আল-জামি` আল-কামিল
4161 - عن جويرية زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ دَخَلَ عَلَيْهَا فَقَالَ:"هَلْ مِنْ طَعَامٍ؟". قَالَتْ: لا وَاللَّهِ يَا رَسُولَ اللَّهِ! مَا عِنْدَنَا طَعَامٌ إِلا عَظْمٌ مِنْ شَاةٍ أُعْطِيَتْهُ مَوْلاتِي مِن الصَّدَقَةِ. فَقَالَ:"قَرِّبِيهِ فَقَدْ بَلَغتْ مَحِلَّهَا".
صحيح: رواه مسلم في الزكاة (1073) من طرق، عن الليث، عن ابن شهاب، ، أنّ عبيد بن السباق، قال: إنّ جويرية زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أخبرته … فذكرت الحديث.
قوله:"بلغت محِلّها" قال النووي: هو بكسر الحاء، أي زال عنها حكم الصدقة وصارت حلالا لنا.
জুওয়াইরিয়া (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন এবং জিজ্ঞাসা করলেন, "খাবার কিছু আছে কি?" তিনি বললেন, "না, আল্লাহর কসম, হে আল্লাহর রাসূল! আমাদের কাছে কোনো খাবার নেই, তবে একটি বকরির হাড় আছে যা আমার দাসী/মুক্তিপ্রাপ্তা সদকা হিসেবে পেয়েছে।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তা নিয়ে আসো। কারণ, তা তার গন্তব্যে পৌঁছে গেছে।"
4162 - عن أبي رافع، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم بَعَثَ رَجُلًا على الصَّدَقَةِ مِنْ بَنِي مَخْزُوم فَقَالَ لأَبِيِ رَافِع: اصْحَبْنِي فَإِنَّكَ تُصِيُب مِنْهَا. قَال: حَتَّي آتِيَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَأَسْأَلَهُ فَأَتَاهُ فَسَأَلَهُ، فَقالَ:"مَوْلَى الْقَوْمِ مِنْ أَنْفُسِهِمْ وَإِنَّا لا تَحِلُّ لَنَا الصَّدَقَةُ".
صحيح: رواه أبو داود (1650)، والترمذيّ (657)، والنسائيّ (2613) كلّهم من طرق عن شعبة، عن الحكم، عن ابن أبي رافع، عن أبي رافع، فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح، وأبو رافع مولى النبيّ صلى الله عليه وسلم اسمه أسلم، وابن أبي رافع هو عبيدالله بن أبي رافع كاتب علي بن أبي طالب رضي الله عنه" انتهي.
والحكم هو ابن عتيبة أبو محمد الكنديّ من رجال الجماعة وصحّحه ابن خزيمة (2344)، وابن حبان (3293)، والحاكم (1/ 404).
ورواه الإمام أحمد (23872)، والبيهقي (7/ 32) كلّهم من هذا الوجه.
قلت: وهذا الرجل الذي بعثه النبيّ صلى الله عليه وسلم ساعيًا هو الأرقم بن أبي الأرقم القرشيّ -وكان اسمه عبد مناف بن أسد بن عبد الله بن عمر بن مخزوم-، وأنه أسلم وكان سابع سبعة، وكانت داره على الصّفا، وهي الدّار التي كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يجلس فيها مع أصحابه في أوّل الأمر.
وأما ما رواه أبو يعلى (3/ 162)، والطبراني (11/ 379)، والبيهقي (7/ 32) كلّهم من طريق ابن أبي ليلى، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، قال: استعمل أرقم الزهريّ على الصدقات، فاستتبع أبا رافع، فأتي رسول الله صلى الله عليه وسلم فسأله فقال (فذكر الحديث).
فقال البيهقي:"رواية شعبة عن الحكم أولي من رواية ابن أبي ليلى، هذا كان سيء الحفظ كثير الوهم".
واسم والده عبد يغوث بن وهب بن عبد مناف، ولكن الذي بعثه النبي صلى الله عليه وسلم على السعاية هو الأرقم بن أبي الأرقم المخزوميّ؛ لأنّ رواية شعبة كما قال البيهقيّ أصح من رواية ابن أبي ليلى، وكذا أكّده أيضًا الحافظ في الإصابة في ترجمة الأرقم بن أبي الأرقم المخزوميّ.
আবু রাফে' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু মাখযূম গোত্রের এক ব্যক্তিকে সাদাকা (যাকাত) সংগ্রহের জন্য প্রেরণ করলেন। সে (ওই ব্যক্তি) আবু রাফে'কে বলল: তুমি আমার সাথে চলো, তবে তুমিও তা থেকে কিছু লাভ করতে পারবে। তিনি (আবু রাফে') বললেন: যতক্ষণ না আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে যাই এবং তাঁকে জিজ্ঞাসা করি। অতএব, তিনি তাঁর কাছে গেলেন এবং তাঁকে জিজ্ঞাসা করলেন। তখন তিনি বললেন: "কোনো সম্প্রদায়ের (গোত্রের) মুক্ত দাস তাদেরই অংশ। আর নিশ্চয়ই আমাদের জন্য সাদাকা (যাকাত) হালাল নয়।"
4163 - عن مَيْمُون أَوْ مِهْرَانَ مَوْلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم أَخْبَرَنِي أَنَّهُ مَرَّ عَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ لَهُ:"يَا مَيْمُونُ أَوْ يَا مِهْرانُ! إِنَّا أَهْلُ بَيْتٍ نُهِينَا عَن الصَّدَقَةِ وَإِنَّ مَوَالِيَنَا مَنْ أَنْفُسِنَا وَلا نَأْكُلُ الصَّدقَةَ".
حسن: رواه الإمام أحمد (16399) عن عبد الرزاق، وهو في مصنفه (6942) وعنه الطبراني أيضًا في الكبير 20/ (836) عن سفيان، عن عطاء بن السائب، قال: حدّثتني أمّ كلثوم ابنة علي، قال: أتيتها بصدقة كان أمر بها، قالت: احذر شبابنا، فإن ميمونا أو مهران، فذكره.
وإسناده حسن من أجل أم كلثوم بنت علي بن أبي طالب، لم يرو عنها غير عطاء بن السائب، وأما عطاء بن السائب فهو مختلط، ولكن روى عنه سفيان -وهو الثوري- قبل الاختلاط.
وأورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 89)، وعزاه أحمد والطبراني وقال:"أم كلثوم لم أر من روى عنها غير عطاء بن السائب، وفيه كلام".
قلت: أمّ كلثوم بنت علي بن أبي طالب هي الصغرى، ولعلي بن أبي طالب بنت أخرى يقال لها أمّ كلثوم وهي الكبرى، أمها فاطمة بنت النبيّ صلى الله عليه وسلم، وتزوّجها عمر فولدت له، والصغرى عمّرت وسمع منها عطاء بن السائب، وأمها أمّ ولد، ذكرها ابن سعد. كذا في"التعجيل".
فكأنّها كانت معروفة عندهم إلّا أنّها لم تشتهر في رواية الحديث.
قال بظاهر هذا الحديث من لم يُبح لموالي بني هاشم الزكاة المفروضة، وذهب جمهور أهل العلم إلى أن الزكاة تجوز لهم؛ لأنه لا حظّ لهم في سهم ذوي القربى، وإنما نهى النبيّ صلى الله عليه وسلم أبا رافع تنزيها له.
وقوله:"مولي القوم من أنفسهم" في الاقتداء بهم، والأخذ بسيرتهم في الاجتناب عما يجتنبون عنه، ويشبه أن يكون النبيّ صلى الله عليه وسلم يكفيه المؤونة، إذ كان أبو رافع يتصرّف له في الحاجة والخدمة، فقال له هذا المعنى: إذا كنت تستغني بما أُعطيت فلا تطلب أوساخ الناس، فإنك مولانا ومنا".
انظر"شرح السُّنة" (6/ 103).
মায়মুন বা মিহরান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুক্ত করা গোলাম (মাওলা), তিনি আমাকে জানিয়েছেন যে, তিনি একবার নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন তিনি তাঁকে বললেন: "হে মায়মুন অথবা হে মিহরান! নিশ্চয়ই আমরা এমন এক আহলে বাইত (পরিবার) যাদের জন্য সাদাকা (যাকাত) গ্রহণ করা নিষিদ্ধ করা হয়েছে। আর আমাদের মুক্ত করা গোলামেরা (মাওয়ালী) আমাদেরই অন্তর্ভুক্ত, তাই আমরা সাদাকা ভক্ষণ করি না।"
4164 - عن * *
৪১৬৪ - থেকে বর্ণিত...
4165 - عن عبد الله بن عمر، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَرَضَ زَكَاةَ الْفِطْرِ صَاعًا مِنْ تَمْرٍ، أَوْ صَاعًا مِنْ شَعِيرٍ عَلَى كُلِّ حُرٍّ أَوْ عَبْدٍ ذَكَرٍ أَوْ أُنْثَى مِن الْمُسْلِمِينَ.
متفق عليه: رواه مالك في الزكاة (52) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره.
ورواه البخاريّ في الزكاة (1504)، ومسلم في الزكاة (984) كلاهما من طريق مالك، به.
قوله:"من المسلمين" قال بعض أهل العلم قديما أن مالكا تفرد بهذه الزيادة دون أصحاب نافع.
قلت: بل تابعه ثقتان أحدهما: عمر بن نافع، عن أبيه نافع، وحديثه عند البخاري في صحيحه (1503).
والثاني: الضحاك بن عثمان، عن نافع، وحديثه عند مسلم (984: 16).
أخذ بظاهر الحديث مالك، والشافعي، وأحمد فقالوا: إذا كان لرجل عبيدٌ غير مسلمين لم يؤدِ عنهم صدقة الفطر.
وقال الثوريّ وابن المبارك وإسحاق: يؤدي عنهم صدقة الفطر وإن كانوا غير مسلمين. ذكره الترمذي عقب رواية هذا الحديث (676).
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলমানদের মধ্য হতে প্রত্যেক স্বাধীন বা ক্রীতদাস, পুরুষ বা নারীর উপর যাকাতুল ফিতর ফরয করেছেন এক সা' খেজুর অথবা এক সা' যব।
4166 - عن ابن عمر، قال: فَرَضَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم صَدَقَةَ الْفِطْرِ -أَوْ قَالَ رَمَضَانَ- عَلَى الذَّكَرِ وَالأُنْثَى وَالْحُرِّ وَالْمَمْلُوكِ صَاعًا مِنْ تَمْرٍ أَوْ صَاعًا مِنْ شَعِيرٍ فَعَدَلَ النَّاسُ بِهِ نِصْفَ صَاعٍ مِنْ بُرٍّ. فَكَانَ ابْنُ عُمَرَ رضي الله عنهما يُعْطِي التَّمْرَ فَأَعْوَزَ أَهْلُ الْمَدِينَةِ مِن التَّمْرِ فَأَعْطَي شَعِيرًا، فَكَانَ ابْنُ عُمَرَ يُعْطِي عَن الصَّغِيرِ وَالْكَبِيرِ حَتَّى إِنْ كَانَ ليُعْطِي عَنْ بَنِيَّ، وَكَانَ ابْنُ عُمَرَ رضي الله عنهما يُعْطيِهَا الِّذِينَ يَقْبَلُونَهَا وَكَانُوا يُعْطُونَ قَبْلَ الْفِطْرِ بِيَوْمٍ أَوْ يَوْمَيْنِ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1511)، ومسلم في الزكاة (984: 14) كلاهما من طريق أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
واللّفظ للبخاريّ، وليس عند مسلم:" فكان ابن عمر … إلخ".
وعنده من رواية الليث عن نافع، به مختصر أيضًا، وفيه: قال ابن عمر: فجعل النّاس عِدْلَه
مُدَّيْن من حنطة.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সাদাকাতুল ফিতর – অথবা তিনি বললেন, রমাদানের সাদাকা – ফরয করেছেন পুরুষ, নারী, স্বাধীন ও ক্রীতদাসের ওপর এক সা‘ খেজুর অথবা এক সা‘ যব (দেওয়া)। এরপর লোকেরা তার পরিবর্তে আধা সা‘ গম (আদান প্রদান) করতে শুরু করলো। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) খেজুর দ্বারা (সাদাকা) দিতেন। যখন মদিনাবাসীদের কাছে খেজুরের অভাব দেখা দিল, তখন তিনি যব দিলেন। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছোট ও বড় সকলের পক্ষ থেকে (ফিতর) দিতেন, এমনকি তিনি আমার সন্তানদের পক্ষ থেকেও দিতেন। আর ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যাদের পক্ষ থেকে তা গ্রহণ করা হতো, তাদের কাছে দিতেন এবং তাঁরা ঈদুল ফিতরের একদিন বা দুই দিন আগে তা প্রদান করতেন।
4167 - عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لَيْسَ فِي الْعَبْدِ صَدَقَةٌ إِلا صَدَقَةُ الْفِطْرِ".
صحيح: رواه مسلم (982/ 10) من طرق عن ابن وهب، أخبرني مخرمة، عن أبيه، عن عراك ابن مالك، قال: سمعت أبا هريرة يحدّث عن رسول الله، صلى الله عليه وسلم فذكر الحديث.
انظر المزيد من التخريج في جموع الأبواب في زكاة الأنعام.
وأمّا ما رُوي عن عبد الله بن عمرو بن العاص، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بعث مناديا في فجاج مكّة:"ألا إنّ صدقة الفطر واجبة على كلّ مسلم، ذكر أو أنثي، حر أو عبد، صغير أو كبير، مدان من قمح، أو سواه صاع من طعام" فهو ضعيف.
رواه الترمذي (674) عن عقبة بن مكرم، حدثنا سالم بن نوح، عن ابن جريج، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه، فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن غريب، وروى عمر بن هارون هذا الحديث عن ابن جريج، وقال: عن العباس عن ميناء، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكر بعض هذا الحديث، حدّثنا جارود، حدثنا عمر ابن هارون، هذا الحديث".
قلت: عمر بن هارون متروك، وسالم بن نوح مختلف فيه، فضعّفه ابن معين والنسائي والدارقطني وغيرهم، وهو من رجال مسلم.
والعباس بن ميناء إن كان هو ابن عبد الرحمن بن ميناء الأشجعيّ فهو من طبقة صغار التابعين.
وكذلك لا يصحُّ ما رُوي عن أنس بن مالك مرفوعًا:"لا يزال صيام العبد معلقًا بين السماء والأرض حتى تؤدى زكاة الفطر".
رواه ابن الجوزي في"العلل المتناهية" (823) من طريق الخطيب البغداديّ -وهو في تاريخه (9/ 121) - عن محمد بن طلحة النعالي، حدّثنا أبو صالح سهل بن إسماعيل بن سهل الجوهريّ الطرسوسي، حدّثنا أبو العباس محمد بن الحسن بن قتيبة العسقلاني، حدّثنا محمد بن أبي السريّ العسقلاني، حدّثنا بقية، حدثني عبد الرحمن بن عثمان، عن أنس بن مالك، فذكره.
قال ابن الجوزيّ:"فيه عبد الرحمن بن عثمان، قال أحمد: طرح الناسُ حديثه، وقال ابن حبان: لا يجوز الاحتجاج به" انتهى.
وأزيد هنا ما قاله ابن حبان في المجروحين (599):"هو أبو بحر البكراويّ من أهل البصرة، يروي عن شعبة مات سنة خمس وتسعين ومائة، منكر الحديث، ممن يروي المقلوبات عن الأثبات، ويأتي عن الثقات ما لا يشبه أحاديثهم".
إذا كان البكراوي هذا توفي سنة (195 هـ)، وتوفي أنس سنة (92، أو 93 هـ) فلا يمكن لقاؤه لتأخر وفاته، فيكون في الإسناد سقط أيضًا، فهو إما منقطع، وإما ضعيف من أجل عبد الرحمن بن
عثمان هذا، وإن كان غير الذي سبق ذكره فهو مجهول.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن جرير مرفوعًا، بلفظ:"إنّ شهر رمضان معلّق بين السماء والأرض، لا يرفع إلا بزكاة الفطر".
رواه ابن الجوزي في العلل المتناهية (824) وقال فيه:"محمد بن عبيد مجهول".
وزاد الحافظ في"اللسان" (5/ 276) فقال:"لا يتابع عليها".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দাসের উপর কোনো সদাকাহ নেই, কেবল সদাকাতুল ফিতর (ফিতরা) ছাড়া।"
4168 - عن قيس بن سعد، قال: أمرنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بصدقةِ الفطر قبل أن تنزل الزّكاة، فلما نزلت الزّكاة لم يأمرنا ولم ينهنا ونحن نفعله.
صحيح: رواه النسائي (2509)، وابن ماجه (1828) كلاهما من حديث وكيع، عن سفيان، عن سلمة بن كهيل، عن القاسم بن مُخيمرة، عن أبي عمار، عن قيس بن سعد، فذكره.
وصحّحه ابن خزيمة (2394) ومن هذا الوجه رواه الإمام أحمد (15477) ولكنه اكتفى فيه بذكر صوم عاشوراء قبل أن ينزل رمضان، ولم يذكر فيه صدقة الفطر.
وإسناده صحيح وأبو عمار اسمه عَريب بن حُميد الدُّهني روى له النسائي وابن ماجه، قال الحافظ في التقريب:"ثقة".
ورواه الإمام أحمد (23840) عن يزيد بن هارون، أنبأنا سفيان الثوريّ، عن سلمة بن كهيل، عن القاسم بن مخيمرة، عن أبي عمار، قال: سألت قيس بن سعد عن صدقة الفطر، فقال:"أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل أن تنزل الزكاة، ثم نزلت الزكاة، فلم نُنه عنها، ولم نؤمر بها ونحن نفعله".
وسألته عن صوم عاشوراء، فقال:"أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل أن ينزل رمضان، ثم نزل رمضان، فلم نؤمر به ولم ننه عنه، فنحن نفعله".
ورواه النسائي (2508) من طريق شعبة، عن الحكم بن عتيبة، عن القاسم بن مخيمرة، عن عمرو بن شرحبيل، عن قيس بن سعد بن عبادة قال:"كنا نصوم عاشوراء، ونودي زكاة الفطر، فلما نزل رمضان، ونزلت الزكاة لم نؤمر به، ولم ننه عنه، وكنا نفعله".
وقال: سلمة بن كهيل خالف الحكم في إسناده، والحكم أثبت من سلمة بن كهيل". انتهي.
قلت: والإسنادان صحيحان، وعمرو بن شرحبيل هو الهمداني أبو ميسرة -كما قال النسائي- وهو ثقة من رجال الشيخين.
فقول الحافظ في"الفتح" (3/ 368) بأنّ في إسناده راويًا مجهولًا فلعله ذهب إلى أن عمرو بن شرحبيل هو ابن سعيد بن سعد بن عبادة الأنصاريّ، وهو"مقبول" عنده.
وقد ذهب بعضهم إلى القول بنسخ زكاة الفطر، ولا دليل لهم في ذلك، والذي عليه جمهور
أهل العلم أن زكاة الفطر واجبة، كما دلّت عليه الأحاديث السابقة.
ولذلك قال البيهقي (4/ 159):"وهذا لا يدل على سقوط فرضها، لأن نزول فرض لا يوجب سقوط آخر. وقد أجمع أهل العلم على وجوب زكاة الفطر، وإن اختلفوا في تسميتها فرضًا، فلا يجوز تركها".
قلت: وهو يشير بذلك إلى ما قال به الحنفية بأن صدقة الفطر واجبة، ليست بفريضة، والواجب عندهم أحطّ رتبة من الفريضة.
قال الحافظ ابن حجر بعد أن تكلّم على الإسناد بأن فيه راويا مجهولًا:"وعلى تقدير الصحة فلا دليل فيه على النسخ الاحتمال الاكتفاء بالأمر الأوّل".
ثم اختلف أهل العلم في شرط ملك النصاب فذهب الجمهور إلى أنه لا يشترط فيه النصاب، بل هي واجبة على الفقير والغني.
وذهب الحنفية إلا أنه لا تجب إلا على من يملك نصابًا، لأنّ من حلّت له الصدقة لا تجب عليه صدقة الفطر.
কায়স ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে যাকাত অবতীর্ণ হওয়ার পূর্বে সাদাকাতুল ফিতর আদায়ের নির্দেশ দিয়েছিলেন। এরপর যখন যাকাত অবতীর্ণ হলো, তখন তিনি (নতুন করে) আর আমাদের নির্দেশও দেননি এবং নিষেধও করেননি, কিন্তু আমরা তা আদায় করতে থাকি।
4169 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: كُنَّا نُخْرِجُ زَكَاةَ الْفِطْرِ صَاعًا مِنْ طَعَامٍ أَوْ صَاعًا مِنْ شَعِيِرٍ أَوْ صَاعًا مِنْ تَمْرٍ أَوْ صَاعًا مِنْ أَقِطٍ أَوْ صَاعًا مِنْ زَبِيبٍ وَذَلِكَ بِصَاعِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه مالك في الزكاة (53) عن زيد بن أسلم، عن عياض بن عبد الله بن سعد بن أبي سرح العامريّ، أنّه سمع أبا سعيد الخدريّ، فذكر الحديث.
ورواه البخاريّ في الزكاة (1506) عن عبد الله بن يوسف، ومسلم في الزكاة (985) عن يحيي أبن يحيى، كلاهما عن مالك.
قوله:"وذلك بصاع النبيّ صلى الله عليه وسلم، لم يرد في الصحيحين.
আবু সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা সদাকাতুল ফিতর হিসেবে এক সা' খাদ্য, অথবা এক সা' যব, অথবা এক সা' খেজুর, অথবা এক সা' আকিত (শুকনো পনির/দই), অথবা এক সা' কিসমিস বের করতাম। আর তা ছিল নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সা' অনুযায়ী।
4170 - عن أبي سعيد الخدري، قال: كُنَّا نُخْرِجُ إِذْ كَانَ فَينَا رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم زَكَاةَ الْفِطْرِ عَنْ كُلِّ صَغِيرٍ وَكَبِيرٍ حُرٍّ أَوْ مَمْلُوكٍ صَاعًا مِنْ طَعَامٍ أَوْ صَاعًا مِنْ أَقِطٍ أَوْ صَاعًا مِنْ شَعِيرٍ أَوْ صَاعًا مَنْ تَمْرٍ أَوْ صَاعًا مِنْ زَبِيبٍ. فَلَمْ تَزَلْ نُخْرِجُهُ حَتَّى قَدِمَ عَلَيْنَا مُعَاوِيَةُ بْنُ أَبِي سُفْيَانَ حَاجًّا أَوْ مُعْتَمِرًا فَكَلَّمَ النَّاسَ عَلَى الْمِنْبَرِ فَكَانَ فِيمَا كَلَّمَ بِهِ النَّاسَ أَنْ قَالَ: إِنِّي أَرَى أَنَّ مُدَّيْنِ مِنْ سَمْرَاءِ الشَّامِ تَعْدِلُ صَاعًا مِنْ تَمْرٍ فَأَخَذَ النَّاسُ بِذَلِكَ. قَالَ أَبُو سَعِيدٍ: فَأَمَّا أَنَا فَلا أَزَالُ أُخْرِجُهُ كَمَا كُنْتُ أُخْرِجُهُ أَبَدًا مَا عِشْتُ.
صحيح: رواه مسلم في الزكاة (985) عن عبد الله بن مسلمة بن قعنب، حدثنا داود (يعني ابن قيس)،
عن عياض بن عبد الله، عن أبي سعيد الخدريّ، قال (فذكره)، ورواه مالك مختصرًا كما سبق.
وأمّا ما رواه حامد بن يحيى، عن سفيان، وزاد في الحديث:"أو صاعًا من دقيق" قال حامد: فأنكروا عليه فتركهـ سفيان.
رواه أبو داود (1618) عن حامد بن يحيى، أخبرنا سفيان (هو ابن عيينة)، عن ابن عجلان، سمع عياضًا، قال: سمعت أبا سعيد الخدري يقول (فذكر الحديث). قال أبو داود: فهذه الزيادة وهم من ابن عيينة.
ورواه النسائيّ (2514) عن محمد بن منصور، قال: حدّثنا سفيان، بإسناده، وفيه:"أو صاعًا من سلت" ثم شكّ سفيان، فقال:"دقيق أو سلت".
والسلت: ضرب من الشعير أبيض لا قشر له، وقيل: هو نوع من الحنطة.
فقول سفيان:"أو صاعًا من دقيق" شاذ.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের মাঝে ছিলেন, তখন আমরা যাকাতুল ফিতর বাবদ প্রত্যেক ছোট, বড়, স্বাধীন ও গোলামের পক্ষ থেকে এক সা’ পরিমাণ খাদ্যদ্রব্য, অথবা এক সা’ পরিমাণ পনীর (আকিত), অথবা এক সা’ পরিমাণ যব, অথবা এক সা’ পরিমাণ খেজুর, অথবা এক সা’ পরিমাণ কিসমিস বের করতাম। আমরা তা অব্যাহতভাবে বের করতে থাকলাম, অবশেষে মু‘আবিয়া ইবনু আবূ সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হজ বা উমরাহকারী হিসেবে আমাদের কাছে আসলেন এবং মিম্বারে দাঁড়িয়ে মানুষের সাথে কথা বললেন। তিনি মানুষের সাথে যা আলোচনা করলেন, তার মধ্যে এও ছিল যে, তিনি বললেন: আমার মতে, শামের (উন্নত মানের) দুই মুদ্দ গম এক সা’ পরিমাণ খেজুরের সমান। ফলে মানুষেরা তা-ই গ্রহণ করল। আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: কিন্তু আমি, যতদিন বেঁচে থাকব, ততদিন আমি তা-ই বের করতে থাকব যা আমি বের করতাম।
4171 - عن ابن عمر، قال: لم تكن الصدقة على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم إلّا التمر والزبيب والشعير، ولم تكن الحنطة.
صحيح: رواه ابن خزيمة (2406) عن محمد بن سفيان بن أبي الزناد الأبلي، حدّثنا عبد الله بن موسي، أخبرنا فضيل بن غزوان، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره. وإسناده صحيح.
وفي رواية، قال ابن عمر: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُخرج زكاة الفطر بالصّاع من التمر، والصّاع من الشعير. قال: وكان عبد الله بن عمر يقول: جعل الناس عدل كذا بمدين من حنطة. رواه ابن خزيمة (2405).
وفيه فضيل بن سليمان النميري، قال فيه ابن معين: ليس بثقة، وقال أبو زرعة: لين الحديث. وقال النسائي: ليس بالقوي.
وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عباس، قال:"أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نؤدي زكاة رمضان صاعًا من طعام عن الصغير والكبير والحر والمملوك، من أدى سلتا قُبل منه، وأحسبه قال: ومن أدّى دقيقًا قبل منه، ومن أدّى سويقًا قبل منه". رواه ابن خزيمة (2415) عن نصر بن علي، حدّثنا عبد الأعلى، حدّثنا هشام، عن محمد بن سيرين، عن ابن عباس، فذكره.
قال ابن أبي حاتم في"علله" (627) سألت أبي عن حديث رواه نصر بن علي؟ قال أبي:"هذا حديث منكر".
قلت: لعلّ النكارة فيه ذكر الدقيق والسويق، وإلا فرجال الإسناد كلّهم ثقات.
وقد روي عنه موقوفا بلفظ: صدقة الفطر صاع من طعام. رواه البيهقي (4/ 167) وقال: هذا هو الصحيح موقوف.
وأمّا ما رُوي عن عمار بن سعد مؤذّن رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر بصدقة الفطر
صاعًا من تمر، أو صاعًا من شعير، أو صاعًا من سُلْتٍ" فهو مرسل.
رواه ابن ماجه (1830) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا عبد الرحمن بن سعد بن عمار المؤذن، قال: حدثنا عمر بن حفص، عن عمار بن سعد، فذكره.
وعبد الرحمن بن سعد بن عمار بن سعد القرظ المؤذن المدني"ضعيف".
وعمار بن سعد تابعي لم يدرك النبيّ صلى الله عليه وسلم. وعلّله البوصيريّ بهاتين العلّتين.
وأما ما وقع في بعض النسخ المطبوعة بزيادة"عن أبيه" فهو خطأ شنيع فتنبّه.
والعبد.
وهذا إسناد حسن، ولكن اختلف الرواة على الزهريّ كما ذكره أبو داود، فمنهم من أرسله، ومنهم من وصله مع اختلاف في اسم شيخ الزهري -ثعلبة بن عبد الله- فمنهم من قلّب، فقال: عبد الله بن ثعلبة، وهذا كله يدل على أن الرواة عن الزهري لم يضبطوا لفظ الحديث كما لم يضبطوا إسناده.
ولذا قال الدارقطني في"علله":"هذا حديث اختلف في إسناده ومتنه" ثم ذكر تفصيل ذلك.
انظر:"نصب الراية" (2/ 407).
وكذلك قال أيضًا ابن دقيق العيد في"الإمام": وقد سأل مُهنا الإمامَ أحمد عن حديث ثعلبة بن أبي صعير في صدقة الفطر نصف صاع من بُرٍّ، فقال: ليس بصحيح، إنما هو مرسل يرويه معمر وابن جريج عن الزهريّ مرسلًا. قال مهنا: قلت: من قبل منْ هذا؟ قال: من قبل النعمان بن راشد وليس بالقوي في الحديث، وضعّف حديث ابن أبي صعير. قال: وسألته عن ابن أبي صعير أهو معروف؟ فقال: ومن يعرف ابن أبي صعير؟ ليس هو معروف.
وذكر أحمد وابن المديني ابن أبي صعير فضعّفاه جميعًا. انظر: نصب الراية، وقد أطال في تضعيف هذا الحديث.
وقال البيهقي رحمه الله:"وقد وردت أخبار عن النبي صلى الله عليه وسلم في صاع من بر، ووردت أخبار في نصف صاع ولا يصح شيء من ذلك قد بينت علّة كلّ واحد منها في الخلافيات. وروينا في حديث أبي سعيد الخدريّ، وفي الحديث الثابت عن ابن عمر أن تعديل مدين من بر وهو نصف صاع بصاع من شعير وقع بعد النبيّ صلى الله عليه وسلم وبالله التوفيق".
وقال ابن المنذر:"لا نعلم في القمع خبرًا ثابتًا عن النبيّ صلى الله عليه وسلم يعتمد عليه، ولم يكن البر بالمدينة ذلك الوقت، إلا الشيء اليسير منه، فلما كثر في زمن الصحابة رأوا أن نصف صاع منه يقوم مقام صاع من شعير وهم الأئمة فغير جائز أن يعدل عن قولهم إلا إلى قول مثلهم".
ثم أسند عن عثمان، وعلي، وأبي هريرة، وجابر، وابن عباس، وابن الزبير، وأمه أسماء بنت أبي بكر بأسانيد صحيحة أنّهم رأوا أنّ في زكاة الفطر نصف صاع من قمح. انتهى.
قال الحافظ في"الفتح" (3/ 374):"بعد هذا النقل من ابن المنذر:"وهذا مصير منه إلى اختبار ما ذهب إليه الحنفية. وقال: لكن حديث أبي سعيد دال على أنه لم يوافق على ذلك وكذلك ابن عمر، فلا إجماع في المسألة خلافًا للطحاويّ" انتهى.
قلت: وللحديث شواهد كلّها ضعيفة وأشهرها ما رواه الحسن قال: خطب ابن عباس في آخر رمضان على منبر البصرة، فقال: أخرجوا صدقة صومكم، فكأن الناس لم يعلموا. فقال: مَنْ هاهنا من أهل المدينة؟ فقوموا إلى إخوانكم فعلّموهم، فإنّهم لا يعلمون. فرض رسول الله صلى الله عليه وسلم هذه
الصدقة صاعًا من تمر أو شعير أو نصف صاع من قمح على كلّ حرّ أو مملوك، ذكر أو أنثى صغير أو كبير، فلما قدم عليٌّ رضي الله عنه رأى رُخْص السِّعر، قال: قد أوسع الله عليكم، فلو جعلتموه صاعًا من كلّ شيء".
قال حميد: وكان الحسن يري صدقة رمضان على من صام.
رواه أبو داود (1622)، والنسائي (2510) كلاهما من حديث حميد، عن الحسن، قال: خطب ابن عباس، فذكره. واللّفظ لأبي داود. ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (3291).
ولم يذكرا لفظ علي بن أبي طالب في آخر الحديث.
وإسناده ضعيف من أجل الانقطاع؛ لأنّ الحسن وهو البصريّ الإمام لم يسمع من ابن عباس كما جزم بذلك كثير من أهل العلم.
والصّحيح الثابت عن ابن عباس ما رواه ابن سيرين عنه:"صاعًا من بر، أو صاعًا من تمر، أو صاعًا من شعير، أو صاعًا من سلت".
وما رواه أبو رجاء قال: سمعت ابن عباس يخطب على منبركم -يعني منبر البصرة- يقول: صدقة الفطر صاع من طعام. قال النسائيّ: هذا أثبت الثلاثة.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে (ফিতরের) সাদকা হিসেবে শুধুমাত্র খেজুর, কিশমিশ ও যব ছাড়া অন্য কিছু ছিল না। গম (حنطة) ছিল না।
সহীহ: এটি ইবনু খুযায়মা (২৪০৬) বর্ণনা করেছেন মুহাম্মাদ ইবনু সুফিয়ান ইবনু আবী যিনাদ আল-আব্লী, তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু মূসা, তিনি ফুযাইল ইবনু গাযওয়ান, তিনি নাফি', তিনি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে। তাঁরা এটি উল্লেখ করেছেন। এর সনদ সহীহ।
অন্য এক বর্ণনায়, ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাকাতুল ফিতর এক সা' খেজুর এবং এক সা' যব দ্বারা আদায় করতেন। তিনি (ইবনু উমর) বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: লোকেরা দুই মুদ্দে (অর্ধ সা') গম দ্বারা এভাবে (এক সা' যবের) সমতাকরণ করে নিয়েছে। এটি ইবনু খুযায়মা (২৪০৫) বর্ণনা করেছেন।
আর এতে ফুযাইল ইবনু সুলায়মান আন-নুমাইরী আছেন। তাঁর সম্পর্কে ইবনু মাঈন বলেছেন: সে নির্ভরযোগ্য নয়। আবু যুর'আ বলেছেন: তার হাদীস দুর্বল (لين الحديث)। নাসায়ী বলেছেন: সে শক্তিশালী নয়।
অনুরূপভাবে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে, তাও সহীহ নয়। তিনি বলেন: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে নির্দেশ দিয়েছেন যে আমরা যেন রমাযানের যাকাত (ফিতর) ছোট-বড়, স্বাধীন ও গোলাম সকলের পক্ষ থেকে এক সা' খাবার দ্বারা আদায় করি। যে সুলত (এক প্রকার যব) আদায় করবে, তার থেকে তা গ্রহণ করা হবে। আমার মনে হয় তিনি বলেছেন: যে আটা আদায় করবে, তার থেকে তা গ্রহণ করা হবে, এবং যে ছাতু আদায় করবে, তার থেকেও গ্রহণ করা হবে।" এটি ইবনু খুযায়মা (২৪১৫) বর্ণনা করেছেন নসর ইবনু আলী, তিনি আব্দুল আ'লা, তিনি হিশাম, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু সীরীন, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে।
ইবনু আবী হাতিম তাঁর "ইলল" গ্রন্থে (৬২৭) বলেন: আমি আমার পিতাকে নসর ইবনু আলী কর্তৃক বর্ণিত এই হাদীস সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলাম। আমার পিতা বললেন: "এই হাদীস মুনকার (অস্বীকৃত/খুব দুর্বল)।"
আমি (সংকলক/পর্যালোচক) বলি: সম্ভবত এতে আটা (দাকীক) ও ছাতু (সাওীক)-এর উল্লেখ থাকাটাই নাকারাতের কারণ, অন্যথায় ইসনাদের সকল বর্ণনাকারী বিশ্বস্ত।
এই হাদীসটি তাঁর (ইবনু আব্বাস) থেকে মাওকুফ হিসেবে এই শব্দে বর্ণিত হয়েছে: "ফিতরের সাদকা হলো এক সা' খাবার।" এটি বাইহাকী (৪/১৬৭) বর্ণনা করেছেন এবং তিনি বলেছেন: এটিই সহীহ মাওকুফ (সাহাবীর নিজস্ব উক্তি হিসেবে)।
আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মুয়াযযিন আম্মার ইবনু সা'দ থেকে যা বর্ণিত হয়েছে: "রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিতরের সাদকা এক সা' খেজুর, অথবা এক সা' যব, অথবা এক সা' সুলত (সূলত/এক প্রকার যব) দ্বারা আদায়ের নির্দেশ দিয়েছেন।" এটি মুরসাল (সনদ বিচ্ছিন্ন)।
এটি ইবনু মাজাহ (১৮৩০) বর্ণনা করেছেন হিশাম ইবনু আম্মার থেকে, তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আব্দুর রহমান ইবনু সা'দ ইবনু আম্মার আল-মুয়াযযিন, তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন উমর ইবনু হাফস, তিনি আম্মার ইবনু সা'দ থেকে।
আব্দুর রহমান ইবনু সা'দ ইবনু আম্মার ইবনু সা'দ আল-কারয আল-মুয়াযযিন আল-মাদানী "যঈফ" (দুর্বল)।
আম্মার ইবনু সা'দ একজন তাবেয়ী, যিনি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে পাননি। বুসায়রী এই দুটি ত্রুটির কারণে এটিকে 'ইল্লতযুক্ত' বলেছেন।
আর কিছু মুদ্রিত সংস্করণে "তাঁর পিতার সূত্রে" এই অতিরিক্ত অংশটি যোগ করা হয়েছে, যা একটি জঘন্য ভুল। সুতরাং সতর্ক হও।
এবং গোলাম। (মূল টেক্সটে অসম্পূর্ণ)।
আর এই সনদটি হাসান, কিন্তু বর্ণনাকারীরা যুহরী (রাহ.) থেকে এর বিষয়ে মতভেদ করেছেন, যেমনটি আবূ দাউদ উল্লেখ করেছেন। তাদের কেউ এটিকে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন, আবার কেউ এটিকে যুক্ত (মাউসুল) হিসেবে বর্ণনা করেছেন, সাথে যুহরীর শাইখের নাম (সা'লাবা ইবনু আব্দুল্লাহ) নিয়েও মতভেদ রয়েছে। কেউ কেউ নাম উল্টে দিয়েছেন এবং বলেছেন: আব্দুল্লাহ ইবনু সা'লাবা। এই সবকিছু প্রমাণ করে যে যুহরী থেকে বর্ণনাকারীরা হাদীসের শব্দগুলো সঠিকভাবে মুখস্থ রাখতে পারেননি, ঠিক যেমন তারা সনদও সঠিকভাবে মনে রাখতে পারেননি।
এই কারণেই দারাকুতনী তাঁর "ইলল" গ্রন্থে বলেছেন: "এই হাদীসের সনদ ও মতন নিয়ে মতভেদ রয়েছে।" অতঃপর তিনি এর বিস্তারিত বর্ণনা করেছেন।
দেখুন: "নাসব আর-রায়া" (২/৪০৭)।
অনুরূপভাবে ইবনু দাকীক আল-ঈদ তাঁর "আল-ইমাম" গ্রন্থে বলেছেন: মুহান্না ইমাম আহমাদকে সা'লাবা ইবনু আবী সু'আইর কর্তৃক বর্ণিত ফিতরের সাদকা প্রসঙ্গে অর্ধ সা' গম সম্পর্কিত হাদীসটি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করেছিলেন। তিনি (ইমাম আহমাদ) বললেন: এটি সহীহ নয়; এটি কেবল মুরসাল (বিচ্ছিন্ন), যা মা'মার এবং ইবনু জুরাইজ যুহরী থেকে মুরসাল হিসেবে বর্ণনা করেছেন। মুহান্না বলেন: আমি বললাম: এটি কার পক্ষ থেকে (দুর্বল)? তিনি বললেন: নু'মান ইবনু রাশিদের পক্ষ থেকে, সে হাদীসে শক্তিশালী নয়। আর তিনি ইবনু আবী সু'আইরের হাদীসটিকেও দুর্বল সাব্যস্ত করেন। তিনি বলেন: আমি তাঁকে ইবনু আবী সু'আইর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম, সে কি সুপরিচিত? তিনি বললেন: ইবনু আবী সু'আইরকে কে জানে? সে পরিচিত নয়।
আহমাদ ও ইবনু মাদীনী উভয়েই ইবনু আবী সু'আইর-এর আলোচনা করে তাকে দুর্বল সাব্যস্ত করেছেন। দেখুন: নাসব আর-রায়া। তিনি এই হাদীসটিকে দুর্বল প্রমাণ করার জন্য দীর্ঘ আলোচনা করেছেন।
ইমাম বাইহাকী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: "নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে এক সা' গম সম্পর্কে বর্ণনা এসেছে এবং অর্ধ সা' সম্পর্কেও বর্ণনা এসেছে, কিন্তু এর কোনোটিই সহীহ নয়। আমি এর প্রত্যেকটির 'ইল্লত (ত্রুটি) 'আল-খিলাফিয়্যাত' গ্রন্থে স্পষ্ট করে দিয়েছি। আর আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসে এবং ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে প্রমাণিত হাদীসে আমরা বর্ণনা করেছি যে, অর্ধ সা' গম দ্বারা এক সা' যব-এর সমতাকরণ নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরে (সাহাবাগণের যুগে) সংঘটিত হয়েছিল। আল্লাহ্র কাছেই তাওফীক (সাহায্য)।"
ইবনুল মুনযির বলেছেন: "গমের বিষয়ে নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে আমরা নির্ভর করার মতো কোনো প্রমাণিত খবর জানি না। সে সময় মদীনাতে গম খুবই কম ছিল। যখন সাহাবীদের যুগে গমের প্রাচুর্য হলো, তখন তাঁরা দেখলেন যে অর্ধ সা' গম এক সা' যবের সমকক্ষ। আর তাঁরাই হলেন ইমাম (নেতৃত্বদানকারী)। অতএব তাঁদের এই উক্তি থেকে অন্য কারও উক্তির দিকে প্রত্যাবর্তন করা বৈধ হবে না, যদি না তাদের মতোই শক্তিশালী কারো উক্তি পাওয়া যায়।"
এরপর তিনি উসমান, আলী, আবূ হুরায়রা, জাবির, ইবনু আব্বাস, ইবনু যুবাইর এবং তাঁর মা আসমা বিন্ত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে সহীহ সনদসমূহের মাধ্যমে বর্ণনা করেছেন যে, তাঁরা যাকাতুল ফিতরে অর্ধ সা' গমকে যথেষ্ট মনে করতেন। সমাপ্ত।
হাফিয ইবন হাজার ফাতহুল বারীতে (৩/৩৭৪) ইবনুল মুনযিরের এই উদ্ধৃতিটির পর বলেন: "এটি হানফী মাযহাবের মতকে সমর্থন করার দিকে তাঁর (ইবনুল মুনযিরের) ঝুঁকে পড়াকে নির্দেশ করে। তিনি আরও বলেছেন: কিন্তু আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস প্রমাণ করে যে এই বিষয়ে তিনি একমত হননি এবং অনুরূপভাবে ইবনু উমরও। সুতরাং, তাহাভীর বিপরীতে এই মাস'আলায় কোনো ইজমা (ঐক্যমত) নেই।" সমাপ্ত।
আমি (সংকলক/পর্যালোচক) বলি: এই হাদীসের স্বপক্ষে কিছু শওয়াহিদ (সমর্থক বর্ণনা) আছে, কিন্তু সেগুলো সবই দুর্বল। এর মধ্যে সবচেয়ে প্রসিদ্ধ হলো যা হাসান বসরী (রাহ.) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) রমাযানের শেষে বাসরার মিম্বরে দাঁড়িয়ে খুতবা দিলেন এবং বললেন: তোমরা তোমাদের সাওমের সাদকা (ফিতরা) বের করো। মনে হলো লোকেরা তা জানত না। তখন তিনি বললেন: এখানে মদীনার অধিবাসী কেউ আছো কি? তোমরা তোমাদের ভাইদের কাছে যাও এবং তাদের শিক্ষা দাও, কারণ তারা জানে না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এই সাদকাকে প্রত্যেক স্বাধীন বা গোলাম, পুরুষ বা নারী, ছোট বা বড়র উপর এক সা' খেজুর বা যব অথবা অর্ধ সা' গম হিসেবে ফরয করেছেন। যখন আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আসলেন, তখন তিনি দাম সস্তা দেখতে পেলেন, তাই তিনি বললেন: আল্লাহ তোমাদের জন্য প্রাচুর্য দান করেছেন, যদি তোমরা এটিকে সবকিছুর ক্ষেত্রেই এক সা' করে দিতে!
হুমাইদ বলেন: হাসান বসরী রমাযানের সাদকা শুধু তাদের জন্য আবশ্যক মনে করতেন যারা রোযা রাখত।
এটি আবূ দাউদ (১৬২২) এবং নাসায়ী (২৫১০) উভয়েই হুমাইদ, তিনি হাসান বসরী থেকে, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। শব্দগুলো আবূ দাউদের। এই সূত্রেই ইমাম আহমাদও (৩২৯১) এটি বর্ণনা করেছেন।
আর তারা (আবূ দাউদ ও নাসায়ী) হাদীসের শেষে আলী ইবনু আবী তালিবের মন্তব্য উল্লেখ করেননি।
এর সনদটি ইনকিতা’ (বিচ্ছিন্নতা)-এর কারণে দুর্বল; কেননা হাসান বসরী অনেক আলিমের মতে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছ থেকে সরাসরি শোনেননি।
আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা সহীহভাবে প্রমাণিত, তা হলো ইবনু সীরীন তাঁর থেকে বর্ণনা করেছেন: "এক সা' গম, বা এক সা' খেজুর, বা এক সা' যব, অথবা এক সা' সুলত।"
আর আবূ রাজা’ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তোমাদের মিম্বরে — অর্থাৎ বাসরার মিম্বরে — খুৎবা দিতে শুনেছি, তিনি বলছিলেন: ফিতরের সাদকা হলো এক সা' খাবার। ইমাম নাসায়ী বলেছেন: এই তিনটি বর্ণনার মধ্যে এটিই সবচেয়ে প্রমাণিত (আছবাত)।
4172 - عن ابن عمر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أمر بزكاة الفطر قبل خروج الناس إلى الصلاة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1509)، ومسلم في الزكاة (986) كلاهما من طريق موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) লোকদের সালাতের জন্য বের হওয়ার পূর্বেই যাকাতুল ফিতর আদায়ের নির্দেশ দিয়েছেন।
4173 - عن ابن عمر، قال: فرض النبيُّ صلى الله عليه وسلم صدقة الفطر، وكان يُعطون قبل الفطر بيوم أو يومين.
صحيح: رواه البخاري في الزكاة (1511) عن أبي النعمان، حدّثنا حماد بن زيد، حدّثنا أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাদাকাতুল ফিতর ফরয করেছেন এবং (লোকেরা) ঈদুল ফিতরের একদিন বা দুই দিন আগে তা প্রদান করত।
4174 - عن عبد الله بن عباس، قال: فَرَضَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم زَكَاةَ الْفِطْرِ طُهْرَة لِلصَّائِم مِن اللَّغْوِ وَالرَّفَثِ وَطُعْمَةً لِلْمَسَاكِينِ. مَنْ أَدَّاهَا قَبْلَ الصَّلاةِ فَهِيَ زَكَاةَ مَقْبُولَةٌ، وَمَنْ أَدَّاهَا بَعْدَ الصَّلاةِ فَهِيَ صَدَقَةٌ مِن الصَّدَقَاتِ.
حسن: رواه أبو داود (1609)، وابن ماجه (1827) كلاهما من حديث مروان بن محمد، قال: حدّثنا أبو يزيد الخولانيّ، عن سيار بن عبد الرحمن الصّدفيّ، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وصحّحه الحاكم (1/ 409) وقال: على شرط البخاريّ.
قلت: هذا وهمٌ منه فإنه ليس على شرط البخاريّ غير أن إسناده حسن فإن أبا يزيد الخولانيّ وهو المصري، وشيخه سيار بن عبد الرحمن لم يرويا لهما غير أبي داود وابن ماجه، وهما صدوقان.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম ফিতরার যাকাত ফরয করেছেন, রোজাদারের জন্য অনর্থক ও অশ্লীল কথা থেকে পবিত্রতা স্বরূপ এবং মিসকীনদের জন্য খাদ্যের ব্যবস্থা স্বরূপ। যে ব্যক্তি তা (ঈদের) সালাতের পূর্বে আদায় করে, তা হবে মাকবূল (গ্রহণযোগ্য) যাকাত, আর যে ব্যক্তি তা সালাতের পরে আদায় করে, তা হবে সাধারণ সাদাকাগুলোর মধ্যে একটি সাদাকা।
4175 - عن * *
৪১৭৫ - থেকে
4176 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"بُني الإسلام على خمس: شهادة أن لا إله إلَّا الله، وأنّ محمّدًا رسول الله، وإقام الصّلاة، وإيتاء الزّكاة، والحجّ، وصوم رمضان".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الإيمان (8)، ومسلم في الإيمان (16/ 22) كلاهما من حديث حنظلة بن أبي سفيان قال: سمعت عكرمة بن خالد، عن ابن عمر، فذكر الحديث، واللّفظ للبخاريّ.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ইসলামের ভিত্তি পাঁচটি স্তম্ভের উপর প্রতিষ্ঠিত: এই সাক্ষ্য দেওয়া যে, আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ (উপাস্য) নেই এবং মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আল্লাহর রাসূল, সালাত (নামায) প্রতিষ্ঠা করা, যাকাত প্রদান করা, হজ্জ করা এবং রমযানের সওম (রোযা) পালন করা।
4177 - عن أبي هريرة، أنّ أعرابيًّا جاء إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، دلّني على عمل إذا عملتُه دخلتُ الجنّة، قال:"تعبد الله لا تشرك به شيئًا، وتقيم الصّلاة المكتوبة، وتؤدّي الزّكاة المفروضة، وتصوم رمضان". قال: والذي نفسي بيده لا أزيد على هذا شيئًا أبدًا، ولا أنقص منه. فلمّا ولّى قال النّبيُّ صلى الله عليه وسلم:"من سرَّه أن ينظر إلى رجل من أهل الجنّة فلينظر إلى هذا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الزكاة (1397)، ومسلم في الإيمان (14) كلاهما من طريق عفّان بن مسلم، حدّثنا وُهيب، عن يحيي بن سعيد بن حيان، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث. واللفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন বেদুঈন (আরব) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল, আমাকে এমন একটি আমলের কথা বলে দিন, যা আমি করলে জান্নাতে প্রবেশ করতে পারব। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি আল্লাহর ইবাদত করবে এবং তাঁর সাথে কোনো কিছুকে শরিক করবে না, ফরয নামায প্রতিষ্ঠা করবে, ফরয যাকাত আদায় করবে এবং রমযানের রোযা রাখবে।" সে বলল: যাঁর হাতে আমার জীবন, তাঁর কসম! আমি এর উপর আর কিছুই বাড়াবো না এবং কমাবোও না। লোকটি যখন ফিরে গেল, তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কেউ যদি জান্নাতের অধিবাসীদের মধ্য থেকে কোনো লোককে দেখতে পছন্দ করে, তবে সে যেন এই লোকটির দিকে তাকায়।"
4178 - عن طلحة بن عبيد الله يقول: جاء رجل إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم من أهل نجد، ثائر الرأس يُسمع دَوي صوته، ولا يُفقه ما يقول، حتى دنا فإذا هو يسأل عن الإسلام،
فقال رسول الله:"خمس صلوات في اليوم والليلة" فقال: هل عليَّ غيرها؟ قال:"لا، إلا أن تطوع" قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"وصيام رمضان"، قال: هل عليَّ غيرُه؟ قال:"لا، إلا أن تطوع" قال: وذكر رسول الله صلى الله عليه وسلم الزكاة، قال: هل عليّ غيرُها؟ قال:"لا، إلا أن تطوع"، قال: فأدبر الرجل وهو يقول: والله! لا أزيد على هذا ولا أنقص، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفلح إن صدق".
متفق عليه: رواه مالك في قصر الصلاة (94) عن عمه أبي سُهيل بن مالك، عن أبيه، أنه سمع طلحة بن عبيد الله فذكر الحديث، ورواه البخاري في الإيمان (46)، ومسلم في الإيمان (8) كلاهما من طريق مالك، ومضى هذا الحديث بكامله في كتاب الإيمان.
তালহা ইবনে উবাইদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নজদবাসীদের মধ্য থেকে এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলেন। তার চুল ছিল এলোমেলো, তার কণ্ঠস্বরের গুঞ্জন শোনা যাচ্ছিল, কিন্তু সে কী বলছিল তা বোঝা যাচ্ছিল না। অবশেষে যখন সে কাছে আসলো, দেখা গেল সে ইসলাম সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করছে।
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "দিন ও রাতের মধ্যে পাঁচ ওয়াক্ত সালাত (নামাজ)।" লোকটি বলল: আমার উপর কি এর ব্যতীত (আরও কিছু) ফরয আছে? তিনি বললেন: "না, তবে তুমি যদি নফল আদায় করো (তাহলে ভিন্ন কথা)।"
রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আর রমজানের রোজা।" লোকটি বলল: আমার উপর কি এর ব্যতীত (আরও কিছু) ফরয আছে? তিনি বললেন: "না, তবে তুমি যদি নফল আদায় করো (তাহলে ভিন্ন কথা)।"
বর্ণনাকারী বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যাকাতের কথা উল্লেখ করলেন। লোকটি বলল: আমার উপর কি এর ব্যতীত (আরও কিছু) ফরয আছে? তিনি বললেন: "না, তবে তুমি যদি নফল আদায় করো (তাহলে ভিন্ন কথা)।"
অতঃপর লোকটি পিঠ ফিরে চলে গেল এবং সে বলছিল: আল্লাহর শপথ! আমি এর থেকে বেশিও করব না, কমও করব না। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি সে সত্য বলে থাকে, তাহলে সে সফলকাম হবে।"
4179 - عن البراء قال: كان أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم إذا كان الرجل صائمًا فحضر الإفطار فنام قبل أن يفطر لم يأكل ليلته ولا يومه حتى يمسي. وإنّ قيس بنَ صِرْمة الأنصاريّ كان صائمًا، فلما حضر الإفطارُ أتي امرأته فقال لها: عندك طعامٌ؟ قالت: لا، ولكن أنطلقُ فأطلب لك، وكان يومه يعمل، فغلبته عيناه، فجاءته امرأته، فلما رأته قالت: خيبة لك! فلما انتصف النّهار غُشي عليه، فذكر ذلك للنبي صلى الله عليه وسلم فنزلت هذه الآية: {أُحِلَّ لَكُمْ لَيْلَةَ الصِّيَامِ الرَّفَثُ إِلَى نِسَائِكُمْ} [البقرة: 187] ففرحوا بها فرحًا شديدًا، ونزلت: {وَكُلُوا وَاشْرَبُوا حَتَّى يَتَبَيَّنَ لَكُمُ الْخَيْطُ الْأَبْيَضُ مِنَ الْخَيْطِ الْأَسْوَدِ} [سورة البقرة: 187]).
صحيح: رواه البخاري في الصوم (1915) عن عبيد الله بن موسى، عن إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن البراء، فذكره.
বারা' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাহাবীগণের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিয়ম এমন ছিল যে, যখন কোনো ব্যক্তি সাওম অবস্থায় থাকত এবং ইফতারের সময় উপস্থিত হতো, অতঃপর সে ইফতার করার আগেই ঘুমিয়ে পড়ত, তবে সে ঐ রাতে এবং পরের দিন সন্ধ্যা পর্যন্ত কিছু খেত না। আর কায়স ইবনু সিরমা আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সাওম পালনকারী ছিলেন। যখন ইফতারের সময় হলো, তিনি তাঁর স্ত্রীর কাছে এসে জিজ্ঞেস করলেন: তোমার কাছে খাবার আছে কি? স্ত্রী বললেন: না, তবে আমি যাই, তোমার জন্য খুঁজে আনি। তিনি সারাদিন কাজ করেছিলেন, তাই তাঁর চোখ লেগে গেল (তিনি ঘুমিয়ে পড়লেন)। তাঁর স্ত্রী এসে তাঁকে দেখে বললেন: তোমার জন্য আফসোস! যখন দিনের মধ্যভাগ হলো, তখন তিনি সংজ্ঞা হারালেন। বিষয়টি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে উল্লেখ করা হলো। তখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: "সাওমের রাতে তোমাদের জন্য তোমাদের স্ত্রীদের নিকট গমন হালাল করা হয়েছে।" (সূরা বাকারা: ১৮৭)। এতে সাহাবীগণ খুব আনন্দিত হলেন। এবং এই আয়াতটিও নাযিল হলো: "আর তোমরা খাও ও পান করো যতক্ষণ না তোমাদের কাছে সাদা রেখা থেকে কালো রেখা স্পষ্ট হয়ে যায়।" (সূরা বাকারা: ১৮৭)।
4180 - عن ابن عباس: {يَاأَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ} [البقرة: 183]، فكان النّاس على عهد النبي صلى الله عليه وسلم إذا صلوا العتمة: حرم عليهم الطّعام والشراب والنساء، وصاموا إلى القابلة. فاختان رجل نفسه فجامع امرأته وقد صلّي العشاء ولم يفطر. فأراد الله أن يجعل ذلك يُسرًا لمن بقي ورخصة ومنفعة، فقال سبحانه: في {عَلِمَ اللَّهُ أَنَّكُمْ كُنْتُمْ تَخْتَانُونَ أَنْفُسَكُمْ} [البقرة: 187] وكان هذا مما نفع الله به الناس ورخّص لهم ويسَّر.
حسن: رواه أبو داود (2313) عن أحمد بن محمد بن شبَّويه، حدّثني علي بن حسين بن واقد، عن أبيه، عن يزيد النحوي، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في علي بن الحسين بن واقد غير أنه حسن الحديث.
ويزيد النحوي هو ابن أبي سعيد أبو الحسن.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (এই আয়াত সম্পর্কে বলেন): "হে মুমিনগণ, তোমাদের উপর রোযা ফরয করা হলো, যেমন ফরয করা হয়েছিল তোমাদের পূর্ববর্তীদের উপর।" [সূরা বাকারা: ১৮৩] নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে লোকেরা যখন 'আতামাহ' (ইশার সালাত) আদায় করতেন, তখন তাদের উপর খাবার, পানীয় ও নারী (স্ত্রীর সাথে সহবাস) হারাম হয়ে যেত, এবং তারা পরবর্তী দিন পর্যন্ত রোযা পালন করতেন। অতঃপর এক ব্যক্তি তার নফসের সাথে বিশ্বাসঘাতকতা (দোষ) করল এবং তার স্ত্রীর সাথে সহবাস করল, অথচ সে ইশার সালাত আদায় করেছিল এবং ইফতার করেনি (খায়নি)। ফলে আল্লাহ চাইলেন যে অবশিষ্ট লোকদের জন্য তা সহজতা, ছাড় এবং কল্যাণস্বরূপ হোক। অতঃপর আল্লাহ সুবহানাহু ওয়া তা'আলা এই আয়াত নাযিল করলেন: "আল্লাহ জানেন যে তোমরা তোমাদের নিজেদের সাথে বিশ্বাসঘাতকতা করছিলে (নিজের নফসের চাহিদার কাছে হার মানছিলে)।" [সূরা বাকারা: ১৮৭] আর এটার মাধ্যমেই আল্লাহ মানুষের উপকার করলেন, তাদের জন্য ছাড় দিলেন এবং সহজ করলেন।