হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3588)


3588 - عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى على النجاشي فكبَّر أربعًا.

حسن: رواه ابن ماجه (1538) عن سهل بن أبي سهل، قال: حدثنا مكي بن إبراهيم أبو السكن، عن مالك، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

وإسناده حسن لأجل سهل بن أبي سهل، وهو ابن زنجلة، قال أبو حاتم:"صدوق"، واعتمده الحافظ في"التقريب"، وذكره ابن حبان في"الثقات".
وأما ما رُوي عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم كبَّر على النجاشي خمسًا فهو باطل، رواه الجوزقاني في"الأباطيل" (427) وقال:"هذا حديث باطل، وسعيد بن المرزبان هذا كان أعور من أهل الكوفة، قال أبو حفص عمرو بن علي: هو ضعيف الحديث، وقال يحيى بن معين: هو ليس بشيء، وعكاشة بن محصن هذا مجهول، هو ليس بعكاشة بن محصن الأسدي الذي روى عن النبي صلى الله عليه وسلم"، انتهى.

وعلق عليه الدكتور الفريوائي محقق كتاب"الأباطيل" قائلًا:"لعله سقط من السند لفظ"ابن" كان فيه عن ابن عكاشة، والمراد به محمد بن إسحاق بن إبراهيم بن محمد بن عكاشة بن محصن أحد المتروكين، نسب إلى جده الأعلى، وهو مذكور في"التهذيب" (9/ 430) انتهى.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম নাজ্জাশীর জানাযার সালাত আদায় করেন এবং চার তাকবীর দেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3589)


3589 - عن الشعبي قال: أخبرني من شهد النبيَّ صلى الله عليه وسلم أنه أتى على قبر منبوذ فصَفَّهم وكبَّر أربعًا.

قلت: يا أبا عمرو! من حدَّثك؟ . قال: ابن عباس رضي الله عنهما.

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1319) عن مسلم، (وهو ابن إبراهيم) حدثنا شعبة، حدثنا الشيباني، عن الشعبي فذكره، وسيأتي مفصلًا.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি পরিত্যক্ত (বা বিচ্ছিন্ন) কবরের কাছে এলেন। অতঃপর তিনি (উপস্থিত লোকদের) কাতারবদ্ধ করলেন এবং চার তাকবীর দিলেন (জানাযার সালাত আদায় করলেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (3590)


3590 - عن يزيد بن ثابت، وكان أكبر من زيد، قال: خرجنا مع النبي صلى الله عليه وسلم فلما ورد البقيعَ فإذا هو بقبر جديد فسأل عنه فقالوا: فُلانة، قال: فعرفها وقال:"ألا آذنتموني بها" قالوا: كنتَ قائلًا صائمًا، فكرهنا أن نؤذيك، قال:"فلا تفعلوا، لا أعرفنَّ ما مات منكم ميت، ما كنت بين أَظهركم إلا آذنتموني به، فإن صلاتي عليه له رحمةٌ" ثم أتى القبر، فصفَفنا خلقَه، فكبَّر عليه أربعًا.

صحيح: رواه النسائي (2022)، وابن ماجه (1528) كلاهما من حديث عثمان بن حكيم الأنصاري، عن خارجة بن زيد بن ثابت، عن عمه يزيد بن ثابت فذكره، وإسناده صحيح.

وصحَّحه أيضًا ابن حبان (3087) ورواه من هذا الوجه.




ইয়াযীদ ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (যিনি যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর চেয়ে বয়সে বড় ছিলেন) তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হলাম। যখন তিনি বাকী' গোরস্থানে পৌঁছালেন, তখন তিনি সেখানে একটি নতুন কবর দেখতে পেলেন। তিনি সেটি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। লোকেরা বলল: এটা অমুক মহিলার কবর। বর্ণনাকারী বলেন, তিনি তাকে চিনতে পারলেন এবং বললেন: "তোমরা আমাকে কেন জানালে না?" তারা বলল: আপনি তখন দুপুরে বিশ্রাম নিচ্ছিলেন এবং সিয়াম পালনকারী ছিলেন। তাই আমরা আপনাকে কষ্ট দিতে অপছন্দ করলাম। তিনি বললেন: "তোমরা এমন করো না। জেনে রাখো, যতক্ষণ আমি তোমাদের মাঝে উপস্থিত থাকি, ততক্ষণ তোমাদের কেউ মারা গেলে তোমরা অবশ্যই আমাকে জানাবে। কারণ তার উপর আমার সালাত (জানাযা) তার জন্য করুণা (রহমত)।" এরপর তিনি কবরের কাছে আসলেন এবং আমরা তার পেছনে কাতার বাঁধলাম। অতঃপর তিনি তার উপর চার তাকবীর দিয়ে সালাত (জানাযা) আদায় করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3591)


3591 - عن أبي أمامة بن سهل بن حُنيف أنه قال: اشتكت امرأة بالعوالي مسكينةٌ، فكان النبي صلى الله عليه وسلم يسألُهم عنها، وقال: إن ماتت فلا تُدفنوها حتى أصلي عليها، فتوفيت فجاؤا بها إلى المدينة بعد العتمة، فوجدوا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قد نام، فكرهوا أن يُوقِظوه، فصلوا عليها ودفنوها ببقيع الغرقد، فلما أصبح رسول الله صلى الله عليه وسلم جاؤا فسألهم عنها، فقالوا: قد دُفنت يا رسول الله، وقد جئناك فوجدناك نائمًا فكرهنا أن نوقظك، قال:"فانطلقوا" فانطلق يمشي، ومشوا معه حتى أرَوه قبرها، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم وصفوا وراءه فصلى عليها وكبر أربعًا.
صحيح: رواه النسائي (1969) عن يونس بن عبد الأعلى، قال: أنبأنا ابن وهب، قال: حدثني يونس، عن ابن شهاب، قال: أخبرني أبو أمامة بن سهل فذكره.

والحديث صحيح إلا أن أبا أمامة بن سهل واسمه أسعد مشهور بكنيته له رؤية ولم يسمع من النبيّ صلى الله عليه وسلم، وليس هو أبو أمامة الباهلي الصحابي المشهور، وأقام البيهقي (4/ 48) إسناد هذا الحديث فرواه من طريق الأوزاعي. قال: أخبرني ابن شهاب، عن أبي أمامة بن سهل بن حُنيف الأنصاري أن بعض أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم أخبره، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يعود مرضى مساكين المسلمين وضعفائهم، ويتبع جنائزهم، ولا يصلي عليهم أحد غيره، وإن امرأة مسكينة من أهل العوالي … فذكر بقية الحديث مثله، وزاد فيه بعض التفاصيل، وفيه:"أنه كبَّر أربعًا كما يكبر على الجنائز".




আবূ উমামাহ ইবনে সাহল ইবনে হুনাইফ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মদীনার আওয়ালী নামক স্থানে এক অভাবী (মিসকীন) নারী অসুস্থ হয়ে পড়লে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার খোঁজ-খবর নিতেন। তিনি বলেছিলেন: "যদি সে মারা যায়, তবে আমি তার জানাযার সালাত আদায় না করা পর্যন্ত তোমরা তাকে দাফন করো না।" অতঃপর সে মারা গেল এবং লোকেরা ইশার পরে তাকে মদীনাতে নিয়ে আসল। তারা এসে দেখলেন, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘুমিয়ে পড়েছেন। তাই তারা তাঁকে জাগানো অপছন্দ করলেন। অতঃপর তারা নিজেরাই তার উপর সালাত আদায় করে তাকে বাকীউল গারক্বাদে দাফন করে দিল। যখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভোরে উঠলেন, তখন তারা আসল। তিনি তাদের কাছে ঐ নারীর সম্পর্কে জানতে চাইলেন। তারা বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! তাকে দাফন করা হয়েছে। আমরা আপনার কাছে এসেছিলাম, কিন্তু আপনাকে ঘুমন্ত দেখে জাগানো অপছন্দ করেছি।" তিনি বললেন: "তোমরা যাও।" অতঃপর তিনি হেঁটে চললেন এবং সাহাবীগণও তাঁর সাথে চললেন, যতক্ষণ না তাঁকে তার কবর দেখানো হলো। এরপর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়ালেন এবং সাহাবীগণ তাঁর পেছনে কাতারবদ্ধ হলেন। তিনি তার উপর জানাযার সালাত আদায় করলেন এবং চারবার তাকবীর বললেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3592)


3592 - عن أبي يعفور، عن عبد الله بن أبي أوفي قال: شهدته، وكبَّر على جنازة أربعًا، ثم قال ساعة يعني يدعو، ثم قال: أتروني كنتُ أكبر خمسًا؟ قالوا: لا. قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: يكبر أربعًا.

صحيح: رواه البيهقي (4/ 35) من طرق عن أبي العباس محمد بن يعقوب، ثنا السري بن يحيى، ثنا قبيصة، ثنا الحسن بن صالح، عن أبي يعفور فذكره.

ورواه أيضًا إبراهيم الهجري، عن ابن أبي أوفى بمعناه إلا أنه قال: قالوا: قد رأينا ذلك. قال: ما كنت لأفعل أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُكبر أربعًا، ثم يمكث ما شاء الله، وذكر فيه قصة وهي أن ابنة له ماتت، وكان يتبع جنازتها على بغلةٍ خلفَها، فجعل النساء يبكين، فقال: لا ترثين، فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن المرائي، فتفيض إحداكن من عَبرتها ما شاءت، ثم كبَّر عليها أربعًا، ثم قام بعد الرابعة قدر ما بين التكبيرتين يدعو، ثم قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصنع في الجنازة هكذا.

رواه الإمام أحمد (19140) عن حسين بن محمد، حدثنا شعبة، عن إبراهيم الهَجري، عن عبد الله بن أبي أوفي فذكره.

إلا أن إبراهيم هو ابن مسلم الهَجري ضعيف، ولذا تعقب الذهبي على الحاكم (1/ 359 - 360) في قوله:"هذا حديث صحيح ولم يخرجاه، وإبراهيم بن مسلم الهجري لم يُنقم عليه بحجة" قال:"ضعَّفوا إبراهيم".

وهذا الحديث أخرجه أيضًا ابن ماجه (1503) وضعَّفه البوصيري في الزوائد من أجل إبراهيم الهجري.

قلت: إن كانت القصة غير صحيحة فأصل الحديث صحيح كما رأيت من طريق أبي يعفور، ولكن يُعكر هذا ما قاله الطبراني في الصغيره (268) بأن الحديث المشهور الذي رواه أبو يعفور عن ابن أبي أوفي هو قوله: غزونا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم سبع غزوات، نأكل فيهن الجراد، هكذا قال: ولا يعد من أبي يعفور وهو ثقة ضابط أن يروي عن ابن أبي أوفي حديثين مستقلين، فلا يُضعَّفُ
أحدهما بالثاني، ولذا صدَّر البيهقي رواية أبي يعفور، وأتبعه برواية إبراهيم الهجري، وسكت الذهبي في"مهذب السنن الكبرى" (3/ 1380)، والحافظ في"التلخيص" والحمد لله على توفيقه.

وأما ما جاء في حديثه من زيادة بأنه سلَّم عن يمينه، وعن شماله من رواية إبراهيم الهجري فلم أجد له متابعًا كما سيأتي في باب ما جاء في تسليمتين.




আব্দুল্লাহ ইবনে আবি আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি তাঁকে (জানাযার সালাতে) দেখেছি, তিনি এর উপর চারটি তাকবীর দিলেন। এরপর তিনি কিছুক্ষণ সময় নিলেন—অর্থাৎ দোয়া করলেন। অতঃপর তিনি বললেন: তোমরা কি মনে করো আমি পাঁচটি তাকবীর দিয়েছিলাম? তারা বলল: না। তিনি বললেন: নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বলেছেন: (জানাযার সালাতে) চারটি তাকবীর দিতে হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (3593)


3593 - عن عبد الرحمن بن أبي ليلى قال: كان زيد (بن أرقم) يُكَبّر على جنازة أربعًا، وإنه كبَّر على جنازة خمسًا، فسألتُه فقال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُكبرها.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (957) من طرق عن شعبة، عن عمرو بن مرة، عن عبد الرحمن ابن أبي ليلى فذكره.

قال ابن عبد البر: ففي هذا ما يدل على أن تكبيره على الجنازة كان أربعًا، وإنه إنما كبر خمسًا مرة واحدة، ولا يوجد هذا عن النبيّ صلى الله عليه وسلم إلا من هذا الوجه".

ونقل الترمذي عن الإمام أحمد وإسحاق: إذا كبر الإمام على الجنازة خمسًا، فإنه يُتَّبع، انتهى. وأما ما رُوي عن كثير بن عبد الله، عن أبيه، عن جده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كبَّر خمسًا فهو ضعيف، رواه ابن ماجه (1506) من طريق إبراهيم بن علي الرافعي، عن كثير بن عبد الله، عن أبيه عن جده.

وإبراهيم بن علي الرافعي رماه بعضهم بالكذب، وشيخه كثير بن عبد الله قال فيه الشافعي:"ركن من أركان الكذب".

وكذلك لا يصح ما رُوي عن حذيفة أنه كبَّر على جنازة خمسًا، ثم قال: رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم فعله، رواه ابن أبي شيبة (3/ 186) عن وكيع، عن جعفر بن زياد، عن يحيى بن الحارث التيمي مولى لحذيفة، عن حذيفة فذكره، ورواه الطحاوي في"شرح المعاني" (2755) من وجه آخر نحوه، وفي الإسناد من لا يحتج به كما قال ابن عبد البر، وسيأتي النقل منه.

أقوال أهل العلم في عدد التكبيرات على الجنائز:

بوَّب البيهقي (4/ 37) بقوله:"باب ما يستدل به على أن أكثر الصحابة اجتمعوا على أربع، ورأى بعضهم الزيادة منسوخة" ثم أخرج بإسناده عن عمر بن الخطاب قال: كل ذلك قد كان أربعًا وخمسًا، فاجتمعنا على أربع تكبيرات على الجنازة، وعن أبي وائل قال: كانوا يكبرون على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم سبعًا وخمسًا وستًا، أو قال: أربعًا فجمع عمر بن الخطاب أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأخبر كل رجل بما رأى، فجمعهم عمر على أربع تكبيرات كأطول الصلاة.

وقال المنذري: وقد اختلف الناس في التكبير على الجنازة.

فقيل: أربع تكبيرات، وروي ذلك عن عمر بن الخطاب، وابنه عبد الله بن عمر، وزيد بن ثابت،
وجابر بن عبد الله، والحسن بن علي، وأخيه محمد بن علي، وأبي هريرة، والبراء بن عازب، وعقبة ابن عامر، وعبد الله بن أبي أوفي، وعطاء بن أبي رباح، وهو قول مالك والشافعي والأوزاعي، وأبي حنيفة والثوري والكوفيين، وأحمد بن حنبل، وأبي ثور، وداود.

وقال ابن عبد البر النَّمَري:"هو قول عامة الفقهاء، إلا أن أبي ليلى وحده، فإنه قال: خمسًا، ولا أعلم له في ذلك سلفًا إلا زيد بن أرقم، وقد اختلف عنه في ذلك، وحذيفة، وأبا ذر، وفي الإسناد عنهما: من لا يحتج به" هذا آخر كلامه - يعني ابن عبد البر.

ثم قال المنذري:"ورجح بعضهم الأربع بكثرة رواته، وصحة أسانيدها، وأنها متأخرة، وقد صلى أبو بكر الصديق على النبي صلى الله عليه وسلم فكبر أربعًا، وصلى عمر على أبي بكر فكبر أربعًا، وصلى صهيب على عمر فكبر أربعًا، وصلى الحسن على أبيه عليّ فكبر أربعًا، وصلى عثمان على جنازة فكبر أربعًا، وروي: أن ابن عمر كبر على عمر أربعًا، ولا يصح، وإنما هو صهيب.

وقال ابن سيرين وجابر بن زيد: فكبر ثلاثًا، وروي ذلك عن ابن عباس.

وكان علي بن أبي طالب يكبر على أهل بدر ستَّ تكبيرات، وعلى سائر الصحابة خمسًا، وعلى سائر الناس أربعًا.

وقد روى البيهقي: أن عليًا صلى على أبي قتادة الأنصاري، فكبر عليه سبعًا، وكان بدريًا، وقال البيهقي: هكذا رُوي، وهو غلط؛ لأن أبا قتادة بقي بعد علي رضي الله عنهما مدة طويلة، هذا آخر كلامه- أي البيهقي.

ومن الناس: من صحَّح أن أبا قتادة توفي بالمدينة، سنة أربع وخمسين، وهذا يؤيده ما قاله البيهقي.

وقال أبو عمر النمري: والصحيح أنه توفي بالكوفة في خلافة علي، وهو صلى عليه، وهذا يؤيد الرواية الأولى، والله أعلم.

وقال بعضهم: اختلف السلف الأول من الصحابة في ذلك: من ثلاث تكبيرات، إلى تسع. هذا آخر كلام المنذري.

وفي هذا النقل من المنذري رد على من ادعي الإجماع على أربع تكبيرات، وأما ما رُوي عن ابن عباس قال: آخر جنازة صلى عليها رسول الله صلى الله عليه وسلم كبَّر عليها أربعًا، رواه البيهقي في"السنن الكبرى" (4/ 37) وقال: تفرد به النضر بن عبد الرحمن أبو عمر الخزاز، عن عكرمة وهو ضعيف. وقد رُوي هذا اللفظ من وجوه أخر كلها ضعيفة"، انتهى.



أحدهما: حديث أبي هريرة قال:"إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كبَّر على جنازة فرفع يديه في أول تكبيرة، ووضع اليمني على اليسرى".

رواه الترمذي (1077) عن القاسم بن دينار الكوفي، حدثنا إسماعيل بن أبان الوراق، عن يحيى بن يعلى، عن أبي فروة يزيد بن سنان، عن زيد (وهو ابن أبي أُنيسة) عن الزهري، عن سعيد ابن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.

قال الترمذي:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه".

قلت: هذا إسناد ضعيف فإن فيه يزيد بن سنان أبا فروة ضعَّفه الدارقطني وأورده النووي في"الخلاصة" (3514) في الفصل الضعيف.

والحديث الثاني: حديث ابن عباس قال:"إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يرفع يديه على الجنازة في أول تكبيرة، ثم لا يعود".

رواه الدارقطني (2/ 75) من طريق الفضل بن السكن، حدثني هشام بن يوسف، ثنا معمر، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس فذكره.

قال الذهبي في"الميزان" (3/ 352): الفضل بن السكن الكوفي عن هشام بن يوسف، لا يعرف، وضعَّفه الدارقطني".

وهذا الحديث ذكره أيضًا النووي في الفصل الضعيف، ونقل تضعيفه عن الدارقطني.

وقال الحافظ في"التلخيص" (2/ 147):"ضعيف لا يصح فيه شيء".

والحديثان ذكرهما ابن التركماني في"الجوهر النقي" (4/ 44) وسكت عليهما.

وقال الترمذي عقب حديث أبي هريرة:"اختلف أهل العلم في هذا، فرأى أكثر أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم، أن يرفع الرجل يديه في كل تكبيرة على الجنازة، وهو قول ابن المبارك والشافعي وأحمد وإسحاق، وقال بعض أهل العلم: لا يرفع يديه إلا في أول مرة، وهو قول الثوري وأهل الكوفة، وذُكر عن ابن المبارك أنه قال: لا يقبض يمينه على شماله، ورأى بعض أهل العلم أن يقبض بيمينه على شماله كما يفعل في الصلاة. قال الترمذي: هذا أحب إليّ". انتهى.

قلت: لعل الجمهور ذهبوا إلى رفع اليدين في كل تكبيرة قياسًا على الصلاة، لأن النبي صلى الله عليه وسلم سماها صلاةٌ في أكثر من حديث كما ذكرها البخاري في صحيحه (3/ 189).

ولعل من أدلتهم ما رواه البيهقي (4/ 44) وغيره بإسناد صحيح عن ابن عمر أنه كان يرفع يديه على كل تكبيرة من تكبيرة الجنازة، وإذا قام بين الركعتين يعني في المكتوبة، ويذكر عن أنس بن مالك أنه كان يرفع يديه كلما كبَّر على الجنازة.

ومن المعروف أن ابن عمر كان شديد التتبع لفعل النبي صلى الله عليه وسلم فلا يبعد أن يكون قد أخذ هذا العمل من النبي صلى الله عليه وسلم؛ ولم يصل إلينا بسند يعتمد عليه، وأما ما رُوي عنه مرفوعًا فهو ضعيف، رواه
الطبراني في"الأوسط""مجمع البحرين" (1282) عن موسى بن عيسى الجزري، ثنا صهيب بن محمد بن عباد بن صُهيب، ثنا عبَّاد بن صُهيب، ثنا عبد الله بن محرر، عن نافع، عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يرفع يديه عند التكبيرة في كل صلاة، وعلى الجنازة. قال الطبراني: لم يرو هذه اللفظة:"وعلى الجنائز" إلا ابن محرر، تفرد به عبَّاد.

قلت: وهو كما قال، فإن عبد الله بن محرر القاضي قال فيه أبو حاتم:"متروك الحديث".

وقال ابن حبان: كان من خيار عباد الله إلا أنه يكذب، والراوي عنه عباد بن صُهيب أحد المتروكين أيضًا كما في الميزان" و"اللسان".

وقد أشار الهيثمي في"المجمع" (3/ 32) إلى تضعيفه فقال:"عبد الله بن محرر مجهول" وسكت عن عباد بن صُهيب. وضعَّفه أيضًا الحافظ في"الفتح" (3/ 190).

فالصحيح أن ما روي عن ابن عمر هو موقوف عليه.




যায়িদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আব্দুর রহমান ইবনে আবি লায়লা বলেন, যায়িদ ইবনে আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জানাযার সালাতে সাধারণত চারটি তাকবীর দিতেন। কিন্তু একবার তিনি একটি জানাযায় পাঁচটি তাকবীর দিলেন। তখন আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও এরূপ তাকবীর দিতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3594)


3594 - عن طلحة بن عبد الله بن عوف قال: صليتُ خلف ابن عباس على جنازة، فقرأ بفاتحة الكتاب، وقال: ليعلموا أنها سنة.

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1335) عن محمد بن بشار، حدثنا غندر، حدثنا شعبة، عن سعد، عن طلحة فذكره. وأما محل قراءة الفاتحة فهو بعد التكبيرة الأولى.

قال الترمذي (1027) بعد أن أخرج حديث ابن عباس من طريق سفيان، عن سعد بن إبراهيم: هذا حديث حسن صحيح، والعمل على هذا عند بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم يختارون أن يُقْرأ بفاتحة الكتاب بعد التكبيرة الأولى، وهو قول الشافعي وأحمد وإسحاق، وقال بعض أهل العلم: لا يقرأ في الصلاة على الجنازة، إنما هو ثناء على الله، والصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم والدعاء للميت وهو قول الثوري وغيره من أهل الكوفة"، انتهى. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (3/ 57).

وأما ما رواه النسائي (1987) عن الهيثم بن أيوب، عن إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن طلحة وفيه:"فقرأ بفاتحة الكتاب وسورةٍ، وجهر حتى أسمعنا، فلما فرغ أخذتُ بيده فسألته فقال:"سنة وحق"، فزاد فيه: سورة أخرى مع الفاتحة -كما جهر في قراءته وإسناده صحيح.

وثبت أيضا ذكر قراءة سورة أخرى عند ابن الجارود (537) من وجهين آخرين عن إبراهيم بن سعد. وقد صحح إسناده النووي في"المجموع" (5/ 234) فلعله فعل مرة أو مرتين لبيان جواز ذلك لا أنه سنة مستمرة، وإلا فقد قال البيهقي (4/ 38): اذكر السورة غير محفوظ".




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তালহা ইবনে আবদুল্লাহ ইবনে আওফ বলেন: আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পেছনে একটি জানাজার সালাত আদায় করেছিলাম। তিনি ফাতিহাতুল কিতাব (সূরা ফাতিহা) পাঠ করলেন এবং বললেন: তারা যেন জানতে পারে যে এটি সুন্নাত।









আল-জামি` আল-কামিল (3595)


3595 - عن أبي أمامة أنه قال: السنة في الصلاة على الجنازة أن يقرأ في التكبيرة
الأولى بأم القرآن مُخافتةٌ، ثم يكبر ثلاثًا، والتسليم عند الآخرة.

صحيح: رواه النسائي (1989) عن قتيبة قال: حدثنا الليث، عن ابن شهاب، عن أبي أمامة فذكره.

وإسناده صحيح، صحَّحه الحاكم (1/ 360) على شرط الشيخين، وكذا قال النووي أيضًا في"المجموع" (5/ 33)، وصحَّحه الحافظ في"الفتح".

وقوله:"من السنة أي من سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم.

قلت: إلا أنه مرسل الصحابي، فإن أبا أمامة ليس هو الباهلي الصحابي المشهور، وإنما هو: أسعد ابن سهل بن حُنيف الأنصاري، ولد في حياة النبي صلى الله عليه وسلم، ولم يسمع منه، وروي عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا.

والحديث المذكور وصله الشافعي بذكر رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، أخرجه البيهقي (4/ 39) من طريق الشافعي أنبأ مطرف بن مازن، عن معمر، عن الزهري، قال: أخبرني أبو أمامة بن سهل، أنه أخبره رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم"أن السنة في الصلاة على الجنازة أن يُكبر الإمام، ثم يقرأ بفاتحة الكتاب بعد التكبيرة الأولى سِرًا في نفسه، ثم يصلي على النبي صلى الله عليه وسلم، ويخلص الدعاء للجنازة في التكبيرات لا يقرأ في شيء منهن، ثم يُسلم سِرًا في نفسه".

ومطرف كذّبه ابن معين، ثم روى عن الضحاك بن قيس مثل قول أبي أمامة، ثم قال البيهقي:"فقويت بذلك رواية مطرف في ذكر الفاتحة" انتهى.

فلا كراهية في قراءة الفاتحة سواء على سبيل الثناء كما يقول الحنفية، أو على سبيل القراءة كما يقول الجمهور.

انظر ما ذكره الشيخ عبد الحي الحنفي في"التعليق الممجد" (2/ 113) وقوله:"ثم يصلي على النبي صلى الله عليه وسلم" أي بعد التكبيرة الثانية، ويختار من صيغ الصلاة على النبي صلى الله عليه وسلم كما سبق في التشهد.

وقوله:"ويُخلص الدعاء" أي بعد التكبيرة الثالثة، ويختار من الأدعية ما يشاء كما سيأتي.

وقوله:"ثم يسلم سرا" أي لا يرفع صوته كالصلوات، بل يُسلم حتى يسمع من يليه، وكان ابن عمر يفعل ذلك، وهو أحد أقوال الإمام أحمد، والقول الثاني له: أنه يُسلم جهرًا.

وأما من فاته بعض الصلاة، فإنه يقضي ما فاته على صفته بعد أن يُسلم الإمام، قياسًا على الصّلوات المفروضة، لأني لم أجد حديثًا صحيحًا ولا ضعيفًا فيمن فاته بعض الصلاة على الجنائز.




আবূ উমামা থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, জানাযার নামাযের সুন্নাত হলো, প্রথম তাকবীরের পর নিঃশব্দে উম্মুল কুরআন (সূরাহ ফাতিহা) পাঠ করা। এরপর আরও তিনবার তাকবীর বলা এবং শেষে সালাম ফিরানো।









আল-জামি` আল-কামিল (3596)


3596 - عن أبي هريرة قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إذا صليتُم على الميت فأخلصوا له الدعاء".

حسن: رواه أبو داود (3199)، وابن ماجه (1497) كلاهما من طريق محمد بن سلمة الحرّاني، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي
هريرة فذكره.

وإسناده حسن لأجل محمد بن إسحاق فإنه مدلس، فإذا صرَّح يُحسن حديثه، وقد وقع التصريح بالتحديث عند ابن حبان (3077) فإنه رواه من وجه آخر عن محمد بن إسحاق، قال: حدثني محمد بن إبراهيم، عن سعيد بن المسيب وأبي سلمة بن عبد الرحمن وسلمان الأغر مولى جهينة، كلهم حدثوني عن أبي هريرة فذكر الحديث.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যখন তোমরা মৃত ব্যক্তির উপর (জানাযার) সালাত আদায় করো, তখন তার জন্য বিশুদ্ধচিত্তে দু’আ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (3597)


3597 - عن عوف بن مالك يقول: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم على جنازة، فحفظتُ من دعائه وهو يقول:"اللهم! اغفر له وارحمه، وعافه واعفُ عنه، وأَكرِم نُزُلَه، ووَسِّع مُدخَلَه، واغسِله بالماء والثلج والبَرَد، ونَقِّه من الخطايا كما نَقَّيتَ الثوبَ الأبيضَ من الدنَس، وأبدِله دارًا خيرًا من داره، وأهلًا خيرًا من أهله، وزوجًا خيرًا من زوجه، وأدخِله الجنة، وأعِذه من عذاب القبر أو من عذاب النار" قال: حتى تمنيت أن أكون أنا ذلك الميت.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (963) عن هارون بن سعيد الأيلي، أخبرنا ابن وهب، أخبرني معاوية بن صالح، عن حبيب بن عبيد، عن جبير بن نُفير، سمعه يقول: سمعت عوف بن مالك فذكر الحديث.

وفي رواية عنده من طريق ابن وهب قال: أخبرني عمرو بن الحارث، عن أبي حمزة بن سليم، عن عبد الرحمن بن جبير بن نفير، عن أبيه ولفظه:"اللهم! اغفر له وارحمه، واعف عنه وعافه، وأكرم نُزُلَه، ووسِّع مُدخله، واغسِله بماءٍ وثلجٍ وبَرَدٍ، ونَقِّه من الخطايا كما يُنَقَّى الثوبُ الأبيضُ من الدنس، وأبدله دارُا خيرًا من داره، وأهلًا خيرًا من أهله، وزوجًا خيرًا من زوجه، وقِهِ فتنةَ القبرِ وعذابَ النار".

وروى الترمذي (1025) من هذا الوجه مختصرا بقوله:"اللَّهم اغفر له، وارحمه، واغسله بالبرد، واغسله كما يُغسل الثوب".

وقال: قال محمد -يعني البخاري-:"أصح شيء في هذا الباب هذا الحديث". كذا بصيغة المجهول:"كما يُنَقَّى الثوبُ الأبيضُ"، هذا هو الصحيح ولا يحتاج إلى تفسير، وأما قوله:"كما نَقَّيتَ الثوبَ الأبيضَ" فيحتاج إلى كشف معانيه.




আওফ ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি জানাযার সালাত আদায় করলেন। আমি তাঁর দু'আ মুখস্থ করে নিলাম। তিনি বলছিলেন: "হে আল্লাহ! তাকে ক্ষমা করে দিন, তার প্রতি রহম করুন, তাকে নিরাপত্তা দিন এবং তাকে মাফ করে দিন। তার আতিথেয়তাকে সম্মানজনক করুন, এবং তার প্রবেশস্থল প্রশস্ত করে দিন। তাকে পানি, বরফ ও শিলাবৃষ্টি দ্বারা ধৌত করুন। তাকে পাপসমূহ থেকে এমনভাবে পরিষ্কার করে দিন, যেমন আপনি সাদা কাপড়কে ময়লা থেকে পরিষ্কার করে দেন। তাকে তার ঘরের চেয়ে উত্তম ঘর, তার পরিবারের চেয়ে উত্তম পরিবার এবং তার স্ত্রীর চেয়ে উত্তম স্ত্রী দান করুন। তাকে জান্নাতে প্রবেশ করান এবং তাকে কবরের শাস্তি থেকে অথবা জাহান্নামের শাস্তি থেকে রক্ষা করুন।" তিনি (আওফ ইবনে মালিক) বলেন: এমনকি আমি এই আকাঙ্ক্ষা করেছিলাম যে, আমি যদি সেই মৃত ব্যক্তি হতাম!









আল-জামি` আল-কামিল (3598)


3598 - عن أبي هريرة قال: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم على جنازة فقال:"اللَّهم! اغفر لحيِّنا ومَيِّتِنا، وصغيرنا وكبيرنا، وذكرنا وأُنثانا، وشاهدنا وغائبنا، اللَّهم! من أحييته منا فأحيه على الإيمان، ومن توفيتَه منا فتوفه على الإسلام، اللَّهم! لا تحرمنا
أجره، ولا تضلنا بعده".

صحيح: رواه أبو داود (3201)، والترمذي (1024)، وابن ماجه (1498) من طرق عن يحيى ابن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة فذكره، إلا ابن ماجه فإنه أخرجه من وجه آخر عن أبي سلمة بإسناده مثله.

ويحيى بن أبي كثير مدلس، إلا أنه توبع عند ابن ماجه فرواه من طريق محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، كما أنه صرَّح بالتحديث في رواية الحاكم (1/ 358) وصحَّحه على شرط الشيخين، وصحَّحه أيضًا ابن حبان (3070).

وليحيى بن كثير طرق أخرى، منها: ما رواه الأوزاعي عنه، عن أبي إبراهيم الأشهلي، عن أبيه قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا صلى على جنازة قال:"اللَّهم! اغفر لحينا وميتنا وشاهدنا وغائبنا، وصغيرنا وكبيرنا وذكرنا وأنثانا"، رواه الترمذي (1024)، والنسائي (1986)، وقال الترمذي:"حديث والد أبي إبراهيم حسن صحيح"، وقال: سمعتُ محمدًا -يعني البخاري- يقول:"أصح الروايات في هذا، حديث يحيى بن أبي كثير، عن أبي إبراهيم الأَشهلي، عن أبيه، وسألتُه عن اسم أبي إبراهيم فلم يعرفه"، انتهى.

وقال أبو حاتم عن أبي إبراهيم الأشهلي:"لا يُدري من هو؟""الجرح والتعديل" (9/ 332).

وجعله الحافظ في درجة"مقبول" أي حيث يتابع، وقد توبع.

ومنها ما رواه هشام الدستوائي وعلي بن المبارك هذا الحديث عن يحيى بن أبي كثير، عن سلمة ابن عبد الرحمن، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا.

ورواه الحاكم (1/ 358) من طريق عمر بن يونس بن القاسم اليمامي، ثنا عكرمة بن عمار، عن يحيى بن أبي كثير، حدثني أبو سلمة بن عبد الرحمن، قال: سألت عائشة أم المؤمنين كيف كانت صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم على الميت فقالت: كان يقول:"اللَّهم! اغفر لحينا وميتنا، وذَكرنا وأنثانا، وشاهدنا وغائبنا، وصغيرنا وكبيرنا، اللَّهم! من أحييته منا فأحيه على الإسلام، ومن توفيته منا فتوفه على الإيمان".

جعله الحاكم شاهدًا صحيحًا على شرط مسلم لحديث أبي هريرة.

ولكن قال الترمذي: حديث عكرمة بن عمار غير محفوظ، وعكرمة ربما يهم في حديث يحيي".

قلت: وهو كما قال، والجمهور على أنه مضطرب الحديث وخاصة في روايته عن يحيى بن أبي كثير، لأنه لم يكن عنده كتاب ولعلّ هذا منه، لأن المعروف أن هذا الحديث رواه الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، قال: حدثني أبو سلمة، عن أبي هريرة.

وليحيى بن أبي كثير طرق أخرى منها ما رواه عن عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه أنه شهد النبي صلى الله عليه وسلم صلى على ميت، فسمعه يقول:"اللهم اغفر لحينا وميتنا، وشاهدنا وغائبنا، وصغيرنا وكبيرنا،
وذَكرنا وأُنثانا".

قال: وحدثني أبو سلمة بهؤلاء الثمان كلمات، وزاد كلمتين:"من أحييته منا فأحيه على الإسلام، ومن توفيته منا فتوفه على الإيمان".

رواه الإمام أحمد (17546، 22554) من طريقين عن همام، قال: حدثنا يحيى بن أبي كثير، حدثنا عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه فذكره، وقد صرَّح ابن أبي كثير في إحدى روايته بالتحديث. وهذا الطريق ذكره الذهبي في المختصر السنن الكبرى" (3/ 1385) وسكت عليه.




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি জানাযার সালাত আদায় করলেন এবং বললেন: “হে আল্লাহ! আমাদের জীবিত ও মৃতদের, আমাদের ছোট ও বড়দের, আমাদের পুরুষ ও নারীদের, আমাদের উপস্থিত ও অনুপস্থিতদের ক্ষমা করে দাও। হে আল্লাহ! আমাদের মধ্যে যাকে তুমি জীবিত রাখবে, তাকে ঈমানের উপর জীবিত রাখো, আর যাকে তুমি মৃত্যু দেবে, তাকে ইসলামের উপর মৃত্যু দাও। হে আল্লাহ! আমাদেরকে এর প্রতিদান থেকে বঞ্চিত করো না এবং এর (মৃত্যুর) পরে আমাদেরকে পথভ্রষ্ট করো না।”









আল-জামি` আল-কামিল (3599)


3599 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"اللَّهم! عبدُك وابن عبدك، كان يشهد أن لا إله إلا أنت، وأن محمدًا عبدك ورسولك، وأنت أعلم به، إن كان محسنًا فزده في إحسانه، وإن كان مسيئًا فاغفر له، ولا تَحرمنا أجره ولا تَفتِنَّا بعده".

صحيح: رواه أبو يعلى"المقصد العلي" (465) عن وهب بن بقية، أنا خالد بن عبد الله، عن عبد الرحمن بن إسحاق المديني، عن سعيد بن أبي سعيد، عن أبي هريرة فذكر الحديث، وصحَّحه ابن حبان (3073) فأخرجه عن أبي يعلى وهو أحمد بن علي بن المثنى الموصلي به مثله.

وإسناده صحيح، قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 33): رواه أبو يعلى ورجاله رجال الصحيح".

قلت: وهو كما قال، ولكن رواه مالك في الجنائز (3/ 33)، وعنه عبد الرزاق في المصنف" (6425) عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبيه، أنه سأل أبا هريرة كيف تُصلي على الجنازة؟ فقال أبو هريرة: لعَمرُ الله أُخبِرُكَ أتَّبِعُها من أهلها، فإذا وُضِعت كبَّرتُ وحمدتُ الله، وصليتُ على النبي، ثم أقول: فذكر الدعاء ولم يرفعه إلى النبي صلى الله عليه وسلم.

وليس فيه انقطاع كما قالوا: فإن سعيد بن أبي سعيد المقبري روي عن أبيه، عن أبي هريرة، وروي أيضًا عن أبي هريرة بدون واسطة أبيه.

وأما كون مالك أوقفه فلعله يَعُود إلى سعيد بن أبي سعيد المقبري فإنه اختلط عليه قبل موته، فلعله رواه مرة مرفوعًا، ثم شك فرواه موقوفًا فما كان من اليقين يُؤخذ، وما كان من الشك يترك.

وأما ما رُوي عن علي بن شماخ قال: شهدتُ مروان يسأل أبا هريرة: كيف سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي على الجنازة؟ قال: أمع الذي قلت؟ قال: نعم، قال: كلام كان بينهما قبل ذلك، قال أبو هريرة:"اللَّهم أنت ربها، وأنت خلقتها، وأنت هديتها للإسلام، وأنت قبضت روحها، وأنت أعلم بسرها وعلانيتها، جئناك شُفَعَاء فاغفر له" فهو ضعيف.

رواه أبو داود (3200) عن أبي معمر عبد الله بن عمرو، حدثنا عبد الوارث، حدثنا أبو الجُلاس عقبة بن سيار، حدثني علي بن شَمَّاخ قال: شهدت مروان سأل أبا هريرة: كيف سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي على الجنازة فذكر الحديث مثله.

ورواه الإمام أحمد (7477) عن يزيد، أخبرنا شعبة، عن الجُلاس، عن عثمان بن شمَّاس قال:
سمعت أبا هريرة ومرَّ عليه مروان فقال: بعضَ حديثه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، أو حديثك عن رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم رجع، فقلنا: الآن يقع به، قال: كيف سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي على الجنائز؟ فذكره.

قال أبو داود: أخطأ شعبةُ في اسم علي بن شَماَّخ، قال فيه عثمان بن شماس، وسمعت أحمد ابن إبراهيم الموصلي يحدث أحمد بن حنبل قال: ما أعلم أني جلست من حماد بن زيد مجلسًا إلا نهى فيه عن عبد الوارث وجعفر بن سليمان. انتهى.

ورُوي هذا الحديث بأسانيد كثيرة إذا جمعت تبين أن فيها اضطرابًا في الإسناد، وجهالةٌ في بعض الرواة، واختلافًا في الوقف والرفع، انظر هذه الأسانيد واختلافها في كتاب الدعاء للطبراني (1179، 1180، 1182، 1183، 1184، 1185)




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আল্লাহ! সে তোমার বান্দা এবং তোমার বান্দার পুত্র, সে সাক্ষ্য দিত যে তুমি ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমার বান্দা ও রাসূল, আর তুমিই তার সম্পর্কে অধিক অবগত। যদি সে সৎকর্মশীল হয়ে থাকে, তবে তার নেকীতে আরও বাড়িয়ে দাও, আর যদি সে পাপী হয়ে থাকে, তবে তাকে ক্ষমা করে দাও, আর আমাদেরকে তার পুরস্কার থেকে বঞ্চিত করো না এবং তার পরে আমাদেরকে পরীক্ষায় (ফিতনায়) ফেলো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3600)


3600 - عن واثلة بن الأسقع قال: صلى بنا رسول الله صلى الله عليه وسلم على رجل من المسلمين، فسمعته يقول:"اللَّهم! إن فُلان بن فُلان في ذمتك، وحبلِ جوارك، فقِه من فتنة القبر وعذاب النار، وأنت أهلُ الوفاء والحق - وفي رواية"الحمد" اللهم فاغفر له، وارحمه، إنك أنت الغفور الرحيم".

حسن: رواه أبو داود (3202)، وابن ماجه (1499) كلاهما عن عبد الرحمن بن إبراهيم الدمشقي، قال: حدثنا الوليد بن مسلم، قال: حدثنا مروان بن جناح، قال: حدثني يونس بن ميسرة بن حَلبَسِ، عن واثلة بن الأسقع فذكره ولفظهما سواء.

وإسناده حسن من أجل مروان بن جناح الأموي مولاهم، الدمشقي، أصله كوفي، وثَّقه جماعة من أهل العلم، وقال أبو حاتم: يكتب حديثه ولا يحتج به، وقال الحافظ في"التقريب":"لا بأس به".

قلت: ومثله يحسن حديثه. والوليد بن مسلم، القرشي مولاهم كثير التدليس والتسوية، وقد صرَّح بالتحديث فانتفت منه شبهة التدليس.

وأخرجه الإمام أحمد (16018) وصحَّحه ابن حبان (3074) كلاهما من طرق، عن الوليد بن مسلم بإسناده مثله.

وقوله:"حبل جوارك" قال بعضهم: كان من عادة العرب أن يخيف بعضهم بعضًا، فكان الرجل إذا أراد سفرًا أخذ عهدًا من سيد كل قبيلة، فيأمن به مادام في حدودها حتى ينتهي إلى الأخرى، فيأخذ مثل ذلك، فهذا حبل الجوار، أي مادام مجاورًا أرضه، أو هو من الإجارة: وهو الأمان والنصرة"، قاله المنذري.




ওয়াছিলাহ ইবনুল আসকা’ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের সাথে একজন মুসলিম ব্যক্তির জানাযার সালাত আদায় করলেন। আমি তাঁকে বলতে শুনলাম: “হে আল্লাহ! অমুক পুত্র অমুক তোমার জিম্মায় এবং তোমার প্রতিবেশীত্বের নিরাপত্তায় রয়েছে। সুতরাং তাকে কবরের ফিতনা ও জাহান্নামের আযাব থেকে রক্ষা করো। আর তুমিই প্রতিশ্রুতি ও সত্য পালনের অধিক যোগ্য।” – আর এক বর্ণনায় (উক্ত বাক্যের স্থলে রয়েছে) ‘আল-হামদু’ (সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর জন্য)। “হে আল্লাহ! তাকে ক্ষমা করো ও তার প্রতি দয়া করো। নিশ্চয় তুমিই অতি ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।”









আল-জামি` আল-কামিল (3601)


3601 - عن يزيد بن ركانة قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا قام للجنازة ليصلي عليها قال:"اللهم! عبدُك وابن أمتك احتاج إلى رحمتك، وأنت غني عن عذابه، إن كان
محسنًا فزد في إحسانه، وإن كان مسيئًا فتجاوز عنه".

حسن: رواه الحاكم (1/ 359) عن أبي محمد عبد العزيز بن عبد الرحمن الخلال بمكة، ثنا عبد الرحمن بن إسحاق الكاتب، ثنا إبراهيم بن المنذر الحزامي، ثنا الحسين بن زيد بن علي بن الحسين بن علي، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن يزيد بن ركانة فذكر الحديث.

قال الحاكم:"هذا إسناد صحيح، ويزيد بن ركانة وأبوه ركانة بن عبد يزيد صحابيان من بني المطلب بن عبد مناف ولم يخرجاه".

قلت: يزيد بن ركانة وأبوه صحابيان كما قال الحاكم، وكذا أكد أيضًا ابن عبد البر في الاستيعاب.

وأخرج ابن قانع والطبراني من طريق حسين بن زيد بن علي، عن ابن عمه جعفر بن محمد الحديث المذكور. أورده الحافظ في"الإصابة" (3/ 655).

قلت: وأما الطبراني فرواه في"المعجم الكبير" (22/ 249) من وجه آخر عن يعقوب بن حميد ابن كاسب، ثنا حسين بن زيد بن علي بإسناده مثله،"وفيه كبَّر على الميت أربعًا" وزاد في آخر الحديث:"ثم يدعو بما شاء الله أن يدعو".

وفيه يعقوب بن حميد بن كاسب المدني نزيل مكة، وقد ينسب إلى جده، تكلم فيه ابن معين وأبو حاتم والنسائي وغيرهم، إليه أشار الحافظ الهيثمي في"المجمع" (3/ 34) بقوله:"رواه الطبراني في"الكبير"، وفيه يعقوب بن حميد وفيه كلام".

قلت: ولا يضر الكلام فيه لأنه تابعه إبراهيم بن المنذر الحزامي في إسناد الحاكم، وهو حسن الحديث، وثَّقه الدارقطني وقال أبو حاتم:"صدوق"، وقال النسائي:"ليس به بأس"، وجعله الحافظ في درجة"صدوق" وقال:"تكلم فيه أحمد لأجل القرآن وهو من رجال البخاري دون مسلم".

وأما ما روي عن ابن عباس مرفوعًا: أنه صلى الله عليه وسلم إذا صلى على ميت قال:"اللهم! اغفر لحينا وميتنا، ولذَكرنا ولأنثانا، ولصغيرنا ولكبيرنا، من أحيته منا فأحيه على الإسلام، ومن توفيته منا فتوفه على الإيمان، اللهم! عفوك، عفوك" فإسناده ضعيف والحديث صحيح.

رواه الطبراني في"الكبير" و"الأوسط""مجمع البحرين" (1286) عن أحمد، ثنا عبيد، ثنا عطاء بن مسلم الخفاف، عن العلاء بن المسيب، عن حبيب بن أبي ثابت، عن ابن عباس فذكره.

وعطاء بن مسلم الخفاف قال فيه البخاري:"لا أعرفه" وقال أبو داود:"ضعيف" وقال الإمام أحمد:"مضطرب الحديث" وقال ابن حبان:"كان شيخا صالحًا، دفن كتبه، ثم جعل يحدث، فكان يأتي بالشيء على التوهم فيخطئ، فكثر المناكير في أخباره، وبطل الاحتجاج به إلا فيما وافق الثقات"."المجروحين" (724) وذكره أيضًا ابن الجوزي في"الضعفاء".

ولكن كان ابن معين حسن الراي فيه لصلاحه فوثَّقه، وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 33):
"وإسناده حسن"، وذلك بناء على ذكره ابن حبان في"الثقات" (7/ 255) وهذا مما تناقض فيه ابن حبان، والله المستعان.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن عائشة مرفوعًا:"اللهم! اغفر له، وصلِّ عليه، وبارك فيه، وأورده حوض رسولك".

رواه الطبراني في"الأوسط""مجمع البحرين" (1287) وأبو يعلى"المقصد العلي" (464) كلاهما من حديث زكريا بن يحيى الرقاشي الخزاز، ثنا عاصم بن هلال، ثنا أيوب السختياني، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته. واللفظ للطبراني، ولم يذكر أبو يعلى"وبارك فيه" وإسناده ضعيف من أجل عاصم بن هلال، وهو البارقي ضعَّفه ابن معين، وقال النسائي:"ليس بالقوي"، وقال ابن حبان:"كان ممن يقلب الأسانيد توهما"، وقال ابن عدي:"عامة ما يرويه لا يتابعه عليه الثقات". وقال فيه ابن حجر:"فيه لين" ومشاه الآخرون فقال أبو حاتم:"صالح شيخ محله الصدق"، وقال أبو داود:"ليس به بأس".

وأورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 33) وقال:"وفيه عاصم بن هلال وثَّقه أبو حاتم وضعَّفه غيره".

وفي الباب أيضًا عن الحارث مرفوعًا ولفظه:"اللهم! اغفر لأحيائنا، ولأمواتنا، وأصلح ذات بيننا، وألِّف بين قلوبنا، اللَّهم! هذا عبدك فلان بن فلان، لا نعلم إلا خيرًا، وأنت أعلم به، فاغفر لنا وله". فقلت له: وأنا أصغر القوم، فإن لم أعلم خيرًا؟ فلا تقل إلا ما تعلم.

رواه الطبراني في"الكبير" و"الأوسط""مجمع البحرين" (1288) وفيه ليث بن أبي سُليم مختلط، وبه علَّله الهيثمي في"المجمع" (3/ 33).




ইয়াযিদ ইবনু রুকানাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন জানাযার সালাত আদায় করার জন্য দাঁড়াতেন, তখন বলতেন: "হে আল্লাহ! আপনার এই বান্দা এবং আপনার এক দাসীর পুত্র আপনার রহমতের মুখাপেক্ষী হয়েছে। আর আপনি তাকে শাস্তি দেওয়া থেকে অমুখাপেক্ষী। যদি সে নেককার হয়, তবে তার নেককাজকে আরও বাড়িয়ে দিন, আর যদি সে মন্দ কাজ করে থাকে, তবে তাকে ক্ষমা করে দিন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3602)


3602 - عن أبي أمامة بن سهل بن حنيف، وكان من كبراء الأنصار وعلمائهم، وأبناء الذين شهدوا بدرًا مع رسول الله أخبره رجال من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم في الصلاة على الجنازة أن يكبر الإمام، ثم يصلي على النبي صلى الله عليه وسلم، ويخلص الصلاة في التكبيرات الثلاث، ثم يسلم تسليمًا خفيًا حين ينصرف، والسنة أن يفعل من وراءه مثل ما فعل الإمام.

صحيح: رواه الحاكم (1/ 360)، وعنه البيهقي (4/ 39 - 40) عن إسماعيل بن أحمد التاجر، ثنا محمد بن الحسن العسقلاني، ثنا حرملة بن يحيى، ثنا ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، قال: أخبرني أبو أمامة بن سهل بن حنيف وكان من كبراء الأنصار وعلمائهم، وأبناء الذين شهدوا بدرًا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، أخبره رجال من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصلاة على الجنازة فذكره.
قال الحاكم: قال الزهري:"حدثني بذلك أبو أمامة، وابن المسيب يسمع فلم ينكر ذلك عليه، قال ابن شهاب: فذكرت الذي أخبرني أبو أمامة من السنة في الصلاة على الميت لمحمد بن سويد قال: وأنا سمعت الضحاك بن قيس، يحدث عن حبيب بن مسلمة في صلاة صلاها على الميت مثل الذي حدثنا أبو أمامة، قال الحاكم: هذا حديث صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه، وليس في التسليمة الواحدة على الجنازة أصح منه. انتهى.

ورواه ابن الجارود في"المنتقى" (540) عن محمد بن يحيى، قال: ثنا عبد الرزاق، قال: أنا معمر، عن الزهري، قال: سمعت أبا أمامة بن سهل بن حُنيف يُحدِّث ابنَ المسيب قال: السنة في الصلاة على الجنازة أن تُكبر، ثم تقرأ بأم القرآن، ثم تُصلي على النبي صلى الله عليه وسلم، ثم تُخلص الدعاء للميت، ولا تقرأ إلا في التكبيرة الأولى، ثم تسلم في نفسه عن يمينه، وهذا إسناد صحيح.

قال الحافظ في"التلخيص" (2/ 122) بعد أن ساقه عن ابن الجارود:"ورجال هذا الإسناد مخرج لهم في الصحيحين".

قلت: ولكن ظاهره مرسل، ولكن ثبت موصولًا كما مضى.

ثم ذكر الحاكم حديث أبي هريرة الآتي شاهدًا لحديث أبي أمامة.

وقوله:"في نفسه" أي: لا يرفع صوته رفعا شديدا.




আবূ উমামা বিন সাহল বিন হুনায়েফ থেকে বর্ণিত, যিনি ছিলেন আনসারদের প্রবীণ ও আলেমদের অন্যতম এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বদরের যুদ্ধে অংশগ্রহণকারী সাহাবীদের সন্তানদের একজন। তাঁকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কতিপয় সাহাবী জানাযার সালাত (নামায) সম্পর্কে জানিয়েছেন যে, ইমাম তাকবীর বলবেন, অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর সালাত (দরূদ) পড়বেন এবং বাকি তিন তাকবীরের মধ্যে আন্তরিকভাবে দু’আ করবেন। অতঃপর যখন তিনি সালাত শেষ করবেন, তখন তিনি চুপিসারে একটি সালাম ফেরাবেন। আর সুন্নাত হলো, মুক্তাদিরা তাঁর পিছনে তাই করবেন যা ইমাম করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3603)


3603 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم صلى على جنازة، فكبَّر عليها أربعًا، وسلَّم تسليمةً واحدة.

حسن: رواه الدارقطني (2/ 77) عن أحمد بن إسحاق بن البهلول، ثنا الحسين بن عمرو العنقري، ثنا إبراهيم بن إسماعيل، ثنا حفص بن غيات، عن أبي العنبس، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وأخرجه الحاكم (1/ 360) وعنه البيهقي (4/ 43) من وجه آخر عن حفص بن غياث بإسناده مثله، ولا يضر ما يقال في شيخ الحاكم وهو أبو بكر بن أبي دارم الحافظ واسمه أحمد بن محمد بن السري بن يحيى بن أبي دارم كما في"الميزان" بأنه رافضي كذاب؛ لأن الحديث ثابت من طريق غيره.

قال الحاكم:"وقد صحت الرواية فيه عن علي بن أبي طالب وعبد الله بن عمر وعبد الله بن عباس وجابر بن عبد الله وعبد الله بن أبي أوفي وأبي هريرة أنهم كانوا يسلمون على الجنازة تسليمة واحدة".

قلت: هذه الآثار أسندها البيهقي، وذكر أيضًا معلقًا عن عطاء بن السائب مرسلًا أن النبي صلى الله عليه وسلم سلم على الجنازة تسليمة واحدة.

وأسنده أبو داود في مراسيله (408) عن طريق أبي إسحاق الفزاري، عن عطاء بن السائب فذكره، وأبو إسحاق ليس ممن روى عن عطاء قبل اختلاطه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি জানাযার সালাত আদায় করলেন, অতঃপর তিনি তাতে চারটি তাকবীর দিলেন এবং একটি মাত্র সালাম ফিরিয়েছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3604)


3604 - عن ابن مسعود قال: ثلاث خلال كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يفعلهن، تركهن الناس، إحداهن التسليم على الجنازة مثل التسليم في الصلاة.

حسن: رواه الطبراني في الكبير" (10/ 100) من طريق موسى بن أعين، عن خالد بن يزيد أبي عبد الرحمن، عن زيد بن أبي أنيسة، عن حماد، عن إبراهيم، عن علقمة والأسود، عن ابن مسعود، ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا البيهقي (4/ 43) واللفظ له.

قال الحافظ الهيثمي في"المجمع" (3/ 34):"رجاله ثقات".

وقال النووي في"المجموع" (5/ 239):"إسناده جيد" وقال في"الخلاصة" (3507):"رواه البيهقي بإسناد جيد".

قلت: في إسناده حماد بن أبي سليمان وثقه ابن معين والنسائي والعجلي، وتكلم فيه غيرهم، غير أنه حسن الحديث.

وقوله: مثل التسليم في الصلاة -أي الصلوات المفروضات وقد ثبت عن عبد الله بن مسعود وغيره أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يسلم تسليمتين في الصلاة.

وروي عن عبد الله بن أبي أوفي أنه كبَّر أربعًا، فمكث ساعة حتى ظننا أنه سيكبر خمسًا، ثم سلَّم عن يمينه، وعن شماله، فلما انصرف قلنا له: ما هذا؟ قال: إني لا أزيدكم على ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يصنع.

رواه الحاكم (1/ 359 - 360)، والبيهقي (4/ 43) كلاهما من حديث إبراهيم الهجري، عن عبد الله بن أبي أوفي فذكر الحديث.

قال الحاكم:"صحيح وإبراهيم بن مسلم الهَجري لم ينقم عليه بحجة".

ورده الذهبي فقال:"ضعَّفوا إبراهيم".

قلت: وهو كما قال.

وإلى التسليمتين ذهب أبو حنيفة والشافعي، ورواية عن الإمام أحمد بأنه تُجزئ عنه تسليمتان، كما تجزئُ تسليمة واحدة، والمستحبة واحدة.




ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তিনটি বিষয় (অভ্যাস) ছিল যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম করতেন, কিন্তু লোকেরা তা ছেড়ে দিয়েছে। সেগুলোর একটি হলো জানাযার সালাতে (এমনভাবে) সালাম (প্রদান করা), যেমন সালাতের মধ্যে সালাম করা হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (3605)


3605 - عن المغيرة بن شعبة، قال: قال النبيّ:"السِّقط يصلي عليه، ويُدعى لوالديه بالمغفرة والرحمة".

صحيح: رواه أبو داود (3180)، والترمذي (1031)، والنسائي (1943)، وابن ماجه (1481) كلّهم من طرق، عن زياد بن جبير، عن أبيه، عن المغيرة بن شعبة، فذكره في حديث
طويل. انظر: ما جاء في الركوب خلف الجنازة. وإسناده صحيح.

قال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري".

والسقط الذي يصلي عليه هو من استكمل أربعة أشهر لحديث ابن مسعود، قال: حدّثنا رسول الله صلى الله عليه وسلم -وهو الصادق المصدوق-:"إنّ خلق أحدكم يُجمع في بطن أمه أربعين يومًا وأربعين ليلة، ثم يكون علقة مثله، ثم يكون مضغة مثله، ثم يبعث إليه الملك فيؤذن بأربع كلمات، فيكتب: رزقه، وأجله، وعمله، وشقي أم سعيد، ثم ينفخ فيه الروح". متفق عليه. البخاري (7454)، ومسلم (2643)، وقد مضى في كتاب الإيمان.

وبه قال الإمام أحمد بأن السقط يغسّل ويصلى عليه. وعند الشافعي: يغسل، وفي الصلاة عليه قولان. وقال أبو حنيفة ومالك: لا يغسل ولا يصلى عليه إلا أن يستهل.

وفي معناه ما روي عن أبي هريرة مرفوعًا:"صلوا على أطفالكم فإنهم من أفراطكم". رواه ابن ماجه (1509)، من طريق البختري بن عبيد، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.

والبختري ضعيف متروك. قال أبو حاتم: ضعيف الحديث.

وقال ابن حبان: لا يحل الاحتجاج به إذا انفرد.

وأبوه عبيد وهو ابن سلمان الطانجي"مجهول" كما قال أبو حاتم والدّارقطنيّ.

وأما ما روي عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الطفل لا يصلي عليه، ولا يرث ولا يورث حتى يستهل" فهو ضعيف.

رواه الترمذي (1032)، والنسائي في الكبرى -كما في التحفة-، وابن ماجه (1508)، وابن حبان (6032)، والحاكم (4/ 348 - 349) كلهم من حديث أبي الزبير، عن جابر، فذكره.

وأبو الزبير المكي مدلس وقد عنعن، ومع هذا فقد اضطرب الناس في هذا الحديث كما قال الترمذي، فرواه بعضهم عن أبي الزبير مرفوعًا.

ورواه بعضهم عن أبي الزبير موقوفًا، وكأنه أصح.

قال الحافظ ابن حجر في"التلخيص" (2/ 113):"وبه جزم النسائي، وقال الدارقطني في"العلل": لا يصح رفعه، وقد روي عن شريك، عن أبي الزبير مرفوعًا ولا يصح. وذكر طرقه عن أبي الزبير وضعّفها. ثم حصر هذه العلل في تدليس أبي الزبير وإن كان محفوظًا عن سفيان الثوري، عن أبي الزبير، عن جابر كما رواه الحاكم وصحّحه على شرط الشيخين، وقال: ووهم لأنَّ أبا الزبير ليس من شرط البخاري وقد عنعن" انتهى كلام الحافظ.

وفي معناه حديث علي وابن عباس ذكرهما الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 277)، وابن حجر في"التلخيص" وبيّنا ضعفهما.

والخلاصة أنه لم يثبت شرط الاستهلال للصلاة على السقط.




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "গর্ভচ্যুত শিশুর জানাজার সালাত আদায় করা হবে এবং তার পিতামাতার জন্য ক্ষমা ও দয়ার (রহমতের) দু'আ করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3606)


3606 - عن جابر قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم حين مات النجاشي:"مات اليومَ رجل صالح، فقوموا فصلوا على أخيكم أصحمة".

متفق عليه: رواه البخاري في مناقب الأنصار (3877)، ومسلم في الجنائز (952/ 65) كلاهما من حديث ابن جريج، عن عطاء، عن جابر بن عبد الله فذكره واللفظ للبخاري، وزاد مسلم:"فقام فأمَّنا وصلي عليه".




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন নাজ্জাশি (বাদশাহ) ইন্তেকাল করলেন, তখন বললেন: "আজ একজন নেককার লোক মারা গেছেন। অতএব তোমরা দাঁড়াও এবং তোমাদের ভাই আসহামার জন্য জানাযার সালাত আদায় করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (3607)


3607 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم نعى النجاشي للناس في اليوم الذي مات فيه، وخرج بهم إلى المصلى، فصفَّ بهم وكبَّر أربع تكبيرات.

متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (14) عن ابن شهاب، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه البخاري في الجنائز (1245)، ومسلم في الجنائز (951) كلاهما من حديث مالك به مثله. وفي رواية:"فنهض ونهضنا حتى انتهى إلى البقيع".

رواه أبو داد الطيالسي (2300) وفيه زمعة بن صالح الجَندي جمهور أهل العلم مطبقون على تضعيفه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাজাশীর মৃত্যুর দিনেই তাঁর মৃত্যুর সংবাদ মানুষকে জানালেন। এরপর তিনি তাঁদেরকে নিয়ে ঈদগাহের দিকে বের হলেন, অতঃপর তাঁদেরকে কাতারবদ্ধ করলেন এবং চার তাকবীর দিলেন।