হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3768)


3768 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من مات مرابطًا في سبيل الله أَجرى عليه أجْرَ عمله الصالح الذي كان يعمل، وأُجْري عليه رزقُه، وأُمِن من الفُتَّان، وبعثه الله يوم القيامة آمنًا من الفَزَع".

حسن: رواه ابن ماجه (2767) عن يونس بن عبد الأعلى، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني الليث، عن زُهرة بن معبد، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكره.

وفيه والد زهرة وهو معبد بن عبد الله التيمي لم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 433) ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي إذا توبع، وقد توبع فيما رواه الإمام أحمد (9244) عن موسى بن داود، قال: حدثنا ابن لهيعة، عن موسي بن وردان، عن أبي هريرة مرفوعًا ولفظه:
من مات مرابطًا وُقِي فتنة القبر، وأُومن من الفزع الأكبر، وغُدي عليه، وريح برزقِه من الجنة، وكتب له أجرُ المرابط إلى يوم القيامة" وفيه ابن لهيعة وفيه كلام معروف، ولكن تبين من متابعته بأنه لم يختلط في هذا الحديث.

وأما ما رواه ابن أبي عاصم في كتاب الجهاد (297)، والطبراني في"الأوسط" (9308) كلاهما من طريق عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، عن أبيه، عن عطاء بن يسار، عن أبي هريرة مرفوعًا ولفظه: من مات مرابطًا أُجري عليه رزقه من الجنة، ونما له عملُه إلى يوم القيامة، ووُقي فُتَّان القبر".

ففيه عبد الرحمن بن زيد بن أسلم ضعيفٌ، ضعَّفه الإمام أحمد والنسائي وأبو زرعة، وقال ابن حبان في المجروحين:"كان يقلب الأخبار، وهو لا يعلم".

وبقية الأحاديث في ذكر الرباط وفضله ستأتي في"كتاب الجهاد".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে প্রহরায় (ইসলামের সীমান্তে পাহারা দেওয়া অবস্থায়) থাকা অবস্থায় মারা যায়, তার আমলকৃত নেক কাজের প্রতিদান অব্যাহতভাবে চালু রাখা হয়, এবং তার রিযিকও চালু রাখা হয়, তাকে কবরের ফিতনা থেকে নিরাপত্তা দেওয়া হয়, আর কিয়ামতের দিন আল্লাহ তাকে মহাভয় (আতঙ্ক) থেকে মুক্ত অবস্থায় উত্থিত করবেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3769)


3769 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إن الميت إذا وُضع في قبره إنه ليسمع خَفْقَ نعالهم حين يولون عنه فإن كان مؤمنًا كانت الصلاة عند رأسه، وكان الصيام عن يمينه، وكانت الزكاة عن يساره، وكان فعل الخيرات من الصدقة والصلة والمعروف والإحسان إلى الناس عند رجليه، فيؤتي من قبل رأسه فتقول الصلاة: ما قبلي مدخل، ثم يؤتى عن يمينه فيقول الصيام: ما قبلي مدخل، ثم يؤتى عن يساره فتقول الزكاة: ما قبلي مدخل، ثم يؤتى من قبل رجليه فيقول فعل الخيرات من الصدقة والصلة والمعروف إلى الناس: ما قبلي مدخل، وذكر الحديث بطوله.

حسن: رواه ابن حبان (3113)، والحاكم (1/ 379 - 381)، والبيهقي في"إثبات عذاب القبر" (154) كلهم من طرق، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث بطوله، وسبق قبل أبواب.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو، وهو حسن الحديث.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: নিশ্চয়ই যখন মৃত ব্যক্তিকে তার কবরে রাখা হয়, তখন সে তাদের জুতার শব্দ শুনতে পায়, যখন তারা তার কাছ থেকে ফিরে যায়। যদি সে মুমিন হয়, তখন সালাত তার মাথার কাছে থাকে, সিয়াম তার ডান দিকে থাকে, যাকাত তার বাম দিকে থাকে এবং সাদাকাহ, আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষা, নেক কাজ ও মানুষের প্রতি অনুগ্রহস্বরূপ অন্যান্য ভালো কাজগুলো তার পায়ের কাছে থাকে। অতঃপর তার মাথার দিক থেকে (ফেরেশতারা) আসে, তখন সালাত বলে: আমার দিক থেকে (আযাবের) প্রবেশের কোনো পথ নেই। তারপর তার ডান দিক থেকে আসে, তখন সিয়াম বলে: আমার দিক থেকে প্রবেশের কোনো পথ নেই। অতঃপর তার বাম দিক থেকে আসে, তখন যাকাত বলে: আমার দিক থেকে প্রবেশের কোনো পথ নেই। অতঃপর তার পায়ের দিক থেকে আসে, তখন সাদাকাহ, আত্মীয়তার সম্পর্ক রক্ষা ও মানুষের প্রতি নেক কাজগুলো বলে: আমার দিক থেকে প্রবেশের কোনো পথ নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (3770)


3770 - عن أبي هريرة، أحسبه رفعه قال:"إن المؤمن ينزل به الموت ويعاين ما يعاين، فود لو خرجت -يعني: نفسه- والله يحب لقاءه، وإن المؤمن يصعد بروحه إلى السماء، فتأتيه أرواح المؤمنين، فيستخبرونه عن معارفهم من أهل الأرض، فإذا قال: تركت فلانا في الدنيا أعجبهم ذلك، وإذا قال: إن فلانا قد مات، قالوا: ما
جيء به إلينا، وإن المؤمن يجلس في قبره فيسأل: من ربه؟ فيقول: ربي الله. فيقول: من نبيك؟ فيقول: نبي محمد صلى الله عليه وسلم. قال: ما دينك؟ قال: ديني الإسلام. فيفتح له باب في قبره، فيقول أو يقال: انظر إلى مجلسك. ثم يرى القبر فكأنما كانت رقدة، وإذا كان عدوا لله نزل به الموت، وعاين ما عاين فإنه لا يحب أن تخرج روحه أبدا، والله يبغض لقاءه، فإذا جلس في قبره أو أجلس يقال له: من ربك؟ فيقول: لا أدري. فيقال: لا دريت، فيفتح له باب من جهنم، ثم يضرب ضربة تسمع كل دابة إلا الثقلين، ثم يقال له: نم كما ينام المنهوش". فقلت لأبي هريرة: ما المنهوش؟ قال: الذي تنهشه الدواب والحيات ثم"يضيق عليه قبره".

حسن: رواه البزار في مسنده (9760) وعبد الله بن أحمد في السنة (1447) كلاهما من حديث الوليد بن القاسم، نا يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره، واللفظ للبزار.

وإسناده حسن من أجل يزيد بن كيسان، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وأما قول البزار:"وهذا الحديث لا نعلم رواه عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة إلا الوليد بن القاسم"، فهو ليس كذلك بل رواه أيضا يحيى بن سعيد، عن يزيد بن كيسان، ومن طريقه رواه عبد الله بن أحمد في السنة (1446).

وأما ما رُوي عن أنس بن مالك مرفوعًا:"إن أعمالكم تعرض على أقاربكم وعشائركم من الأموات، فإن كان خيرًا استبشروا به، وإن كان غير ذلك قالوا: اللَّهم! لا تمتهم حتى تهديَهم كما هديتنا، ففيه رجل لم يسم.

رواه الإمام أحمد (12683) عن عبد الرزاق، أخبرنا سفيان، عمن سمع أنس بن مالك فذكره، وإسناده ضعيف لإبهام الواسطة بين سفيان وأنس، ولم أقف على إسناد آخر ذكر فيه هذه الواسطة. وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي أيوب الأنصاري مرفوعا:"إن نفس المؤمن إذا قُبضتْ تلقَّاها أهل الرحمة من عباد الله، كما تَلَقَّون البشيرَ من أهل الدنيا فيقولون: انظروا صاحبكم يستريح، فإنه في كَرْبٍ شديد. ثم يسألونه: ما فعل فلان؟ وما فعلت فلانة، هل تزوجتْ؟ فإذا سألوه عن الرجل قد مات قبله فيقول: هَيْهات، قد مات ذاك قبلي، فيقولون: إنا لله وإنا إليه راجعون، ذُهب به إلى أمهِ الهاوية، بئستِ الأُم، وبئستِ المربيةُ، وقال: إن أعمالكم تُعرض على أقاربكم وعشائركم من أهل الآخرة، فإن كان خيرًا فرحوا واستبشروا وقالوا: اللَّهم! هذا فضلُك ورحمتك، فأَتْمِم نعمتَك عليه، وأَمِتْه عليها، ويُعرض عليهم عملُ المسيء فيقولون: اللَّهم! أَلْهِمه عملًا صالحًا تَرضى به، وتُقربه إليك".

رواه الطبراني في"الأوسط" (148) عن أحمد بن يحيي بن خالد بن حيَّان، قال: حدثنا محمد ابن سفيان الحضرمي، قال: حدثنا مَسْلمةُ بن علي، عن زيد بن واقد وهشام بن الغاز، عن
مكحول، عن عبد الرحمن بن سلامة، عن أبي رُهْم السباعي، عن أبي أيوب الأنصاري فذكره.

قال الطبراني:"لا يروي هذا الحديث عن مكحول إلا زيد بن واقد وهشام بن الغاز، تفرد بهما مسلمة بن علي".

وأورده الهيثمي في"المجمع" (2/ 327) وقال:"رواه الطبراني في"الكبير" و"الأوسط" وفيه مسلمة بن علي وهو ضعيف".

قلت: وهو كما قال، فإن مسلمة بن علي هو الخشني من أهل الشام قال فيه ابن حبان:"كان ممن يقلب الأسانيد، ويروي عن الثقات ما ليس من أحاديثهم توهمًا، فلما فحش ذلك منه بطل الاحتاج به""المجروحين" (1076).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয় যখন মুমিন ব্যক্তির নিকট মৃত্যু আসে এবং সে যা দেখবে তা দেখতে পায়, তখন সে আকাঙ্ক্ষা করে যে, তার রূহ (জান) যেন বের হয়ে যায়। আর আল্লাহ তার সঙ্গে সাক্ষাৎ করা পছন্দ করেন। আর নিশ্চয় মুমিন ব্যক্তির রূহ আসমানের দিকে আরোহণ করে। তখন মুমিনদের রূহসমূহ তার নিকট আসে এবং তারা দুনিয়াবাসী তাদের পরিচিতজনদের সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে থাকে। যখন সে বলে যে, আমি অমুককে দুনিয়াতে রেখে এসেছি, তখন তারা আনন্দিত হয়। আর যখন সে বলে যে, অমুক ব্যক্তি মারা গেছে, তখন তারা বলে, তাকে তো আমাদের নিকট আনা হয়নি। আর মুমিনকে তার কবরে বসানো হয় এবং তাকে প্রশ্ন করা হয়: তোমার রব কে? সে বলে: আমার রব আল্লাহ। তাকে জিজ্ঞাসা করা হয়: তোমার নবী কে? সে বলে: আমার নবী মুহাম্মাদ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম। তাকে বলা হয়: তোমার দীন কী? সে বলে: আমার দীন ইসলাম। তখন তার কবরে একটি দরজা খুলে দেওয়া হয় এবং সে দেখে অথবা তাকে বলা হয়: তোমার স্থানটি দেখ। এরপর সে কবরকে দেখে মনে করে যেন এটি ছিল একটি ঘুম (মাত্র)। আর যখন সে আল্লাহর শত্রু হয়, তখন তার নিকট মৃত্যু আসে এবং সে যা দেখবে তা দেখতে পায়। সে কখনো চায় না যে তার রূহ বের হয়ে যাক। আর আল্লাহ তার সঙ্গে সাক্ষাৎ করাকে ঘৃণা করেন। অতঃপর যখন তাকে তার কবরে বসানো হয় বা বসানো হয়, তখন তাকে বলা হয়: তোমার রব কে? সে বলে: আমি জানি না। তখন বলা হয়: তুমি জানলে না। অতঃপর তার জন্য জাহান্নামের একটি দরজা খুলে দেওয়া হয়। এরপর তাকে এমন জোরে আঘাত করা হয় যে, মানুষ ও জিন ব্যতীত সমস্ত প্রাণী সেই শব্দ শুনতে পায়। তারপর তাকে বলা হয়: তুমি ঘুমাও, যেমন ‘আল-মানহুশ’ ঘুমায়। আমি (রাবী) আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞাসা করলাম: ‘আল-মানহুশ’ কী? তিনি বললেন: যাকে হিংস্র প্রাণী ও সাপেরা দংশন করে। এরপর তার জন্য তার কবর সংকীর্ণ করে দেওয়া হয়।









আল-জামি` আল-কামিল (3771)


3771 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا دخل الميت القبر، مُثِّلتْ له الشّمس عند غروبها، فيقول: دعوني أصلي".

حسن: رواه ابن ماجه (4272) عن إسماعيل بن حفصٍ الأُبلّي، قال: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر فذكره.

وصحَّحه ابن حِبّان (3116) ورواه من هذا الوجه.

وإسناده حسن من أجل إسماعيل بن حفص قال فيه النسائي:"أرجو أن لا يكون به بأس"، وذكره ابن حبان في"الثقات".

وأبو بكر بن عياش وهو الأسدي الكوفي الحناط المقريء مختلف فيه، والخلاصة فيه كما قال ابن عدي:"أبو بكر بن عياش هذا كوفي مشهور، وهو يروي عن أجلة الناس، وحديثه فيه كثرة، وقد روى عنه من الكبار جماعة، وحديثه مسندُه ومقطوعه يكثر، وهو من مشهوري مشايخ الكوفة، ومن المختصين بالرواية عن جملة مشايخهم، وهو من قُراء أهل الكوفة، وعن عاصم أخذ القراءة، وعليه قرأ، وهو في رواياته عن كل من روى عنه لا بأس به، وذلك أني لم أجد له حديثًا منكرًا إذا روى عنه ثقة إلا أن يروي عنه ضعيف"، انتهى.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন মৃত ব্যক্তি কবরে প্রবেশ করে, তখন তার সামনে সূর্যকে অস্ত যাওয়ার সময়কার রূপ দেখানো হয়। তখন সে বলে: 'আমাকে ছেড়ে দাও, আমি সালাত (নামাজ) আদায় করি।'"









আল-জামি` আল-কামিল (3772)


3772 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا دخل المؤمن قبره فأتاه ملكان فانتهراه فيقوم يهب كما يهب النائم فيسألانه: من ربك؟ وما دينك؟ ومن نبيك؟ فيقول: الله ربي، والإسلام ديني، ومحمد نبيي، فيقولان له: صدقت كذلك كنت، فيقال: أفرشوه من الجنة، وألبسوه من الجنة، فيقول: دعوني حتى آتي أهلي، فيقولان: اسكن".
حسن: رواه ابن أبي عاصم في السنة (866) عن يوسف بن يعقوب الصفار، ثنا أبو بكر بن عياش، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر فذكره. ومن هذا الوجه رواه أيضًا البيهقي في"إثبات عذاب القبر" (238)، ورواه أحمد (14547) عن شاذان قال: حدثنا أبو بكر بن عياش به مختصرًا.

وإسناده حسن من أجل الكلام في أبي بكر بن عياش غير أنه حسن الحديث كما سبق من كلام ابن عدي فيه.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন কোনো মু'মিন তার কবরে প্রবেশ করে, তখন তার কাছে দু'জন ফিরিশতা আসে এবং তারা তাকে ধমক দেয়। তখন সে জেগে ওঠা ঘুমন্ত ব্যক্তির মতো চমকে উঠে দাঁড়ায়। তারা তাকে জিজ্ঞাসা করে: তোমার রব কে? তোমার দ্বীন কী? এবং তোমার নবী কে? সে বলে: আল্লাহ আমার রব, ইসলাম আমার দ্বীন, এবং মুহাম্মাদ আমার নবী। তখন তারা দু'জন তাকে বলে: তুমি সত্য বলেছ, তুমি তেমনই ছিলে। অতঃপর বলা হয়: তার জন্য জান্নাতের বিছানা বিছিয়ে দাও এবং জান্নাতের পোশাক পরিয়ে দাও। সে তখন বলে: আমাকে যেতে দাও, যেন আমি আমার পরিবারের কাছে পৌঁছাতে পারি। তখন তারা দু'জন বলে: শান্ত হও।









আল-জামি` আল-কামিল (3773)


3773 - عن أبي الزبير أنه سأل جابر بن عبد الله، عن فتَّانَي القَبْر، فقال: سمعتُ النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"إن هذه الأُمَّة تُبتلى في قُبورِها، فإذا أُدْخِلَ المُؤْمِنُ قَبْرَه، وتَوَلَّى عنه أصحابُه، جاء مَلَكٌ شديدُ الانتهار، فيقولُ له: ما كُنْتَ تقولُ في هذا الرَّجل؟ فيقولُ المُؤمِنُ: أقولُ: إنَّه رسولُ الله وعَبْدُه، فيقولُ له المَلَكُ: انظُرْ إلى مَقْعَدِكَ الذي كان لك في النار، قد أنجاكَ الله منه، وأبدَلَكَ بمَقْعَدِكَ الذي تَرَي من النار، مَقْعَدَكَ الذي تَرَى من الجنة، فيراهُما كِلاهُما، فيقولُ المُؤْمِنُ: دَعُوني أُبَشِّرْ أهلي، فيُقالُ له: اسْكُنْ، وأمَّا المُنافِقُ، فيُقْعَدُ إذا تَوَلَّى عنه أهله، فيقال له: ما كُنْت تقولُ في هذا الرجل؟ فيقولُ: لا أدري، أقولُ ما يقولُ الناسُ، فيقال له: لا دَرَيْتَ، هذا مَقْعَدُكَ الذي كان لك من الجنة، قد أُبْدِلْتَ مكانَه مَقْعدَكَ من النار".

قال جابر: فسمعتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول:"يُبْعَثُ كُلُّ عَبْدٍ في القبرِ على ما مات، المؤمنُ على إيمانِه، والمنافقُ على نفاقِه".

صحيح: رواه عبد الرزاق (6744، 6746) عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو الزبير أنه سمع جابر بن عبد الله يقول فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه أحمد (14722)، والطبراني في"الأوسط" (9072) والبيهقي في"إثبات عذاب القبر" (239) كلهم من طريق ابن لهيعة، عن أبي الزبير أنه سأل جابرا فذكره، واللفظ لأحمد. وابن لهيعة فيه كلام معروف ولكنه توبع.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু যুবাইর তাঁকে কবরের প্রশ্নকারী ফেরেশতা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি:

"নিশ্চয়ই এই উম্মতকে তাদের কবরে পরীক্ষা করা হবে। যখন কোনো মু’মিনকে তার কবরে প্রবেশ করানো হয় এবং তার সাথীরা তাকে ত্যাগ করে চলে যায়, তখন একজন কঠোর প্রকৃতির ধমকদাতা ফেরেশতা এসে তাকে বলেন: এই ব্যক্তি (নবী) সম্পর্কে তুমি কী বলতে?" মু’মিন তখন বলবে: "আমি বলি, তিনি আল্লাহর রাসূল এবং তাঁর বান্দা।" তখন ফেরেশতা তাকে বলবেন: "তোমার সেই স্থানটির দিকে তাকাও যা তোমার জন্য জাহান্নামে ছিল। আল্লাহ তোমাকে তা থেকে মুক্তি দিয়েছেন এবং জাহান্নামের যে স্থানটি তুমি দেখছ, তার পরিবর্তে জান্নাতের এই স্থানটি দিয়েছেন, যা তুমি দেখতে পাচ্ছ।" সে তখন উভয় স্থানই দেখতে পাবে। মু’মিন বলবে: "আমাকে আমার পরিবারকে সুসংবাদ দিতে দাও।" তখন তাকে বলা হবে: "শান্ত হও।"

আর যখন মুনাফিককে তার পরিবারের লোকেরা চলে যাওয়ার পর বসানো হবে, তখন তাকে জিজ্ঞেস করা হবে: "এই ব্যক্তি সম্পর্কে তুমি কী বলতে?" সে বলবে: "আমি জানি না। লোকেরা যা বলত, আমিও তাই বলতাম।" তখন তাকে বলা হবে: "তুমি জানলে না! তোমার জন্য জান্নাতে যে স্থানটি নির্ধারিত ছিল, তার পরিবর্তে এটিই তোমার জাহান্নামের স্থান।"

জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে আরও বলতে শুনেছি: "প্রত্যেক বান্দাকেই কবরে তার মৃত্যুর অবস্থার উপর ভিত্তি করে পুনরুত্থিত করা হবে; মু’মিনকে তার ঈমানের উপর এবং মুনাফিককে তার নিফাকের (কপটতার) উপর।"









আল-জামি` আল-কামিল (3774)


3774 - عن أبي هريرة عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"بين النفختين أربعون" قالوا: يا أبا هريرة! أربعون يومًا؟ قال: أبيتُ، قال: أربعون سنة؟ قال: أبيت. قال: أربعون شهرًا؟ قال: أبيت."ويَبلى كل شيء من الإنسان إلا عجْب ذنبه، فيه يُرَكَّبُ الخلق".

متفق عليه: رواه البخاري في التفسير (4814)، ومسلم في الفتن (2955) كلاهما من حديث الأعمش، قال: سمعت أبا صالح، قال: سمعت أبا هريرة فذكر الحديث. واللفظ للبخاري.
وزاد مسلم في أول الحديث:"ثم يُنْزل الله من السماء ماءً فينبتون كما ينبتُ البقلُ، وليس من الإنسان شيء إلا يبلى إلا عظمًا واحدًا وهو عجْبُ الذَنَب".

وفي رواية عنده من حديث همام بن منبة:"إن في الإنسان عَظْمًا لا تأكله الأرض أبدًا، فيه يُركَّب يوم القيامة" قالوا: أي عظم هو؟ يا رسول الله؟ قال:"عجْبُ الذَنَب".

قال البيهقي:"وكأن أبا هريرة لم يحفظ عن النبيّ صلى الله عليه وسلم ما أراد بالأربعين، وأهل التفسير يقولون: هي أربعون سنة"،"إثبات عذاب القبر" (2422).

وفي الحديث إشارة إلى قوله تعالى: {وَنُفِخَ فِي الصُّورِ فَصَعِقَ مَنْ فِي السَّمَاوَاتِ وَمَنْ فِي الْأَرْضِ إِلَّا مَنْ شَاءَ اللَّهُ ثُمَّ نُفِخَ فِيهِ أُخْرَى فَإِذَا هُمْ قِيَامٌ يَنْظُرُونَ} [الزمر: 68]. قالوا في قوله تعالى: {إِلَّا مَنْ شَاءَ اللَّهُ} هم جبريل، وميكائيل، وإسرافيل، وملك الموت، ثم يأمر ملك الموت أن يقبض روح ميكائيل، ثم روح جبريل، ثم روح إسرافيل، ثم يأمر ملك الموت فيموت، ثم يلبث الخلق بعد النفخة الأولى في البرزح أربعين سنة، ثم تكون النفخة الأخرى، فيُحبي الله إسرافيل فيأمره أن ينفخ الثانية فذلك قوله تعالى: {ثُمَّ نُفِخَ فِيهِ أُخْرَى فَإِذَا هُمْ قِيَامٌ يَنْظُرُونَ} أي على أرجلهم ينظرون إلى البعث الذي كذبوا به في الدنيا. وقيل: غير ذلك.

وقالوا أيضًا: إن أرواح الكفار كانوا يعرضون على منازلهم من النار طرفي النهار، فلما كان بين النفختين رفع عنهم العذاب، فرقدت تلك الأرواح بين النفختين، فلما بعثوا في النفخة الأخرى، وعاينوا يوم القيامة ما كانوا يكذبون به في الدنيا من البعث والحساب بعثوا بالويل فقالوا: {يَاوَيْلَنَا مَنْ بَعَثَنَا مِنْ مَرْقَدِنَا} [يس: 52] قالت لهم الملائكة: {هَذَا مَا وَعَدَ الرَّحْمَنُ} على ألسنة الرسل، بأنه يبعثكم بعد الموت، فكذبتم به {وَصَدَقَ الْمُرْسَلُونَ} بأن البعث حق. وذلك أنهم ظنوا لما رفع عنهم العذاب أربعين سنة، إن الله لا يعذبهم، ولكن لما نُفخ النفخة الثانية {فَإِذَا هُمْ مِنَ الْأَجْدَاثِ إِلَى رَبِّهِمْ يَنْسِلُونَ (51) قَالُوا يَاوَيْلَنَا مَنْ بَعَثَنَا مِنْ مَرْقَدِنَا} [يس: 51، 52] أي من منامنا.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দুই ফুঁকের (সিংগায় ফুঁক) মাঝে ব্যবধান হলো চল্লিশ।" [বর্ণনাকারী বলেন] উপস্থিত লোকেরা জিজ্ঞেস করলেন, "হে আবূ হুরায়রা! চল্লিশ দিন?" তিনি বললেন, "আমি অস্বীকার করছি।" তাঁরা বললেন, "চল্লিশ বছর?" তিনি বললেন, "আমি অস্বীকার করছি।" তাঁরা বললেন, "চল্লিশ মাস?" তিনি বললেন, "আমি অস্বীকার করছি।"

"মানুষের সবকিছুই পচে গলে নিশ্চিহ্ন হয়ে যাবে, কেবল তার মেরুদণ্ডের শেষ অংশ বা ককসিক হাড় (আ’জবুয যানা’ব) ছাড়া। এর মাধ্যমেই (কেয়ামতের দিন) সৃষ্টিকুলকে আবার জোড়া লাগানো হবে।"

(অন্য বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে:) এরপর আল্লাহ আকাশ থেকে পানি বর্ষণ করবেন, ফলে তারা অঙ্কুরিত হবে, যেভাবে শাক-সবজি জন্ম নেয়। মানুষের সবকিছুই পচে যায়, একটিমাত্র হাড় ছাড়া, আর তা হলো আ’জবুয যানা’ব।









আল-জামি` আল-কামিল (3775)


3775 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كل ابن آدم تأكله الأرض إلا عَجْبَ الذَّنَب، منه خُلق، وفيه يُركَّبُ".

صحيح: رواه مالك في الجنائز (48) عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة فذكر الحديث. ورواه مسلم في الفتن (2955/ 142) من وجه آخر عن المغيرة الحزامي، عن أبي الزناد بإسناده مثله.




আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আদম সন্তানের সবকিছুই মাটি খেয়ে ফেলে (ধ্বংস করে দেয়), কিন্তু 'আযবুয যামাব' (মেরুদণ্ডের সর্বনিম্ন অংশ বা কক্্িগ্স) ব্যতীত। তা থেকেই তাকে সৃষ্টি করা হয়েছে, এবং তার মধ্যেই (কেয়ামতের দিন) তাকে পুনরায় যুক্ত করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3776)


3776 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يأكل التراب كل شيء من الإنسان إلا عجْب ذَنَبِه" قيل: مثل ما هو يا رسول الله؟ قال:"مثل حبة خردل، منه تنبتُون".
ابن لهيعة، عن دَرَّاج أبي السمح، عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد به.

دراج أبو السمع مختلف فيه، والجمهور على تضعيفه وخاصة في روايته عن أبي الهيثم، عن أبي سعيد كما قال أبو داود، ولكن قال ابن عدي: عامة الأحاديث التي أمليتُها عن دراج مما لا يتابع عليه، ولم يذكر هذا الحديث فيما أنكره، وقال:"أرجو أن أحاديثه بعد هذه التي أنكرت عليه، لا بأس بها". وأما ابن لهيعة فقد توبع عند ابن حبان في صحيحه (3140)، والحاكم (4/ 609).




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মাটি মানুষের সব কিছু খেয়ে ফেলে, কিন্তু তার 'আজব আয-যানাব' (মেরুদণ্ডের শেষ অংশ) ছাড়া।" জিজ্ঞাসা করা হলো: "হে আল্লাহর রাসূল! তা দেখতে কেমন?" তিনি বললেন: "তা সরিষার বীজের মতো। তা থেকেই তোমাদেরকে পুনরায় উঠানো হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3777)


3777 - عن * *




৩ ৭৭৭ - ... থেকে বর্ণিত।









আল-জামি` আল-কামিল (3778)


3778 - عن بريدة بن الحُصَيب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نهيتكم عن زيارة القبور فزورها، ونهيتكم عن لحوم الأضاحي فوق ثلاث فأمسكوا ما بدا لكم، ونهيتكم عن النبيذ إلا في سقاء فاشرَبُوا في الأسقية كلها، ولا تشربوا مسكرًا".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (977) من طرق، عن محمد بن فُضيل، عن أبي سنان (وهو ضرار بن مرة) عن محارب بن دثار، عن ابن بريدة، عن أبيه فذكر الحديث. ورواه النسائي (2032) من وجه آخر، وفيه:"ولا تقولوا هُجرا""هُجر" - بضم الهاء، أي لا تقولوا ما لا ينبغي من الكلام، فإنه ينافي المطلوب الذي هو التذكير.

ورواه الترمذي (1054) وفيه:"فقد أُذن لمحمد في زيارة قبر أمه فزورها فإنها تذكر الآخرة".

ورواه البيهقي (4/ 76) من وجه آخر عن زهير، عن زيد، عن محارب بن دثار بإسناده وفيه: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر، فنزلنا منزلًا، ونحن معه قريبا من ألف راكب فقام فصلى ركعتين، ثم أقبل علينا وعيناه تذرفان، فقام إليه عمر فقداه بالأب والأم وقال له: ما لك يا رسول الله! قال:"إني استأذنت ربي في استغفاري لأمي فلم يأذن لي، فبكيت لها رحمة لها من النار، وإني كنت نهيتكم عن زيارة القبور …" فذكر الحديث.

ورواه أبو داود (3235) من طريق معرف بن واصل، عن محارب بن دثار بإسناده وفيه:"نهيتكم عن زيارة القبور، فزورها فإن في زيارتها تذكرة". ومعرف ثقة.




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম, (এখন) তোমরা তা যিয়ারত করো। আর আমি তোমাদেরকে তিন দিনের বেশি কুরবানীর গোশত খেতে নিষেধ করেছিলাম, (এখন) তোমরা যতদিন ইচ্ছা জমা করে রাখো। আর আমি তোমাদেরকে মশক ছাড়া অন্য পাত্রে নাবীয (খেজুর ভেজানো পানীয়) পান করতে নিষেধ করেছিলাম, (এখন) তোমরা সকল পাত্রেই পান করো, তবে তোমরা নেশাযুক্ত (জিনিস) পান করবে না।”









আল-জামি` আল-কামিল (3779)


3779 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"استأذنتُ ربي أن أستغفر لأمي فلم يأْذَنْ لي، واستأذنْتُه أن أزورَ قبرها فأذن لي".

وفي رواية قال أبو هريرة: زار النبي صلى الله عليه وسلم قبر أمه، فبكى وأبكى من حوله، فقال:"استأذَنْتُ ربي في أن أستغفر لها فلم يُؤذنْ لي، واستأذنتُه في أن أزور قبرها فَأُذِن لي، فزوروا القبور، فإنها تذكر الموت".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (976) من طرق، عن مروان بن معاوية، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة فذكر الحديث مثله.

والرواية الثانية رواها محمد بن عبيد، عن يزيد بن كيسان بإسناده مثله.
قال البغوي رحمه الله:"ويقال: كان قبر أمه بالأبواء، فمر به عام الحديبية، ويُروى أنه زار قبر أمه في ألْف مُقنع، أي: في ألْف فارس مُغَطَّى بالسلاح"،"شرح السنة" (5/ 463).

وقوله:"استأذنت ربي أن أستغفر لأمي" يحتمل أن يكون هذا الاستئذان قبل نزول قوله تعالى: {مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَالَّذِينَ آمَنُوا أَنْ يَسْتَغْفِرُوا لِلْمُشْرِكِينَ وَلَوْ كَانُوا أُولِي قُرْبَى} [التوبة: 113] ويحتمل أن يكون بعد ذلك، وارتجي خصوصية أمه بذلك.

وفي الحديث جواز زيارة قبر المشركين للموعظة والذكرى بمشاهدة قبرهم، ويؤيد ذلك آخر الحديث:"فزوروا القبور فإنها تذكر الموت وقبر المسلم والمشرك فيه سواء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আমি আমার রবের কাছে আমার মায়ের জন্য ক্ষমা চাওয়ার অনুমতি চেয়েছিলাম, কিন্তু তিনি আমাকে অনুমতি দেননি। আর আমি তাঁর কাছে তাঁর কবর যিয়ারত করার অনুমতি চাইলে তিনি আমাকে অনুমতি দিলেন।”

আরেকটি বর্ণনায় আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মায়ের কবর যিয়ারত করলেন। ফলে তিনি কাঁদলেন এবং তাঁর চারপাশে যারা ছিল, তাদেরকেও কাঁদালেন। অতঃপর তিনি বললেন: “আমি আমার রবের কাছে তাঁর জন্য (ক্ষমা চাওয়ার) অনুমতি চেয়েছিলাম, কিন্তু আমাকে অনুমতি দেওয়া হয়নি। আর আমি তাঁর কবর যিয়ারত করার অনুমতি চাইলে আমাকে অনুমতি দেওয়া হলো। সুতরাং তোমরা কবর যিয়ারত করো, কেননা তা মৃত্যুকে স্মরণ করিয়ে দেয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (3780)


3780 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إني نهيتكم عن زيارة القبور، فزوروها، فإن فيها عِبرةً، ونهيتكم عن النبيذ فاشربوا، ولا أحل مسكرًا، ونهيتكم عن الأضاحي فكلوا".

حسن: رواه أحمد (11329) عن يحيى بن آدم، حدثنا ابن المبارك، عن أُسامة، عن محمد بن يحيى بن حَبَّان، عن عمه، عن أبي سعيد الخدري فذكره.

وإسناده حسن لأجل أسامة وهو: ابن زيد الليثي المدني حسن الحديث.

ورواه الحاكم في"المستدرك" (1/ 374) من طريق أسامة بن زيد بإسناده، وقال: صحيح على شرط مسلم".

قلت: وهو كما قال، إلا أن أسامة بن زيد تكلم فيه النسائي، فقال:"ليس بالقوي"، ومشاه أبو حاتم، وقال العجلي:"ثقة" والخلاصة فيه كما قال الحافظ:"صدوق يهم"، فلا بأس بالاستشهاد به، لأنه أرجو أنه لم يهم في هذا الحديث.

وعم محمد بن حَبَّان هو: واسع بن حبَّان بن منقذ صحابي ابن صحابي.

ورواه البزار"كشف الأستار" (861) من وجه آخر وفيه:"نهيتكم عن لحوم الأضاحي فوق ثلاث فكلوا وادخروا، ونهيتكم عن زيارة القبور فزُوروها، ولا تقولوا ما يُسخط الرب، ونهيتكم عن الأوعية فانتبذوا، وكل مسكر حرام".

قال البزار: وعمر ومحمد قد حدَّث كل منهما بأحاديث لم يتابع عليها.

قلت: عمر هو: ابن محمد بن زيد بن عبد الله بن عمر بن الخطاب ثقة من رجال الشيخين، وكذلك أبوه محمد وهو من رجال الجماعة.

وأورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 85) وقال:"رجاله رجال الصحيح".

فلا يضر عدم المتابعة على أحاديثهما إذا كان في الإسناد من قبلهما ومن بعدهما ثقات.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম, তবে এখন তোমরা তা যিয়ারত করো, কারণ এর মধ্যে শিক্ষা রয়েছে। আর আমি তোমাদেরকে নাবীয (খেজুর বা আঙ্গুর ভেজানো পানীয়) পান করতে নিষেধ করেছিলাম, এখন তোমরা তা পান করো, তবে আমি কোনো নেশাকর জিনিস হালাল করি না। আর আমি তোমাদেরকে কুরবানীর গোশত খেতে নিষেধ করেছিলাম, এখন তোমরা তা খাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (3781)


3781 - عن أنس بن مالك قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كُنت نهيتكم عن زيارة القبور،
ألا فزوروها فإنه يرق القلب، وتدمع العين، وتذكر الآخرة، ولا تقولوا هجرًا".

حسن: رواه الحاكم (1/ 376) بإسناده عن عامر بن يساف، ثنا إبراهيم بن طهمان، عن يحيى ابن عباد، عن أنس فذكره. وإسناده حسن لأجل عامر بن يساف فإنه"صالح" كما قال أبو حاتم.

قال الذهبي: ورُوي بإسناد آخر عن أنس.

قلت: ما ذكرته هو أجوده، وقد رواه الإمام أحمد (13487) عن يعقوب، قال: حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني يحيى بن الحارث الجابر، عن عبد الوارث مولى أنس وعمرو بن عامر، كلاهما عن أنس قال:"نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن زيارة القبور، وعن لحوم الأضاحي بعد ثلاث، وعن النبيذ في الدُّبَّاء والنقير والحنتم والمزفَّت"، قال: ثم قال رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ذلك:"ألا إني قد كنت نهيتكم عن ثلاث، ثم بدا لي فيهن، نَهيتُكم عن زيارة القبور، ثم بدا لي أنها تُرقُّ القلبَ، وتُدمعُ العينَ، وتُذكر الآخرة، فزوروها ولا تقولوا هُجرًا، ونهيتكم عن لحوم الأضاحي أن تأكلوها فوق ثلاث ليال، ثم بدا لي أن الناس يتحفون ضيفَهم، ويُخبِّئُون لغائبهم، فأمْسِكوا ما شئتُم، ونهيتكم عن النبيذ في هذه الأوعية فاشربوا بما شئتُم، ولا تشربوا مُسْكِرا، من شاء أوكى سقاءَه على إثم".

ورواه الحاكم (1/ 376) من طريق يحيى بن عبد الله التيمي، عن عمرو بن عامر الأنصاري وحده عن أنس مختصرًا. وفي الإسناد يحيى بن الحارث وهو: يحيى بن عبد الله بن الحارث الجابر أكثر أهل العلم على تضعيفه، وقال الإمام أحمد: لا بأس به، وقال ابن عدي: أرجو أنه لا بأس به، وجعله الحافظ:"ليِّن الحديث" وللحديث أسانيد أخرى أضعف مما ذكرته.

وقوله:"ولا تقولوا هُجرًا" أي قولًا قبيحًا مثل يا ويلي وغيرها.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি তোমাদেরকে কবর জিয়ারত করতে নিষেধ করেছিলাম। এখন তোমরা তা জিয়ারত করো। কেননা তা অন্তরকে কোমল করে, চোখকে অশ্রুসিক্ত করে এবং আখেরাতকে স্মরণ করিয়ে দেয়। আর তোমরা সেখানে কোনো অশ্লীল বা খারাপ কথা বলো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3782)


3782 - عن عائشة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم رخَّص في زيارة القبور.

وفي رواية: عن عبد الله بن أبي مليكة، أن عائشة أَقبلت ذات يوم من المقابر، فقلت لها يا أم المؤمنين! من أين أقبلتِ؟ قالت: من قبر أخي عبد الرحمن بن أبي بكر، فقلت لها: أليس كان رسول الله صلى الله عليه وسلم نهى عن زيارة القبور؟ قالت: نعم كان نهى، ثم أمر بزيارتها.

صحيح: رواه ابن ماجه (1570) عن إبراهيم بن سعيد الجوهري، قال: حدثنا رَوح، قال: حدثنا بسطام بن مسلم، قال: سمعت أبا التيَّاح، قال: سمعت ابن أبي مليكة، عن عائشة فذكرته.

وهذا إسناده صحيح، ورجاله ثقات كما قال البوصيري في"الزوائد".

والرواية الثانية رواها الحاكم (1/ 376) وعنه البيهقي (4/ 78) من طريق بَسْطَام بن مسلم، عن أبي التياح يزيد بن حميد، عن عبد الله بن أبي مليكة فذكره. وقال البيهقي:"تفرد به بسطام".
قلت: بسطام هو ابن مسلم البصري، ثقة، وثَّقه ابن معين وغيره، وقال فيه الحافظ:"ثقة" فلا يضر تفرده. وتفصيل هذه القصة رواها الترمذي (1055) عن عبد الله بن أبي مليكة نفسه قال: توفي عبد الرحمن بن أبي بكر بحُبْشِيِّ، قال: فحمل إلى مكة فُدفن فيها، فلما قدمت عائشة، أتتْ قبر عبد الرحمن بن أبي بكر فقالت:

وكنا كنَدْمَاني جُذَيمةَ حُقْبةً … من الدهر حتى قيل: لن يتصدَّعا

فلما تَفَرَّقنا كأَنِّي ومالكًا … لطولِ اجتماعٍ لم نَبِتْ ليلةً معًا

ثم قالت: والله لو حضرتُك ما دُفنت إلا حيث مُت، ولو شهدتُك ما زرتك، رواه عن الحسين ابن حريث، حدثنا عيسى بن يونس، عن ابن جُريج، عن عبد الله بن أبي مليكة فذكره.

وسكت عليه الترمذي، ورجاله ثقات.

وأخرجه عبد الرزاق (6535) عن ابن جريج قال: سمعت ابن أبي مليكة، وتابعه أيوب عند عبد الرزاق (6539).

وقوله:"بُحبْشِيّ" هو جبل بأسفل مكة على ستة أميال منها.

وقولها:"ولو شهدتُك ما زرتُك" دليل على كراهية زيارة النساء القبور.

قال شيخ الإسلام:"وهذا يدل على أن الزيارة ليست مستحبة للنساء، كما تستحب للرجال، إذ لو كان كذلك لاستحب لها زيارته، كما تستحب للرجال زيارته، سواء شهدته أو لم تشهد"،"مجموع الفتاوى" (24/ 345).




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কবর যিয়ারত করার অনুমতি দিয়েছেন।

অন্য এক বর্ণনায় আব্দুল্লাহ ইবনু আবী মুলাইকা থেকে বর্ণিত, একদিন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কবরস্থান থেকে ফিরছিলেন। আমি তাঁকে বললাম, হে উম্মুল মু’মিনীন! আপনি কোথা থেকে আসলেন? তিনি বললেন, আমার ভাই আব্দুর রহমান ইবনু আবী বকরের কবর থেকে। আমি তাঁকে বললাম, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কি কবর যিয়ারত করতে নিষেধ করেননি? তিনি বললেন, হ্যাঁ, নিষেধ করেছিলেন, অতঃপর তিনি তা যিয়ারত করার আদেশ দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3783)


3783 - عن محمد بن قيس بن مخرمة بن المطلب أنه قال يومًا: ألا أحدثكم عني، وعن أمي؟ فظننا أنه يريد أمه التي ولدته، قال: قالت عائشة: ألا أحدثكم عني وعن رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قلنا: بلى، قالت: لما كانت ليلتي التي كان النبي صلى الله عليه وسلم فيها عندي، انقلب فوضع رداءه -فذكرت الحديث بطوله الذي في باب ما جاء من الأدعية لأصحاب القبور وفيه-: قالت: كيف أقول لهم يا رسول الله؟ فقال:"قولي: السلام على أهل الديار من المؤمنين والمسلمين، ويرحم الله المستقدمين والمستأخرين، وإنا إن شاء الله بكم للاحقون".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (974/ 103) من طرق عن ابن جريج قال: أخبرني عبد الله بن كثير بن المطلب، عن محمد بن قيس بن مخرمة بن المطلب فذكر الحديث بطوله.

وأما ما رُوي عن فاطمة بنت محمد صلى الله عليه وسلم أنها كانت تزور قبر عمها حمزة كل جمعة، فتصلي وتبكي عنده فهو لا يصح.
رواه الحاكم (1/ 377)، وعنه البيهقي (4/ 78) من طريق سليمان بن داود، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن علي بن الحسين، عن أبيه، أن فاطمة كانت تزور فذكره.

قال الحاكم:"هذا الحديث رواته عن آخرهم ثقات".

وتعقبه الذهبي بقوله:"هذا منكر جدًّا، وسليمان ضعيف".

وقال البيهقي:"وقد قيل عن سليمان بن داود، عن أبيه، عن محمد بن محمد، عن أبيه، دون ذكر علي بن الحسين، عن أبيه فيه. وهو منقطع".

وقد اغتررتُ بقول الحاكم فصحَّحتُه في"المنة الكبرى" (3/ 123) والصواب أنه ضعيف، فمن لديه نسخة منه فليُصَحّحها.

وفي معناه ما رُوي عن علي بن أبي طالب أن النبي صلى الله عليه وسلم نهى عن زيارة القبور، وعن الأوعية … ثم قال:"إني كنت نهيتكم عن زيارة القبور فزوروها، فإنها تذكركم الآخرة".

فإن فيه علي بن زيد، وهو ابن جدعان"ضعيف" وشيخه ربيعة بن النابغة"مجهول".

رواه الإمام أحمد (1236) عن يزيد، أخبرنا حماد بن زيد، عن علي بن زيد، عن ربيعة بن النابغة، عن أبيه، عن علي بن أبي طالب فذكر الحديث، وله أسانيد أخرى أضعف منها.

وفي الباب ما رُوي عن ابن مسعود أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"كنت نهيتكم عن زيارة القبور فزوروها فإنها تُزهِّد في الدنيا، وتذكر الآخرة" رواه ابن ماجه (1571) عن يونس بن عبد الأعلى، قال: حدثنا ابن وهب، قال: أنبأنا ابن جريج، عن أيوب بن هانئ، عن مسروق بن الأجدع، عن ابن مسعود فذكره.

وأيوب بن هانئ الكوفي مختلف فيه، فضعَّفه ابن معين، وقال ابن عدي:"لا أعرفه". وعرفه أبو حاتم فقال:"شيخ صالح"، والخلاصة فيه كما قال الحافظ:"صدوق فيه لين".

وأما ابن حبان فأخرجه في صحيحه (981) مطولًا، وكذلك الحاكم (2/ 336) كلاهما من طريق ابن جريج بإسناده، وصحَّحه الحاكم فتعقبه الذهبي بقوله:"أيوب ضعَّفه ابن معين".

وقال ابن عدي في"الكامل" (1/ 351):"هذا في كتب ابن جريج مرسل، وهذا حديث لا يُساوي شيئًا".

وقد أسقط ابن جريج شيخه أيوب بن هانئ في رواية عبد الرزاق في"المصنف" (6714) عنه فإنه قال:"حُدثت عن مسروق بن الأجدع به فذكر الحديث".

وللحديث إسناد آخر أضعف منه وهو ما رواه الإمام أحمد (4319) عن يزيد بن هارون، أخبرنا حماد بن زيد، حدثنا فرقد السبخيُّ، قال: حدثنا جابر بن يزيد، أنه سمع مسروقًا، يحدث عن عبد الله بن مسعود فذكر الحديث.

وفرقد السبخيُّ هو: فرقد بن يعقوب السبخيُّ -بفتح المهملة والموحدة، وبخاء معجمة- أبو
يعقوب البصري تكلم فيه كبار النقاد، فقال البخاري:"في حديثه مناكير"، وقال أحمد:"رجل صالح ليس بقوي في الحديث لم يكن صاحب حديث"، وقال ابن سعد:"كان ضعيفًا منكر الحديث"، قال أبو أحمد:"منكر الحديث"، وقال ابن حبان:"كانت فيه غفلة ورداءة حفظ، فكان يرفع المراسيل وهو لا يعلم، ويُسند الموقوف من حيث لا يفهم، فبطل الاحتجاج به"، وقال النسائي:"ليس بثقة". ومشَّاه ابن معين وابن عدي.

وقلت: فمثله لا يُستبعد أن يخطئ في الإسناد، فيجعل جابر بن يزيد محل ابن جريج، مع أن جابر بن يزيد إن كان هو الجعفي، فهو أضعف من ابن جريج، والله المستعان.

وأما ما رُوي عن أبي هريرة مرفوعًا:"من زار قبر أبويه، أو أحدهما كل جمعة غفر له، وكتب برًا" فهو ضعيف جدا.

رواه الطبراني في"الأوسط" و"الصغير""مجمع البحرين" (1329) عن محمد بن أحمد بن النعمان بن شبل البصري، ثنا أبي، حدثني عم أبي محمد بن النعمان بن عبد الرحمن، عن يحيى بن العلاء البجلي، عن عبد الكريم أبي أمية، عن مجاهد، عن أبي هريرة فذكره.

وفيه سلسلة الضعفاء والمجهولين محمد بن النعمان، وشيخه يحيى بن العلاء البجلي، وشيخه عبد الكريم أبي أمية، كلهم ضعفاء، بل وقد أُتهِم البجلي.

وقد ضعَّفه أيضًا الهيثمي في"المجمع" (3/ 59 - 60) من جهة عبد الكريم أبي أمية.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (একবার) বললেন: আমি কি তোমাদের আমার এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর একটি ঘটনা শোনাবো না? আমরা বললাম: অবশ্যই শোনান। তিনি বললেন: যখন আমার রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার নিকট ছিলেন, তখন তিনি পাশ ফিরে গেলেন এবং তাঁর চাদর রাখলেন— (তিনি তখন কবরের বাসিন্দাদের জন্য দু‘আর অধ্যায়ে বর্ণিত দীর্ঘ হাদীসটি উল্লেখ করলেন) তাতে (আয়িশা) বললেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি তাদের (কবরবাসীদের) জন্য কী বলবো? তিনি বললেন: "তুমি বলো: এই আবাসস্থলের মু’মিন ও মুসলিম বাসিন্দাদের উপর শান্তি বর্ষিত হোক। আল্লাহ তা‘আলা আমাদের পূর্ববর্তী ও পরবর্তী সকলের উপর রহমত বর্ষণ করুন। আর ইনশাআল্লাহ, আমরাও তোমাদের সাথে মিলিত হতে যাচ্ছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (3784)


3784 - عن أبي هريرة قال: لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم زوَّارات القبور.

حسن: رواه الترمذي (1056)، وابن ماجه (1576) كلاهما من طريق أبي عوانة، عن عمر بن أبي سلمة، عن أبيه، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل عمر بن أبي سلمة وهو: عمر بن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف الزهري قاضي المدينة، حسن الحديث. قال فيه ابن معين:"ليس به بأس"، وقال أبو حاتم:"هو عندي صالح صدوق"، وقال البخاري:"صدوق"، وقال ابن عدي:"حسن الحديث".

قال الترمذي:"حسن صحيح"، وصحَّحه أيضًا ابن حبان (3179)، ورواه الإمام أحمد (8449) كلاهما من هذا الوجه.

وأما كون شعبة تركه فكما قال أحمد:"لم يسمع شعبةُ من عمر بن أبي سلمة".

قال الترمذي:"وقد رأى بعض أهل العلم أن هذا كان قبل أن يُرخِّص النبي صلى الله عليه وسلم في زيارة القبور، فلما رخَّص دخل في رخصته الرجال والنساء، وقال بعضهم: إنما كُرِه زيارةُ القبور للنساء لقلة صبرهن، وكثرة جزعهنَّ"، انتهى.
وفي الباب حديثان آخران عن ابن عباس وحسان بن ثابت.

أما حديث ابن عباس فقال:"لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم زائرات القبور، والمتخذين عليها المساجد والسرج". رواه أبو داود (3236)، والترمذي (320)، والنسائي (2045)، وابن ماجه (1575) كلهم من طريق محمد بن جحادة، قال: سمع أبا صالح، يحدث عن ابن عباس فذكر الحديث، ولفظهم سواء غير أن ابن ماجه رواه مختصرًا، وأبو صالح هو باذام، ويقال: باذان مولى أم هانئ بنت أبي طالب ضعَّفه أَكثر الأئمة منهم أبو حاتم قال:"يكتب حديثه ولا يحتج به"، وقال النسائي:"ليس بثقة"، وقال ابن عدي:"عامة ما يرويه تفسير، وما أقل ما له من المسند، وفي ذلك التفسير ما لم يتابعه عليه أهل التفسير، ولم أعلم أحدا من المتقدمين رضيه"، وقال الجوزجاني:"إنه متروك"، ونقل ابن الجوزي عن الأزدي أنه قال:"كذاب" وقال أبو أحمد الحاكم:"ليس بالقوي عندهم"، وقال ابن حبان:"يحدث عن ابن عباس ولم يسمع منه"، وقال أحمد:"كان ابن مهدي ترك حديث أبي صالح".

وأما ابن معين فقال:"ليس به بأس، وإذا روى عن الكلبي فليس بشيء"، وقال ابن المديني عن القطان:"لم أر أحدًا من أصحابنا تركهـ، وما سمعت من الناس يقول فيه شيئًا"، ووثَّقه العجلي، وقد صحَّح حديثه هذا ابن حبان (3179، 3180) وحسَّنه الترمذي، وأخرجه الحاكم (1/ 374) كلهم من هذا الوجه.

وقد زعم ابن حبان أن أبا صالح هو:"ميزان، وهو ثقة"، وقال أيضًا:"أبو صالح: اسمه ميزان بصري ثقة، وليس بصاحب محمد بن السائب الكلبي"، انتهى. واستغربه الحافظ في"التلخيص" (2/ 137) وقال:"ضعيف" وقال في التقريب:"ضعيف مدلس".

وأما الحاكم فأَكَّد أنه باذان، ونفى أن يكون السمان الزيات ذكوان أبو صالح من رجال الشيخين ثم قال:"لكن حديث متداول فيما بين الأئمة، وقد وجدت له متابعا من حديث سفيان الثوري في متن الحديث فخرجته" انتهى.

فالذي يظهر من أقوال أهل العلم في أبي صالح أنه ضعيف، فإن من علم حجة على من لم يعلم.

وأما حديث سفيان الذي أشار إليه الحاكم فهو ما رواه ابن ماجه (1574)، والحاكم (1/ 374)، وأحمد (15657) كلهم من طرق، عن سفيان، عن عبد الله بن عثمان بن خُثيِم القارئ، عن عبد الرحمن بن بهمان، عن عبد الرحمن بن حسان، عن أبيه حسان بن ثابت قال:"لعن رسول الله صلى الله عليه وسلم زوّارات القبور"، وعبد الرحمن بن بهمان لم يرو عنه سوى ابن خُثيم، ولم يُوثر فيه توثيق من أحد غير أن ابن حبان أورده في"الثقات"، وكذا العجلي، فهو مجهول على رأي أهل العلم، وأما الحافظ فجعله"مقبولًا" لتوثيق ابن حبان له كما هو معروف من تتبع"المقبولين" في"التقريب"، ولذا حسَّنه بعض أهل العلم في الشواهد، ومنهم الحاكم.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن علي بن أبي طالب قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم فإذا نسوة جلوس فقال:"ما يُحبسكن؟" قُلن: ننتظر الجنازة، قال:"هل تغْسِلْن؟" قُلن: لا، قال:"هل تحملن؟" قلن: لا، قال:"هل تُدلين فيمن يُدلي؟" قلن: لا، قال:"فارجعن مأزوراتٍ غير مأجورات" فهو ضعيف جدًّا، رواه ابن ماجه (1578) عن محمد بن المصفي، قال: حدثنا أحمد بن خالد، قال: حدثنا إسرائيل، عن إسماعيل بن سلْمان، عن دينار أبي عمر، عن ابن الحنفية، عن علي بن أبي طالب فذكر الحديث.

وفيه إسماعيل بن سلمان بن أبي المغيرة التيمي قال النسائي:"متروك"، وضعَّفه أبو زرعة وأبو حاتم وأبو داود والدارقطني وغيرهم، ودينار بن عمر الأسدي، أبو عمر البزَّار قال فيه الحافظ:"صالح الحديث رمي بالرفض".

قلت: هذا الرجل مختلف فيه، فقد وَثَّقه وكيع -على ما رواه عبد الله بن أحمد بن حنبل، عن أبيه- وقال أبو الفتح الأزدي:"متروكٌ"، وقال الخَلِيلي في"الإرشاد":"كذَّاب"، وقال البخاري:"كان مختاريًا من شُرط المختار بن أبي عُبَيد (الكذاب)، ونحن نخشى أن يكون وكيع إنما وَثَّقَ غير الراوي عن محمد بن الحنفية، فإذا كان ذلك كذلك -وهو المرجح- فهو متروك" والله تعالى أعلم.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: قَبرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم -يعني ميتًا- فلما فرغنا انصرف رسول الله صلى الله عليه وسلم وانصرفنا معه، فلما حاذى بابه وقف فإذا نحن بامرأة مقبلة، قال: أظنه عرفها، فلما ذهبت إذا هي فاطمة [عليها السلام] فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما أخرجك يا فاطمة من بيتك؟" فقالت: أتيت يا رسول الله، أهْلَ هذا البيت فرحَّمْت إليهم ميتهم، أو عزيتهم به، فقال لها رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فلعلَّك بَلغتِ معهم الكُدَى" قالت: معاذ الله! وقد سمعتك تذكر فيها ما تذكر، قال:"لو بلغت معهم الكُدَى" فذكر تشديدًا في ذلك، فسألت ربيعة عن الكدى، فقال: القبور فيما أحسب.

رواه أبو داود (3123)، والنسائي (1880) كلاهما من طريق ربيعة بن سيف المعافري، عن أبي عبد الرحمن الحُبُلي، عن عبد الله بن عمرو فذكره.

وأخرجه ابن حبَّان في صحيحه (3177)، والحاكم (1/ 373 - 374)، والإمام أحمد (6574) كلهم من هذا الطريق. قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

والصواب: أنه ليس على شرط أحدهما، وفي إسناده ربيعة بن سيف المعافري ضغَّفه النسائي في"السنن"، وقال البخاري:"عنده مناكير"، وقال المنذري:"ربيعة بن سيف المعافري من تابعي أهل مصر وفيه مقال".

وأما ابن حبان فإنه وإن كان أخرج الحديث في صحيحه ولكنه قال في"الثقات":"يخطئ كثيرًا"، وتساهل فيه العجلي فقال:"ثقة".
وقوله:"الكدى": جمع الكُدية، وهي القطعة الصلبة من الأرض، والقبور: إنما تحفر في المواضع الصلبة لئلا تنهار، والعرب تقول: ما هو إلا ضب كدية، إذا وصفوا الرجل بالدهاء والأرب، ويقال أكدى الرجل: إذا حفر فأفضى إلى الصلابة، ويضرب به المثل فيمن أخفق، فلم ينجح في طلبته". قاله الخطابي في معالمه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘন ঘন কবর জিয়ারতকারিণী মহিলাদেরকে অভিশাপ দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3785)


3785 - عن عائشة قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم كلما كان ليلتها من رسول الله صلى الله عليه وسلم يخرج من آخر الليل إلى البقيع فيقول:"السلام عليكم دار قومٍ مؤمنين، وأتاكم ما توعدون غدًا مؤجَّلون، وإنا إن شاء الله بكم لاحقون، اللهم! اغفر لأهل بقيع الغرقد".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (974) من طرق، عن إسماعيل بن جعفر، عن شريك (وهو ابن أبي نمر) عن عطاء بن يسار، عن عائشة فذكرته.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর তাঁর (আয়েশার) সাথে রাত্রিযাপনের পালা আসত, তখন তিনি রাতের শেষভাগে বাকী' (কবরস্থান)-এর দিকে বের হতেন এবং বলতেন: "আসসালামু আলাইকুম (তোমাদের উপর শান্তি বর্ষিত হোক), হে মুমিন কওমের ঘর! তোমাদের কাছে তা-ই এসে গেছে যার ওয়াদা তোমাদেরকে দেওয়া হয়েছিল, (তোমাদের মৃত্যুর) নির্ধারিত সময় যা স্থগিত ছিল (তা এখন উপস্থিত)। আর আমরাও ইনশাআল্লাহ তোমাদের সাথে মিলিত হব। হে আল্লাহ! বাকী' আল-গারক্বাদ-এর অধিবাসীদের ক্ষমা করে দিন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3786)


3786 - عن محمد بن قيس قال: سمعتُ عائشة تحدث فقالت: ألا أحدثكم عني وعن رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قلنا: بلى، قالت: لمَّا كانت ليلتي التي كان النبي صلى الله عليه وسلم فيها عندي انقلب فَوَضَعَ رداءَه، وخلع نعليه فوضعهما عند رجليه، وبسط طرف إزاره على فراشه فاضطجع فلم يلبث إلا ريثما ظَنَّ أن قد رَقَدْتُ، فأخذ رداءَهُ رُوَيْدًا، وانتعلَ رُوَيدًا، وفتحَ البابَ رُوَيْدًا فخرج، ثم أجافَهُ رُوَيْدًا، فجعلتُ دِرْعي في رأْسي، واخْتَمَرْتُ، وتقنَّعْتُ إزاري، ثم انْطَلقْتُ على إثْرِهِ، حتَّى جاءَ البَقِيعَ فقام فأطال القيام، ثم رفع يديه ثلاث مرَّات، ثم انحرفَ فانحرفتُ، فأَسرع وأسرعتُ، فهرْوَلَ فَهَرْوَلتُ، فأحضرَ فأحضرْتُ، فسَبَقتُه فدخلتُ، فليسَ إلا أنِ اضْطَجَعْتُ، فدخل فقال:"ما لكِ يا عائشُ! حشْيًا رابيةً؟ قالت: قلتُ: لا شيء، قال:"لتُخبريني أو ليُخْبِرَنِّي اللَّطيفُ الخبيرُ" قالتْ: قلتُ: يا رسولَ الله! بأبي أنتَ وأُمِّي، فأَخْبرتُه، قال:"فأنتِ السَّوَادُ الذي رأيتُه أَمَامي؟" قلتُ: نعم، فلَهَدَني في صَدْرِي لَهْدَةً أوجَعَتْنِي، ثم قال:"أظنَنْتِ أنْ يَحيفَ اللهُ عليكِ ورسولُه؟" قالت: مهما يَكْتُم الناسُ يَعْلَمْهُ اللهُ، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فإنَّ جبريل عليه السلام -أتَاني حينَ رأيتِ فنَادَاني، فأَخْفَاهُ منكِ، فأجَبتُه، فأَخْفَيْتُهُ منكِ، ولم يكن يَدْخُلُ عَليكِ وقَدْ وَضَعْتِ ثِيَابَكِ، وظَنَنْتُ أنْ قَدْ رَقَدْتِ، فكرهتُ أن أُوقِظَكِ، وَخَشيتُ أن تَسْتَوحِشي، فقال: إنَّ رَبَّكَ يَأمُرُكَ أنْ تأتيَ أهلَ البَقيع فتَسْتَغْفِرَ لَهُم" قالت: قلتُ: كيف أقولُ لهم؟ يا رسول الله قال: قولي:"السلام على أهل الديار من المؤمنين والمسلمين، ويرحم
الله المستقيمين منا والمستأخرين، وإنا إن شاء الله بكم لَلَاحقون".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (974: 103) عن هارون بن سعيد الأيلي، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرنا ابن جريج، عن عبد الله بن كثير بن المطلب، أنه سمع محمد بن قيس فذكره.

وقولها:"ثم أجافه" بالجيم - أي أغلقه.

وقوله:"ما لك يا عائش! حَشْيًا رابية؟" عائش فيه ترخيم وهو حذف الحرف الأخير من المنادى.

و"حَشْيًا" - بفتح الحاء وإسكان الشين، معناه: وقد وقع عليك الحشا وهو الربو، والتهيج الذي يعرض للمُسْرع في مشيه، والمحتد في كلامه من ارتفاع النفس وتواتره، يقال: امرأة حشياء وحشية، ورجل حشيان وحشش، قيل: أصله من أصاب الربو حشاء.

وقوله:"رابية" أي مرتفعة البطن.

وقولها:"فلَهَدني" بفتح الهاء والدال، ورُوي"فلهزني" - بالزاي وهما متقاربان، ويقرب منهما"لكزه" و"وكزه"، فاللهد الدفع، واللهز الضرب بالكف على الصدر.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মদ ইবনু কায়েস বলেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে হাদিস বর্ণনা করতে শুনেছি। তিনি বললেন, আমি কি তোমাদেরকে আমার ও আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সম্পর্কিত একটি ঘটনা বর্ণনা করব না? আমরা বললাম: অবশ্যই। তিনি বললেন: যখন আমার পালা ছিল এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে ছিলেন, তখন তিনি পাশ ফিরলেন, তাঁর চাদর রাখলেন, জুতা খুললেন এবং পায়ের কাছে রাখলেন। অতঃপর তাঁর চাদরের এক দিক বিছানায় বিছিয়ে শুয়ে পড়লেন। তিনি কেবল ততটুকু সময়ই থাকলেন, যতটুকু সময়ে তিনি ধারণা করলেন যে আমি ঘুমিয়ে পড়েছি। অতঃপর তিনি খুব ধীরে ধীরে তাঁর চাদর নিলেন, ধীরে ধীরে জুতা পরলেন, ধীরে ধীরে দরজা খুললেন এবং বের হলেন। এরপর তিনি ধীরে ধীরে দরজা বন্ধ করলেন। তখন আমি আমার জামা মাথায় চাপালাম, ওড়না পরলাম এবং আমার চাদর দিয়ে মুখ ঢেকে নিলাম। এরপর আমি তাঁর পিছু পিছু গেলাম। তিনি বাকী (কবরস্থানে) পৌঁছলেন এবং দাঁড়িয়ে দীর্ঘ সময় ধরে অবস্থান করলেন। এরপর তিনি তিনবার হাত তুললেন। এরপর তিনি ফিরলেন, আমিও ফিরলাম। তিনি দ্রুত চললেন, আমিও দ্রুত চললাম। তিনি দৌড়ালেন, আমিও দৌড়ালাম। তিনি আরো জোরে দৌড়ালেন, আমিও আরো জোরে দৌড়ালাম। আমি তাঁকে অতিক্রম করে ঘরে প্রবেশ করলাম এবং শুয়ে পড়লাম। (এরপর) তিনি প্রবেশ করলেন। তিনি বললেন: "হে আয়িশা! তোমার কী হয়েছে? হাঁপাচ্ছ কেন, পেট ফুলে আছে দেখছি?" আমি বললাম: কিছুই না। তিনি বললেন: "তুমি আমাকে জানাও, অন্যথায় সূক্ষ্মদর্শী ও সর্বজ্ঞ (আল্লাহ) আমাকে জানিয়ে দেবেন।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার পিতা-মাতা আপনার উপর কুরবান হোক! অতঃপর আমি তাঁকে সব জানালাম। তিনি বললেন: "তুমিই কি সেই কালো ছায়া, যা আমি আমার সামনে দেখেছি?" আমি বললাম: হ্যাঁ। তখন তিনি আমার বুকে এমন জোরে ধাক্কা দিলেন যে আমি ব্যথা পেলাম। এরপর তিনি বললেন: "তুমি কি ধারণা করেছিলে যে আল্লাহ এবং তাঁর রাসূল তোমার সাথে অবিচার করবেন?" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: লোকেরা যাই গোপন করুক না কেন, আল্লাহ তা জানেন। আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি যখন দেখলে, তখন জিবরীল (আঃ) আমার কাছে এসেছিলেন। তিনি আমাকে ডাকলেন, যা তিনি তোমার কাছ থেকে গোপন রেখেছিলেন। আমি তাঁকে সাড়া দিলাম, যা আমি তোমার কাছ থেকে গোপন রেখেছিলাম। তিনি তোমার কাছে আসতে পারতেন না, কারণ তুমি তোমার পোশাক খুলে রেখেছিলে। আর আমি ভেবেছিলাম তুমি ঘুমিয়ে পড়েছো, তাই তোমাকে জাগানো অপছন্দ করলাম এবং তোমার একা থাকার ভয় হলো। অতঃপর তিনি বললেন: 'তোমার রব তোমাকে নির্দেশ দিচ্ছেন যেন তুমি বাকী কবরবাসীদের কাছে যাও এবং তাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করো'।" আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তাদেরকে কী বলব? তিনি বললেন: তুমি বলো: "এই ঘরের (কবরের) মুমিন ও মুসলিম বাসিন্দাদের উপর শান্তি বর্ষিত হোক। আমাদের মধ্যে যারা অগ্রবর্তী এবং যারা বিলম্বকারী, আল্লাহ তাদের প্রতি রহম করুন। আর আল্লাহ চাইলে আমরা অবশ্যই তোমাদের সাথে মিলিত হব।"









আল-জামি` আল-কামিল (3787)


3787 - عن عائشة قالت: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات ليلة، فأَرسلتُ بريرة في أثره لتنظر أين ذهب، قالت: فسلك نحو بقيع الغرقد، فوقف في أدنى البقيع، ثم رفع يديه، ثم انصرف، فرجعت إليّ بريرة، فأخبرتْني، فلما أصبحت، سألتُه فقلت: يا رسول الله! ، أين خرجت الليلة؟ قال:"بعثْتُ إلى أهل البقيع لأُصَلِّي عليهم".

حسن: رواه أحمد (24162) عن قتيبة بن سعيد، قال: حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن علقمة ابن أبي علقمة، عن أمه، عن عائشة قالت: فذكرته.

وإسناده حسن من أجل أم علقمة واسمها مرجانة، وهي مختلفة فيها فلم يرو عنها إلا ابنها وشخص آخر، وذكرها ابن حبان في"الثقات"، وقال العجلي:"مدنية تابعية ثقة"، واضطرب فيها قول الذهبي فذكرها في"الميزان" في"المجهولات" وقال في الكاشف:"وثِّقَت".

ورواه النسائي (2038) وابن حبان (3748)، والحاكم (1/ 488) كلهم من طريق مالك -وهو في الموطأ- الجنائز (55) عن علقمة بن أبي علقمة، عن أمه مرجانة، إلا أنه لم يذكر فيه رفع اليدين، فلعله اختصره.

وأما ابن حجر فقال فيها:"مقبولة" على قاعدته فيمن وثقه ابن حبان، وهو كما قال، فإنها تقبل عند المتابعة، وإلا فهي لينة الحديث، ولكن لا بأس بقبول حديثها لوجود شواهد له.

وأما ما رُوي عن عبد الله بن أبي بكر، عن أبيه، عن عائشة أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يخرج إلى البقيع فيدعو لهم، فسألته عائشة عن ذلك فقال:"إني أُمرت أن أدعو لهم"، فلم يثبت.

رواه الإمام أحمد (26148) عن عبد الله بن عمرو، عن زهير، عن عبد الله بن أبي بكر، عن أبيه فذكره.
وأبو بكر هو: ابن محمد بن عمرو بن حزم ولد سنة (36 هـ) ولم يذكروا له سماعًا من عائشة مع أنه كان ممكنًا إذ ماتت عائشة رضي الله عنها سنة (57 هـ) على الصحيح.

ولكن اختلف على عبد الله بن أبي بكر، فيقال: ما رواه زهير وهو: ابن محمد، عن عبد الله بن أبي بكر لا يثبت فيه قوله:"عن أبيه" كما قال الدارقطني فإن صحَّ هذا فلقاء عبد الله بن أبي بكر عن عائشة أبعد، والله تعالى أعلم.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (ঘর থেকে) বের হলেন। তখন আমি বারীরাকে তাঁর পেছনে পাঠালাম, যেন সে দেখে তিনি কোথায় গেলেন। (বারীরা) বলল, তিনি বাকীউল গারকাদ-এর দিকে গেলেন। তারপর তিনি বাকী'র (কবরস্থানের) শুরুতে দাঁড়ালেন। এরপর তিনি তাঁর দু'হাত তুললেন, অতঃপর ফিরে এলেন। এরপর বারীরা আমার কাছে ফিরে এসে আমাকে সে খবর দিল। যখন সকাল হলো, তখন আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম এবং বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি গত রাতে কোথায় গিয়েছিলেন? তিনি বললেন: "আমাকে বাকী'-এর অধিবাসীদের নিকট পাঠানো হয়েছে, যেন আমি তাদের জন্য দু'আ করি।"