হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3788)


3788 - عن بريدة بن الحُصَيب قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُعلمهم إذا خرجوا إلى المقابر، فكان قائلهم يقول (في رواية أبي بكر): السّلام على أهل الديار، (وفي رواية زهير): السلام عليكم أهل الدّيار من المؤمنين والمسلمين، وإنا إن شاء الله لَلاحقون، أسأل الله لنا ولكم العافية".

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (975) عن أبي بكر بن أبي شيبة وزهير بن حرب، قالا: حدثنا محمد بن عبد الله الأسدي، عن سفيان، عن علقمة بن مَرْثَدٍ، عن سليمان بن بريدة، عن أبيه فذكره.

وزاد النسائي (2040) بعد قوله:"بكم لاحقون":"أنتم لنا فرط، ونحن لكم تبع، أسأل الله العافية لنا ولكم".




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সাহাবীগণ কবরস্থানের উদ্দেশ্যে বের হতেন, তখন তাঁদেরকে (নিম্নোক্ত বাক্যগুলো) শিক্ষা দিতেন। তাঁদের মধ্য থেকে কোনো ব্যক্তি বলতেন: (আবু বকরের বর্ণনায়): "আস-সালামু আলা আহলিদ দিয়ার" (এই বাসস্থানের অধিবাসীদের উপর শান্তি বর্ষিত হোক)। (এবং যোহায়েরের বর্ণনায়): "আস-সালামু আলাইকুম আহলাদ দিয়ার মিনাল মু'মিনিনা ওয়াল মুসলিমিন" (হে মুমিন ও মুসলিম বাসস্থানের অধিবাসীরা, তোমাদের উপর শান্তি বর্ষিত হোক)। এবং (তাঁরা বলতেন): "ওয়া ইন্না ইন শা আল্লাহু লালা-হিকূন, আসআলুল্লাহা লানা ওয়া লাকুমুল আ-ফিয়াহ" (নিশ্চয়ই আল্লাহ্‌র ইচ্ছায় আমরা তোমাদের সাথে মিলিত হবো। আমি আল্লাহ্‌র কাছে আমাদের জন্য ও তোমাদের জন্য নিরাপত্তা (আফিয়াত) প্রার্থনা করি)।









আল-জামি` আল-কামিল (3789)


3789 - عن أبي هريرة أن رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج إلى المقبرة فقال:"السلام عليكم دارَ قوم مؤمنين، وإنا إن شاء الله بكم لاحقون".

صحيح: رواه مالك في الطهارة (28) عن العلاء بن عبد الرحمن، ومن طريقه مسلم (249) في حديث طويل مضى في الطّهارة، باب فضل الوضوء والغرّ المحجلين من آثار الوضوء.

قال الخطابي في معالم السنن:"فيه من العلم أن السلام على الموتَى كهو على الأحياء في تقديم الدعاء على الاسم، ولا يقدم الاسم على الدعاء كما تفعله العامة، وكذلك هو في كل دعاء الخير كقوله تعالى: {رَحْمَتُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ عَلَيْكُمْ أَهْلَ الْبَيْتِ} [هود: 73] وكقوله عز وجل: {سَلَامٌ عَلَى إِلْ يَاسِينَ} [الصافات: 130] وقال في خلاف ذلك: {وَإِنَّ عَلَيْكَ لَعْنَتِي إِلَى يَوْمِ الدِّينِ} [ص: 78] فقدم الاسم على الدعاء، وفيه أنه سمي المقابر دارًا، فدل على أن اسم النار قد يقع من جهة اللغة على الربع العامر المسكون، وعلى الخراب غير المأهول كقول الشاعر:

يا دار مَيّة بالعلياء فالسند

ثم قال:

أقْوات وطال عليها سالف الأمد

وأما قوله:"وإنا إن شاء الله بكم لاحقون" فقد قيل إن ذلك ليس على معنى الاستثناء الذي يدخل الكلام لشكّ وارتياب، ولكنه عادةُ المتكلِم يُحسِّن بذلك كلامه ويُزينه، كما يقول الرجل
لصاحبه:"إنك إن أحسنتَ إليّ شكرتك إن شاء الله، وإن ائتمنتني لم أخنك إن شاء الله" في نحو ذلك من الكلام، وهو لا يريد به الشك في كلامه. وقد قبل: أنه دخل المقبرة، ومعه قوم مؤمنون محققون بالإيمان، والآخرون يظن بهم النفاق، فكان استثناؤه منصرفًا إليهم دون المؤمنين، فمعناه اللحوق بهم في الإيمان، وقيل إن الاستثناء إنما وقع في استصحاب الإيمان إلى الموت لا في نفس الموت" انتهى كلامه.

وقد رُوي عن أبي مُويهبة مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم الاستغفار لأهل بقيع، قال: بعثني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم من جوف الليل، فقال:"يا أبا مُوَيْهِبة! ، إنّي قد أُمرتُ أن أستغفِرَ لأهلِ البقيعِ، فانطلقْ معي" فانطلقتُ معه، فلما وقف بين أظهرهم، قال:"السَّلامُ عَلَيْكُمْ يا أهل المقابر! ، ليَهْنِ لكم ما أَصْبَحْتُم فيه مِمَّا أَصْبَحَ فِيهِ الناسُ، لَو تَعْلَمُونَ ما نَجَّاكُمُ اللهُ مِنْهُ، أَقبَلَتِ الفِتَنُ كَقِطَعِ اللَّيْلِ الْمُظْلِمِ يَتْبَعُ أَوَّلَهَا آخِرُها، الآخرَةُ شَرٌّ مِنَ الأولَى"، قال: ثم أقبل عليّ، فقال:"يا أبا مُوَيْهِبة! إني قد أوتيتُ مَفاتيحَ خَزائن الدُّنْيا والخُلْدَ فيها ثُمَّ الجَنَّةَ، وخُيِّرْتُ بينَ ذلك وبَيْنَ لِقَاءِ رَبِّي عز وجل والجنة" قال: قلتُ: بأبي وأمِّي، فخُذْ مفاتيح الدنيا والخُلد فيها، ثم الجنة، قال:"لا والله يا أبا مُويْهِبة! ، لقد اخْتَرْتُ لِقَاءَ رَبِّي والجَنَّة" ثم استغفَرَ لأهل البقيع، ثم انصرف، فبُدئَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في وجعه الذي قبضه الله عز وجل فيه حين أصبح.

رواه الإمام أحمد (15996، 15997) من وجهين: أحدهما: من طريق يعلى بن عبيد، عن عبيد بن جبير، عن أبي مُوَيهِبة مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم، والوجه الثاني: من طريق عبد الله بن عمر العبلي، قال: حدثني عبيد بن جبير مولى الحكم بن أبي العاص، عن عبد الله بن عمرو، عن أبي مُوَيهِبة واللفظ للطريق الثاني.

وفي الإسنادين عبيد بن جبير لم يوثقه أحد، ذكره ابن حبان في"الثقات"، فهو"مقبول" حسب تعريف ابن حجر، إلا أنه لم يترجم له في"التقريب"، لأنه من رجال"التعجيل" وفي الإسنادين أيضًا بعض المجاهيل.

وأما قول الحاكم (3/ 55 - 56):"صحيح على شرط مسلم" فهو ليس كما قال، فإن عبد الله بن عمر العبلي ليس من رجال مسلم، لعله وقع له وهم فظن أنه عبيد الله بن عمر بن حفص فقال ما قال. والصحيح أنه عبد الله بن عمر العبلي كما في المصادر الأخرى.

وأما ما رُوي عن ابن عباس قال: مرَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بقبور المدينة، فأقبل عليهم بوجهه فقال:"السلام عليكم يا أهل القبور! يغفر الله لنا ولكم، أنتم سلفنا ونحن بالأثر" فهو ضعيف.

رواه الترمذي (1053) عن أبي كريب، حدثنا محمد بن الصلت، عن أبي كدينة، عن قابوس ابن أبي ظبيان، عن أبيه، عن ابن عباس فذكره.

قال الترمذي:"حسن غريب، وأبو كدينة اسمه يحيى بن المهلب، وأبو ظبيان اسمه حصين بن
جندب" انتهى.

وقاموس أبو ظبيان تكلم فيه جمهور أهل العلم فقال الإمام أحمد:"ليس بذاك"، وقال النسائي:"ليس بالقوي ضعيف"، وقال ابن سعد:"فيه ضعف ولا يحتج به"، وقال ابن حبان:"كان رديء الحفظ ينفرد عن أبيه بما لا أصل له".

قلت: ولعل قوله:"فأقبل عليهم بوجهه" مما انفرد به، وليس له أصل، لأن من المستحب أن يتوجه إلى القبلة عند الدعاء.

وكذلك ما رُوي عن بشير بن الخصاصية قال: أتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم فلحقته بالبقيع، فسمعتُه يقول:"السلام على أهل الديار من المؤمنين" فانقطع شِسْعِي فقال لي:"أتَعِسَ قدمُك؟" قلت: يا رسول الله! طالت عُزوبتي، ونأيْتُ عن دار قومي، فقال:"يا بشير! ألا تحمدِ الله الذي أخذ بناصيتِك للإسلام من بين ربيعة، قوم يَرَون أن لولاهم لائُتَفَكَتِ الأرضُ بمن عليها" فهو منكر.

رواه الطبراني في"الأوسط" (2870) واللفظ منه، وفي"الكبير" (2/ 33) عن إبراهيم بن هاشم البغوي، وعبيد العجلي، قالا: حدثنا الصلت بن مسعود الجحدري، ثنا عقبة بن المغيرة الشيباني، قال: ثنا إسحاق بن أبي إسحاق الثياني، عن أبيه، عن بشير بن الخصاصية فذكره.

قال الطبراني في"الأوسط": لم يرو هذا الحديث عن أبي إسحاق إلا ابنه، تفرد به عقبة، ولا يُروى عن بشير إلا بهذا الإسناد.

قلت: عقبة بن المغيرة وشيخه إسحاق بن أبي إسحاق ترجمهما البخاري، وابن أبي حاتم ولم يقولا فيهما شيئًا، فهما في عداد المجهولين، ولذا لا يحتمل تفردهما، وفي بعض لفظ الحديث نكارة.

وأما قول الهيثمي في"المجمع" (3/ 60):"رواه الطبراني في"الكبير" و"الأوسط" ورجاله ثقات" فهو اعتمادًا على ذكر ابن حبان عقبة وإسحاق في"الثقات".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার কবরস্থানের দিকে বের হলেন। এরপর তিনি বললেন: “আসসালামু আলাইকুম (তোমাদের উপর শান্তি বর্ষিত হোক), হে মুমিন কওমের ঘর! আর আমরাও ইন শা আল্লাহ (যদি আল্লাহ চান) তোমাদের সাথে মিলিত হবো।”

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আযাদকৃত গোলাম আবু মুওয়াইহিবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের মাঝামাঝি সময়ে আমাকে ডাকলেন এবং বললেন: “হে আবু মুওয়াইহিবাহ! আমাকে বাকী’ (কবরবাসী)-দের জন্য ইসতিগফার করতে (ক্ষমাপ্রার্থনা করতে) নির্দেশ দেওয়া হয়েছে, সুতরাং আমার সাথে চলো।” আমি তাঁর সাথে চললাম। যখন তিনি তাদের (কবরবাসীদের) সামনে দাঁড়ালেন, তখন বললেন: “আসসালামু আলাইকুম, হে কবরবাসী! তোমরা যা নিয়ে সকাল করেছ, লোকেরা যা নিয়ে সকাল করেছে তার চেয়ে তোমাদের জন্য তা আনন্দের হোক। তোমরা যদি জানতে, আল্লাহ তোমাদের কী থেকে মুক্তি দিয়েছেন! ফিতনা অন্ধকার রাতের খণ্ডাংশের মতো আসছে, যার প্রথম অংশ শেষ অংশকে অনুসরণ করছে। শেষটি প্রথমটির চেয়েও নিকৃষ্ট হবে।” বর্ণনাকারী বলেন: এরপর তিনি আমার দিকে ফিরে বললেন: “হে আবু মুওয়াইহিবাহ! আমাকে দুনিয়ার ধন-ভাণ্ডারের চাবিকাঠি ও তাতে চিরকাল থাকার সুযোগ, তারপর জান্নাত দান করা হয়েছে; আর এর মাঝে ও আমার মহান প্রতিপালক আল্লাহর সাথে সাক্ষাৎ ও জান্নাতের মাঝে (যে কোনো একটি বেছে নেওয়ার) এখতিয়ার দেওয়া হয়েছে।” আমি বললাম: আমার বাবা-মা আপনার উপর কুরবান হোক, আপনি দুনিয়ার চাবিকাঠি ও তাতে চিরকাল থাকার সুযোগ গ্রহণ করুন, তারপর জান্নাত নিন। তিনি বললেন: “না, আল্লাহর কসম, হে আবু মুওয়াইহিবাহ! আমি আমার রবের সাথে সাক্ষাৎ ও জান্নাতকেই বেছে নিয়েছি।” এরপর তিনি বাকী’বাসীর জন্য ইসতিগফার করলেন। এরপর তিনি ফিরে এলেন, এবং সকালে যে অসুস্থতায় আল্লাহ তাঁকে উঠিয়ে নিলেন, সেই অসুস্থতা শুরু হয়ে গেল।

ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনার কবরগুলোর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তিনি তাদের দিকে মুখ করে বললেন: “আসসালামু আলাইকুম, হে কবরবাসীগণ! আল্লাহ আমাদের ও তোমাদের ক্ষমা করুন। তোমরা আমাদের অগ্রগামী এবং আমরা তোমাদের অনুগামী।”

বশির ইবনুল খাস্সাসিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলাম এবং তাকে বাকী’তে পেলাম। আমি তাকে বলতে শুনলাম: “মুমিনদের ঘরের অধিবাসীদের উপর শান্তি বর্ষিত হোক।” বর্ণনাকারী বলেন: আমার জুতার ফিতা ছিঁড়ে গেল। তিনি আমাকে বললেন: “তোমার পায়ে কি কষ্ট হয়েছে?” আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমার অবিবাহিত জীবন দীর্ঘ হয়েছে, আর আমি আমার কওমের বাড়ি থেকে দূরে রয়েছি। তখন তিনি বললেন: “হে বশির! তুমি কি সেই আল্লাহর প্রশংসা করবে না, যিনি রাবী’আ গোত্রের মধ্য থেকে তোমার কপালের চুল ধরে ইসলামে নিয়ে এসেছেন? তারা এমন এক জাতি যারা মনে করে যে, যদি তারা না থাকতো, তাহলে জমিন তার অধিবাসীদের নিয়ে উল্টে যেতো।”









আল-জামি` আল-কামিল (3790)


3790 - عن عائشة قالت: جاء النبي صلى الله عليه وسلم البقيع فقام فأطال القيام ثم رفع يديه ثلاث مرات.

صحيح: رواه مسلم في الجنائز (974: 103) عن هارون بن سعيد الأبلي، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرنا ابن جريج، عن عبد الله بن كثير بن المطلب، أنه سمع محمد بن قيس أنه قال: سمعت عائشة تقول: فذكر الحديث بطوله وهو مذكور في باب الأدعية لأصحاب القبور.

ولا يشترط عند السلام على أصحاب القبور، والدعاء لهم استقبال القبلة، بل يسلم عليهم ويدعو لهم متوجهًا إليهم حيث ما كان، لأن النبي صلى الله عليه وسلم لم يأمرنا بذلك، وقد ثبت أنه كان يُكثر زيارة البقيع، ولم ينقل إلينا أنه كان يستقبل القبلة عند السلام على أصحابها والدعاء لهم، كما لا يشترط عند السلام على النبي صلى الله عليه وسلم وصاحبيه والدعاء لهم استقبال القبلة باتفاق أهل العلم
وهذا الذي رجحه شيخ الإسلام ابن باز -رحمه الله تعالى- في فتاواه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বাকী' (কবরস্থানে) এলেন, অতঃপর দাঁড়িয়ে গেলেন এবং দীর্ঘ সময় দাঁড়িয়ে থাকলেন, এরপর তিনি তিনবার দু’হাত উপরে তুললেন। সহীহ: এটি ইমাম মুসলিম জানাইয অধ্যায়ে (৯৭৪: ১০৩) হারূন ইবনু সাঈদ আল-আবালী থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু ওয়াহব থেকে, তিনি ইবনু জুরাইজ থেকে, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু কাসীর ইবনু মুত্তালিব থেকে বর্ণনা করেছেন, যিনি মুহাম্মাদ ইবনু কায়সকে বলতে শুনেছেন, তিনি বলেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি—অতঃপর তিনি দীর্ঘ হাদীসটি উল্লেখ করেন। এটি কবরবাসীদের জন্য দু’আ অধ্যায়েও উল্লিখিত হয়েছে। কবরবাসীদেরকে সালাম দেওয়ার সময় এবং তাদের জন্য দু’আ করার সময় কিবলামুখী হওয়া শর্ত নয়। বরং সালাম দেওয়া হবে এবং তাদের দিকে মুখ করে দু’আ করা হবে, যেখানেই তারা থাকুক না কেন। কেননা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে এর (কিবলামুখী হওয়ার) নির্দেশ দেননি। আর এটা প্রমাণিত যে, তিনি প্রায়শই বাকী' (কবরস্থান) যিয়ারত করতেন, কিন্তু তিনি যে এর বাসিন্দাদেরকে সালাম ও দু’আ করার সময় কিবলামুখী হতেন, এমন কোনো বর্ণনা আমাদের কাছে পৌঁছেনি। যেমন, জ্ঞানীদের ঐকমত্য অনুসারে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর দুই সঙ্গীকে সালাম ও দু’আ করার সময় কিবলামুখী হওয়া শর্ত নয়। আর শাইখুল ইসলাম ইবনু বায (রহিমাহুল্লাহ) তাঁর ফাতাওয়াতে এই মতটিই প্রাধান্য দিয়েছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3791)


3791 - عن عامر بن سعد، عن أبيه أن أعرابيًا، أتى النبي صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! أين أبي؟ فقال:"في النار" قال: فأين أبوك؟ قال:"حيث ما مررت بقبر كافر فبشره بالنار".

وفي رواية: فأسلم الأعرابي وقال: لقد كلَّفني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم تعبًا ما مررتُ بقبر كافر إلا بشرته بالنار.

صحيح: رواه البزار"كشف الأستار" (93)، والطبرانيّ في"الكبير" (1/ 145)، وابن السني في"عمل اليوم والليلة" (595) كلهم من طرق عن إبراهيم بن سعد، عن الزهري، عن عامر بن سعد فذكره.

واللفظ للبزار، والزيادة من الرواية الثانية عند ابن السني، قال الهيثمي في"المجمع" (117 - 118): ورجاله رجال الصّحيح". وصحّحه الضّياء في"المختارة" (1005).




সা'দ ইবনু আবী ওয়াক্কাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বেদুঈন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছে এসে জিজ্ঞেস করল, “হে আল্লাহর রাসূল! আমার বাবা কোথায়?” তিনি বললেন, “জাহান্নামে।” লোকটি বলল, “তাহলে আপনার বাবা কোথায়?” তিনি বললেন, “যখনই তুমি কোনো কাফিরের কবরের পাশ দিয়ে যাও, তখন তাকে জাহান্নামের খবর দাও।”

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: অতঃপর বেদুঈনটি ইসলাম গ্রহণ করল এবং বলল, “আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে এমন এক কষ্টকর দায়িত্ব দিয়েছেন যে, আমি কোনো কাফিরের কবরের পাশ দিয়ে যাই না, তবে তাকে জাহান্নামের সুসংবাদ দিই।









আল-জামি` আল-কামিল (3792)


3792 - عن عبد الله بن عمر قال: جاء أعرابيٌّ إلى النّبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، إنّ أبي كان يصلُ الرَّحم، وكان وكان، فأين هو؟ قال:"في النار". قال: فكأنّه وجد من ذلك، فقال: يا رسول الله! ، فأين أبوك؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"حيثما مررتَ بقبر مشرك فبشِّرْه بالنّار"، قال: فأسلم الأعرابيُّ بعد، وقال: لقد كلّفني رسول الله صلى الله عليه وسلم تعبًا، ما مررتُ بقبر كافر إلّا بشّرتُه بالنّار".

صحيح: رواه ابن ماجه (1573) عن محمد بن إسماعيل بن البختريّ الواسطيّ، قال: حدّثنا يزيد بن هارون، عن إبراهيم بن سعد، عن الزّهريّ، عن سالم، عن أبيه، فذكره. وإسناده صحيح، وقد صحّحه أيضًا البوصيريّ في"الزوائد" وقال:"هذا إسناد صحيح، رجاله ثقات، محمد بن إسماعيل وثقه ابن حبان والدارقطني والذهبي، وباقي رجال الإسناد على شرط الشيخين".

فالذي يظهر كأنّ الزهريّ يروي هذا الحديث بإسنادين وعن صاحبين وكلاهما صحيح، ولا يحتاج إلى تخطئة أحدهما.

وفي معناه ما رُوي عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا مررتُم بقبورنا وقبوركم من أهل الجاهلية، فأخبروهم أنهم من أهل النار".

رواه ابن السني في"عمل اليوم والليلة" (594)، وابن حبان في صحيحه (847) كلاهما عن الحارث ابن سُريج، ثنا يحيى بن يمان، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة فذكر الحديث.

ويحيى بن يمان مختلف فيه غير أنه يحسن حديثه في الشواهد إذا لم يأت بشيء منكر. ولكن آفته الحارث بن سريج النّقّال ذكره الذهبيّ في"الميزان" (1/ 433)، ونقل تضعيفه عن عدد من أهل العلم، قال ابن عدي:"ضعيف يسرق الحديث".




আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন বেদুঈন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার পিতা আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখতেন এবং আরও অনেক ভালো কাজ করতেন। এখন তিনি কোথায় আছেন? তিনি (নবী) বললেন: জাহান্নামে। বর্ণনাকারী বলেন, এতে সে যেন কিছুটা কষ্ট পেল। অতঃপর সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! তাহলে আপনার পিতা কোথায় আছেন? আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি যখনই কোনো মুশরিকের কবরের পাশ দিয়ে অতিক্রম করবে, তাকে জাহান্নামের সুসংবাদ দেবে। বর্ণনাকারী বলেন, এরপরে বেদুঈনটি ইসলাম গ্রহণ করে নিল এবং বলল: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে কষ্টসাধ্য কাজে নিযুক্ত করেছেন। আমি কোনো কাফিরের কবরের পাশ দিয়ে গেলেই তাকে জাহান্নামের সুসংবাদ দিয়েছি।









আল-জামি` আল-কামিল (3793)


3793 - عن ابن عباس، عن معاذ بن جبل، قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنّك تأتي قومًا من أهل الكتاب، فادعُهم إلى شهادة أن لا إله إلّا الله وأنّي رسول الله. فإنْ هم أطاعوا لذلك فأعلمهم أنّ الله افترض عليهم خمس صلوات في كلّ يوم وليلة. فإن هم أطاعوا لذلك فأعلمْهم أنّ الله افترض عليهم صدقةً تؤخذ من أغنيائهم فتردُّ في فقرائهم. فإن هم أطاعوا لذلك، فإيّاكَ وكرائمَ أموالهم. واتّقِ دعوةَ المظلوم فإنّه ليس بينها وبين الله حجاب".

متفق عليه: رواه البخاريُّ في الزّكاة (1458)، ، ومسلم في الإيمان (19) كلاهما من طريق يحيى بن عبد الله بن صيفي، عن أبي معبد، عن ابن عباس، فذكر الحديث. واللّفظ لمسلم.

قوله:"كرائم أموالهم" الكرائم: جمع كريمة، وهي الجامعة للكمال الممكن في حقّها، من غزارة لبن، وجمال صورة، أو كثرة لحم أو صوف.




মু‘আয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে (ইয়ামেনের দিকে) প্রেরণ করেন। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তুমি আহলে কিতাবদের এক সম্প্রদায়ের কাছে যাচ্ছ। সুতরাং তুমি তাদের আহ্বান জানাবে যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং আমি আল্লাহর রাসূল—এই সাক্ষ্য প্রদানের দিকে। যদি তারা এটা মেনে নেয়, তবে তুমি তাদের জানিয়ে দেবে যে, আল্লাহ তাদের উপর প্রতি দিন ও রাতে পাঁচ ওয়াক্ত সালাত (নামাজ) ফরয করেছেন। যদি তারা তা মেনে নেয়, তবে তুমি তাদের জানিয়ে দেবে যে, আল্লাহ তাদের উপর সাদকা (যাকাত) ফরয করেছেন, যা তাদের ধনীদের থেকে নেওয়া হবে এবং তাদের দরিদ্রদের মধ্যে বণ্টন করা হবে। যদি তারা তা মেনে নেয়, তাহলে তুমি তাদের উত্তম সম্পদ গ্রহণ করা থেকে সতর্ক থাকবে। আর তুমি মাযলুমের (অত্যাচারিতের) অভিশাপকে ভয় করবে, কেননা তার (আহ্বান) ও আল্লাহর মাঝে কোনো পর্দা থাকে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3794)


3794 - عن أبي أيوب أنّ أعرابيًّا عرض لرسول الله صلى الله عليه وسلم وهو في سفر، فأخذ بخطام ناقته أو بزمامها، ثم قال: يا رسول الله! أو يا محمد! أخبرني بما يقرّبني من الجنّة وما يباعدني من النّار. قال: فكفَّ النّبيُّ صلى الله عليه وسلم، ثم نظر في أصحابه، ثم قال:"لقد وفِّقَ أو هُدي". قال:"كيف قلتَ؟". قال: فأعاد. فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"تعبد الله لا تشرك به شيئًا، وتقيم الصّلاة، وتؤتي الزّكاة، وتصل الرّحم. دعِ النّاقة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1396)، ومسلم في الإيمان (13) كلاهما من طريق عمرو بن عثمان، حدثنا موسى به نحة، قال: حدّثني أبو أيوب، فذكره.
واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه إلّا أنه قال في إسناده: عن ابن عثمان بن عبد الله بن موهب.




আবু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জনৈক গ্রাম্য বেদুঈন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সামনে এল, যখন তিনি সফরে ছিলেন। সে তাঁর উষ্ট্রীর লাগাম বা রশি ধরে ফেলল এবং বলল: ইয়া রাসূলুল্লাহ! অথবা ইয়া মুহাম্মাদ! আমাকে এমন কিছু বলে দিন যা আমাকে জান্নাতের নিকটবর্তী করবে এবং জাহান্নাম থেকে দূরে সরিয়ে দেবে। বর্ণনাকারী বলেন, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নীরব থাকলেন, এরপর তিনি সাহাবীদের দিকে তাকালেন এবং বললেন: "তাকে সফলতা দেওয়া হয়েছে" অথবা বললেন, "তাকে হেদায়েত দেওয়া হয়েছে।" তিনি (নবী) বললেন: "তুমি কী বলেছিলে?" লোকটি তা পুনরায় বলল। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি আল্লাহর ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কাউকে শরীক করবে না, সালাত কায়েম করবে, যাকাত আদায় করবে এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখবে। উষ্ট্রীটি ছেড়ে দাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (3795)


3795 - عن أبي هريرة، أنّ أعرابيًّا جاء إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! ، دلّني على عمل إذا عملتُه دخلتُ الجنّة. قال:"تعبد الله لا تشرك به شيئًا، وتقيم الصّلاة المكتوبة، وتؤدّي الزّكاة المفروضة، وتصوم رمضان". قال: والذي نفسي بيده! لا أزيد على هذا شيئًا أبدًا، ولا أنقص منه. فلمّا ولّى قال النّبيُّ صلى الله عليه وسلم:"من سرَّه أن ينظر إلى رجل من أهل الجنّة فلينظر إلى هذا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1397)، ومسلم في الإيمان (14) كلاهما من طريق عفّان بن مسلم، حدّثنا وُهيب، عن يحيى بن سعيد بن حيان، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث، واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বেদুঈন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে এমন একটি কাজের সন্ধান দিন, যা করলে আমি জান্নাতে প্রবেশ করতে পারব।" তিনি বললেন: "তুমি আল্লাহর ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করবে না, ফরয সালাত (নামায) কায়েম করবে, ফরয যাকাত আদায় করবে এবং রমযানের সওম (রোযা) পালন করবে।" লোকটি বলল: "যার হাতে আমার প্রাণ, তাঁর কসম! আমি এর উপর আর কখনো কিছু যোগও করব না, আর কমও করব না।" যখন সে চলে গেল, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি জান্নাতের অধিবাসীদের মধ্য থেকে একজন মানুষকে দেখতে চায়, সে যেন এই লোকটির দিকে তাকায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3796)


3796 - عن أبي هريرة قال: لما توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم واستخلف أبو بكر بعده وكفر من كفر من العرب قال عمر لأبي بكر: كيف تقاتل الناس وقد قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أمرت أن أقاتل الناس حتى يقولوا: لا إله إلا الله. فمن قال لا إله إلا الله عصم مني ماله ونفسه إلا بحقه وحسابه على الله". قال: والله! لأقاتلن من فرق بين الصلاة والزكاة فإن الزكاه حق المال، والله! تو متعوني عقالا كانوا يؤدونه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم لقاتلتهم على منعه.

فقال عمر: فوالله! ما هو إلا أن رأيت الله قد شرح صدر أبي بكر للقتال فعرفت أنه الحق.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الاعتصام بالكتاب والسنة (7284)، ومسلم في الإيمان (20: 32) كلاهما عن قتية بن سعيد، حدّثنا ليث، عن عقيل، عن الزّهريّ، أخبرني عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن أبي هريرة، فذكره.

قال البخاريّ عقبه: قَالَ ابْنُ بُكَيْرٍ وَعبد الله عن اللَّيْثِ"عَنَاقًا" وَهُوَ أَصَحُّ.

قلت: ابن بكير هو يحيى بن عبد الله بن بكير، ورواية عن اللّيث، في استتابة المرتدين (6924). وعبد الله هو أبو صالح المصريّ كاتب اللّيث.

وقول البخاريّ:"وهو أصحّ" يعني من رواية"عِقَالًا".

والعَناق: بفتح العين والنون جميعًا هي الأنثى من ولد المعز لم تبلغ سنة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইন্তেকাল করলেন, এবং তাঁর পরে আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খলীফা হলেন, আর আরবদের মধ্যে যারা কুফরী করার তারা কুফরী করল (যাকাত অস্বীকার করল), তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ বাকরের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছে বললেন: আপনি কীভাবে লোকেদের সাথে যুদ্ধ করবেন? অথচ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি আদিষ্ট হয়েছি যে, আমি যেন লোকেদের সাথে যুদ্ধ করি যতক্ষণ না তারা 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলে। সুতরাং যে ব্যক্তি 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলবে, সে তার সম্পদ ও জীবন আমার থেকে রক্ষা করবে, তবে ইসলামের (হকের) দাবি ব্যতীত। আর তার হিসাব আল্লাহর ওপর ন্যস্ত।"

আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমি অবশ্যই তাদের সাথে যুদ্ধ করব যারা সালাত ও যাকাতের মধ্যে পার্থক্য করে। কেননা যাকাত হলো সম্পদের হক। আল্লাহর কসম! তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যে উটের রশি (বাঁধার দড়ি) প্রদান করত, যদি তারা তা দিতেও অস্বীকার করে, তবে তা অস্বীকার করার কারণে আমি তাদের সাথে যুদ্ধ করব।

উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! (আবূ বাকরের এই কথা শোনার) পর আমার কাছে মনে হলো যে, আল্লাহ তা‘আলা আবূ বাকরের অন্তরকে যুদ্ধের জন্য উন্মুক্ত করে দিয়েছেন। ফলে আমি বুঝলাম, এটাই সত্য।









আল-জামি` আল-কামিল (3797)


3797 - عن أبي جمرة قال كنت أترجم بين يدي ابن عباس وبين الناس فأتته امرأة تسأله عن نبيذ الجر فقال: إن وفد عبد القيس أتوا رسول الله صلى الله عليه وسلم. فقال رسول الله
- صلى الله عليه وسلم:"من الوفد أو من القوم؟". قالوا: ربيعة، قال:"مرحبا بالقوم أو بالوفد غير خزايا ولا الندامى". قال: فقالوا: يا رسول الله! إنا نأتيك من شقة بعيدة، وإن بيننا وبين هذا الحي من كفار مضر وإنَّا لا نستطيع أن نأتيك إلا في شهر الحرام فمرنا بأمرٍ فصل نخبر به من وراءنا ندخل به الجنة. قال: فأمرهم بأربع ونهاهم عن أربع. قال: أمرهم بالإيمان بالله وحده، وقال:"هل تدرون ما الإيمان بالله؟". قالوا: الله ورسوله أعلم. قال:"شهادة أن لا إله إلا الله، وأن محمدا رسول الله، وإقام الصلاة، وإيتاء الزكاة، وصوم رمضان، وأن تؤدوا خمسًا من المغنم، ونهاهم عن الدباء، والحنتم والمزفَّت".

قال شعبة: وربما قال: النَّقير. قال شعبة: وما قال: المُقَيَّرِ. وقال:"احفظوه وأخبروا به من ورائكم".

وقال أبو بكر في روايته:"من وراءكم". وليس في روايته: المقيَّر.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1398)، وفي المغازي (4368)، ومسلم في الإيمان (17: 24) كلاهما من طريق أبي جمرة، به، فذكره. واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه.

وفي رواية عند البخاريّ: عن أبي جمرة، قلت لابن عباس رضي الله عنهما:"إنّ لي جرّة يتبذ لي نبيذ فأشربه حلوًا في جرٍّ، إن أكثرتُ منه فجالست القوم فأطلتُ الجلوس خشيتُ أن أفتضح؟ فقال: قدم وفد عبد القيس (فذكره).




আব্দুল্লাহ ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবূ জামরাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সামনে লোকদের এবং তাঁর মধ্যে দোভাষীর কাজ করতাম। একদিন এক মহিলা তাঁর কাছে এসে ‘নাবিজুল জার’ (মাটির পাত্রে তৈরি পানীয়) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন। তখন তিনি বললেন: নিশ্চয় ‘আব্দুল ক্বাইস গোত্রের প্রতিনিধিদল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এই প্রতিনিধিদল কারা, অথবা এই কওম কারা?” তারা বললেন: রাবী‘আহ গোত্র। তিনি বললেন: “এই কওমকে বা প্রতিনিধিদলকে সু-স্বাগতম, যারা লজ্জিতও নয়, অনুতপ্তও নয়।”

তিনি (আব্দুল কাইসের প্রতিনিধিদল) বললেন: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমরা অনেক দূর পথ অতিক্রম করে আপনার কাছে এসেছি। আর আমাদের ও কাফির মুদার গোত্রের এই লোকালয়ের মাঝে দূরত্ব বিদ্যমান। আমরা হারাম মাস (নিষিদ্ধ মাস) ছাড়া আপনার নিকট আসতে পারি না। অতএব, আপনি আমাদেরকে একটি সুস্পষ্ট কাজের আদেশ দিন, যা আমরা আমাদের পেছনের লোকদের জানাতে পারি এবং যার দ্বারা আমরা জান্নাতে প্রবেশ করতে পারি।

তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তখন তাদেরকে চারটি বিষয়ের আদেশ দিলেন এবং চারটি বিষয় থেকে নিষেধ করলেন। তিনি তাদেরকে এক আল্লাহর প্রতি ঈমান আনার আদেশ দিলেন। তিনি বললেন: “তোমরা কি জান, আল্লাহ্‌র প্রতি ঈমান কী?” তারা বললেন: আল্লাহ ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ই ভালো জানেন। তিনি বললেন: “এই সাক্ষ্য দেওয়া যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই এবং মুহাম্মাদ আল্লাহ্‌র রাসূল, সালাত ক্বায়েম করা, যাকাত দেওয়া, রমাযানের সওম পালন করা, আর তোমরা গনীমতের এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) আদায় করবে।”

আর তিনি তাদেরকে দূব্বা, হানতাম ও মুজাফ্‌ফাত (নামক পাত্র) ব্যবহার করতে নিষেধ করলেন। শু‘বাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আর কখনো বা তিনি ‘আন-নাকীর’ (নামক পাত্র) উল্লেখ করতেন। শু‘বাহ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: তবে তিনি ‘আল-মুকাইয়্যার’ (নামক পাত্র) উল্লেখ করেননি। আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা এটা মুখস্থ রাখবে এবং তোমাদের পেছনের লোকদেরকে তা জানিয়ে দেবে।”

আবূ বাকর তাঁর বর্ণনায় ‘মিন ওয়ারা-য়াকুম’ (তোমাদের পেছনের) শব্দটি উল্লেখ করেছেন। তাঁর বর্ণনায় ‘আল-মুকাইয়্যার’ শব্দটি নেই।

ইমাম বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর অপর একটি বর্ণনায় রয়েছে, আবূ জামরাহ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ইবনু ‘আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললাম: আমার একটি মাটির পাত্র আছে, তাতে আমি খেজুর ভিজিয়ে পানীয় তৈরি করি এবং তা মিষ্টি থাকতেই পান করি। যদি বেশি পান করে ফেলি এবং লোকজনের সাথে দীর্ঘক্ষণ বসে থাকি, তাহলে আমি লজ্জিত হওয়ার ভয় করি। তিনি বললেন: ‘আব্দুল ক্বাইস গোত্রের প্রতিনিধিদল এসেছিল (অতঃপর তিনি হাদীসটি বর্ণনা করলেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (3798)


3798 - عن أنس قال: كنا نتمنّى أن يأتي الأعرابيُّ العاقل فيسأل النّبيَّ صلى الله عليه وسلم ونحن عنده، فبينا نحن كذلك إذ أتاه أعرابيٌّ فجثا بين يدي النّبيّ صلى الله عليه وسلم فقال (فذكر الحديث) وجاء فيه: إنّ رسولك زعم لنا أنّك تزعم أن علينا في أموالنا الزّكاة؟ فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"صدق". فقال الأعرابيّ: والذي بعثك بالحقّ! لا أدع منهن شيئًا، ولا أجاوزهنّ، ثم وثب. فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"إنْ صدق الأعرابيُّ دخل الجنّة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في العلم (63)، ومسلم في الإيمان (12) كلاهما من طريق سليمان ابن المغيرة، عن ثابت، عن أنس، فذكره بطوله كما مضى في كتاب الإيمان.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা আকাঙ্ক্ষা করতাম যে, কোনো বুদ্ধিমান বেদুঈন এসে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে প্রশ্ন করুক যখন আমরা তাঁর কাছে উপস্থিত থাকতাম। আমরা এমন অবস্থায় ছিলাম যে, হঠাৎ একজন বেদুঈন তাঁর নিকট আসল এবং নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সামনে হাঁটু গেড়ে বসল। অতঃপর সে বলল (এরপর পুরো হাদীস উল্লেখ করা হয়)। এর মধ্যে (হাদীসে) এও আছে যে, বেদুঈন বলল: আপনার দূত আমাদের কাছে দাবি করেছে যে, আপনি নাকি মনে করেন আমাদের সম্পদে যাকাত ফরয? নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সে সত্য বলেছে।” তখন বেদুঈন বলল: যিনি আপনাকে সত্য সহকারে প্রেরণ করেছেন তাঁর শপথ! আমি এর (যাকাতের) কোনো অংশ ছাড়বও না, আবার এর থেকে বাড়াবও না। এরপর সে উঠে দাঁড়াল। তখন নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “যদি এই বেদুঈন সত্য বলে থাকে, তবে সে জান্নাতে প্রবেশ করবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (3799)


3799 - عن أبي سعيد الخدريّ، أنّ أعرابيًّا سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الهجرة، فقال:"ويحك إنّ شأنها شديد، فهل لك من إبل تؤدي صدقتها؟". قال: نعم. قال:"فاعمل من وراء البحار، فإنّ الله لن يترك من عملك شيئًا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1452)، ومسلم في الإمارة (1865) كلاهما من طريق
الوليد بن مسلم، حَدَّثَنَا الأوزاعيّ، حَدَّثَنِي ابن شهاب، عن عطاء بن يزيد، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره.

وقوله:"لن يترك" بكسر التاء معناه: لن ينقصك من ثواب أعمالك شيئًا.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক বেদুঈন (আ'রাবী) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে হিজরত সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার জন্য আফসোস! নিঃসন্দেহে এর (হিজরতের) বিষয়টি কঠিন। তোমার কি এমন কোনো উট আছে যার সাদকা (যাকাত) তুমি আদায় করো?" সে বলল: হ্যাঁ। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তুমি সমুদ্রের ওপারে (দূর-দূরান্তে) থেকেও আমল করতে থাকো। কেননা আল্লাহ তোমার কোনো আমলই ছেড়ে দেবেন না (অর্থাৎ তার প্রতিদান কমাবেন না)।"









আল-জামি` আল-কামিল (3800)


3800 - عن بَهْزَ بْنَ حَكِيمٍ يُحَدِّثُ عَنْ أَبِيهِ عَنْ جَدِّهِ قَالَ قُلْتُ" يَا نَبِىَّ اللَّهِ! مَا أَتَيْتُكَ حَتَّى حَلَفْتُ أَكْثَرَ مِنْ عَدَدِهِنَّ لأَصَابِعِ يَدَيْهِ أَنْ لا آتِيَكَ وَلا آتِىَ دِينَكَ، وَإِنِّى كُنْتُ امْرَأً لا أَعْقِلُ شَيْئًا إِلَاّ مَا عَلَّمَنِى اللَّهُ عز وجل وَرَسُولُهُ، وَإِنِّى أَسْأَلُكَ بِوَحْىِ اللَّهِ بِمَا بَعَثَكَ رَبُّكَ إِلَيْنَا؟ قَالَ"بِالإِسْلامِ" قُلْتُ وَمَا آيَاتُ الإِسْلامِ؟ قَالَ:"أَنْ تَقُولَ أَسْلَمْتُ وَجْهِىَ إِلَى اللَّهِ، وَتَخَلَّيْتُ وَتُقِيمَ الصَّلاةَ، وَتُؤْتِىَ الزَّكَاةَ".

حسن: رواه النسائي (2436) عن محمد بن عبد الأعلى، حَدَّثَنَا معتمر، قال: سمعت بهز بن حكيم، به، فذكره.

وإسناده حسن من أجل بهز بن حكيم فهو صدوق، ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (20037)، وابن ماجة (2536) مختصرًا.

وقوله:"تخليتُ". يعني من الترك.

وقوله:"أن لا أتيك" أي دينك كارهًا له.




মু'আবিয়া ইবনু হায়দা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, "হে আল্লাহর নবী! আমি আপনার কাছে আসিনি যতক্ষণ না আমি আমার হাতের আঙুলগুলোর সংখ্যার চেয়েও বেশিবার কসম করেছিলাম যে আমি আপনার কাছে আসব না এবং আপনার দ্বীনের কাছেও আসব না। আমি এমন একজন লোক ছিলাম যে কোনো কিছু বুঝতাম না, আল্লাহ্ তা'আলা ও তাঁর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে যা শিখিয়েছেন তা ব্যতীত। আর আমি আল্লাহর ওহীর মাধ্যমে আপনাকে জিজ্ঞাসা করছি, আপনার রব আপনাকে আমাদের কাছে কী দিয়ে পাঠিয়েছেন?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "ইসলামের মাধ্যমে।" আমি বললাম, ইসলামের নিদর্শন কী? তিনি বললেন, "তুমি বলবে, আমি আল্লাহর কাছে আমার মুখমণ্ডলকে সমর্পণ করলাম, (অন্যান্য ধর্ম) ত্যাগ করলাম, সালাত প্রতিষ্ঠা করলে এবং যাকাত আদায় করলে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3801)


3801 - عن أبي أمامة قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يخطب في حجّة الوداع [وهو على الجدعاء، واضع رجله في غرز الرّحْل يتطاول] فقال:"اتقوا الله ربَّكم، وصلُّوا خمسكم، وصوموا شهركم، وأدُّوا زكاة أموالكم، وأطيعوا ذا أمركم، تدخلوا جنّة ربَّكم".

صحيح: رواه الترمذيّ (616) عن موسى بن عبد الرحمن الكنديّ الكوفيّ، حَدَّثَنَا زيد بن الحباب، أخبرنا معاوية بن صالح، حَدَّثَنِي سليم بن عامر، قال: سمعت أبا أمامة، فذكره.

فقلت لأبي أمامة: منذ كم سمعتَ من رسول الله صلى الله عليه وسلم هذا الحديث؟ قال: سمعته وأنا ابن ثلاثين سنة.

وإسناده صحيح. قال الترمذيّ:"حسن صحيح"، وصحّحه أيضًا ابن حبَّان (4563)، والحاكم (1/ 9)، وهو في مسند الإمام أحمد (22161) كلّهم من طريق معاوية بن صالح، قال: أخبرني سليم بن عامر، فذكره.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم، ولا نعرف له علّة، ولم يخرجاه، وقد احتج البخاريّ ومسلم بأحاديث سليم بن عامر، وسائر رواته متفق عليهم".

وقول:"ذا أمركم"، وفي رواية:"وأطيعوا أمراءكم".




আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বিদায় হজ্জের সময় খুতবা দিতে শুনেছি— যখন তিনি জাদআ নামক (উটনী/পশুর) পিঠে আরোহণরত ছিলেন এবং জিনপোষের সওয়ারির ফিতেতে পা রেখে উঁচিয়ে অবস্থান করছিলেন— তখন তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের প্রতিপালক আল্লাহকে ভয় করো, তোমাদের পাঁচ ওয়াক্ত সালাত আদায় করো, তোমাদের (রমযান) মাসের সওম পালন করো, তোমাদের সম্পদের যাকাত প্রদান করো, আর তোমাদের দায়িত্বশীলের আনুগত্য করো, তাহলে তোমরা তোমাদের প্রতিপালকের জান্নাতে প্রবেশ করতে পারবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3802)


3802 - عن علقمة بن ناجية الخزاعي أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لهم عام المريسيع حين أسلموا:"إن من تمام إسلامكم أن تؤدوا زكاة أموالكم".
حسن: رواه الطبرانيّ في"الكبير" (8/ 18) والبزّار. -"كشف الأستار" (876) وابن أبي عاصم في"الآحاد والمثاني" (2334) من حديث يعقوب بن حميد، ثنا عيسى بن الحضرمي بن كلثوم بن علقمة بن ناجية بن الحارث الخزاعيّ، عن جده كلثوم، عن أبيه، فذكره.

إِلَّا أن البزّار لم يسم شيخه، فقال: حَدَّثَنَا بعض أصحابنا، عن عيسي بن الحضرمي بن كلثوم، عن علقمة بن ناجية الخزاعيّ، عن جده، عن أبيه علقمة فذكره، وقال:"لا نعلم روي علقمة إِلَّا هذا".

وقال ابن عبد البر في"الاستيعاب" (1863):"علقمة بن ناجية له حديث واحد مخرجه عن ولده".

وإسناده حسن من أجل الكلام في يعقوب بن حميد بن كاسب المدنيّ، قال البخاريّ:"لم يزل خيرًا، هو في الأصل صدوق". وتكلم فيه غيره. غير أنه حسن الحديث إذا لم يأت في حديثه ما يُغرب لأنه كان كثير الحديث، كثير الغرائب كما قال ابن عدي.

وفي الباب ما رُوي عن أبي الدّرداء أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أخلصوا عبادة ربّكم، وصلوا خمسكم، وأدّوا زكاة أموالكم، وصوموا شهركم، وحجّوا بيت ربِّكم، تدخلوا جنّة ربّكم)). فهو ضعيف.

رواه الطَّبرانيّ في"مسند الشَّامين" (659) عن أحمد بن مسعود المقدسيّ، ثنا عمرو بن أبي سلمة، ثنا صدقة بن عبد الله، عن الوضين بن عطاء، عن يزيد بن مرند، عن أبي الدّرداء، أنَّ رجلًا أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! ما عصمة هذا الأمر وعراه ووثاقه؟ قال: فعقد بيمينه فقال: (فذكره).

وعنه رواه أبو نعيم في"الحلية" (5/ 166) وقال:"غريب من حديث يزيد، تفرّد به عنه الوضين".

قلت: وإسناده ضعيف من أجل صدقة بن عبد الله وهو أبو معاوية الدّمشقيّ ضعَّفه النّسائيّ وغيره. وفي"التقريب":"ضعيف".

وأمّا الوضين الذي تفرّد به فهو الوضين بن عطاء بن كنانة الخزاعيّ الدّمشقيّ مختلف فيه فوثقه أحمد وابن معين، وضعّفه ابن سعد والجوزجاني. وقال ابن عدي:"ما أرى بأحاديثه بأسًا".

وأمّا ما رُوي عن فاطمة بنت قيس قالت: سألت أو سئل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم عن الزكاة فقال:"إنَّ في المال لحقًّا سوى الزّكاة". ثمّ تلا هذه الآية التي في البقرة: {لَيْسَ الْبِرَّ أَنْ تُوَلُّوا وُجُوهَكُمْ} الآية [سورة البقرة: 177] فهو ضعيف.

رواه الترمذيّ (659، 660) من وجهين عن شريك، عن أبي حمزة، عن عامر الشّعبيّ، عن فاطمة بنت قيس، فذكرته.

قال الترمذيّ:"هذا حديث إسناده ليس بذاك، وأبو حمزة ميمون الأعور يُضعّف. وروي بيان وإسماعيل بن سالم، عن الشّعبي هذا الحديث قوله. وهذا أصح" انتهى.

وفي الإسناد أيضًا شريك وهو عبد الله النخعي سيء الحفظ. وقال النوويّ في"الخلاصة" (3837):"هذا حديث منكر".
وحديث بيان الذي أشار إليه الترمذيّ -رواه ابن أبي شيبة في المصنف (3/ 191) عن ابن فضيل، عن بيان، عن عامر، قال:"في المال حقّ سوى الزّكاة".

وقد انقلب هذا الحديث على بعض الرّواة، فرووه بلفظ:"ليس في المال حقّ سوى الزّكاة". هكذا رواه ابن ماجه (1789) من طريق يحيي بن آدم، عن شريك، بإسناده.

قال البيهقيّ (4/ 84) بعد أن ذكر اللّفظ الأوّل من الحديث:"هذا حديث يعرف بأبي حمزة ميمون الأعور كوفيّ، وقد جرّحه أحمد بن حنبل ويحيى بن معين فمن بعدهما من حفَّاظ الحديث، والذي يرويه أصحابنا في التعاليق:"ليس في المال حق سوى الزّكاة" فلست أحفظ فيه إسنادًا" انتهى.




আলকামা ইবন নাজিয়া আল-খুযা'ঈ থেকে বর্ণিত, যখন তারা ইসলাম গ্রহণ করলো, তখন আল-মুরাইসী' যুদ্ধের বছর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের বলেছিলেন: "নিশ্চয় তোমাদের ইসলামের পূর্ণতার অংশ হলো তোমরা তোমাদের সম্পদের যাকাত আদায় করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3803)


3803 - عن جرير بن عبد الله قال:"بايعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم على إقام الصّلاة، وإيتاء الزّكاة، والنُّصح لكلِّ مسلم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1401)، ومسلم في الإيمان (56) من طرق، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس، عن جرير، فذكره.




জারীর ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সালাত প্রতিষ্ঠা করা, যাকাত প্রদান করা এবং প্রত্যেক মুসলিমের কল্যাণ কামনা করার (নসিহত করার) উপর বাইয়াত গ্রহণ করেছি।"









আল-জামি` আল-কামিল (3804)


3804 - عن عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ، قَالَ: بَعَثَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم عُمَرَ عَلَى الصَّدَقَةِ، فَقِيلَ: مَنَعَ ابْنُ جَمِيلٍ، وَخَالِدُ بْنُ الْوَلِيدِ، وَالْعَبَّاسُ عَمُّ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم"مَا يَنْقِمُ ابْنُ جَمِيلٍ إِلَّا أَنَّهُ كَانَ فَقِيرًا فَأَغْنَاهُ اللهُ، وَأَمَّا خَالِدٌ فَإِنَّكُمْ تَظْلِمُونَ خَالِدًا قَدِ احْتَبَسَ أَدْرَاعَهُ وَأَعْتَادَهُ فِي سَبِيلِ اللهِ، وَأَمَّا الْعَبَّاسُ فَهِيَ عَلَيَّ وَمِثْلُهَا مَعَهَا" ثُمَّ قَالَ:"يَا عُمَرُ، أَمَا شَعَرْتَ أَنَّ عَمَّ الرَّجُلِ صِنْوُ أَبِيهِ؟".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1468)، ومسلم في الزّكاة (983) كلاهما من طريق أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاري نحوه.

قوله:"احتبس" أي حبس.

وقوله:"أعتاده" جمع عتد، وعند البخاريّ:"أعتده" وهو جمع أيضًا، والمراد: ما يُعدّ من الدّواب والسّلاح، وقيل: الخيل خاصة، ويقال: فرس عنيد أي صلب، أو معدٌّ للركوب، أو سريع الوثوب.

وقوله:"وأمّا العباس فهي عليّ"، معناه: أني سلفت منه زكاة عامين، وعلى المعنى تدل عليه الأحاديث الأخرى وإن كان أكثرها لا تصح، ولكن مجموعها يدل عليه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যাকাত (সাদাকা) সংগ্রহের জন্য পাঠালেন। তখন বলা হলো: ইবনু জামীল, খালিদ ইবনুল ওয়ালীদ এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চাচা আব্বাস যাকাত দিতে অস্বীকার করেছেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইবনু জামীল কেবল এই কারণে ক্ষুব্ধ যে সে গরিব ছিল, আর আল্লাহ তাকে সচ্ছল করে দিয়েছেন। আর খালিদের ব্যাপার হলো, তোমরা খালিদের প্রতি জুলুম করছ। সে তার বর্মসমূহ ও যুদ্ধের সরঞ্জামাদি আল্লাহর রাস্তায় ওয়াকফ করে রেখেছে। আর আব্বাসের ব্যাপারে, তা (যাকাত) আমার ওপর (দায়িত্ব), এবং এর সাথে আরও এক বছরের যাকাতও (দায়িত্ব)।" অতঃপর তিনি বললেন: "হে উমার! তুমি কি জানো না যে মানুষের চাচা তার পিতার প্রতিরূপ (সহোদর ভাইতুল্য)?"









আল-জামি` আল-কামিল (3805)


3805 - عن عليّ بن أبي طالب، أنَّ العبَّاس سأل النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في تعجيل صدقته قبل أن
تحلّ، فرخَّصَ له في ذلك. قال مرّة: فأذَّن له في ذلك.

حسن: رواه أبو داود (1624)، والتِّرمذيّ (678)، وابن ماجه (1795) كلّهم من طريق سعيد ابن منصور، حَدَّثَنَا إسماعيل بن زكريا، عن حجَّاج بن دينار، عن الحكم، عن حُجية بن عديّ، عن عليّ، فذكره. ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (822) وصحّحه ابن خزيمة (2331)، والحاكم (3/ 332).

وقال الترمذيّ: حسن. وقال أيضًا: وقد روي هذا الحديث عن الحكم بن عتيبة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا" انتهى.

وقال أبو داود عقب رواية الحديث:"روي هذا الحديث هُشيم، عن منصور بن زاذان، عن الحكم، عن الحسن بن مسلم، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وحديث هُشيم أصح".

وهو الذي رجّحه أيضًا الدَّارقطنيّ والبيهقي وغيرهما؛ لأنه اختلف على الحكم بن عتبة، فرواه عنه الحجاج بن دينار بإسناده، وحجاج بن دينار ضعَّفه الدارقطنيّ، ومشّاه الآخرون، وحجة بن عدي صدوق يخطئ من رجال السنن.

ونظرًا لكون هذه القصة رويت من أوجه كثيرة، ومخارج مختلفة فالغالب على الظّن أن حجية بن عدي لم يخطئ في بيانها، وقد أيدته ما رواه الشّيخان كما سبق؛ لأنَّ قول النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في حديث أبي هريرة:"أمّا العباس فهي عليَّ". وقد قيل معناه: هي عندي قرض؛ لأنّي استسلفت منه صدقة عامين.

قال الحافظ ابن حجر بعد أن تكلّم على الروايات الواردة في تعجيل صدقته:"وليس ثبوت هذه القصة في تعجيل صدقة العباس بيعيد في النظر بمجموع هذه الطرق"."الفتح" (3/ 334).

قلت: وله تفسير آخر كما في المرجع المذكور.

وأمّا من رجّح المرسل فلا يضر من رجّح الموصول لما فيه زيادة علم؛ ولذا حسّنه الترمذيّ والبغوي وغيرهما.

وبه أخذ جمهور أهل العلم في جواز تعجيل الزّكاة قبل تمام الحول، منهم: الزّهريّ، والأوزاعيّ، والشّافعيّ، وأحمد، وإسحاق، وأصحاب الرّأي. وقال مالك: لا يجوز تعجيله ويعيد لو عجّل. انظر"شرح السنة" (6/ 32).




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তার যাকাত (সাদাকাহ) ওয়াজিব হওয়ার পূর্বেই অগ্রিম প্রদান করার বিষয়ে জিজ্ঞেস করেছিলেন। তখন তিনি তাকে সেই অনুমতি দেন। (বর্ণনাকারী) একবার বললেন: অতঃপর তিনি তাকে সেই বিষয়ে অনুমতি দেন।

[হাদীসের মান: হাসান]

এটি বর্ণনা করেছেন আবূ দাউদ (১৬২৪), তিরমিযী (৬৭৮), এবং ইবনু মাজাহ (১৭৯৫)। তাঁরা সকলেই সাঈদ ইবনু মানসূরের সূত্রে, তিনি ইসমাঈল ইবনু যাকারিয়া থেকে, তিনি হাজ্জাজ ইবনু দীনার থেকে, তিনি আল-হাকাম থেকে, তিনি হুজ্জিয়াহ ইবনু আদী থেকে, তিনি আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে (হাদীসটি) উল্লেখ করেছেন। এই সূত্রেই ইমাম আহমাদ (৮২২) এটি বর্ণনা করেছেন। ইবনু খুযাইমাহ (২৩৩১) এবং হাকিমও (৩/৩৩২) এটিকে সহীহ বলেছেন।

তিরমিযী বলেছেন: হাদীসটি হাসান। তিনি আরও বলেছেন: এই হাদীসটি আল-হাকাম ইবনু উতাইবা থেকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত মুরসাল (অনুপস্থিত সাহাবী দ্বারা বর্ণিত) হিসেবেও বর্ণিত হয়েছে।

আবূ দাউদ এই হাদীসটি বর্ণনা করার পর বলেন: এই হাদীসটি হুশাইম বর্ণনা করেছেন মানসূর ইবনু যাদান থেকে, তিনি আল-হাকাম থেকে, তিনি আল-হাসান ইবনু মুসলিম থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে। আর হুশাইমের হাদীসটি অধিক বিশুদ্ধ।

দারাকুতনী, বাইহাকী এবং অন্যরা এই মুরসাল বর্ণনাকেই অধিক প্রাধান্য দিয়েছেন। এর কারণ হলো: আল-হাকাম ইবনু উতাইবার সূত্রে মতভেদ রয়েছে। হাজ্জাজ ইবনু দীনার তার সূত্রসহ এটি বর্ণনা করেছেন, কিন্তু হাজ্জাজ ইবনু দীনারকে দারাকুতনী দুর্বল বলেছেন এবং অন্যরা তাকে গ্রহণযোগ্য বলে মনে করেন। হুজ্জিয়াহ ইবনু আদী ‘সাদুক’ (সত্যবাদী) তবে তিনি ভুল করেন এবং তিনি সুনান গ্রন্থসমূহের রাবী।

এই ঘটনাটি বহু সূত্র ও বিভিন্ন উৎস থেকে বর্ণিত হওয়ায় প্রবল ধারণা এই যে, হুজ্জিয়াহ ইবনু আদী তা বর্ণনায় ভুল করেননি। শাইখান (বুখারী ও মুসলিম) কর্তৃক পূর্বে বর্ণিত হাদীসও এর সমর্থন করে। কেননা আবূ হুরাইরার হাদীসে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উক্তি: "আব্বাসের বিষয়টি আমার দায়িত্বে।" এর অর্থ হলো: এটি আমার কাছে ঋণ স্বরূপ রয়েছে; কারণ আমি তাঁর থেকে দুই বছরের যাকাত অগ্রিম নিয়েছি।

হাফিয ইবনু হাজার (রাহিমাহুল্লাহ) আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যাকাত অগ্রিম প্রদানের বিষয়ে বর্ণিত রিওয়ায়াতগুলো নিয়ে আলোচনা করার পর বলেন: "এই সকল পথের সমষ্টির মাধ্যমে আব্বাসের যাকাত অগ্রিম প্রদানের এই ঘটনাটির নির্ভরযোগ্যতা সুদূরপরাহত নয়।" (ফাতহুল বারী ৩/৩৩৪)।

আমি (আলবানী/গ্রন্থকার) বলি: উল্লেখিত রেফারেন্সে এর আরেকটি ব্যাখ্যাও আছে।

যারা মুরসাল বর্ণনাকে অগ্রাধিকার দিয়েছেন, তারা সে কারণে মাওসুল (সংযুক্ত/সম্পূর্ণ সনদযুক্ত) বর্ণনাকে দুর্বল মনে করেন না, কারণ এতে অতিরিক্ত জ্ঞান রয়েছে। এই কারণেই তিরমিযী ও বাগাওয়ী প্রমুখ এটি হাসান বলেছেন।

এই হাদীসের ভিত্তিতেই জমহূর (অধিকাংশ) উলামায়ে কিরাম পূর্ণ এক বছর হওয়ার আগেই যাকাত অগ্রিম প্রদান করা বৈধ বলে মত দিয়েছেন। তাঁদের মধ্যে রয়েছেন: যুহরী, আওযাঈ, শাফিঈ, আহমাদ, ইসহাক এবং আসহাবুর-রায় (হানাফীগণ)। তবে ইমাম মালিক বলেছেন: যাকাত অগ্রিম দেওয়া বৈধ নয় এবং কেউ অগ্রিম দিলে তাকে পুনরায় দিতে হবে। (শারহুস সুন্নাহ ৬/৩২ দ্রষ্টব্য)।









আল-জামি` আল-কামিল (3806)


3806 - عن عقبة بن الحارث، قال: صلَّى بنا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم العصرَ فأسرعَ، ثمّ دخل البيتَ فلم يلبث أن خرج، فقلت -أو قيل- له. فقال:"كنتُ خلَّفتُ في البيت تبرًا من الصَّدقة فكرهتُ أن أبيِّته، فقسمته".

صحيح: رواه البخاريّ في الزكاة (1430) حَدَّثَنَا أبو عاصم، عن عمر بن سعيد، عن ابن أبي
مُلكة، أنّ عقبة بن الحارث حدَّثه، فذكر الحديث.




উকবাহ ইবনুল হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে আসরের সালাত দ্রুত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি ঘরে প্রবেশ করলেন এবং দেরি না করে বেরিয়ে আসলেন। আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম – অথবা (রাবী বলেন,) তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো। তখন তিনি বললেন, "আমি ঘরে সাদকার (যাকাতের) কিছু স্বর্ণপিণ্ড রেখে এসেছিলাম, তাই আমি তা রাত্রি যাপন করা অপছন্দ করলাম, ফলে আমি তা বণ্টন করে দিলাম।"









আল-জামি` আল-কামিল (3807)


3807 - عن أبي هريرة، أنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"ما يسرُّني أنَّ لي أُحدًا ذهبًا يأتي عليَّ ثالثةٌ وعندي منه دينار إِلَّا دينار أرصده لديْن عليَّ".

متفق عليه: رواه مسلم في الزّكاة (991) من طرق عن محمد بن زياد، قال: سمعت أبا هريرة، فذكر الحديث. ورواه البخاريّ في الاستقراض (23889) من وجه آخر عن أبي هريرة نحوه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘আমার কাছে এই বিষয়টি আনন্দের নয় যে, আমার কাছে উহুদ পাহাড় পরিমাণ সোনা আছে, আর তৃতীয় দিন চলে আসে অথচ আমার কাছে তার থেকে এক দীনার অবশিষ্ট আছে, তবে শুধু ঐ এক দীনার ব্যতীত যা আমি আমার উপর থাকা ঋণ পরিশোধের জন্য জমা রেখেছি।’