আল-জামি` আল-কামিল
3748 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"معيشة ضنكا - قال: عذاب القبر".
صحيح: رواه الحاكم (2/ 381)، -وعنه البيهقي في"إثبات عذاب القبر" (71) - عن أبي زكريا العنبري، ثنا محمد بن عبد السلام، ثنا إسحاق، أنبأ النضر بن شُميل، ثنا حماد بن سلمة، عن أبي حازم المدني، عن النعمان بن أبي عياش، عن أبي سعيد فذكره.
وقال:"صحيح على شرط مسلم". وقال ابن كثير في تفسيره:"إسناده جيد".
ورواه عبد الرزاق (6741) عن ابن عيينة، عن أبي حازم، عن أبي سلمة، عن أبي سعيد الخدري قال: {فَإِنَّ لَهُ مَعِيشَةً ضَنْكًا} يضيق عليه قبره حتى تختلف أضلاعه، ولم يرفعه، والرفع زيادة في العلم وهي مقبولة عند جماهير أهل العلم.
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "(যাদের জন্য রয়েছে) সংকীর্ণ জীবন" (মাঈশাতান দ্বাংকান) এর অর্থ হলো: কবরের শাস্তি।
3749 - عن أنس بن مالك أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن العبد إذا وضع في قبره وتولَّى عنه أصحابه -إنه يسمع قرعَ نعالهم- أتاه ملكان فيقعدانه فيقولان: ما كنت تقول في هذا الرجل لمحمد صلى الله عليه وسلم؟ فأما المؤمن فيقول: أشهد أنه عبد الله ورسوله، فيقال له: انظر إلى مقعدك من النار، قد أبدلك الله به مقعدًا من الجنة فيراهما جميعًا، وأما المنافق والكافر فيقال له: ما كنتَ تقول في هذا الرجل؟ فيقول: لا أدري، كنتُ أقول ما يقول الناس، فيقال: لا دَريتَ ولا تليتَ، ويضربُ بمطارق من حديد ضربةً، فيصيحُ صيحةً يسمعها من يليه غيرَ الثقلين".
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1338)، ومسلم في صفة الجنة (2870/ 71) كلاهما من حديث يزيد بن زريع، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس فذكره، ولفظهما قريب.
وفي مسلم: قال قتادة: وذكر لنا أن يُفسح له في قبره سبعون ذراعًا، ويُملأ عليه خضِرًا إلى يوم يُبعثون.
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বান্দাকে যখন তার কবরে রাখা হয় এবং তার সঙ্গীরা তার কাছ থেকে চলে যায় – তখন সে তাদের জুতার শব্দ শুনতে পায় – তখন দুজন ফেরেশতা তার কাছে আসেন এবং তাকে বসান। তারা তাকে বলেন: তুমি এই ব্যক্তি (মুহাম্মদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে কী বলতে? তখন মুমিন ব্যক্তি বলে: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, তিনি আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল। তখন তাকে বলা হয়: জাহান্নামে তোমার যে আসন ছিল তা দেখো, আল্লাহ তার পরিবর্তে তোমাকে জান্নাতে আসন দান করেছেন। ফলে সে দুটি আসনই দেখতে পায়। আর মুনাফিক ও কাফিরকে জিজ্ঞেস করা হয়: তুমি এই ব্যক্তি সম্পর্কে কী বলতে? সে বলে: আমি জানি না, মানুষ যা বলতো আমিও তাই বলতাম। তখন তাকে বলা হয়: তুমি জানলে না এবং অনুসরণও করলে না! অতঃপর তাকে লোহার হাতুড়ি দিয়ে এমন জোরে আঘাত করা হয় যে, মানুষ ও জিন ছাড়া তার আশপাশের সবাই তার চিৎকার শুনতে পায়।"
3750 - عن عبد الله بن عمر قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إن أحدكم إذا مات عرض عليه مقْعَدُه بالغداة والعشيِّ، إن كان من أهل الجنة فمن أهل الجنة، وإن كان من أهل النار فمن أهل النار، يقال له: هذا مقعدك حتى يبعثك الله إلى يوم القيامة".
متفق عليه: رواه مالك في الجنائز (47) عن نافع، عن ابن عمر فذكره.
ورواه البخاري في الجنائز (1379) عن إسماعيل، ومسلم في الجنة (2866) عن يحيى بن يحيي -كلاهما عن مالك به مثله.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তোমাদের মধ্যে কেউ যখন মারা যায়, তখন সকাল-সন্ধ্যায় তার অবস্থানস্থল তাকে দেখানো হয়। যদি সে জান্নাতের অধিবাসী হয়, তবে জান্নাতের (স্থান); আর যদি সে জাহান্নামের অধিবাসী হয়, তবে জাহান্নামের (স্থান)। তাকে বলা হয়, ‘এটাই তোমার বিশ্রামস্থল, যতক্ষণ না আল্লাহ কিয়ামতের দিন তোমাকে পুনরুত্থিত করেন’।”
3751 - عن البراء بن عازب، قال: خرجنا مع النبي صلى الله عليه وسلم في جنازة رجل من الأنصار، فانتهينا إلى القبر، ولما يُلْحد، فجلس رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، وجلسنا حوله، كأنّ على رؤوسنا الطير، وفي يده عودٌ ينكُتُ به في الأرض، فرفع رأسَه، فقال:"استعيذوا بالله من عذاب القبر" مرّتين أو ثلاثًا، ثم قال:"إنَّ العبدَ المؤمن إذا كان في انقطاع من الدنيا وإقبال من الآخرة، نزل إليه ملائكة من السماء بيضُ الوجوه، كأنَّ وجوهَهُمُ الشمسُ، معهم كَفَنٌ مِن أكْفَانِ الجَنَّةِ، وحَنُوطٌ مِن حَنُوطِ الجنَّة، حتى يجلِسُوا منه مَدَّ البصر، ثم يجئُ ملكُ الموت عليه السلام حتى يجلس عند رأسه، فيقول: أيَّتُها النفس الطيِّبة، اخْرُجي إلى مغفرة من الله ورضوان".
قال:"فتخرجُ تسيل كما تسيل القطرة من في السقاء فيأخذُها، فإذا أخذها لم
يَدَعُوها في يده طرفةَ عين حتى يأخذوها، فيجعلوها في ذلك الكفن، وفي ذلك الحنوط، ويخرج منها كأطيب نفحة مسْكٍ وُجِدَتْ على وجه الأرض".
قال:"فيصعدون بها، فلا يمُرُّون -يعني بها- على ملأ من الملائكة إلا قالوا: ما هذا الروحُ الطيب؟ ! فيقولون: فلان بن فلان، بأحسن أسمائه التي كانوا يُسَمُّونه بها في الدنيا، حتى ينتهوا بها إلى السماء الدنيا، فيستفتحون له، فيفتح لهم فيشيِّعُهُ من كل سماء مُقَرَّبُوها إلى السماء التي تليها، حتى يُنْتَهَى به إلى السماء السابعة، فيقولُ الله عز وجل: اكتبوا كتاب عبدي في عِلِّيين، وأَعيدُوه إلى الأرض، فإني منها خلقتُهم، وفيها أعيدُهُم، ومنها أُخرجُهُمْ تارة أخرى".
قال:"فتعاد روحُه في جَسَدِه، فيأتيه مَلَكان، فَيُجْلِسَانِه، فيقولان له: من رَبُّكَ؟ فيقولُ: رَبِّيَ الله، فيقولان له: ما دِينُكَ؟ فيقولُ: ديني الإسلامُ، فيقولان له: ما هذا الرَّجُلُ الذي بُعِثَ فيكُمْ؟ فيقول: هو رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فيقولان له: وما عِلْمُك؟ فيقول: قرأتُ كتاب الله، فآمنتُ به وصَدَّقتُ، فيُنادي مناد في السماء: أن صدق عبدي، فأفْرِشُوه من الجنَّةِ، وأَلْبِسُوهُ من الجنَّة، وَافْتَحُوا له بابًا إلى الجنَّة".
قال:"فيأتيه من رَوْحِها وطيبها، ويُفْسَحُ له في قبره مَدَّ بصره".
قال:"ويأْتيه رجل حسن الوجه، وحسن الثياب، طيبُ الريح، فيقول: أبْشِرْ بالذي يَسُرُّكَ، هذا يومُكَ الذي كُنْتَ توعدُ، فيقول له: من أنتَ؟ فوجهُك الوجه يجيء بالخير، فيقول: أنا عملُكَ الصالحُ، فيقول: ربِّ أقِم الساعة حتى أرجعَ إلى أهلي ومالي".
قال:"وإنَّ العبد الكافر إذا كان في القطاع من الدنيا وإقبال من الآخرة، نزل إليه من السماء ملائكةٌ سُودُ الوجوه، معهم المُسُوحُ، فيجلسُون منه مَدَّ البصر، ثم يجيءُ ملَكُ الموتِ حتى يجلِسَ عندَ رأسه، فيقولُ: أيَّتُها النفسُ الخبيثةُ! ، اخْرُجي إلى سَخَطٍ مِنَ الله وغَضَب".
قال:"فتفرَّقُ في جسده، فينتَزِعُها كما يُنْتَزَعُ السُّفُّودُ من الصُّوفِ المبلول، فيأْخُذُها، فإذا أخذها لم يَدَعُوها في يده طرفة عين حتى يجعلوها في تلك المُسُوح، ويخرج منها كأنتنِ ريح جيفةٍ وُجدتْ على وجه الأرض، فيصعدون بها، فلا يَمُرُّوَنَ بها على ملأ من الملائكة إلا قالوا: ما هذا الروحُ الخَبيثُ؟ ! فيقولون:
فلانُ بن فلانٍ، بأقبح أسمائه التي كان يُسَمَّى بها في الدنيا، حتى يُنْتَهَى به إلى السماء الدنيا، فيُسْتَفْتَح له، فلا يفتح له" ثم قرأ رسول الله صلى الله عليه وسلم: {لَا تُفَتَّحُ لَهُمْ أَبْوَابُ السَّمَاءِ وَلَا يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ حَتَّى يَلِجَ الْجَمَلُ فِي سَمِّ الْخِيَاطِ} [الأعراف: 40] فيقول الله عز وجل: اكتبوا كتابَهُ في سجِّين في الأرض السُّفْلي، فتُطْرَحُ رُوحُه طرحًا". ثم قرأ: {وَمَنْ يُشْرِكْ بِاللَّهِ فَكَأَنَّمَا خَرَّ مِنَ السَّمَاءِ فَتَخْطَفُهُ الطَّيْرُ أَوْ تَهْوِي بِهِ الرِّيحُ فِي مَكَانٍ سَحِيقٍ} [الحج: 31] فتعاد رُوحُهُ في جسده، ويأتيه ملكان، فيُجلسانه، فيقولان له: من ربك؟ فيقول: هاه هاه لا أدري، فيقولان له: ما دينُك؟ فيقول: هاه هاه لا أدري، فيقولان له: ما هذا الرجل الذي بُعث فيكم؟ فيقولُ: هاه هاه لا أدري، فينادي منادٍ من السماء أن كذب فأَفْرِشوا له من النار، وافْتَحُوا له بابا إلى النار، فيأتيه من حَرِّها وسَمُومها، ويُضَيَّقُ عليه قبْرُهُ حتَّى تَخْتَلِفَ فيه أضلاعه، ويأتيه رجل قبيحُ الوجه، قبيحُ الثياب، مُنْتِنُ الريح، فيقول: أبْشِرْ بالذي يَسُوؤكَ، هذا يَومُكَ الذي كنت تُوعد، فيقول: من أنت؟ فوجهُك الوجهُ الذي يجي بالشرِّ، فيقول: أنا عملُك الخبيثُ، فيقول: ربِّ لا تُقِم الساعة".
حسن: رواه أبو داود (4753) عن هنَّاد بن السري، عن أبي معاوية، عن الأعمش، عن المنهال، عن زاذان، عن البراء فذكر الحديث.
والحديث رواه هناد بن السري في كتابه"الزهد" (339) والإمام أحمد (18534) كلاهما عن أبي معاوية، واللفظ للإمام أحمد، ولفظ هناد نحوه. ورواه النسائي (2001)، وابن ماجه (1549) كلاهما من طريق المنهال بن عمرو به مختصرًا جدًّا.
وإسناده حسن من أجل المنهال بن عمرو فإنه"صدوق"، وقد صحَّحه الحاكم (1/ 37 - 39) وقال:"على شرط الشيخين، فقد احتجا جميعًا بالمنهال بن عمرو وزاذان أبي عمر الكندي، وفي هذا الحديث فوائد كثيرة لأهل السنة، وقمع للمبتدعة، ولم يخرجاه بطوله".
قلت: ليس كما قال، فإن المنهال بن عمرو من رجال البخاري فقط، وأما زاذان وهو: أبو عمر الكندي فهو من رجال مسلم، وأخرج له البخاري في"الأدب المفرد" وصحَّحه أيضًا البيهقي وأخرجه في"إثبات عذاب القبر" (27) وقال: هذا حديث كبير صحيح الاسناد، رواه جماعة من الأئمة الثقات عن الأعمش" وأخرجه أيضًا في"شعب الإيمان" (395) وقال:"هذا حديث صحيح الإسناد".
وأما قول ابن حبان في صحيحه (7/ 387):"خبر الأعمش عن المنهال بن عمرو، عن زاذان، عن البراء، - سمعه الأعمش عن الحسن بن عمارة، عن المنهال بن عمرو، وزاذان لم يسمعه من البراء، فلذلك لم أخرجه" فقد ردوا عليه بأن زاذان صرَّح بقوله: سمعتُ البراء بن عازب يقول:
فذكر الحديث، ذكره أبو عوانة الإسفرائيني في"صحيحه" كما قال ابن القيم في"تهذيب السنن" (4/ 337).
আল-বারা ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এক আনসারী ব্যক্তির জানাযায় বের হলাম। আমরা কবরের কাছে পৌঁছলাম, কিন্তু তখনো কবর খনন (লাহদ) করা হয়নি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বসলেন এবং আমরা তাঁর চারপাশে এমনভাবে বসলাম যেন আমাদের মাথার ওপর পাখি বসে আছে (অর্থাৎ স্থির ও নীরব)। তাঁর হাতে একটি লাঠি ছিল, যা দিয়ে তিনি মাটিতে খুঁটছিলেন। এরপর তিনি মাথা তুললেন এবং বললেন: "তোমরা কবরের আযাব থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় চাও।" - দু’বার অথবা তিনবার।
অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই মু'মিন বান্দা যখন দুনিয়া থেকে বিদায় নিয়ে আখিরাতের দিকে যাত্রা শুরু করে, তখন আসমান থেকে একদল ফিরিশতা তার কাছে নেমে আসেন। তাদের চেহারা হবে শুভ্র, যেন তাদের মুখমণ্ডল সূর্য। তাদের সাথে থাকবে জান্নাতের কাফন ও জান্নাতের সুগন্ধি (হানূত)। তারা তার দৃষ্টির শেষ সীমা পর্যন্ত বসে থাকেন। এরপর মালাকুল মাউত (আঃ) এসে তার মাথার কাছে বসেন এবং বলেন: ‘হে পবিত্র রূহ! আল্লাহর ক্ষমা ও সন্তুষ্টির দিকে বেরিয়ে এসো।’"
তিনি বলেন: "তখন সেই রূহটি চামড়ার মশকের মুখ থেকে পানির ফোঁটার মতো সহজে বেরিয়ে আসে। মালাকুল মাউত তা গ্রহণ করেন। তিনি যখনই রূহটি গ্রহণ করেন, তখন অন্য ফিরিশতাগণ এক মুহূর্তের জন্যও তা তাঁর হাতে থাকতে দেন না, বরং দ্রুত তা নিয়ে সেই কাফন ও সুগন্ধির মধ্যে স্থাপন করেন। রূহটি থেকে পৃথিবীর বুকে পাওয়া সবথেকে উত্তম মৃগনাভির (কস্তুরীর) সুগন্ধির মতো সুঘ্রাণ বের হতে থাকে।"
তিনি বলেন: "ফিরিশতাগণ সেটি নিয়ে ওপরে উঠতে থাকেন। তারা যে ফিরিশতাদের দলের পাশ দিয়েই অতিক্রম করেন, তারা জিজ্ঞাসা করেন: ‘এই পবিত্র রূহটি কার?’ তখন তারা তার দুনিয়ায় প্রচলিত সবচেয়ে উত্তম নামটি উল্লেখ করে বলেন: ‘এই রূহটি অমুক, অমুকের পুত্র।’ এভাবে তারা তাকে নিয়ে প্রথম আসমানে পৌঁছান। তাদের জন্য দরজা খোলার অনুরোধ করা হলে তা খুলে দেওয়া হয়। এভাবে প্রত্যেক আসমানের নিকটবর্তী ফিরিশতারা তাকে বিদায় জানাতে জানাতে পরবর্তী আসমান পর্যন্ত পৌঁছিয়ে দেন, যতক্ষণ না তাকে নিয়ে সপ্তম আসমানে পৌঁছানো হয়। তখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলেন: ‘আমার বান্দার আমলনামা ইল্লিয়্যীনে লিখে রাখো এবং তাকে পৃথিবীতে ফিরিয়ে দাও। কারণ আমি তাদেরকে মাটি থেকেই সৃষ্টি করেছি, সেখানেই তাদেরকে ফিরিয়ে দেবো এবং সেখান থেকেই তাদেরকে আরেকবার বের করে আনবো।"
তিনি বলেন: "তখন তার রূহ তার দেহে ফিরিয়ে দেওয়া হয়। দুজন ফিরিশতা তার কাছে এসে তাকে বসান। তারা তাকে জিজ্ঞাসা করেন: ‘তোমার রব কে?’ সে বলে: ‘আমার রব আল্লাহ।’ তারা আবার জিজ্ঞাসা করেন: ‘তোমার দ্বীন কী?’ সে বলে: ‘আমার দ্বীন ইসলাম।’ তারা জিজ্ঞাসা করেন: ‘এই ব্যক্তি কে, যাকে তোমাদের মাঝে পাঠানো হয়েছিল?’ সে বলে: ‘তিনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)।’ তারা জিজ্ঞাসা করেন: ‘তুমি কীভাবে জানলে?’ সে বলে: ‘আমি আল্লাহর কিতাব পড়েছি, তার প্রতি ঈমান এনেছি এবং তাকে সত্য বলে মেনে নিয়েছি।’ তখন আসমান থেকে একজন ঘোষণাকারী ঘোষণা করেন: ‘আমার বান্দা সত্য বলেছে। অতএব, তাকে জান্নাতের বিছানা বিছিয়ে দাও, তাকে জান্নাতের পোশাক পরিয়ে দাও এবং তার জন্য জান্নাতের দিকে একটি দরজা খুলে দাও।"
তিনি বলেন: "তার কাছে জান্নাতের শীতল বাতাস ও সুগন্ধি আসতে থাকে এবং তার কবরকে তার দৃষ্টির শেষ সীমা পর্যন্ত প্রশস্ত করে দেওয়া হয়।" তিনি বলেন: "তার কাছে একজন সুন্দর চেহারার, সুন্দর পোশাক পরিহিত, সুগন্ধিময় লোক এসে বলে: ‘তুমি এমন বস্তুর সুসংবাদ গ্রহণ করো যা তোমাকে আনন্দিত করবে। এই হলো তোমার সেই দিন, যার ওয়াদা তোমাকে দেওয়া হয়েছিল।’ সে তাকে জিজ্ঞেস করে: ‘তুমি কে? তোমার চেহারাই তো কল্যাণ নিয়ে আসে।’ সে বলে: ‘আমি তোমার নেক আমল।’ তখন সে বলে: ‘হে আমার রব! কিয়ামত কায়েম করো, যেন আমি আমার পরিবার ও সম্পদের কাছে ফিরে যেতে পারি।’"
তিনি বলেন: "আর কাফির বান্দা যখন দুনিয়া থেকে বিদায় নিয়ে আখিরাতের দিকে যাত্রা শুরু করে, তখন আসমান থেকে একদল ফিরিশতা তার কাছে নেমে আসেন। তাদের চেহারা হবে কালো, তাদের সাথে থাকবে মোটা (কর্কশ) চট। তারা তার দৃষ্টির শেষ সীমা পর্যন্ত বসে থাকেন। এরপর মালাকুল মাউত এসে তার মাথার কাছে বসেন এবং বলেন: ‘হে অপবিত্র রূহ! আল্লাহর ক্রোধ ও অসন্তুষ্টির দিকে বেরিয়ে এসো।’"
তিনি বলেন: "তখন রূহটি তার দেহের মধ্যে ছড়িয়ে যায়। তাকে ভেজা পশম থেকে লোহার কাঁটা বের করার মতো কষ্ট দিয়ে টেনে বের করা হয়। মালাকুল মাউত তা গ্রহণ করেন। তিনি যখনই রূহটি গ্রহণ করেন, তখন অন্য ফিরিশতাগণ এক মুহূর্তের জন্যও তা তাঁর হাতে থাকতে দেন না, বরং দ্রুত তা নিয়ে সেই চটের মধ্যে রেখে দেন। রূহটি থেকে পৃথিবীর বুকে পাওয়া সবচেয়ে পচা লাশের দুর্গন্ধে মতো গন্ধ বের হতে থাকে। এরপর তারা তা নিয়ে ওপরে উঠতে থাকেন। তারা যে ফিরিশতাদের দলের পাশ দিয়েই অতিক্রম করেন, তারা জিজ্ঞাসা করেন: ‘এই অপবিত্র রূহটি কার?’ তখন তারা তার দুনিয়ায় প্রচলিত সবচেয়ে জঘন্য নামটি উল্লেখ করে বলেন: ‘এই রূহটি অমুক, অমুকের পুত্র।’ এভাবে তারা তাকে নিয়ে প্রথম আসমানে পৌঁছান। তাদের জন্য দরজা খোলার অনুরোধ করা হয়, কিন্তু দরজা খোলা হয় না।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিলাওয়াত করলেন: {তাদের জন্য আসমানের দরজা খোলা হবে না, আর তারা জান্নাতে প্রবেশ করবে না, যতক্ষণ না সূচের ছিদ্র দিয়ে উট প্রবেশ করে।} [সূরা আল-আ'রাফ: ৪০] তখন আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলেন: ‘তার আমলনামা নিম্নতম স্তর সิจ্জীনে লিখে রাখো।’ এরপর তার রূহকে ছুড়ে ফেলে দেওয়া হয়।" অতঃপর তিনি তিলাওয়াত করলেন: {যে আল্লাহর সাথে শরীক করে, সে যেন আকাশ থেকে পড়ে গেল; অতঃপর পাখী তাকে ছোঁ মেরে নিয়ে গেল, অথবা বাতাস তাকে দূরবর্তী কোনো স্থানে নিক্ষেপ করল।} [সূরা আল-হাজ্জ: ৩১]
তখন তার রূহ তার দেহে ফিরিয়ে দেওয়া হয়। দুজন ফিরিশতা তার কাছে এসে তাকে বসান। তারা তাকে জিজ্ঞাসা করেন: ‘তোমার রব কে?’ সে বলে: ‘হাহ! হাহ! আমি জানি না।’ তারা আবার জিজ্ঞাসা করেন: ‘তোমার দ্বীন কী?’ সে বলে: ‘হাহ! হাহ! আমি জানি না।’ তারা জিজ্ঞাসা করেন: ‘এই ব্যক্তি কে, যাকে তোমাদের মাঝে পাঠানো হয়েছিল?’ সে বলে: ‘হাহ! হাহ! আমি জানি না।’ তখন আসমান থেকে একজন ঘোষণাকারী ঘোষণা করেন: ‘সে মিথ্যা বলেছে। অতএব, তাকে জাহান্নামের বিছানা বিছিয়ে দাও, তার জন্য জাহান্নামের দিকে একটি দরজা খুলে দাও।’ তখন তার কাছে জাহান্নামের উষ্ণ বাতাস ও বিষাক্ত তাপ আসতে থাকে এবং তার কবরকে এমনভাবে সংকুচিত করে দেওয়া হয় যে, তার পাঁজরের হাড়গুলো একে অপরের সাথে মিশে যায়। তার কাছে একজন কদাকার চেহারার, খারাপ পোশাক পরিহিত, দুর্গন্ধময় লোক এসে বলে: ‘তুমি এমন বস্তুর সুসংবাদ গ্রহণ করো যা তোমাকে খারাপ লাগবে। এই হলো তোমার সেই দিন, যার ওয়াদা তোমাকে দেওয়া হয়েছিল।’ সে জিজ্ঞাসা করে: ‘তুমি কে? তোমার চেহারাই তো অমঙ্গল নিয়ে আসে।’ সে বলে: ‘আমি তোমার অসৎ আমল।’ তখন সে বলে: ‘হে আমার রব! কিয়ামত কায়েম করো না।’"
3752 - عن أبي هريرة نحو حديث البراء إلا أنه قال:"ارقد رقدة المتقين المؤمنين" ويقال للفاجر:"ارقد منهوشًا". قال:"فما من دابة إلا ولها في جسده نصيب".
حسن: رواه الحاكم (1/ 38) وعنه البيهقي في إثبات"عذاب القبر" (36) عن أبي الحسن محمد بن عبد الله العمري، ثنا محمد بن إسحاق، ثنا علي بن المنذر، ثنا محمد بن فُضيل، حدثني أبي، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه مدلس ولكنه صرَّح بالتحديث. وهو حسن الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (এই হাদীসটি) বারাআ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের অনুরূপ, তবে তিনি বলেছেন: (কবরে মুমিনকে বলা হয়) "তুমি মুত্তাকী মুমিনদের ঘুম ঘুমাও।" আর পাপীকে বলা হয়: "তুমি দংশিত অবস্থায় ঘুমাও।" তিনি বলেন: "এমন কোনো প্রাণী নেই, যার জন্য তার দেহে অংশ বরাদ্দ নেই।"
3753 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا قُبر الميتُ (أو قال أحدكم) أتاه ملكان أسودان أزرقان، يقال لأحدهما: المنكرُ والآخرُ النكيرُ، فيقولان: ما كنت تقول في هذا الرجل؟ فيقولُ ما كان يقولُ: هو عبد الله ورسولُه، أشهدُ أن لا إله إلا الله وأن مُحمدًا عبدُهُ ورسولُه، فيقولان: قد كنا نعلمُ أنَّكَ تقولُ هذا، ثم يُفْسَحُ له في قبره سبعون ذراعًا في سبعينَ، ثم يُنوَّرُ له فيه، ثم يقال له: نَمْ، فيقولُ أرْجعُ إلى أهلي فأخْبرُهُم؟ فيقولان: نَمْ كنومَةِ العروسِ الذي لا يُوقِضُهُ إلا أحبُّ أهله إليه، حتى يبْعثَهُ الله من مَضْجَعِه ذلك. وإن كان مُنافقًا قال: سمعتُ الناسَ يقولونَ فقلتُ مثلهُ، لا أدري، فيقولان: قد كُنَّا نعلم أنك تقولُ ذلك، فيقالُ للأرضِ: التَثمي عليه. فتلْتَئمُ عليه. فتختلفُ أضلاعُهُ، فلا يَزالُ فيها مُعذَبًا حتى يبعَثَهُ الله من مضجَعِهِ ذلك".
حسن: رواه الترمذي (1071) عن أبي سلمة يحيى بن خلف، حدثنا بشر بن المفضل، عن عبد الرحمن بن إسحاق، عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي هريرة فذكر الحديث.
قال الترمذي: حسن غريب.
قلت: وهو كما قال، فإن فيه عبد الرحمن بن إسحاق بن عبد الله بن الحارث العامري المدني، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وبقية رجاله ثقات، وأخرجه ابن حبان (3117) من طريق عبد الرحمن بن إسحاق بإسناده مثله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন মৃত ব্যক্তিকে (অথবা তোমাদের মধ্যে কাউকে) কবরে রাখা হয়, তখন তার নিকট কালো এবং নীল বর্ণের দুইজন ফেরেশতা আসেন। তাদের একজনের নাম মুনকার এবং অন্যজনের নাম নাকীর। তারা উভয়ে বলেন: “তুমি এই ব্যক্তি (মুহাম্মদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে কী বলতে?” সে উত্তরে তা-ই বলে যা সে বলত: “তিনি আল্লাহর বান্দা ও তাঁর রাসূল। আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, আল্লাহ ছাড়া কোন ইলাহ নেই এবং মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল।” তারা উভয়ে বলেন: “আমরা জানতাম যে, তুমি এই কথাই বলবে।” অতঃপর তার জন্য তার কবর সত্তর হাত লম্বা ও সত্তর হাত চওড়া করে প্রশস্ত করে দেওয়া হয় এবং তাতে আলোকময় করা হয়। এরপর তাকে বলা হয়: “ঘুমাও।” সে বলে: “আমি কি আমার পরিবারের কাছে ফিরে যাব এবং তাদেরকে এ সংবাদ দেব?” তারা উভয়ে বলেন: “নববধূর ঘুমের মতো ঘুমাও, যাকে তার পরিবারের সবচেয়ে প্রিয়জন ছাড়া অন্য কেউ জাগিয়ে তোলে না, যতক্ষণ না আল্লাহ তাকে তার সেই শয়নস্থল থেকে পুনরুত্থিত করবেন।” আর যদি সে মুনাফিক হয়, তবে সে বলে: “আমি লোকদেরকে কিছু বলতে শুনেছি, তাই আমিও তাদের মতো বলেছি। আমি জানি না।” তারা উভয়ে বলেন: “আমরা জানতাম যে, তুমি এই কথাই বলবে।” অতঃপর মাটিকে বলা হয়: “তাকে চেপে ধরো।” তখন মাটি তাকে চেপে ধরে। ফলে তার পাঁজরগুলো একটি অন্যটির মধ্যে ঢুকে যায়। আল্লাহ তাকে তার সেই শয়নস্থল থেকে পুনরুত্থিত না করা পর্যন্ত সে এর মধ্যে শাস্তি পেতে থাকবে।
3754 - عن عائشة قالت: جاءت يهودية، فاستطعمتْ على بابي، فقالت: أطْعِموني، أعاذكم الله من فتنة الدّجال، ومن فتنة عذاب القبر، قالت: فلم أزل أحبسها، حتى جاء رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فقلتُ: يا رسول الله! ، ما تقولُ هذه اليهودية؟ قال:"وما تقولُ؟" قلت: تقول: أعاذكم الله من فتنة الدجال، ومن فتنة عذاب القبر! قالت: عائشة: فقام رسول الله صلى الله عليه وسلم، فرفع يدَيه مَدًّا يستعيذُ بالله من فتنة الدجال، ومن فتنة
عذاب القبر، ثم قال:"أما فتنة الدجال، فإنه لم يكن نبيٌّ إلا قد حذَّر أمَّته، وسأُحذِّرُكُموه تحذيرًا لم يحذِّرْه نبيٌّ أمته، إنه أعورُ، والله عز وجل ليس بأعور، مكتوبٌ بين عينيه: كافر، يقرؤُه كلُّ مؤمن، فأمَّا فتنة القبر، فبي تُفْتَنُون، وعَنّي تُسْألون، فإذا كان الرجلُ الصالحُ، أُجلس في قبره غير فزع، ولا مشعوف، ثم يقال له: فيم كنت؟ فيقول: في الإسلام -فيقالُ: ما هذا الرجلُ الذي كان فيكم؟ فيقولُ محمدٌ. رسول الله صلى الله عليه وسلم، جاءنا بالبيِّنات من عند الله عز وجل، فصَدَّقْناه، فيُفْرَجُ له فرجة قبل النار، فينظر إليها يحطِمُ بعضُها بعضًا، فيقال له: انظر إلى ما وقاك الله عز وجل، ثم يفرج له فُرْجَةٌ إلى الجنة، فينظر إلى زَهْرَتِها وما فيها، فيُقالُ له: هذا مَقْعَدُكَ منها، ويُقالُ: على اليَقِين كُنْتَ، وعَلَيْهِ مِتَّ، وعَلَيه تُبْعَثُ إن شاء الله. إذا كان الرجل السوء، أُجْلِسَ في قبره فزعًا مشعوفًا، فيقال له: فيمَ كنتَ؟ فيقولُ: لا أدري، فيُقال: ما هذا الرجُلُ الذي كان فيكم؟ فيقولُ: سَمِعْتُ الناس يقولون قولًا، فقُلْتُ كما قالوا، فتُفْرَجُ له فَرْجَةٌ قِبَلَ الجَنَّة، فينظُرُ إلى زَهْرَتِها وما فيها فيُقالُ له: انظُرْ إلى ما صَرَفَ الله عز وجل عنك، ثُمَّ يُفْرَجُ له فُرْجَةٌ قِبَلَ النَّار، فَيَنْظُرُ إليها يَحْطِمُ بعضها بعضًا، ويقالُ له: هذا مقعدك منها، كنتَ على الشَّكِّ، وعليه مِتَّ، وعليه تُبْعَث إن شاء الله، ثُمَّ يُعَذَّبُ".
صحيح: رواه الإمام أحمد (25089) عن يزيد بن هارون قال: أخبرنا ابن أبي ذئب، عن محمد بن عمرو بن عطاء، عن ذكوان، عن عائشة فذكرته.
وإسناده صحيح، وقد عزاه الهيثمي في"المجمع" (3/ 48 - 49) لأحمد وسكت عليه، وأورده المنذري في"الترغيب والترهيب" (4/ 267 - 269) وقال: رواه أحمد بإسناد صحيح".
وقولها:"مشعوف" من الشعف وهو شدة الفزع حتى يذهب بالقلب.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন ইহুদি মহিলা আমার দরজায় এসে খাবার চাইল। সে বলল, আমাকে খাবার দাও, আল্লাহ্ তোমাদেরকে দাজ্জালের ফিতনা ও কবরের আযাবের ফিতনা থেকে রক্ষা করুন।
তিনি (আয়িশা) বলেন: আমি তাকে বসিয়ে রাখলাম, যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আসলেন। আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! এই ইহুদি মহিলাটি কী বলছে? তিনি বললেন: "সে কী বলছে?" আমি বললাম: সে বলছে: আল্লাহ্ তোমাদেরকে দাজ্জালের ফিতনা ও কবরের আযাবের ফিতনা থেকে রক্ষা করুন!
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উঠে দাঁড়ালেন এবং দীর্ঘক্ষণ ধরে হাত তুলে দাজ্জালের ফিতনা ও কবরের আযাবের ফিতনা থেকে আল্লাহর কাছে আশ্রয় প্রার্থনা করলেন।
অতঃপর তিনি বললেন: "দাজ্জালের ফিতনার কথা হলো, এমন কোনো নবী আসেননি যিনি তাঁর উম্মতকে এ সম্পর্কে সতর্ক করেননি। আমি তোমাদেরকে এমনভাবে সতর্ক করব, যা কোনো নবী তাঁর উম্মতকে সতর্ক করেননি। সে হবে কানা (এক চোখ অন্ধ), আর আল্লাহ্ তাআলা কানা নন। তার দুই চোখের মাঝখানে 'কাফির' লেখা থাকবে, যা প্রত্যেক মু'মিন পড়তে পারবে।"
"আর কবরের ফিতনার কথা হলো, আমাকে দিয়েই তোমাদের পরীক্ষা করা হবে এবং আমাকে সম্পর্কেই তোমাদের জিজ্ঞাসা করা হবে।"
"যখন কোনো নেককার লোককে তার কবরে বসানো হবে, তখন সে ভীত বা উদ্বিগ্ন হবে না। অতঃপর তাকে জিজ্ঞেস করা হবে: তুমি কী অবস্থায় ছিলে? সে বলবে: ইসলামের মধ্যে ছিলাম।—তাকে বলা হবে: এই লোকটি কে, যিনি তোমাদের মাঝে ছিলেন? সে বলবে: ইনি হলেন মুহাম্মাদ, রাসূলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম। তিনি আমাদের কাছে আল্লাহ্ তাআলার নিকট থেকে সুস্পষ্ট প্রমাণাদি নিয়ে এসেছিলেন, আর আমরা তাঁকে বিশ্বাস করেছিলাম।"
"অতঃপর তার জন্য জাহান্নামের দিকে একটি পথ খুলে দেওয়া হবে, সে সেদিকে তাকিয়ে দেখবে যে তার অংশগুলো একে অপরের উপর পতিত হচ্ছে (বা জ্বলে উঠছে)। তাকে বলা হবে: আল্লাহ্ তাআলা তোমাকে যে বিপদ থেকে রক্ষা করেছেন, তা দেখো।"
"এরপর তার জন্য জান্নাতের দিকে একটি পথ খুলে দেওয়া হবে। সে জান্নাতের সৌন্দর্য ও তার মধ্যে যা কিছু আছে, তা দেখবে। তাকে বলা হবে: এটাই জান্নাতে তোমার ঠিকানা। তাকে আরও বলা হবে: তুমি দৃঢ় বিশ্বাসের উপর ছিলে, এর উপরই তোমার মৃত্যু হয়েছে এবং ইনশাআল্লাহ্ এর উপরেই তোমাকে পুনরুত্থিত করা হবে।"
"পক্ষান্তরে, যখন কোনো মন্দ লোককে তার কবরে বসানো হবে, তখন সে ভীত ও উদ্বিগ্ন হবে। তাকে জিজ্ঞেস করা হবে: তুমি কী অবস্থায় ছিলে? সে বলবে: আমি জানি না। তাকে বলা হবে: এই লোকটি কে, যিনি তোমাদের মাঝে ছিলেন? সে বলবে: আমি লোকজনকে কিছু বলতে শুনেছি, তাই আমিও তাদের মতোই বলেছি।"
"তখন তার জন্য জান্নাতের দিকে একটি পথ খুলে দেওয়া হবে। সে তার সৌন্দর্য ও তার মধ্যে যা কিছু আছে, তা দেখবে। তাকে বলা হবে: আল্লাহ্ তাআলা তোমার থেকে যা ফিরিয়ে নিয়েছেন, তা দেখে নাও।"
"অতঃপর তার জন্য জাহান্নামের দিকে একটি পথ খুলে দেওয়া হবে, সে সেদিকে তাকিয়ে দেখবে যে তার অংশগুলো একে অপরের উপর পতিত হচ্ছে (বা জ্বলে উঠছে)। তাকে বলা হবে: এটাই জাহান্নামে তোমার ঠিকানা। তুমি সন্দেহের মধ্যে ছিলে, এর উপরই তোমার মৃত্যু হয়েছে এবং ইনশাআল্লাহ্ এর উপরেই তোমাকে পুনরুত্থিত করা হবে। এরপর তাকে আযাব দেওয়া হবে।"
3755 - عن أبي الزبير أنه سأل جابر بن عبد الله، عن فتَّانَي القَبْر، فقال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن هذه الأمَّة تُبتلى في قُبورِها، فإذا أُدْخِلَ المُؤْمِنُ قَبْرَه، وتَوَلَّى عنه أصحابُه، جاء مَلَكٌ شديدُ الانْتِهار، فيقولُ له: ما كُنْتَ تقولُ في هذا الرَّجلِ؟ فيقولُ المُؤمِنُ: أقولُ: إنَّه رسولُ الله وعَبْدُه، فيقولُ له المَلَكُ: انظُرْ إلى مَقْعَدِكَ الذي كان لك في النار قد أنجاكَ الله منه، وأبدَلَكَ بمَقْعَدِكَ الذي تَرَى من النار، مَقْعَدَكَ الذي تَرَى من الجنة، فيراهُما كِلاهُما، فيقولُ المُؤْمِنُ: دَعُوني أُبَشِّرْ أهلي، فيُقالُ له: اسْكُنْ، وأمَّا المُنافِقُ، فيُقْعَدُ إذا تَوَلَّى عنه أهله، فيقال له: ما كُنْت تقولُ في هذا
الرجل؟ فيقولُ: لا أدري، أقولُ ما يقولُ الناسُ، فيقال له: لا دَرَيْتَ، هذا مقْعَدُكَ الذي كان لَكَ من الجنة، قد أُبْدِلْتَ مكانَه مَقْعدَكَ من النار".
قال جابر: فسمعتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"يُبْعَثُ كُلُّ عَبْدٍ في القبرِ على ما مات: المؤمنُ على إيمانه، والمنافقُ على نفاقِه".
صحيح: رواه عبد الرزاق (6744، 6746) عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يقول فذكره. وإسناده صحيح.
ورواه الإمام أحمد (14722)، والطبراني في"الأوسط" (9072) كلاهما من طريق ابن لهيعة، عن أبي الزبير أنه سأل جابر بن عبد الله واللفظ للإمام أحمد، وابن لهيعة فيه كلام، ولكنه قد توبع في الإسناد الأول.
وأما ما رُوي عن عبد الله بن عمرو أن رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر فتَّان القبور، فقال عمر: أتُرد علينا عقولُنا يا رسول الله؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نعم كهيتكم اليوم" فقال عمر:"بفيه الحجر". فهو ضعيف.
رواه الإمام أحمد (6603) عن حسن (ابن موسى الأشيب) حدثنا ابن لهيعة، حدثني حُيي بن عبد الله، أن أبا عبد الرحمن حدَّثه، عن عبد الله بن عمرو فذكره.
وابن لهيعة فيه كلام معروف، ولكن رواه ابن حبان في صحيحه (3115) من طريق ابن وهب، قال: حدثني حُييُّ بن عبد الله بإسناده فذكره.
وحُيَيُّ بن عبد الله المعافري قال فيه أحمد:"أحاديثه مناكير"، وقال البخاري:"فيه نظر"، وقال النسائي:"ليس بالقوي"، وذكره العقيلي وابن الجوزي وغيرهما في"الضعفاء"، وتساهل فيه ابن حبان فأورده في"الثقات" وأخرج عنه في صحيحه، ولعله اعتمد فيه على قول ابن معين:"ليس به بأس"، ولم ينظر إلى كلام الأئمة السابقين.
وكذلك قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 47):"رواه أحمد والطبراني في"الكبير"، ورجال أحمد رجال الصحيح" وهو ليس كما قال، لأن ابن لهيعة وحُيَيَّ بن عبد الله ليسا من رجال الصحيح.
والفتان هما الملكان السائلان.
وقصة فتاني القبر أخرجها الحافظ البيهقي فيه"إثبات عذاب القبر" (116) بعدة أسانيد، وها أنا أسوقها مع التعليق عليها.
قال البيهقي رحمه الله تعالى: أخبرني محمد بن عبد الله الحافظ، ومحمد بن موسى بن الفضل قالا: ثنا أبو العباس محمد بن يعقوب، ثنا محمد بن إسحاق الصغاني، ثنا منصور بن أبي مزاحم، ثنا إبراهيم بن سعد، عن أبيه، عن عطاء بن يسار قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لعمر بن الخطاب رضي الله عنه:"يا عمر! كيف بك إذا أنت أعد لك من الأرض ثلاث أذرع وشبر في عرض ذراع وشبر، ثم قام إليك أهلوك فغسلوك، وكفنوك، وحنطوك، ثم احتملوك حتى يغيبوك ثم يهيلوا عليك
التراب، ثم انصرفوا عنك فأتاك فتانا القبر"منكر" و"نكير" أصواتهما مثل الرعد القاصف، وأبصارهما كالبرق الخاطف، قد سدلا شعورهما فتلتلاك وتوهلاك وقالا: من ربك؟ وما دينك؟".
قال: يا نبي الله! ويكون معي قلبي الذي معي اليوم؟ . قال:"نعم". قال: إذًا أكفيكهما بالله تعالي.
قلت: وهذا مرسل.
وقال رحمه الله تعالى: وأخبرنا محمد بن عبد الله، ومحمد بن موسى قالا: حدثنا أبو العباس، ثنا محمد بن إسحاق، ثنا محمد بن عمر، ثنا عبد الله بن الفضيل بن أبي عبد الله، عن أبيه، عن أبي غطفان، عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كيف أنت يا عمر إذا انتهى بك إلى الأرض فحفر لك ثلاثة أذرع وشبر، ثم أتاك"منكر" و"نكير" أسودان، يجران أشعارهما، كأن أصواتهما الرعد القاصف، وكأن أعينهما البرق الخاطف، يحفران الأرض بأنيابهما، فأجلساك فزعًا فتلتلاك وتوهلاك؟". قال: يا رسول الله! وأنا يومئذ على ما أنا عليه؟ . قال:"نعم". قال: أكفيكهما بإذن الله يا رسول الله.
قلت: وفيه محمد بن عمر وهو الواقدي متروك.
وقال رحمه الله تعالى: وأخبرنا أبو عبد الله الحافظ في (التاريخ) أخبرني سليمان بن محمد بن ناجية، ثنا محمد بن إسحاق بن راهويه، ثنا علي بن عبد الله المدني، ثنا مفضل بن صالح، عن إسماعيل بن [أبي] خالد، عن أبي سهيل، عن أبيه، عن عمر بن الخطاب رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا عمر! كيف أنت إذا كنت في أربع من الأرض في ذراعين فرأيت"منكرًا، و"نكيرًا؟". قال: يا رسول الله! وما منكر ونكير؟ قال:"فتانا القبر، أبصارهما كالبرق الخاطف، وأصواتهما كالرعد القاصف، معهما"مرزبة" لو اجتمع عليها أهل مني ما استطاعوا رفعها، هي أهون عليهما من عصاي هذه، فامتحناك فإن تعاييت أو تلويت ضرباك بها ضربة تصير بها رمادًا". قال: يا رسول الله: وإني على حالتي هذه؟ قال:"نعم". قال: أرجو أكفيكهما.
قلت: قال في"الاعتقاد" (ص 223): غريب بهذا الإسناد، تفرد به مفضل هذا، وقد رويناه من وجه آخر عن ابن عباس، ومن وجه آخر صحيح، عن عطاء بن يسار، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلًا في قصة عمر، وقال:"ثلاثة أذرع في عرض ذراع وشبر" ولم يذكر المرزبة، انتهى.
قلت: مفضل بن صالح أبو جميلة الكوفي النخَّاس - بالنون والخاء - قال فيه البخاري وغيره: منكر الحديث" وأورد حديثه هذا الذهبي في"الميزان" (4/ 168) من وجه آخر عن مفضل بن صالح، حدثنا إسماعيل من أبي خالد، عن أبي شمر، عن عمر فذكره.
وقال: أبو شهم، ويقال: أبو شمر فيه جهالة. وقال في ترجمة"أبو شهر" عن عمر، وعنه ابن أبي خالد بخبر منكر: في منكر ونكير، مر في مفضل بن صالح، لا يُعرف، وقيل: مصحف أبو شهم، وقيل: أبو شمر، وقيل: أبو سُهيل" انتهى (4/ 537).
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি:
নিশ্চয় এই উম্মতকে তাদের কবরে পরীক্ষা করা হবে। যখন কোনো মুমিনকে তার কবরে প্রবেশ করানো হবে এবং তার সঙ্গী-সাথীরা তার কাছ থেকে ফিরে যাবে, তখন কঠিন ধমক প্রদানকারী একজন ফেরেশতা তার কাছে আসবেন এবং তাকে বলবেন: এই ব্যক্তি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে তুমি কী বলতে? মুমিন বলবে: আমি বলি যে, তিনি আল্লাহর রাসূল এবং তাঁর বান্দা। তখন ফেরেশতা তাকে বলবেন: জাহান্নামে তোমার যে স্থানটি নির্ধারিত ছিল, সেদিকে তাকাও! আল্লাহ তোমাকে তা থেকে মুক্তি দিয়েছেন এবং জাহান্নামে তোমার জন্য যে স্থানটি তুমি দেখতে পাচ্ছো, তার পরিবর্তে জান্নাতে তোমার জন্য যে স্থানটি তুমি দেখছ, তা বদলে দিয়েছেন। তখন সে উভয় স্থানই দেখতে পাবে। মুমিন বলবে: আমাকে ছেড়ে দাও, যেন আমি আমার পরিবারের কাছে গিয়ে তাদের সুসংবাদ দিতে পারি। তখন তাকে বলা হবে: শান্ত থাকো।
আর মুনাফিকের কথা হলো, যখন তার পরিবার তার কাছ থেকে ফিরে যায়, তখন তাকে বসানো হয় এবং তাকে বলা হয়: এই ব্যক্তি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে তুমি কী বলতে? সে বলবে: আমি জানি না, মানুষ যা বলত, আমিও তাই বলতাম। তখন তাকে বলা হবে: তুমি জানতেও পারোনি। জান্নাতে তোমার জন্য যে স্থানটি নির্ধারিত ছিল, তার পরিবর্তে এটিই তোমার জাহান্নামের স্থান।
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: প্রত্যেক বান্দাকে কবরে সেই অবস্থার ওপর পুনরুত্থিত করা হবে, যে অবস্থায় সে মৃত্যুবরণ করেছে। মুমিন তার ঈমানের ওপর, আর মুনাফিক তার নিফাকের (কপটতার) ওপর।
3756 - عن البراء بن عازب، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أُقْعِد المؤمن في قبره، أُتي ثم شهد أن لا إله إلا الله وأن محمدًا رسول الله فذلك قوله: {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ} [إبراهيم: 27].
متفق عليه: رواه البخاري في الجنائز (1369) عن حفص بن عمر، حدثنا شعبة، عن علقمة بن مرثد، عن سعد بن عبيدة، عن البراء بن عازب فذكره.
ورواه مسلم في الجنة (2871) من طرق، عن محمد بن جعفر غندر، عن شعبة بإسناده قال النبي صلى الله عليه وسلم:"نزلت في عذاب القبر فيقال له: من ربك؟ فيقول: ربي الله، ونبي محمد صلى الله عليه وسلم فذلك قوله عز وجل: {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ}.
ورواه البخاري في التفسير (4699) عن أبي الوليد، عن شعبة بإسناده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"المسلم إذا سئل في القبر يشهد أن لا إله إلا الله، وأن محمدًا رسول الله، فذلك قوله: {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ}".
বারা ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন মুমিনকে তার কবরে বসানো হবে, তখন তাকে [প্রশ্ন করার জন্য ফেরেশতাদের মাধ্যমে] আনা হবে। অতঃপর সে সাক্ষ্য দেবে যে, আল্লাহ্ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর রাসূল। আর এটাই হচ্ছে আল্লাহ্ তা‘আলার বাণী: {দৃঢ় কথার দ্বারা আল্লাহ্ মুমিনদেরকে সুপ্রতিষ্ঠিত রাখেন} [সূরা ইবরাহীম: ২৭]-এর মর্ম।"
3757 - عن أبي سعيد الخدري قال: شهدتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم جنازةً فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا أيها الناس! إن هذه الأمة تُبْتَلى في قبورها، فإذا الإنسان دُفِنَ، فتفرَّقَ عنه أصحابه، جاءَهُ ملكٌ في يده مِطْراقٌ، فأقعده، قال: ما تقول في هذا الرجل؟ فإن كان مؤمنًا قال: أشهدُ أن لا إله إلا الله وأنَّ محمدًا عبدُهُ ورسولُه، فيقولُ: صدَقْتَ، ثم يفتح له باب إلى النار، فيقول: هذا كان منزِلَكَ لو كفَرْت بربِّك، فأما إذ آمَنتَ فهذا منزِلُك، فيُفْتَحُ له باب إلى الجنة، فيُريدُ أن ينْهض إليه، فيقول له: اسْكُنْ، ويُفْسَحُ له في قبره، وإن كان كافرًا أو منافقًا يقول له: ما تقول في هذا الرجل؟ فيقول: لا أدري، سمعتُ الناس يقولون شيئًا، فيقول: لا دَرَيْتَ ولا تَلَيتَ ولا اهْتَدَيْتَ، ثم يُفتح له باب إلى الجنة، فيقول: هذا منزلُكَ لو آمنتَ بربِّك، فأما إذ كفرت به، فإن الله عز وجل أبْدَلَكَ به هذا، ويُفْتَح له باب إلى النار، ثم يَقْمعه قمعةً بالمطراق يَسْمَعُها خلقُ الله كلُّهم غير الثقلين"، فقال بعضُ القوم: يا رسول الله، ما أحد يقوم عليه مَلَك في يده مطراق إلا هيل عند ذلك، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم: {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ} [إبراهيم: 27].
حسن: رواه الإمام أحمد (11000) والبزار"كشف الأستار" (872) كلاهما من حديث أبي
عامر عبد الملك بن عمرو، ثنا عباد بن راشد، عن داود بن أبي هند، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد فذكره.
وإسناده حسن من أجل عباد بن راشد فإنه مختلف فيه، غير أنه حسن الحديث، وله في البخاري (4529) حديث واحد، وبقية رجاله ثقات، ولذا قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 48):"رواه أحمد والبزار ورجاله رجال الصحيح".
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে একটি জানাযায় উপস্থিত ছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে লোক সকল! এই উম্মতকে তাদের কবরে পরীক্ষা করা হবে। যখন কোনো ব্যক্তিকে দাফন করা হয় এবং তার সঙ্গী-সাথীরা তাকে ছেড়ে চলে যায়, তখন তার কাছে একজন ফেরেশতা আসেন যার হাতে একটি হাতুড়ি (বা মুগুর) থাকে। তিনি তাকে বসান এবং জিজ্ঞাসা করেন: 'এই ব্যক্তি (মুহাম্মদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সম্পর্কে তুমি কী বলো?'
যদি সে মুমিন হয়, তবে সে বলে: 'আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর বান্দা ও রাসূল।' তখন ফেরেশতা বলেন: 'তুমি সত্য বলেছ।' অতঃপর তার জন্য জাহান্নামের দিকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। ফেরেশতা বলেন: 'যদি তুমি তোমার রবকে অস্বীকার করতে, তবে এটি তোমার ঠিকানা হতো। কিন্তু যেহেতু তুমি ঈমান এনেছ, তাই এটি তোমার ঠিকানা।' এরপর তার জন্য জান্নাতের দিকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। সে তার দিকে উঠতে চায় (বা যাওয়ার জন্য দ্রুত প্রস্তুত হয়)। ফেরেশতা তাকে বলেন: 'শান্ত হও।' এবং তার কবরকে প্রশস্ত করে দেওয়া হয়।
আর যদি সে কাফির বা মুনাফিক হয়, তবে ফেরেশতা তাকে বলেন: 'এই ব্যক্তি সম্পর্কে তুমি কী বলো?' সে বলে: 'আমি জানি না, আমি লোকজনকে কিছু বলতে শুনেছি।' তখন ফেরেশতা বলেন: 'তুমি জানলে না, তেলাওয়াত করলে না এবং হেদায়েত লাভ করলে না।' অতঃপর তার জন্য জান্নাতের দিকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। ফেরেশতা বলেন: 'যদি তুমি তোমার রবের প্রতি ঈমান আনতে, তবে এটি তোমার ঠিকানা হতো। কিন্তু যেহেতু তুমি তাঁকে অস্বীকার করেছ, তাই মহান আল্লাহ তোমাকে এর পরিবর্তে এই ঠিকানা দান করেছেন।' এরপর তার জন্য জাহান্নামের দিকে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়।
এরপর তিনি তাকে সেই হাতুড়ি (বা মুগুর) দ্বারা এমন জোরে আঘাত করেন, যা জ্বিন ও মানুষ ব্যতীত আল্লাহর সকল সৃষ্টি শুনতে পায়।"
তখন উপস্থিত লোকদের মধ্য থেকে কেউ কেউ বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! যার ওপর একজন ফেরেশতা হাতুড়ি নিয়ে দাঁড়ান, সে ভীত-সন্ত্রস্ত না হয়ে পারে না।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যারা ঈমান এনেছে, আল্লাহ তাদেরকে দুনিয়ার জীবনে ও আখিরাতে সুদৃঢ় বাক্যের মাধ্যমে প্রতিষ্ঠিত রাখেন।" (সূরা ইবরাহীম: ২৭)।
3758 - عن أبي هريرة قال: تلا رسول الله صلى الله عليه وسلم: {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ} فقال: ذلك إذا قيل له في القبر: من ربك؟ وما دينك؟ ومن نبيك؟ فيقول: الله ربي، والإسلام ديني، ومحمد نبيي جاءنا بالبينات من عند الله فآمنتُ به، وصدقته فيقال: صدقت على هذا حييت، وعليه تبعث إن شاء الله".
حسن: رواه البيهقي في"إثبات عذاب القبر" (8) عن محمد بن عبد الله بن محمد، عن عبد الرحمن بن الحسن القاضي بهمدان، ثنا إبراهيم بن الحسين، ثنا آدم بن أبي إياس، ثنا حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكره.
ورواه الطبري في تفسيره من وجه آخر عن آدم بن أبي إياس، وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو وهو ابن علقمة الليثي فإنه حسن الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই আয়াতটি তিলাওয়াত করলেন: {যারা ঈমান এনেছে, আল্লাহ তাদের দৃঢ় বাক্য দ্বারা পার্থিব জীবনে ও পরকালে সুপ্রতিষ্ঠিত রাখবেন}। অতঃপর তিনি বললেন, এটি (দৃঢ়তা) তখন হবে যখন কবরে তাকে জিজ্ঞাসা করা হবে: তোমার রব কে? তোমার দ্বীন কী? এবং তোমার নবী কে? তখন সে বলবে: আল্লাহ আমার রব, ইসলাম আমার দ্বীন, এবং মুহাম্মাদ আমার নবী। তিনি আল্লাহর নিকট থেকে সুস্পষ্ট প্রমাণাদি নিয়ে আমাদের কাছে এসেছেন, তাই আমি তাঁকে বিশ্বাস করেছি এবং তাঁকে সত্য বলে মেনে নিয়েছি। তখন বলা হবে: তুমি সত্য বলেছ। এই অবস্থার উপরই তুমি জীবিত ছিলে, আর এর উপরই ইনশাআল্লাহ তোমাকে পুনরুত্থিত করা হবে।
3759 - عن البراء قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"وذكر الكافر حين تُقبض روحه قال: فتعاد روحُه في جَسده، قال: فيأتيه ملكان شديد الانتهار فيجلسانه فيتهرانه، فيقولان له: من ربك؟ فيقول: لا أدري، قال: فيقولان له: ما دينك؟ فيقول: لا أدري، قال: فيقال له: ما هذا النبي الذي بُعث فيك؟ قال: فيقول: سمعت الناس يقولون ذلك، لا أدري قال: فيقولان: لا دريتَ قال: وذلك قول الله: {وَيُضِلُّ اللَّهُ الظَّالِمِينَ وَيَفْعَلُ اللَّهُ مَا يَشَاءُ}".
حسن: رواه الطبري في تفسيره (13/ 218) من طريق أبي عوانة، عن الأعمش، عن المنهال ابن عمرو، عن زاذان، عن البراء فذكره، وهو حديث طويل سبق ذكره في الباب الذي قبله.
وهو الذي قال فيه البيهقي في"إثبات عذاب القبر" (27):"هذا حديث كبير صحيح الإسناد، رواه جماعة من الأئمة الثقات عن الأعمش".
وإسناده حسن من أجل المنهال بن عمرو فإنه"صدوق".
ومعنى قول الله تعالى: {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَفِي الْآخِرَةِ وَيُضِلُّ اللَّهُ الظَّالِمِينَ وَيَفْعَلُ اللَّهُ مَا يَشَاءُ} [إبراهيم: 27] أي تثبيتُه إياهم في الحياة الدنيا بالإيمان بالله وبرسوله صلى الله عليه وسلم، وفي الآخرة بمثل الذي ثبتهم به في الحياة الدنيا، وذلك في قبورهم حين يُسألون عن
الذي هم عليه من التوحيد والإيمان برسوله صلى الله عليه وسلم.
وقوله: {وَيُضِلُّ اللَّهُ الظَّالِمِينَ} فإنه يعني أن الله لا يوفق المنافق والكافر في الحياة الدنيا وفي الآخرة عند المسألة في القبر لما هدى له المؤمن من الإيمان بالله ورسوله صلى الله عليه وسلم. انظر"تفسير الطبري" (13/ 218).
وأما ما رُوي عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بي يُفتن أهل القبور، وفيّ نزلت هذه الآية: {يُثَبِّتُ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا بِالْقَوْلِ الثَّابِتِ} [إبراهيم: 27]". فهو ضعيف.
رواه البيهقي في"إثبات عذاب القبر" (15) من طريق محمد بن إسحاق الصغاني، ثنا محمد بن عمر الأسلمي، قال عبد السلام بن حفص: ثنا عن شريك بن أبي نمر، عن عطاء بن يسار، عن عائشة قالت: فذكرته. ومحمد بن عمر هو الواقدي الأسلمي متروك.
বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাফিরের কথা উল্লেখ করলেন যখন তার রূহ (জান) কবয করা হয়। তিনি বলেন: অতঃপর তার রূহ তার দেহের মধ্যে ফিরিয়ে দেওয়া হয়। এরপর তার কাছে দু'জন কঠিন ধমক প্রদানকারী ফেরেশতা আসেন এবং তাকে বসিয়ে কঠোরভাবে ধমকাতে থাকেন। তারা তাকে জিজ্ঞাসা করেন: তোমার রব কে? সে বলে: আমি জানি না। তিনি বলেন: তখন তারা তাকে জিজ্ঞাসা করেন: তোমার দীন (ধর্ম) কী? সে বলে: আমি জানি না। তিনি বলেন: তখন তাকে জিজ্ঞাসা করা হয়: এই নবী কে, যিনি তোমাদের কাছে প্রেরিত হয়েছেন? তিনি বলেন: সে বলে: আমি মানুষকে এমনটি বলতে শুনেছি। আমি জানি না। তিনি বলেন: তখন তারা দু'জন বলেন: তুমি জানোনি! তিনি বলেন: আর এটাই আল্লাহর বাণী: "আর আল্লাহ্ জালিমদেরকে বিভ্রান্ত করেন, আর আল্লাহ্ যা ইচ্ছা তাই করেন।"
3760 - عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم أن رجلًا قال: يا رسول الله! ما بال المؤمنين يُفْتتَنُونَ في قبورهم إلَّا الشهيد؟ قال:"كفى ببارقة السيوف على رأسه فتنة".
صحيح: رواه النسائي (2053) عن إبراهيم بن الحسن قال: حدثنا حجاج، عن ليث بن سعد، عن معاوية بن صالح، أن صفوان بن عمْرو حدَّثه عن راشد بن سعد، عن رجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.
ورجاله ثقات إلَّا أنَّ راشد بن سعد ثقة يُرسل، فقد سمع جماعة من الصحابة وأرسل عن سعد بن أبي وقاص، واختلف في سماعه من ثوبان فنفاه الإمام أحمد، وأثبته البخاري في"الأدب المفرد".
والذي أرجوه أنَّهُ سمع هذا الحديث عن أحد من الصحابة ولم يُرسلهُ.
নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, এক ব্যক্তি বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! কী এমন হলো যে, শহীদ ছাড়া সকল মুমিনকে তাদের কবরে পরীক্ষা করা হবে?" তিনি বললেন, "তার মাথার উপর তরবারির ঝিলিকই (মৃত্যুর সময়ের এই কষ্ট) পরীক্ষার জন্য যথেষ্ট।"
3761 - عن المقدام بن معد يكرب، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"للشهيد عند الله ست خصال: …" وذكر منها:"ويُجار من عذاب القبر".
حسن: رواه ابن ماجه (2799) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا إسماعيل بن عياش، قال: حدثني بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن المقدام بن معد يكرب فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجْل إسماعيل بن عياش فإنه حسن الحديث إذا روى عن أهل بلده الشاميين، وبَحير بن سعد منهم من حمص، ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (17182)، وتابعه بقية بن الوليد فرواه عن بحير بن سعد بإسناده مثله رواه الترمذي (1663) وقال:"حسن صحيح غريب".
قلت: وفيه بقية بن الوليد وهو مدلس لكنْ تقبل عنعنتُه عن بحير بن سعد كما قال ابن عبد الهادي في تعليقه على علل ابن أبي حاتم. .
وللحديث أسانيد أخرى من حديث إسماعيل بن عياش فإنه جعله مرة من مسند ابن معد يكرب،
وأخرى من مسند عبادة بن الصامت رواه الإمام أحمد (17183) عن الحكم بن نافع، حدثنا ابن عياش، عن بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن كثير بن مرة، عن عبادة بن الصامت، عن النبي صلى الله عليه وسلم.
فلعله سمع هذا الحديث من شيخه بَحير بن سعد من وجهين، لأنَّه حمصي وسماعه من أهل بلده صحيح، فلا اضطراب في الإسناد.
মিকদাম ইবনে মা'দিকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘আল্লাহর কাছে শহীদের জন্য ছয়টি বিশেষ মর্যাদা রয়েছে। ...’ তিনি এর মধ্যে উল্লেখ করেছেন: ‘তাকে কবরের আযাব থেকে মুক্তি দেওয়া হবে।’
3762 - عن قيس الجذامي -رجل كانت له صحبة- قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"يُعطى الشهيد ست خصال عند أول قطرةٍ من دمه: يُكَفَّر عنه كلُّ خطيئةٍ، ويُرَى مقعَده من الجنة، ويُزَوَّج من الحُور العِين، ويُؤْمَن من الفَزَعِ الأكبر، ومن عذاب القبر، ويُحَلَّى حُلَّة الإيمان".
حسن: رواه الإمام أحمد (17783) عن زيد بن يحي الدمشقي، قال: حدثنا ابن ثوبان، عن أبيه، عن مكحول، عن كثير بن مرة، عن قيس الجُذامي فذكره.
ورجال إسناده ثقات غير ابن ثوبان وهو: عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان الشامي اختلف فيه قول ابن معين فقال مرة: هو ضعيف وأبوه ثقة، وأخرى قال: ليس به بأس، وقال: ابن ثوبان أصله من خراسان، نزل الشام، ولم يذكروه إلَّا بخير، وترجمه ابن عدي في"الكامل" (4/ 1591 - 1993) وقال:"وقد كتبت حديثه عن ابن جوصاء وأبي عروبة من جميعهما، ويبلغ أحاديث صالحة، وكان رجلًا صالحًا، ويكتب حديثُه على ضعفه".
ولكن خالفه سفيان فرواه عن برد بن سنان عن مكحول وأوقفه عليه، أخرجه ابن أبي شيبة (5/ 307) عن وكيع، عن سفيان.
وبرد بن سنان هو أبو العلاء الدمشقي وثَّقه ابن معين وغيره، وضعَّفه علي بن المديني، وعلى ترجيح الوقف، فإن له حكم الرفع، فإن إثبات العذاب والثواب ونهيه لا يقال بالرأي في حين رواه أبو نعيم في"معرفة الصحابة" (5723) من وجه آخر عن أبي توبة الربيع بن نافع، ثنا الهيثم بن حُميد، عن زيد بن واقد، عن كثير بن مرة به مرفوعًا وفيه:"ويجار من عذاب القبر".
والهيثم بن حميد هو الغساني وثَّقه ابن معين وأبو داود، وقال النسائي:"ليس به بأس". وهذه متابعة قوية لحديث عبد الرحمن بن ثابت بن ثوبان.
وقيس الجذامي هو: ابن زيد بن جبار، وفي"الإصابة": ابن جبار، الجذامي، جمهور أهل العلم أثبتوا أن له صحبة، إلَّا ابن أبي حاتم فإنه نفي ذلك، والصواب ما قاله الجمهور، وقد أورد الحافظ في"الإصابة" قصة وفدِه على النبي صلى الله عليه وسلم والدعاء له.
কায়েস আল-জুযামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: শহিদকে তার রক্তের প্রথম ফোঁটা ঝরার সঙ্গে সঙ্গে ছয়টি বিশেষ মর্যাদা দেওয়া হয়: তার সমস্ত গুনাহ মাফ করে দেওয়া হয়, জান্নাতে তার অবস্থান তাকে দেখানো হয়, তাকে ডাগর চোখের হুরদের সাথে বিবাহ দেওয়া হয়, তাকে মহা আতঙ্ক (ফাযা আল-আকবার) এবং কবরের আযাব থেকে নিরাপদ রাখা হয়, আর তাকে ঈমানের অলঙ্কারে ভূষিত করা হয়।
3763 - عن عبد الله بن يسار قال: كنتُ جالسًا، وسليمانُ بن صُرد وخالد بن عرفُطة فذكروا أن رجلًا توفِّيَ، مات ببطْنِه فإذاهما يشتهيان أن يكونا شهداءَ جنازته، فقال أحدهما للآخر: ألم يَقُل رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من يقتله بَطْنُه فلن يُعذَّب في قبره" فقال الآخر: بلي.
صحيح: رواه النسائي (2052) عن محمد بن عبد الأعلى، قال: حدثنا خالد، عن شُعبة، قال: أخبرني جامع بن شَدَّاد، قال: سمعت عبد الله بن يسار فذكره، وإسناده صحيح، وقد صحَّحه أيضًا ابن حبان (2933) وأخرجه الإمام أحمد (18310) كلاهما من حديث شعبة، ورواه الترمذي (1064) من وجه آخر عن أبي إسحاق السبيعي، قال: قال سليمان بن صُرد الخالد بن عرفُطة (أو خالد لسليمان) فذكره، وقال:"حسن غريب من هذا الوجه، وقد رُوي من غير هذا الوجه".
قلت: لعله يشير بذلك إلى الوجه الذي أخرجه النسائي وغيره كما هو عند البيهقي في"إثبات عذاب القبر"
আব্দুল্লাহ ইবনে ইয়াসার থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি সুলাইমান ইবনে সুরদ ও খালিদ ইবনে উরফুতার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাথে বসেছিলাম। তখন তারা আলোচনা করলেন যে, এক ব্যক্তি পেটের পীড়ায় মারা গিয়েছেন। তারা দু'জনই আকাঙ্ক্ষা করলেন যে, তারা যেন তার জানাজায় উপস্থিত থাকতে পারতেন। তাদের মধ্যে একজন অন্যজনকে বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি বলেননি যে: "যাকে তার পেটের রোগ মেরে ফেলে, তাকে তার কবরে শাস্তি দেওয়া হবে না?" অপরজন বললেন: হ্যাঁ।
3764 - عن عبد الله بن عمْرو يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ما من مسلمٍ يموتُ في ليلة الجمعة إلَّا بُرِئَ من فتنة القبر".
حسن: رواه أحمد (7050) عن إبراهيم بن أبي العباس، حدثنا بقية، حدثني معاوية بن سعيد التجيبي، سمعت أبا قبيل المصري يقول: سمعت عبد الله بن عمرو بن العاص فذكر الحديث.
وفي هذا الإسناد صرَّح بقية بالتحديث كما صرَّح في بقية الإسناد بالسماع، فزالت منه تهمة التدليس. وهذا إسناد حسن، فإنَّ أبا قَبيل المصري هو حي بن هانئ قال فيه أحمد وابن معين وأبو زرعة:"ثقة"، وقال أبو حاتم:"صالح الحديث".
ورواه الإمام أحمد أيضا (6646) عن سُريج، حدثنا بقية، عن معاوية بن سعيد، عن أبي قبيل، عن عبد الله بن عمرو فذكر الحديث.
ورواه البيهقي في"إثبات عذاب القبر" (172) من طريق الليث بن سعد، حدثني خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن ربيعة بن سيف، أن أبا عبد الرحمن الحبلي أخبره أن أبنًا لعياض بن عُقبة توفِّيَ يوم الجمعة، فاشتد وجده عليه، فقال له رجل من الصدف: يا أبا يحيي ألَا أُبِشِّرك بشيْءٍ سمعته من عبد الله بن عمْرو بن العاص، سمعته يقول: فذكره.
ورجل من الصدف هو سنان بن عبد الرحمن الصدفي كما جاء في رواية أخرى عنده (174) من
طريق ابن وهب، أخبرني ابن لهيعة، عن سنان بن عبد الرحمن الصدفي، أن عبد الله بن عمْرو بن العاص كان يقول:"من توفي يوم الجمعة أو ليلة الجمعة وُقِيَ الفتان"، إلَّا أنه لم يرفعه، وحكمه الرفع، لأن فيه الإخبار عن الغيبيات، وابن وهب كان سماعه من ابن لهيعة قبل اختلاطه.
أما ما رواه الترمذي (1074) عن محمد بن بشار، حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، وأبو عامر العقدي، قالا: حدثنا هشام بن سعد، عن سعيد بن أبي هلال، عن ربيعة بن سيف، عن عبد الله بن عمْرو مرفوعًا: : ما من مسلم يموت يوم الجمعة أو ليلة الجمعة إلَّا وقاه الله فتنة القبر" ففيه انقطاع، فإن ربيعة بن سيف لم يسمع من عبد الله بن عمْرو، وقد أكَّدَ بذلك الترمذي نفسه فقال:"حسن غريب" وقال: هذا حديث ليس إسناده بمتصل، ربيعة بن سيف إنَّما يروي عن أبي عبد الرحمن الحُبلي، عن عبد الله بن عمْرو، ولَا نعرِفُ لربيعة سماعًا من عبد الله بن عمْرو"، هكذا في نسخة فؤاد عبد الباقي، وفي نسخة أخرى قال:"غريب" فقط وهو الصحيح، لأن الحسن والانقطاع لا يجتمعان.
وللحديث طرق أخرى غير أنَّ ما ذكرته هو أصحها.
وفي الباب حديثان ضعيفان:
أحدهما: حديث أنس بن مالك رواه أبو يعلى (4099) وفي سنده يزيد الرقاشي وهو ضعيف.
والثاني: حديث جابر بن عبد الله، أخرجه أبو نعيم في"الحلية" (3/ 155)، وفيه عمر بن موسى ذاهب الحديث، قال أبو نعيم:"غريب من حديث جابر، تفرد به عمر بن موسى وهو مدني فيه لين".
انظر للمزيد"كتاب الجمعة".
আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: “যে কোনো মুসলিম জুমআর রাতে ইন্তিকাল করে, সে অবশ্যই কবরের ফিতনা (পরীক্ষা) থেকে মুক্তি পায়।”
3765 - عن سلمان قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"رباط يوم وليلة خير من صيام شهر وقيامه، وإن مات جرى عليه عملُه الذي كان يعمله، وأجري عليه رزقُه، وأمن الفُتَّان".
صحيح: رواه مسلم في كتاب الإمارة (1913) عن عبد الله بن عبد الرحمن بن بهرام الدارمي، حدثنا أبو الوليد الطيالسي، حدثنا الليث (يعني ابن سعد) عن أيوب بن موسى، عن مكحول، عن شرحبيل بن السِّمْط، عن سلمان فذكره.
وقوله:"الفُتَّان" بضم الفاء، جمع فاتن، ويحمل على أنواع من الفتن بعد الإقبار من ضغطة القبر، والسُؤال والتعذيب في القبر.
وضبط بعضهم بفتح الفاء، وهو الذي يفتن المقبور بالسؤال فيعذبه.
সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "এক দিন ও এক রাতের সীমান্ত পাহারা এক মাস সিয়াম (রোজা) পালন ও রাত জেগে ইবাদত করার চেয়েও উত্তম। যদি সে (সীমান্ত প্রহরী) মারা যায়, তবে তার আমল যা সে করত, তা তার জন্য জারী থাকবে, তার রিযক তার জন্য জারী করা হবে, এবং সে কবরের ফিতনা সৃষ্টিকারীদের (পরীক্ষক ও আযাব) থেকে নিরাপদ থাকবে।"
3766 - عن فَضالة بن عبيد أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كل الميت يُختم على عمله إلا
المرابطُ، فإنه ينمو له عملُه إلى يوم القيامة، ويُؤَمَّنُ من فُتَّانِ القبر".
صحيح: رواه أبو داود (2500)، والترمذي (1621) كلاهما من طريق أبي هانئ الخولاني، عن عمرو بن مالك، عن فَضالة بن عبيد فذكره، واللفظ لأبي داود، ولفظ الترمذي قريب منه.
وقال:"حسن صحيح".
ومن هذا الوجه أخرجه ابن حبان في صحيحه (4674) والحاكم (2/ 79) وقال:"صحيح على شرط مسلم".
قلت: إسناده صحيح إلا أنه ليس على شرط مسلم، فإن عمرو بن مالك وهو الهمداني أبو علي الجنبي لم يخرج له مسلم، وإنما أخرج له أصحاب السنن.
ফাযালা ইবনে উবাইদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক মৃতের আমলের সমাপ্তি ঘটে যায়, কিন্তু যে সীমান্ত প্রহরায় নিযুক্ত থাকে (আল-মুরাবিত), তার আমল কিয়ামত পর্যন্ত বাড়তে থাকে এবং সে কবরের ফিতনাকারী ফেরেশতাদের পরীক্ষা থেকে নিরাপদ থাকে।"
3767 - عن عقبة بن عامر يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"كل ميت يُختم على عمله، إلا المرابط في سبيل الله، فإنه يُجرى له أجر عملِه حتى يُبْعث، ويؤمن من فُتَّان القبر".
حسن: رواه أحمد (17359) عن عبد الله بن يزيد، حدثنا ابن لهيعة، حدثنا مِشْرح قال: سمعت عقبة بن عامر فذكره.
قال الإمام أحمد: حدثنا قتيبة، قال فيه:"ويؤمن من فُتَّان القبر".
وابن لهيعة فيه كلام معروف إلا أن عبد الله بن يزيد وهو المقرئ سمع منه قبل اختلاطه، ورواية العبادلة عنه مستقيمة.
وإسناده حسن من أجله، ومن أجل مِشْرح، وهو ابن هاعان المعافري، أبو مصعب المصري، قال فيه يحيى بن معين:"ثقة" وقال عثمان:"دراج ويشرح ليسا بكل ذاك، وهما صدوقان".
وقال ابن عدي في"الكامل" (1/ 2460):"ولمشرح عن عقبة غير ما ذكرتُ، يروي عنه ابن لهيعة وغيره من شيوخ مصر، وأرجو أنه لا بأس به".
উকবাহ ইবন আমের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "প্রত্যেক মৃত ব্যক্তির আমলের পরিসমাপ্তি ঘটে যায়, তবে আল্লাহর পথে সীমান্ত রক্ষী (মুরাবিত) ব্যতীত। কারণ, তার আমলের সওয়াব চলতে থাকে যতক্ষণ না তাকে পুনরুত্থিত করা হয়, এবং সে কবরের ফিতনা (পরীক্ষা) থেকে নিরাপদ থাকে।"
