হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3841)


3841 - عن أنس، أَنَّ أَبَا بَكْرٍ رضي الله عنه كَتَبَ لَهُ هَذَا الْكِتَابَ لَمَّا وَجَّهَهُ إِلَى الْبَحْرَيْنِ:"بِسْمِ اللهِ الرَّحْمَنِ الرِّحِيمِ هَذِهِ فَرِيضَةُ الصَّدَقَةِ الَّتِي فَرَضَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَلَى الْمُسْلِمِينَ وَالَّتِي أَمَرَ اللهُ بِهَا رَسُولَهُ فَمَنْ سُئِلَهَا مِن الْمُسْلِمِينَ عَلَى وَجْهِهَا فَلْيُعْطِهَا وَمَنْ سُئِلَ فَوْقَهَا فَلا يُعْطِ …".

وجاء فيه:"وَفِي صَدَقَةِ الْغَنَمِ فِي سَائِمَتِهَا إِذَا كَانَتْ أَرْبَعِينَ إِلَى عِشْرِينَ وَمِائَةٍ شَاةٌ، فَإِذَا زَادَتْ عَلَى عِشْرِينَ وَمِائَةٍ إِلَى مِائَتَيْنِ شَاتَانِ، فَإِذَا زَادَتْ عَلَى مِائَتَيْنِ إِلَى ثَلاثِ مِائَةٍ فَفِيهَا ثَلاثُ شِيَاهٍ، فَإِذَا زَادَتْ عَلَى ثَلاثِ مِائَةٍ فَفِي كُلِّ مِائَةٍ شَاةٌ، فَإِذَا كَانَتْ سَائِمَةُ الرَّجُلِ نَاقِصَةً مِنْ أَرْبَعِينَ شَاةً وَاحِدَةً فَلَيْسَ فِيهَا صَدَقَةٌ إِلا أَنْ يَشَاءَ رَبُّهَا وَفِي الرِّقَّةِ رُبْعُ الْعُشْرِ، فَإِنْ لَمْ تَكُنْ إِلا تِسْعِينَ وَمِائَةً فَلَيْسَ فِيهَا شَيْءٌ إِلا أَنْ يَشَاءَ رَبُّهَا".

صحيح: رواه البخاريّ في الزّكاة (1454) عن محمد بن عبد الله بن المثنى الأنصاريّ، قال: حدثني أبي، قال: حدثني ثمامة بن عبد الله بن أنس، أنّ أنسًا حدّثه، أنّ أبا بكر كتب له الكتاب، فذكره.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন তাঁকে বাহরাইনে প্রেরণ করেন, তখন তিনি তাঁর (আনাসের) জন্য এই পত্রটি লিখেছিলেন: "বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম। এটি হলো সাদাকার (যাকাতের) সেই ফরয বিধান যা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলমানদের ওপর ফরয করেছেন এবং যা আল্লাহ তা‘আলা তাঁর রাসূলকে (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নির্দেশ দিয়েছেন। অতএব, কোনো মুসলমানের কাছে যদি নিয়ম অনুযায়ী এটি (যাকাত) চাওয়া হয়, তবে সে যেন তা প্রদান করে। আর যার কাছে তার (নির্ধারিত পরিমাণের) চেয়ে বেশি চাওয়া হয়, সে যেন তা প্রদান না করে..."।

এবং তাতে (পত্রে) উল্লেখ ছিল: "চরানো মেষের (বা ছাগলের) যাকাতের ক্ষেত্রে, যদি সেগুলোর সংখ্যা চল্লিশ থেকে একশ বিশটি পর্যন্ত হয়, তবে যাকাত হলো একটি মেষ (বা ছাগল)। অতঃপর যখন একশ বিশটির চেয়ে বেড়ে দুইশ পর্যন্ত হয়, তবে যাকাত হলো দুটি মেষ (বা ছাগল)। অতঃপর যখন দুইশ’র চেয়ে বেড়ে তিনশ পর্যন্ত হয়, তবে যাকাত হলো তিনটি মেষ (বা ছাগল)। অতঃপর যখন তিনশ’র চেয়ে বেশি হয়, তবে প্রতি একশ’তে একটি মেষ (বা ছাগল)। আর কোনো ব্যক্তির চরানো মেষের সংখ্যা যদি চল্লিশটি থেকে একটি কম হয়, তবে তাতে কোনো সাদাকা (যাকাত) নেই, যদি না তার মালিক স্বেচ্ছায় দিতে চায়। আর রৌপ্যের (বা সম্পদের) ক্ষেত্রে যাকাত হলো দশ ভাগের চার ভাগ (অর্থাৎ আড়াই শতাংশ)। কিন্তু যদি তা একশ নব্বই (দিরহাম) হয়, তবে তাতে কিছুই (যাকাত) নেই, যদি না তার মালিক স্বেচ্ছায় দিতে চায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (3842)


3842 - عن أنس بن مالك قال: إنّ أبا بكر لما استخلفه كتب له:"بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ، هذه فريضة الصّدقة التي فرضها رسول الله صلى الله عليه وسلم على المسلمين التي أمر الله بها رسوله" فذكر الحديث.

وقال فيه:"لا يجمع بين متفرق، ولا يفرّق بين مجتمع خشية الصّدقة، وما من خليطين فهما يتراجعان بينهما بالسّوية".

صحيح: رواه البخاريّ في الزكاة (1451) عن محمد بن عبد الله، قال: حدّثني أبي، قال: حدّثني ثمامة، أنّ أنسًا حدّثه، فذكر الحديث.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন খলীফা নিযুক্ত হলেন, তখন তিনি (যাকাত সংক্রান্ত) তার জন্য লিখলেন: "বিসমিল্লাহির রাহমানির রাহীম। এটা হচ্ছে সাদাকার (যাকাতের) সেই ফরয, যা আল্লাহ্‌র রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মুসলমানদের উপর ফরয করেছেন, যা আল্লাহ্‌ তাঁর রাসূলকে আদেশ করেছেন।" অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেন এবং এর মধ্যে বলেন: সাদাকার (যাকাতের) ভয়ে বিচ্ছিন্ন পশুকে একত্র করা যাবে না এবং একত্র পশুকে বিচ্ছিন্ন করা যাবে না। আর যে কোনো দুই শরীকদার, তারা উভয়েই নিজেদের মধ্যে সমতার ভিত্তিতে (যাকাত) পরিশোধের বিষয়টির মীমাংসা করবে।









আল-জামি` আল-কামিল (3843)


3843 - عن سويد بن غفلة، قال: سرتُ أو قال: أخبرني من سار مع مصدّق النبيّ صلى الله عليه وسلم فإذا في عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أَنْ لا تَأْخُذَ مِنْ رَاضِعِ لَبَنٍ وَلا تَجْمَعَ بَيْنَ مُفْتَرِقٍ وَلَا تُفَرِّقَ بَيْنَ مُجْتَمِعٍ".

وكَانَ إِنَّمَا يَأْتِي الْمِيَاهَ حِينَ تَرِدُ الْغَنَمُ فَيَقُولُ أَدُّوا صَدَقَاتِ أَمْوَالِكُمْ قَالَ: فَعَمَدَ رَجُلٌ مِنْهُمْ إِلَى نَاقَةٍ كَوْمَاءَ. قَالَ: قُلْتُ: يَا أَبَا صَالِحٍ! مَا الْكَوْمَاءُ؟ قَالَ: عَظِيمَةُ السَّنَامِ. قَال: فَأَبَى أَنْ يَقْبَلَهَا، قَالَ: إِنِّي أُحِبُّ أَنْ تَأْخذَ خَيْرَ إِبِلِي. قَالَ: فَأَبَى أَنْ
يَقْبَلَهَا، قَالَ: فَخَطَمَ لَهُ أُخْرَى دُونَهَا، فَأَبَى أَنْ يَقْبَلَهَا، ثُمَّ خَطَمَ لَهُ أُخْرَى دُونَهَا. فَقَبِلَهَا وَقَالَ: إِنِّي آخِذُهَا وَأَخَافُ أَنْ يَجِدَ عَلَيَّ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ لِي عَمَدْتَ إِلَى رَجُلٍ فَتَخَيَّرْتَ عَلَيْهِ إِبِلَهُ".

حسن: رواه أبو داود (1579)، والنسائيّ (2459) كلاهما من حديث هلال بن خبّاب، عن ميسرة أبي صالح، عن سويد بن غفلة، فذكره.

ومن هذا الوجه أخرجه أحمد (18837) مختصرًا، وهلال بن حبان وثقه أحمد ويحيى بن معين وأبو حاتم وغيرهم، وذكره ابن حبان في كتاب"الثقات" فقال:"يخطئ ويخالف". وذكره أيضًا في"الضعفاء" فقال: اختلط في آخر عمره، وكان يحدث بالشيء على التوهم، لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد. هكذا ذكره في الكتابين:"الثقات" و"الضعفاء" ثم إنه قد توبع في الإسناد الثاني.

وهو ما رواه أبو داود (1585)، وابن ماجه (1801) كلاهما من حديث شريك، عن عثمان بن أبي زرعة، عن أبي ليلى الكنديّ، عن سويد بن غفلة، قال: جاءنا مصدّق النبيّ صلى الله عليه وسلم فأخذت بيده، وقرأت في عهده، فذكر الحديث.

وزاد ابن ماجه من قول المصدّق:"أي أرض تقلني، وأي سماء تظلني إذا أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم وقد أخذت خيار إبل رجل مسلم". وشريك سيء الحفظ، إلّا أنه توبع.

وتبين من هذه الرواية بأنه ليس أحد بين سويد بن غفلة ومصدق رسول الله صلى الله عليه وسلم.

وقوله:"راضع لبن" أي صغير يرضع اللّبن، أو ذات لبن.

والنهي عن جمع متفرق -حتى لا تجب فيه الزكاة، والنهي عن متفرق مجمع- حتى تسقط فيه الزّكاة.




সুওয়াইদ ইবনু গাফালাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ভ্রমণ করছিলাম, অথবা তিনি (সুওয়াইদ) বললেন: যিনি নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যাকাত সংগ্রাহকের সাথে ভ্রমণ করেছিলেন, তিনি আমাকে জানিয়েছেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চুক্তিনামায় (নির্দেশনায়) ছিল: "দুধ পানকারী (পশুর বাচ্চা) থেকে যাকাত গ্রহণ করা যাবে না। আর বিচ্ছিন্ন জিনিসকে একত্রে একত্রিত করা যাবে না এবং একত্রিত জিনিসকে বিচ্ছিন্ন করা যাবে না।"

আর তিনি (যাকাত সংগ্রাহক) পানির উৎসের কাছে আসতেন যখন ভেড়া-বকরির পাল সেখানে আসতো। এরপর তিনি বলতেন: তোমরা তোমাদের সম্পদের যাকাত আদায় করো। তিনি (সুওয়াইদ) বলেন: তখন তাদের মধ্য হতে এক ব্যক্তি একটি কওমা’ উটনী (যাকাত হিসেবে) দেওয়ার ইচ্ছা করলো। তিনি (সুওয়াইদ) বলেন: আমি বললাম, হে আবূ সালিহ! কওমা’ কী? তিনি বললেন: বিশাল কুঁজবিশিষ্ট উটনী। লোকটি বলল: যাকাত সংগ্রাহক তা গ্রহণ করতে অস্বীকার করলেন। লোকটি বলল: আমি চাই যে আপনি আমার উটগুলোর মধ্যে সেরাটি গ্রহণ করুন। তিনি (সংগ্রাহক) তা গ্রহণ করতে অস্বীকার করলেন। লোকটি এরপর এর চেয়ে কম মূল্যের আরেকটি উটনী তার সামনে উপস্থিত করল। তিনি সেটাও গ্রহণ করতে অস্বীকার করলেন। অতঃপর লোকটি এর চেয়ে নিম্নমানের আরেকটি উটনী তার সামনে উপস্থিত করল। তখন তিনি সেটি গ্রহণ করলেন। আর তিনি (সংগ্রাহক) বললেন: আমি এটিই গ্রহণ করছি। আমি ভয় পাচ্ছি যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার উপর ক্রুদ্ধ হবেন এবং আমাকে বলবেন: তুমি লোকটির দিকে গিয়ে তার উট থেকে সবচেয়ে ভালোটি বেছে নিয়েছ।









আল-জামি` আল-কামিল (3844)


3844 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ليس على المسلم في عبده ولا في فرسه صدقة".

متفق عليه: رواه مالك في الزكاة (37) عن عبد الله بن دينار، عن سليمان بن يسار، عن عراك ابن مالك، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

ورواه مسلم في الزكاة (982) ثنا يحيى بن يحيى، قال: قرأت على مالك.

ورواه البخاري في الزكاة (1463) من وجه آخر عن سليمان بن يسار، بإسناده.

وعند مسلم من حديث ابن وهب، قال: أخبرني مخرمة، عن أبيه، عن عراك بن مالك، قال: سمعت أبا هريرة يحدث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ليس في العبد صدقة إلّا صدقة الفطر".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মুসলমানের উপর তার ক্রীতদাস বা তার ঘোড়ার জন্য কোনো সাদাকাহ (যাকাত) নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3845)


3845 - عن علي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد عفوتُ عن الخيل والرّقيق، فهاتوا صدقة الرّقة من كل أربعين درهمًا درهمًا، وليس في تسعين ومائة شيء فإذا بلغت
مائتين ففيها خمسة دراهم".

حسن: رواه أبو داود (1574)، والترمذيّ (620) من حديث أبي عوانة، والنسائيّ (2478) من حديث الأعمش - كلاهما عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضمرة، عن علي، فذكره.

قال الترمذيّ: وروي سفيان الثوريّ، وابن عيينة، وغير واحد عن أبي إسحاق، عن الحارث، عن علي، وقال: سألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: كلاهما عندي صحيح عن أبي إسحاق، يحتمل أن يكون روي عنهما جميعًا.

قلت: حديث سفيان وهو الثوريّ، رواه ابن ماجه (1790) عن أبي إسحاق، عن الحارث، عن علي بن أبي طالب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إني عفوتُ عنكم عن صدقة الخيل والرّقيق، ولكن هاتوا ربع العشر من كلِّ أربعين درهمًا درهمًا".

وكذلك رواه الإمام أحمد (984) من طريق حجاج وهو ابن أرطاة، عن أبي إسحاق، بإسناده، مثله.

وأبو إسحاق تغيّر بآخره، ولكن رواه عنه سفيان قبل اختلاطه.

وأما ما رواه ابن خزيمة في صحيحه (2284) من طريق سفيان الثوريّ، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضمرة، عن علي، كما مضى.

فلعلّ الراوي عن سفيان وهو أبو أسامة حماد بن أسامة الكوفيّ أخطأ فيه، فإنه وإن كان من رجال الجماعة إلا أنه كان يستعير كتب النّاس ويحدّث بها ويخطئ فيه.

والخلاصة حديث علي حسن من طريق عاصم بن ضمرة، وأما الحارث فهو ضعيف جدًّا، ولكنه متابع.

وأمّا ما رُوي عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا صدقة في فرس رجل ولا عبده" فهو ضعيف.

رواه أبو عبيد في"كتاب الأموال" (1357) عن عمرو بن طارق، عن يحيى بن أيوب، عن المثنى بن الصبّاح، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه.

والمثنّى بن الصبَّاح ضعيف، ضعّفه جمهور أهل العلم.

وكذلك لا يصح ما روي عن عمر وحذيفة بن اليمان أن النبي صلى الله عليه وسلم لم يأخذ من الخيل والرقيق صدقة.

رواه أحمد (113) عن أبي اليمان، حدثنا أبو بكر بن عبد الله، عن راشد بن سعد، عن عمر بن الخطاب وحذيفة بن اليمان، فذكراه.

وأبو بكر بن عبد الله وهو ابن أبي مريم الغساني الشامي ضعيف باتفاق أهل العلم، قال ابن حبان: كان من خيار أهل الشام، لكن كان رديء الحفظ يحدث بالشيء فيهم فكثر ذلك حتى استحق الترك.

وراشد بن سعد المقرئي الحمصي مات بعد المائة وثلاث عشر، وكان كثير الإرسال، لم يدرك عمر ولا حذيفة.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله- صلى الله عليه وسلم:"عفوتُ لكم عن صدقة الجبهة، والكسعة، والنّخة".

قال بقية: الجبهة: الخيل، والكسعة: البغال والحمير، والنّخة: المربيات في البيوت.

رواه البيهقيّ (4/ 118) من طريق بقية، قال: حدّثني أبو معاذ الأنصاريّ، عن الزهري، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره.

قال البيهقيّ:"كذا رواه بقية بن الوليد عن أبي معاذ، وهو سليمان بن أرقم متروك الحديث لا يحتج به، وقد اختلف عليه في إسناده، فقيل: هكذا، وقيل عنه عن الحسن، عن عبد الرحمن بن سمرة".

وقال:"ورواه كثير بن زياد أبو سهل عن الحسن، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم. أخرجه أبو داود في المراسيل".

ثم قال البيهقيّ: أسانيد هذا الحديث ضعيفة، وفي الأحاديث الصحيحة قبله كفاية، وبالله التوفيق". انتهى.

فقه الحديث: قال أكثر أهل العلم من الصحابة والتابعين ومن الفقهاء مالك والشافعي وأحمد: لا زكاة في الخيل ولا في العبد إلا أن تكون للتجارة، فتجب في قيمتها زكاة التجارة، إلا أن يتطوّع صاحبها فيجوز للإمام قبول زكاته كما قبل عمر بن الخطاب من أهل الشّام.

عن حارثة بن مُضرِّب قال: جاء ناسٌ من أهل الشّام إلى عمر، فقالوا: إنّا قد أصبنا أموالًا: خيلًا ورقيقًا، نحبُّ أن يكون لنا فيها زكاة طهورًا، فقال: ما فعله صاحباي قبلي فأفعله؟ ! . فاستشار أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم وفيهم عليّ. فقال عليٌّ: هو حسن إن لم تكن جزية راتبة يؤخذون بها من بعدك.

إسناده صحيح رواه أحمد (82) وابن خزيمة (2290) والحاكم (1/ 400) كلهم من حديث عبد الرحمن (هو ابن مهدي)، حدّثنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن حارثة بن مضرّب، فذكره. واللفظ لأحمد.

ورواه عبد الرزاق في مصنفه (6887) عن معمر، عن أبي إسحاق، قال: أتى أهل الشام عمر فقالوا: فذكره مفصّلًا أطول من هذا إلَّا أنه لم يذكر بين أبي إسحاق وبين عمر"حارثة بن مضرب".

وفي الموطأ في كتاب الزكاة (38) عن مالك، عن ابن شهاب، عن سليمان بن يسار: أنّ أهل الشّام قالوا لأبي عبيدة بن الجراح: خذْ خيلنا ورقيقنا صدقة، فأبي. ثم كتب إلى عمر بن الخطاب، فأبي عمر، ثم كلّموه أيضًا، فكتب إلى عمر، فكتب إليه عمر: إن أحبُّوا فخذها منهم، واردُدها عليهم، وارزق رقيقهم. قال مالك: ومعنى قوله رحمه الله:"وارددها عليهم" يقول: على فقرائهم.

قال ابن خزيمة:"إن كان صاحب المال أعطى صدقة من ماله، وإن كانت الصدقة غير واجبة في ماله، فجائز للإمام أخذها إذا طابت نفس المعطي. وكذلك الفاروق لما أُعلم القوم أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم والصديق قبله لم يأخذا صدقة الخيل والرّقيق فطابت أنفسهم بإعطاء الصدقة من الخيل والرقيق متطوعين جاز للفاروق أخذ الصدقة منهم كما أباح المصطفى صلى الله عليه وسلم أخذ الصدقة مما دون خمس من
الإبل، ودون أربعين من الغنم، ودون مائتي درهم من الورق" انتهى.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "আমি তোমাদের জন্য ঘোড়া ও ক্রীতদাসের (যাকাত) থেকে অব্যাহতি দিয়েছি। তবে তোমরা রৌপ্যের যাকাত দাও—প্রতি চল্লিশ দিরহামে একটি দিরহাম। একশ নব্বই দিরহামে কোনো কিছু (যাকাত) নেই। যখন তা দুইশতে পৌঁছবে, তখন তাতে পাঁচটি দিরহাম দিতে হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3846)


3846 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مَا مِنْ صَاحِبِ ذَهَبٍ وَلا فِضَّةٍ لا يُؤَدِّي مِنْهَا حَقَّهَا إِلا إِذَا كَانَ يَوْمُ الْقِيَامَةِ صُفِّحَتْ لَهُ صَفَائِحُ مِنْ نَارٍ فَأُحْمِيَ عَلَيْهَا فِي نَارِ جَهَنَّمَ فَيُكْوَى بِهَا جَنْبُهُ وَجَبِينُهُ وَظَهْرُهُ كُلَّمَا بَرَدَتْ أُعِيدَتْ لَهُ فِي يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ حَتَّى يُقْضَى بَيْنَ الْعِبَادِ فَيَرَى سَبِيلَهُ إِمَّا إِلَى الْجَنَّةِ وَإِمَّا إِلَى النَّار". قِيلَ يَا رَسُولَ اللَّهِ، فَالإِبِلُ؟ قَالَ:"وَلا صَاحِبُ إِبِلٍ لا يُؤَدِّي مِنْهَا حَقَّهَا -وَمِنْ حَقِّهَا حَلَبُهَا يَوْمَ وِرْدِهَا- إِلا إِذَا كَانَ يَوْمُ الْقِيَامَةِ بُطِحَ لَهَا بِقَاعٍ قَرْقَرٍ أَوْفَرَ مَا كَانَتْ لا يَفْقِدُ مِنْهَا فَصِيلا وَاحِدًا تَطَؤُهُ بِأَخْفَافِهَا وَتَعَضُّهُ بِأَفْوَاهِهَا كُلَّمَا مَرَّ عَلَيْهِ أُولاهَا رُدَّ عَلَيْهِ أُخْرَاهَا فِي يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ حَتَّى يُقْضَى بَيْنَ الْعِبَادِ فَيَرَى سَبِيلَهُ إِمَّا إِلَى الْجَنَّةِ وَإِمَّا إِلَى النَّارِ". قِيلَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ! فَالْبَقَرُ وَالْغَنَمُ؟ قَالَ:"وَلا صَاحِبُ بَقَرٍ وَلا غَنَمٍ لا يُؤَدِّي مِنْهَا حَقَّهَا إِلا إِذَا كَانَ يَوْمُ الْقِيَامَةِ بُطِحَ لَهَا بِقَاعٍ قَرْقَرٍ لا يَفْقِدُ مِنْهَا شَيْئًا لَيْسَ فِيهَا عَقْصَاءُ وَلا جَلْحَاءُ وَلا عَضْبَاءُ تَنْطَحُهُ بِقُرُونِهَا وَتَطَؤُهُ بِأَظْلافِهَا كُلَّمَا مَرَّ عَلَيْهِ أُولاهَا رُدَّ عَلَيْهِ أُخْرَاهَا فِي يَوْمٍ كَانَ مِقْدَارُهُ خَمْسِينَ أَلْفَ سَنَةٍ حَتَّى يُقْضَى بَيْنَ الْعِبَادِ فَيَرَى سَبِيلَهُ إِمَّا إِلَى الْجَنَّةِ وَإِمَّا إِلَى النَّارِ. قِيلَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، فَالْخَيْلُ؟ قَالَ:"الْخَيْلُ ثَلاثَةٌ هِيَ لِرَجُلٍ وِزْرٌ، وَهِيَ لِرَجُلٍ سِتْرٌ، وَهِيَ لِرَجُلٍ أَجْرٌ، فَأَمَّا الَّتِي هِيَ لَهُ وِزْرٌ فَرَجُلٌ رَبَطَهَا رِيَاءً وَفَخْرًا وَنِوَاءً عَلَى أَهْلِ الإِسْلامِ فَهِيَ لَهُ وِزْرٌ، وَأَمَّا الَّتِي هِيَ لَهُ سِتْرٌ فَرَجُلٌ رَبَطَهَا فِي سَبِيلِ اللَّهِ ثُمَّ لَمْ يَنْسَ حَقَّ اللَّهِ فِي ظُهُورِهَا وَلا رِقَابِهَا فَهِيَ لَهُ سِتْرٌ".

متفق عليه: رواه مسلم في الزكاة (987) عن سويد بن سعيد، حدّثنا حفص بن ميسرة الصّنعانيّ، عن زيد بن أسلم، أنّ أبا صالح ذكوان أخبره، أنه سمع أبا هريرة يقول: (فذكره).

رواه مالك في الجهاد (3) وعنه البخاريّ في المساقاة (2371) عن زيد بن أسلم، بإسناده باختلاف بعض الألفاظ.

قال البيهقيّ:"في الحديث:"ولا ينسى حق الله في ظهورها وبطونها في عسرها ويسرها". وذلك لا يدل على الزكاة".

وتعقّبه ابن التركمانيّ في"الجوهر النقيّ" بقوله:"بل يدل عليها ظاهر قوله:"ولم ينس حقّ الله في رقابها" مع قرينة قوله في الصحيح في أول الحديث:"ما من صاحب كنز لا يؤدي زكاته …".
وقال ابن الجوزيّ في"التحقيق" (3/ 43) بعد أن ذكر هذا الحديث واستدل به:"وجوابه من وجهين: أحدهما: أن يريد بالحقّ إعارتها، وحمل المنقطعين عليها، وذلك يكون على وجه النّدب.

والثاني: أن يكون ذلك قد كان واجبًا ثم نُسخ، بدليل قوله:"عفوت لكم عن صدقة الخيل" والعفو إنما يكون عن لازم".

وأمّا ما روي عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"في الخيل السائمة في كلّ فرس دينار" فهو ضعيف.

رواه الدّارقطنيّ (2019) قال: أخبرني أحمد بن عبدان الشّيرازيّ فيما كتب إليَّ أن محمد بن موسى الحارثيّ حدّثهم، حدّثنا إسماعيل بن يحيى بن بحر الكرماني، حدثنا الليث بن حماد الإصطخريّ، حدثنا أبو يوسف، عن غُورَك بن الحصْرِم أبي عبد الله، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره.

ومن هذا الطريق رواه البيهقيّ (4/ 119). قال الدارقطني:"تفرّد به غورك عن جعفر، وهو ضعيف جدًّا، ومن دونه ضعفاء".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: এমন কোনো স্বর্ণ বা রৌপ্যের মালিক নেই, যে তার প্রাপ্য হক (যাকাত) আদায় করে না, কিন্তু যখন কিয়ামতের দিন হবে, তখন তার জন্য আগুনের পাত তৈরি করা হবে। অতঃপর জাহান্নামের আগুনে সেগুলো উত্তপ্ত করা হবে এবং তার পার্শ্বদেশ, কপাল ও পিঠে তা দ্বারা দাগ দেওয়া হবে। যখনই তা ঠাণ্ডা হয়ে যাবে, পঞ্চাশ হাজার বছর পরিমাণ দীর্ঘ এক দিনে তা পুনরায় তার জন্য (উত্তপ্ত করে) ফিরিয়ে আনা হবে, যতক্ষণ না বান্দাদের মাঝে বিচার ফয়সালা হয়ে যায়। এরপর সে তার পথ দেখতে পাবে—হয় জান্নাতের দিকে, নয়তো জাহান্নামের দিকে।

জিজ্ঞাসা করা হলো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! উট সম্পর্কে কী বলবেন? তিনি বললেন: এমন কোনো উটের মালিক নেই, যে তার প্রাপ্য হক (যাকাত) আদায় করে না—আর তার হকের মধ্যে রয়েছে, পানি পানের দিন সেগুলোর দুধ দোহন করা—কিন্তু যখন কিয়ামতের দিন হবে, তখন তাকে একটি সমতল বিস্তৃত প্রান্তরে (ক্বা'ন ক্বিরক্বির) উপুড় করে ফেলে রাখা হবে। তখন তার উটগুলো পূর্ণ সংখ্যায় উপস্থিত হবে, এমনকি একটি বাচ্চাও অনুপস্থিত থাকবে না। উটগুলো তাদের খুর দ্বারা তাকে মাড়াতে থাকবে এবং মুখ দ্বারা কামড়াতে থাকবে। যখনই তাদের প্রথম দলটি তার উপর দিয়ে অতিক্রম করে যাবে, তখনই শেষ দলটি পুনরায় তার উপর দিয়ে ফিরিয়ে আনা হবে। পঞ্চাশ হাজার বছর পরিমাণ দীর্ঘ এক দিনে, যতক্ষণ না বান্দাদের মাঝে বিচার ফয়সালা হয়ে যায়। এরপর সে তার পথ দেখতে পাবে—হয় জান্নাতের দিকে, নয়তো জাহান্নামের দিকে।

জিজ্ঞাসা করা হলো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! গরু ও ছাগল সম্পর্কে কী বলবেন? তিনি বললেন: এমন কোনো গরু ও ছাগলের মালিক নেই, যে তার প্রাপ্য হক (যাকাত) আদায় করে না, কিন্তু যখন কিয়ামতের দিন হবে, তখন তাকে একটি সমতল বিস্তৃত প্রান্তরে (ক্বা'ন ক্বিরক্বির) উপুড় করে ফেলে রাখা হবে। তার কোনো প্রাণীই অনুপস্থিত থাকবে না। সেগুলোর মধ্যে শিং বাঁকা, শিং ভাঙ্গা বা শিংবিহীন (দোষযুক্ত) কোনো প্রাণী থাকবে না। তারা তাদের শিং দিয়ে তাকে আঘাত করতে থাকবে এবং তাদের ক্ষুর দ্বারা তাকে মাড়াতে থাকবে। যখনই তাদের প্রথম দলটি তার উপর দিয়ে অতিক্রম করে যাবে, তখনই শেষ দলটি পুনরায় তার উপর দিয়ে ফিরিয়ে আনা হবে। পঞ্চাশ হাজার বছর পরিমাণ দীর্ঘ এক দিনে, যতক্ষণ না বান্দাদের মাঝে বিচার ফয়সালা হয়ে যায়। এরপর সে তার পথ দেখতে পাবে—হয় জান্নাতের দিকে, নয়তো জাহান্নামের দিকে।

জিজ্ঞাসা করা হলো: ইয়া রাসূলাল্লাহ! ঘোড়া সম্পর্কে কী বলবেন? তিনি বললেন: ঘোড়া তিন প্রকার। এক প্রকার ঘোড়া কারো জন্য হবে বোঝা (পাপ), আরেক প্রকার কারো জন্য হবে পর্দা (মুক্তি), আর আরেক প্রকার কারো জন্য হবে প্রতিদান (সওয়াব)।
যে ঘোড়া তার জন্য বোঝা: সে হলো সেই ব্যক্তি, যে লোক দেখানো, অহংকার ও মুসলমানদের সাথে শত্রুতার উদ্দেশ্যে ঘোড়া পালন করে। এগুলো তার জন্য বোঝা (পাপ)।
আর যে ঘোড়া তার জন্য পর্দা: সে হলো সেই ব্যক্তি, যে আল্লাহর রাস্তায় ঘোড়া পালন করে, অতঃপর তার পিঠ ও ঘাড়ের ক্ষেত্রে আল্লাহর প্রাপ্য হক ভুলে যায় না। সুতরাং এগুলো তার জন্য পর্দা (মুক্তির কারণ)।









আল-জামি` আল-কামিল (3847)


3847 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا جلب ولا جنب، ولا تؤخذ صدقاتهم إلّا في دورهم".

حسن: رواه أبو داود (1591) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا ابن أبي عدي، عن ابن إسحاق، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، فذكره.

وصحّحه ابن خزيمة (2280)، فرواه مطوّلًا من طريق عبد الأعلى، حدّثنا محمد بن إسحاق بإسناده.

وإسناده حسن من أجل عمرو فإنه حسن الحديث. وابن إسحاق مدلِّس وقد عنعن، ولكن جاء التصريح منه في مسند أحمد (7024) فإنه رواه من وجه آخر عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني عمرو بن شعيب بن محمد بن عبد الله بن عمرو بن العاص، عن أبيه، عن جدّه، فذكره.

وتابعه أسامة بن زيد، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"تؤخذ صدقات المسلمين عند مياههم، أو عند أفنيتهم". رواه البيهقيّ (4/ 110) من طريق أبي داود (الطيالسي)، حدّثنا ابن المبارك، عن أسامة بن زيد.

قال البيهقيّ:"الشّك من أبي داود. ولكن خالفه محمد بن الفضل، فرواه عن ابن المبارك، عن أسامة بن زيد، عن أبيه، عن ابن عمر، ولفظه:"تؤخذ صدقات المسلمين على مياههم".

رواه ابن ماجه (1806) عن أبي بدر عبّاد بن الوليد، قال: حدّثنا محمد بن الفضل، فذكره.

وأسامة بن زيد هنا ليس باللّيثي، وإنما هو ابن أسلم العدوي مولاهم المدني ضعيف، وبه أعلّه
البوصيريّ في زوائد ابن ماجه.

وهذا الوهم من محمد بن فضل وهو السدوسيّ، لقبه"عارم" وُصف بأنه"ثقة ثبت تغيرّ في آخر عمره" كذا في التقريب، وهو من رجال الجماعة، فلعلّه وهم في هذا الإسناد في موضعين:

أحدهما: أسامة بن زيد، عن أبيه.

والثاني: جعله من مسند ابن عمر، والصحيح أنه من مسند ابن عمرو.

والمتابعة الثانية لابن إسحاق هو ما رواه عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله بن عياش بن أبي ربيعة، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، فذكر الحديث بطوله.

رواه الإمام أحمد (7012) عن إبراهيم بن أبي العباس، وحسين بن محمد، قالا: حدّثنا عبد الرحمن بن أبي الزّناد، عن عبد الرحمن بن الحارث، بإسناده في خطبة النبيّ صلى الله عليه وسلم عام الفتح. فذكر الحديث بطوله مع الشّاهد.

ثم ذكر أبو داود (1592) تفسير"لا جلب ولا جنب" عن الحسن بن علي، حدّثنا يعقوب بن إبراهيم، قال: سمعت أبي يقول: عن محمد بن إسحاق في قوله:"لا جلب ولا جنب".

قال: أن تصدق الماشية في مواضعها، ولا تُجلب إلى المصدّق.

والجنب عن غير هذه الفريضة أيضًا: لا يجنب أصحابها، يقول: لا يكون الرجل بأقصى مواضع الصّدقة فتُجنب إليه، ولكن تؤخذ في موضعه" انتهى.




আব্দুল্লাহ ইবন আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “জ্বালব (যাকাতের পশু দূর থেকে টেনে আনা) বা জানব (যাকাত আদায়কারীকে দূরে সরিয়ে রাখা) করা যাবে না। আর তাদের সাদকা (যাকাত) তাদের আবাসস্থলের বাইরে গ্রহণ করা হবে না।”









আল-জামি` আল-কামিল (3848)


3848 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تؤخذ صدقات أهل البادية على مياههم، وبأفنيتهم".

حسن: رواه الطبرانيّ في"الأوسط" (مجمع البحرين 1360) عن محمد بن العباس المؤدّب، ثنا عبد الله بن صالح العجليّ، ثنا عبد الملك بن محمد بن أبي بكر، عن عبد الله بن أبي بكر، عن عمرو، عن عائشة، فذكرته.

ورواه البيهقيّ في"الكبرى" (4/ 110) من وجه آخر عن عبد الله بن صالح إلا أنه نسبه إلى مصر، وهو الجهني، كاتب اللّيث، صدوق كثير الغلط، ثبت في الكتابة، وكانت فيه غفلة.

وفي سند الطبراني: عبد الله بن صالح العجليّ، وهذا ثقة، وكلاهما متقاربان في الطبقات، والله أعلم ما هو الصّحيح.

وقال البيهقيّ بعد أن ذكر لفظ الحديث بكماله:"لفظ حديث عبد الله بن صالح، وفي رواية عبد العزيز:"تؤخذ صدقات المسلمين من أموالهم على مياههم، وأفنيتهم".

قال الطبراني:"لم يروه عن عبد الله بن أبي بكر إلا عبد الملك بن محمد بن أبي بكر، تفرّد به عبد الله بن صالح". انتهى.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বেদুঈন অঞ্চলের লোকদের সাদকা (যাকাত) তাদের জলাধারগুলোতে (পানির উৎসের কাছে) এবং তাদের আঙ্গিনাগুলোতে (বসতবাড়ির কাছে) গ্রহণ করা হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3849)


3849 - عن أنس بن مالك، قال: غدوتُ إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم بعبد الله بن أبي طلحة يحنِّكه، فوافيته في يده الميسم يسم إبل الصّدقة.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1502)، ومسلم في اللباس (2119: 112) كلاهما من طريق الوليد بن مسلم، حدّثنا أبو عمرو الأوزاعيّ، حدثني إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، عن أنس، فذكره.

والوسم من وسَمَ يَسِم وسمة إذا أثّر فيه بكي، والميسم: الحديدة التي يكوي بها.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আনাস) বলেন, আমি আব্দুল্লাহ ইবনে আবূ তালহাকে তাহনীক করানোর জন্য রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট সকালে গেলাম, তখন আমি তাঁকে দেখলাম যে তাঁর হাতে ছিল একটি গরম লোহার শলাকা (আল-মায়সাম), যা দিয়ে তিনি সাদকার (যাকাতের) উটকে চিহ্নিত করছিলেন (ব্র্যান্ডিং করছিলেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (3850)


3850 - عن أنس قال: دخلتُ على النّبيّ صلى الله عليه وسلم بأخ لي يحنّكُه، وهو في مِرْبدٍ له، فرأيتُه يسم شاةً. حسبته قال: في آذانها.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الذّبائح (5542)، ومسلم في اللباس (2119/ 111) كلاهما من حديث شعبة، عن هشام بن زيد، عن أنس، قال (فذكره). واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم نحوه.

ولكن في رواية مسلم أخرى عن شعبة، قال:"وأكثر علمي أنه قال:"في آذانها".

ورواه الإمام أحمد (12725) من وجه آخر عن شعبة، وفيه قال هشام: أحسبه قال:"في آذانها". قال: ثم قال بعد:"في آذانها" ولم يشك.

وهشام بن زيد هو ابن أنس، روي عن جدّه أنس بن مالك، كما في رواية أحمد.

وكذلك يجوز وسم نعم الجزية كما رواه مالك في الزكاة (44) عن زيد بن أسلم، عن أبيه، أنه قال لعمر: إنّ في الظّهر ناقة عمياء. فقال عمر: أمن نعم الجزية هي أم من نعم الصّدقة؟ قال: فقلت: من نعم الجزية، إنّ عليها وسم الجزية.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার এক ভাইকে তাহনীক করানোর জন্য নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট প্রবেশ করলাম। তখন তিনি তাঁর একটি খোয়াড়ে (বা বকরির খোঁটায়) ছিলেন। তখন আমি তাঁকে একটি বকরির গায়ে দাগ দিতে (চিহ্নিত করতে) দেখলাম। আমার ধারণা, তিনি বললেন: (দাগটি ছিল) সেগুলোর কানে।









আল-জামি` আল-কামিল (3851)


3851 - عن سُفْيَانَ بْنِ عبد الله: أَنَّ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ بَعَثَهُ مُصَدِّقًا فَكَانَ يَعُدُّ عَلَى النَّاسِ بِالسَّخْلِ. فَقَالُوا: أَتَعُدُّ عَلَيْنَا بِالسَّخْلِ، وَلا تَأْخُذُ مِنْهُ شَيْئًا؟ فَلَمَّا قَدِمَ عَلَى عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ ذَكَرَ لَهُ ذَلِكَ، فَقَالَ عُمَرُ: نَعَمْ تَعُدُّ عَلَيْهِمْ بِالسَّخْلَةِ يَحْمِلُهَا الرَّاعِي وَلا تَأْخُذُهَا، وَلا تَأْخُذُ الأَكُولَةَ وَلا الرُّبَّى وَلا الْمَاخِضَ وَلا فَحْلَ الْغَنَمِ وَتَأْخُذُ الْجَذَعَةَ وَالثَّنِيَّةَ وَذَلِكَ عَدْلٌ بَيْنَ غِذَاءِ الْغَنَمِ وَخِيَارِهِ.

رواه مالك في الزكاة (26) عن ثور بن زيد الدّيليّ، عن ابن لعبد الله بن سفيان الثقفيّ، عن جدّه سفياغن بن عبد الله، أن عمر بن الخطاب بعثه مصدّقًا، فذكره.

قال مالك:"والسّخلة: الصغيرة حين تُنتج. والرُّبّي: التي قد وضعتْ فهي تربّي ولدها.
والماخضُ: هي الحاملُ. والأكولةُ: هي شاةُ اللّحم التي تُسمَّن لتؤكل".

وقال مالك في الرجل تكون له الغنم: لا تجب فيها الصّدقة فتوالد قبل أن يأتيها المصدِّقُ بيوم واحد فتبلغُ ما تجب فيه الصدقة بولادتها.

قال مالك: إذا بلغت الغنم بأولادها ما تجب فيه الصّدقة فعليه فيها الصدقة وذلك أنّ ولادةَ الغنم منها، وذلك مخالفٌ لما أفيد منها باشتراء أو هبة أو ميراث، ومثل ذلك العَرْض لا يبلغُ ثمنه ما تجب فيه الصدقة ثم يبيعه صاحبُه فيبلغ بربحه ما تجب فيه الصدقة فيصدِّقُ ربْحَه مع رأس المال ولو كان ربحُه فائدةً أو ميراثًا لم تجبْ فيه الصّدقة حتى يحولَ عليه الحولُ من يوم أفاده أو ورثه.

قال مالك: فغذا الغنم منها كما ربحُ المال منه غير أنّ ذلك يختلف في وجْهٍ آخرَ أنه إذا كان للرجل من الذّهب أو الورِق ما تجب فيه الزكاة ثم أفاد إليه مالا ترك ماله الذي أفاد فلم يزكِّه مع ماله الأوّل حين يزكّيه حتى يحول على الفائدة الحول من يوم أفادها، ولو كانت لرجل غنم أو بقر أو إبل تجبُ في كل صنف منها الصّدقة ثم أفاد إليها بعيرًا أو بقرة أو شاة صدَّقها مع صنف ما أفاد من ذلك حين يصدّقه إذا كان عنده من ذلك الصّنف الذي أفاد نصاب ماشيةٍ.

قال مالك: وهذا أحسن ما سمعتُ في ذلك.

وبقول عمر بن الخطاب أمير المؤمنين أخذ مالك، وأبو حنيفة وأصحابه.

وقال الشافعي: لا يضمَّن شيئًا من الفوائد إلى غيره ويزكي كلٌّ لحوله إلا ما كان من نتاج الماشية مع النصاب. انظر"الاستذكار" (9/ 181).

وأما الإمام أحمد فعنده قولان. انظر"التحقيق" (3/ 20 - 21).

انظر للمزيد:"الأم" (2/ 16)، و"المجموع" (5/ 370)،"المنة الكبري" (3/ 157 - 158).




সুফিয়ান ইবনে আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে সাদকা (যাকাত) সংগ্রহকারী হিসেবে প্রেরণ করলেন। তিনি লোকদের মেষের বাচ্চাদেরও গণনা করতেন। তারা বলল: আপনি কি আমাদের উপর বাচ্চাগুলো গণনা করছেন, অথচ আপনি এর থেকে কিছুই নিচ্ছেন না? অতঃপর তিনি যখন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আসলেন, তখন তিনি বিষয়টি তাঁর কাছে উল্লেখ করলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হ্যাঁ, তুমি তাদের উপর সেই মেষশাবকটি গণনা করবে যা রাখাল বহন করে, কিন্তু তুমি সেটি গ্রহণ করবে না। আর তুমি 'আকুলাহ্' (যেটিকে খাওয়ার জন্য মোটাতাজা করা হয়), 'রুব্বা' (যা তার বাচ্চাকে দুধ পান করায়), 'মাখিদ' (গর্ভবতী) এবং পালের মর্দ ছাগল (ফাহল আল-গানাম) গ্রহণ করবে না। আর তুমি জাযআহ্ (এক বছর পূর্ণ হয়েছে এমন মেষ) এবং সানিয়্যাহ্ (দুই দাঁত বিশিষ্ট মেষ) গ্রহণ করবে। আর এটি হলো মেষপালের খাদ্য (বৃদ্ধি) এবং তাদের সর্বোত্তম অংশের মধ্যে একটি ভারসাম্যপূর্ণ ন্যায়বিচার।

ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) এটি কিতাবুল যাকাত (২৬)-এ সাওর ইবনে যায়দ আদ-দীলী, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনে সুফিয়ান আস-সাকাফীর পুত্র থেকে, তিনি তাঁর দাদা সুফিয়ান ইবনে আব্দুল্লাহ থেকে বর্ণনা করেছেন যে, উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে সাদকা সংগ্রহকারী হিসেবে প্রেরণ করেছিলেন। অতঃপর তিনি (উপরের হাদীসটি) বর্ণনা করলেন।

ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: "সাখলাহ্ (السّخلة) হলো জন্মকালীন ছোট বাচ্চা। রুব্বী (الرُّبّي) হলো যে সবেমাত্র বাচ্চা প্রসব করেছে এবং সে তার বাচ্চাকে প্রতিপালন করছে। মাখিদ (الماخض) হলো গর্ভবতী পশু। আর আকুলাহ্ (الأكولة) হলো সেই মাংসের মেষ, যাকে খাওয়ার জন্য মোটাতাজা করা হয়।"

ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) সেই ব্যক্তি সম্পর্কে বলেন যার এমন মেষ থাকে যেগুলোতে সাদকা ওয়াজিব হয় না, কিন্তু সাদকা সংগ্রাহক আসার একদিন আগে সেগুলো বাচ্চা প্রসব করে এবং বাচ্চার কারণে তা (সাদকার) নিসাব পরিমাণে পৌঁছে যায়।

মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: যদি মেষগুলো তাদের বাচ্চা সহ সাদকা ওয়াজিব হওয়ার পরিমাণে পৌঁছে যায়, তবে তার উপর সাদকা ওয়াজিব হবে। এর কারণ হলো, মেষের বাচ্চা মেষ থেকেই জন্ম নেয়। এটি ক্রয়, হেবা (উপহার) বা উত্তরাধিকার সূত্রে প্রাপ্ত সম্পদের থেকে ভিন্ন।

তেমনিভাবে, ব্যবসার মালামাল (আর্দ) যার মূল্য নিসাব পরিমাণে পৌঁছায় না, অতঃপর এর মালিক তা বিক্রি করে এবং লাভের মাধ্যমে তা নিসাব পরিমাণে পৌঁছে যায়। তবে তাকে মূলধনের সাথে লাভেরও সাদকা দিতে হবে। কিন্তু যদি সেই লাভ অর্জিত সম্পদ বা উত্তরাধিকার সূত্রে প্রাপ্ত সম্পদ হতো, তবে যেদিন সে তা লাভ করেছে বা উত্তরাধিকার সূত্রে পেয়েছে, সেদিন থেকে এক বছর পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত সাদকা ওয়াজিব হতো না।

মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: সুতরাং মেষের বাচ্চা মেষের অংশ, যেমন সম্পদের লাভ সম্পদ থেকে। তবে অন্য একটি দিক থেকে এটি ভিন্নতা রাখে: যখন কোনো ব্যক্তির কাছে যাকাত ওয়াজিব হওয়ার মতো স্বর্ণ বা রৌপ্য থাকে, এরপর সে আরও সম্পদ লাভ করে, তখন সে তার অর্জিত নতুন সম্পদকে প্রথম সম্পদের সাথে যাকাত দিবে না, বরং যেদিন সে তা লাভ করেছে সেদিন থেকে এক বছর পূর্ণ না হওয়া পর্যন্ত নতুন সম্পদের উপর বছর পূর্ণ হবে।

কিন্তু যদি কোনো ব্যক্তির এমন মেষ, গরু বা উট থাকে, যার প্রতিটি প্রকারের উপর সাদকা ওয়াজিব হয়, অতঃপর সে একটি উট, বা একটি গরু বা একটি মেষ লাভ করে, তবে যখন সে সাদকা দিবে, তখন সে তার অর্জিত সেই প্রকারের পশুর সাথে এটি যোগ করবে, যদি তার কাছে ইতোমধ্যেই সেই প্রকারের পশুর নিসাব পরিমাণ বিদ্যমান থাকে।

মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: এ বিষয়ে আমি যা শুনেছি, এটিই তার মধ্যে সর্বোত্তম।

আমীরুল মুমিনীন উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই মতকে ইমাম মালিক, আবূ হানীফা এবং তাঁর অনুসারীগণ গ্রহণ করেছেন।

আর ইমাম শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: কোনো প্রকারের লাভ বা অর্জিত সম্পদকে অন্য সম্পদের সাথে যোগ করা যাবে না, বরং প্রত্যেকটির যাকাত তার নিজ নিজ বছরের হিসাব অনুযায়ী দিতে হবে, তবে নিসাব পরিমাণ পশুর বাচ্চার ক্ষেত্রে ভিন্ন। (দ্রষ্টব্য: আল-ইসতিযকার ৯/১৮১)।

আর ইমাম আহমদ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর ক্ষেত্রে দুটি অভিমত রয়েছে। (দ্রষ্টব্য: আত-তাহকীক ৩/২০-২১)।

অধিক জানার জন্য দেখুন: আল-উম্ম (২/১৬), আল-মাজমূ' (৫/৩৭০), আল-মিন্নাতুল কুবরা (৩/১৫৭-১৫৮)।









আল-জামি` আল-কামিল (3852)


3852 - عن أنس، أنّ أبا بكر رضي الله عنه: كتب له هذا الكتاب لما وجهه إلى البحرين:"هذه فريضة الصّدقة، فرض رسول الله صلى الله عليه وسلم على المسلمين". فذكر الكتاب بطوله وجاء فيه:"وفي الرِّقة ربع العشر، فإن لم تكن إلّا تسعين ومائة فليس فيها شيء إلّا أن يشاء ربُّها".

صحيح: رواه البخاري في الزكاة (1454) عن محمد بن عبد الله بن المثنى الأنصاريّ، قال: حدثني أبي، قال: حدّثني ثمامة بن عبد الله بن أنس، أن أنسًا حدّثه، فذكر الكتاب بطوله.

والرِّقة -بكسر الراء، وتخفيف القاف-: الفضة الخالصة، سواء كانت مضروبة أو غير مضروبة.

وقوله:"فإن لم تكن إلا تسعين ومائة" يوهم أنها إذا زادت على التسعين ومائة قبل بلوغ المائتين أن فيها صدقة. وليس كذلك. وإنما ذكر التسعين لأنه آخر عقد قبل المائة والحساب إذا جاوز الآحاد كان تركيبه بالعقود كالعشرات والمائتين والألوف. فذكر التسعين ليدل على أن لا صدقة فيما نقص المائتين، ويدل عليه:"ليس فيما دون خمس أواق صدقة". انتهى انظر:"الفتح" (3/ 321).




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যখন তাকে বাহরাইনে প্রেরণ করেন, তখন তার জন্য এই পত্রটি লিখেছিলেন: "এই হলো সাদাকাহ (যাকাত)-এর ফরয বিধান, যা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলিমদের ওপর ফরয করেছেন।" এরপর তিনি পুরো চিঠিটি উল্লেখ করেন এবং তাতে এই অংশটুকু ছিল: "আর রিক্কাহ (রূপা)-এর ক্ষেত্রে এক-দশমাংশের এক-চতুর্থাংশ (যাকাত দিতে হবে)। তবে যদি তা একশ’ নব্বইয়ের বেশি না হয়, তবে তাতে কিছু (যাকাত) নেই, যদি না এর মালিক ইচ্ছা করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3853)


3853 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس فيما دون خمس ذود صدقة، وليس فيما دون خمسة أواق صدقة، وليس فيما دون خمسة أوسق صدقة".

متفق عليه: رواه مالك في الزكاة (1) عن عمرو بن يحيى المازني، عن أبيه، أنه سمع أبا سعيد الخدريّ يقول (فذكر الحديث).

ورواه البخاريّ في الزكاة (1447) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك.

ورواه مسلم في الزكاة (979) من وجه آخر عن عمرو بن يحيي، به.

وقوله:"خمسِ ذَوْدٍ" بإضافة ذود إلى خمس، وقد روي أيضًا بتوين خمس، ويكون ذود بدلا منه. والذَّوْد في اللغة: من الثلاثة إلى العشرة، لا واحد له من لفظه، إنما يقال في الواحد: بعير.

وقوله:"خمس ذودٍ" كقوله: خمسة أبعرة، وخمسة جمالٍ، وخمس نوق، ونحوه.

وقوله:"خمس أواقٍ" بالتنوين، وفي رواية:"أواقي" بإثبات الياء، وكلاهما صحيح.
والأُوقية: بضم الهمزة، وتشديد الياء، وجمعها: أوقي -بتشديد الياء وتخفيفها-، وأواقٍ، بحذف الياء. وأجمع أهل الحديث والفقه وأئمّة اللغة على أنّ الأوقيّة الشّرعيّة أربعون درهمًا، وهي أوقية الحجاز.

قال القاضي عياض: ولا يصح أن تكون الأوقيّة والدّراهم مجهولة في زمن النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو يوجب الزّكاة في أعداد منها، ويقع بها البياعات والأنكحة، كما ثبت في الأحاديث الصحيحة.

وقوله:"خمسة أوسق" الأوسق جمع وسق، وفيه لغتان: فتح الواو، وهو المشهور وكسرها. وأصلها في اللغة الحمل. والمراد بالوسْق: ستون صاعًا.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাঁচটি 'যাওদ' (উট) এর কম পরিমাণে কোনো যাকাত নেই; পাঁচ 'আওক্ব' (উকিয়া পরিমাণ রূপা) এর কম পরিমাণে কোনো যাকাত নেই; এবং পাঁচ 'আওসাক্ব' (শস্য বা ফল) এর কম পরিমাণে কোনো যাকাত নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3854)


3854 - عن جابر بن عبد الله، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"ليس فيما دون خمسة أواق من الوَرِق صدقة، وليس فيما دون خمس ذود من الإبل صدقة، وليس فيما دون خمسة أوسق من التّمر صدقة".

صحيح: رواه مسلم في الزكاة (980) من طرق، عن ابن وهب، أخبرني عياض بن عبد الله، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله، فذكره.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাঁচ উকিয়ার কম রূপার মধ্যে কোনো সাদকা (যাকাত) নেই। আর পাঁচটির কম উটের মধ্যে কোনো সাদকা নেই। আর পাঁচ ওয়াসাকের কম খেজুরের মধ্যে কোনো সাদকা নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3855)


3855 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ليس فيما دون خمسة أوسق صدقة، ولا فيما دون خمس أواق صدقة، ولا فيما دون خمس ذود صدقة".

صحيح: رواه الإمام أحمد (9221، 9232) من وجهين عن عبد الله بن المبارك، قال: أخبرنا معمر، قال: حدّثني سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث. وإسناده صحيح.




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “পাঁচ ওয়াসাক-এর কম হলে কোনো সাদাকাহ (যাকাত) নেই, পাঁচ উকিয়াহ-এর কম হলে কোনো সাদাকাহ নেই এবং পাঁচটি উটের কম হলে কোনো সাদাকাহ নেই।”









আল-জামি` আল-কামিল (3856)


3856 - عن أبي رافع، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث رجلًا من بني مخزوم على الصّدقة، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس فيما دون خمسة أوسق صدقة، ولا فيما دون خمس ذود صدقة، وليس فيما دون خمس أواق صدقة".

صحيح: رواه الطبراني في"الكبير" (1/ 295) عن الحسين بن إسحاق التّستريّ، ويحيى بن زكريا السّاجيّ، قالا: ثنا موسي بن عبد الرحمن المسروقي، ثنا أبو أسامة، ثنا شعبة، عن الحكم، عن ابن أبي رافع، عن أبيه، فذكره.

ورجاله ثقات، أبو أسامة هو حماد بن أسامة بن زيد من رجال الجماعة. وابن أبي رافع هو عبيد الله بن أبي رافع المدني مولى النبيّ صلى الله عليه وسلم، كان كاتب عليٍّ، ثقة من رجال الجماعة.

أورده الهيثميّ في"المجمع" (3/ 70) وسكت عليه.




আবূ রাফে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বানী মাখযূম গোত্রের এক ব্যক্তিকে সাদাকা (যাকাত) আদায়ের জন্য প্রেরণ করলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "পাঁচ 'ওয়াসাক'-এর কম পরিমাণে কোনো সাদাকা (যাকাত) নেই, আর পাঁচটির কম উটে কোনো সাদাকা (যাকাত) নেই, আর পাঁচ 'উকিয়া'-এর কম পরিমাণেও কোনো সাদাকা (যাকাত) নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3857)


3857 - عن علي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد عفوتُ عن الخيل والرّقيق، فهاتوا صدقة الرّقة من كل أربعين درهمًا درهمًا، وليس في تسعين ومائة شيء فإذا بلغت مائتين ففيها خمسة دراهم".
حسن: رواه أبو داود (1574)، والترمذيّ (620) من حديث أبي عوانة، والنسائيّ (2478)، وابن ماجه (1790)، والإمام أحمد (711، 984) كلّهم من طرق، عن أبي إسحاق، عن عاصم ابن ضمرة -والحارث في بعض طرقه-، كلاهما عن علي فذكره. وصحّحه ابن خزيمة (2284).

وانظر تخريجه كاملًا في باب زكاة الخيل والرّقيق.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি ঘোড়া ও গোলামদের (যাকাত থেকে) অব্যাহতি দিয়েছি। সুতরাং তোমরা রিক্কাহর (রূপার মুদ্রার) যাকাত দাও, প্রতি চল্লিশ দিরহামে এক দিরহাম। আর একশো নব্বই দিরহামে কোনো যাকাত নেই। কিন্তু যখন তা দুইশোতে পৌঁছাবে, তখন তাতে পাঁচটি দিরহাম আবশ্যক হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3858)


3858 - عن بهز بن حكيم، عن أبيه، عن جدّه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"في كلّ خمس ذود سائمة صدقة".

حسن: رواه الطبراني في"المعجم الأوسط" (مجمع البحرين 1353) عن محمد بن جعفر بن سام، ثنا الزبير بن بكار، ثنا عبد المجيد بن عبد العزيز، عن معمر، عن الزهري، قال: حدثني رجل من بني قشير - قال له بهز بن حكيم- عن أبيه، عن جدّه، فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 70) بعد أن عزاه إلى"الأوسط":"رجاله موثقون غير شيخ الطبراني محمد بن جعفر بن سام فإني لم أعرفه".

وقال:"معاوية بن حيدة القشيري له حديث رواه أبو داود غير هذا".

قلت: وهو كما قال، فإن حديثه عند أبي داود يختلف عن هذا سيأتي في باب عقوبة مانع الزكاة في الدنيا.

أما شيخ الطبراني محمد بن جعفر بن سام فقد توبع، رواه الخطيب في تاريخه (8/ 467) عن أبي الحسين أحمد بن محمد بن أحمد بن حماد الواعظ، حدّثنا أبو بكر يوسف بن يعقوب بن إسحاق بن البهلول التنوخي -إملاء-، حدّثنا الزبير بن بكّار، بإسناده، فذكره مثله.

وإسناده حسن من أجل بهز بن حكيم وأبيه فهما صدوقان، إلا أن الدّارقطني علّله فقال:"يرويه عبد المجيد بن عبد العزيز بن أبي رواد، عن معمر، واختلف عنه، حدّث به الزبير بن بكّار، عن عبد المجيد، عن معمر، عن الزّهريّ، عن بهز بن حكيم، ووهم في ذكر الزّهريّ، والصواب عن عبد المجيد، عن معمر، عن بهز بن حكيم، قال: وكذلك رواه محمد بن ميمون الخياط، عن عبد المجيد" انتهى. انظر:"العلل" (7/ 90).

قال الخطيب بعد أن نقل كلام الدارقطني:"وكذلك رواه عبد الله بن المبارك عن معمر، عن بهز" ثم أسنده.

قلت: لا يمنع أن يكون معمر روي عن بهز بن حكيم أحاديث في الزكاة من وجهين: أحدهما: عن الزهري، عنه، كهذا الذي أمامنا.

والثاني: عن بهز بن حكيم بدون واسطة الزهري؛ لحديث أبي داود وغيره في عقوبة مانع الزكاة.

لأنّ الخطيب أثبت أن الزهري روي عن بهز بن حكيم وبين وفاتيهما نحوًا من خمس وثلاثين سنة، فإن الزهري توفي عام (125 هـ)، وبهز بن حكيم توفي عام (160)، فمن الخطأ أن تجعل
أحاديث بهز بن حكيم في الزكاة حديثًا واحدًا. انظر للمزيد: باب عقوبة مانع الزكاة في الدّنيا.




মু'আবিয়া ইবন হাইদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "প্রত্যেক পাঁচটি চারণভূমিতে বিচরণকারী উটের উপর সাদাকা (যাকাত) রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3859)


3859 - عن محمد بن عبد الرحمن الأنصاريّ قال: إنّ في كتاب رسول الله وفي كتاب عمر في الصدقة:"أنّ الذهب لا يؤخذ منه شيء حتى يبلغ عشرين دينارًا، فإذا بلغ عشرين دينارًا ففيه نصف دينار. والوَرِق لا يؤخذ منه شيء حتى يبلغ مائتي درهم، فإذا بلغ مائتي درهم ففيها خمسة دراهم".

صحيح: رواه أبو عبيد في كتاب"الأموال" (ص 559) عن يزيد بن هارون، عن حبيب بن أبي حبيب، عن عمرو بن هرم، عن محمد بن عبد الرحمن الأنصاريّ. وإسناده صحيح.

وعمرو بن هرم هو الأزديّ البصريّ من رجال مسلم، وصورته مرسل؛ فإن محمد بن عبد الرحمن الأنصاريّ تابعي، ولكن حكمه حكم الرّفع؛ لأنه وجد كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصّدقات عند آل عمرو بن حزم، وكتاب عمر بن الخطاب عند آل عمر كما قال فيما أخرجه أيضًا أبو عبيد في"الأموال" (ص 497) بالإسناد نفسه عن محمد بن عبد الرحمن الأنصاريّ أنه قال:"لما استخلف عمر بن عبد العزيز أرسل إلى المدينة يلتمس كتاب رسول الله صلى الله عليه وسلم في الصدقات، وكتاب عمر بن الخطاب قال: فنسخنا له قال: فحدثني عمرو بن هرم: أنه طلب إلى محمد بن عبد الرحمن أن ينسخه ما في ذينك الكتابين، فنسخ له ما في هذا الكتاب من صدقة الإبل والبقر والغنم والذهب والورق، والتمر -أو الثَّمر-، والحب والزبيب". فذكر الحديث بطوله. وليس فيه ذكر نصاب الذهب والورق.

قال أبو عبيد:"ثم ذكر سائر أنواع الصدقة في هذا الحديث، وستأتي في مواضعها إن شاء الله". انتهى.




মুহাম্মদ ইবনু আবদির রহমান আল-আনসারী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কিতাবে এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কিতাবে যাকাত সম্পর্কে রয়েছে: স্বর্ণ থেকে কিছুই নেওয়া হবে না যতক্ষণ না তা বিশ (২০) দীনারে পৌঁছে। যখন তা বিশ (২০) দীনারে পৌঁছবে, তখন তাতে অর্ধ (১/২) দীনার যাকাত ফরয। এবং রূপা থেকে কিছুই নেওয়া হবে না যতক্ষণ না তা দুইশত (২০০) দিরহামে পৌঁছবে। যখন তা দুইশত (২০০) দিরহামে পৌঁছবে, তখন তাতে পাঁচ (৫) দিরহাম যাকাত ফরয।









আল-জামি` আল-কামিল (3860)


3860 - عن علي بن أبي طالب، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"فَإِذَا كَانَتْ لَكَ مَائَتَا دِرْهَمٍ وَحَالَ عَلَيْهَا الْحَوْلُ فَفِيهَا خَمْسَةُ دَرَاهِمَ وَلَيْسَ عَلَيْكَ شَيْءٌ يَعْنِي فِي الذَّهَبِ حَتَّى يَكُونَ لَكَ عِشْرُونَ دِينَارًا فَإِذَا كَانَ لَكَ عِشْرُونَ دِينَارًا وَحَالَ عَلَيْهَا الْحَوْلُ فَفِيهَا نِصْفُ دِينَارٍ فَمَا زَادَ فَبِحِسَابِ ذَلِكَ".

حسن: رواه أبو داود (1573) عن سليمان بن داود المهري، أخبرنا ابن وهب، أخبرني جرير ابن حازم -وسمّى آخر-، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضمرة، والحارث الأعور، عن علي ابن أبي طالب، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عاصم بن ضمرة وهو صدوق. وقد تابعه الحارث الأعور وفيه كلام معروف. انظر تخريجه بالتفصيل في باب"لا زكاة في مال حتى يحول عليه الحول" وأزيد هنا:
هذا الحديث أخرجه ابن حزم في"المحلي" (6/ 84) وعلّله بالحارث وبغيره، ثم استدرك قائلًا:"ثم استدركنا فرأينا أن حديث جرير بن حازم مسند صحيح، لا يجوز خلافه، وأن الاعتلال فيه بأن عاصم بن ضمرة أو أبا إسحاق، أو جريرًا خلّط في إسناد الحارث بإرسال عاصم -هو الظّن الباطل الذي لا يجوز، وما علينا من مشاركة الحارث لعاصم، ولا لإرسال من أرسله، ولا لشكّ زهير فيه شيء، وجرير ثقة، فالأخذ بما أسنده لازم، وبالله التوفيق"."المحلي" (6/ 91).

وفي الباب أحاديث:

منها: ما رواه ابن ماجه (1791) عن بكر بن خلف ومحمد بن يحيى، قالا: حدثنا عبيد الله بن موسي، قال: أنبأنا إبراهيم بن إسماعيل، عن عبد الله بن واقد، عن ابن عمر، وعائشة:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يأخذ من كلّ عشرين دينارًا فصاعدًا نصف دينار، ومن أربعين دينارًا دينارًا".

وفيه إبراهيم بن إسماعيل وهو ابن مجمع الأنصاريّ أبو إسحاق المدني، أهل العلم مطبقون على تضعيفه. ومن طريقه رواه أيضًا الدارقطني (1896).

ومنها: ما رواه الدارقطني (1902) بإسناده عن ابن أبي ليلى، عن عبد الكريم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال (فذكر الحديث).

وجاء فيه:"ولا في أقلّ من عشرين مثقالًا من الذّهب شيء، ولا في أقلّ من مائتي درهم شيء".

وعبد الكريم هو ابن أبي المخارق أبو أمية المعلم البصريّ، أهل العلم مطبقون على تضعيفه.

والرّاوي عنه ابن أبي ليلى وهو محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى"صدوق، سيء الحفظ جدًّا" كما في"التقريب". وفي الباب أحاديث أخرى وفي كلّها مقال، إلّا أن بعضه يشدّ بعضًا ويقويه، وبه أخذ الجمهور.

قال مالك في"الموطأ":"السنة التي لا خلاف فيها عندنا أن الزكاة تجب في عشرين دينارًا عينًا، كما تجب في مائتي درهم".

وقال الشافعيّ في"الرسالة" (ص 192):"وفرض رسول الله صلى الله عليه وسلم في الورق صدقة، وأخذ المسلمون في الذهب بعد صدقة، إما بخبر عن النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يبلغنا، وإما قياسًا على أن الذهب والورق نقدُ الناس الذي اكتنزوه وأجازوه أثمانًا على ما تبايعوا به في البلدان قبل الإسلام وبعده".

وقال الحنفية كما في"أصول السرخسيّ" (ص 110):"لا خلاف بين أصحابنا المتقدمين والمتأخرين أن قول الواحد من الصحابة حجة فيما لا مدخل للقياس في معرفة الحكم فيه، وذلك نحو المقادير التي لا تعرف بالرأي". وذكر منها زكاة الذّهب.

وخالفهم في ذلك طاوس، والزهريّ، وعطاء، وسليمان بن حرب فقالوا: نصاب الذّهب تقويمه بالفضّة. وقال الحسن البصريّ: نصابه أربعون دينارًا.

والصّواب ما ذهب إليه الجمهور، واتفقوا بعد هذا الخلاف على أنّ نصاب الذهب عشرون
دينارًا، وهو ما يساوي اليوم (85 جرامًا). وأمّا الفضة فيساوي (595 جرامًا).

ومن كان لديه أوراق نقدية فيقدّره بالفضة لأن فيه مصلحة للفقراء.




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন তোমার দু’শ দিরহাম হবে এবং তার উপর এক বছর পূর্ণ হবে, তখন তাতে পাঁচ দিরহাম (যাকাত) ফরয হবে। আর তোমার উপর সোনার ক্ষেত্রে কোনো যাকাত নেই, যতক্ষণ না তোমার বিশ দীনার হয়। অতঃপর যখন তোমার বিশ দীনার হবে এবং তার উপর এক বছর পূর্ণ হবে, তখন তাতে অর্ধ দীনার (যাকাত) ফরয হবে। আর যা এর চেয়ে বেশি হবে, তার হিসাবও সেই অনুপাতে হবে।”