আল-জামি` আল-কামিল
3621 - عن عامر بن ربيعة قال: مر رسول الله صلى الله عليه وسلم بقبر فقال: ما هذا القبر؟" قالوا:
قبر فلانة، قال:"أفلا آذَنْتموني؟" قالوا: كنت نائمًا، فكرهنا أن نُوقظك، قال:"فلا تفعلوا فادعوني لجنائزكم" فصفَّ عليها فصلَّي.
حسن: رواه الإمام أحمد (15673) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا عبد العزيز -يعني ابن محمد الدراوردي، عن محمد بن زيد التيمي، عن عبد الله بن عامر، عن أبيه فذكره.
وإسناده حسن من أجل عبد العزيز الدراوردي فإنه"حسن الحديث".
وأما ما رواه ابن ماجه (1529) عن يعقوب بن حُميد بن كاسب، قال: حدثنا عبد العزيز بن محمد الدراوردي بإسناده نحوه وفيه: إن امرأة سوداء ماتت.
فإسناده ضعيف لأن شيخ ابن ماجه وهو يعقوب بن حميد بن كاسب تكلم فيه غير واحد من أهل العلم فقال ابن معين: ليس بشيء، وقال أبو حاتم: ضعيف الحديث. وقال النسائي: ليس بشيء.
قلت: والحديث حسن بدونه كما رواه الإمام أحمد.
وفي الباب عن حصين بن وحوح أن طلحة بن البراء لما لقي النبي صلى الله عليه وسلم قال: يا رسول الله! مرني بأمرك ولا أعصي لك أمرًا. قال فعجب لذلك النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو غلام فقال له عند ذلك"اذهب فاقتل أباك" قال: فذهب موليًا ليفعل فدعاه فقال:"اقبل فإني لم أبعث بقطيعة الرحم" فمرض طلحة بعد ذلك فأتاه النبي صلى الله عليه وسلم يعوده في الشتاء في برد وغيم، فلما انصرف قال لأهله:"إني لا أرى طلحة إلا قد حدث فيه الموت، فآذنوني به حتى أشهده وأصلي عليه، وعجلوا" فلم يبلغ النبي صلى الله عليه وسلم بني سالم ابن عوف حتى توفي، وجن عليه الليل فكان فيما قال طلحة: ادفنوني وألحقوني بربي عز وجل، ولا تدعوا رسول الله صلى الله عليه وسلم فإني أخاف اليهود أن يصاب في سببي وأخبر النبي صلى الله عليه وسلم حين أصبح فجاء حتى وقف على قبره، وصفَّ الناس معه فقال:" اللهم الق طلحة تضحك إليه، ويضحك إليك".
رواه الطبراني في"الكبير" (4/ 33) عن موسى بن هارون، ثنا عمر بن زرارة الحدثي، ثنا عيسي ابن يونس، عن سعيد بن عثمان البلوي، عن عروة بن سعيد الأنصاري، عن أبيه، عن حصين بن وحوح فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 37):"عزاه صاحب الأطراف بعض هذا إلى أبي داود -ولم أره- رواه الطبراني في"الكبير" وإسناده حسن".
قلت: هو كما قال صاحب الأطراف، فقد رواه أبو داود (3159) في باب التعجيل بالجنازة وكراهية حبسها عن عبد الرحيم بن مطرف الرواسي أبي سفيان وأحمد بن جناب، قالا: حدثنا عيسي، قال أبو داود: وهو يونس، عن سعيد بن عثمان البلوي، عن عزرة، وقال عبد الرحيم: عروة بن سعيد الأنصاري، عن أبيه، عن الحصين بن وَحْوَح، أن طلحة بن البراء مرض، فأتاه النبيّ صلى الله عليه وسلم يعوده فقال:"إني لا أرى طلحة إلا قد حدث فيه الموت، فأذنوني به وعجلوا، فإنه لا ينبغي لجيفة مسلم أن تُحبس بين ظهراني أهله".
قلت: وفي الإسناد عروة أو عزرة"مجهول" كما قال الحافظ في"التقريب" وسعيد بن عثمان البلوي، لم يرو عنه إلا عيسى بن يونس، ولم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في"ثقاته" (6/ 361) ولم يذكر من الرواة عنه سوي عيسي بن يونس فهو"مجهول" أيضًا، وجعله الحافظ في"التقريب""مقبول" لذكره ابن حبان في الثقات، وترجمه ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (4/ 47) ولم يقل فيه شيئًا.
وفي الباب أيضًا عن بريدة: أن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى على ميت بعد ما دفن"، رواه ابن ماجه (1532) عن محمد بن حُميد قال: حدثنا مهران بن أبي عمر، عن أبي سنان، عن علقمة بن مرثَد، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكره. ورواه البيهقي من هذا الوجه (4/ 48) في سياق أطول، ومحمد بن حميد هو: ابن حبان الرازي، قال فيه البخاري:"في حديثه نظر"، وقال النسائي:"ليس بثقة"، وقال الجوزجاني:"ردئ المذهب غير ثقة"، وقال ابن حبان: لينفرد عن الثقات بالمقلوبات".
وكان ابن معين: حسن الرأي فيه فوثَّقه. والقول فيه قول الجماهير، وشيخه مهران بن أبي عمر العطار مختلف فيه، قال الحافظ:"صدوق له أوهام، سيء الحفظ".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي سعيد قال: كانت سوداء تقُمُّ المسجدَ، فتوفيتْ ليلًا. فلما أصبح رسول الله صلى الله عليه وسلم أُخبر بموتها فقال:"ألا آذنتموني بها؟" فخرج بأصحابه فوقف على قبرها، فكبَّر عليها، والناس من خلفه، ودعا لها، ثم انصرف.
رواه ابن ماجه (1533) وفي إسناده عبد الله بن لهيعة وفيه كلام معروف، ولم يرو عنه أحد العبادة، وقد ضعَّفه أيضًا البوصيري في"مصباح الزجاجة".
أقوال أهل العلم في الصلاة على القبر:
قال الترمذي بعد أن أخرج حديث ابن عباس (1037):"والعمل على هذا عند أكثر أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيره، وهو قول الشافعي وأحمد وإسحاق، وقال بعض أهل العلم: لا يُصلي على القبر. وهو قول مالك بن أنس. وقال عبد الله بن المبارك: إذا دفن الميت، ولم يُصل عليه صُلِّى على القبر. (ورأي ابن المبارك الصلاة على القبر) هكذا ذكره مكررًا، وقال أحمد وإسحاق: يصلي على القبر إلى شهر، وقالا: أكثر ما سمعنا عن ابن المسيب أن النبي صلى الله عليه وسلم صلي على قبر أم سعد بن عبادة بعد شهر".
ثم أخرج مرسل سعيد بن المسيب قال: إن أم سعد ماتت والنبي صلى الله عليه وسلم غائب، فلما قدم صلي عليها، وقد مضى لذلك شهر. انتهى.
আমির ইবনু রাবী'আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একটি কবরের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "এই কবরটি কার?" তারা বলল: এটা অমুক মহিলার কবর। তিনি বললেন: "তোমরা কি আমাকে অবহিত করলে না (জানাজার জন্য)?" তারা বলল: আপনি ঘুমিয়ে ছিলেন, তাই আমরা আপনাকে জাগানো অপছন্দ করলাম। তিনি বললেন: "তোমরা এমন করো না। তোমাদের জানাজার জন্য আমাকে ডাকবে।" এরপর তিনি (কবরের উপর) কাতার করলেন এবং সালাত আদায় করলেন।
3622 - عن جابر بن سمرة قال: أتي النبي صلى الله عليه وسلم برجل قتل نفسه بمشاقص، فلم يُصَلّ عليه. وفي رواية: ذكرت قصة هذا الرجل بأنه مرض، فصيح عليه، فجاء جاره إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم،
فقال [له]: إنه قد مات، قال:"وما يُدْريك؟" قال: أنا رأيته، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّه لم يمت"، قال: فرجع، فصيح عليه، فجاء إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: إنه قد مات، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إنه لم يمت" فرجع، فصيح عليه، فقالت امرأته: انطلق إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فأخبره، فقال الرجل: اللهم! العنه، قال: ثم انطلق الرجل، فرآه قد نحر نفسه بمشْقَص معه، فانطلق إلى النبي صلى الله عليه وسلم فأخبره أنه قد مات، فقال:"وما يُدريك؟" قال: رأيته ينحر نفسه بمشاقِصَ معه، قال:"أنت رأيته؟" قال: نعم، قال:"إذًا لا أصلي عليه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (978) عن عون بن سلَّام، أخبرنا زهير، عن سماك، عن جابر فذكره. والرواية الثانية عند أبي داود (3185) من وجه آخر، عن زهير بإسناده.
قال الترمذي عقب هذا الحديث (1068):"هذا حديث حسن صحيح. واختلف أهل العلم في هذا، فقال بعضهم: يُصلَّي على كل من صلَّى إلى القبلة، وعلى قاتل النفس، وهو قول الثوري وإسحاق، وقال أحمد: لا يُصَلِّي الإمام على قاتل النفس، ويُصَلِّي عليه غير الإمام".
وقال النووي: في هذا الحديث دليل لمن يقول: لا يُصَلِّي على قاتل نفسه لعصيانه، وهذا مذهب عمر بن عبد العزيز والأوزاعي، وقال الحسن والنخعي وقتادة ومالك وأبو حنيفة والشافعي وجماهير العلماء: يُصَلِّي عليه، وأجابوا عن هذا الحديث بأن النبي صلى الله عليه وسلم لم يُصَلَّ عليه بنفسه زجرًا للناس عن مثل فعله، وصلت عليه الصحابة، وهذا كما ترك النبي صلى الله عليه وسلم الصلاة في أول الأمر على من عليه دين زجرًا لهم عن التساهل في الاستدانة، وعن إهمال وفائه، وأمر أصحابه بالصلاة عليه، فقال صلى الله عليه وسلم:"صلوا على صاحبكم".
قال القاضي: مذهب العلماء كافة الصلاةُ على كل مسلم، ومحدود، ومرجوم، وقاتل نفسه، وولد الزنا، وعن مالك وغيره: أن الإمام يجتنب الصلاة على مقتول في حد، وأن أهل الفضل لا يُصلون على الفساق زجرًا لهم، وعن الزهري: لا يُصَلِّي على مرجوم، ويُصَلِّي على المقتول في قصاص، وقال أبو حنيفة: لا يُصَلِّي على محارب، ولا على قتيل الفئة الباغية، وقال قتادة: لا يُصَلِّي على ولد الزنا، وعن الحسن: لا يُصَلِّي على النفساء تموت من زنا، ولا على ولدها" انتهى.
ونقل القرطبي في"المفهم" عن الإمام أحمد: لا يُصلِّي الإمام على قاتل نفس، ولا على غال، وقال أبو حنيفة: لا يُصلِّي على من ترك الصلاة إذا قيل، ويُصلِّي على من سواه.
জাবির ইবন সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এমন এক ব্যক্তিকে আনা হলো, যে তীরের ফলার দ্বারা আত্মহত্যা করেছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জানাযার সালাত আদায় করলেন না।
আরেকটি বর্ণনায় সেই লোকটির ঘটনা উল্লেখ করা হয়েছে যে, সে অসুস্থ হয়েছিল এবং (তার মৃত্যু হয়েছে মনে করে) তার জন্য কান্নাকাটি করা হলো। অতঃপর তার প্রতিবেশী রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে বললেন: "নিশ্চয়ই সে মারা গেছে।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কীভাবে জানলে?" লোকটি বলল: "আমি তাকে দেখেছি।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে মরেনি।" লোকটি ফিরে গেল। অতঃপর আবার তার জন্য কান্নাকাটি করা হলো। লোকটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল: "সে মারা গেছে।" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে মরেনি।" সে আবার ফিরে গেল। অতঃপর তার জন্য কান্নাকাটি করা হলো। তার স্ত্রী বলল: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যাও এবং তাঁকে খবর দাও।" লোকটি তখন বলল (রোগীটির ব্যাপারে): "হে আল্লাহ! তাকে অভিশাপ দিন।" (বর্ণনাকারী) বলেন: অতঃপর লোকটি গেল এবং দেখল যে সে তার সাথে থাকা তীরের ফলার দ্বারা নিজের গলা কেটে ফেলেছে। এরপর সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে গিয়ে তাঁকে খবর দিল যে সে মারা গেছে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কীভাবে জানলে?" লোকটি বলল: "আমি তাকে তার সাথে থাকা তীরের ফলার দ্বারা নিজের গলা কাটতে দেখেছি।" তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি তাকে দেখেছ?" সে বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "তাহলে আমি তার জানাযার সালাত আদায় করব না।"
3623 - عن جابر أن رجلًا من أسلم جاء النبي صلى الله عليه وسلم فاعترف بالزنا، فأعرض عنه النبي صلى الله عليه وسلم حتى شهد على نفسه أربع مرات، قال له النبي صلى الله عليه وسلم:"أبك جنون"؟ قال: لا، قال:"أحصنت؟" قال: نعم، قال: فأمر النبي صلى الله عليه وسلم فرجم بالمصلي، فلما أذلقتْه الحجارة فرَّ، فأُدرك فرجم حتى مات، فقال النبي صلى الله عليه وسلم خيرًا، ولم يُصَلِّ عليه.
متفق عليه: رواه البخاري في الحدود (6820)، ومسلم في الحدود (1691/ 16) كلاهما من حديث عبد الرزاق، وهو في مصنفه (13337) عن معمر، عن الزهري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن جابر فذكر الحديث واللفظ من مصنف عبد الرزاق.
وأما مسلم لم يسق لفظه، وأما البخاري فقال:"وصلى عليه" وهو خطأ كما قال البيهقي (8/ 218) فإن كل من رواه من طريق عبد الرزاق لم يقل فيه"وصلى عليه" منهم أبو داود (4430)، والترمذي (1429)، والنسائي (1956)، وأحمد (14462) وغيرهم.
ثم قال البخاري: لم يقل يونس وابن جريج، عن الزهري:"فصلى عليه".
قلت: وكذلك لم يقل معمر عن الزهري:"فصلي عليه"، بل قال:"ولم يصل عليه" كما سبق.
وأما ما رواه أبو برزة الأسلمي أن رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يُصَلِّ على ماعز بن مالك، ولم ينه عن الصلاة عليه، فقيه رجال مجاهيل. رواه أبو داود (3186) عن أبي كامل، حدثنا أبو عوانة، عن أبي بشر، حدثني نفر من أهل البصرة، عن أبي برزة الأسلمي فذكره. ونفر من أهل البصرة رجال لا يعرفون.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আসলাম গোত্রের একজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে ব্যভিচারের স্বীকারোক্তি করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে মুখ ফিরিয়ে নিলেন, যতক্ষণ না সে নিজের বিরুদ্ধে চারবার সাক্ষ্য দিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে জিজ্ঞাসা করলেন: "তোমার কি কোনো উন্মাদনা আছে?" সে বলল: "না।" তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: "তুমি কি বিবাহসূত্রে আবদ্ধ?" সে বলল: "হ্যাঁ।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে মুসাল্লা নামক স্থানে রজম (পাথর নিক্ষেপ) করার নির্দেশ দিলেন। যখন পাথরগুলো তাকে আঘাত করতে শুরু করল, তখন সে পালিয়ে গেল। অতঃপর তাকে ধরে আনা হলো এবং পাথর নিক্ষেপ করা হলো, যতক্ষণ না সে মারা গেল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার সম্পর্কে ভালো কথা বললেন, কিন্তু তার জানাযার সালাত (নামাজ) আদায় করলেন না।
3624 - عن عمران بن حُصين أن امرأة من جُهينة أتتْ نبي الله صلى الله عليه وسلم وهي حُبلى من الزنا، فقالت: يا نبي الله! أصبتُ حدًا فأقمه عليَّ، فدعا النبي صلى الله عليه وسلم وليها فقال:"أحسن إليها، فإذا وضعت فائتني بها" ففعل. فأمر بها نبي الله صلى الله عليه وسلم فشكتْ عليها ثيابُها، ثم أمر بها فرجمتْ، ثم صلَّى عليها، فقال له عمر: تُصلي عَليها يا نبي الله! وقد زنتْ فقال:"لقد تابتْ توبة لو قُسِمت بين سبعين من أهل المدينة لوسعتْهم، وهل وجدت توبة أفضل من أن جادتْ بنفسها الله تعالي".
صحيح: رواه مسلم في الحدود (1696) عن أبي غسان مالك بن عبد الواحد المشمعي، حدثنا معاذ (يعني ابن هشام) حدثني أبي، عن يحيى بن أبي كثير، حدثني أبو قلابة، أن أبا المهلب حدَّثه، عن عمران بن حصين فذكره.
ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জুহায়নাহ গোত্রের এক মহিলা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল। সে ছিল যেনার কারণে গর্ভবতী। সে বলল, হে আল্লাহর নবী! আমি এমন কাজ করেছি যার কারণে আমার উপর শাস্তি (হদ) প্রযোজ্য, অতএব তা আমার উপর প্রয়োগ করুন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার অভিভাবককে ডেকে বললেন, "তার সাথে সদ্ব্যবহার করো, যখন সে প্রসব করবে তখন তাকে আমার কাছে নিয়ে এসো।" সে তাই করল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার ব্যাপারে আদেশ দিলেন। তখন তার পোশাকাদি শক্ত করে বেঁধে দেওয়া হলো। এরপর তিনি তাকে রজম (পাথর নিক্ষেপ করে শাস্তি) করার নির্দেশ দিলেন। অতঃপর তিনি তার উপর জানাযার সালাত আদায় করলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন, হে আল্লাহর নবী! আপনি তার উপর সালাত (জানাযা) আদায় করছেন? অথচ সে যেনা করেছে! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "সে এমন তাওবা করেছে যে, যদি তা মদীনার সত্তর জন বাসিন্দার মধ্যে ভাগ করে দেওয়া হতো, তবে তা তাদের জন্য যথেষ্ট হতো। আল্লাহর জন্য নিজের জীবন উৎসর্গ করার চেয়ে উত্তম তাওবা কি তুমি আর কিছু পেয়েছ?"
3625 - عن عبد الله بن عمر قال: لما تُوفي عبد الله بن أُبَيّ ابن سلول جاء ابنه عبد الله بن عبد الله بن أُبيّ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وسأله أن يُعطيه قميصَه يُكفِّنُ فيه أباه فأعطاه. ثم سأل أن يُصلي عليه، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم ليصلي عليه، فقام عمر فأخذ بثوب رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! تصلي عليه، وقد نهاك ربك أن تصلي عليه؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إنما خيَّرني الله فقال: {اسْتَغْفِرْ لَهُمْ أَوْ لَا تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ إِنْ تَسْتَغْفِرْ لَهُمْ سَبْعِينَ مَرَّةً}
[التوبة: 80] وسأزيده على سبعين" قال: إنه منافق قال: فصلى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم فأنزل الله: {وَلَا تُصَلِّ عَلَى أَحَدٍ مِنْهُمْ مَاتَ أَبَدًا وَلَا تَقُمْ عَلَى قَبْرِهِ} [سورة التوبة: 84].
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4670)، ومسلم في صفات المنافقين (2774) كلاهما من حديث أبي أسامة، حدثنا عبيدالله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكره ولفظهما سواء.
ورواه مسلم من حديث يحيي القطان، عن عبيدالله بهذا الإسناد نحوه وزاد: قال:"فترك الصلاة عليهم". جاء في بعض الروايات: قال عمر: فعجبتُ من جرأتي على رسول الله صلى الله عليه وسلم.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আব্দুল্লাহ ইবনে উবাই ইবনে সালূল মারা গেল, তার পুত্র আব্দুল্লাহ ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে উবাই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন এবং তাঁর পিতার কাফনের জন্য নিজের জামাটি দিতে অনুরোধ করলেন। তিনি তাকে তা দিলেন। এরপর সে তার জন্য জানাযার সালাত আদায়ের অনুরোধ করল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার উপর সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দাঁড়িয়ে গেলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাপড় ধরে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কি তার উপর সালাত আদায় করবেন, অথচ আপনার রব আপনাকে তার উপর সালাত আদায় করতে নিষেধ করেছেন? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আল্লাহ তো আমাকে এখতিয়ার দিয়েছেন। তিনি বলেছেন: {তুমি তাদের জন্য ক্ষমা চাও বা না চাও; যদি তুমি তাদের জন্য সত্তর বারও ক্ষমা চাও} [সূরা তাওবা: ৮০]। আমি সত্তর বারের চেয়েও বেশি ক্ষমা চাইব। তিনি (উমর) বললেন: সে তো মুনাফিক! তিনি (ইবনে উমর) বললেন: এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার উপর সালাত আদায় করলেন। তখন আল্লাহ নাযিল করলেন: {তাদের মধ্য থেকে কেউ মারা গেলে তোমরা কখনো তার জন্য জানাযার সালাত আদায় করবে না এবং তার কবরের পাশে দাঁড়াবে না} [সূরা আত-তাওবা: ৮৪]।
এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের উপর সালাত আদায় করা ছেড়ে দিলেন। কতিপয় বর্ণনায় এসেছে, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি আমার এই সাহস দেখে আমি আশ্চর্য হলাম।
3626 - عن المسيب بن حَزْن قال: لما حضر أبا طالب الوفاة دخل عليه النبي صلى الله عليه وسلم وعنده أبو جهل وعبد الله بن أبي أمية فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أي عم! قل: لا إله إلا الله. أحاج لك بها عند الله" فقال أبو جهل وعبد الله بن أبي أميه: يا أبا طالب! أترغب عن ملة عبد المطلب؟ فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"لأستغفرن لك ما لم أُنه عنك" فنزلت: {مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قُرْبَى مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُمْ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ} [سورة التوبة: 113].
متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4675)، ومسلم في الإيمان (24/ 40) كلاهما عن إسحاق بن إبراهيم، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبيه فذكره، واللفظ للبخاري.
وفي رواية عند عبد الرزاق أيضًا بعد قوله فنزلت: .. {مَا كَانَ لِلنَّبِيّ … } ونزلت: {إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ} [سورة القصص: 56].
মুসাইয়াব ইবনে হাযন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আবূ তালিবের মৃত্যুর সময় উপস্থিত হলো, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কাছে প্রবেশ করলেন। সেখানে আবূ জাহল এবং আবদুল্লাহ ইবনু আবী উমাইয়াও উপস্থিত ছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে চাচা! আপনি বলুন, 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ'। এই কলেমার মাধ্যমে আমি আপনার জন্য আল্লাহর কাছে সওয়াল করব।" তখন আবূ জাহল ও আবদুল্লাহ ইবনু আবী উমাইয়া বললো, "হে আবূ তালিব! আপনি কি আবদুল মুত্তালিবের ধর্ম থেকে মুখ ফিরিয়ে নিচ্ছেন?" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যতক্ষণ না আমাকে নিষেধ করা হয়, আমি অবশ্যই আপনার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতে থাকব।" তখন এই আয়াত নাযিল হলো: "নবী এবং মুমিনদের জন্য মুশরিকদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করা উচিত নয়, যদিও তারা আত্মীয় হয়, তাদের কাছে এটা স্পষ্ট হয়ে যাওয়ার পর যে তারা জাহান্নামের অধিবাসী।" [সূরা আত-তাওবাহ: ১১৩]
এবং (আব্দুর রাজ্জাকের এক বর্ণনায় এসেছে যে) এই আয়াতও নাযিল হয়েছিল: "নিশ্চয়ই আপনি যাকে ভালোবাসেন, তাকে হেদায়েত দিতে পারবেন না।" [সূরা আল-কাসাস: ৫৬]
3627 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعمه عند الموت:"قل: لا إله إلا الله. أشهد لك بها يوم القيامة" فأبى، فأنزل الله: {(55) إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ} [سورة القصص: 56].
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (25) من طرق عن مروان، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكر الحديث، ورواه من وجه آخر عن يحيى بن سعيد، حدثنا يزيد بن كيسان بإسناده، وذكر فيه قول أبي طالب: لولا أن تُعيّرني قريش يقولون: إنما حمله على ذلك الجزع، لأقررت بها عينك.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর মৃত্যুকালে তাঁর চাচাকে বললেন: “বলুন, ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ’ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই)। এর মাধ্যমে আমি ক্বিয়ামতের দিন আপনার জন্য সাক্ষ্য দেব।” কিন্তু সে (কালেমা পাঠে) বিরত থাকল। অতঃপর আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করলেন: “নিশ্চয় আপনি যাকে ভালোবাসেন, তাকে সৎপথে আনতে পারবেন না…” [সূরা আল-ক্বাসাস: ৫৬]।
(হাদীসের অন্য বর্ণনায়) আবূ তালিবের এই উক্তিও উল্লেখ আছে: "যদি কুরাইশরা আমাকে উপহাস না করত—তারা বলবে: ‘ভয়ই তাকে এর দিকে ঠেলে দিয়েছে’—তাহলে আমি এই কালেমা পাঠ করে আপনার চোখ জুড়িয়ে দিতাম।"
3628 - عن وعن جابر قال: لما مات أبو طالب قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"رحمك الله وغفر لك يا عم، ولا أزال أستغفر لك حتي ينهاني الله عز وجل" فأخذ المسلمون يستغفرون لموتاهم الذين ماتوا وهم مشركون، فأنزل الله تعالى: {مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قُرْبَى مِنْ بَعْدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُمْ أَصْحَابُ
الْجَحِيمِ} [سورة التوبة: 113].
صحيح: رواه الحاكم (2/ 335) من طريق أبي حمة اليماني، ثنا سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن جابر فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه، وقال لنا أبو علي (أي شيخه الحافظ الحسين بن علي) على أثره:"لا أعلم أحدًا وصل هذا الحديث عن سفيان غير أبي حمة اليماني، وهو ثقة، وقد أرسله أصحاب ابن عينة".
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আবু তালিব মারা গেলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ আপনার প্রতি রহম করুন এবং আপনাকে ক্ষমা করুন, হে আমার চাচা। আমি আপনার জন্য ক্ষমা চাইতে থাকব যতক্ষণ না আল্লাহ আমাকে তা থেকে নিষেধ করেন।" এরপর মুসলিমগণও তাদের মৃত আত্মীয়-স্বজনের জন্য ক্ষমা চাইতে শুরু করল, যারা মুশরিক (শিরককারী) অবস্থায় মারা গিয়েছিল। তখন আল্লাহ তাআলা এই আয়াতটি নাযিল করলেন: "নবী এবং মুমিনদের জন্য সংগত নয় যে, তারা মুশরিকদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করবে, যদিও তারা আত্মীয় হয়—যখন তাদের কাছে স্পষ্ট হয়ে গেছে যে, তারা জাহান্নামের অধিবাসী।" [সূরা আত-তাওবা: ১১৩]।
3629 - عن علي بن أبي طالب، قال: سمعت رجلًا يستغفر لأبويه وهما مشركان، فقلت: أتستغفر لهما وهما مشركان؟ فقال: أو لم يستغفر إبراهيم لأبيه، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم فذكرت ذلك له فنزلت: {وَمَا كَانَ اسْتِغْفَارُ إِبْرَاهِيمَ لِأَبِيهِ إِلَّا عَنْ مَوْعِدَةٍ وَعَدَهَا إِيَّاهُ} [سورة التوبة: 114].
حسن: رواه الترمذي (3101)، والنسائي (2036) كلاهما من حديث سفيان، عن أبي إسحاق، عن أبي الخليل، عن علي بن أبي طالب فذكره. قال الترمذي:"حديث حسن".
وأخرجه الإمام أحمد (1085)، والحاكم (2/ 335) من هذا الوجه وقال:"صحيح الإسناد".
وأبو الخليل هو عبد الله بن الخليل، أو ابن أبي الخليل الحضرمي الكوفي، قال ابن سعد: كان قليل الحديث، ووثَّقه ابن حبان، وروى عنه جمع، فيُحسن حديثه في الشواهد، وأما إذا انفرد فينظر فيه.
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি এক ব্যক্তিকে তার পিতা-মাতার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করতে শুনলাম, অথচ তারা মুশরিক (শিরককারী) ছিল। আমি বললাম, তুমি তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করছ, অথচ তারা মুশরিক? সে বললো, ইবরাহীম (আঃ)-ও কি তাঁর পিতার জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করেননি? তখন আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট এসে তাঁকে বিষয়টি জানালাম। তখন নাযিল হলো: "ইবরাহীম তাঁর পিতার জন্য যে ক্ষমা প্রার্থনা করেছিলেন, তা কেবল সেই প্রতিশ্রুতির কারণে, যা তিনি তাকে দিয়েছিলেন।" (সূরাহ আত-তাওবাহ: ১১৪)
3630 - عن سلمة بن الأكوع قال: كنا جلوسًا عند النبي صلى الله عليه وسلم إذ أُتِيَ بجنازةٍ، فقالوا: صلِّ عليها، فقال:"هل عليه دَيْنٌ؟" قالوا: لا، قال: فهل ترك شيئًا" قالوا: لا، فصَلَّى عليه، ثم أُتِيَ بجنازةٍ أُخرى، فقالوا: يا رسول الله! صلِّ عليها، قال:"هل عليه دين؟" قيل: نعم، قال: فهل ترك شيئًا؟" قالوا: ثلاثة دنانير، فصلى عليها، ثم أُتِي بالثالثة، فقالوا: صلِّ عليها، قال:"فهل ترك شيئًا؟" قالوا: لا، قال:"هل عليه دين؟" قالوا: ثلاثة دنانير، قال:"صلُّوا على صاحبكم".
قال أبو قتادة: صلِّ عليه يا رسول الله! وعليَّ دينُه، فصلى عليه.
صحيح: رواه البخاري في الكفالة (2289، 2295) من طريقين عن المكي بن إبراهيم، وأبي عاصم، كلاهما عن يزيد بن أبي عبيد، عن سلمة بن الأكوع، فذكره، واللفظ للمكي، ولفظ أبي عاصم مختصر.
সালামাহ ইবনুল আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসেছিলাম, এমন সময় একটি জানাযা আনা হলো। লোকেরা বলল: আপনি এর উপর সালাত (জানাযা) আদায় করুন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “তার কি কোনো ঋণ আছে?” তারা বলল: না। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “সে কি কিছু রেখে গেছে?” তারা বলল: না। তখন তিনি তার উপর সালাত আদায় করলেন। এরপর আরেকটি জানাযা আনা হলো। লোকেরা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এর উপর সালাত আদায় করুন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “তার কি কোনো ঋণ আছে?” বলা হলো: হ্যাঁ। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “সে কি কিছু রেখে গেছে?” তারা বলল: তিন দিনার। এরপর তিনি তার উপরও সালাত আদায় করলেন। এরপর তৃতীয় আরেকটি জানাযা আনা হলো। লোকেরা বলল: এর উপর সালাত আদায় করুন। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “সে কি কিছু রেখে গেছে?” তারা বলল: না। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: “তার কি কোনো ঋণ আছে?” তারা বলল: তিন দিনার। তিনি বললেন: “তোমরা তোমাদের সাথীর জানাযার সালাত আদায় করো।” তখন আবূ কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তার উপর সালাত আদায় করুন। তার ঋণের দায়িত্ব আমার। এরপর তিনি তার উপর সালাত আদায় করলেন।
3631 - عن أبي قتادة، أن النبي صلى الله عليه وسلم أتي بجنازة رجل ليصلي عليها فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"صلوا على صاحبكم، فإن عليه دينا". قال أبو قتادة: هو عليَّ. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بالوفاء؟" قال: بالوفاء، فصلى عليه.
وفي رواية كان عليه ثمانية عشر، أو تسعة عشر درهما.
صحيح: رواه الترمذي (1069)، والنسائي (1960)، وابن ماجه (2407) كلهم من طرق، عن
شعبة، عن عثمان بن عبد الله بن موهب، قال: سمعت عبد الله بن أبي قتادة، عن أبيه فذكره.
والرواية الثانية ذكرها ابن ماجه. قال الترمذي: حسن صحيح. وصحَّحه أيضًا ابن خزيمة (3060) ورواه من هذا الوجه وللحديث طرق أخرى.
আবূ কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এক ব্যক্তির জানাজা আনা হলো, যাতে তিনি এর উপর সালাত (জানাজার নামাজ) আদায় করেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তোমাদের সাথীর জানাজা পড়ো, কারণ তার ঋণ রয়েছে।" আবূ কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "ঋণটি আমার দায়িত্বে।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "পরিশোধ করার নিশ্চয়তা দিচ্ছো?" তিনি বললেন: "পরিশোধের নিশ্চয়তা দিচ্ছি।" অতঃপর তিনি (নবী) তার উপর জানাজার সালাত আদায় করলেন। অন্য এক বর্ণনায় আছে, তার উপর আঠারো বা ঊনিশ দিরহাম (দিরহাম পরিমাণ) ঋণ ছিল।
3632 - عن جابر قال: توفي رجل فغسَّلناه، وحنَّطناه وكفَّنَّاه، ثم أتينا به رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي عليه، فقلنا: تُصلي عليه، فخطا خطىً ثم قال:"أعليه دين؟" قلنا: ديناران، فانصرف، فتحملهما أبو قتادة: فأَتيناه. فقال أبو قتادة: الدنياران عليَّ. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"حق الغريم، وبَرِئَ منهما الميت؟" قال: نعم، فصلى عليه، ثم قال بعد ذلك بيوم"ما فعل الديناران؟" فقال: إنما مات أمس، قال: فعاد إليه من الغد، فقال: قد قضيتُهما، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الآن برَّدْتَ عليه جِلْده".
حسن: رواه الإمام أحمد (1436) عن عبد الصمد وأبي سعيد، المعنى، قالا: حدثنا زائدة، عن عبد الله بن محمد بن عقيل، عن جابر بن عبد الله فذكره. وإسناده حسن لأجل عبد الله بن محمد ابن عقيل فإنه حسن الحديث ورواه الحاكم (2/ 58) من هذا الوجه وصحَّحه.
وأبو سعيد هو: عبد الله بن عبد الله بن عبيد مولى بني هاشم. وزائدة هو: ابن قدامة.
وقوله:"حقَّ الغريم، وبرئ منهما الميت" قال البيهقي (6/ 74):"إن كان حفظه ابن عقيل فإنما عنَي به -والله أعلم- للغريم مطالبتك بهما وحدك إن شاء، كما لو كان له عليك حق من وجه آخر، والميت منه بريء.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি মারা গেল। আমরা তাকে গোসল করালাম, সুগন্ধি মাখালাম এবং কাফন পরালাম। এরপর আমরা তাকে নিয়ে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসলাম যেন তিনি তার জানাযার সালাত আদায় করেন। আমরা বললাম: আপনি তার উপর সালাত আদায় করুন। তিনি কয়েক কদম এগিয়ে গেলেন, তারপর বললেন: "তার কি কোনো ঋণ আছে?" আমরা বললাম: দুই দীনার। তিনি (সালাত আদায় করা থেকে) ফিরে গেলেন। তখন আবূ ক্বাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই ঋণের দায়িত্ব নিলেন। অতঃপর আমরা তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিকট আসলাম। আবূ ক্বাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: দুই দীনারের দায়ভার আমার। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "পাওনাদারের পাওনা সুরক্ষিত হলো এবং মৃত ব্যক্তি এর থেকে মুক্ত হলো কি?" তিনি বললেন: হ্যাঁ। অতঃপর তিনি তার উপর সালাত আদায় করলেন। এরপর এর এক দিন পর তিনি বললেন: "দুই দীনারের কী ব্যবস্থা হলো?" তিনি বললেন: সে তো গতকাল মারা গেছে (অর্থাৎ আমি এখনো পরিশোধ করিনি)। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পরদিন আবার তাঁর (আবূ ক্বাতাদাহর) কাছে আসলেন। তখন তিনি বললেন: আমি তা পরিশোধ করে দিয়েছি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "এখন তুমি তার চামড়াকে শীতল করলে (তার উপর থেকে কষ্ট দূর করলে)।"
3633 - عن أبي أمامة قال: توفي رجل على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فلم يوجد له كفن، فأتوا النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"انظروا إلى داخلة إزاره" فأصيب دينار، أو ديناران فقال:"كَيَّتَانِ، صلوا على صاحبكم" فقال رجل: إلي قضاؤها يا رسول الله! ، فصلَّى عليه.
حسن: رواه الطبراني في"الكبير" (4/ 124) عن محمد بن أحمد بن أبي خيثمة، ثنا عبد الرحمن بن يونس الرقي، ثنا عقبة بن علقمة، عن أرطاة بن المنذر، عن ضمرة بن حبيب، عن أبي أمامة فذكره.
وإسناده حسن من أجل عقبة بن علقمة، وهو المعافري مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم
يكن الحديث من ابنه محمد فإنه كان يُدخل عليه، وكذلك إذا لم يكن الحديث من روايته عن الأوزاعي، فإنه روى عنه ما لا يوافقه عليه أحد كما قال ابن عدي، وقد وثَّقه ابن أبي خيثمة وأبو مسهر، وقال ابن معين: لا بأس به، وبقية رجاله ثقات وإسناده متصل. قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 41):"رجاله ثقات".
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তির মৃত্যু হলো, কিন্তু তার জন্য কাফন পাওয়া গেল না। অতঃপর তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে হাজির হলো। তিনি বললেন: "তোমরা তার তহবিলের (লুঙ্গির) ভেতরের দিকটা দেখ।" তখন এক বা দু'টি দীনার পাওয়া গেল। তিনি বললেন: "এই দু'টি হলো (তার ঋণের ব্যবস্থা), তোমরা তোমাদের সঙ্গীর জানাযা পড়ো।" তখন এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমি এর (ঋণের) দায়িত্ব নিচ্ছি। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার জানাযা পড়লেন।
3634 - عن أبي هريرة أن النبي صلى الله عليه وسلم أتي بجنازة فقام يصلي عليها، قالوا: عليه دين، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"انطلقوا بصاحبكم، فصلوا عليه، فقال رجل: عليَّ دينه، فصَلِّ عليه، فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلى عليه.
حسن: رواه البزار (7804) عن محمد بن معمر، قال: نا روح بن عبادة قال: نا محمد بن أبي حفصة، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره.
قال البزار:"هذا الحديث رواه ابن أبي ذئب عن الزهري، عن أبي سلمة، ولا نعلم أحدا قال: عن سعيد إلا ابن أبي حفصة".
قلت: وهو كما قال. ولكن لا يبعد أن يكون عند الزهري حديثان، أحدهما هذا، والآخر هو ما يأتي في الباب الذي يليه. ومحمد بن أبي حفصة مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 40):"رجاله رجال الصحيح".
وأما ما رُوي عن عيسى بن صدقة بن عباد اليشكري قال: دخلت مع أبي على أنس بن مالك فقلنا له: حدَّثنا حديثًا ينفعنا الله به، فسمعته يقول: من استطاع منكم أن يموت ولا دين عليه فليفعل، فإني رأيت نبي الله صلى الله عليه وسلم وأتي بجنازة رجل، وعليه دين فقال:"لا أصلي عليه حتى تضمنوا دَيْنَه فإن صلاتي عليه تنفعه" فلم يضمنوا دَينه، ولم يُصل عليه، وقال:"إنه مرتهن في قبره" فهو ضعيف.
رواه أبو يعلى (4229) عن سعيد بن الأشعث، أخبرني عيسي بن صدقة بن عَبَّاد فذكره. ورواه أبو الوليد قال: حدثنا عيسى بن صدقة، عن عبد الحميد بن أمية قال: شهدتُ أنس بن مالك، فقال له رجل: يا أبا حمزة! حدِّثنا حديثًا ينفعنا الله به، قال: من استطاع منكم أن يموت، وليس عليه دين فليفعل، فإني شهدت رسول الله- صلى الله عليه وسلم أتي بجنازة رجل يُصلي عليه، فقال:"عليه دين؟" فقالوا: نعم، قال: فما ينفعكم أن أصلي على رجل روحه مرتهن في قبره، لا تصعد روحه إلى الله، فلو ضمن رجل دَينَه قُمت فصلَّيت عليه، فإن صلاتي تنفعه"، رواه العُقيلي في الضعفاء (1432) عن معاذ بن المثنى بن معاذ قال: حدثنا أبو الوليد فذكره.
قال: حدثني آدم بن موسي، قال: سمعت البخاري يقول: عيسي بن صدقة، ويقال: ابن عبَّاد ابن صدقة، قال لي أبو الوليد: هو ضعيف.
وكرر الذهبي في" الميزان" ترجمته فقال: عيسي بن صدقة ويقال: صدقة بن عيسى أبو محرز، والصحيح الأول، ونقل فيه تضعيف أبي الوليد، وقال أبو زرعة: شيخ، وقال الدارقطني: متروك،
ثم ترجمه في عيسي بن صدقة بن عبَّاد بن صدقة وقال: وينسب إلى جده فيقال: عيسي بن صدقة، ضعَّفوه، روى عنه أبو الوليد فقال: صدقة بن عيسى، ثم ضعَّفه، وكذا ضعَّفه أبو حاتم، وقال ابن حبان، منكر الحديث. انتهى.
وانتقده الحافظ في"اللسان" (4/ 398) وقال: هذا هو الذي قبله، كررَّه بلا فائدة".
قلت: وقال الحافظ الهيثمي في"المجمع" (3/ 39):"رواه أبو يعلى وعيسى وثَّقه أبو حاتم وضعَّفه غيره" هذا هو الصحيح بأن أبا حاتم لم يضعف عيسي بن صدقة، فإن عبد الرحمن بن أبي حاتم نقل عن أبيه في"الجرح والتعديل" (6/ 279) فقال:"شيخ يكتب حديثه، وترجمه أيضًا في صدقة بن عيسي (4/ 428) فلم ينقل تضعيفه من أبيه، ولم يُنبه عليه الحافظ ابن حجر في اللسان فتنبه".
وقد رُوي عن أسماء بنت يزيد قالت: دُعي رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى جنازة رجل من الأنصار، فلما وضع السرير تقدم نبي الله صلى الله عليه وسلم ليصلي عليه، ثم التفت فقال:"علي صاحبكم دين؟" قالوا: نعم يا رسول الله ديناران، فقال:"صلوا على صاحبكم". فقال أبو قتادة: إنا ندينه يا نبي الله، فصلى عليه.
رواه الطبراني في"الكبير" (24/ 184) عن يحيى بن عثمان بن صالح، ثنا عبد الله بن يوسف، ثنا محمد بن مهاجر، عن أبيه، قال: حدثتنا أسماء بنت يزيد فذكرته.
ومهاجر هو: ابن دينار الشامي الأنصاري مولي أسماء بنت يزيد، ذكره ابن حبان في"الثقات" ولم يوثقه أحد، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة، ولم يتابع فهو"لين الحديث".
وأما الهيثمي فقال في"المجمع" (3/ 40) بعد أن عزاه للطبراني"رجاله ثقات" وذلك اعتمادًا على توثيق ابن حبان.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর নিকট একটি জানাযা আনা হয়েছিল। তিনি তার উপর (জানাযার) সালাত আদায়ের জন্য দাঁড়ালেন। লোকেরা বললো: তার উপর ঋণ রয়েছে। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "তোমরা তোমাদের সাথীকে নিয়ে যাও, এবং তোমরা তার জানাযার সালাত আদায় করো।" তখন এক ব্যক্তি বললো: তার ঋণ পরিশোধের দায়িত্ব আমার, সুতরাং আপনি তার উপর সালাত আদায় করুন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাঁড়ালেন এবং তার উপর সালাত আদায় করলেন।
3635 - عن أبي هريرة قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُؤتى بالرجل المتوفى عليه الدين، فيسأل:"هل ترك لدينه فضْلًا؟" فإن حُدِّث أنه ترك لدَينه وفاءً صلى، وإلا قال للمسلمين:"صلوا على صاحبكم" فلما فتح الله عليه الفتوح قال:"أنا أولى بالمؤمنين من أنفسهم، فمن تُوفي من المؤمنين فترك دينا فعلي قضاؤُه، ومن ترك مالا فلورثته".
متفق عليه: رواه البخاري في الكفالة (2298)، ومسلم في الفرائض (1619) كلاهما من حديث الليث، عن عُقيل، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.
قال الطيالسي (2338):"بهذا نسخ تلك الأحاديث التي جاءت في ترك الصلاة على الذي عليه الدين".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এমন মৃত ব্যক্তিকে আনা হতো যার উপর ঋণ ছিল। তিনি জিজ্ঞেস করতেন, "সে কি তার ঋণের জন্য কোনো অতিরিক্ত (সম্পদ) রেখে গেছে?" যদি তাকে জানানো হতো যে, সে তার ঋণ পরিশোধের জন্য যথেষ্ট (সম্পদ) রেখে গেছে, তাহলে তিনি তার (জানাযার) সালাত আদায় করতেন। অন্যথায় তিনি মুসলমানদেরকে বলতেন, "তোমরা তোমাদের সাথীর জানাযার সালাত আদায় করো।" অতঃপর যখন আল্লাহ তাঁর জন্য (বিজয়ের) দুয়ারসমূহ উন্মুক্ত করে দিলেন, তখন তিনি বললেন, "আমি মু'মিনদের নিকট তাদের নিজেদের থেকেও অধিক নিকটবর্তী। সুতরাং মু'মিনদের মধ্যে যে কেউ মারা যায় এবং ঋণ রেখে যায়, তবে তা পরিশোধ করার দায়িত্ব আমার। আর যে সম্পদ রেখে যায়, তা তার ওয়ারিশদের জন্য।"
3636 - عن جابر قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم لا يصلي على رجل مات وعليه دين، فأتي بميت فقال:"أعليه دين؟" قالوا: نعم، ديناران، قال:"صلوا على صاحبكم" فقال
أبو قتادة الأنصاري: هما علي يا رسول الله؟ ، قال: فصلى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم، فلما فتح الله على رسوله صلى الله عليه وسلم قال:"أنا أولى بكل مؤمن عن نفسه، فمن ترك دينًا فعلي قضاؤُه، ومن ترك مالًا فلورثته".
صحيح: رواه أبو داود (3343)، والنسائي (1962) كلاهما من حديث عبد الرزاق وهو في مصنفه (15257) عن معمر، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن جابر فذكره. وإسناده صحيح.
وصحَّحه أيضًا ابن حبان (3064) من هذا الوجه، وبوَّب عليه بقوله: الإباحة للمرء الصلاة على كل مسلم مات من أهل القبلة، وإن كان عليه دين.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন কোনো ব্যক্তির জানাযার সালাত আদায় করতেন না, যার উপর ঋণ ছিল। একবার একটি মৃতদেহ আনা হলে তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: "তার উপর কি কোনো ঋণ আছে?" তারা বলল: হ্যাঁ, দুই দীনার। তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের সঙ্গীর উপর সালাত আদায় করো।" তখন আবূ কাতাদাহ আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! এই (ঋণ) পরিশোধের দায়িত্ব আমার।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার উপর সালাত আদায় করলেন। অতঃপর যখন আল্লাহ তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বিজয় দান করলেন, তখন তিনি বললেন: "আমি প্রত্যেক মুমিনের কাছে তার নিজের চেয়েও অধিক গুরুত্বপূর্ণ। সুতরাং, যে ব্যক্তি ঋণ রেখে যায়, তা পরিশোধ করার দায়িত্ব আমার। আর যে ব্যক্তি সম্পদ রেখে যায়, তা তার ওয়ারিশদের জন্য।"
3637 - عن أبي عطية أن رجلًا توفي على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال بعضهم يا رسول الله! لا تُصل عليه، فقال:"هل رآه أحد منكم على شيء من أعمال الخير" فقال رجل: حرس معنا ليلة كذا وكذا، قال: فصلَّى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم مشى إلى قبره ثم حثا عليه ويقول:"إن أصحابك يظنون أنك من أهل النار، وأنا أشهد أنك من أهل الجنة" ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعمر:"إنك لا تسأل عن أعمال الناس، وإنما تسأل عن الغيبة". وفي رواية:"وإنما تسأل عن الفطرة".
حسن: أخرجه أبو يعلى"المطالب العالية" (888) والبغوي وأبو أحمد والحاكم كما في"الإصابة" (4/ 134) كلهم من طريق إسماعيل بن عياش، حدثنا بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن أبي عطية.
والرواية الثانية عند أبي أحمد من رواية البغوي.
وإسماعيل بن عياش صدوق في روايته عن الشاميين، وهذه منها، وفي غير الشاميين مخلط، وقد تابعه بقية بن الوليد، عن بحير بن سعد، بإسناده، رواه الطبراني في"الكبير" (22/ 378) وبقية مدلس، ولكنه صرَّح بالتحديث إلا أن فيه شيخ الطبراني وهو إبراهيم بن محمد بن عرق الحمصي ضعَّفه الذهبي، كما في"المجمع" (5/ 288).
وأما ما روي عن ابن عمر مرفوعًا:"صلوا على من قال لا إله إلا الله، وصلوا خلف من قال لا إله إلا الله" فهو ضعيف.
رواه الدارقطني (2/ 56) من طريق عثمان بن عبد الرحمن، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عمر فذكره. وعثمان بن عبد الرحمن هو القرشي قال فيه الذهبي في"الميزان" قال ابن معين: ليس بشيء، وقال مرة: يكذب، وضعَّفه عَلِي (ابن المديني) جدًّا.
ورواه أيضًا من وجه آخر وفيه أبو الوليد المخزومي وهو خالد بن إسماعيل قال ابن عدي: متهم بالكذب.
وله وجه آخر وفيه محمد بن الفضل حديثه حديث أهل الكذب، قاله أحمد.
والخلاصة أن كل طريق روي منه هذا الحديث لا يصح.
ولذا قال الدارقطني:"ليس منها شيء يثبت".
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"الصّلاة واجبة على كل مسلم يموت برًا كان أو فاجرًا، وإن عمل بالكبائر".
رواه أبو داود (594) باختصار، والدارقطني (2/ 56) في سياق طويل كلاهما من طريق مكحول، عن أبي هريرة. وفيه انقطاع فإن مكحولًا لم يدرك أبا هريرة. وذكر الدارقطني الأحاديث الأخرى بمعناه وضعَّفها.
আবূ আতিয়্যাহ্ থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তি মারা গেল। তখন তাদের কেউ কেউ বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি তার উপর জানাযার সালাত আদায় করবেন না। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তোমাদের মধ্যে কেউ কি তাকে কোনো প্রকার ভালো কাজ করতে দেখেছ? তখন এক ব্যক্তি বলল, তিনি আমাদের সাথে অমুক অমুক রাতে প্রহরা দিয়েছেন। বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার উপর সালাত আদায় করলেন, অতঃপর তার কবরের দিকে হেঁটে গেলেন এবং তার উপর মাটি ছুঁড়ে দিলেন আর বললেন: "নিশ্চয়ই তোমার সাথীরা মনে করে যে তুমি জাহান্নামবাসী, কিন্তু আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে তুমি জান্নাতী।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "নিশ্চয়ই তোমাকে মানুষের আমল সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হবে না, বরং তোমাকে কেবল গীবত (পরনিন্দা) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হবে।" অন্য বর্ণনায় এসেছে: "বরং তোমাকে জিজ্ঞেস করা হবে ফিতরা (স্বভাব বা প্রকৃতি) সম্পর্কে।"
3638 - عن * *
৩৬৩৮ - থেকে * *
3639 - عن جابر بن عبد الله قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يجمع بين الرجلين من قتلى أُحد في ثوب واحد، ثم يقول:"أيهم أكثر أخذًا للقرآن؟" فإذا أُشير إلى أحدهما قدَّمه في اللحد وقال:"أنا شهيد على هؤلاء يوم القيامة" وأمر بدفنهم في دمائهم، ولم يُغَسِّلُوا، ولم يُصَلِّ عليهم.
صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1343) عن عبد الله بن يوسف، حدثنا الليث، قال: حدثني ابن شهاب، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن جابر بن عبد الله فذكره.
ورواه النسائي (2002) من طريق معمر، عن الزهري، عن عبد الله بن ثعلبة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لقتلى أُحد:"زمِّلوهم بدمائهم، فإنه ليس كَلْم يُكْلَم في سبيل الله إلا يأتي يومَ القيامة يَدْمي لونُه لونُ الدم، وريحُه ريح المسك" وهذا إسناد صحيح غير أن عبد الله بن ثعلبة بن صُعير لم يحضر المشهد، لأنه كان صغيرًا، وإنما سمع ذلك من جابر بن عبد الله هكذا رواه عبد الرزاق (6633) وعنه الإمام أحمد (33660) عن معمر، عن الزهري، عن ابن أبي صُعير، عن جابر بن عبد الله فذكر الحديث بطوله وفيه:"زَمِّلوهم بدمائهم، فإني قد شهدت عليهم" فكان يُدفن الرجلان والثلاثة في القبر الواحد، ويسأل:"أيهم كان أقرأ للقرآن" فيقدمونه، قال جابر: فدفن أبي وعَمِّي يومئذ في قبر واحد.
قال البغوي في"شرح السنة" (5/ 366):"اتفق العلماء على أن الشهيد المقتول في معركة الكفار لا يُغَسَّلُ، واختلفوا في الصلاة عليه، فذهب أكثرهم إلى أنه لا يُصَلِّي عليه، وهو قول أهل المدينة، وبه قال مالك والشافعي وأحمد، وذهب قوم إلى أنه يُصلى عليه، لأنه رُوي أن النبي صلى الله عليه وسلم صلى على حمزة، وهو قول الثوري وأصحاب الرأي وبه قال إسحاق"، انتهى.
قلت: ولهم أيضًا حديث عقبة بن عامر كما سيأتي.
وأما ما رُوي عن ابن عباس قال:"أتي بهم رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم أُحد، فجعل يصلي على عشرةٍ عشرةٍ، وحمزة هو كما هو، يُرْفَعُون وهو كما هو موضوع"، فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (1513) عن محمد بن عبد الله بن نُمير، قال: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن يزيد ابن أبي زياد، عن مقسم، عن ابن عباس فذكره.
ورواه البيهقي (4/ 12) من وجه آخر عن أبي بكر بن عياش عن يزيد بن أبي زياد، عن ابن عباس قال:"لما قتل حمزة يوم أُحد أقبلت صفيةُ تطلبه لا تدري ما صنع، فلقيتُ عليًا والزبير فقال عليّ للزبير: اذكر لأمك، فقال الزبير: لا بل أنت اذكر لعمتك قال: فقالت: ما فعل حمزة فأرياها أنهما لا يدريان. قال: فجاء النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"إني أخاف على عقلها فوضع يده على صدرها ودعا لها" قال: فاسترجعت وبكت، قال: ثم جاء فقام عليه وقد مثل به فقال:"لولا جزع النساء لتركته حتى يحشر من بطون السباع وحواصل الطير" قال: ثم أمر بالقتلى فجعل يصلي عليهم، فيوضع تسعة وحمزة فيكبر عليهم سبع تكبيرات ويرفعون ويترك حمزة ثم يجاء بتسعة فيكبر عليهم سبعًا حتى فرغ منهم - لا أحفظه إلا من حديث أبي بكر بن عياش، عن يزيد بن أبي زياد وكانا غير حافظين"، انتهى.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن محمد بن إسحاق قال: حدثني من لا أتهم عن مقسم مولي عبد الله ابن الحارث، عن ابن عباس قال: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بحمزة فسُجِّي ببردة، ثم صلى عليه، فكبَّر ست تكبيرات، ثم أُتي بالقتلى فيوضعون إلى حمزة فصلى عليهم وعليه معهم، حتى صلى عليه ثنتين وسبعين صلاة، ذكره ابن هشام في"السيرة" (2/ 97).
قال الهيثمي:"ولا يعرج بما يرويه ابن إسحاق إذا لم يذكر اسم راويه لكثرة روايته عن الضعفاء والمجهولين، والأشبه أن تكون روايتُه غلطًا لمخالفتها الرواية الصحيحة عن جابر أنه صلى الله عليه وسلم لم يُصل عليهم، وهو قد شهد القصة".
وقال السهيلي في"الروض الأنف":"قول ابن إسحاق في هذا الحديث: حدثني من لا أتهم - إن كان هو الحسن بن عمارة- كما قاله بعضهم فهو ضعيف بإجماع أهل الحديث، وإن كان غيره فهو مجهول، ولم يُرو عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه صلى على شهيد في شيء من مغازيه، إلا في هذه الرواية، ولا في مدة الخليفتين من بعده". انتهى كلامه.
وقال الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 311):"قد ورد مصرحًا فيه بالحسن بن عُمارة كما رواه الإمام أبو قرة موسي بن طارق الزبيدي في"سننه" فذكر بطوله.
وأما ما رواه الطبراني في"الكبير" (11/ 62) بأن محمد بن إسحاق قال: حدثني محمد بن كعب القرظي والحكم بن عتيبة، عن مقسم ومجاهد، عن ابن عباس فذكره، إلا أنه قال فيه:"كبَّر عليه تسعًا" ففي طريقه إليه أحمد بن أيوب بن راشد البصريّ، ثنا عبد الأعلى، عن محمد بن إسحاق بإسناده.
قال الهيثمي في"المجمع" (6/ 120):"أحمد بن أيوب بن راشد ضعيف، وجعله الحافظ في درجة"مقبول" أي إن تُوبع، ولكنه لم يتابع فهو ليِّن الحديث".
وكذلك لا يصح ما روي عن أبي مالك الغفاري أنه قال: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم على قتلى أُحد
عشرة عشرة، ثم كل عشرة منهم حمزة حتى صلى عليه سبعين صلاة.
رواه البيهقي (4/ 12) وقال:"هذا أصح ما في هذا الباب، وهو مرسل، أخرجه أبو داود في"المراسيل" (417) بمعناه قال: حدثنا هنَّاد، عن أبي الأحوص، عن عطاء، عن الشعبي، قال: صلى النبي صلى الله عليه وسلم يوم أحد على حمزة سبعين صلاة، بدأ بحمزة فصلى عليه، ثم جعل يدعو بالشهداء فيصلي عليهم، وحمزة مكانه. قال: وهذا أيضًا منقطع، وحديث جابر موصول، وكان أبوه من شهداء أحد". انتهى كلام البيهقي.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم مرَّ بحمزة، وقد مُثِّل به، ولم يُصَلِّ على أحد من الشهداء غيره، رواه أبو داود (3137) عن عباس العنبري، حدثنا عثمان بن عمر، حدثنا أسامة، عن الزهري، عن أنس فذكره. وصححَّه الحاكم (3/ 196) وقال:"على شرط مسلم"، وقال النووي في"المجموع" (5/ 265): فرواه أبو داود وإسناده حسن، أو صحيح".
قلت: لم يتنبه هؤلاء إلى أن في الإسناد علة خفية ذكرها البخاري كما في"العلل الكبير" (1/ 411) للترمذي أنه سأل البخاري عن حديث عبد الرحمن بن كعب، عن جابر بن عبد الله في شهداء أحد فقال:" هو حديث حسن"، وحديث أسامة بن زيد، عن ابن شهاب، عن أنس غير محفوظ، غلط فيه أسامة بن زيد"، انتهى.
فأبدى البخاري علة خفية في الإسناد والمتن، فأما الإسناد فما رواه الليث بن سعد، عن الزهري، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن جابر هو الأصح من رواية أسامة بن زيد عن ابن شهاب، وأما المتن فجابر يؤكد أنه صلى الله عليه وسلم لم يُصَلِّ على أحد من شهداء أُحد، وكان فيهم أبوه عبد الله، فهو أعرف الناس بالصلاة على شهداء أُحد بخلاف ما ذكره أسامة بن زيد فإنه جعل حمزة ممن صلى عليه النبي صلى الله عليه وسلم. ثم رأيت أن أسامة بن زيد اضطرب في متن الحديث، فرواه أبو داود (3135) من طريق ابن وهب، عن أسامة بن زيد بإسناده بأن شهداء أحد لم يغسلوا، ودفنوا بدمائهم، ولم يُصَلِّ عليهم، وكذلك رواه الترمذي (1016) من طريق أبي صفوان، عن أسامة في سباق طويل وفيه أيضًا:"فدفنهم رسول الله صلى الله عليه وسلم ولم يُصَلِّ عليهم" قال الترمذي: حديث أنس حديث حسن غريب، لا نعرفه من حديث أنس إلا من هذا الوجه".
فمرة قال:"لم يُصَلِّ على أحد من الشهداء غير حمزة" وأخرى في الصلاة على شهداء أُحد نفيًا عامًا، فلعل هذا يعود إلى سوء حفظه، لأنه وصف به، قال الحافظ في"التقريب":"صدوق يهم" وهو أسامة بن زيد الليثي مولاهم، أبو زيد المدني، وبهذا صحَّ تعليل البخاري لهذا الحديث، والحافظ في"التلخيص" (759)، وكذا أعله الدارقطني.
وقال الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن":"والذي يظهر من أمر شهداء أُحد أنه لم يُصَلِّ عليهم عند الدفن، وقد قتل معه بأحد سبعون نفسًا، فلا يجوز أن تخفي الصلاة عليهم، وحديث
جابر بن عبد الله في ترك الصلاة عليهم صحيح صريح، وأبوه عبد الله أحدُ القتلى يومئذ، فله الخبرة ما ليس لغيره".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উহুদের নিহতদের মধ্য থেকে দুই ব্যক্তিকে একটি মাত্র কাপড়ে (একসাথে) জড়ো করতেন। এরপর তিনি বলতেন, "তাদের মধ্যে কে কুরআনের অধিক হাফিয?" যখন তাদের একজনের দিকে ইঙ্গিত করা হতো, তিনি তাকে কবরে (লাহাদে) আগে রাখতেন এবং বলতেন, "আমি কিয়ামতের দিন এদের জন্য সাক্ষী।" আর তিনি নির্দেশ দেন যেন তাদের রক্তমাখা অবস্থায়ই দাফন করা হয়। তাদেরকে গোসল দেওয়া হয়নি এবং তাদের জানাযার সালাতও পড়া হয়নি।
3640 - عن أبي برزة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان في مغزًى له، فأفاء الله عليه، فقال لأصحابه:"هل تفقدون من أحدٍ؟" قالوا: نعم، فلانًا وفلانًا وفلانًا، ثم قال:"هل تفقدون من أحد؟" قالوا: نعم، فلانًا وفلانًا وفلانًا، ثم قال:"هل تفقدون من أحد؟" قالوا: لا. قال:"لكني أفقد جُلَيبيبًا فاطلبوه" فطلب في القتلى، فوجدوه إلى جنب سبعة قد قتلهم، ثم قتلوه، فأتى النبي صلى الله عليه وسلم، فوقف عليه فقال:"قتل سبعةً، ثم قتلوه هذا مني، وأنا منه، هذا مني وأنا منه" قال: فوضعه على ساعديه، ليس له إلا ساعدا النبي صلى الله عليه وسلم قال: فحفر له، ووضع في قبره، ولم يذكر غُسْلًا.
صحيح: رواه مسلم في المناقب (2472) عن إسحاق بن عمر بن سَليط، حدثنا حماد بن سلمة، عن ثابت، عن كنانة بن نُعيم، عن أبي برزة فذكره.
আবু বারযাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর একটি যুদ্ধে ছিলেন। আল্লাহ তাঁকে (গণিমতের) বিজয় দান করলেন। তিনি তাঁর সাহাবীদেরকে বললেন: "তোমরা কি কাউকে খুঁজে পাচ্ছ না?" তাঁরা বললেন, হ্যাঁ, অমুককে, অমুককে এবং অমুককে। তারপর তিনি বললেন: "তোমরা কি কাউকে খুঁজে পাচ্ছ না?" তাঁরা বললেন, হ্যাঁ, অমুককে, অমুককে এবং অমুককে। তারপর তিনি বললেন: "তোমরা কি কাউকে খুঁজে পাচ্ছ না?" তাঁরা বললেন, না। তিনি বললেন: "কিন্তু আমি জুলাইবীবকে খুঁজে পাচ্ছি না। তোমরা তাকে খোঁজ করো।" নিহতদের মধ্যে তাঁর খোঁজ করা হলো। তারা তাঁকে সাতজন (শত্রুর) পাশে দেখতে পেল, যাদেরকে তিনি হত্যা করেছিলেন এবং তারপর তারা তাঁকে হত্যা করেছে। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর কাছে আসলেন, তাঁর পাশে দাঁড়ালেন এবং বললেন: "সে সাতজনকে হত্যা করেছে, তারপর তারা তাকে হত্যা করেছে। এ আমার, আর আমি তার। এ আমার, আর আমি তার।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর তিনি তাঁকে তাঁর দু’বাহুর উপর রাখলেন। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের বাহু ছাড়া তাঁর জন্য আর কোনো স্থান ছিল না। তিনি বলেন: এরপর তাঁর জন্য কবর খোঁড়া হলো এবং তাঁকে কবরে রাখা হলো। (তবে) গোসলের কথা উল্লেখ করা হয়নি।