আল-জামি` আল-কামিল
3901 - عن جرير بن عبد الله، قال: جاء ناسٌ من الأعراب إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالوا: إنّ ناسًا من المصدّقين يأتوننا فيظلموننا. قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أرضوا مصدِّقيكم".
وفي رواية:"إذا أتاكم المصدِّق فليصدر عنكم وهو عنكم راضٍ".
صحيح: رواه مسلم في الزكاة (989) من طرق، عن محمد بن أبي إسماعيل، ثنا عبد الرحمن ابن هلال العبْسيّ، عن جرير بن عبد الله، فذكره.
والرواية الثانية: رواها في آخر كتاب الزكاة من طرق، عن إسماعيل بن إبراهيم، أخبرنا داود، عن الشعبي، عن جرير بن عبد الله، فذكره.
قال جرير:"ما صدر عنّي مصدِّق منذ سمعتُ هذا من رسول الله صلى الله عليه وسلم إلّا وهو عنّي راضٍ".
وأمّا ما روي عنه مرفوعًا:"إذا أتاكم المصدِّق فلا تكتموه شيئًا، فإن عدل عليكم فهو خير له، وإن جار عليكم فهو خير لكم وشرّ عليها. فالصّحيح وقفه. برويه الشيباني، واختلفوا عليه: فرواه أبو معاوية الضّرير، عن الشيبانيّ، عن الشّعبيّ، عن جرير، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، قاله مهدي بن حفص عنه.
وعن غيره لا يرفعه، والموقوف أصح، قاله الدّارقطنيّ في"العلل" (13/ 444).
জারীর ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কতিপয় বেদুইন (আরবের গ্রাম্য অধিবাসী) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: নিশ্চয় যাকাত সংগ্রহকারীরা (মুসাদ্দিকীন) আমাদের কাছে আসে এবং আমাদের প্রতি জুলুম করে। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তোমাদের যাকাত সংগ্রহকারীদের সন্তুষ্ট রাখো।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "যখন তোমাদের কাছে যাকাত সংগ্রহকারী আসে, তখন সে যেন তোমাদের কাছ থেকে এমনভাবে ফিরে যায় যে সে তোমাদের প্রতি সন্তুষ্ট।"
জারীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে এটি শোনার পর থেকে আমার কাছ থেকে এমন কোনো যাকাত সংগ্রহকারী ফিরে যায়নি, যে আমার প্রতি সন্তুষ্ট ছিল না।
3902 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا جاءكم المصدِّق فلا يصدر إلّا وهو راضٍ".
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حسن: رواه الطبرانيّ في الأوسط (5803) عن محمد بن عبد الله الحضرميّ، قال: حدّثنا محمد بن طريف البجليّ، قال: حدّثنا محمد بن فضيل، عن عاصم الأحول، عن أبي عثمان النّهديّ، عن أبي هريرة، فذكره.
قال الطبرانيّ: لم يرو هذا الحديث عن عاصم إلّا محمد بن فضيل، تفرّد به محمد بن طريف، ولا يُروي عن أبي هريرة إلّا بهذا الإسناد.
قلت: إسناده حسن من أجل محمد بن طريف فإنه"صدوق" كما في التقريب، وقد وثقه ابن سعد، وذكره ابن حبان في"الثقات".
وقال أبو زرعة:"محلّه الصّدق". فلا يضرُّ تفرده.
ومن طريقه رواه البيهقيّ (4/ 137) وسكت عليه، وحسنه أيضًا الهيثميّ في"المجمع" (3/ 79) إلّا أنّ الدّارقطنيّ في"العلل" (11/ 217) رجّح الإرسال عن أبي عثمان النّهديّ.
وفي الباب عن جابر بن عتيك، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"سيأتيكم ركيبٌ مبغضون فإن جاءوكم فرحبوا بهم وخلوا بينهم وبين ما يبتغون فإن عدلوا فلأنفسهم وإن ظلموا فعليها وأرضوهم فإن تمام زكاتكم رضاهم وليدعوا لكم".
رواه أبو داود (1588) عن عباس بن عبد العظيم ومحمد بن المثنى، قالا: حدّثنا بشر بن عمر، عن أبي الغصن، عن صخر بن إسحاق، عن عبد الرحمن بن جابر بن عتيك، عن أبيه، فذكره.
وصخر بن إسحاق وشيخه عبد الرحمن بن جابر"مجهولان".
وأمّا ما رُوي عن بشير بن الخصاصية، قال: قلنا: إنّ أهل الصّدقة يعتدون علينا، أفنكتم من أموالنا بقدر ما يعتدون علينا؟ فقال:"لا". ففيه أيضًا رجل مجهول.
رواه أبو داود (1586) عن مهدي بن حفص ومحمد بن عبيد -والمعني- قالا: حدّثنا حمّاد، عن أيوب، عن رجل يقال له: ديْسم -وقال ابن عبيد: من بني سدوس-، عن بشير بن الخصاصية، فذكره.
قال أبو داود: حدّثنا الحسن بن علي ويحيي بن موسي قالا: حدّثنا عبد الرزاق عن معمر، عن أيوب، بإسناده ومعناه إلّا أنه قال:"قلنا يا رسول الله! إنّ أصحاب الصدقة يعتدون علينا".
قال أبو داود: رفعه عبد الرزاق عن معمر. انتهى.
أي أن ديسم لم يرفعه، بل أوقفه على بشير بن الخصاصية إلّا في إسنادهما رجل يقال له: ديسم لا يعرف من هو، ومع ذلك ذكره ابن حبان في الثقات، وفيه دليل على توثيق المجاهيل.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন তোমাদের কাছে যাকাত (সাদকা) আদায়কারী আসবে, তখন সে যেন সন্তুষ্ট না হয়ে ফিরে না যায়।”
3903 - عن المستورد بن شدّاد، قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"من كان لنا عاملا فليكتسب زوجة، فإن لم يكن لَهُ خادم فليكتسب خادمًا، فإن لم يكن لَهُ مسكن فليكتسب مسكنا".
صحيح: رواه أبو داود (2945) عن موسى بن مروان الرّقي، حدّثنا المعاني، حدّثنا الأوزاعيّ، عن الحارث بن يزيد، عن جبير بن نفير، عن المستورد بن شدّاد، فذكره.
قال أبو داود: قَالَ أَبُو بَكْرٍ (يعني المعافي - كما في صحيح ابن خزيمة) أُخْبِرْتُ أنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم قَال:"مَن اتَّخَذَ غَيْرَ ذَلِكَ فَهُوَ غَالٌّ أَوْ سَارِقٌ".
وصحّحه ابن خزيمة (2370)، والحاكم (1/ 406) كلاهما من طريق المعاني، به، إلّا أنهما قالا: عبد الرحمن بن جبير، وزاد الحاكم نسبته إلى جدّه نفير. وقال:"على شرط البخاريّ ومسلم".
هكذا جاء في أكثر المصادر، وجبير بن نفير روي عن المستورد كذلك كما في تهذيب المزي، وأشار إلى الخلاف فيه، وكلاهما ثقة فلا يضرُّ هذا الاختلاف.
والمعافي هو ابن عمران الموصليّ كما نسبه ابن خزيمة.
والمعافي هو صاحب كتاب"الزهد" إلّا أني لم أقف عليه.
وللحديث إسناد آخر، رواه الإمام أحمد (18015، 18017، 18019) من طرق عن ابن لهيعة، عن عبد الله بن هبيرة والحارث بن يزيد، عن عبد الرحمن بن جبير، قال: سمعت المستورد ابن شدّاد يقول: سمعت النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث بنحوه). وزاد فيه:"أو دَابَّةً فَلْيَتَّخِذْ دَابَّةً فَمَنْ أَصَابَ شَيئًا سِوَى ذَلِكَ فَهُوَ غَالٌّ أَوْ سَارِقٌ".
وابن لهيعة فيه كلام معروف غير أنه توبع كما سبق إلّا على هذه الزّيادة فإني لم أجد من تابعه، إلّا من وجه مقطع كما سبق.
وحديث ابن لهيعة بتمامه أعلّه أبو حاتم الرازيّ -كما في العلل لابنه (636) - بما ليس بقادح.
মুস্তাওরিদ ইবনে শাদ্দাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আমাদের পক্ষ থেকে কোনো কাজে (কর্মচারী হিসেবে) নিয়োজিত হবে, সে যেন একজন স্ত্রী গ্রহণ করে নেয়। যদি তার কোনো খাদেম না থাকে, তবে সে যেন একজন খাদেম সংগ্রহ করে নেয়। আর যদি তার কোনো থাকার স্থান (বাসস্থান) না থাকে, তবে সে যেন একটি বাসস্থান সংগ্রহ করে নেয়।"
নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরও বলেছেন: "যে ব্যক্তি এর অতিরিক্ত কিছু গ্রহণ করবে, সে খেয়ানতকারী অথবা চোর।"
3904 - عن ابن السّاعديّ المالكيّ أنه قال: استعملني عمر بن الخطاب رضي الله عنه على الصّدقة فلا فرغت منها وأديتها إليه أمر لي بعمالةٍ. فقلت: إنما عملت لله وأجري على الله، فقال: خذ ما أُعْطيت فإني عملت على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم -
فعمَّلني، فقلت مثل قولك فقال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أُعطيتَ شيئًا من غير أنْ تسأل فكل وتصدق".
متفق عليه: رواه مسلم في الزكاة (1045: 112) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا اللّيث، عن بكير، عن بسر بن سعيد، عن ابن الساعديّ المالكي، فذكره.
ورواه ابن خزيمة في"صحيحه" (2364) وقال: ابن السّاعدي المالكي أحسبه عبد الله بن سعد ابن أبي سرح.
وهو كما قال، وكذلك نسبه أيضًا البخاريّ في الرواية الآتية.
حيث رواه في الأحكام (7163) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهريّ، أخبرني السائب اين يزيد ابن أخت نمر، أنّ حويطب بن العزي أخبره، أنّ عبد الله بن السعدي، أخبره أنه قدم على عمر في خلافته فقال له عمر:"ألم أُحدَّث أنَّك تلي من أعمال النَّاس أعمَالا، فإذا أُعْطيت العُمَالة كرهتها فقلت: بلى. فقال عمر: فما تريد إلى ذلك. قلت: إن لي أفراسًا وأعبدًا وأنا بخير وأريد أن تكون عمالتي صدقة على المسلمين. قال عمر: لا تفعل فإني كنت أردت الذي أردت فكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعطيني العطاء فأقول: أعطيه أفقر إليه منِّي حتى أعطاني مرَّةً مالا. فقلت: أعطه أفقر إليه منِّي. فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"خذه فتموَّلهُ وتصدَّق به فما جاءك من هذا المال وأنت غير مشرفٍ ولا سائلٍ فخذه وإلا فلا تتبعه نفسك".
ইবনুস সা'ঈদী আল-মালিকী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে সাদাকা (যাকাত) সংগ্রহের দায়িত্ব দিলেন। যখন আমি কাজ শেষ করে তা তাঁর কাছে বুঝিয়ে দিলাম, তখন তিনি আমাকে পারিশ্রমিক দেওয়ার নির্দেশ দিলেন। আমি বললাম: আমি তো আল্লাহর জন্যই কাজ করেছি এবং আমার প্রতিদান আল্লাহর কাছেই। তিনি বললেন: যা তোমাকে দেওয়া হয়েছে তা গ্রহণ করো। কেননা, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে কাজ করেছি—তখন তিনি (রাসূল) আমাকে পারিশ্রমিক দিয়েছিলেন, আর আমিও তোমার মতো কথাই বলেছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "যখন তুমি কোনো কিছু চাওয়ার ব্যতীত পাও, তখন তা খাও এবং সাদাকা করো।"
অন্য এক বর্ণনায় (আব্দুল্লাহ ইবনুস সা'ঈদী) জানান যে, তিনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের সময় তাঁর কাছে গেলে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: "আমার কাছে কি এমন খবর পৌঁছেনি যে তুমি মানুষের কিছু দায়িত্বপূর্ণ কাজ পরিচালনা করো, কিন্তু যখন পারিশ্রমিক দেওয়া হয় তখন তুমি তা অপছন্দ করো?" তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "তুমি কেন এমনটি চাও?" তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনুস সা'ঈদী) বললেন: "আমার ঘোড়া ও গোলাম রয়েছে এবং আমি সচ্ছল। আমি চাই আমার পারিশ্রমিক মুসলিমদের জন্য সাদাকা হয়ে যাক।" উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "এমন করো না। কেননা আমিও তাই চেয়েছিলাম যা তুমি চাওছো। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে দান করতেন, আর আমি বলতাম: 'এটা আমার চেয়ে দরিদ্র কাউকে দিন।' এভাবে একবার তিনি আমাকে কিছু সম্পদ দিলেন। আমি বললাম: 'এটা আমার চেয়ে দরিদ্র কাউকে দিন।' তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি গ্রহণ করো, এর মালিক হও এবং তা থেকে সাদাকা করো। যখন এই সম্পদ তোমার কাছে আসে অথচ তুমি এর প্রত্যাশী নও বা যাঞ্চাকারী নও, তখন তা গ্রহণ করো। আর যদি তা না হয়, তবে এর প্রতি তোমার মনকে ধাবিত করো না।"
3905 - عن أبي الخير قال: عرض مسلمه بن مخلد -وكان أميرا على مصر- على رُويفع بن ثابت أنْ يوليه العشور فقال: إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنَّ صاحب المكس في النار".
حسن: رواه الإمام أحمد (17001) عن قتيبة بن سعيد، قال: حدّثنا ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيبة، عن أبي الخير، قال (فذكره).
وابن لهيعة فيه كلام معروف من أجل اختلاطه، ولكن رواه عنه قتيبة بن سعيد قبل اختلاطه، ورواه الطبرانيّ في الكبير (4493) من وجه آخر عن ابن لهيعة. وزاد فيه: يعني العاشر، وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (3/ 88) فإنه لا يفرّق بين ما روى عنه قبل الاختلاط وبين من روى عنه بعد الاختلاط، فتنبّه لذلك فإن معرفة ذلك مهمّ جدًّا؛ لأن الحكم على الحديث يختلف بحسب ذلك.
والماكس: هو العشّار الذي يجمع الصدقات وينتقص من حقوق المساكين، ولا يعطيهم إياها بالتمام، فهو حينئذ صاحب مكس يخاف عليه الإثم والعقوبة، قاله البيهقي في السنن (7/ 16).
فرويفع بن ثابت لم يقبل العمل على الصدقات تورعا وإلا فقد جاء في فضل العامل على الصّدقة بالحق كالغازي في سبيل الله.
রুওয়াইফি' বিন সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু আল-খায়র বলেন: মুসলিমাহ বিন মুখাল্লাদ— যিনি মিসরের শাসক ছিলেন— তিনি রুওয়াইফি' বিন সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সামনে প্রস্তাব করলেন যে, তিনি যেন তাকে 'উশুর' (শুল্ক/দশমাংশ) আদায়ের দায়িত্ব দেন। অতঃপর তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: 'নিশ্চয়ই মাকস (অবৈধ কর) আদায়কারী জাহান্নামে যাবে'।"
3906 - عن عثمان بن أبي العاص الثقفيّ، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"تفتح أبواب السماء نصف الليل، فينادي مناد: هل من داع فيستجاب لَهُ، هل من سائل فيعطى، هل من مكروب فيفرج عنه، فلا يبقى مسلم يدعو بدعوة إلا استجاب الله عز وجل له، إلا زانية تسعى بفرجها، أو عشّارًا".
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (9/ 51)، وفي الأوسط (مجمع البحرين 1381) عن إبراهيم ابن هاشم البغوي، ثنا عبد الرحمن بن سلّام الجمحيّ، ثنا داود بن عبد الرحمن العطّار، عن هشام ابن حسان، عن محمد بن سيرين، عن عثمان بن أبي العاص، فذكره.
قال الطبرانيّ: لم يروه عن هشام إلّا داود، تفرّد به عبد الرحمن.
قلت: عبد الرحمن بن سلام هو الجمحيّ مولاهم، أبو حرب البصريّ، قال أبو حاتم: صدوق، وذكره ابن حبان في الثقات (8/ 379) فلا يضرّ تفرّده فإنه في أقلّ تقدير حسن الحديث.
ورواه أيضًا الطبرانيّ في الكبير (9/ 44) من وجه آخر عن كلاب بن أمية أنه لقي عثمان بن أبي العاص فقال: ما جاء بك؟ فقال: استعملت على عشر الأبلة فقال عثمان: إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ الله يدنو من خلقه فيغفر لمن استغفر إلّا لبغي بفرجها أو لعشّار".
أورده الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (3/ 88)، وعزاه إلى الطبرانيّ في الكبير ولم يقل فيه شيئًا.
وأما ما روي عن الحسن، قال: مرّ عثمان بن أبي العاص على كلاب بن أمية وهو جالس على مجلس العاشر بالبصرة، فقال: ما يجسلك هاهنا؟ قال: استعملي هذا على هذا المكان -يعني زيادًا-، فقال له عثمان: ألا أحدِّثك حديثًا سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: بلي. فقال عثمان: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"كان لداود نبي الله عليه السلام من الليل ساعه يوقظ فيها أهله فيقول: يا آل داود! قوموا فصلُّوا، فإن هذه ساعة يستجيب الله فيها الدعاء إلا لساحر أو عشار". فركب كلاب بن أمية سفينة فأتي زيادا فاستعفاه فأعفاه". فهو ضعيف.
رواه الإمام أحمد (16281)، والطبراني في الكير (9/ 46)، وفي الدعاء (139) من طريق علي بن زيد، عن الحسن، عن عثمان بن أبي العاص، نحوه.
وعلي بن زيد هو ابن جدعان ضعيف، والحسن لم يسمع من عثمان بن أبي العاص على الصحيح.
وكذلك لا يصح ما روي عن عقبة بن عامر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يدخل الجنة صاحب مكْس" فهو ضعيف.
رواه أبو داود (2937) عن عبد الله بن محمد النفيلي، حدّثنا محمد بن سلمة، عن محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن عبد الرحمن بن شماسة، عن عقبة بن عامر، فذكره.
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ورواه أحمد (17294، 17354) وصحّحه ابن خزيمة (2333)، والحاكم (1/ 404) والبيهقي (7/ 16) كلّهم من طريق محمد بن إسحاق، به.
قلت: إسناده ضعيف من أجل محمد بن إسحاق فإنه مدلّس وقد عنعن، ولم أقف على تصريح منه، فإنه يحسّن حديثه إذا صرَّح وإلّا فيضعّف.
والمقصود من الحديث هو العشّار كما جاء تفسيره في بعض الروايات. والمكس هو النقصان.
قال الخطابي:"صاحب المكس: هو الذي يعشّر أموال الناس، ويأخذ من التجّار إذا مرّوا عليه، وعبروا به مكسّا باسم العشر".
وفي الباب عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ويل للأمراء! ويل للعرفاء! ويل للأمناء! ليتمنين أقوام يوم القيامة أنّ ذوائبهم كانت معلقة بالثريا يتذبذبون بين السَّماء والأرض ولم يكونوا عملوا على شيء".
رواه أحمد (8627)، وأبو يعلى (6217) كلاهما من حديث هشام الدستوائي، عن عباد بن أبي علي، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.
وصححه الحاكم (4/ 91) وقال:"صحيح الإسناد".
وقال الذهبيّ في الميزان في ترجمة عباد بن أبي علي بعد أنّ روى الحديث المذكور:"هذا حديث منكر". وقد رواه أيضًا ابن حبان (4483) من وجه آخر عن هشام بن حسان، عن أبي حازم مولى أبي رهم الغفاري عنه.
وأبو حازم مولى أبي رهم الغفاري التمار قال فيه الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة. وأما ما نقل من توثيق أبي داود كما في تهذيب الكمال، فهو لأبي حازم الأنصاريّ البياضي، كما جنح إليه ابن حجر في التهذيب.
وكذلك لا يصح ما روي عن يزيد بن شريك العامري قال: سمعت مروان يقول لأبي هريرة: يا أبا هريرة! حدثني حديثاً سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم. قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ليوشكن رجل يتمنى أنه خَرَّ من عند الثريا، وأنه لم يل من أمر الناس شيئًا".
رواه أحمد (10927) واللفظ له، والبزار -كشف الأستار (1643) كلاهما من حديث شيبان، عن عاصم، عن يزيد بن شريك العامري، فذكره.
وصححه الحاكم (4/ 91) ورواه من طريق حماد بن سلمة، أنبأ عاصم بن بهدلة، عن يزيد بن شريك، أن الضحاك بن قيس بعث معه بكسوة إلى مروان بن الحكم. فقال مروان للبواب: انظر من بالباب؟ قال: أبو هريرة. فأذن لَهُ، فقال: يا أبا هريرة! حدّثنا شيئًا سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكره.
قلت: وفيه يزيد بن شريك العامري، لم أقف على ترجمته، والمتن فيه نكارة واضحة، كما قال الذهبيّ في الحديث السابق.
উসমান ইবনে আবুল-আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মধ্যরাতে আকাশের দরজাগুলো খুলে দেওয়া হয়। তখন একজন আহ্বানকারী আহ্বান করে: 'এমন কেউ কি আছে যে প্রার্থনা করবে এবং তার প্রার্থনা গ্রহণ করা হবে? এমন কোনো যাচনাকারী কি আছে, যাকে প্রদান করা হবে? এমন কোনো বিপদগ্রস্ত কি আছে, যার বিপদ দূর করা হবে?' তখন এমন কোনো মুসলিম অবশিষ্ট থাকে না যে কোনো দু'আ করে, আর আল্লাহ তাআলা তার দু'আ কবুল না করেন—তবে যে ব্যভিচারিণী তার লজ্জাস্থান ব্যবহার করে জীবিকা নির্বাহ করে, অথবা (অবৈধ) শুল্ক আদায়কারী ব্যতীত।"
3907 - عن ابن مسعود، قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"لا حسد إلّا في اثنتين رجل آتاه الله مالا فسلطه على هلكته في الحق، ورجل آتاه الله حكمة فهو يقضي بها ويعلمها".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1409)، ومسلم في صلاة المسافرين (816) كلاهما من طريق إسماعيل بن أبي خالد، قال: حدثني قيس (هو ابن أبي حازم)، عن ابن مسعود، فذكر الحديث.
ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলতে শুনেছি: “দু’টি ক্ষেত্র ছাড়া অন্য কোনো ক্ষেত্রে ঈর্ষা (বা আকাঙ্ক্ষা) করা বৈধ নয়। (প্রথমত) এমন ব্যক্তি, যাকে আল্লাহ সম্পদ দান করেছেন এবং সে সত্যের পথে তা ধ্বংস (ব্যয়) করার ক্ষমতাও লাভ করেছে। (দ্বিতীয়ত) এমন ব্যক্তি, যাকে আল্লাহ হিকমত (জ্ঞান/প্রজ্ঞা) দান করেছেন এবং সে তার দ্বারা ফায়সালা করে ও তা শিক্ষা দেয়।”
3908 - عن عبد الله بن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا حسد إلّا في اثنتين رجل آتاه الله القرآن فهو يتلوه آناء الليل وآناء النهار، ورجلٌ آتاه الله مالا فهو ينفقه آناء الليل وآناء النهار".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التوحيد (7529)، ومسلم في صلاة المسافرين (815) كلاهما من حديث سفيان، حدّثنا الزهري، عن سالم، عن أبيه، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দু'টি বিষয় ছাড়া অন্য কোনো বিষয়ে ঈর্ষা (বা ঈপ্সা) করা বৈধ নয়: এক ব্যক্তি, যাকে আল্লাহ কুরআন দান করেছেন, আর সে তা দিনের ও রাতের বিভিন্ন অংশে তেলাওয়াত করে। আর এক ব্যক্তি, যাকে আল্লাহ সম্পদ দান করেছেন, আর সে তা দিনের ও রাতের বিভিন্ন অংশে (আল্লাহর পথে) ব্যয় করে।"
3909 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا حسد إلّا في اثنتين رجل علمه الله القرآن فهو يتلوه آناء الليل وآناء النهار فسمعه جارٌ لَهُ فقال: ليتني أُوتيتُ مثل ما أوتي فلان فعملت مثل ما يعملُ، ورجل آتاه الله مالا فهو يهلكه في الحقِّ، فقال: رجلٌ ليتني أوتيت مثل ما أوتي فلان فعملت مثل ما يعمل".
صحيح: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5026) عن علي بن إبراهيم، حدّثنا روح، حدّثنا شعبة، عن سليمان، سمعت ذكوان، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “দুইটি ক্ষেত্র ছাড়া (অন্য কিছুতে) ঈর্ষা করা যায় না: ১. একজন লোক, যাকে আল্লাহ কুরআন শিক্ষা দিয়েছেন এবং সে দিন-রাতের বিভিন্ন অংশে তা তেলাওয়াত করে। তখন তার প্রতিবেশী তা শুনে বলে: ‘হায়! যদি আমাকেও অমুককে যা দেওয়া হয়েছে তা দেওয়া হতো, তাহলে আমিও তার মতো কাজ করতে পারতাম!’ ২. আর একজন লোক, যাকে আল্লাহ সম্পদ দিয়েছেন এবং সে তা হক্কের (সঠিক) কাজে ব্যয় করে। তখন আরেকজন লোক বলে: ‘হায়! যদি আমাকেও অমুককে যা দেওয়া হয়েছে তা দেওয়া হতো, তাহলে আমিও তার মতো কাজ করতে পারতাম!’”
3910 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا حسد إلّا في اثنتين: رجل أتاه الله القرآن فهو يتلوه آناء الليل وآناء النّهار، فهو يقول: لو أُوتيت مثل ما أوتي هذا، لفعلت كما يفعل، ورجل آتاه الله مالا فهو ينفقه في حقِّه، فهو يقول: لو أوتيت مثل ما أوتي هذا لفعلت كما يفعل".
صحيح: رواه أبو يعلي (1085) عن عثمان، حدّثنا يحيى بن آدم، حدّثنا يزيد بن عبد العزيز، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي سعيد، فذكره.
وإسناده صحيح، يزيد بن عبد العزيز هو ابن سياه الأسديّ الحماني ثقة من رجال الشيخين.
ورواه الإمام أحمد (10215) عن يحيى بن آدم بإسناده إلّا أنه لم يذكر لفظ الحديث، وإنما أحال على حديث أبي هريرة، فقال: مثله سواء.
فكأنّ الأعمش يروي من وجهين عن أبي صالح وهو ذكوان، عن أبي سعيد. وعن أبي هريرة، ولفظهما سواء. إلا أن أبا حاتم يرى أنّ الحديث لأبي هريرة. العلل (1672).
وأورده الهيثميّ في المجمع (2/ 257) وعزاه إلى أبي يعلى وقال: رجاله رجال الصّحيح، ورواه البزّار، نحوه.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: হিংসা (ঈর্ষা) শুধু দুই ক্ষেত্রে হতে পারে: এক ব্যক্তি, যাকে আল্লাহ কুরআন দান করেছেন এবং সে তা দিন-রাতের বিভিন্ন সময়ে তিলাওয়াত করে। তখন (অন্য এক ব্যক্তি) বলে: যদি আমাকেও এর মতো দেওয়া হতো, তাহলে আমি তেমনই করতাম যেমন সে করছে। আর অপর এক ব্যক্তি, যাকে আল্লাহ সম্পদ দান করেছেন এবং সে তা সঠিক পথে ব্যয় করে। তখন (অন্য এক ব্যক্তি) বলে: যদি আমাকেও এর মতো দেওয়া হতো, তাহলে আমি তেমনই করতাম যেমন সে করছে।
3911 - عن أبي كبشة الأنماري، أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ثلاثة أقسم عليهن وأحدكم حديثا فالحفظوه قال: ما نقص مال عبد من صدقة ولا ظلم عبد مظلمة فصبر عليها إلّا زاده الله عزًّا، ولا فتح عبدٌ باب مسألةٍ إلّا فتح الله عليه باب فقرٍ أو كلمة نحوها، وأحدثكم حديثًا فاحفظوه قال: إنما الدنيا لأربعة نقر: عبدٍ رزقه الله مالا وعلمًا فهو يتَّقي فيه ربه ويصلُ فيه رحمه ويعلم لله فيه حقًّا فهذا بأفضل المنازل، وعبد رزقه الله علمًا ولم يرزقه مالا فهو صادق النية يقول لو أنّ لي مالا لعملت بعمل فلانٍ فهو بنيَّته فأجرهما سواءٌ، وقد رزقه الله مالا ولم يرزقه علما فهو يخبط في ماله بغير علم لا يتقي فيه ربه ولا تصل فيه رحمه ولا يعلم الله فيه حقًا فهذا بأخبث المنازل، وعبد لم يرزقه الله مالا ولا علما فهو يقول لو أنَّ لي مالا لعملت فيه بعمل فلانٍ فهو بنيَّته فوزرهما سواءٌ".
حسن: رواه الترمذيّ (2326) عن محمد بن إسماعيل، ثنا أبو نعيم، حدّثنا عبادة بن مسلم، حدّثنا يونس بن خبّاب، عن سعيد الطّائيّ أبي البختريّ، أنه قال: حدّثني أبو كبشة الأنماري (فذكره). قال الترمذيّ: حسن صحيح.
وإسناده حسن من أجل الكلام في يونس بن خبّاب تُكلم فيه لسوء معتقده؛ لأنه كان غاليًا في تشيّعه غير أنه حسن الحديث إذا لم يكن ما يرويه مؤيّدًا لبدعته.
وله طرق أخرى منها ما رواه وكيع، عن الأعمش، عن سالم بن أبي الجعد، عن أبي كبشة الأنماريّ، نحوه.
ومن هذا الطريق رواه الإمام أحمد (18024)، وابن ماجه (4228)، والفريابي في فضائل القرآن (105). وسالم بن أبي الجعد ثقة إلّا أنه يرسل كثيرًا إلا أنه لم ينكر إدراكه لأبي كبشة، وإن
كان رواه عبد الرزاق عن معمر، عن منصور، عن سالم بن أبي الجعد، عن ابن أبي كبشة، عن أبيه، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا ابن ماجه (4228) والطريقان محفوظان، وابن أبي كبشة لا يعرف، ولكنه توبع.
وفي الباب ما رُوي عن عبد الله بن عمرو مرفوعًا:"إنّما الحسد في اثنتين: رجل أتاه الله القرآن فقام به، فأحلّ حلاله وحرّم حرامه، ورجل آتاه الله مالًا فوصل منه أقاربه ورحمه وعمل بطاعة الله فيه".
رواه الطبراني في الكبير (قطعة جزء 13 - 14 (28)، وفي الأوسط (233) عن أحمد بن رشدين، قال: حدّثنا روح بن صلاح، قال: حدّثنا موسى بن علي بن رباح، عن أبيه، عن عبد الله ابن عمرو، فذكره.
وفيه روح بن صلاح، ويقال له: ابن سبابة قال ابن عدي:"وأظنه مصريّ ضعيف، يكنى أبا الحارث، وذكر له حديثين وقال: هذان الحديثان بإسناديهما ليسا بمحفوظين، ولعلّ البلاء فيه من عيسي (بن صالح المؤذّن بمصر، ثنا روح بن صلاح) هذا فإنه ليس بمعروف، ولروح بن سبابة أحاديث ليست بالكثيرة عن ابن لهيعة، والليث وسعيد بن أبي أيوب، ويحيى بن أيوب، وحيوة وغيرهم، وفي بعض حديثه نكرة". انتهى.
وقال ابن حجر في اللسان (2/ 466):"ذكره ابن يونس في تاريخ الغرباء فقال: من أهل الموصل قدم مصر، وحدّث بها، رويت عنه مناكير. وقال الدارقطنيّ: ضعيف في الحديث، وقال ابن ماكولا: ضعّفوه".
قلت: ومع ذلك ذكره ابن حبان في"الثقات" (8/ 244).
وأما الهيثمي فتضارب قوله فيه، فقال في كتاب الصلاة في"مجمع الزوائد" (2/ 256):"رواه الطبراني في الكبير، وفيه روح بن صلاح ضعّفه ابن عدي، ووثقه ابن حبان، وقال الحاكم: ثقة مأمون".
ثم أعاد ذكره في كتاب الزكاة"المجمع" (3/ 108) فقال: رواه الطبراني في الأوسط، ورجاله موثقون. انتهى.
قلت: وخالفه عبد الله بن المبارك فرواه في الزهد (1204) عن موسى بن علي بن رباح، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو بن العاص موقوفًا عليه، وهذا أشبه.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن يزيد بن الأخنس، وكانت له صحبة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تنافس بينكم إلا في الاثنتين: رجل أعطاه الله عز وجل القرآن، فهو يقوم به آناء اللّيل والنهار، فيتبع ما فيه، فيقول الرجل: لو أعطاني الله مثل ما أعطى فلانًا فأقوم به مثل ما يقوم به فلان. ورجل أعطاه الله مالًا فهو ينفق ويتصدق فيقول الرجل مثل ذلك.
رواه الإمام أحمد (16966)، والطبراني في الكبير (22/ 239)، وفي الأوسط (2292)، وفي
الصغير (1/ 48 - 49) كلّهم من طريق الهيثم بن حُميد، عن زيد بن واقد، عن سليمان بن موسي، عن كثير بن مرة، عن يزيد بن الأخنس، فذكره.
وزاد أحمد: فقال رجل: يا رسول الله! أرأيتك النجدة تكون في الرجل؟ … (سقط باقي الحديث).
وأشار الهيثمي أيضًا إلى هذا السّقط، وقد وجدنا تكملة الحديث عند الفريابيّ في"فضائل القرآن" (107) وهو جواب النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: ليست هما بعدل، إنّ الكلب ليهرُّ من وراء أهله".
وأعتقد أنّ السّقط في المسند سببه أن عبد الله بن أحمد وجده في كتاب أبيه بخطّه. قال عبد الله:"وجدتُ في كتاب أبي بخطّ يده قال: كتب إليَّ أبو توبة الربيع بن نافع -وكان في كتابه-: حدّثنا الهيثم بن حُميد، فذكره.
قال الطبراني في"الصغير":"لا يُروى عن يزيد بن الأخنس، وهو أبو معن ابن يزيد، وهو وابنه قد صحبة رسول الله صلى الله عليه وسلم إلّا بهذا الإسناد، تفرّد به الهيثم".
وقال في الأوسط:"لم يسند يزيد بن الأخنس عن رسول الله صلى الله عليه وسلم حديثًا غير هذا، تفرّد به ابن زيد بن واقد".
وأورده الهيثمي في موضعين من"المجمع" في كتاب الصلاة (2/ 256) وعزاه إلى"الكبير" وحده وقال:"رجاله ثقات".
وذكره في كتاب الزكاة (3/ 108) وقال بعد أن أشار إلى التقط الذي وقع في مسند أحمد:"رواه أحمد كتابة، والطبراني في"الكبير" و"الأوسط" وفيه سليمان بن موسي، وفيه كلام، وقد وثّقه جماعة".
ولم يُشر إلى الصغير، كما أنه لم يُشر إلى العلّة التي في الإسناد وهما الانقطاع فإن موسي بن سليمان لم يدرك كثير بن مرة كما قال أبو مسهر، نقله المزي في تهذيب الكمال.
وسليمان بن موسى وهو القرشي الأموي الأشدق هو فقيه أهل الشام، تكلّم فيه البخاريّ والنسائيّ، ووثقه ابن معين. وقال أبو حاتم:"محله الصدق، وفي حديثه بعض الاضطراب". غير أنه حسن الحديث.
وقوله: وإنّ الكلب ليهِرُّ من وراء أهله"
يقال: هرَّ الكلبُ يَهرُّ، من باب ضرب، هريرًا: إذا صوت، وهو دون النّباح. والمعنى"أنّ الشّجاعة غريزة في الإنسان، فهو يلقي الحروب، ويقاتل طبعًا وحمية لا حسبة، فضرب بالكلب مثلًا إذا كان من طبعه أن يهرَّ دون أهله ويذب عنهم، بريد أن الجهاد والشجاعة ليسا بمثل القراءة والصدقة". كذا في النهاية لابن الأثير.
وفي الباب أيضًا عن سمرة بن جندب، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: ليس في الدنيا حسد إلّا في اثنتين: الرجل يحسد الرجل أن يعطيه الله المال الكثير، فينفق منه، فيكثر النفقة ويقول الآخر: لو كان لي
مثل هذا لأنفقت مثل ما ينفق وأحسن فهو يحسده، ورجل يقرأ القرآن فيقوم به بالليل وعنده رجل إلى جنبه لا يعلم القرآن فهو يحسده على قيامه، وعلى ما علمه الله عز وجل القرآن، فيقول: لو علمني الله مثل هذا القمتُ مثل ما يقوم".
رواه الطبرانيّ في الكبير (7064) عن موسى بن هارون، ثنا مروان بن جعفر، ثنا محمد بن إبراهيم بن خبيب بن سليمان بن سمرة، ثنا جعفر بن سعد بن سمرة، عن خبيب بن سليمان بن سمرة، عن أبيه، عن سمرة بن جندب، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال (فذكره). وفيه سلسلة من الضّعفاء وهم:
محمد بن إبراهيم بن خبيب، وشيخه جعفر بن سعد بن سمرة، وشيخه خبيب بن سليمان بن سمرة.
ولذا قال الهيثميّ في"المجمع" (1/ 256):"رواه الطبرانيّ في الكبير، وفي إسناده بعض ضعف، ورواه البزّار بإسناد ضعيف".
আবু কাবশাহ আল-আনমারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "আমি তোমাদের কাছে তিনটি বিষয়ে শপথ করছি এবং তোমাদেরকে একটি হাদীস বলছি, সুতরাং তোমরা তা মুখস্থ রাখো।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন:
"সাদাকা করার কারণে কোনো বান্দার সম্পদ হ্রাস পায় না। আর কোনো বান্দা যদি কোনো অন্যায় দ্বারা আক্রান্ত হয় এবং তার উপর ধৈর্য ধারণ করে, তবে আল্লাহ তার সম্মান (ইজ্জত) বৃদ্ধি করে দেন। আর কোনো বান্দা যদি যাচ্ঞার (ভিক্ষা বা চাওয়ার) দরজা খোলে, তবে আল্লাহ তার জন্য দারিদ্র্যের দরজা খুলে দেন।"
"আর আমি তোমাদেরকে একটি কথা বলছি, তোমরা তা মুখস্থ রাখো।" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "দুনিয়া কেবল চার প্রকার লোকের জন্য:
১. এক ব্যক্তি, যাকে আল্লাহ সম্পদ ও জ্ঞান উভয়ই দিয়েছেন। সে তার রবের ব্যাপারে তাকওয়া অবলম্বন করে, আত্মীয়ের সাথে সম্পর্ক বজায় রাখে এবং তাতে আল্লাহর হক সম্পর্কে অবগত থাকে। এই ব্যক্তি সর্বোত্তম মর্যাদার অধিকারী।
২. আরেক ব্যক্তি, যাকে আল্লাহ জ্ঞান দিয়েছেন কিন্তু সম্পদ দেননি। সে সৎ নিয়তের অধিকারী হয় এবং বলে: যদি আমার সম্পদ থাকত, তবে আমি অমুক ব্যক্তির মতো কাজ করতাম। সে তার নিয়তের কারণে (প্রতিফল পাবে) এবং তাদের উভয়ের পুরস্কার সমান হবে।
৩. আরেক ব্যক্তি, যাকে আল্লাহ সম্পদ দিয়েছেন কিন্তু জ্ঞান দেননি। সে অজ্ঞতার কারণে তার সম্পদে নির্বিচারে ব্যয় করে, তাতে সে তার রবের ব্যাপারে তাকওয়া অবলম্বন করে না, আত্মীয়ের সাথে সম্পর্ক বজায় রাখে না এবং তাতে আল্লাহর হক সম্পর্কে অবগত থাকে না। এই ব্যক্তি নিকৃষ্টতম মর্যাদার অধিকারী।
৪. আরেক ব্যক্তি, যাকে আল্লাহ সম্পদ বা জ্ঞান কোনোটাই দেননি। সে বলে: যদি আমার সম্পদ থাকত, তবে আমি অমুক (খারাপ) ব্যক্তির মতো কাজ করতাম। সে তার নিয়তের কারণে (পাপী হবে) এবং তাদের দুজনের পাপ সমান হবে।"
3912 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لو كان عندي أحدٌ ذهبًا أحببت أن لا يأتي ثلاث، وعندي منه دينار -ليس شيء أرصده في دين عليَّ- أجد من يقبله".
متفق عليه: رواه البخاريّ في التمني (7228) عن إسحاق بن نصر، حدّثنا عبد الرزاق، عن معمر، عن همّام: سمع أبا هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.
وأخرجه مسلم في الزكاة (991) من طرق عن أبي هريرة، نحوه.
وقوله: أرصده أي أعدُّه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যদি আমার কাছে উহুদ পাহাড় পরিমাণ সোনাও থাকে, আমি পছন্দ করি না যে, তিন দিন অতিবাহিত হবে আর আমার কাছে তা থেকে একটি দিনারও অবশিষ্ট থাকবে—তবে সেই দিনার নয়, যা আমি আমার কোনো ঋণ পরিশোধের জন্য জমা রেখেছি—বরং আমি এমন কাউকে যেন পেয়ে যাই, যে তা গ্রহণ করবে (অর্থাৎ আমি তা সাদকা করে দেব)।"
3913 - عن أبي ذرّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما يسُرُّني أنَّ عندي مثل أُحُدٍ هذا ذهبا تمضي عليَّ ثالثةٌ وعندي منه دينار إلا شيئا أرصده لدينٍ إلا أن أقول به في عباد الله هكذا وهكذا وهكذا عن يمينه وعن شماله ومن خلفه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الرقاق (6444)، ومسلم في الزكاة (992) كلاهما من حديث الأعمش، عن زيد بن وهب، عن أبي ذرّ في حديث طويل.
আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার নিকট যদি এই উহুদ পাহাড়ের সমপরিমাণ স্বর্ণও থাকে, তাতে আমি খুশি হবো না যে, তিন দিন পার হয়ে যাবে, আর আমার নিকট তা থেকে একটি দিনারও অবশিষ্ট থাকবে—তবে (যদি থাকে) শুধু সেই পরিমাণ, যা আমি ঋণের জন্য প্রস্তুত রাখি। তবে যদি আমি তা আল্লাহর বান্দাদের মধ্যে এভাবে, এভাবে এবং এভাবে—ডান দিকে, বাম দিকে এবং পিছনের দিকে—বিতরণ করে দেই (তাহলে আমি খুশি)।"
3914 - عن عائشة، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم في مرضه الذي مات فيه:"يا عائشة! ما فعلت الذَّهبُ". فجاءت ما بين الخمسة إلى السبعة أو الثمانية أو التسعة فجعل يقلبها بيده ويقول:"ما ظنُّ محمد الله عز وجل لو لقيه وهذي عنده؟ ! أنفقيها".
حسن: رواه الإمام أحمد (24222)، (25492)، والبغويّ في شرح السنة (1658) وصحّحه ابن حبان (3212) كلّهم من طرق عن محمد بن عمرو، قال: حدّثني أبو سلمة، قال: قالت عائشة (فذكرته)،
وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو، وهو ابن علقمة اللّيثيّ، وهو صدوق، حسن الحديث.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সেই অসুস্থতার সময়, যাতে তিনি ইন্তেকাল করেছিলেন, বললেন: "হে আয়েশা! স্বর্ণগুলো কী করলে?" তখন তিনি পাঁচ থেকে সাত বা আট বা নয়টি (মুদ্রা) নিয়ে আসলেন। অতঃপর তিনি তা নিজের হাতে উল্টেপাল্টে দেখতে লাগলেন এবং বললেন: "মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহ আযযা ওয়া জাল সম্পর্কে কী ধারণা পোষণ করতেন যদি তিনি আল্লাহর সাথে সাক্ষাৎ করতেন আর এই [স্বর্ণগুলো] তাঁর কাছেই থাকতো?! এগুলো খরচ করে দাও।"
3915 - عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم التفت إلى أحد فقال:"والذي نفس محمد بيده، ما يسرني أن أحدا يُحول لآل محمد ذهبا أنفقه في سبيل الله، أموت يوم أموت أدع منه دينارين، إلا دينارين أعدهما لدين إن كان". فَمات وما ترك دينارا، ولا درهما، ولا عبدا، ولا وليدة، وترك درعه مرهونة عند يهودي على ثلاثين صاعا من شعير.
حسن: رواه أحمد (2724) وأبو يعلى (2684) والبزار - كشف الأستار (3682) وعبد بن حُميد (598) كلهم من حديث هلال بن خباب، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل هلال بن خباب العبدي مولاهم أبو العلاء البصري، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উহুদের দিকে ফিরে তাকিয়ে বললেন: "শপথ সেই সত্তার, যাঁর হাতে মুহাম্মাদের জীবন! আমার কাছে এটা মোটেও পছন্দনীয় নয় যে, উহুদ পর্বত মুহাম্মাদের পরিবারের জন্য সোনায় রূপান্তরিত হবে আর আমি তা আল্লাহর পথে খরচ করব। আমি যেদিন মৃত্যুবরণ করব, সেদিন যেন আমি তা থেকে (আমার কাছে) দুই দিনার রেখে না যাই—তবে সেই দুই দিনার ছাড়া, যা আমি কোনো ঋণের (পরিশোধের) জন্য প্রস্তুত করে রেখেছি, যদি আমার কোনো ঋণ থাকে।" অতঃপর তিনি (নবী) ইন্তেকাল করলেন এবং তিনি কোনো দিনার, কোনো দিরহাম, কোনো দাস, অথবা কোনো দাসী রেখে যাননি। আর তিনি তার লৌহবর্ম একজন ইহুদীর কাছে ত্রিশ সা' যবের বিনিময়ে বন্ধক রেখে গিয়েছিলেন।
3916 - عن أنس بن مالك قال: كان أبو طلحة أكثر أنصاري بالمدينة مالًا من نخل وكان أحب أموال إليه بيرحاء كانت مستقبلة المسجد وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يدخلها ويشرب من ماءٍ فيها طيب. قال أنس: فلما أنزلت هذه الآية: {لَنْ تَنَالُوا الْبِرَّ حَتَّى تُنْفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَ} [آل عمران: 92]. قام أبو طلحة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله! إن الله تبارك وتعالى يقول: {لَنْ تَنَالُوا الْبِرَّ حَتَّى تُنْفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَ} وإن أحب أموالي إلي بيرحاء وإنها صدقة لله أرجو برها وذخرها عند الله فضعها يا رسول الله! حيث شئت. قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بخ ذلك مالٌ رابح! ذلك مال رابحٌ! وقد سمعت ما قلت فيه وإنِّي أرى أن تجعلها في الأقربين". فقال أبو طلحة: أفعل يا رسول الله! فقسمها أبو طلحة في أقاربه وبني عمِّهِ.
متفق عليه: رواه مالك في الصدقة (2) عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، أنّه سمع أنس بن مالك يقول (فذكره).
ورواه البخاريّ في الوكالة (2318)، ومسلم في الزكاة (998) كلاهما عن يحيى بن يحيي، قال: قرأت على مالك، به.
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মদীনার আনসারদের মধ্যে সবচেয়ে বেশি খেজুর বাগানবিশিষ্ট ধনী ছিলেন। তাঁর কাছে তাঁর সমস্ত সম্পদের মধ্যে 'বীরহা' নামক বাগানটি সবচেয়ে প্রিয় ছিল, যা ছিল মসজিদের দিকে মুখ করা। আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাতে প্রবেশ করতেন এবং সেখানকার সুস্বাদু পানি পান করতেন।
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: "তোমরা কখনো পুণ্য লাভ করতে পারবে না, যতক্ষণ না তোমরা তোমাদের প্রিয় বস্তু হতে (আল্লাহর পথে) ব্যয় করবে।" [সূরা আলে ইমরান: ৯২]
তখন আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট দাঁড়িয়ে বললেন, ইয়া রাসূলুল্লাহ! নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা বলেছেন: "তোমরা কখনো পুণ্য লাভ করতে পারবে না, যতক্ষণ না তোমরা তোমাদের প্রিয় বস্তু হতে (আল্লাহর পথে) ব্যয় করবে।" আর আমার সমস্ত সম্পদের মধ্যে 'বীরহা' আমার নিকট সবচেয়ে প্রিয়। আমি আল্লাহর নিকট এর কল্যাণ ও সওয়াবের আশা করি, আর এটি আল্লাহর জন্য সাদকা (দান)। অতএব হে আল্লাহর রাসূল! আপনি এটি যেখানে ইচ্ছা রাখুন (ব্যয় করুন)।
বর্ণনাকারী বলেন, তখন আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "বাহ! সেটি তো লাভজনক সম্পদ! সেটি তো লাভজনক সম্পদ! তুমি যা বলেছ আমি তা শুনেছি, আর আমি মনে করি যে, তুমি এটি তোমার নিকটাত্মীয়দের মাঝে বণ্টন করো।" আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, ইয়া রাসূলুল্লাহ! আমি তা-ই করব। অতঃপর আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর নিকটাত্মীয় ও চাচাতো ভাইদের মধ্যে তা বণ্টন করে দিলেন।
[হাদীসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম মালিক এটি বর্ণনা করেছেন ইসহাক ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু আবী তালহা (রাহঃ)-এর সূত্রে, যিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছেন। ইমাম বুখারী (২৩১৮) এবং মুসলিম (৯৯৮) ইয়াহইয়া ইবনু ইয়াহইয়া হতে, তিনি মালিক (রাহঃ) হতে এই সূত্রে বর্ণনা করেছেন।]
3917 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من تصدَّق بعدل تمرةٍ من كسبٍ طيِّب -لا يقبل الله إلا الطيب- إن الله يتقبلها بيمينه ثم يربيها لصاحبه كما يربِّي أحدكم فلوَّه حتى تكون مثل الجبل".
عبد الرحمن - هو ابن عبد الله بن دينار، عن أبيه، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.
قال البخاريّ:"تابعه سليمان، عن ابن دينار. وقال ورقاء: عن ابن دينار، عن سعيد بن يسار، عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم.
ورواه مسلم بن أبي مريم، وزيد بن أسلم، وسهيل بن أبي صالح، عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم" انتهى قول البخاريّ.
قلت: رواه مسلم في الزكاة (1014) من وجه آخر عن سعيد بن يسار، أنه سمع أبا هريرة يقول (فذكره). ورواه أيضًا من حديث سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة.
ورواه أيضًا من حديث زيد بن أسلم، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.
وألفاظ مسلم نحو ألفاظ البخاريّ إلا أن البخاريّ لم يسق اختلاف الألفاظ في المتابعات بخلاف مسلم فإنه ساقها.
ومن الذين تابعوه أيضًا القاسم بن محمد قال: سمعت أبا هريرة، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم"إنّ الله يقبل الصّدقة ويأخذها بيمينه، فيربّيها لأحدكم كما يربّي أحدكم مُهْره، حتى إنّ اللّقمة لتصير مثل أحد. وتصديق ذلك في كتاب الله عز وجل: {أَلَمْ يَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ هُوَ يَقْبَلُ التَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِ وَيَأْخُذُ الصَّدَقَاتِ} [سورة التوبة: 104]، {يَمْحَقُ اللَّهُ الرِّبَا وَيُرْبِي الصَّدَقَاتِ} [سورة البقرة: 276]".
رواه الترمذيّ (662) عن أبي كريب محمد بن العلاء، حدّثنا وكيع، حدّثنا عبّاد بن منصور، حدّثنا القاسم بن محمد، فذكره. قال الترمذيّ: هذا حديث حسن صحيح.
قلت: وهو كما قال غير أن ذكر الآية تفرّد به عباد بن منصور، عن القاسم، فقد رواه الإمام أحمد (9245) من طريق عبد الواحد بن صبرة، وقرنه بعباد بن منصور كلاهما سمعا القاسم بن محمد بإسناده، فذكره ولم يذكر فيه قوله:"تصديق ذلك في كتاب الله …".
وكذلك رواه أيوب، عن القاسم بن محمد. ومن طريقه رواه الإمام أحمد (7634)، وابن خزيمة (2426) كلاهما عن عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن أيوب، بإسناده.
وعبّاد بن منصور، ضعف، تغيّر بأخره؛ ولذا قالوا: إنّ هذه الزّيادة منكرة، فلعلْ تلاوة هذه الآية من كلام أبي هريرة.
بل قد وقع التصريح في رواية ابن جرير بأنّ تلاوة الآية من كلام أبي هريرة. ذكره الحافظ في الفتح (3/ 280) ولم يعلّه بشيء.
وأما الترمذيّ فقال عقبه:"هذا حديث حسن صحيح، وقد رُوي عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم". قلت: حديث عائشة سيأتي.
ثم قال الترمذي:"وقد قال غير واحد من أهل العلم في هذا الحديث وما يشبه هذا من الروايات من الصفات، ونزول الرّبّ تبارك وتعالى كل ليلة إلى السّماء الدّنيا، قالوا: قد تثبت
الروايات في هذا، ويؤمن بها، ولا يتوهّم، ويقال:"كيف". هكذا رُوي عن مالك بن أنس، وسفيان بن عيينة، وعبد الله بن المبارك، أنّهم قالوا في هذه الأحاديث:"أمروها بلا كيف، وهكذا قول أهل العلم من أهل السنة والجماعة.
وأما الجهمية: فأنكرت هذه الروايات وقالوا: هذا تشبيه!
وقد ذكر الله تبارك وتعالى في غير موضع من كتابه (اليد) و (السمع والبصر) فتأوّلت الجهمية هذه الآيات، ونشروها على غير ما فسّر أهل العلم وقالوا: إنّ الله لم يخلق آدم يده، وقالوا: إنّما معني اليد: القوّة.
وقال إسحاق بن إبراهيم: إنما يكون التشبيه إذا قال: يد كيد، أو مثل يد، أو سمع كسمع، فهذا تشبيه.
وأما إذا قال كما قال الله: يد، وسمع، وبصر. ولا يقول: كيف، ولا يقول: مثل سمع ولا كسمع، فهذا لا يكون تشيهًا، وهو كما قال الله تبارك وتعالى في كتابه: {لَيْسَ كَمِثْلِهِ شَيْءٌ} [الشوري: 11]". انتهى كلام الترمذيّ رحمه الله.
قوله:"فَلُوَّه" بفتح الفاء وضمّ اللّام وتشديد الواو - أي المهر، سُمّي بذلك لأنّه فَلِي عن أمّه أي عزل وفصل. وفي رواية عند مسلم:"فلُوّه أو فصيله".
وفي رواية أخرى:"فَلُوَّه أو قَلُوصَه". والفصيل: ولد النّاقة إذا فصل من إرضاع أمِّه. والقلوص: هي الناقة الفتية، ولا تطلق على الذّكر.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি উত্তম (হালাল) উপার্জন থেকে একটি খেজুরের সমপরিমাণ দান করে—আল্লাহ তা'আলা উত্তম ব্যতীত অন্য কিছু কবুল করেন না—নিশ্চয় আল্লাহ তা তাঁর ডান হাত দ্বারা গ্রহণ করেন, অতঃপর তিনি তা তার দাতার জন্য এমনভাবে লালন-পালন করেন, যেমন তোমাদের কেউ তার ঘোড়ার বাচ্চাকে (ফাল্লুকে) লালন-পালন করে, শেষ পর্যন্ত তা পাহাড়ের মতো হয়ে যায়।"
আবদুর রহমান — তিনি হলেন ইবনু আবদুল্লাহ ইবনু দীনার — তাঁর পিতা থেকে, তিনি আবূ সালিহ থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন।
আল-বুখারী বলেছেন: "সুলায়মান এই হাদীসে ইবনু দীনারের অনুসরণ করেছেন। আর ওয়ারকা বলেছেন: ইবনু দীনার থেকে, তিনি সাঈদ ইবনু ইয়াসার থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেছেন।"
আর মুসলিম ইবনু আবী মারয়াম, যায়িদ ইবনু আসলাম এবং সুহায়ল ইবনু আবী সালিহ—সকলেই আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন। আল-বুখারীর উক্তি এখানে সমাপ্ত।
আমি (গ্রন্থকার) বলি: মুসলিম হাদীসটি যাকাত অধ্যায়ে (নং ১০১৪) সাঈদ ইবনু ইয়াসার থেকে অন্য সূত্রে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছেন (অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেন)। তিনি সুহায়ল ইবনু আবী সালিহ থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণনা করেছেন।
তিনি যায়িদ ইবনু আসলাম থেকে, তিনি আবূ সালিহ থেকে, তিনি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও এটি বর্ণনা করেছেন।
মুসলিমের শব্দগুলো বুখারীর শব্দগুলোর মতোই, তবে বুখারী তাঁর অনুসরণকারী রাবীদের মধ্যে শব্দের পার্থক্য উল্লেখ করেননি, যা মুসলিম করেছেন।
তাঁর অনুসরণকারীদের মধ্যে কাসিম ইবনু মুহাম্মাদও আছেন। তিনি বলেন: আমি আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতে শুনেছি যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ সাদাকা কবুল করেন এবং তা তাঁর ডান হাত দ্বারা গ্রহণ করেন। অতঃপর তিনি তোমাদের কারো জন্য তা লালন-পালন করেন, যেমন তোমাদের কেউ তার ঘোড়ার বাচ্চাকে লালন-পালন করে। এমনকি একটি লোকমাও (সাদাকা) উহুদ পাহাড়ের মতো হয়ে যায়। আর এর সত্যতা আল্লাহ তাআলার কিতাবে রয়েছে: {তারা কি জানে না যে, আল্লাহই তাঁর বান্দাদের তাওবা কবুল করেন এবং সাদাকা গ্রহণ করেন?} [সূরা আত-তাওবা: ১০৪], {আল্লাহ সুদকে নিশ্চিহ্ন করেন এবং সাদাকা বৃদ্ধি করেন} [সূরা আল-বাক্বারা: ২৭৬]।"
তিরমিযী (নং ৬৬২) আবূ কুরায়ব মুহাম্মাদ ইবনু আল-‘আলা থেকে, তিনি ওয়াকী’ থেকে, তিনি ‘আব্বাদ ইবনু মানসূর থেকে, তিনি কাসিম ইবনু মুহাম্মাদ থেকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। তিরমিযী বলেন: এই হাদীসটি হাসান সহীহ।
আমি (গ্রন্থকার) বলি: তিনি যা বলেছেন তা সঠিক, তবে আয়াতের উল্লেখ কেবল কাসিম থেকে ‘আব্বাদ ইবনু মানসূর এককভাবে বর্ণনা করেছেন। ইমাম আহমাদ (নং ৯২৪৫) ‘আব্দুল ওয়াহিদ ইবনু সাবরা-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন এবং তাকে ‘আব্বাদ ইবনু মানসূর-এর সঙ্গে মিলিয়েছেন। উভয়েই কাসিম ইবনু মুহাম্মাদ থেকে তাঁর সনদসহ বর্ণনা করেছেন, কিন্তু তাতে এই উক্তিটি উল্লেখ করেননি: "এর সত্যতা আল্লাহ তাআলার কিতাবে রয়েছে..."
অনুরূপভাবে আইয়ুব, কাসিম ইবনু মুহাম্মাদ থেকে বর্ণনা করেছেন। তাঁর সূত্রে ইমাম আহমাদ (নং ৭৬৩৪) এবং ইবনু খুযাইমাহ (নং ২৪২৬) উভয়েই আবদুর রাযযাক থেকে, তিনি মা‘মার থেকে, তিনি আইয়ুব থেকে তাঁর সনদসহ বর্ণনা করেছেন।
আর ‘আব্বাদ ইবনু মানসূর দুর্বল রাবী, শেষ বয়সে তাঁর স্মৃতিশক্তি পরিবর্তিত হয়েছিল। একারণেই তারা বলেছেন যে, এই অতিরিক্ত অংশটি মুনকার (অস্বীকৃত)। সম্ভবত এই আয়াত তিলাওয়াত আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব উক্তি।
বরং ইবনু জারীরের বর্ণনায় স্পষ্ট উল্লেখ রয়েছে যে, এই আয়াত তিলাওয়াত আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা। হাফিয ইবনু হাজার ফাতহুল বারী (৩/২৮০)-তে এটি উল্লেখ করেছেন এবং এর কোনো ত্রুটি ধরেননি।
আর তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ) এর শেষে বলেছেন: "এই হাদীসটি হাসান সহীহ। এটি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সূত্রে বর্ণিত হয়েছে।" আমি বলি: আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস পরে আসবে।
এরপর তিরমিযী বলেন: "এই হাদীস এবং আল্লাহর সিফাত (গুণাবলি) সম্পর্কিত অনুরূপ অন্যান্য বর্ণনা, যেমন প্রতি রাতে বরকতময় প্রভু (আল্লাহ) দুনিয়ার আকাশে নেমে আসেন, এ বিষয়ে একাধিক বিদ্বান বলেছেন: এই বর্ণনাগুলো প্রমাণিত এবং এগুলোর ওপর ঈমান আনা হবে। কিন্তু এ বিষয়ে কোনো প্রকার ধারণা করা বা 'কীভাবে' বলা যাবে না। মালিক ইবনু আনাস, সুফিয়ান ইবনু উয়ায়না এবং আবদুল্লাহ ইবনু মুবারক থেকে অনুরূপ বর্ণিত হয়েছে যে, তাঁরা এই হাদীসগুলো সম্পর্কে বলেছেন: 'তাফসীর না করে যেভাবে এসেছে সেভাবেই অতিক্রম করতে দাও।' এটিই আহলুস সুন্নাহ ওয়াল জামা‘আতের বিদ্বানদের বক্তব্য।
আর জাহমিয়্যাহ সম্প্রদায় এই বর্ণনাগুলো অস্বীকার করেছে এবং বলেছে: এটি তাশবীহ (সাদৃশ্য আরোপ)।
আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা‘আলা তাঁর কিতাবে একাধিক স্থানে 'হাত' (اليد), 'শ্রবণ' (السمع) ও 'দর্শন' (البصر) এর উল্লেখ করেছেন। জাহমিয়্যাহ এই আয়াতগুলোর তা’বীল (ব্যাখ্যা) করেছে এবং বিদ্বানদের ব্যাখ্যার বিপরীত অর্থ প্রচার করেছে। তারা বলেছে: আল্লাহ আদমকে তাঁর নিজ হাতে সৃষ্টি করেননি। তারা বলেছে: 'হাত' অর্থ হলো 'শক্তি'।
ইসহাক ইবনু ইব্রাহীম বলেছেন: তাশবীহ (সাদৃশ্য) তখনই হবে, যখন কেউ বলবে: হাত হাতের মতো, অথবা হাতের উদাহরণ, অথবা শ্রবণ শ্রবণের মতো। এটি তাশবীহ।
কিন্তু যখন কেউ আল্লাহর বর্ণনা অনুসারে বলে: হাত, শ্রবণ, এবং দর্শন, এবং 'কীভাবে' না বলে, আর শ্রবণের মতো বা শ্রবণের সাদৃশ্যও না বলে, তবে তা তাশবীহ হবে না। আর এটি তেমনই যেমন আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তা‘আলা তাঁর কিতাবে বলেছেন: {তাঁর মতো কিছুই নেই} [সূরা আশ-শূরা: ১১]।" এখানে ইমাম তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর বক্তব্য সমাপ্ত হলো।
তাঁর বাণী: "ফাল্লুওয়াহ" (فَلُوَّه) হলো ফা-তে ফাতহা (জবর), লাম-এ দাম্মা (পেশ) এবং ওয়াও-এর উপর তাশদীদসহ — অর্থাৎ ঘোড়ার বাচ্চা। এটিকে এই নামে ডাকা হয় কারণ এটি তার মা থেকে 'ফালী' (আলাদা/বিচ্ছিন্ন) করা হয়েছে। মুসলিমের একটি বর্ণনায় রয়েছে: "তাঁর ঘোড়ার বাচ্চা (ফাল্লুওয়াহ) অথবা উটের বাচ্চা (ফাসীল)।"
আরেকটি বর্ণনায় রয়েছে: "তাঁর ঘোড়ার বাচ্চা (ফাল্লুওয়াহ) অথবা যুবতী উট (ক্বালূসাহ)।" 'ফাসীল' হলো উটনীর বাচ্চা, যখন তাকে মায়ের দুধ পান করানো থেকে আলাদা করা হয়। আর 'ক্বালূস' হলো যুবতী উটনী, তবে এটি পুরুষের জন্য ব্যবহৃত হয় না।
3918 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: أيها الناس! إنّ الله طيِّبٌ لا يقبلُ إلا طيبًا وإنَّ الله أمير المؤمنين بما أمر به المرسلين فقال: {يَاأَيُّهَا الرُّسُلُ كُلُوا مِنَ الطَّيِّبَاتِ وَاعْمَلُوا صَالِحًا إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌ} [المؤمنون: 51] وقال: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُلُوا مِنْ طَيِّبَاتِ مَا رَزَقْنَاكُمْ} [البقرة: 172]. ثم ذكر الرَّجل يُطِيلُ السَّفر أشعثَ أغبر يمدُّ يديه إلى السَّماء: يا ربِّ! يا ربِّ! ومطعمه حرامٌ ومشربه حرام وملبسُه حرامٌ وغذيَ بالحرام فأني يستجاب لذلك".
صحيح: رواه مسلم في الزّكاة (1015) عن أبي بكر محمد بن العلاء، ثنا أبو أسامة، ثنا فضيل ابن مرزوق، حدثني عدي بن ثابت، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: হে মানবমণ্ডলী! নিশ্চয় আল্লাহ তা‘আলা পবিত্র। তিনি পবিত্র বস্তু ছাড়া অন্য কিছু গ্রহণ করেন না। আর আল্লাহ তা‘আলা মু’মিনদেরকে সেই নির্দেশই দিয়েছেন, যা তিনি রাসূলদেরকে দিয়েছেন। তিনি বলেছেন: ‘হে রাসূলগণ! তোমরা পবিত্র বস্তু থেকে আহার কর এবং সৎকর্ম কর। নিশ্চয় তোমরা যা কর, সে সম্পর্কে আমি সম্যক অবগত।’ (সূরা মু’মিনূন: ৫১) এবং তিনি আরও বলেছেন: ‘হে ঈমানদারগণ! আমরা তোমাদেরকে যে রুযী দান করেছি, তা থেকে পবিত্র বস্তুসমূহ আহার কর।’ (সূরা বাকারা: ১৭২)। এরপর তিনি এমন এক ব্যক্তির কথা উল্লেখ করলেন যে দীর্ঘ পথ সফর করেছে, যার চুলগুলো এলোমেলো ও ধূলিধূসরিত। সে তার দুই হাত আকাশের দিকে তুলে ‘ইয়া রব! ইয়া রব!’ বলে ডাকছে। অথচ তার খাদ্য হারাম, তার পানীয় হারাম, তার পরিধেয় বস্তু হারাম এবং সে হারাম দ্বারা প্রতিপালিত হয়েছে। কীভাবে তার দু‘আ কবুল হতে পারে?
3919 - عن عائشة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الله ليربِّي لأحدكُم التَّمرة واللُّقمة كما يربِّي أحدكم فلُوَّهُ أو فصيله حتَّى يكون مثل أُحُدٍ".
صحيح: رواه أحمد (26135) وصحَّحه ابنُ حبان (3317) كلاهما من طريق عبد الصمد،
قال: حدّثنا حماد (هو ابن سلمة) عن ثابت، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، فذكرته.
وعزاه الهيثمي في"المجمع" (3/ 111) إلى الطبرانيّ في الأوسط.
وفاته عزوه إلى الإمام أحمد، وقال:"ولعائشة حديث يأتي بعد هذا".
قلت: وهو الآتي.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের কারও জন্য একটি খেজুর বা একটি লোকমা (সাদকা) প্রতিপালন করেন, যেমন তোমাদের কেউ তার ঘোড়ার বাচ্চাকে বা উটের বাচ্চাকে প্রতিপালন করে; শেষ পর্যন্ত তা উহুদ পাহাড়ের মতো হয়ে যায়।"
3920 - عن عائشة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الرّجل ليتصدّق بالصّدقة من الكسب الطّيب، ولا يقبل الله إلّا الطّيب، فيتلقاه الرّحمن تبارك وتعالى بيده فيربيها كما يُربّي أحدكم فلوّه، ووصيفه، أو قال: فصيله".
حسن: رواه البزّار -كشف الأستار (931) -، والطبراني في الأوسط (مجمع البحرين 1412) كلاهما من حديث إسماعيل، حدّثني أبي، عن يحيى بن سعيد، عن عمرة، عن عائشة، فذكرته.
قال البزّار:"لا نعلم رواه هكذا إلّا أبو أويس".
أورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 112) وقال:"رواه البزّار، ورجاله ثقات".
وقال أيضًا (3/ 111):"رواه الطبرانيّ في الأوسط، ورجاله رجال الصّحيح". ظنا منه أنهما حديثان، والصّواب أنه حديث واحد، وإن اختلف بعض لفظه.
وإسناده حسن من أجل الكلام في إسماعيل وهو ابن أبي أويس -واسمه عبد الله- فمختلف فيه غير أنه حصن الحديث، وهو من رجال الشيخين.
وأبوه أبو أويس الأصبحيّ هو عبد الله بن عبد الله بن أويس الأصحي أيضًا مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وقد روى له مسلم.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই কোনো ব্যক্তি উত্তম (হালাল) উপার্জন থেকে সাদকা করলে আল্লাহ তাআলা উত্তম (পবিত্র) জিনিস ছাড়া গ্রহণ করেন না। তখন পরম করুণাময় আল্লাহ—তিনি বরকতময় ও সুউচ্চ—তা নিজ হাতে গ্রহণ করেন এবং তা এমনভাবে প্রতিপালন করেন, যেমন তোমাদের কেউ তার ঘোড়ার বাচ্চা, বাছুর অথবা (রাবী) বলেছেন: উটের বাছুরকে লালন-পালন করে।"