আল-জামি` আল-কামিল
3661 - عن جابر بن عبد الله قال: رأى ناس نارًا في المقبرة، فأتوها، فإذا رسول الله -صلى الله عليه وسلم
في القبر، وإذا يقول:"ناولوني صاحبكم" فإذا هو الرجل الذي كان يرفع صوته بالذكر.
حسن: رواه أبو داود (3164) عن محمد بن حاتم بن بزيغ، حدثنا أبو نعيم، عن محمد بن مسلم، عن عمرو بن دينار، أخبرني جابر بن عبد الله، أو سمعت جابر بن عبد الله قال: فذكره.
وأخرجه الحاكم (1/ 368) وقال:"صحيح على شرط مسلم".
قلت: وهو كما قال: فإن في الإسناد محمد بن مسلم: وهو ابن سوسن الطائفيّ، وقيل سويس، روى عنه مسلم متابعة، والبخاري تعليقًا، إلا أنه مختلف فيه، فضعَّفه الإمام أحمد، ومشاه الآخرون، فوثَّقه ابن معين وأبو داود والعجلي وغيرهم، وذكره ابن حبان في"الثقات" إلا أنه قال:"يخطئ".
والخلاصة فيه كما في التقريب:"صدوق يخطئ" ولم يظهر لنا خطؤه في هذا الحديث، بل له شواهد تقويه، منها ما مضى، ومنها ما رواه ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم دخل قبًرا ليلًا فأُسرِج له سراج، فأخذه من القبلة وقال:"رحمك الله إن كنت لأوَّاها تلاءً للقرآن" وكبَّر عليه أربعًا.
رواه الترمذي (1057)، وابن ماجه (1520) كلاهما من طريق يحيى بن اليمان، عن المنهال ابن خليفة، عن الحجاج بن أرطاة، عن عطاء، عن ابن عباس فذكر الحديث واللفظ للترمذي، وأما ابن ماجه فاختصره.
وهذا إسناد ضعيف من أجل المنهال بن خليفة فإنه"ضعيف" كما في"التقريب"، والحجاج بن أرطاة"مدلس" وقد عنعن، وضعَّفه أيضًا البيهقي (4/ 55)، وأما الترمذي فقال:"حديث حسن" وقال:"رخص أكثر أهل العلم في الدفن بالليل".
قلت: وعليه يدل عمل الصحابة، فأبو بكر دفن ليلًا، وعلي بن أبي طالب دفن فاطمةَ ليلًا، وممن دفن ليلًا: عثمان وعائشة وابن مسعود، ورخص فيه عقبة بن عامر وابن المسيب وعطاء والثوري والشافعي وإسحاق، وكرهه الحسن وأحمد في إحدى الروايتين، والآثار في جواز الدفن بالليل أكثر.
قال الحافظ ابن القيم رحمه الله في"تهذيب السنن" (4/ 308 - 309) بعد أن نقل هذه الآثار وغيرها:"والآثار في جواز الدفن بالليل أكثر" وقال:"قيل: وحديث النهي محمول على الكراهة والتأديب، والذي ينبغي أن يقال في ذلك -والله أعلم- إنه متى كان الدفن ليلًا لا يفوت به شيء من حقوق الميت والصلاة عليه، فلا بأس به، وعليه تدل أحاديث الجواز، وإن كان يفوت بذلك حقوقه، والصلاة عليه، وتمام القيام عليه نهي عن ذلك، وعليه يدل الزجر، وبالله التوفيق".
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কিছু লোক কবরস্থানে আগুন দেখতে পেল। তারা সেদিকে এগিয়ে গেল। হঠাৎ তারা দেখল যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কবরের মধ্যে (অবস্থান করছেন)। তিনি তখন বলছিলেন: ‘তোমাদের এই সাথীটিকে আমার হাতে দাও।’ দেখা গেল, তিনি হলেন সেই ব্যক্তি যিনি উচ্চস্বরে যিকির করতেন।
3662 - عن أبي الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يحدث أن النبي صلى الله عليه وسلم خطب يومًا فذكر رجلًا من أصحابه قُبض، فكفِّن في كفن غير طائل، وقُبر ليلًا، فزجر النبي صلى الله عليه وسلم أن
يُقبر الرجلُ بالليل حتى يصلي عليه، إلا أن يضطر إنسان إلى ذلك، وقال النبي صلى الله عليه وسلم:"إذا كفَّن أحدكم أخاه فليُحسِن كفَنَه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (943) من طرق عن حجاج بن محمد قال: قال ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، فذكره.
وقيل في هذا الحديث إن النهي كان لترك النبي صلى الله عليه وسلم الصلاة عليه، ولم ينه عن مجرد الدفن بالليل، أو لقلة المصلين، أو لإساءة الكفن، أو عن المجموع، فكل ذلك ممكن.
وأما ما رُوي عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"لا تدفنوا موتاكم بالليل" فهو ضعيف، رواه ابن الجوزي في العلل المتناهية (2/ 427) وقال: فيه محمد بن عمران بن أبي ليلى قال البخاري: منكر الحديث. انتهي.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ভাষণ দিচ্ছিলেন। তিনি তাঁর সাহাবীদের মধ্যে এমন একজন ব্যক্তির কথা উল্লেখ করলেন যিনি ইন্তেকাল করেছেন, তাঁকে নিম্নমানের কাফনে কাফন দেওয়া হয়েছিল এবং তাঁকে রাতেই দাফন করা হয়েছিল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে কোনো ব্যক্তিকে দাফন করতে নিষেধ করলেন, যতক্ষণ না তাঁর জানাযার সালাত আদায় করা হয়। তবে কেউ যদি এর জন্য বাধ্য হয় (তবে ভিন্ন কথা)। এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন তোমাদের কেউ তার ভাইকে কাফন দেবে, তখন সে যেন উত্তম রূপে কাফন দেয়।"
3663 - عن أبي إسحاق قال: أوصى الحارث أن يُصَلِّي عليه عبد الله بن زيد، فصلى عليه، ثم أدخله القبر من قبل رجلي القبر. وقال:"هذا من السنة".
صحيح: رواه أبو داود (3211) عن عبيدالله بن معاذ، حدثنا أبي، حدثنا شعبة، عن أبي إسحاق فذكره.
ورواه البيهقي (4/ 54) من طريق أبي داود وقال:"هذا إسناد صحيح، وقد قال: هذا من السنة فصار كالمسند، وروينا هذا القول عن ابن عمر وأنس بن مالك". انتهى كلامه.
قلت: وأما أثر أنس بن مالك فهو ما رواه محمد بن سيرين قال: كنت مع أنس في جنازة، فأمر بالميت، فُسُلّ من قبل رجل القبر، رواه الإمام أحمد (4081) عن عبد الأعلى، حدثنا خالد، عن محمد بن سيرين فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 43):"رواه أحمد ورجاله ثقات".
قلت: وهو كما قال، خالد هو: ابن مهران الحذاء.
وهذا هو الصحيح بأن الميت بوضع رأسه عند رجل القبر، ثم يُسَلّ سلا، وهو المعروف عن جمهور الصحابة، وهو عمل المهاجرين والأنصار بمكة والمدينة، كذلك رواه الشافعي في الأم، وغيرُه من العلماء عن أهل مكة والمدينة من الصحابة، ومن بعدهم، وهم بأمور رسول الله صلى الله عليه وسلم أعلم من غيرهم، قاله النووي في"المجموع" (5/ 294).
واستشهد البيهقي بحديث عمران بن موسى بأن النبي صلى الله عليه وسلم سُلّ من قبل رأسه، وكذلك من حديث ابن عباس مثله.
قال البيهقي: قال الشافعي: أنبأنا بعض أصحابنا عن أبي الزناد وربيعة وأبي النضر: لا
اختلاف بينهم في ذلك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سُل من قبل رأسه، وأبو بكر وعمر".
قال البيهقي:"هذا هو المشهور فيما بين أهل الحجاز".
ولكن تعقبه ابن التركماني فقال: حديث عمران بن موسى فيه أمران، أحدهما: أنه معضل من جهة عمران هذا. الثاني: أن الشافعي رواه عن مسلم الزنجي وغيره، ومسلم ضعَّفه النسائي، وقال أبو زرعة والبخاري:"منكر الحديث"، وقال ابن المديني:"ليس بشيء"، والغير الذي قرنه الشافعي بالزنجي"مجهول"، وحديث ابن عباس قال فيه الشافعي:"أنبأنا الثقة" -قال ابن التركماني: مشهور عند أهل هذا الشأن أن قولهم:"أخبرنا الثقة" ليس بتوثيق، وفيه عمر بن عطاء ضعَّفه يحيي والنسائي، قال مرة:"ليس بشيء". انتهى.
وقال أبو حنيفة:"يوضع عرضا من ناحية القبلة، ثم يدخل معترضًا"، ورُوي فيه حديث ابن عباس وهو ضعيف، انظر باب الدفن في الليل، وحديث بريدة قال: أدخل النبي صلى الله عليه وسلم من قبل القبلة، وأُلحد له لحدًا، ونصب عليه اللبن نصبًا، رواه البيهقي (4/ 54 - 55) من طريق يحيي بن عبد الحميد، ثنا أبو بردة في منزله، ثنا علقمة بن مرثد، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكره.
قال البيهقي: أبو بردة هو: عمرو بن يزيد التميمي الكوفي، وهو ضعيف في الحديث، ضعَّفه يحيى بن معين وغيره.
আবু ইসহাক থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আল-হারিস (মৃত্যুর আগে) অসিয়ত করেছিলেন যে আব্দুল্লাহ ইবনে যায়িদ যেন তাঁর জানাযার সালাত আদায় করেন। অতঃপর তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে যায়িদ) তাঁর উপর সালাত পড়ালেন। এরপর মৃতদেহটিকে কবরের পায়ের দিক থেকে প্রবেশ করানো হলো। আর তিনি বললেন, "এটি সুন্নাহর অংশ।"
3664 - عن أنس قال: شهدنا بنتَ رسول الله صلى الله عليه وسلم، ورسول الله صلى الله عليه وسلم جالس على القبر، فرأيت عينيه تدمعان، فقال:"هل فيكم من أحد لم يقارف الليلة؟" فقال أبو طلحة: أنا، قال:"فأنزل في قبرها" فنزل في قبرها فقبرها.
قال ابن المبارك: قال فليح: أُراه يعني الذنب. قال أبو عبد الله (البخاري) {لِيَقْتَرِفُوا} أي ليكتسبوا.
صحيع: رواه البخاري في الجنائز (1342) عن محمد بن سِنان، حدثنا فليح بن سليمان، حدثنا هلال بن علي، عن أنس فذكره، ومن طريق فليح رواه الإمام أحمد (12275).
وقد ثبت في الروايات الصحيحة أن بنت النبي صلى الله عليه وسلم هي أم كلثوم، زوج عثمان، وتنحي عثمان عن النزول في القبر، لأنه جامع بعض جواريه في تلك الليلة.
وأما ما رواه حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس، أن رقية لما ماتت قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يدخل القبر رجل قارف أهلَه" فلم يدخل عثمان بن عفان القبر، فسماها أنها رقية بنت النبي صلى الله عليه وسلم فهو وهم منه، ومن هذا الوجه أخرجه الإمام أحمد (13398)، والحاكم (4/ 47) وقال:"صحيح على شرط مسلم".
قلت: الصواب أن فيه وهما وقع من حماد بن سلمة، فإن رقية بنت النبي صلى الله عليه وسلم ماتتْ، والنبي صلى الله عليه وسلم -
ببدر لم يشهدها، كما قال البخاري وغيره، فالصحيح أن التي ماتت هي أم كلثوم كما ثبت في الروايات التاريخية.
فقول الهيثمي في"المجمع" (3/ 43):"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح" لا يستلزم صحة الحديث فتنبه، وكذلك لا يصح ما رُوي عن عامر (وهو الشعبي) قال: غسَّل رسولَ الله صلى الله عليه وسلم عليٌّ والفضل وأسامة بن زيد، وهم أدخلوه قبره.
قال: وحدثني مرحَّب، أو أبو مرحَّب، أنهم أدخلوا معهم عبد الرحمن بن عوف، فلما فرغ علي قال: إنما يلي الرجل أهلُه، فهو مرسل. رواه أبو داود (3209) عن أحمد بن يونس، حدثنا زهير، حدثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن عامر فذكره.
وفي رواية أخرى عن محمد بن الصباح، أخبرنا سفيان، عن ابن أبي خالد، عن الشعبي، عن أبي مرحَّب، أن عبد الرحمن بن عوف نزل في قبر النبي صلى الله عليه وسلم قال: كأني أنظر إليهم أربعة.
ومرحَّب أو أبو مرحَّب مختلف في صحبته كما قال الحافظ في التقريب.
وجاء في أثر صحيح عن عبد الرحمن بن أبزى، أن عمر بن الخطاب كبَّر علي زينب بنت جحش أربعًا، ثم أرسل إلى أزواج النبي صلى الله عليه وسلم من يدخل هذه قبرها؟ ، قلن: من كان يدخل عليها في حياتها.
وفي رواية: وكان عمر يعجبه أن يدخلها، فلما قلن ما قلن: قال: صدقن، رواه البيهقي (4/ 53) من طريق شعبة، عن إسماعيل بن خالد، عن الشعبي، عن عبد الرحمن بن أبزي فذكره.
وفي حديث أنس دليل على أن الرجال يتولون دفن المرأة ولو كانوا أجنبيين عند الحاجة، والأولى أن يتولى ذلك أولياؤها.
وفيه دليل أيضًا أن الذي لم يجامع أهله تلك الليلة أولى بالدفن من الذي جامع أهله ولو كان أجنبيا؛ فإن بعيد العهد عن الملاذ يكون بعيد التفكير في الشهوات.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কন্যার দাফনে উপস্থিত ছিলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কবরের পাশে বসেছিলেন। আমি দেখলাম তাঁর দুই চোখ অশ্রুসজল। অতঃপর তিনি বললেন, "তোমাদের মধ্যে এমন কেউ কি আছে, যে আজ রাতে (স্ত্রীর সাথে) মিলিত হয়নি?" আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি আছি। তিনি বললেন, "তবে তুমিই তার কবরে নামো।" অতঃপর তিনি তাঁর কবরে নামলেন এবং তাঁকে দাফন করলেন।
ইবনু মুবারক বলেছেন, ফুলাইহ বলেছেন: আমি মনে করি তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পাপ বুঝিয়েছেন। আবূ আব্দুল্লাহ (আল-বুখারী) বলেছেন: {لِيَقْتَرِفُوا} এর অর্থ হলো— তারা যেন উপার্জন করে।
সহীহ: এটি বুখারী (জানায়েয, ১৩৪২) বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু সিনান থেকে, তিনি ফুলাইহ ইবনু সুলাইমান থেকে, তিনি হিলাল ইবনু আলী থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। আর ফুলাইহের সূত্রে এটি ইমাম আহমাদও বর্ণনা করেছেন (১২২৭৫)।
সহীহ রেওয়ায়াতসমূহে প্রমাণিত যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সেই কন্যা ছিলেন উম্মু কুলসুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি ছিলেন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কবরে নামা থেকে বিরত ছিলেন, কারণ তিনি সেই রাতে তাঁর কোনো এক দাসীর সাথে সহবাস করেছিলেন।
কিন্তু হাম্মাদ ইবনু সালামাহ যে রিওয়ায়াত সাবিত, আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে, যখন রুকাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারা গেলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে ব্যক্তি তার স্ত্রীর সাথে মিলিত হয়েছে, সে যেন কবরে প্রবেশ না করে।" ফলে উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কবরে প্রবেশ করেননি— এই বর্ণনায় রুকাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম উল্লেখ করা হাম্মাদ ইবনু সালামাহর পক্ষ থেকে একটি ভ্রম। এই সূত্রেই ইমাম আহমাদ (১৩৩৯৮) ও হাকিম (৪/৪৭) এটি সংকলন করে বলেছেন: "এটি মুসলিমের শর্তানুযায়ী সহীহ।"
আমি (গ্রন্থকার) বলি: সঠিক হলো— এতে হাম্মাদ ইবনু সালামাহর পক্ষ থেকে একটি ভ্রম ঘটেছে। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কন্যা রুকাইয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন মারা যান যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরে ছিলেন এবং তিনি (তাঁর দাফনে) উপস্থিত ছিলেন না, যেমনটি বুখারী ও অন্যান্যরা বলেছেন। তাই সঠিক হলো, যিনি মারা গিয়েছিলেন তিনি উম্মু কুলসুম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যেমনটি ঐতিহাসিক রিওয়ায়াতসমূহে প্রমাণিত।
অতএব হাইছামী 'আল-মাজমা' (৩/৪৩)-এ যে বলেছেন: "এটি আহমাদ বর্ণনা করেছেন এবং এর রাবীগণ সহীহর রাবী", তা হাদীসটির বিশুদ্ধতা প্রমাণ করে না, এ বিষয়ে মনোযোগ দিন। অনুরূপভাবে, আমের (যিনি শা'বী)-এর পক্ষ থেকে বর্ণিত রিওয়ায়াতটিও সহীহ নয় যে, তিনি বলেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে আলী, ফাদল এবং উসামাহ ইবনু যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) গোসল করিয়েছিলেন এবং তাঁরাই তাঁকে তাঁর কবরে প্রবেশ করিয়েছিলেন।
তিনি (আমের) বলেন: আমাকে মারহাব বা আবূ মারহাব হাদীস শুনিয়েছেন যে, তাঁরা তাঁদের সাথে আব্দুর রহমান ইবনু আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কেও কবরে প্রবেশ করিয়েছিলেন। যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাজ শেষ করলেন, তখন তিনি বললেন: কোনো ব্যক্তির দাফনের কাজ তার পরিবারের লোকেরাই করবে। এটি মুরসাল (বিচ্ছিন্ন সনদ)। এটি আবূ দাউদ (৩২০৯) আহমাদ ইবনু ইউনুস থেকে, তিনি যুহাইর থেকে, তিনি ইসমাঈল ইবনু আবী খালিদ থেকে, তিনি আমের থেকে বর্ণনা করেছেন।
অন্য একটি রিওয়ায়াতে মুহাম্মাদ ইবনু আস-সাব্বাহ থেকে, তিনি সুফিয়ান থেকে, তিনি ইবনু আবী খালিদ থেকে, তিনি শা'বী থেকে, তিনি আবূ মারহাব থেকে বর্ণনা করেছেন যে, আব্দুর রহমান ইবনু আওফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কবরে নেমেছিলেন। তিনি (আবূ মারহাব) বলেন: আমি যেন তাঁদের চারজনকে দেখতে পাচ্ছি। মারহাব বা আবূ মারহাবের সাহাবী হওয়া নিয়ে হাফিয ইবনু হাজার 'আত-তাক্বরীব'-এ মতপার্থক্য থাকার কথা বলেছেন।
আব্দুর রহমান ইবনু আবযা থেকে একটি সহীহ বর্ণনায় এসেছে যে, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যাইনাব বিনত জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর জানাযার সালাতে চার তাকবীর দিয়েছিলেন। অতঃপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদের কাছে এই বলে লোক পাঠালেন: "কে তাঁকে কবরে প্রবেশ করাবে?" তাঁরা বললেন: "যারা তাঁর জীবদ্দশায় তাঁর কাছে প্রবেশ করত।" অন্য এক রিওয়ায়াতে এসেছে: উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে (কবরে) প্রবেশ করানো পছন্দ করতেন, কিন্তু যখন তাঁরা এই কথা বললেন, তখন তিনি বললেন: "তাঁরা সত্য বলেছেন।" এটি বাইহাকী (৪/৫৩) শু'বাহর সূত্রে, তিনি ইসমাঈল ইবনু খালিদ থেকে, তিনি শা'বী থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু আবযা থেকে বর্ণনা করেছেন।
আর আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসে প্রমাণ রয়েছে যে, প্রয়োজনের সময় পুরুষরা মহিলাদের দাফন করতে পারে, যদিও তারা মাহরাম না হয়। তবে উত্তম হলো, তার অভিভাবকরা এই কাজটি সম্পন্ন করবে।
এতে আরো প্রমাণ রয়েছে যে, যে ব্যক্তি সেই রাতে তার স্ত্রীর সাথে মিলিত হয়নি, সে তার দাফনের জন্য অধিক হকদার, যদিও সে মাহরাম না হয়ে থাকে; কারণ যে ব্যক্তি আনন্দ থেকে দূরে থাকে, সে শাহওয়াত (কামনা) নিয়ে চিন্তা করা থেকেও দূরে থাকে।
3665 - عن ابن عمر أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا وضع الميت في القبر قال:"بسم الله، وعلى سنة رسول الله".
صحيح: رواه أبو داود (3213)، والنسائي في الكبرى (10927) وصحَّحه ابن حبان (3110)، والحاكم (1/ 366) كلهم من طريق همام بن يحيى، عن قتادة، عن أبي الصديق وهو الناجي، عن ابن عمر فذكره، واللفظ لأبي داود.
وأخرجه الإمام أحمد (4812) عن يزيد (وهو ابن هارون) عن همام بن يحيى بإسناده.
وإسناده صحيح، وأبو الصديق هو بكر بن عمرو وهو ثقة، ولفظ ابن حبان وأحمد:"إذا وضعتم موتاكم في اللحد فقولوا: بسم الله، وعلى سنة رسول الله"، وعند أحمد:"وعلى ملة رسول الله".
ورواه الترمذي (1046)، وابن ماجه (1550) كلاهما من طريق أبي خالد الأحمر، عن الحجاج، عن نافع، عن ابن عمر ولفظه:"باسم الله وبالله وعلى ملة رسول الله"، وفي رواية"على سنة رسول الله".
وقال الترمذي:"حسن غريب من هذا الوجه، وقد رُوي هذا الحديث من غير هذا الوجه عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، ورواه أبو الصديق الناجي عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وقد رُوي عن أبي الصديق الناجي، عن ابن عمر موقوفًا أيضًا" انتهى.
قلت: ما صح منه لا يُعلل بما لم يَصح، ولذا قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه، وهمام بن يحيي ثبت مأمون إذا أسند مثل هذا الحديث لا يُعلل بأحد إذا أوقفه شعبة" انتهى.
وفي الباب ما رُوي عن البياضي، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"الميت إذا وضع في قبره فليقل الذين يضعونه حين يوضع في اللحد: باسم الله، وبالله، وعلى ملة رسول الله صلى الله عليه وسلم".
وفيه أبو حازم مولى الغفارين -واسمه التمار، ذكره ابن حبان في"الثقات"، ولم يوثقه أحد، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي حيث يتابع، ولم أجد من تابعه.
ورواه الحاكم (1/ 366) من حديث الليث بن سعد، حدثني ابن الهاد، عن محمد بن إبراهيم التيمي، عن أبي حازم مولى الغفاريين، قال: حدثني البياضي فذكره.
قال الحاكم:"حديث البياضي وهو مشهور في الصحابة شاهد لحديث همام عن قتادة مسندًا".
قلت: كون حديث البياضي شاهدًا لحديث ابن عمر فلا بأس به، لأنه ليس فيه متهم.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عبد الرحمن بن العلاء بن اللَّجاج، عن أبيه قال: قال لي أبي: يا بني! إذا أنا مُتُّ فألحدني، فإذا وضعتني في لحدي فقل:"بسم الله، وعلى ملة رسول الله، ثم شُنَّ عليَّ الثري شَنَّا، ثم اقرا عند رأسي بفاتحة البقرة وخاتمها"، فإني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول ذلك، رواه الطبراني في"الكبير" (19/ 321) بإسناده عن عبد الرحمن بن العلاء فذكره، وأورده الحافظ في"التلخيص" (2/ 130) وسكت عليه.
وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 44) وقال:"رجاله موثقون".
قلت: قال ذلك تبعًا لابن حبان فإنه ذكر عبد الرحمن بن العلاء في"الثقات" ولم يسبق له توثيق من أحد، ولم يذكر المزي من الرواة عنه سوى مبشر بن إسماعيل الحلبي، وأكَّد ذلك الذهبي في"الميزان" فهو مجهول.
وقال الحافظ في"التقريب":"مقبول" أي إذا توبع، ولم يتابع على روايته فهو ليّن الحديث.
عليه من قبل رأسه ثلاثًا.
رواه ابن ماجه (1565) حدثنا العباس بن الوليد الدمشقي، قال: حدثني يحيى بن صالح، قال: حدثنا سلمة بن كلثوم، قال: حدثنا الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
وهو منكر أنه لم يذكر هذا الحديث بهذا اللفظ إلا سلمة بن كلثوم عن الأوزاعي، وسلمة بن كلثوم وصف بأنه كان يهم كثيًرا.
وقد نقل ابن أبي حاتم عن أبيه بأنه حديث باطل، وقال الدارقطني في"علله" (9/ 322):"زاد فيه ألفاظًا لم يأت بها غيره، وهي قوله:"أتى النبي صلى الله عليه وسلم على القبر حثا عليه ثلاثًا ..". أي أنه تفرد به وخالف كثيًرا من الرواة؛ لأنّ أصل حديث أبي هريرة في الدعاء على الجنازة"اللهم! اغفر لحينا وميتنا …" رواه جماعة كثيرون، ولم يذكر أحدٌ هذه اللفظة إلا سلمة بن كلثوم، وهو ممن لا يقبل تفرده.
وأما ما رُوي عن أبي أمامة قال: لما وُضِعت أم كلثوم ابنة رسول الله صلى الله عليه وسلم في القبر، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: {مِنْهَا خَلَقْنَاكُمْ وَفِيهَا نُعِيدُكُمْ وَمِنْهَا نُخْرِجُكُمْ تَارَةً أُخْرَى} [طه: 55] قال: ثم لا أدري أقال:"بسم الله وفي سبيل الله، وعلى ملة رسول الله" أم لا؟ فلما بُني عليها لحدُها طفق يطرح لهم الجبوب ويقول:"سُدُّوا خلال اللَّبن" ثم قال:"أما إن هذا ليس بشيء، ولكنَّه يُطيِّب بنفس الحيّ" فهو ضعيف جدا.
رواه الإمام أحمد (22187) عن علي بن إسحاق، أخبرنا عبد الله -يعني ابن المبارك، أخبرنا يحيى بن أيوب، عن عبيدالله بن زحر، عن علي بن يزيد، عن القاسم، عن أبي أمامة فذكره.
وفيه عبيدالله بن زحر وشيخه علي بن يزيد وهو ابن أبي هلال الألهاني ضعيفان.
وأخرجه الحاكم (2/ 379) وعنه البيهقي (3/ 409) من طريق يحيي بن أيوب به مثله.
وقال البيهقي:"وهذا إسناد ضعيف". وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"من حثا على مسلم، أو مسلمة احتسابًا كتب له بكل ثراة حسنة"، رواه ابن الجوزي في العلل المتناهية (2/ 428) وفيه الهيثم بن رُزيق المالكي وهو مجهول ولا يتابع عليه.
وفي الباب أيضًا عن عامر بن ربيعة وجعفر بن محمد، عن أبيه وغيرهما وهي كلها معلولة. انظر:"المنة الكبري" (3/ 82 - 83).
وقد صحّ عن بعض الصحابة حثو التراب على القبر بعد دفن الميت منهم: علي وابن عباس وأبي أمامة وغيرهم؛ ولذا رأي أهل العلم أنه لا يكره ذلك.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন কোনো মৃত ব্যক্তিকে কবরে রাখতেন, তখন তিনি বলতেন: "বিসমিল্লাহ, ওয়া আলা সুন্নাতি রাসূলিল্লাহ।" (আল্লাহর নামে, এবং আল্লাহর রাসূলের সুন্নাতের ওপর [স্থাপন করছি])
3666 - عن عثمان بن عفان قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم إذا فرغ من دفن الميت، وقف عليه
فقال:"استغفروا لأخيكم، وسَلُوا له التثبيتَ، فإنه الآن يُسأل".
حسن: أخرجه أبو داود (3221) عن إبراهيم بن موسي الرازي، حدثنا هشام، عن عبد الله بن بَحير، عن هانئ مولي عثمان، عن عثمان بن عفان فذكره.
ورواه البيهقي في إثبات عذاب القبر (50) من وجه آخر عن هشام بن يوسف بإسناده مثله. وعبد الله بن بحير -بفتح الموحدة، وكسر المهملة- ابن رَيسان أبو وائل القاص وثَّقه ابن معين، وذكره ابن حبان في"الثقات" (8/ 331).
وأما قول الحافظ في"التقريب":"واضطرب فيه كلام ابن حبان" فالصحيح أنه لم يضطرب، لأنه فرق بين عبد الله بن بحير بن رَيسان وبين عبد الله بن بَحير الصنعاني فذكر الأول في"الثقات" كما تقدم، والثاني في"المجروحين" (548) فقال:"وليس هذا عبد الله بن بَحير بن رَيسان ذاك ثقة، وهذا هالك، هذا يروي عن عروة بن محمد بن عطية وعبد الرحمن بن يزيد الصنعاني العجائب التي كأنها معمولة، لا يجوز الاحتجاج به" إلا أنه كنَّى الصنعاني بأبي وائل القاص، وصاحبنا هو الأول، ولكن في الإسناد هانئ مولي عثمان، وهو أبو سعيد البربري قال فيه النسائي: ليس به بأس"، وذكره ابن حبان في"الثقات" فهو حسن الحديث، لا يرتقي إلى درجة"ثقة".
وأخرجه الحاكم في"المستدرك" (1/ 370) من هذا الوجه، وقال:"صحيح على شرط الإسناد". وأمّا التلقين، فقال الحافظ ابن القيم في"زاده" (1/ 522 - 523):"لم يكن من هديه صلى الله عليه وسلم أن يجلس يقرأ عند القبر، ولا يلقَّن الميِّت كما يفعله النّاسُ اليوم، وأمّا الحديث الذي رواه الطّبراني في"معجمه" [7979] من حديث أبي أمامة مرفوعًا، فلا يصح". وأورده الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (2/ 324) وقال:"رواه الطّبراني في"الكبير"، وفيه من لم أعرفه".
أما رفع اليدين مستقبل القبلة عند دفن الميت والدعاء له فلم يثبت، وأما ما روي عن عبد الله بن مسعود قال: والله لكأني أنطبع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك، وهو في قبر ذي البجادين، وأبو بكر وعمر، وهو يقول:"أدنيا إلى أخاكما"، فأخذه من قبل القبلة حتى أسنده في لحده، ثم خرج النبي صلى الله عليه وسلم ووليا العمل، فلما فرغ من دفنه استقبل القبلة رافعا يديه يقول:"اللهم! إني أمسيت عنه راضيًا، فارض عنه"، وكان ذلك ليلا ، فواللهّ لقد رأيتني ولقد أسلمت قبله بخمسة وعشرين سنة ولوددت أني مكانه، فهو غريب.
رواه البغوي في"معجم الصحابة" (2/ 323) عن عبد الله بن أبي سعد، نا إسحاق بن إبراهيم الفارسي، قال: ثني جدي سعد بن الصلت، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن عبد الله، فذكره.
ورواه أبو نعيم في"الحلية" (1/ 122)، وفي"معجم الصحابة" (3/ 1636) من طريق محمد بن عمر بن حفص، ثنا إسحاق بن إبراهيم شاذان بإسناده مثله.
وأخرجه ابن مندة -كما في"الإصابة"- من طريق سعد بن الصلت بإسناده، والغالب أنه من
طريق إسحاق بن إبراهيم والنهشلي، المعروف بشاذان الفارسي، ابن ابنة سعد بن الصلت ترجمه ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (2/ 211)، وقال:"هو صدوق".
وسعد بن الصلت هو ابن بُرد بن أسلم القاضي، ترجمه الذهبي في"السير" (9/ 317) ووصفه بأنه الإمام المحدث الفقيه. سأل عنه سفيان الثوري، فقال:"ما فعل سعد؟" قالوا: ولي قضاء شيراز، قال:"دُرة وقع في الحُشّ"، قال الذهبي:"هو صالح الحديث، وما علمت لأحد فيه جرحًا". انتهى.
وذكره ابن حبان في"الثقات" وقال:"ربما أغرب".
قلت: لعل هذا الحديث من غرائبه، فإنه تفرد بالرواية عن الأعمش، وهو كثير الرواية. وقد حكم الذهبي أيضًا على حديث رواه سعد بن الصلت، عن عيسي بن عمر بإسناده مرفوعًا:"من حج عن أبويه، ولم يحجا جزي عنهما، وعنه، ونُشرت أرواحهما في السماء، وكتب عند الله برًا".
قال الذهبي:"غريب جدًّا، وعيسي هذا هو الكوفي المقرئ صدوق".
وللحديث إسناد آخر وهو ما رواه محمد بن إسحاق، قال: حدثني محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، أن عبد الله بن مسعود كان يحدث، قال: قمت من جوف الليل، وأنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غزوة تبوك، قال: فرأيت شعلة من نار في ناحية العسكر، قال: فاتبعتها أنظر إليها، فإذا رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأبو بكر، وعمر، وإذا عبد الله ذو البجادين المزني قد مات، وإذا هم قد حفروا له، ورسول الله صلى الله عليه وسلم في حفرته، وأبو بكر وعمر يدلّيانه إليه، وهو يقول:"أدنيا إلي أخاكم"، فدلّياه، فلما هيأه لشقِّه قال:"اللهم! إني أمسيت راضيًا عنه، فارض عنه"، قال: يقول عبد الله بن مسعود: ياليتني كنت صاحب الحفرة.
رواه البغوي في"معجم الصحابة"، وأبو نعيم في"الحلية"، وهو في"سيرة ابن هشام" (2/ 527) كلهم من حديث محمد بن إسحاق، وفيه انقطاع كما أشار إليه ابن حجر في"الإصابة" (2/ 339)، فإن محمد بن إبراهيم الحارث لم يسمع من عبد الله بن مسعود، ثم هو مختلف فيه، فوثقه ابن معين وأبو حاتم والنسائي.
وقال أحمد:"في حديثه شيء، يروي أحاديث مناكير، أو منكرة". ثم ليس فيه محل الشاهد وهو:"استقبل القبلة رافعًا يديه". وعبد الله ذو البجادين سمي به لأنه كان يتيمًا في حجر عمه، وكان محسنًا له، فبلغ عمه أنه أسلم، فنزع منه كل شيء أعطاه، حتي جرّده من ثوبه، فأتى أمه، فقطعت له بجادًا لها اثنتين، فاتزر نصفًا، وارتدى نصفًا، ثم أسلم، فقال له النبي صلى الله عليه وسلم:"أنت عبد الله ذو البجادين"، فلزم به. هذا عند دفن الميت، أما رفع اليدين للدعاء عند زيارة المقابر فهو صحيح ثابت من حديث عائشة كما هو مذكور في باب الأدعية لأصحاب القبور.
উসমান ইবনে আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মৃত ব্যক্তির দাফন শেষ করতেন, তখন তিনি (কবরের পাশে) দাঁড়িয়ে বলতেন: "তোমরা তোমাদের ভাইয়ের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো এবং তার জন্য দৃঢ়তা (স্থিরতা) কামনা করো, কারণ তাকে এখনই প্রশ্ন করা হবে।"
3667 - عن قتادة قال: ذكر لنا أنس بن مالك، عن أبي طلحة قال: لما كان يومُ بدرٍ،
وظهر عليهم نبي الله صلى الله عليه وسلم وأمر ببضعة وعشرين رجلًا-وفي رواية: بأربعة وعشرين رجلًا من صناديد قريش، فأُلقوا في طَوِيٍّ من أطواء بدرٍ.
متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (3976)، ومسلم في كتاب الجنَّة (2875)، كلاهما من حديث روح بن عبادة، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، فذكره في سياق طويل وسيأتي في المغازي بطوله. وفي رواية: فجروا بأرجلهم.
وقوله:"في طَوِي" بفتح الطاء وكسر الواو، بئر مطوي بالحجارة أو غيرها، وجمعه أطواء كشريف وأشراف.
আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন বদরের দিন ছিল, আর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের উপর বিজয়ী হলেন, তখন তিনি কুরাইশের সর্দারদের মধ্য থেকে বিশের বেশি সংখ্যক লোককে — অন্য বর্ণনায়: চব্বিশজন লোককে — নির্দেশ দিলেন। অতঃপর তাদের বদরের কূপগুলোর (তাওয়ীগুলোর) একটিতে নিক্ষেপ করা হলো।
3668 - عن عمر بن الخطاب قال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُرينا مصارع أهل بدر بالأمس، يقول:"هذا مصرع فلان غدًا إن شاء الله" قال: فوالذي بعثه بالحق ما أخطؤوا الحدود التي حدَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: فجعلوا في بئر بعضهم على بعض.
صحيح: رواه مسلم في الجنة (2873) عن إسحاق بن عمر بن سليط الهذلي، حدثنا سليمان بن المغيرة، عن ثابت، قال: قال أنس: كنت مع عمر بين مكة والمدينة، فتراءَينا الهلال، وكنت رجلًا حديد البصر فرأيتهُ، وليس أحد يزعم أنه رآه غيري، قال: فجعلتُ أقول لعُمَر: أمَا تراه؟ فجعل لا يراه، قال: يقول عمر: سأراه وأنا مستلق على فراشي، ثم أنشأ يحدثنا عن أهل بدر فذكره.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) গতকাল (বদরের যুদ্ধের প্রাক্কালে) আমাদেরকে বদরবাসীদের (মুশরিকদের) মৃত্যুর স্থানগুলো দেখাচ্ছিলেন। তিনি বলছিলেন: "ইনশাআল্লাহ, আগামীকাল অমুকের মৃত্যুস্থান হবে এটি।" উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যাঁর হাতে তাঁকে সত্যসহ প্রেরণ করা হয়েছে, তাঁর কসম! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যে স্থানগুলো চিহ্নিত করেছিলেন, তারা সেই সীমা থেকে সামান্যতমও বিচ্যুত হয়নি। তিনি বললেন: অতঃপর তাদেরকে এক কূপের মধ্যে একজনকে আরেকজনের ওপর রাখা হয়েছিল।
3669 - عن عائشة قالت: أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بالقتلى أن يُطرحوا في القَليبِ، فطُرحوا فيهِ، إلَّا ما كان من أميَّة بن خلف، فإنَّهُ انتفخَ في دِرعِه فملأها، فذهبوا ليحركوه، فتزايلَ (لحمه) فأقرُّوه وألقَوا عليه ما غيَّبه من التُّراب والحجارة، فذكر الحديث بطوله وسيأتي في موضعه كاملًا.
حسن: رواه الإمام أحمد (26361) عن يعقوب، قال: حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: حدثني يزيد بن رومان، عن عروة، عن عائشة فذكرته، وهو في"سيرة ابن هشام" (1/ 638 - 639) من هذا الوجه، وصحَّحه ابن حبان (7088) والحاكم (3/ 224) وقال:"صحيح على شرط مسلم".
قلتُ: إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه إن صرَّح فهو حسن الحديث لأنه مدلس، وقد صرَّح هنا بالتحديث فانتفت عنه تهمة التدليس.
والقَليب: البئر، وقوله:"تزايل" أَي تفرَّقَ لحمُهُ.
وكان بالمدينة مقابر خاصة للمشركين، ومقابر خاصة للمسلمين كما هو الظاهر من حديث بشير ابن الخصامية الذي سيأتي في باب كراهية المشي في النعال بين القبور، ويستفاد من حديثه أيضًا أن من السنة الدفنُ في المقبرة العامة للمسلمين، لأن النبي صلى الله عليه وسلم كان يُدفن الموتى في مقبرة البقيع، ولم يثبت أنه أجاز دفن أحد من المسلمين في بيوتهم، بل قوله صلى الله عليه وسلم:"لا تجعلوا بيوتكم مقابر" كما جاء في صحيح مسلم ظاهره يقتضي النهي عن الدفن في البيوت، وأما دفن النبي صلى الله عليه وسلم في حجرته فهو من خصوصياته عليه السلام كما دل عليه حديث أبي بكر الذي سبق، وأما دفن أبي بكر وعمر مع صاحبيه فهو لظروف خاصة، ولا يقاس عليهما غيرهما.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নিহতদেরকে কূপে নিক্ষেপ করার নির্দেশ দিলেন। তখন তাদেরকে সেখানে নিক্ষেপ করা হলো, উমাইয়া ইবনে খালাফ ব্যতীত। কারণ সে তার বর্মের ভেতর ফুলে উঠেছিল এবং তা পূর্ণ করে ফেলেছিল। যখন তারা তাকে নাড়াতে গেল, তখন তার গোশত আলগা হয়ে বিচ্ছিন্ন হয়ে পড়ল। ফলে তারা তাকে (সেখানেই) রেখে দিল এবং তার উপর মাটি ও পাথর চাপা দিল যা তাকে ঢেকে দিল। (বর্ণনাকারী) এরপর দীর্ঘ হাদীসটি উল্লেখ করলেন, যা যথাস্থানে সম্পূর্ণভাবে আসবে।
3670 - عن علي بن أبي طالب قال: قلت للنبي صلى الله عليه وسلم: إن عمك الشيخ الضال قد مات، قال:"اذهب فوار أباك، ثم لا تحدثَنَّ شيئًا حتى تأتيني" فذهبت فواريتُه وجئتُه، فأمرني فاغتسلت، ودعا لي.
حسن: رواه أبو داود (3217)، والنسائي (2006)، وابن الجارود (550)، وأحمد (1093) كلّهم من حديث أبي إسحاق، عن ناجية بن كعب، عن علي بن أبي طالب فذكره.
وإسناده حسن من أجل ناجية بن كعب فهو مختلف فيه، فقد سئل يحيى بن معين عنه فقال:"صالح"، وقال أبو حاتم:"شيخ"، وقال العجلي:"كوفي ثقة"، وجعله الحافظ في درجة"ثقة" وأرى أنه لا يرتقي عن درجة"صدوق" وتكلم فيه ابن المديني فقال:"مجهول". وأورده الحافظ ابن حجر في"الفتح" (7/ 195) وسكت عنه (إلا أنه عزاه إلى ابن خزيمة أيضًا، وهذا سهو منه، فإنه لم يعزه إليه في"إتحاف المهرة" (14776) فتنبه).
ونقل البيهقي (1/ 304) عن ابن المديني قال: لم نجد هذا الحديث إلا عند أهل الكوفة، وقال البيهقي: وفي إسناده بعض الشيء. رواه أبو إسحاق عن ناجية، ولا نعلم أحدا روي عن ناجية غير أبي إسحاق، قال الإمام أحمد: وقد رُوي من وجه آخر ضعيف عن علي هكذا. انتهى.
قلت: لعل الإمام أحمد يشير إلى ما رواه في مسنده (807) عن إبراهيم بن أبي العباس، حدثنا الحسن بن يزيد الأصم، قال: سمعت السُدي إسماعيل يذكره عن أبي عبد الرحمن السُلمي، عن علي قال فذكره، وزاد في آخر الحديث:"فدعا لي بدعوة ما يسرني أن لي بها حمرَ النعم وسودها قال: وكان علي إذا غسل الميت اغتسل" وهذا الإسناد فيه شيء من الضعف.
ورواه ابن الإمام أحمد في"زوائد المسند" (1074) من وجه آخر عن الحسن بن يزيد الأصم بإسناده مثله، والإسناد الثاني هذا يقوي الإسناد الأول الذي من طريق ناجية بن كعب، والله أعلم.
وقد قال الحافظ في"التلخيص" بعد أن عزاه للمخرجين من طريق أبي إسحاق:"ومدار كلام البيهقي على أنه ضعيف، ولا يتبين وجه ضعفه، وقال الرافعي: إنه حديث ثابت مشهور، قال ذلك في أماليه".
قلت: هذا الحديث وإن كان من جهة النّقل فيه مقال، ولكن الحديث يدل على قصة وقعت بدون شك، فإن لم يفعل علي بن أبي طالب بأبيه هذا فماذا كان يجب عليه عمله بعد موته؟ ! وأمّا كونه غسّل أبا طالب قبل دفنه فلم يثبت هذا لا في حديث صحيح ولا ضعيف، وإنّما فيه أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أمره أن يغتسل بعد دفنه تنظيفًا؛ لأنّ الاغتسال إنّما شرع من غسل الميت، ولم يشرع من دفنه، ولذا لم يقلْ أحدٌ بالاغتسال من الدَّفن.
আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললাম: আপনার পথভ্রষ্ট বৃদ্ধ চাচা মারা গেছেন। তিনি বললেন, "যাও, তোমার পিতাকে দাফন করো। এরপর আমার কাছে আসার আগে আর কিছু করো না।" অতঃপর আমি গেলাম এবং তাঁকে দাফন করে তাঁর কাছে ফিরে আসলাম। তখন তিনি আমাকে গোসল করার নির্দেশ দিলেন। অতঃপর আমি গোসল করলাম এবং তিনি আমার জন্য দু'আ করলেন।
3671 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كسر عظْم الميت ككسْره حيًّا".
صحيح: رواه أبو داود (3207)، وابن ماجه (1616) كلاهما من طريق عبد العزيز بن محمد الدراوردي، قال: حدثنا سعد بن سعيد، عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة فذكرته.
وقد تابع الدراوردي كل من ابن نمير عند أحمد (24308)، ومحاضر بن المورّع عند ابن الجارود (551)، وابن جريج -مع التحديث- عند الدارقطني (3413) كلهم عن سعد بن سعيد بإسناده، مثله.
وسعد بن سعيد هو أخو يحيى بن سعيد، تُكلّم فيه من ناحية حفظه والخلاصة فيه كما قال ابن عدي:"له أحاديث صالحة، تقرب من الاستقامة لا أرى بحديثه بأسًا بمقدار ما يرويه".
وقد تابعه على رفعه كل من:
يحيى بن سعيد أخوه ومن طريقه رواه ابن حبان (3167)، والبيهقي (4/ 58). وأبو الرجال: وهو محمد بن عبد الرحمن بن أبي الرجال، ومن طريقه رواه أحمد (24739).
وحارثة بن أبي الرجال ممن ذكره الدارقطني في"العلل" (14/ 408)، والبخاري في"التاريخ الكبير" (1/ 150).
وللدارقطني في"سننه" (3415) إسناد آخر عن زهير بن محمد، عن إسماعيل بن أبي حكيم، عن القاسم، عن عائشة، فذكرته مرفوعًا. وبهذه المتابعات وغيرها صحّ هذا الحديث مرفوعًا.
وأما البخاري فرجّح الوقف كما في"التاريخ الكبير" فلعله بناء على أن الذين رفعوه هم عنده اثنان كما ذكر، وهما: سعد بن سعيد، وحارثة وقال:"وغير مرفوع أكثر". والله تعالى أعلم.
وأما ما رُوي عن أمّ سلمة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"كسر عظْم الميت ككسر عظْم الحي في الإثم" فهو ضعيف. رواه ابن ماجه (1617) عن محمد بن مُعَمَّر، قال: حدثنا محمد بن بكر، قال: حدثنا عبد الله بن زياد، قال: أخبرني أبو عبيدة بن عبد الله بن زمعة، عن أمه، عن أم سلمة فذكرته.
قال البوصيري في"الزوائد":"فيه عبد الله بن زياد مجهول، ولعله عبد الله بن زياد بن سمعان المدني أحد المتروكين فإنه في طبقته" ثم ذكر حديث عائشة شاهدًا له.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মৃত ব্যক্তির হাড় ভাঙা জীবিত অবস্থায় তার হাড় ভাঙার মতোই।"
3672 - عن أنس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا عَقْر في الإسلام".
قال عبد الرزاق: كانوا يَعْقِرون عند القبر ببقرةٍ أو شاةٍ.
صحيح: رواه أبو داود (3222) عن يحيى بن موسى البلْخِي، حدثنا عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن ثابت، عن أنس فذكره.
والحديث في مصنف عبد الرزاق (6690) مطولًا.
وأما قول عبد الرزاق الذي ذكره أبو داود فلم أجده في مصنفه.
وقوله:"ولا عقر" قال السندي: العَقْر: ضرب قوائم البعير، أو الشاة بالسيف وهو قائم، وكانوا يَعْقِرون الإبل على قبور الموتى - أي ينحرونها ويقولون: صاحب القبر كان يعقر للأضياف، فنكافثه بمثله".
وقال النووي في"المجموع" (5/ 320):"وأما الذبح والعَقْر عند القبر فمذموم لحديث أنس هذا". رواه أبو داود والترمذي وقال:"حسن صحيح".
قلت: العزو إلى الترمذي وهم منه رحمه الله تعالى.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ইসলামে (কবরের পাশে) পশু যবেহ (আক্বর) করার বিধান নেই।"
3673 - عن عائشة قالت: لما اشتكى النبي صلى الله عليه وسلم ذكرتْ بعض نسائه كنيسةً رأينَها بأرض الحبشة يقال لها مارية، وكانت أم سلمة وأم حبيبة أتتا أرض الحبشة، فذكرتا من حسنها وتصاوير فيها، فرفع رأسه فقال:"أولئك إذا مات منهم الرجل الصالح بنوا على قبره مسجدًا، ثم صوَّروا فيه تلك الصورة، أولئك شِرار الخلق عند الله".
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1341)، ومسلم في المساجد (528) كلاهما من حديث هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته واللفظ للبخاري.
وبقية أحاديث النهي عن بناء المساجد على القبور انظر في"المساجد".
وقد رُوي عن أبي سعيد"أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يُبْنى على القبر" إلا أنه منقطع، رواه ابن ماجه (1564) عن محمد بن يحيى قال: حدثنا محمد بن عبد الله الرقاشي، قال: حدثنا وُهيب، قال: حدثنا عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن القاسم بن مُخيمِرة، عن أبي سعيد فذكره.
القاسم بن مُخيمرة لم يثبثْ سماعُه من أحد من الصحابة، قاله يحيى بن معين وغيره. وقد أشار إليه البوصيري في"الزوائد بقوله":"هذا إسناد رجاله ثقات إلا أنه منقطع، القاسم بن مخيمرة لم يسمع من أبي سعيد".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অসুস্থ হলেন, তখন তাঁর কতিপয় স্ত্রী হাবশার ভূমিতে দেখা একটি গির্জার কথা উল্লেখ করলেন, যার নাম ছিল মারিয়া। উম্মু সালামা এবং উম্মু হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাবশার ভূমিতে গিয়েছিলেন। তখন তাঁরা এর সৌন্দর্য এবং এর ভেতরের ছবিগুলোর কথা বর্ণনা করলেন। (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাথা তুলে বললেন: "ওরা এমন জাতি, তাদের মধ্যে যখন কোনো সৎকর্মপরায়ণ লোক মারা যেত, তখন তারা তার কবরের উপর মসজিদ নির্মাণ করত, অতঃপর তাতে ঐ সমস্ত ছবি আঁকত (বা স্থাপন করত)। আল্লাহর কাছে এরাই হলো সৃষ্টির মধ্যে নিকৃষ্টতম।"
3674 - عن جابر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُجصَّص القبرُ، وأن يُقْعد عليه، وأن يبُنى عليه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (970) من طرق عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله فذكر الحديث مثله.
ورواه أيوب، عن أبي الزبير، عن جابر قال:"نهى عن تقصيص القبور".
وزاد أبو داود (3226) من طريق سليمان بن موسى، عن جابر"وأن يكتب عليه"، ورواه أيضًا ابن ماجه (1563) من طريق حفص بن غياث، عن ابن جريج، عن سليمان بن موسى، عن جابر فذكر الحديث بقوله:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يكتب على القبر شيء". وسليمان بن موسى لم يلق جابرًا.
ورواه الحاكم في"المستدرك" (1/ 370) من طريق حفص بن غياث النخعي، ثنا ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر فجمع فيه ألفاظ الحديث جميعًا وهي قوله:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُبنى على القبر، ويُجصص، أو يُقعد عليه، ونهى أن يكتب عليه"، وقال:"على شرط مسلم، وقد خرَّج بإسناده"غير الكتابة"، فإنها لفظة صحيحة غريبة، وكذلك رواه أبو معاوية، عن ابن جريج" انتهى.
ثم رواه من طريقه وقال:"هذه الأسانيد صحيحة، وليس العمل عليها، فإن أئمة المسلمين من الشرق إلى الغرب مكتوب على قبورهم، وهو عمل أخذ به الخلف عن السلف" انتهى.
وردَّه الذهبي قائلًا:"ما قُلْتَ طائلًا، ولا نعلم صحابيًا فعل ذلك، وإنما هو شيء أحدثه بعض التابعين فَمن بعدهم، ولم يبلغهم النهي".
والتجصيص والتقصيص هو: البناء بالجص، وهو القص والقصة، والجصاص والقصاص واحد، فإذا خلط الجص بالرماد فهو الجيار. انظر"المفهم" (2/ 626).
وفي الباب أيضًا عن أم سلمة قالت:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يُبْنى على القبر، أو يُجصص".
رواه الإمام أحمد (26555، 26556) من وجهين أولهما: عن حسن، ثنا ابن لهيعة، ثنا يزيد ابن أبي حبيب، عن ناعم مولى أم سلمة فذكرته.
والثاني: عن علي بن إسحاق، حدثنا عبد الله، أخبرنا ابن لهيعة، حدثني يزيد بن حبيب، عن ناعم مولى أم سلمة"أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى أن يُجَصَّص قبر، وأن يبُنى عليه، أو يُجلس عليه"، قال أبي: ليس فيه"أم سلمة". انتهى.
والوجه الثاني هو الصحيح لأن عبد الله وهو ابن المبارك أحد العبادة الذين سمعوا أبن لهيعة، قبل احتراق كتبه، إلا أنه مرسل كما نقل عبد الله بن أحمد، عن أبيه.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কবরকে চুনকাম (প্লাস্টার) করতে, তার উপর বসতে এবং তার উপর কোনো কিছু নির্মাণ করতে নিষেধ করেছেন।
3675 - عن ثُمامة بن شفيٍّ قال: كنا مع فَضالة بن عُبيد بأرض الروم برودس، فتوفي صاحب لنا، فأمر فضالة بن عبيد بقبره فسُوِّيَ ثم قال:"سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يأمر بتسويتها".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (968) من طرق، عن أبي علي الهمداني، حدَّثه، أن ثُمامة بن شُفَيِّ حدَّثه قال: فذكره.
ورودِس: جزيرة معروفة في البحر الأبيض المتوسط، جنوب غرب تركيا.
থুমামাহ ইবনে শুফাই থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা ফাদালাহ ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে রোম দেশের রুদস নামক স্থানে ছিলাম। আমাদের এক সাথী মারা গেলেন। তখন ফাদালাহ ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কবরকে সমান করে দেওয়ার নির্দেশ দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: “আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এগুলো (কবর) সমান করে দেওয়ার নির্দেশ দিতে শুনেছি।”
3676 - عن أبي الهَيَّاج الأسَدي قال: قال لي عليُّ بن أبي طالب: ألا أبعثُك على ما بَعَثَي عليه رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، أن لا تَدَعَ تمثالًا إلا طمستَه، ولا قبرًا مشرقًا إلا سوَّيته.
وفي رواية: ولا صورةً إلا طمستها.
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (969) من طرق عن وكيع، عن سفيان، عن حبيب بن أبي ثابت، عن أبي وائل، عن أبي الهيَّاج فذكره.
والرواية الثانية رواها من طريق يحيى (وهو القطان) عن سفيان بإسناده.
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবুল হাইয়্যাজ আল-আসাদী বলেন, তিনি আমাকে বললেন: আমি কি তোমাকে সেই কাজের জন্য প্রেরণ করব না, যার জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে প্রেরণ করেছিলেন? (তা হলো,) তুমি কোনো প্রতিমা বা মূর্তি ছেড়ে দেবে না যতক্ষণ না তা নিশ্চিহ্ন করে দাও এবং কোনো উঁচু কবর ছেড়ে দেবে না যতক্ষণ না তা সমান করে দাও।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: এবং কোনো ছবি বা চিত্র ছেড়ে দেবে না যতক্ষণ না তা নিশ্চিহ্ন করে দাও।
3677 - عن معاوية قال: إن تسوية القبور من السنة، وقد رفعت اليهود والنصارى فلا تُشبهوا بهما.
صحيح: رواه الطبراني في"الكبير" (19/ 352) عن الحسين بن إسحاق التستري، ثنا وهب بن بقية، أنا خالد بن عبد الله، عن عمران بن حدير، عن أبي مجلز، أن معاوية قال: فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 352): رجاله رجال الصحيح".
قلت: وهو كما قال.
মুআবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই কবরকে সমতল করা সুন্নাতের অংশ। ইহুদি ও নাসারারা (খ্রিস্টানরা) সেগুলোকে উঁচু করেছে, সুতরাং তোমরা তাদের অনুকরণ করো না।
3678 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لأن يجلس أحدكم على جَمْرة فَتحْرِق ثيابُه، فتخلص إلى جلده، خير له من أن يجلس على قبر".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (971) من طرق عن سُهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره.
وأما ما رُوي عنه بلفظ:"من جلس على قبر يتغوط، أو يبول فكأنما جلس على جمرة" فهو ضعيف فيه محمد بن أبي حُميد قال فيه البخاري:"منكر الحديث"، وضعَّفه ابن معين وأبو زرعة والنسائي وغيرهم، ومن طريقه أخرجه أبو داود الطيالسي، والطحاوي وأحمد بن منيع وغيرهم،
انظر:"المطالب العالية" (838).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে কেউ যদি জ্বলন্ত অঙ্গারের উপর বসে ফলে তার পোশাক পুড়ে যায়, এমনকি তা তার চামড়া পর্যন্ত পৌঁছে যায়, তবুও তা তার জন্য কবরের উপর বসা অপেক্ষা উত্তম।"
3679 - عن أبي مرثَدٍ الغَنَوي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تجلسوا على القبور، ولا تُصلوا إليها".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (972) من طريق الوليد بن مسلم، عن ابن جابر (وهو عبد الرحمن بن يزيد بن جابر) عن بُسر بن عبيدالله، عن واثلة بن الأسقع، عن أبي مرثد الغنوي فذكره.
ورواه أيضًا من وجه آخر عن ابن المبارك، عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر وأدخل بين بسر بن عبد الله وبين واثلة بن الأسقع"أبا إدريس الخولاني".
قال البخاري: هذا خطأ أخطأ فيه ابن المبارك، وزاد فيه"عن أبي إدريس الخولاني" وإنما هو بُسر بن عبيد الله، عن واثلة. هكذا روى غير واحد عن عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، وليس فيه"عن أبي إدريس"وبسر بن عبد الله، قد سمع من واثلة بن الأسقع، هذا ما نقله الترمذي (1051) عن البخاري.
قلت: عبد الله بن المبارك حافظ ثقة، فلعل عبد الرحمن بن يزيد بن جابر نفسه روى من وجهين، فإنه سمع أولًا عن بسر بن عبيد الله، عن أبي إدريس الخولاني، عن واثلة بن الأسقع، ثم سمع عن واثلة بن الأسقع بدون واسطة أبي إدريس الخولاني، فسمع منه عبد الله بن المبارك من أحد هذه الوجوه وهي بالواسطة فروى عنه، وسمع غيره من عبد الرحمن بن يزيد بن جابر عن بسر بن عبيد الله، عن واثلة بن الأسقع بدون واسطة"أبي إدريس الخولاني" ومن هؤلاء الوليد بن مسلم عند مسلم، وعيسى بن يونس عند أبي داود (3229) وفيه التصريح من بسر بن عبيدالله بأنه سمع من واثلة بن الأسقع.
وقوله:"لا تُصلوا إليها" أي لا تتخذوها قبلة، لأن ذلك يُؤدي إلى تعظيم من فيها، ومن ثم عبادته، وقد صرَّح كثير من أهل العلم أن الصلاة إلى القبر محرم لظاهر النهي.
আবু মারছাদ আল-গানাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা কবরের উপর বসো না এবং কবরের দিকে মুখ করে সালাত আদায় করো না।"
3680 - عن جابر قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يجصص القبر، وأن يُقْعَدَ عليه، وأن يبنى عليه".
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (970) من طرق، عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله فذكر الحديث وسبق قبل أبواب.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিষেধ করেছেন যে, কবর যেন চুনকাম করা না হয়, তার উপর যেন বসা না হয় এবং তার উপর যেন কোনো স্থাপনা নির্মাণ করা না হয়।