হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3641)


3641 - عن عبد الله بن الزبير قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: وقد كان الناس انهزموا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى انتهى بعضُهم إلى دون الأعراض إلى جبل بناحية المدينة، ثم رجعوا إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، وقد كان حنظلة بن أبي عامر الثقفي هو، وأبو سفيان بن حرب، فلما استعلاه حنظلة رآه شداد بن الأسود، فعلاه شداد بالسيف حتى قتله، وقد كاد يقتل أبا سفيان، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن صاحبكم حنظلة تُغَسِّله الملائكة، فسلوا صاحبتَه".

فقالت: خرج وهو جنب لما سمع الهائعة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فذاك قد غسَّلته الملائكة".

حسن: رواه ابن حبان في صحيحه (7025)، والحاكم (3/ 204) من طريق محمد بن إسحاق ابن إبراهيم، ثنا سعيد بن يحيى الأموي، حدثني أبي، قال: قال ابن إسحاق: حدثني يحيى بن عباد بن عبد الله، عن أبيه، عن جده فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه مدلس إلا أنه صرَّح بالتحديث، وصحَّحه الحاكم على شرط مسلم. وجد يحيى بن عباد هو: عبد الله بن الزبير، فيكون الحديثُ مرسل صحابي، لأن عبد الله بن الزبير لم يدرك يوم أُحد، كان له سنتان، والجمهور يحتجون بمرسل الصحابي كما قال النووي في"الخلاصة" (3368).

وقوله:"أعراض المدينة، أي قراها التي في أوديتها، وقيل: أعراض المدينة هي: بطون سوادها حيث الزرع والنخل. وقولها:"الهائعة" أي الصوت الذي تفْزَعُ عنه وتخاف.




আব্দুল্লাহ ইবন যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে (যুদ্ধক্ষেত্র ছেড়ে) ছত্রভঙ্গ হয়ে গিয়েছিল। এমনকি তাদের কেউ কেউ আল-আ'রাদ এর কাছাকাছি জায়গায়—মদীনার দিকে একটি পাহাড়ে গিয়ে পৌঁছেছিল। এরপর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে আসল।

তখন হানযালা ইবনু আবী আমির আস-সাকাফী এবং আবু সুফিয়ান ইবনু হারব একে অপরের মুখোমুখি ছিল। যখন হানযালা আবু সুফিয়ানের উপর আঘাত হানতে উদ্যত হলেন, তখন শাদ্দাদ ইবনুল আসওয়াদ তাকে দেখতে পেল। শাদ্দাদ তখন তাকে তলোয়ার দ্বারা আঘাত করে শহীদ করে দিল। অথচ হানযালা আবু সুফিয়ানকে হত্যা করার খুব কাছাকাছি ছিলেন।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমাদের সাথী হানযালাকে ফেরেশতারা গোসল করাচ্ছেন। তোমরা তার স্ত্রীকে জিজ্ঞেস করো।"

তখন তার স্ত্রী বললেন: যখন তিনি যুদ্ধের আহ্বান (উচ্চ শব্দে বিপদের ডাক) শুনলেন, তখন তিনি অপবিত্র (জানাবাত) অবস্থায়ই ঘর থেকে বেরিয়ে গিয়েছিলেন।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এজন্যই ফেরেশতারা তাকে গোসল করিয়েছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3642)


3642 - عن جابر قال: رمي رجل بسهم في صدره، أو في حلقه فمات، فأدرج في ثيابه كما هو، ونحن مع رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه أبو داود (3133) وأحمد (14952) كلاهما من طرق عن إبراهيم بن طهمان، عن أبي الزبير، عن جابر فذكره. وإسناده حسن من أجل أبي الزبير.

وأما ما رُوي عن ابن عباس من ذكر حمزة بن عبد المطلب مع حنظلة فهو ضعيف، رواه الطبراني في"الكبير" (11/ 391) في إسناده شريك وهو سيء الحفظ وفيه رجال لم أعرفهم، وأما الهيثمي فقال في المجمعه (3/ 23):"إسناده حسن". ورواه أيضًا الطبراني من وجه آخر (12/ 365)، والبيهقي (2/ 15) وفيه أبو شيبة متروك، ورواه الحاكم (3/ 195) من وجه آخر بذكر حمزة وحده، وقال:"صحيح الإسناد" فتعقبه الذهبي فقال: فيه معلى (ابن عبد الرحمن الواسطي) هالك، ورواه ابن سعد عن الحسن البصري مرفوعًا، وهو مرسل، ولذا حكم أهل العلم على ذكر حمزة في قصة غسل الملائكة بأنه شاذ.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তিকে তার বুকে অথবা গলায় তীর নিক্ষেপ করা হলো, ফলে সে মারা গেল। অতঃপর তাকে যেমন ছিল তেমনই তার কাপড়ের সাথে দাফনের জন্য মোড়ানো হলো, যখন আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে ছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (3643)


3643 - عن عقبة بن عامر قال: صلَّى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم على قَتْلى أُحُد بعد ثماني سنين كالمودِّع للأحياء والأموات، ثم طلع على المنبر فقال:"إني بين أيديكم فَرَطٌ، وأنا عليكم شهيد، وإن موعدكم الحوض، وإني لأنظر إليه من مقامي هذا، وإني لستُ أخشى عليكم أن تُشركوا، ولكني أخشى عليكم الدنيا أن تنافسوا" قال: فكانت آخر نَطْرةٍ نظرتُها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم.

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (4043)، ومسلم في الفضائل (2296) كلاهما من حديث يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر فذكره، واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم قريب منه وفيه:"فصلَّى على أهل أُحد صلاته على الميت".

وحمل البيهقي وغيره الصلاة هنا على الدعاء، لأنه لو كان المراد بها صلاة الجنازة لما أخرها كل هذه المدة، وقد أطال الشافعي القول في الرد على من أثبت أنه صلى عليهم، نقله البيهقي في"المعرفة" (3/ 143 - 184).

ثم حديث عقبة بن عامر ليس فيه دليل لمن أجازوا الصلاة على الشهداء، لأنهم لا يرون تأخيرها أكثر من ثلاثة أيام.

والحق في هذه المسألة ما قاله الحافظ ابن القيم:"الصواب في هذه المسألة أنه مخير بين الصلاة عليهم وتركها لمجيء الآثار بكل واحد من الأمرين، وهذا إحدى الروايات عن الإمام أحمد، وهي الأليق بأصوله ومذهبه""تهذيب السنن" (4/ 295).




উকবাহ ইবনু আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উহুদের শহীদদের উপর আট বছর পর সালাত (দো'আ) আদায় করলেন, যেন তিনি জীবিত ও মৃত সবার কাছ থেকে বিদায় নিচ্ছিলেন। এরপর তিনি মিম্বরে আরোহণ করলেন এবং বললেন: "আমি তোমাদের অগ্রগামী (তোমাদের জন্য প্রতীক্ষমাণ), এবং আমি তোমাদের উপর সাক্ষী। নিশ্চয়ই তোমাদের সাক্ষাতের স্থান হলো হাওয (কাউসারের জলাধার), আর আমি আমার এই স্থান থেকে সেটির দিকে তাকাচ্ছি (দেখতে পাচ্ছি)। আর আমি তোমাদের ব্যাপারে এই ভয় করি না যে তোমরা শিরক করবে, বরং আমি তোমাদের জন্য দুনিয়ার ভয় করি যে তোমরা তাতে একে অপরের সাথে প্রতিযোগিতা করবে।" তিনি [উকবাহ] বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর প্রতি এটাই ছিল আমার শেষ দৃষ্টি।









আল-জামি` আল-কামিল (3644)


3644 - عن شداد بن الهاد أن رجلًا من الأعراب جاء إلى النبي صلى الله عليه وسلم فآمن به واتَّبعه ثم قال: أهاجر معك، فأوصى به النبيُّ صلى الله عليه وسلم بعض أصحابه، فلما كانت غزوة غنم النبيُّ صلى الله عليه وسلم في سبيًا فقَسَمَ وقَسَمَ له، فأعطى أصحابه ما قَسَمَ له وكان يرعى ظهرهم، فلما جاء دفعوه إليه فقال: ما هذا؟ قالوا: قَسم قَسَمَهُ لك النبي صلى الله عليه وسلم فأخذه فجاء به إلى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: ما هذا؟ قال قَسَمتُه لك، قال: ما على هذا اتَّبَعتُكَ، ولكني اتَّبَعتُك على أن أُرمي إلى ههنا. وأشار إلى حَلقه بسهم فأمُوتَ فأدخلَ الجنَّة، فقال:"إن تَصدُق الله يصدقكُ" فلبثوا قليلًا، ثم نَهَضوا في قتال العدُوِّ فأُتِيَ به النبي صلى الله عليه وسلم يُحمل وقد أصابه سهمٌ حيث أشار، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أَهُو هو؟" قالوا: نعم، قال:"صدق الله فصدقَه"، ثم كفَّنه النبيُّ صلى الله عليه وسلم في جُبَّةِ النبي صلى الله عليه وسلم ثم قدَّمه فصَلَّى عليه، فكان فيما ظهر من صلاته:"اللهم! هذا عَبدُك خرج مُهاجرًا في سبيلك فقُتِلَ شهيدًا، أنا شهيدٌ على ذلك".

صحيح: رواه النسائي (1953) من طريق ابن جريج قال: أخبرني عكرمة بن خالد، أن ابن أبي عمار أخبره، عن شداد بن الهاد فذكره. وأخرجه الحاكم (3/ 595) من هذا الطريق.

وإسناده صحيح، غير أن شدَّاد بن الهاد مختلف في صحبته فذكره ابن قانع في معجم الصحابة (412)، وقال ابن حبان في"الثقات" (3/ 186):"يقال إن له صحبة"، هذا هو الصحيح.

ولكن قال بعض أهل العلم: هو مختلف فيه، وجزم النووي في"المجموع" (5/ 265) بأنه تابعي وحديثه مرسل، والله تعالى أعلم.

وقوله:"كانت غزوة غنم النبي صلى الله عليه وسلم سبيًا" وفي رواية"شيئًا" كانت غزوة خيبر أو حنين.

والحديث أخرجه أيضًا البيهقي (4/ 15 - 16) من هذا الوجه إلا أنه أوَّله بأنه يحتمل أن يكون هذا الرجل بقي حيًا حتى انقطعت الحرب، ثم مات فصلى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم، والذين لم يُصَل عليهم بأُحد ماتوا قبل انقضاء الحرب. انتهي.




শাদ্দাদ ইবনুল হাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জনৈক গ্রাম্য আরব (আ'রাব) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসলেন, অতঃপর ঈমান আনলেন এবং তাঁর অনুসরণ করলেন। এরপর তিনি বললেন: আমি আপনার সাথে হিজরত করব। তখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর কিছু সাহাবীকে তাঁর বিষয়ে উপদেশ দিলেন (যেন তাঁর খেয়াল রাখেন)। যখন এক যুদ্ধে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম গনীমতের মাল ও বন্দী লাভ করলেন, তখন তিনি বন্টন করলেন এবং লোকটির জন্যও অংশ রাখলেন। তিনি তাঁর সাহাবীদেরকে তাঁর (লোকটির) জন্য নির্ধারিত অংশ দিয়ে দিলেন। লোকটি তখন তাদের পশু চরাচ্ছিল। যখন লোকটি ফিরে আসল, তখন তারা তাকে সেটি (বন্টনকৃত অংশ) প্রদান করল। সে বলল: এটা কী? তারা বলল: এটা সেই অংশ যা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আপনার জন্য বন্টন করেছেন। সে তা নিয়ে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আসল এবং বলল: এটা কী? তিনি বললেন: এটা তোমার জন্য আমি বন্টন করেছি। সে বলল: আমি এর জন্য আপনার অনুসরণ করিনি। বরং আমি আপনার অনুসরণ করেছি এই উদ্দেশ্যে যে, আমি এখানে (সে তার গলা/কণ্ঠনালীর দিকে ইশারা করল) একটি তীর দ্বারা আঘাতপ্রাপ্ত হব, অতঃপর আমি মারা যাব এবং জান্নাতে প্রবেশ করব। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তুমি আল্লাহর সাথে সত্যবাদী হও, তবে আল্লাহও তোমার সাথে সত্য প্রতিপন্ন করবেন (অর্থাৎ তোমার আশা পূরণ করবেন)।" তারা কিছুক্ষণ অপেক্ষা করলেন, এরপর শত্রুর সাথে যুদ্ধে লিপ্ত হওয়ার জন্য অগ্রসর হলেন। অতঃপর তাকে বহন করে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের নিকট আনা হলো। যেখানে সে ইশারা করেছিল, সেখানেই তার একটি তীর বিদ্ধ হয়েছিল। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "এ কি সে-ই?" তারা বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "সে আল্লাহর সাথে সত্যবাদী হয়েছিল, তাই আল্লাহও তার সাথে সত্য প্রতিপন্ন করলেন।" এরপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাকে নিজের জুব্বা (পোশাক) দ্বারা কাফন দিলেন, অতঃপর তাকে সামনে রাখলেন এবং তার উপর জানাযার সালাত আদায় করলেন। তাঁর সালাতে যা প্রকাশ পেয়েছিল তা ছিল এই: "হে আল্লাহ! এ আপনার বান্দা, আপনার পথে হিজরতকারী হিসেবে বের হয়েছিল, অতঃপর শহীদ হিসেবে নিহত হয়েছে। আমি এর উপর সাক্ষী।"









আল-জামি` আল-কামিল (3645)


3645 - عن جابر بن عبد الله، قال: كنا حملنا القتلى يوم أُحُد لندفنهم، فجاء منادي النبي صلى الله عليه وسلم فقال:"إن رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمركم أن تدفنوا القتلى في مضاجعهم" فرددناهم.

حسن: رواه أبو داود (3165)، والترمذي (1717)، والنسائي (2005)، وابن ماجه (1516) كلهم من حديث الأسود بن قيس، سمع نُبيحًا العنزي يقول: سمعت جابر بن عبد الله فذكره.

ورواه أحمد (14169) مختصرًا هكذا، ومطولًا (15281) من وجهين عن الأسود بن قيس، عن نُبيح العنزي، عن جابر بن عبد الله قال: فبينما أنا في النظارين، إذ جاء عمتي بأبي وخالي
عادِلَتَهما على ناضح، فدخلت بهما المدينة لتدفنهما في مقابرنا، إذ لحق رجل ينادي"ألا إن النبي صلى الله عليه وسلم يأمركم أن ترجعوا بالقتلى فتدفنوها في مصارعها حيث قُتِلت"، فرجعنا بهما فدفناهما حيث قتلا. وإسناده حسن، قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح ونُبيح ثقة". وصحَّحه أيضًا ابن حبان (3183) من هذا الطريق.

وأما قول الحافظ في نُبيح العنزي بأنه"مقبول" ففيه نظر، إذ وثَّقه أبو زرعة والعجلي وابن حبان والترمذي كما مضى، فهو لا ينزل عن درجة"صدوق".




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা উহুদের দিন নিহতদের দাফন করার জন্য বহন করে নিয়ে যাচ্ছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে একজন ঘোষণাকারী এসে বললেন: "নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদেরকে নির্দেশ দিচ্ছেন যে, তোমরা নিহতদেরকে তাদের শায়িত স্থানেই দাফন করো।" অতঃপর আমরা তাদেরকে ফিরিয়ে নিয়ে গেলাম।

(অপর এক বর্ণনায় তিনি বলেন): আমি পর্যবেক্ষকদের মাঝে ছিলাম, তখন আমার খালা আমার পিতা ও আমার মামাকে একটি পানি বহনকারী উটের পিঠে চাপিয়ে নিয়ে এলেন। তিনি তাদের উভয়কে আমাদের কবরস্থানে দাফন করার জন্য মদিনায় প্রবেশ করছিলেন। তখন এক ব্যক্তি এসে চিৎকার করে বলতে লাগল: "সাবধান! নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তোমাদেরকে নির্দেশ দিচ্ছেন যে, তোমরা নিহতদেরকে ফিরিয়ে নিয়ে যাও এবং তাদের নিহতের স্থানেই দাফন করো, যেখানে তারা নিহত হয়েছিল।" তখন আমরা তাদের উভয়কে ফিরিয়ে নিয়ে গেলাম এবং যেখানে তারা নিহত হয়েছিল সেখানেই দাফন করলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (3646)


3646 - عن أبي سعيد الخدري قال:"لما كان يوم أُحد نادي منادي رسول الله صلى الله عليه وسلم أن رُدوا القتلى إلى مضاجعهم".

حسن: رواه البزار"كشف الأستار" (841) عن محمد بن عبد الرحيم صاعقة، ثنا مصعب بن عبد الله، ثنا عبد العزيز بن محمد، عن كثير بن زيد، عن رُبيح بن عبد الرحمن بن أبي سعيد، عن أبيه، عن جده فذكره.

قال البزار: لا نعلمه عن أبي سعيد إلا بهذا الإسناد.

وقال الهيثمي في"المجمع" (43/ 43):"رواه البزار وإسناده حسن".

قلت: وهو كما قال، وإن كان فيه رُبيح بن عبد الرحمن بن أبي سعيد مختلف فيه، والخلاصة أنه يُحسّن حديثُه إذا كان له أصلٌ ثابتٌ، وهذا منه.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন উহুদ যুদ্ধের দিন হলো, তখন রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে একজন ঘোষণাকারী ঘোষণা করলেন যে, তোমরা নিহতদের (তাদের) শয়নস্থানে (কবরে) ফিরিয়ে দাও।









আল-জামি` আল-কামিল (3647)


3647 - عن * *




৩৬৪৭ - ...কর্তৃক * *









আল-জামি` আল-কামিল (3648)


3648 - عن البراء بن عازب قال: لما توفي إبراهيم عليه السلام قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن له مرضعًا في الجنة".

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1382) عن أبي الوليد، حدثنا شعبة، عن عدي بن ثابت، أنه سمع البراء قال: فذكر الحديث.




বারা' ইবন আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন ইবরাহীম (আঃ) মারা গেলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয় জান্নাতে তার জন্য একজন দুধমা রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3649)


3649 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كل مولود يُولد على الفطرة، فأبواه يُهودانه أو ينصرانه كما تُنَاتَجُ الإبلُ من بهيمةٍ جمعاءَ، هل تُحِسُّ فيها من جَدعَاء؟" قالوا: يا رسول الله! أرأيت الذي يموت وهو صغير؟ قال:"الله أعلم بما كانوا عاملين".

وفي رواية:"من يُولد يُولد على هذه الفطرةِ، فأبواه يهودانه ويُنصرانه كما تنَتِجون الإبلَ، فهل تجدون فيها جَدعاء؟ حتى تكونوا أنتم تجدعونها".

وفي رواية أخري:"كل إنسان تلده أمه علي الفطرة، وأبوه بعد يُهَوِّدانه، ويُنَصِّرانه ويُمَجِّسانه، فإن كانا مُسلِمَين فمسلم، كل إنسان تلده أمه يَلكزه الشيطان في حِضنَه، إلا مريم وابنها".

متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (52) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكره.

ورواه الشيخان -البخاري في الجنائز (1359)، ومسلم في القدر (2658) كلاهما من حديث الزهري، قال: أخبرني أبو سلمة بن عبد الرحمن، أن أبا هريرة قال: فذكر الحديث. وفيه ثم يقول أبو هريرة: {فِطْرَتَ اللَّهِ الَّتِي فَطَرَ النَّاسَ عَلَيْهَا لَا تَبْدِيلَ لِخَلْقِ اللَّهِ ذَلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ} [الروم: 30]

والرواية الثانية والثالثة عند مسلم من أوجه أخرى عن أبي هريرة.

وقد ورد في بعض الروايات في الصحيح:"حتي يُعبر عنه لسانه".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: প্রত্যেক নবজাতকই ফিতরাতের (স্বাভাবিক প্রকৃতির) উপর জন্মগ্রহণ করে, অতঃপর তার বাবা-মা তাকে ইহুদি বানায় বা খ্রিস্টান বানায়, যেভাবে একটি পূর্ণাঙ্গ পশুর বাচ্চা থেকে উট শাবক জন্ম নেয়। তোমরা কি তার মধ্যে কোনো কানকাটা দেখতে পাও? সাহাবীগণ বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! যে শিশু ছোট অবস্থায় মারা যায় তার ব্যাপারে আপনার কী অভিমত? তিনি বললেন: তারা কী আমল করত, সে সম্পর্কে আল্লাহই অধিক অবগত।

অপর এক বর্ণনায় এসেছে: যে জন্ম নেয়, সে এই ফিতরাতের উপরই জন্ম নেয়। অতঃপর তার বাবা-মা তাকে ইহুদি বানায় বা খ্রিস্টান বানায়, যেমন তোমরা উট জন্ম দাও; তোমরা কি সেগুলোর মধ্যে কানকাটা দেখতে পাও? যতক্ষণ না তোমরা নিজেরাই সেগুলোর কান কেটে ফেলো।

অন্য এক বর্ণনায়: প্রত্যেক মানুষকে তার মা ফিতরাতের উপর জন্ম দেয়। অতঃপর তার বাবা-মা তাকে ইহুদি বানায়, খ্রিস্টান বানায় অথবা মাজুসি (অগ্নিপূজক) বানায়। যদি তার বাবা-মা মুসলিম হয়, তবে সে মুসলিম হয়। প্রত্যেক মানুষকে তার মা জন্ম দিলে শয়তান তার (পাজরের) পার্শ্বদেশে খোঁচা মারে, তবে মারইয়াম ও তার পুত্র ব্যতীত।

সহীহ-এর কোনো কোনো বর্ণনায় এসেছে: 'যতক্ষণ না তার (শিশুর) ভাষা তা প্রকাশ করে।'









আল-জামি` আল-কামিল (3650)


3650 - عن عائشه قالت: توفي صبي، فقلت: طوبي له، عُصفور من عَصافير الجنة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أَوَ لا تدري أن الله خلق الجنة، وخلق النار، فخلق لهذه أهلًا، له ولهذه أهلًا".
وفي رواية: دُعي رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى جنازة صبي من الأنصار، فقلت: يا رسول الله! طوبي لهذا، عصفور من عصافير الجنة، لم يعمل السوء ولم يُدركه، قال:"أَوَ غير ذلك يا عائشة إن الله خلق للجنة أهلًا، خلقهم لها وهم في أَصلاب آبائهم، وخلق للنار أهلًا، خلقهم لها وهم في أَصلاب آبائهم".

صحيح: رواه مسلم في القدر (2662) عن زهير بن حرب، حدثنا جرير، عن العلاء بن المسيب، عن فُضيل بن عمرو، عن عائشة بنت طلحة، عن عائشة أم المؤمنين فذكرت الحديث.

والرواية الثانية عند مسلم أيضًا من وجه آخر عن طلحة بن يحيى، عن عمته عائشة بنت طلحة، بإسنادها.

يقول أهل العلم: إنما أنكر النبي صلى الله عليه وسلم على عائشة الجزم بالجنة لطفل معين، ولا يصح الجزمُ في مخصوص، لأن إيمان الأبوين تحقيقًا غيبٌ، وهو المناطُ عند الله تعالى، قاله السندي في حاشية النسائي، وقال غيره: لعله قال ذلك قبل أن يعلم أن أطفال المسلمين في الجنة كما سبق في كتاب الإيمان.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক শিশু মারা গেল। আমি বললাম: তার জন্য জান্নাতের সুসংবাদ, (সে তো) জান্নাতের চড়ুইপাখিদের মধ্যে একটি চড়ুইপাখি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তুমি কি জান না যে আল্লাহ্ জান্নাত সৃষ্টি করেছেন এবং জাহান্নাম সৃষ্টি করেছেন? অতঃপর তিনি এর (জান্নাতের) জন্য অধিবাসী সৃষ্টি করেছেন এবং এর (জাহান্নামের) জন্যও অধিবাসী সৃষ্টি করেছেন।"

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে জনৈক আনসারী শিশুর জানাযায় ডাকা হলো। আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! এর জন্য সুসংবাদ, জান্নাতের চড়ুইপাখিদের মধ্যে একটি চড়ুইপাখি; সে কোনো মন্দ কাজ করেনি এবং মন্দ কাজ করার বয়সও পায়নি। তিনি বললেন: "হে আয়েশা! এর বাইরেও কি কিছু হতে পারে না? নিশ্চয় আল্লাহ্ জান্নাতের জন্য অধিবাসী সৃষ্টি করেছেন, যখন তারা তাদের পিতৃপুরুষদের মেরুদণ্ডে ছিল, তখন থেকেই তাদের এর জন্য সৃষ্টি করেছেন। আর জাহান্নামের জন্যও অধিবাসী সৃষ্টি করেছেন, যখন তারা তাদের পিতৃপুরুষদের মেরুদণ্ডে ছিল, তখন থেকেই তাদের এর জন্য সৃষ্টি করেছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3651)


3651 - عن المغيرة بن شعبة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"الراكب يسير خلف الجنازة، والماشي يمشي خلفَها وأمامَها، وعن يمينها وعن يسارها قريبًا منها، والسِقطُ يُصَلَّي عليه، ويُدعى لوالديه بالمغفرة والرحمة".

صحيح: رواه أبو داود (3180)، والترمذي (1031)، وابن ماجه (1481، 1507)، والنسائي (1943) كلهم من طرق، عن زياد بن جبير بن حية، عن أبيه، عن المغيرة بن شعبة فذكره.

واللفظ لأبي داود، ولفظ غيره:"الطفلُ يصلى عليه". قال الترمذي:"حسن صحيح".

وصحَّحه ابن حبان (3049)، والحاكم (1/ 355، 363)، وقال:"صحيح على شرط البخاري".

والسِقْط: هو الذي يسقط من بطن أمه قبل تمامه، فإذا أكمل أربعة أشهر يُصَلَّي عليه لأنه تم فيه نفخ الروح، وما كان قبل ذلك لا يُصلَّي عليه، لأنه ليس بميت، وإنما هو علقة، أو مضغة.

قال الترمذي:"والعمل عليه عند بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم قالوا: يُصلي على الطفل وإن لم يستهل بعد أن يُعلم أنه خلق، وهو قول أحمد وإسحاق".

ويدل على هذا حديث ابن مسعود مرفوعًا:"إن خلق أحدكم يجمع في بطن أمه، أربعين يومًا، ثم يكون علقة مثل ذلك، ثم يكون مضغة مثل ذلك، ثم يبعث ملكًا … ينفخ فيه الروح" متفق عليه، مضي بكامله في كتاب الإيمان.

قلت: وللشافعي قولان، القول الثاني: لا يُصلَّي على الطفل حتى يستهل، ولعله احتج بحديث جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الطفل لا يُصلَّي عليه، ولا يرث، ولا يورث حتي يستهل".

رواه الترمذي (1032)، وابن ماجه (1508) كلاهما من طريق أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث قد اضطرب الناس فيه، فرواه بعضهم عن أبي الزبير، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرفوعًا، وروى أشعث بن سوار وغير واحد، عن أبي الزبير، عن جابر موقوفًا، وروى محمد بن إسحاق، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر موقوفًا، وكأن هذا أصح من الحديث المرفوع". انتهى.

وقال ابن القطان:"هو من رواية أبي الزبير، عن جابر معنعنًا من غير رواية الليث عنه، وهو علة، ومع ذلك فهو من رواية إسماعيل بن مسلم المكي، عن أبي الزبير، وهو ضعيف جدًّا".

قلت: ورواه أيضًا ابن حبان (6032) والحاكم (4/ 348، 349) كلاهما من حديث إسحاق الأزرق، ثنا سفيان الثوري، عن أبي الزبير، عن جابر، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا استهل الصبي صلي عليه وورث".

انظر للمزيد:"نصب الراية" (2/ 277).

والخلاصة في حديث جابر أنه كثير الاضطراب كما قال الترمذي.




মুগীরাহ ইবনু শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “আরোহী জানাযার পেছনে পেছনে চলবে, আর পদাতিক ব্যক্তি তার (জানাযার) পেছনে, সামনে, এবং তার ডানপাশে ও বামপাশে তার নিকটবর্তী হয়ে হাঁটবে। আর 'সিক্বত' (অপূর্ণাঙ্গ মৃত শিশু) এর জন্য জানাযার সালাত আদায় করা হবে এবং তার পিতা-মাতার জন্য মাগফিরাত ও দয়ার (রহমতের) দু’আ করা হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3652)


3652 - عن إسماعيل السدي قال: سألت أنس بن مالك قلت: صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم على ابنه إبراهيم؟ قال: لا أدري، رحمةُ الله على إبراهيم، لو عاش كان صديقًا بينًّا، قال: قلت: كيف أنصرف إذا صليتُ، عن يميني أو عن يساري؟ قال: أما أنا فرأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ينصرف عن يمينه.

حسن: رواه الإمام أحمد (13985) عن عفان، حدثنا أبو عوانة، عن إسماعيل السدي به مثله.

وإسماعيل السدي هو: ابن عبد الرحمن بن أبي كريمة السُدِّي، أبو محمد الكوفي من رجال مسلم، وقد روى مسلم في الصلاة (708) الحديث المذكور عن قتيبة بن سعيد، حدثنا أبو عوانة، عن السُدي قال: سألت أنسًا كيف أنصرفُ إذا صليتُ؟ عن يميني أو عن يساري؟ قال: أما أنا فأكثر ما رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم ينصرف عن يمينه. انتهي.

ولم يذكر فيه سؤاله عن الصلاة على إبراهيم عليه السلام.

وقول أنس:"لا أدري" يحتمل أنه نفي علمه به لأنه قد يكون بعيدا عن المسجد لقضاء حاجة من حاجات رسول الله صلى الله عليه وسلم لأنه خادمه. وقد رُوي في الصلاة عليه أحاديث مسندة ومرسلة.

فأما المسندة: فمنها: ما روي عن البراء بن عازب قال:"صلَّي رسول الله صلى الله عليه وسلم على ابنه إبراهيم، ومات وهو ابن ستة عشر شهرًا وقال: إن له في الجنة من تُتِم رَضاعَه، وهو صديق".

رواه الإمام أحمد (18497) عن أسود بن عامر، حدثنا إسرائيل، عن جابر، عن عامر، عن البراء فذكره. وإسناده ضعيف، لأجل جابر وهو: ابن يزيد الجعفي.
وعامر هو: الشعبي، وقد رُوي عنه مرسلًا بدون ذكر البراء.

ومنها: ما رُوي عن عبد الله بن عباس قال: لما مات إبراهيم بن محمد رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّي رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال:"إن له مرضعًا في الجنة، ولو عاش لكان صديقًا نبيًّا، ولو عاش لعتقت أخوالُه القبطُ، وما استرقَّ قِبطي".

رواه ابن ماجه (1511) عن عبد القدوس بن محمد، قال: حدثنا داود بن شَبيب الباهلي، قال: حدثنا إبراهيم بن عثمان، قال: حدثنا الحكم بن عيينة، عن مقسم، عن ابن عباس فذكره.

وإسناده ضعيف جدًّا، فيه إبراهيم بن عثمان وهو: أبو شيبة الكوفي قاضي واسط متروك الحديث. ومنها ما رُوي عن أنس بن مالك أن النبي صلى الله عليه وسلم صلى على ابنه إبراهيم، فكبر عليه أربعا.

رواه أبو يعلي (3660) وفيه محمد بن عبيد الله الفزاري العرزمي ضعيف باتفاق أهل العلم، وشيخه عطاء بن عجلان متروك أيضا.

ومنها ما رُوي عن أبي سعيد الخدري عند البزار"كشف الأستار" (806) وهي كلها معلولة.

وأما المرسلة فمنها ما رواه أبو داود (3188) بإسناده عن البهي، قال: لما مات إبراهيم بن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم في المقاعد.

قال المنذري:"والبهي هو: عبد الله بن يسار مولي مصعب بن الزبير، تابعي يُعد في الكوفيين.

والمقاعد -أي كان منتهيًا إلى موضع يسمى مقاعد بقرب المسجد الشريف، اتخذ للقعود فيه للحوائج والوضوء". انتهى كلام المنذري.

ومنها ما رُوي عن عطاء قال: إن النبي صلى الله عليه وسلم صلَّى على ابنه إبراهيم وهو ابن سبعين ليلة، وهذا مرسل أيضًا، رواه أبو داود.

وقد أورد الحافظ الزيلعي في"نصب الراية": (2/ 280) هذه الآثار، وهي وإن كان لا يصح منها شيء ولكن يشد بعضها بعضا، وقد ذكر الخطابي مرسل عطاء في صلاته صلى الله عليه وسلم عليه ثم قال:"هذا أولى الأمرين، وإن كان حديث عائشة أحسن اتصالا".

وممن ذهب إلى تقوية هذه الآثار البيهقي (4/ 9) وابن القيم في"زاد المعاد"، وفي"تحفة المودود" بناء على أصل استحباب الصلاة على الأطفال، وبالله التوفيق.

وأما حديث عائشة الذي أشار إليه الخطابي فهو ما روي عنها، قالت: مات إبراهيم بن النبي صلى الله عليه وسلم، وهو ابن ثمانية عشر شهرًا، فلم يُصل عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم.

رواه أبو داود (3187) عن محمد بن يحيى بن فارس، حدثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثني أبي، عن ابن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي بكر، عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.

ورواه الإمام أحمد (26305) عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد به مثله.

قلت: ظاهر إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق إلا أن فيه علة خفية، وهي تفرده،
والجمهور على عدم قبول تفرده في الأحكام. ولذا قال الإمام أحمد: هذا حديث منكر جدا، ووَهَّي ابن إسحاق. كذا ذكره ابن القيم في زاده (1/ 514).

وقال ابن عبد البر في"الاستيعاب":"هذا غير صحيح والله أعلم؛ لأن الجمهور قد أجمعوا على الصلاة على الأطفال إذا أستهلوا وراثة وعملا مستفيضا عن السلف والخلف، ولا أعلم أحدا جاء عنه غير هذا إلا عن سمرة بن جندب".

وممن ذهبوا إلى ترك الصلاة عليه علَّلوه بعلل:

منها: شُغل النبي صلى الله عليه وسلم بصلاة الكسوف.

ومنها: أنه استغني بفضيلة نبوة النبي صلى الله عليه وسلم عن الصلاة عليه، كما استغنى الشهداء بفضيلة الشهادة.

ومنها: أنه لا يصلي نبي على نبي، وقد جاء في الأخبار: أنه لو عاش لكان نبيًا إلا أنه لا يصح كما سيأتي.

ومنها: أنه لم يصل عليه بنفسه، وصلى عليه غيره.

ذكر هذه العلل الحافظ الزيلعي، ووصفها بأنها: علل ضعيفة. يعني أنها لا تضاهي أدلة القائلين بجواز الصلاة على إبراهيم.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ইসমাঈল আস-সুদ্দী বলেন: আমি আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি তাঁর পুত্র ইবরাহীমের উপর সালাত (জানাজার সালাত) আদায় করেছিলেন? তিনি বললেন: আমি জানি না। ইবরাহীমের উপর আল্লাহর রহমত হোক! যদি সে জীবিত থাকত, তবে সে স্পষ্টতই সিদ্দীক (সত্যবাদী) হতো। বর্ণনাকারী বলেন: আমি জিজ্ঞেস করলাম: আমি সালাত শেষ করে কিভাবে ফিরবো—ডান দিকে, নাকি বাম দিকে? তিনি বললেন: আমি তো রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ডান দিকে ফিরতে দেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (3653)


3653 - عن ابن عباس قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن أولاد المشركين فقال:"الله إذ خلقهم أعلمُ بما كانوا عاملين".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1383)، ومسلم في القدر (2660) كلاهما من طريق أبي بشر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মুশরিকদের সন্তান-সন্ততি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল। তখন তিনি বললেন: "আল্লাহ যখন তাদেরকে সৃষ্টি করেছেন, তখন তারা কী করবে সে সম্পর্কে তিনিই সর্বাধিক অবগত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3654)


3654 - عن أبي هريرة يقول: سئل النبي صلى الله عليه وسلم عن ذَراري المشركين فقال:"الله أعلم بما كانوا عاملين".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1384)، ومسلم في القدر (2659) كلاهما عن أبي اليمان، أخبرنا شُعيب، عن ابن شهاب الزهري قال: أخبرني عطاء بن يزيد الليثي، أنه سمع أبا هريرة فذكر الحديث. ولفظهما سواء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মুশরিকদের (অপ্রাপ্তবয়স্ক) সন্তান-সন্ততি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলে তিনি বললেন: “তারা কী কাজ করবে, সে সম্পর্কে আল্লাহই ভালো জানেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (3655)


3655 - عن أبي بن كعب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن الغلام الذي قتله الخَضِرُ طُبع كافرًا، ولو عاش لأَرهقَ أبويه طغيانًا وكفرًا".

صحيح: رواه مسلم في القدر (2661) عن عبد الله بن مسلمة، حدثنا معتمر بن سليمان، عن أبيه، عن رَقبة بن مسقلة، عن أبي إسحاق، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، عن أبي بن كعب فذكره.




উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "খিদর (আঃ) যে ছেলেটিকে হত্যা করেছিলেন, সে প্রকৃতিগতভাবে কাফির রূপে সৃষ্টি হয়েছিল, আর যদি সে বেঁচে থাকত, তবে সে তার বাবা-মাকে সীমালঙ্ঘন ও কুফরীর মাধ্যমে অতিষ্ঠ করে দিত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3656)


3656 - عن أنس قال: كان غلام يهودي يخدم النبي صلى الله عليه وسلم فمرض، فأتاه النبي صلى الله عليه وسلم يعودُه، فقعد عند رأسه فقال له:"أسلم" فنظر إلى أبيه وهو عنده فقال له: أطع أبا القاسم صلى الله عليه وسلم، فأسلم، فخرج النبي صلى الله عليه وسلم وهو يقول:"الحمد لله الذي أنقذه من النار".

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1356) عن سليمان بن حرب، حدثنا حماد (وهو ابن زيد) عن ثابت، عن أنس فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন ইয়াহুদী বালক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খেদমত করত। সে অসুস্থ হলে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে দেখতে গেলেন। তিনি তার মাথার কাছে বসলেন এবং তাকে বললেন: "ইসলাম গ্রহণ করো।" তখন সে তার পিতার দিকে তাকালো, যিনি তার কাছেই ছিলেন। (পিতা) তাকে বললেন: "আবুল কাসিম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আনুগত্য করো।" (এই কথা শুনে) সে ইসলাম গ্রহণ করল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেখান থেকে এই কথা বলতে বলতে বের হলেন: "সমস্ত প্রশংসা আল্লাহর, যিনি তাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দিলেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3657)


3657 - عن * *




৩৬৫৭ - এর সূত্রে * *









আল-জামি` আল-কামিল (3658)


3658 - عن أبي هريرة قال: أُرسل ملك الموت إلى موسى عليه السلام، فلما جاءه صكَّه، فرجع إلي ربه فقال: أرسلتني إلي عبد ل يريد الموت ،فرد الله عليه عينه، وقال: ارجع فقُل له يضع يَده على متن ثور، فله بكل ما غطَّت به يدُه بكل شعرة سنة، قال: أي رب! ثم ماذا؟ قال: ثم الموت، قال: فالآن. فسأل الله أن يُدنِيه من الأرض المقدسة رميةً بحجرٍ. قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فلو كنتُ ثم، لأريتُكم قبره إلى جانب الطريق عند الكثيب الأحمر".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1339)، ومسلم في الفضائل (2373) كلاهما من حديث عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره. ولم يذكرا فيه الرفَع إلى النبي صلى الله عليه وسلم ولكن ساقه البخاري في أحاديث الأنبياء من هذا الوجه ثم قال: وعن معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وكذلك ساقه مسلم.

اختلف أهل العلم من نقل الميت من بلد إلى بلد، فاستحب الشافعي إن كان نقله إلى الأرض الفاضلة كمكة وغيرها، وكره إن لم يكن الغرض منه الدفن في البقاع الفاضلة.

رُوي أن سعد بن أبي وقاص، وسعيد بن زيد بن عمرو بن نُفيل ماتا بالعقيق فحُملا إلى المدينة، ودُفنا بها، وحُمل أسامة بن زيد من الجرف، وحمل عبد الرحمن بن أبي بكر من الحُبشي -أحد جبال مكة على مسافة ستة أميال- إلى مكة ودفن بها، وحمُل قتلى أُحد ليدفنوا بالبقيع فنادى مناد"إن رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمركم أن تدفنوا القتلى في مضاجعهم" قال جابر: فرددناهم.

ولكن إن ترتب على ذلك تأخير دفنهم، وتعرضهم لهتك حرمتهم فيحرم ذلك، أو يكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মালাকুল মাওত (মৃত্যুর ফেরেশতা)-কে মূসা (আঃ)-এর নিকট পাঠানো হলো। যখন তিনি তাঁর নিকট আসলেন, মূসা (আঃ) তাঁকে আঘাত করলেন (বা চড় মারলেন)। অতঃপর তিনি তাঁর প্রতিপালকের নিকট ফিরে গেলেন এবং বললেন: আপনি আমাকে এমন এক বান্দার নিকট পাঠিয়েছেন, যে মরতে চায় না। আল্লাহ তাঁর চোখ ফিরিয়ে দিলেন (বা ঠিক করে দিলেন), এবং বললেন: ফিরে যাও এবং তাকে বলো, সে যেন তার হাত একটি ষাঁড়ের পিঠের উপর রাখে। তার হাত ষাঁড়ের পিঠের যতগুলো লোমকে আবৃত করবে, তার প্রতিটি লোমের বিনিময়ে সে এক বছর করে জীবন পাবে। মূসা (আঃ) বললেন: হে আমার রব! তারপর কী? আল্লাহ বললেন: তারপর মৃত্যু। মূসা (আঃ) বললেন: তাহলে এখনই (মৃত্যু দিন)। এরপর তিনি আল্লাহর কাছে চাইলেন যেন তাঁকে পবিত্র ভূমি (বায়তুল মাকদিস)-এর কাছাকাছি, এক ঢিল ছোঁড়ার দূরত্বে, স্থানান্তরিত করা হয়। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “আমি যদি সেখানে উপস্থিত থাকতাম, তাহলে অবশ্যই পথের পাশে লাল বালিয়াড়ির নিকটে তাঁর কবর তোমাদেরকে দেখিয়ে দিতাম।”









আল-জামি` আল-কামিল (3659)


3659 - عن عقبة بن عامر الجهني قال:"ثلاث ساعات كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ينهانا أن نصلي فيهن، أو نَقبر فيهن موتانا: حين تطلع الشمس بازغة حتى ترتفع، وحين يقوم قائم الظهيرة حتى تميل الشمس، وحين تَضيَّفُ الشمسُ للغروب حتى تغربَ".

صحيح: رواه مسلم في صلاة المسافرين (831) عن يحيى بن يحيى، حدثنا عبد الله بن وهب، عن موسى بن علي، عن أبيه، قال: سمعتُ عقبة بن عامر الجهني يقول: فذكر الحديث.
وزاد البيهقي في"السنن الكبرى" (4/ 32): قيل لعقبة: أيُدفن بالليل؟ قال: نعم، قد دُفن أبوبكر بالليل. قال الترمذي: (1030):"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم يكرهون الصلاة على الجنازة في هذه الساعات، وقال ابن المبارك: معنى هذا الحديث: أن نَقبُر فيهن موتانا -يعني الصلاة على الجنازة، وكره الصلاة على الجنازة عند طلوع الشمس وعند غروبها، وإذا انتصف النهار حتى تزول الشمس، وهو قول أحمد وإسحاق، وقال الشافعي: لا بأس في الصلاة على الجنازة في الساعات التي تكره فيهن الصلاة" انتهى.

وممن ذهب إلى كراهية الصلاة في الأوقات المكروهة ابن عمر وعطاء والنخعي والأوزاعي وسفيان الثوري وأصحاب الرأي وغيرهم.

قال الخطابي:"قول الجماعة أولى لموافقته الحديث".

وأما الصلاة على الجنازة بعد صلاة الصبح وبعد صلاة العصر فلا حرج في ذلك كما روي مالك في الجنائز (21) عن نافع، أن عبد الله بن عمر قال:"يُصلَّي على الجنازة بعد العصر وبعد الصبح إذا صُلّيتا لوقتهما".

وروي أيضًا عن محمد بن أبي حَرملةَ مولي عبد الرحمن بن أبي سفيان بن حُويطب، أن زينب بنت أبي سلمة تُوفِّيت، وطارق أمير المدينة، فأُتي بجنازتها بعد صلاة الصبح، فوُضِعت بالبقيع. قال: وكان طارق يُغلِّس بالصبح.

قال ابن أبي حَرملةَ: فسمعتُ عبد الله بن عمر يقول لأهلها: إما أن تُصلُّوا على جنازتكم الآن، وإما أن تتركوها حتى ترتفعَ الشمسُ، وبوَّب عليه مالك بقول: الصلاة على الجنازة بعد الصبح إلى الإسفار، وبعد العصر إلى الإصفرار.




উকবাহ ইবন আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তিনটি সময় আছে, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে সেগুলোর মধ্যে সালাত আদায় করতে অথবা আমাদের মৃতদের দাফন করতে নিষেধ করতেন: যখন সূর্য উদিত হতে শুরু করে, যতক্ষণ না তা ভালোভাবে উপরে উঠে যায়; এবং যখন মধ্যাহ্নে ঠিক দুপুরের সময় হয়, যতক্ষণ না সূর্য পশ্চিম দিকে হেলে যায়; এবং যখন সূর্য অস্ত যাওয়ার জন্য ঝুঁকে পড়ে, যতক্ষণ না তা সম্পূর্ণভাবে অস্ত যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (3660)


3660 - عن ابن عباس قال: صلى النبي صلى الله عليه وسلم على رجل بعد ما دُفِن بليلة، قام هو وأصحابُه، وكان سأل عنه فقال:"من هذا؟" فقالوا: فلان، دُفن البارحة، فصلوا عليه.

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1340) عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا جرير، عن الشيباني، عن الشعبي، عن ابن عباس فذكره.

وفيه دليل لمن يقول بجواز الدفن بالليل، لأن النبي صلى الله عليه وسلم لم ينكر دفنهم إياه بالليل، بل أنكر عليهم عدم إعلامهم بأمره، وقد صح أن دُفن أبو بكر ليلًا، ودَفَن علي بن أبي طالب فاطمةَ ليلًا، ولم يُنقل إنكار أحد من الصحابة على الدفن بالليل بل ثبت أن النبي صلى الله عليه وسلم أيضا دفن في الليل، وسيأتي تفصيل ذلك في السيرة.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তির জানাযার সালাত আদায় করলেন তাকে দাফন করার এক রাত পরে। তিনি এবং তাঁর সাহাবীগণ দাঁড়িয়ে গেলেন। তিনি ঐ ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন: "ইনি কে?" তারা বলল: ইনি অমুক, যাকে গত রাতে দাফন করা হয়েছে। অতঃপর তিনি তার উপর সালাত (জানাযা) আদায় করলেন।