হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3821)


3821 - عن وعن ثوبان، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من ترك بعده كنزًا مُثِّل له يوم القيامة شجاعًا أقرع، له زبيبتان يتبع فاه، فيقول: ويلك مالك؟ فيقول: أنا كنزك الذي تركته بعدك، فلا يزال يتبعه حتّى يلقمه بده، فيقضمها، ثمّ يتبعه سائر جسده".

صحيح: رواه الطبرانيّ في"الكبير" (1408)، والبزّار -"كشف الأستار" (882) -، وصحّحه

ابن خزيمة (2255)، والحاكم (1/ 388) كلّهم من طرق عن يزيد بن زريع، ثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن سالم بن أبي الجعد الغطفانيّ، عن معدان بن أبي طلحة اليعمريّ، عن ثوبان، فذكره.

قال البزّار:"قد روي نحوه بلفظه من غير هذا الوجه، ولا نعلم له طريقًا إِلَّا هذا الطريق إسناده حسن".

وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
والصّواب ما قاله الحاكم؛ فإنّ معدان بن أبي طلحة من رجال مسلم وحده.

ورجاله ثقات، وذكره الهيثميّ في"المجمع" (3/ 64)، وعزاه إلى البزّار، ونقل قوله، وقال:"رجاله ثقات، ورواه الطّبرانيّ في"الكبير".




ছাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি তার পরে ধনভান্ডার রেখে যায়, কিয়ামতের দিন তা তার জন্য একটি টাকমাথা ভয়ংকর সাপের রূপ ধারণ করবে, যার দুটি কালো ফোঁটা থাকবে এবং তা তার মুখের দিকে অনুসরণ করবে। সে (সাপটি) বলবে: তোমার সর্বনাশ হোক! তুমি কী চাও? সে (সাপটি) বলবে: আমিই তোমার সেই ধনভান্ডার, যা তুমি তোমার পরে রেখে এসেছিলে। এরপর তা তাকে অনুসরণ করতে থাকবে যতক্ষণ না সে (বাধ্য হয়ে) তার হাত সেটির মুখের মধ্যে ঢুকিয়ে দেয়। তখন সেটি তার হাত কামড়ে ধরবে, অতঃপর তার বাকি শরীরকেও তা গ্রাস করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3822)


3822 - عن عبد الله بن الزُّبير، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما من صاحب إبل لا يؤدِّي حقّها في رسلها ونجدتها إِلَّا جيء يوم القيامة حتّى يبطح لها بقاع قرقر يطؤه بأخفافها. كلما نفدت أخراها، أعيدت عليه أولاها حتى يقضى بين النَّاس، ويرى سبيله".

حسن: رواه البزّار (2199) -كشف الأستار (879) - عن مرزوق بن بكير وعمر بن الخطّاب، قالا: ثنا موسي بن مسعود، ثنا محمد بن مسلم، عن عمرو بن دينار، عن ابن الزُّبير، فذكره.

قال البزّار:"لا نعلمه يروي من حديث ابن الزُّبير إِلَّا بهذا الإسناد".

وعزاه الهيثميّ إلى البزّار وقال:"رجاله ثقات""المجمع" (3/ 64).




আব্দুল্লাহ ইবনুয-যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "উটসমূহের এমন কোনো মালিক নেই, যে এর (উটসমূহের) দুধ ও সাহায্যে এর প্রাপ্য হক আদায় করে না, কিন্তু কিয়ামতের দিন তাকে আনা হবে। এরপর তাকে মসৃণ সমতল ভূমিতে উপুড় করে শুইয়ে দেওয়া হবে, আর উটগুলো তাদের খুর দ্বারা তাকে পিষ্ট করতে থাকবে। যখন উটগুলোর শেষ দল অতিক্রম করে যাবে, তখন আবার প্রথম দলকে তার কাছে ফিরিয়ে আনা হবে। মানুষের বিচার কাজ শেষ না হওয়া পর্যন্ত তার সাথে এভাবে চলতে থাকবে এবং পরিশেষে সে তার গন্তব্য দেখতে পাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3823)


3823 - عن بريدة بن الحصيب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما منع قوم الزّكاة إِلَّا ابتلاهم الله بالسِّنين".

حسن: رواه الطبرانيّ في"الأوسط" -"مجمع البحرين" (1343) - عن عبدان بن أحمد، ثنا العباس بن الوليد الخلَّال الدِّمشقيّ، ثنا مروان بن محمد الطَّاطريّ، ثنا سليمان بن موسى أبو داود الكوفيّ، عن فضيل بن مرزوق، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه، فذكره.

وفيه فضيل بن مرزوق الأغرّ مختلف فيه، فضعّفه النسائيّ ومشّاه الآخرون غير أنّه حسن الحديث، وقد توبع أيضًا.

رواه الحاكم (2/ 126) من وجه آخر عن بشير بن مهاجر، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه مرفوعًا، ولفظه:"ما نقض قومٌ العهد قطّ إِلَّا كان القتلى بينهم، ولا ظهرت الفاحشة في قوم قطّ إِلَّا سلّط الله عليهم الموت، ولا منع قوم الزّكاة إِلَّا حبس الله عنهم القطر".

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

وبشير بن مهاجر مختلف فيه، فقال الإمام أحمد:"منكر الحديث، ومشّاه الآخرون، وهو لا بأس به في المتابعات".




বুরাইদাহ ইবনুল হুসাইব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখনই কোনো জাতি যাকাত দেওয়া থেকে বিরত থাকে, আল্লাহ অবশ্যই তাদের উপর (কষ্টের) বছরসমূহ চাপিয়ে দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (3824)


3824 - عن بَهْزُ بْنُ حَكِيمٍ، قَالَ: حَدَّثَنِي أَبِي، عَنْ جَدِّي، قَالَ: سمعت النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يَقُول:"فِى كُلِّ إِبِلٍ سَائِمَةٍ فِى كُلِّ أَرْبَعِينَ بِنْتُ لَبُونٍ، وَلا يُفَرَّقُ إِبِلٌ عَنْ حِسَابِهَا مَنْ أَعْطَاهَا مُؤْتَجِرًا فَلَهُ أَجْرُهَا وَمَنْ أَبَى فَإِنَّا آخِذُوهَا وَشَطْرَ مَالِهِ عَزْمَةٌ مِنْ عَزَمَاتِ رَبِّنَا، لَا يَحِلُّ لآلِ مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم مِنْهَا شَيْءٌ".
حسن: رواه أبو داود (1575)، والنسائي (3446) كلاهما من وجهين، عن بهز بن حكيم، عن أبيه، عن جده، فذكره.

وصحّحه ابن خزيمة (2266)، والحاكم (1/ 397 - 398)، وقال: هذا حديث صحيح الإسناد على ما قدّمنا ذكره في تصحيح هذه الصحيفة ولم يخرجاه".

قلت: وإسناده حسن من أجل بهز وأبيه، وهما حسنا الحديث، وجدّه معاوية بن حيدة القشيريّ، وله صحبة.

وقوله:"في كلّ أربعين ابنة لبون" أي ما زاد على مائة وعشرين، كما جاء مفسّرًا في كتاب أبي بكر.

وقوله:"مؤتجرا" أي طالبًا أجره عند الله.

وقد تكلّم ابنُ حبَّان في"المجروحين" (144) من أجل هذا الحديث كلامًا شديدًا في بهز بن حكيم، فقال:"تركهـ جماعة من أئمّتنا، ولولا حديث:"إنَّا آخذوه وشطر إبله عزمة من عزمات ربّنا" أدخلناه في الثّقات، وهو ممن أستخير الله عز وجل فيه".

قلت: لم أعرف من هؤلاء الأئمّة الذين تركوا بهز بن حكيم، وقد نقل ابن حبَّان نفسه عن الإمام أحمد وإسحاق بن إبراهيم أنّهما يحتجان به، وقد سئل يحيى بن معين عن بهز بن حكيم عن أبيه عن جده؟ فقال:"إسناد صحيح إذا كان دون بهز ثقة". ووثَّقه أيضًا عليّ بن المديني، وقال ابن عدي:"قد روى عنه ثقات الناس، وروى عنه الزهري، وجماعة من الثّقات، وأرجو أنه لا بأس به، ولم أرَ له حديثًا منكرًا، وإذا حدَّث عنه ثقة فلا بأس به". إذا من هؤلاء الأئمة الذين تركوا بهزًا؟ ! . نعم لقد قال أبو حاتم:"هو شيخ يكتب حديثه ولا يحتج به".

إذًا اختلف أهل العلم في الاحتجاج بحديثه لا أنهم تركوه، وقد قال الحافظ الذّهبي ردًّا على ابن حبَّان في قوله:"تركهـ جماعة":"ما علمتُ أحدًا تركه أبدًا، بل قد يتركون الاحتجاج بخبره، وأمّا حديث الباب فهو مما انفرد به بهز بن حكيم أصلًا ورأسًا، وقد قال به بعض المجتهدين" انتهى كلام الذهبي. انظر ترجمته في"تاريخ الإسلام" ودافع عنه أيضًا في"الميزان" (1/ 354) فراجعه.

وأمّا عقوبة مانع الزكاة في الدُّنيا من أخذ شطر ماله، فقال به أحمد، وهو قول قديم للشافعي، ثمّ ذهب الشافعي وأتباعه إلى نسخ حديث بهز، أو تضعيفه من أجل نقل البيهقي عن الشافعي أنه قال:"هذا الحديث لا يثبته أهل العلم بالحديث، ولو ثبت لقلنا به".

قال النووي:"هذا تصريح من الشافعي بأنَّ أهل الحديث ضعَّفوا هذا الحديث". انظر"المجموع" (5/ 332، 337).

وقال في"الخلاصة" (2/ 1079):"إسناده إلى بهز صحيح، واختلفوا في الاحتجاج ببهز، ونقل الشافعي أنّ هذا الحديث ضعيف عند أهل الحديث، وادّعى أصحابنا أنّه منسوخ" انتهى.




মু'আবিয়াহ ইবনে হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "প্রতিটি বিচরণশীল উটের ক্ষেত্রে, প্রতি চল্লিশটি উটে একটি 'বিনত লাবুন' (দুই বছর পূর্ণ হওয়া মাদী উট) দিতে হবে। আর যাকাতের হিসাব (কমিয়ে দেখানোর জন্য) উটকে বিভক্ত করা যাবে না। যে ব্যক্তি সওয়াবের আশায় তা (যাকাত) প্রদান করবে, সে তার প্রতিদান পাবে। আর যে অস্বীকার করবে, আমরা তা (যাকাত) গ্রহণ করব এবং তার সম্পদের অর্ধেকও (শাস্তিস্বরূপ গ্রহণ করা হবে)। এটা আমাদের রবের পক্ষ থেকে কঠোর সিদ্ধান্তসমূহের মধ্যে অন্যতম। মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের জন্য এর কোনো অংশই হালাল নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3825)


3825 - عن عَنِ الأَحْنَفِ بْنِ قَيْسٍ حَدَّثَهُمْ قَالَ: جَلَسْتُ إِلَى مَلَإٍ مِنْ قُرَيْشٍ فَجَاءَ رَجُلٌ خَشِنُ الشَّعَرِ وَالثِّيَابِ وَالهَيْئَةِ حَتَّى قَامَ عَلَيْهِمْ، فَسَلَّمَ، ثُمَّ قَالَ: بَشِّرِ الكَانِزِينَ بِرَضْفٍ يُحْمَى عَلَيْهِ فِي نَارِ جَهَنَّمَ، ثُمَّ يُوضَعُ عَلَى حَلَمَةِ ثَدْيِ أَحَدِهِمْ حَتَّى يَخْرُجَ مِنْ نُغْضِ كَتِفِهِ وَيُوضَعُ عَلَى نُغْضِ كَتِفِهِ حَتَّى يَخْرُجَ مِنْ حَلَمَةِ ثَدْيِهِ يَتَزَلْزَلُ. ثُمَّ وَلَّى فَجَلَسَ إِلَى سَارِيَةٍ وَتَبِعْتُهُ وَجَلَسْتُ إِلَيْهِ وَأَنَا لا أَدْرِي مَنْ هُوَ. فَقُلْتُ لَهُ: لا أُرَى القَوْمَ إِلَّا قَدْ كَرِهُوا الَّذِي قُلْتَ؟ قَالَ: إِنَّهُمْ لا يَعْقِلُونَ شَيْئًا، قَالَ لِي خَلِيلِي. قَالَ: قُلْتُ: مَنْ خَلِيلُكَ؟ قَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"يَا أَبَا ذَرٍّ! أَتُبْصِرُ أُحُدًا؟". قَالَ: فَنَظَرْتُ إِلَى الشَّمْسِ مَا بَقِيَ مِنَ النَّهَارِ، وَأَنَا أُرَى أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يُرْسِلُنِي فِي حَاجَةٍ لَهُ. قُلْتُ: نَعَمْ. قَالَ:"مَا أُحِبُّ أَنَّ لِي مِثْلَ أُحُدٍ ذَهَبًا أُنْفِقُهُ كُلَّهُ، إِلَّا ثَلاثَةَ دَنَانِيرَ". وَإِنَّ هَؤُلاءِ لَا يَعْقِلُونَ، إِنَّمَا يَجْمَعُونَ الدُّنْيَا، لا وَاللَّهِ! لا أَسْأَلُهُمْ دُنْيَا وَلا أَسْتَفْتِيهِمْ عَنْ دِينٍ حَتَّى أَلْقَى اللَّهَ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1407)، ومسلم في الزّكاة (992) كلاهما من طريق الجريريّ، عن أبي العلاء، عن الأحنف، فذكره. واللّفظ للبخاريّ.




আহনাফ ইবনে কাইস থেকে বর্ণিত, তিনি তাদের কাছে বর্ণনা করেন: আমি কুরাইশদের একদল লোকের সাথে বসেছিলাম। তখন একজন রুক্ষ চুল, পোশাক ও আকৃতির লোক এসে তাদের সামনে দাঁড়ালেন এবং সালাম দিলেন। এরপর বললেন: যারা সম্পদ জমা করে (সঞ্চয় করে), তাদের জন্য জাহান্নামের আগুনে উত্তপ্ত পাথর বা ইটের সুসংবাদ দাও। সেই উত্তপ্ত পাথর তাদের কারো স্তনের বোঁটার ওপর রাখা হবে, অতঃপর তা তার কাঁধের সংযোগস্থল ভেদ করে বেরিয়ে যাবে। আবার তা তার কাঁধের সংযোগস্থলের ওপর রাখা হবে, অতঃপর তা কাঁপতে কাঁপতে তার স্তনের বোঁটা ভেদ করে বেরিয়ে যাবে।

এরপর তিনি চলে গেলেন এবং একটি খুঁটির পাশে বসে পড়লেন। আমি তাঁকে অনুসরণ করলাম এবং তাঁর পাশে বসলাম, অথচ আমি জানতাম না যে তিনি কে। আমি তাঁকে বললাম: আমার মনে হয়, লোকেরা আপনি যা বলেছেন, তা অপছন্দ করেছে। তিনি বললেন: এরা কিছুই বোঝে না। আমার খলীল (অন্তরঙ্গ বন্ধু) আমাকে বলেছেন। আহনাফ বলেন: আমি বললাম: আপনার খলীল কে? তিনি বললেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। [তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বলেছেন]: "হে আবূ যার! তুমি কি উহুদ পাহাড় দেখতে পাও?" আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন আমি দিনের বাকি অংশের জন্য সূর্যের দিকে তাকালাম। আমার মনে হলো, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হয়তো কোনো প্রয়োজনে আমাকে পাঠাবেন। আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমার কাছে যদি উহুদ পাহাড় পরিমাণ সোনা থাকত, তবে আমি এটা পছন্দ করতাম না যে, এর তিন দীনার ছাড়া বাকি সব আমি খরচ করে না দেই।"

আর এই লোকেরা বোঝে না। এরা কেবল দুনিয়া জমা করছে। না, আল্লাহর কসম! আমি তাদের কাছে দুনিয়ার কোনো কিছু চাইব না এবং তাদের দ্বীনের ব্যাপারে কোনো ফাতওয়াও জিজ্ঞাসা করব না, যতক্ষণ না আমি আল্লাহর সাথে মিলিত হই।









আল-জামি` আল-কামিল (3826)


3826 - عن عَنْ زَيْدِ بْنِ وَهْبٍ قَالَ: مَرَرْتُ بِالرَّبَذَةِ فَإِذَا أَنَا بِأَبِي ذَرٍّ رضي الله عنه، فَقُلْتُ لَهُ: مَا أَنْزَلَكَ مَنْزِلكَ هَذَا؟ قَالَ: كُنْتُ بِالشَّأْمِ، فَاخْتَلَفْتُ أَنَا وَمُعَاوِيَةُ فِي {وَالَّذِينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ وَلَا يُنْفِقُونَهَا فِي سَبِيلِ اللَّهِ فَبَشِّرْهُمْ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ} [سورة التوبة: 34] قَالَ مُعَاوِيَةُ: نَزَلَتْ فِي أَهْلِ الكِتَابِ. فَقُلْتُ: نَزَلَتْ فِينَا وَفِيهِمْ فَكَانَ بَيْنِي وَبَيْنَهُ فِي ذَاكَ، وَكَتَبَ إِلَى عُثْمَانَ رضي الله عنه يَشْكُونِي فَكَتَبَ إِلَيَّ عُثْمَانُ أَن اقْدَمِ المَدِينَةَ فَقَدِمْتُهَا، فَكَثُرَ عَلَيَّ النَّاسُ حَتَّى كَأَنَّهُمْ لَمْ يَرَوْنِي قَبْلَ ذَلِكَ فَذَكَرْتُ ذَاكَ لِعُثْمَانَ فَقَالَ لِي: إِنْ شِئْتَ تَنَحَّيْتَ فَكُنْتَ قَرِيبًا فَذَاكَ الَّذِي أَنْزَلَنِي هَذَا المَنْزِلَ وَلَوْ أَمَّرُوا عَلَيَّ حَبَشِيًّا لَسَمِعْتُ وَأَطَعْتُ".

صحيح: رواه البخاريّ في الزّكاة (1406) عن عليّ بن أبي هاشم، سمع هُشيمًا، أخبرنا حصين، عن زيد بن وهب، فذكره.

وأمّا ما رُوي عن ابن عباس قال:"لما نزلت هذه الآية {وَالَّذِينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ} قال: كبر ذلك على المسلمين، فقال عمر رضي الله عنه: أنا أُفرِّج عنكم، فانطلق فقال: يا نبي الله! إنه كبر على أصحابك هذه الآية، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الله لم يفرض الزّكاة إِلَّا ليطيب ما بقي
من أموالكم، وإنما فرض المواريث لتكون لمن بعدكم".

فكبَّر عمر ثمّ قال له:"ألا أخبرك بخير ما يكنز المرأُ: المرأة الصَّالحة إذا نظر إليها سرته، وإذا أمرها أطاعته، وإذا غاب عنها حفظته". فهو ضعيف.

رواه أبو داود (1664) عن عثمان بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا يحيى بن يعلى المحاربيّ، حَدَّثَنَا أبيّ، حَدَّثَنَا غيلان، عن جعفر بن إياس، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.

وصحّحه الحاكم (1/ 408 - 409) ورواه من طريق عليّ بن عبد الله بن المدينيّ، ثنا يحيى بن يعلى المحاربيّ، ثنا أبي، عن غيلان بن جامع، بإسناده. وقال:"صحيح على شرط الشّيخين".

قلت: غيلان بن جامع، وهو ابن أشعث البخاريّ أبو عبد الله الكوفي من رجال مسلم دون البخاريّ. ثمّ رواه الحاكم (2/ 333) وعنه البيهقيّ (4/ 82) من طريق يحيى بن يعلى بن الحارث المحاربيّ، ثنا أبي، ثنا غيلان بن جامع، عن عثمان أبي يقظان، عن جعفر بن إياس، بإسناده.

فزاد في الإسناد بين غيلان بن جامع وبين جعفر بن إياس:"عثمان أبو يقظان". وقال:"صحيح الإسناد". وتعقّبه الذّهبي فقال:"عثمان لا أعرفه، والخبر عجيب".

وقال البيهقي:"قصر به بعض الرّواة عن يحيى، فلم يذكر في إسناده عثمان أبا اليقظان".

قلت: فإذًا هو دائر بين انقطاع وضعيف، فإنه لم يذكر أحد أن غيلان بن جامع رُوي عن جعفر ابن إياس.

وأمّا عثمان فهو ابن عُمير -بالتصغير- ويقال: ابن قيس، والصواب أن قيسًا جدّ أبيه، أبو اليقظان الكوفي الأعمى، ضعَّفه أحمد وابن معين وابن أبي حاتم والجوزجاني والدارقطني وغيرهم.

وأمّا قول الذّهبيّ:"عثمان لا أعرفه". فهو يخالف لما ذكره في"الميزان" في ترجمته، ونقل عن الأئمة تضعيفه، ولعلّ ذلك يعود إلى اختلاف النُّسخ، فإنه كتب مرة: عثمان بن أبي اليقظان، وأخرى: عثمان بن القطان، ولم يقع مثل هذا الاختلاف في نسخ البيهقيّ فإنه قال فيه: عثمان أبو البقظان، وكذا عرَّفه فقال:"عثمان ضعّفوه".

وأمّا رواية جعفر بن إياس عن مجاهد فكان شعبة يُضعفه كما قال أحمد.




যায়িদ ইবনু ওয়াহব থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি 'রাবাযাহ' নামক স্থানের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, তখন সেখানে আবূ যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পেলাম। আমি তাঁকে বললাম: কী কারণে আপনি এই স্থানে অবস্থান করছেন? তিনি বললেন: আমি শামে ছিলাম। আমি এবং মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই আয়াতটি ({যারা সোনা ও রূপা জমা করে রাখে এবং তা আল্লাহর পথে খরচ করে না, তাদেরকে যন্ত্রণাদায়ক শাস্তির সুসংবাদ দাও} [সূরা আত-তাওবাহ: ৩৪]) নিয়ে মতভেদ করি। মু'আবিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটি আহলে কিতাবদের (গ্রন্থধারীদের) সম্পর্কে নাযিল হয়েছে। আমি বললাম: এটি আমাদের এবং তাদের উভয়ের সম্পর্কেই নাযিল হয়েছে। এই বিষয়ে আমার এবং তাঁর মাঝে মতপার্থক্য সৃষ্টি হয়। তিনি আমার ব্যাপারে অভিযোগ করে উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লিখলেন। তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে মাদীনাতে আসার জন্য লিখলেন। আমি সেখানে এলাম। কিন্তু লোকজন আমার প্রতি এত বেশি ভিড় করল, যেন তারা এর আগে আমাকে কখনও দেখেনি। আমি উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বিষয়টি বললাম। তিনি আমাকে বললেন: আপনি যদি চান, তবে সরে গিয়ে (মাদীনার) কাছাকাছি কোথাও থাকতে পারেন। আর এটাই হলো সেই কারণ, যার জন্য আমি এই স্থানে (রাবাযায়) অবস্থান করছি। আর যদি তারা আমার উপর কোনো হাবশি ক্রীতদাসকেও নেতা বানায়, তবে আমি অবশ্যই শুনব এবং আনুগত্য করব।









আল-জামি` আল-কামিল (3827)


3827 - عن أبي هريرة، قال: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أدّيت زكاة مالك، فقد قضيتَ ما عليك".

حسن: رواه الترمذيّ (618)، وابن ماجة (1788) كلاهما من حديث دراج أبي السمح، عن ابن حُجَيْرة، عن أبي هريرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في دراج أبي السَّمح فإنه يضعف في روايته عن أبي الهيثم لأنَّ
فيه ضعفًا كما قال الإمام أحمد، وأمّا في غيره فيحسّن.

وقد صحَّحه ابن خزيمة (2471)، وابن حبَّان (3216)، والحاكم (1/ 390) وجعله شاهدًا صحيحًا لما قبله.

وهو ما رواه الحاكم عن جابر بن عبد الله مرفوعًا:"إذا أديت زكاة مالك فقد أذهبت عنك شره". رجّح أبو زرعة والبيهقي وغيرهما أنه موقوف على جابر كما قال ابن حجر في"الفتح" (3/ 272) وكذلك من الموقوف أيضًا ما رواه البخاريّ في الزّكاة (1404) عن أحمد بن شبيب عَنْ خَالِدِ بْنِ أَسْلَمَ قَالَ: خَرَجْنَا مَعَ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ عُمَرَ، فَقَالَ أَعْرَابِيٌّ: أَخْبِرْنِي عَنْ قَوْلِ اللَّهِ: {وَالَّذِينَ يَكْنِزُونَ الذَّهَبَ وَالْفِضَّةَ وَلَا يُنْفِقُونَهَا فِي سَبِيلِ اللَّهِ} [سورة التوبة: 34]. قَالَ ابْنُ عُمَرَ: مَنْ كَنَزَهَا فَلَمْ يُؤَدِّ زَكَاتَهَا فَوَيْلٌ لَهُ، إِنَّمَا كَانَ هَذَا قَبْلَ أَنْ تُنْزَلَ الزَّكَاةُ، فَلَمَّا أُنْزِلَتْ جَعَلَهَا اللَّهُ طُهْرًا لِلْأَمْوَالِ".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তুমি তোমার সম্পদের যাকাত আদায় করবে, তখন তুমি তোমার উপর যা ফরয ছিল তা পূরণ করে দিলে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3828)


3828 - عن عليّ بن أبي طالب، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ليس في مال زكاة حتّى يحول عليه الحول" في حديث طويل.

حسن: رواه أبو داود (1573) عن سليمان بن داود المهريّ، أخبرنا ابن وهب، أخبرني جرير ابن حازم -وسمَّى آخر-، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضمرة والحارث الأعور، عن عليّ بن أبي طالب، فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عاصم بن ضمرة، وهو حسن الحديث وهو أيضًا مقرون بالحارث الأعور وإن كان فيه كلام معروف.

وقوله:"وسمَّى آخر" قائله سليمان بن داود المهريّ، أن ابن وهب رواه عن جرير بن حازم، عن شيخ آخر لم يحفظه سليمان بن داود.

ولكن اختلف جرير بن حازم مع هذا الشّيخ الذي لم يحفظه سليمان، فإنَّ جريرًا رفع الحديث إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم ولم يرفعه هذا الشّيخ، ولذا أفرد ذكر حازم بأنَّه زاد في الحديث عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فالظّاهر أن الآخر لم يقل ذلك، وقد رواه سفيان وشريك وزكريا بن أبي زائدة هذا الحديث عن أبي إسحاق ولم يرفعوه، فعرف أن الوهم وقع من جرير في رفعه، ولكن قبل كثيرٌ من أهل العلم تفرّد جرير بزيادة رفعه، وتابعه في أصل الحديث زهير، قال: حَدَّثَنَا أبو إسحاق بإسناده إِلَّا أنه قال: أحسبه عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، هكذا بالشّك، وهذه المتابعة وإن كانت ضعيفة من أجل الشّك إِلَّا أنها تقوي جرير بن حازم في رفع الحديث.

وقد حسَّنه الزيلعيّ، ونقل عن النوويّ في"الخلاصة" أنه قال:"هو حديث صحيح أو حسن، ولا يقدح فيه ضعف الحارث لمتابعة عاصم له"، وقال عبد الحق في"أحكامه":"هذا حديث رواه ابن وهب، عن جرير بن حازم، عن أبي إسحاق، عن عاصم والحارث، عن عليّ. فقرن أبو
إسحاق بين عاصم والحارث، والحارث كذّاب، وكثير من الشيوخ يجوز عليه مثل هذا، وهو أن الحارث أسنده، وعاصم لم يسنده، فجمعهما جرير وأدخل حديث أحدهما في الآخر، وكلّ ثقة رواه موقوفًا، فلو أنَّ جريرًا أسنده عن عاصم، وبين ذلك أخذنا منه. وقال غيره: هذا لا يلزم لأنَّ جريرًا ثقة، وقد أسند عنهما". انتهى من"نصب الراية" (2/ 328 - 329).

وقد ثبت كتاب عليّ رضي الله عنه في أمر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في الصّدقة كما أخرجه البخاريّ (3112) عن ابن الحنفية، قال: أرسلني أبي وقال: خذ هذا الكتاب فاذهب به إلى عثمان، فإن فيه أمر النَّبِيّ في الصّدقة.

رواه البخاريّ معلقًا: قال الحميديّ، حَدَّثَنَا سفيان، حَدَّثَنَا محمد بن سوقة، قال: سمعت منذرًا الثوريّ، عن ابن الحنفية، فذكره مختصرًا.

ورواه عبد الرزّاق (6795) عن ابن عيينة بالكتاب كاملًا، وقال:"وإنما كان في الكتاب ما في حديث عليّ". انتهى.

فمن الرواة من رواه كاملًا ومنهم من اختصرها، ومنهم من جزّأها في مواضع، فلا يبعد ما رواه أبو داود كاملًا أن يكون صحيحًا.

وفيه إثبات الحول في إيجاب الزّكاة وهو أمر متفق عليه عند المسلمين ولم يخالف فيه أحد يعتد به. وفي معناه أحاديث وفيها مقال.

منها: حديث عائشة قالت: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا زكاة في مال حتّى يحول عليه الحول".

رواه ابن ماجة (1792) عن نصر بن عليّ الجهضميّ قال: حَدَّثَنَا شجاع بن الوليد، قال: حَدَّثَنَا حارثة بن محمد، عن عمرة، عن عائشة، فذكرته.

وفيه حارثة بن محمد وهو ابن أبي الرجال -بكسر الراء ثمّ جيم- الأنصاريّ، أهل العلم مطبقون على تضعيفه.

ومن طريقه رواه البيهقيّ (4/ 95) وقال:"ورواه الثوري عن حارثة موقوفًا على عائشة، وحارثة لا يحتج بخبره".

ومنها: عن أنس، رواه الدَّارقطنيّ (1891) من حديث حسان بن سياه، عن ثابت، عن أنس مرفوعًا:"ليس في مال زكاة حتّى يحول عليه الحول".

قال ابن حبَّان في"المجروحين":"حسان بن سياه منكر الحديث جدًّا، لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد".

وقال الحافظ في"التلخيص" (2/ 156):"حسان بن سياه ضعيف، وقد انفرد به عن ثابت".

وقول الحافظ البيهقيّ (4/ 95) بعد إيراد حديث عليّ بن أبي طالب، وحديث عائشة، وإعلاله حديث عائشة بأنه جاء مرفوعًا وموقوفًا - وفيه حارثة لا يحتج بخبره، والاعتماد في ذلك على
الآثار الصحيحة فيه عن أبي بكر الصديق رضي الله عنه، وعثمان بن عفّان، وعبد الله بن عمر وغيرهم رضي الله عنهم.

وقد سكت عليه أيضًا البيهقيّ، فالعمدة في اشتراط الحول حديث عليّ بن أبي طالب، ثمّ اتفاق الصّحابة على ذلك.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "কোনো সম্পদে ততক্ষণ পর্যন্ত যাকাত নেই, যতক্ষণ না তার উপর এক বছর পূর্ণ হয়।" (এটি একটি দীর্ঘ হাদীসের অংশ ছিল)।









আল-জামি` আল-কামিল (3829)


3829 - عن عمرو بن العاص قال: بعث إليَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"خُذْ عليك ثيابك وسلاحك، ثمّ ائْتني". فأتيتُه وهو يتوضَّأ، فصعَّد في النّظر ثمّ طأطأه فقال:"إني أريد أن أبعثك على جيش فيُسَلِّمك الله ويُغْنِمك، وأزْعب لك من المال زعبة صالحة".

قال: فقلت: يا رسول الله، ما أسلمتُ من أجل المال، ولكني أسلمتُ رغبة في الإسلام، وأن أكون مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: يا عمرو! نِعمًا بالمال الصَّالح للرجل الصالح".

صحيح: رواه الإمام أحمد (17763)، والطَّبرانيّ في"الأوسط" (3213)، وصحّحه ابن حبَّان (3210)، والحاكم (2/ 236) كلّهم من طريق موسي بن عُليّ، عن أبيه، قال: سمعت عمرو بن العاص يقول (فذكره). وإسناده صحيح، وصحّحه الحاكم.

وموسي بن عُليّ -بالتصغير- هو ابن رباح اللّخمي من رجال مسلم، وثَّقه ابن معين وأحمد والنسائي وابن سعد وجماعة.

قال ابن حبَّان:"سمع هذا الخبر عليّ بن رباح عن عمرو بن العاص، وسمعه من أبي القيس بدل عمرو، عن عمرو، والطريقان جميعًا محفوظان".

وقوله:"أزعب زُعبة". بالزَّاي والعين -بمعنى الدّفع، يقال: زعب له من ماله زُعبة- أي دفع له منه دُفعة، والزُّعْب قطعة من المال.

وفي بعض المصادر الحديثية:"أرغب رغبة"، ومعناه مستقيم أيضًا، فكأنَّ بعض الرّواة تصرَّفوا في اللّفظ المأثور، فأتوا بما يتوافق معناه.



ورواه الدَّارقطنيّ (1888) من وجه آخر عن عبد الرحمن بن زيد بن أسلم، بإسناده نحوه. ورواه أيضًا (1887) من وجه آخر عن بقة، عن إسماعيل، عن عبد الله، عن نافع، عن ابن عمر، مرفوعًا.

وعبد الرحمن بن زيد بن أسلم ضعيف، ضعَّفه أحمد وابن المديني وغيرهما.

وقال البيهقيّ:"عبد الرحمن ضعيف لا يحتج به".

وبقية مدلِّس، وإسماعيل هو ابن عَيَّاش ضعيف في روايته عن غير الشاميين، وهذا منها. ولذا قال البيهقيّ (4/ 104):"رواه بقية، عن إسماعيل بن عَيَّاش، عن عبيد الله، فرفعه، وليس بصحيح".

قلت: الصواب فيه أنه موقوف على ابن عمر، رواه الترمذيّ (632) عن محمد بن بشار، حَدَّثَنَا عبد الوهّاب الثقفيّ، حَدَّثَنَا أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره موقوفًا.

قال الترمذيّ: وهذا أصحّ من حديث عبد الرحمن بن زيد بن أسلم قال أبو عيسى: وروي أيُوب وعبيد الله بن عمر وغير واحد عن نافع عن ابن عمر موقوفًا وعبد الرحمن بن زيد بن أسلم ضعيفٌ في الحديث ضعَّفه أحمد بن حنبل وعلي بن المديني وغيرهما من أهل الحديث وهو كثير الغلط، وقد رُوي عن غير واحد من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن لا زكاة في المال المستفاد حتّى يحول عليه الحول، وبه يقول مالك بن أنس، والشافعيّ، وأحمد، وإسحاق.

وقال بعض أهل العلم: إذا كان عنده مالٌ تجب فيه الزّكاة ففيه الزّكاة وإن لم يكن عنده سوي المال المستفاد ما تجب فيه الزّكاة لم يجبْ عليه في المال المستفاد زكاة حتّى يحول عليه الحول، فإن استفاد مالًا قبل أن يحول عليه الحولُ فإنه يزكي المال المستفاد مع ماله الذي وجبتْ فيه الزّكاة، وبه يقول سفيان الثوري وأهل الكوفة" انتهى.

ومعنى المال المستفاد: هو المال الذي حصل للرجل في أثناء الحول من هبة أو ميراث أو مثله، ولا يكون من نتائج المال الأوّل. انظر"تحفة الأحوذيّ" (3/ 273).

وقال الحافظ البغويّ في"شرح السنة" (6/ 29):"وقد رُوي عن غير واحد من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أن لا زكاة في المستفاد حتّى يحول عليه الحول، يروي ذلك عن أبي بكر، وعليّ، وابن عمر، وعائشة، وبه قال عطاء، وإبراهيم النخعيّ، وعمر بن عبد العزيز، وهو قول الشافعي وأحمد وإسحاق.

وقال بعض أهل العلم: إن استفاد مالًا زكاتيًا، وعنده من جنسه نصاب يضم إليه المستفاد في الحول. فإذا تم حول ما عنده تجب الزّكاة في الكلّ. يُروي ذلك عن ابن عباس، وبه قال الحسن البصريّ، والزهريّ، وهو قول الثوري ومالك وأصحاب الرأي. أما إذا تم النّصاب بالمستفاد، فلا زكاة فيها حتّى يحول عليه الحول من يوم أفاد.

واتفقوا على النّتاج يُضمُّ إلى الأصل في الحول، وكذلك حول الرّبح يبتني على حول الأصل في زكاة التجارة، فإذا تمَّ حول الأصل فعليه أن يُزكَّيَ عن الكلّ.

وفي الحديث دليلٌ على أنَّ النصاب إذا انتقص في خلال الحول انقطع الحول، فإذا تمَّ بعد ذلك
يستأنف الحول، وبه قال الشافعي، وذهب أصحاب الرّأي إلى أنه لا ينقطع الحول، والنّصاب شرط في طرفي الحول، وعن مالك في الناضِّ يشترط النصاب في آخر الحول حتى لو ملك دينارًا فصار في آخر الحول عشرين تجب عليه الزكاة، كما في زكاة التجارة.

قلت: زكاة التجارة تجب في القيمة، ولا يمكن ضبطُها في جميع الحول فرُوعي آخر الحول فيها.

وفيه دليل على أنه إذا بادل ماله في أثناء الحول بمال آخر من جنسه، أو غير جنسه، ينقطع الحول، ويبتدأ الحول على ما اشتراه من يوم الشراء، وهو قول الأكثرين، وقال مالك: إن بادل بجنسه لا ينقطع الحول، أما إن بادل النّقد بالنقد، فعند الأكثرين لا ينقطع الحول، وعند الشافعي ينقطع.

ومن ورث مالًا، فلا يبتني حول الوارث على حول المورث، بل يستأنف الحول من يوم ورثه، فإذا تمَّ أخرج الزكاة" انتهى.




আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে লোক পাঠালেন এবং বললেন: "তোমার পোশাক ও তোমার অস্ত্র নাও, অতঃপর আমার কাছে এসো।" আমি তাঁর কাছে আসলাম যখন তিনি ওযু করছিলেন। তিনি আমার দিকে দৃষ্টি উঁচু করলেন, এরপর দৃষ্টি নিচু করে বললেন: "আমি তোমাকে একটি বাহিনীর (নেতা হিসেবে) পাঠাতে চাই, যার ফলে আল্লাহ তোমাকে নিরাপদে রাখবেন এবং গনিমত দান করবেন। আর আমি তোমাকে পর্যাপ্ত পরিমাণ উত্তম সম্পদ প্রদান করব।" তিনি (আমর) বললেন: তখন আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি সম্পদের জন্য ইসলাম গ্রহণ করিনি, বরং আমি ইসলাম গ্রহণের আগ্রহে এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে থাকার জন্য ইসলাম গ্রহণ করেছি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আমর! নেক লোকের জন্য উত্তম সম্পদ কতই না ভালো!"









আল-জামি` আল-কামিল (3830)


3830 - عن ابن عباس قال: إن معاذًا قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال" … فأعلمهم أن الله افترض عليهم صدقة تؤخذ من أغنيائهم، فتردّ على فقرائهم".

متفق عليه: رواه البخاري في الزكاة (1458)، ومسلم في الإيمان (19) كلاهما من طريق يحيى بن عبد الله بن صيفي، عن أبي معبد، عن ابن عباس، فذكره في حديث طويل.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মু'আয (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে পাঠালেন এবং বললেন, "...তুমি তাদেরকে জানিয়ে দাও যে, আল্লাহ তাআলা তাদের উপর একটি সাদাকা (যাকাত) ফরয করেছেন, যা তাদের ধনীদের কাছ থেকে গ্রহণ করা হবে এবং তাদের দরিদ্রদের মধ্যে ফিরিয়ে দেওয়া হবে (বিতরণ করা হবে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (3831)


3831 - عن إبراهيم بن عطاء مولى عمران بن حصين، عن أبيه، أنّ زيادًا، أو بعض الأمراء بعث عمران بن حصين على الصّدقة. فلما رجع قال لعمران: أين المال؟ قال: وللمال أرسلتني؟ أخذناها من حيث كنا نأخذها على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم، ووضعناها حيث كنّا نضعها على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه أبو داود (1625)، وابن ماجه (1811) كلاهما من طريق إبراهيم بن عطاء بإسناده، مثله.

وإسناده حسن من أجل إبراهيم بن عطاء بن أبي ميمونة البصريّ فإنه حسن الحديث.

وأما ما رُوي عن أبي جحيفة، قال: قدم علينا مصدّق النبيّ صلى الله عليه وسلم فأخذ الصدقة من أغنيائنا فجعلها في فقرائنا، وكنت غلامًا يتيمًا، فأعطاني منها قلوصًا. فهو ضعيف.

رواه الترمذيّ (649) عن علي بن سعيد الكنديّ الكوفيّ، حدّثنا حفص بن غياث، عن أشعث، عن عون بن أبي جحيفة، عن أبيه، فذكره.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا ابن خزيمة في"صحيحه" (2362)، وأشعث هو ابن سوار الكنديّ النجار ضعف، ضعّفه جمهور أهل العلم، قال ابن حبان:"كان فاحش الخطأ كثير الوهم".

وقال ابن خزيمة:"باب إعطاء اليتامى من الصدقة إذا كانوا فقراء -إن ثبت الخبر، فإن في
النفس من أشعث بن سوار. وإن لم يثبت هذا الخبر فالقرآن كان في نقل خبر الخاص فيه، قد أعلم الله في محكم تنزيله أنّ للفقراء قسم (كذا والصّواب: قسمًا) في الصدقات. فالفقير كان يتيمًا أو غير يتيم فله في الصدقة قسم بنص الكتاب".

قلت: لا خلاف بين أهل العلم بأنّ اليتيم من المسلمين له حق في الصّدقات، بل قد يكون هو أولى من غيره، وإنما الخلاف في ثبوت هذا الخبر.

والظّاهر من أحاديث الباب أن الصّدقة تؤخذ من أغنياء البلد وتردّ على فقراء البلد، ولا تُنقل من بلد إلى بلد آخر إلّا لضرورة قصوى، وعليه جمهور أهل العلم، ولكن لو نقلها إلى بلد آخر أجزأ ذلك وسقط الواجب عنه.

وقوله:"قلوصًا" بفتح القاف: الناقة الشّابة، ويُجمع على قِلاص -بكسر القاف.



يرويه المثنى بن عمرو" هذا ما قاله مهنّا في سؤالاته للإمام أحمد. انظر"التلخيص".

ثم خالفهم جميعًا حسين المعلم، فرواه عن مكحول، عن عمرو بن شعيب، عن سعيد بن المسيب، عن عمر. ورواه ابن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن عمرو بن شعيب، عن عمر.

ولم يذكر ابن المسيب وهو أصح. قاله الدّارقطني في العلل (2/ 157).

وإليه أشار الترمذي في قوله:"وروى بعضهم هذا الحديث عن عمرو بن شعيب، أنّ عمر بن الخطاب" (فذكر الحديث).

ومن الشّواهد لهذا الحديث ما رُوي عن أنس بن مالك مرفوعًا:"اتّجروا في أموال اليتامى، لا تأكلها الزكاة".

رواه الطبراني في"الأوسط" (4164) عن علي بن سعيد الرّازي، حدّثنا الفرات بن محمد القيروانيّ، حدّثنا شجرة بن عيسى المعافريّ، عن عبد الملك بن أبي كريمة، عن عُمارة بن غزية، عن يحيى بن سعيد، عن أنس، فذكره.

وفي إسناده فرات بن محمد القيرواني، ترجمه الحافظ في"اللسان" (4/ 432) قال أبو العرب:"سمعت منه كثيرًا". وقال ابن حارث:"كان يغلب عليه الرواية والجمع ومعرفة الأخبار، وكان ضعيفًا متهما بالكذب، أو معروفًا به، مات سنة اثنتين وتسعين ومائتين".

ولكن نقل الهيثميّ في"المجمع" (3/ 67) قال:"أخبرني سيدي وشيخي أن إسناده صحيح".

وشيخه هو الحافظ العراقي، وأنا أستبعد أن يكون الحافظ العراقي يصحح حديثًا فيه متهم، إلا أنه يقع منه ذهول.

ومنها ما رُوي عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ابتغوا في مال اليتيم -أو في أموال اليتامى- حتى لا تذهبها، -أو لا تستهلكها- الصّدقة".

رواه الشّافعي في"الأم" (2/ 28) قال: أخبرنا عبد المجيد، عن ابن جريج، عن يوسف بن ماهك، فذكره.

وهذا مرسل فإنّ يوسف بن ماهك تابعيّ ثقة لم يلق النبيّ صلى الله عليه وسلم.

ثم استدلّ الشافعي بعموم قوله تعالى: {خُذْ مِنْ أَمْوَالِهِمْ صَدَقَةً تُطَهِّرُهُمْ وَتُزَكِّيهِمْ} [سورة التوبة: 103] فقال:"الزكاة في مال اليتيم كما في مال البالغ". وبعموم الأحاديث الصّحيحة في إيجاب الزكاة مطلقًا.

وقد صحَّ عن عمر بن الخطّاب رضي الله عنه قال:"ابتغوا بأموال اليتامى، لا تأكلها الصّدقة".

رواه الدارقطني (2/ 110)، وعنه البيهقيّ (4/ 107) وقال:"هذا إسناد صحيح، وله شواهد عن عمر رضي الله عنه".

قال أبو عيسى الترمذي:"وقد اختلف أهل العلم في هذا الباب، فرأى غير واحد من أصحاب
النبيّ صلى الله عليه وسلم في مال اليتيم زكاة منهم: عمر، وعلي، وعائشة، وابن عمر، وبه يقول مالك والشافعي وأحمد وإسحاق.

وقالت طائفة من أهل العلم:"ليس في مال اليتيم زكاة. وبه يقول سفيان الثوري، وعبد الله بن المبارك". انتهى.




ইমরান ইবনু হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিয়াদ অথবা কোনো এক আমীর যাকাত (সাদাকাহ) সংগ্রহের জন্য ইমরান ইবনু হুসাইনকে প্রেরণ করেন। এরপর যখন তিনি ফিরে আসলেন, তখন (আমীর) ইমরানকে বললেন, 'সম্পদ কোথায়?' তিনি বললেন, 'আপনি কি আমাকে মালের জন্য পাঠিয়েছিলেন? আমরা তা সেখান থেকেই গ্রহণ করেছি, যেখান থেকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে আমরা তা গ্রহণ করতাম, এবং সেখানেই তা রেখেছি, যেখানে আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে তা রাখতাম।'









আল-জামি` আল-কামিল (3832)


3832 - عن * *




৩৮৩২ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (3833)


3833 - عن أنس بن مالك، أن أبا بكر رضي الله عنه كتب له هذا الكِتَابَ لمَّا وجَّهَهُ إلى البحرين:"بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ، هذه فريضة الصَّدقة التي فرض رسول الله صلى الله عليه وسلم على المسلمين والتي أمر الله بها رسوله من سئلها من المسلمين على وجهها فليعطها ومن سئل فوقها فلا يعط. في أربع وعشرين من الإبل فما دونها من الغنم من كلِّ خمسٍ شاةٌ إذا بلغتْ خمسًا وعشرين إلى خمسٍ وثلاثين ففيها بنت مخاضٍ أنثى، فإذا بلغت ستًّا وثلاثين إلى خمسٍ وأربعين ففيها بنتُ لبونٍ أنثى، فإذا بلغت ستًّا وأربعين إلى ستِّينَ ففيها حقَّةٌ طروقة الجَمَلِ، فإذا بلغت واحدة وستين إلى خمس وسبعين ففيها جذعة، فإذا بلغت يعني ستا وسبعين إلى تسعين ففيها بنتا لبون، فإذا بلغت إحدى وتسعين إلى عشرين ومائة ففيها حِقَّتان طروقتا الجمل، فإذا زادت على عشرين ومائة ففي كل أربعين بنت لبون وفي كل خمسين حقه ومن لم يكن معه إلا أربع من الإبل فليس فيها صدقة إلا أن يشاء ربها، فإذا بلغت خمسا من الإبل ففيها شاة، وفي صدقة الغنم في سائمتها إذا كانت أربعين إلى عشرين ومائة شاة فإذا زادت على عشرين ومائة إلى مائتين شاتان، فإذا زادت على مائتين إلى ثلاث مائة ففيها ثلاث شياه، فإذا زادت على ثلاث مائة ففي كل مائة شاة، فإذا كانت سائمة الرجل ناقصة من أربعين شاة واحدة فليس فيها صدقة إلا أن يشاء ربها، وفي الرقة ربع العشر فإن لم تكن إلا تسعين ومائة فليس فيها شيء إلا أن يشاء ربها".

صحيح: رواه البخاريّ في الزكاة (1454) عن محمد بن عبد الله بن المثنى الأنصاريّ، قال: حدثني أبي، قال: حدثني ثمامة بن عبد الله بن أنس، أنّ أنسًا حدّثه، أنّ أبا بكر كتب له هذا الكتاب، فذكره.

روى البخاريّ هذا الحديث في مواضع متفرقة عن عبد الله بن المثنى بإسناده متصلًا.

ولكن رواه أبو داود (1567) من طريق حماد بن سلمة، قال: أخذت من ثمامة بن عبد الله بن أنس كتابًا زعم أن أبا بكر كتبه لأنس، فذكر الحديث بكامله. فظنَّ بعضُ أهل العلم أن فيه
انقطاعًا، والصحيح أنه موصول، إلّا أن بعض الرّواة قصّر به فرواه كما ذكره أبو داود.

وقد ذكر البيهقيّ في"المعرفة" (6/ 19) الرواة عن حماد بن سلمة، رووه عنه موصولًا بالتحديث ثم قال:"ولا نعلم من حملة الحديث وحفّاظهم من استقصى في انتقاد الرواة ما استقصاه محمد بن إسماعيل البخاري رحمه الله مع إمامته وتقدّمه في معرفة الرجال وعلل الأحاديث، ثم إنه اعتمد في هذا الباب على حديث عبد الله بن المثنى الأنصاريّ، عن ثمامة بن أنس، فأخرجه في"الصّحيح" عن محمد بن عبد الله بن المثنى، عن أبيه، وذلك لكثرة الشواهد لحديث هذا بالصّحة". انتهى.

قوله:"بنت مخاض" هي التي أتى عليها حول ودخلت في السنة الثانية، وحملت أمّها فصارت من المخاض، وهي الحوامل، والمخاض اسم جماعة للنوق الحوامل.

و"بنت لبون" هي التي أتى عليها حولان، ودخلتْ في السنة الثالثة، فصارتْ أمّها لبونًا بوضع الحمل، أي ذات لبن.

و"الحقة" هي التي أتى عليها ثلاث سنين، ودخلتْ في السنة الرّابعة، فاستحقت الحمل والضراب. و"طروقة الفحل" هي التي طرقها الفحل، أي نزا عليها، وهي فعولة بمعنى مفعولة كما قبل: ركوبة وحلوبة، بمعنى مركوبة ومحلوبة.

و"الجذعة" هي التي تمّت لها أربع سنين، ودخلتْ في الخامسة.

وذكر أبو داود تفسير أسنان الإبل فقال: سَمِعْتُهُ مِن الرِّيَاشِيِّ (وهو عباس بن فرج البصريّ النّحويّ) وَأَبِي حَاتِمٍ (وهو سهل بن محمد السجستانيّ النّحويّ المقرئ، كان إمامًا في علوم القرآن واللغة) وغيرهما ومن كتاب النَّضرِ بنِ شميلٍ ومن كتابِ أبِي عبيد وربما ذكر أحدهم الكلمة قالوا يسمّى الحوار ثمّ الفصيل إذا فصل ثمّ تكون بنت مخاضٍ لسنَة إلى تمام سنتين فإذا دخلت في الثالثة فهي ابنَة لبُون فإِذَا تَمَّتْ له ثلاث سِنِينَ فهو حقٌّ وحقّة إلى تمام أربع سنين لأَنَّها استحقَّت أن تركب ويحمل عليها الفحل وهي تلقح ولا يلقح الذّكر حتّى يثني ويقال للحقَّة طروقة الفحل لأَنّ الفحل يطرقها إلى تمام أربع سِنين فإذا طعنت في الخامسة فهي جَذَعةٌ حتى يتِمَّ لها خمس سنين فإذا دخلتْ فِي السَّادسة وألقى ثنيَّتَه فهو حينئذ ثنيّ حتّى يستكمل سنًا فإذا طعن في السَّابِعَةِ سُمِّيَ الذَّكَرُ رَبَاعِيًا وَالأُنْثَى رَبَاعية إلى تَمام السَّابعة فإذا دخل في الثّامنة وألقَى السِّنَّ السَّدِيسَ الَّذِي بَعْدَ الرَّبَاعِيَة فَهو سَدِيسٌ وَسَدَسٌ إلى تَمام الثَّامِنَة فإذا دخَل في التِّسع وَطَلَع نَابه فهو بازل أَي بزل نابه يعنِي طلع حتّى يدخل في العَاشرة فهو حِينَئِذ مخلف ثمّ ليس له اسم ولكن يقال بَازِلُ عَام وبازل عامين ومخلف عام ومخلف عامين ومخلِف ثلاثة أعوام إلى خمس سِنِين والخلفةُ الحَامل قال أبُو حاتم والجذوعةُ وقت من الزّمن ليْس بسنٍّ وفصول الأَسنَان عند طلوع سهيل".

قال أبو داود وأنشدنا الرِّياشِيُّ:
إِذَا سُهَيْلٌ آخِرَ اللَّيْلِ طَلَعْ … فَابْنُ اللَّبُونِ الْحِقُّ وَالْحِقُّ جَذَعْ

لَمْ يَبْقَ مِنْ أَسْنَانِهَا غَيْرُ الْهُبَعْ

وَالْهُبَعُ الَّذِي يُولَدُ فِي غَيْرِ حِينِهِ" انتهى كلام أبي داود (2/ 247).

وقوله:"ثني البعير" أي استكمل سنا من السنين، بإلقاء ثنيته.

قال ابن سيده: وللإنسان والخف والسبع: ثنيتان من فوق، وثنيتان من أسفل يعني الأسنان.

وألقحَ الفحلُ النّاقةَ إلقاحًا ولقاحًا بوزن أعطى إعطاء وعطاء: إذا أولدها -ولقِحت الناقة- بالكسر -لقحًا ولقاحًا بالفتح: إذا ولدت.

وقوله:"عند طلوع سهيل" يعني أن أسنان الإبل من وقت طلوع النّجم الذي يسمّى سهيلًا؛ لأنّ سهيلًا إنّما يطلع في زمن نتاج الإبل، فالتي كانت ابنة لبون تصير عند طلوع سهيل حقة، وقلّما تُنتج الإبلُ إلّا في زمن طلوع سهيل، فالإبل التي تلد في غير زمنه يحسب سنُّها من ولادتها.

وقوله:"الهُبع" هو الفصيل يولد في الصيف، وقيل: هو الذي فصل آخر النتاج.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে এই লিখিত নির্দেশনাটি লিখে দিয়েছিলেন যখন তিনি তাঁকে বাহরাইনে পাঠিয়েছিলেন:

"বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম। এটি সেই সাদাকার (যাকাতের) ফরয যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মুসলমানদের উপর ফরয করেছেন এবং যা আল্লাহ তাঁর রাসূলকে নির্দেশ দিয়েছেন। কোনো মুসলমানের কাছে তার নিয়ম অনুযায়ী এটি চাওয়া হলে সে যেন তা প্রদান করে, আর যার কাছে নিয়মের অতিরিক্ত চাওয়া হবে সে যেন তা প্রদান না করে।

উট চব্বিশটি এবং তার কমের জন্য (যাকাত নেই), তবে (এই সংখ্যা পূরণের জন্য) ছাগলের ক্ষেত্রে প্রতি পাঁচটি উটের জন্য একটি ছাগল দিতে হবে।

যখন উটের সংখ্যা পঁচিশ থেকে পঁয়ত্রিশে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি মাদী ‘বিনতে মাখাদ’ (দ্বিতীয় বছরে পদার্পণকারী উটনী) দিতে হবে। আর যখন ছত্রিশ থেকে পঁয়তাল্লিশে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি মাদী ‘বিনতে লাবুন’ (তৃতীয় বছরে পদার্পণকারী উটনী) দিতে হবে। আর যখন ছেচল্লিশ থেকে ষাটে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি ‘হিক্কাহ’ (চতুর্থ বছরে পদার্পণকারী, প্রজননের উপযুক্ত উটনী) দিতে হবে। আর যখন একষট্টি থেকে পঁচাত্তরে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি ‘জাযাআহ’ (পঞ্চম বছরে পদার্পণকারী উটনী) দিতে হবে। আর যখন (অর্থাৎ) ছিয়াত্তর থেকে নব্বইয়ে পৌঁছাবে, তখন তাতে দুটি ‘বিনতে লাবুন’ দিতে হবে। আর যখন একানব্বই থেকে একশো বিশে পৌঁছাবে, তখন তাতে দুটি ‘হিক্কাহ’ (যা প্রজননের উপযুক্ত) দিতে হবে।

আর যখন একশো বিশের বেশি হবে, তখন প্রতি চল্লিশটির জন্য একটি ‘বিনতে লাবুন’ এবং প্রতি পঞ্চাশটির জন্য একটি ‘হিক্কাহ’ দিতে হবে।

আর যার কাছে মাত্র চারটি উট থাকবে, তার উপর কোনো সাদাকা (যাকাত) নেই, তবে যদি তার মালিক ইচ্ছা করে (তবে দিতে পারে)। আর যখন উটের সংখ্যা পাঁচে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি ছাগল (বা ভেড়া) দিতে হবে।

আর বিচরণকারী ছাগলের (বা ভেড়ার) যাকাতের ক্ষেত্রে, যখন সংখ্যা চল্লিশ থেকে একশো বিশ হবে, তখন তাতে একটি ছাগল দিতে হবে। আর যখন একশো বিশের বেশি হয়ে দুইশো পর্যন্ত পৌঁছাবে, তখন দুটি ছাগল দিতে হবে। আর যখন দুইশোর বেশি হয়ে তিনশো পর্যন্ত পৌঁছাবে, তখন তাতে তিনটি ছাগল দিতে হবে। আর যখন তিনশোর বেশি হবে, তখন প্রতি একশোতে একটি ছাগল দিতে হবে। আর যদি কোনো ব্যক্তির বিচরণকারী ছাগলের সংখ্যা চল্লিশ থেকে একটি কম হয়, তবে তাতে কোনো সাদাকা নেই, তবে যদি তার মালিক ইচ্ছা করে (তবে দিতে পারে)।

আর রূপার (নগদ অর্থের) ক্ষেত্রে চল্লিশ ভাগের এক ভাগ (অর্থাৎ ২.৫ শতাংশ)। আর যদি তা মাত্র একশো নব্বই (দিরহামের সমপরিমাণ) হয়, তবে তাতে কোনো কিছু নেই, তবে যদি তার মালিক ইচ্ছা করে (তবে দিতে পারে)।”









আল-জামি` আল-কামিল (3834)


3834 - عن أبي سعيد الخدري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس فيما دون خمس من الإبل صدقة. ولا في الأربع شيء، فإذا بلغت خمسا ففيها شاة إلى أن تبلغ تسعا. فإذا بلغت عشرا ففيها شاتان إلى أن تبلغ أربع عشرة. فإذا بلغت خمس عشرة ففيها ثلاث شياه إلى أن تبلغ تسع عشرة. فإذا بلغت عشرين ففيها أربع شياه إلى أن تبلغ أربعا وعشرين. فإذا بلغت خمسا وعشرين ففيها بنت مخاض إلى خمس وثلاثين. فإذا لم تكن بنت مخاض فابن لبون ذكر. فإن زادت بعيرا ففيها بنت لبون إلى أن تبلغ خمسا وأربعين. فإن زادت بعيرا ففيها حقة إلى أن تبلغ ستين. فإن زادت بعيرا ففيها جذعة إلى أن تبلغ خمسا وسبعين. فإن زادت بعيرا ففيها بنتا لبون إلى أن تبلغ تسعين. فإن زادت بعيرا ففيها حقتان إلى أن تبلغ عشرين ومائة. ثم في كل خمسين حقة. وفي كل أربعين بنت لبون".

حسن: رواه ابن ماجه (1799) عن محمد بن عقيل بن خويلد النيسابوري، حدثنا حفص بن عبد الله السلمي، حدثنا إبراهيم بن طهمان، عن عمرو بن يحيى بن عُمارة، عن أبيه، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عقيل بن خويلد، وثقه النسائي ولكن قال الحاكم أبو أحمد: حدَّث عن حفص بن عبد الله بحديثين لم يتابع عليهما. ويقال: دخل له حديث في حديث، وكان أحد الثقات النبلاء.
قلت: هذا الحديث لم يخطئ فيه إن شاء الله لأنه موافق لحديث أنس.




আবু সাঈদ খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাঁচটির কম উটের উপর কোনো যাকাত নেই। চারের মধ্যে (চারটি উটে) কিছুই নেই। যখন তা পাঁচে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি বকরী (যাকাত), যতক্ষণ না তা নয়ে পৌঁছায়। যখন তা দশে পৌঁছাবে, তখন তাতে দুটি বকরী, যতক্ষণ না তা চৌদ্দতে পৌঁছায়। যখন তা পনেরোতে পৌঁছাবে, তখন তাতে তিনটি বকরী, যতক্ষণ না তা উনিশে পৌঁছায়। যখন তা বিশে পৌঁছাবে, তখন তাতে চারটি বকরী, যতক্ষণ না তা চব্বিশে পৌঁছায়। যখন তা পঁচিশে পৌঁছাবে, তখন তাতে একটি ‘বিনতে মাখাদ’ (এক বছর পূর্ণ হওয়া উটনী), যতক্ষণ না তা পঁয়ত্রিশে পৌঁছায়। যদি ‘বিনতে মাখাদ’ না থাকে, তবে একটি পুরুষ ‘ইবনু লাবুন’ (দুই বছর পূর্ণ হওয়া উট) দিতে হবে। এরপর যদি একটি উটও বাড়ে, তবে তাতে একটি ‘বিনতে লাবুন’ (দুই বছর পূর্ণ হওয়া উটনী), যতক্ষণ না তা পঁয়তাল্লিশে পৌঁছায়। এরপর যদি একটি উটও বাড়ে, তবে তাতে একটি ‘হিক্কাহ’ (তিন বছর পূর্ণ হওয়া উটনী), যতক্ষণ না তা ষাটে পৌঁছায়। এরপর যদি একটি উটও বাড়ে, তবে তাতে একটি ‘জাযআহ’ (চার বছর পূর্ণ হওয়া উটনী), যতক্ষণ না তা পঁচাত্তরে পৌঁছায়। এরপর যদি একটি উটও বাড়ে, তবে তাতে দুটি ‘বিনতে লাবুন’, যতক্ষণ না তা নব্বইয়ে পৌঁছায়। এরপর যদি একটি উটও বাড়ে, তবে তাতে দুটি ‘হিক্কাহ’, যতক্ষণ না তা একশত বিশে পৌঁছায়। এরপর প্রতি পঞ্চাশে একটি ‘হিক্কাহ’ এবং প্রতি চল্লিশে একটি ‘বিনতে লাবুন’ (যাকাত দিতে হবে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (3835)


3835 - عن نافع، أنه قرأ كتاب عمر بن الخطاب:"أنه ليس فيما دون خمسة من الإبل شيء، وإذا بلغت خمسا ففيها شاة إلى تسع، فإذا كانت عشرًا فشاتان إلى أربع عشرة، فإذا بلغت خمس عشرة ففيها ثلاث إلى تسع عشرة، فإذا بلغت العشرين فأربع وإلى أربع وعشرين، فإذا بلغت خمسًا وعشرين ففيها بنت مخاض إلى خمس وثلاثين، فإذا زادت ففيها ابنة لبون إلى خمس وأربعين، فإذا زادت ففيها حقة إلى الستين، فإذا زادت ففيها ابنتا لبون إلى التسعين، فإذا زادت ففيها حقتان إلى العشرين ومائة، فإذا زادت ففي كل خمسين حقّة، وفي كل أربعين ابنة لبون، وليس في الغنم شيء فيما دون الأربعين، فإذا بلغت الأربعين ففيها شاة إلى العشرين ومائة، فإذا زادت فشاتان إلى المائتين، فإن زادت على المائتين فثلاث شياه إلى الثلاث مائة، فإذا زادت على الثلاث مائة، ففي كل مائة شاة".

صحيح: رواه أبو يعلى في"مسنده" (125) عن أبي الرّبيع (هو الزّهرانيّ)، ثنا حماد (هو ابن زيد)، قال: سمعت أيوب وعبد الرحمن وعبيد الله بن عمر يحدّثون عن نافع، أنّه قرأ كتاب عمر بن الخطّاب، فذكره. وهي رواية وجادة وهي إحدى صيغ التحمّل عند المحدّثين.

ورجاله ثقات كما قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 74)، وهو يشبه كتاب أبي بكر لأنس كما سبق.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাফি’ তাঁর একটি পত্রে পাঠ করে শোনান: "পাঁচটি উটের কম হলে তাতে যাকাত নেই। আর যখন তা পাঁচটি হবে, তখন তাতে একটি বকরী দিতে হবে—নয়টি পর্যন্ত। যখন তা দশটি হবে, তখন তাতে দু'টি বকরী দিতে হবে—চৌদ্দটি পর্যন্ত। যখন তা পনেরোটি হবে, তখন তাতে তিনটি বকরী দিতে হবে—উনিশটি পর্যন্ত। যখন তা বিশটি হবে, তখন তাতে চারটি (বকরী) দিতে হবে—চব্বিশটি পর্যন্ত। যখন তা পঁচিশটি হবে, তখন তাতে এক বছর বয়সের একটি উষ্ট্রী (বিনত মাখাদ) দিতে হবে—পঁয়ত্রিশটি পর্যন্ত। যখন তা পঁয়ত্রিশটির বেশি হবে, তখন তাতে দুই বছর বয়সের একটি উষ্ট্রী (বিনতে লাবুন) দিতে হবে—পঁয়তাল্লিশটি পর্যন্ত। যখন তা পঁয়তাল্লিশটির বেশি হবে, তখন তাতে তিন বছর বয়সের একটি উষ্ট্রী (হিক্কাহ) দিতে হবে—ষাটটি পর্যন্ত। যখন তা ষাটটির বেশি হবে, তখন তাতে দুই বছর বয়সের দু'টি উষ্ট্রী (বিনতে লাবুন) দিতে হবে—নব্বইটি পর্যন্ত। যখন তা নব্বইটির বেশি হবে, তখন তাতে তিন বছর বয়সের দু'টি উষ্ট্রী (হিক্কাহ) দিতে হবে—একশত বিশটি পর্যন্ত। যদি এর চেয়েও বেশি হয়, তবে প্রতি পঞ্চাশটিতে একটি তিন বছর বয়সের উষ্ট্রী (হিক্কাহ) এবং প্রতি চল্লিশটিতে একটি দুই বছর বয়সের উষ্ট্রী (বিনতে লাবুন) দিতে হবে। আর চল্লিশটির কম হলে ছাগল/বকরীর যাকাত নেই। যখন তা চল্লিশটি হবে, তখন তাতে একটি বকরী দিতে হবে—একশত বিশটি পর্যন্ত। যখন এর চেয়ে বেশি হবে, তখন দু'টি বকরী দিতে হবে—দুইশতটি পর্যন্ত। যদি দুইশতটির বেশি হয়, তবে তিনটি বকরী দিতে হবে—তিনশতটি পর্যন্ত। আর যদি তিনশতটির বেশি হয়, তবে প্রতি একশততে একটি বকরী দিতে হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3836)


3836 - عن قَزَعَة بن يحيى البصريّ، قَالَ: أَتَيْتُ أَبَا سَعِيدٍ وَهُوَ مَكْثُورٌ عَلَيْهِ فَلَمَّا تَفَرَّقَ النَّاسُ عَنْهُ قُلْتُ: إِنِّي لا أَسْأَلُكَ عَمَّا يَسْأَلُكَ هَؤُلاءِ عَنْهُ، قُلْتُ أَسْأَلُكَ عَنْ صَلاةِ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ: مَا لَكَ فِي ذَلِكَ مِنْ خَيْرٍ، فَأَعَادَهَا عَلَيْهِ فَقَالَ: كَانَتْ صَلاةُ الظُّهْرِ تُقَامُ فَيَنْطَلِقُ أَحَدُنَا إِلَى الْبَقِيعِ فَيَقْضِي حَاجَتَهُ، ثُمَّ يَأْتِي أَهْلَهُ فَيَتَوَضَّأُ، ثُمَّ يَرْجِعُ إِلَى الْمَسْجِدِ وَرَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم فِي الرَّكْعَةِ الأُولَى. قَالَ: وَسأَلْتُهُ عَن الزَّكَاةِ فَقَالَ: لا أَدْرِي أَرَفَعَهُ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَمْ لا؟"فِي مِائَتَيْ دِرْهَمٍ خَمْسَةُ دَرَاهِمَ، وَفِي أَرْبَعِينَ شَاةً شَاةٌ إِلَى عِشْرِينَ وَمِائَةٍ، فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا شَاتَانِ إِلَى مِائَتَيْنِ، فَإِذَا زَادَتْ فَفِيهَا ثَلاثُ شِيَاهٍ إِلَى ثَلاثِ مِائَةٍ، فَإِذَا زَادَتْ فَفِي كُلِّ مِائَةٍ شَاةٌ، وَفِي الإِبِلِ فِي خَمْسٍ شَاةٌ، وَفِي عَشْرٍ شَاتَانِ وَفِي خَمْسَ عَشْرَةَ ثَلاثُ شِيَاهٍ، وَفِي عِشْرِينَ أَرْبَعُ شِيَاهٍ وَفِي خَمْسٍ وَعِشْرِينَ ابْنَةُ مَخَاضٍ إِلَى خَمْسٍ وَثَلاثِينَ، فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا ابْنَةُ لَبُونٍ إِلَى خَمْسٍ وَأَرْبَعِينَ، فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا حِقَّةٌ إِلَى سِتِّينَ، فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا جَذَعَةٌ إِلَى خَمْسٍ وَسَبْعِينَ، فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا ابْنَتَا لَبُونٍ إِلَى تِسْعِينَ، فَإِذَا زَادَتْ
وَاحِدَةً فَفِيهَا حِقَّتَانِ إِلَى عِشْرِينَ وَمِائَةٍ، فَإِذَا زَادَتْ فَفِي كُلِّ خَمْسِينَ حِقَّهٌ وَفِي كُلِّ أَرْبَعِينَ بِنْتُ لَبُونٍ". وَسَأَلْتُهُ عَن الصَّوْم فِي السَّفَرِ قَالَ: سَافَرْنَا مَعَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم إِلَى مَكَّةَ وَنَحْنُ صِيَامٌ، قَال: فَنَزَلْنَا مَنْزِلا، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"إِنَّكُمْ قَدْ دَنَوْتُمْ مِنْ عَدُوِّكُمْ وَالْفِطْرُ أَقْوَى لَكُمْ"، فَكَانَتْ رُخْصَةً فَمِنَّا مَنْ صَامَ وَمِنَّا مَنْ أَفْطَرَ ثُمَّ نَزَلْنَا مَنْزِلا آخَرَ فَقَالَ:"إِنَّكُمْ مُصَبِّحُو عَدُوِّكُمْ وَالْفِطْرُ أَقْوَى لَكُمْ فَأَفْطِرُوا". فَكَانَتْ عَزِيمَةً فَأَفْطَرْنَا ثُمَّ قَالَ: لَقَدْ رَأَيْتُنَا نَصُومُ مَعَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم بَعْدَ ذَلِكَ فِي السَّفَرِ.

صحيح: رواه الإمام أحمد (11307) عن عبد الرحمن بن مهدي، قال: حدّثني معاوية -يعني ابن صالح-، عن ربيعة بن يزيد، قال: حدّثني قزعة، فذكره بطوله.

ورواه مسلم في الصيام (1120) من هذا الوجه مختصرًا، وهو الجزء الخاص بالصّوم.




আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ক্বাযা‘আ ইবনু ইয়াহইয়া আল-বাসরী (রহ.) বলেন: আমি আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। তখন তাঁর চারপাশে অনেক লোকের ভিড় ছিল। যখন লোকেরা তাঁর কাছ থেকে চলে গেল, আমি বললাম: আপনি যাদের প্রশ্নের উত্তর দিচ্ছেন, আমি আপনাকে সেই বিষয়ে প্রশ্ন করব না। আমি আপনাকে রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত (নামায) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করতে চাই। তিনি (আবূ সাঈদ) বললেন: এই বিষয়ে তোমার কোনো কল্যাণ নেই (বিশেষ প্রয়োজনীয়তা নেই)। সে (ক্বাযা‘আ) আবারও জিজ্ঞেস করল। তখন তিনি বললেন: যুহরের সালাত (নামাযের জামাত) এমন সময় শুরু হতো যে, আমাদের কেউ (মসজিদ থেকে) বাকী‘ কবরস্থানের দিকে যেত এবং তার প্রয়োজন (পেশাব-পায়খানা) সেরে নিত, তারপর তার পরিবারের কাছে আসত এবং ওযু করত, এরপর মসজিদে ফিরে আসত, তখনও রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রথম রাকাতেই থাকতেন।

তিনি (ক্বাযা‘আ) বলেন: আমি তাঁকে যাকাত সম্পর্কেও জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: আমি জানি না, তিনি (আবূ সাঈদ) এই কথাগুলো নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পর্যন্ত পৌঁছিয়ে বলেছেন কি না (অর্থাৎ এগুলো মারফূ‘ হাদিস কিনা):

“দুইশ দিরহামে পাঁচ দিরহাম যাকাত (২.৫%)। আর চল্লিশ থেকে একশ বিশটি পর্যন্ত ছাগলে একটি ছাগল যাকাত দিতে হবে। যখন তা একটি বেড়ে যাবে, তখন দুইশ পর্যন্ত দু’টি ছাগল দিতে হবে। যদি তা আরো বাড়ে, তবে তিনশ পর্যন্ত তিনটি ছাগল দিতে হবে। আর এর চেয়ে বেশি হলে প্রতি একশতে একটি ছাগল দিতে হবে।

উট (ইবিলের) যাকাতের ক্ষেত্রে: পাঁচটি উটে একটি ছাগল, দশটিতে দু’টি ছাগল, পনেরটিতে তিনটি ছাগল, বিশটিতে চারটি ছাগল, আর পঁচিশটি উটে ইবনু মাখাদ (এক বছর বয়সী উট বা উটনী) দিতে হবে পঁয়ত্রিশটি পর্যন্ত। যখন তা একটি বেড়ে যাবে, তখন পঁয়তাল্লিশ পর্যন্ত ইবনাতু লাবূন (দুই বছর বয়সী উটনী) দিতে হবে। যখন তা একটি বেড়ে যাবে, তখন ষাট পর্যন্ত হিক্কাহ (তিন বছর বয়সী উটনী) দিতে হবে। যখন তা একটি বেড়ে যাবে, তখন পঁচাত্তর পর্যন্ত জাযাআহ (চার বছর বয়সী উটনী) দিতে হবে। যখন তা একটি বেড়ে যাবে, তখন নব্বই পর্যন্ত দু’টি ইবনাতু লাবূন দিতে হবে। যখন তা একটি বেড়ে যাবে, তখন একশ বিশ পর্যন্ত দু’টি হিক্কাহ দিতে হবে। এর চেয়ে বেশি হলে প্রতি পঞ্চাশটিতে একটি হিক্কাহ এবং প্রতি চল্লিশটিতে একটি ইবনাতু লাবূন দিতে হবে।”

আমি তাঁকে (আবূ সাঈদকে) সফর অবস্থায় সওম (রোযা) রাখা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: আমরা সওম অবস্থায় রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মক্কার উদ্দেশ্যে সফর করলাম। তিনি বলেন: আমরা এক স্থানে অবতরণ করলে রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তোমরা তোমাদের শত্রুর নিকটবর্তী হয়ে গেছ, আর রোযা ভঙ্গ করা তোমাদের জন্য অধিক শক্তিশালী হবে।” এটি ছিল একটি সুযোগ (রুখসাত)। তাই আমাদের মধ্যে কেউ রোযা রাখল এবং কেউ রোযা ভঙ্গ করল। এরপর আমরা অন্য এক স্থানে অবতরণ করলাম। তখন তিনি বললেন: “তোমরা সকালে তোমাদের শত্রুর মোকাবিলা করবে, আর রোযা ভঙ্গ করা তোমাদের জন্য অধিক শক্তিশালী হবে, অতএব তোমরা রোযা ভঙ্গ কর।” এটি ছিল দৃঢ় আদেশ (আযীমাহ)। সুতরাং আমরা রোযা ভঙ্গ করলাম। এরপর তিনি বললেন: আমি এর পরেও দেখেছি যে, আমরা রাসুলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সফরে রোযা রেখেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (3837)


3837 - عن عبد الله بن عمر، قال: كَتَبَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم كِتَابَ الصَّدَقَةِ فَلَمْ يُخْرِجْهُ إِلَى عُمَّالِهِ حَتَّى قُبِضَ، فَقَرَنَهُ بِسَيْفِهِ فَعَمِلَ بِهِ أَبُو بَكْرٍ حَتَّى قُبِضَ، ثُمَّ عَمِلَ بِهِ عُمَرُ حَتَّى قُبِضَ، فَكَانَ فِيهِ:"فِي خَمْسٍ مِن الإِبِلِ شَاةٌ، وَفِي عَشْرٍ شَاتَانِ، وَفِي خَمْسَ عَشْرَةَ ثَلاثُ شِيَاهٍ وَفِي عِشْرِينَ أَرْبَعُ شِيَاهٍ، وَفِي خَمْسٍ وَعِشْرِينَ ابْنَةُ مَخَاضٍ إِلَى خَمْسٍ وَثَلاثِينَ، فَإِنْ زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا ابْنَةُ لَبُونٍ إِلَى خَمْسٍ وَأَرْبَعِينَ، فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا حِقَّةٌ إِلَى سِتِّينَ، فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا جَذَعَةٌ إِلَى خَمْسٍ وَسَبْعِينَ، فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا ابْنَتَا لَبُونٍ إِلَى تِسْعِينَ، فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا حِقَّتَانِ إِلَى عِشْرِينَ وَمِائَةٍ، فَإِنْ كَانَت الإِبِلُ أَكْثَرَ مِنْ ذَلِكَ فَفِي كُلِّ خَمْسِينَ حِقَّةٌ وَفِي كُلِّ أَرْبَعِينَ ابْنَةُ لَبُونٍ. وَفِي الْغَنَمِ فِي كُلِّ أَرْبَعِينَ شَاةً شَاةٌ إِلَى عِشْرِينَ وَمِائَةٍ، فَإِنْ زَادَتْ وَاحِدَةً فَشَاتَانِ إِلَى مِائَتَيْنِ، فَإِنْ زَادَتْ وَاحِدَةً عَلَى الْمِائَتَيْنِ فَفِيهَا ثَلاثُ شِيَاهٍ إِلَى ثَلاثِ مِائَةٍ، فَإِنْ كَانَت الْغَنَمُ أَكْثَرَ مِنْ ذَلِكَ فَفِي كُلِّ مِائَةِ شَاةٍ شَاةٌ وَلَيْسَ فِيهَا شَيْءٌ حَتَّى تَبْلَغُ الْمِائَةَ، وَلا يُفَرَّقُ بَيْنَ مُجْتَمِعٍ وَلا يُجْمَعُ بَيْنَ مُتَفَرِّقٍ مَخَافَةَ الصَّدَقَةِ، وَمَا كَانَ مِنْ خَلِيطَيْنِ فَإِنَّهُمَا يَتَرَاجَعَانِ بَيْنَهُمَا بِالسَّوِيَّةِ وَلا يُؤْخَذُ فِي الصَّدَقَةِ هَرِمَةٌ وَلا ذَاتُ عَيْبٍ".

قَالَ: وقَالَ الزُّهْرِيُّ: إِذَا جَاءَ الْمُصَدِّقُ قُسِّمَت الشَّاءُ أَثْلاثًا: ثُلُثًا شِرَارًا، وَثُلُثًا خِيَارًا، وَثُلُثًا وَسَطًا، فَأَخَذَ الْمُصَدِّقُ مِن الْوَسَطِ وَلَمْ يَذْكُر الزُّهْرِيُّ الْبَقَرَ.

حسن: رواه أبو داود (1568) واللّفظ له، والترمذي (621) كلاهما من حديث عبّاد بن العوّام، حدّثنا سفيان بن حسين، عن الزّهريّ، عن سالم، عن ابن عمر، فذكره.

ومن هذا الطريق رواه أيضًا الإمام أحمد (4632) مختصرًا.
ورواه ابن خزيمة (2267) من وجه آخر عن سفيان بن حسين، مختصرًا.

قال الترمذي:"حديث ابن عمر حديث حسن، والعمل على هذا الحديث عند عامة الفقهاء، وقد روى يونس بن يزيد وغير واحد عن الزهريّ، عن سالم، بهذا الحديث ولم يرفعوه، وإنّما رفعه سفيان بن حسين". انتهى.

ونقل البيهقيّ (4/ 88) عن الترمذيّ في كتابه"العلل" قال:"سألت محمّد بن إسماعيل البخاريّ عن هذا الحديث فقال: أرجو أن يكون محفوظًا، وسفيان بن حسين صدوق" انتهى.

قلت: سفيان بن حسين الواسطيّ ثقة في غير الزهريّ باتفاقهم كما قال الحافظ ابن حجر في"التقريب" وهو من رجال مسلم.

قال ابن الملقن في"البدر المنير" (5/ 424):"ولا يضرُّ تفرّده، فإنّ سفيان وثّقه ابنُ معين وابن سعد والنسائيّ، وأخرج له مسلم في مقدمة صحيحه، والبخاريّ تعليقًا، لكنّه ضعيف في الزّهريّ.

وقد ارتفع ذلك هنا فإنه توبع، قال ابن عدي فيما نقله البيهقي (4/ 88) عنه:"وافق سفيان بن حسين على هذه الرواية عن سالم، عن أبيه: سليمان بن كثير".

قال:"وبهذا يظهر الرّد على ما نُقل عن ابن معين حيث ضعّف هذا الحديث. وقال: لم يتابع سفيان أحدٌ عليه". انتهى.

ونقل عن الحاكم قوله:"ويصحِّحُه على شرط الشيخين حديثُ عبد الله بن المبارك، عن يونس ابن يزيد، عن الزّهريّ، وإن كان فيه أدنى إرسال، فإنه شاهد صحيح لحديث سفيان بن حسين. ثم ساقه كما أخرجه الدارقطني سواء". انتهى.

قلت: وهو يشير إلى ما رواه أبو داود (1570)، والدّارقطني (1986)، والحاكم (1/ 393 - 394)، والبيهقيّ (4/ 90 - 91) كلّهم من طريق عبد الله بن المبارك، عن يونس بن يزيد، عن ابن شهاب، قال:"هذه نسخة كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم الذي كتبه في الصّدقة وهي عند آل عمر بن الخطاب، قال ابن شهاب: أقرأنيها سالم بن عبد الله بن عمر فوعيتُها على وجهها، وهي التي انتسخ عمر بن عبد العزيز من عبد الله بن عبد الله بن عمر، وسالم بن عبد الله بن عمر حين أُمِّر على المدينة، فأمر عماله بالعمل بها، وكتب بها إلى الوليد بن عبد الملك، فأمر الوليد عماله بالعمل بها، ثم لم يزل الخلفاء يأمرون بذلك بعده، ثم أمر بها هشام فنسخها إلى كل عامل من المسلمين، وأمرهم بالعمل بما فيها ولا يتعدونها".

وكون الزهريّ سمع هذه النسخة من سالم بن عبد الله فوعاها ووجدها سالم منسوخة عند آل عمر ابن الخطاب فهي وجادة والرواية بها صحيحة، وحكمها الرّفع. وسالم بن عبد الله عزاه إلى أبيه في رواية سليمان بن كثير قال: حدّثنا ابن شهاب، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم.

قال الزّهريّ: أقرأني سالم كتابًا كتبه رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصدقات قبل موته (فذكر الحديث).
ومن هذا الطّريق رواه ابن ماجه (1798). وبهذا صحّ قول البخاري والترمذي بأنه حسن.

غير أنّ الدّارقطنيّ في كتابه"العلل" (12/ 291) أشار إلى الاختلاف فيه على الزّهريّ، ورجّح رواية يونس بن يزيد يعني الوجادة، وهي حجّة.

ولذلك قال النووي في"المجموع" (5/ 382):"مدار نصب زكاة الماشية على حديثي أنس وابن عمر رضي الله عنهم".




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাকাত সংক্রান্ত লিখিত নির্দেশ তৈরি করেছিলেন, কিন্তু তিনি তাঁর কর্মচারীদের কাছে তা প্রেরণ করেননি যতক্ষণ না তিনি ইন্তেকাল করেন। তিনি সেটি তাঁর তলোয়ারের সাথে বেঁধে রেখেছিলেন। আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ইন্তেকাল পর্যন্ত তদনুযায়ী আমল করেন, অতঃপর উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর ইন্তেকাল পর্যন্ত তদনুযায়ী আমল করেন।

তাতে উল্লেখ ছিল: "পাঁচটি উটে একটি বকরী, দশটি উটে দুটি বকরী, পনেরোটি উটে তিনটি বকরী এবং বিশটি উটে চারটি বকরী দিতে হবে। পঁচিশটি উটে একটি 'বিনতে মাখাদ' (এক বছর বয়সের স্ত্রী উট) দিতে হবে পঁয়ত্রিশটি পর্যন্ত। যদি একটি বেড়ে যায় (অর্থাৎ ছত্রিশটি হয়), তবে পঁয়তাল্লিশটি পর্যন্ত একটি 'বিনতে লাবুন' (দুই বছর বয়সের স্ত্রী উট) দিতে হবে। যদি একটি বেড়ে যায় (অর্থাৎ ছেচল্লিশটি হয়), তবে ষাটটি পর্যন্ত একটি 'হিক্কাহ' (তিন বছর বয়সের স্ত্রী উট) দিতে হবে। যদি একটি বেড়ে যায় (অর্থাৎ একষট্টিটি হয়), তবে পঁচাত্তরটি পর্যন্ত একটি 'জাযআহ' (চার বছর বয়সের স্ত্রী উট) দিতে হবে। যদি একটি বেড়ে যায় (অর্থাৎ ছিয়াত্তরটি হয়), তবে নব্বইটি পর্যন্ত দুটি 'বিনতে লাবুন' দিতে হবে। যদি একটি বেড়ে যায় (অর্থাৎ একানব্বইটি হয়), তবে একশ বিশটি পর্যন্ত দুটি 'হিক্কাহ' দিতে হবে। উটের সংখ্যা এর চেয়ে বেশি হলে, প্রতি পঞ্চাশটিতে একটি 'হিক্কাহ' এবং প্রতি চল্লিশটিতে একটি 'বিনতে লাবুন' দিতে হবে।

আর বকরীর ক্ষেত্রে, একশ বিশটি পর্যন্ত প্রতি চল্লিশটি বকরীতে একটি বকরী যাকাত দিতে হবে। যদি একটার বেশি হয় (অর্থাৎ ১২১টি হয়), তবে দুইশ পর্যন্ত দুটি বকরী। যদি দুইশর চেয়ে একটা বেশি হয়, তবে তিনশ পর্যন্ত তিনটি বকরী। যদি বকরীর সংখ্যা এর চেয়ে বেশি হয়, তবে প্রতি একশ বকরীতে একটি বকরী দিতে হবে।

আর শতকে পৌঁছার পূর্বে তাতে (যাকাত দেওয়ার) কিছু নেই। যাকাত থেকে বাঁচার জন্য একত্র হওয়া পশুকে বিচ্ছিন্ন করা যাবে না এবং বিচ্ছিন্ন পশুকে একত্র করা যাবে না। আর যে সম্পদ দুই অংশীদারের সম্মিলিত, তারা উভয়ে নিজেদের মধ্যে সমানভাবে (যাকাতের বোঝা) ভাগ করে নেবে। যাকাতের জন্য বুড়ো বা ত্রুটিযুক্ত পশু নেওয়া যাবে না।"

তিনি (বর্ণনাকারী) বললেন: আর যুহরী বলেছেন, যখন যাকাত সংগ্রাহক আসবে, তখন বকরীকে তিন ভাগে বিভক্ত করা হবে: এক তৃতীয়াংশ খারাপ, এক তৃতীয়াংশ উত্তম এবং এক তৃতীয়াংশ মধ্যম মানের। অতঃপর যাকাত সংগ্রাহক মধ্যম মানের অংশ থেকে (যাকাত) নেবে। আর যুহরী গরুর কথা উল্লেখ করেননি।









আল-জামি` আল-কামিল (3838)


3838 - عن عَنْ عَلِيٍّ رضي الله عنه قَالَ زُهَيْرٌ: أَحْسَبُهُ عَن النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَنَّه قَالَ:"هَاتُوا رُبْعَ الْعُشُورِ مِنْ كُلِّ أَرْبَعِينَ دِرْهَمًا دِرْهَمٌ وَلَيْسَ عَلَيْكُمْ شَيْءٌ حَتَّى تَتِمَّ مِائَتَيْ دِرْهَمٍ فَإِذَا كَانَتْ مِائَتَيْ دِرْهَمٍ فَفِيهَا خَمْسَةُ دَرَاهِمَ، فَمَا زَادَ فَعَلَى حِسَابِ ذَلِكَ، وَفِي الْغَنَمِ فِي أَرْبَعِينَ شَاةً شَاةٌ، فَإِنْ لَمْ يَكُنْ إِلا تِسْعٌ وَثَلاثُونَ فَلَيْسَ عَلَيْكَ فِيهَا شَيْءٌ". وَسَاقَ صَدَقَةَ الْغَنَمِ مِثْلَ الزُّهْرِيِّ قَالَ:"وَفِي الْبَقَرِ فِي كُلِّ ثَلاثِينَ تَبِيعٌ، وَفِي الأَرْبَعِينَ مُسِنَّةٌ وَلَيْسَ عَلَى الْعَوَامِلِ شَيْءٌ وَفِي الإِبِلِ". فَذَكَرَ صَدَقَتَهَا كَمَا ذَكَرَ الزُّهْرِيُّ قَالَ:"وَفِي خَمْسٍ وَعِشْرِينَ خَمْسَةٌ مِن الْغَنَمِ، فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا ابْنَةُ مَخَاضٍ فَإِنْ لَمْ تَكُنْ بِنْتُ مَخَاضٍ فَابْنُ لَبُونٍ ذَكَرٌ إِلَى خَمْسٍ وَثَلاثِينَ، فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا بِنْتُ لَبُونٍ إِلَى خَمْسٍ وَأَرْبَعِينَ، فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً فَفِيهَا حِقَّةٌ طَرُوقَةُ الْجَمَلِ إِلَى سِتِّينَ". ثُمَّ سَاقَ مِثْلَ حَدِيثِ الزُّهْرِيِّ قَالَ:"فَإِذَا زَادَتْ وَاحِدَةً يَعْنِي وَاحِدَةً وَتِسْعِينَ فَفِيهَا حِقَّتَانِ طَرُوقَتَا الْجَمَلِ إِلَى عِشْرِينَ وَمِائَةٍ، فَإِنْ كَانَت الإِبْلُ أَكْثَر مِنْ ذَلِكَ فَفِي كُلِّ خَمْسِينَ حِقَّةٌ، وَلا يُفَرَّقُ بَيْنَ مُجْتَمِعٍ وَلَا يُجْمَعُ بَيْنَ مُفْتَرِقٍ خَشْيَةَ الصَّدَقَةِ، وَلا تُؤْخَذُ فِي الصَّدَقَةِ هَرْمَةٌ، وَلا ذَاتُ عَوَارٍ، وَلا تَيْسٌ إِلا أَنْ يَشَاءَ الْمُصَدِّقُ. وَفِي النَّبَاتِ مَا سَقَتْهُ الْأَنْهَارُ أَوْ سَقَت السَّمَاءُ الْعُشْرُ، وَمَا سَقَى الْغَرْبُ فَفَيهِ نِصْفُ الْعُشْرِ".

وَفِي حَدِيثِ عَاصِمٍ وَالْحَارِثِ:"الصَّدَقَةُ فِي كُلِّ عَامٍ". قَالَ زُهَيْرٌ: أَحْسَبُهُ قَالَ:"مَرَّةً".

وَفِي حَدِيثِ عَاصِمٍ:"إِذَا لَمْ يَكُنْ فِي الإِبِلِ ابْنَةُ مَخَاضٍ وَلا ابْنُ لَبُونٍ فَعَشَرَةُ دَرَاهِمَ أَوْ شَاتَانِ".

حسن: رواه أبو داود (1572) عن عبد الله بن محمد النّفيليّ، حدّثنا زهير، حدّثنا أبو إسحاق، عن عاصم بن حمزة، وعن الحارث الأعور، عن علي رضي الله عنه قال زهير: أحسبه عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال (فذكره).

وعاصم بن حمزة حسن الحديث، وقد تابعه الحارث الأعور.

وصحّحه ابن خزيمة (2270)، ولكنه لم يسم الحارث الأعور، وقال ابن القطان:"إسناده
صحيح، وكلّهم ثقات، ولا أعني رواية الحارث وإنما أعني رواية عاصم". انظر:"نصب الراية" (2/ 352).

إلا أن قوله:"وفي خمس وعشرين خمسةٌ من الغنم" شاذ، والصحيح أن في خمس وعشرين من الإبل بنت مخاض. كما أن قوله في آخر الحديث"إذا لم يكن في الإبل ابنة مخاض ولا ابن لبون فعشرة دراهم أو شاتان" فيه أيضا شذوذ.

قوله:"تبيع" قال أبو عبيد: تبيع ليس بسنّ، إنّما هو صفة، وإنّما سمّي تبيعًا إذا قوي على اتباع أمّه في الرّعي. وقال: إنه لا يقوى على اتباع أمّه في الرّعي إلا أن يكون حوليًّا -أي قد تمّ له حول". ذكره ابن خزيمة في"صحيحه" (4/ 20).

وأمّا ما رُوي:"فإذا زادتْ على عشرين ومائة، تردُّ الفرائض إلى أولها" أي تستأنف بها الفرائض فكلّها ضعيفة.

منها ما رُوي عن علي بن أبي طالب، رواه عنه عاصم بن حمزة:"إذا زادت الإبل على عشرين ومائة، فبحساب ذلك يستأنف بها الفرائض".

قال البيهقيّ: وقد أنكر أهل العلم هذا على عاصم بن حمزة؛ لأنّ رواية عاصم بن حمزة، عن علي خلاف كتاب آل عمرو بن حزم، وخلاف كتاب أبي بكر وعمر رضي الله عنهما.

وقال الشافعي في كتاب القديم:"راوي هذا مجهول عن علي، وأكثر الرواة عن ذلك المجهول يزعم الذي روى هذا عنه غلط عليه، وإن هذا ليس في حديثه".

قال البيهقي:"يريد قوله في الاستئناف. واستدل على هذا في كتاب آخر برواية من روى عن أبي إسحاق، عن عاصم، عن علي بخلاف ذلك".

ثم روى الشافعي عن شريك. والبيهقي عن زهير بن معاوية كلاهما عن أبي إسحاق، عن عاصم ابن حمزة، عن علي، قال:"إذا زادت الإبلُ على عشرين ومائة ففي كلّ خمسين حقّة، وفي كلّ أربعين بنت لبون. قال: وقال عمرو بن الهيثم وغيره عن شعبة، عن أبي إسحاق، عن عاصم، عن علي، مثله. قال الشافعي: وبهذا نقول، وهو موافق للسنة، وهم -يعني بعض العراقيين- لا يأخذون بهذا، فيخالفون ما روي عن النبيّ صلى الله عليه وسلم وأبي بكر وعمر رضي الله عنهما، والثابت عن علي رضي الله عنه عندهم إلى قول إبراهيم وشيء يغلط به عن علي رضي الله عنه". انتهى.

قلت: حديث زهير، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضمرة وعن الحارث الأعور، عن علي رضي الله عنه هو ما رواه أبو داود (1572) عن عبد الله بن محمد النّفيليّ، عن زهير، بإسناده مطوّلًا كما سبق.

ومنها ما رواه أبو داود في المراسيل (106) عن موسى بن إسماعيل، قال: قال حماد: قلت لقيس بن سعد: خذ لي كتاب محمد بن عمرو بن حزم، فأعطاني كتابًا أخبر أنه أخذه من أبي بكر
ابن محمد بن عمرو بن حزم أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كتبه لجدّه فقرأته، فكان فيه ذكر ما يخرج من فرائض الإبل، فقصَّ الحديث إلى أن تبلغ عشرين ومائة، فإذا كان أكثر من ذلك فعد في كلّ خمسين حقّة، وما فضل فإنه يعاد إلى أوّل فريضة الإبل، وما كان أقلّ من خمس وعشرين ففيه الغنم في كلّ خمس ذود شاة، ليس فيها ذكر ولا هرمة ولا ذات عوار من الغنم".

قال البيهقيّ (4/ 94):"وهذا منقطع بين أبي بكر بن حزم إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم، وقيس بن سعد أخذه عن كتاب لا عن سماع، وكذلك حماد بن سلمة، أخذه عن كتاب لا عن سماع، وقيس بن سعد وحماد بن سلمة، وإن كانا من الثقات فروايتهما هذه بخلاف رواية الحفّاظ عن كتاب عمرو بن حزم وغيره.

وحماد بن سلمة ساء حفظه في آخر عمره، فالحفّاظ لا يحتجّون بما يخالف فيه، ويتجنّبون ما ينفرد به عن قيس بن سعد خاصة وأمثاله، وهذا الحديث قد جمع الأمرين ما فيه من الانقطاع" انتهى.

وقال عبد الله بن أحمد بن حنبل:"سمعت أبي يقول: ضاع كتاب حماد بن سلمة، عن قيس بن سعد، فكان يحدّثهم من حفظه، فهذه قصّته". ذكره ابن عدي في"الكامل" (2/ 670).

قال حماد بن سلمة:"استعار مني حجاج الأحول كتاب قيس، فذهب إلى مكة، فقال: ضاع". انظر:"معرفة السنن والآثار" (3/ 29).

قال البيهقيّ:"وإذا كان حديث حماد، عن قيس بن سعد مرسلًا، وخالفه عدد، وفيهم ولد الرجل. والكتاب بالمدينة يتوارثونه بينهم فأخبروا بما وجدوا فيه، ويعرف عنه عمر بن عبد العزيز، وأمر بأن ينسخ له فوجد بخلاف ما رواه حماد عن قيس بن سعد موافقًا لما وجد في الكتاب الذي كان عند آل عمر بن الخطاب، موافقًا لما رواه سفيان بن حسين موصولًا، موافقًا لما رواه ثمامة بن عبد الله موصولًا، إنما يدلّك كلّ هذا على خطأ تلك الرواية التي قد انفردت عن سائر تلك الروايات وأن الأخذ بغيرها أولى". انظر:"معرفة السنن والآثار" (6/ 29 - 30).




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। যুহায়র (বর্ণনাকারী) বলেন, আমার মনে হয় এটি নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণিত যে, তিনি বলেছেন:

তোমরা যাকাত দাও— (প্রতি চল্লিশ দিরহামে এক দিরহাম)— যা হচ্ছে (সম্পদের) দশমাংশের এক চতুর্থাংশ। দুইশ দিরহাম পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত তোমাদের উপর কিছু আবশ্যক নয়। যখন তা দুইশ দিরহাম হবে, তখন তাতে পাঁচ দিরহাম যাকাত দিতে হবে। এরপর যা বাড়বে, তা সেই হিসেবেই দিতে হবে। আর বকরির ক্ষেত্রে, চল্লিশটি বকরিতে একটি বকরি (যাকাত)। যদি ঊনচল্লিশটি থাকে, তবে তাতে তোমার উপর কিছু আবশ্যক নয়। এরপর তিনি যুহরি বর্ণিত বকরির যাকাত প্রদানের বিধান উল্লেখ করলেন। তিনি বলেন: গরুর ক্ষেত্রে, প্রতি ত্রিশটিতে একটি তাবি' (এক বছর বয়সের বাছুর), এবং চল্লিশটিতে একটি মুসিন্নাহ (দুই বছর বয়সের গাভী)। কর্মক্ষম পশুর উপর কিছু আবশ্যক নয়। এবং উটের ক্ষেত্রে। তিনি যুহরি যেভাবে বর্ণনা করেছেন, সেভাবেই এর যাকাতের পরিমাণ উল্লেখ করেছেন। তিনি বলেন: পঁচিশটি উটে পাঁচটি বকরি। যদি একটি বাড়ে, তবে তাতে একটি বিনতে মাখাদ (এক বছর বয়সী মাদী উট)। যদি বিনতে মাখাদ না থাকে, তবে পঁয়ত্রিশটি পর্যন্ত একটি ইবনে লাবুন যাকার (দুই বছর বয়সী মদ্দা উট)। যদি একটি বাড়ে, তবে পঁয়তাল্লিশটি পর্যন্ত একটি বিনতে লাবুন (দুই বছর বয়সী মাদী উট)। যদি একটি বাড়ে, তবে ষাটটি পর্যন্ত একটি হিক্কাহ (তিন বছর বয়সী মাদী উট যা প্রজননের উপযুক্ত)। এরপর তিনি যুহরি বর্ণিত হাদিসের অনুরূপ বর্ণনা করেন। তিনি বলেন: যখন একটি বাড়ে অর্থাৎ একানব্বইটি হয়, তখন একশ বিশটি পর্যন্ত তাতে দু'টি হিক্কাহ (যা প্রজননের উপযুক্ত)। যদি উট এর চেয়ে বেশি হয়, তবে প্রতি পঞ্চাশটিতে একটি হিক্কাহ। যাকাত এড়ানোর উদ্দেশ্যে একত্রে থাকা পালকে বিচ্ছিন্ন করা যাবে না এবং বিচ্ছিন্ন পালকে একত্রিত করা যাবে না। যাকাত হিসেবে বার্ধক্যজনিত দুর্বল পশু, ত্রুটিযুক্ত পশু এবং ছাগল বা বকরির মদ্দা জাত (পাঠা) নেওয়া হবে না, যদি না যাকাত আদায়কারী নিজেই তা চায়। আর ফসলের ক্ষেত্রে, যা নদী দ্বারা সিক্ত হয় অথবা আকাশ (বৃষ্টি) দ্বারা সিক্ত হয়, তাতে দশমাংশ (উশর) এবং যা সেচযন্ত্র দ্বারা সিক্ত হয়, তাতে অর্ধ-দশমাংশ (নিসফু'ল উশর) যাকাত ধার্য হবে।

আ’সিম ও হারিসের হাদিসে রয়েছে: "প্রতি বছর যাকাত দিতে হবে।" যুহায়র বলেছেন: আমার মনে হয় তিনি বলেছেন: "একবার।"

আর আ’সিমের হাদিসে রয়েছে: "যদি উটের মধ্যে বিনতে মাখাদ কিংবা ইবনে লাবুন না থাকে, তাহলে দশ দিরহাম অথবা দু'টি বকরি দিতে হবে।









আল-জামি` আল-কামিল (3839)


3839 - عن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن أبيه، عن جدّه: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كتب إلى أهل اليمن بكتاب فيه الفرائض والسُّنن والدِّيات، وبعث به مع عمرو ابن حزم، فقرئت على أهل اليمن، وهذه نسختها:"من محمد النبي صلى الله عليه وسلم إلى شرحبيل بن عبد كلال، والحارث بن عبد كلال، ونعيم بن عبد كلال، قيل ذي رُعَينٍ ومعافر وهمدان: أمّا بعد، فقد رجع رسولكم، وأعطيتم من الغنائم خُمس الله، وما كتب الله على المؤمنين من العشر في العقار، وما سقت السَّماء أو كان سَيْحًا أو بَعْلا، ففيه العُشْر إذا بلغ خمسة أوسق، وما سقي بالرَّشاء، والدَّالية، ففيه نصف العشر إذا بلغ خمسة أوسق. وفي كلّ خمس من الإبل سائمة شاة إلى أن تبلغ أربعًا وعشرين، فإذا زادتْ واحدة على أربع وعشرين ففيها ابنة مخاض، فإن لم
توجد بنت مخاض، فابن لبون ذكر إلى أن تبلغ خمسًا وثلاثين، فإذا زادتْ على خمس وثلاثين، ففيها ابنة لبون إلى أن تبلغ خمسا وأربعين، فإذا زادتْ على خمس وأربعين، ففيها حقة طروقة إلى أن تبلغ ستين، فإن زادت على ستين واحدة، ففيها جذعة إلى أن تبلغ خمسة وسبعين، فإن زادت على خمس وسبعين واحدة، ففيها ابنتا لبون إلى أن تبلغ تسعين، فإن زادت على تسعين واحدة، ففيها حقّتان طروقتا الجمل، إلى أن تبلغ عشرين ومائة، فما زاد ففي كلّ أربعين ابنة لبون، وفي كلّ خمسين حقة طروقة الجمل، وفي كلّ ثلاثين باقورة بقرة. وفي كلّ أربعين شاة سائمة شاة إلى أن تبلغ عشرين ومائة، فإن زادتْ على عشرين واحدة، ففيها شاتان إلى أن تبلغ مئتين، فإن زادت واحدة، فثلاثة شياه إلى أن تبلغ ثلاث مائة، فما زاد ففي كل مائة شاة شاة. ولا تؤخذ في الصّدقة هرمة، ولا عجفاء، ولا ذات عوار، ولا تيس الغنم، ولا يجمع بين متفرق، ولا يفرق بين مجتمع خيفة الصّدقة، وما أخذ من الخليطين، فإنّهما يتراجعان بينهما بالسّوية. وفي كل خمس أواق من الورق خمسة دراهم، فما زاد ففي كلّ أربعين درهمًا درهم، وليس فيها دون خمس أواق شيء، وفي كلِّ أربعين دينارا دينار. وإنَّ الصَدقةَ لا تحل لمحمّد ولا لأهل بيته، وإنّما هي الزّكاة تزكي بها أنفسهم في فقراء المؤمنين، أو في سبيل الله. وليس في رقيق ولا مزرعة ولا عمالها شيء، إذا كانت تؤدى صدقتها من العشر. وليس في عبد المسلم ولا فرسه شيء. وإنّ أكبر الكبائر عند الله يوم القيامة الإشراك بالله، وقتل النفس المؤمنة بغير الحق، والفرار في سبيل الله يوم الزحف، وعقوق الوالدين، ورمي المحصنة، وتعلّم السّحر، وأكل الربا، وأكل مال اليتيم. وإنّ العمرة الحج الأصغر. ولا يمسُّ القرآن إلا طاهر. ولا طلاق قبل إملاك، ولا عتق حتى يبتاع. ولا يصلينَّ أحدكم في ثوب واحد ليس على منكبه منه شيء، ولا يحتبين في ثوب واحد ليس بينه وبين السماء شيء، ولا يصلين أحدكم في ثوب واحد وشقه باد. ولا يصلين أحدكم عاقصا شعره. وإنّ من اعتبط مؤمنا قتلا عن بينة، فهو قود إلا أن يرضى أولياء المقتول. وإنَّ في النفس الدية مائة من الإبل، وفي الأنف إذا أوعب جدعه الدّية، وفي اللسان الدّية، وفي الشفتين الدية، وفي البيضتين الدية، وفي الذّكر الدّية، وفي الصّلب الدية، وفي العينين الدّية، وفي الرّجل الواحدة نصف الدية، وفي المأمومة ثلث الدّية، وفي الجائفة ثلث الدية، وفي المنقلة خمس عشرة من الإبل، وفي كل أصبع من الأصابع من اليد والرجل عشر من الإبل، وفي السن
خمس من الإبل، وفي الموضحة خمس من الإبل، وإنّ الرجل يقتل بالمرأة، وعلى أهل الذهب ألف دينار".

صحيح وجادة: رواه ابن حبان (6559) -واللّفظ له-، والحاكم (1/ 395 - 396)، والبيهقيّ (4/ 89) مطوّلًا.

ورواه النسائي (4853)، والدّارميّ (1661، 1668، 1675) مختصرًا متقطّعًا -كلّهم من طرق عن الحكم بن موسى، ثنا يحيى بن حمزة، عن سليمان بن داود، حدّثني الزّهريّ، عن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن أبيه، عن جدّه، فذكره.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح كبير مفسر في هذا الباب يشهد له أمير المؤمنين عمر بن عبد العزيز، وأقام العلماءُ في عصره محمّد بن مسلم الزّهريّ بالصّحة كما تقدم ذكري له، وسليمان بن داود الدّمشقيّ الخولانيّ معروف بالزّهريّ، وإن كان يحيى بن معين غمزه فقد عدله غيره.

كما أخبرنيه أبو أحمد الحسين بن علي، ثنا عبد الرحمن بن أبي حاتم، قال: سمعت أبي وسئل عن حديث عمرو بن حزم في كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم الذي كتبه له في الصدقات، فقال: سليمان بن داود الخولاني عندنا ممن لا بأس به، قال أبو محمد بن أبي حاتم: وسمعت أبا زرعة يقول ذلك". وقال:"هو قواعد الإسلام" انتهى.

ونقل ابن الجوزيّ في"التحقيق" (3/ 11)، والبيهقيّ في"السنن" (4/ 90) عن الإمام أحمد أنه سئل عن حديث الصّدقات الذي يرويه يحيى بن حمزة أصحيح؟ فقال:"أرجو أن يكون صحيحًا".

قال البيهقيّ:"وقد أثنى جماعة من الحفّاظ على سليمان بن داود الخولاني منهم: أحمد بن حنبل، وأبو حاتم، وأبو زرعة الرّازيان، وعثمان بن سعيد الدّارميّ، وابن عدي الحافظ، قال: وحديثه هذا يوافق رواية من رواه مرسلًا، ويوافق رواية من رواه من جهة أنس بن مالك وغيره موصولًا".

قلت: هذا كله بناء على أنّ سليمان اسم أبيه داود وهو الخولانيّ، ولكن رواه النسائي (4854) من وجه آخر من طريق محمد بن بكار بن بلال قال: حدّثنا يحيي، حدّثنا سليمان بن أرقم، قال: حدثني الزهري، عن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن أبيه، عن جدّه، فذكره مختصرًا.

قال النسائي:"وهذا أشبه بالصّواب، وسليمان بن أرقم متروك الحديث، وقد روي هذا الحديث يونس عن الزهري مرسلًا". انتهى.

قلت: هذا الذي قاله كثير من الأئمة، ووهّموا فيه الحكم بن موسى، فقالوا: غلط في اسم أبي سليمان، فقال: داود، والصحيح: إنه أرقم. نبّه على ذلك أبو داود في مراسيله (247).

وقد تردّد أبو حاتم في أوّل الأمر فقال:"لا أدري أيّهما هو، ثم قال: وما أظن أنه هذا الدمشقي (يعني سليمان بن داود الخولانيّ الدّمشقيّ) ويقال: إنّهم أصابوا هذا الحديث بالعراق من حديث سليمان بن أرقم"."العلل" (1/ 222).
وخلاصة القول في حديث أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن أبيه، عن جدّه، أنه دائر بين ضعيف وإرسال، فإنّ المرفوع فيه سليمان بن أرقم أهل العلم مطبقون على تضعيفه؛ فالصّواب فيه أنه منقطع.

قال الزّهريّ:"جاءني أبو بكر بن حزم بكتاب في رقعة أدم عن رسول الله صلى الله عليه وسلم". فذكر بعض نصوص الكتاب في الديات.

رواه النسائي (4856) عن أحمد بن عبد الواحد، حدّثنا مروان بن محمد، قال: حدّثنا سعيد (وهو ابن عبد العزيز)، عن الزهريّ، فذكره.

وقد يرى البيهقيّ أن نصّ الكتاب الذي رواه داود بن سليمان (أو ابن أرقم) يوافق ما رواه غيره مرسلًا إلا أني لم أقف على نصّ الكتاب كاملًا من رواية من رواه مرسلًا. فإذا صحّ قول البيهقيّ فمن خالف شيئًا من هذا النّص فهو شاذ أو منكر.

والخلاصة فيه أنّ العلماء قبلوا كتاب أبي بكر بن حزم -سواء كان مرفوعًا أو مرسلًا-، وهو يوافق أيضًا كتاب أبي بكر الصّديق رضي الله عنه كما قال البيهقيّ.

قال الزّيلعيّ في"نصب الراية" (2/ 342):"وقال بعضُ الحفَّاظ من المتأخِّرِينَ: وَنُسْخَةُ كتاب عمرو بن حزم تَلَقَّاها الأئمَّةُ الأربعة بالقبُول، وهي مُتَوَارَثَةٌ، كَنُسخَةِ عمرو بن شُعَيب عن أَبيه عن جَدِّه، وهي دائرة على سُليمان بن أرقم، وسليمان بن أَبِي دَاوُد الخولانيِّ عن الزّهريِّ، عن أبي بكر ابن محمَّد بن عمرو بن حزم، عن أَبِيه، عن جدِّه، وكلاهما ضعيف، بل المرجّح في روايتِهما سليمان بن أرقم، وهو مترُوك، لكن قَالَ الشَّافعيّ رضي الله عنه في"الرّسالة":"لم يَقبلوه حتَّى ثَبَت عندهم أنَّه كتاب رَسُولِ الله صلى الله عليه وسلم". وقال أحمد رضي الله عنه:"أرجو أن يكون هذا الحَدِيث صحيحًا". وقال يعقوب بن سفيان الفسويُّ:"لا أعلم في جميع الكتب المنقولة أصحّ منه، كان أصحاب النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم والتّابعون يرجعون إلَيْهِ، ويدعون آرَاءَهُم". انتهى.

قلت: وفي الباب أيضًا عن أبي ذرّ مرفوعًا:"في الإبلِ صدقتها، وفي الغنم صدقتها، وفي البقر صدقتُها، وفي البز أو تبر صدقته".

وهو حديث ضعيف، ينظر تخريجه في باب العروض التي للتجارة فيها زكاة.




আমর ইবন হাযম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ইয়ামানবাসীদের কাছে একটি চিঠি লিখেছিলেন, যাতে ফরযসমূহ, সুন্নাতসমূহ এবং দিয়াত (রক্তপণ/ক্ষতিপূরণ) সংক্রান্ত বিধানাবলী ছিল। তিনি তা আমর ইবন হাযমকে দিয়ে প্রেরণ করেন। সেটি ইয়ামানবাসীদের সামনে পাঠ করা হয়। আর এটিই হলো তার অনুলিপি:

"আল্লাহর নবী মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে শারাহবিল ইবন আবদ কুলাল, আল-হারিস ইবন আবদ কুলাল এবং নুআইম ইবন আবদ কুলাল, যু রু’আইন, মা‘আফির ও হামদান গোত্রের নেতাদের প্রতি।

অতঃপর, তোমাদের দূত ফিরে এসেছে। তোমরা গনীমাতের সম্পদ থেকে আল্লাহর জন্য নির্দিষ্ট এক-পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রদান করেছ। আল্লাহ মুমিনদের উপর স্থাবর সম্পত্তির উপর যে উশর (দশমাংশ) ফরয করেছেন—যা আসমানী পানি, প্রবাহিত পানি বা শিকড় দ্বারা সিক্ত হয়, তাতে উশর (দশ ভাগের এক ভাগ) দিতে হবে, যদি তা পাঁচ ওয়াসাক পরিমাণ হয়। আর যা সেচের দড়ি (রিশা) বা ডালিয়া (বিশেষ সেচ যন্ত্র) দ্বারা সিক্ত হয়, তাতে নিসফে উশর (বিশ ভাগের এক ভাগ) দিতে হবে, যদি তা পাঁচ ওয়াসাক পরিমাণ হয়।

প্রত্যেক পাঁচ থেকে চব্বিশটি বিচরণশীল উটের উপর একটি বকরী যাকাত ফরয। যখন চব্বিশের চেয়ে একটিও বেশি হবে, তখন তাতে দিতে হবে বিনতে মাখাদ (এক বছর পূর্ণ হওয়া উটনী)। যদি বিনতে মাখাদ পাওয়া না যায়, তবে ইবনু লাবুন যাকার (দু’বছর পূর্ণ হওয়া উট) দিতে হবে, পঁয়ত্রিশ পর্যন্ত। যখন পঁয়ত্রিশের চেয়ে বেশি হবে, তখন তাতে বিনতে লাবুন (দু’বছর পূর্ণ হওয়া উটনী) দিতে হবে, পঁয়তাল্লিশ পর্যন্ত। যখন পঁয়তাল্লিশের চেয়ে বেশি হবে, তখন তাতে হিক্কাহ্ (তিন বছর পূর্ণ হওয়া উটনী, যা প্রজননের উপযুক্ত) দিতে হবে, ষাট পর্যন্ত। যদি ষাটের চেয়ে একটিও বেশি হয়, তখন তাতে জাযআহ্ (চার বছর পূর্ণ হওয়া উটনী) দিতে হবে, পঁচাত্তর পর্যন্ত। যদি পঁচাত্তরের চেয়ে একটিও বেশি হয়, তখন তাতে দু’টি বিনতে লাবুন দিতে হবে, নব্বই পর্যন্ত। যদি নব্বইয়ের চেয়ে একটিও বেশি হয়, তখন তাতে হিক্কাহ্ (প্রজননের উপযুক্ত) দু’টি উটনী দিতে হবে, একশত বিশ পর্যন্ত। এরপর যা বেশি হবে, তাতে প্রতি চল্লিশটিতে একটি বিনতে লাবুন, এবং প্রতি পঞ্চাশটিতে একটি হিক্কাহ্ (প্রজননের উপযুক্ত) দিতে হবে।

আর প্রতি ত্রিশটি গাভীর উপর একটি গরু (বাছুর)।

আর প্রত্যেক চল্লিশটি বিচরণশীল মেষের উপর একটি মেষ দিতে হবে, একশত বিশ পর্যন্ত। যদি একশত বিশের চেয়ে একটিও বেশি হয়, তবে তাতে দু’টি মেষ দিতে হবে, দু’শত পর্যন্ত। যদি একটিও বেশি হয়, তবে তাতে তিনটি মেষ দিতে হবে, তিনশত পর্যন্ত। এরপর যা বেশি হবে, তাতে প্রতি একশত মেষের উপর একটি মেষ দিতে হবে।

যাকাত হিসাবে অতি বুড়ো, দুর্বল, রোগগ্রস্ত এবং বকরীর পাঠা (যা পাল বৃদ্ধির জন্য রাখা হয়) নেওয়া যাবে না। যাকাতের ভয়ে বিচ্ছিন্ন পালকে একত্রিত করা যাবে না এবং একত্রিত পালকে বিচ্ছিন্ন করা যাবে না। আর যদি দুই অংশীদারের কাছ থেকে যাকাত নেওয়া হয়, তবে তারা উভয়ে সমানভাবে একে অপরের সাথে (পশুর মূল্য) হিসেব করে নেবে।

প্রত্যেক পাঁচ উকিয়া রূপার উপর পাঁচটি দিরহাম যাকাত ফরয। এরপর যা বেশি হবে, প্রতি চল্লিশ দিরহামের উপর এক দিরহাম দিতে হবে। পাঁচ উকিয়ার চেয়ে কমে কোনো যাকাত নেই। আর প্রত্যেক চল্লিশ দীনারের উপর এক দীনার যাকাত ফরয।

নিশ্চয় যাকাত মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য এবং তার আহলে বাইতের (পরিবারের) জন্য হালাল নয়। বরং তা এমন একটি যাকাত যার দ্বারা মুমিনগণ তাদের দরিদ্র মুমিনদের বা আল্লাহর পথে নিজেদের পবিত্র করে।

ক্রীতদাস, কৃষিক্ষেত্র ও তার শ্রমিকদের উপর কোনো যাকাত নেই, যদি তার ফসলের যাকাত (উশর) আদায় করা হয়। মুসলিমের ক্রীতদাস এবং তার ঘোড়ার উপর কোনো যাকাত নেই।

আর নিশ্চয় কিয়ামতের দিন আল্লাহর নিকট সবচেয়ে বড় কবীরা গুনাহ হলো আল্লাহর সাথে শরীক করা, অন্যায়ভাবে মুমিন ব্যক্তিকে হত্যা করা, যুদ্ধের দিন আল্লাহর পথে (শত্রুর মোকাবেলায়) পিঠ ফিরিয়ে পালিয়ে যাওয়া, পিতা-মাতার অবাধ্যতা, সতী নারীর উপর অপবাদ আরোপ করা, যাদু শিক্ষা করা, সূদ খাওয়া এবং ইয়াতীমের সম্পদ ভক্ষণ করা।

আর নিশ্চয় উমরা হলো ছোট হজ্ব। পবিত্র ব্যক্তি ব্যতীত অন্য কেউ কুরআন স্পর্শ করবে না।

মালিকানা লাভ করার আগে তালাক নেই, এবং ক্রয় করার আগ পর্যন্ত মুক্তি দেওয়া নেই।

তোমাদের কেউ যেন এমন এক কাপড়ে সালাত আদায় না করে যার কোনো অংশ তার কাঁধের উপর নেই। আর সে যেন এমন এক কাপড়ে ইহতেরা (আঁটু গেঁথে বসা) না করে যার সাথে আসমানের মাঝে কোনো কিছু অন্তরায় না থাকে (অর্থাৎ লজ্জাস্থান প্রকাশ পায়)। আর তোমাদের কেউ যেন এমন এক কাপড়ে সালাত আদায় না করে যাতে তার লজ্জাস্থান খোলা থাকে।

তোমাদের কেউ যেন চুলের খোঁপা বেঁধে সালাত আদায় না করে।

নিশ্চয় যে ব্যক্তি কোনো মুমিনকে সাক্ষ্যপ্রমাণ দ্বারা অন্যায়ভাবে হত্যা করবে, তাকে কিসাস (প্রতিশোধ) হিসাবে হত্যা করা হবে, যদি না নিহত ব্যক্তির উত্তরাধিকারীগণ সন্তুষ্ট হয়।

আর নিশ্চয় প্রাণের ক্ষতিপূরণ (দিয়াত) হলো একশত উট। নাক সম্পূর্ণ কেটে ফেললে তার ক্ষতিপূরণ পূর্ণ দিয়াত। জিহ্বার ক্ষতিপূরণ পূর্ণ দিয়াত। দু’টি ঠোঁটের ক্ষতিপূরণ পূর্ণ দিয়াত। দু’টি অণ্ডকোষের ক্ষতিপূরণ পূর্ণ দিয়াত। পুরুষাঙ্গের ক্ষতিপূরণ পূর্ণ দিয়াত। মেরুদণ্ডের ক্ষতিপূরণ পূর্ণ দিয়াত। দু’টি চোখের ক্ষতিপূরণ পূর্ণ দিয়াত। একটি পায়ের ক্ষতিপূরণ অর্ধেক দিয়াত। মাথার খুলি ভেদকারী ক্ষতের (মা’মূমাহর) ক্ষতিপূরণ এক-তৃতীয়াংশ দিয়াত। পেট বা পিঠের গভীর ক্ষতের (জা’ইফাহর) ক্ষতিপূরণ এক-তৃতীয়াংশ দিয়াত। অস্থি স্থানচ্যুতকারী ক্ষতের (মুনাক্কিলাহর) ক্ষতিপূরণ পনেরোটি উট। হাত ও পায়ের প্রত্যেকটি আঙ্গুলের ক্ষতিপূরণ দশটি করে উট। দাঁতের ক্ষতিপূরণ পাঁচটি উট। যে ক্ষতে হাড্ডি দেখা যায় (মাওদিহাহ), তার ক্ষতিপূরণ পাঁচটি উট। নিশ্চয় পুরুষের বদলে নারীকে হত্যা করা হবে। আর স্বর্ণের (অধিকারীদের) উপর এক হাজার দীনার (দিয়াত) ধার্য করা হলো।"









আল-জামি` আল-কামিল (3840)


3840 - عن معاذ بن جبل، قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى اليمن، وأمرني أن آخذ من البقر من كلّ أربعين مسنّة، ومن كلّ ثلاثين تبيعًا أو تبيعة.

صحيح: رواه أبو داود (1576)، والترمذي (623)، والنسائي (2455)، وابن ماجه (1803) كلّهم من طرق عن الأعمش، عن شقيق، عن مسروق، عن معاذ بن جبل، فذكره.
وصحّحه ابن خزيمة (226)، وابن حبان (4886)، والحاكم (1/ 398) وقال:"صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه".

وزاد بعضهم:"ومن كل حالم -يعني محتلمًا- دينارًا أو عدله من المعافر -ثياب تكون باليمن".

وقع خلاف بين أهل العلم في إدراك مسروق لمعاذ، فالذي عليه المحقّقون أنّه أدركه.

قال ابن عبد البر في"التمهيد" (2/ 275):"قد رُوي هذا الخبر عن معاذ بإسناد متصل صحيح ثابت، ذكره عبد الرزاق، حدثنا معمر والثوري عن الأعمش، عن أبي وائل، عن مسروق، عن معاذ".

قلت: مسروق هو ابن الأجدع الهمدانيّ، وهو ممن يروي عن أبي بكر رضي الله عنه الذي توفي سنة ثلاث عشرة، ومعاذ بن جبل توفي سنة ثمان عشرة، وقد أطال الحافظ في"التلخيص" فراجعه.

ويؤيده ما رواه مالك موقوفًا على معاذ في الزكاة (24) عن حميد بن قيس المكيّ، عن طاوس اليمانيِّ، أنّ معاذ بن جبل الأنصاريّ أخذ من ثلاثين بَقَرَةً تَبِيعًا ومن أربَعين بقرة مُسِنَّةً وأتي بما دون ذلك فأَبَى أن يأخذ منه شَيْئًا وَقَال:"لم أَسمع من رسول الله صلى الله عليه وسلم فيه شيئًا حتَّى أَلْقَاهُ فأسأَله". فتوفِّي رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل أن يقدم معاذ بن جبل.

قال ابن عبد البر:"ظاهر هذا الحديث الوقوف على معاذ بن جبل من قوله، إلّا أنّ في قوله: أنه لم يسمع من النبيّ صلى الله عليه وسلم فيما دون الثلاثين والأربعين من البقر شيئًا دليلًا واضحًا على أنه قد سمع منه عليه السلام في الثلاثين وفي الأربعين ما عمل به في ذلك، مع أن مثله لا يكون رأيًا إنّما هو توقيف ممن أمر بأخذ الزكاة من الذين يطّهرهم ويزكّيهم بها صلى الله عليه وسلم.

ولا خلاف بين العلماء أنّ السنة في زكاة البقر ما في حديث معاذ هذا وأنه النّصاب المجتمع عليه فيها. وحديث طاوس هذا عندهم عن معاذ غير متصل والحديث عن معاذٍ ثابتٌ متصّل من رواية معمر والثوري، عن الأعمش، عن أبي وائل، عن مسروق، عن معاذ بمعنى حديث مالك"."الاستذكار" (9/ 157).

قلت: وقد رُوي أيضًا مثله عن ابن مسعود مرفوعًا:"في ثلاثين من البقر تبيع أو تبيعة، وفي كلّ أربعين مسنّة". ولكن فيه انقطاع وضعف.

رواه الترمذيّ (622)، وابن ماجه (1804) كلاهما من حديث عبد السلام بن حرب، عن خُصيف، عن أبي عبيدة، عن عبد الله، فذكره.

قال الترمذي: هكذا رواه عبد السلام بن حرب، عن خصيف، وعبد السلام ثقة حافظ، وروى شريك هذا الحديث عن خُصيف، عن أبي عبيدة، عن أبيه، عن عبد الله، وأبو عبيدة بن عبد الله لم يسمع من عبد الله"يعني أبيه".

قلت: وفيه خصيف وهو ابن عبد الرحمن الجزري ضعّفه الإمام أحمد، وقال أبو حاتم: صالح يخلط، وتكلّم في سوء حفظه، وقال ابن حبان: كان شيخًا صالحًا، فقيهًا عابدًا إلّا أنه كان يخطئ
كثيرًا فيما يروي، ويتفرّد عن المشاهير بما لا يتابع عليه، وهو صدوق في روايته.

ومن طريقه أخرجه الإمام أحمد (3905) بأطول من هذا.

وفي الباب أيضًا عن ابن عباس قال:"لما بعث النبيُّ صلى الله عليه وسلم معاذًا إلى اليمن أمره أن يأخذ من البقر من كلّ ثلاثين تبيعًا أو تبيعة، جذعًا أو جذعة، ومن كلّ أربعين بقرة بقرة مسنّة".

رواه البزّار (892)، والدّارقطنيّ (1928) من طريق بقية، حدثني المسعوديّ، عن الحكم، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.

قال الحافظ ابن حجر في"التلخيص":"وهذا موصول، ولكن المسعوديّ اختلط، وتفرّد بوصله عنه بقية بن الوليد، وقد رواه الحسن بن عمارة، عن الحكم، ولكن الحسن ضعيف" انتهى.

وقال البزّار:"إنّما يرويه الحفاظ عن الحكم، عن طاوس مرسلًا. ولم يتابع بقية على هذا أحد. ورواه الحسن بن عمارة، عن الحكم، عن طاوس، عن ابن عباس، والحسن لا يحتجُّ بحديثه إذا تفرّد".

والخلاصة في هذا الباب أنه لا خلاف بين أهل العلم أن السّنة في زكاة البقر على ما جاء في حديث معاذ هذا، وأنه النصاب المجمع عليه فيها.

وفيه ردٌّ على ابن جرير الطّبريّ الذي ادّعى الإجماع المتيقن المقطوع به أن في كلّ خمسين بقرة بقرة، ولم يرد في حديث صحيح ولا في حديث ضعيف في كلّ خمسين بقرة بقرة، وإنما الصّحيح الذي لا خلاف فيه أنّ في كلّ أربعين مسنّة، وفي كلّ ثلاثين تبيعة. كما في حديث معاذ بن جبل، فيجب الأخذ به.

وقوله:"تبيعًا" وهي ما دخل في الثانية، وسمي تبيعًا لأنه فطم عن أمِّه، فهو يتبعها.

وقوله:"مسنّة" وهي ما دخلتْ في الثالثة، وقيل: الرابعة.

وأمّا في أوقاص البقر، فروي عن معاذ بن جبل قال:"لم يأمرني رسول الله صلى الله عليه وسلم في أوقاص البقر شيئًا" فهو مرسل.

رواه الإمام أحمد (22010)، والطبراني في"الكبير" (20/ (348) كلاهما من حديث حماد ابن زيد، حدّثنا عمرو بن دينار، عن طاوس، عن معاذ بن جبل، فذكره.

وطاوس لم يدرك معاذًا (كما في"المراسيل لابن أبي حاتم" (99" ولذا أخرجه أبو داود في"المراسيل" (107) من وجه آخر عن طاوس قال:"إنّ معاذًا أتى باليمن" فذكره وزاد فيه:"والعسل".

وأمّا ما رواه الدّارقطنيّ (2/ 94) من طريق طاوس، عن ابن عباس، قال:"لما بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم معاذًا إلى اليمن". فذكره، ففيه الحسن بن عمارة ضعيف جدًّا.

والوقص في الزّكاة ما بين النّصابين.




মুআয ইবনে জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে ইয়েমেনে প্রেরণ করলেন এবং আমাকে আদেশ করলেন যে, আমি যেন গরু (গবাদি পশু) থেকে প্রতি চল্লিশটিতে একটি 'মুসিন্না' এবং প্রতি ত্রিশটিতে একটি 'তাবী' অথবা 'তাবীআ' (যাকাত হিসেবে) গ্রহণ করি।