আল-জামি` আল-কামিল
4048 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"دِينَارٌ أَنْفَقْتَهُ فِي سَبِيلِ اللهِ، وَدِينَارٌ
أَنْفَقْتَهُ فِي رَقَبَةٍ، وَدِينَارٌ تَصَدَّقْتَ بِهِ عَلَى مِسْكِينٍ، وَدِينَارٌ أَنْفَقْتَهُ عَلَى أَهْلِكَ، أَعْظَمُهَا أَجْرًا الَّذِي أَنْفَقْتَهُ عَلَى أَهْلِكَ".
صحيح: رواه مسلم في الزّكاة (995) من طريق وكيع، عن سفيان، عن مزاحم بن زفر، عن مجاهد، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক দীনার যা তুমি আল্লাহর রাস্তায় খরচ করো, আর এক দীনার যা তুমি কোনো গোলাম আযাদ করতে খরচ করো, আর এক দীনার যা তুমি কোনো মিসকিনকে দান করো, আর এক দীনার যা তুমি তোমার পরিবারের জন্য খরচ করো—এর মধ্যে সবচেয়ে বড় সাওয়াব হলো ঐ দীনারের, যা তুমি তোমার পরিবারের জন্য খরচ করো।"
4049 - عن أبي أمامة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يَا ابْنَ آدَمَ إِنَّكَ أَنْ تَبْذُلَ الْفَضْلَ خَيْرٌ لَكَ، وَأَنْ تُمْسِكَهُ شَرٌّ لَكَ، وَلَا تُلَامُ عَلَى كَفَافٍ، وَابْدَأْ بِمَنْ تَعُولُ، وَالْيَدُ الْعُلْيَا خَيْرٌ مِنَ الْيَدِ السُّفْلَى".
صحيح: رواه مسلم في الزّكاة (1036) من طريق عمر بن يونس، ثنا عكرمة بن عمّار، ثنا شدّاد، قال: سمعت أبا أمامة، فذكر الحديث.
আবু উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: হে আদম সন্তান! তোমার জন্য উত্তম হলো তুমি তোমার অতিরিক্ত সম্পদ (আল্লাহর পথে) ব্যয় করো এবং তা আটকে রাখা তোমার জন্য মন্দ। আর জীবনধারণের জন্য যতটুকু যথেষ্ট (শুধু নিজের প্রয়োজন), তার কম থাকার জন্য তোমাকে দোষারোপ করা হবে না। তুমি তাদের থেকে শুরু করো যাদের ভরণপোষণের দায়িত্ব তোমার উপর। আর উপরের হাত নিচের হাতের চেয়ে উত্তম।
4050 - عن ثوبان، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أَفْضَلُ دِينَارٍ يُنْفِقُهُ الرَّجُلُ، دِينَارٌ يُنْفِقُهُ عَلَى عِيَالِهِ، وَدِينَارٌ يُنْفِقُهُ الرَّجُلُ عَلَى دَابَّتِهِ فِي سَبِيلِ اللهِ، وَدِينَارٌ يُنْفِقُهُ عَلَى أَصْحَابِهِ فِي سَبِيلِ اللهِ".
صحيح: رواه مسلم في الزّكاة (994) من طريق حمّاد بن زيد، ثنا أيوب، عن أبي قلابة، عن أبي أسماء، عن ثوبان، فذكره. وقال عقب الحديث: قال أبو قلابة:"وَبَدَأَ بِالعِيَالِ". ثمّ قال أبو قلابة:"وَأَيُّ رَجُلٍ أَعْظَمُ أَجْرًا مِنْ رَجُلٍ يُنْفِقُ عَلَى عِيَالٍ صِغَارٍ يُعِفُّهُمْ أَوْ يَنْفَعُهُمُ اللهُ بِهِ وَيُغْنِيهِمْ".
সাউবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সর্বোত্তম দীনার (মুদ্রা) যা কোনো ব্যক্তি ব্যয় করে, তা হলো সেই দীনার যা সে তার পরিবার-পরিজনের জন্য ব্যয় করে; আর সেই দীনার যা সে আল্লাহর পথে তার বাহনের জন্য ব্যয় করে; এবং সেই দীনার যা সে আল্লাহর পথে তার সাথীদের জন্য ব্যয় করে।"
(হাদীসের বর্ণনাকারী) আবূ কিলাবাহ বলেছেন: "(রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পরিবারকে দিয়ে শুরু করেছেন।" অতঃপর আবূ কিলাবাহ বললেন: "আর কোন্ ব্যক্তির সাওয়াব সেই ব্যক্তির চেয়ে বেশি হতে পারে, যে ছোট ছোট পরিবার-পরিজনের জন্য খরচ করে, যার মাধ্যমে সে তাদের পবিত্র রাখে (মানুষের কাছে হাত পাতা থেকে রক্ষা করে), অথবা আল্লাহ এর দ্বারা তাদের উপকৃত করেন এবং তাদেরকে অভাবমুক্ত করেন?"
4051 - عن خيثمة قَالَ: كُنَّا جُلُوسًا مَعَ عَبْدِ اللهِ بْنِ عَمْرٍو إِذْ جَاءَهُ قَهْرَمَانٌ لَهُ، فَدَخَلَ فَقَالَ: أَعْطَيْتَ الرَّقِيقَ قُوتَهُمْ؟ قَالَ: لَا، قَالَ: فَانْطَلِقْ فَأَعْطِهِمْ. قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"كَفَى بِالْمَرْءِ إِثْمًا أَنْ يَحْبِسَ، عَمَّنْ يَمْلِكُ قُوتَهُ".
صحيح: رواه مسلم في الزّكاة (996) عن سعيد بن محمد الجرميّ، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن عبد الملك بن أبجر الكنانيّ، عن أبيه، عن طلحة بن مصرف، عن خيثمة، فذكره.
قوله:"قهرمان" القهرمان: هو أمين الملك ووكيله الخاص بتدبير دخله وخرجه، وهي كلمة فارسية معربة. انظر: المعجم الوسيط (2/ 764).
وذكر الحاكم (4/ 500) قصة القهرمان في سياق آخر، فقال:"قدم عليه قهرمان من الشّام، وقد بقيت ليلتان من رمضان، فقال له عبد الله: هل تركت عند أهلي ما يكفيهم؟ قال: قد تركتُ عندهم نفقة. فقال عبد الله: عزمتُ عليك لما رجعت، فتركت لهم ما يكفيهم، فإني سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"كفى بالمرأ إثما أن يضيِّع من يعول".
رواه من طريق عبد الرزّاق -وهو في مصنفه (20810) - عن معمر، عن أبي إسحاق، عن وهب بن جابر الخيوانيّ، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.
تنبيه: وقع تحريف في إسناد الحاكم فصحَّحه.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين".
وهذا وهم منه فإنَّ وهب بن جابر الخيوانيّ -بفتح الخاء- وسكون الياء ليس من رجال أحدهما، ثمّ هو مختلف فيه، فوثقه ابن معين والعجليّ وابن حبَّان، وروى عنه كما سيأتي.
وقال ابن المديني والنسائي:"مجهول". وقال الذّهبيّ:"لا يكاد يعرف، تفرّد عنه أبو إسحاق". وفي التقريب:"مقبول، إِلَّا أنه لم يتابع فهو لين الحديث عند الحافظ.
ثمّ سياق القصة يختلف، فالذي في صحيح مسلم أنه سأله عن قوت رقيقه، وهنا سأله عن قوت أهله، وفي مسند الإمام أحمد (6842) سأله عن قوت أهله هو، ولفظه: إنَّ مولى لعبد الله بن عمرو قال له: إنِّي أريد أن أقيم هذا الشّهر هاهنا ببيت المقدس؟ فقال له: تركت لأهلك ما يقوتهم هذا الشهر؟ قال: لا، قال: فارجع إلى أهلك فاترك لهم ما يقوتهم، فإنِّي سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"كفى بالمرأة إثما أن يُضيّع من يقوت".
رواه عن محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، عن أبي إسحاق، سمعت وهب بن جابر يقول (فذكره).
ثمّ رواه أبو داود (1692)، وأحمد (6495)، والبيهقيّ (9/ 20)، وصحّحه ابن حبَّان (4240)، والحاكم (1/ 415) كلّهم من حديث الثوريّ، ثنا أبو إسحاق، عن وهب بن جابر الخيوانيّ، عن عبد الله بن عمرو، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كفى بالمرأ إثما أن يُضيّع من يقوت". قال الحاكم:"وهب من كبار تابعي الكوفة".
وهذه الأسانيد كلّها تدور على أبي إسحاق عن وهب بن جابر، وأبو إسحاق هو السَّبيعيّ وهو مختلط ومدلِّس، إِلَّا أن سفيان الثوريّ روى عنه قبل الاختلاط، كما أنه صرَّح بالتحديث في إحدى الروايات.
وأمّا وهب بن جابر، فهو"مقبول" حيث يتابع، ولم أجد من تابعه على هذا السِّياق، فإذا ثبت فالظاهر من اختلاف لفظ الحديث أنه روي بالمعنى، فإنَّ لفظ"أن يحبس عمن يملك قوته" يختلف عن لفظ"أن يضيع من يعول أو يقوت".
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عمر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال:"كفى بالمرأ إثمًا أن يضيّع من يقوت".
رواه الطبرانيّ في الكبير (12/ 382) من طريق إسماعيل بن عَيَّاش، عن موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وإسماعيل بن عَيَّاش يخطئ في روايته عن غير الشّاميين، وهذا عن المدنيين، فلعلّه وهم فجعله من مسند عبد الله بن عمر.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن الحسن البصريّ مرفوعًا:"إنَّ الله سائل كلّ راع عمّا استرعاه:
أحفظ أم ضيَّع، حتّى يسأل الرّجلَ عن أهل بيته".
رواه ابن حبَّان في صحيحه (4493) وهو مرسل.
وبقية أحاديث الرعاية، والإمام مسؤول عن رعيته ستأتي في مواضعها.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, খায়ছামা বলেন: আমরা আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে বসেছিলাম। এমন সময় তাঁর একজন কাহরামান (ম্যানেজার) তাঁর কাছে আসলো। সে ভেতরে প্রবেশ করলে তিনি তাকে বললেন, "তুমি কি দাসদের তাদের খাদ্য (খোরাক) দিয়েছ?" সে বলল, "না।" তিনি বললেন, "তাহলে যাও, এবং তাদের তা দিয়ে দাও।" তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে আমর) বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "কোনো ব্যক্তির জন্য এতটুকুই গুনাহের জন্য যথেষ্ট যে, সে তার অধীনস্থদের থেকে তাদের খাদ্য (বা ভরণপোষণ) আটকে রাখে।"
4052 - عن جابر، قال: أَعْتَقَ رَجُلٌ مِنْ بَنِي عُذْرَةَ عَبْدًا لَهُ عَنْ دُبُرٍ، فَبَلَغَ ذَلِكَ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ:"أَلَكَ مَالٌ غَيْرُهُ؟". فَقَالَ: لَا، فَقَالَ:"مَنْ يَشْتَرِيهِ مِنِّي؟". فَاشْتَرَاهُ نُعَيْمُ بْنُ عَبْدِ اللهِ الْعَدَوِيُّ بِثَمَانِ مِائَةِ دِرْهَمٍ، فَجَاءَ بِهَا رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم، فَدَفَعَهَا إِلَيْهِ، ثُمَّ قَالَ:"ابْدَأْ بِنَفْسِكَ فَتَصَدَّقْ عَلَيْهَا، فَإِنْ فَضَلَ شَيْءٌ فَلِأَهْلِكَ، فَإِنْ فَضَلَ عَنْ أَهْلِكَ شَيْءٌ، فَلِذِي قَرَابَتِكَ، فَإِنْ فَضَلَ عَنْ ذِي قَرَابَتِكَ شَيْءٌ فَهَكَذَا وَهَكَذَا - يَقُولُ: فَبَيْنَ يَدَيْكَ وَعَنْ يَمِينِكَ وَعَنْ شِمَالِكَ".
متفق عليه: رواه مسلم (997) من طريق اللّيث، عن أبي الزُّبير، عن جابر بن عبد الله فذكره.
وفي رواية عن أيوب، عن أبي الزُّبير:"أَعْتَقَ غُلامًا له عن دُبُرٍ، يقال له: يعقوب". واللّيث ممّن روى عن أبي الزُّبير ما سمعه من جابر.
وتابعه أيوب عن أبي الزُّبير، عن جابر، أنَّ رجلًا من الأنصار -يقال له أبو مذكور- أعتق غلامًا له عن دُبر -يقال له: يعقوب-، وساق الحديث بمعنى حديث اللّيث. رواه مسلم من طريق إسماعيل ابن عليّة، عن أيوب.
ومن هذا الطريق رواه ابن خزيمة (2445، 2452) وساق لفظه وجاء فيه:"إذا كان أحدكم فقيرًا فليبدأ بنفسه، فإن كان فضلًا فعلى عياله، فإن كان فضلًا فعلي قرابته أو ذي رحمه، فإن كان فضلًا فهنا وههنا".
ورواه البخاريّ في الأحكام (7186)، وفي مواضع أخرى من أوجه أخرى عن جابر، نحوه مختصرًا.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বনু উযরা গোত্রের এক ব্যক্তি তার এক গোলামকে ‘আন দুবুর’ (মালিকের মৃত্যুর পর মুক্ত হওয়ার শর্তে) আযাদ করল। এ খবর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট পৌঁছলে তিনি বললেন: "তোমার কি এ ছাড়া অন্য কোনো সম্পদ আছে?" লোকটি বলল: "না।" তখন তিনি বললেন: "আমার কাছ থেকে কে তাকে কিনবে?" তখন নু'আইম ইবনু আবদুল্লাহ আল-‘আদাবী তাকে আটশত দিরহামের বিনিময়ে কিনে নিলেন। এরপর তিনি তা (অর্থ) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট নিয়ে আসলেন এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা লোকটিকে দিয়ে দিলেন। এরপর বললেন: "তুমি নিজের থেকে শুরু করো, সুতরাং নিজের জন্য খরচ করো। যদি কিছু অবশিষ্ট থাকে, তবে তোমার পরিবারের জন্য। যদি তোমার পরিবারের প্রয়োজন পূরণের পরও কিছু অবশিষ্ট থাকে, তবে তোমার নিকটাত্মীয়দের জন্য। যদি তোমার নিকটাত্মীয়দের প্রয়োজন পূরণের পরও কিছু অবশিষ্ট থাকে, তবে এমনভাবে ও এমনভাবে – অর্থাৎ তোমার সামনে, তোমার ডানে ও তোমার বামে (অন্যান্য অভাবী মানুষদের দান করো)।"
4053 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تَصَدَّقُوا". فَقَالَ رَجُلٌ: يَا رَسُولَ اللَّهِ! عِنْدِي دِينَارٌ؟ قَالَ:"تَصَدَّقْ بِهِ عَلَى نَفْسِكَ". قَالَ: عِنْدِي آخَرُ، قَالَ:"تَصَدَّقْ بِهِ عَلَى زَوْجَتِكَ". قَالَ: عِنْدِي آخَرُ؟ قَالَ:"تَصَدَّقْ بِهِ عَلَى وَلَدِكَ". قَالَ: عِنْدِي آخَرُ؟ قَالَ:"تَصَدَّقْ بِهِ عَلَى خَادِمِكَ" قَالَ: عِنْدِي آخَرُ؟ قَالَ:"أَنْتَ أَبْصَرُ".
حسن: رواه أبو داود (1691)، والنسائيّ (2535) كلاهما من حديث ابن عجلان، عن سعيد
المقبريّ، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل ابن عجلان وهو محمد بن عجلان المدنيّ مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (7419) وصحّحه ابن حبَّان (3337)، والحاكم (1/ 415) وقال: صحيح على شرط مسلم. وسعيد المقبريّ هو سعيد بن أبي سعيد المقبريّ.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা সাদাকা (দান) করো।" তখন এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আমার কাছে একটি দিনার আছে? তিনি বললেন: "তা তোমার নিজের জন্য সাদাকা করো।" সে বলল: আমার কাছে আরও একটি আছে। তিনি বললেন: "তা তোমার স্ত্রীর জন্য সাদাকা করো।" সে বলল: আমার কাছে আরও একটি আছে? তিনি বললেন: "তা তোমার সন্তানের জন্য সাদাকা করো।" সে বলল: আমার কাছে আরও একটি আছে? তিনি বললেন: "তা তোমার খাদেমের জন্য সাদাকা করো।" সে বলল: আমার কাছে আরও একটি আছে? তিনি বললেন: "তুমিই সবচেয়ে ভালো জানো (কোথায় দেবে)।"
4054 - عن أنس بن مالك قال: كَانَ أَبُو طَلْحَةَ أَكْثَرَ أَنْصَارِيٍّ بِالْمَدِينَةِ مَالًا مِنْ نَخْلٍ وَكَانَ أَحَبُّ أَمْوَالِهِ إِلَيْهِ بَيْرُحَاءَ وَكَانَتْ مُسْتَقْبِلَةَ الْمَسْجِدِ وَكَانَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَدْخُلُهَا وَيَشْرَبُ مِنْ مَاءٍ فِيهَا طَيِّبٍ. قَالَ أَنَس: فَلَمَّا أُنْزِلَتْ هَذِهِ الآيَةُ: {لَنْ تَنَالُوا الْبِرَّ حَتَّى تُنْفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَ} [آل عمران: 92]. قَامَ أَبُو طَلْحَةَ إِلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ: يَا رَسُولُ اللهِ! إِنَّ اللهَ تبارك وتعالى يَقُولُ: {لَنْ تَنَالُوا الْبِرَّ حَتَّى تُنْفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَ} وَإِنَّ أَحَبَّ أَمْوَالِي إِلَيَّ بَيْرُحَاءَ وَإِنَّهَا صَدَقَةٌ لِلَّهِ أَرْجُو بِرَّهَا وَذُخْرَهَا عِنْدَ اللهِ، فَضَعْهَا يَا رَسُولَ اللهِ! حَيْثُ شِئْتَ. قَالَ: فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"بَخْ ذَلِكَ مَالٌ رَابِحٌ! ذَلِكَ مَالٌ رَابِحٌ! قَدْ سَمِعْتُ مَا قُلْتَ فِيهِ وَإِنِّي أَرَى أَنْ تَجْعَلَهَا فِي الْأَقْرَبِينَ".فَقَالَ أَبُو طَلْحَةَ: أَفْعَلُ يَا رَسُولَ اللهِ! فَقَسَمَهَا أَبُو طَلْحَةَ فِي أَقَارِبِهِ وَبَنِي عَمِّهِ".
متفق عليه: رواه مالك في الصّدقة (2) عن إسحاق بن عبد الله بن أبي طلحة، أنَّه سمع أنس بن مالك يقول (فذكره).
ورواه البخاريّ في الوكالة (2318)، ومسلم في الزّكاة (998) كلاهما عن يحيى بن يحيى، قال: قرأت على مالك، به.
ورواه مسلم من وجه آخر عن أنس أنه قال: لما نزلت هذه الآية: {لَنْ تَنَالُوا الْبِرَّ حَتَّى تُنْفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَ}. قال أبو طلحة: أُرى ربَّنا يسألنا من أموالنا، فأشهد يا رسولَ الله! أنّي قد جعلتُ أرضي بريحا لله. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اجعلها في قرابتك".
قال: فجعلها في حسّان بن ثابت، وأُبَيّ بن كعب.
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মদিনার আনসারদের মধ্যে খেজুর বাগান সংক্রান্ত সম্পদে আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন সবচেয়ে ধনী। তাঁর প্রিয়তম সম্পদ ছিল ‘বাইরুহা’ নামক বাগান। এটি ছিল মসজিদের দিকে মুখ করা। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাতে প্রবেশ করতেন এবং সেখানকার সুস্বাদু পানি পান করতেন।
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: "তোমরা কখনো পুণ্য লাভ করবে না, যে পর্যন্ত না তোমরা তোমাদের প্রিয় বস্তু হতে ব্যয় করবে" [সূরা আলে ইমরান: ৯২]। তখন আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট দাঁড়িয়ে বললেন, "হে আল্লাহর রাসূল! নিশ্চয়ই আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলা বলেছেন: 'তোমরা কখনো পুণ্য লাভ করবে না, যে পর্যন্ত না তোমরা তোমাদের প্রিয় বস্তু হতে ব্যয় করবে।' আর আমার প্রিয়তম সম্পদ হচ্ছে বাইরুহা বাগান। আমি এটিকে আল্লাহর জন্য সাদাকা (দান) করে দিলাম। আমি আল্লাহর কাছে এর নেকি ও সঞ্চয় আশা করি। হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যেখানে ইচ্ছা তা রাখুন (বা ব্যবহার করুন)।"
তিনি (আনাস) বলেন, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "বাহ! এই সম্পদ লাভজনক! এই সম্পদ লাভজনক! তুমি যা বললে, আমি তা শুনেছি। আমার পরামর্শ হলো, তুমি এটি তোমার নিকটাত্মীয়দের মধ্যে বন্টন করে দাও।" আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, "আমি তাই করব, হে আল্লাহর রাসূল!" অতঃপর আবু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই বাগান তাঁর নিকটাত্মীয় ও চাচাতো ভাইদের মধ্যে বন্টন করে দিলেন।
4055 - عن عَنْ مَيْمُونَةَ زَوْجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَعْتَقَتْ وَلِيدَةً لَهَا، فَقَالَ لَهَا رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"وَلَوْ وَصَلْتِ بَعْضَ أَخْوَالَكِ كَانَ أَعْظَمَ لِأَجْرِكِ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الهبة (2594)، ومسلم في الزّكاة (999) كلاهما من حديث عمرو بن الحارث، عن بكير بن عبد الله بن الأشجّ، عن كريب، عن ميمونة، فذكرته.
ورواه البخاريّ أيضًا (2592) من طريق يزيد بن أبي حبيب، عن بكير، نحوه.
وأمّا ما رواه أبو داود (1690) من طريق محمد بن إسحاق، عن بكير بن عبد الله بن الأشجّ، عن سليمان بن يسار، عن ميمونة، نحوه.
وصحّحه الحاكم (1/ 414) ففيه عنعنة ابن إسحاق وهو مدلِّس كما أنه خالف يزيد بن أبي حبيب وعمرو بن الحارث فقال: سليمان بن يسار.
والصحيح: عن كريب، عن ميمونة، كما قال الدَّارقطنيّ وغيره.
মাইমূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি ছিলেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সহধর্মিণী, থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর এক দাসীকে মুক্ত করে দিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "যদি তুমি তাকে তোমার কিছু মামা-খালা বা মাতৃকুলের আত্মীয়দের জন্য ব্যয় করতে, তাহলে তা তোমার জন্য আরো বেশি প্রতিফল (সওয়াব) হতো।"
4056 - عن الْمِقْدَامِ بْنِ مَعْدِيكَرِبَ قَالَ: قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"مَا أَطْعَمْتَ نَفْسَكَ فَهُوَ لَكَ صَدَقَةٌ، وَمَا أَطْعَمْتَ وَلَدَكَ، فَهُوَ لَكَ صَدَقَةٌ، وَمَا أَطْعَمْتَ زَوْجَتَكَ فَهُوَ لَكَ صَدَقَةٌ، وَمَا أَطْعَمْتَ خَادِمَكَ، فَهُوَ لَكَ صَدَقَةٌ".
صحيح: رواه الإمام أحمد (17179)، والطَّبرانيّ في الكبير (20/ (634)، والنسائي في السنن الكبري (9185)، والبخاريّ في الأدب المفرد (82) كلّهم من حديث بقية بن الوليد بن مسلم، عن بحير، عن خالد بن معدان، عن المقدام بن معديكرب الزبيديّ، فذكره.
وبقية مدلِّس وقد عنعن، وقال ابن عبد الهادي:"ورواية بقية عن بحير صحيحة سواء صرَّح بالتحديث أم لا. تعليقة على علل ابن أبي حاتم (ص 80) وهو قد توبع أيضًا، فقد رواه ابن ماجه (2138)، وأحمد (17191) وغيرهما من وجه آخر عن إسماعيل بن عَيَّاش، عن بحير بن سعد بإسناده نحوه.
وإسماعيل بن عَيَّاش الحمصيّ صدوق في روايته عن أهل بلده، وهذا منها فإنّ بحير بن سعد حمصيّ أيضًا، وبقية رجاله ثقات.
فإسناده صحيح برواية بقية وإسماعيل عن بحير بن سعد، وشيخه خالد بن معدان أيضًا حمصيّ وهو من رجال الجماعة. وأورده الهيثميّ في"المجمع" (4/ 119) وقال:"رواه أحمد ورجاله ثقات".
মিকদাম ইবনে মা'দিকারিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যা তুমি তোমার নিজকে খাদ্য হিসেবে দাও, তা তোমার জন্য সাদাকা। আর যা তুমি তোমার সন্তানকে খাদ্য হিসেবে দাও, তা তোমার জন্য সাদাকা। আর যা তুমি তোমার স্ত্রীকে খাদ্য হিসেবে দাও, তা তোমার জন্য সাদাকা। আর যা তুমি তোমার খাদেমকে (সেবককে) খাদ্য হিসেবে দাও, তাও তোমার জন্য সাদাকা।"
4057 - عن أبي أمامة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ما أنفق الرّجلُ في بيته وأهله وولده وخدمه فهو له صدقة".
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (8/ 112) عن أحمد بن المعلي الدمشقيّ، ثنا هشام بن عمار، ثنا إسماعيل بن عَيَّاش، عن بحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن أبي أمامة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في إسماعيل بن عَيَّاش إِلَّا أنه حسن الحديث إذا روى عن أهل بلده، وبحير بن سعد من أهل بلده من حمص.
وللحديث إسناد آخر (8/ 285) ولكن فيه بشير بن نمر متروك، وإليه يشير الهيثميّ في
"المجمع" (3/ 120) بقوله:"رواه الطبرانيّ في الأوسط والكبير بإسنادين أحدهما حسن".
আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: একজন লোক তার ঘর, পরিবার, সন্তান-সন্ততি এবং তার সেবকদের জন্য যা কিছু খরচ করে, তা তার জন্য সদাকাহ (দান) হিসেবে গণ্য হয়।
4058 - عن أمِّ كلثوم بنت عقبة، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفضل الصّدقة على ذي الرَّحم الكاشح".
صحيح: رواه الحاكم (1/ 406) وعنه البيهقيّ (7/ 27) من طريق عبد الرزّاق، أبنا معمر، عن الزّهريّ، عن حميد بن عبد الرحمن، عن أمه كلثوم بنت عقبة، فذكرته. قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.
ورواه الطبرانيّ في الكبير (25/ 80)، والحميدي في"مسنده" (328) وصحّحه ابن خزيمة (2386) كلّهم من طريق سفيان بن عيينة، عن الزهري بإسناده، مثله. إِلَّا أن الحميدي قال: حَدَّثَنَا سفيان قال: أخبروني عن الزهري. قال سفيان: ولم أسمعه من الزهري.
فلعله لم يسمعه في أوّل الأمر ثمّ تيسّر له السماع منه، أو أنَّ الذين سمع منهم كانوا عنده معروفين؛ فلذا يروي أحيانًا بالواسطة وأخرى بدونها.
أورده المنذريّ في الترغيب والترهيب (1343) وقال: رواه الطبرانيّ في الكبير ورجاله رجال الصَّحيح، وصحّحه ابن خزيمة والحاكم".
وأورده أيضًا الهيثميّ في"المجمع" وقال:"رجاله رجال الصَّحيح".
وفي معناه ما رُوي عن حكيم بن حزام أنَّ رجلًا سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن الصّدقات أيّها أفضل؟ فقال:"على ذي الرّحم الكاشح".
رواه عبد الله بن أحمد في مسند أبيه (1523) قال: وجدت في كتاب أبي بخطّ يده: حَدَّثَنَا سعيد -يعني ابن سليمان-، حَدَّثَنَا عبّاد - يعني ابن العوّام، عن سفيان بن حسين، عن الزّهريّ، عن أيوب بن بشير الأنصاريّ، عن حكيم بن حزام، فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل سفيان بن حسين وهو الواسطيّ ثقة باتفاق أهل العلم إِلَّا في الزهري فإنه ضعيف فيه، كذا قال ابن معين وأحمد والنسائي وغيرهم. وذكره ابن حبَّان في الثّقات (6/ 404) وقال:"أما روايته عن الزهري فإن فيها تخاليط يجب أن يجانب، وهو ثقة في غيره".
وقال في"المجروحين":"يروي عن الزهري المقلوبات، وذلك أن صحيفة الزّهري اختلطت عليه".
قلت: ولا تنفع متابعة حجَّاج بن أرطأة له عن الزهري فإن الحجّاج ضعيف، وهو غير معروف من أصحاب الزهريّ.
ومن طريقه رواه الطبرانيّ في الكبير (3126) فلا تغتر بقول الهيثميّ في"المجمع" (3/ 116):"رواه أحمد والطَّبرانيّ وإسناده حسن".
وقوله: رواه أحمد، لعلّه يشير إلى ما رواه الإمام أحمد (23530) عن أبي معاوية، حَدَّثَنَا الحجاج، عن الزّهريّ، عن حكيم بن بشير، عن أبي أيوب الأنصاريّ، فذكر الحديث، مثله.
وهذا كلّه من تخاليط الحجاج بن أرطاة.
قال الدَّارقطنيّ في"العلل" (15/ 360 - 361):"رواه حجَّاج بن أرطاة عن الزهري. قال مرة: عن حكيم بن بشير، عن أبي أيوب الأنصاريّ. ومرة: عن أيوب بن بشير، عن حكيم بن حزام، وكلاهما غير محفوظ".
وأمّا قوله في موضع آخر في"العلل" (6/ 119):"لم يرو عن الزهريّ غير حجَّاج ولا يثبت".
فقد رأيت رواه أيضًا سفيانُ بنُ حسين عنه، ولم يشر الدَّارقطنيّ إلى هذه الرواية.
وقوله:"الكاشح" يعني القاطع المبغض، وقيل: هو العدو الذي يضمر عداوته.
উম্মু কুলসুম বিনতে উকবাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: সর্বোত্তম সাদাকাহ হলো সেই আত্মীয়ের প্রতি করা, যে (তোমার প্রতি) বিদ্বেষ পোষণ করে।
4059 - عن سلمان بن عامر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"إنّ الصّدقة على المسكين صدقة، وعلى ذي الرّحم اثتان: صدقة، وصلة".
حسن: رواه الترمذيّ (658)، والنسائيّ (2582)، وابن ماجة (1844) كلّهم من حديث حفصة بنت سيرين، عن الرّباب، عن عمّها سلمان بن عامر، فذكره. واللّفظ للنسائيّ.
وأمّا الترمذيّ فزاد فيه:"إذا أفطر أحدكم فليفطر على تمر فإنه بركة، فإن لم يجد تمرًا، فالماء فإنه طهور".
وهذه الفقرة أخرجها أيضًا أبو داود (2355)، وابن ماجة (1699) كلاهما من هذا الطريق.
وحسّنه الترمذيّ وصحّحه ابن خزيمة (2385)، وابن حبَّان (3344)، والحاكم (1/ 407) كلّهم من هذا الطريق.
وهو كذلك فإن الرَّباب -بفتح أولها وتخفيف الموحدة- بنت صليع أم الرّائح روتْ عنها حفصة بنت سيرين، وذكرها ابن حبَّان في"ثقاته" (4/ 244) وأخرج حديثها في صحيحه؛ ولم يعرف فيها جرحٌ، وهي من التابعيات، ولحديثها أصل ثابت من حديث زينب زوجة عبد الله بن مسعود -سيأتي ذكره في الباب الذي يليه- أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لها:"نَعَمْ لَهَا أَجْرَانِ أَجْرُ القَرَابَةِ وَأَجْرُ الصّدَقَةِ". فيحسّنُ حديثها من أجل الأسباب المذكورة.
وفي الباب أيضًا عن أبي طلحة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الصّدقة على المسكين صدقة، وعلى ذي الرَّحم صدقة وصلة".
رواه الطبرانيّ في"الكبير" (5/ 105)، وفي الأوسط (مجمع البحرين 1423) عن عليّ بن سعيد الرَّازيّ، ثنا هارون بن موسي بن راشد المستمليّ، ومحمد بن عمار الموصليّ، قالا: ثنا عمر بن أيوب الموصليّ، عن مصاد بن عقبة، عن يحيى بن أبي إسحاق، عن أنس، عن أبي طلحة، فذكره.
فيه رجال لم يوثقه غير ابن حبَّان منهم: هارون بن موسي المستملي الكبير مكحلة، كما قال الطبرانيّ في"الكبير"، ومصاد بن عقبة فهما في مرتبة مقبولة عند الحافظ ابن حجر.
وأمّا الهيثميّ فقال في"المجمع" (3/ 16):"فيه من لم أعرفه".
قلت: ويحيى بن أبي إسحاق اثنان كلاهما يرويان عن أنس، وكلاهما في طبقة واحدة، أحدهما الهنائي وهو"مجهول". جزم المزي في"تهذيب الكمال" أنه الهنائي.
ويرى الحافظ ابن حجر أنَّ الهنائي شخص آخر واسمه يحيى بن يزيد أبو نصر، وهو من رجال مسلم.
والثاني: يحيى بن أبي إسحاق الحضرميّ مولاهم البصري وهو أيضًا ممن يرُوي عن أنس بن مالك، إِلَّا أن هذا من رجال الجماعة ثقة، وتكلم فيه يحيى بن معين فقال: في حديثه بعض الضّعف، وقال الإمام أحمد: في حديثه نكارة.
والنفس تطمئن إلى أنه يحيي بن إسحاق الهنائي؛ لأنَّ هذا الحديث لو كان من أحاديث الحضرميّ لرُوي عنه كبار أصحابه، والله تعالى أعلم.
وأمّا ما رُوي عن سراقة بن مالك، أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال له:"ألا أدلك على أفضل الصّدقة؟ ابنتُك، مردودة إليك، ليس لها كاسب غيرك" ففيه انقطاع.
رواه ابن ماجه (3667)، والبخاريّ في"الأدب المفرد" (80، 81)، والحاكم (4/ 176) كلّهم من طرق عن موسى بن عُليّ بن رباح، قال: سمعت أبي يذكر عن سراقة بن مالك، فذكر الحديث.
هكذا في رواية ابن ماجه والحاكم، وفي إحدى الروايتين للبخاريّ في الأدب المفرد: عن سراقة بن مالك.
وفي الرواية الثانية: أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال لسراقة بن مالك.
وقد صرَّح العلائيّ وغيره أن رواية عُليّ بن رباح عن سراقة مرسلة، وعليه بدل ما رواه أحمد (17586) قال: بلغني عن سراقة بن مالك، فذكره.
وهذا فيه تصريح بأنه لم يسمعه من سراقة بن مالك بينهما رجل.
সালমান ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: নিশ্চয় মিসকিনের উপর সদকা করা হলো (এক) সদকা। আর আত্মীয়-স্বজনের উপর (সদকা করলে) তাতে দুটি (সওয়াব) রয়েছে: সদকা এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখার (সিলাহ) সওয়াব।
4060 - عن أبي سعيد الخدريّ، قَالَ: خَرَجَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فِي أَضْحًى أَوْ فِطْرٍ إِلَى المُصَلَّى، ثُمَّ انْصَرَفَ فَوَعَظَ النَّاسَ وَأَمَرَهُمْ بِالصَّدَقَةِ فَقَالَ:"أَيُّهَا النَّاسُ! تَصَدَّقُوا". فَمَرَّ عَلَى النِّسَاءِ، فَقَالَ:"يَا مَعْشَرَ النِّسَاءِ! تَصَدَّقْنَ فَإِنِّي رَأَيْتُكُنَّ أَكْثَرَ أَهْلِ النَّارِ". فَقُلْنَ: وَبِمَ ذَلِكَ يَا رَسُولَ اللَّهِ؟ قَالَ:"تُكْثِرْنَ اللَّعْنَ، وَتَكْفُرْنَ العَشِيرَ، مَا رَأَيْتُ مِنْ نَاقِصَاتِ عَقْلٍ وَدِينٍ أَذْهَبَ لِلُبِّ الرَّجُلِ الحَازِمِ، مِنْ إِحْدَاكُنَّ يَا مَعْشَرَ النِّسَاءِ".
ثُمَّ انْصَرَفَ، فَلَمَّا صَارَ إِلَى مَنْزِلِهِ جَاءَتْ زَيْنَبُ امْرَأَةُ ابْنِ مَسْعُودٍ تَسْتَأْذِنُ عَلَيْهِ فَقِيلَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ! هَذِهِ زَيْنَبُ. فَقَالَ:"أَيُّ الزَّيَانِبِ؟". فَقِيلَ: امْرَأَةُ ابْنِ مَسْعُودٍ. قَالَ:"نَعَمْ، ائْذَنُوا لَهَا". فَأُذِنَ لَهَا، قَالَتْ: يَا نَبِيَّ اللَّهِ، إِنَّكَ أَمَرْتَ اليَوْمَ بِالصَّدَقَةِ، وَكَانَ
عِنْدِي حُلِيٌّ لِي فَأَرَدْتُ أَنْ أَتَصَدَّقَ بِهِ، فَزَعَمَ ابْنُ مَسْعُودٍ أَنَّهُ وَوَلَدَهُ أَحَقُّ مَنْ تَصَدَّقْتُ بِهِ عَلَيْهِمْ؟ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"صَدَقَ ابْنُ مَسْعُودٍ زَوْجُكِ وَوَلَدُكِ أَحَقُّ مَنْ تَصَدَّقْتِ بِهِ عَلَيْهِمْ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1462)، ومسلم في الإيمان (80) كلاهما من حديث محمد بن جعفر، أخبرني زيد، عن عياض بن عبد الله، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره. واللّفظ للبخاريّ.
وأمّا مسلم فلم يسق لفظه وإنما أحال على حديث ابن عمر، وليس فيه قصّة ابن مسعود وزوجته.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল আযহা অথবা ঈদুল ফিতরের দিন ঈদগাহের দিকে বের হলেন। অতঃপর তিনি ফিরে এসে লোকদেরকে উপদেশ দিলেন এবং তাদেরকে সাদাকা (দান) করার নির্দেশ দিলেন। তিনি বললেন: "হে লোক সকল! তোমরা সাদাকা করো।"
এরপর তিনি মহিলাদের নিকট দিয়ে গমন করলেন এবং বললেন: "হে নারী সমাজ! তোমরা সাদাকা করো। কারণ আমি দেখেছি, তোমরাই জাহান্নামের অধিবাসীদের মধ্যে সংখ্যাগরিষ্ঠ।" তারা বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এর কারণ কী? তিনি বললেন: "তোমরা বেশি বেশি অভিশাপ দাও এবং স্বামীর অকৃতজ্ঞতা দেখাও। হে নারী সমাজ! বুদ্ধি ও দীনের দিক থেকে ত্রুটিপূর্ণ হওয়া সত্ত্বেও বিচক্ষণ ও দৃঢ়চেতা পুরুষের বুদ্ধি হরণে তোমাদের চেয়ে অধিক পারদর্শী আর কাউকে আমি দেখিনি।"
এরপর তিনি (সেখান থেকে) চলে গেলেন। যখন তিনি তাঁর বাসস্থানে পৌঁছলেন, তখন ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী যায়নাব তাঁর কাছে প্রবেশের অনুমতি চাইলেন। বলা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! এ হলেন যায়নাব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কোন যায়নাব?" বলা হলো: ইবনু মাসঊদের স্ত্রী। তিনি বললেন: "হ্যাঁ, তাকে অনুমতি দাও।"
অতঃপর তাকে অনুমতি দেওয়া হলো। তিনি বললেন: হে আল্লাহর নবী! আপনি আজ সাদাকা করার নির্দেশ দিয়েছেন। আমার কিছু অলংকার ছিল, আমি তা সাদাকা করতে চেয়েছিলাম। কিন্তু ইবনু মাসঊদ মনে করেন যে, তার ও তার সন্তানেরা আমার সাদাকা পাওয়ার ব্যাপারে সবচেয়ে বেশি হকদার? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ইবনু মাসঊদ সত্য বলেছে। তোমার স্বামী এবং তোমার সন্তানেরাই তোমার সাদাকা পাওয়ার ব্যাপারে সবচেয়ে বেশি হকদার।"
4061 - عن عَنْ زَيْنَبَ امْرَأَةِ عَبْدِ اللَّهِ قَالَتْ: كُنْتُ فِي المَسْجِدِ فَرَأَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ:"تَصَدَّقْنَ وَلَوْ مِنْ حُلِيِّكُنَّ -وَكَانَتْ زَيْنَبُ تُنْفِقُ عَلَى عَبْدِ اللَّهِ، وَأَيْتَامٍ فِي حَجْرِهَا- قَالَ: فَقَالَتْ لِعَبْدِ اللَّهِ: سَلْ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَيَجْزِي عَنِّي أَنْ أُنْفِقَ عَلَيْكَ وَعَلَى أَيْتَامٍ فِي حَجْرِي مِنَ الصَّدَقَةِ؟ فَقَالَ: سَلِي أَنْتِ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَانْطَلَقْتُ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم، فَوَجَدْتُ امْرَأَةً مِنَ الأَنْصَارِ عَلَى البَابِ حَاجَتُهَا مِثْلُ حَاجَتِي، فَمَرَّ عَلَيْنَا بِلالٌ فَقُلْنَا: سَلِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم: أَيَجْزِي عَنِّي أَنْ أُنْفِقَ عَلَى زَوْجِي وَأَيْتَامٍ لِي فِي حَجْرِي؟ وَقُلْنَا: لا تُخْبِرْ بِنَا فَدَخَلَ فَسَأَلَهُ فَقَالَ:"مَنْ هُمَا؟" قَالَ: زَيْنَبُ، قَالَ:"أَيُّ الزَّيَانِبِ؟" قَالَ: امْرَأَةُ عَبْدِ اللَّهِ. قَالَ:"نَعَمْ، لَهَا أَجْرَانِ، أَجْرُ القَرَابَةِ وَأَجْرُ الصَّدَقَةِ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1466)، ومسلم في الزّكاة (1000/ 46) كلاهما من طريق عمر بن حفص، حَدَّثَنَا أبيّ، حَدَّثَنَا الأعمش، قال: حَدَّثَنِي شقيق، عن عمرو بن الحارث، عن زينب فذكرته.
وفي سنن ابن ماجه (1835):"وكانت زينب صناع اليدين". أي تصنع باليدين وتكسب. والأيتام هم بنو أخيها.
যয়নব (আব্দুল্লাহর স্ত্রী) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি মসজিদে ছিলাম এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখতে পেলাম। তিনি বললেন: "তোমরা সাদাকা করো, যদিও তোমাদের অলঙ্কার থেকে হয়।" (আর যয়নব তার স্বামী আব্দুল্লাহ ও তার তত্ত্বাবধানে থাকা কিছু ইয়াতীমের ওপর খরচ করতেন।) তিনি (যয়নব) বলেন: এরপর তিনি আব্দুল্লাহকে বললেন, আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করুন, আমি যে আপনার ও আমার তত্ত্বাবধানে থাকা ইয়াতীমদের ওপর সাদাকা হিসেবে খরচ করি, তা কি আমার পক্ষ থেকে যথেষ্ট হবে? তিনি (আব্দুল্লাহ) বললেন: বরং তুমি নিজেই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করো। সুতরাং আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর দিকে গেলাম। আমি দরজায় একজন আনসারী মহিলাকে পেলাম, যার প্রয়োজনও আমার প্রয়োজনের মতোই ছিল। এরপর আমাদের পাশ দিয়ে বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যাচ্ছিলেন। আমরা তাঁকে বললাম: আপনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করুন, আমি যদি আমার স্বামী ও আমার তত্ত্বাবধানে থাকা ইয়াতীমদের ওপর খরচ করি, তা কি আমার পক্ষ থেকে যথেষ্ট হবে? এবং আমরা বললাম: আমাদের নাম বলবেন না। অতঃপর বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) প্রবেশ করলেন এবং তাঁকে (নবীকে) জিজ্ঞেস করলেন। তিনি (নবী) বললেন: "তারা দুজন কারা?" বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যয়নব। তিনি বললেন: "কোন যয়নব?" বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আব্দুল্লাহর স্ত্রী। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, তার জন্য দুটি সওয়াব রয়েছে: আত্মীয়তার সওয়াব এবং সাদাকার সওয়াব।"
4062 - عن عَنْ رَائِطَةَ امْرَأَةِ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ وَأُمِّ وَلَدِهِ -وَكَانَتْ امْرَأَةً صَنَاعَ الْيَدِ- قَالَ: فَكَانَتْ تُنْفِقُ عَلَيْهِ وَعَلَى وَلَدِهِ مِنْ صَنْعَتِهَا قَالَتْ: فَقُلْتُ لِعَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ: لَقَدْ شَغَلْتَنِي أَنْتَ وَوَلَدُكَ عَنِ الصَّدَقَةِ فَمَا أَسْتَطِيعُ أَنْ أَتَصَدَّقَ مَعَكُمْ بِشَيْءٍ! فَقَالَ لَهَا عَبْدُ اللَّهِ: وَاللَّهِ! مَا أُحِبُّ إِنْ لَمْ يَكُنْ فِي ذَلِكَ أَجْرٌ أَنْ تَفْعَلِي. فَأَتَتْ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَتْ: يَا رَسُولَ اللَّهِ! إِنِّي امْرَأَةٌ ذَاتُ صَنْعَةٍ أَبِيعُ مِنْهَا وَلَيْسَ لِي وَلَا لِوَلَدِي وَلَا لِزَوْجِي نَفَقَةٌ غَيْرَهَا، وَقَدْ شَغَلُونِي عَنِ الصَّدَقَةِ فَمَا أَسْتَطِيعُ أَنْ أَتَصَدَّقَ بِشَيْءٍ فَهَلْ لِي مِنْ أَجْرٍ فِيمَا أَنْفَقْتُ؟ قَالَ: فَقَالَ لَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"أَنْفِقِي عَلَيْهِمْ فَإِنَّ لَكِ فِي ذَلِكَ أَجْرَ مَا أَنْفَقْتِ عَلَيْهِمْ".
حسن: رواه الإمام أحمد (16086) عن يعقوب، حَدَّثَنَا أبيّ، عن ابن إسحاق، قال: حَدَّثَنِي هشام بن عروة، عن أبيه، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، عن رائطة، فذكرته.
ورواه أيضًا (16085) من وجه آخر هو والطَّبرانيّ في"الكبير" (34/ 263) كلاهما من حديث سليمان بن داود الهاشميّ، ثنا عبد الرحمن بن أبي الزّناد، عن أبيه، عن عروة بن الزُّبير، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة، به مختصرًا.
وصحّحه ابن حبَّان (4247) من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، بإسناده، مثله. ومحمد بن إسحاق وإن كان مدلِّسًا فقد صرَّح بالتّحديث، كما أنه توبع. وقد أشار إليه الهيثميّ في"المجمع". (3/ 108).
ورائطة هي ابنة عبد الله بن معاوية الثقفية، قيل إنها زينب امرأة ابن مسعود نفسها، وأن رائطة لقبها. وقيل: بل هما اثنتان وهي زوجة أخرى لابن مسعود، وقيل: إنها امرأة أخرى وليست امرأة ابن مسعود، ولكن قصتها تشبه قصة زينب، وهذا الرأي الأخير مرجوح؛ لأنه جاء في الحديث أنها امرأة عبد الله.
রায়েতা থেকে বর্ণিত, যিনি ছিলেন আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী এবং তাঁর সন্তানের জননী। তিনি ছিলেন হাতে কাজ করা (কারিগর) মহিলা। বর্ণনাকারী বলেন: তিনি নিজের কাজ থেকে উপার্জিত অর্থ তার (আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ) এবং তাদের সন্তানের জন্য ব্যয় করতেন। রায়েতা বললেন: আমি আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদকে বললাম, আপনি এবং আপনার সন্তানেরা আমাকে সাদকা (দান) করা থেকে বিরত রেখেছেন। আমি আপনাদের সাথে থেকে (আপনাদের দেখাশোনা করে) কোনো কিছু দান করার সুযোগ পাই না! তখন আব্দুল্লাহ (ইবনে মাসউদ) তাকে বললেন: আল্লাহর কসম! যদি এর মধ্যে কোনো সাওয়াব না থাকে, তবে তুমি এমনটি করো, তা আমি পছন্দ করি না।
এরপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন এবং বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি একজন কারিগর মহিলা। আমি (আমার কাজ) বিক্রি করি, আর আমার, আমার সন্তানের এবং আমার স্বামীর জন্য এই উপার্জন ছাড়া আর কোনো ব্যয় নির্বাহের উৎস নেই। তারা আমাকে সাদকা করা থেকে বিরত রেখেছে, তাই আমি কোনো কিছু দান করতে পারি না। আমি যা ব্যয় করি, তাতে কি আমার জন্য কোনো সাওয়াব আছে?
বর্ণনাকারী বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে বললেন: "তুমি তাদের উপর খরচ করো। কারণ, তুমি তাদের উপর যা খরচ করো, তার বিনিময়ে তোমার জন্য সাওয়াব রয়েছে।"
4063 - عن أبي هريرة، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم انْصَرَفَ مِنَ الصُّبْحِ يَوْمًا فَأَتَى النِّسَاءَ فِي الْمَسْجِدِ فَوَقَفَ عَلَيْهِنَّ فَقَالَ:"يَا مَعْشَرَ النِّسَاءِ، مَا رَأَيْتُ مِنْ نَوَاقِصِ عُقُولٍ وَدِينٍ أَذْهَبَ بِقُلُوبِ ذَوِي الْأَلْبَابِ مِنْكُنَّ! فَإِنِّي قَدْ رَأَيْتُكُنَّ أَكْثَرَ أَهْلِ النَّارِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ، فَتَقَرَّبْنَ إِلَى اللَّهِ مَا اسْتَطَعْتُنَّ". وَكَانَ فِي النِّسَاءِ امْرَأَةُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ، فَأَتَتْ إِلَى عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ فَأَخْبَرَتْهُ بِمَا سَمِعَتْ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَأَخَذَتْ حُلِيًّا لَهَا، فَقَالَ ابْنُ مَسْعُودٍ: أَيْنَ تَذْهَبِينَ بِهَذَا الْحُلِيِّ؟ فَقَالَتْ: أَتَقَرَّبُ بِهِ إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ؛ لَعَلَّ اللَّهَ أَنْ لَا يَجْعَلَنِي مِنْ أَهْلِ النَّارِ. فَقَالَ: وَيْلَكِ هَلُمِّي تَصَدَّقِي بِهِ عَلَيَّ وَعَلَى وَلَدِي فَإِنَّا لَهُ مَوْضِعٌ، فَقَالَتْ: لَا وَاللَّهِ! حَتَّى أَذْهَبَ بِهِ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَذَهَبَتْ تَسْتَأْذِنُ عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالُوا لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم: هَذِهِ زَيْنَبُ تَسْتَأْذِنُ يَا رَسُولَ اللَّهِ. فَقَالَ:"أَيُّ الزَّيَانِبِ هِيَ؟". فَقَالُوا: امْرَأَةُ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ مَسْعُودٍ. فَقَالَ:"ائْذَنُوا لَهَا". فَدَخَلَتْ عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم، فَقَالَتْ: يَا رَسُولَ اللَّهِ، إِنِّي سَمِعْتُ مِنْكَ مَقَالَةً، فَرَجَعْتُ إِلَى ابْنِ مَسْعُودٍ فَحَدَّثْتُهُ وَأَخَذْتُ حُلِيًّا أَتَقَرَّبُ بِهِ إِلَى اللَّهِ وَإِلَيْكَ رَجَاءَ أَنْ لَا يَجْعَلَنِي اللَّهُ مِنْ أَهْلِ النَّارِ. فَقَالَ لِي ابْنُ مَسْعُودٍ: تَصَدَّقِي بِهِ عَلَيَّ وَعَلَى وَلَدِي فَإِنَّا لَهُ مَوْضِعٌ، فَقُلْتُ: حَتَّى أَسْتَأْذِنَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"تَصَدَّقِي بِهِ عَلَيْهِ، وَعَلَى بَنِيهِ فَإِنَّهُمْ لَهُ مَوْضِعٌ".
حسن: رواه الإمام أحمد (8862)، وأبو يعلى (6585) كلاهما من حديث إسماعيل أخبرني عمرو -يعني ابن أبي عمرو-، عن أبي سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل عمرو بن أبي عمرو فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. ومن طريقه رواه ابن خزيمة في صحيحه (2461).
وأصله في صحيح مسلم (80) إِلَّا أنَّ مسلمًا لم يسق لفظ الحديث، وإنما أحال على حديث ابن عمر وليس فيه ذكر لقصة زينب.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাত শেষ করে ফিরলেন, অতঃপর তিনি মসজিদের মহিলাদের কাছে এলেন এবং তাদের সামনে দাঁড়িয়ে বললেন: “হে নারী সমাজ! বুদ্ধি ও দ্বীনের স্বল্পতার কারণে তোমাদের চেয়ে অধিক আমি এমন কাউকে দেখিনি, যারা বুদ্ধিমান পুরুষদের হৃদয়কে [এত সহজে] আকৃষ্ট করতে পারে! কারণ আমি তোমাদেরকে কিয়ামতের দিন জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী হিসেবে দেখেছি। সুতরাং তোমরা যতটা সম্ভব আল্লাহর নিকটবর্তী হওয়ার চেষ্টা করো (দান-সদকা করে)।”
সেই মহিলাদের মধ্যে আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রীও ছিলেন। তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট যা শুনেছিলেন তা জানালেন এবং নিজের অলংকারাদি নিলেন। ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এই অলংকার নিয়ে তুমি কোথায় যাচ্ছো? তিনি বললেন: এর মাধ্যমে আমি আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের নৈকট্য লাভ করতে চাই, যাতে আল্লাহ আমাকে জাহান্নামের অধিবাসী না বানান। তিনি বললেন: তোমার জন্য আফসোস! এদিকে আসো! এটি আমার উপর এবং আমাদের সন্তানদের উপর সদকা করো, কারণ আমরাই এর হকদার। স্ত্রী বললেন: আল্লাহর কসম! আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে না যাওয়া পর্যন্ত (এটি দেব না)।
অতঃপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে অনুমতি নিতে গেলেন। তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! এই যে যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অনুমতি চাচ্ছেন। তিনি বললেন: “কোন্ যায়নাব?” তারা বললেন: আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী। তিনি বললেন: “তাকে অনুমতি দাও।” তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশ করে বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনার থেকে একটি কথা শুনেছি। আমি ইবনু মাসঊদের নিকট ফিরে গিয়ে তাকে জানালাম এবং অলংকারাদি নিলাম, যার দ্বারা আমি আল্লাহ ও আপনার নৈকট্য লাভ করতে চাই এই আশায় যে, আল্লাহ আমাকে জাহান্নামের অধিবাসী করবেন না। তখন ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন: এটি আমার উপর এবং আমাদের সন্তানদের উপর সদকা করো, কারণ আমরাই এর হকদার। তখন আমি বললাম: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অনুমতি না নেওয়া পর্যন্ত (এটি করব না)। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “এটি তার (ইবনু মাসঊদের) এবং তার সন্তানদের উপর সদকা করো, কারণ তারাই এর হকদার।”
4064 - عن أم سلمة، قالت: قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ! هَلْ لِي مِنْ أَجْرٍ فِي بَنِي أَبِي سَلَمَةَ أَنْ أُنْفِقَ عَلَيْهِمْ وَلَسْتُ بِتَارِكَتِهِمْ هَكَذَا وَهَكَذَا إِنَّمَا هُمْ بَنِيَّ؟ قَالَ:"نَعَمْ، لَكِ أَجْرُ مَا أَنْفَقْتِ عَلَيْهِمْ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1467)، ومسلم في الزّكاة (1001) كلاهما من طريق هشام، عن أبيه، عن زينب بنت أبي سلمة، عن أمّ سلمة، فذكرته.
উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আবূ সালামার সন্তানদের উপর খরচ করার জন্য কি আমার কোনো সওয়াব (প্রতিদান) আছে? আমি তো তাদেরকে এমন অসহায়ভাবে ছেড়ে দিতে পারি না, তারা তো আমারই সন্তান। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: হ্যাঁ, তুমি তাদের উপর যা খরচ করবে, তার জন্য তোমার প্রতিদান রয়েছে।
4065 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لَا تَصُمِ الْمَرْأَةُ وَبَعْلُهَا شَاهِدٌ إِلَّا بِإِذْنِهِ، وَلَا تَأْذَنْ فِي بَيْتِهِ وَهُوَ شَاهِدٌ إِلَّا بِإِذْنِهِ، وَمَا أَنْفَقَتْ مِنْ كَسْبِهِ مِنْ غَيْرِ أَمْرِهِ فَإِنَّ نِصْفَ أَجْرِهِ لَهُ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في النكاح (5360)، ومسلم في الزّكاة (1026) كلاهما من طريق عبد الرزّاق عن معمر، عن همام بن منبّه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
قوله:"من غير أمره" أي الصريح، وهو لا ينفي إذا عامًا لها في القدر المعروف؛ ولذا قال النوويّ:"واعلم أن هذا كله مفروض في قدر يسير بعلم رضا المالك به عرفًا، فإن زاد على ذلك لم يجز".
قلت: هذا الانفاق يكون في الغالب في الطّعام كما قال أبو هريرة نفسه:
رواه أبو داود (1688) عن محمد بن سوّار المصريّ، حَدَّثَنَا عبدة، عن عبد الملك، عن عطاء، عن أبي هريرة: في المرأة تصدق من بيت زوجها؟ قال: لا، إِلَّا من قوتها، والأجر بينهما، ولا يحل لها أن تصدَّق من مال زوجها إِلَّا بإذنه". قال أبو داود: هذا يُضعّف حديث همّام. انتهى.
أي يُضعف حمله على التعميم، فإن الذي يصح فيه الإهداء هو الطّعام فقط لأنه يتسارع إليه الفساد، هذا في الطعام الرّطب، أما في الطّعام النَّاشف فيأتي فيه حديث أمامة.
وأمّا ما رواه الحاكم (4/ 134 - 135) من طريق سويد بن عبد العزيز، ثنا محمد بن عجلان، عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنَّ الله تبارك وتعالي ليدخل بلقمة الخبز، وقبضة التمر، ومثله مما ينفع المسلمين ثلاثة الجنّة: الآمر به، والزوجة المصلحة، والخادم الذي ينال المسكين".
وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الحمد لله الذي لم ينس خدمنا" فهو ضعيف.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم".
وتعقبه الذّهبيّ فقال:"سويد متروك".
قلت: وهم الحاكم فإنَّ سويد بن عبد العزيز وهو ابن نمير السّلميّ مولاهم الدّمشقيّ ليس من رجال مسلم، وإنّما أخرج له الترمذيّ وابن ماجه ضعَّفه جمهور أهل العلم، وذكروه في الضعفاء إِلَّا أن ابن حبَّان تضارب فيه قولُه، فقال مرة:"كان كثير الخطأ، فاحش الوهم، حتّى يجيء في أخبار من المقلوبات أشياء يتخايل إلى من سمعها أنها عُملت تعمّدًا".
ثمّ قال:"والذي عندي في سويد بن عبد العزيز تنكب ما خالف الثّقات من حديثه، والاعتبار بما روي مما لم يخالف الأثبات، والاحتجاج بما وافق الثّقات، وهو ممن أستخير الله فيه؛ لأنه يقرب من الثقات". انتهى."المجروحين" (448).
قلت: والخلاصة فيه أنه ضعيف جدًّا في أقل أحواله، وقد قال الإمام أحمد: متروك، وقال ابن معين: ليس حديثه بشيء، وضعّفه النسائيّ وغيره.
ثمّ هذا الحديث لم نجد من رواه عن محمد بن عجلان غيره، عن أبي هريرة.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো নারী যেন রোযা না রাখে যখন তার স্বামী উপস্থিত থাকে, তার অনুমতি ছাড়া। আর সে যেন তার (স্বামীর) ঘরে কাউকে প্রবেশ করার অনুমতি না দেয় যখন সে (স্বামী) উপস্থিত থাকে, তার অনুমতি ছাড়া। আর সে যদি স্বামীর উপার্জন থেকে তার (সুস্পষ্ট) আদেশ ছাড়া (আল্লাহর পথে) কিছু খরচ করে, তবে এর অর্ধেকের সওয়াব স্বামীর জন্য থাকবে।"
4066 - عن عائشة، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إِذَا أَنْفَقَتِ المَرْأَةُ مِنْ طَعَامِ بَيْتِهَا غَيْرَ مُفْسِدَةٍ كَانَ لَهَا أَجْرُهَا بِمَا أَنْفَقَتْ، وَلِزَوْجِهَا أَجْرُهُ بِمَا كَسَبَ، وَلِلْخَازِنِ مِثْلُ ذَلِكَ، لَا يَنْقُصُ بَعْضُهُمْ أَجْرَ بَعْضٍ شَيْئًا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1425)، ومسلم في الزّكاة (1024) كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن شقيق، عن مسروق، عن عائشة، فذكرته.
وفي رواية:"من طعام زوجها".
وأمّا ما رُوي عن سعد قال:"لَمَّا بَايَعَ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم النِّسَاءُ قَامَتِ امْرَأَةٌ جَلِيلَةٌ كَأَنَّهَا مِنْ نِسَاءِ مُضَرَ فَقَالَتْ: يَا نَبِيَّ اللَّهِ! إِنَّا كَلٌّ عَلَى آبَائِنَا، وَأَبْنَائِنَا -قَالَ أَبُو دَاوُدَ: وَأُرَى فِيهِ: وَأَزْوَاجِنَا- فَمَا يَحِلُّ لَنَا مِنْ أَمْوَالِهِمْ؟ فَقَالَ:"الرَّطْبُ تَأْكُلْنَهُ وَتُهْدِينَهُ". فهو منقطع.
رواه أبو داود (1686) عن محمد بن سوّار المصريّ، حَدَّثَنَا عبد السّلام بن حرب، عن يونس ابن عبيد، عن زياد بن جبير بن حية، عن سعد، قال (فذكره). وصحّحه الحاكم (4/ 134) على شرط الشّيخين.
قلت: وهو كما قال، إِلَّا أن فيه انقطاعًا بين زياد بن جبير وبين سعد بن أبي وقَّاص.
قال أبو حاتم وأبو زرعة: إنَّ حديثه عن سعد بن أبي وقَّاص مرسل.
انظر: مراسيل ابن أبي حاتم (ص 61)، وجامع التحميل (177).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন কোনো স্ত্রীলোক তার ঘরের খাদ্যবস্তু থেকে অপচয় না করে (সঠিকভাবে) খরচ করে, তখন সে যা খরচ করল তার সওয়াব সে পাবে; আর তার স্বামী যা উপার্জন করল তার সওয়াব সে পাবে; আর কোষাধক্ষ্যও অনুরূপ সওয়াব পাবে। তাদের কারো সওয়াব থেকে সামান্যও কমানো হবে না।
4067 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، قال: لَمَّا فَتَحَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم مَكَّةَ قَامَ خَطِيبًا فَقَالَ فِي خُطْبَيِهِ:"لَا يَجُوزُ لامْرَأَةٍ عَطِيَّةٌ إِلَّا بِإِذْنِ زَوْجِهَا".
حسن: رواه النسائيّ (3757)، وأبو داود (3547) كلاهما من حديث خالد بن الحارث، عن حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، أنَّ أباه أخبره، عن عبد الله بن عمرو، فذكره في خطبة طويلة منها هذا الجزء.
وكذلك رواه أحمد (6681) من وجه آخر عن حسين المعلّم في سياق طويل. والمقصود من هذا الإنفاق النقدين من غير الطّعام.
وفي لفظ:"لا يجوز لامرأة أمر في مالها إذا ملك زوجها عصمتها".
رواه النّسائيّ (3756)، وأبو داود (3546).
كلاهما من حديث حمّاد بن سلمة، عن داود بن أبي هند وحبيب المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكره.
ورواه ابن ماجه (2388) من وجه آخر عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، فذكره، مثله. وصحّحه الحاكم (2/ 47).
وهذا يحمل على الاستحباب، وإلَّا فالمرأة لا تحتاج إلى الإذن في مالها وهو يحمل عند أكثر العلماء على معنى حسن العشرة واستطابة نفس الزّوج.
وإلَّا فقد نقل السّندي في حاشية النسائيّ عن الشافعي:"أن هذا الحديث ليس بثابت، وكيف نقول به والقرآن يدل على خلافه، ثمّ السنة، ثمّ الأثر، ثمّ المعقول، ويمكن أن يكون هذا في موضع الاختيار مثل ليس لها أن تصوم وزوجها حاضر إِلَّا بإذنه، فإن فعلتْ جاز صومها، وإن خرجت بغير إذنه فباعت جاز بيعها، وقد أعتقت ميمونة قبل أن يعلم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فلم يُعب ذلك عليها، فدل هذا مع غيره على أنّ هذا الحديث إن ثبت فهو محمول على الأدب والاختيار".
قلت: أما الحديث فهو حسن، وأمّا الجمع بينه وبين غيره فهو كما قال الشّافعي الأمر يحمل على الأدب والاختيار.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয় করলেন, তখন তিনি দাঁড়িয়ে খুতবা দিলেন এবং তাঁর খুতবার মধ্যে বললেন: "কোনো নারীর জন্য তার স্বামীর অনুমতি ব্যতীত কোনো কিছু দান করা বৈধ নয়।"
