হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3681)


3681 - عن عقبة بن عامر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لأن أمشي على جمرةٍ أو سيفٍ، أو أخصف نعلي برجلي، أحب إلي من أن أمشي على قبر مسلم، وما أبالي أوسط القبور قضيت حاجتي، أو وسط السوق".

صحيح: رواه ابن ماجه (1567) عن محمد بن إسماعيل بن سمرة، قال: حدثنا المحاربي، عن الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، عن أبي الخير مرثد بن عبد الله اليزني، عن عقبة بن
عامر فذكره. وإسناده صحيح.

قال البوصيري في"زوائد ابن ماجه":"هذا إسناد صحيح رجاله ثقات" ثم ذكر من شواهده حديث أبي هريرة وحديث أبي مرثد.

وأما ما رُوي عن عمرو بن حزم، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تقعدوا على القبور" ففيه رجل مجهول.

رواه النسائي (2045) عن محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، عن شُعيب، قال: حدثنا الليث، قال: حدثنا خالد، عن ابن أبي هلال، عن أبي بكر بن حزم، عن النضر بن عبد الله السلمي، عن عمرو بن حزم فذكره.

والنضر بن عبد الله السَلمي قال فيه الحافظ:"مجهول" والحديث في أطراف مسند الإمام أحمد (5/ 131) من هذا الوجه (لأنه سقط من المسند المطبوع) وله طرق أخرى بلفظ: رآني رسول الله صلى الله عليه وسلم متكئًا على قبر فقال:"لا تؤذِ صاحب هذا القبر" في بعض طرقه ابن لهيعة وفيه كلام معروف.

وفي أحاديث الباب دليل على تحريم الجلوس على قبر المسلم ووطئه، ولكن قال مالك رحمه الله تعالى في الموطأ (1/ 233):"إنه بلغه أن علي بن أبي طالب كان يتوشَّدُ القبور، ويضطجعُ عليها، قال مالك: وإنما نُهي عن القعود على القبور، فيما نُرى للمذاهب" أي يريد قضاء الإنسان حاجته، إلا أن هذا التأويل يرده حديث عقبة بن عامر فإنه سوَّى بين قضاء الحاجة بين القبور، أو وسط السوق - يعني أنه كما يجب الاستحياء من الأحياء، يجب الاستحياء من الأموات فلا يقضي حاجته بين القبور.




উকবাহ ইবনু আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি যদি কোনো জ্বলন্ত কয়লা বা তরবারির উপর দিয়ে হেঁটে যাই, অথবা আমার জুতো আমার পা দিয়ে মেরামত করি, তা আমার কাছে একজন মুসলিমের কবরের উপর দিয়ে হেঁটে যাওয়ার চেয়ে অধিক প্রিয়। আর আমি কোনো পরোয়া করি না যে কবরস্থানের মাঝে আমার প্রয়োজন (প্রস্রাব-পায়খানা) পূর্ণ করি, নাকি বাজারের মাঝে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3682)


3682 - عن بشير بن الخصاصية -وكان اسمه في الجاهلية زحم بن معبد، فهاجر إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال:"ما اسمك؟" قال: زحم، قال:"بل أنت بشير"- قال: بينما أنا أمشي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم مرَّ بقبور المشركين فقال:"لقد سبق هؤلاء خيرًا كثيرًا" ثلاثًا، ثم مر بقبور المسلمين فقال:"لقد أدرك هؤلاء خيرًا كثيرًا" وحانت من رسول الله صلى الله عليه وسلم نظرة فإذا رجل يمشي في القبور عليه نعلان فقال:"يا صاحب السَّبْتّيِتينِ ويحك ألْقِ سَبْتّيتيك" فنظر الرجل، فلما عرف رسول الله صلى الله عليه وسلم خَلعهما فرمى بهما.

حسن: رواه أبو داود (3230)، والنسائي (2048)، وابن ماجه (1568) كلهم من طريق الأسود ابن شيان، عن خالد بن سمير، عن بشير بن نَهِيك، عن بشير بن الخصاصية فذكره ولفظهم قريب.

وإسناده حسن لأجل خالد بن سُمير فإنه حسن الحديث، وثَّقه النسائي والعجلي وغيرهما.

وأخرجه أيضًا ابن حبان (3170)، والحاكم (1/ 373)، والإمام أحمد (20787) كلهم من هذا الوجه، قال الحاكم:"صحيح الإسناد".
ونقل الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن" (4/ 34 - 35) عن الإمام أحمد قال: إسناده جيّد، أذهب إليه إلّا من علّة. ونقل ابنه عبد الله في مسائل أبيه: قال: ورأيته إذا أراد أن يخرج إلى الجنازة لبس خفيه، وكان يأمر بخلع النِّعال في المقابر، وقال: حديث بشير بن الخصاصية، حديث النبيّ صلى الله عليه وسلم.

قال: ورأيت أبي في جنازة ينظر إلى رجل من الجيران وعليه نعلاه يمشي في المقابر نظرًا كأنّه منكر عليه.

وقال: رأيت أبي إذا أراد أن يدخل المقابر خلع نعليه، وربما رأيته أن يذهب إلى الجنازة، ربما لبس خفيه أكثر ذلك وينزع نعليه. انظر مسائل الإمام أحمد (679 - 681).

وقوله: السبتية -نسبة إلى السِبت، وهو جلود البقر المدبوغة بالقرظ يتخذ منها النعال، لأنه سُبِتَ شعرها أي- حُلق وأزيل.




বশীর ইবনুল খাসাসিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (জাহেলী যুগে তাঁর নাম ছিল যুহাম ইবনু মা‘বাদ। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট হিজরত করে আসলে তিনি জিজ্ঞেস করলেন, “তোমার নাম কী?” সে বলল, যুহাম। তিনি বললেন, “না, বরং তুমি বশীর।”) তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হেঁটে যাচ্ছিলাম। তিনি মুশরিকদের কবরের পাশ দিয়ে গেলেন এবং বললেন, “এরা বহু কল্যাণ থেকে বঞ্চিত হয়েছে।” — কথাটি তিনি তিনবার বললেন। এরপর তিনি মুসলিমদের কবরের পাশ দিয়ে গেলেন এবং বললেন, “এরা তো বহু কল্যাণ লাভ করেছে।” এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দৃষ্টি পড়ল যে, এক ব্যক্তি কবরের মধ্য দিয়ে জুতা পরে হেঁটে যাচ্ছে। তিনি বললেন, “ওহে সাব্তিয়া জুতা পরিধানকারী! তোমার জন্য আফসোস! তোমার সাব্তিয়া জুতা জোড়া খুলে ফেলো।” লোকটি তাকাল। যখন সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে চিনতে পারল, তখন সে জুতা জোড়া খুলে ছুঁড়ে ফেলল।









আল-জামি` আল-কামিল (3683)


3683 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن العبد إذا وضع في قبره، وتولى عنه أصحابه إنه يسمع قرعَ نعالهم".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1374)، ومسلم في كتاب الجنة (2870) كلاهما من حديث سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس بن مالك في حديث طويل - انظر جموع إثبات عذاب القبر.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় বান্দাকে যখন তার কবরে রাখা হয় এবং তার সঙ্গীরা তার থেকে চলে যায়, তখনও সে তাদের জুতার আওয়াজ শুনতে পায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3684)


3684 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الميت يسمع حِس النعال إذا ولَّوا عنه الناس مدبرين، ثم يُجلس ويوضع كفنُه في عنقه، ثم يسأل".

حسن: رواه البغوي في"شرح السنة" (5/ 413) بإسناده عن ابن عدي، نا عبد الله بن سعيد، نا أسد بن موسى، نا عنبسة بن سعيد بن كثير، قال: حدثني جدي، عن أبي هريرة فذكره.

قال الشيخ:"كثير جد عنبسة: هو كثير بن عبيد رضيع عائشة مولى أبي بكر".

وإسناده حسن، كثير بن عبيد التيمي روى عنه جمعٌ، وذكره ابن حبان في"الثقات"، ولا يوجد فيه جرح، وليس في حديثه ما يُنكر عليه، فيُحسّن حديثُه إذا كان لحديثه أصلٌ ثابت، وهذا منه.

قال الشّيخ: قوله:"إن الميت بسمع حِسّ النعال" فيه دليل على جواز المشي في النعال بحضرة القبور، وبين ظهرانيها".

وقال أيضًا:"والعامة على أن لا كراهة فيه".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই মৃত ব্যক্তি তার থেকে লোকেরা পিঠ ফিরিয়ে চলে গেলে তাদের জুতার আওয়াজ শুনতে পায়। এরপর তাকে বসানো হয় এবং তার কাফন তার গলায় রাখা হয়। অতঃপর তাকে প্রশ্ন করা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3685)


3685 - عن هشام بن عامر قال: شُكي إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم الجراحات يوم أُحد فقال:
"احفروا وأوسعوا وأحسنوا وادفنوا الاثنين والثلاثة في قبر واحد، وقدِّموا أكثرهم قرآنا".

قال: فمات أبي فقُدم بين يدي رجلين.

وفي رواية: قتل أبي يوم أُحد فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"احفِروا وأوسِعوا وأحسنوا وادفنِوا الاثنين والثلاثة في القبر، وقدِّموا أكثرهم قرآنا"، فكان أبي ثالث ثلاثةِ، وكان أكثرهم قرآنّا فقُدِّم.

صحيح: رواه الترمذي (1713)، وابن ماجه (1560) كلاهما عن أزهر بن مروان، قال: حدثنا عبد الوارث بن سعيد، قال: حدثنا أيوب، عن حُميد بن هلال، عن أبي الدهماء، عن هشام ابن عامر فذكره، واللفظ للترمذي. ولفظ ابن ماجه مختصر.

ورواه النسائي (2017) من وجه آخر عن عبد الوارث، والحديث أخرجه أحمد (16262) من طريق أيوب بإسناده والرواية الثانية عند النسائي.

قال الترمذي:"حسن صحيح، وروى سفيان الثوري وغيره هذا الحديث، عن أيوب، عن حميد بن هلال، عن هشام بن عامر، وأبو الدهماء اسمه قِرفة بن بُهيس أو بيهس" انتهى.

قلت: والرواية الثانية عند أبي داود (3216)، والنسائي (2010) من طريق سفيان كما قال الترمذي، وعند الإمام أحمد (16251)، وأبي داود (3215) من طريق سليمان بن المغيرة، عن حُميد بن هلال به مثله.

اختلف في سماع حميد بن هلال من هشام بن عامر فقال أبو حاتم كما في"المراسيل" (171):"حُميد بن هلال لم يلق هشام بن عامر، يدخل بينه وبين هشام: أبو قتادة العدوي، ويقول بعضهم: عن أبي الدهماء، والحفاظ لا يدخلون بينهم أحدًا حميد عن هشام، قيل له: فأي ذلك أصح؟

قال: ما رواه حماد بن زيد، عن أيوب، عن حُميد، عن هشام، انتهى.

قلت: الظاهر أن حميدًا سمع من هشام بن عامر كما جاء التصريح به في رواية معمر، عن أيوب، عنه قال: أخبرنا هشام بن عامر فذكر الحديث، رواه الإمام أحمد (16261) عن عبد الرزاق، عن معمر بإسناده، وصرح به أيضا الحافظ ابن حجر في"إتحاف المهرة" (13/ 632) وبهذا صحَّ الإسنادان، وأقر الحافظ أيضا في"التلخيص" (2/ 127) تصحيح الترمذي له.




হিশাম ইবনে আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উহুদের যুদ্ধের দিনে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট (নিহত) আহতদের জখমের বিষয়ে অভিযোগ করা হলো। অতঃপর তিনি বললেন: "তোমরা (কবর) খনন করো, প্রশস্ত করো, উত্তম করো এবং দু'জন ও তিনজনকে এক কবরে দাফন করো। আর তাদের মধ্যে যে কুরআনের অধিক হাফিয/অধিক জানতো, তাকে আগে রাখো।" তিনি [হিশাম] বললেন: আমার পিতা ইন্তেকাল করলেন এবং তাকে দু'জন লোকের সামনে (বা আগে) রাখা হলো।

অন্য এক বর্ণনায় আছে: উহুদের দিনে আমার পিতা শহীদ হলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা (কবর) খনন করো, প্রশস্ত করো, উত্তম করো এবং দু'জন ও তিনজনকে এক কবরে দাফন করো। আর তাদের মধ্যে যে কুরআনের অধিক হাফিয/অধিক জানতো, তাকে আগে রাখো।" অতঃপর আমার পিতা ছিলেন তিনজনের মধ্যে তৃতীয়, আর তিনি তাদের মধ্যে কুরআনের অধিক জানতেন। তাই তাকে আগে রাখা হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (3686)


3686 - عن رجل من الأنصار قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في جنازة، فرأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو على القبر يُوصي الحافر:"أوسع من قبل رجليه، أوسع من قبل رأسه".

وفي رواية:"لرُبَّ عَذْقٍ له في الجنة".

حسن: رواه أبو داود (3332) عن محمد بن العلاء، أخبرنا ابن إدريس، أخبرنا عاصم بن كليب، عن أبيه، عن رجل من الأنصار في حديث طويل سيأتي في موضعه.
وإسناده حسن من أجل عاصم وأبيه كليب فهما"صدوقان".

وقد رواه الإمام أحمد (22509، 23465) مطولًا ومختصرًا من أوجه عن عاصم بن كليب بإسناده.

وصحَّح إسناده الحافظ في"التلخيص" (2/ 127).




জনৈক আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে এক জানাযায় বের হয়েছিলাম। আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-কে কবরের পাশে দাঁড়িয়ে খননকারীকে উপদেশ দিতে দেখলাম: "তাঁর পায়ের দিকটা প্রশস্ত করো, তাঁর মাথার দিকটা প্রশস্ত করো।"

অপর এক বর্ণনায় রয়েছে: "হতে পারে জান্নাতে তার জন্য খেজুরের কাঁদি আছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3687)


3687 - عن عامر بن سعد بن أبي وقَّاص أن سعد بن أبي وقاص قال في مرضه الذي هلك فيه: أَلْحِدُوا لي لَحْدًا، وانْصِبُوا عليَّ اللَّبِنَ نصْبًا، كما صُنِع برسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (966) عن يحيى بن يحيى، نا عبد الله بن جعفر المِسْوَرِي، عن إسماعيل بن محمد بن سعد، عن عامر بن سعد بن أبي وقاص فذكره.




সা'দ ইবন আবি ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর যে রোগে মৃত্যুবরণ করেন, সেই রোগশয্যায় বলেছিলেন: "তোমরা আমার জন্য লাহদ (পাশ্বস্থ) কবর খনন করো এবং আমার উপর কাঁচা ইট খাড়াভাবে স্থাপন করো, যেমনটা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জন্য করা হয়েছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (3688)


3688 - عن علي بن أبي طالب قال: غسَّلت النبيَّ صلى الله عليه وسلم فذهبتُ لأنظر ما يكون من الميت، فلم أر شيئًا، وكان طيبًا صلى الله عليه وسلم حيًا وميتًا، وولي دفنه وإجنانه دون الناس أربعة: علي والعباس والفضل وصالح مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولحد لرسول الله صلى الله عليه وسلم لحدًا، ونصب عليه اللبن نصبًا.

صحيح: رواه الحاكم (1/ 362) وعنه البيهقي (3/ 388) من طريق مسدد، ثنا عبد الواحد بن زياد، ثنا معمر، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، قال: قال علي بن أبي طالب فذكره.

ورواه ابن ماجه (1467) عن يحيى بن خذام، قال: حدثنا صفوان بن عيسى، قال: أخبرنا معمر بإسناده مختصرًا، وشيخ ابن ماجه يحيى بن خِذام"مقبول" لأنه توبع.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط الشيخين"، وتعقّبه الذهبي فقال:"فيه انقطاع".

قلت: إن كان يقصد به الانقطاع بين سعيد بن المسيب وبين على ففيه نظر، لأن سعيد بن المسيب ولد بعد مضي سنتين من خلافة عمر - أي في سنة أربع عشرة أو خمس عشرة، وقد ثبت سماعه من عثمان، وإنما اختلف في سماعه من عمر، فكيف لا يصح سماعه من علي بن أبي طالب، على أني لم أجد من نص على عدم سماعه منه.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে গোসল করালাম। আমি চেষ্টা করলাম দেখতে যে মৃত ব্যক্তির শরীর থেকে (সাধারণত যা) বের হয়, তা দেখি কিনা, কিন্তু আমি কিছুই দেখতে পেলাম না। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জীবিত ও মৃত উভয় অবস্থাতেই পবিত্র ছিলেন। সাধারণ মানুষ বাদে কেবল চারজন তাঁর দাফন ও কবরের ব্যবস্থাপনার দায়িত্ব গ্রহণ করেন: আলী, আব্বাস, ফযল এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম সালিহ। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য লাহ্দ (পার্শ্ব-গর্ত বিশিষ্ট কবর) খনন করা হয় এবং তার উপর ইটসমূহ সোজাভাবে গেঁথে দেওয়া হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (3689)


3689 - عن أنس بن مالك قال: لما تُوفي النبي صلى الله عليه وسلم كان بالمدينة رجل يَلْحَدُ، وآخر يُصَرِّحُ فقالوا: نستخير ربَّنا ونبعث إليهما، فأيهما سبق تركناه، فأُرسل إليهما، فسبق صاحبُ اللحدِ، فلحدوا للنبي صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه ابن ماجه (1557) قال: حدثنا محمود بن غيلان، قال: حدثنا هاشم بن القاسم، قال: حدثنا مبارك بن فَضالة، قال: حدثني حُميد الطويل، عن أنس فذكر الحديث.

وهاشم بن القاسم هو أبو النضر شيخ الإمام أحمد، وعنه رواه في مسنده (12415) مثله.
وإسناده حسن من أجل مبارك بن فَضالة فإنه"صدوق يدلس ويُسوي"، قال أبو زرعة: يُدَلِّس كثيرًا فإذا قال:"حدثنا" فهو ثقة، وقد صرَّح هنا بالحديث، وبقية رجاله ثقات، وقد حسنه الحافظ في"التلخيص" (2/ 128).

وقال البوصيري:" إسناده صحيح ورجاله ثقات" والصواب كما قلت.

وجاء في بعض الروايات أن الذي يُصرح هو: أبو عبيدة، وأن الذي كان يلحد هو: أبو طلحة.

وقوله:"يلحد" هو عمل الشق الذي يُعمل في جانب القبر لموضع الميت، لأنه أمْيل عن وسط القبر إلى جانبه.

و"يُضرح" وهو عمل الضريح، وهو القبر، من الضرح وهو الشقُّ في الأرض.

وأبو عبيدة هو ابن الجرَّاح، وهو عامر بن عبد الله بن الجراح القرشي المكي شهد له النبي صلى الله عليه وسلم بالجنة، وسماه أمين الأمة، وله مناقب كثيرة توفي سنة ثمان عشرة في طاعون عَمَواس.

وأبو طلحة هو زيد بن سهل الخزرجي النجاري الأنصاري، من بني أحوال النبي صلى الله عليه وسلم، أحد أعيان البدريين، وأحد النقباء الاثني عشر ليلة العقبة، وله مناقب كثيرة توفي سنة أربع وثلاثين.




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তিকাল করলেন, তখন মদীনায় একজন লোক ছিলেন যিনি 'লাহ্দ' (পার্শ্বীয় কবর) খনন করতেন এবং আরেকজন ছিলেন যিনি 'শরহ্' (মাঝখানে সরল কবর) খনন করতেন। সাহাবাগণ বললেন: আমরা আমাদের রবের কাছে কল্যাণ কামনা করে ইস্তিখারা করব এবং তাদের দুজনের কাছে লোক পাঠাব। তাদের মধ্যে যে আগে আসবে, আমরা তাকেই গ্রহণ করব। এরপর তাদের দুজনের কাছেই লোক পাঠানো হলো। অতঃপর 'লাহ্দ' খননকারী ব্যক্তিই আগে পৌঁছলেন। ফলে তাঁরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য লাহ্দ কবর খনন করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3690)


3690 - عن عائشة قالت: كان بالمدينة حفاران، أحدهما يلحد، والآخر يشق فانتظروا أن يجيء أحدهما فجاء الذي يلحد، فلحد لرسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه ابن سعد (2/ 295) عن يزيد بن هارون وهشام أبي الوليد الطيالسي، قال يزيد: قال أخبرنا، وقال هشام: أخبرنا حماد بن سلمة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة فذكرته وإسناده صحيح. ورواه مالك في الموطأ عن هشام بن عروة، عن أبيه مرسلًا.

وأما ما رواه ابن ماجه (1558) من وجه آخر عن عائشة قالت: لما مات رسول الله صلى الله عليه وسلم اختلفوا في اللحد والشق حتى تكلموا في ذلك، وارتفعتْ أصواتُهم، فقال عمر: لا تَصخبوا عند رسول الله صلى الله عليه وسلم حيًّا ولا ميتًا، أو كلمة نحوها، فأَرْسِلوا إلى الشَقَّاق واللاحِد جميعًا فجاء اللاجِدُ، فلحد لرسول الله صلى الله عليه وسلم، ثم دُفن صلى الله عليه وسلم، ففي إسناده عبيد بن طفيل المُقري قال فيه الحافظ:"مجهول" وشيخه عبد الرحمن بن أبي مليكة القرشي وهو عبد الرحمن بن أبي بكر بن عبيد الله بن أبي مليكة قال فيه الحافظ:"ضعيف" وضعَّفه أيضًا في"التلخيص" (2/ 128).

وأما البوصيري فلم يتنبه فقال:"إسناده صحيح رجاله ثقات".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মদীনায় দুজন কবর খননকারী ছিল। তাদের একজন 'লাহদ' (কবরের পার্শ্বস্থ কুলঙ্গি) খনন করত এবং অপরজন 'শাক্ক' (মাঝখান চেরা) খনন করত। তারা উভয়ের মধ্য থেকে একজনের আসার অপেক্ষা করলেন। অতঃপর যে লাহদ খনন করত, সে আসল এবং সে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য লাহদ খনন করল।









আল-জামি` আল-কামিল (3691)


3691 - عن عبد الله بن عباس قال: دخل قبر رسول الله صلى الله عليه وسلم العباس وعلي والفضل، وشق لحدَه رجل من الأنصار، وهو الذي يشُق لحود قبور الشّهداء.

صحيح: رواه ابن الجارود في"المنتفى" (547) عن محمد بن عبد الملك بن زنجويه، قال: ثنا أبو بدر شجاع بن الوليد، قال: ثني زياد بن خيثمة، قال: أني إسماعيلُ السدي، عن عكرمة، عن
ابن عباس فذكره.

وأما ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"اللحد لنا، والشق لغيرنا" فهو ضعيف. رواه أبو داود (3208)، والترمذي (1045)، والنسائي (2009)، وابن ماجه (1554) كلهم من طرق، عن حُكَّام ابن سَلْم الرازي، عن علي بن عبد الأعلى، عن أبيه، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس فذكره.

وضعَّفه النووي في"الخلاصة" (3616) وقال:"مداره على عبد الأعلى بن عامر وهو ضعيف" وبه ضعَّفه الحافظ في"التلخيص" (2/ 127).

قلت: عبد الأعلى بن عامر الثعلبي الكوفي ضعَّفه جمهور أهل العلم، منهم أحمد وأبو زرعة وأبو حاتم، والنسائي وابن عدي ويحيى بن سعيد والعقلي ويعقوب بن سفيان، وابن سعد وغيرهم، نقل أقوالهم الحافظ في"التهذيب" وقال في نهاية الترجمة:"وصحَّح الطبري حديثه في الكسوف، وحسَّن له الترمذي، وصحَّح له الحاكم وهو من تساهله" انتهى.

فالخلاصة فيه أنه:"ضعيف".

وأما الترمذي فقال فيه:"حسن غريب من هذا الوجه" وهو الذي أشار إليه الحافظ آنفًا، ولعل تحسين الترمذي يعود إلى شواهده. وأما ولده علي فهو أحسن حالًا من أبيه، فقد وثَّقه البخاري، وقال أحمد والنسائي: ليس به بأس، وذكره ابن حبان في"الثقات".

وكذلك لا يصح ما رُوي عن جرير بن عبد الله البجلي مرفوعًا:"اللحد لنا، والشق لغيرنا" رواه ابن ماجه (1555) وفيه أبو اليقظان واسمه عثمان بن عمير وهو متفق على ضعفه، كما قال البوصيري.

ورواه الإمام أحمد (19158) وفيه الحجاج - وهو ابن أرطاة وفيه كلام معروف، وله طريق آخر عند الإمام أحمد (19177) وفيه ثابت وهو ابن أبي صفية أبو حمزة الشمالي وهو" ضعيف رافضي" كما قال الحافظ في" التقريب"، ورواه أيضًا الإمام أحمد (18176) في سياق طويل وفيه أبو جناب وهو يحيى بن أبي حية الكلبي ضعيف. انظر"التلخيص" (2/ 127).

وقال النووي في"الخلاصة" (3617):"رواه أحمد وابن ماجه من رواية جرير وهو ضعيف أيضًا".

والخلاصة أني لم أقف على سند صحيح أو حسن لحديث جرير بن عبد الله البجلي إلا أن يقال إن هذه الأسانيد يُقوي بعضُها بعضًا.

وكذلك لا يصح إسناد ما رُوي عن عائشة وابن عمر أن النبي- صلى الله عليه وسلم أُلحد له لحد، والحديث صحيح.

رواه الإمام أحمد (4762) عن وكيع، حدثنا العمري، عن نافع، عن ابن عمر وعن عبد الرحمن ابن القاسم، عن أبيه، عن عائشة.

وإسناده ضعيف من أجل العُمري: وهو عبد الله بن عمر بن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب أبو عبد الرحمن المدني، قال النسائي: ضعيف الحديث. وقال ابن حبان: كان ممن غلب عليه الصلاح حتى غفل عن الضبط، ومشاه بعض أهل العلم فقال ابن عدي: لا بأس به في
رواياته، صدوق، وروى له مسلم، ولذا قال الحافظ الهيثمي في"المجمع" (3/ 42):"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح".

والخلاصة أن النبي صلى الله عليه وسلم لُحد له، واللحد والشق كلاهما جائز.

قال النووي في"المجموع" (5/ 287):"أجمع العلماءُ أن الدفن في اللحد والشق جائزان، لكن إن كانت الأرض صلبةً لا ينهار ترابُها فاللحد أفضل لما سبق من الأدلة، وإن كانت رخوةً تنهار فالشق أفضل".




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কবরে প্রবেশ করেছিলেন আল-আব্বাস, আলী এবং আল-ফাদল। আর আনসারদের একজন লোক তাঁর লাহদ (নাকের মতো একপাশ কাটা কবর) খনন করেছিলেন। তিনি সেই ব্যক্তি যিনি শহীদদের কবরের লাহদ খনন করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3692)


3692 - عن جابر بن عبد الله أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يجمع بين الرجلين من قتلى أُحد في ثوب واحد، ثم يقول:"أيهم أكثر أخذا للقرآن؟" فإذا أشير له إلى أحدهما قدمه في اللحد، وقال:"أنا شهيد على هؤلاء" وأمر بدفنهم بدمائهم، ولم يُصل عليهم ولم يغسلهم.

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1347) عن ابن مقاتل، أخبرنا عبد الله، أخبرنا الليث بن سعد، حدثني ابن شهاب، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن جابر بن عبد الله فذكره.

ورواه الأوزاعي عن الزهري، عن جابر بن عبد الله قال: كان النبي صلى الله عليه وسلم يقول لقتلى أُحد:"أي هؤلاء أكثر أخذًا للقرآن؟" فإذا أشير له إلى رجل قدَّمه في اللحد قبل صاحبه. قال جابر: فكفِّن أبي وعمي في نمِرة واحدة.

وقال سليمان بن كثير: حدثني الزهري، حدثني من سمع جابرًا.

ولا يؤثر حذف الأوزاعي شيخ الزهري، ولا إبهام سليمان بن كثير، فإن الليث بن سعد قد ذكر شيخ الزهري بأنه عبد الرحمن بن كعب بن مالك، والحجة لمن ضبط وزاد وهو ثقة.

وأما ما رُوي عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم مرَّ على حمزة وقد مُثِّل به فقال:"لولا أن تجد صفيةُ في نفسها لتركتُه حتى تأكله العافيةُ حتى يُحشر من بطونها" وقلَّت الثيابُ، وكثُرتِ القتلى، فكان الرجل والرجلان والثلاثة يكفنون في الثوب الواحد، ثم يدفنون في قبر واحد، فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يسأل:"أيهم أكثر قرآنا"؟ فيقدِّمه إلى القبلة. فهو خطأ.

رواه أبو داود (3136)، والترمذي (1016) كلاهما عن قتيبة بن سعيد، حدثنا أبو صفوان، عن أسامة بن زيد، عن ابن شهاب، عن أنس بن مالك فذكر الحديث واللفظ لأبي داود وزاد الترمذي بعد قوله"من بطونها": ثم دعا بنمرة فكفَّنه فيها، فكانت إذا مُدَّت على رأسه بدَتْ رجلاه، وإذا مُدَّت على رجليه بدا رأسُه".

وزاد أيضًا بعد قوله:"فيقدمه إلى القبلة""فدفنهم رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولم يصل عليهم". وقال:"حسن غريب، لا نعرفه من حديث أنس إلا من هذا الوجه، وقد خولف أسامة بن زيد في رواية
هذا الحديث. فروى الليث بن سعد، عن ابن شهاب، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن جابر بن عبد الله بن زيد، وروى معمر، عن الزهري، عن عبد الله بن ثعلبة، عن جابر، ولا نعلم أحدًا ذكره عن الزهري عن أنس إلا أسامة بن زيد، وسألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: حديث الليث، عن ابن شهاب، عن عبد الرحمن بن كعب بن مالك، عن جابر أصح" انتهى كلام الترمذي.

ونقل المنذري عن الدارقطني أنه قال:"تفرد به أسامة بن زيد، عن الزهري، عن أنس بهذه

الألفاظ، رواه عثمان بن عمر، عن أسامة، عن الزهري، عن أنس وزاد فيه حرفًا لم يأت به غيره"، وقال في موضع آخر:"لم ينقل هذه اللفظة غير عثمان بن عمر، وليس بمحفوظ، وقال البخاري:"وحديث أسامة بن زيد هو غير محفوظ، غلط فيه أسامة بن زيد".

ثم أجاب المنذري عن هذه العلة إلا أن إجابته ضعيفة، لأن كون الراوي من رجال البخاري أو مسلم لا يجعله حجة إنْ أخطأ. انظر أيضًا باب أن الشهيد لا يُغسَّل ولا يُصلى عليه.

قلت: حديث عثمان بن عمرو رواه أبو داود (3137) عن العباس العنبري، عنه، عن أسامة، عن الزهري، عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم مر بحمزة، وقد مُثِّل به، ولم يصل على أحد من الشهداء غيره، ورواه الحاكم (1/ 365) من وجهين آخرين عن عثمان بن عمر وروح بن عبادة به. وهي زيادة غير محفوظة لأن الصحيح الثابت أنه لم يُصل على أحد من قتلى أُحد.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উহুদের শহীদদের মধ্য থেকে দু’জন পুরুষকে একটি কাপড়ে একত্রিত করতেন। তারপর বলতেন: “তাদের মধ্যে কে কুরআন সম্পর্কে বেশি জ্ঞান রাখত (বা বেশি মুখস্থকারী ছিল)?” যখন তাকে তাদের মধ্যে একজনের দিকে ইঙ্গিত করা হতো, তিনি তাকে কবরের গর্তে (লাহাদে) আগে রাখতেন, এবং বলতেন: “আমি এদের উপর সাক্ষী।” আর তিনি তাদেরকে তাদের রক্তসহ দাফন করার নির্দেশ দেন, তাদের উপর জানাযা পড়েননি এবং তাদের গোসলও দেননি।

সহীহ: এটি বুখারী (জানাইয, ১৩৪৭) ইবনু মুকাতিল থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ থেকে, তিনি লাইস ইবনু সা‘দ থেকে, তিনি ইবনু শিহাব থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু কা‘ব ইবনু মালিক থেকে, তিনি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।

আর এটি আওযাঈ যুহরী থেকে, তিনি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উহুদের শহীদদের সম্পর্কে বলতেন: “এদের মধ্যে কে কুরআন সম্পর্কে বেশি জ্ঞান রাখত?” যখন তাঁকে একজনের দিকে ইঙ্গিত করা হতো, তিনি তাকে তার সঙ্গীর আগে কবরের গর্তে রাখতেন। জাবির বলেন: আমার পিতা ও আমার চাচাকে একটিই মাত্র কাপড়ে কাফন দেওয়া হয়েছিল।

সুলাইমান ইবনু কাছীর বলেন: যুহরী আমার কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন, আমার কাছে এমন একজন হাদীস বর্ণনা করেছেন, যিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে শুনতে পেয়েছেন।

যুহরীর শাইখ আওযাঈ-কে বাদ দেওয়া অথবা সুলাইমান ইবনু কাছীর-এর ক্ষেত্রে বর্ণনাকারীর নাম অস্পষ্ট থাকা কোনো প্রভাব ফেলে না। কারণ, লাইস ইবনু সা‘দ যুহরীর শাইখের নাম আব্দুর রহমান ইবনু কা‘ব ইবনু মালিক বলে উল্লেখ করেছেন। আর যিনি বিশ্বস্ততা সহকারে কোন সংযোজন করেছেন, তাঁর কথাই প্রমাণ হিসেবে গৃহীত হবে।

আর আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে, যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, আর তাঁর অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ বিকৃত করা হয়েছিল। তখন তিনি বললেন: “যদি সাফিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কষ্ট না পেতেন, তবে আমি তাকে এভাবেই রেখে দিতাম, যাতে প্রাণীগুলো তাকে খেতে পারে, এমনকি তাদের পেট থেকে তিনি পুনরুত্থিত হবেন।” কাপড় কম ছিল এবং শহীদদের সংখ্যা বেশি ছিল। ফলে এক, দুই বা তিনজনকে একটি কাপড়ে কাফন দেওয়া হতো, অতঃপর একটি কবরে তাদের দাফন করা হতো। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জিজ্ঞেস করতেন: “তাদের মধ্যে কে বেশি কুরআনের জ্ঞান রাখত?” অতঃপর তাকে কিবলার দিকে এগিয়ে দিতেন।— এটি ভুল।

এটি আবূ দাঊদ (৩১৩৬) ও তিরমিযী (১০১৬) দু’জনই কুতাইবাহ ইবনু সাঈদ থেকে, তিনি আবূ সাফওয়ান থেকে, তিনি উসামাহ ইবনু যাইদ থেকে, তিনি ইবনু শিহাব থেকে, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। হাদীসের শব্দগুলো আবূ দাঊদের। তিরমিযী “তাদের পেট থেকে” এই উক্তির পরে আরও যোগ করেছেন: “অতঃপর তিনি একটি চাদর চাইলেন এবং তাকে তাতে কাফন দিলেন। যখন চাদরটি তার মাথার দিকে টানা হতো তখন পা দুটি বের হয়ে যেত, আর যখন পা দুটির দিকে টানা হতো তখন মাথা বের হয়ে যেত।”

আর তিনি “তাকে কিবলার দিকে এগিয়ে দিতেন” এই উক্তির পরেও আরও যোগ করেছেন: “রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদেরকে দাফন করলেন, আর তাদের উপর জানাযা পড়লেন না।” তিনি (তিরমিযী) বলেছেন: “এটি হাসান গারীব। আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস হিসেবে এই সূত্র ছাড়া আমাদের তা জানা নেই। আর এই হাদীস বর্ণনায় উসামাহ ইবনু যাইদ-এর বিরোধিতা করা হয়েছে। লাইস ইবনু সা‘দ ইবনু শিহাব থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু কা‘ব ইবনু মালিক থেকে, তিনি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু যাইদ থেকে বর্ণনা করেছেন। আর মা‘মার যুহরী থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু সা‘লাবাহ থেকে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। যুহরী থেকে আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে উসামাহ ইবনু যাইদ ছাড়া আর কেউ এটি বর্ণনা করেছেন বলে আমরা জানি না। আমি মুহাম্মাদ (বুখারী)-কে এই হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বলেন: লাইস ইবনু সা‘দ ইবনু শিহাব থেকে, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু কা‘ব ইবনু মালিক থেকে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যে বর্ণনা করেছেন, সেটিই অধিকতর সহীহ।” – তিরমিযীর কথা এখানে শেষ হলো।

মুনযিরী দারাকুতনী থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি বলেন: “এই শব্দগুলোসহ যুহরী থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে উসামাহ ইবনু যাইদ একাই বর্ণনা করেছেন। উসমান ইবনু উমার উসামাহ থেকে, তিনি যুহরী থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন এবং এতে একটি অতিরিক্ত শব্দ যোগ করেছেন, যা তিনি ছাড়া আর কেউ বর্ণনা করেননি।” তিনি অন্য স্থানে বলেছেন: “এই শব্দগুলো উসমান ইবনু উমার ছাড়া কেউ বর্ণনা করেননি, আর এটি মাহফূয নয়।” আর বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: “উসামাহ ইবনু যাইদ-এর হাদীসটি মাহফূয নয়, উসামাহ ইবনু যাইদ এতে ভুল করেছেন।”

অতঃপর মুনযিরী এই ত্রুটির উত্তর দিয়েছেন, কিন্তু তাঁর উত্তর দুর্বল। কারণ বর্ণনাকারী বুখারী বা মুসলিমের রাবী হওয়া সত্ত্বেও যদি ভুল করেন, তবে সেটি প্রমাণ হিসেবে গণ্য হবে না। শহীদকে গোসল করানো হবে না এবং তার উপর জানাযা পড়া হবে না— এই অধ্যায়টিও দেখুন।

আমি (আলবানী) বলি: উসমান ইবনু আমর-এর হাদীস আবূ দাঊদ (৩১৩৭) আব্বাস আল-আনবারী থেকে, তিনি তাঁর থেকে, তিনি উসামাহ থেকে, তিনি যুহরী থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হামযা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, আর তাঁর অঙ্গ-প্রত্যঙ্গ বিকৃত করা হয়েছিল, আর শহীদদের মধ্যে শুধু তাঁর উপরই জানাযা পড়েছিলেন। আর হাকিম (১/৩৬৫) উসমান ইবনু উমার ও রূহ ইবনু উবাদাহ থেকে আরো দুটি সূত্রে বর্ণনা করেছেন। এই সংযোজনটি অসংরক্ষিত (গাইরু মাহফূয), কারণ সহীহভাবে প্রমাণিত হলো এই যে, উহুদের শহীদদের কারো উপরই তিনি জানাযা পড়েননি।









আল-জামি` আল-কামিল (3693)


3693 - عن جابر بن عبد الله قال: أتى رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عبد الله بن أُبيّ بعد ما أُدْخل حُفْرتَه، فأمر به فأخرج، فوضعه على رُكْبتيه، ونَفَثَ عليه من ريقة، وألبسه قميصه، فالله أعلم وكان (أي عبد الله بن أُبيّ) كسا عبَّاسًا قميصًا.

قال سفيان: وقال أبو هريرة: وكان على رسول الله صلى الله عليه وسلم قميصان، فقال له ابن عبد الله: يا رسول الله! ألْبِس أبي قميصك الذي يلي جلْدك.

قال سفيان: فيَروْن أن النبي صلى الله عليه وسلم ألْبس عبد الله قميصه مكافأة لما صنع.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1350)، ومسلم في صفات المنافقين (2773) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن عمرو قال: سمعت جابر بن عبد الله يقول: فذكر الحديث واللفظ للبخاري، ولم يذكر مسلم بعد قوله:"فالله أعلم".

ورواه البخاري (1270) من وجه آخر عن عمرو وفيه: أتى النبيُ صلى الله عليه وسلم عبد الله بن أُبيّ بعد ما دفن. فأخرجه فنفث فيه …

وقوله:"بعد ما دفن عبد الله بن أُبيّ"أي وضع في حفرته كما في الرواية الأولى، لا أنه دُفن ورمي عليه التراب، وكان أهل عبد الله بن أُبيّ خشوا على رسول الله صلى الله عليه وسلم المشقةَ في حضوره،
فبادروا إلى تجهيزه قبل وصول النبي صلى الله عليه وسلم، فلما وصل وجدهم قد دلوه في حفرته، فأمر بإخراجه إنجازًا لوعده في تكفينه في القميص والصلاة عليه.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবদুল্লাহ ইবনে উবাইয়ের কাছে আসলেন যখন তাকে তার কবরের গর্তে রাখা হয়েছিল। অতঃপর তিনি নির্দেশ দিলেন এবং তাকে বের করা হলো। তিনি তাকে নিজের দুই হাঁটুর উপর রাখলেন, তার উপর নিজের পবিত্র মুখের লালা ছিটিয়ে দিলেন, এবং তাকে নিজের জামা পরিয়ে দিলেন। আর আল্লাহই ভালো জানেন, (আবদুল্লাহ ইবনে উবাই) আব্বাসকে একটি জামা পরিয়েছিলেন। সুফিয়ান বলেন, আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট দুটি জামা ছিল। তখন আবদুল্লাহ ইবনে আবদুল্লাহ (আবদুল্লাহ ইবনে উবাইয়ের পুত্র) তাঁকে বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আপনার চামড়ার সাথে লেগে থাকা জামাটি আমার পিতাকে পরিয়ে দিন। সুফিয়ান বলেন, লোকেরা মনে করে যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবদুল্লাহকে তার জামাটি পরিয়েছিলেন তার (আব্বাসের প্রতি) উপকারের প্রতিদানস্বরূপ।









আল-জামি` আল-কামিল (3694)


3694 - عن جابر بن عبد الله قال: لما حضر أُحُد دعاني أبي من الليل فقال: ما أُراني إلا مقتولًا في أولِ من يُقتل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم، وإني لا أترك بعدي أعزَّ عليَّ منك، غيرَ نفْس رسول الله صلى الله عليه وسلم، وإن عليَّ دينا فاقض، واستَوصِ بأخواتِك خيرًا، فأصبحنا فكان أول قتيلٍ، ودفن معه آخر في قبر، ثم لم تَطِبْ نفسي أن أتركه مع الآخر، فاستخرجتُه بعد ستة أشهر، فإذا هو كيوم وضعتُه هُنيَّةً، غير أُذنِه.

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1351) عن مسدد، أخبرنا بشر بن المفضَّل، حدثنا حسين المعلم، عن عطاء، عن جابر فذكره.

والرجل الثاني في القبر هو: عمرو بن الجموح بن زيد بن حرام الأنصاري، وكان صديق والد جابر، وزوج أخته هند بنت عمرو.

قال ابن إسحاق في المغازي: حدثني أبي، عن رجال من بني سلمة أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: حين أصيب عبد الله بن عمرو، وعمرو بن الجموح:"اجمعوا بينهما، فإنهما كانا متصادقين في الدنيا".

انظر للمزيد: افتح الباري (3/ 2




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন উহুদের যুদ্ধ উপস্থিত হলো, তখন আমার পিতা রাতে আমাকে ডাকলেন এবং বললেন, আমি মনে করি আমিই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীদের মধ্যে প্রথম শহীদদের অন্তর্ভুক্ত হব। আমার পরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সত্তা ছাড়া তোমার চেয়ে প্রিয় আর কাউকে রেখে যাচ্ছি না। আর আমার উপর ঋণ রয়েছে, তুমি তা পরিশোধ করে দিও এবং তোমার বোনদের প্রতি উত্তম আচরণের উপদেশ দিলাম। এরপর সকাল হলো এবং তিনিই প্রথম শহীদ হলেন। অন্য একজনকে তার সাথে এক কবরে দাফন করা হলো। এরপর অন্যজনের সাথে তাকে রেখে যেতে আমার মন সায় দিল না, তাই ছয় মাস পর আমি তাকে কবর থেকে বের করলাম। তখন দেখা গেল, তার কানের সামান্য অংশ ছাড়া (বাকি পুরো শরীর) ঠিক তেমনই আছে, যেমন তাকে সেই দিন দাফন করা হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (3695)


3695 - عن المطلب قال: لما مات عثمان بن مظعون أخرج بجنازته، فدُفن، فأمر النبي صلى الله عليه وسلم رجلًا أن يأتيه بحجر، فلم يستطع حمله، فقام إليها رسول الله صلى الله عليه وسلم وحسر عن ذراعيه، قال كثير: قال المطلب: قال الذي يخبرني ذلك عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: كأني أنظر إلى بياض ذراعي رسول الله صلى الله عليه وسلم حين حسر عنهما، ثم حملها فوضعها عند رأسه وقال:"أَتَعَلَّمُ بها قبر أخي، وأُدفن إليه من مات من أهلي".

حسن: رواه أبو داود (3206) من طريقين عن كثير بن زيد المدني، عن المطلب فذكره. وكثير ابن زيد مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وقال الحافظ في"التلخيص" (2/ 133):"وإسناده حسن ليس فيه إلا كثير بن زيد راويه عن المطلب وهو"صدوق"، وقد بين المطلب أن مخبرًا أخبره به ولم يُسمه، ولا يضر إبهام الصحابي".

وأما ما رُوي عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أعلم قبر عثمان بن مظعون بصخرة فهو خطأ، رواه ابن ماجه (1561) من وجه آخر عن كثير بن زيد، عن زينب بنت نُبيط، عن أنس.

قال الحافظ في"التلخيص" (2/ 133 - 134):"وقال أبو زرعة:"هذا خطأ، وأشار إلى أن الصواب رواية من رواه عن كثير عن المطلب".
وقال أيضًا:"ورواه الطبراني في"الأوسط" من حديث أنس بإسناد آخر فيه ضعف، ورواه الحاكم في"المستدرك" في ترجمة عثمان بن مظعون بإسناد آخر فيه الواقدي من حديث أبي رافع فذكر معناه" انتهى.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد الله بن محمد بن عمر، عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم رش قبر ابنه إبراهيم، زاد ابن عمر في حديثه. وإنه أول قبر رُشَّ عليه. وإنه قال حين دفن وفرغ منه عند رأسه:"سلام عليكم" ولا أعلمه إلا قال: حثا عليه بيده ولم يقل القعنبي: ابن عمر

رواه أبو داود في"المراسيل" (414) عن عبد الله بن مسلمة بن قعنب، وعبد الله بن عمر بن محمد ابن أبان بن صالح، أن عبد العزيز بن محمد حدثهم، عن عبد الله بن محمد بن عمر، عن أبيه فذكره.

وعبد الله بن محمد بن عمر هو: ابن علي بن أبي طالب أبو محمد العلوي المدني، قال فيه الحافظ:"مقبول" أي حيث يتابع، ولم يتابع فهو ليِّن الحديث، وأبوه محمد بن عمر بن علي بن أبي طالب"صدوق" وروايته عن رسول الله صلى الله عليه وسلم مرسلة.

وكذلك لا يصح ما رواه الشافعي في مسنده (360) وعنه البيهقي (3/ 411) عن إبراهيم بن محمد، عن جعفر بن محمد، عن أبيه أن النبي صلى الله عليه وسلم رش قبر إبراهيم ابنه، ووضع عليه حصباء.

قال الشافعي: والحصباء لا تثبت إلا على قبر مسطح. انتهى.

وإبراهيم بن محمد هو: ابن أبي يحيى الأسلمي متهم مع الإرسال.

وكذلك لم يثبت رش الماء على قبر النبي صلى الله عليه وسلم، رواه البيهقي من حديث جابر وكان الذي رش بلال بن رباح بدأ من قبل رأسه من شقه الأيمن حتى انتهى إلى رجليه، وفي إسناده الواقدي، قاله الحافظ"التلخيص" (2/ 133) وفيه حديث آخر إلا أنه مرسل.




আল-মুত্তালিব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন উসমান ইবনু মাযঊন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মারা গেলেন, তখন তাঁর জানাযা বের করা হলো এবং তাঁকে দাফন করা হলো। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এক ব্যক্তিকে একটি পাথর আনতে আদেশ করলেন। কিন্তু সে তা বহন করতে পারল না। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেটির কাছে দাঁড়ালেন এবং তাঁর উভয় বাহু উন্মোচন করলেন। কাছীর (নামের রাবী) বলেন, মুত্তালিব বলেছেন, যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে এ সংবাদ আমাকে দিয়েছেন, তিনি বলেছেন: আমার যেন মনে হচ্ছে, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের বাহুদ্বয় উন্মোচিত করার সময় সেগুলোর শুভ্রতা দেখতে পাচ্ছি। এরপর তিনি সেটি বহন করে তাঁর (উসমানের) মাথার কাছে রাখলেন এবং বললেন: "এর মাধ্যমে আমি আমার ভাইয়ের কবর চিহ্নিত করে রাখব, আর আমার পরিবারের যে কেউ মারা যাবে, তাকে যেন তার পাশেই দাফন করা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3696)


3696 - عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الله حرَّم مكة، فلم تحِلَّ لأحد قبلي، ولا تَحِلُّ لأحد بعدي، وإنما أُحِلَّتْ لي ساعة من نهار، لا يُختلي خلاها، ولا يُعْضَدُ شجرها، ولا يُنَفَّر صيدُها، ولا تُلْتقط لُقَطَتُها إلا لمعرف" فقال العباس: يا رسول الله! إلا الإذْخِر لصاغتنا وقبورنا، فقال:"إلا الإذْخِر".

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1349) عن محمد بن عبد الله بن حوشب، حدثنا عبد الوهاب، حدثنا خالد، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره. ورواه الشيخان - البخاري (1834)، ومسلم (1353) كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن مجاهد، عن طاوس، عن ابن عباس في سياق أطول وسيأتي في موضعه إن شاء الله.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবীজি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ্‌ মক্কাকে সম্মানিত (হারাম) করেছেন। সুতরাং আমার পূর্বে এটি কারো জন্য হালাল হয়নি, আর আমার পরেও এটি কারো জন্য হালাল হবে না। তবে দিনের কিছু সময়ের জন্য এটিকে শুধু আমার জন্য হালাল করা হয়েছিল। এর ঘাস কাটা যাবে না, এর গাছ কাটা যাবে না, এর শিকারকে তাড়ানো যাবে না, আর এর হারানো বস্তু শুধুমাত্র (মালিককে) চিনিয়ে দেওয়ার উদ্দেশ্য ছাড়া উঠানো যাবে না।" তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! ইযখির (নামক ঘাস) ব্যতীত; কারণ তা আমাদের কামারশালা ও আমাদের কবরের জন্য প্রয়োজন।" তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইযখির ব্যতীত।"









আল-জামি` আল-কামিল (3697)


3697 - عن ابن عباس قال: جُعل في قبر النبي صلى الله عليه وسلم قطيفةٌ حمراءُ.
صحيح: رواه مسلم في الجنائز (967) من طرق، عن شعبة، قال: حدثنا أبو جمرة، عن ابن عباس فذكره. قال مسلم: أبو جمرة - اسمه نصر بن عمران.

قال القرطبي في"المفهم" (2/ 627):"هذه القطيفة كان النبي صلى الله عليه وسلم يلبسها، ويفترشها، فلما مات اختلف في أخذها علي وعباس، وتنازعا فيها، فأخذها شُقْران مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم وجعلها في القبر وقال: والله! لا يلبسها أحد بعده أبدًا".

قال النووي:"وقد نص الشافعي وجميع أصحابنا وغيرهم من العلماء على كراهية وضع قطيفة، أو مضربة، أو مخدة ونحو ذلك تحت الميت في القبر".

"وأجابوا عن هذا الحديث: بأن شُقْران انفرد بفعل ذلك لم يوافقه غيره من الصحابة، ولا علموا ذلك، وإنما فعله شُقْران لما ذكرناه عنه من كراهته أن يلبسها أحد بعد النبي صلى الله عليه وسلم، لأن النبي صلى الله عليه وسلم كان يلبسها ويفترشُها، فلم تُطب نفس شُقْران أن يستبدلها أحد بعد النبي صلى الله عليه وسلم وخالفه غيره، فروى البيهقي عن ابن عباس: أنه كره أن يُجعل تحت الميت ثوب في قبره".

"والقطيفة: كساء له خمل". انتهى كلام النووي.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কবরে একটি লাল রঙের মখমলের চাদর (কাতীফা) রাখা হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (3698)


3698 - عن البراء بن عازب قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في جنازة رجل من الأنصار، فانتهينا إلى القبر ولما يلحد، فجلس رسول الله صلى الله عليه وسلم وجلسنا حوله كأنما على رؤوسنا الطير، وفي يده عود ينكت به في الأرض، فرفع رأسه فقال:"استعيذوا بالله من عذاب القبر" مرتين أو ثلاثا، وذكر الحديث بطوله وسيأتي في باب إثبات عذاب القبر.

صحيح: رواه أبو داود (3212)، والنسائي (2003)، وابن ماجه (1548) كلهم من طريق المنهال بن عمرو، عن زاذان، عن البراء فذكره.

وأخرجه أبو داود (4753)، والإمام أحمد (18534) مفصلًا، انظر: إثبات عذاب القبر.

وإسناده صحيح. وأخرجه الحاكم (1/ 37 - 40). وقال: صحيح على شرط الشيخين".




বারা ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে জনৈক আনসারী ব্যক্তির জানাযায় বের হলাম। আমরা কবরের কাছে পৌঁছলাম, তখনো কবর খনন (লাহ্দ) করা হয়নি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসলেন এবং আমরা তার চারপাশে এমনভাবে বসলাম যেন আমাদের মাথার উপরে পাখি বসে আছে। তাঁর হাতে একটি লাঠি ছিল, যা দিয়ে তিনি মাটিতে আঁচড় কাটছিলেন। অতঃপর তিনি মাথা তুলে বললেন: "তোমরা কবরের আযাব থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় প্রার্থনা করো।" তিনি এ কথাটি দুই বা তিনবার বললেন। [তিনি এর পরের দীর্ঘ হাদীসটিও উল্লেখ করলেন।]









আল-জামি` আল-কামিল (3699)


3699 - عن عائشة قالت: إن كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ليتعذرُ في مرضه:"أين أنا اليوم؟ ، أين أنا غدًا؟" استبطاءً ليوم عائشة، فلما كان يومي قبضه الله بين سَحْري ونَحْري، ودُفِن في بيتي.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1389) ومسلم في فضائل الصحابة (2443/ 84) كلاهما من طرق عن هشام، عن عروة، عن عائشة فذكرته، واللفظ للبخاري.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর অসুস্থতার সময় (ব্যস্ততা প্রকাশ করে) জিজ্ঞাসা করতেন: "আজ আমি কোথায় থাকব? আগামীকাল আমি কোথায় থাকব?" (আসলে) তিনি আয়িশার দিনের (অর্থাৎ, তাঁর কাছে থাকার দিনের) প্রতীক্ষায় ছিলেন। অতঃপর যখন আমার দিন এলো, আল্লাহ তাঁকে আমার বুক ও চিবুকের মধ্যবর্তী স্থানে (অর্থাৎ আমার কোলে) ইন্তেকাল করালেন এবং তাঁকে আমার ঘরেই দাফন করা হলো।









আল-জামি` আল-কামিল (3700)


3700 - عن عائشة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال في مرَضه الذي مات فيه:"لعن الله اليهود والنصارى اتخذوا قبور أنبيائهم مسجدًا".

قالت: ولولا ذلك لأبرزوا قبره غير أني أخشى أن يتخذ مسجدًا.

متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1330) ومسلم في المساجد (529) كلاهما من حديث شيبان، عن هلال -هو الوزّان- عن عروة، عن عائشة فذكرتْه.

وقول عائشة في الحديث السابق:"ودُفن في بيتي".

وقولُها في هذا الحديث:"غير أني أخشى"، وفي رواية:"خُشِي"، وفي رواية:"خَشِي" أن يتخذ مسجدًا، ولذا لم يُبرز قبره" يعني لم يُقبر النبي صلى الله عليه وسلم خارجَ البيت حتى لا يكون بارزًا، فهي تبين سبب دفنه صلى الله عليه وسلم في بيتها.

وقد اختلف أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم في موضع دفنه صلى الله عليه وسلم، فمن قائلٍ: يدفن في مكة لأنها مولدُه، ومن قائل: يُدفن في بيت المقدس لأنه مسراه ومبعث الأنبياء ومقابرهم، ومن قائلٍ: يُدفن في بقيع الغرقد لأنه مقابر المسلمين، ومن قائلٍ: يُدفن في بيته.

فجاء أبو بكر خليفة رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأمير المؤمنين، وحسم الخلاف بقوله، كما رواه ابنُ سعد في طبقاته (2/ 292) بإسناد صحيح من حديث عائشة قالت:"لما مات النبي صلى الله عليه وسلم، قالوا: أين يُدفن؟ فقال أبو بكر: في المكان الذي مات فيه". ورواه الترمذي في"الشمائل" (379) والبيهقي في"الدلائل" (7/ 259) من طريق نبيط بن شريط الأشجعي عن سالم بن عبيد -وكانتْ له صحبة-، فذكر حديثًا طويلًا في مرضه صلى الله عليه وسلم، ووفاته، واختلاف الصحابة في دفنه،"قالوا: يا صاحبَ رسول الله! أيُدفن رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال: نعم، قالوا: أين؟ قال: في المكان الذي قبض الله فيه روحَه، فإن الله لم يقبض روحَه إلا في مكانٍ طيب، فعلموا أنْ قد صدق".

قال الحافظ ابن حجر في الفتحه (1/ 529):"إسناده صحيح، لكنه موقوف. وقد رُويَ عنه مرفوعا وهو مخرج في مواضعه".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মৃত্যুশয্যার অসুস্থতার সময় বলেন: "আল্লাহ ইহুদি ও খ্রিস্টানদের অভিশাপ দিয়েছেন, কারণ তারা তাদের নবীদের কবরগুলোকে ইবাদতের স্থান (মসজিদ) বানিয়ে নিয়েছে।"

তিনি (আয়েশা) বললেন: যদি এ কারণ না থাকত, তাহলে তাঁর কবরকে প্রকাশ্য রাখা হতো, কিন্তু আমি আশঙ্কা করি যে সেটাকে ইবাদতের স্থান বানানো হবে।

[হাদিসটি] মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী এটি জানাযা অধ্যায়ে (1330) এবং মুসলিম মাসাজিদ অধ্যায়ে (529) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই শাইবান থেকে, তিনি হিলাল (আল-ওয়াজ্জান) থেকে, তিনি উরওয়াহ থেকে, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।

আর আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসে বলা কথা: "কিন্তু আমি আশঙ্কা করি" (অন্য বর্ণনায়: 'আশঙ্কা করা হয়েছিল'), এই কারণেই তাঁর কবরকে প্রকাশ্য করা হয়নি। এর অর্থ হলো, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঘরের বাইরে কবর দেওয়া হয়নি যাতে তা দৃশ্যমান ও উন্মুক্ত না থাকে। এভাবেই তিনি (আয়েশা) তাঁর ঘরে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দাফন করার কারণ বর্ণনা করেছেন।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দাফনের স্থান নিয়ে সাহাবীগণের মধ্যে মতপার্থক্য দেখা দিয়েছিল। কেউ বলছিলেন: তাঁকে মক্কায় দাফন করা হোক, কারণ এটি তাঁর জন্মস্থান। কেউ বলছিলেন: বায়তুল মাকদিসে দাফন করা হোক, কারণ এটি তাঁর মি'রাজের স্থান এবং নবীদের কেন্দ্র ও তাদের কবরস্থান। কেউ বলছিলেন: তাঁকে বাকী আল-গারকাদে দাফন করা হোক, কারণ এটি মুসলমানদের কবরস্থান। আবার কেউ বলছিলেন: তাঁকে তাঁর ঘরে দাফন করা হোক।

অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খলিফা ও আমীরুল মুমিনীন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে তাঁর বক্তব্যের মাধ্যমে এই বিরোধ নিষ্পত্তি করেন। আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন, তারা (সাহাবীগণ) বললেন: তাঁকে কোথায় দাফন করা হবে? তখন আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যে স্থানে তিনি ইন্তেকাল করেছেন।"

সালেম ইবনু উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত দীর্ঘ একটি হাদীসে এই ঘটনা উল্লেখ আছে, যেখানে সাহাবীগণ তাঁর কাছে জিজ্ঞাসা করেন: "হে আল্লাহর রাসূলের সাথী! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কি দাফন করা হবে?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" তারা বললেন: "কোথায়?" তিনি বললেন: "যেখানে আল্লাহ তাঁর রূহ কবজ করেছেন, কারণ আল্লাহ কোনো উত্তম স্থান ছাড়া তাঁর রূহ কবজ করেননি।" তখন তারা বুঝতে পারলেন যে তিনি সত্য বলেছেন।