হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4068)


4068 - عن أبي أمامة الباهليّ، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم فِي خُطْبَتِهِ عَامَ حَجَّةِ الوَدَاعِ يَقُولُ:"لَا تُنْفِقُ الْمَرْأَةُ شَيْئًا مِنْ بَيْتِ زَوْجِهَا إِلَّا بِإِذْنِ زَوْجِهَا" قِيلَ: يَا رَسُولَ اللهِ! وَلَا الطَّعَامَ؟ قَالَ:"ذَاكَ أَفْضَلُ أَمْوَالِنَا".

حسن: رواه أبو داود (3565)، والتِّرمذيّ (670)، وابن ماجة (2295) كلّهم من طريق إسماعيل ابن عَيَّاش، قال: حَدَّثَنِي شرحبيل بن مسلم الخولانيّ، قال: سمعت أبا أمامة الباهليّ، فذكره.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (22294) في سياق أطول.

قال الترمذيّ:"حديث حسن".

قلت: وهو كما قال، فإن إسماعيل بن عَيَّاش صدوق في روايته عن أهل بلده، وهذا منها.

وفي الباب ما رُوي عن خيرة -امْرَأَةَ كَعْبِ بْنِ مَالِكٍ- أَنَّهَا أَتَتْ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِحُلِيٍّ لَهَا فَقَالَتْ: إِنِّي تَصَدَّقْتُ بِهَذَا. فَقَالَ لَهَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"لَا يَجُوزُ لِلْمَرْأَةِ فِي مَالِهَا إِلَّا بِإِذْنِ زَوْجِهَا، فَهَلِ اسْتَأْذَنْتِ كَعْبًا؟" قَالَتْ: نَعَمْ. فَبَعَثَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِلَى كَعْبِ بْنِ مَالِكٍ زَوْجِهَا فَقَالَ:"هَلْ أَذِنْتَ لِخَيْرَةَ أَنْ تَتَصَدَّقَ بِحُلِيِّهَا؟". فَقَالَ: نَعَمْ، فَقَبِلَهُ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْهَا.

رواه ابن ماجه (2389) عن حرملة بن يحيى، قال: حَدَّثَنَا عبد الله بن وهب، قال: أخبرني اللّيث بن سعد، عن عبد الله بن يحيي -رجل من ولد كعب بن مالك-، عن أبيه، عن جدّه، أنَّ جدَّته خيرة، فذكرته.

وفيه عبد الله بن يحيى الأنصاريّ من ولد كعب بن مالك"مجهول". وأبوه يحيى الأنصاريّ قال فيه أبو حاتم:"مجهول""الجرح والتعديل" (9/ 125).

وفي الباب أيضًا عن عبادة بن الصَّامت في حديث طويل.

وفيه:"قضي أنَّ المرأة لا تعطي شيئًا من مالها شيئًا إِلَّا بإذن زوجها".

رواه عبد الله في مسند أبيه (22778) عن أبي كامل الجحدريّ، حَدَّثَنَا الفضيل بن سليمان، حَدَّثَنَا موسى بن عقبة، عن إسحاق بن يحيى بن الوليد بن عبادة بن الصَّامت، عن عبادة، فذكره بطوله، وهذا جزء منه.

وأخرجه ابن ماجه (2213) مفرقا من طريق الفضيل بن سليمان إِلَّا أنه لم يخرج هذا الجزء.

وإسناده ضعيف من أجل إسحاق بن يحيى بن الوليد فإنه أرسل عن عبادة، وهو"مجهول الحال". قال ابن عدي: أحاديثه غير محفوظة.




আবূ উমামা আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বিদায় হজ্জের বছরের তাঁর খুতবায় (ভাষণে) বলতে শুনেছি: "কোনো নারী তার স্বামীর অনুমতি ছাড়া তার স্বামীর ঘরের কোনো জিনিস (সম্পদ) খরচ করবে না।" জিজ্ঞেস করা হলো: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! খাদ্যও কি নয়?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ওটাই তো আমাদের উত্তম সম্পদ।"









আল-জামি` আল-কামিল (4069)


4069 - عن عمير مولي آبي اللحم، قال: كُنْتُ مَمْلُوكًا فَسَأَلْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَأَتَصَدَّقُ مِنْ مَالِ مَوَالِيَّ بِشَيْءٍ؟ قَالَ:"نَعَمْ وَالْأَجْرُ بَيْنَكُمَا نِصْفَانِ".

صحيح: رواه مسلم في الزّكاة (1025) من طريق حفص بن غياث، عن محمد بن زيد، عن عمير، فذكر الحديث.

ورواه من وجه آخر عن عمير، بلفظ:"أَمَرَنِي مَوْلَايَ أَنْ أُقَدِّدَ لَحْمًا فَجَاءَنِي مِسْكِينٌ فَأَطْعَمْتُهُ مِنْهُ، فَعَلِمَ بِذَلِكَ مَوْلَايَ فَضَرَبَنِي، فَأَتَيْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَذَكَرْتُ ذَلِكَ لَهُ، فَدَعَاهُ، فَقَالَ:"لِمَ ضَرَبْتَهُ؟" فَقَالَ: يُعْطِي طَعَامِي بِغَيْرِ أَنْ آمُرَهُ، فَقَالَ:"الْأَجْرُ بَيْنَكُمَا".
وقوله:"آبي اللحم" قيل له ذلك؛ لأنه في الجاهليّة حرّم على نفسه اللّحم وأبى أن يأكل ما ذُبح على الأصنام، فقيل له: آبي اللّحم.




উমায়ের, যিনি আবি ল-লাহমের আযাদকৃত গোলাম, (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি গোলাম ছিলাম। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করলাম: আমি কি আমার মনিবদের সম্পদ থেকে কিছু দান করতে পারি? তিনি বললেন: হ্যাঁ, আর তোমাদের দুজনের মধ্যে পুরস্কার (সওয়াব) অর্ধেক অর্ধেক ভাগ হয়ে যাবে।

অন্য এক বর্ণনায় (উমায়ের থেকে) বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার মনিব আমাকে গোশত শুকাতে আদেশ করলেন। তখন এক মিসকীন আমার কাছে এলো, আমি তাকে তা থেকে কিছু খাবার দিলাম। আমার মনিব সে কথা জানতে পেরে আমাকে মারধর করলেন। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁর নিকট বিষয়টি বললাম। তিনি মনিবকে ডেকে পাঠালেন এবং বললেন: তুমি তাকে কেন মারলে? সে বলল: সে আমার অনুমতি ছাড়াই আমার খাদ্য অন্যকে দিয়ে দেয়। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমাদের দুজনের মধ্যে সওয়াব ভাগ হয়ে যাবে।









আল-জামি` আল-কামিল (4070)


4070 - عن عائشة، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إِذَا أَنْفَقَتِ الْمَرْأَةُ مِنْ من طَعَامِ بَيْتِهَا غَيْرَ مُفْسِدَةٍ كَانَ لَهَا أَجْرُهَا بِمَا أَنْفَقَتْ، وَلِزَوْجِهَا أَجْرُهُ بِمَا كَسَبَ، وَلِلْخَازِنِ مِثْلُ ذَلِكَ لَا يَنْقُصُ بَعْضُهُمْ أَجْرَ بَعْضٍ شَيْئًا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1425)، ومسلم في الزّكاة (1024) كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن شقيق، عن مسروق، عن عائشة، فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন কোনো মহিলা তার ঘরের খাদ্যবস্তু থেকে অপচয় না করে খরচ করে, তখন সে যা খরচ করল, তার কারণে তার জন্য সওয়াব হবে। আর তার স্বামী যা উপার্জন করেছে, তার কারণে তার জন্যও সওয়াব হবে। এবং খাজাঞ্চির (তত্ত্বাবধায়ক) জন্যও অনুরূপ সওয়াব থাকবে। তাদের একজনও অন্যের সওয়াব সামান্যও কমাবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (4071)


4071 - عن أبي موسى، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الْخَازِنَ الْمُسْلِمَ الْأَمِينَ الَّذِي يُنْفِذُ -وَرُبَّمَا قَالَ يُعْطِي- مَا أُمِرَ بِهِ كَامِلًا مُوَفَّرًا طَيِّبًا بِهِ نَفْسُهُ فَيَدْفَعُهُ إِلَى الَّذِي أُمِرَ لَهُ بِهِ أَحَدُ الْمُتَصَدِّقَيْنِ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1438)، ومسلم في الزّكاة (1023) كلاهما من طريق أبي أسامة، عن بريد بن عبد الله، عن أبي بردة، عن أبي موسى، فذكره.




আবু মূসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “সেই বিশ্বস্ত মুসলিম কোষাধ্যক্ষ, যে ব্যক্তি পূর্ণরূপে, পর্যাপ্তভাবে এবং সন্তুষ্টচিত্তে সেই নির্দেশ কার্যকর করে—অথবা (বর্ণনাকারী) কখনও বলেছেন, যা তাকে দেওয়ার জন্য নির্দেশ দেওয়া হয়েছে তা প্রদান করে—এবং সে যাকে তা দেওয়ার আদেশ করা হয়েছে তার কাছে তা পৌঁছে দেয়, সেও দুজন দানকারীর (সওয়াবের) একজন।”









আল-জামি` আল-কামিল (4072)


4072 - عن وعن أسماء بنت أبي بكر، قالت: قَدِمَتْ عَلَيَّ أُمِّي وَهِيَ مُشْرِكَةٌ فِي عَهْدِ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَاسْتَفْتَيْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم قُلْتُ: وَهِيَ رَاغِبَةٌ أَفَأَصِلُ أُمِّي؟ قَالَ:"نَعَمْ صِلِي أُمَّكِ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الهبة (2620)، ومسلم في الزّكاة (1003) كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عن أسماء فذكرته.

وفي رواية:"قدمتْ مع أبيها".




আসমা বিনত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমার মা মুশরিক অবস্থায় আমার কাছে এলেন। তখন আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফাতওয়া (পরামর্শ) চাইলাম। আমি বললাম, তিনি (সাহায্যের) আকাঙ্ক্ষী, আমি কি আমার মায়ের সাথে সম্পর্ক বজায় রাখব? তিনি বললেন: হ্যাঁ, তুমি তোমার মায়ের সাথে সম্পর্ক বজায় রাখো।









আল-জামি` আল-কামিল (4073)


4073 - عن ابن عمر، أَنَّ عُمَرَ بْنَ الخَطَّابِ رَأَى حُلَّةً سِيَرَاءَ تُبَاعُ عِنْدَ بَابِ المَسْجِدِ، فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ! لَوِ اشْتَرَيْتَ هَذِهِ الحُلَّةَ فَلَبِسْتَهَا يَوْمَ الجُمُعَةِ وَلِلْوَفْدِ إِذَا قَدِمُوا عَلَيْكَ. فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"إِنَّمَا يَلْبَسُ هَذِهِ مَنْ لَا خَلاقَ لَهُ فِي الآخِرَةِ". ثُمَّ جَاءَتْ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مِنْهَا حُلَلٌ فَأَعْطَى عُمَرَ بْنَ الخَطَّابِ مِنْهَا حُلَّةً، فَقَالَ عُمَرُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ أَكَسَوْتَنِيهَا وَقَدْ قُلْتَ فِي حُلَّةِ عُطَارِدٍ مَا قُلْتَ؟ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"لَمْ أَكْسُكَهَا لِتَلْبَسَهَا". فَكَسَاهَا عُمَرُ أَخًا لَهُ مُشْرِكًا بِمَكَّةَ.
متفق عليه: رواه مالكٌ في اللباس (18) عن نافعٍ، عن ابن عمرَ، فذكره.

ورواه البخاريّ في الجمعة (886) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في اللباس (2068) عن يحيى بن يحيى كلاهما عن مالك.

وفي رواية للبخاريّ في الهبة (2619) من طريق عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، نحوه، وزاد:"تبيعها أو تكسوها".




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমর ইবনে খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মসজিদের দরজার কাছে রেশমী কারুকার্যখচিত একটি পোশাক বিক্রি হতে দেখলেন। তিনি বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি যদি এই পোশাকটি কিনে নিতেন, তাহলে জুমুআর দিনে এবং যখন প্রতিনিধিদল আপনার কাছে আসত, তখন আপনি তা পরিধান করতে পারতেন।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি আখিরাতে (পরকালে) কল্যাণ/পুণ্য থেকে বঞ্চিত, সেই কেবল এটা পরিধান করে।"

এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ঐ ধরনের কিছু পোশাক এলো। তিনি উমর ইবনে খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে এর মধ্য থেকে একটি পোশাক দিলেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি তো আতারিদের পোশাক সম্পর্কে ঐরূপ কথা বলেছিলেন, তারপরও আমাকে এটি দিলেন?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাকে এটি পরার জন্য দেইনি।" এরপর উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মক্কায় অবস্থানকারী তার এক মুশরিক ভাইকে পোশাকটি দিয়ে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4074)


4074 - عن * *




4074 - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (4075)


4075 - عن عبد الله بن عمر أنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ -وهُوَ عَلَى الْمِنْبَرِ، وهُوَ يذْكُرُ الصَّدَقَةَ والتَّعَفُّفَ عَن المَسْأَلَةِ-:"اليَدُ العُلْيَا خَيْرٌ مِن اليَدِ السُّفْلَى، واليَدُ العُلْيَا هِيَ المُنْفِقَةُ والسُّفْلَى هِيَ السَّائِلَةُ".

متفق عليه: رواه مالك في الصّدقة (8) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره.

ورواه البخاريّ في الزّكاة (1429)، ومسلم في الزّكاة (1033) كلاهما من طريق مالك، به.

وما رواه البيهقيّ (4/ 197) من طريق مالك، وقال فيه:"اليد العليا المتعفّفة، والسّفلى السّائلة"، ثمّ عزاه إلى الشّيخين فهو ليس كما قال.

فإنّ"اليد المنفقة" في رواية عبد الوارث، عن أيوب، عن نافع كما قال أبو داود عقب إخراج الحديث (1648) عن عبد الله بن مسلمة، عن مالك، وهذا لفظه:

قال أبو داود:"اختلف على أيوب عن نافع في هذا الحديث. قال عبد الوارث:"اليد العليا المتعفّفة". وقال أكثرهم عن حمّاد بن زيد، عن أيوب:"اليد العليا المنفقة"، وقال واحدٌ عن حمّاد:"المتعفّفة". انتهى.

قلت: كذلك رواه إبراهيم بن طهمان، عن موسى بن عقبة، عن نافع:"المتعفّفة" هكذا رواه البيهقيّ.

ولكن رواه الإمام أحمد (5344) من طريق عبد الله (هو ابن المبارك)، عن موسى بن عقبة وقال فيه:"المنفقة"، فالله أعلم بالصواب.



معنى الحديث:

قال الخطابي:"رواية المتعفّفة أشبه وأصح في المعنى، وذلك أنّ ابن عمر ذكر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال هذا الكلام وهو يذكر الصدقة، والتعفف منها، فعطف الكلام على سببه الذي خرج عليه، وعلى ما يطابقه في معناه أولى.

وقال: وقد يتوهم كثير من الناس أن معنى العليا هو أن يد المعطي مستعلية فوق يد الآخذ، ويجعلونه عن علو الشيء إلى فوق، وليس ذلك عندي بالوجه، وإنما هو من علاء المجد والكرم،
يريد به الرفع عن المسألة والتعفف عنها، وأنشدني أبو عمر قال: أنشدنا العباس، قال: أنشدنا ابن الأعرابي في معناه:

إذا كان باب الذّل من جانب الغنى … سموتُ إلى العلياء من جانب الفقر

يريد به التعزز بترك المسألة والتنزّه عنها". انتهى

وقوله:"اليد العليا هي المنفقة … الخ" ظاهره الإدراج، فكأنه من تفسير بعض الرواة، وقيل: من تفسير ابن عمر راوي الحديث نفسه، هذا الذي رجّحه أكثر أهل العلم منهم الحافظ ابن حجر، انظر: الفتح (3/ 297).




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন —যখন তিনি মিম্বরে ছিলেন এবং সাদাকাহ (দান) ও চাওয়া থেকে বিরত থাকা (তা'আফ্ফুফ) সম্পর্কে বলছিলেন—: "উপরের হাত নিচের হাত অপেক্ষা উত্তম, আর উপরের হাত হলো দানকারী (ব্যয়কারী) হাত এবং নিচের হাত হলো যাচনাকারী (ভিক্ষুক) হাত।"









আল-জামি` আল-কামিল (4076)


4076 - عن كتَبَ عبد العزيز بْنُ مَرْوَانَ إِلَى ابْنِ عُمَرَ أَن ارْفَعْ إِلَيَّ حَاجَتكَ قَالَ: فكتب إليه ابْنُ عمَرَ: أنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم كان يقول:"إنَّ اليَدَ العُلْيَا خَيْرٌ مِن اليَدِ السُّفْلَي، وابْدَأُ بِمَنْ تَعُولُ". وَلَسْتُ أَسْأَلُكَ شيئًا وَلا أرُدُّ رزقًا رَزَقَنِيهِ اللهُ مِنْكَ.

حسن: رواه الإمام أحمد (4474)، وأبو يعلى (5730) كلاهما من حديث إسحاق بن يوسف، عن سفيان، عن ابن عجلان، عن القعقاع بن حكيم، قال: كتب عبد العزيز بن مروان إلى ابن عمر، فذكره.

وأورده الهيثميّ في"المجمع" (3/ 262) وعزاه للطبراني، ولم يعزه إلى الإمام أحمد، وقال:"رجاله رجال الصحيح".

قلت: إسناده حسن من أجل ابن عجلان وهو المدني، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، واختلطت عليه أحاديث أبي هريرة، وهذا ليس منها.




ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আব্দুল আযীয ইবনু মারওয়ান তাঁকে লিখে পাঠালেন যে, "আপনার কোনো প্রয়োজন থাকলে তা আমার কাছে পেশ করুন।" ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উত্তরে তাকে লিখলেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "নিশ্চয় উপরের হাত নিচের হাতের চেয়ে উত্তম। আর (খরচ করা) শুরু করো যাদের ভরণপোষণ তুমি বহন করো তাদের দিয়ে।" আর আমি আপনার কাছে কিছুই চাইব না, তবে আল্লাহ আপনার পক্ষ থেকে আমাকে যে রিযিক দিয়েছেন, তা আমি প্রত্যাখ্যানও করব না।









আল-জামি` আল-কামিল (4077)


4077 - عن مالك بن نضلة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الأَيْدِي ثَلاثَةٌ: فيَدُ اللهِ العُلْيَا، ويَدُ المُعْطِي الَّتِي تَلِيهَا، ويَدُ السَّائِلِ السُّفْلَى، فَأَعْطِ الفَضْلَ وَلا تَعْجِزْ عَنْ نَفْسِكَ".

صحيح: رواه أبو داود (1649) عن أحمد بن حنبل -وهو في مسنده (15890) - عن عبيدة ابن حُميد التيميّ، حَدَّثَنِي أبو الزعراء، عن أبي الأحوص، عن أبيه مالك بن نضْلة، فذكره.

وأبو الأحوص هو عوف بن مالك بن نضلة.

وإسناده صحيح، وصحّحه ابن خزيمة (2440)، وابن حبان (3662)، والحاكم (1/ 408) كلّهم من طريق عبيدة بن حميد به.

وأبو الزعراء -بفتح الزاي وسكون المهملة- هو عمرو بن عمرو أو ابن عامر أو ابن مالك بن نضة الجشمي - بضم الجيم، وفتح المعجمة، من رجال السنن وهوثقة، وثَّقه ابن معين وأحمد وغيرهما.

قال ابن حبَّان:"إنَّ اليد العليا خير من اليد السُّفلى أراد به أن يد المعطي خير من يد الآخذ وإن لم يسأل".
وبمعناه رُوي عن ابن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الأيدي ثلاثة: فيد الله العليا، ويد المعطي التي تليها، ويد السائل السفلى".

رواه أحمد (4261) وأبو يعلى (5125) وابن خزيمة (2435) والحاكم (1/ 408) كلّهم من طريق إبراهيم بن مسلم الهجريّ، عن أبي الأحوص، عن ابن مسعود، فذكره، وسكت عليه الحاكم.

وإبراهيم بن مسلم الهجري ضعيف، وقد اختلف في رفعه ووقفه أيضًا.




মালিক ইবনে নদ্বলা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “হাত তিনটি: আল্লাহর হাত হলো সবার উপরে (বা সর্বোচ্চ), এবং দানকারীর হাত যা আল্লাহর হাতের কাছাকাছি (বা তার পরের স্থানে), আর যাঞ্কারী বা ভিক্ষুকের হাত হলো সবার নিচে (বা সর্বনিম্ন)। অতএব, তুমি তোমার উদ্বৃত্ত (সম্পদ) দান করো এবং নিজের ব্যাপারে অপারগতা (বা কৃপণতা) দেখাও না।”









আল-জামি` আল-কামিল (4078)


4078 - عن جابر بن عبد الله قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفضَلُ الصَّدَقَةِ عَنْ ظَهْرِ غِنًى، وَابْدَأُ بِمَنْ تَعُولُ، وَاليَدُ العُلْيَا خَيْرٌ مِن اليَدِ السُّفْلَى".

صحيح: رواه الإمام أحمد (14531) عن روح، حَدَّثَنَا ابن جريج، أخبرني أبو الزُّبير، أنه سمع جابر بن عبد الله، فذكره. وإسناده صحيح ومن هذا الوجه أخرجه ابن حبَّان في صحيحه (3345) إِلَّا أنه لم يذكر فيه الفقرة الثالثة من الحديث.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "স্বচ্ছলতা থাকা সত্ত্বেও যে সদাকাহ (দান) করা হয়, তাই সর্বোত্তম। আর তুমি তাদের থেকে শুরু করো যাদের ভরণ-পোষণের দায়িত্ব তোমার উপর। উপরের হাত নিচের হাত অপেক্ষা উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (4079)


4079 - عن طارق المحاربيّ، قال: قَدِمْنَا المَدِينَةَ فَإِذَا رَسُول الله صلى الله عليه وسلم قائِمٌ عَلَى المِنْبَرِ يخْطُبُ النَّاسَ وَهُوَ يَقُولُ:"يَدُ المُعْطِي العُلْيَا، وَابْدَأْ بِمَنْ تَعُولُ أُمَّكَ وَأَبَاكَ وَأُخْتَكَ وَأَخَاكَ ثُمَّ أَدْنَاكَ أذناك".

حسن: رواه النسائيّ (2532) عن يوسف بن عيسى، قال: أنبأنا الفضل بن موسى، قال: حَدَّثَنَا يزيد وهو ابن زياد بن أبي الجعد، عن جامع بن شداد، عن طارق، فذكره.

وإسناده حسن من أجل يزيد بن زياد، وثَّقه ابن معين والعجليّ، وقال أبو زرعة: شيخ، ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا ابن حبَّان في صحيحه (3341).




তারিক আল-মুহারিবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা মদীনায় উপস্থিত হলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিম্বারে দাঁড়িয়ে জনগণের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিচ্ছিলেন। তিনি বলছিলেন: দানকারীর হাতই শ্রেষ্ঠ। আর তুমি তাদের দিয়ে শুরু করো যাদের ভরণপোষণ তুমি বহন করো—তোমার মা, তোমার বাবা, তোমার বোন ও তোমার ভাই। অতঃপর তোমার নিকটতমদেরকে, তারপর তোমার নিকটতমদেরকে।









আল-জামি` আল-কামিল (4080)


4080 - عن أبي رمثة عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يد المعطي العليا، أمك وأباك وأختك وأخاك، ثمّ أدناك أدناك"، وقال رجل: يا رسول الله! هؤلاء بنو يربوع قتلة فلان؟ قال:"ألا لا تجني نفس على أخرى".

حسن: رواه أحمد (7105) عن عمرو بن الهيثم وأبي النضر -، والطَّبرانيّ في الكبير (22/ 283) من طريق حجَّاج بن نصير- كلهم عن المسعودي عن إياد بن لقيط، عن أبي رمثة فذكره.

وإسناده حسن، والمسعودي هو: عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة بن مسعود الكوفي صدوق اختلط قبل موته، وسماع البصريين منه قبل اختلاطه، وعمرو بن الهيثم بصريٌّ.




আবু রুমসাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "দানকারীর হাত (গ্রহীতার হাতের) উপরে থাকে। (দান শুরু করো) তোমার মা, তোমার বাবা, তোমার বোন এবং তোমার ভাইকে দিয়ে। এরপর নিকটবর্তী, এরপর নিকটবর্তী জনকে।" এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল! এরা (বনু ইয়ারবূ‘ গোত্র) কি সেই লোক, যারা অমুককে হত্যা করেছিল? তিনি বললেন: "সাবধান! কোনো ব্যক্তি যেন অন্য ব্যক্তির অপরাধের বোঝা বহন না করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4081)


4081 - عن رجل من بني يربوع، قال: أَتَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَسَمِعْتُهُ وَهُوَ يُكَلِّمُ النَّاسَ يقُولُ:"يَدُ المُعْطِي العُلْيَا أُمَّك وَأَبَاك وَأُخْتَك وَأَخَاك ثُمَّ أَدْنَاكَ فَأَدْنَاكَ". قَالَ: فقَالَ رَجَلٌ: يَا رَسُولَ الله، هَؤُلاءِ بَنُو ثَعْلَبَةَ الَّذِينَ أَصَابُوا فُلانًا؟ قال: فَقَالَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم:"أَلا لا تَجْنِي نَفْسٌ عَلَى أُخْرَى".
صحيح: رواه الإمام أحمد (16613) عن يونس، حَدَّثَنَا أبو عوانة، عن الأشعث بن سليم، عن أبيه، عن رجل من بني يربوع، فذكره.

ورواه النسائيّ (4837) عن قُتَيبة، حَدَّثَنَا أبو عوانة، بإسناده مختصرًا.

ورواه أبو داود الطيالسي (1353) ومن طريقه النسائيّ (4835)، والبزّار - كشف الأستار (918) -، عن شعبة، عن أشعث بن أبي الشّعثاء، قال: سمعت الأسود بن هلال يحدّث عن رجل من بني ثعلبة بن يربوع، أنّ أناسًا منهم أتوا رسول الله صلى الله عليه وسلم -وكانوا من بني ثعلبة- أصابوا رجلًا من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فقال رجل: يا رسول الله! هؤلاء بنو ثعلبة بن يربوع قتلت: فلانًا. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تجني نفسٌ على أخري".

وذكر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم الصّدقة فقال:"يد المعطي العليا: أمك، وأباك، وأختك، وأخاك، ثمّ أدناك أدناك". هذا لفظ أبي داود، وأمّا غيرهما فاختصره.

ورواه سفيان، عن الأشعث، عن سليم بإسناده وجعل هذا الرّجل المبهم ثعلبة بن زهدم اليربوعيّ، رواه النسائيّ (4833)، والبيهقي (8/ 345)، والبزّار -كشف الأستار (917) - فذكر الحديث، مثله.

واختلف في ثعلبة بن زهدم، فجزم ابن حبَّان وابن السكن وجماعة ممن صنّفوا في الصّحابة بأنه له صحبة.

وقال الترمذيّ في"تاريخه":"أدرك النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم وعامة روايته عن الصّحابة".

وفي الباب عن ابن مسعود مرفوعًا:"اليد العليا أفضل من اليد السفلي، وابدأ بمن تعول أمّك وأباك وأختك وأخاك وأدناك فأدناك".

رواه الطبراني في"الكبير" (10/ 229 - 230) عن علي بن عبد العزيز، ثنا حرمي بن حفص القسمليّ، ثنا زياد بن عبد الرحمن القرشيّ، ثنا عاصم بن بهدلة، عن أبي وائل، عن عبد الله، فذكره.

قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 120):"إسناده حسن".

قلت: وذلك بناء على ذكر ابن حبَّان لبعض رجال الإسناد في" الثّقات"، وإلَّا فزياد بن عبد الرحمن القرشي ذكره البخاريّ في"التاريخ الكبير" (3/ 361) ولم يذكر نسبه"القرشيّ" ولكن ذكره ابن أبي حاتم، ولم يذكر فيه شيئًا من جرح أو تعديل، فهو في عداد المجهولين، وأمّا ابن حبَّان فذكره في"الثقات" (6/ 325) ولم يذكروا من الرواة عنه إِلَّا عبد الواحد بن واصل، وحرمي ابن حفص ثانيه، فيكون في درجة"مقبول" عند الحافظ ابن حجر أي إذا توبع، وإلَّا فلين الحديث.

وفي الباب عن عطية السّعديّ قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"اليد المنطية خير من اليد السفلى".

رواه الإمام أحمد (17983)، والبزّار -كشف الأستار (916) -، والطَّبرانيّ في الكبير (17/
166) كلّهم من طريق عبد الرزّاق -وهو في مصنفه (20055) - عن معمر، عن سماك بن الفضل، عن عروة بن محمد، عن أبيه، عن جده، قال (فذكر الحديث).

و"المنطية" هي المعطية بلغة عطية الصحابيّ، ولذا غيّروه في المصادر الأخرى إلى"المعطية".

وفيه عروة بن محمد، وأبوه مجهولًا الحال، ولم يذكرهما إِلَّا ابن حبَّان على قاعدته في توثيق المجهولين.

قال الحافظ في الأوّل:"مقبول"، وقال في الثاني وهو محمد بن عطية السعدي"صدوق" مع أنه لم يذكر في"التهذيب" إِلَّا توثيق ابن حبَّان، ولكنه ذكر الخلاف في صحبته، ورجّح أن الصحبة لأبيه.

ويؤيد هذا لما رواه الحاكم (4/ 327) من طريق عبد الرحمن بن يزيد بن جابر، قال: حَدَّثَنِي عروة بن محمد بن عطية، قال: حَدَّثَنِي أبي، أن أباه أخبره قال: قدمت على رسول الله صلى الله عليه وسلم في أناس من بني سعد بن بكر، وكنت أصغر القوم فخلّفوني في رحالهم، ثمّ أتوا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقضى من حوائجهم ثمّ قال:"هل بقي منكم من أحد؟". قالوا: نعم غلام معنا خلفناه في رحالنا، فأمرهم أن يبعثوا إليّ، فأتوني فقالوا: أجب رسول الله صلى الله عليه وسلم فأتيته، فلمّا رآني قال:"ما أغناك الله فلا تسأل الناس شيئًا، فإن اليد العليا هي المنطية وإن اليد السّفلي هي المنطاة، وإن مال الله تعالى لمسئول ومنطي". قال: فكلمني رسول الله صلى الله عليه وسلم بلغتنا.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه".

والصّحيح -كما قلت- فيه عروة بن محمد بن عطية وأبوه مجهولان.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"خير الصّدقة ما أبقت غنيّ، واليد العليا خير من اليد السّفليّ، وابدأ بمن تعول".

رواه الطبرانيّ في الكبير (12726) عن عبد الله بن ناجية، ثنا المنذر بن الوليد الجارودي، ثنا أبي، ثنا الحسن بن أبي جعفر، عن محمد بن جحادة، عن أبي صالح، عن ابن عباس، فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 98):"فيه الحسن بن أبي جعفر الجفريّ وفيه كلام".

قلت: وهو كما قال، فإن الحسن بن أبي جعفر الجفري البصريّ ضعيف، وقد ضعَّفه جمهور أهل العلم.




বানী ইয়ারবু' গোত্রের একজন ব্যক্তি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম এবং আমি তাঁকে মানুষের সাথে কথা বলতে শুনলাম। তিনি বলছিলেন: "দানকারীর হাত উত্তম (উপরের হাত)। (সাহায্য শুরু করো) তোমার মা, তোমার পিতা, তোমার বোন এবং তোমার ভাই থেকে। এরপর যারা তোমার নিকটবর্তী এবং তাদের নিকটবর্তী।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন একজন লোক বলল: "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এরা কি বানু সা'লাবাহ গোত্রের লোক, যারা অমুককে আঘাত করেছে (বা হত্যা করেছে)?" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জেনে রাখো! কোনো ব্যক্তি অন্য কোনো ব্যক্তির অপরাধের জন্য দায়ী হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4082)


4082 - عن أبي سعيد الخدريّ: أنَّ نَاسًا مِن الأَنْصَارِ سَأَلُوا رَسُول اللهِ صلى الله عليه وسلم فَأَعْطَاهُمْ، ثُمَّ سَأَلُوهُ فَأَعْطَاهُمْ، حتّى نَفِدَ مَا عِنْدَهُ ثمّ قال:"ما يَكُونُ عِنْدِي مِنْ خَيْرٍ فَلَنْ أَدَّخِرَهُ عَنْكُم، وَمَنْ يَسْتَعْفِفْ يُعِفَّهُ اللهُ، وَمَن يَسْتَغْنِ يُغْنِهِ اللهُ، وَمَنْ يَتَصَبَّرْ يُصَبِّرْهُ اللهُ، وَمَا أُعْطِيَ أَحَدٌ عَطَاءً هُوَ خَيْرٌ وَأَوْسَعُ مِن الصَّبْرِ".
متفق عليه: رواه مالك في الصّدقة (7) عن ابن شهاب، عن عطاء بن يزيد اللّيثيّ، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره.

ورواه البخاريّ في الزّكاة (1469)، ومسلم في الزّكاة (1053) كلاهما من طريق مالك، به.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আনসারদের কিছু লোক রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে চাইলেন। তিনি তাদের দিলেন। এরপর তারা আবার চাইলেন, তিনি তাদের আবার দিলেন। অবশেষে তাঁর কাছে যা কিছু ছিল, তা নিঃশেষ হয়ে গেল। এরপর তিনি বললেন: "আমার কাছে যদি কোনো কল্যাণকর বস্তু থাকে, তবে আমি তা তোমাদের কাছ থেকে লুকিয়ে রাখব না। আর যে লোক পবিত্র থাকতে চায়, আল্লাহ তাকে পবিত্র রাখেন। আর যে লোক অমুখাপেক্ষী হতে চায়, আল্লাহ তাকে অমুখাপেক্ষী করে দেন। আর যে লোক ধৈর্যধারণের চেষ্টা করে, আল্লাহ তাকে ধৈর্যশীল করে তোলেন। আর ধৈর্যের চেয়ে উত্তম ও অধিক প্রশস্ত কোনো দান কাউকে দেওয়া হয়নি।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)









আল-জামি` আল-কামিল (4083)


4083 - عن أبي سعيد: أَنَّ رجلًا مِن الأَنْصَارِ كَانَتْ بِهِ حَاجَةٌ، فَقَالَ لَهُ أَهْلُهُ: ائْتِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَاسْأَلْهُ، فَأَتَاهُ وَهُوَ يَخْطُبُ وَهُوَ يَقُول:"مَنِ اسْتَعَفَّ أَعَفَّهُ اللهُ، وَمَن اسْتَغْنَى أَغْنَاهُ اللهُ، وَمَنْ سَأَلَنَا فَوَجَدْنَا لَهُ أَعْطَيْنَاهُ" قَالَ: فَذَهَبَ وَلَمْ يَسْأَلْ.

صحيح: رواه الإمام أحمد (10989) عن هُشيم، حَدَّثَنَا أبو بشر، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد، فذكره. وإسناده صحيح. وأبو بشر هو جعفر بن إياس من رجال الشّيخين.

وأبو نضرة هو المنذر بن مالك بن قُطعة -بضم القاف، وفتح المهملة - العَوَقيّ - بفتح المهملة والواو ثمّ قاف -، ثقة من رجال مسلم.

وفي الحديث الآتي ورد ذكر هذا السائل بأنه أبو سعيد الخدريّ نفسه، هو الذي ذهب إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يسأله.




আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক আনসার ব্যক্তির কোনো প্রয়োজন ছিল। তখন তার পরিবারের লোকেরা তাকে বলল: আপনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যান এবং তার কাছে (সাহায্য) চান। সে ব্যক্তি তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলো, তখন তিনি খুতবা দিচ্ছিলেন এবং বলছিলেন: "যে ব্যক্তি (মানুষের কাছে চাওয়া থেকে) পবিত্র থাকতে চায়, আল্লাহ তাকে পবিত্র রাখেন। আর যে ব্যক্তি অমুখাপেক্ষী হতে চায়, আল্লাহ তাকে অভাবমুক্ত করেন। আর যে ব্যক্তি আমাদের কাছে চায় এবং আমরা তার জন্য কিছু পাই, আমরা তাকে তা প্রদান করি।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন সে ব্যক্তি চলে গেল এবং কিছু চাইল না।









আল-জামি` আল-কামিল (4084)


4084 - عن أبي سعيد الخدريّ: أنّ أهله شكوا إليه الحاجة، فخرج إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ليسأله لهم شيئًا، فوافقه على المنبر، وهو يقول:"أيها الناس، قد آن لكم أن تستغنوا عن المسألة، فإنه من يستعفف يُعِفّه الله، ومن يستغن يُغْنِه الله، والذي نفس محمد بيده! ما رزق عبد شيئًا أوسع من الصبر، ولئن أبيتم إِلَّا أن تسألوني لأعطينكم ما وجدت".

حسن: رواه ابن حبَّان (3399) من طريق اللّيث، عن ابن عجلان، عن سعيد المقبريّ، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره.

وإسناده حسن من أجل ابن عجلان وهو محمد بن عجلان المدني"صدوق". إِلَّا أنه اختلطت عليه أحاديث أبي هريرة.

وله طرق أخرى منها: ما رواه حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، أن أبا سعيد الخدري، قال: أتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا أريد أن أسأله، فسمعته يخطب، وهو يقول:"من يستغن يغنه الله، ومن يستعفف يعفّه الله، ومن سألنا أعطيناه". قال: فرجع ولم أسأله، فأنا اليوم أكثر الأنصار مالا. رواه ابن حبَّان (3398).




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, তাঁর পরিবারের লোকেরা অভাবের অভিযোগ করলে তিনি তাদের জন্য কিছু চাইতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর কাছে গেলেন। তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে মিম্বরে পেলেন, যখন তিনি বলছিলেন: “হে লোক সকল! এখন তোমাদের জন্য ভিক্ষা করা হতে মুখাপেক্ষীহীন হওয়ার সময় হয়েছে। কেননা যে ব্যক্তি পবিত্র থাকতে চায়, আল্লাহ তাকে পবিত্র রাখেন। আর যে ব্যক্তি মুখাপেক্ষীহীন হতে চায়, আল্লাহ তাকে অভাবমুক্ত করে দেন। ঐ সত্তার কসম, যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন! কোনো বান্দাকে এমন কোনো প্রশস্ত রিজিক দেওয়া হয়নি যা ধৈর্য অপেক্ষা উত্তম। আর তোমরা যদি একান্তই না চাও যে, তোমরা শুধু আমার কাছেই চাইবে, তবে আমি যা কিছু পাই তা তোমাদের অবশ্যই দেব।”









আল-জামি` আল-কামিল (4085)


4085 - عن حكيم بن حزام، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"اليَدُ العُلْيَا خَيْرٌ مِن اليَدِ السُّفْلَى، وَابْدَأْ بِمَنْ تَعُولُ، وَخَيْرُ الصَّدَقَةِ عَنْ ظَهْرِ غِنًى، وَمَنْ يَسْتَعْفِفْ يُعِفَّهُ اللهُ وَمَنْ يَسْتَغْنِ يُغْنِه اللهُ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1427) عن موسى بن إسماعيل، حَدَّثَنَا وهيب، حَدَّثَنَا هشام، عن أبيه، عن حكيم بن حزام، فذكره.

وعن وُهيب، قال: أخبرنا هشام، عن أبيه، عن أبي هريرة، بهذا.

ورواه مسلم في الزّكاة (1034) من وجه آخر عن حكيم بن حزام، ولم يذكر فيه:"وَمَنْ يَسْتَعْفِفْ يُعِفَّهُ اللهُ وَمَنْ يَسْتَغْنِ يُغْنِهِ اللهُ".




হাকীম ইবনু হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "উপরের হাত নিচের হাতের চেয়ে উত্তম। আর তুমি তাদের থেকে শুরু করো যাদের ভরণপোষণের দায়িত্ব তোমার উপর। আর উত্তম সাদাকা হলো যা প্রাচুর্য থাকা সত্ত্বেও দেওয়া হয়। আর যে ব্যক্তি পবিত্র থাকতে চায়, আল্লাহ তাকে পবিত্র রাখেন। আর যে ব্যক্তি স্বাবলম্বী হতে চায়, আল্লাহ তাকে স্বাবলম্বী করে দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (4086)


4086 - عن رجل من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال: كان بالكوفة أميرا، قال: فخطب يومًا فقال: إن في إعطاء هذا المال فتنة، وفي إمساكه فتنة، وبذلك قام رسول الله صلى الله عليه وسلم في خطبته حتّى فرغ، ثمّ نزل.

صحيح: رواه أحمد (20586) قال: حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، حَدَّثَنَا شعبة، قال: سمعت إسحاق بن سويد، قال: سمعت مطرِّف بن عبد الله بن الشخير، يحدث عن رجل من أصحاب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.

وإسناده صحيح، وإسحاق بن سويد وهو العدوي البصري ثقة وثَّقه جمع من الأئمة إِلَّا أن الحافظ ابن حجر قال فيه:"صدوق".

وأمّا ما رُوي عن حكيم بن حزام، قال: جاء مَالٌ مِنَ البَحْرَيْنِ، فَدَعَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم العَبَّاسَ فَحَفَنَ لَهُ، فَقَالَ:"أَزِيدُكَ؟". قَالَ: نَعَمْ، فَحَفَنَ لَهُ، ثُمَّ قال:"أَزِيدُكُ؟" قال: نَعَمْ، فَحَفَنَ لَهُ، ثُمَّ قَال:"أَزِيدُكَ؟" قَالَ: نَعَمْ، فَحَفَنَ لَهُ، ثُمَّ قال:"أَزِيدُكَ؟" قال: نَعَمْ، قال:"أَبْقِ لِمَنْ بَعْدَكَ"، ثُمَّ دَعَانِي فَحَفَنَ لِيّ، فَقُلْتُ: يَا رَسُول اللهِ، خَيْرٌ لِي أَوْ شَرٌّ لِي؟ قال:"لَا بَلْ شَرٌّ لَكَ"، فَرَدَدْتُ عَلَيْهِ مَا أَعْطَانِي، ثُمَّ قُلْتُ: لا وَالَّذِي نَفْسِي بِيَدِهِ! لا أَقْبَلُ مِنْ أَحَدٍ عَطِيَّةً بَعْدَكَ، قَال مُحَمَّدٌ: قَالَ حَكِيمٌ: فَقُلْتُ: يَا رَسُول الله، ادْعُ اللهَ أَنْ يُبَارِكَ لِي، قال:"اللَّهُمَّ بَارِكْ فِي صَفْقَةِ يَدِهِ". فهو ضعيف.

رواه الطبراني في الكبير (3/ 230) عن الحسين بن إسحاق التّستريّ، والعباس بن حمدان الحنفيّ الأصبهانيّ، قالا: ثنا علي بن المنذر، ثنا محمد بن فضيل، عن إسماعيل بن مسلم، عن ابن سيرين، عن حكيم بن حزام، فذكره.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 97):"وفيه إسماعيل بن مسلم وفيه كلام كثير، وقد قيل فيه: إنه صدوق يهم". وقال أيضًا:"ولحكيم حديث غير هذا في الصَّحيح". وأورده المنذريّ في الترغيب والترهيب (1217) بصيغة التمريض وعزاه للطبراني.

قلت: إسماعيل بن مسلم هو المكي ضعَّفه جمهور أهل العلم، قال ابن عدي: أحاديثه غير محفوظة إِلَّا أنه يكتب حديثه.

وأمّا حديث حكيم في الصَّحيح الذي أشار إليه الهيثمي فهو ما ذكر في باب"من أخذه بإشراف نفس لم يبارك فيه".
وفي الباب عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"استَغْنوا عن النّاس ولو بشوص سواك".

رواه البزّار -كشف الأستار (913) - عن عبد الواحد بن غياث، ثنا عبد العزيز بن مسلم، ثنا الأعمش، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.

وفيه عنعنة الأعمش، وهو لم يسمع من سعيد بن جبير إِلَّا أربعة أحاديث، كما قال عليّ بن المدينيّ، وهذا ليس منها. انظر: تحفة التحصيل (ص 1




নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তিনি (সেই সাহাবী) কূফায় একজন আমীর (শাসক) ছিলেন। তিনি বলেন: একদিন আমি খুতবা দিতে দাঁড়ালাম এবং বললাম: এই (ধন-)সম্পদ (মানুষকে) দান করার মধ্যেও ফিতনা (পরীক্ষা) রয়েছে, আর তা (নিজের কাছে) আটকে রাখার মধ্যেও ফিতনা রয়েছে। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর খুতবার মধ্যে এই বিষয়টি নিয়েই দাঁড়িয়েছিলেন যতক্ষণ না তিনি তা শেষ করেন, অতঃপর তিনি (মিম্বর থেকে) নেমে যান।









আল-জামি` আল-কামিল (4087)


4087 - عن معاوية بن أبي سفيان، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُلْحِفُوا فِي المَسْأَلَةِ، فَوَاللهِ لا يَسْأَلُنِي أَحَدٌ مِنْكُمْ شيئًا فَتُخْرِجَ لَهُ مَسْأَلَتُهُ مِنِّي شيئًا وَأَنَا لَهُ كَارِهٌ فَيُبَارَكَ لَهُ فِيمَا أَعْطَيْتُهُ".

صحيح: رواه مسلم في الزّكاة (1038) عن محمد بن عبد الله بن نمير، حَدَّثَنَا سفيان، عن عمرو، عن وهب بن منبه، عن أخيه همّام، عن معاوية، فذكره.

ورواه أيضًا من وجه آخر عن سفيان، عن عمرو بن دينار، حَدَّثَنِي وهب بن منبه -ودخلتُ عليه في داره بصنعاء فأطعمني من جَوْزَة في داره- عن أخيه منبه، قال: سمعت معاوية بن أبي سفيان يقول (فذكره).

والإلحاف: الإلحاح، يقال: قد ألحف السائلُ في مسألته إذا ألحَّ، وهو أن يلازم المسؤول حتّى يعطيه.




মুআবিয়া ইবনু আবী সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা যাঞ্চার (চাওয়ার) ক্ষেত্রে অতিশয় পীড়াপীড়ি করো না। আল্লাহর কসম, তোমাদের কেউ আমার কাছে এমন কিছু চায় না, যা আমি অপছন্দ করা সত্ত্বেও তার চাওয়া আমার কাছ থেকে বের করে নেয় (অর্থাৎ অনিচ্ছাকৃতভাবে দিতে বাধ্য হই)। ফলে আমি তাকে যা প্রদান করি, তাতে তার জন্য কোনো বরকত (কল্যাণ) হয় না।"