আল-জামি` আল-কামিল
3608 - عن عمران بن حصين قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن أخًا لكم قد مات، فقوموا فصلوا عليه" يعني النجاشي. وفي رواية:"إن أخاكم".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (953) من طرق عن أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي المهلب، عن عمران بن حصين فذكره.
ورواه الإمام أحمد (2005) وغيره من وجه آخر عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي قلابة وفيه:"فصفَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، وصففنا خلْفَه، فصلى عليه، وما نحسب الجنازة إلا موضوعة بين يديه"، وصحَّحه ابن حبان (3102)، ورواه من هذا الوجه.
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের এক ভাই মারা গেছে, সুতরাং তোমরা দাঁড়াও এবং তার জানাযার সালাত আদায় করো।" (তিনি নাজ্জাশীকে উদ্দেশ্য করেছিলেন)। অন্য বর্ণনায় আছে: "নিশ্চয় তোমাদের ভাই"।
3609 - عن حذيفة بن أَسيد الغفاري أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أُخبِر بموت النجاشي، قال: فقال:"صَلُّوا على أخ لكم مات بغير أرضكم" قالوا: من هو؟ قال:"النجاشي".
صحيح: رواه ابن ماجه (1537) عن محمد بن المثنى، قال: حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، عن المثنى بن سعيد، عن قتادة، عن أبي الطفيل، عن حذيفة بن أَسيد فذكره.
قال البوصيري:"هذا إسناد صحيح، رجاله ثقات، وله شاهد في الصحيحين من حديث جابر ابن عبد الله، ومن حديث أنس بن مالك".
قلت: وهو كما قال، لكن اختلف في سماع قتادة عن أبي الطفيل، فالصحيح أنه سمع منه كما قال ابن المديني. ذكره العلائي في"جامع التحصيل" (633).
وقد حسَّنه الهيثمي في"المجمع" (3/ 39) بعد أن عزاه إلى الطبراني في الكبيره (3/ 199) لأنه رواه من طريق عمران القطان، عن قتادة بإسناده، وزاد في الحديث:"فمن أراد أن يصلي عليه فليصل عليه" وعمران القطان هو أبو العوام قال فيه ابن معين: ليس بالقويّ، وفي رواية: ليس بشيء لم يرو عنه يحيى بن سعيد، وضعَّفه أيضًا أبو داود في رواية، كما ضعَّفه أيضًا النسائي، وغيره، ولذا هذه الزيادة منكرة، فإنه لم يتابع عليها.
والحديث رواه الإمام أحمد (16145) عن رَوح قال: حدثنا سعيد بن أبي عَروبة، وعبد الوهاب، عن سعيد، (يعني ابن أبي عروبة) عن قتادة، عن أبي الطفيل بإسناده، مثل حديث ابن ماجه.
وسعيد بن أبي عروبة مختلط، ولكن سمع منه رَوح وعبد الوهاب قبل اختلاطه.
وفي الباب حديث مجمع بن جارية الأنصاري مرفوعًا:"إن أخاكم النجاشي قد مات فقوموا وصلوا عليه" رواه ابن ماجه (1536) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا معاوية بن هشام، قال: حدثنا سفيان، عن حمران بن أعين، عن أبي الطفيل، عن مجمع بن جارية الأنصاري فذكره.
ورواه عبد الله بن أحمد (16606) من هذا الوجه إلا أنه قال: عن فلان بن جارية الأنصاري، ورواه الإمام أحمد (23195) عن معاوية بن هشام به مثله.
وإسناده ضعيف فإن حمران بن أعين ضعيف عند جمهور أهل العلم، وبه أعلَّه البوصيري في زوائد ابن ماجه (1/ 500) فقال:"حمران ضعَّفه ابن معين والنسائي، وقال أبو داود: رافضي، وقال أبو حاتم: شيخ، وذكره ابن حبان في الثقات". انتهى.
وقد اختلط على الشيخ محمد فؤاد عبد الباقي فنقل في سنن ابن ماجه من زوائد البوصيري:"إسناده صحيح، ورجاله ثقات" وإنما قال البوصيري هذا القول في حديث حذيفة بن أسيد كما سبق، فتنبه، فإن كل من اعتمد على الشيخ محمد فؤاد وقع في هذا الوهم.
وفي الباب عن أنس. رواه الطبراني في"الأوسط" (2688)، وفيه مؤمل بن إسماعيل تُكلم فيه، وله طريق آخر في"الأوسط" (5143)، وفيه أبو بكر بن عياش.
وفيه أيضا عن وحشي بن حرب، رواه الطبراني في"الكبير" (22/ 136) من طريق وحشي بن حرب بن وحشي بن حرب، عن أبيه، عن جده.
ووحشي بن حرب الحفيد"مستور" كما قال الحافظ، وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 39):"رواه الطبراني في"الكبير" وفيه سليمان بن أبي داود الحراني وهو ضعيف" هكذا قال الهيثمي، والإسناد الذي ساقه الطبراني فيه: محمد بن سليمان بن أبي داود الحراني، قال: ثنا وحشي بن حرب، ولم يقل فيه محمد بن سلمان، عن أبيه سليمان بن أبي داود، فلعل النسخة التي كانت عند الهيثمي فيها زيادة"أبيه".
وعن أبي سعيد الخدري رواه الطبراني في"الأوسط" (4642) وفيه أبو أسلم محمد بن مخلد
الرعيني ضعيف جدًّا.
وعن جعفر بن أبي طالب رواه البزار، والطبراني في"الكبير" (2/ 110 - 111) وفيه مجالد بن سعيد ضعيف.
وعن جرير رواه أحمد (19186)، والطبراني في"الكبير" (2/ 367) من حديث شريك، عن أبي إسحاق، عن عامر الشعبي، عن جرير.
وشريك سيء الحفظ، وله طرق أخرى لا تخلو من ضعف.
ويستفاد من أحاديث الباب جواز الصلاة على الميت الغائب عن البلد، وهو مذهب الشافعي وأحمد وأكثر السلف، لأن المقصود من الصلاة الدعاء والاستغفار للميت وهو مطلوب شرعًا، وخاصة إذا كان الميت له جهود في خدمة الإسلام والمسلمين فأدنى حق على كل مسلم أن يصلي عليه ويدعو له.
ومنعه أبو حنيفة ومالك وغيرهما من أهل العلم وقالوا: هذا خاص بالنجاشي وليس لغيره؛ لأنه مات في بلد لم يُصل عليه، وقيل إن النبي صلى الله عليه وسلم طُويتْ له الأرض فكأنه بين يديه، وقيل غير ذلك.
قال النووي في"المجموع" (5/ 253):"دليلنا حديث النجاشي، وهو صحيح لا مطعن فيه، وليس لهم عنه جواب صحيح، بل ذكروا فيه خيالات أجاب عنها أصحابنا بأجوبة مشهورة، منها قولهم: إنه طويت الأرض فصار بين يدي النبي صلى الله عليه وسلم.
وجوابه: أنه لو فتح هذا الباب لم يبق وثوق بشيء من ظواهر الشرع لاحتمال انحراف العادة في تلك القضية مع أنه لو كان شيء من ذلك لتوفرت الدواعي بنقله. وأما حديث العلاء بن زيدل ويقال ابن زيد عن أنس أنهم كانوا في تبوك فأخبر جبريل النبي صلى الله عليه وسلم بموت معاوية بن معاوية في ذلك اليوم وأنه قد نزل عليه سبعون ألف ملك يصلون عليه فطويت الأرض للنبي صلى الله عليه وسلم حتى ذهب فصلى عليه ثم رجع، فهو حديث ضعيف، ضعفه الحفاظ منهم البخاري في تاريخه، والبيهقي، واتفقوا على ضعف العلاء هذا وأنه منكر الحديث، انتهى.
وقال الخطابي في"معالم السنن":"وهذا تأويل فاسد، لأن رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا فعل شيئًا من أفعال الشريعة، كان علينا متابعته والاتِّساءُ به، والتخصيص لا يُعلم إلا بدليل، ومما يُبَين ذلك أنه صلى الله عليه وسلم خرج بالناس إلى المصلى فصفَّ بهم، فصلوا معه، فعُلم أن هذا التأويل فاسد. والله أعلم"، انتهى. وانظر أيضًا"المنة الكبرى" (3/ 70 - 71).
ومن أخبار النجاشي ما ورد عن عائشة قالت: لما مات النجاشي كنا نتحدّث أنه لا يزال يُرى على قبره نور.
رواه أبو داود (2523) عن محمد بن عمرو الرازي، حدثنا سلمة -يعني ابن الفضل- عن محمد ابن إسحاق، حدثني يزيد بن رومان، عن عروة، عن عائشة فذكرته. وهو في السيرة النبوية لابن
هشام (1/ 340). وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق.
হুযাইফা ইবনে আসীদ আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নাজাশীর মৃত্যুর সংবাদ দেওয়া হলো। তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের সেই ভাইয়ের জন্য সালাত (জানাযা) আদায় করো, যে তোমাদের ভূমি ছাড়া অন্য স্থানে মৃত্যুবরণ করেছে।" তারা জিজ্ঞেস করল: "তিনি কে?" তিনি বললেন: "নাজাশী।"
3610 - عن عائشة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما من ميت يُصلِّي عليه أمة من المسلمين يَبْلُغون مائة كلهم يشفعون له إلا شُفِّعوا فيه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (947) عن الحسن بن عيسي، حدثنا ابن المبارك، أخبرنا سلَّامُ ابن أبي مطيع، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن عبد الله بن يزيد رضيع عائشة، عن عائشة فذكرته.
قال:"فحدثتُ به شُعيب بن الحَبْحَاب فقال: حدثني به أنس بن مالك، عن النبي صلى الله عليه وسلم، انتهى.
وقوله:" فحدثت به شعيب" القائل هو سلَّامُ بن أبي المطيع هكذا بَيَّنه النسائي (991) وفي رواية عنده:"أمة من الناس يبلغون أن يكونوا مائة ..".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে কোনো মৃত ব্যক্তির ওপর একদল মুসলিম জানাযার সালাত আদায় করে, যাদের সংখ্যা একশত জনে পৌঁছে এবং তারা সকলেই তার জন্য সুপারিশ করে, তবে তার ক্ষেত্রে তাদের সুপারিশ গ্রহণ করা হয়।"
3611 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من صلَّى عليه مائة من المسلمين غُفر له". صحيح: رواه ابن ماجه (1488) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا عبيدالله، قال: أنبأنا شيبان، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده صحيح، قال البوصيري:"هذا إسناد صحيح رجاله رجال الصّحيحين، وله شاهد من حديث عائشة رواه النسائي والترمذي وقال: حسن صحيح".
قلت: هذا تقصير من البوصيري، فإن حديث عائشة مخرج في صحيح مسلم كما مضى.
আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যার (জানাযার) সালাত একশ জন মুসলিম আদায় করে, তাকে ক্ষমা করে দেওয়া হয়।"
3612 - عن ابن عباس أنه مات ابن له بقَديد، أو بعُسْفان، فقال: يا كريب! انظر ما اجتمع له من الناس، قال: فخرجتُ فإذا ناس قد اجتمعوا له، فأَخبرتُه، فقال: تقول هم أربعون؟ قال: نعم، قال: أخرجوه، فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من رجل مسلم يموتُ فيقوم على جنازته أربعون رجلًا، لا يُشْركون بالله شيئًا إلا شَفَّعهم الله فيه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (948) من طرق، عن ابن وهب، قال: أخبرني أبو صخر، عن شريك بن عبد الله بن أبي نمر، عن كُريب مولى ابن عباس، عن ابن عباس فذكر الحديث.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তাঁর (ইবনু আব্বাসের) এক পুত্র কাদীদ অথবা উসফান নামক স্থানে মারা যান। তখন তিনি বললেন, হে কুরাইব! দেখো তার জন্য কত লোক সমবেত হয়েছে। (কুরাইব) বলেন, আমি বের হলাম এবং দেখলাম কিছু লোক তার জন্য সমবেত হয়েছে। আমি তাঁকে (ইবনু আব্বাসকে) জানালাম। তিনি বললেন: তুমি কি বলবে যে তারা চল্লিশ জন? (কুরাইব) বললেন: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তাকে (জানাযা) বের করো। কারণ, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "এমন কোনো মুসলিম ব্যক্তি নেই, যে মারা গেল আর তার জানাযায় চল্লিশজন লোক দাঁড়ালো, যারা আল্লাহর সাথে কাউকে শরীক করে না, কিন্তু আল্লাহ তার (মৃতের) ব্যাপারে তাদের সুপারিশ কবুল করে নেন।"
3613 - عن ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: أخبرني النبي صلى الله عليه وسلم قال:"ما من ميت يُصلِّي عليه أمة من الناس إلا شُفِّعوا فيه". فسألت أبا المليح عن الأمة، فقال: أربعون.
وفي رواية: الأمة أربعون إلى مائة.
حسن: رواه النسائي (1993) عن إسحاق بن إبراهيم، قال: أنبأنا محمد بن سواء أبو الخطاب، قال: حدثنا أبو بكَّار الحكم بن فرُّوخ قال: صلَّى بنا أبو الملح على جنازة فظننا أنه قد كبَّر، فأقبل علينا بوجهه فقال: أقيموا صفوفكم ولتحسُنْ شَفاعتُكم، قال أبو المليح: حدثني عبد الله وهو ابن سليط، عن إحدى أمهات المؤمنين، وهي ميمونة فذكرت الحديث.
والرواية الثانية عند الإمام أحمد (26812) عن يحيى بن سعيد، عن أبي بكار إلا أنه قال في إسناده:"عبد الله بن سليل" ولكن رواه أيضًا عن أبي عبيدة الحدَّاد قال: حدثني عبد الله بن سليط. وهذا يؤيد ما قاله أبو الخطاب محمد بن سواء.
وقد رجَّح الحافظ وغيره أن يكون هو عبد الله بن سليط، وهو ممن ذكره ابن حبان في الصحابة، ثم في التابعين، وقال: له صحبة فيما يزعمون انظر:"الإصابة" (2/ 321 - 322) فإن صحَّ ما ذكره ابن حبان بأن له صحبة فالإسناد حسن من أجل محمد بن سواء أبي الخطاب فإنه"صدوق".
وللحديث أسانيد أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحَّها.
মায়মূনা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী, থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে জানিয়েছেন, তিনি বলেছেন: “যখন কোনো মৃতের উপর মানুষের একটি জামাআত (দল) জানাযার সালাত আদায় করে, তখন তাদের জন্য সুপারিশ অবশ্যই কবুল করা হয়।” (বর্ণনাকারী বলেন,) এরপর আমি আবূল মালীহকে এই ‘জামাআত’ (দল) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন: চল্লিশ জন।
অপর এক বর্ণনায় রয়েছে: এই জামাআত হলো চল্লিশ থেকে একশ জনের মধ্যে।
3614 - عن سليمان الشيباني قال: سمعت الشعبي قال: أخبرني من مرَّ مع النبي صلى الله عليه وسلم على قبر منبوذٍ فأمَّهم، وصفُّوا عليه، فقلت: يا أبا عمرو! من حدثك؟ قال: ابن عباس.
وفي رواية: عن ابن عباس قال: مات إنسان كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعوده فمات بالليل، فدفنوه ليلًا، فلما أصبح أخبروه فقال:"ما منعكم أن تعلموني؟ قالوا: كان الليلُ فكرهنا -وكانت ظُلمة- أن نَشُقَّ عليك، فأتى قبره فصلى عليه.
متفق عليه: رواه البخاري في الأذان (857)، ومسلم في الجنائز (954) كلاهما من حديث محمد بن جعفر غندر، قال: حدثنا شعبة، عن سليمان الشيباني فذكره.
والرواية الثانية عند البخاري (1247) من طريق أبي معاوية، عن الشيباني، ورواه الشيخان من أوجه أخرى عن سليمان الشيباني به مثله.
إلا أنه في طريق عبد الله بن إدريس، عن الشيباني عند مسلم زيادة:"فكبَّر أربعًا".
وأما ما رواه الدارقطني (2/ 78) من طريق هريم بن سفيان، عن الشيباني، عن الشعبي، عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم صلى على ميت بعد موته بثلاث.
فلفظة"ثلاث" شاذة كما قال غير واحد من أهل العلم، والصحيح أنه صلى عليه في صبيحة دفنه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি মারা গেল, যাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দেখতে যেতেন। সে রাতে মারা যাওয়ায় তাকে রাতেই দাফন করা হলো। যখন সকাল হলো, তখন তাঁকে (নবীকে) এ খবর জানানো হলো। তিনি বললেন: "তোমরা আমাকে জানাতে মানা করলে কেন?" তারা বললো: "রাত ছিল, আর অন্ধকারও ছিল, তাই আমরা আপনাকে কষ্ট দিতে অপছন্দ করেছি।" অতঃপর তিনি তার কবরের কাছে আসলেন এবং তার উপর জানাযার সালাত আদায় করলেন।
3615 - عن أبي هريرة أن امرأة سوداء كانت تقُمُّ المسجد (أو شابًا) ففقدها رسول الله صلى الله عليه وسلم فسأل عنها (أو عنه) فقالوا: مات. قال:"أفلا كنتُم آذنتموني" قال: فكأنهم
صغروا أمرها (أو أمره) فقال:"دُلُّوني على قبره" فدلُّوه فصلى عليها، ثم قال:"إن هذه القبور مملوءة ظلمةً على أهلها، وإن الله عز وجل يُنَوِّرها لهم بصلاتي عليهم".
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1337)، ومسلم في الجنائز (956) كلاهما من حديث حماد بن زيد، عن ثابت البناني، عن أبي رافع، عن أبي هريرة فذكره، واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري قريب منه.
ورجح أهل العلم أن هذا القبر كان لامرأة لأنه جاء في بعض الروايات بغير شك، واليقين مقدم على الشك، وقوله:"تَقُمُّ المسجد"، أي تكنسه، والقُمامة الكناسة، والمِقَمَّة المكنسة.
أخذ جمهور أهل العلم بهذا الحديث، وقالوا بمشروعية الصلاة على الميت بعد ما دُفن، ومنعه مالك وأبو حنيفة وغيرهم بحجة أن ذلك من خصوصيات النبي صلى الله عليه وسلم؛ لأن الله عز وجل يُنور قبر الميت بصلاته صلى الله عليه وسلم كما أخبره المصطفى صلى الله عليه وسلم. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (3/ 68).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন কালো মহিলা মসজিদ ঝাড়ু দিতো (অথবা একজন যুবক ছিল)। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাকে না দেখতে পেয়ে তার (অথবা তার সম্পর্কে) খোঁজ করলেন। সাহাবীরা বললেন: সে মারা গেছে। তিনি বললেন: "তোমরা আমাকে কেন জানালে না?" বর্ণনাকারী বলেন: যেন তারা তার ব্যাপারটিকে (অথবা তার বিষয়টি) ছোট করে দেখেছিল। তিনি বললেন: "আমাকে তার কবর দেখিয়ে দাও।" তারা তাঁকে কবর দেখিয়ে দিলেন। তখন তিনি তার জন্য সালাত (জানাযা) আদায় করলেন। এরপর বললেন: "নিশ্চয়ই এই কবরগুলো তাদের অধিবাসীদের জন্য অন্ধকারাচ্ছন্ন। আর মহান আল্লাহ আমার সালাতের মাধ্যমে তা তাদের জন্য আলোকিত করে দেন।"
3616 - عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى على قبر.
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (955) عن إبراهيم بن محمد بن عرعرة السامي، حدثنا غندر، حدثنا شعبة، عن حبيب بن الشهيد، عن ثابت، عن أنس فذكر الحديث، هكذا رواه مسلم حديث أنس مختصرا وجاء تفصيله في الحديث التالي.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি কবরের উপর (দাঁড়িয়ে) সালাত আদায় করেছিলেন।
3617 - عن أنس أن أسود كان ينظف المسجد فمات، فدُفِن ليلا، وأَتي النبي صلى الله عليه وسلم، فأُخْبِرَ، فقال:"انطلِقوا إلى قبره"، فانطلَقوا إلى قبره، فقال:"إن هذه القبور ممتلئة على أهلها ظلمة، وإن الله ينورها بصلاتي عليها"، فأتي القبر فصلَّى عليه، وقال رجل من الأنصار: يا رسول الله! إن أخي مات ولم تصل عليه. قال: فأين قبره؟" فأخبره فانطلق رسول الله صلى الله عليه وسلم مع الأنصاري.
حسن: رواه أحمد (12517) عن سليمان بن داود الطيالسي، حدثنا أبو عامر -يعني الخزاز، عن ثابت، عن أنس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل أبي عامر، وهو صالح بن رستم المزني مولاهم البصري مختلف فيه، فضعفه ابن معين، ووثقه أبو داود. وقال أحمد: صالح الحديث. وقال ابن عدي:"عزيز الحديث"، وقال:"روى عنه يحيى القطان مع شدة استقصائه، وهو عندي لا بأس به، ولم أر له حديثا منكرا جدا".
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আসওয়াদ (নামক এক ব্যক্তি) মসজিদ পরিষ্কার করতেন। তিনি মারা গেলে রাতে তাকে দাফন করা হলো। এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে এই খবর দেওয়া হলো। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তার কবরের দিকে যাও।" অতঃপর তারা তার কবরের দিকে গেলেন। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই এই কবরগুলো তাদের বাসিন্দাদের জন্য অন্ধকারে পূর্ণ। আর আল্লাহ্ আমার সালাতের (দো‘আ ও প্রার্থনার) কারণে সেগুলোকে আলোকিত করে দেন।" অতঃপর তিনি কবরের কাছে আসলেন এবং তার ওপর সালাত আদায় করলেন। এরপর আনসারদের একজন লোক বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমার এক ভাই মারা গেছেন, কিন্তু আপনি তার ওপর সালাত আদায় করেননি। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার কবর কোথায়?" তখন লোকটি তাকে সেই কবরের কথা জানালেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই আনসারী ব্যক্তির সাথে গেলেন।
3618 - عن يزيد بن ثابت، وكان أكبر من زيد، قال: خرجنا مع النبي صلى الله عليه وسلم فلما ورد البقيعَ فإذا هو بقبر جديد سأل عنه فقالوا: فُلانة، قال: فعرفها وقال:"ألا آذنتموني بها" قالوا: كنتَ قائلًا صائمًا، فكرهنا أن نؤذيك، قال: فلا تفعلوا، لا أعرفنَّ ما
مات منكم ميت، ما كنت بين أَظهركم إلا آذنتموني به، فإن صلاتي عليه له رحمةٌ" ثم أتي القبر، فصفَفْنا خلْفَه، فكبَّر عليه أربعًا.
صحيح: رواه النسائي (2022)، وابن ماجه (1528) كلاهما من حديث عثمان بن حكيم الأنصاري، عن خارجة بن زيد بن ثابت، عن عمه يزيد بن ثابت فذكره. وإسناده صحيح. وصحَّحه ابن حبان (3087) والحاكم (3/ 591).
ইয়াযীদ ইবনু ছাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি যায়িদ (ইবনু ছাবিত)-এর চেয়ে বয়সে বড় ছিলেন, তিনি বলেন: আমরা নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে বের হলাম। যখন তিনি বাকী' (কবরস্থানে) পৌঁছালেন, তখন সেখানে একটি নতুন কবর দেখতে পেলেন। তিনি তা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। লোকেরা বলল: এটা অমুক মহিলার কবর। তিনি তাকে চিনতে পারলেন এবং বললেন: "তোমরা আমাকে কেন জানালে না?" তারা বলল: আপনি তখন দুপুরে বিশ্রামরত এবং সওম পালনকারী ছিলেন। তাই আমরা আপনাকে বিরক্ত করতে অপছন্দ করলাম। তিনি বললেন: তোমরা এমন করবে না। আমি তোমাদের মাঝে থাকা অবস্থায় তোমাদের কেউ মৃত্যুবরণ করলে আমাকে অবশ্যই জানাবে। কারণ তার উপর আমার সালাত (জানাযা) তার জন্য রহমতস্বরূপ। অতঃপর তিনি কবরের কাছে আসলেন। আমরা তার পিছনে কাতারবদ্ধ হলাম এবং তিনি তার উপর চার তাকবীর দিয়ে সালাত আদায় করলেন।
3619 - عن أبي أمامة بن سهل بن حُنيف أنه أخبره، أن مسكينةً مرضَتْ، فأخبر النبي صلى الله عليه وسلم بمرضها، وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعود المساكين، ويسأل عنهم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا ماتت فآذنتموني بها" فخرج بجنازتها ليلًا، فكرهوا أن يُوقِظوا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم، فلما أصبح رسول الله صلى الله عليه وسلم أخبر بالذي كان من شأنها فقال:"ألم آمركم أن تؤذنوني بها؟" فقالوا: يا رسول الله! كرهنا أن نُخرجَك ليلًا، ونوقظك، فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم حتي صفَّ بالناس على قبرها، وكبَّر أربع تكبيرات.
صحيح: رواه مالك في الجنائز (15) عن ابن شهاب عن أبي أمامة بن سهل فذكره، وهذا مرسل فإن أبا أمامة -واسمه سعد، مشهور بكنيته له رؤية ولم يسمع من النبي صلى الله عليه وسلم.
ورواه النسائي (1907) من طريق مالك.
وأقام البيهقي (4/ 48) إسناد هذا الحديث فرواه من طريق الأوزاعي قال: أخبرني ابن شهاب، عن أبي أمامة بن سهل بن حُنيف الأنصاري، قال: إن بعض أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أخبره فذكر الحديث بطوله وزاد فيه بعض التفاصيل الأخرى.
وأما ما رُوي عن أبي أمامة بن سهل، عن أبيه، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعود فقراء أهل المدينة، ويشهد جنائزهم إذا ماتوا، قال: فتوفيت امرأة من أهل العوالي، فذكر الحديث بمثله.
ففيه سفيان بن حسين يروي عن الزهري، وهو ضعيف فيه، أخرجه أبو بكر بن أبي شيبة في مصنفه (3/ 361) عن سعيد بن يحيى الحميري، عن سفيان بن حسين بإسناده، وقد خطّأ أبو حاتم هذه الطريق، ولكنه رجح رواية الزهري عن أبي أمامة مرسلة كما رواها مالك، وزيادة الثقة مقبولة، وقد زاد الأوزاعي:"عن بعض أصحاب النّبي صلى الله عليه وسلم.
আবু উমামা ইবনু সাহল ইবনু হুনাইফ থেকে বর্ণিত, যে একজন দরিদ্র নারী অসুস্থ হয়ে পড়েন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তার অসুস্থতার কথা জানানো হয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দরিদ্রদের দেখতে যেতেন এবং তাদের খোঁজখবর নিতেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে মারা গেলে তোমরা আমাকে খবর দেবে।" রাতের বেলায় তার জানাযা বের করা হলো, কিন্তু তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জাগানো অনুচিত মনে করলেন। যখন সকাল হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তার (মৃত্যু ও দাফন) ঘটনা সম্পর্কে জানানো হলো। তখন তিনি বললেন: "আমি কি তোমাদেরকে আমাকে খবর দিতে বলিনি?" তারা বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমরা আপনাকে রাতে বের করা এবং জাগানো অপছন্দ করেছিলাম।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন এবং লোকজনকে নিয়ে তার কবরের পাশে কাতারবদ্ধ হলেন এবং চার তাকবীর দিয়ে জানাযার সালাত আদায় করলেন।
3620 - عن جابر أن النبي صلى الله عليه وسلم صلى على قبر امرأةٍ بعد ما دُفنتْ.
حسن: رواه النسائي (2025) عن المغيرة بن عبد الرحمن، قال: حدثنا زيد بن علي -وهو أبو أسامة، قال: حدثنا جعفر بن بُرقان، عن حبيب بن أبي مرزوق، عن عطاء، عن جابر فذكره.
وإسناده حسن لأجل زيد بن علي فإنه"صدوق" وجعفر بن برقان"حسن الحديث".
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক মহিলার কবরের ওপর সালাত আদায় করেছিলেন, তাকে দাফন করার পর।
3621 - عن عامر بن ربيعة قال: مر رسول الله صلى الله عليه وسلم بقبر فقال: ما هذا القبر؟" قالوا:
قبر فلانة، قال:"أفلا آذَنْتموني؟" قالوا: كنت نائمًا، فكرهنا أن نُوقظك، قال:"فلا تفعلوا فادعوني لجنائزكم" فصفَّ عليها فصلَّي.
حسن: رواه الإمام أحمد (15673) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا عبد العزيز -يعني ابن محمد الدراوردي، عن محمد بن زيد التيمي، عن عبد الله بن عامر، عن أبيه فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد العزيز الدراوردي فإنه"حسن الحديث".
وأما ما رواه ابن ماجه (1529) عن يعقوب بن حُميد بن كاسب، قال: حدثنا عبد العزيز بن محمد الدراوردي بإسناده نحوه وفيه: إن امرأة سوداء ماتت.
فإسناده ضعيف لأن شيخ ابن ماجه وهو يعقوب بن حميد بن كاسب تكلم فيه غير واحد من أهل العلم فقال ابن معين: ليس بشيء، وقال أبو حاتم: ضعيف الحديث. وقال النسائي: ليس بشيء.
قلت: والحديث حسن بدونه كما رواه الإمام أحمد.
وفي الباب عن حصين بن وحوح أن طلحة بن البراء لما لقي النبي صلى الله عليه وسلم قال: يا رسول الله! مرني بأمرك ولا أعصي لك أمرًا. قال فعجب لذلك النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو غلام فقال له عند ذلك"اذهب فاقتل أباك" قال: فذهب موليًا ليفعل فدعاه فقال:"اقبل فإني لم أبعث بقطيعة الرحم" فمرض طلحة بعد ذلك فأتاه النبي صلى الله عليه وسلم يعوده في الشتاء في برد وغيم، فلما انصرف قال لأهله:"إني لا أرى طلحة إلا قد حدث فيه الموت، فآذنوني به حتى أشهده وأصلي عليه، وعجلوا" فلم يبلغ النبي صلى الله عليه وسلم بني سالم ابن عوف حتى توفي، وجن عليه الليل فكان فيما قال طلحة: ادفنوني وألحقوني بربي عز وجل، ولا تدعوا رسول الله صلى الله عليه وسلم فإني أخاف اليهود أن يصاب في سببي وأخبر النبي صلى الله عليه وسلم حين أصبح فجاء حتى وقف على قبره، وصفَّ الناس معه فقال:" اللهم الق طلحة تضحك إليه، ويضحك إليك".
رواه الطبراني في"الكبير" (4/ 33) عن موسى بن هارون، ثنا عمر بن زرارة الحدثي، ثنا عيسي ابن يونس، عن سعيد بن عثمان البلوي، عن عروة بن سعيد الأنصاري، عن أبيه، عن حصين بن وحوح فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 37):"عزاه صاحب الأطراف بعض هذا إلى أبي داود -ولم أره- رواه الطبراني في"الكبير" وإسناده حسن".
قلت: هو كما قال صاحب الأطراف، فقد رواه أبو داود (3159) في باب التعجيل بالجنازة وكراهية حبسها عن عبد الرحيم بن مطرف الرواسي أبي سفيان وأحمد بن جناب، قالا: حدثنا عيسي، قال أبو داود: وهو يونس، عن سعيد بن عثمان البلوي، عن عزرة، وقال عبد الرحيم: عروة بن سعيد الأنصاري، عن أبيه، عن الحصين بن وَحْوَح، أن طلحة بن البراء مرض، فأتاه النبيّ صلى الله عليه وسلم يعوده فقال:"إني لا أرى طلحة إلا قد حدث فيه الموت، فأذنوني به وعجلوا، فإنه لا ينبغي لجيفة مسلم أن تُحبس بين ظهراني أهله".
قلت: وفي الإسناد عروة أو عزرة"مجهول" كما قال الحافظ في"التقريب" وسعيد بن عثمان البلوي، لم يرو عنه إلا عيسى بن يونس، ولم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في"ثقاته" (6/ 361) ولم يذكر من الرواة عنه سوي عيسي بن يونس فهو"مجهول" أيضًا، وجعله الحافظ في"التقريب""مقبول" لذكره ابن حبان في الثقات، وترجمه ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (4/ 47) ولم يقل فيه شيئًا.
وفي الباب أيضًا عن بريدة: أن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى على ميت بعد ما دفن"، رواه ابن ماجه (1532) عن محمد بن حُميد قال: حدثنا مهران بن أبي عمر، عن أبي سنان، عن علقمة بن مرثَد، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكره. ورواه البيهقي من هذا الوجه (4/ 48) في سياق أطول، ومحمد بن حميد هو: ابن حبان الرازي، قال فيه البخاري:"في حديثه نظر"، وقال النسائي:"ليس بثقة"، وقال الجوزجاني:"ردئ المذهب غير ثقة"، وقال ابن حبان: لينفرد عن الثقات بالمقلوبات".
وكان ابن معين: حسن الرأي فيه فوثَّقه. والقول فيه قول الجماهير، وشيخه مهران بن أبي عمر العطار مختلف فيه، قال الحافظ:"صدوق له أوهام، سيء الحفظ".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي سعيد قال: كانت سوداء تقُمُّ المسجدَ، فتوفيتْ ليلًا. فلما أصبح رسول الله صلى الله عليه وسلم أُخبر بموتها فقال:"ألا آذنتموني بها؟" فخرج بأصحابه فوقف على قبرها، فكبَّر عليها، والناس من خلفه، ودعا لها، ثم انصرف.
رواه ابن ماجه (1533) وفي إسناده عبد الله بن لهيعة وفيه كلام معروف، ولم يرو عنه أحد العبادة، وقد ضعَّفه أيضًا البوصيري في"مصباح الزجاجة".
أقوال أهل العلم في الصلاة على القبر:
قال الترمذي بعد أن أخرج حديث ابن عباس (1037):"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيره، وهو قول الشافعي وأحمد وإسحاق، وقال بعض أهل العلم: لا يُصلي على القبر. وهو قول مالك بن أنس. وقال عبد الله بن المبارك: إذا دفن الميت، ولم يُصل عليه صُلِّى على القبر. (ورأي ابن المبارك الصلاة على القبر) هكذا ذكره مكررًا، وقال أحمد وإسحاق: يصلي على القبر إلى شهر، وقالا: أكثر ما سمعنا عن ابن المسيب أن النبي صلى الله عليه وسلم صلي على قبر أم سعد بن عبادة بعد شهر".
ثم أخرج مرسل سعيد بن المسيب قال: إن أم سعد ماتت والنبي صلى الله عليه وسلم غائب، فلما قدم صلي عليها، وقد مضى لذلك شهر. انتهى.
আমির ইবনু রাবী'আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একটি কবরের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "এই কবরটি কার?" তারা বলল: এটা অমুক মহিলার কবর। তিনি বললেন: "তোমরা কি আমাকে অবহিত করলে না (জানাজার জন্য)?" তারা বলল: আপনি ঘুমিয়ে ছিলেন, তাই আমরা আপনাকে জাগানো অপছন্দ করলাম। তিনি বললেন: "তোমরা এমন করো না। তোমাদের জানাজার জন্য আমাকে ডাকবে।" এরপর তিনি (কবরের উপর) কাতার করলেন এবং সালাত আদায় করলেন।
3622 - عن جابر بن سمرة قال: أتي النبي صلى الله عليه وسلم برجل قتل نفسه بمشاقص، فلم يُصَلّ عليه. وفي رواية: ذكرت قصة هذا الرجل بأنه مرض، فصيح عليه، فجاء جاره إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم،
فقال [له]: إنه قد مات، قال:"وما يُدْريك؟" قال: أنا رأيته، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّه لم يمت"، قال: فرجع، فصيح عليه، فجاء إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: إنه قد مات، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إنه لم يمت" فرجع، فصيح عليه، فقالت امرأته: انطلق إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبره، فقال الرجل: اللهم! العنه، قال: ثم انطلق الرجل، فرآه قد نحر نفسه بمشْقَص معه، فانطلق إلى النبي صلى الله عليه وسلم فأخبره أنه قد مات، فقال:"وما يُدريك؟" قال: رأيته ينحر نفسه بمشاقِصَ معه، قال:"أنت رأيته؟" قال: نعم، قال:"إذًا لا أصلي عليه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (978) عن عون بن سلَّام، أخبرنا زهير، عن سماك، عن جابر فذكره. والرواية الثانية عند أبي داود (3185) من وجه آخر، عن زهير بإسناده.
قال الترمذي عقب هذا الحديث (1068):"هذا حديث حسن صحيح. واختلف أهل العلم في هذا، فقال بعضهم: يُصلَّي على كل من صلَّى إلى القبلة، وعلى قاتل النفس، وهو قول الثوري وإسحاق، وقال أحمد: لا يُصَلِّي الإمام على قاتل النفس، ويُصَلِّي عليه غير الإمام".
وقال النووي: في هذا الحديث دليل لمن يقول: لا يُصَلِّي على قاتل نفسه لعصيانه، وهذا مذهب عمر بن عبد العزيز والأوزاعي، وقال الحسن والنخعي وقتادة ومالك وأبو حنيفة والشافعي وجماهير العلماء: يُصَلِّي عليه، وأجابوا عن هذا الحديث بأن النبي صلى الله عليه وسلم لم يُصَلَّ عليه بنفسه زجرًا للناس عن مثل فعله، وصلت عليه الصحابة، وهذا كما ترك النبي صلى الله عليه وسلم الصلاة في أول الأمر على من عليه دين زجرًا لهم عن التساهل في الاستدانة، وعن إهمال وفائه، وأمر أصحابه بالصلاة عليه، فقال صلى الله عليه وسلم:"صلوا على صاحبكم".
قال القاضي: مذهب العلماء كافة الصلاةُ على كل مسلم، ومحدود، ومرجوم، وقاتل نفسه، وولد الزنا، وعن مالك وغيره: أن الإمام يجتنب الصلاة على مقتول في حد، وأن أهل الفضل لا يُصلون على الفساق زجرًا لهم، وعن الزهري: لا يُصَلِّي على مرجوم، ويُصَلِّي على المقتول في قصاص، وقال أبو حنيفة: لا يُصَلِّي على محارب، ولا على قتيل الفئة الباغية، وقال قتادة: لا يُصَلِّي على ولد الزنا، وعن الحسن: لا يُصَلِّي على النفساء تموت من زنا، ولا على ولدها" انتهى.
ونقل القرطبي في"المفهم" عن الإمام أحمد: لا يُصلِّي الإمام على قاتل نفس، ولا على غال، وقال أبو حنيفة: لا يُصلِّي على من ترك الصلاة إذا قيل، ويُصلِّي على من سواه.
জাবির ইবন সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এমন এক ব্যক্তিকে আনা হলো, যে তীরের ফলার দ্বারা আত্মহত্যা করেছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জানাযার সালাত আদায় করলেন না।
আরেকটি বর্ণনায় সেই লোকটির ঘটনা উল্লেখ করা হয়েছে যে, সে অসুস্থ হয়েছিল এবং (তার মৃত্যু হয়েছে মনে করে) তার জন্য কান্নাকাটি করা হলো। অতঃপর তার প্রতিবেশী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে বললেন: "নিশ্চয়ই সে মারা গেছে।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কীভাবে জানলে?" লোকটি বলল: "আমি তাকে দেখেছি।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে মরেনি।" লোকটি ফিরে গেল। অতঃপর আবার তার জন্য কান্নাকাটি করা হলো। লোকটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: "সে মারা গেছে।" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে মরেনি।" সে আবার ফিরে গেল। অতঃপর তার জন্য কান্নাকাটি করা হলো। তার স্ত্রী বলল: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যাও এবং তাঁকে খবর দাও।" লোকটি তখন বলল (রোগীটির ব্যাপারে): "হে আল্লাহ! তাকে অভিশাপ দিন।" (বর্ণনাকারী) বলেন: অতঃপর লোকটি গেল এবং দেখল যে সে তার সাথে থাকা তীরের ফলার দ্বারা নিজের গলা কেটে ফেলেছে। এরপর সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গিয়ে তাঁকে খবর দিল যে সে মারা গেছে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কীভাবে জানলে?" লোকটি বলল: "আমি তাকে তার সাথে থাকা তীরের ফলার দ্বারা নিজের গলা কাটতে দেখেছি।" তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি তাকে দেখেছ?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "তাহলে আমি তার জানাযার সালাত আদায় করব না।"
3623 - عن جابر أن رجلًا من أسلم جاء النبي صلى الله عليه وسلم فاعترف بالزنا، فأعرض عنه النبي صلى الله عليه وسلم حتى شهد على نفسه أربع مرات، قال له النبي صلى الله عليه وسلم:"أبك جنون"؟ قال: لا، قال:"أحصنت؟" قال: نعم، قال: فأمر النبي صلى الله عليه وسلم فرجم بالمصلي، فلما أذلقتْه الحجارة فرَّ، فأُدرك فرجم حتى مات، فقال النبي صلى الله عليه وسلم خيرًا، ولم يُصَلِّ عليه.
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6820)، ومسلم في الحدود (1691/ 16) كلاهما من حديث عبد الرزاق، وهو في مصنفه (13337) عن معمر، عن الزهري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن جابر فذكر الحديث واللفظ من مصنف عبد الرزاق.
وأما مسلم لم يسق لفظه، وأما البخاري فقال:"وصلى عليه" وهو خطأ كما قال البيهقي (8/ 218) فإن كل من رواه من طريق عبد الرزاق لم يقل فيه"وصلى عليه" منهم أبو داود (4430)، والترمذي (1429)، والنسائي (1956)، وأحمد (14462) وغيرهم.
ثم قال البخاري: لم يقل يونس وابن جريج، عن الزهري:"فصلى عليه".
قلت: وكذلك لم يقل معمر عن الزهري:"فصلي عليه"، بل قال:"ولم يصل عليه" كما سبق.
وأما ما رواه أبو برزة الأسلمي أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يُصَلِّ على ماعز بن مالك، ولم ينه عن الصلاة عليه، فقيه رجال مجاهيل. رواه أبو داود (3186) عن أبي كامل، حدثنا أبو عوانة، عن أبي بشر، حدثني نفر من أهل البصرة، عن أبي برزة الأسلمي فذكره. ونفر من أهل البصرة رجال لا يعرفون.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আসলাম গোত্রের একজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে ব্যভিচারের স্বীকারোক্তি করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন, যতক্ষণ না সে নিজের বিরুদ্ধে চারবার সাক্ষ্য দিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "তোমার কি কোনো উন্মাদনা আছে?" সে বলল: "না।" তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কি বিবাহসূত্রে আবদ্ধ?" সে বলল: "হ্যাঁ।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে মুসাল্লা নামক স্থানে রজম (পাথর নিক্ষেপ) করার নির্দেশ দিলেন। যখন পাথরগুলো তাকে আঘাত করতে শুরু করল, তখন সে পালিয়ে গেল। অতঃপর তাকে ধরে আনা হলো এবং পাথর নিক্ষেপ করা হলো, যতক্ষণ না সে মারা গেল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সম্পর্কে ভালো কথা বললেন, কিন্তু তার জানাযার সালাত (নামাজ) আদায় করলেন না।
3624 - عن عمران بن حُصين أن امرأة من جُهينة أتتْ نبي الله صلى الله عليه وسلم وهي حُبلى من الزنا، فقالت: يا نبي الله! أصبتُ حدًا فأقمه عليَّ، فدعا النبي صلى الله عليه وسلم وليها فقال:"أحسن إليها، فإذا وضعت فائتني بها" ففعل. فأمر بها نبي الله صلى الله عليه وسلم فشكتْ عليها ثيابُها، ثم أمر بها فرجمتْ، ثم صلَّى عليها، فقال له عمر: تُصلي عَليها يا نبي الله! وقد زنتْ فقال:"لقد تابتْ توبة لو قُسِمت بين سبعين من أهل المدينة لوسعتْهم، وهل وجدت توبة أفضل من أن جادتْ بنفسها الله تعالي".
صحيح: رواه مسلم في الحدود (1696) عن أبي غسان مالك بن عبد الواحد المشمعي، حدثنا معاذ (يعني ابن هشام) حدثني أبي، عن يحيى بن أبي كثير، حدثني أبو قلابة، أن أبا المهلب حدَّثه، عن عمران بن حصين فذكره.
ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জুহায়নাহ গোত্রের এক মহিলা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল। সে ছিল যেনার কারণে গর্ভবতী। সে বলল, হে আল্লাহর নবী! আমি এমন কাজ করেছি যার কারণে আমার উপর শাস্তি (হদ) প্রযোজ্য, অতএব তা আমার উপর প্রয়োগ করুন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার অভিভাবককে ডেকে বললেন, "তার সাথে সদ্ব্যবহার করো, যখন সে প্রসব করবে তখন তাকে আমার কাছে নিয়ে এসো।" সে তাই করল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার ব্যাপারে আদেশ দিলেন। তখন তার পোশাকাদি শক্ত করে বেঁধে দেওয়া হলো। এরপর তিনি তাকে রজম (পাথর নিক্ষেপ করে শাস্তি) করার নির্দেশ দিলেন। অতঃপর তিনি তার উপর জানাযার সালাত আদায় করলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন, হে আল্লাহর নবী! আপনি তার উপর সালাত (জানাযা) আদায় করছেন? অথচ সে যেনা করেছে! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "সে এমন তাওবা করেছে যে, যদি তা মদীনার সত্তর জন বাসিন্দার মধ্যে ভাগ করে দেওয়া হতো, তবে তা তাদের জন্য যথেষ্ট হতো। আল্লাহর জন্য নিজের জীবন উৎসর্গ করার চেয়ে উত্তম তাওবা কি তুমি আর কিছু পেয়েছ?"
3625 - عن عبد الله بن عمر قال: لما تُوفي عبد الله بن أُبَيّ ابن سلول جاء ابنه عبد الله بن عبد الله بن أُبيّ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وسأله أن يُعطيه قميصَه يُكفِّنُ فيه أباه فأعطاه. ثم سأل أن يُصلي عليه، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم ليصلي عليه، فقام عمر فأخذ بثوب رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! تصلي عليه، وقد نهاك ربك أن تصلي عليه؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إنما خيَّرني الله فقال: {اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِنْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً}
[التوبة: 80] وسأزيده على سبعين" قال: إنه منافق قال: فصلى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم فأنزل الله: {وَلَا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَى قَبْرِهِ} [سورة التوبة: 84].
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4670)، ومسلم في صفات المنافقين (2774) كلاهما من حديث أبي أسامة، حدثنا عبيدالله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكره ولفظهما سواء.
ورواه مسلم من حديث يحيي القطان، عن عبيدالله بهذا الإسناد نحوه وزاد: قال:"فترك الصلاة عليهم". جاء في بعض الروايات: قال عمر: فعجبتُ من جرأتي على رسول الله صلى الله عليه وسلم.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আব্দুল্লাহ ইবনে উবাই ইবনে সালূল মারা গেল, তার পুত্র আব্দুল্লাহ ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে উবাই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং তাঁর পিতার কাফনের জন্য নিজের জামাটি দিতে অনুরোধ করলেন। তিনি তাকে তা দিলেন। এরপর সে তার জন্য জানাযার সালাত আদায়ের অনুরোধ করল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার উপর সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে গেলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাপড় ধরে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি তার উপর সালাত আদায় করবেন, অথচ আপনার রব আপনাকে তার উপর সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ তো আমাকে এখতিয়ার দিয়েছেন। তিনি বলেছেন: {তুমি তাদের জন্য ক্ষমা চাও বা না চাও; যদি তুমি তাদের জন্য সত্তর বারও ক্ষমা চাও} [সূরা তাওবা: ৮০]। আমি সত্তর বারের চেয়েও বেশি ক্ষমা চাইব। তিনি (উমর) বললেন: সে তো মুনাফিক! তিনি (ইবনে উমর) বললেন: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার উপর সালাত আদায় করলেন। তখন আল্লাহ নাযিল করলেন: {তাদের মধ্য থেকে কেউ মারা গেলে তোমরা কখনো তার জন্য জানাযার সালাত আদায় করবে না এবং তার কবরের পাশে দাঁড়াবে না} [সূরা আত-তাওবা: ৮৪]।
এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের উপর সালাত আদায় করা ছেড়ে দিলেন। কতিপয় বর্ণনায় এসেছে, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি আমার এই সাহস দেখে আমি আশ্চর্য হলাম।
3626 - عن المسيب بن حَزْن قال: لما حضر أبا طالب الوفاة دخل عليه النبي صلى الله عليه وسلم وعنده أبو جهل وعبد الله بن أبي أمية فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أي عم! قل: لا إله إلا الله. أحاج لك بها عند الله" فقال أبو جهل وعبد الله بن أبي أميه: يا أبا طالب! أترغب عن ملة عبد المطلب؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لأستغفرن لك ما لم أُنه عنك" فنزلت: {مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قُرْبَى مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُمْ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ} [سورة التوبة: 113].
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4675)، ومسلم في الإيمان (24/ 40) كلاهما عن إسحاق بن إبراهيم، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبيه فذكره، واللفظ للبخاري.
وفي رواية عند عبد الرزاق أيضًا بعد قوله فنزلت: .. {مَا كَانَ لِلنَّبِيّ … } ونزلت: {إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ} [سورة القصص: 56].
মুসাইয়াব ইবনে হাযন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আবূ তালিবের মৃত্যুর সময় উপস্থিত হলো, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন। সেখানে আবূ জাহল এবং আবদুল্লাহ ইবনু আবী উমাইয়াও উপস্থিত ছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে চাচা! আপনি বলুন, 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ'। এই কলেমার মাধ্যমে আমি আপনার জন্য আল্লাহর কাছে সওয়াল করব।" তখন আবূ জাহল ও আবদুল্লাহ ইবনু আবী উমাইয়া বললো, "হে আবূ তালিব! আপনি কি আবদুল মুত্তালিবের ধর্ম থেকে মুখ ফিরিয়ে নিচ্ছেন?" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যতক্ষণ না আমাকে নিষেধ করা হয়, আমি অবশ্যই আপনার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতে থাকব।" তখন এই আয়াত নাযিল হলো: "নবী এবং মুমিনদের জন্য মুশরিকদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করা উচিত নয়, যদিও তারা আত্মীয় হয়, তাদের কাছে এটা স্পষ্ট হয়ে যাওয়ার পর যে তারা জাহান্নামের অধিবাসী।" [সূরা আত-তাওবাহ: ১১৩]
এবং (আব্দুর রাজ্জাকের এক বর্ণনায় এসেছে যে) এই আয়াতও নাযিল হয়েছিল: "নিশ্চয়ই আপনি যাকে ভালোবাসেন, তাকে হেদায়েত দিতে পারবেন না।" [সূরা আল-কাসাস: ৫৬]
3627 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعمه عند الموت:"قل: لا إله إلا الله. أشهد لك بها يوم القيامة" فأبى، فأنزل الله: {(55) إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ} [سورة القصص: 56].
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (25) من طرق عن مروان، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكر الحديث، ورواه من وجه آخر عن يحيى بن سعيد، حدثنا يزيد بن كيسان بإسناده، وذكر فيه قول أبي طالب: لولا أن تُعيّرني قريش يقولون: إنما حمله على ذلك الجزع، لأقررت بها عينك.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর মৃত্যুকালে তাঁর চাচাকে বললেন: “বলুন, ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই)। এর মাধ্যমে আমি ক্বিয়ামতের দিন আপনার জন্য সাক্ষ্য দেব।” কিন্তু সে (কালেমা পাঠে) বিরত থাকল। অতঃপর আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করলেন: “নিশ্চয় আপনি যাকে ভালোবাসেন, তাকে সৎপথে আনতে পারবেন না…” [সূরা আল-ক্বাসাস: ৫৬]।
(হাদীসের অন্য বর্ণনায়) আবূ তালিবের এই উক্তিও উল্লেখ আছে: "যদি কুরাইশরা আমাকে উপহাস না করত—তারা বলবে: ‘ভয়ই তাকে এর দিকে ঠেলে দিয়েছে’—তাহলে আমি এই কালেমা পাঠ করে আপনার চোখ জুড়িয়ে দিতাম।"
