হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (3881)


3881 - عن جابر بن عبد الله، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"وليس فيما دون خمسة أوسق من التّمر صدقة".

صحيح: رواه مسلم في الزكاة (980) من طرق عن ابن وهب، أخبرني عياض بن عبد الله، عن أبي الزّبير، عن جابر بن عبد الله، فذكره.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "পাঁচ ওয়াসাকের কম পরিমাণ খেজুরের উপর কোনো যাকাত (সদকা) নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3882)


3882 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ليس فيما دون خمسة أوسق صدقة".

صحيح: رواه الإمام أحمد (9221، 9232) من وجهين عن عبد الله بن المبارك، أخبرنا معمر، قال: حدثني سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره. وإسناده صحيح.

وأمّا ما رُوي عن أبي سعيد الخدريّ مرفوعًا:"الوَسق ستون صاعًا" فهو ضعيف من أجل الانقطاع.

رواه أبو داود (1559)، والنسائيّ (5/ 40)، وابن ماجه (1832)، وابن خزيمة في صحيحه (2310) كلّهم من طريق أبي البختريّ، عن أبي سعيد، فذكره.

وأبو البختريّ لم يسمع من أبي سعيد، كما قال أبو داود. ولفظ ابن خزيمة:"الوسق ستون مختومًا". وقال:"يريد المختوم الصاع، وقال: لا خلاف بين العلماء أن الوسق ستون صاعًا".

قلت: فنصاب الزّروع والثمار خمسة أوسق وهو ما يساوي اليوم 653 كيلو غرام تقريبًا، إن كان الصاع يساوي 2 كيلو و 176 غرام.

هكذا قدّره الدكتور القرضاوي في كتابه فقه"الزكاة" (1/ 371 - 373).




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পাঁচ ওসাকের কম হলে তাতে কোনো সদকা (যাকাত) নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3883)


3883 - عن أبي أمامة بن سهل، عن أبيه، قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الجعرور، ولون الحُبيق أن يؤخذ في الصّدقة.

قال الزهريّ: لونين من تمر المدينة.

قال أبو داود: وأسنده أيضًا أبو الوليد، عن سليمان بن كثير، عن الزّهريّ.

حسن: رواه أبو داود (1607) عن محمد بن يحيى بن فارس، حدّثنا سعيد بن سليمان، حدّثنا عبّاد، عن سفيان بن حسين، عن الزّهريّ، عن أبي أمامة بن سهل، عن أبيه، فذكره.

وصحّحه ابن خزيمة (2313) ورواه من طريق سعيد بن سليمان.

قلت: إسناده حسن من أجل متابعة سليمان بن كثير سفيانَ بن حسين وهو أبو محمد أو أبو الحسن الواسطيّ، وهو ثقة في غير الزهريّ.

ولعلّ أبا داود تنبّه لذلك فذكر هذه المتابعة قائلًا:"وأسنده أيضًا أبو الوليد، عن سليمان بن كثير، عن الزهريّ". ووصله ابن أبي حاتم في تفسيره (2802) عن أبيه، عن أبي الوليد، به.

وسليمان بن كثير هو العبديّ البصريّ لا بأس به، ولكن في غير الزهريّ كما قال الحافظ في التقريب.

فاجتماعهما في رواية هذا الحديث عن الزهريّ مشعر بأنّهما لم يخطئا فيه.

ولكن يعكّر هذا ما رواه النسائيّ (2494) وصحّحه ابن خزيمة (2312) كلاهما من حديث عبد الجليل بن حميد اليحصبيّ، أنّ ابن شهاب حدّثه قال: حدّثني أبو أمامة بن سهل بن حنيف في الآية التي قال الله عز وجل: {وَلَا تَيَمَّمُوا الْخَبِيثَ مِنْهُ تُنْفِقُونَ} [البقرة: 267] قال:"هو الجعرور ولون الحبيق، فنهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تؤخذ في الصدقة الرّذالة".

فلم يقل عبد الجليل بن حميد"عن أبيه"، وتابعه على ذلك محمد بن أبي حفصة. ومن طريقه رواه ابن خزيمة أيضًا (2311).

وأبو أمامة واسمه أسعد بن سهل، ولد في حياة النبيّ صلى الله عليه وسلم وليست له صحبة، وما روي عنه فهو مرسل، وقد رُوي عن جماعة من الصحابة منهم أبوه سهل بن حنيف. فلا يستبعد أن يكون هذا الحديث سمعه من أبيه.

فيكون الطريقان محفوظين، فكان أبو أمامة أحيانًا يسنده عن أبيه، وأحيانًا يرسله. فكان الزهريّ يرويه على الوجهين. فإذا كان كذلك فلا يُعلُّ المسند بالمرسل، والله أعلم.




সাহল ইবনু হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাদাকা (যাকাত) হিসেবে গ্রহণ করতে জা'রূর এবং লওনুল হুবাইক নামক খেজুরকে নিষেধ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3884)


3884 - عن عوف بن مالك قال: دخل علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم وبيده عصا، وقد علَّق
رجلٌ قنًّا حشفًا، فطعن بالعصا في ذلك القِنو وقال:"لو شاء ربُّ هذه الصّدقة تصدَّق بأطيب منها". وقال:"إنّ ربَّ هذه الصّدقة يأكل الحشف يوم القيامة".

حسن: رواه أبو داود (1608)، والنّسائيّ (2495)، وابن ماجه (1821) كلّهم من حديث يحيى بن سعيد، عن عبد الحميد بن جعفر، حدّثني صالح بن أبي عريب، عن كثير بن مرة الحضرميّ، عن عوف بن مالك، فذكره.

وصحّحه ابن خزيمة (2467)، وابن حبان (6774)، والحاكم (2/ 285)، (4/ 425 - 426).

وذكره الحافظ في"الفتح" وقال:"إسناده صحيح".

قلت: هو حسن بما قبله لأنّ فيه صالح بن أبي عريب رُوي عنه جماعة، ولكن لم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال الحافظ في التقريب"مقبول" أي إذا توبع، ولم يتابع فهو ليّن الحديث.

لكن لا بأس به في الشّواهد، وقد صحّحه عددٌ من أهل العلم كما مضى.

وأخرجه أيضًا الإمام أحمد (23976) من هذا الطريق وزاد في آخره:"ثم أقبل علينا فقال: أما والله! يا أهل المدينة لتدعُنَّها أربعين عامًا للعوافي".

قال:"فقلت: والله أعلم قال يعني الطّير والسّباع". قال: وكنا نقول: إنّ هذا الذي تسميه العجم الكراكي". انتهي.

والكراكي: جمع كَرْكي - وهو طائر معروف كبير أغبر اللون، طويل العنق والرجلين، أبتر الذنب، قليل اللّحم.

وقوله:"قنًّا حشفّا" القنّ -بالكسر والفتح- مقصور، هو العذق بما فيه من الرّطب. والقِنْو - بكسر القاف أو ضمها، وسكون النون- جمعه: قنوان، وأقناء.

والحشف: بفتحتين - هو اليابس الفاسد من التمر.




আওফ ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিকট আগমন করলেন, তাঁর হাতে ছিল একটি লাঠি। এ সময় এক ব্যক্তি শুকিয়ে যাওয়া (খারাপ) খেজুরের ছড়া ঝুলিয়ে রেখেছিল। তিনি লাঠি দিয়ে সেই ছড়ায় আঘাত করলেন এবং বললেন: "এই সদকার (দানকৃত বস্তুর) মালিক যদি চাইত, তবে এর চেয়ে উত্তম জিনিস সদকা করতে পারত।" এবং তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই এই সদকার মালিক কিয়ামতের দিন শুকনো (খারাপ) খেজুর খাবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3885)


3885 - عن البراء بن عازب في قوله سبحانه: {وَمِمَّا أَخْرَجْنَا لَكُمْ مِنَ الْأَرْضِ وَلَا تَيَمَّمُوا الْخَبِيثَ مِنْهُ تُنْفِقُونَ} قَالَ: نَزَلَتْ فِي الْأَنْصَارِ كَانَتِ الْأَنْصَارُ تُخْرِجُ إِذَا كَانَ جِدَادُ النَّخْلِ مِنْ حِيطَانِهَا أَقْنَاءَ الْبُسْرِ، فَيُعَلِّقُونَهُ عَلَى حَبْلٍ بَيْنَ أُسْطُوَانَتَيْنِ فِي مَسْجِدِ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَيَأْكُلُ مِنْهُ فُقَرَاءُ الْمُهَاجِرِينَ فَيَعْمِدُ أَحَدُهُمْ فَيُدْخِلُ قِنْوًا فِيهِ الْحَشَفُ يَظُنُّ أَنَّهُ جَائِزٌ فِي كَثْرَةِ مَا يُوضَعُ مِنَ الْأَقْنَاءِ، فَنَزَلَ فِيمَنْ فَعَلَ ذَلِكَ {وَلَا تَيَمَّمُوا الْخَبِيثَ مِنْهُ تُنْفِقُونَ} يَقُولُ: لَا تَعْمِدُوا لِلْحَشَفِ مِنْهُ تُنْفِقُونَ {وَلَسْتُمْ بِآخِذِيهِ إِلَّا أَنْ تُغْمِضُوا فِيهِ} يَقُولُ: لَوْ أُهْدِيَ لَكُمْ مَا قَبِلْتُمُوهُ إِلَّا عَلَى اسْتِحْيَاءٍ مِنْ صَاحِبِهِ، غَيْظًا أَنَّهُ بَعَثَ إِلَيْكُمْ مَا لَمْ يَكُنْ لَكُمْ فِيهِ حَاجَةٌ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنْ صَدَقَاتِكُمْ".

حسن: رواه ابن ماجه (1822) عن أحمد بن محمد بن يحيى بن سعيد القطان، قال: حدّثنا
عمرو بن محمد العنقريّ، قال: حدّثنا أسباط بن نصر، عن السُّديّ، عن عدي بن ثابت، عن البراء ابن عازب، فذكره.

ورواه الترمذي (2987) من وجه آخر عن السّديّ، عن أبي مالك، عن البراء بن عازب، قال: وهذا لفظه:" {وَلَا تَيَمَّمُوا الْخَبِيثَ مِنْهُ تُنْفِقُونَ} قال: نزلت فينا معشر الأنصار، كنّا أصحاب نخل، فكان الرّجلُ يأتي من نخله على قدر كثرته وقلّته، وكان الرّجل يأتي بالقنو والقنوين فيعلِّقه في المسجد، وكان أهل الصُّفّة ليس لهم طعام، فكان أحدهم إذا جاع أتي القنو فضربه بعصاه فيسقط البُسْر والتَّمرُ فيأكل، وكان ناسٌ ممّن لا يرغبُ في الخير يأتي الرجلُ بالقِنُو فيه الشِّيصُ والحَشَف، وبالقنو قد انكسر فيعلِّقه، فأنزل الله تبارك وتعالى: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا أَنْفِقُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا كَسَبْتُمْ وَمِمَّا أَخْرَجْنَا لَكُمْ مِنَ الْأَرْضِ وَلَا تَيَمَّمُوا الْخَبِيثَ مِنْهُ تُنْفِقُونَ وَلَسْتُمْ بِآخِذِيهِ إِلَّا أَنْ تُغْمِضُوا فِيهِ} قالوا: لو أنَّ أحدهم أُهدي إليه مثلُ ما أعطاهُ لم يأخذْه إلا على إغماض أو حياء. قال: فكُنّا بعد ذلك يأتي أحدُنا بصالح ما عنده".




বারা' ইবনে আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ তাআলার বাণী: {আর যা আমরা তোমাদের জন্য ভূমি থেকে উৎপাদন করেছি, তার মধ্য থেকে (দান করো), এবং তোমরা খারাপ (নিকৃষ্ট) বস্তুকে বেছে নিও না, যা তোমরা (আল্লাহর পথে) খরচ করবে} সম্পর্কে তিনি বলেন: এই আয়াতটি আনসারদের সম্পর্কে নাযিল হয়েছিল। আনসারগণ যখন খেজুর কাটার সময় আসত, তখন তারা তাদের বাগান থেকে কাঁচা খেজুরের কাঁদি বের করে আনতেন এবং তা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের মসজিদে দুটি খুঁটির মাঝে রশিতে ঝুলিয়ে রাখতেন। ফলে অভাবী মুহাজিরগণ তা থেকে খেতেন। তাদের কেউ কেউ ইচ্ছা করে এমন কাঁদিও ঢুকিয়ে দিত যার মধ্যে নিকৃষ্ট খেজুর (হাশাফ) থাকত। তারা ভাবত যে এত অধিক পরিমাণ কাঁদি রাখা হচ্ছে, তাতে এটি বৈধ হবে। অতঃপর যারা এই কাজ করেছিল, তাদের সম্পর্কে এই আয়াত নাযিল হয়: {আর তোমরা খারাপ (নিকৃষ্ট) বস্তুকে বেছে নিও না, যা তোমরা খরচ করবে।} তিনি বলেন, অর্থাৎ তোমরা নিকৃষ্ট খেজুরগুলো বেছে নিও না যা তোমরা দান করবে। {আর তোমরা তা গ্রহণ করতে না, তবে চোখ বন্ধ করে ছাড়া।} তিনি বলেন, যদি তোমাদেরকে এমন জিনিস উপহার দেওয়া হতো, তবে তোমরা তোমাদের দানকারীর প্রতি লজ্জার কারণে ছাড়া তা গ্রহণ করতে না; (কারণ তোমাদের) রাগ হতো যে সে তোমাদের কাছে এমন জিনিস পাঠিয়েছে যার প্রয়োজন তোমাদের নেই। আর জেনে রাখো, আল্লাহ তোমাদের সাদাকা (দান) থেকে সম্পূর্ণ অমুখাপেক্ষী।









আল-জামি` আল-কামিল (3886)


3886 - عن قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح غريب، وأبو مالك هو الغفاريّ، ويقال: اسمه غزوان".

قلت: إسناده حسن من أجل السّديّ وهو إسماعيل بن عبد الرحمن بن أبي كريمة من رجال مسلم مختلف فيه، فكذّبه الجوزجانيّ وأفرط فيه لعلّه لتشيّعه، ووثقه الإمام أحمد وقال النسائي:"صالح"، وقال ابن عدي:"له أحاديث يرويها عن عدّة شيوخ وهو عندي مستقيم الحديث، صدوق لا بأس به".

قلت: ولعلّ هذا الحديث مما يرويه عن شيخين وكلاهما صدوقان، وصحّحه الحاكم (2/ 285) على شرط مسلم.




৩৮৮৬ - [বর্ণিত] আছে যে, ইমাম তিরমিযী বলেছেন: "এই হাদীসটি হাসান সহীহ গারীব (সহীহ, তবে একক সূত্রে বর্ণিত), আর আবূ মালিক হলেন আল-গিফারী। বলা হয়, তাঁর নাম গাযওয়ান।"

আমি (ভাষ্যকার) বলি: এর সনদ হাসান ('সুদ্দী'র কারণে), আর তিনি হলেন ইসমাঈল ইবনু আব্দির্ রহমান ইবনু আবী কারীমা, যিনি মুসলিমের বর্ণনাকারীদের অন্তর্ভুক্ত হলেও তার ব্যাপারে মতানৈক্য রয়েছে। আল-জাওযাজানী তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন এবং তার সমালোচনায় বাড়াবাড়ি করেছেন, সম্ভবত তার শী'ঈ মতাদর্শের কারণে। ইমাম আহমাদ তাকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন এবং নাসাঈ বলেছেন: "সালেহ (গ্রহণযোগ্য)"। আর ইবনু আদী বলেছেন: "তিনি বেশ কিছু শাইখ থেকে হাদীস বর্ণনা করেছেন এবং আমার মতে তিনি হাদীসের ক্ষেত্রে নির্ভুল ও সত্যবাদী, তার ব্যাপারে কোনো সমস্যা নেই।"

আমি বলি: সম্ভবত এই হাদীসটি এমন একটি হাদীস যা তিনি দুইজন শাইখ থেকে বর্ণনা করেছেন এবং তারা উভয়েই সত্যবাদী। আর হাকেম (২/২৮৫) মুসলিমের শর্তানুসারে এটিকে সহীহ বলেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3887)


3887 - عن * *




৩৮৮৭ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (3888)


3888 - عن رافع بن خديج قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"العامل على الصّدقة بالحقّ كالغازي في سبيل الله حتّى يرجع إلى بيته".

حسن: رواه أبو داود (2936)، والترمذيّ (645)، وابن ماجه (1809) كلّهم من طريق محمد ابن إسحاق، عن عاصم بن عمر بن قتادة، عن محمود بن لبيد، عن رافع بن خديج، فذكره.

وصحّحه ابن خزيمة (2334)، والحاكم (1/ 406) وقال:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنّه مدلِّس وقد عنعن، ولكن صرَّح بالتّحديث في رواية عند الإمام أحمد (17285) فانتفتْ عنه تهمة التّدليس، وهو حسن الحديث إذا صرَّح.

وقد تابعه يزيد بن عياض، عن عاصم بن عمر بن قتادة - ومن طريقه أيضًا رواه الترمذيّ وقال:"حديث رافع بن خديج حديث حسن صحيح، ويزيد بن عياض ضعيف عند أهل الحديث، وحديث محمد بن إسحاق أصح". انتهى كلام الترمذيّ.

قلت: يزيد بن عياض هو ابن جُعْديّة -بضم الجيم وسكون العين- اللّيثيّ ضعيف جدًّا، كذّبه مالك وغيره، قال البخاريّ:"منكر الحديث". وقال النّسائيّ:"متروك". فمثله لا ينفع في المتابعات.




রাফি' ইবন খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি ন্যায্যভাবে (সততার সাথে) সাদকা (যাকাত) আদায়কারী, সে আল্লাহর পথে যুদ্ধকারীর (মুজাহিদের) মতো, যতক্ষণ না সে তার ঘরে ফিরে আসে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3889)


3889 - عن أبي حميد السّاعديّ قال: اسْتَعْمَلَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم رَجُلًا مِنَ الْأَسْدِ يُقَالُ لَهُ: ابْنُ اللُّتْبِيَّةِ -قَالَ عَمْرٌو وَابْنُ أَبِي عُمَرَ: عَلَى الصَّدَقَةِ- فَلَمَّا قَدِمَ قَالَ: هَذَا لَكُمْ، وَهَذَا لِي أُهْدِيَ لِي. قَالَ: فَقَامَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَلَى الْمِنْبَرِ، فَحَمِدَ اللهَ وَأَثْنَى عَلَيْهِ، وَقَالَ:"مَا بَالُ عَامِلٍ أَبْعَثُهُ، فَيَقُولُ: هَذَا لَكُمْ، وَهَذَا أُهْدِيَ لِي! أَفَلَا قَعَدَ فِي بَيْتِ أَبِيهِ أَوْ فِي بَيْتِ أُمِّهِ حَتَّى يَنْظُرَ أَيُهْدَى إِلَيْهِ أَمْ لَا؟ ! وَالَّذِي نَفْسُ مُحَمَّدٍ بِيَدِهِ! لَا يَنَالُ أَحَدٌ مِنْكُمْ مِنْهَا شَيْئًا إِلَّا جَاءَ بِهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ يَحْمِلُهُ عَلَى عُنُقِهِ، بَعِيرٌ لَهُ رُغَاءٌ، أَوْ بَقَرَةٌ لَهَا خُوَارٌ، أَوْ شَاةٌ تَيْعِرُ". ثُمَّ رَفَعَ يَدَيْهِ حَتَّى رَأَيْنَا عُفْرَتَيْ إِبْطَيْهِ، ثُمَّ قَالَ:"اللَّهُمَّ! هَلْ بَلَّغْتُ". مَرَّتَيْنِ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الأيمان والنّذور (366)، ومسلم في الإمارة (1832) كلاهما من حديث الزّهريّ، عن عروة، عن أبي حميد السّاعديّ، فذكره. واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه.

قال أبو حميد: وقد سمع ذلك معي زيد بن ثابت من النبيّ صلى الله عليه وسلم فسلوه.

وابن اللّتبية هو عبد الله بن اللّتبية بن ثعلبة الأزدي.

ورُويت هذه القصّة عن عائشة رضي الله عنها أيضًا قالت:"إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث رجلًا مصدّقًا يقال لَهُ: ابن اللتبية، فصدق ثُمَّ رجع إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يَا رسول الله! مَا تركتُ لكم حقًا ولقد أهدي إلي فقبلت الهديّة، فجلس رسول الله صلى الله عليه وسلم على المنبر فقال:"إنّي أبعث رجالًا عَلَى الصّدقة فيأتي أحدهم فيقول: والله! مَا تعديتُ ولا تركت لكم حقًا، ولقد أُهدي إليّ فقبلت الهدية! ألا جلس فِي حقش أمِّه فينظر من هَذَا يهدي لَهُ؟ ! إيّاكم وأن يأتي أحدكم على عاتقه ببعير لَهُ رغاء، أو بقرة لَهَا خوار، أو شاة تيعر". ثُمَّ رفع يديه حَتَّى نُظر إلى بياض إبطيه.

رواه البزار -"كشف الأستار" (899) - عن معمر بن سهل، ثنا إبراهيم بن إسماعيل بن نصر، ثنا إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبية، عن داود بن الحصين، عن يزيد بن رومان، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.

قال البزّار:"روي هذا هشام والزّهريّ عن عروة، عن أبي حميد، وروي يزيد بن رومان، عن عروة، عن أبي حميد، ولكن هكذا قال ابن أبي حبيبة، ولا نعلمه عن عائشة إلا من هذا الوجه".

وقال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 85):"وفيه إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة وهو ضعيف".

قلت: وهو كما قال، فإنّ إبراهيم بن إسماعيل هذا قال فيه ابن حبان:"كان يقلِّب الأسانيد ويرفع المراسيل"، ولعلّ هذا منه، وضعفه جمهور أهل العلم إلّا أنّ أحمد كان حسن الرّأي فيه.




আবূ হুমাইদ আস-সা'ইদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আল-আযদ গোত্রের ইবনুল লুতবিয়্যাহ নামক এক ব্যক্তিকে সাদাকাহ (যাকাত) সংগ্রহের দায়িত্বে কর্মকর্তা হিসেবে নিয়োগ দিলেন। যখন সে (যাকাত সংগ্রহ করে) ফিরে এল, তখন বলল: "এই অংশ আপনাদের জন্য, আর এই অংশটি আমার জন্য—আমাকে হাদিয়াস্বরূপ দেওয়া হয়েছে।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মিম্বরে দাঁড়ালেন। তিনি আল্লাহ্‌র প্রশংসা ও গুণগান করলেন এবং বললেন: "আমি যে কর্মচারীকে প্রেরণ করি, তার কী হলো যে সে এসে বলে: 'এই অংশ তোমাদের জন্য, আর এই অংশটি আমাকে হাদিয়া দেওয়া হয়েছে!' সে তার পিতা-মাতার ঘরে বসে থাকল না কেন—যাতে দেখতে পেত তাকে হাদিয়া দেওয়া হয় কি হয় না?! মুহাম্মাদের জীবন যাঁর হাতে, তাঁর শপথ! তোমাদের কেউ যদি তা থেকে সামান্য কিছুও আত্মসাৎ করে, তবে কিয়ামতের দিন অবশ্যই সে তা নিজের ঘাড়ে বহন করে নিয়ে আসবে—তা হবে উট, যা শব্দ (রুগা) করবে, অথবা গাভী, যা হাম্বা (খুওয়ার) রব করবে, অথবা ছাগল, যা ভ্যা-ভ্যা (ইয়া'র) করবে।" অতঃপর তিনি তাঁর উভয় হাত এত উপরে উঠালেন যে আমরা তাঁর বগলের শুভ্রতা দেখতে পেলাম। এরপর তিনি দু'বার বললেন: "হে আল্লাহ! আমি কি পৌঁছে দিয়েছি?"









আল-জামি` আল-কামিল (3890)


3890 - عن عدي بن عَميرة الكنديّ قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من استعملناه منكم على عمل فكتمنا مخيطًا فما فوقه كان غُلُولا يأتي به يوم القيامة". قال: فقام إليه رجل أسود من الأنصار كأني أنظر إليه فقال: يا رسول الله! اقبل عني عملك. قال:"وما لك؟". قال: سمعتك تقول كذا وكذا، قال:"وأنا أقوله الآن من استعملناه ومنكم على عملٍ فليجئ بقليله وكثيره، فما أُوتي منه أخذ وما نُهِيَ عنه انتهى".

صحيح: رواه مسلم في الإمارة (1833) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا وكيع بن الجرّاح، حدّثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس بن أبي حازم، عن عدي بن عميرة الكنديّ، قال (فذكره).




আদী ইবনে উমাইরা আল-কিন্দী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি, "তোমাদের মধ্যে যাকে আমরা কোনো কাজের দায়িত্বে নিযুক্ত করি, আর সে যদি আমাদের থেকে একটি সুঁই কিংবা তার চেয়েও বড় কোনো কিছু গোপন করে, তবে তা খেয়ানত (আত্মসাৎ) হিসেবে গণ্য হবে এবং সে কিয়ামতের দিন তা নিয়ে উপস্থিত হবে।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন আনসারদের মধ্য থেকে একজন কালো রঙের লোক দাঁড়ালেন—যেন আমি এখনো তাকে দেখতে পাচ্ছি—এবং বললেন: "ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমার পক্ষ থেকে আমার দায়িত্ব আপনি ফিরিয়ে নিন।" তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তোমার কী হলো?" লোকটি বলল: "আমি আপনাকে এমন এমন কথা বলতে শুনেছি।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি এখনও সেই কথাই বলছি। তোমাদের মধ্যে যাকে আমরা কোনো দায়িত্বে নিযুক্ত করি, সে যেন তার সামান্য ও বেশি—সবকিছু নিয়ে আসে। তাকে যা দেওয়া হয়, সে তা গ্রহণ করবে, আর যা থেকে নিষেধ করা হয়, তা থেকে বিরত থাকবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (3891)


3891 - عن أبي مسعود الأنصاريّ، قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم ساعيًا ثم قال:"انْطَلِقْ أَبَا مَسْعُودٍ وَلا أُلْفِيَنَّكَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ تَجِيءُ وَعَلَى ظَهْرِكَ بَعِيرٌ مِنْ إِبِلِ الصَّدَقَةِ لَهُ رُغَاءٌ قدْ
غَلَلْتَهُ". قال: إِذًا لا أَنْطَلِقُ. قَالَ:"إِذًا لا أُكْرِهُكَ".

حسن: رواه أبو داود (2947) عن عثمان بن أبي شيبة، حدّثنا جرير، عن مطرَّف، عن أبي الجهم، عن أبي مسعود، فذكره.

وأبو الجهم هو سليمان بن جهم بن أبي الجهم الأنصاريّ الحارثي أبو الجهم الجوزجاني مولي البراء بن عازب، قال ابن عدي:"لا أعلم أحدًا روى عنه غير مطرّف". ووثقه ابن حبان، والعجليّ، وأثنى عليه مطرّف بن طريف الرّاوي عنه، فهو حسن الحديث.

ووهمَ الحافظ الهيثميّ رحمه الله فذكره في"المجمع" (3/ 86) وهو ليس من الزّوائد، وأصاب الحافظ المنذريّ فعزاه في"الترغيب" إلى أبي داود فقط.




আবু মাসঊদ আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে যাকাত আদায়কারী (সাঈ) হিসেবে প্রেরণ করলেন। এরপর তিনি বললেন: "হে আবু মাসঊদ, যাও (কাজ শুরু করো)। আর কিয়ামতের দিন যেন আমি তোমাকে এই অবস্থায় না দেখি যে, তুমি এমন একটি সাদাকার উট পিঠে নিয়ে আসছো যেটি তুমি আত্মসাৎ করেছ এবং যার থেকে (তখনও) গোঁ গোঁ আওয়াজ হচ্ছে।" তিনি (আবু মাসঊদ) বললেন: "তাহলে আমি যাবো না।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে আমি তোমাকে বাধ্য করব না।"









আল-জামি` আল-কামিল (3892)


3892 - عن عبادة بن الصامت أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثه عَلَى الصّدقة فقال:"يَا أبا الوليد! اتقِّ الله لا تأتِ يوم القيامة ببعير تحمله لَهُ رغاء، أو بقرة لَهَا خوار، أو شأة لَهَا ثغاء". فقال: يا رسول الله! إنَّ ذَلِكَ لكذلك؟ قال:"أي والذي نفسي بيده!". قال: فو الَّذِي بعثك بالحق! لا أعمل لَكَ عَلَى شيء أبدًا.

صحيح: رواه الطبراني في"الكبير" ورجاله رجال الصحيح. قاله الهيثميّ في"المجمع" (3/ 86) إلّا أني لم أقف على إسناده؛ لأن هذا الجزء من حديث عبادة بن الصامت لم يطبع.

وقال المنذريّ في"الترغيب والترهيب" (1180) بعد أن عزاه إلى الطبراني في الكبير:"إسناده صحيح".

قوله:"لَهُ رغاء" وهو صوت البعير.

و"الخوار" صوت البقر.

و"الثغاء" صوت الغنم.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে সাদাকা (যাকাত) সংগ্রহের কাজে প্রেরণ করলেন। অতঃপর তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আবুল ওয়ালীদ! আল্লাহকে ভয় করো। এমন যেন না হয় যে, কিয়ামতের দিন তুমি কোনো উট বহন করে নিয়ে আসবে, যার (যন্ত্রণাগ্রস্ত) গর্জন থাকবে, অথবা এমন কোনো গরু, যার হাম্বা ধ্বনি থাকবে, অথবা এমন কোনো ছাগল, যার ভেড়ার ডাক থাকবে।" তিনি (উবাদাহ) বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! এটা কি সত্যিই এমন হবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হ্যাঁ, যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর শপথ!" তিনি বললেন, যিনি আপনাকে সত্যসহ প্রেরণ করেছেন, তাঁর শপথ! আমি আপনার জন্য এরপর কখনো কোনো কিছুর (যাকাত সংগ্রহের) কাজ করব না।









আল-জামি` আল-কামিল (3893)


3893 - عن ابن عمر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بعث سعد بن عبادة مصدّقًا وقال:"إيّاك يا سعد! أن تجيء يوم القيامة ببعير له رغاء". فقال: لا أجده، ولا أجيء به، فأعفاه.

صحيح: رواه البزّار -كشف الأستار (898) - عن سعيد بن يحيى بن سعيد الأمويّ، ثنا أبي، ثنا يحيى بن سعيد الأنصاريّ، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 86):"رواه البزّار ورجاله رجال الصحيح".

وصحّحه ابن حبان (3270)، والحاكم (1/ 399) كلاهما من هذا الوجه.

قال البزّار: لا نعلم رواه هكذا إلّا يحيى الأمويّ.

قلت: لا يضرّ تفرّده فإنّ يحيى الأمويّ هو ابن سعيد بن أبان الأمويّ وثقه ابن معين وأبو داود وغيرهما وله ما يشهده لأصل القصّة.

وجعله الحاكم شاهدًا لحديث أبي رغال، وقال:"صحيح على شرط الشيخين".
قلت: وحديث أبي رغال فيه انقطاع كما قال الذهبي وهو الآتي بعد قليل.

هذا هو الصحيح من حديث ابن عمر في بعث سعد بن عبادة مصدّقًا.

وأما ما رواه سعيد بن المسيب، عن سعد بن عبادة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال له:"قم على صدقة بني فلان، وانظر لا تأتي يوم القيامة ببكر تحمله على عاتقك، أو على كاهلك له رغاء يوم القيامة". قال: يا رسول الله! اصرفها عني فصرفها عنه. ففيه انقطاع.

رواه الإمام أحمد (22461)، والبزّار -كشف الأستار (897) -، والطبراني في الكبير (5363) كلّهم من حديث سليمان بن المغيرة، حدّثنا حميد بن هلال، عن سعيد بن المسيب، عن سعد بن عبادة، فذكره.

قال البزّار:"لا نعلمه عن سعد إلّا من هذا الوجه، وإسناده حسن".

قلت: لا بل فيه انقطاع؛ فإنّ سعيد بن المسيب لم يدرك سعد بن عبادة. انظر"المجمع" (3/ 85).




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সা’দ ইবনু উবাদাহ্ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে যাকাত সংগ্রাহক হিসেবে প্রেরণ করেন এবং তিনি বললেন: "হে সা’দ! তুমি কিয়ামতের দিন এমন কোনো উট নিয়ে আসা থেকে সাবধান থেকো, যার চিৎকার থাকবে।" তিনি (সা’দ) বললেন: আমি তা খুঁজেও দেখব না এবং তা নিয়েও আসব না। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে অব্যাহতি দেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3894)


3894 - عن عمر بن الخطاب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّي ممسك بحجزكم عن النار هَلُمّ عن النار وأنتم تهافتون فيها -أو تقاحمون فيها- تقاحُمَ الفراش في النّار، والجنادب يعني في النار، وأنا ممسك بحجزكم، وأنا فرط لكم عَلَى الحوض، فتردون عليَّ معًا وأشتاتًا فأعرفكم بسيماكم وأسمائكم كما يعرف الرجل الفرس -وقال غيره: كَمَا يعرف الرجلُ الغريبة من الإبل في إبله- فيؤخذ بكم ذاتَ الشِّمال، فأقول: إليَّ يا ربّ! بأمّتي أمّتي. فيقول -أو يقال-: يَا محمد! إنك لا تدري مَا أحدثوا بعدك، كانوا يمشون بعدك القهقرى. فلا أعرفنَّ أحدكم يأتي يوم القيامة يحمل شاة لَهَا ثغاء ينادي: يَا محمد! فأقول: لا أملك لَكَ شيئًا قَدْ بلّغت، ولا أعرفنَّ أحدكم يأتي يوم القيامة ببعير لَهُ رُغاء فينادي يَا محمد! فأقول: لا أملك لَكَ من الله شيئًا قَدْ بلّغت، ولا أعرفنّ أحدكم يأتي يوم القيامة يحمل قشعًا، فيقول: يَا محمد! يَا محمد! فأقول: لا أملك لَكَ شيئًا قَدْ بلّغت".

حسن: رواه البزّار -كشف الأستار (900) - عن الفضل بن سهل، ثنا مالك بن إسماعيل، ثنا يعقوب بن عبد الله القمّيّ، عن حفص بن حمد، عن عكرمة، عن ابن عباس، عن عمر بن الخطاب، فذكره.

قال البزّار:"لا نعلمه عن عمر إلّا بهذا الإسناد، وحفص لا نعلم روى عنه إلا القمّيّ".

قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في يعقوب بن عبد الله القميّ غير أنه حسن الحديث.

وأمّا حفص بن حميد فهو القميّ أبو عبيد، قال ابن معين: صالح، وذكره ابن حبان في"الثقات" إلّا أن ابن المديني قال فيه:"مجهول"، وهو يطلق هذه الكلمة على غير المشهورين في
رواية الحديث، وقد يصحح حديثه.

وحفص بن حميد هذا لم ينفرد عنه يعقوب بن عبد الله القميّ كما قال البزّار، بل روى عنه أيضًا أشعث بن إسحاق القميّ، والخلاصة فيه أنه حسن الحديث.

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (3/ 85)، والمنذري في الترغيب والترهيب (1185) وقالا: رواه أبو يعلى والبزار. قال الهيثمي: رواه أبو يعلى في الكبير، ورجال الجميع ثقات. وقال المنذري: إسنادهما جيد.

وقوله:"قِشَعًا" بكسر القاف، وفتح الشين -القِرْبة اليابسة، وقيل: بيت من أُدم. وفي رواية أبي يعلى:"سقاء" كما يفهم من قول الحافظين الهيثميّ والمنذريّ.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আমি তোমাদের কোমর ধরে জাহান্নামের আগুন থেকে টেনে রাখছি। আগুন থেকে সরে এসো! অথচ তোমরা আগুনে এমনভাবে ঝাঁপিয়ে পড়ছো, যেমন পতঙ্গেরা ও ফড়িংয়েরা আগুনে ঝাঁপিয়ে পড়ে। আর আমি তোমাদের কোমর ধরে রাখছি। আমি হাউযের (কাউসার) কাছে তোমাদের জন্য অগ্রগামী অপেক্ষাকারী হিসেবে থাকব। তোমরা আমার কাছে দলবদ্ধভাবে এবং বিচ্ছিন্নভাবে আসতে থাকবে। আমি তোমাদেরকে তোমাদের বাহ্যিক চিহ্ন (সিমা) এবং নাম দিয়ে চিনতে পারব, যেমন একজন মানুষ তার ঘোড়াকে চেনে (—অন্য বর্ণনাকারী বলেছেন: যেমন একজন মানুষ তার পালের উটের মধ্যে কোনো অপরিচিত উটকে চেনে—)। অতঃপর তোমাদের বাম দিকে (জাহান্নামের দিকে) ধরে নিয়ে যাওয়া হবে। তখন আমি বলব: 'হে আমার রব! আমার উম্মত! আমার উম্মত!' তখন তিনি বলবেন—অথবা বলা হবে: 'হে মুহাম্মাদ! তুমি জানো না, তোমার পরে এরা কী নতুন কিছু ঘটিয়েছে। তারা তোমার পরে পশ্চাৎপদ হয়েছিল (দ্বীন থেকে ফিরে গিয়েছিল)।'

আমি যেন তোমাদের কাউকে এমন না দেখি যে, সে কিয়ামতের দিন ব্যা ব্যা শব্দকারী একটি ছাগল বহন করে আসবে, আর সে ডাকতে থাকবে: 'হে মুহাম্মাদ!' তখন আমি বলব: 'আমি তোমার জন্য কিছু করার ক্ষমতা রাখি না। আমি তো (আল্লাহর বাণী) পৌঁছে দিয়েছিলাম।'

আর আমি যেন তোমাদের কাউকে এমন না দেখি যে, সে কিয়ামতের দিন ফোঁস ফোঁস শব্দকারী একটি উট বহন করে আনবে, আর সে ডাকতে থাকবে: 'হে মুহাম্মাদ!' তখন আমি বলব: 'আল্লাহর পক্ষ থেকে আমি তোমার জন্য কিছু করার ক্ষমতা রাখি না। আমি তো (আল্লাহর বাণী) পৌঁছে দিয়েছিলাম।'

আর আমি যেন তোমাদের কাউকে এমন না দেখি যে, সে কিয়ামতের দিন একটি কিশ'আন (শুকনো মশ্ক বা চামড়ার তৈরি বোঝা) বহন করে আসবে, আর সে বলবে: 'হে মুহাম্মাদ! হে মুহাম্মাদ!' তখন আমি বলব: 'আমি তোমার জন্য কিছু করার ক্ষমতা রাখি না। আমি তো (আল্লাহর বাণী) পৌঁছে দিয়েছিলাম।'"









আল-জামি` আল-কামিল (3895)


3895 - عن بريدة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من استعملناه على عمل، فرزقناه رزقًا، فما أخذ بعد ذلك فهو غلول".

صحيح: رواه أبو داود (2943)، وصحّحه ابن خزيمة (2369)، والحاكم (1/ 406) كلهم من حديث أبي عاصم، عن عبد الوارث بن سعيد، عن حسين المعلم، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه، فذكره.

وقال الحاكم:" صحيح على شرط الشيخين".

وأما قول أبي داود: لم يرو حسين المعلم، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم شيئًا يعني يروي عن عبد الله بن بريدة، عن غير أبيه. فهو ليس على إطلاقه، فقد روى هو في سننه عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه، وقد أشار علي بن المديني إلى أنه لم يرو عن أيه مرفوعا شيئًا إلا حرفا واحدا، وكلها عن رجال آخرين، هكذا ذكره الباجي، ولعله قصد به الحديث المذكور.

وفي الباب ما رُوي عن أبي رافع، قال: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا صَلَّى الْعَصْرَ ذَهَبَ إِلَى بَنِي عَبْدِ الأَشْهِلِ فَيَتَحَدَّثُ عِنْدَهُمْ حَتَّى يَنْحِدِر لِلْمَغْرِبِ. قَالَ أَبُو رَافِع: فَبَيْنَمَا النَّبْيُّ صلى الله عليه وسلم يُسْرعُ إِلَى الْمَغْرِبِ مَرَرْنَا بَالْبَقِيعِ فَقَالَ:"أُفٍّ لَكَ أُفٍّ لَكَ". قَالَ: فَكَبُرَ ذَلِكَ فِي ذَرعِي فَاسْتَأْخرتُ وَظَنَنْتُ أنَّهُ يُرْيدُنِي. فَقَالَ:"مَا لَكَ امْشِ". فَقُلْتُ: أَحْذَثْتَ حَدَثًا. قَالَ:"مَا ذَاكَ؟". قُلْتُ: أَفَّفْتَ بِي! قَالَ:"لا وَلَكِنْ هَذَا فُلانٌ بَعَثْتُهُ سَاعِيًا عَلَى بنَي فُلانٍ فَغَلَّ نَمِرةً فَدُرِّعَ الآنَ مِثْلُهَا مِنْ نَارٍ".

رواه النسائي (826) عن عمرو بن سوّاد بن الأسود بن عمرو، قال: أنبأنا ابن وهب، قال: أنبأنا ابن جريج، عن منبوذ، عن الفضل بن عبيدالله، عن أبي رافع، فذكره.

وصححه ابن خزيمة (2337)، وأخرجه الإمام أحمد (27192) كلاهما من حديث ابن جريج، به، مثله. ومنبوذ هذا رجل من آل أبي رافع لم يوثقه أحدٌ، ولم يذكره ابن حبان في"الثقات" مع أنه روى عنه اثنان ابن جريج، وابن أبي ذئب. وفي التقريب:"مقبول" أي إذا تُوبع، ولم يتابع.

والفضل بن عبيدالله هو ابن أبي رافع، روي عن أبيه، وعن جدّه ولم بوثقه أحدٌ غير ابن حبان؛
ولذا قال فيه الحافظ"مقبول" أيضًا.

وفي الباب أيضًا عن قيس بن سعد بن عبادة الأنصاريّ، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعثه ساعيًا فقال أبوه: لا تخرج حتى تحدث برسول الله صلى الله عليه وسلم عهدًا، فلما أراد الخروج أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال له رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يا قيس! لا تأتي يوم القيامة على رقبتك بعير له رغاء، أو بقرة لها خوار، أو شاة لها بعار، ولا تكن كأبي رغال". فقال: سعد وما أبو رغال؟ قال:"مصدّق بعثه صالح فوجد رجلًا بالطّائف في غنيمة قرية من المائة شصاص إلّا شاة واحدة، وابن صغير لا م له، فلبن تلك الشاة عيشه، فقال صاحب الغنم: من أنت؟ فقال: أنا رسول رسول الله صلى الله عليه وسلم فرحب وقال: هذه غنمي فخذ بما أحببت فنظر إلى الشّاة اللبّون، فقال: هذه. فقال الرّجل: هذا الغلام كما ترى ليس له طعام، ولا شراب غيرها، فقال: إن كنت تحب اللّبن فأنا أحبه، فقال: خذ شاتين مكانها فأبي، فلم يزل يزيده، ويبذل حتى بذل له خمس شياه شصاص مكانها فأبى عليه، فلما رأى ذلك عمد إلى قوسه، فرماه فقتله. فقال: ما ينبغي لأحد أنّ يأتي رسول الله صلى الله عليه وسلم بهذا الخبر أحدٌ قبلي فأتي صاحبُ الغنم صالحًا النّبيَّ صلى الله عليه وسلم فأخبره، فقال صالِحٌ: اللهم العن أبا رغال، اللهم العن أبا رغال". فقال سعد بن عبادة: يا رسول الله! اعفُ قيسًا من السِّقاية.

رواه ابن خزيمة (2272)، والحاكم (1/ 398 - 399)، وعنه البيهقيّ (4/ 157) كلّهم من طريق يحيى بن بكير، ثنا اللّيث، حدّثني هشام بن سعد، عن عباس بن عبد الله بن معبد بن عباس، عن عاصم بن عمرو بن قتادة الأنصاريّ، فذكره.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

وتعقّبه الذهبيّ فقال: بل منقطع، عاصم لم يدرك قيسًا.

وأمّا أبو رغال، فقيل: رجل من الجاهلية من قوم ثمود، جاء إلى الطّائف خوفًا من العذاب. وقيل: هو الذي بعثه أهل الطائف مع أبرهة يدلّه على الطّريق إلى مكة، فخرج أبرهة ومعه أبو رغال حتى أنزله المُغَمِّس (وهو موضع بين الطائف ومكة) فلما أنزله مات أبو رغال هناك، فرجمت العربُ قبره.

قال جرير:

إذا مات الفرزدق فارجموه … كرجم الناس قبر أبي رغال

وأمّا ما رُوي عن عبد الله بن أُنيس أنه تذاكر وعمر بن الخطاب يومًا الصدقة، فقال عمر: ألم تسمع رسول الله صلى الله عليه وسلم حين يذكر غلول الصّدقة:"أنّه من غلَّ منها بعيرًا أو شاة أُتي به يوم القيامة يحمله؟". قال: فقال عبد الله بن أُنيس: بلي. ففيه رجل مجهول.

رواه ابن ماجه (1810) عن عمرو بن سوّاد المصريّ، قال: حدّثنا ابن وهب، قال: أخبرني عمرو بن الحارث، أنّ موسي بن جبير حدّثه أنّ عبد الله بن أُنيس حدّثه، فذكره.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (16063).

وعبد الله بن أُنيس لم يرو عنه سوي موسي بن جبير، فهو في عداد المجهولين، وإن كان ابن حبان ذكره في الثقات (5/ 26)، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول".

وقوله:"غلول الصّدقة"الخيانة فيها.

وأمّا الترهيب من الغلول في الغنائم فسيأتي في كتاب الجهاد والسير.




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আমরা যাকে কোনো কাজে নিয়োগ করি এবং তাকে জীবিকা (বেতন) প্রদান করি, এরপরও সে যা কিছু গ্রহণ করে, তা সবই আত্মসাৎ (গূলূল)।









আল-জামি` আল-কামিল (3896)


3896 - عن سالم بن أبي أمية أبي النضر، قال: جلس إليَّ شيخٌ من بني تميمٍ في مسجد البصرة ومعه صحيفةٌ لَهُ في يده -قال: وفي زمان الحجَّاج- فقال لي: يا عبد الله! أترى هذا الكتاب مغنيًا عنِّي شيئًا عند هذا السلطان؟ قال: فقلت: وما هذا الكتاب؟ قال: هذا كتابٌ من رسول الله صلى الله عليه وسلم كتبهُ لنا أنْ لا يُتَعَدَّى علينا في صدقاتنا. قال: فقلت لا والله! ما أظن أنْ يغني عنك شيئًا وكيف كان شأن هذا الكتاب؟ قال: قدمت المدينة مع أبي وأنا غلامٌ شابٌّ بإبل لنا نبيعُهَا وكان أبي صديقًا لطلحة بن عبيدالله التَّيميِّ فنزلنا عليه فقال لَهُ أبي: اخرج معي فبع لي إبلي هذه قال فقال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قد نهى أنْ يبيع حاضرٌ لبادٍ ولكن سأخرج معك فأجلس وتعرض إبلك، فإذا رضيتُ من رجلٍ وفاءً وصدقًا ممَّنْ ساوَمَكَ أمرتُك ببيعه. قال: فخرجنا إلى السوق فوقفنا ظهرنا وجلس طلحةُ قريبًا فساوَمَنَا الرِّجالُ حتى إذا أعطانا رجلٌ ما نرْضى قال لَهُ أبي: أُبَايعُهُ؟ قال: نعم رضيتُ لكم وفاءَهُ فبايعوه فبايعناه، فلما قبضنا ما لنا وفرغنا من حاجتنا قال أبي لِطلحة: خذ لنا من رسول الله صلى الله عليه وسلم كتابا أنْ لا يتعدَّى علينا في صدقاتنا. قال: فقال: هذا لكم ولكل مسلمٍ. قال: على ذلك إنِّي أحبُّ أنْ يكون عندي من رسول الله صلى الله عليه وسلم كتابٌ فخرجَ حتَّى جاء بنا إلى رسُول الله صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسُول الله! إنَّ هذا الرَّجُلَ من أهل البادية صديقٌ لنا وقد أحبَّ أنْ تكتُبَ لَهُ كتابًا لا يتعدَّى عليه في صَدَقَتِهِ. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هذا لَهُ ولكلِّ مُسْلِم". قال: يا رسول الله! إني قد أحِبُّ أنْ يكون عندي منك كتابٌ على ذلك قال: فكتب لنا رسول الله صلى الله عليه وسلم هذا الكتاب.

حسن: رواه الإمام أحمد (1404)، وأبو يعلى (644)، كلاهما من طريق محمد بن إسحاق، حدّثنا سالم أبو النّضر، قال: جلس إليَّ شيخ من بني تميم (فذكره). واللّفظ لأحمد، وزاد أبو يعلى في آخر الحديث: قلت:"لا أظنّ والله".
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه إذا صرَّح يحسّن حديثه، وسالم أبو النضر هذا المدني ثقة من رجال الجماعة.

ورواه أبو يعلى (643) من وجه آخر عن حماد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن سالم المكي، أنّ أعرابيًّا قال: فذكر بعض الأحاديث.

وهو خطأ من حماد بن سلمة، فإن سالمًا هذا ليس بمكي كما زعم وإنما هو مدنيّ كما سبق، وفيه صحابي لم يسم، وجهالة الصحابي لا تضر كما هو معروف.

ولبعض فقرات الحديث شواهد في السنن ستأتي في مواضعها.

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (3/ 83) وعزاه إلى أحمد وأبي يعلى وقال:"ورجاله رجال الصّحيح".




সালিম ইবনে আবী উমাইয়্যা আবুন-নাদর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বসরার মসজিদে বানু তামিম গোত্রের এক বৃদ্ধ লোক আমার কাছে এসে বসলেন। তাঁর হাতে একটি পাণ্ডুলিপি ছিল। (তিনি বলেন: ঘটনাটি হাজ্জাজের শাসনামলের)। তিনি আমাকে বললেন: হে আব্দুল্লাহ! আপনি কি মনে করেন যে, এই সুলতানের (হাজ্জাজের) কাছে এই কাগজটি আমার কোনো কাজে আসবে?

আমি বললাম: এই কিতাবটি কী? তিনি বললেন: এটি হলো আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে লিখিত একটি পত্র, যা তিনি আমাদের জন্য লিখেছিলেন, যেন আমাদের যাকাতের (সাদকাত) বিষয়ে কেউ বাড়াবাড়ি না করে।

আমি বললাম: আল্লাহর কসম! আমার মনে হয় না যে এটি আপনার কোনো কাজে আসবে। আর এই কিতাবের পটভূমি কী ছিল?

তিনি বললেন: আমি যখন যুবক ছিলাম, তখন আমাদের বিক্রি করার মতো কিছু উট নিয়ে আমার পিতার সাথে মদিনায় এসেছিলাম। আমার পিতা তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ আত-তাইমীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বন্ধু ছিলেন। আমরা তাঁর কাছে উঠলাম। আমার পিতা তাঁকে বললেন: আমার সাথে বাজারে চলুন এবং আমার এই উটগুলো বিক্রি করে দিন। তিনি (তালহা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো শহরবাসীকে গ্রামবাসীর পক্ষে পণ্য বিক্রি করতে নিষেধ করেছেন, তবে আমি আপনার সাথে বাজারে যাব এবং বসে থাকব, আর আপনি আপনার উট প্রদর্শন করবেন। যখন দরদামকারীদের মধ্যে থেকে কোনো ব্যক্তির বিশ্বস্ততা ও সততার ব্যাপারে আমি সন্তুষ্ট হব, তখন আমি আপনাকে তা বিক্রি করার নির্দেশ দেব।

তিনি বলেন: এরপর আমরা বাজারে গেলাম এবং আমাদের পিঠ উঁচু করে দাঁড়ালাম (বিক্রির জন্য)। তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কাছাকাছি বসলেন। লোকেরা আমাদের সাথে দরদাম করতে লাগল। যখন এক ব্যক্তি আমাদের সন্তুষ্টির মতো মূল্য দিল, তখন আমার পিতা তাঁকে (তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে) বললেন: আমি কি তার কাছে বিক্রি করব? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আমি তার বিশ্বস্ততা নিয়ে তোমাদের জন্য সন্তুষ্ট। তোমরা তার কাছে বিক্রি করো। সুতরাং আমরা তার কাছে বিক্রি করলাম। যখন আমরা আমাদের পাওনা বুঝে নিলাম এবং কাজ থেকে ফারেগ হলাম, তখন আমার পিতা তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: আপনি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে আমাদের জন্য একটি পত্র নিয়ে দিন, যাতে আমাদের যাকাত (সাদকাত) নিয়ে কেউ বাড়াবাড়ি না করে।

তিনি (তালহা) বললেন: এটি তো তোমাদের এবং প্রত্যেক মুসলমানের জন্যই। তিনি (পিতা) বললেন: তা সত্ত্বেও, আমি চাই যে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে আমার কাছে একটি লিখিত প্রমাণ থাকুক। অতঃপর তিনি (তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বের হলেন এবং আমাদের নিয়ে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন। তিনি (তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! এই বেদুইন লোকটি আমাদের বন্ধু। সে চায় যে আপনি তার জন্য এমন একটি পত্র লিখে দিন, যাতে তার সাদকাতের (যাকাত) বিষয়ে কেউ বাড়াবাড়ি না করে।

রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এটি তার এবং প্রত্যেক মুসলমানের জন্য।” তিনি (পিতা) বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি চাই যে এই বিষয়ে আপনার পক্ষ থেকে আমার কাছে একটি লিখিত প্রমাণ থাকুক। বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের জন্য এই কিতাবটি লিখে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3897)


3897 - عن جرير بن عبد الله، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"المعتدي في الصّدقة كمانعها".

صحيح: رواه الطبراني في الكبير (2275) عن الحسن بن علي المعمريّ، ثنا محمد بن همّام بن أبي خيرة السدوسيّ، ثنا عمر بن علي، عن إسماعيل بن أبي خالد، عن قيس، عن جرير، فذكره.

قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 83):"رجاله ثقات".

قلت: وهو كما قال، إسماعيل بن أبي خالد هو الأحمسيّ، وقيس هو ابن أبي حازم.

وأما ما روي عن أنس بن مالك، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"المعتدي في الصّدقة كمانعه" فإسناده ضعيف.

رواه أبو داود (1585)، والترمذيّ (141)، وابن ماجه (1808) كلّهم من طريق الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، عن سعد بن سنان، عن أنس بن مالك، فذكره.

وصحّحه ابن خزيمة (2335)، ورواه من هذا الوجه وزاد في أول الحديث:"لا إيمان لمن لا أمانة له …".

قلت: في الإسناد سعد بن سنان ويقال: سنان بن سعد، ويقال: سعيد بن سنان، فيري البخاريّ وابن يونس أن الصّحيح: سنان بن سعد الكنديّ، المصريّ، وهو الذي صوبه أيضًا ابن حبان في"الثقات" (4/ 336) فقال: يروي عن أنس بن مالك، حدّث عنه المصريّون، وهم مختلفون فيه يقولون: سعد بن سنان وسعيد بن سنان وسنان بن سعيد، وأرجو أن يكون الصحيح سنان بن سعد، وقد اعتبرتُ حديثه فرأيت ما روي عن سنان بن سعد يُشبه أحاديث الثقات، وما رُوي عن سعد بن سنان وسعيد بن سنان فيه المناكير كأنّهما اثنان".

هذا النّقل عن ابن حبان يدلّ على أنّهما اثنان والصّحيح الذي عليه جمهور أهل العلم أنه شخص واحد، لم يرو عنه غير يزيد بن أبي حبيب، فإذا روى الليث بن سعد عن يزيد بن أبي حبيب قال: عن سعد بن سنان، وإذا روى عمرو بن الحارث وعبد الله بن لهيعة عن يزيد بن أبي حبيب
قالا: سنان بن سعد، وهو شخص واحد.

قال الترمذيّ:"حديث أنس حديث غريب من هذا الوجه، وقد تكلّم أحمد بن حنبل في سعد ابن سنان -هكذا يقول الليث بن سعد عن يزيد بن أبي حبيب، عن سعد بن سنان، عن أنس بن مالك. ويقول عمرو بن الحارث وابن لهيعة عن يزيد بن أبي حبيب، عن سنان بن سعد، عن أنس قال: وسمعت محمدًا يقول: الصحيح سنان بن سعد".

وقال: قوله:"المعندي في الصّدقة كمانعها" يقول: على المعتدي من الإثم كما على المانع إذا منع. انتهي.

قال الإمام أحمد: لم أكتب أحاديث سنان بن سعد لأنهم اضطربوا فيها، فقال بعضهم: سعد ابن سنان، وبعضهم: سنان بن سعد.

قال أحمد: روي خمسة عشر حديثًا منكرة كلّها ما أعرف منها واحدًا.

وقال عبد الله بن أحمد عن أبيه: اتركت حديثه لأن حديثه مضطرب غير محفوظة. وقال: سمعته مرة أخرى يقول:"يشبه حديث الحسن، لا يشبه حديث أنس".

وقال الجوزجانيّ:"أحاديث واهية لا تشبه أحاديث الناس عن أنس".

وقال النسائي، وابن سعد: منكر الحديث.

وبمقابل هذا الجرح المفسّر لا يلتفت إلى توثيق ابن معين له، وكذا قول الحافظ:"صدوق له أفراد".

ونقل الفاسيّ في كتاب"بيان الوهم والإيهام" (3/ 607) عن البخاريّ:"وهّنه أحمد". وقال ابن معين: سمع عبد الله بن يزيد من سنان بن سعد بعد ما اختلط، نفى هذا أنه اختلطه. انتهى.

تنبيه: وقع في"الميزان" للذهبي:"نقل ابن القطان أن أحمد وثّقه".

والصّحيح كما ذكرنا:"وهّنه".

وفي الباب عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: إذا أتاكم المصدّق فاعطه صدقتَك، فإن اعتدى عليك فولِّه ظهرك، ولا تلعنه. وقلْ: اللهم! إنْي أحتسب عندك ما أخذ مني".

رواه البيهقيّ (1/ 115، 137) عن أبي نصر بن قتادة، حدّثنا أبو الحسن محمد بن الحسن السراج، ثنا مطين، ثنا محمد بن طريف، ثنا حفص بن غياث، عن عاصم (الأحول)، عن أبي عثمان (النهديّ)، عن أبي هريرة، فذكره.

وأخرجه الترمذيّ في"العلل الكبير" (1/ 322) عن محمد بن طريف بإسناده وقال: سألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: إّنما يروى هذا عن أبي عثمان، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم مرسلًا.

وكذا قاله أيضًا الدّارقطنيّ في"العلل" (11/ 217).

وأما ما رواه إسحاق بن راهويه (1/ 383) من وجه آخر عن كلثوم، نا عطاء، عن أبي هريرة. ففيه كلثوم وهو ابن محمد ضعيف.
وعطاء هو ابن أبي مسلم لم يسمع من أبي هريرة.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أمِّ سلمة زوجة النبيّ صلى الله عليه وسلم:"أَنَّ نَبِيَّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بينا هو يومًا قائلٌ في بيتها وعنده رجلٌ من أصحابه يتحدثون إذ جاء رجلٌ، فقال: يا رسول الله! كم صدقه كذا وكذا من التمر؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كذا وكذا". قال الرجل: فإني فُلانًا تعدي عليَّ فأخذ مني كذا وكذا من التَّمْر، فازداد صاعًا، فقال لَهُ رسول الله صلى الله عليه وسلم:"فكيف إذا سعى عليكم من يتعدى عليكم أشدَّ منْ هذا التَّعدي؟". فخاض القوم وبهرهم الحديث حتَّى قال رجل منهم: كيف يا رسول الله! إذا كان رجل غائبٌ عنك في إبله وماشيته وزرعه فأدَّي زكاة ماله فتعدَّي عليه الحق فكيف يصنع وهو غائبٌ عنك؟ ، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أدَّى زكاة ماله طيِّب النفس بها يريد بها وجه الله والدار الآخرة، فلم يغيب شيئًا من ماله، وأقام الصلاة، ثم أدَّى الزَّكاة فتعدَّى عليه في الحقِّ، فأخذ سلاحًا فقاتل فقتل فهو شهيد".

رواه الطبرانيّ في الكبير (23/ 278)، وفي الأوسط (مجمع البحرين 1370) وهذا لفظه.

ورواه الإمام أحمد (26574) مختصرًا، كلّهم من حديث عبيدالله بن عمرو، عن زيد بن أبي أنيسة، عن القاسم بن عوف الشّياني، عن علي بن الحسين، قال: حدّثتنا أمُّ سلمة قالت (فذكرته).

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (3/ 82) وقال:"رواه أحمد مختصرًا، ورواه الطبراني في الكبير والأوسط، ورجال الجميع رجال الصّحيح".

وصحّحه ابن خزيمة (2336)، وابن حبان (3193)، والحاكم (1/ 404) كلّهم من هذا الطّريق.

وقال الحاكم: صحيح على شرط الشّيخين".

قلت: القاسم بن عوف الشّيباني روى له مسلم وحده حديثًا واحدًا فقط، وهو حديث الأوّابين وقال النسائي عقب تخريج حديثه في اليوم والليلة"القاسم ضعيف الحديث"، كما قال الحافظ في"التهذيب، وتركهـ شعبه ولم يرو عنه، قال ابن المديني: ذكرناه ليحيي فقال: قال شعبة: دخلت عليه فحرك رأسه. قلت ليحيى: ما شأنه؟ قال: فجعل يحيد. فقلت: ضعّفه في الحديث؟ فقال: لو لم يضعّفه لروي عنه. وقال أبو حاتم: مضطرب الحديث، ومحله عندي الصّدق. وقال ابن عدي: هو ممن يكتب حديثه، وذكره ابن حبان في الثقات، ولم أجد له متابعًا.

وفي حديثه نكارة في قوله:"فأخذ سلاحًا فقاتل فقُتل فهو شهيد" لأنّه من المعلوم أن الأحاديث الواردة في تعدي المصدقين على أموال الزكاة تحث على الصبر لا على القتال.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أمِّ سلمة، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما نقص مالٌ من صدقة، ولا عفا رجل عن مظلمة إلّا زاده الله بها عزًّا، فاعفوا يعزكّم الله، ولا فتح رجل على نفسه باب مسألة إلّا فتح الله عليه باب فقر".
رواه الطبرانيّ في الصغير (1/ 54)، وفي الأوسط (1405 - مجمع البحرين) عن أحمد بن إسحاق الدّميريّ، حدّثنا زكريا بن دويد بن محمد بن الأشعث بن قيس الكنديّ، حدّثنا سفيان الثوريّ، عن منصور، عن يونس بن خباب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أمّ سلمة، قالت (فذكرته).

ومن طريق الطبرانيّ رواه القضاعي في"مسند الشهاب" (817).

قال الطبراني:"لم يروه عن الثوريّ إلا قاسم بن يزيد الجرمي، وزكريا بن دُويد الأشعثي".

قلت: بل رواه أيضًا محمد بن عمارة القرشي، عن سفيان الثوريّ، ومن طريقه رواه القضاعي في"مسند الشهاب" (783) إلا أنه لا يعرف من هو، وزكريا بن دريد كذاب كان يضع الحديث، وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (3/ 105).

وأمّا القاسم بن يزيد الجرمي فهو صدوق، وقد وثّقه أبو حاتم.

وفي الباب أيضًا عن ابن عمر: رواه البزّار -كشف الأستار (902) -، وفيه إبراهيم بن يزيد ضعيف.

وعن هُلب: رواه أحمد (21970)، وفيه قبيصة بن هُلْب مجهول كما قال ابن عدي والنسائي، وذكره ابن حبان في ثقات التابعين. وقال الحافظ:"مقبول". يعني إذا توبع، وإذا لم يتابع فلين الحديث.




জرير ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "সাদাকা (যাকাত) আদায়ের ক্ষেত্রে যে ব্যক্তি বাড়াবাড়ি করে (বা সীমালঙ্ঘন করে), সে তা প্রদানে বাধা প্রদানকারীর (বা যাকাত অস্বীকারকারীর) মতোই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3898)


3898 - عن ابن عباس قال: بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم معاذ بن جبل إلى اليمن، فأوصاه، وكان من وصيته:"إيّاك وكرائمَ أموالهم، واتّقِ دعوة المظلوم، فإنّه ليس بينه وبين الله حجاب".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1496) ومسلم في الإيمان (19) كلاهما من حديث زكريا ابن إسحاق، عن يحيى بن عبد الله بن صيفي، عن أبي معبد مولي ابن عباس، عن ابن عباس، فذكره في حديث طويل.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম মুআয ইবনে জাবালকে ইয়ামেনে প্রেরণ করলেন এবং তাকে উপদেশ দিলেন। আর তাঁর উপদেশের মধ্যে ছিল: "তুমি তাদের সম্পদের সর্বোৎকৃষ্ট অংশ (যাকাত হিসেবে নেওয়া) থেকে বেঁচে থাকবে এবং তুমি মাযলুমের (অত্যাচারিতের) বদদোয়াকে ভয় করবে। কারণ তার এবং আল্লাহর মাঝে কোনো পর্দা নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (3899)


3899 - عن أبي بن كعب، قال: بعثني النبي صلى الله عليه وسلم مصدّقًا فمررت برجل فلما جمع لي ماله لم أجد عليه فيه إلّا ابنة مخاضٍ. فقلت لَهُ: أدِّ ابنةَ مخاضٍ فإنَّها صدقتك، فقال: ذاك ما لا لبَن فيه ولا ظهر، ولكن هذه ناقةٌ فتيَّةٌ عظيمةٌ سمينةٌ فخذْها. فقلت لَهُ: ما أنا بآخذٍ ما لم أُومرْ به وهذا رسول الله صلى الله عليه وسلم منك قريبٌ فإن أحببت أنْ تأتيه فتعرض عليه ما عرضت عليَّ فافعل، فإن قبله من قبلته وإن ردَّهُ عليك ردتُهُ. قال: فإني فاعل فخرج معي وخرج بالناقة التي عرض عليَّ حتى قدمنا على رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال لَهُ: يا نبي الله! أتاني رسولك ليأخذ مني صدقة مالي وأيم الله ما قام في مالي
رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا رسوله قط قبله فجمع لَهُ مالي فزعم أن ما على فيه ابنة مخاض وذلك ما لا لبن فيه ولا ظهر وقد عرضت عليه ناقة فتية عظيمة ليأخذها فأبي علي وها هي ذه قد جئتك بها يا رسول الله! خذها، فقال لَهُ رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ذاك الذي عليك فإن تطوعت بخير آجرك الله فيه وقبلناه منك". قال: فها هي ذه يا رسول الله! قد جئتك بها فخذها. قال: فأمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بقبضها ودعا لَهُ في ماله بالبركة.

حسن: رواه أبو داود (1583) عن محمد بن منصور، حدّثنا يعقوب بن إبراهيم، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: حدثني عبد الله بن أبي بكر، عن يحيى بن عبد الله بن عبد الرحمن بن سعد بن زرارة، عن عمارة بن عمرو بن حزم، عن أبي بن كعب، قال (فذكره).

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنّه مدلّس، ولكنّه صرّح بالتحديث.

وصحّحه ابن خزيمة (2277)، وابن حبان (3269)، والحاكم (1/ 299 - 400) وعنه البيهقيّ (4/ 96) كلّهم من هذا الوجه.

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قال عمارة بن عمرو:"فضرب الدّهرُ ضربةً، فولاني مروان صدقة بَلي، وعُذرة في زمن معاوية، فمررتُ بهذا الرجل، فصدّقت ماله ثلاثين حقّة فيها فحلّها على ألف وخمسمائة بعير".

قال ابن إسحاق: قلت لعبد الله بن أبي بكر: ما فحلُها؟ قال: في السنة إذا بلغ صدقة الرجل ثلاثون حقّة أخذ منها فحلها.

وفي الباب ما رُوي عن المغيرة بن شعبة، قال: قال عثمان بن أبي العاص - وكان شابا -:"وفدنا على النبي صلى الله عليه وسلم فوجدني أفضلهم أخذا للقرآن، وقد فضلتهم بسورة البقرة، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"قد أمرتك على أصحابك، وأنت أصغرهم، فإذا أممت قومًا فأمَّهُم بأضعفهم، فإن وراءك الكبير والصغير والضَّعيف وذا الحاجة، وإذا كنت مصدّقًا لا تأخذ الشافع وهي الماخض ولا الرُّبَّي ولا فحل الغنم، وحزرة الرَّجُل هو أحق بها منك، ولا تمسَّ القرآن إلّا وأنت طاهرٌ، واعلم أنّ العمرة هي الحج الأصغر، وأن عمرة خير من الدنيا وما فيها، وحجَّةٌ خير من عمرةٍ".

رواه الطبرانيّ في الكبير (9/ 33) عن أحمد بن عمرو الخلال المكيّ، ثنا يعقوب بن حميد، ثنا هشام بن سليمان، عن إسماعيل بن رافع، عن محمد بن سعيد بن عبد الملك، عن المغيرة بن شعبة، فذكره.

قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 74):"فيه هشام بن سليمان، وقد ضعّفه جماعة من الأئمّة ووثقه البخاريّ".

قلت: في ترجمته في"التهذيب" قال البخاريّ في البيوع:"قال لي إبراهيم بن المنذر: أنا هشام،
أنا ابن جريج، سمعت ابن أبي مليكة يخبر عن نافع مولى ابن عمر في بيع الثمرة إذا أُبِّرت".

قال الحافظ: فالبخاريّ روي له هذا الحديث في هذا الموضع في المتابعات، وأورده بألفاظ الشّواهد؛ ولذا لم يذكر المتقدّمون أنه من رجاله، ثم هو رواه من حديث ابن جريج، وأما روايته عن غير ابن جريج ففيه وهم كما قال العقيليّ.

قلت: وهذا الحديث ليس من حديث ابن جريج.

وقال الحافظ في التقريب:"مقبول".

وأما قول الهيثميّ:"وثّقه البخاريّ فلم أجده لا في"التاريخ الكبير، ولا في" تهذيب الكمال" وفروعه، فليتأكّد.




উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে যাকাত আদায়কারী (মাসাদ্দিক) হিসেবে প্রেরণ করেন। আমি এক ব্যক্তির পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম। যখন সে আমার জন্য তার সম্পদ একত্র করল, তখন আমি তার উপর যাকাত হিসেবে একটি 'ইবনাতে মাখাদ' (এক বছর পূর্ণ হওয়া উটনী) ছাড়া আর কিছুই পেলাম না। আমি তাকে বললাম: তুমি একটি 'ইবনাতে মাখাদ' দাও, কারণ এটাই তোমার যাকাত। সে বলল: ওটা তো এমন (উটনী), যার দুধও নেই এবং পিঠে বহন করার ক্ষমতাও নেই। তবে আমার এই অল্প বয়স্ক, বড়, মোটাতাজা উটনীটি নিন। আমি তাকে বললাম: আমাকে যার আদেশ দেওয়া হয়নি, আমি তা গ্রহণকারী নই। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আপনার নিকটেই আছেন। আপনি যদি চান যে তাঁর কাছে গিয়ে আপনি যা আমাকে দিয়েছেন তা পেশ করুন, তাহলে আপনি তা করতে পারেন। যদি তিনি আপনার কাছ থেকে তা গ্রহণ করেন, আমিও তা গ্রহণ করব। আর যদি তিনি তা প্রত্যাখ্যান করেন, আমিও তা প্রত্যাখ্যান করব। সে বলল: আমি তাই করব। এরপর সে আমার সাথে রওনা হলো এবং যে উটনীটি সে আমার কাছে পেশ করেছিল, সেটি নিয়েও গেল। অবশেষে আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছলাম। লোকটি তাঁকে (নবীকে) বলল: হে আল্লাহর নবী! আপনার প্রেরিত ব্যক্তি আমার সম্পদের যাকাত নিতে এসেছিলেন। আল্লাহর কসম! এর আগে কখনোই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বা তাঁর কোনো প্রতিনিধি আমার সম্পদের জন্য আসেননি। আমি তার জন্য আমার সম্পদ একত্র করলাম এবং সে দাবি করল যে, আমার উপর যাকাত হিসেবে একটি 'ইবনাতে মাখাদ' আবশ্যক, যা দুধ বা বোঝা বহন করার কোনোটিরই উপযুক্ত নয়। অথচ আমি তার কাছে একটি অল্প বয়স্ক, বিরাট উটনী পেশ করেছিলাম যাতে সে সেটি গ্রহণ করে। কিন্তু সে আমাকে প্রত্যাখ্যান করেছে। হে আল্লাহর রাসূল! এই দেখুন, আমি সেটি আপনার কাছে নিয়ে এসেছি, আপনি এটি গ্রহণ করুন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তোমার উপর তো ওটাই (ইবনাতে মাখাদ) আবশ্যক ছিল। কিন্তু যদি তুমি স্বেচ্ছায় উত্তম কিছু দিতে চাও, তবে আল্লাহ এর জন্য তোমাকে প্রতিদান দেবেন এবং আমরা তা তোমার কাছ থেকে গ্রহণ করব।" সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এই দেখুন, আমি সেটি নিয়ে এসেছি, আপনি তা গ্রহণ করুন। বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা গ্রহণ করার আদেশ দিলেন এবং তার সম্পদে বরকতের জন্য দোয়া করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (3900)


3900 - عن عبد الله بن معاوية الغاضري -من غاضرة قيس- قال: قال النبي صلى الله عليه وسلم:"ثلاثٌ من فعلهنَّ فقد طَعِمَ طَعْمَ الإيمان: من عبد الله وحدهُ وأنه لا إله إلّا الله. وأعطى زكاة ماله طيبةً بها نفسُه رافدةً عليه كُلَّ عام، ولا يُعطي الهرمَةَ، ولا الدَّرنَةَ، ولا المريضة ولا الشرط اللَّئيمَةَ، ولكن من وسط أموالكم فإنَّ الله لم يسألكم خيرهُ ولم يأمركم بشره".

حسن: رواه أبو داود (1582) قال: قرأتُ في كتاب عبد الله بن سالم بحمص عند آل عمرو بن الحارث الحمصيّ، عن الزُّبَيْديّ، قال: وأخبرني يحيى بن جابر، عن جبير بن نفير، عن عبد الله بن معاوية الغاضريّ، فذكره.

الزَّبَيْديّ هو محمد بن الوليد بن عامر الحمصيّ، ثقة من رجال الصحيح.

وعبد الله بن معاوية الغاضريّ له صحبة كما قال أبو حاتم الرازي وابن حبان وغيرهما.

وقول أبي داود:"قرأت في كتابه يدل على أنه لم يسمع هذا الحديث، وإنما رواه من طريق الوجادة، وهي إحدى أنواع التّحمّل، كما أنّ فيه انقطاعًا بين يحيى بن جابر، وجبير بن نفير.

وقد جاء متصلًا، رواه الطبرانيّ في"الصغير" (555) عن علي بن الحسن بن معروف الحمصي، حدّثنا أبو تقي عبد الحميد بن إبراهيم، حدّثنا عبد الله بن سالم، عن محمد بن الوليد الزُّبَيديّ، حدّثنا يحيى بن جابر الطائي، أنّ عبد الرحمن بن جبير حدّثه أنّ أباه حدّثه أن عبد الله بن معاوية الغاضريّ حدثهم، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال (فذكر الحديث).

وهذا إسناد حسن من أجل أبي تقي عبد الحميد بن إبراهيم فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وقد قال الحافظ في"التلخيص" بعد أن عزاه لأبي داود: ورواه الطبرانيّ وجوَّد إسناده".

ورواه أيضًا البيهقيّ (5/ 95 - 96) من طريق يعقوب بن سفيان (وهو في كتابه" المعرفة" 1/ 269)، ثنا إسحاق بن إبراهيم، حدثني عمرو بن الحارث، حدثني عبد الله بن سالم، بإسناده، مثله.
وإسحاق بن إبراهيم هو ابن العلاء الحمصي ضعيف، ولكنه توبع في الإسناد الأول.

وزاد الطبرانيّ والبيهقي في آخر الحديث:"وزكّي عبد نفسه". فقال رجل: ما تزكية المرأ نفسه يا رسول الله؟ قال:"يعلم أنّ الله معه حيث ما كان".

وقوله:"يعلم أن الله معه". كقوله تعالى: {وَهُوَ مَعَكُمْ أَيْنَ مَا كُنْتُمْ} [سورة الحديد: 4]. والمراد بالمعية في هذه الآية وغيرها علمه سبحانه بعباده، وإحاطته بهم، واطلاعه عليهم وأنه لا يخفى عليه شيء من أعمالهم، لا أنه سبحانه مختلط بهم، ولا أنه معهم في الأرض.

سئل محمد بن يحيى، عن حديث عبد الله بن معاوية عن قوله:"ليعلم العبد أنّ الله معه حيث كان" قال: ويريد أنّ الله علمه محيط بكل مكان، والله على العرش". ذكره الذهبيّ في"العلو" (462).

وفي الباب ما جاء عن عائشة أنها قالت:"مُرَّ على عُمَرَ بن الخطَّاب بغنمٍ من الصَّدقة فرأى فيها شاة حافلا ذات ضرعٍ عظيم. فقال: ما هذه الشَّاة؟ فقالوا: شاة من الصدقة. فقال عمر: ما أعطى هذه أهلها وهم طائعون! لا تفتنوا الناس، لا تأخذوا حزرات المسلمين نكبوا عن الطَّعَامِ". رواه مالك في الزكاة (28).




আব্দুল্লাহ ইবনে মু'আবিয়া আল-গাদ্বরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তিনটি জিনিস রয়েছে, যে ব্যক্তি তা পালন করে, সে ঈমানের স্বাদ গ্রহণ করে: (১) যে একমাত্র আল্লাহর ইবাদত করে এবং সাক্ষ্য দেয় যে আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই। (২) যে স্বতঃস্ফূর্ত মনে প্রতি বছর তার সম্পদের যাকাত প্রদান করে। আর সে বুড়ো (অক্ষম), রোগগ্রস্ত, অসুস্থ অথবা নিকৃষ্ট ত্রুটিপূর্ণ পশু (যাকাত হিসেবে) দেবে না, বরং সে তোমাদের মধ্যম মানের সম্পদ থেকে (যাকাত) দেবে। কারণ আল্লাহ তোমাদের উত্তম সম্পদও চাননি এবং তোমাদের খারাপ সম্পদ দিতেও নির্দেশ দেননি।