হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3701)


3701 - عن عمرو بن ميمون الأوْدي قال: رأيتُ عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال: يا عبد الله بن عمر! اذهب إلى أمِّ المؤمنين عائشة رضي الله عنها فقل: يقرأ عمر بن الخطاب عليكِ السلام، ثم سلها أن أُدْفن مع صاحبيّ، قالت: كنتُ أريد لنفسي، فلأوثِرنَّه اليومَ على نفسي، فلما أقبلَ قال له: ما لَديك؟ قال: أذِنت لك يا أمير المؤمنين، قال: ما كان شيءٌ أهمَّ إليَّ من ذلك المضجع، فإذا قُبضتُ فاحملوني، ثم سلِّموا، ثم قل: يستأذِنُ عمر بن الخطاب، فإن أذِنَتْ لي فادفنوني، وإلا فرُدُّوني إلى مقابر المسلمين، إني لا أعلم أحدًا أحقّ بهذا الأمر من هؤلاء النفر الذين تُوُفِّي
رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وهو عنهم راض، فمن استخلفوا بعدي فهو الخليفة فاسمعوا له وأطيعوا، فسمَّى عثمان وعليّا وطلحة والزبير وعبد الرحمن بن عوف وسعد بن أبي وقَّاص، ووَلج عليه شابٌّ من الأنصار فقال: أبشر يا أمير المؤمنين ببُشْرى الله، كان لك من القِدَم في الإسلام ما قد علمت، ثم استُخلِفتَ فعدلتَ، ثم الشهادة بعد هذا كله، فقال: ليتَني يا ابن أخي وذلك كفافًا لا عليَّ ولا لي، أوصي الخليفة من بعدي بالمهاجرين الأولين خيرًا، أن يعرف لهم حقَّهم، وأن يحفظ لهم حُرمتهم، وأوصيه بالأنصار خيرًا، الذين تَبَوّءوا الدار والإيمان أن يُقبل من مُحسنهم، ويُعفي عن مُسيئهم، وأُوصية بذِمَّةِ الله وذمَّةِ رسولهِ صلى الله عليه وسلم أن يُوفي لهم بعهدهم، وأن يُقاتل من ورائهم، وأن لا يُكلَّفوا فوقَ طاقتِهم".

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1392) عن قتيبة، حدثنا جرير بن عبد الحميد، حدثنا حُصين بن عبد الرحمن، عن عمرو بن ميمون فذكره.




আমর ইবনু মাইমূন আল-আউদী (রহ.) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম, তিনি বললেন: হে আব্দুল্লাহ ইবনু উমার! তুমি উম্মুল মু’মিনীন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে যাও এবং বলো: উমার ইবনুল খাত্তাব আপনাকে সালাম দিয়েছেন। অতঃপর তাঁর কাছে জিজ্ঞাসা করো, আমি যেন আমার দুই সঙ্গীর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ও আবু বকর) পাশে দাফন হতে পারি।

তিনি (আয়েশা) বললেন: আমি তো তা নিজের জন্য রেখেছিলাম। তবে আজ আমি তাঁকে আমার নিজের ওপর প্রাধান্য দেব।

যখন সে (আব্দুল্লাহ ইবনু উমার) ফিরে এলেন, তিনি (উমার) তাকে জিজ্ঞেস করলেন: কী খবর? সে বলল: হে আমীরুল মু’মিনীন! তিনি আপনাকে অনুমতি দিয়েছেন।

উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই শয্যাস্থানের চেয়ে গুরুত্বপূর্ণ আর কিছুই আমার কাছে ছিল না। যখন আমি মারা যাব, তখন তোমরা আমাকে বহন করে নিয়ে যাবে, এরপর সালাম দেবে এবং বলবে: উমার ইবনুল খাত্তাব অনুমতি চাচ্ছেন। যদি তিনি (আয়েশা) আমাকে অনুমতি দেন, তবে আমাকে সেখানে দাফন করবে। অন্যথায়, আমাকে মুসলিমদের কবরস্থানে ফিরিয়ে নিয়ে যাবে।

নিশ্চয়ই আমি এমন কাউকে জানি না, যারা এই (খিলাফতের) কাজের জন্য ঐসব ব্যক্তির চেয়ে অধিক হকদার, যাদের ওপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সন্তুষ্ট থাকা অবস্থায় ইন্তেকাল করেছেন। আমার পরে তারা যাকে খলীফা নিযুক্ত করবেন, তিনিই হবেন খলীফা। তোমরা তাঁর কথা শুনবে এবং তাঁর আনুগত্য করবে।

অতঃপর তিনি উসমান, আলী, তালহা, যুবাইর, আব্দুর রহমান ইবনু 'আউফ এবং সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নাম নিলেন।

এ সময় আনসারদের মধ্য থেকে এক যুবক তাঁর নিকট প্রবেশ করে বলল: হে আমীরুল মু'মিনীন! আল্লাহর পক্ষ থেকে সুসংবাদ গ্রহণ করুন। ইসলামে আপনার মর্যাদা এবং প্রথম দিককার অবদান সম্পর্কে আপনি তো জানেনই। এরপর আপনি খলীফা হলেন এবং সুবিচার করলেন। আর এর সবকিছুর পর শাহাদাত।

তিনি (উমার) বললেন: হে আমার ভাতিজা! আমি তো কামনা করি, যদি এ সব কিছুই আমার পক্ষে বা বিপক্ষে না হয়ে সমান সমান হয়ে যায়।

আমি আমার পরবর্তী খলীফাকে প্রথম দিককার মুহাজিরগণের প্রতি উত্তম আচরণের উপদেশ দিচ্ছি, যেন তিনি তাদের অধিকার সম্পর্কে জানেন এবং তাদের মর্যাদা রক্ষা করেন।

আর আমি তাঁকে সেই আনসারদের প্রতি উত্তম আচরণের উপদেশ দিচ্ছি, যারা মাদীনাহ ও ঈমানকে আশ্রয়স্থল বানিয়েছেন, যেন তিনি তাদের সৎকর্মশীলদের নেক আমল কবুল করেন এবং তাদের অপরাধীদের ক্ষমা করে দেন।

আর আমি তাঁকে আল্লাহ এবং তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জিম্মাধারী (অমুসলিম প্রজা) সম্পর্কে উপদেশ দিচ্ছি, যেন তিনি তাদের সাথে কৃত অঙ্গীকার পূর্ণ করেন, তাদের পেছনে থেকে তাদের জন্য যুদ্ধ করেন (তাদের রক্ষা করেন) এবং তাদের ওপর তাদের সাধ্যের অতিরিক্ত কিছু চাপিয়ে না দেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3702)


3702 - عن قالت عائشة لعبد الله بن الزبير: ادفني مع صواحبي، ولا تدفِني مع النبي صلى الله عليه وسلم في البيت، فإنّي أكره أن أُزكَّى.

صحيح: رواه البخاري في الاعتصام (7327) عن عبيد بن إسماعيل، حدثنا أبو أسامة، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة فذكرته.

وقولُها:"أزكِّى" بضم أوله، وفتح الكاف على البناء للمجهول، أي لا يثني علي بسببه، ويجعل لي بذلك مزية وفضل، وأنا في نفس الأمر يحتمل أن لا أكون كذلك، وهذا منها على سبيل التواضع وهضم النفس بخلاف قولها لعمر: كنت أريده لنفسي فكأن اجتهادها في ذلك تغير.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আবদুল্লাহ ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: আমাকে আমার সাথীগণের (নাবীজীর অন্যান্য স্ত্রীগণের) সাথে দাফন করো এবং নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এই ঘরে আমাকে দাফন করো না, কারণ আমি অপছন্দ করি যে আমার প্রশংসা করা হোক (বা আমাকে বিশেষ মর্যাদা দেওয়া হোক)।









আল-জামি` আল-কামিল (3703)


3703 - عن سفيان التمار أنه حدَّثه أنه رأى قبر النبي صلى الله عليه وسلم مُسَنَّمًا.

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1390/ 2) عن محمد بن مقاتل، أخبرنا عبد الله، أخبرنا أبو بكر بن عياش، عن سفيان التمار فذكره.

وسفيان التمار هو: ابن دينار على الصحيح، وقيل ابن زياد، والصواب أنه غيره، وكل منهما عصفري كوفي، وهو من كبار أتباع التابعين.

وقوله"مُسَنَّمًا" أي مرتفعًا. وزاد أبو نعيم في"المستخرج":"وقبر أبي بكر وعمر كذلك" واستدل به على أن المستحب تسنيم القبور، وهو قول أبي حنيفة ومالك وأحمد والمزني وكثير من الشافعية. انظر:"الفتح".

ولا يعارض هذا ما رُوي عن القاسم (وهو ابن محمد بن أبي بكر الصديق) قال: دخلت على عائشة فقلت: يا أمهْ! اكشفي لي عن قبر النبي- صلى الله عليه وسلم وصاحبيه رضي الله عنهما، فكشفتْ لي عن ثلاثة
قبور، لا مُشرِفة ولا لاطئة، مبطوحةٍ ببطحاء العَرْصةِ الحمراء.

قال أبو علي اللؤلوي: يقال إن رسول الله صلى الله عليه وسلم مقدم، وأبو بكر عند رأسه، وعمر عند رجليه، رأسه عند رجلي رسول الله صلى الله عليه وسلم.

أولًا: لأنه ضعيف. رواه أبو داود (3220) عن أحمد بن صالح، حدثنا ابن أبي فديك، أخبرني عمرو بن عثمان بن هانئ، عن القاسم فذكره.

وعمرو بن عثمان بن هاني المدني"مستور" كما في"التقريب"، وأما الحاكم فقال في"المستدرك" (1/ 369):"صحيح الإسناد".

ثانيًا: على فرض صحة قول القاسم يحتمل أن يكون قبره صلى الله عليه وسلم لم يكن في أول الأمر مُسَنَّمًا، ثم لما بُني جدار القبر في إمارة عمر بن عبد العزيز على المدينة من قبل الوليد بن عبد الملك صيروها مرتفعة، وقد روى أبو بكر الآجري في كتاب"صفة قبر النبي صلى الله عليه وسلم من طريق إسحاق بن عيسى ابن بنت داود بن أبي هند، عن غُنيم بن بسطام المديني قال: رأيت قبر النبي صلى الله عليه وسلم في إمارة عمر بن عبد العزيز فرأيتُه مرتفعًا نحوًا من أربع أصابع، ورأيت قبر أبي بكر وراء قبره، ورأيت قبر عمر وراء قبر أبي بكر أسفل منه، كذا في"الفتح".

ثالثا: قوله:"مسنما" لا ينافي قوله:"مبطوحه ببطحاء العرصة الحمراء" كما قال الحافظ ابن القيم في"زاده" (1/ 524):"فقبرُه صلى الله عليه وسلم مُسَنَّم مبطوحٌ ببطحاء العَرْصةِ الحمْراءِ، لا مَنْبيٌّ ولا مطيَّنٌ، وهكذا كان قبر صاحيبه" انتهى.

قلت: وعليه يدل حديث جابر بن عبد الله الآتي.




সুফিয়ান আত-তাম্মার থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কবর উঁচু বা টিলার মতো (মুসান্নাম) অবস্থায় দেখেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3704)


3704 - عن جابر بن عبد الله أن النبي صلى الله عليه وسلم أُلحِد، ونُصب عليه اللَّبنُ نَصْبًا، ورفع قبره من الأرض نحوًا من شبرٍ.

صحيح: رواه ابن حبان (6635)، والبيهقي (3/ 410) كلاهما من طريق أبي كامل الجحدري، حدثنا الفُضيل بن سليمان، حدثنا جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر بن عبد الله فذكره. وإسناده صحيح.

ويستفاد منه أنه يستحب رفع القبر شبرًا عن الأرض ليتميز فيُصان ولا يُهان.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে লাহদ (পাশ্বর্‌খোদিত কবর) দেওয়া হয়েছিল, এবং তার উপর কাঁচা ইট সোজা করে রাখা হয়েছিল, এবং তার কবর যমীন থেকে প্রায় এক বিঘত উঁচু করা হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (3705)


3705 - عن أوس بن أوس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ من أفضل أيامكم يوم الجمعة، فيه خلق آدم، وفيه قبض، وفيه النفخة، وفيه الصعقة، فأكثروا عليَّ من الصلاة فيه، فإنَّ صلاتكم معروضة عليَّ". قال: قالوا: يا رسول الله! كيف تُعرض صلاتنا عليك وقد أَرِمتَ؟ يقولون: بَليتَ؟ فقال:"إنَّ الله عز وجل حرَّمَ على الأرض أجسادَ الأنبياء".
صحيح: رواه أبو داود (1047)، والنسائي (1374)، وابن ماجه (1636) كلهم من طريق عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، عن أبي الأشعث الصنعاني، عن أوس بن أوس، فذكره.

وإسناده صحيح، وصحَّحه ابن خزيمة (1733)، وابن حبان (910)، والحاكم (1/ 278) فأخرجوه من طريق عبد الرحمن بن يزيد به.

قال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري، ولم يُخرجاه"، وليس كما قال، بل هو على شرطهما عنده، فقد أخرجا لجميع رواته، إلَّا أنَّ البخاري لم يخرج لأبي الأشعث الصنعاني (واسمه: شرحبيل ابن آدة) إلَّا تعليقًا، والحاكم لا يُفرِّق بين الإخراج للراوي تعليقًا أو متابعة، أو أصلًا.

وفي معناه ما رُوي عن أبي الدرداء قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أكثروا الصلاة عليَّ يوم الجمعة، فإنه مشهود تشهده الملائكة، وإن أحدًا لم يُصَلِّ عليَّ إلا عرضتْ علي صلاته حتى يفرغَ منها"، قال: قلت: وبعد الموت؟ قال:"وبعد الموت إن الله حرَّم على الأرض أن تأكل أجسام الأنبياء، فنبي الله حيٌّ يرزق".

رواه ابن ماجه (1637) عن عمرو بن سوَّاد المصري، قال: حدثنا عبد الله بن وهب، عن عمرو بن الحارث، عن سعيد بن أبي هلال، عن زيد بن أيمن، عن عُبادة بن نُسي، عن أبي الدرداء فذكره.

قال البوصيري:"هذا إسناد رجاله ثقات إلَّا أنه منقطع في موضعين، عُبادة بن نُسي روايته عن أبي الدرداء مرسلة قاله العلائي، وزيد بن أيمن عن عبادة بن نُسي مرسلة، قاله البخاري".




আওস ইবনু আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় তোমাদের দিনগুলোর মধ্যে শ্রেষ্ঠ দিন হলো জুমু‘আর দিন। এই দিনেই আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছে, এই দিনেই তাঁর রূহ কবয করা হয়েছে, এই দিনেই শিঙ্গায় ফুঁক দেওয়া হবে এবং এই দিনেই (মহাপ্রলয়ের কারণে সবাই) বেহুঁশ হয়ে যাবে। অতএব, তোমরা এই দিনে আমার প্রতি বেশি করে সালাত (দরূদ) পাঠ করো। কারণ তোমাদের সালাত আমার কাছে পেশ করা হয়।" বর্ণনাকারী বলেন: তাঁরা বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! যখন আপনি পচে গলে বিলীন হয়ে যাবেন, তখন কীভাবে আমাদের সালাত (দরূদ) আপনার কাছে পেশ করা হবে?" তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা‘আলা জমিনের জন্য নবীদের দেহ ভক্ষণ করা হারাম করে দিয়েছেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3706)


3706 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"مررتُ على موسى ليلة أُسري بي عند الكثيب الأحمر - وهو قائم يُصَلِّي في قبره".

صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2375) من طريق عن حماد بن سلمة، عن ثابت البناني وسليمان التيمي، عن أنس بن مالك فذكره.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি যখন মি‘রাজের রাতে যাচ্ছিলাম, তখন লাল বালিয়াড়ির কাছে মূসা (‘আ)-এর পাশ দিয়ে গেলাম। তিনি তখন তাঁর কবরে দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছিলেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3707)


3707 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الأنبياء أحياء في قبورهم يصلون".

حسن: رواه أبو يعلى في"مسنده" (3425) عن أبي الجهم الأزرق بن علي، ثنا يحيى بن أبي بكير، ثنا المستلم بن سعيد، عن الحجاج، عن ثابت، عن أنس بن مالك فذكره.

ومن طريق أبي يعلى أخرجه البيهقي في"حياة الأنبياء" (صـ 72) ورجاله ثقات غير الأزرق وهو أبو الجهم الحنفي، الأزرق بن علي قال الحافظ في"التقريب""صدوق يُغرب" قلت: إلَّا أنه لم ينفرد به فقد رواه الحسن بن عرفة، قال: حدثني الحسن بن قتيبة المدائني، ثنا المستلم بن سعيد بإسناده مثله.
كذا قال مع أنه رواه من طريق أبي الجهم الأزرق بن علي كما مضى، ومن طرق أخرى، وإن كان في بعضها من يُتَّهم.

وللحديث طريق آخر أخرجه أبو نعيم في"أخبار أصبهان" (2/ 82) من طريق عبد الله بن إبراهيم ابن الصباح، عن عبد الله بن محمد بن يحيى بن أبي بكير، ثنا يحيى بن أبي بكير بإسناده مثله.

وقد تبين من هذه المتابعات بأن الأزرق بن علي لم يُغرب فيه، كما أنَّ الحسن بن قُتَيبة المدائني لم ينفرد به.

والحياة هذه حياة برزخية، وليست من حياة الدُّنيا في شيء. انظر للمزيد: كتاب الإيمان بالأنبياء عليهم السلام.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নবীগণ তাঁদের কবরসমূহে জীবিত এবং তাঁরা সালাত (নামাজ) আদায় করেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3708)


3708 - عن * *




৩৭০৮ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (3709)


3709 - عن هانئ مولي عثمان قال: كان عثمان بن عفّان إذا وقف على قَبْرٍ يبكي حتّى يَبُلَّ لحيتُه، فقيل له: تذكر الجنّة والنار ولا تبكي، وتبكي من هذا؟ قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن القبر أولُ منازل الآخرة، فإن نجا منه مما بعده أيسر منه، وإن لم ينجُ منه مما بعده أشد منه" قال: وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما رأيت منظرًا قط إِلَّا والقبر أفظع منه.

حسن: رواه الترمذيّ (2308)، وابن ماجة (4267) كلاهما من حديث يحيى بن معين، قال: حَدَّثَنَا هشام بن يوسف، عن عبد الله بن بَحير، عن هانئ مولي عثمان قال: فذكره.

قال الترمذيّ:"حسن غريب لا نعرفه إِلَّا من حديث هشام بن يوسف".

وأخرجه الحاكم (1/ 371) وقد صحَّح الإسناد مثله قبله. وتعقبه الذّهبيّ فقال:"ابن بَحير ليس بالعمدة، ومنهم من يقويه، وهانئ روى عنه جماعة، ولا ذكر له في الكتب الستة".

قلت: عبد الله بن بحير هو ابن رَيْسان -بفتح الراء وسكون الياء- المرادي أبو وائل القاص اليماني الصنعانيّ، قال يحيى بن معين: ثقة.

وقال عليّ بن المديني: سمعت هشام بن يوسف - وسئل عن عبد الله بن بَحير القاص الذي روي عن هانئ مولي عثمان فقال:"كان يُتقن ما سمع". وذكره ابن حبَّان في"الثقات" (8/ 331).

وقال في"المجروحين": أبو وائل القاص اسمه عبد الله بن بَحير الصنعانيّ، وليس هو عبد الله بن بحير بن رَيسان ذاك ثقة، وهذا يروي عن عروة بن محمد وعبد الرحمن بن يزيد الصنعاني العجائب كأنّها معلولة، لا يجوز الاحتجاج به. فجعل ابن حبَّان رجلين أحدهما ثقة، والآخر ضعيف، والراوي هنا عبد الله بن بحير بن رَيسان هو الثقة.

وأمّا هانئ مولي عثمان فهو أبو سعيد البربري قال فيه النسائيّ: ليس به بأس، وذكره ابن حبَّان في"الثّقات"، وقال الذهبي في"الكاشف":"وُثق".

فهو حسن الحديث، وقد روى له أبو داود والتِّرمذي وابن ماجه، وقد أشار إلى هذا الذهبي.

وأمّا ما رُوي عن أبي سعيد مرفوعًا:"إنَّما القبر روضة من رياض الجنّة، أو حفرة من حُفَر النار" فهو ضعيف.
رواه الترمذيّ (2460) عن محمد بن أحمد -وهو ابن مدُّويه، حَدَّثَنَا القاسم بن الحكم العُرني، حَدَّثَنَا عبيد الله بن الوليد الوصَّافي، عن عطية، عن أبي سعيد فذكره في سيأتي أطول سيأتي في موضعه.

قال الترمذي: حديث غريب لا نعرفه إِلَّا من هذا الوجه.

قلت: فيه عطية وهو ابن سعد العوفي ضعَّفه النسائيّ، وقال أبو داود: ليس بالذي يعتمد عليه، وفي"التقريب":"صدوق يخطئ كثيرًا كان شيعيًا مدلسًا".

والراوي عنه عبيد الله بن الوليد الوصافي، أهلُ العلم مطبقون على تضعيفه.

وكذلك لا يصح ما رواه البيهقي في"إثبات عذاب القبر" (61) من طريق محمد بن إسحاق الصنعاني، ثنا محمد بن عمر الواقدي، أن سلمة بن أخي عمر، عن عمر بن شَبَّة بن أبي كثير الأشجعي، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعًا:"القبر حفرة من حفر جهم، أو روضة من رياض الجنّة" والواقدي متروك.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في جنازة، فجلس إلى قبر منها فقال:"ما يأتي على هذا القبر من يوم إِلَّا وهو ينادي بصوت ذلق طلق يا ابن آدم: كيف نَسيتني؟ ألم تعلم أني بيتُ الوحدة، وبيتُ الغربة، وبيتُ الوحشة، وبيتُ الدود، وبيتُ الضِّيق، إِلَّا من وسَّعني الله عليه" ثمّ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"القبر إما روضة من رياض الجنّة، أو حفرة من حفر النار" رواه الطبرانيّ في"الأوسط".

قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 46):"وفيه محمد بن أيوب بن سويد وهو ضعيف".

قلت: بل هو رُوي عن أبيه، عن الأوزاعي الأشياء الموضوعة، وكان أبو زرعة يقول: رأيت هذا الشّيخ أدخل في كتاب أبيه أشياء موضوعة بخط طريّ، وكان يحدث بها، انظر:"المجروحين". (1001).




হানী' মাওলা উসমান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উসমান ইবনু আফফান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন কোনো কবরের পাশে দাঁড়াতেন, তখন এত কাঁদতেন যে, তাঁর দাড়ি ভিজে যেত। তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি জান্নাত ও জাহান্নামের কথা স্মরণ করে কাঁদেন না, অথচ (শুধু) এই কবরের জন্য কাঁদছেন? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: 'নিশ্চয় কবর হলো আখেরাতের প্রথম মনযিল। যদি কেউ এর থেকে মুক্তি (সফলতা) পায়, তবে এর পরবর্তী ধাপগুলো তার জন্য সহজ হবে। আর যদি এর থেকে মুক্তি না পায়, তবে এর পরবর্তী ধাপগুলো তার জন্য আরও কঠিন হবে।' তিনি (উসমান) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেছেন: 'আমি এমন কোনো দৃশ্য দেখিনি, যা কবরের দৃশ্যের চেয়েও ভয়াবহ নয়।'









আল-জামি` আল-কামিল (3710)


3710 - عن أنس عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ العبد إذا وضع في قبره وتولَّى عنه أصحابه حتّى إنه ليسمع قرع نعالهم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1338)، ومسلم في صفة الجنّة (2870/ 71) كلاهما من حديث يزيد بن زُريع، حَدَّثَنَا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس بن مالك فذكره ولفظهما سواء.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয় বান্দাকে যখন তার কবরে রাখা হয় এবং তার সঙ্গীরা তার কাছ থেকে ফিরে যায়, তখন সে তাদের জুতার আওয়াজও শুনতে পায়।”









আল-জামি` আল-কামিল (3711)


3711 - عن البراء بن عازب قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في جنازة رجل من الأنصار، فانتهينا إلى القبر، ولم يُلْحدُ فجلس رسول الله صلى الله عليه وسلم وجلسنا حوله كأنما على رؤوسنا الطير، وفي يده عُود ينكتُ به في الأرض، فرفع رأسه فقال:"استعيذوا بالله من عذاب القبر مرتين أو ثلاثًا" زاد في حديث جرير ههنا وقال:
"وإنه ليسمع خفْقَ نعالهم إذا ولَّوا مدبرين حين يقال له: يا هذا من ربَّك؟ وما دينك؟ ومن نبيك؟".

حسن: رواه أبو داود (4753) عن عثمان بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا جرير، ح وحدثنا هناد بن السري، قال: حَدَّثَنَا معاوية، وهذا لفظ هناد -عن الأعمش، عن المنهال، عن زاذان، عن البراء ابن عازب فذكره في حديث طويل. والحديث في زهد هناد بن السري (339) من هذا الوجه.

وإسناده حسن من أجل المنهال وهو ابن عمرو، فإنه"صدوق".




বারা ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সঙ্গে জনৈক আনসারী ব্যক্তির জানাযায় বের হলাম। আমরা কবরের কাছে পৌঁছলাম, কিন্তু তখনো কবর খনন (বা লাহাদ) করা হয়নি। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বসে গেলেন এবং আমরাও তাঁর চারপাশে বসে গেলাম। (আমরা এমন নীরব ছিলাম যে) মনে হচ্ছিল যেন আমাদের মাথার উপর পাখি বসে আছে। তাঁর হাতে একটি লাঠি ছিল, যা দিয়ে তিনি মাটিতে আঘাত করছিলেন (খোঁটা দিচ্ছিলেন)। অতঃপর তিনি মাথা তুলে বললেন: "তোমরা কবরের আযাব থেকে আল্লাহর কাছে দু'বার অথবা তিনবার আশ্রয় প্রার্থনা করো।" তিনি আরও বললেন: "নিশ্চয়ই সে (মৃত ব্যক্তি) তাদের জুতার আওয়াজ শুনতে পায় যখন তারা পিছন ফিরে চলে যায়। তখন তাকে বলা হয়: 'হে ব্যক্তি, তোমার রব কে? তোমার দীন কী? আর তোমার নবী কে?'"









আল-জামি` আল-কামিল (3712)


3712 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الميت يسمع خفق نعالهم إذا ولَّوا عنه" يعني مدبرين.

حسن: رواه البزار"كشف الأستار" (873) عن محمد بن عبد الله المخرميّ، ثنا وكيع بن الجراح، ثنا سفيان - يعني الثوريّ، عن السُدِّي، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وإسناده حسن من أجل السدي وهو إسماعيل بن عبد الرحمن بن أبي كُريمة -بضم الكاف- الكوفي الأعور الكبير، مختلف فيه فكذَّبه الجوزجاني (أظن لتشيعه) ووثَّقه الإمام أحمد والعجلي، وقال النسائي:"صالح"، وقال ابن عدي:"له أحاديث يرويها عن عدة شيوخ، وهو عندي مستقيم الحديث صدوق، لا بأس به"، وأخرج له مسلم، والخلاصة أنه"صدوق يهم، رمي بالتشيع".

وحسَّنه أيضًا الهيثمي في"المجمع" (3/ 54) وأرجو أنه لم يهم في هذا الحديث لشواهده.

وبمعناه رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"إذا دُفن الميت سمع خفق نعالهم إذا ولوا عنه منصرفين". رواه الطبراني في"الكبير" (11/ 87) عن أبي الزنباع روح بن الفرح، ثنا يحيى بن سليمان الجعفي، ثنا محمد بن فُضيل، ثنا مسلم الضبي، عن مجاهد، عن ابن عباس فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 54):"رجاله ثقات".

قلت: وهو وهم عنه، فإن مسلمًا الضبي وهو ابن كيسان ضعيف باتفاق أهل العلم.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي سعيد أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إن الميت يعرف من يحمله، ومن يغسله، ومن يدليه في قبره".

رواه أحمد (10997) عن أبي عامر، حَدَّثَنَا عبد الملك بن حسن الحارثي، حَدَّثَنَا سعيد بن عمرو بن سُلَيم، قال: سمعت رجلًا منا -قال عبد الملك: نسيت اسمه، ولكن اسمه معاوية أو ابن معاوية- يحدث عن أبي سعيد الخدري، أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال: فذكره. فقال ابن عمر وهو في المجلس: ممن سمعت هذا؟ قال: عن أبي سعيد. فانطلق ابن عمر إلى أبي سعيد فقال: يا أبا سعيد، ممن سمعت هذا؟ قال: من النَّبِي صلى الله عليه وسلم.

وإسناده ضعيف لإبهام الراوي عن أبي سعيد، وإن كان هو معاوية أو ابن معاوية فلا يعرف من
هو هذا؟ قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 20):"فيه رجل لم أجد من ترجمه".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় মৃত ব্যক্তি তাদের জুতার শব্দ শুনতে পায় যখন তারা তার নিকট থেকে চলে যায় (অর্থাৎ প্রস্থান করে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (3713)


3713 - عن أبي طلحة أن نبي الله صلى الله عليه وسلم أمر يوم بدر بأربعة وعشرين رجلًا من صناديد قريش فقُذِفوا في طَوي من أطواء بدر خَبيث مُخبث، وكان إذا ظهر على قوم أقام بالعرصة ثلاث ليال، فلمّا كان ببدر اليوم الثالث أمر براحلته فشُد عليها رحلُها، ثمّ مشى، واتبعه أصحابُه وقالوا: ما نرى ينطلق إِلَّا لبعض حاجته، حتّى قام على شفة الركي، فجعل يُناديهم بأسمائهم وأسماء آبائهم: يا فلان بن فلان، ويا فلان بن فلان، أيسركم أنكم أطعتم الله ورسولَه؟ فإنا قد وجدنا ما وعدنا ربنا حقًا، فهل وجدتم ما وعد ربكم حقًا.

قال: فقال عمر: يا رسول الله! ما تُكلم من أجساد لا أرواح لها، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"والذي نفس محمد بيده ما أنتم بأسمع لما أقول منهم".

متفق عليه: رواه البخاري في المغازي (3976)، ومسلم في الجنّة (2875) كلاهما من حديث رَوح بن عُبادة، حَدَّثَنَا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس بن مالك، عن أبي طلحة فذكر الحديث واللفظ للبخاري.

ولم يذكر مسلم لفظ الحديث وإنما أحال على لفظ حديث أنس بن مالك الآتي.




আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, আল্লাহ্‌র নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বদরের দিন কুরাইশ নেতাদের চব্বিশ জন লোককে কূপের মধ্যে নিক্ষেপ করার নির্দেশ দিলেন। বদরের কূপগুলোর মধ্যে একটি নোংরা ও দুর্গন্ধময় কূপে তাদের নিক্ষেপ করা হলো। আর তিনি যখন কোনো জাতির উপর বিজয় লাভ করতেন, তখন তিনি ময়দানে তিন রাত অবস্থান করতেন। যখন বদরে তৃতীয় দিন হলো, তখন তিনি তাঁর বাহন প্রস্তুত করার নির্দেশ দিলেন এবং সেটির পিঠে সওয়ার বসানো হলো। অতঃপর তিনি হেঁটে চললেন এবং তাঁর সাহাবাগণ তাঁকে অনুসরণ করলেন। তাঁরা বলাবলি করতে লাগলেন: আমরা তো মনে করি না যে, তিনি তাঁর কোনো ব্যক্তিগত প্রয়োজন ছাড়া অন্য কোনো কারণে চলেছেন। অবশেষে তিনি কূয়ার কিনারে এসে দাঁড়ালেন এবং তাদেরকে তাদের নাম ধরে ও তাদের পিতার নাম ধরে ডাকতে লাগলেন: হে অমুকের পুত্র অমুক! হে অমুকের পুত্র অমুক! তোমাদের কি ভালো লাগতো যদি তোমরা আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের আনুগত্য করতে? আমরা তো আমাদের রবের পক্ষ থেকে আমাদের প্রতিশ্রুত ফল সত্য পেয়েছি, তোমরা কি তোমাদের রবের পক্ষ থেকে প্রতিশ্রুত ফল সত্য পেয়েছো?

আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আল্লাহ্‌র রাসূল! আপনি এমন দেহগুলোর সাথে কথা বলছেন, যার মধ্যে কোনো রূহ (আত্মা) নেই। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সেই সত্তার শপথ, যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, আমি যা বলছি তা তাদের চেয়ে তোমরা বেশি শুনতে পাচ্ছ না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3714)


3714 - عن ابن عمر قال: اطلع النَّبِي صلى الله عليه وسلم على أهل القّليب فقال:"وجدتم ما وعد ربّكم حقًّا" فقيل له: تدعو أمواتا؟ فقال:"ما أنتم بأسمع منهم، ولكن لا يجيبون".

صحيح: رواه البخاري في الجنائز (1370) عن عليّ بن عبد الله، حَدَّثَنَا يعقوب بن إبراهيم، حَدَّثَنِي أبي، عن صالح، حَدَّثَنِي نافع، عن ابن عمر فذكره.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ক্বালিবের (গণকবরের) লোকদের দিকে ঝুঁকে দেখলেন এবং বললেন: "তোমাদের প্রতিপালক তোমাদেরকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন, তোমরা কি তা সত্য পেয়েছ?" তখন তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: আপনি কি মৃতদেরকে ডাকছেন? তিনি বললেন: "তোমরা তাদের চেয়ে বেশি শুনতে পাও না, কিন্তু তারা উত্তর দিতে পারে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3715)


3715 - عن عمر بن الخطّاب قال: ثم أمر النَّبِي صلى الله عليه وسلم فطرحوا في بئر، فانطلق إليهم فقال:"يا فلان بن فلان، يا فلان بن فلان، هل وجدتم ما وعدكم الله ورسوله حقًّا؟ فإني قد وجدتُ ما وعدني الله حقًّا" قلت: يا رسول الله! كيف تكلم أجسادا لا أرواح فيها؟ قال:"ما أنتم بأسمع لما أقول منهم، غير أنهم لا يستطيعون أن يردوا علي شيئًا".

صحيح: رواه مسلم في الجنّة (2873) من طرق، عن سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس ابن مالك، عن عمر بن الخطّاب فذكره في قصة مصارع أهل بدر.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম নির্দেশ দিলেন, ফলে তাদেরকে (বদর যুদ্ধে নিহত কাফিরদের) একটি কূপে নিক্ষেপ করা হলো। অতঃপর তিনি তাদের কাছে গেলেন এবং বললেন: “হে অমুকের পুত্র অমুক! হে অমুকের পুত্র অমুক! আল্লাহ ও তাঁর রাসূল তোমাদেরকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন, তোমরা কি তা সত্য বলে পেয়েছো? আমি তো আল্লাহ আমাকে যে ওয়াদা দিয়েছেন, তা সত্য বলে পেয়েছি।” আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি কীভাবে এমন দেহের সাথে কথা বলছেন, যার মধ্যে আত্মা নেই? তিনি বললেন: “আমি যা বলছি, তোমরা তাদের চেয়ে বেশি শ্রবণকারী নও, তবে তারা আমাকে কোনো কিছুর জবাব দিতে সক্ষম নয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (3716)


3716 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ترك قتلى بدر ثلاثًا ثم أتاهم فقام عليهم
فناداهم فقال:"يا أبا جهل بن هشام، يا أمية بن خلف، يا عتبة بن ربيعة، يا شيبة ابن ربيعة، أليس قد وجدتم ما وعد ربّكم حقًا؟ فإني قد وجدتُ ما وعدني ربي حقًا"، فسمع عمر قول النَّبِي صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله! كيف يسمعوا، وأنَّى يُجيبوا وقد جيَّفوا؟ قال النَّبِي صلى الله عليه وسلم: والذي نفسي بيده ما أنتم بأسمع لما أقول منهم، ولكنهم لا يقدرون أن يجيبوا" ثم أمر بهم فسُحبوا فأُلقوا في قليب بدرٍ.

صحيح: رواه مسلم في الجنة (2874) من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت البناني، عن أنس ابن مالك فذكره.

وأما ما رُوي عن عبد الله بن مسعود قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم على أهل القَليب فقال: يا أهل القَليب! هل وجدتم ما وعد ربكم حقًا؟ فإني قد وجدتُ ما وعدني ربي حقًّا"، قالوا: يا رسول الله هل يسمعون؟ قال: ما أنتم بأسمع لما أقول منهم، لكنهم اليوم لا يجيبون" فهو ضعيف.

رواه الطبرانيّ في"الكبير" (10/ 198) من طريق أشعث بن سوار، عن أبي إسحاق، عن عمرو ابن ميمون، عن عبد الله فذكره. وأشعث بن سوار الكندي وإن كان رواه مسلم في المتابعات فالأكثر على تضعيفه، ولذا أطلق عليه الحافظ في"التقريب" لفظ"ضعيف" وتناقض في"الفتح" (7/ 303) فقال:"وللطبراني من حديث ابن مسعود مثله بإسناد صحيح".

وقول الحافظ الهيثمي في"المجمع" (6/ 91):"ورجاله رجال الصحيح" صحيح، لأن أشعث ابن سوار من رجال مسلم كما سبق.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد الله بن سيدان، عن أبيه، قال: أشرف النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم على أهل القَليب، فقال:"يا أهل القليب! هل وجدتم ما وعد ربّكم حقًا؟" فقالوا: يا رسول الله! وهل يسمعون؟ قال:"يسمعون كما تسمعون، ولكن لا يجيبون" رواه الطبراني في"الكبير" (7/ 197).

قال الهيثمي في"المجمع" (6/ 91):"وعبد الله بن سِيدَان مجهول".

قلت: وهو كما قال، وقد جهَّله ابن عدي واللالكائي وغيرهما، وقال البخاريّ:"لا يتابع في حديثه". وله الترجمة في"الكامل" و"الميزان" وهو عبد الله بن سِيدان المطرودِي.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদরের নিহতদের (লাশ) তিন দিন পর্যন্ত রেখে দিলেন। অতঃপর তিনি তাদের কাছে আসলেন এবং তাদের সামনে দাঁড়িয়ে তাদের ডাকলেন এবং বললেন: "হে আবূ জাহল ইবনু হিশাম! হে উমাইয়া ইবনু খালফ! হে উতবা ইবনু রাবি'আহ! হে শায়বাহ ইবনু রাবি'আহ! তোমাদের রব তোমাদেরকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন, তা কি তোমরা সত্য পাওনি? নিশ্চয় আমিও আমার রব আমাকে যে ওয়াদা দিয়েছেন, তা সত্য পেয়েছি।" উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই কথা শুনলেন এবং বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! তারা কিভাবে শুনতে পাবে এবং কিভাবেই বা জবাব দেবে, অথচ তারা তো পচে গলে গিয়েছে?" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার হাতে আমার জীবন, তোমরা আমার কথা তাদের চেয়ে বেশি শোনো না, তবে তারা জবাব দিতে সক্ষম নয়।" অতঃপর তিনি তাদের বিষয়ে আদেশ দিলেন। তখন তাদের টেনে নিয়ে গিয়ে বদরের কূপে নিক্ষেপ করা হলো।

[দ্রষ্টব্য: এই বর্ণনাটি সহীহ। এটি মুসলিম তার জান্নাত অধ্যায়ে (২৮৭৪) হাম্মাদ ইবনু সালামাহ, তিনি সাবিত আল-বুনানী, তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে উল্লেখ করেছেন। নিচে অন্যান্য দুর্বল বর্ণনা ও তার বিশ্লেষণ রয়েছে।]









আল-জামি` আল-কামিল (3717)


3717 - عن عروة بن الزبير قال: ذكر عند عائشة أن ابن عمر برفع إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إن الميت يُعذَّب في قبره ببكاء أهله عليه" فقالت: وَهِل، إنما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنه لَيُعذَّب بخطيئته وذنبه، وإن أهله ليكون عليه الآن" وذلك مثل قوله: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قام على القليب يوم بدر، وفيه قتلي بدر من المشركين فقال لهم ما قال:"إنهم يسمعون ما أقول" وقد وَهِل، إنّما قال:"إنَّهم الآن ليعلمون أن ما كنت أقول لهم
حق" ثمّ قرأت: {إِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتَى} [النمل: 80] {وَمَا أَنْتَ بِمُسْمِعٍ مَنْ فِي الْقُبُورِ} [فاطر: 22] يقول: حين تبؤوا مقاعدهم من النار.

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (3978)، ومسلم في الجنائز (932) كلاهما من طريق أبي أسامة، عن هشام بن عروة، عن أبيه فذكره.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উরুয়াহ ইবনুয-যুবাইর (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে উল্লেখ করা হলো যে, ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন: ‘নিশ্চয়ই মৃত ব্যক্তিকে তার পরিবারের কান্নার কারণে কবরে শাস্তি দেওয়া হয়।’ তখন তিনি (আয়েশা) বললেন: তিনি ভুল করেছেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল এতটুকুই বলেছিলেন: ‘নিশ্চয়ই তাকে (কাফিরকে) তার পাপ ও অপরাধের কারণে শাস্তি দেওয়া হয়, আর এই সময় তার পরিবার তার জন্য কাঁদছে।’ আর এটা তার (ইবনু উমরের) সেই বক্তব্যের মতো, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বদর যুদ্ধের দিন ক্বালিবের (কূয়ার) পাশে দাঁড়িয়েছিলেন, যেখানে মুশরিকদের মধ্য থেকে নিহতদের লাশ ছিল। তখন তিনি তাদেরকে কিছু কথা বলেছিলেন (যেমনটি ইবনু উমর বর্ণনা করেন): ‘নিশ্চয়ই তারা আমি যা বলছি তা শুনতে পাচ্ছে।’ কিন্তু তিনি ভুল করেছেন। রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কেবল এতটুকুই বলেছিলেন: ‘নিশ্চয়ই তারা এখন জানতে পারছে যে, আমি তাদের কাছে যা বলতাম তা সত্য ছিল।’ এরপর তিনি এই আয়াতগুলো পাঠ করলেন: **“নিশ্চয়ই আপনি মৃতদেরকে শোনাতে পারবেন না।”** (সূরা নমল: ৮০) এবং **“আর আপনি কবরে শায়িতদেরকে শোনাতে সক্ষম নন।”** (সূরা ফাতির: ২২)। তিনি (আয়েশা) বললেন: (এই আয়াতগুলো তখন প্রযোজ্য) যখন তারা জাহান্নামের মধ্যে তাদের স্থান তৈরি করে নেয়।









আল-জামি` আল-কামিল (3718)


3718 - عن ابن عمر قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم على القليب يوم بدر فقال:"يا فلان يا فلان! هل وجدتم ما وعدكم ربّكم حقًّا؟ أما والله! إنهم الآن يسمعون كلامي" قال يحيى: فقالت عائشة: غفر الله لأبي عبد الرحمن، إنه وَهِل، إنّما قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"والله! إنهم ليعلمون الآن أن الذي كنت أقول لهم حق" وإن الله تعالى يقول: {إِنَّكَ لَا تُسْمِعُ الْمَوْتَى} [النمل: 80] {وَمَا أَنْتَ بِمُسْمِعٍ مَنْ فِي الْقُبُورِ} [فاطر: 22].

حسن: رواه الإمام أحمد (4864) عن يزيد، أخبرنا محمد - يعني ابن عمرو، عن يحيى بن عبد الرحمن بن حاطب، أنه حدثهم عن ابن عمر فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو فإنه حسن الحديث.



فقه الحديث:

إن ما فهمتْه عائشة المخالفة بين الآية والحديث هو الذي فهمه أيضًا بعض الصّحابة، لأنهم تعجبوا من قول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"يا فلان بن فلان، يا فلان بن فلان -وجيّفوا- قد وجدتم ما وعدكم ربكم حقًّا؟" فأجاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بأنهم يسمعون الآن. وهذا الحديث يدل على أنه حصل خرق العادة في هذه الحالة.

ولذا ثبت رجوع عائشة إلى قول هؤلاء لما رواه ابن إسحاق في المغازي من رواية يونس بن بكير بإسناد جيد عن عائشة مثل حديث أبي طلحة وفيه:"ما أنتم بأسمع لما أقول منهم" أخرجه أحمد بإسناد حسن كما قال الحافظ في"الفتح" (7/ 304).

قلت: وأما ما رواه الإمام أحمد (2572) فهو من طريق هُشيم، قال: أخبرنا مغيرة، عن إبراهيم، عن عائشة أنها قالت: لما أمر النَّبي صلى الله عليه وسلم يوم بدر بأولئك الرهْطِ، فأُلقوا في الطوِيّ: عتبة وأبو جهل وأصحابه، وقف عليهم فقال:"جزاكم الله شرًّا من قوم نبي، ما كان أسوأَ الطرْدِ وأشد التكذيب" قالوا: يا رسول الله! كيف تكلم قومًا قد جيَّفوا؟ فقال:"ما أنتم بأفهم لقولي منهم، أو لهم أفهم لقولي منكم".

وإبراهيم هو ابن يزيد النخعي قال الهيثميّ في"المجمع" (6/ 90):"رواه أحمد، ورجاله ثقات إِلَّا أن إبراهيم لم يسمع من عائشة، ولكنه دخل عليها" والله تعالى أعلم.




ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বদরের দিন কূপের (ক্বালিবের) কাছে দাঁড়িয়ে বললেন: "হে অমুক, হে অমুক! তোমাদের রব তোমাদেরকে যে ওয়াদা দিয়েছিলেন, তোমরা কি তা সত্য বলে পেয়েছো? আল্লাহর কসম! তারা এখন আমার কথা শুনতে পাচ্ছে।" ইয়াহইয়া বলেন, তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ আবু আবদির রহমানের (ইবনে উমারের) ভুল ক্ষমা করুন, তিনি ভুল করেছেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম শুধু এতটুকুই বলেছিলেন: "আল্লাহর কসম! আমি তাদের কাছে যা বলতাম, তারা এখন তা সত্য বলে জানতে পারছে।" কেননা আল্লাহ তাআলা বলেছেন: "নিশ্চয়ই আপনি মৃতদেরকে শোনাতে পারবেন না" [সূরা নামল: ৮০], "আর আপনি কবরবাসীদেরকে শোনাতে পারবেন না।" [সূরা ফাতির: ২২]।









আল-জামি` আল-কামিল (3719)


3719 - عن أبي أيوب قال: خرج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وقد وجبتْ الشّمس فسمع صوتًا فقال:"يهود تُعذبُ في قبورها".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجنائز (1375)، ومسلم في صفة الجنّة والنار (2869) كلاهما من حديث شعبة، عن عون بن أبي جحيفة، عن أبيه، عن البراء بن عازب، عن أبي أيوب فذكر الحديث. واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه وفيه:"خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ما غربت الشّمس".

وقوله:"وجبت الشمس" أي سقطت، والمراد غروبها.




আবূ আইয়্যুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বের হলেন যখন সূর্য অস্তমিত হয়েছিল। তখন তিনি একটি শব্দ শুনতে পেলেন এবং বললেন: "ইহুদীদেরকে তাদের কবরসমূহে শাস্তি দেওয়া হচ্ছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3720)


3720 - عن أسماء بنت أبي بكر رضي الله عنهما أنها قالت: أتيتُ عائشة رضي الله عنها، زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، حين خسفتِ الشّمس، فإذا الناس قيام يصلُّون، وإذا هي قائمة تصَلِّي، فقلتُ: ما للناس؟ فأشارتْ بيدها إلى السماء، وقالت: سبحان الله، فقلت: آيَةٌ؟ فأشارت: أي نعم، قالتْ: فقُمْتُ حتى تجلَّاني الغَشْيُ، فجعلتُ أصُبُّ فوق رأسي الماء، فلمّا انصرف رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حمدَ الله وأثنى عليه، ثم قال:"ما من شيء كنتُ لم أرَه إِلَّا قد رأيتُه في مقامي هذا، حتّى الجنَّة والنار، ولقد أوحيَ إليَّ أَنَّكُمْ تُفْتَون في القُبُور مِثْل -أو قريبًا من- فِتْنَةٍ الدَّجَّال"، لا أدري أيَّتَهُما قالتْ أسماء،"يُؤتَي أحدُكم فيقال له: ما عِلْمُكَ بهذا الرّجُلِ؟ فأمَّا المؤمنُ، أو المُوقِنُ"، لا أدري أيَّ ذلك قالت أسماءُ،"فيقول: محمدٌ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، جاءنا بالبينات والهُدى، فأجبنا وآمنَّا واتبعنَا، فيقال له: نمْ صالحًا، فقد علمنا إن كنت
لموقِنًا، وأمّا المنافق، أو المرتاب"، لا أدري أيتهما قالت أسماء -"فيقول: لا أدري، سمعتُ الناس يقولون شيْئًا فقلتُه".

متفق عليه: رواه مالك في الكسوف (4) عن هشام بن عروة، عن فاطمة بنت المنذر، عن أسماء بنت أبي بكر فذكرته.

ورواه البخاري في الوضوء (184) وفي الكسوف (1053) من طريقين عن مالك بإسناده.

ورواه الشيخان - البخاري في العلم (86)، ومسلم في الكسوف (905) من وجهين آخرين عن هشام بإسناده نحوه.




আসমা বিনত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন সূর্যগ্রহণ হলো, তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। তখন দেখি লোকেরা দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছে এবং তিনিও দাঁড়িয়ে সালাত আদায় করছেন। আমি বললাম, লোকদের কী হয়েছে? তিনি হাত দিয়ে আকাশের দিকে ইঙ্গিত করলেন এবং বললেন, সুবহানাল্লাহ! আমি বললাম, (এটি কি) কোনো নিদর্শন? তিনি ইশারায় বললেন, হ্যাঁ। তিনি (আসমা) বলেন, আমি সালাতে দাঁড়ালাম, এমনকি আমি দুর্বলতা অনুভব করতে লাগলাম। তখন আমি আমার মাথার ওপর পানি ঢালতে শুরু করলাম।

যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত শেষ করলেন, তখন তিনি আল্লাহর প্রশংসা ও স্তুতি জ্ঞাপন করলেন, অতঃপর বললেন: “এমন কোনো জিনিস নেই যা আমি এর আগে দেখিনি, কিন্তু আমি আমার এই সালাতের স্থানে দাঁড়িয়ে তা দেখেছি, এমনকি জান্নাত ও জাহান্নামও। আর আমার নিকট ওহী প্রেরণ করা হয়েছে যে, তোমাদেরকে কবরের মধ্যে দাজ্জালের ফিতনার মতোই – অথবা তার কাছাকাছি – ফিতনার সম্মুখীন করা হবে।” (আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি নিশ্চিত নই যে তিনি দুটির মধ্যে কোনটি বলেছিলেন)।

“তোমাদের প্রত্যেকের কাছে (ফিরিশতা) এসে জিজ্ঞেস করবে: এই লোক সম্পর্কে তোমার জ্ঞান কী? তখন মু'মিন বা ইয়াকীনকারী (দৃঢ় বিশ্বাসী) ব্যক্তি – (আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি নিশ্চিত নই যে তিনি দুটির মধ্যে কোনটি বলেছিলেন) – সে বলবে: ইনি হলেন মুহাম্মাদ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। তিনি আমাদের নিকট স্পষ্ট নিদর্শনাবলী ও হিদায়াত নিয়ে এসেছিলেন। অতঃপর আমরা সাড়া দিয়েছি, ঈমান এনেছি এবং তাঁর অনুসরণ করেছি। তখন তাকে বলা হবে: তুমি শান্তিতে ঘুমিয়ে থাকো। আমরা জানতাম যে তুমি অবশ্যই ইয়াকীনকারী (দৃঢ় বিশ্বাসী) ছিলে। আর মুনাফিক বা সন্দেহ পোষণকারী ব্যক্তি – (আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমি নিশ্চিত নই যে তিনি দুটির মধ্যে কোনটি বলেছিলেন) – সে বলবে: আমি জানি না, আমি লোকদেরকে কিছু বলতে শুনেছিলাম, তাই আমিও তাই বলেছিলাম।”