আল-জামি` আল-কামিল
4148 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، أَنَّ رَسُولَ الله صلى الله عليه وسلم كَانَ نَائِمًا فَوَجَدَ تَمْرَةً تَحْتَ جَنْبِهِ فَأَخَذَهَا فَأَكَلَهَا، ثُمَّ جَعَلَ يَتَضَوَّرُ مِنْ آخِرِ اللَّيْلِ وَفَزِعَ لِذَلِكَ بَعْضُ أَزْوَاجِهِ فَقَالَ:"إِنِّي وَجَدْتُ تَمْرةً تَحْتَ جَنبْيِ فَأَكَلْتُهَا فَخَشِيتُ أَنْ تَكُونَ مِنْ تَمْرِ الصَّدَقَةِ".
حسن: رواه الإمام أحمد (6720) عن أبي بكر الحنفيّ، حدّثنا أسامة بن زيد، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكره.
وإسناده حسن من أجل أسامة بن زيد وهو الليثي، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، روي له مسلم.
وأبو بكر الحنفيّ هو عبد الكبير بن عبد المجيد ثقة من رواة الجماعة.
أورده الهيثميّ في"المجمع" (3/ 89) وقال:"رواه أحمد ورجاله موثقون".
ولا منافاة بين هذا الحديث وحديث أنس المتقدم؛ لأنّ هذا الحديث قد يكون متقدمًا، فلما أكل أقلقه ذلك فتركه بعد ذلك كما في حديث أنس.
وكان أكله صلى الله عليه وسلم مباحًا؛ لأن الأصل ما كان في بيته يكون مباحًا حتى يقوم الدّليل على تحريمه.
وأمّا ما رُوي عن أبي عمير -أو أبي عميرة- قال: كُنَّا جُلُوسًا عِنْدَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمًا فَجَاءَ رَجُلٌ بِطَبَقٍ عَلَيْهِ تَمْرٌ فَقَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"مَا هَذَا أَصَدَقَةٌ أَمْ هَدِيَّةٌ؟". قَالَ: صدقة. قَالَ:"فَقَدِّمْهُ إِلَى الْقَومِ". وَحَسَنٌ يَتَعَفَّرُ بَيْنَ يَدَيْهِ فَأَخَذَ الصَّبِيُّ تَمْرَةً فَجَعَلَهَا فِي فِيهِ فَأَدْخَلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم أُصْبُعَهُ فِي فِي الصَّبِيِّ فَنَزَعَ التَّمْرَةَ فَقَذَفَ بِهَا ثُمَّ قَالَ:"إنَّا آل مُحَمَّدٍ لا تَحِلُّ لَنَا الصَّدَقَةُ".
فقلت لمعرف: أبو عمير جدّك؟ قال: جدّ أبي. ففيه ضعف من أجل الجهالة.
رواه الإمام أحمد (16002، 16003)، والطبراني في الكبير (5/ 76) كلاهما من حديث معرف ابن واصل، قال: حدثني حفصة ابنة طلق امرأة من الحي سنة تسعين، عن أبي عمير، فذكره.
وفيه حفصة ابنة طلق لم يرو عنها غير معرف بن واصل، ولم يوثقها أحد، وأورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 89) وقال: رواه أحمد والطبراني إلّا أن أحمد سماه أسيد بن مالك، وسماه الطبراني رشيد. وفيه حفصة بنت طلق لم يرو عنها غير معرف بن واصل، ولم يوثقها أحد" انتهى.
আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম একবার ঘুমন্ত অবস্থায় ছিলেন। তিনি তাঁর কাত/পাশের নিচে একটি খেজুর পেলেন। তখন তিনি সেটি তুলে নিলেন এবং খেয়ে ফেললেন। এরপর তিনি শেষ রাতে [অস্বস্তি নিয়ে] ছটফট করতে লাগলেন। এতে তাঁর কোনো এক স্ত্রী ভয় পেয়ে গেলেন। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি আমার পাশের নিচে একটি খেজুর পেয়েছিলাম এবং সেটি খেয়ে ফেলেছিলাম। তাই আমি ভয় পাচ্ছি, সেটি হয়তো সাদকার খেজুর ছিল।"
4149 - عن يزيد بن حيّان، قَالَ: انْطَلَقْتُ أَنَا وَحُصَيْنُ بْنُ سَبْرَةَ وَعُمَرُ بْنُ مُسْلِمٍ إِلَى زَيْدِ ابْنِ أَرْقَمَ فَلَمَّا جَلَسْنَا إِلَيْهِ قَالَ لَهُ حُصَيْنٌ لَقَدْ: لَقِيتَ يَا زَيْدً! خَيْرًا كَثِيرًاً، رَأَيْتَ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَسَمِعْتَ حَدِيثَهُ وَغَزَوْتَ مَعَهُ وَصَلَّيْتَ خَلْفَهُ لَقَدْ لَقِيتَ يَا زَيْدُ! خَيْرًا كَثِيرًا حَدِّثْنَا يَا زَيْدُ مَا سَمِعْتَ مِنْ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم، قَال: يَا ابْنَ أَخِي وَالله! لَقْدْ كَبِرَتْ سِنِّي وَقَدُمَ عَهْدِي وَنَسِيتُ بَعْضَ الَّذِي كُنْتُ أَعِي مِنْ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَمَا حَدَّثْكُمْ فَاقْبَلُوا وَمَا لا فَلا تُكَلِّفُونِيِه ثُمَّ قَالَ: قَامَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَوْمًا فِينَا خَطِيبًا بِمَاءٍ يُدْعَى خُمًا بَيْنَ مَكَّةَ وَالْمَدِينَةِ فَحَمِدَ اللهَ وَأَثْنَى عَلَيْهِ وَوَعَظَ وَذَكَّرَ ثُمَّ قَالَ:"أَمَّا بَعْدُ أَلا أَيُّهَا النَّاسُ! فَإِنَّمَا أَنَا بَشَرٌ يُوشِكُ أَنْ يَأْتِيَ رَسُولُ رَبِّي فَأُجِيبَ وَأَنَا تَارِكٌ فِيكُمْ
ثَقَلَيْنِ أَوَّلُهُمَا كِتَابُ اللهِ فِيهِ الْهُدَى وَالنُّورُ فَخُذُوا بِكتَابِ اللهِ واسْتَمْسِكُوا بِهِ". فَحَثَّ عَلَى كِتَابِ اللهِ وَرَغَّبَ فِيهِ ثُمَّ قَالَ:"وَأَهْلُ بَيْتِي أُذَكِّرُكُم اللهِ فِي أَهْلِ بَيْتِي، أُذَكِّرُكُم اللَّهِ فِي أَهْلِ بَيْتِي، أُذَكِّرُكُم اللَّهِ فِي أَهْلِ بَيْتِي". فَقَالَ لَهُ حُصَيْنٌ: وَمَنْ أَهْلُ بَيْتِه يَا زَيْدُ؟ أَلَيْسَ نِسَاؤُهُ مِنْ أَهْلِ بَيْتِهِ؟ قَالَ: نِسَاؤُهُ مِنْ أَهْلِ بَيْتِهِ، وَلَكِنْ أَهْلُ بَيْتِه مَنْ حُرِمَ الصَّدَقَةَ بَعْدَهُ. قَالَ: وَمَنْ هُم؟ قَالَ: هُمْ آلُ عَلِيِّ، وَآلُ عِقيلٍ، وَآلُ جِعْفَرٍ، وَآلُ عَبَّاسٍ. قَالَ: كُلُّ هَؤُلاءِ حُرِمَ الصَّدَقَةَ؟ قَالَ: نَعَمْ.
صحيح: رواه مسلم في فضائل الصّحابة (2408) من طرق، عن إسماعيل بن إبراهيم المعروف بابن علية، حدثني أبو حيان، حدّثني يزيد بن حيان فذكره.
ورواه من وجه آخر عن حسان بن إبراهيم، عن سعيد بن مسروق، عن يزيد بن حبان، عن زيد ابن أرقم، وجاء فيه:"أَلا وَإِنِّي تَارِكٌ فيِكُمْ ثَقَلَيْنِ أَحَدُهُمَا كِتَابُ اللَّهِ عز وجل هُوَ حَبْلُ اللَّهِ مَن اتَّبَعَهُ كَانَ عَلَى الْهُدَى، وَمَنْ تَرَكَهُ كَانَ عَلَى ضَلالَةٍ".
وَفِيهِ فَقُلْنَا: مَنْ أَهْلُ بَيْتِهِ نِسَاؤُهُ؟ قَالَ: لا، وَأيْمُ اللهِ! إِنَّ الْمَرْأَةَ تَكُونُ مَعَ الرَّجُلِ الْعَصْرَ مِن الدَّهْرِ ثُمَّ يُطَلِّقُهَا فَتَرْجِعُ إِلّى أَبِيهَا وَقَوْمِهَا؛ أَهْلُ بَيْتِهِ أَصْلُهُ وَعَصَبَتُهُ الَّذِينَ حُرِمُوا الصَّدَقَةَ بَعْدَهُ.
وقوله:"آل علي، وآل عَقيل، وآل جعفر، وآل عباس" يعني به أولاد عبد المطلب بن هاشم بن عبد مناف.
ولعبد مناف أربعة أولاد وهم: هاشم، ومطلب، وعبد شمس، ونوفل.
واتفق العلماء على تحريم الصّدقة على أولاد بني هاشم، كما اتفقوا على جوازها على بني عبد شمس وبني نوفل ابني عبد مناف.
واختلفوا في بني المطلب بن عبد مناف:
فذهب أبو حنيفة إلى جوازها لهم، وذهب الشافعي إلى تحريمها، وعند أحمد روايتان.
ولعلّ دليل الشافعي هو حديث جبير بن مطعم (ابن عدي بن نوفل بن عبد مناف)، الذي في صحيح البخاري (3140)، قال: مشيتُ أنا وعثمان بن عفّان (ابن أبي العاص بن أمية بن عبد شمس بن عبد مناف) إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلنا: يا رسول الله، أعطيت بني المطلب وتركتنا ونحن وهم عنك بمنزلة واحدة؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:" إنّما بنو المطّلب وبنو هاشم شيءٌ واحد".
واختلف في صدقة التطوّع، فالصّحيح أنّها أيضًا كانت محرّمة على النبيّ صلى الله عليه وسلم؛ لأن اجتنابها كان من دلائل النّبوة وعلاماتها كما جاء في حديث إسلام سلمان الفارسيّ رضي الله عنه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أخبره بأنه يأكل الهدية ولا يأكل الصّدقة، وهو عام في نوعي الصدقة فرضها ونقلها، بخلاف آله فهم في الشّرف دونه فحرم عليهم الفرض دون التّطوّع.
وقد رُوي عن جعفر بن محمّد، عن أبيه،"أنه كان يشرب من سقايات بين مكة والمدينة. قبل له: تشرب من الصّدقة؟ فقال: إنّما حرّمت علينا الصّدقة المفروضة".
ذكره البغويّ في شرح السنة (6/ 103) ولكن فيه إبراهيم بن محمد يرويه عن جعفر بن محمد، ومن طريقه أخرجه البيهقيّ (6/ 183)، وإبراهيم بن محمد متروك.
وقد أجاز بعض المحقّقين من أهل العلم أخذ الصدقة بنوعيها إذا حُرموا من سهم ذوي القربي لعدم وجود الجهاد. انظر للمزيد"المنة الكبرى" (3/ 260).
যায়িদ ইবন আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইয়াযীদ ইবনু হাইয়্যান বলেন: আমি, হুসাইন ইবনু সাবরাহ এবং উমার ইবনু মুসলিম একদা যায়িদ ইবনু আরকাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। যখন আমরা তাঁর কাছে বসলাম, তখন হুসাইন তাঁকে বললেন: হে যায়িদ! আপনি তো অনেক কল্যাণ লাভ করেছেন! আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছেন, তাঁর হাদীস শুনেছেন, তাঁর সাথে যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছেন এবং তাঁর পিছনে সালাত আদায় করেছেন। হে যায়িদ! আপনি সত্যিই অনেক কল্যাণ লাভ করেছেন। হে যায়িদ! আপনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে যা শুনেছেন, তা আমাদেরকে বলুন।
তিনি (যায়িদ) বললেন: হে আমার ভাতিজা! আল্লাহর কসম! আমার বয়স বেশি হয়েছে, আগের দিনের কথা এখন অনেক দূরে চলে গেছে এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে যা আমি মুখস্থ করে রেখেছিলাম, তার কিছু অংশ ভুলে গেছি। সুতরাং আমি তোমাদেরকে যা বলবো তা গ্রহণ করো এবং যা বলবো না, তার জন্য আমাকে কষ্ট দিও না।
অতঃপর তিনি বললেন: একদিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা ও মাদীনার মধ্যবর্তী ‘খুম্ম’ নামক জলাশয়ের কাছে আমাদের মাঝে দাঁড়িয়ে খুতবা দিলেন। তিনি আল্লাহর হামদ ও সানা (প্রশংসা) করলেন, নসীহত করলেন এবং স্মরণ করিয়ে দিলেন। অতঃপর বললেন: “শোনো! হে লোকেরা! আমি তো একজন মানুষ মাত্র। শীঘ্রই আমার রবের দূত (মৃত্যুর ফেরেশতা) আসবেন এবং আমি তাঁর ডাকে সাড়া দেব। আমি তোমাদের মাঝে দুটি ভারী জিনিস (গুরুত্বপূর্ণ আমানত) রেখে যাচ্ছি। এর প্রথমটি হলো আল্লাহর কিতাব। এর মধ্যে রয়েছে হিদায়াত ও নূর। সুতরাং তোমরা আল্লাহর কিতাবকে আঁকড়ে ধরো এবং তা মজবুতভাবে ধরে থাকো।” এরপর তিনি আল্লাহর কিতাবের প্রতি উৎসাহিত করলেন এবং আগ্রহ সৃষ্টি করলেন। অতঃপর বললেন: “আর (দ্বিতীয়টি হলো) আমার আহলে বাইত (পরিবার-পরিজন)। আমি তোমাদেরকে আমার আহলে বাইতের ব্যাপারে আল্লাহর কথা স্মরণ করিয়ে দিচ্ছি। আমি তোমাদেরকে আমার আহলে বাইতের ব্যাপারে আল্লাহর কথা স্মরণ করিয়ে দিচ্ছি। আমি তোমাদেরকে আমার আহলে বাইতের ব্যাপারে আল্লাহর কথা স্মরণ করিয়ে দিচ্ছি।”
হুসাইন তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: হে যায়িদ! তাঁর আহলে বাইত কারা? তাঁর স্ত্রীগণ কি তাঁর আহলে বাইতের অন্তর্ভুক্ত নন? তিনি বললেন: তাঁর স্ত্রীগণও তাঁর আহলে বাইতের অন্তর্ভুক্ত, কিন্তু তাঁর (প্রধান) আহলে বাইত হলেন তারা, যাদের জন্য তাঁর পরে সাদাকাহ (যাকাত) হারাম করা হয়েছে। হুসাইন জিজ্ঞেস করলেন: তারা কারা? তিনি বললেন: তাঁরা হলেন আল-আলী (আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বংশধর), আল-আকীল (আকীল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বংশধর), আল-জা‘ফার (জা‘ফর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বংশধর) এবং আল-আব্বাস (আববাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বংশধর)। হুসাইন জিজ্ঞেস করলেন: এদের সবার জন্য কি সাদাকাহ হারাম করা হয়েছে? তিনি বললেন: হ্যাঁ।
4150 - عن ابن عباس، قال: بعثني أبي إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم في إبلٍ أعطاها إيّاه من الصَّدقة.
صحيح: رواه أبو داود (1653، 1654) بإسنادين: أحدهما عن محمد بن عبيد المحاربيّ، حدّثنا محمد بن فضيل، عن الأعمش، عن حبيب بن أبي ثابت، عن كريب مولى ابن عباس، عن ابن عباس، فذكره.
والثاني: عن محمّد بن العلاء وعثمان بن أبي شيبة، قالا: حدّثنا محمّد -وهو ابن أبي عبيدة-، عن أبيه، عن الأعمش، عن سالم، عن كريب مولى ابن عباس، عن ابن عباس، نحوه وزاد:"أبي يبدلها له". والإسنادان صحيحان، والأعمش روي عن شيخين، ثم هما رويا عن كريب مولي ابن عباس.
معنى الحديث: قال الخطابي:"وهذا لا أدري ما وجهه، والذي لا أشك فيه أن الصّدقة محرّمة على العباس، والمشهور أنه أعطاه من سهم ذوي القربي من الفيء، ويُشبه أن يكون ما أعطاه من إبل الصّدقة، إن ثبت الحديث فضاء عن سلف كان تسلفه منه لأهل الصّدقة، فقد رُوي أنّه شُكي إليه العباس في منع الصّدقة، فقال:"هي عليَّ ومثلها" كأنه كان قد تسلّف منه صدقة عامين، فردّها أو ردّ صدقة أحد العامين عليه لما جاءته من إبل الصّدقة.
فروى الحديث من رواه على الاختصار من غير ذكر السبب فيه، والله أعلم".
وقال البيهقيّ:"هذا الحديث لا يحتمل إلا معنيين: أحدهما أن تكون قبل تحريم الصدقة على بني هاشم، ثم صار منسوخًا، والآخر أن يكون استسلف من العباس للمساكين إيلا ثم ردّها عليه". بذل المجهود (8/ 197).
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার পিতা আমাকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কিছু উটের জন্য পাঠালেন, যা তিনি সাদাকার (যাকাতের) মাল থেকে তাঁকে দিয়েছিলেন।
4151 - عن عبد المطلب بن ربيعة بن الحارث حدَّثه، قال: اجْتَمَعَ رَبِيعَةُ بْنُ الْحَارِثِ وَالْعَبَّاسُ بْنُ عَبْدِ الْمُطَّلِبِ فَقَالا: وَاللهِ! لَوْ بَعَثْنَا هَذَيْنِ الْغُلامَيْنِ قَالا لِي وَلِلْفَضْلِ بْنِ عَبَّاسٍ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَكَلَّمَاهُ فَأَمَّرَهُمَا عَلَى هَذِهِ الصَّدَقَاتِ فَأَدَّيَا مَا يُؤَدِّي النَّاسُ وَأَصَابَا مِمَّا يُصِيبُ النَّاسُ، قَالَ: فَبَيْنَمَا هُمَا فِي ذَلِكَ جَاءَ عَلِيُّ بْنُ أَبِي طَالِبٍ فَوَقَفَ
عَلَيْهمَا فَذَكَرًا لَهُ ذَلِكَ، فَقَالَ عَلِيُّ بْنُ أَبِيِ طَالِبٍ: لا تَفْعَلا فَوَاللَّهِ! مَا هُوَ بِفَاعِلٍ، فَانْتَحَاهُ رَبِيعَةُ بْنُ الْحَارِثِ، فَقَالَ: وَاللَّهِ! مَا تَصْنَعُ هَذَا إِلا نَفَاسَهً مِنْكَ عَلَيْنَا! فَوَاللَّهِ! لَقَدْ نِلْتَ صِهْرَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَمَا نَفِسْنَاهُ عَلَيْكَ! قَالَ عَلِيٌّ: أَرْسِلُوهُمَا فَانْطَلَقَا، وَاضْطَجَعَ عَلِيٌّ قَالَ: فَلَمَّا صَلَّى رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم الظُّهْرَ سَبَقْنَاهُ إِلَى الْحُجْرَةِ فَقُمْنَا عِنْدَهَا حَتَّى جَاءَ فَأَخَذَ بِآذَنِنَا، ثُمَّ قَالَ:"أَخْرِجَا مَا تُصَرِّرَانِ". ثُمَّ دَخَلَ وَدَخَلْنَا عَلَيْهِ، وَهُوَ يَوْمَئِذٍ عِنْدَ زَيْبَبَ بِنْتِ جَحْشٍ. قَالَ: فَتَوَاكَلْنَا الْكَلامَ ثُمَّ تَكَلَّمَ أَحَدُنَا، فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللَّهِ! أَنْتَ أَبَرُّ النَّاسِ وَأَوْصَلُ النَّاسِ، وَقَدْ بَلَغْنَا النِّكَاحَ فَجِئْنَا لِتُؤَمِّرَنَا عَلَى بَعْضِ هَذِهِ الصَّدَقَاتِ فَنُؤَدِّيَ إِلَيْكَ كَمَا يُؤَدِّي النَّاسُ وَنُصِيبَ كَمَا يُصِيبُونَ قَال: فَسَكَتَ طَوِيلا حَتَّى أَرَدْنَا أَنْ نُكَلِّمَهُ. قَال: وَجَعَلَتْ زَيْنَبُ تُلْمِعُ عَلَيْنَا مِنْ وَرَاءِ الْحِجَابِ أَنْ لا تُكَلِّمَاهُ. قَالَ: ثُمَّ قَالَ:"إِنَّ الصَّدَقَةَ لا تَنْبَغِي لآلِ مُحَمَّدٍ؛ إنَّمَا هِيَ أَوْسَاخُ النَّاسِ ادْعُوَا لِي مَحْمِيَةَ -وَكَانَ عَلَى الْخُمُسِ- وَنَوْفَلَ بْنَ الْحَارِثِ بْنِ عَبْدِ الْمُطَّلِب". قَالَ: فَجَاءَاهُ، فَقَالَ لِمَحْمِيَةَ:"أَنْكِحْ هَذَا الْغُلام ابْنَتَكَ". لِلْفَضْلِ بْنِ عَبَّاسٍ فَأَنْكَحَهُ، وَقَالَ لِنَوْفَلِ بْنِ الْحَارِثِ:"أَنْكِحْ هَذَا الْغُلامَ ابْنَتَكَ". لِي فَأَنْكَحَنِي، وَقَالَ لِمَحْمِيَةَ:"أَصْدِقْ عَنْهُمَا مِن الْخُمُسِ كَذَا وَكَذَا".
قَالَ الزُّهْرِيُّ: وَلَمْ يُسَمِّهِ لِي.
صحيح: رواه مسلم في الزكاة (1072) عن عبد الله بن محمد بن أسماء الضُّبعيّ، حدثنا جويرية، عن مالك، عن الزهريّ، أن عبد الله بن عبد الله بن نوفل بن الحارث بن عبد المطلب حدّثه، أن عبد المطلب بن ربيعة بن الحارث حدّثه، فذكره.
هذا الحديث ذكره مالك في كتاب الصدقة (13) بلاغًا، وذكره مسلم من رواية جويرية وهو أبن أسماء الضّبعي البصريّ أحد رواة الموطأ، إلّا أني لم أجد هذا الحديث في الموطآت الموجودة بهذا التفصيل عن مالك إلّا برواية جويرية.
وقد رواه أبو داود (2985)، والنسائي (2609)، وابن خزيمة (2344)، والإمام أحمد (17518) كلهم من طرق عن يونس، عن الزهريّ بإسناده نحوه مطوّلًا ومختصرًا.
فلعلّ مالكًا اختصر هذا الحديث، وحذف منه التفصيل، ولم يدر ذلك جويرية بن أسماء لأنه رجع إلى البصرة، ومات قبل مالك بست سنوات والله أعلم.
قوله:"فانتحاه ربيعة" أي قصده.
وقوله:"أخرجا ما تصرّان" أي ما تجمعان في صدوركما من الكلام.
وقوله:"تُلِمِع" أي تشير بثوبها أو بيدها.
وقول الزهري:"لم يسمّه لي" أي لم يبيّن له شيخه مقدار الصّداق الذي سمّاه لهما رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وفي الحديث دليل على أنّ أهل البيت تحرم عليهم الصدقة سواء كان بسبب العمل أو بسبب الفقر والمسكنة وغيرها من الأسباب الثمانية، وإليه ذهب جمهور أهل العلم منهم: مالك والشافعي وأحمد، وأجاز أبو حنيفة بحجّة أنّ الأجر بمقابل العمل.
وفهم بعض أهل العلم أنّ الحديث بمنع جعل العامل من أهل البيت، والصحيح أنّ الحديث لا يمنع من ذلك، وإنما يمنع من أخذ الأجرة من الزكاة، ولكن لو أُعطوا من غيرها جاز، وقد استعمل علي بن أبي طالب بعض بني العباس على ذلك.
وأمّا ما رُوي عن ابن عباس قال: بَعَثَ نَوْفَلُ بن الْحَارِثِ ابْنَيْهِ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَقَالَ لَهُمَا: انْطَلِقَا إِلَى عَمِّكُمَا لَعَلَّهُ يَسْتَعِينُ بِكُمَا عَلَى الصَّدقَاتِ لَعَلَّكُمَا تُصيانِ شَيْئًا فتزوجانِ فَلَقِيَا عَلِيًّا، فَقَالَ: أَيْنَ تَأُخُذَانِ؟ فَحَدَّثَاهُ بِحاجَتِهما، فَقَالَ لَهُمَا: ارْجِعَا فَرَجَعَا، فَلَمَّا أَمْسَيَا أَمَرَهُمَا أَنْ يَنْطَلِقا إِلَى نَبِيِّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَلَمَّا دَفَعَا إِلَى الْبَابِ اسْتَأُذَنا، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لِعَائِشَةَ:"أَرْخِي عَلَيْكِ سجفَكِ أُدْخِلُ عَلَيَّ ابْنَيْ عَمِّي" فَحَدَّثَا نَبِيَّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بحاجَتِهما، فَقَالَ لَهُمَا نَبِيُّ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"لا يَحِلُّ لَكُمَا أَهْلَ الْبَيْتِ منَ الصَّدَقَاتِ شَيْءٌ، وَلا غُسَالَةُ الأَيْدِيِ إِنَّ لَكُمْ فِي خُمْسِ الْخُمُسِ لِمَا يُغْنيِكُمْ أَوْ يَكْفِيكُمْ". فهو ضعيف جدًّا.
رواه الطبراني في"الكبير" (11/ 217) عن معاذ بن المثي، ثنا مسدد، ثنا معتمر قال: سمعت أبي يحدث عن حنش، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وحنش -بفتح المهملة والنون- هو الحسين بن قيس الرحبيّ ضعيف جدًّا، ضعّفه جمهور أهل العلم. وأورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 91) وعلّله به.
আব্দুল মুত্তালিব ইবনে রাবী'আহ ইবনে আল-হারিথ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাবী'আহ ইবনে আল-হারিথ এবং আব্বাস ইবনে আব্দুল মুত্তালিব একত্রিত হলেন এবং বললেন: আল্লাহর কসম! যদি আমরা এই দুই যুবককে— আমাকে (অর্থাৎ আব্দুল মুত্তালিবকে) এবং ফাদল ইবনে আব্বাসকে— রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে পাঠাতাম, তাহলে তারা তাঁর সাথে কথা বলত। অতঃপর তিনি তাদের এই সাদাকাহ (যাকাত) সংগ্রহের দায়িত্ব দিতেন। ফলে তারা অন্যদের মতো (সাদাকাহ) আদায় করত এবং অন্যদের মতো সম্পদ অর্জন করত।
বর্ণনাকারী বলেন: তারা যখন এই বিষয়ে আলোচনা করছিলেন, তখন আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে তাদের কাছে দাঁড়ালেন। তারা বিষয়টি তাঁকে জানালেন। আলী ইবনে আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা এটি করো না, আল্লাহর কসম! তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এটি করবেন না।
তখন রাবী'আহ ইবনে আল-হারিথ তাঁর (আলী'র) দিকে ফিরে বললেন: আল্লাহর কসম! তুমি আমাদের প্রতি বিদ্বেষবশতই এমনটি বলছ! আল্লাহর কসম! তুমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জামাতা হওয়ার সৌভাগ্য অর্জন করেছ, কিন্তু আমরা তাতে তোমার প্রতি ঈর্ষা করিনি! আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাদের দু'জনকে যেতে দাও। এরপর তারা দু'জন রওনা হলো এবং আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) শুয়ে পড়লেন।
বর্ণনাকারী বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুহরের সালাত আদায় করলেন, আমরা তাঁর হুজরার দিকে তাঁর চেয়ে দ্রুত গেলাম এবং সেখানে দাঁড়িয়ে রইলাম, যতক্ষণ না তিনি এলেন। তিনি এসে আমাদের কান ধরলেন, তারপর বললেন: "তোমরা দু'জন যা গোপন করে রেখেছ, তা বের করো।"
অতঃপর তিনি ভেতরে প্রবেশ করলেন, আর আমরাও তাঁর সাথে প্রবেশ করলাম। সেদিন তিনি যায়নাব বিনতে জাহশের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঘরে ছিলেন। বর্ণনাকারী বলেন: আমরা (কথা বলার দায়িত্ব) একে অপরের ওপর চাপাতে লাগলাম, তারপর আমাদের একজন কথা বলল। সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি মানুষের মধ্যে সর্বাধিক দয়ালু ও আত্মীয়তার বন্ধন রক্ষাকারী। আমরা এখন বিবাহের বয়সে পৌঁছেছি। আমরা আপনার কাছে এসেছি, যেন আপনি আমাদের এই সাদাকাহ (যাকাত) সংগ্রহের কিছু অংশের দায়িত্ব দেন, যাতে আমরাও অন্যদের মতো তা আপনার কাছে পৌঁছে দিতে পারি এবং অন্যদের মতো উপার্জন করতে পারি।
বর্ণনাকারী বলেন: তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দীর্ঘক্ষণ নীরব থাকলেন, এমনকি আমরা প্রায় তাঁকে আবারও কথা বলতে উদ্যত হয়েছিলাম। বর্ণনাকারী বলেন: যায়নাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্দার আড়াল থেকে ইশারায় আমাদের দেখাচ্ছিলেন যে আমরা যেন তাঁর সাথে কথা না বলি। এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বংশধরদের জন্য সাদাকাহ (যাকাত) গ্রহণ করা উচিত নয়; কারণ এটি হলো মানুষের ময়লা। আমার কাছে মাহমিয়াহকে— যিনি খুমুস (গনীমতের এক-পঞ্চমাংশ) বণ্টনের দায়িত্বে ছিলেন— এবং নওফাল ইবনে আল-হারিথ ইবনে আব্দুল মুত্তালিবকে ডেকে আনো।"
বর্ণনাকারী বলেন: তারা দু'জন তাঁর কাছে এলেন। তিনি মাহমিয়াহকে ফাদল ইবনে আব্বাসের দিকে ইশারা করে বললেন: "এই যুবককে তোমার মেয়ের সাথে বিবাহ দাও।" অতঃপর তিনি তার বিবাহ দিলেন। আর আমাকে ইঙ্গিত করে নওফাল ইবনে আল-হারিথকে বললেন: "এই যুবককে তোমার মেয়ের সাথে বিবাহ দাও।" অতঃপর তিনি আমার বিবাহ দিলেন। এরপর তিনি মাহমিয়াহকে বললেন: "খুমুস (এক-পঞ্চমাংশ) থেকে এই দু'জনের মোহর এত এত আদায় করে দাও।"
যুহরি (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: তিনি (তাঁর শাইখ) আমার কাছে এর (মোহরের পরিমাণ) নাম উল্লেখ করেননি।
4152 - عن أبي هريرة، قال: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا أُتِىَ بطِعَامٍ سَأَلَ عَنْهُ أَهَدِيَّةٌ أَمْ صَدَقَةٌ فَإِنْ قِيلَ: صَدَقَةٌ قَال لأَصْحَابِهِ:"كُلُوا". وَلَمْ يَأْكُلْ وَإِنْ قِيلَ: هَدِيَّةٌ ضَرَبَ بِيَدِهِ صلى الله عليه وسلم فَأَكَلَ مَعَهُمْ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الهبة (2576) عن إبراهيم بن المنذر، حدّثنا معن، حدّثني إبراهيم بن طهمان، عن محمد بن زياد، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه مسلم في الزكاة (1077) من وجه آخر عن محمد بن زياد، مختصرًا.
قوله:"إذا أُتي بطعام" أي من غير أهله سأل عنه كما في رواية الإمام أحمد (8014) من طريق حماد بن سلمة، عن محمد بن زياد.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে যখন কোনো খাবার আনা হতো, তিনি তা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতেন—এটা কি হাদিয়া (উপহার) নাকি সাদাকা (দান)? যদি বলা হতো: সাদাকা, তখন তিনি তাঁর সাহাবীগণকে বলতেন: "তোমরা খাও।" কিন্তু তিনি নিজে খেতেন না। আর যদি বলা হতো: হাদিয়া, তখন তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাত দিয়ে তা গ্রহণ করতেন এবং তাদের সাথে খেতেন।
4153 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لَوْ دُعِتُ إِلَى كُراعٍ لأَجَبْتُ وَلَوْ
أُهْدِيَ إِلَيَّ كُرَاعٌ لَقَبِلْتُ".
صحيح: رواه البخاريّ في النكاح (5178) عن عبدان، عن أبي حمزة، عن الأعمش، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যদি আমাকে (একটি পশুর) খুর (রান্না করা মাংস) খাওয়ার জন্য দাওয়াত করা হয়, তবে আমি তা কবুল করব। আর যদি আমাকে একটি খুরও হাদিয়া দেওয়া হয়, তবে আমি তা গ্রহণ করব।"
4154 - عن عائشة، قالت: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقْبَلُ الْهَدِيَّةَ وَيُثِيبُ عَلَيْهَا.
صحيح: رواه البخاريّ في الهبة (2585) عن مسدّد، حدّثنا عيسى بن يونس، عن هشام، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাদিয়া (উপহার) গ্রহণ করতেন এবং তার বিনিময়ে প্রতিদান দিতেন।
4155 - عن بهز بن حكيم، عن أبيه، عن جده، قال: كَانَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِذَا أُتِيَ بِشَيْءٍ سَأَلَ:"أَصَدَقَةٌ هِيَ أَمْ هَدِيَّةٌ؟" فَإِنْ قَالُوا: صَدَقَةٌ، لَمْ يَأُكُلْ وَإِنْ قَالُوا: هَدِيَّةٌ، أَكَلَ.
حسن: رواه الترمذي (656)، والنسائيّ (2614) كلاهما من حديث بهز بن حكيم، عن أبيه، عن جدّه، فذكره.
قال الترمذي: حديث بهز بن حكيم حديث حسن غريب.
وقال:"جدّ بهز بن حكيم اسمه معاوية بن حيدة القشيريّ". انتهى.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (20054) وفيه:" فإن قالوا: هدية بسط يده، وإن قالوا: صدقة، قال لأصحابه:"خذوا".
قلت: وإسناده حسن كما قال الترمذي؛ لأنّ بهزًا وأباه حكيمًا صدوقان.
মু'আবিয়াহ ইবনু হাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যখন কোনো কিছু দেওয়া হতো, তখন তিনি জিজ্ঞাসা করতেন: “এটা কি সাদাকা নাকি হাদিয়া (উপহার)?” যদি তারা বলত: “সাদাকা”, তবে তিনি খেতেন না। আর যদি তারা বলত: “হাদিয়া (উপহার)”, তবে তিনি তা খেতেন।
4156 - عن سلمان الفارسيّ، قال: كُنْتُ مِنْ أَبْنَاءِ أَسَاوِرَةِ فَارِسَ -فَذَكَرَ الْحَدِيثَ- قَالَ: فَانْطَلَقْتُ تَرْفَعُنِي أَرْضٌ وَتَخْفِضُنِي أُخْرَى حَتَّى مَرَرْتُ عَلَى قَوْمٍ مِنَ الأَعْرَابِ فَاسْتَعْبَدُونِي فَبَاعُونِي حَتَّى اشْتَرَتْنِي امْرَأَةٌ فَسَمِعُتُهمْ يَذْكُرُونَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم وَكَانَ الْعَيْشُ عَزِيزًا فَقُلْتُ لَهَا: هَبِي لِي يَوْمًا فَقَالَتْ: نَعَمْ، فَانْطَلَقْتُ فَاحْتَطَبْتُ خَطَبًا فَبِعْتُهُ فَصَنَعْتُ طَعَامًا فَأَتَيْتُ بِهِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَوَضَعْتُهُ بَيْنَ يَدَيْهِ فَقَالَ:"مَا هَذَا؟". فَقُلْتُ: صَدَقَةٌ. فَقَالَ لأَصْحَابِهِ:"كُلُوا". وَلَمْ يَأْكُلْ، قُلْتُ: هَذِهِ مِنْ عَلامَاتِهِ، ثُمَّ مَكَثْتُ مَا شَاءَ اللَّهُ أَنْ أَمْكُثَ فَقُلْتُ: لِمَولاتِي هَبي لِي يَوْمًا. قَالَتْ: نَعَمْ، فَانْطَلَقْتُ فَاحْتَطَبْتُ حَطَبًا بِأَكْثَرَ مِنْ ذَلِكَ فَصَنَعْتُ طَعَامًا فَأَتَيْتُهُ بِهِ، وَهُوَ جَالِسٌ بَيْنَ أَصْحَابِهِ فَوَضَعْتُهُ بَيْنَ يَدَيْهِ فَقَالَ:"مَا هَذَا؟". قُلْتُ: هَدِيَّةٌ فَوَضَعَ يَدَهُ وَقَالَ لأَصْحَابِهِ:"خُذُوا بِسْمِ اللَّهِ". وَقُمْتُ خَلْفَهُ فَوَضَعَ رِدَاءَهُ فَإِذَا خَاتَمُ النُّبُوَّةِ، فَقُلْتُ: أَشْهَدُ أَنَّكَ رَسُولُ اللَّهِ. فَقَالَ:"وَمَا ذَاكَ؟". فَحَدَّثْتُهُ عَن الرَّجُلِ وَقُلْتُ: أَيَدْخُلُ الْجَنَّةَ يَا رَسُولَ اللَّهِ فَإِنَّهُ حَدَّثَنِي أَنَّكَ نَبِيٌّ؟ فَقَالَ:"لَنْ يَدْخُلَ الْجَنَّةَ إِلا نَفْسٌ مُسْلِمَةٌ". فَقُلْتُ: يَا رَسُولَ اللَّهِ! إِنَّهُ أَخْبَرَنِي أَنَّكَ نَبِيٌّ
أَيَدْخُلُ الْجَنَّةَ؟ قَالَ:"لَنْ يَدْخُلَ الْجَنَّةَ إِلا نَفْسٌ مُسْلِمَةٌ".
حسن: رواه الإمام أحمد (23712)، والطبراني في الكبير (6/ 259) كلاهما من حديث إسرائيل، حدّثنا أبو إسحاق، عن أبي قرة الكنديّ، عن سلمان الفارسيّ، فذكره. وصحّحه ابن حبان (7124).
قلت: إسناده حسن، فإن أبا قرة الكندي الذي لا يعرف اسمه وثقه ابن حبان وذكره في ثقات التابعين، وكان معروفًا عند ابن سعد، فقال في طبقاته (6/ 148):"كان قاضيًا بالكوفة، واسمه فلان ابن سلمة، روى عن عمر بن الخطاب، وسلمان وحذيفة بن اليمان، وكان معروفًا قليل الحديث".
وذكره أيضًا أصحاب التراجم والسير، وأخرجه الحاكم (4/ 108) من طريقه مختصرًا، وقال:"صحيح الإسناد".
ثم هو لم ينفرد في سرد هذه القصة مختصرًا ومطوّلًا. فقد تابعه أبو الطفيل عند أحمد (23704)، والطبراني في الكبير (6071) ولكن في طريقه إليه شريك وهو ابن عبد الله النخعيّ سيء الحفظ.
وتابعه أيضًا أبو عثمان النهديّ عند الطبراني (6121)، وبريدة الأسلمي عنده أيضًا (6070) كلهم عن سلمان.
وهذه القصة رُويتْ من طرق أخرى حسنة.
منها: ما رواه أحمد (23737)، والبزار في مسنده (2499، 2500)، والطبراني في الكبير (6065)، وابن سعد في الطبقات (4/ 75 - 80) كلهم من طرق عن محمد بن إسحاق، قال: حدثني عاصم بن عمر بن قتادة الأنصاريّ، عن محمود بن لبيد، عن عبد الله بن عباس، حدّثني سلمان الفارسيّ حديثه من فيه، فقال: فذكر القصة أطول مما هنا. وابن إسحاق مدلس إلّا أنه صرَّح بالتحديث.
وأمّا ما رُوي عن عبد الرحمن بن علقمة الثقفيّ، قال: قَدِمَ وَفْدُ ثَقِيفٍ عَلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَمَعَهُمْ هَدِيَّةٌ فَقَالَ:"أَهَدِيَّة أَمْ صَدَقَة؟" فَإِنْ كَانَتْ هَدِيَّةٌ فَإِنَّمَا يُبْتَغَي بِهَا وَجْهُ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَقَضَاءُ الْحَاجَةِ وَإِنْ كَانَتْ صَدَقَةٌ فَإِنَّمَا يُبْتَغَى بِهَا وَجْهُ اللَّهِ عز وجل". قَالُوا: لا بَلْ هَدِيَّةٌ فَقَبِلَهَا مِنْهُمْ وَقَعَدَ مَعَهُمْ يُسَائِلُهُمْ وَيُسَائِلُونَهُ حَتَّى صَلَّى الظُّهْرَ مَعَ الْعَصْرِ. ففيه رجل مجهول.
رواه النسائيّ (3758) عن هناد بن السريّ، قال: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن يحيى بن أبي هانى، عن أبي حذيفة، عن عبد الله بن معن بن بشير، عن عبد الرحمن بن علقمة، فذكره.
وأبو حذيفة غير منسوب شيخ ليحيى بن هانئ"مجهول".
ومن هذا الوجه رواه أيضًا ابن أبي شيبة (5/ 230)، والبخاري في التاريخ الكبير (5/ 251)، والعقيلي في الضعفاء (3/ 33) في ترجمة عبد الملك بن محمد بن بشر، وقال:"ولا يتابع عليه، ولا يعرف إلا به".
সালমান আল-ফারসী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি পারস্যের 'আসাওয়িরাহ' (অভিজাত/সর্দার) বংশের সন্তান ছিলাম। -এরপর তিনি হাদীসটি বর্ণনা করেন- তিনি বলেন: এরপর আমি যাত্রা শুরু করলাম। এক ভূমি থেকে অন্য ভূমিতে ঘুরতে থাকলাম। অবশেষে আমি বেদুঈনদের একটি গোত্রের কাছ দিয়ে যাচ্ছিলাম। তারা আমাকে দাস বানিয়ে বিক্রি করে দিল। শেষ পর্যন্ত একজন মহিলা আমাকে কিনে নিলেন।
আমি তাদেরকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আলোচনা করতে শুনলাম। তখন জীবিকা নির্বাহ করা খুবই কঠিন ছিল। আমি তাকে (আমার মনিব মহিলাকে) বললাম: আমাকে একদিনের জন্য ছুটি দিন। তিনি বললেন: ঠিক আছে। এরপর আমি গেলাম, কাঠ সংগ্রহ করলাম, তা বিক্রি করলাম এবং সেই অর্থে খাবার তৈরি করলাম। আমি তা নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম এবং তাঁর সামনে রাখলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "এটা কী?" আমি বললাম: সাদাকা (দান)। তিনি তাঁর সাহাবীদেরকে বললেন: "তোমরা খাও।" কিন্তু তিনি নিজে খেলেন না। আমি মনে মনে বললাম: এটি তাঁর (নবুয়তের) অন্যতম নিদর্শন।
এরপর আল্লাহ্ যতদিন চাইলেন আমি ততদিন সেখানে থাকলাম। আমি আমার মনিবকে বললাম: আমাকে একদিনের জন্য ছুটি দিন। তিনি বললেন: ঠিক আছে। আমি গেলাম, তার আগের বারের চেয়েও বেশি কাঠ সংগ্রহ করলাম এবং তা বিক্রি করে খাবার তৈরি করলাম। আমি তা নিয়ে তাঁর কাছে আসলাম। তিনি তখন তাঁর সাহাবীদের সাথে বসে ছিলেন। আমি তা তাঁর সামনে রাখলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "এটা কী?" আমি বললাম: হাদিয়া (উপহার)।
তিনি তাঁর হাত রাখলেন এবং সাহাবীদেরকে বললেন: "বিসমিল্লাহ বলে ধরো (এবং খাও)।" আমি তাঁর পেছনে দাঁড়ালাম। তিনি তাঁর চাদর সরিয়ে দিলেন, আর তখনই আমি নবুয়তের মোহর (খাতামুন নুবুওয়াহ) দেখতে পেলাম। তখন আমি বললাম: আমি সাক্ষ্য দিচ্ছি যে আপনি আল্লাহর রাসূল।
তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "সেটা কী?" তখন আমি তাঁকে সেই লোকটির (যিনি আমাকে ইসলাম সম্পর্কে বলেছিলেন) কথা বললাম এবং জিজ্ঞেস করলাম: হে আল্লাহর রাসূল! সে কি জান্নাতে যাবে? কারণ সে আমাকে জানিয়েছিল যে আপনি একজন নবী। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মুসলিম (আত্মসমর্পণকারী) ব্যক্তি ছাড়া কেউ জান্নাতে প্রবেশ করবে না।" আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! সে আমাকে জানিয়েছে যে আপনি একজন নবী। সে কি জান্নাতে যাবে? তিনি বললেন: "মুসলিম (আত্মসমর্পণকারী) ব্যক্তি ছাড়া কেউ জান্নাতে প্রবেশ করবে না।"
4157 - عن أمِّ عطيّة، قالت: بَعَثَ إِلَيَّ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِشَاةٍ منِ الصَّدَقَةِ فَبَعَثْتُ إِلَى عَائِشَةَ مِنْهَا بِشَيْءٍ، فَلَمَّا جَاءَ رَسُولُ اللَّهِ إِلَى عَائِشَةَ قَالَ:"هَلْ عِنْدَكُمْ شَيْءٌ؟". قَالَتْ: لا إِلا أَنَّ نُسَيْبَةَ بَعَثَتْ إِلَيْنَا مِن الشَّاةِ الَّتِي بَعَثْتُمْ بِهَا إِلَيْهَا، قَالَ:"إِنَّهَا قَدْ بَلَغَتْ مَحِلَّهَا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1446)، ومسلم في الزكاة (1076) كلاهما من طريق خالد، عن حفصة بنت سيرين، عن أمّ عطية، فذكرته. واللفظ لمسلم.
উম্মে আতিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাদকার একটি বকরী আমার কাছে পাঠিয়েছিলেন। অতঃপর আমি তা থেকে কিছুটা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পাঠালাম। এরপর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে আসলেন, তখন তিনি বললেন: "তোমাদের কাছে কি (খাবারের) কিছু আছে?" তিনি (আয়েশা) বললেন: না, তবে নুসাইবাহ আমাদের কাছে সেই বকরী থেকে কিছু পাঠিয়েছেন যা আপনি তার কাছে পাঠিয়েছিলেন। তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই সেটি তার গন্তব্যে পৌঁছে গেছে।"
4158 - عن عائشة، قالت: كَانَ فِي بَريرَةَ ثَلاثُ سُنَنٍ، فَكَانَتْ إِحْدَى السُّنَن الثَّلاثِ: أَنَّهَا أُعْتِقَتْ فَخُيِّرَتْ فِي زَوْجِهَا، وَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"الْوَلاءُ لِمَنْ أَعْتَقَ". وَدَخَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم وَالْبُرْمَةُ تَفُورُ بِلَحْمٍ فَقرُبَ إِلَيْهِ خُبْزٌ وَأُدْمٌ مِنْ أُدْمِ الْبَيْتِ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"أَلَمْ أَرَ بُرْمَةً فِيهَا لَحْمٌ؟". فَقَالُوا: بَلَي يَا رَسُولُ اللَّهِ! وَلَكِنْ ذَلِكَ لَحْمٌ تُصُدِّقَ بِهِ عَلَى بَرِيرَةَ وَأَنْتَ لا تَأُكُلُ الصَّدَقَةَ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"هُوَ عَلَيْهَا صَدَقَةٌ وَهُوَ لَنَا هَدِيَّةٌ".
متفق عليه: رواه مالك في الطّلاق (29) عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن القاسم بن محمد، عن عائشة أمّ المؤمنين أنها قالت (فذكرته).
ورواه البخاري في الطلاق (5279)، ومسلم في الزكاة (1075: 173) كلاهما من طريق مالك، به، نحوه، غير أن مسلما اختصره على الهدية، وأحال اللفظ الذي ذكره من وجه آخر عن القاسم.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বারিরাহ-এর (মুক্তির) সাথে তিনটি সুন্নাহ (বিধান) সম্পর্কিত ছিল। সেই তিন বিধানের একটি হলো: তাকে মুক্ত করার পর তার স্বামীর ব্যাপারে তাকে এখতিয়ার দেওয়া হয়েছিল। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ওয়ালা (অভিভাবকত্ব) তার জন্য, যে মুক্ত করে।" আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘরে প্রবেশ করলেন, তখন একটি ডেগে গোশত ফুটছিল। অতঃপর তাঁর নিকট রুটি ও ঘরের সাধারণ তরকারি পেশ করা হলো। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি কি ডেগের মধ্যে গোশত দেখলাম না?" তারা বলল: হ্যাঁ, ইয়া রাসূলাল্লাহ! কিন্তু ঐ গোশত বারিরাহ-কে সাদকা (দান) করা হয়েছে, আর আপনি সাদকা খান না। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তা বারিরাহ-এর জন্য সাদকা, আর তা আমাদের জন্য হাদিয়া (উপহার)।"
4159 - عن عائشة، أَنَّهَا أَرَادَتْ أَنْ تَشْتَرِيَ بَرِيرَةَ لِلْعِتْقِ وَأَرَادَ مَوَالِيها أَنْ يَشْتَرطُوا وَلاءَهَا فَذَكَرَتْ عَائِشَةُ لِلنَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ لَهَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"اشْتَريِهَا فَإِنَّمَا الْؤَلاءُ لِمَنْ أَعْتَقَ". قَالَتْ: وَأُتِيَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بِلَحْمٍ فَقُلْتُ: هَذَا مَا تُصُدِّقَ بِهِ عَلَى بَرِيرَةَ فَقَالَ:"هُوَ لَهَا صَدَقَةٌ وَلَنَا هَدِيَّةٌ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1493)، ومسلم في الزكاة (1075) كلاهما من طريق شعبة، عن الحكم، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، فذكرته. واللفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم مختصر، وفيه تعيين اللّحم بأنه لحم بقر.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তিনি (আয়িশা) বারীরাকে মুক্ত করার উদ্দেশ্যে ক্রয় করতে চাইলেন। কিন্তু তার (বারীরার) মনিবরা তাদের আনুগত্যের শর্ত (আল-ওয়ালা) আরোপ করতে চাইল। তখন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বিষয়টি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উল্লেখ করলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "তুমি তাকে ক্রয় করে নাও। কেননা আল-ওয়ালা (আনুগত্য ও উত্তরাধিকারের অধিকার) তো সেই ব্যক্তির জন্য, যে মুক্ত করে।" তিনি (আয়িশা) বললেন: এরপর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কিছু গোশত আনা হলো। আমি বললাম: এই গোশত বারীরাকে সদকা (দান) করা হয়েছে। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটা বারীরার জন্য সদকা এবং আমাদের জন্য হাদিয়া (উপহার)।"
4160 - عن أنس بن مالك قال: أهدتْ بريرةُ إلى النبي صلى الله عليه وسلم لحمًا تُصُدِّقَ بِهِ عَلَى بَرِيرَةَ فَقَالَ:"هُوَ لَهَا صَدَقَةٌ وَلَنَا هَدِيَّةٌ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1495)، ومسلم في الزكاة (1074) كلاهما من طريق
شعبة، عن قتادة، عن أنس، فذكر الحديث.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: বারীরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট কিছু গোশত হাদিয়া হিসেবে পেশ করলেন, যা বারীরাহকে সাদকা হিসেবে দেওয়া হয়েছিল। অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটা তার জন্য সাদকা, আর আমাদের জন্য হাদিয়া।"
4161 - عن جويرية زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ دَخَلَ عَلَيْهَا فَقَالَ:"هَلْ مِنْ طَعَامٍ؟". قَالَتْ: لا وَاللَّهِ يَا رَسُولَ اللَّهِ! مَا عِنْدَنَا طَعَامٌ إِلا عَظْمٌ مِنْ شَاةٍ أُعْطِيَتْهُ مَوْلاتِي مِن الصَّدَقَةِ. فَقَالَ:"قَرِّبِيهِ فَقَدْ بَلَغتْ مَحِلَّهَا".
صحيح: رواه مسلم في الزكاة (1073) من طرق، عن الليث، عن ابن شهاب، ، أنّ عبيد بن السباق، قال: إنّ جويرية زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أخبرته … فذكرت الحديث.
قوله:"بلغت محِلّها" قال النووي: هو بكسر الحاء، أي زال عنها حكم الصدقة وصارت حلالا لنا.
জুওয়াইরিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন এবং জিজ্ঞাসা করলেন, "খাবার কিছু আছে কি?" তিনি বললেন, "না, আল্লাহর কসম, হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের কাছে কোনো খাবার নেই, তবে একটি বকরির হাড় আছে যা আমার দাসী/মুক্তিপ্রাপ্তা সদকা হিসেবে পেয়েছে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তা নিয়ে আসো। কারণ, তা তার গন্তব্যে পৌঁছে গেছে।"
4162 - عن أبي رافع، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم بَعَثَ رَجُلًا على الصَّدَقَةِ مِنْ بَنِي مَخْزُوم فَقَالَ لأَبِيِ رَافِع: اصْحَبْنِي فَإِنَّكَ تُصِيُب مِنْهَا. قَال: حَتَّي آتِيَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَأَسْأَلَهُ فَأَتَاهُ فَسَأَلَهُ، فَقالَ:"مَوْلَى الْقَوْمِ مِنْ أَنْفُسِهِمْ وَإِنَّا لا تَحِلُّ لَنَا الصَّدَقَةُ".
صحيح: رواه أبو داود (1650)، والترمذيّ (657)، والنسائيّ (2613) كلّهم من طرق عن شعبة، عن الحكم، عن ابن أبي رافع، عن أبي رافع، فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح، وأبو رافع مولى النبيّ صلى الله عليه وسلم اسمه أسلم، وابن أبي رافع هو عبيدالله بن أبي رافع كاتب علي بن أبي طالب رضي الله عنه" انتهي.
والحكم هو ابن عتيبة أبو محمد الكنديّ من رجال الجماعة وصحّحه ابن خزيمة (2344)، وابن حبان (3293)، والحاكم (1/ 404).
ورواه الإمام أحمد (23872)، والبيهقي (7/ 32) كلّهم من هذا الوجه.
قلت: وهذا الرجل الذي بعثه النبيّ صلى الله عليه وسلم ساعيًا هو الأرقم بن أبي الأرقم القرشيّ -وكان اسمه عبد مناف بن أسد بن عبد الله بن عمر بن مخزوم-، وأنه أسلم وكان سابع سبعة، وكانت داره على الصّفا، وهي الدّار التي كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يجلس فيها مع أصحابه في أوّل الأمر.
وأما ما رواه أبو يعلى (3/ 162)، والطبراني (11/ 379)، والبيهقي (7/ 32) كلّهم من طريق ابن أبي ليلى، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، قال: استعمل أرقم الزهريّ على الصدقات، فاستتبع أبا رافع، فأتي رسول الله صلى الله عليه وسلم فسأله فقال (فذكر الحديث).
فقال البيهقي:"رواية شعبة عن الحكم أولي من رواية ابن أبي ليلى، هذا كان سيء الحفظ كثير الوهم".
واسم والده عبد يغوث بن وهب بن عبد مناف، ولكن الذي بعثه النبي صلى الله عليه وسلم على السعاية هو الأرقم بن أبي الأرقم المخزوميّ؛ لأنّ رواية شعبة كما قال البيهقيّ أصح من رواية ابن أبي ليلى، وكذا أكّده أيضًا الحافظ في الإصابة في ترجمة الأرقم بن أبي الأرقم المخزوميّ.
আবু রাফে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু মাখযূম গোত্রের এক ব্যক্তিকে সাদাকা (যাকাত) সংগ্রহের জন্য প্রেরণ করলেন। সে (ওই ব্যক্তি) আবু রাফে'কে বলল: তুমি আমার সাথে চলো, তবে তুমিও তা থেকে কিছু লাভ করতে পারবে। তিনি (আবু রাফে') বললেন: যতক্ষণ না আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যাই এবং তাঁকে জিজ্ঞাসা করি। অতএব, তিনি তাঁর কাছে গেলেন এবং তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন তিনি বললেন: "কোনো সম্প্রদায়ের (গোত্রের) মুক্ত দাস তাদেরই অংশ। আর নিশ্চয়ই আমাদের জন্য সাদাকা (যাকাত) হালাল নয়।"
4163 - عن مَيْمُون أَوْ مِهْرَانَ مَوْلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَخْبَرَنِي أَنَّهُ مَرَّ عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ لَهُ:"يَا مَيْمُونُ أَوْ يَا مِهْرانُ! إِنَّا أَهْلُ بَيْتٍ نُهِينَا عَن الصَّدَقَةِ وَإِنَّ مَوَالِيَنَا مَنْ أَنْفُسِنَا وَلا نَأْكُلُ الصَّدقَةَ".
حسن: رواه الإمام أحمد (16399) عن عبد الرزاق، وهو في مصنفه (6942) وعنه الطبراني أيضًا في الكبير 20/ (836) عن سفيان، عن عطاء بن السائب، قال: حدّثتني أمّ كلثوم ابنة علي، قال: أتيتها بصدقة كان أمر بها، قالت: احذر شبابنا، فإن ميمونا أو مهران، فذكره.
وإسناده حسن من أجل أم كلثوم بنت علي بن أبي طالب، لم يرو عنها غير عطاء بن السائب، وأما عطاء بن السائب فهو مختلط، ولكن روى عنه سفيان -وهو الثوري- قبل الاختلاط.
وأورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 89)، وعزاه أحمد والطبراني وقال:"أم كلثوم لم أر من روى عنها غير عطاء بن السائب، وفيه كلام".
قلت: أمّ كلثوم بنت علي بن أبي طالب هي الصغرى، ولعلي بن أبي طالب بنت أخرى يقال لها أمّ كلثوم وهي الكبرى، أمها فاطمة بنت النبيّ صلى الله عليه وسلم، وتزوّجها عمر فولدت له، والصغرى عمّرت وسمع منها عطاء بن السائب، وأمها أمّ ولد، ذكرها ابن سعد. كذا في"التعجيل".
فكأنّها كانت معروفة عندهم إلّا أنّها لم تشتهر في رواية الحديث.
قال بظاهر هذا الحديث من لم يُبح لموالي بني هاشم الزكاة المفروضة، وذهب جمهور أهل العلم إلى أن الزكاة تجوز لهم؛ لأنه لا حظّ لهم في سهم ذوي القربى، وإنما نهى النبيّ صلى الله عليه وسلم أبا رافع تنزيها له.
وقوله:"مولي القوم من أنفسهم" في الاقتداء بهم، والأخذ بسيرتهم في الاجتناب عما يجتنبون عنه، ويشبه أن يكون النبيّ صلى الله عليه وسلم يكفيه المؤونة، إذ كان أبو رافع يتصرّف له في الحاجة والخدمة، فقال له هذا المعنى: إذا كنت تستغني بما أُعطيت فلا تطلب أوساخ الناس، فإنك مولانا ومنا".
انظر"شرح السُّنة" (6/ 103).
মায়মুন বা মিহরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুক্ত করা গোলাম (মাওলা), তিনি আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি একবার নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন তিনি তাঁকে বললেন: "হে মায়মুন অথবা হে মিহরান! নিশ্চয়ই আমরা এমন এক আহলে বাইত (পরিবার) যাদের জন্য সাদাকা (যাকাত) গ্রহণ করা নিষিদ্ধ করা হয়েছে। আর আমাদের মুক্ত করা গোলামেরা (মাওয়ালী) আমাদেরই অন্তর্ভুক্ত, তাই আমরা সাদাকা ভক্ষণ করি না।"
4164 - عن * *
৪১৬৪ - থেকে বর্ণিত...
4165 - عن عبد الله بن عمر، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَرَضَ زَكَاةَ الْفِطْرِ صَاعًا مِنْ تَمْرٍ، أَوْ صَاعًا مِنْ شَعِيرٍ عَلَى كُلِّ حُرٍّ أَوْ عَبْدٍ ذَكَرٍ أَوْ أُنْثَى مِن الْمُسْلِمِينَ.
متفق عليه: رواه مالك في الزكاة (52) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره.
ورواه البخاريّ في الزكاة (1504)، ومسلم في الزكاة (984) كلاهما من طريق مالك، به.
قوله:"من المسلمين" قال بعض أهل العلم قديما أن مالكا تفرد بهذه الزيادة دون أصحاب نافع.
قلت: بل تابعه ثقتان أحدهما: عمر بن نافع، عن أبيه نافع، وحديثه عند البخاري في صحيحه (1503).
والثاني: الضحاك بن عثمان، عن نافع، وحديثه عند مسلم (984: 16).
أخذ بظاهر الحديث مالك، والشافعي، وأحمد فقالوا: إذا كان لرجل عبيدٌ غير مسلمين لم يؤدِ عنهم صدقة الفطر.
وقال الثوريّ وابن المبارك وإسحاق: يؤدي عنهم صدقة الفطر وإن كانوا غير مسلمين. ذكره الترمذي عقب رواية هذا الحديث (676).
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলমানদের মধ্য হতে প্রত্যেক স্বাধীন বা ক্রীতদাস, পুরুষ বা নারীর উপর যাকাতুল ফিতর ফরয করেছেন এক সা' খেজুর অথবা এক সা' যব।
4166 - عن ابن عمر، قال: فَرَضَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم صَدَقَةَ الْفِطْرِ -أَوْ قَالَ رَمَضَانَ- عَلَى الذَّكَرِ وَالأُنْثَى وَالْحُرِّ وَالْمَمْلُوكِ صَاعًا مِنْ تَمْرٍ أَوْ صَاعًا مِنْ شَعِيرٍ فَعَدَلَ النَّاسُ بِهِ نِصْفَ صَاعٍ مِنْ بُرٍّ. فَكَانَ ابْنُ عُمَرَ رضي الله عنهما يُعْطِي التَّمْرَ فَأَعْوَزَ أَهْلُ الْمَدِينَةِ مِن التَّمْرِ فَأَعْطَي شَعِيرًا، فَكَانَ ابْنُ عُمَرَ يُعْطِي عَن الصَّغِيرِ وَالْكَبِيرِ حَتَّى إِنْ كَانَ ليُعْطِي عَنْ بَنِيَّ، وَكَانَ ابْنُ عُمَرَ رضي الله عنهما يُعْطيِهَا الِّذِينَ يَقْبَلُونَهَا وَكَانُوا يُعْطُونَ قَبْلَ الْفِطْرِ بِيَوْمٍ أَوْ يَوْمَيْنِ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1511)، ومسلم في الزكاة (984: 14) كلاهما من طريق أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
واللّفظ للبخاريّ، وليس عند مسلم:" فكان ابن عمر … إلخ".
وعنده من رواية الليث عن نافع، به مختصر أيضًا، وفيه: قال ابن عمر: فجعل النّاس عِدْلَه
مُدَّيْن من حنطة.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সাদাকাতুল ফিতর – অথবা তিনি বললেন, রমাদানের সাদাকা – ফরয করেছেন পুরুষ, নারী, স্বাধীন ও ক্রীতদাসের ওপর এক সা‘ খেজুর অথবা এক সা‘ যব (দেওয়া)। এরপর লোকেরা তার পরিবর্তে আধা সা‘ গম (আদান প্রদান) করতে শুরু করলো। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খেজুর দ্বারা (সাদাকা) দিতেন। যখন মদিনাবাসীদের কাছে খেজুরের অভাব দেখা দিল, তখন তিনি যব দিলেন। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছোট ও বড় সকলের পক্ষ থেকে (ফিতর) দিতেন, এমনকি তিনি আমার সন্তানদের পক্ষ থেকেও দিতেন। আর ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যাদের পক্ষ থেকে তা গ্রহণ করা হতো, তাদের কাছে দিতেন এবং তাঁরা ঈদুল ফিতরের একদিন বা দুই দিন আগে তা প্রদান করতেন।
4167 - عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لَيْسَ فِي الْعَبْدِ صَدَقَةٌ إِلا صَدَقَةُ الْفِطْرِ".
صحيح: رواه مسلم (982/ 10) من طرق عن ابن وهب، أخبرني مخرمة، عن أبيه، عن عراك ابن مالك، قال: سمعت أبا هريرة يحدّث عن رسول الله، صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.
انظر المزيد من التخريج في جموع الأبواب في زكاة الأنعام.
وأمّا ما رُوي عن عبد الله بن عمرو بن العاص، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بعث مناديا في فجاج مكّة:"ألا إنّ صدقة الفطر واجبة على كلّ مسلم، ذكر أو أنثي، حر أو عبد، صغير أو كبير، مدان من قمح، أو سواه صاع من طعام" فهو ضعيف.
رواه الترمذي (674) عن عقبة بن مكرم، حدثنا سالم بن نوح، عن ابن جريج، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، وروى عمر بن هارون هذا الحديث عن ابن جريج، وقال: عن العباس عن ميناء، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكر بعض هذا الحديث، حدّثنا جارود، حدثنا عمر ابن هارون، هذا الحديث".
قلت: عمر بن هارون متروك، وسالم بن نوح مختلف فيه، فضعّفه ابن معين والنسائي والدارقطني وغيرهم، وهو من رجال مسلم.
والعباس بن ميناء إن كان هو ابن عبد الرحمن بن ميناء الأشجعيّ فهو من طبقة صغار التابعين.
وكذلك لا يصحُّ ما رُوي عن أنس بن مالك مرفوعًا:"لا يزال صيام العبد معلقًا بين السماء والأرض حتى تؤدى زكاة الفطر".
رواه ابن الجوزي في"العلل المتناهية" (823) من طريق الخطيب البغداديّ -وهو في تاريخه (9/ 121) - عن محمد بن طلحة النعالي، حدّثنا أبو صالح سهل بن إسماعيل بن سهل الجوهريّ الطرسوسي، حدّثنا أبو العباس محمد بن الحسن بن قتيبة العسقلاني، حدّثنا محمد بن أبي السريّ العسقلاني، حدّثنا بقية، حدثني عبد الرحمن بن عثمان، عن أنس بن مالك، فذكره.
قال ابن الجوزيّ:"فيه عبد الرحمن بن عثمان، قال أحمد: طرح الناسُ حديثه، وقال ابن حبان: لا يجوز الاحتجاج به" انتهى.
وأزيد هنا ما قاله ابن حبان في المجروحين (599):"هو أبو بحر البكراويّ من أهل البصرة، يروي عن شعبة مات سنة خمس وتسعين ومائة، منكر الحديث، ممن يروي المقلوبات عن الأثبات، ويأتي عن الثقات ما لا يشبه أحاديثهم".
إذا كان البكراوي هذا توفي سنة (195 هـ)، وتوفي أنس سنة (92، أو 93 هـ) فلا يمكن لقاؤه لتأخر وفاته، فيكون في الإسناد سقط أيضًا، فهو إما منقطع، وإما ضعيف من أجل عبد الرحمن بن
عثمان هذا، وإن كان غير الذي سبق ذكره فهو مجهول.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن جرير مرفوعًا، بلفظ:"إنّ شهر رمضان معلّق بين السماء والأرض، لا يرفع إلا بزكاة الفطر".
رواه ابن الجوزي في العلل المتناهية (824) وقال فيه:"محمد بن عبيد مجهول".
وزاد الحافظ في"اللسان" (5/ 276) فقال:"لا يتابع عليها".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দাসের উপর কোনো সদাকাহ নেই, কেবল সদাকাতুল ফিতর (ফিতরা) ছাড়া।"
