হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4128)


4128 - عن رجل من بني هلال، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تَصْلُحُ الصَّدَقَةُ لِغَنِيٍّ وَلا لِذِي مِرَّةٍ سَوِيٍّ".

حسن: رواه أحمد (16594) عن أبي عبد الرحمن عبد الله بن يزيد، قال: حدّثنا عكرمة، قال: حدّثنا أبو زُميل سماك، قال: حدّثني رجل من بني هلال، فذكره.

وقال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 92):"رواه أحمد، ورجاله رجال الصحيح".

قلت: وهو كما قال، وأبو زميل -بالزّاي مصغر- هو سماك بن الوليد الحنفيّ من رواة مسلم، وثقه أحمد وابن معين، وقال أبو حاتم: صدوق لا بأس به، وقال النسائيّ: ليس به بأس. ومثله يحسّن حديثه.

ورجل من بني هلال لم يُسمَّ، ولا تضرّ جهالة الصّحابيّ، وقد ثبت أنّ أبا زميل روي عن جماعة من الصّحابة منهم: ابن عباس، وابن عمر، ومن التابعين مالك بن مرثد، وعروة بن الزبير وغيرهما.




বনু হিলাল গোত্রের জনৈক ব্যক্তি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: "সদকা (বা যাকাত) কোনো ধনী ব্যক্তির জন্য অথবা সুস্থ ও সবল ব্যক্তির জন্য বৈধ নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (4129)


4129 - عن حُبْشي بن جُنادة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من سأل من غير فَقْر فكأنّما يأكل الجمْر".

صحيح: رواه أحمد (17508، 17509)، والطبرانيّ في المعجم الكبير (3506، 3508)، وابن خزيمة في صحيحه (2446)، والبيهقي في شعب الإيمان (3241) كلهم من حديث أبي إسحاق السبيعي، قال: حدثنا حُبشي بن جنادة السلولي، قال: فذكر الحديث.

كذا عند ابن خزيمة، وإسناده صحيح.

وقد رُوي أيضا عن حُبشي بن جنادة السّلوليّ، قال: سَمِعْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ -وَهُوَ وَاقِفٌ بِعَرَفَةَ- أَتَاهُ أَعْرَابِيٌّ فَأَخَذَ بِطَرَفِ رِدَائِهِ فَسَأَلَهُ إِيَّاهُ فَأَعْطَاهُ وَذَهَبَ فَعِنْدَ ذَلِكَ حَرُمَت الْمَسْأَلَةُ فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"إِنَّ الْمَسْأَلَةَ لا تَحِلُّ لِغَنِيٍّ ولا لِذِي مِرَّةٍ سَوِيٍّ إِلّا لِذِي فَقْرٍ مُدْقِعٍ أَوْ غُرْمٍ مُفْظِعٍ، وَمَنْ سَأَلَ النَّاسَ لِيُثْرِيَ بِهِ مَالَهُ كَانَ خُمُوشًا فِي وَجْهِهِ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَرَضْفًا يَأْكُلُهُ مِنْ جَهَنَّمَ وَمَنْ شَاءَ فَلْيُقِلَّ وَمَنْ شَاءَ فَلْيُكْثِرْ".

رواه الترمذيّ (653) عن علي بن سعيد الكنديّ، حدّثنا عبد الرحيم بن سليمان، عن مجالد، عن عامر الشعبيّ، عن حبشي بن جنادة السلوليّ، فذكره.

ورواه أيضًا من وجه آخر عن يحيى بن آدم، عن عبد الرحيم بن سلمان، بإسناده، نحوه.

وقال: هذا حديث غريب من هذا الوجه.

قلت: فيه مجالد وهو ابن سعيد بن عمير الهمداني ضعيف، ضعّفه النسائي وابن معين والدارقطني وابن سعد وغيرهم إلّا أنّ البخاريّ قال عنه:"صدوق".




হুবশী ইবনে জুনাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি অভাবগ্রস্ত না হয়েও (মানুষের কাছে) চায়, সে যেনো আগুন খাচ্ছে।"

হুবশী ইবনে জুনাদা আস-সালুলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আরো বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বিদায় হজ্জের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি—যখন তিনি আরাফাতে দাঁড়িয়ে ছিলেন—তখন একজন বেদুইন তাঁর কাছে এসে তাঁর চাদরের এক দিক ধরে তা চেয়ে নিল। তিনি তাকে তা দিয়ে দিলেন এবং সে চলে গেল। এরপরই (অকারণে) ভিক্ষা করা নিষিদ্ধ করা হয়। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ভিক্ষা করা ধনী ব্যক্তির জন্য অথবা সক্ষম ও শক্তিশালী উপার্জনক্ষম ব্যক্তির জন্য বৈধ নয়, শুধুমাত্র মারাত্মক অভাবগ্রস্ত বা ভয়ঙ্কর ঋণের ভারে জর্জরিত ব্যক্তির জন্য বৈধ। আর যে ব্যক্তি তার সম্পদ বাড়ানোর জন্য মানুষের কাছে চায়, কিয়ামতের দিন তা তার চেহারায় আঁচড়ের দাগ হবে এবং (জাহান্নামের) উত্তপ্ত পাথর হবে যা সে খাবে। অতএব, যে চায় সে যেন কম চায় (অর্থাৎ নিজের চাওয়াকে সীমিত করে), আর যে চায় সে যেন বেশি চায় (অর্থাৎ নিজের কষ্ট ও দুর্ভোগ বাড়িয়ে নেয়)।"









আল-জামি` আল-কামিল (4130)


4130 - عن أبي هريرة، أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم صَلَّى عَلَى رَجُلٍ تَرَكَ دِينَارَيْنِ أَوْ ثَلاثَةً فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"كَيَّتَانِ أَوْ ثَلاثَةٌ".

صحيح: رواه الإمام أحمد (9538)، والبزار -كشف الأستار (3650) - كلاهما من حديث يحيى بن سعيد، عن فضيل بن غزوان، قال: حدثني أبو حازم، عن أبي هريرة، فذكره.

وإسناده صحيح، وأبو حازم هو سلمان الأشجعيّ الكوفي من رجال الجماعة.

والسّبب في ذلك أنّ هذا الرجل كان يسأل الناس تكثّرًا كما رواه البيهقيّ في"شعب الإيمان" (3515) من طريق يحيى بن عبد الحميد، نا ابن فضيل، عن أبيه، عن أبي حازم.

وزاد فيه: فلقيت عبد الله بن القاسم مولى أبي بكر، فذكرتُ ذلك له فقال:"ذاك رجل كان يسأل الناس تكثّرًا".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমন এক ব্যক্তির জানাযার সালাত আদায় করলেন, যিনি দুই বা তিনটি দীনার রেখে গিয়েছিলেন। অতঃপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "(এগুলো) দুইটি বা তিনটি পোড়া দাগ (কলঙ্ক)।"









আল-জামি` আল-কামিল (4131)


4131 - عن عبد الله بن مسعود، قال: لَحِقَ بِالنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم عَبْدٌ أَسْوَدُ فَمَاتَ فَأُوذِنَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ:"انْظُرُوا هَلْ تَرَكَ شَيْئًا؟". فَقَالُوا: تَرَكَ دِينَارَيْنِ. فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"كَيَّتَانِ".

حسن: رواه الإمام أحمد (3843)، وأبو يعلى (4997) كلاهما من حديث زائدة، عن عاصم ابن أبي النجود، عن زر، عن عبد الله، فذكره. وصحّحه ابن حبان (3263).

وإسناده حسن من أجل عاصم بن أبي النجود فإنه حسن الحديث.

وكان هذا الرجل من أهل الصفّة، كما جاء في رواية عند الإمام أحمد (3914) (4367).

ومن المعروف أنّ أهل الصفة كانوا فقراء، وأهل الخير كانوا يقدّمون لهم الطعام فكان هذا الرجل يظهر الفقر وعنده ما يكفيه ولذا قال فيه النبيّ صلى الله عليه وسلم:"كيّة".

وأما الغني لو ترك أكثر من هذا فلا يلام عليه إذا لم يظهر الفقر أمام الناس.




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: একজন কালো দাস নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এসে যোগ দিলো এবং সে মারা গেল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খবর দেওয়া হলো। তিনি বললেন: "দেখো, সে কি কিছু রেখে গেছে?" তারা বলল: সে দুটি দিনার রেখে গেছে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "দুটি আগুনে পোড়ানোর দাগ।"









আল-জামি` আল-কামিল (4132)


4132 - عن أبي أمامة: أَنَّ رَجُلا مِنْ أَهْلِ الصُّفَّةِ تُوُفِّيَ وَتَرَكَ دِينَارًا فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"لَهُ كَيَّةٌ". قَالَ: ثُمَّ تُوُفِّيَ آخَرُ فَتَرَكَ دِينَارَيْنِ، فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"كَيَّتَانِ".

حسن: رواه الإمام أحمد (22172) عن حجّاج، قال: سمعت شعبة يحدّث عن قتادة، وهاشم، قال: حدّثني شعبة، أخبرنا قتادة، قال: سمعت أبا الجعد يحدّث -قال هاشم في حديثه: أبو الجعد مولى لبني ضُبيعة-، عن أبي أمامة، فذكره.

وهذا إسناد حسن، وأبو الجعد"مقبول". لأنه توبع، تابعه شهر بن حوشب. رواه الإمام أحمد من ثلاث طرق عن قتادة، عنه (22174، 22175، 22176)، والطبرانيّ في"الكبير" (7573) من طريق سعيد بن أبي عروبة، وهي إحدى طرق الإمام أحمد، عن قتادة، عنه.

وكذلك تابعه أيضًا عبد الرحمن بن العدّاء الكنديّ، قال: سمعت أبا أمامة، فذكر مثله.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا الإمام أحمد (22180)، والطبرانيّ في"الكبير" (8008)، وهذه الطّرق يقوّي بعضها بعضًا.

وقد رُوي مثله عن علي بن أبي طالب: مات رجلٌ من أهل الصّفة وترك دينارين، أو درهمين فقال النّبيّ صلى الله عليه وسلم:"كيّتان، صلوا على صاحبكم".

رواه الإمام أحمد (788) عن عفّان، حدّثنا جعفر بن سليمان، حدّثنا عتيبة، عن بريد بن أصرم، سمعت عليًّا، فذكره.

وعتيبة -بالتصغير- بصريّ، ذكره البخاريّ في التاريخ الكبير (96/ 4) وقال: إسناده مجهول، واعتمده الحافظ في"التقريب" فقال:"مجهول".

وكذلك شيخه بريد بن أصرم ذكره ابن حبان في"الثقات" (4/ 22) ولكن قال فيه الحافظ:"مجهول".

وكذلك رُوي أيضًا عن جابر، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من ترك دينارًا فهو كيّة".

رواه الإمام أحمد (14688) عن حسن، حدّثنا ابن لهية، حدّثنا أبو الزبير، عن جابر، فذكره. وابن لهيعة فيه كلام معروف.




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আহলে সুফফার একজন লোক মারা গেলেন এবং তিনি একটি দীনার (স্বর্ণমুদ্রা) রেখে যান। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার জন্য একটি দাগ (শাস্তি)।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর অন্য একজন মারা গেলেন এবং তিনি দুটি দীনার রেখে গেলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "দুটি দাগ (শাস্তি)।"









আল-জামি` আল-কামিল (4133)


4133 - عن المغيرة بن شعبة، أنّه سَمِع النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ:"إِنَّ اللهَ كَرِهَ لَكُمْ ثَلاثًا قِيلَ وَقَالَ، وَإِضَاعَةَ الْمَالِ، وَكَثْرَةَ السُّؤَالِ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1477)، ومسلم في الأقضية (593: 13) كلاهما من طريق إسماعيل ابن عليّة، عن خالد الحذّاء، حدّثني ابن أَشْوَع، عن الشعبيّ، حدّثني كاتب المغيرة ابن شعبة، قال: كتب معاوية إلى المغيرة بن شعبة: أن اكتب إليَّ بشيء سمعتَه من النبيّ صلى الله عليه وسلم، فكتب إليه سمعت النبيَّ صلى الله عليه وسلم يقول (فذكره).

وكاتب المغيرة اسمه ورَّاد -بتشديد الراء- أبو سعيد أو أبو الورد الكوفي مولى المغيرة بن شعبة.

وابن أشوع نسب إلى جدّه وهو سعيد بن عمرو بن أشوع الهمدني الكوفيّ.




মুগীরাহ ইবনে শু'বাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তোমাদের জন্য তিনটি বিষয় অপছন্দ করেন: অনর্থক কথা বলা (গুজব ও জল্পনা), সম্পদ নষ্ট করা এবং অতিরিক্ত প্রশ্ন করা।"









আল-জামি` আল-কামিল (4134)


4134 - عن بهز بن حكيم، عن أبيه، عن جدّه، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يَأْتِي رَجُلٌ مَوْلاهُ يَسْأَلُهُ مِنْ فَضْلٍ عِنْدَهُ فَيَمْنَعُهُ إِيَّاهُ إِلا دُعِيَ لَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ شُجَاعٌ أَقْرَعُ يَتَلَمَّظُ فَضْلَهُ الَّذِي مَنَعَ".

حسن: رواه النسائيّ (2566)، وأبو داود إثر حديث رقم (5139) كلاهما من حديث بهز بن
حكيم، بإسناده، مثله، واللفظ للنسائيّ.

قال أبو داود: الأقرع الذي ذهب شعر رأسه من السّم.

ورواه أحمد (20020) عن عبد الرزاق -وهو في مصنفه (6839) - عن معمر. ورواه أيضا (20032) عن يزيد -كلاهما عن بهز بن حكيم، بإسناده، نحوه. وإسناده حسن من أجل بهز فإنه حسن الحديث.




মু'আবিয়াহ ইবনু হায়দাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "কোনো ব্যক্তি তার মনিবের (বা বন্ধুর) কাছে তার কাছে থাকা অতিরিক্ত সম্পদ চাইলে যদি সে তাকে তা দিতে অস্বীকার করে, তবে কিয়ামতের দিন তার জন্য একটি টাক মাথাওয়ালা বিষাক্ত সাপকে ডাকা হবে, যা সে যে অতিরিক্ত সম্পদ দিতে অস্বীকার করেছিল, তা গ্রাস করার জন্য মুখ চেটে অপেক্ষা করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4135)


4135 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: أُصِيبَ رَجُلٌ فِي عَهْدِ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فِي ثِمَارٍ ابْتَاعَهَا فَكَثُرَ دَيْنُهُ فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"تَصَدَّقُوا عَلَيْهِ". فَتَصَدَّقَ النَّاسُ عَلَيْهِ فَلَمْ يَبْلُغْ ذَلِكَ وَفَاءَ دَيْنِهِ. فَقَالَ رَسُولُ الله صلى الله عليه وسلم لِغُرَمَائِهِ:"خُذُوا مَا وَجَدْتُمْ وَلَيْسَ لَكُمْ إِلا ذَلِكَ".

صحيح: رواه مسلم في كتاب المساقاة (1556) عن قتيبة بن سعيد، حدّثنا ليث، عن بكير بن الأشج، عن عياض بن عبد الله، عن أبي سعيد، فذكره.




আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এক ব্যক্তি ফল কিনে ক্ষতিগ্রস্ত হয়, ফলে তার ঋণ অনেক বেড়ে যায়। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা তাকে সাদকা দাও (সাহায্য করো)।" অতঃপর লোকেরা তাকে সাদকা দিল, কিন্তু তা তার ঋণ পরিশোধের জন্য যথেষ্ট হলো না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার পাওনাদারদের বললেন: "তোমরা যা পেয়েছো তা গ্রহণ করো। এর বাইরে তোমাদের আর কিছু প্রাপ্য নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (4136)


4136 - عن قبيصة بن مُخارق الهلاليّ، قال: تَحَمَّلْتُ حَمَالَةً فَأَتَيْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَسْأَلُهُ فِيهَا فَقَالَ:"أَقِمْ حَتَّى تَأْتِيَنَا الصَّدَقَةُ فَنَأْمُرَ لَكَ بِهَا". قَالَ: ثُمَّ قَالَ:"يَا قَبِيصَةُ إِنَّ الْمَسْأَلَةَ لا تَحْلُّ إِلا لأَحَدِ ثَلاثَةٍ: رَجُلٍ تَحَمَّلَ حَمَالَةً فَحَلَّتْ لَهُ الْمَسْأَلَةُ حَتَّى يُصِيبَهَا ثُمَّ يُمْسِكُ، وَرَجُلٌ أَصَابَتْهُ جَائِحَةٌ اجْتَاحَتْ مَالَهُ فَحَلَّتْ لَهُ الْمَسْأَلَةُ حَتَّى يَصِيبَ قِوَامًا مِنْ عَيْشٍ -أَوْ قَالَ سِدَادًا مِنْ عَيْشٍ-، وَرَجُلُ أَصَابَتْهُ فَاقَةٌ حَتَّى يَقُومَ ثَلاثَةٌ مِنْ ذَوِي الْحِجَا مِنْ قَوْمِه لَقَدْ أَصَابَتْ فُلانًا فَاقَةٌ فَحَلَّتْ لَهُ الْمَسْأَلَةُ حَتَّى يُصِيبَ قِوَامًا مِنْ عَيْشٍ -أَوْ قَالَ سِدَادًا مِنْ عَيْشٍ- فَمَا سِوَاهُنَّ مِن الْمَسْأَلَةِ يَا قَبِيصَةُ سُحْتًا يَأْكُلُهَا صَاحِبُهَا سُحْتًا".

صحيح: رواه مسلم في الزكاة (1044) من طرق عن حماد بن زيد، عن هارون بن رياب، حدثني كنانة بن نعيم العدويّ، عن قبيصة بن مخارق الهلالي، فذكره.

ورواه ابن خزيمة (2360) من طريق الأوزاعي، عن هارون بن رباب، وفيه قصة، وفي الأصل سقط.




কুবাইসা ইবনু মুখারিক আল-হিলালী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একটি ঋণের (বা ক্ষতিপূরণের) দায়িত্ব গ্রহণ করেছিলাম। তাই আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট তা (পরিশোধের জন্য সাহায্য) চাইতে এলাম। তিনি বললেন: "তুমি অপেক্ষা করো, যতক্ষণ না আমাদের নিকট যাকাত আসে। এরপর আমি তোমার জন্য তা প্রদান করার নির্দেশ দেব।"

তিনি বলেন: অতঃপর তিনি বললেন: "হে কুবাইসা! চাওয়া বা ভিক্ষা করা কেবল তিন ব্যক্তির জন্য বৈধ:

১. যে ব্যক্তি কোনো ঋণের (বা ক্ষতিপূরণের) দায়িত্ব গ্রহণ করেছে, তার জন্য তা চাওয়া ততক্ষণ পর্যন্ত বৈধ যতক্ষণ না সে তা পরিশোধ করতে পারে। এরপর সে বিরত থাকবে।

২. যে ব্যক্তির সম্পদে কোনো বিপর্যয় (বা দৈব দুর্বিপাক) এসে তাকে গ্রাস করে নিয়েছে (সবকিছু নষ্ট করে দিয়েছে), তার জন্য চাওয়া ততক্ষণ পর্যন্ত বৈধ যতক্ষণ না সে জীবিকা নির্বাহের জন্য পর্যাপ্ত ব্যবস্থা করে নিতে পারে—অথবা তিনি বলেছেন: জীবনের প্রয়োজন মেটানোর মতো ব্যবস্থা করে নিতে পারে।

৩. যে ব্যক্তিকে অভাব-অনটন পেয়ে বসেছে, আর তার সম্প্রদায়ের বিজ্ঞ ও জ্ঞানী ব্যক্তিদের মধ্যে থেকে তিনজন লোক সাক্ষ্য দেয় যে, অমুক ব্যক্তিকে অবশ্যই অভাব গ্রাস করেছে। তার জন্য চাওয়া ততক্ষণ পর্যন্ত বৈধ যতক্ষণ না সে জীবিকা নির্বাহের জন্য পর্যাপ্ত ব্যবস্থা করে নিতে পারে—অথবা তিনি বলেছেন: জীবনের প্রয়োজন মেটানোর মতো ব্যবস্থা করে নিতে পারে।

হে কুবাইসা! এই তিন প্রকার ছাড়া অন্য কোনো কারণে চাওয়া বা ভিক্ষা করা হলো হারাম (সুহ্তান), আর যে তা গ্রহণ করে, সে যেন হারামই গ্রহণ করে।









আল-জামি` আল-কামিল (4137)


4137 - عن عائشة، قالت: وَقَعَتْ جُوَيْرِيَةُ بِنْتُ الْحَارِثِ بْنِ الْمُصْطَلِقِ فِي سَهْمِ ثَابِتِ ابْنِ قَيْسِ بْنِ شَمَّاسٍ -أَو ابْنِ عَمٍّ لَهُ- فَكَاتَبَتْ عَلَى نَفْسِهَا وَكَانَت امْرَأَةً مَلاحَةً تَأْخُذُهَا الْعَيْنُ. قَالَتْ عَائِشَةُ رضي الله عنها: فَجَاءَتْ تَسْأَلُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم فِي
كِتَابَتِهَا فَلَمَّا قَامَتْ عَلَى الْبَابِ فَرَأَيْتُهَا كَرِهْتُ مَكَانَهَا وَعَرَفْتُ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم سَيَرَى مِنْهَا مِثْلَ الَّذِي رَأَيْتُ فَقَالَتْ: يَا رَسُولَ اللهِ! أَنَا جُوَيْرِيَةُ بِنْتُ الْحَارِثِ وَإِنَّمَا كَانَ مِنْ أَمْرِي مَا لا يَخْفَى عَلَيْكَ وَإِنِّي وَقَعْتُ فِي سَهْمِ ثَابِتِ بْنِ قَيْسِ بْنِ شَمَّاسٍ وَإِنِّي كَاتَبْتُ عَلَى نَفْسِي فَجْئْتُكَ أَسْأَلُكَ فِي كِتَابَتِي فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"فَهَلْ لَكِ إِلَى مَا هُوَ خَيْرٌ مِنْهُ؟". قَالَتْ: وَمَا هُوَ يَا رَسُولَ اللهِ؟ قَالَ:"أُؤَدِّي عَنْكِ كِتَابَتَكِ وَأَتَزَوَّجُكِ". قَالَتْ: قَدْ فَعَلْتُ. قَالَتْ فَتَسَامَعَ تَعْنِي النَّاسَ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَدْ تَزَوَّجَ جُوَيْرِيَةَ فَأَرْسَلُوا مَا فِي أَيْدِيهِمْ مِن السَّبْيِ فَأَعْتَقُوهُمْ وَقَالُوا: أَصْهَارُ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَمَا رَأَيْنَا امْرَأَةً كَانَتْ أَعْظَمَ بَرَكَةً عَلَى قَوْمِهَا مِنْهَا أُعْتِقَ فِي سَبَبِهَا مِائَةُ أَهْلِ بَيْتٍ مِنْ بَنِي الْمُصْطَلِقِ.

قَالَ أَبُو دَاوُد هَذَا حُجَّةٌ فِي أَنَّ الْوَلِيَّ هُوَ يُزَوِّجُ نَفْسَهُ.

حسن: رواه أبو داود (3931) عن عبد العزيز بن يحيى أبي الأصبغ الحراني، حدّثنا محمد -يعني ابن سلمة-، عن محمد بن إسحاق، عن محمد بن جعفر بن الزبير، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق وهو مدلس، وقد صرّح بالتحديث في رواية الإمام أحمد (26265) وصحّحه ابن حبان (4054)، والحاكم (4/ 26) كلّهم من طريق ابن إسحاق بإسناده نحوه.

ورواه أيضًا الحاكم من وجه آخر عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن عائشة، نحوه.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হারিস ইবনু মুসতালিকের কন্যা জুয়াইরিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছাবিত ইবনু কাইস ইবনু শাম্মাসের অংশে পড়েছিলেন—অথবা তাঁর (ছাবিতের) কোনো চাচাতো ভাইয়ের অংশে। অতঃপর তিনি নিজেকে মুক্ত করার জন্য চুক্তি (মুকাতাবা) করলেন। আর তিনি ছিলেন এমন এক রূপসী মহিলা, যাঁর দিকে চোখ পড়লে সবার নজর কেড়ে নিত।

আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এলেন তাঁর মুকাতাবার বিষয়ে সাহায্য চাইতে। যখন তিনি দরজায় দাঁড়ালেন, আমি তাঁকে দেখলাম এবং তাঁর অবস্থানকে অপছন্দ করলাম (ঈর্ষান্বিত হলাম)। আমি বুঝতে পারলাম যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর মধ্যে এমন কিছু দেখবেন যা আমি দেখেছি।

অতঃপর তিনি (জুয়াইরিয়া) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি জুয়াইরিয়া বিনতে হারিস, আর আমার বিষয়টি আপনার কাছে গোপন নেই। আমি ছাবিত ইবনু কাইস ইবনু শাম্মাসের ভাগে পড়েছি এবং আমি নিজেকে মুক্ত করার জন্য চুক্তি করেছি। আমি আপনার কাছে আমার চুক্তির বিষয়ে সাহায্য চাইতে এসেছি।

তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি কি এর চেয়ে উত্তম কিছু চাও?" তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! তা কী? তিনি বললেন: "আমি তোমার পক্ষ থেকে তোমার চুক্তির অর্থ পরিশোধ করে দিচ্ছি এবং তোমাকে বিবাহ করছি।" তিনি বললেন: আমি রাজি হলাম।

আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তখন মানুষেরা জানতে পারলো যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জুয়াইরিয়াকে বিবাহ করেছেন। ফলস্বরূপ, তাদের হাতে যেসব বন্দী ছিল, তারা তাদেরকে ছেড়ে দিলেন এবং মুক্ত করে দিলেন। তারা বললো: এরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শ্বশুরকুলের আত্মীয়। আমরা কোনো মহিলাকে তাঁর গোত্রের জন্য তাঁর চেয়ে অধিক বরকতময় দেখিনি। তাঁর কারণে বনী মুসতালিক গোত্রের একশ পরিবারকে মুক্তি দেওয়া হয়েছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (4138)


4138 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تَحِلُّ الصَّدَقَةُ لِغَنِيٍّ إِلا لِخَمْسَةٍ: لِعَامِلٍ عَلَيْهَا، أَوْ لِغَازٍ فِي سَبِيلِ اللهِ، أَوْ لِغَنِيٍّ اشْتَرَاهَا بِمَالِهِ، أَوْ فَقِيرٍ تُصُدِّقَ عَلَيْهِ فَأَهْدَاهَا لِغَنِيٍّ أَوْ غَارِمٍ".

صحيح: رواه أبو داود (1636)، وابن ماجه (1841) -واللّفظ له- كلاهما من حديث عبد الرزاق -وهو في مصنفه (7151) - قال: حدّثنا معمر، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره.

وصحّحه ابن خزيمة (2374)، والحاكم (1/ 407)، وروياه من هذا الوجه. قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين ولم يخرجاه لإرسال مالك بن أنس إياه عن زيد بن أسلم".

ثم رواه من طريق مالك مرسلًا وقال:"هذا ليس من شرطي في خطبة الكتاب، إنه صحيح، قد يرسل مالكٌ في الحديث ويصله ويسنده ثقة، والقول قول الثقة الذي يصله ويسنده" انتهى.

وأما حديث مالك المرسل فقد رواه أيضًا أبو داود (1635) عن عبد الله بن مسلمة (هو
القعنبيّ)، عنه، بإسناده، مثله. وهو في الموطأ في الزكاة (29).

وقد صحَّ هذا الحديث مرسلًا وموصولًا، فإنّ معمر الذي وصله لم يتفرّد به، فقد رواه عبد الرزاق (7152) عن الثوريّ، عن زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، مثله.

فلم يذكر اسم الصّحابي، ولا يضر ذلك، ولعلّه أبو سعيد ولكن من أجل الشّك لم يسمه.

ولكن قال أبو داود:"ورواه ابن عيينة، عن زيد كما قال مالك. ورواه الثّوريّ، عن زيد قال: حدثني الثبت عن النبيّ صلى الله عليه وسلم". فالظاهر منه أنه يرجِّح الإرسال، ولكن رواية الثوريّ التي وصلتْ إلى أبي داود أكانت هكذا؟ أم وقع فيها خطأ ممن قبل الثوريّ، أو كان الثوريّ يروي تارة هكذا، وتارة عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم كما رواه عبد الرزاق، فالغالب أنّ هذا من الثوريّ نفسه، وعلى كلّ فإنّ رواية الثوريّ تقوي رواية معمر الموصولة.

وأشار ابن عبد البر إلى أنّ جماعة من الرواة وصلوا هذا الحديث عن زيد بن أسلم.




আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ধনীর জন্য সাদকা (যাকাত) হালাল নয়, তবে পাঁচ ধরনের ব্যক্তির জন্য হালাল: (১) যে ব্যক্তি সাদকা (যাকাত) সংগ্রহ করার দায়িত্বে নিয়োজিত, (২) অথবা আল্লাহর পথে জিহাদকারী, (৩) অথবা ধনী ব্যক্তি যে তার সম্পদ দ্বারা সাদকার বস্তু ক্রয় করেছে, (৪) অথবা একজন দরিদ্র ব্যক্তি যাকে সাদকা দেওয়া হয়েছে, অতঃপর সে তা কোনো ধনী ব্যক্তিকে হাদিয়া (উপহার) দিয়েছে, (৫) অথবা ঋণগ্রস্ত ব্যক্তি।









আল-জামি` আল-কামিল (4139)


4139 - عن بهز بن حكيم، عن أبيه، عن جدّه، قال: قُلْتُ: يَا رَسُولَ اللهِ! إِنَّا قَوْمٌ نَتَسَاءَلُ أَمْوَالَنَا؟ قَالَ:"يَتَسَاءَلُ الرَّجُلُ فِي الْجَائِحَةِ أَو الْفَتْقِ لِيُصْلِحَ بِهِ بَيْنَ قَوْمِهِ فَإِذَا بَلَغَ أَوْ كَرَبَ اسْتَعَفَّ".

حسن: رواه الإمام أحمد (20033)، وعبد الرزاق (20018) ومن طريقه الطبرانيّ في الكبير (19/ 406) ومن طرق أخرى أيضًا كلّهم من حديث بهز بن حكيم، عن أبيه، عن جدّه، فذكره. قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 100):"رجاله ثقات".

قلت: وهو كما قال، وإسناده حسن من أجل بهز فإنه حسن الحديث.

وقوله:"الفَتْق" وهو الشِّقُّ، والخلاف بين الجماعات وتصدع الكلمة، فيجوز سؤال الرجل ليصلح به بين قومه ما حصل من الجراحات والدّماء.

وأمّا ما رواه أبو داود (1637) من طريق عطية، عن أبي سعيد بلفظ:"لا تحل الصدقة لغني إلا في سبيل الله، أو ابن السبيل، أو جار فقير يتصدّق عليه، فيُهدي لك أو يدعوك". ففيه زيادة"ابن السبيل"، وعطية هو ابن سعد العوفي لا يحتج بحديثه، كما قال المنذريّ.

وفي الباب ما رُوي عن زياد بن الحارث الصُّدائيّ، قال: أَتَيْتُ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَبَايَعْتُهُ -فَذَكَرَ حَدِيثًا طَوِيلا- قَال: فَأَتَاهُ رَجُلٌ فَقَال: أَعْطِنِي مِن الصَّدَقَةِ فَقَالَ لَهُ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"إِنَّ اللهَ تَعَالَى لَمْ يَرْضَ بِحُكْمِ نَبِيٍّ وَلا غَيْرِهِ فِي الصَّدَقَاتِ حَتَّى حَكَمَ فِيهَا هُوَ فَجَزَّأَهَا ثَمَانِيَةَ أَجْزَاءٍ فَإِنْ كُنْتَ مِنْ تِلْكَ الأَجْزَاءِ أَعْطَيْتُكَ حَقَّكَ".

رواه أبو داود (1630) عن عبد الله بن مسلمة، حدّثنا عبد الله -يعني ابن عمر بن غانم-، عن عبد الرحمن بن زياد، أنه سمع زياد بن نُعيم الحضرميّ، أنه سمع زياد بن الحارث الصّدائيّ، فذكره.
وإسناده ضعيف من أجل عبد الرحمن بن زياد وهو الإفريقي ضعيف، ضعّفه النسائي وأحمد،

وقال ابن حبان:"يروي الموضوعات عن الثقات ويدلس".

والراوي عنه عبد الله بن عمر بن غانم الرُّعيني مختلف، فوثقه ابن يونس وغيره، ولم يعرفه أبو حاتم، وأفرط ابن حبان في تضعيفه، وهو من رجال أبي داود.

وفي الباب أيضًا عن أنس أَنَّ رَجُلا مِن الْأَنْصَارِ أَتَى النَّبِيَ صلى الله عليه وسلم يَسْأَلُهُ فَقَالَ:"أَمَا فِي بَيْتِكَ شَيْءٌ؟". قَالَ: بَلَى حِلْسٌ نَلْبَسُ بَعْضَهُ وَنَبْسُطُ بَعْضَهُ وَقَعْبٌ نَشْرَبُ فِيهِ مِن الْمَاءِ. قَالَ:"ائْتِنِي بِهِمَا". قَالَ: فَأَتَاهُ بِهِمَا فَأَخَذَهُمَا رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم بِيَدِهِ وَقَالَ:"مَنْ يَشْتَرِي هَذَيْنِ؟". قَالَ رَجُلٌ: أَنَا آخُذُهُمَا بِدِرْهَمٍ. قَالَ:"مَنْ يَزِيدُ عَلَى دِرْهَمٍ -مَرَّتَيْنِ أَوْ ثَلاثًا-؟". قَالَ رَجُلٌ: أَنَا آخُذُهُمَا بِدِرْهَمَيْنِ فَأَعْطَاهُمَا إِيَّاهُ، وَأَخَذَ الدِّرْهَمَيْنِ وَأَعْطَاهُمَا الأَنْصَارِيَّ وَقَالَ:"اشْتَرِ بِأَحَدِهِمَا طَعَامًا فَانْبِذْهُ إِلَى أَهْلِكَ وَاشْتَرِ بِالْآخَرِ قَدُومًا فَأْتِنِي بِهِ". فَأَتَاهُ بِهِ فَشَدَّ فِيهِ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم عُودًا بِيَدِهِ ثُمَّ قَالَ لَهُ:"اذْهَبْ فَاحْتَطِبْ وَبِعْ وَلا أَرَيَنَّكَ خَمْسَةَ عَشَرَ يَوْمًا". فَذَهَبَ الرَّجُلُ يَحْتَطِبُ وَيَبِيعُ فَجَاءَ وَقَدْ أَصَابَ عَشْرَةَ دَرَاهِمَ فَاشْتَرَى بِبَعْضِها ثَوْبًا وَبِبَعْضِهَا طَعَامًا. فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"هَذَا خَيْرٌ لَكَ مِنْ أَنْ تَجِيءَ الْمَسْأَلَةُ نُكْتَةٌ فِي وَجْهِكَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ؛ إِنَّ الْمَسْأَلَةَ لا تَصْلُحُ إِلا لِثَلاثَةٍ لِذِي فَقْرٍ مُدْقِعٍ أَوْ لِذِي غُرْمٍ مُفْظِعٍ أَوْ لِذِي دَمٍ مُوجِعٍ".

رواه أبو داود (1641)، والترمذي (1218)، والنسائي (4512)، وابن ماجه (2198) كلهم من طريق الأخضر بن عجلان، عن أبي بكر الحنفيّ، عن أنس بن مالك، فذكر الحديث، إلّا النسائي اختصره.

وإسناده ضعيف من أجل أبي بكر وهو عبد الله بن عبد الله الحنفي فإنه مجهول، وبه أعله ابن القطان.

ونقل الحافظ في"تهذيبه" في ترجمة أبي بكر الحنفي عن البخاريّ أنه قال:"لا يصح حديثه"، وذكر البخاريّ في"تاريخ الكبير" (5/ 146) حديث أنس: باع النبيّ صلى الله عليه وسلم فيمن يزيد مختصرًا من طريق أبي بكر، عن أنس، ولم يذكر الحكم عليه. فانظر أين قال البخاري:"لا يصح حديثه".




মু'আবিয়াহ ইবনু হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা এমন এক সম্প্রদায় যারা মানুষের কাছে সম্পদ চেয়ে থাকি (সাহায্যপ্রার্থী হই)।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কোনো লোক কেবল তখনই চাইতে পারে যখন কোনো মহাবিপদ (যেমন, দুর্ভিক্ষ) ঘটে, অথবা (গোষ্ঠীর মধ্যে) ফাটল বা বিচ্ছেদ দেখা দেয়, যাতে সে এর মাধ্যমে তার গোত্রের লোকদের মধ্যে সংশোধন ঘটাতে পারে। অতঃপর যখন সে তার উদ্দেশ্য হাসিল করে ফেলে অথবা প্রায় সফল হয়, তখন সে যেন (মানুষের কাছে চাওয়া থেকে) নিজেকে বিরত রাখে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4140)


4140 - عن * *




৪১৪০ - হতে ***









আল-জামি` আল-কামিল (4141)


4141 - عن أنس بن مالك، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم مرَّ بتمرة في الطّريق، فقال:"لولا أنْ تكونَ من الصَّدَقَةِ لأَكَلْتُهَا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في اللقطة (2431)، ومسلم في الزكاة (1071: 165) كلاهما من طريق منصور، عن طلحة بن مصرّف، ثنا أنس بن مالك، فذكر الحديث.




আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাস্তা দিয়ে যাওয়ার সময় একটি খেজুর দেখতে পেলেন। তখন তিনি বললেন: ‘যদি এই আশঙ্কা না থাকতো যে এটি সাদকার (যাকাতের) মাল, তবে আমি এটি খেয়ে নিতাম’।









আল-জামি` আল-কামিল (4142)


4142 - عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"وَاللهِ! إِنِّي لأَنْقَلِبُ إِلَى أَهْلِي فَأَجِدُ التَّمْرَةَ سَاقِطَةً عَلَى فِرَاشِي أَوْ فِي بَيْتِي فَأَرْفَعُهَا لآكُلَهَا ثُمَّ أَخْشَى أَنْ تَكُونَ صَدَقَةً أَوْ مِن الصَّدَقَةِ فَأُلْقِيهَا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في اللّقطة (2432)، ومسلم في الزكاة (1070: 163) كلاهما من طريق معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث. واللّفظ لمسلم.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহর কসম! আমি আমার পরিবারের কাছে ফিরে আসি, তখন আমার বিছানায় বা আমার ঘরে একটি খেজুর পড়ে থাকতে দেখি। আমি সেটি উঠিয়ে নিই যেন খাই। কিন্তু এরপর আমার আশঙ্কা হয় যে সেটি হয়তো সাদাকা (দান) অথবা সাদাকার অংশ। তাই আমি তা ফেলে দেই।









আল-জামি` আল-কামিল (4143)


4143 - عن أبي هريرة، قال: أَخَذَ الْحَسَنُ بْنُ عَلِيٍّ تَمْرَةً مِنْ تَمْرِ الصَّدَقَةِ فَجَعَلَهَا فِي فِيهِ فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"كِخْ كِخْ ارْمِ بِهَا أَمَا عَلِمْتَ أَنَّا لا نَأْكُلُ الصَّدَقَةَ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1491)، ومسلم في الزكاة (1069) كلاهما من حديث شعبة، عن محمّد بن زياد، سمعت أبا هريرة، فذكره.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদা হাসান ইবনু আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাদাকাহ (যাকাত)-এর খেজুর থেকে একটি খেজুর তুলে মুখে দিলেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কিখ কিখ (দূরে সরাও)! ওটা ফেলে দাও! তুমি কি জানো না যে আমরা সাদাকাহ খাই না?"









আল-জামি` আল-কামিল (4144)


4144 - عن أبي هريرة، قال: كَانَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يُؤْتَى بِالتَّمْرِ عِنْدَ صِرَامِ النَّخْلِ فَيَجِيءُ هَذَا بِتَمْرِهِ وَهَذَا مِنْ تَمْرِهِ حَتَّى يَصِيرَ عِنْدَهُ كَوْمًا مِنْ تَمْرٍ فَجَعَلَ الْحَسَنُ وَالْحُسَيْنُ رضي الله عنهما يَلْعَبَانِ بِذَلِكَ التَّمْرِ فَأَخَذَ أَحَدُهُمَا تَمْرَةً فَجَعَلَهَا فِي فِيهِ فَنَظَرَ إِلَيْهِ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَأَخْرَجَهَا مِنْ فِيهِ فَقَال:"أَمَا عَلِمْتَ أَنَّ آلَ مُحَمَّدٍ صلى الله عليه وسلم لَا يَأْكُلُونَ الصَّدَقَةَ".

صحيح: رواه البخاريّ في الزّكاة (1485) عن عمر بن محمد بن الحسن الأسديّ، حدّثنا أبي، حدّثنا إبراهيم بن طهمان، عن محمد بن زياد، عن أبي هريرة، فذكره. وجاءت قصّة الحسن عن أبي الحوراء، وابن أبي ليلى.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট খেজুর কাটার সময় খেজুর আনা হতো। কেউ তার খেজুর আনতো, আবার কেউ তার খেজুর আনতো, এভাবে তাঁর কাছে খেজুরের স্তূপ জমে যেত। তখন হাসান ও হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই খেজুরগুলো নিয়ে খেলা করতেন। তাদের মধ্যে একজন একটি খেজুর নিয়ে তার মুখে রাখলেন। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তার দিকে তাকিয়ে সেটি তার মুখ থেকে বের করে দিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "তুমি কি জান না যে, মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারবর্গ সাদাকাহ (দান) গ্রহণ করেন না (তা খান না)?"









আল-জামি` আল-কামিল (4145)


4145 - عن أبي الحوراء السّعديّ، قال: قُلْتُ لِلْحَسَنِ بْنِ عَلِيٍّ: مَا تَذْكُرُ مِنْ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم؟ قَالَ: أَذْكُرُ أَنِّي أَخَذْتُ تَمْرَةً مِنْ تَمْرِ الصَّدَقَةِ فَأَلْقَيْتُهَا فِي فِيَّ فَانْتَزَعَهَا رَسُولُ اللهِ
- صلى الله عليه وسلم بِلُعَابِهَا فَأَلْقَاهَا فِي التَّمْرِ فَقَالَ لَهُ رَجُلٌ: مَا عَلَيْكَ لَوْ أَكَلَ هَذِهِ التَّمْرَةَ قَالَ:"إِنَّا لا نَأُكُلُ الصَّدَقَةَ". قَالَ: وَكَانَ يَقُولُ"دَعْ مَا يرِيبُكَ إلَى مَا لا يرِيبُكَ، فَإِنَّ الصِّدْقَ طُمَانِينَةٌ وَإِنَّ الْكَذِبَ رِيبَةٌ". قَالَ: وَكَانَ يُعَلِّمُنَا هَذَا الدُّعَاءَ:"اللَّهُمَّ اهْدِنِي فِيمَنْ هَدْيْتَ، وَعَافِنِي فِيمَنْ عَافيْتَ، وَتَوَلَّنِي فَيمَنْ تَوَلَّيْتَ وَبَارِكْ لِي فِيمَا أَعْطَيْتَ وَقِينِي شَرَّ مَا قَضَيْتَ إِنَّهُ لا يَذِلُّ مَنْ وَالَيْتَ وَرُبَّمَا قَالَ تَبارَكْتَ رَبَّنَا وَتَعَالَيْتَ".

صحيح: رواه الإمام أحمد (1723)، وأبو يعلى (6762)، والطبراني في الكبير (1710) كلهم من حديث شعبة، قال: حدثني بريد بن أبي مريم، عن أبي الحوراء السعديّ، قال (فذكره).

ومن هذا الوجه رواه النسائي (8/ 327)، والترمذي (2518)، مختصرًا جدًّا، وقال:"حسن صحيح".

قلت: إسناده صحيح، صحّحه ابن خزيمة (2347)، وابن حبان (945)، والحاكم (2/ 13، 4/ 99) كلّهم من هذا الوجه غير أنّ منهم من اختصره.

تنبيه: تحرّف في بعض المصادر"يريد" إلى"يزيد".




হাসান ইবন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবু আল-হাওরা আস-সাদী তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ব্যাপারে আপনার কী মনে আছে? তিনি বললেন: আমার মনে আছে যে, আমি সাদকার খেজুর থেকে একটি খেজুর নিয়ে আমার মুখে দিয়েছিলাম। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার মুখের লালাসহ তা বের করে নিয়ে খেজুরগুলোর স্তূপে ফেলে দিলেন। তখন এক ব্যক্তি তাঁকে (নবীকে) বললেন: এই একটি খেজুর খেলে আপনার কী ক্ষতি হতো? তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমরা সাদকার (দান) জিনিস খাই না।"

তিনি আরো বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন, "যা তোমাকে সন্দেহে ফেলে, তা পরিহার করে এমন বস্তুর দিকে যাও যা তোমাকে সন্দেহে ফেলে না। কারণ সত্য হলো প্রশান্তি এবং মিথ্যা হলো সন্দেহ।"

তিনি (হাসান) বললেন: তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে এই দু'আটিও শিক্ষা দিতেন: "হে আল্লাহ! যাদেরকে আপনি হিদায়াত করেছেন, আমাকে তাদের মধ্যে শামিল করে হিদায়াত দান করুন। যাদেরকে আপনি ক্ষমা করেছেন, আমাকে তাদের মধ্যে শামিল করে ক্ষমা করে দিন। যাদের অভিভাবকত্ব আপনি গ্রহণ করেছেন, আমাকে তাদের মধ্যে শামিল করে আমার অভিভাবকত্ব গ্রহণ করুন। আর আপনি আমাকে যা দিয়েছেন, তাতে বরকত দিন। এবং আপনি যে ফয়সালা করেছেন, তার মন্দ থেকে আমাকে রক্ষা করুন। কেননা, আপনি যার অভিভাবক হন, সে কখনো অপদস্থ হয় না।" আর কখনো তিনি বলতেন, "আপনি বরকতময়, হে আমাদের প্রতিপালক, এবং সুমহান।"









আল-জামি` আল-কামিল (4146)


4146 - عن ربيعة بن شيبان قال: قلت للحسين بن علي: ما تعقل عن رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: صعدت غرفة، فأخذت تمرة، فلكتها في فيِّ، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"ألقها؛ فإنها لا تَحِلُّ لنا الصَّدَقَةُ".

حسن: رواه أحمد (1724، 1731) وابن خزيمة (2349) والطحاوي في شرح المعاني (2/ 7) كلهم من حديث ثابت بن عمارة، عن ربيعة بن شيبان، قال: فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في ثابت بن عمارة، فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.




হুসাইন ইবন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাবি'আ ইবন শায়বান বলেন, আমি হুসাইন ইবন আলীকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে আপনি কী কী মনে রেখেছেন? তিনি বললেন: আমি একবার একটি কামরায় উঠলাম, আর একটি খেজুর নিলাম এবং তা আমার মুখে চিবিয়েছিলাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তা ফেলে দাও। কেননা সাদকা (দান) আমাদের (আহলে বাইতের) জন্য হালাল নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (4147)


4147 - عن أبي ليلى، قال: كنتُ عند النبيِّ صلى الله عليه وسلم وعنده الحسن بن علي، فأخذ تمرة من تمر المدينة، فانتزعها منه وقال:"أمَا عَلِمْتَ أنَّهُ لا تَحِلُّ لنا الصَّدَقَةُ".

صحيح: رواه الإمام أحمد (19057)، والطبرانيّ (7/ 90)، والدّارميّ (1643) كلّهم من حديث زهير، عن عبد الله بن عيسى، عن عيسى، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن أبي ليلى، فذكره، واللّفظ للدّارميّ، ولفظهما أطول من هذا. وإسناده صحيح، وعبد الرحمن بن أبي ليلى الكوفي ثقة.

وعزاه الهيثمي في"المجمع" (1/ 284) إلى أحمد والطبراني وقال: رجاله ثقات.




আবূ লায়লা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট ছিলাম এবং তাঁর নিকট হাসান ইবন আলীও ছিলেন। সে (হাসান) মদীনার খেজুর থেকে একটি খেজুর নিল। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার থেকে তা কেড়ে নিলেন এবং বললেন: "তুমি কি জানো না যে, আমাদের জন্য সাদকা (দান) হালাল নয়?"