হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (41)


41 - عن أنس بن مالك، قال: ما خطبنا نبيُّ اللَّه صلى الله عليه وسلم إلّا قال فيه:"لا إيمان لمن لا أمانة له، ولا دين لمن لا عهد له".

حسن: رواه الإمام أحمد (12383)، وأبو يعلى (2863)، والبزار -كشف الأستار (100) -، والطبراني في الأوسط (2627) كلّهم من طريق أبي هلال، حدثنا قتادة، عن أنس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في أبي هلال وهو محمد بن سليم الرّاسبيّ غير أنه حسن الحديث، وقد حسّنه البغويّ في شرح السنة (38)، ثم هو لم ينفرد به، بل رواه أبو يعلى (3863) وعنه ابن حبان في صحيحه (194) عن الحسن بن الصبّاح البزّار، حدثنا مؤمّل بن إسماعيل، عن حماد بن سلمة، عن ثابت، عن أنس، فذكر مثله.

ومؤمّل بن إسماعيل تُكلّم في حفظه، غير أنه لا بأس به في المتابعات.

وفي الباب عن ابن عمر، وابن عباس، وأبي أمامة، وابن مسعود ولا يصح منه شيءٌ غير أنّ بعضه يستشهد به.

قال النوويّ رحمه اللَّه تعالى في شرح مسلم:"هذا الحديث مما اختلف العلماء في معناه، فالقول الصحيح الذي قاله المحقّقون أن معناه لا يفعلُ هذه المعاصي وهو كامل الإيمان، وهذا من الألفاظ التي تطلق على نفي الشيء، ويراد نفيُ كماله ومختاره، كما يقال: لا علم إلا ما نفع، ولا مال إلا الإبل، ولا عيش إلا عيشُ الآخرة، وإنما تأولناه على ما ذكرناه لحديث أبي ذرّ وغيره:"من قال: لا إله إلا اللَّه دخل الجنة، وإن زنى وإن سرق"، وحديث عبادة بن الصامت الصحيح المشهور: أنهم بايعوه صلى الله عليه وسلم على أن لا يسرقوا، ولا يزنوا، ولا يعصوا. . . إلى آخره، ثم قال لهم صلى الله عليه وسلم:"فمن وفي منكم فأجرُه على اللَّه، ومن فعل شيئًا من ذلك فعُوقب في الدنيا فهو كفّارتُه، ومن فعل ولم يعاقب فهو إلى اللَّه تعالى، إن شاء عفا عنه، وإن شاء عذّبه". فهذان الحديثان مع نظائرهما في الصحيح مع قول اللَّه عز وجل {إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ} [سورة النساء: 48]، مع إجماع أهل الحقّ على أنّ الزّاني والسّارق والقاتل وغيرهم من أصحاب الكبائر
غير الشّرك لا يكفرون بذلك، بل هم مؤمنون ناقصو الإيمان، إن تابوا سقطت عقوبتهم، وإن ماتوا مصرّين على الكبائر كانوا في المشيئة، فإن شاء اللَّه تعالى عفا عنهم، وأدخلهم الجنة أولًا، وإن شاء عذّبهم، ثم أدخلهم الجنة، وكلّ هذه الأدلة تضطرنا إلى تأويل هذا الحديث وشبهه". انتهى.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখনই আমাদের উদ্দেশ্যে কোনো ভাষণ দিতেন, তখনই তার মধ্যে বলতেন: “যার আমানতদারী নেই, তার ঈমান নেই। আর যার কোনো অঙ্গীকার (বা চুক্তি) নেই, তার কোনো দ্বীন নেই।”









আল-জামি` আল-কামিল (42)


42 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: خرج رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في أضحى أو في فطر إلى المصلّى، فمرّ على النساء فقال:"يا معشر النّساء تصدّقن، فإنّي أريتكن أكثر أهل النّار" فقلن: وبمَ يا رسول اللَّه؟ قال:"تكثرن اللّعن، وتكفرن العشير، ما رأيتُ من ناقصات عقلٍ ودين أذهب للبِّ الرّجل الحازم من إحداكن". قلن: وما نقصان ديننا وعقلنا يا رسول اللَّه؟ قال:"أليس شهادة المرأة مثل نصف شهادة الرجل" قلن: بلى. قال:"فذلك من نقصان عقلها. أليس إذا حاضتْ لم تصل ولم تصم؟" قلن: بلي، قال:"فذلك من نقصان دينها".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحيض (304) عن سعيد بن أبي مريم، أخبرنا محمد بن جعفر، قال: أخبرني زيد -وهو ابن أسلم- عن عياض بن عبد اللَّه، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر الحديث.

ورواه مسلم في الإيمان (80) من أوجه عن ابن أبي مريم، نا محمد بن جعفر بإسناده غير أنه لم يسق لفظ الحديث وإنّما أحال على معنى حديث ابن عمر الآتي.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঈদুল আযহা অথবা ঈদুল ফিতরের দিন ঈদগাহের দিকে যাচ্ছিলেন। তিনি মহিলাদের পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় বললেন: "হে নারী সমাজ! তোমরা সাদকা করো। কেননা, আমি তোমাদেরকে জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী হিসেবে দেখেছি।" তারা জিজ্ঞেস করল: "হে আল্লাহর রাসূল! কিসের কারণে (আমরা এমন)?" তিনি বললেন: "তোমরা বেশি বেশি অভিশাপ দাও এবং স্বামীর প্রতি অকৃতজ্ঞতা প্রকাশ করো। আমি দৃঢ়চেতা পুরুষের বুদ্ধি ও বিবেককে তোমাদের চেয়ে দুর্বলকারী ধর্ম ও জ্ঞান-বুদ্ধিতে অপূর্ণ আর কাউকে দেখিনি।" তারা জিজ্ঞেস করল: "হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের ধর্ম ও জ্ঞান-বুদ্ধির অপূর্ণতা কী?" তিনি বললেন: "নারীর সাক্ষ্য কি পুরুষের সাক্ষ্যের অর্ধেক নয়?" তারা বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "এটা তোমাদের জ্ঞান-বুদ্ধির অপূর্ণতা। আর যখন তোমাদের হায়িয (মাসিক) হয়, তখন কি তোমরা সালাত আদায় করো না এবং সওম (রোযা) রাখো না?" তারা বলল: "হ্যাঁ।" তিনি বললেন: "এটা তোমাদের ধর্মের অপূর্ণতা।"









আল-জামি` আল-কামিল (43)


43 - عن عبد اللَّه بن عمر، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم أنه قال:"يا معشر النّساء تصدّقن، وأكثرن الاستغفار، فإني رأيتُكنّ أكثر أهل النار" فقالت امرأة منهن جزلة:"وما لنا يا رسول اللَّه أكثر أهل النار؟ قال:"تكثرن اللّعن، وتكفرن العشير، وما رأيتُ من ناقصات عقل ودين أغلب الذي لبّ منكنّ" قالت: يا رسول اللَّه، وما نقصان العقل والدِّين؟ قال:"أما نقصان العقل فشهادة امرأتين تعدل شهادة رجل، فهذا نقصان العقل، وتمكث الليالي ما تصلي، وتفطر في رمضان فهذا نقصان الدِّين".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (79) عن محمد بن رمح، أخبرنا اللّيث، عن ابن الهاد، عن عبد اللَّه بن دينار، عن عبد اللَّه بن عمر، فذكر الحديث.

وقوله:"امرأة منهن جزلة": جزلة -بفتح الجيم وسكون الزاي- أي ذات عقل ورأي.




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "হে নারী সম্প্রদায়! তোমরা সাদকা করো এবং বেশি বেশি ইস্তিগফার (ক্ষমাপ্রার্থনা) করো। কারণ আমি দেখেছি, তোমরাই জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী।" তখন তাদের মধ্যে একজন বুদ্ধিমতী নারী বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! কী কারণে আমরা জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী হব?" তিনি বললেন: "তোমরা বেশি বেশি লা’নত (অভিশাপ) করো এবং স্বামীর অকৃতজ্ঞতা প্রকাশ করো। বুদ্ধি ও দীনের দিক থেকে ত্রুটিপূর্ণ হওয়া সত্ত্বেও আমি তোমাদের চেয়ে বেশি দৃঢ়প্রতিজ্ঞ পুরুষকে পরাভূত করতে সক্ষম আর কাউকে দেখিনি।" নারীটি বলল: "হে আল্লাহর রাসূল! বুদ্ধি ও দীনের ঘাটতি বা ত্রুটি কী?" তিনি বললেন: "বুদ্ধির ত্রুটি হলো, দুইজন নারীর সাক্ষ্য একজন পুরুষের সাক্ষ্যের সমান। এটাই হলো বুদ্ধির ত্রুটি। আর দীনের ত্রুটি হলো, তারা কয়েক রাত সালাত আদায় করা থেকে বিরত থাকে এবং রমাদানে রোযা পালন করে না। এটাই হলো দীনের ত্রুটি।"









আল-জামি` আল-কামিল (44)


44 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، بمثل حديث ابن عمر.

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (80) عن يحيى بن أيوب، وقتيبة، وابن حجر قالوا: حدثنا إسماعيل (وهو ابن جعفر)، عن عمرو بن أبي عمرو، عن المقبريّ، عن أبي هريرة ولم يسق لفظ
الحديث وإنّما أحال على لفظ حديث ابن عمر.

وساقه الترمذيّ (2613) عن أبي عبد اللَّه هُريم بن مسعر الأزديّ الترمذيّ، حدثنا عبد العزيز بن محمد، عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، قال: إنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم خطب النّاس فوعظهم ثم قال:"يا معشر النساء تصدّقن فإنكنّ أكثرُ أهل النّار"، فقالت امرأةٌ منهنّ: وبمَ ذاك يا رسول اللَّه؟ قال:"لكثرة لعنكُنّ، -يعني- وكفرَكُنّ العشير". قال:"وما رأيتُ ناقصات عقْل ودين أغلب لذوي الألباب وذوي الرّأي منكن". قالت امرأةٌ منهنّ: وما نقصان دينها وعقلها؟ قال:"شهادةُ امرأتين منكنّ بشهادة رجل، ونقصان دينكنّ: الحيضة، تمكث إحداكنّ الثّلاث والأربع لا تصلي".

قال الترمذي:"حسن صحيح". وفي نسخة:"حسن صحيح غريب".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন এবং তাদের উপদেশ দিলেন, এরপর বললেন: "হে নারী সমাজ! তোমরা সাদাকাহ (দান) করো। কেননা তোমরাই জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী হবে।" তখন তাদের মধ্য থেকে একজন মহিলা বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! এর কারণ কী? তিনি বললেন: "তোমাদের বেশি অভিশাপ দেওয়ার কারণে, অর্থাৎ স্বামীর অকৃতজ্ঞতার কারণে।" তিনি আরো বললেন: "বুদ্ধিমান ও জ্ঞানীদের উপর কর্তৃত্বশীল (প্রভাব বিস্তারকারী) তোমাদের চেয়ে কম বুদ্ধি ও কম দীনের অধিকারী আর কাউকে আমি দেখিনি।" তাদের মধ্য থেকে একজন মহিলা বললেন: তার দীন ও বুদ্ধির কমতি কী? তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্য থেকে দুইজন মহিলার সাক্ষ্য একজন পুরুষের সাক্ষ্যের সমান। আর তোমাদের দীনের কমতি হলো: ঋতুস্রাব। তোমাদের কেউ কেউ তিন-চার দিন নামায না পড়ে থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (45)


45 - عن أبي هريرة: أن النبي صلى الله عليه وسلم انصرف من الصبح يوما فأتي النساء في المسجد، فوقف عليهن فقال:"يا معشر النساء ما رأيتُ من نواقص عُقول ودين أذهب بقُلوب ذَوِي الألباب منكنّ، فإنّي قد رأيتُ أنكنَّ أكثر أهل النار يوم القيامة، فتقربنْ إلى اللَّه ما استطعتُنَّ". وكان في النساء امرأةُ عبد اللَّه بن مسعود فأتت إلى عبد اللَّه بن مسعود فأخبرته بما سمعتْ من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، وأخذت حُليًّا لها، فقال ابن مسعود: فأين تذهبين بهذا الحليّ؟ فقالت: أتقرب به إلى اللَّه ورسوله، لعلّ اللَّه أن لا يجعلني من أهل النار. فقال: ويلكِ هلُمَّ تصدَّقي به عليَّ وعلى وَلَدي، فأنا له موضعٌ. فقالت: لا واللَّه حتى أذهب به إلى النّبيّ صلى الله عليه وسلم. فذهبت تستأذنُ على النبي صلى الله عليه وسلم فقالوا للنّبي صلى الله عليه وسلم: هذه زينبُ تستأذنُ يا رسول اللَّه. فقال:"أيُّ الزَّيانب هي؟". فقالوا: امرأةُ عبد اللَّه بن مسعود. فقال:"ائذنوا لها". فدخلتْ على النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: يا رسول اللَّه، إني سمعتُ منك مقالةً، فرجعتُ إلى ابن مسعود فحدثْتُه، وأخذتُ حُلِيِّي أتقرب به إلى اللَّه وإليك رجاء أن لا يجعلني اللَّه من أهل النار، فقال لي ابنُ مسعود: تصدّقي به عليَّ وعلى ولدي، فأنا له مَوْضعٌ، فقلتُ: حتى أستأذن النّبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"تصدَّقي به عليه وعلى بنيه فإنهم له موضع". ثم قالت: يا رسول اللَّه أرأيت ما سمعتُ منك حين وقفتَ علينا:"ما رأيت من نواقص عقول قط ولا دين أذهب بقلوب ذوي الألباب منكنَّ". قالتْ: يا رسولَ اللَّه، فما نقصان ديننا وعقولنا؟ فقال:"أما ما ذكرتُ من نقصان دينكُنَّ: فالحيضة التي تصيبكن، تمكثُ إحداكُنَّ ما شاء اللَّه أن تمكثَ لا تصلي ولا تصوم، فذلك من نقصان دينكُنَّ، وأمّا ما ذكرتُ من نقصان عقولِكُنَّ فشهادَتُكُنَّ، إنّما شهادةُ المرأة نصفُ شهادةٍ".

حسن: رواه أحمد (8862) عن سليمان، أخبرنا إسماعيل، أخبرني عمرو -يعني ابن أبي
عمرو-، عن أبي سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وسليمان هو ابن داود الهاشميّ، وإسماعيل هو ابن جعفر بن أبي كثير.

وإسناده حسن، من أجل عمرو بن أبي عمرو وهو ميسرة مولى المطلب المدني مختلف فيه، فضعّفه ابن معين، والنسائيّ، ووثقه أبو زرعة، والعجليّ وغيره، ومشّاه الآخرون وهو من رجال الجماعة.

ومن طريقه رواه ابن خزيمة في صحيحه (2461).

وقولها:"أتقرب به إلى اللَّه ورسوله" فيه نكارة، إذ لا يجوز التقرب إلى غير اللَّه تعالى بشيء من العبادات، ولا يروي هذه الزيادة إلا إسماعيل بن جعفر عن عمرو ابن أبي عمرو، ورواه مسلم في الإيمان (80) من طرق عن إسماعيل بن جعفر إلا أنه لم يسُق لفظه وإنما أحال على معني حديث ابن عمر، وليس في حديث ابن عمر هذه الزيادة ولا قصة زينب، فلعلّ مسلمًا لم يسمع قصة زينب من شيوخه الثلاثة الذين روى عنهم الحديث كما مضى بمعنى حديث ابن عمر، بخلاف الإمام أحمد فإنه سمع هذه القصة من شيخه سليمان بن داود الهاشميّ وهو ثقة جليل، والأوهام والنكارة فيمن دونه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাত শেষে ফিরছিলেন। তিনি মসজিদের মধ্যে মহিলাদের কাছে এলেন এবং তাদের সামনে দাঁড়িয়ে বললেন: "হে নারী সমাজ! আমি বুদ্ধি ও দ্বীনের ঘাটতির কারণে তোমাদের চেয়ে অধিক জ্ঞানী-সচেতন পুরুষদের হৃদয়কে হরণকারী আর কাউকে দেখিনি। আমি দেখেছি যে কিয়ামতের দিন তোমরাই হবে জাহান্নামের অধিবাসীদের মধ্যে সংখ্যাগরিষ্ঠ। সুতরাং তোমরা আল্লাহ্‌র নিকট যথাসাধ্য নৈকট্য লাভ করো।"

সেই মহিলাদের মধ্যে আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী ছিলেন। তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট এসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে যা শুনেছিলেন তা জানালেন এবং তার কিছু অলংকার নিলেন। ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: "এই অলংকার দিয়ে তুমি কোথায় যাবে?" তিনি বললেন: "আমি এর মাধ্যমে আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের নিকট নৈকট্য লাভ করতে চাই, যেন আল্লাহ আমাকে জাহান্নামের অধিবাসী না করেন।" তিনি (ইবনু মাসঊদ) বললেন: "তোমার কল্যাণ হোক! এসো, তুমি এটা আমার ও আমার সন্তানদের ওপর সাদকা করো, কেননা আমিই এর হকদার।" তিনি বললেন: "না, আল্লাহর কসম, যতক্ষণ না আমি এটি নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যাই।"

অতঃপর তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অনুমতি চাইতে গেলেন। তারা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! এই যে যাইনাব (আপনার কাছে প্রবেশের) অনুমতি চাইছেন।" তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "কোন যাইনাব?" তারা বললেন: "আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদের স্ত্রী।" তিনি বললেন: "তাকে অনুমতি দাও।"

তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে প্রবেশ করে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমি আপনার কাছ থেকে একটি কথা শুনেছিলাম এবং ইবনু মাসঊদের কাছে ফিরে গিয়ে তাকে তা জানালাম। আমি আমার অলংকার নিয়েছি যেন আল্লাহ আমাকে জাহান্নামের অধিবাসী না করেন এই আশায় আল্লাহ্‌র ও আপনার নিকট নৈকট্য লাভ করতে পারি। তখন ইবনু মাসঊদ আমাকে বললেন: 'এটা আমার ও আমার সন্তানদের ওপর সাদকা করে দাও, কেননা আমিই এর হকদার।' আমি বললাম: 'আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অনুমতি না নেওয়া পর্যন্ত নয়।' তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটা তার (ইবনু মাসঊদের) এবং তার সন্তানদের ওপর সাদকা করো, কেননা তারা এর হকদার।"

এরপর তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যখন আমাদের সামনে দাঁড়িয়ে বললেন: 'আমি বুদ্ধি ও দ্বীনের ঘাটতির কারণে তোমাদের চেয়ে অধিক জ্ঞানী-সচেতন পুরুষদের হৃদয়কে হরণকারী আর কাউকে দেখিনি,' সেই কথাটির ব্যাপারে বলুন। হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের দ্বীন ও বুদ্ধির ঘাটতি কী?"

তিনি বললেন: "তোমাদের দ্বীনের ঘাটতি যা আমি উল্লেখ করেছি তা হলো, যে ঋতুস্রাব তোমাদের হয়। তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ আল্লাহ যতদিন চান ততদিন সালাত আদায় করে না এবং সাওম পালন করে না। এটিই তোমাদের দ্বীনের ঘাটতি। আর তোমাদের বুদ্ধির ঘাটতি যা আমি উল্লেখ করেছি, তা হলো তোমাদের সাক্ষ্যদান। কেননা, একজন মহিলার সাক্ষ্য হলো (একজন পুরুষের) অর্ধেক সাক্ষ্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (46)


46 - عن ابن مسعود، أن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"تصدقن يا معشر النساء، ولو من حليِّكُن، فإنكن أكثر أهل النار"، فقامت امرأة ليست مِن علية النساء، فقالت: لِمَ يا رسول اللَّه؟ قال:"لأنكنَّ تُكثِرْن اللعنَ وتكفُرن العشير".

وفي رواية:"وما رأيتُ ناقصات عقل ودين أغلب للب الرجال مِنكُن".

حسن: رواه الإمام أحمد (3569، 4152)، وأبو يعلى (5112، 5144)، والحاكم (2/ 190)، كلهم من طريق منصور بن أبي الأسود، عن ذر، عن وائل بن مهانة، عن عبد اللَّه بن مسعود، فذكر الحديث.

قال الحاكم: صحيح الإسناد ولم يخرجاه.

قلت: هو حسن، فإن وائل بن مهانة لم يوثقه غير ابن حبان (5/ 495) إلا أنه كان معروفًا عند الإمام أحمد، فقال في الموضع الثاني: كان من أصحاب عبد اللَّه بن مسعود، وكذلك قال شعبة كما ذكره البخاري في التاريخ الكبير (8/ 176): قال نصر بن علي عن أبيه عن شعبة قال: كان وائل من أصحاب ابن مسعود"، فمثله يحسّن حديثه، ولا يُجهّل كما قال الذهبي في الميزان:"لا يعرف".

والجملة الثانية أخرجها الحاكم (4/ 602، 603) من طريق قبيصة بن عقبة، عن سفيان، عن منصور بإسناده مرفوعًا، وقال: صحيح على شرط الشيخين ولم يخرجاه، وقد رواه جرير، عن منصور، عن الأعمش بزيادة الألفاظ فيه".

والصواب أن الجملة الآخرة موقوفة على ابن مسعود لما رواه الحميدي (92) عن سفيان، ثنا منصور بإسناده وفيه: ثم قال عبد اللَّه: ما وجد من ناقص العقل والدين، وأغلب للرجال ذوي
الرأي على أمورهم من النساء، قال: فقيل يا أبا عبد الرحمن: وما نقصان عقلها ودينها؟ قال: أما نقصان عقلها، فجعل اللَّه شهادة امرأتين بشهادة رجل، وأما نقصان دينها، فإنها تمكث كذا يومًا لا تصلي للَّه سجدة.

وكذلك رواه أيضًا أبو يعلي (5112) من طريق عبد العزيز بن عبد الصمد، حدثنا منصور بإسناده مثله موقوفًا، ولكن له حكم الرفع، فإن ابن مسعود لا يقول ذلك من عنده فلعله يرفعه مرة، ويوقفه أخرى احتياطًا كما هو معروف منه.




ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: “হে নারী সমাজ! তোমরা সাদাকাহ করো, তোমাদের অলংকার থেকে হলেও। কারণ নিশ্চয়ই তোমরা জাহান্নামের অধিকাংশ অধিবাসী।” তখন একজন মহিলা দাঁড়ালেন, যিনি সাধারণ নারীদের মধ্যে অন্যতম ছিলেন না, অতঃপর তিনি বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! এর কারণ কী? তিনি বললেন: “কারণ তোমরা বেশি বেশি অভিশাপ (লা'নত) দাও এবং স্বামীর অকৃতজ্ঞতা প্রকাশ করো।”

অন্য বর্ণনায় এসেছে: "তোমাদের চেয়ে জ্ঞান ও ধর্মে কম হওয়া সত্ত্বেও পুরুষদের মন জয় করার ক্ষেত্রে তোমাদের চেয়ে আর কাউকে বেশি প্রভাব বিস্তারকারী দেখিনি।"









আল-জামি` আল-কামিল (47)


47 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"حتى إذا خلص المؤمنون من النار، فوالذي نفسي بيده ما منكم من أحد بأشدّ مناشدةً للَّه في استقصاء الحقّ من المؤمنين للَّه يوم القيامة لإخوانهم الذين في النّار، يقولون: ربَّنا كانوا يصومون معنا، ويصلُّون ويحجُّون؟ فيقال لهم: أخرجُوا من عرفتم، فتُحَرَّمُ صورهم على النار. فَيُخْرِجُون خلقًا كثيرًا قد أخذت النّارُ إلى نصف ساقيه وإلى ركبتيه، ثم يقولون: ربَّنا ما بقي فيها أحدٌ ممن أمرْتنا به. فيقول: ارجعوا فمن وجدتم في قلبه مثقال دينار من خير فأخرجوه. فيخرجون خلقًا كثيرًا، ثم يقولون: ربَّنا لم نذرْ فيها أحدًا ممن أمرْتنا. ثم يقول: ارجعوا فمن وجدتم في قلبه مثقال نصف دينار من خير فأخرِجوه. فيخرجون خلقًا كثيرًا، ثم يقولون: ربّنا لم نَذرْ فيها ممن أمرتنا أحدًا. ثم يقول: ارجعوا فمن وجدتم في قلبه مثقال ذرة من خير فأخرجوه فيخرجون خلقًا كثيرًا. ثم يقولون: ربَّنا لم نَذَرْ فيها خيرًا".

وكان أبو سعيد يقول: إن لم تصدقوني بهذا الحديث فاقرءوا إن شئتم: {إِنَّ اللَّهَ لَا يَظْلِمُ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ وَإِنْ تَكُ حَسَنَةً يُضَاعِفْهَا وَيُؤْتِ مِنْ لَدُنْهُ أَجْرًا عَظِيمًا} [سورة النساء: 40]."فيقول اللَّه عز وجل: شفعت الملائكةُ، وشفع النّبيُّون، وشفع المؤمنون، ولم
يبقَ إلا أرحمُ الرّاحمين فيقبض قبضةً من النار فيخرج منها قوما لم يعملوا خيرًا قطّ، قد عادوا حُممًا، فيلقيهم في نهر في أفواه الجنة يقال له:"نهر الحياة" فيخرجون كما تخرج الحِبة في حميل السّيل".

متفق عليه: رواه البخاريّ في التوحيد (7439)، ومسلم في الإيمان (183) كلاهما عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد، واللّفظ لمسلم.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন:

"যখন মুমিনরা জাহান্নাম থেকে মুক্তি পাবে, তখন সেই সত্তার কসম, যার হাতে আমার প্রাণ! তোমাদের কেউই হক আদায়ের জন্য আল্লাহ্‌র কাছে এমন কঠোর আবেদনকারী হবে না, যেমন আবেদনকারী হবে মুমিনরা কিয়ামতের দিন তাদের সেই ভাইদের জন্য যারা জাহান্নামে থাকবে। তারা বলবে: 'হে আমাদের রব! তারা আমাদের সাথে সাওম পালন করত, সালাত আদায় করত এবং হজ করত?'

তখন তাদেরকে বলা হবে: 'যাদেরকে তোমরা চিনতে পারো, তাদেরকে বের করে নিয়ে আসো।' (এ কথা বলার পর) তাদের আকৃতিকে আগুনের জন্য হারাম করে দেওয়া হবে। এরপর তারা এমন বহু লোককে বের করে নিয়ে আসবে, যাদেরকে আগুন হাঁটু পর্যন্ত এবং অর্ধেক গোছা পর্যন্ত গ্রাস করে ফেলেছিল। তারপর তারা বলবে: 'হে আমাদের রব! যাদেরকে আপনি বের করতে নির্দেশ দিয়েছিলেন, তাদের মধ্যে আর কেউ অবশিষ্ট নেই।'

তখন আল্লাহ্ বলবেন: 'ফিরে যাও। যার অন্তরে এক দীনার পরিমাণও কল্যাণ (ঈমান) পাবে, তাকে বের করে নিয়ে আসো।' তখন তারা বহু লোককে বের করে নিয়ে আসবে। এরপর তারা বলবে: 'হে আমাদের রব! আপনি যাদেরকে বের করার নির্দেশ দিয়েছেন, তাদের কাউকে আমরা আর সেখানে রাখিনি।' এরপর তিনি বলবেন: 'ফিরে যাও। যার অন্তরে অর্ধ দীনার পরিমাণও কল্যাণ পাবে, তাকে বের করে নিয়ে আসো।' তখন তারা অনেক লোককে বের করে নিয়ে আসবে। এরপর তারা বলবে: 'হে আমাদের রব! যাদেরকে আপনি বের করার নির্দেশ দিয়েছেন, তাদের মধ্যে কাউকে আমরা আর রাখিনি।' এরপর তিনি বলবেন: 'ফিরে যাও। যার অন্তরে একটি অণু পরিমাণও কল্যাণ পাবে, তাকে বের করে নিয়ে আসো।' তারা তখন বহু লোককে বের করে আনবে। এরপর তারা বলবে: 'হে আমাদের রব! আমরা তো সেখানে আর কোনো কল্যাণ অবশিষ্ট দেখিনি।'

(আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: যদি তোমরা আমাকে এ হাদীস সম্পর্কে বিশ্বাস না করো, তবে তোমরা চাইলে এই আয়াতটি পাঠ করো: "নিশ্চয়ই আল্লাহ্‌ অণু পরিমাণও যুলম করেন না। আর যদি কোনো নেক কাজ হয়, তিনি তা বহুগুণ বাড়িয়ে দেন এবং তাঁর পক্ষ থেকে মহাপুরস্কার প্রদান করেন।" [সূরা আন-নিসা: ৪০])

তখন আল্লাহ্‌ আযযা ওয়া জাল্লা বলবেন: 'ফেরেশতারা সুপারিশ করেছে, নবীগণ সুপারিশ করেছে, আর মুমিনগণও সুপারিশ করেছে। এখন কেবল আরহামুর রাহিমীন (সর্বশ্রেষ্ঠ দয়ালু) বাকি আছেন।' তখন তিনি জাহান্নাম থেকে এক মুষ্টি ভরে এমন এক জাতিকে বের করবেন, যারা জীবনে কখনো কোনো নেক কাজ করেনি, যাদের অবস্থা এমন যে তারা কয়লার মতো কালো হয়ে গেছে। তিনি তাদেরকে জান্নাতের প্রবেশদ্বারের পার্শ্ববর্তী 'নাহরুল হায়াত' (জীবনের নহর) নামক একটি নহরে নিক্ষেপ করবেন। তখন তারা (সজীব হয়ে) এমনভাবে বেরিয়ে আসবে, যেমন স্রোতের প্লাবনের সাথে আসা বীজ গজিয়ে ওঠে।"









আল-জামি` আল-কামিল (48)


48 - عن أبي سعيد الخدريّ، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يدخل أهلُ الجنة الجنةَ، وأهلُ النار النارَ، ثم يقول اللَّه تعالى: أخرجوا من النار مَنْ كان في قلبه مثقال حبّة من خردل من إيمان، فيخرجون منها قد اسودّوا، فيلقون في نهر الحيا أو الحياة -شك مالك- فينبتون كما تنبتُ الحِبّةُ في جانب السّيل، ألم تر أنّها تخرج صفراء ملتويةً".

متفق عليه: رواه البخاري في الإيمان (22) عن إسماعيل، ومسلم في الإيمان (184) من حديث ابن وهب - كلاهما عن مالك، عن عمرو بن يحيى بن عمارة المازنيّ، قال: حدثني أبي، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكر الحديث، واللفظ للبخاريّ.

ولفظ مسلم:"يدخل اللَّه أهل الجنة الجنةَ، يدخل من يشاء برحمته، ويدخلُ أهل النار النار، ثم يقول: انظروا من وجدتم في قلبه مثقال حبة من خردل من إيمان فأخرجوه، فيخرجون منها حُمَمًا قد امتحشوا" ثم ذكر مثله.

وفي رواية:"كما تنبت الغُثاء في جانب السيل".

هذا الحديث لم يخرجه يحيى بن يحيى اللّيثيّ في موطأ مالك كما لم يذكره الجوهريّ في مسند الموطأ، مع أنه جمع فيه رواية عبد اللَّه بن وهب، فالظاهر أن الحديث في خارج الموطأ.

وقوله:"امتحشوا" أي احترقوا.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: জান্নাতবাসীরা জান্নাতে প্রবেশ করবে এবং জাহান্নামবাসীরা জাহান্নামে প্রবেশ করবে। অতঃপর আল্লাহ তাআলা বলবেন: তোমরা জাহান্নাম থেকে এমন ব্যক্তিকে বের করে আনো, যার অন্তরে সরিষার দানা পরিমাণ ঈমান আছে। তখন তাদের সেখান থেকে বের করে আনা হবে এমন অবস্থায় যে তারা (কয়লার মতো) কালো হয়ে গেছে। অতঃপর তাদের 'নাহরুল হায়া' অথবা 'নাহরুল হায়াত'—(এ ব্যাপারে মালিকের সন্দেহ)—নামক নদীতে নিক্ষেপ করা হবে। ফলে তারা দ্রুত বেড়ে উঠবে, যেমন শস্যদানা বন্যার স্রোতের তীরে গজায়। তুমি কি দেখোনি যে তা হলুদ ও মোচড়ানো অবস্থায় বের হয়ে আসে?









আল-জামি` আল-কামিল (49)


49 - عن أنس، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يخرج من النار من قال: لا إله إلا اللَّه، وفي قلبه وزن شعيرة من خير، ويخرج من النار من قال: لا إله إلا اللَّه، وفي قلبه وزن بُرّة من خير، ويخرج من النار من قال: لا إله إلا اللَّه وفي قلبه وزن ذرّة من خير".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (44)، ومسلم في الإيمان (193: 325) كلاهما من حديث هشام صاحب الدستوائيّ، قال: حدثنا قتادة، عن أنس، فذكره، واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "জাহান্নাম থেকে সে ব্যক্তি বের হয়ে আসবে, যে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলেছে, আর যার অন্তরে এক যব পরিমাণ নেকি বিদ্যমান। এবং জাহান্নাম থেকে সে ব্যক্তি বের হয়ে আসবে, যে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলেছে, আর যার অন্তরে এক গম পরিমাণ নেকি বিদ্যমান। এবং জাহান্নাম থেকে সে ব্যক্তি বের হয়ে আসবে, যে 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ' বলেছে, আর যার অন্তরে এক অণু পরিমাণ নেকি বিদ্যমান।"









আল-জামি` আল-কামিল (50)


50 - عن ابن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا يدخل النارَ أحدٌ في قلبه مثقال حبّة خردل من إيمان. ولا يدخل الجنة أحدٌ في قلبه مثقال حبّة خردل من كبرياء".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (91: 148) من طرق عن علي بن مسهر، عن الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، عن عبد اللَّه بن مسعود، فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যার অন্তরে সরিষার দানা পরিমাণ ঈমান আছে, সে জাহান্নামে প্রবেশ করবে না। আর যার অন্তরে সরিষার দানা পরিমাণ অহংকার আছে, সে জান্নাতে প্রবেশ করবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (51)


51 - عن جابر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إذا مُيِّز أهلُ الجنّة وأهلُ النار، فدخل أهلُ الجنة الجنة، وأهل النار النار، قامت الرُّسلُ فشفعوا فيقول: انطلقوا -أو اذهبوا- فمن عرفتم فأخرجوه. فيخرجونهم قد امْتَحَشُوا فيلقونهم في نهر -أو على نهر- يقال له: الحياة. قال فتسقطُ مُحَاشهم على حافة النّهر ويخرجون بِيضًا مثل الثعارير. ثم يشفعون، فيقول: اذهبوا -أو انطلقوا- فمن وجدتم في قلبه مثقال قيراط من إيمان فأخرجوهم. قال: فيخرجون بَشَرًا، ثم يشفعون فيقول اذهبوا -أو انطلقوا- فمن وجدتم في قلبه مثقال حبة من خردلة من إيمان فأخرجوه، ثم يقول اللَّه عز وجل: أنا الآن أُخْرجُ بعلمي ورحمتي. قال: فيُخرجُ أضعافَ ما أخرجُوا وأضعافه فيكتب في رقابهم: عُتَقاءُ اللَّه، ثم يَدخلون الجنّة فيسمَّوْن فيها الجهنّميّين".

حسن: رواه الإمام أحمد (14491، 15048) من وجهين عن أبي الزبير، قال: حدثني جابر، فذكر الحديث.

وإسناده حسن من أجل أبي الزبير.

وصحّحه ابن حبان (183)، وأصله في الصحيحين من وجوه أخرى.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যখন জান্নাতবাসীদের ও জাহান্নামবাসীদের পৃথক করা হবে, আর জান্নাতবাসীরা জান্নাতে ও জাহান্নামবাসীরা জাহান্নামে প্রবেশ করবে, তখন রাসূলগণ (নবীগণ) উঠে সুপারিশ করবেন। আল্লাহ বলবেন: ‘যাও (অথবা ‘চলে যাও’)। যাদেরকে তোমরা চিনতে পারো, তাদেরকে বের করে আনো।’ তারা (জাহান্নাম থেকে) এমন কিছু লোককে বের করে আনবেন, যারা সম্পূর্ণরূপে জ্বলে কালো হয়ে গেছে। অতঃপর তারা তাদেরকে একটি নদীর মধ্যে—অথবা একটি নদীর ধারে—নিক্ষেপ করবেন, যার নাম ‘আল-হায়াত’ (জীবন)। বর্ণনাকারী বলেন: তখন তাদের (শরীরের) কালো অংশগুলো নদীর কিনারে পড়ে যাবে এবং তারা ‘থা’আরীর’ (ছোট শসার মতো বা বীজকোশের মতো সাদা জিনিস) এর মতো উজ্জ্বল সাদা হয়ে বেরিয়ে আসবে। এরপর তারা আবার সুপারিশ করবেন। আল্লাহ বলবেন: ‘যাও (অথবা ‘চলে যাও’)। যার অন্তরে তোমরা এক কীরাত পরিমাণও ঈমান পাবে, তাকে বের করে আনো।’ বর্ণনাকারী বলেন: ফলে তারা বহু লোককে বের করে আনবে। এরপর তারা আবার সুপারিশ করবেন। আল্লাহ বলবেন: ‘যাও (অথবা ‘চলে যাও’)। যার অন্তরে তোমরা সরিষার দানা পরিমাণও ঈমান পাবে, তাকে বের করে আনো।’ এরপর আল্লাহ তাআলা বলবেন: ‘এখন আমি আমার জ্ঞান ও রহমত দ্বারা বের করব।’ বর্ণনাকারী বলেন: ফলে তিনি (আল্লাহ) তাদের (রাসূলগণের) বের করে আনা সংখ্যার বহুগুণ এবং তারও বহুগুণ বের করবেন এবং তাদের ঘাড়ে লিখে দেওয়া হবে: ‘এরা আল্লাহর মুক্তিকৃত দাস।’ এরপর তারা জান্নাতে প্রবেশ করবে এবং সেখানে তাদের ‘জাহান্নামী’ নামে ডাকা হবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (52)


52 - عن جندب بن عبد اللَّه قال: كنا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم ونحن فتيانٌ حزاورةٌ، فتعلمنا الإيمان قبل أن نتعلم القرآن، ثم تعلمنا القرآن، فازددنا به إيمانًا.

حسن: رواه ابن ماجه (61) عن علي بن محمد، قال: حدثنا وكيع، قال: حدثنا حماد بن نجيح -وكان ثقة-، عن أبي عمران الجوني، عن جندب، فذكره.

وإسناده حسن من أجل حماد بن نجيح الإسكاف السّدوسيّ، فإنّه حسن الحديث.

قوله:"حزاورة" جمع حزور، وهو الغلام إذا اشتد وقوي وحزم.




জুনদুব ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম যখন আমরা পূর্ণ যুবক ছিলাম। তখন আমরা কুরআন শেখার পূর্বে ঈমান শিক্ষা করেছিলাম। অতঃপর আমরা কুরআন শিক্ষা করেছিলাম, ফলে তা দ্বারা আমাদের ঈমান আরও বৃদ্ধি পেয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (53)


53 - عن أبي أيوب: أنّ رجلًا قال للنّبيّ صلى الله عليه وسلم: أخبرني بعمل يُدخلني الجنّة. قال (أي القوم): ما له ما له! وقال النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"أَرَبٌ ما له، تعبد اللَّه ولا تشركْ به شيئًا، وتقيم الصّلاة، وتُؤتي الزّكاة، وتصلُ الرَّحم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1396)، ومسلم في الإيمان (13/ 13) كلاهما من
حديث شعبة، حدثنا محمد بن عثمان بن عبد اللَّه بن موهب، وأبوه عثمان كلاهما سمعا موسى بن طلحة بحدّث عن أبي أيوب، فذكره.

واللّفظ للبخاريّ؛ إلّا أنه قال في أحد الإسنادين:"عن ابن عثمان بن عبد اللَّه بن موهب، عن موسى بن طلحة" وقال أيضًا:"أخشى أن يكون محمد غير محفوظ إنما هو عمرو".

إلّا أنّ مسلمًا لم يذكر لفظ الحديث، وإنّما أحال على ما سبقه وهو ما رواه عن عبد اللَّه بن نمير، عن عمرو بن عثمان -كما رجّحه البخاريّ-، عن موسى بن طلحة، قال: حدثني أبو أيوب: أنّ أعرابيًّا عرض لرسول اللَّه صلى الله عليه وسلم وهو في سفر، فأخذ بخطام ناقته -أو بزمامها- ثم قال: يا رسول اللَّه -أو يا محمد- أخبرني بما يقرّبني من الجنّة وما يباعدني من النّار. قال: فكفّ النبي صلى الله عليه وسلم ثم نظر في أصحابه ثم قال:"لقد وُفَّق -أو لقد هُدِى-". قال:"كيف قلت؟". قال: فأعاد فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"تعبد اللَّه لا تشرك به شيئًا، وتقيم الصّلاة، وتؤتي الزّكاة، وتصل الرّحم، دع النَّاقة".

وزاد في رواية أبي إسحاق، عن موسى بن طلحة:"إن تمسّك بما أُمر به دخل الجنّة".

ورواه أيضًا البغويّ في"شرح السنة" (1/ 20) من طريق أبي نعيم، فقال:

"عن عمرو بن عثمان" إلّا أنّه فاته العزو إلى البخاريّ.

وعمرو بن عثمان هو الصّحيح، قال النَّووي:"اتفقوا على أنَّه وهم من شعبة، وأنَّ الصّواب: عمرو".

وقوله:"أرب" فيه ثلاث روايات: إحدها:"أَرِبَ" بوزن عَلِم، ومعناه الدّعاء عليه أي: أُصيبت آرابه وسقطت، وهي كلمة لا يراد بها وقوع الأمر، وإنما تذكر في معرض التعجّب. والثانية:"أَرَبٌ ما له" بوزن جَمَلٌ، أي: حاجة له، و"ما" زائدة للتقليل، أي حاجة يسيرة: والثالثة:"أَرِبٌ" بوزن كتف، والأرِبُ: الحاذق الكامل، أي: هو أرِبٌ، فحذف المبتدأ ثم سأل فقال: ماله؟ أي ما شأنه. راجع: النهاية (1/ 35).




আবু আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: আমাকে এমন একটি কাজের কথা বলুন যা আমাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবে। (উপস্থিত) লোকেরা বললো: তার কী হলো! তার কী হলো! তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “তার একটি প্রয়োজন আছে (বা তার কী হয়েছে!)। তুমি আল্লাহর ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কাউকে শরীক করবে না, সালাত কায়েম করবে, যাকাত দেবে এবং আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখবে।”









আল-জামি` আল-কামিল (54)


54 - عن أبي هريرة، أنّ أعرابيًّا أتى النَّبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: دُلّني على عمل إذا عملتُه دخلتُ الجنّةَ. قال:"تعبد اللَّه لا تشركُ به شيئًا، وتقيم الصّلاة المكتوبة، وتؤدّي الزّكاة المفروضة، وتصوم رمضان". قال: والذي نفسي بيده! لا أزيد على هذا. فلما ولَّى قال النّبيُّ صلى الله عليه وسلم:"من سرَّه أن ينظر إلى رجل من أهل الجنّة فلينظرْ إلى هذا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزّكاة (1397)، ومسلم في الإيمان (14)، كلاهما من حديث عفّان بن عثمان، حدّثنا وهيب، عن يحيى بن سعيد بن حيّان، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث، ولفظهما سواء.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় একজন বেদুঈন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমাকে এমন কাজের সন্ধান দিন, যা করলে আমি জান্নাতে প্রবেশ করব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি আল্লাহর ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কাউকে শরীক করবে না; ফরয সালাত (নামায) প্রতিষ্ঠা করবে; ফরয যাকাত আদায় করবে; এবং রমাযানের সাওম (রোযা) পালন করবে।" সে বলল, সেই সত্তার কসম, যাঁর হাতে আমার জীবন! আমি এর চেয়ে বেশি কিছু করব না। যখন সে চলে গেল, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "যে ব্যক্তি কোনো জান্নাতী লোককে দেখতে আনন্দিত হয়, সে যেন এই লোকটিকে দেখে নেয়।" (মুত্তাফাকুন আলাইহি)









আল-জামি` আল-কামিল (55)


55 - عن أبي جمرة قال: كنتُ أقعدُ مع ابن عباس يُجلسني على سريره فقال: أَقِمْ عندي حتى أجعل لك سهمًا من مالي. فأقمتُ معه شهرين، ثم قال: إنّ وفد عبد
القيس لما أتوا النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من القوم؟ -أو من الوفد؟ -" قالوا: ربيعة. قال:"مرحبا بالقوم -أو بالوفد- غير خزايا ولا ندامى". فقالوا: يا رسول اللَّه، إنّا لا نستطيع أن نأتيك إلا في الشّهر الحرام، وبيننا وبينك هذا الحيُّ من كفار مُضر، فُمرْنا بأمر فَصْل نُخْبر به مَنْ وراءَنا، وندخل به الجنّة. وسألوه عن الأشرية، فأمرهم بأربع، ونهاهم عن أربع، أمرهم: بالإيمان باللَّه وحده، قال:"أتدرون ما الإيمان باللَّه وحده؟" قالوا: اللَّه ورسوله أعلم. قال:"شهادةُ أن لا إله إلا اللَّه، وأنّ محمدًا رسولُ اللَّه، وإقامُ الصّلاة، وإيتاءُ الزّكاة، وصيامُ رمضان، وأنْ تُعطوا من المغنم الخمس". ونهاهم عن أربع: عن الحنتم، والدُّباء والنّقير، والمزفّت، وربما قال: المقير، وقال:"احفظوهن وأخبروا بهنّ من وراءكم".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (53)، ومسلم في الإيمان (17) كلاهما من طريق شعبة، عن أبي جمرة، فذكره، واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم نحوه.

وزاد مسلمٌ في رواية قرّة بن خالد، عن أبي جمرة: وقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم للأشجّ -أشجّ عبد القيس-:"إن فيك خصلتين يحبُّهما اللَّه: الحِلمُ والأناةُ".

قوله:"والمقير" هو المزقّت، وهو المطلي بالقار -وهو الزّفت-، وقيل: الزفت نوع من القار.

والمقصود من النهي عن هذه الأربع هو أنه نهى عن الانتباذ فيها، وإنّما خُصّت هذه بالنهي لأنه يسرع إليها الإسكار فيها فيصير حرامًا.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু জামরাহ বলেন: আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে বসতাম। তিনি আমাকে তাঁর খাটের উপর বসাতেন এবং বলতেন: তুমি আমার কাছে থাকো, যাতে আমি আমার সম্পদ থেকে তোমার জন্য একটি অংশ নির্ধারণ করে দিতে পারি। আমি তাঁর সঙ্গে দু'মাস ছিলাম। এরপর তিনি বললেন: আবদ কায়স গোত্রের প্রতিনিধিদল যখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল, তখন তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: “তোমরা কারা? - অথবা, প্রতিনিধিদল কারা?” তারা বলল: আমরা রাবী'আহ (গোত্রের লোক)। তিনি বললেন: “তোমাদেরকে স্বাগত! তোমরা অপমানিতও নও, লজ্জিতও নও।”

তারা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমরা আপনাকে হারাম মাস ছাড়া আসতে পারি না। কারণ আমাদের ও আপনার মাঝে মুদার গোত্রের কাফিরদের এ জনপদ অবস্থিত। অতএব, আমাদের এমন কিছু চূড়ান্ত নির্দেশের আদেশ দিন যা আমরা আমাদের পেছনে যারা আছে, তাদেরকে জানাতে পারি এবং যার দ্বারা আমরা জান্নাতে প্রবেশ করতে পারি। তারা তাঁকে পানীয় সম্পর্কেও জিজ্ঞেস করল।

তিনি তাদের চারটি জিনিসের আদেশ দিলেন এবং চারটি জিনিস থেকে নিষেধ করলেন। তিনি তাদের একমাত্র আল্লাহর প্রতি ঈমান আনার আদেশ দিলেন। তিনি বললেন: “তোমরা কি জানো, একমাত্র আল্লাহর প্রতি ঈমান আনা মানে কী?” তারা বলল: আল্লাহ ও তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। তিনি বললেন: “এ হলো: এই সাক্ষ্য দেওয়া যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ (উপাস্য) নেই এবং নিশ্চয়ই মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর রাসূল, সালাত প্রতিষ্ঠা করা, যাকাত আদায় করা, রমাযানের সাওম পালন করা এবং গণীমতের মাল হতে এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রদান করা।”

আর তিনি তাদের চারটি জিনিস থেকে নিষেধ করলেন: হানতাম, দুব্বা, নাকীর ও মুযাফফাত (পাত্র ব্যবহার) থেকে। আর কখনো কখনো (রাবী) ‘আল-মুকায়্যার’ বলেছেন। আর তিনি বললেন: “এগুলো তোমরা ভালোভাবে মনে রেখো এবং তোমাদের পেছনে যারা আছে, তাদেরকেও এ সম্পর্কে অবহিত করবে।”

(মুসলিমে কুরাহ ইবনু খালিদ সূত্রে আবু জামরাহ থেকে অতিরিক্ত রয়েছে): আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আশাজ্জকে – অর্থাৎ আবদ কায়স গোত্রের আশাজ্জকে – বললেন: “নিশ্চয়ই তোমার মধ্যে এমন দু’টি গুণ আছে, যা আল্লাহ পছন্দ করেন: ধৈর্য ও সহনশীলতা (ধীরস্থিরতা)।”









আল-জামি` আল-কামিল (56)


56 - عن أبي سعيد الخدريّ قال: إنّ أناسا من عبد القيس قدموا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم، فقالوا: يا نبيَّ اللَّه، إنّا حيٌّ من ربيعة وبيننا وبينك كفار مضر، ولا نقدر عليك إلا في أشهر الحرم فمرْنا بأمر نأْمُرُ به مَنْ وَراءَنا وندخل به الجنّة، إذا نحن أخذنا به فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"آمركم بأربع، وأنهاكم عن أربع: اعبدوا اللَّه ولا تشركوا به شيئًا، وأقيموا الصّلاة، وآتوا الزّكاة، وصُوموا رمضان وأعطوا الخمس من الغنائم، وأنهاكم عن أربع: عن الدُّبّاء، والحَنْتَم، والمزفَّت والنّقِير". قالوا: يا نبي اللَّه، ما علمُك بالنّقير؟ قال:"بلي جِذعٌ تنقرونه فتقذفون فيه من القُطَيْعاء -قال سعيدٌ: أو قال من التمر-، ثم تصبُّون فيه من الماء، حتى إذا سكن غلَيانُه شربتموه، حتى إنّ أحدكم -أو إنَّ أحدهم- ليضربُ ابنَ عمِّه بالسّيف" قال: وفي القوم رجل أصابته جراحة كذلك. قال: وكنتُ أَخْبأُها حياءً من رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم. فقلتُ: ففيم نشرب يا رسول اللَّه؟ قال:"في أَسْقِية الأَدَم التي يُلاثُ على أفواهها". قالوا: يا رسول اللَّه،
إنّ أرضنا كثيرةُ الجِرْذان، ولا تبقى بها أسقية الأَدَم. فقال نبيُّ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"وإن أكلتها الجرذانُ، وإن أكلتها الجرذانُ، وإن أكلتها الجرذان" قال: وقال نبيُّ اللَّه صلى الله عليه وسلم لأشج عبد القيس:"إنّ فيك لخصلتين يحبُّهما اللَّه الحِلْم والأَنَاة".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (18) عن يحيى بن أيوب، حدثنا ابنُ عليّة، حدّثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، قال: حدّثنا من لقي الوفدَ الذين قدموا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم من عبد القيس. قال سعيد (ابن أبي عروبة): وذكر قتادة أبا نضرة، عن أبي سعيد في حديثه هذا:"أنّ ناسًا من عبد القيس" فذكره.

ورواه من وجه آخر عن ابن أبي عدي، عن سعيد، عن قتادة، قال: حدثني غيرُ واحد لقي ذاك الوفد. وذكر أبا نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ: أنّ وفد عبد القيس لما قدموا على رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم بمثل حديث ابن عليّة، غير أنّ فيه:"وتَذيفُون فيه من القُطَيْعاء أو التمر والماء" ولم يقل:"قال سعيد: أو قال: من التمر".

ورواه من طريق أبي عاصم وعبد الرزّاق، قال عبد الرزّاق: أخبرنا ابن جريج، قال: أخبرني أبو قزعة، أنّ أبا نضرة أخبره وحسنًا أخبرهما، أنّ أبا سعيد الخدريّ أخبره: أنّ وفد عبد القيس لما أتوا نبي اللَّه صلى الله عليه وسلم قالوا: يا نبيّ اللَّه، جعلنا اللَّه فداءك، ماذا يصلح لنا من الأشربة؟ فقال:"لا تشرَبوا في النّقير". قالوا: يا نبي اللَّه، جعلنا اللَّه فداءك، أو تدري ما النّقير؟ قال: نعم الجِذْع يُنقرُ وسطه، ولا في الدّبّاء، ولا في الحنتمة، وعليكم بالموكَى".

وقوله:"إنّ أبا نضرة وحسنًا أخبرهما" قال ابن الصّلاح في صيانة صحيح مسلم (ص 159 - 161):"إحدى المعضلات، ولا عضال ذلك وقع فيه تغييرات من جماعة واهمة، فمن ذلك: رواية أبي نعيم الأصبهاني الحافظ في مستخرجه على كتاب مسلم بإسناده: أخبرني أبو فزعة، أنّ أبا نضرةَ وحسنًا أخبرهما أنّ أبا سعيد الخدريّ، وهذا يلزم منه أن يكون أبو قزعة هو الذي أخبر أبا نضرة وحسنًا عن أبي سعيد، فيكون أبو قزعة هو الذي سمع من أبي سعيد ذلك. وذلك منتفٍ، واللَّه أعلم.

ومن ذلك: أنّ أبا عليّ الغسّاني صاحب"تقييد المهمل" ردّ رواية مسلم هذه، وقلّده في ذلك صاحب"المُعِلمِ"، ومن شأنه تقليده فيما يذكره من علم الأسانيد، مع أنه لا يسمّيه ولا ينصفه، وصوّبهما في ذلك القاضي أبو الفضل عياض بن موسى، فقال أبو عليّ: الصّواب في الإسناد عن ابن جريج، قال: أخبرني أبو قزعة، أن أبا نضرةً وحسنًا أخبراه، أنّ أبا سعيد أخبره. وذكر أنه إنما قال:"أخبره" ولم يقل:"أخبرهما"؛ لأنّه ردّ الضّمير إلى أبي نضرة وحده، وأسقط الحسن لموضع الإرسال، فإنّه لم يسمع من أبي سعيد الخدريّ ولم يلْقَه، وذكر أنّه بهذا اللّفظ الذي ذكره خرّجه أبو عليّ بن السّكن في"مصنّفه" بإسناده قال: وأظنُّ هذا من إصلاح ابن السَّكن.
وذكر الغسّاني أيضًا: أنه رواه كذلك أبو بكر البزّار في"مسنده الكبير" بإسناده وحكى عنه، وعن عبد الغني بن سعيد الحافظ: أنّهما ذكرا أنّ حسنًا هذا هو الحسن البصريّ.

وليس الأمر في ذلك على ما ذكروه، بل ما أورده مسلمٌ في هذا الإسناد هو الصواب، وكما أورده رواه أحمد بن حنبل، عن روح بن عبادة، عن ابن جريج.

وقد انتصر له الحافظ أبو موسى الأصبهانيّ، وألّف في ذلك كتابًا لطيفًا تبجّح فيه بإجادته وإصابته، مع وهم غير واحد من الحفّاظ فيه.

فذكر: أنّ حسنًا هذا هو الحسن بن مسلمٌ بن ينّاق الذي روى عنه ابن جريج غير هذا الحديث، وأن معنى هذا الكلام: أنّ أبا نضرة أخبر بهذا الحديث أبا قزعة وحسن بن مسلم كليهما، ثم أكّد ذلك بأن أعاد فقال: أخبرهما أن أبا سعيد أخبره -يعني أبو سعيد أبا نضرة- وهذا كما تقول: إن زيدًا جاءني وعمرًا جاءاني فقالا: كذا وكذا.

وهذا من فصيح الكلام، واحتجّ على أنّ حسنًا فيه هو الحسن بن مسلم: بأنّ سلمة بن شبيب وهو ثقة، رواه عن عبد الرزّاق، وعن ابن جريج، قال: أخبرني أبو قزعة، أنّ أبا نضرة أخبره، وحسن بن مسلم أخبرهما، أنّ أبا سعيد أخبره. الحديث. رواه أبو الشيخ الحافظ في كتابه"المخرّج على صحيح مسلم".

وقد أسقط أبو مسعود الدمشقي وغيره، ذكر حسن أصلًا من الإسناد؛ لأنّه مع إشكاله لا مدخل له في رواية الحديث.

وذكر الحافظ أبو موسى ما حكاه أبو علي الغسّاني في كتابه"تقييد المهمل" في ذلك، وبيّن بطلانه، وبطلان رواية من غيّر الضمير في قوله:"أخبرهما" وعبر ذلك من تغيير، ولقد أجاد وأحسن، واللَّه أعلم، انتهى كلام ابن الصّلاح.

ونقل هذا الكلام النووي في شرح مسلم وأقرّه.

قوله:"أشج عبد القيس" اسمه منذر بن عائذ كما قال الترمذي، وهو المنذر بن عائذ بن المنذر ابن الحارث القصري -بمفتوحتين- صحابي نزل البصرة ومات بها.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয়ই আব্দুল কায়স গোত্রের কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল। তারা বলল, "হে আল্লাহর নবী! আমরা রবীআ গোত্রের একটি শাখা, এবং আমাদের ও আপনার মাঝে মুদার গোত্রের কাফিররা রয়েছে। আমরা হারাম মাসগুলো ছাড়া আপনার কাছে আসতে পারি না। অতএব, আপনি আমাদেরকে এমন কিছু কাজের নির্দেশ দিন, যা আমরা আমাদের পিছনের লোকদেরকেও বলতে পারি এবং যা গ্রহণ করলে আমরা জান্নাতে প্রবেশ করতে পারি।"

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি তোমাদেরকে চারটি কাজের নির্দেশ দিচ্ছি এবং চারটি কাজ থেকে নিষেধ করছি: তোমরা আল্লাহর ইবাদত করো এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরীক করো না; সালাত প্রতিষ্ঠা করো; যাকাত দাও; রমযান মাসের সওম পালন করো; এবং গনীমতের মালের এক পঞ্চমাংশ (খুমুস) প্রদান করো। আর আমি তোমাদেরকে চারটি জিনিস থেকে নিষেধ করছি: দুব্বা (কুমড়োর খোলা), হানতাম (সবুজ রঙের মাটির পাত্র), মুজাফফাত (আলকাতরা মাখানো পাত্র) এবং নাকীর (কাঠের পাত্র) ব্যবহার করতে।"

তারা বলল, "হে আল্লাহর নবী! নাকীর সম্পর্কে আপনি কী জানেন?" তিনি বললেন, "তা হলো কাণ্ডের ভেতরের অংশ, যা তোমরা কেটে ফাঁপা করো এবং তাতে কুত্বাইআ' নামক ফল— সাঈদ বলেন: অথবা খেজুর— রাখো। এরপর তাতে পানি ঢালো। যখন সেটির বুদবুদ ওঠা থেমে যায়, তখন তোমরা তা পান করো। ফলে তোমাদের মধ্যে কেউ কেউ তার চাচাতো ভাইকে তরবারি দ্বারা আঘাত করতে থাকে।"

রাবী বলেন: সেই গোত্রের একজন লোক এমন আঘাতে আহত ছিল। লোকটি বলল: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর লজ্জায় তা লুকিয়ে রেখেছিলাম। আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল! তাহলে আমরা কিসে পান করব?" তিনি বললেন, "চামড়ার তৈরি মশকগুলোতে, যেগুলোর মুখ শক্ত করে বাঁধা হয়।"

তারা বলল, "হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের এলাকায় ইঁদুরের উপদ্রব খুব বেশি, চামড়ার মশক সেখানে টিকে থাকে না।" তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "ইঁদুর খেয়ে ফেললেও (তোমরা তাতেই পান করবে), ইঁদুর খেয়ে ফেললেও (তোমরা তাতেই পান করবে), ইঁদুর খেয়ে ফেললেও (তোমরা তাতেই পান করবে)।"

রাবী বলেন: আর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আব্দুল কায়সের আশাজ্জকে বললেন, "নিশ্চয়ই তোমার মধ্যে এমন দুটি গুণ রয়েছে, যা আল্লাহ তাআলা ভালোবাসেন: সহনশীলতা (ধৈর্য) ও স্থিরতা (ধীরস্থিরতা)।"









আল-জামি` আল-কামিল (57)


57 - عن جابر بن عبد اللَّه، قال: أتى النّبيَّ صلى الله عليه وسلم النعمانُ بن قوقل، فقال: يا رسول اللَّه، أرأيت إذا صليتُ المكتوبة، وحرّمتُ الحرام، وأحللْتُ الحلال، أأدخلُ الجنّة؟ فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"نعم".

وفي رواية:"صليتُ الصلوات المكتوبات، وصمتُ رمضان، وأحللتُ الحلال، وحرمتُ الحرام، ولم أزد على ذلك، أأدخلُ الجنة؟ قال:"نعم" قال: واللَّه لا أزيد على ذلك شيئًا".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (15) من طرق عن جابر، به.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নু'মান ইবনে কাওকাল নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি বলুন, যদি আমি ফরয নামায আদায় করি, হারামকে হারাম মনে করি (তা থেকে বিরত থাকি), আর হালালকে হালাল মনে করি (তা পালন করি), তাহলে কি আমি জান্নাতে প্রবেশ করব?" নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।"

অপর এক বর্ণনায় এসেছে, (তিনি জিজ্ঞেস করলেন:) "যদি আমি ফরয নামাযগুলো আদায় করি, রমযানের রোযা রাখি, হালালকে হালাল মনে করি এবং হারামকে হারাম মনে করি, আর এর থেকে অতিরিক্ত আর কিছু না করি, তবুও কি আমি জান্নাতে প্রবেশ করব?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ।" তিনি (নু'মান) বললেন: "আল্লাহর কসম! আমি এর থেকে আর কিছুই অতিরিক্ত করব না।"









আল-জামি` আল-কামিল (58)


58 - عن معاذ بن جبل، قال: كنت مع النبي صلى الله عليه وسلم في سفر فأصبحتُ يوما قريبا منه ونحن نسيرُ، فقلت: يا رسولَ اللَّه، أخبرني بعمل يدخلني الجنة، ويباعدني من النار. قال:"لقد سألتني عن عظيم، وإنّه ليسيرٌ على من يسّره اللَّه عليه؛ تعبد اللَّه ولا تشركُ به شيئًا، وتقيم الصّلاة، وتُؤتي الزّكاة، وتصوم رمضان، وتحجّ البيت". ثم قال:"ألا أدلك على أبواب الخير؟ الصّومُ جُنّة، والصّدقةُ تُطفئ الخطيئةَ كما يطفئ الماءُ النّارَ، وصلاةُ الرّجل من جوف الليل" قال: ثم تلا: {تَتَجَافَى جُنُوبُهُمْ عَنِ الْمَضَاجِعِ} حتى بلغ {يَعْمَلُونَ} [سورة السجدة: 16 - 17]، ثم قال:"ألا أخبرك برأس الأمر كلّه وعموده وذروة سنامه؟" قلت: بلى يا رسول اللَّه، قال:"رأس الأمر الإسلام، وعموده الصّلاة، وذروة سنامه الجهاد". ثم قال:"ألا أخبرك بملاك ذلك كله؟" قلت: بلى يا نبي اللَّه، فأخذه بلسانه قال:"كفّ عليك هذا" فقلت: يا نبي اللَّه، وإنّا لمؤاخذون بما نتكلم به؟ فقال:"ثكلتك أمُّك يا معاذ! وهل يكبُّ الناس في النار على وُجُوههم -أو على مناخرهم- إلّا حصائدُ ألسنتهم؟ !".

حسن: رواه الترمذي (2616) واللّفظ له، وابن ماجه (3973) كلاهما عن محمد بن أبي عمر العدنيّ، حدثنا عبد اللَّه بن معاذ الصنعانيّ، عن معمر، عن عاصم بن أبي النَّجود، عن أبي وائل، عن معاذ بن جبل، فذكر الحديث.

قال الترمذي:"حسن صحيح".

ورواه عبد الرزّاق في مصنفه (20303)، وعنه الإمام أحمد (22016).

وإسناده حسن لأجل الكلام في عاصم بن أبي النّجود، غير أنه حسن الحديث.

وأبو وائل شقيق بن سلمة، ولد في السنة الأولى من الهجرة، ولكن لم تثبت صحبتُه، روى عن جماعة من الصّحابة منهم معاذ بن جبل، وكان من أعلم أهل الكوفة بحديث عبد اللَّه بن مسعود توفي سنة (82 هـ) روايته عن أبي بكر مرسلة، وشك الناس في سماعه من عائشة وأبي الدرداء غير أنّه لم يعرف بالتدليس.

وهذا الإسناد هو من أجود ما روي به هذا الحديث، وللحديث أسانيد أخرى سيأتي بعضها في كتاب الجهاد.




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি এক সফরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে ছিলাম। একদিন সকালে পথ চলার সময় আমি তাঁর কাছাকাছি হলাম এবং বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে এমন একটি আমলের কথা বলে দিন, যা আমাকে জান্নাতে প্রবেশ করাবে এবং জাহান্নাম থেকে দূরে রাখবে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: ‘তুমি তো একটি বিরাট (গুরুত্বপূর্ণ) বিষয় সম্পর্কে প্রশ্ন করেছ। আর এটি তার জন্য সহজ, যার জন্য আল্লাহ তা সহজ করে দেন। (তা হলো:) তুমি আল্লাহর ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কাউকে শরীক করবে না; সালাত প্রতিষ্ঠা করবে; যাকাত দেবে; রমযানে সাওম (রোযা) পালন করবে এবং বাইতুল্লাহর হজ্জ করবে।’ এরপর তিনি বললেন: ‘আমি কি তোমাকে কল্যাণের দুয়ারগুলো সম্পর্কে বলে দেব না? সাওম (রোযা) হলো ঢালস্বরূপ, আর সদকা (দান) গুনাহকে এমনভাবে মিটিয়ে দেয় যেমন পানি আগুনকে নিভিয়ে দেয়। আর রাতের মধ্যভাগে কোনো ব্যক্তির সালাত (নামাজ)।’ তিনি বললেন: এরপর তিনি এই আয়াতগুলো তিলাওয়াত করলেন: {تَتَجَافَى جُنُوبُهُمْ عَنِ الْمَضَاجِعِ} [অর্থাৎ—তাদের পার্শ্বদেশ শয্যা থেকে বিচ্ছিন্ন থাকে]... থেকে {يَعْمَلُونَ} [অর্থাৎ—তারা যা করে] পর্যন্ত (সূরা আস-সাজদাহ: ১৬-১৭)। এরপর তিনি বললেন: ‘আমি কি তোমাকে সব বিষয়ের মূল, তার স্তম্ভ এবং তার সর্বোচ্চ শিখর সম্পর্কে অবহিত করব না?’ আমি বললাম: হ্যাঁ, হে আল্লাহর রাসূল! তিনি বললেন: ‘বিষয়টির মূল হলো ইসলাম, তার স্তম্ভ হলো সালাত এবং তার সর্বোচ্চ শিখর হলো জিহাদ।’ এরপর তিনি বললেন: ‘আমি কি তোমাকে এই সবকিছুর নিয়ন্ত্রক সম্পর্কে অবহিত করব না?’ আমি বললাম: হ্যাঁ, হে আল্লাহর নবী! অতঃপর তিনি তাঁর জিহ্বা ধরে বললেন: ‘এটাকে সংযত রাখো।’ আমি বললাম: হে আল্লাহর নবী! আমরা কি আমাদের কথার জন্যেও পাকড়াও হবো? তিনি বললেন: ‘মু’আয! তোমার মা তোমাকে হারিয়ে ফেলুক! (আশ্চর্যবোধক বাক্য) মানুষকে কি তাদের মুখের উপর ভর করে—অথবা তাদের নাকের উপর ভর করে— জাহান্নামে নিক্ষেপ করে শুধু তাদের জিহ্বার ফসল ছাড়া অন্য কিছু?’









আল-জামি` আল-কামিল (59)


59 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لا تدخلون الجنّة حتى تؤمنوا، ولا تؤمنوا حتى تحابُّوا. أولا أدلكم على شيء إذا فعلتموه تحاببتم؟ أفشُوا السّلام بينكم".

صحيح: رواه مسلم في الإيمان (54) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا أبو معاوية، ووكيع،
عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وفي رواية جرير عن الأعمش:"والذي نفسي بيده لا تدخلون الجنّة حتى تؤمنوا" بمثل حديث أبي معاوية ووكيع.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: তোমরা জান্নাতে প্রবেশ করতে পারবে না, যতক্ষণ না তোমরা ঈমান আনো। আর তোমরা ঈমানদার হতে পারবে না, যতক্ষণ না তোমরা একে অপরকে ভালোবাসো। আমি কি তোমাদের এমন একটি বিষয় বলে দেব না, যা তোমরা করলে একে অপরকে ভালোবাসতে শুরু করবে? তোমরা নিজেদের মধ্যে সালাম (বিনিময়) ব্যাপকভাবে প্রচার করো।









আল-জামি` আল-কামিল (60)


60 - عن أبي هريرة، قال: قلت: يا رسول اللَّه، إني إذا رأيتُك طابتْ نفسي، وقرَّتْ عيني، فأنبئني عن كلّ شيء، فقال:"كلُّ شيء خلق من ماء". قال: قلت: أنبئني عن أمر إذا أخذتُ به دخلتُ الجنّة، قال:"أفْشِ السّلام، وأطعم الطّعام، وصِل الأرحام، وقُمْ باللّيل والناس نيام، ثم ادخل الجنّة بسلام".

صحيح: رواه الإمام أحمد (7932)، وصحّحه ابن حبان (508)، والحاكم (4/ 160) كلهم من طريق همام بن يحيى، عن قتادة، عن أبي ميمون، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وإسناده صحيح، ورجاله رجال الشيخين غير أبي ميمونة، وهو الفارسيّ المدنيّ الأبار، وثّقه النسائيّ والعجليّ وغيرهما، وهو من رجال السنن.

وأورده الهيثمي في"المجمع" (5/ 16) وقال:"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح خلا أبا ميمونة وهو ثقة".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি যখন আপনাকে দেখি, তখন আমার মন সন্তুষ্ট হয়ে যায় এবং চোখ শীতল হয়। আপনি আমাকে সবকিছু সম্পর্কে বলুন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “প্রত্যেক জিনিস পানি থেকে সৃষ্টি করা হয়েছে।” তিনি বললেন: আমি বললাম, আমাকে এমন একটি আমল সম্পর্কে বলুন, যা আমি গ্রহণ করলে জান্নাতে প্রবেশ করতে পারব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সালামের প্রসার ঘটাও, (ক্ষুধার্তকে) খাবার দাও, আত্মীয়তার সম্পর্ক বজায় রাখো, আর মানুষ যখন ঘুমিয়ে থাকে, তখন রাতে সালাত (নামাজ) আদায় করো। তাহলে শান্তির সাথে জান্নাতে প্রবেশ করবে।”