হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4181)


4181 - عن سلمة بن الأكوع، قال: لما نزلت هذه الآية: {وَعَلَى الَّذِينَ يُطِيقُونَهُ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ} [البقرة: 184] كان من أراد أن يُفطر ويفتدي، حتّى نزلت الآيةُ التي بعدها، فنسختها.

وفي لفظ: كنّا في رمضان على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم من شاء صام، ومن شاء أفطر فافتدي بطعام مسكين، حتى أُنزلت هذه الآية {فَمَنْ شَهِدَ مِنْكُمُ الشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ} [البقرة: 185].

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4507)، ومسلم في الصيام (1145) من طريق قتيبة بن سعيد، حدثنا بكر بن مضر، عن عمرو بن الحارث، عن بُكير بن عبد الله بن الأشجّ، عن يزيد مولي سلمة بن الأكوع، عن سلمة، فذكره. ولفظهما سواء، واللفظ الآخر لمسلم.




সালমা ইবনু আল-আকওয়া' (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {আর যারা কষ্ট করে রোযা রাখতে পারে, (তাদের জন্য) একজন মিসকীনকে খাদ্যদান করা ফিদইয়া} [সূরা আল-বাকারা: ১৮৪], তখন যে ব্যক্তি রোযা ভাঙতে এবং ফিদইয়া দিতে চাইতো, সে তাই করতো। অবশেষে এর পরের আয়াতটি নাযিল হয়ে এটিকে রহিত করে দেয়।

অন্য একটি শব্দে (বর্ণনায়) এসেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে আমরা রমযান মাসে ছিলাম। তখন যে ব্যক্তি চাইতো সে রোযা রাখতো, আর যে ব্যক্তি চাইতো সে রোযা ভেঙে একজন মিসকীনকে খাদ্যদানের মাধ্যমে ফিদইয়া দিতো। অবশেষে এই আয়াতটি নাযিল হয়: {সুতরাং তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি মাসটিতে উপস্থিত থাকবে, সে যেন তাতে রোযা রাখে} [সূরা আল-বাকারা: ১৮৫]।









আল-জামি` আল-কামিল (4182)


4182 - عن عبد الله بن عمر قرأ: {فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ} [البقرة: 184] قال: هي منسوخة.

صحيح: رواه البخاريّ في الصوم (1949) عن عيّاش، حدّثنا عبد الأعلى، حدّثنا عبد الله، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره. وعيّاش هو ابن الوليد الرّقام البصريّ.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (কুরআনের এই অংশ) পাঠ করেন: "ফিদইয়াতুন তা‘আমু মিসকিন" [সূরা বাকারা: ১৮৪]। তারপর তিনি বললেন: এটি মানসুখ (রহিত)।









আল-জামি` আল-কামিল (4183)


4183 - عن ابن عباس قرأ: {وَعَلَى الَّذِينَ يُطِيقُونَهُ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ} قال: ليست بمنسوخة، هو الشيخ الكبير والمرأة الكبيرة لا يستطيعان أن يصوما، فليُطعما مكان كلِّ يوم مسكينًا.

صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4505) عن إسحاق (هو ابن راهويه)، أخبرنا روح (هو ابن عُبادة)، حدّثنا زكريا بن إسحاق، حدّثنا عمرو بن دينار، عن عطاء، سمع ابن عباس، فذكره.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (কুরআনের এই আয়াতটি) তিলাওয়াত করলেন: "{আর যারা তা কষ্ট করে সহন করতে পারে, তাদের জন্য রয়েছে ফিদইয়া—একজন মিসকীনকে খাদ্য দান}"। তিনি বললেন: এটি মানসূখ (রহিত) নয়। এই বিধান সেই অতি বৃদ্ধ পুরুষ ও অতি বৃদ্ধা নারীর জন্য প্রযোজ্য, যারা রোযা রাখতে সক্ষম নন। তারা যেন প্রতিটি দিনের পরিবর্তে একজন মিসকীনকে খাদ্য দান করে।









আল-জামি` আল-কামিল (4184)


4184 - عن ابن عباس أنه قال: رُخّص للشّيخ الكبير والعجوز الكبيرة في ذلك وهما يطيقان الصوم أن يُفطرا إن شاءا، ويطعما مكان كلِّ يوم مسكينًا، ثم نُسخ ذلك في هذه الآية: فمن شهد منكم الشهر فليصمه [البقرة: 185] وثبت للشيخ الكبير والعجوز الكبيرة إذا كانا لا يطيقان الصوم، والحامل والمرضع إذا خافتا أفطرتا وأطعمتا مكان كل يوم مسكينًا.

صحيح: رواه أبو داود (2318) عن ابن المثنى، حدثنا ابن أبي عدي، عن سعيد، عن قتادة،
عن عروة (كذا والصواب عزرة)، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره مختصرًا.

ومن طريقه رواه البيهقيّ (4/ 230) بتمامه.

وفي اختصار أبي داود أو من دونه شيء من الخلل في معنى الحديث؛ ولذا نقلت الحديث كاملًا من سنن البيهقيّ. وعزرة هو ابن عبد الرحمن بن زرارة الخزاعيّ شيخ لقتادة.



فقه الحديث:

يفهم من هذه الآيات والأحاديث أنّ الناس على ثلاثة أقسام:

1 - المريض والمسافر، فهما لا يصومان بل يفطران، ويقضيان بعدة أيام من أيام أخر.

2 - الصحيح المقيم. كان مخيرًا في البداية بين الصيام وبين الإطعام، إن شاء صام وإن شاء أفطر وأطعم عن كلّ يوم مسكينًا، فإن أطعم أكثر من مسكين عن كلّ يوم فهو خير، وإن صام فهو أفضل من الإطعام.

وقوله تعالى: {وَعَلَى الَّذِينَ يُطِيقُونَهُ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ}. وتقديره: وعلى الذين يطيقون الصيام إذا أفطروا فدية.

ثم نُسخ ذلك بقوله تعالى: {فَمَنْ شَهِدَ مِنْكُمُ الشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ}.

فأثبت الله الصّيام على المقيم الصحيح الذي يطيق الصّيام.

3 - الشيخ الكبير والمرأة الكبيرة اللذان لا يستطيعان الصيام.

ففيه مذهبان:

الأول: أن يطعموا مكان كلّ يوم مسكينًا.

واستدلوا بقوله تعالى: {وَعَلَى الَّذِينَ يُطِيقُونَهُ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ} فبقي حكمها في هؤلاء كما قال ابن عباس.

وهو قول أبي حنيفة وأحد قولي الشافعي، وعليه أكثر العلماء كما قال ابن كثير.

وهو اختيار البخاري قال:"وأما الشيخ الكبير إذا لم يطق الصيام، فقد أطعم أنس بعد ما كَبِر عامًا أو عامين كلّ يوم مسكينًا خبزًا ولحمًا وأفطر""الفتح" (8/ 179).

المذهب الثاني: لا يجب عليهم إطعام لضعفهم عن الصوم فهم كالصبي الذي لا يجب عليه الفدية؛ لأنّ الله لا يكلف نفسًا إلا وسعها. وبه قال مالك وهو القول الآخر للشافعي.

واختلف في الحامل والمرضع ومن أفطر لكبر ثم قوي على الصوم على مذاهب:

1 - قيل: هم يلحقون بالمذهب الثاني؛ لأنهم لما لم يكونوا قادرين على الصوم عند إيجابه فلا يجب عليهم الفدية ولا القضاء.

2 - وقال أحمد والشافعي: يطعمون ويقضون.
3 - وقال الكوفيون: يقضون ولا يطعمون.

4 - وقال غيرهم: يطعمون ولا يقضون.

وهذا الذي يذهب إليه ابن عباس كما رواه عنه ابن جرير الطبري (3/ 171) وغيره أنه قال لأمّ ولد له حُبلي أو مرضع:"أنتِ بمنزلة الذين لا يطيقونه، عليكِ الفداء ولا صومَ عليك".

وفي رواية عند الدارقطني:"أنت من الذين لا يطيقون الصيام، عليك الجزاء وليس عليك القضاء". وقال: إسناده صحيح.

فهذه أربعة أقوال في هذه المسألة، وأدلة كل واحد منها مبسوطة في كتب الفقه. انظر للمزيد"المنة الكبري" (3/ 336).

وفي فتاوى اللجنة الدّائمة للبحوث العلمية والإفتاء ما نصُّه:"من عجز عن صوم رمضان لكبر سن كالشيخ الكبير والمرأة العجوز أو شقَّ عليه الصوم مشقة شديدة رُخّص له في الفطر، ووجب عليه أن يُطعم عن كل يوم مسكينًا نصف صاع من بُرّ، أو تَمر، أو أرز، أو نحو ذلك مما يطعمه أهله، وكذا المريض الذي عجز عن الصوم أو شق عليه مشقة شديدة ولا يرجى برؤه لقوله تعالى: {لَا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا} [البقرة: 286] وقوله: {وَمَا جَعَلَ عَلَيْكُمْ فِي الدِّينِ مِنْ حَرَجٍ} [الحج: 78]، وقوله: {وَعَلَى الَّذِينَ يُطِيقُونَهُ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ}. قال ابن عباس رضي الله عنهما:"نزلت رخصة في الكبير والمرأة الكبيرة وهما لا يطيقان الصيام أن يفطرا ويطعما عن كل يوم مسكينًا" اهـ.

والمريض الذي يعجز عن الصّوم أو يشق عليه مشقة شديدة ولا يرجى برؤه حكمه حكم الشيخ الكبير الذي لا يقوي على الصوم.

ثانيا: أما الحامل التي تخاف ضررًا على نفسها أو على حملها من الصوم، والمرضع التي تخشى ضررًا على نفسها أو رضيعها من الصوم، فعليهما فقط أن يقضيا ما أفطرتا فيه من الأيام كالمريض الذي يرجى برؤه إذا أفطر.



وقال ابن خزيمة: باب التغليظ في إفطار يوم من رمضان متعمدًا من غير رخصة إن صحَّ الخبر، فإني لا أعرف أبا المطوس غير أنّ حبيب بن أبي ثابت قد ذكر أنه لقي أبا المطوس.

وأبو المطوس، ويقال ابن المطوس. قال ابن حبان:"لا يجوز الاحتجاج بما انفرد من الروايات".

قلت: وهذه منها.

قال الحافظ ابن حجر:"اختلف فيه على حبيب بن أبي ثابت اختلافًا كثيرًا، فحصلت فيه ثلاث علل: الاضطراب، والجهل بحال أبي المطوس، والشك في سماع أبيه من أبي هريرة". الفتح (4/ 161).

وللحديث أسانيد أخرى ولا يصح منها شيء، وقد رُوي موقوفًا على أبي هريرة أيضًا.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন কোনো বৃদ্ধ পুরুষ ও বৃদ্ধা নারী রোযা রাখতে সক্ষম হওয়া সত্ত্বেও ইচ্ছে করলে রোযা না রেখে দিতে পারত এবং তারা রোযার পরিবর্তে প্রতিদিন একজন করে মিসকীনকে খাওয়াতো, তাদের জন্য প্রথমে এ ব্যাপারে অনুমতি (রুখসত) ছিল। কিন্তু পরে এই আয়াত দ্বারা তা রহিত (মানসূখ) করা হয়: “তোমাদের মধ্যে যে এই মাসটিকে পাবে, সে যেন রোযা রাখে।” [সূরা আল-বাকারা: ১৮৫] আর এই হুকুম বহাল (স্থায়ী) থাকে কেবল সেই বৃদ্ধ পুরুষ ও বৃদ্ধা নারীর জন্য যারা রোযা রাখতে একেবারেই সক্ষম নয়। এবং গর্ভবতী ও দুগ্ধদানকারী নারী— যখন তারা (নিজের বা সন্তানের ক্ষতির) ভয় করে, তখন তারা রোযা ভেঙে ফেলবে এবং প্রতিদিনের পরিবর্তে একজন করে মিসকীনকে খাদ্য খাওয়াবে।









আল-জামি` আল-কামিল (4185)


4185 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:" إذا دخل شهرُ رمضان فُتحتْ أبواب السّماء، وغُلِّقت أبوابُ جهنّم، وسُلسلت الشّياطين".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1899)، ومسلم في الصيام (1079) كلاهما من طريق ابن شهاب الزهري، أخبرني ابن أبي أنس مولى التّيميين، أنّ أباه حدّثه أنه سمع أبا هريرة يقول (فذكره).

وابن أبي أنس هو نافع بن مالك بن أبي عامر.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন রমযান মাস শুরু হয়, তখন আকাশের দরজাসমূহ খুলে দেওয়া হয়, জাহান্নামের দরজাসমূহ বন্ধ করে দেওয়া হয় এবং শয়তানদেরকে শৃংখলিত করা হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (4186)


4186 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا كان أوّل ليلة من شهر رمضان صُفِّدت الشياطين مردة الجنّ، وغُلّقت أبواب النار، فلم يفتح منها باب، وفتحت أبواب الجنّة فلم يغلق منها باب، وينادي منادٍ: يا باغي الخير أقبل، ويا باغي الشّر أقْصر. ولله عتقاء من النار، وذلك كلّ ليلة".

حسن: رواه الترمذيّ (682)، وابن ماجه (1642)، وصحّحه ابن خزيمة (1883)، وابن حبان (3435)، والحاكم (1/ 421) كلّهم من حديث محمد بن العلاء بن كريب، حدّثنا أبو بكر بن عياش، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في أبي بكر بن عياش، غير أنه حسن الحديث؛ فإنه ضعِّف من قبل حفظه، كما أن ابن نمير ضعّفه في الأعمش، ولعلّه لذلك قال الترمذي:"حديث غريب، لا نعرفه من رواية أبي بكر بن عياش، عن الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، إلّا من حديث أبي بكر".

قال: وسألت محمد بن إسماعيل عن هذا الحديث فقال: حدثنا الحسن بن الربيع، حدثنا أبو الأحوص، عن الأعمش، عن مجاهد قوله.

قال محمد: وهذا أصح عندي من حديث أبي بكر بن عياش" انتهى.

هذا رأي البخاريّ، وخالفه أصحاب الصحاح فأخرجوه في كتبهم. قال الحاكم:"صحيح على
شرط الشيخين ولم يخرجاه بهذه السياقة".

وأشار الحافظ ابن حجر في"الفتح" (4/ 114) إلى رواية ابن خزيمة وغيره ولم يعلق عليه بشيء، فالظاهر أنه يذهب إلى تحسينه.

ويقويه ما رواه أبو قلابة، عن أبي هريرة، قال: لما حضر رمضان، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: قد جاءكم رمضان، شهر مبارك، افترض الله عليكم صيامه، تُفتح فيه أبواب الجنة، وتغلق فيه أبواب الجحيم، وتُغلّ فيه الشياطين، فيه ليلة خير من ألف شهر، من حُرم خيرها فقد حُرم".

رواه النسائيّ (2106)، وعبد الرزاق (8383)، وأحمد (7148) كلّهم من حديث أيوب السختياني، عن أبي قلابة، عنه.

وأبو قلابة اسمه عبد الله بن زيد الجرمي لم يسمع من أبي هريرة. ذكره العلائي وقال: الظاهر في ذلك كلّه الإرسال.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন রমজান মাসের প্রথম রাত আসে, তখন দুষ্ট জিনদের (অর্থাৎ) শয়তানদেরকে শৃঙ্খলাবদ্ধ করা হয়, জাহান্নামের দরজাগুলো বন্ধ করে দেওয়া হয়, আর তার কোনো দরজাই খোলা হয় না। জান্নাতের দরজাগুলো খুলে দেওয়া হয়, আর তার কোনো দরজাই বন্ধ করা হয় না। আর একজন ঘোষক (ফেরেশতা) ঘোষণা করেন: 'হে কল্যাণের অনুসন্ধানকারী, এগিয়ে আসো! আর হে অকল্যাণের অনুসন্ধানকারী, বিরত হও (বা ক্ষান্ত হও)। আর আল্লাহ্‌র পক্ষ থেকে অনেক লোককে জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেওয়া হয়। আর এটা প্রত্যেক রাতেই হয়ে থাকে।।"









আল-জামি` আল-কামিল (4187)


4187 - عن أبي هريرة أو أبي سعيد -هو شكّ يعني الأعمش-، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إن لله عتقاء في كلّ يوم وليلة، لكلّ عبد منهم دعوة مستجابة".

صحيح: رواه الإمام أحمد (7450) عن أبي معاوية، حدثنا الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة أو أبي سعيد، فذكره.

والشك في الصحابي لا يضر. وهذا المطلق جاء مقيدًا بشهر رمضان كما رواه أبو بكر بن عياش، عن الأعمش، كما مضى.




আবূ হুরায়রা অথবা আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয়ই আল্লাহ তা‘আলার পক্ষ থেকে এমন কিছু লোক আছেন যাদেরকে তিনি প্রতিদিন ও প্রতি রাতে (জাহান্নাম থেকে) মুক্তি দেন। তাদের প্রত্যেকের জন্য একটি করে কবুল হওয়া দু‘আ (প্রার্থনা) রয়েছে।”









আল-জামি` আল-কামিল (4188)


4188 - عن أبي أمامة الباهلي، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الله عند كلّ فطر عتقاء".

حسن: رواه الإمام أحمد (22202)، والطبراني في الكبير (8/ 340)، والبيهقي في شعب الإيمان (3605) كلّهم من حديث عبد الله بن نمير، حدّثنا الأعمش، عن حسين الخراسانيّ، عن أبي غالب، عن أبي أمامة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل أبي غالب صاحب أبي أمامة وهو مختلف فيه غير أنه حسن الحديث في الشواهد، وقد وثقه الدارقطني وغيره، وضعّفه الآخرون.

وأورده المنذري في الترغيب والترهيب (1516) وقال: إسناده لا بأس به.




আবূ উমামাহ আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা‘আলা প্রতিটি ইফতারের সময় বহু ব্যক্তিকে (জাহান্নামের আগুন থেকে) মুক্তি দিয়ে থাকেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (4189)


4189 - عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ لله عند كلّ فطر عتقاء، وذلك في كلّ ليلة".

حسن: رواه ابن ماجه (1643) عن أبي كريب، قال: حدثنا أبو بكر بن عياش، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في أبي بكر بن عياش غير أنه حسن الحديث.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: নিশ্চয়ই আল্লাহ তা'আলা ইফতারের সময় বহু লোককে জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেন এবং এটি প্রত্যেক রাতেই হয়ে থাকে।









আল-জামি` আল-কামিল (4190)


4190 - عن أنس بن مالك، قال: دخل رمضان، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ هذا الشهر قد حضركم، وفيه ليلة خير من ألف شهر، من حُرمها فقد حرم الخير كلّه، ولا يُحرم خيرها إلا محروم".

حسن: رواه ابن ماجه (1644) عن أبي بدر عباد بن الوليد، حدثنا محمد بن بلال، قال: حدثنا عمران القطان، عن قتادة، عن أنس بن مالك، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عمران وهو ابن دَاوَر -بفتح الواو وبعدها راء- أبو العوام القطان البصري، مختلف فيه فضعفه ابن معين وأبو داود والنسائي، ومشاه الآخرون. فقال أحمد: أرجو أن يكون صالح الحديث. وقال البخاري والترمذي: صدوق. وقال ابن عدي: هو ممن يكتب حديثه، وذكره ابن حبان في الثقات. فمثله يحسّن حديثه إذا لم يأت في حديثه بما ينكر عليه، وله أصول صحيحة.

وذكره الحافظ المنذري في"الترغيب والترهيب" (1511) وعزاه إلى ابن ماجه وحسن إسناده.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রমযান মাস প্রবেশ করল, তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "নিশ্চয়ই এই মাস তোমাদের মাঝে এসে উপস্থিত হয়েছে। এতে এমন একটি রাত আছে যা এক হাজার মাসের চেয়েও উত্তম। যে ব্যক্তি এই রাত থেকে বঞ্চিত হলো, সে সব ধরনের কল্যাণ থেকে বঞ্চিত হলো। আর হতভাগা (বা বঞ্চিত) ছাড়া অন্য কেউ এর কল্যাণ থেকে বঞ্চিত হয় না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4191)


4191 - عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، قال:"في رمضان تُفتح أبواب السماء، وتغلق أبواب النار، ويُصفَّد فيه كلّ شيطان مَريد، وينادي منادٍ كلّ ليلة: يا طالب الخير! هلمَّ، ويا طالب الشّر! أمسك".

حسن: رواه النسائيّ (2108)، وأحمد (18749) كلاهما من حديث محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن عطاء بن السائب، عن عرفجة، قال: كنت في بيت فيه عتبة بن فرقد، فأردتُ أن أحدّث بحديث قال: فكان رجل من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم كأنه أولى بالحديث منه. قال: فحدَّث الرجل عن رسول الله أنه قال (فذكر الحديث).

وإسناده حسن من أجل عرفجة وهو ابن عبد الله الثقفي، وثقه العجلي، وابن حبان، وروى عنه جمع.

وعطاء بن السائب مختلط إلا أن رواية شعبة عنه كانت قبل الاختلاط.

وقد خطّأ النسائي رواية سفيان، عن عطاء بن السائب، عن عرفجة، قال:"عُدنا عتبة بن فرقد، فتذاكرنا شهر رمضان. فقال: ما تذكرون؟ قلنا: شهر رمضان. قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث نحوه).

قال النسائي:"هذا خطأ" يعني جعل الحديث من مسند عتبة بن فرقد، والصحيح أنه لرجل من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم.

وكذلك جعل الإمام أحمد من مسند رجل (من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم) ولم يجعله من مسند عتبة بن فرقد؛ لأنه ليس له مسند عنده أصلًا.




রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "রমজানে আসমানের দরজাসমূহ খুলে দেওয়া হয়, এবং জাহান্নামের দরজাসমূহ বন্ধ করে দেওয়া হয়, আর এতে প্রত্যেক অবাধ্য শয়তানকে শৃঙ্খলিত করা হয়। এবং প্রতি রাতে একজন ঘোষণাকারী ঘোষণা করতে থাকেন: 'হে কল্যাণ অন্বেষণকারী! এগিয়ে এসো, আর হে অকল্যাণ অন্বেষণকারী! ক্ষান্ত হও।'"









আল-জামি` আল-কামিল (4192)


4192 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من صام رمضان إيمانًا واحتسابًا، غُفر له ما تقدّم من ذنبه، ومن قام ليلة القدر إيمانًا واحتسابًا غُفر له ما تقدّم من ذنبه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّوم (1901)، ومسلم في صلاة المسافرين (760) كلاهما من طريق هشام الدّستوائيّ، حدّثنا يحيى بن أبي كثير، حدّثنا أبو سلمة بن عبد الرحمن، أنّ أبا هريرة حدّثهم به، فذكره.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সওয়াবের আশায় রমযান মাসে সাওম (রোযা) পালন করে, তার পূর্বের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়। আর যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সওয়াবের আশায় লাইলাতুল কদরের রাতে কিয়াম (নামায) করে, তারও পূর্বের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (4193)


4193 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من صام رمضان إيمانًا واحتسابًا غُفر له ما تقدّم من ذنبه".

قال عبد الله بن أحمد: قال أبي: سمعته أربع مرات من سفيان.

وقال مرة:"من صام رمضان".

وقال مرة:"من قام رمضان، ومن قام ليلة القدر إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدّم من ذنبه".

صحيح: رواه الإمام أحمد (7280) عن سفيان (هو ابن عيينة)، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.

هذا الحديث رواه عدد من أصحاب سفيان، منهم: قتيبة بن سعيد، ومحمد بن عبد الله بن يزيد، وإسحاق بن إبراهيم، به، مثله.

وعن هؤلاء أخرجه النسائي (2202، 2203).

ولكن جاء في"سننه الكبرى" (3314) في النسخة الهندية، عن قتيبة بن سعيد، عن سفيان، وفيه:"من قام رمضان إيمانا واحتسابًا غفر له ما تقدّم من ذنبه وما تأخّر".

وأشار محقق الكتاب إلى أن قوله:"وما تأخر" ثابت في أصلين وضرب عليه في الثالث.

ولكن أشار الحافظ ابن حجر في"الخصال المكفرة" (ص 52 - 54) إلى وجود هذه الزيادة في السنن الكبرى، وقال:"إنه لم ينفرد بهذه الزيادة، بل تابعه كل من حامد بن يحيى البلخيّ عند قاسم ابن أصبغ في"مصنفه" وهشام بن عمار في"فوائده"، ويوسف بن يعقوب النجاحي عند أبي بكر المقرئ في"فوائده"، والحسين بن الحسن المروزي في"كتاب الصيام" له" انتهى.

ولكن رواه جمهور اصحاب سفيان وهم أكثر عددًا وأحسن ضبطًا ولم يذكروا هذه الزيادة منهم الإمام أحمد -كما رأيت-، وعلي بن المديني عند البخاري (2014) والشافعي والحميدي، ومخلد ابن خالد ومحمد بن أحمد بن أبي خلف. أخرج عن الأخيرين أبو داود (1372)، وعمرو بن علي الفلاس عند ابن خزيمة (1894)، وعبد الجبار بن العلاء وسعيد بن عبد الرحمن المخزومي مع عمرو بن علي عنده أيضًا (2199)، وابن المقري عند ابن الجارود (404)، وأبو خيثمة عند أبي
بعلي (5960) وغيرهم وهم كثيرون.

وقد رواه جماعة عن الزهري منهم: مالك، وعقيل بن أبي خالد الأيلي، وصالح بن كيسان،

ومحمد بن عبد الرحمن بن أبي ذئب، والأوزاعي، وغيرهم ولم يذكروا هذه الزيادة.

وأشار الحافظ إلى ذلك بقوله:"والمشهور عن الزهريّ بدونها".

فدلّ على أنّ هذه الزيادة شاذّة في حديث أبي هريرة.

وكذلك انفرد بهذه الزيادة حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي هريرة. رواه أحمد (9001) عن عفان، عن حماد بن سلمة.

ورواه الترمذي (683) وابن ماجه (1326) وابن حبان (3682) وغيرهم من طرق أخرى عن محمد بن عمرو، ولم يذكروا فيه وما تأخر".




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সাওয়াবের আশায় রমজানের রোজা পালন করবে, তার পূর্বের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4194)


4194 - عن عمرو بن مرّة الجهنيّ، قال: جاء رجلٌ إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، أرأيتَ إن شهدتُ لا إله إلا الله، وأنّك رسولُ الله، وصليتُ الصلوات الخمس، وأديتُ الزّكاة، وصمتُ رمضان وقمتُه، فممن أنا؟ قال:"من الصدِّيقين والشّهداء".

صحيح: رواه ابن خزيمة (2212)، وابن حبان (3438) كلاهما من حديث الحكم بن نافع، عن شعيب بن أبي حمزة، عن عبد الله بن عبد الرحمن بن أبي حسين، عن عيسى بن طلحة، قال: سمعت عمرو بن مرة الجهنيّ، فذكره.

ورواه البزار -كشف الأستار (25) - من وجه آخر عن الحكم بن نافع.

وحسَّن إسناده الهيثمي أو صححه. مجمع الزوائد (1/ 46).

وفي الباب ما رُوي عن أبي سعيد الخدريّ، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من صام رمضان، وعرف حدوده وتحفّظ مما كان ينبغي له أن يتحفّظ فيه، كفّر ما قبله".

رواه الإمام أحمد (11524)، وأبو يعلى (1058)، وابن حبان (3433) كلّهم من حديث عبد الله بن المبارك -وهو في زهده (98) -، عن يحيى بن أيوب، عن عبد الله بن قريط، أنّ عطاء بن يسار حدّثه، أنه سمع أبا سعيد الخدريّ، فذكره.

وعبد الله بن قريط لم يرو عنه إلا يحيى بن أيوب، وذكره ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (5/ 140) ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا، فهو في عداد المجهولين؛ ولذا قال الحسيني في"الإكمال":"مجهول".

وأما ابن حبان فذكره في"الثقات" وأخرج حديثه في"صحيحه" وذلك بناء على منهجه.

وفي الباب ما رُوي أيضًا عن سلمان، قال: خطبنا رسول الله صلى الله عليه وسلم في آخر يوم من شعبان، فقال: أيها الناس! قد أظلكم شهر عظيم، شهر مبارك، شهر فيه ليلة خير من ألف شهر، جعل الله
صيامه فريضة، وقيام ليله تطوّعًا، من تقرّب فيه بخصلة من الخير، كان كمن أدّى فريضة فيما سواه، ومن أدّى فيه فريضة كان كمن أدّى سبعين فريضة فيما سواه، وهو شهر الصبر، والصبر ثوابه الجنة، وشهر المواساة، وشهر يزداد فيه رزق المؤمن، من فطَّر فيه صائمًا كان مغفرة لذنوبه وعتق رقبته من النار، وكان له مثل أجره من غير أن ينتقص من أجره شيء".

قالوا: ليس كلنا نجد ما يفطّر الصائم. فقال:"يعطي الله هذا الثواب من فطّر صائمًا على تمرة، أو شربة ماء، أو مذقة لبن، وهو شهر أوله رحمة، وأوسطه مغفرة، وآخره عتق من النار. من خفّف عن مملوكه غفر الله له، وأعتقه من النار، واستكثروا فيه من أربع خصال: خصلتين ترضون بهما ربكم، وخصلتين لا غني بكم عنهما. فأما الخصلتان اللتان ترضون بهما ربكم: فشهادة أن لا إله إلا الله، وتستغفرونه، وأما اللتان لا غنى بكم عنهما: فتسألون الله الجنة، وتعوذون به من النار، ومن أشبع فيه صائمًا سقاه الله من حوضي شربة لا يظمأ حتى يدخل الجنة".

رواه ابن خزيمة في"صحيحه" (1887) وقال:"إن صح الخبر، والبيهقي في"فضائل الأوقات" (37)، وشعب الإيمان (3336)، والأصفهاني في"الترغيب والترهيب" (1753) كلّهم من طرق عن يوسف بن زياد، ثنا همام بن يحي، عن علي بن زيد، عن سعيد بن المسيب، عن سلمان الفارسيّ، فذكره.

ويوسف بن زياد هو البصري أبو عبد الله، قال البخاري وأبو حاتم:"منكر الحديث"، وقال الدارقطني:"مشهور بالأباطيل".

وفيه أيضا على بن زيد وهو ابن جدعان ضعيف عند أئمة الحديث.

وأما رواه الحارث في مسنده -بغية الباحث (321) - عن عبد الله بن بكر، قال: حدثني بعض أصحابنا رجل يقال له: إياس -رفع الحديث إلى سعيد بن المسيب، عن سلمان الفارسي، قال (فذكر الحديث).

فليس إياس وهو ابن عبد الغفار متابعًا لعلي بن زيد بن جدعان، بل المقصود من قول الراوي أنه رفع الحديث إلى سعيد بن المسيب من طريق علي بن زيد بن جدعان كما هو مصرّح في شعب الإيمان للبيهقي (3336) فإنه رواه من طريق عبد الله بن بكر السهمي، حدثنا إياس بن عبد الغفار، عن علي بن زيد بن جدعان بإسناده نحوه.

وإياس بن عبد الغفار وهو إياس بن أبي إياس قال عنه العقيلي في الضعفاء (1/ 35):"مجهول، وحديثه غير محفوظ"، ثم ذكر هذا الحديث وقال:"قد رُوي من غير وجه ليس له طريق ثبت بين". انتهي.




আমর ইবনু মুররাহ আল-জুহানি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি বলুন, যদি আমি সাক্ষ্য দিই যে আল্লাহ ছাড়া কোনো উপাস্য নেই এবং আপনি আল্লাহর রাসূল, আর আমি পাঁচ ওয়াক্ত সালাত আদায় করি, যাকাত প্রদান করি, রমজানের সিয়াম পালন করি ও রাতে কিয়াম (ইবাদত) করি, তাহলে আমি কাদের অন্তর্ভুক্ত হব? তিনি বললেন: "তুমি সিদ্দীকীন (মহাসত্যবাদী) এবং শহীদদের (শাহাদাতপ্রাপ্তদের) অন্তর্ভুক্ত হবে।"

এই বিষয়ে আরও বর্ণিত আছে আবূ সাঈদ আল-খুদরি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি রমজানের সওম পালন করল, তার সীমাসমূহ জানল এবং তাতে যা থেকে বেঁচে থাকা উচিত তা থেকে বেঁচে থাকল, তার পূর্ববর্তী গুনাহসমূহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়।"

এই বিষয়ে আরও বর্ণিত আছে সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শাবান মাসের শেষ দিনে আমাদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন এবং বললেন: "হে লোক সকল! তোমাদের উপর এক মহান ও বরকতময় মাস ছায়া ফেলেছে। এটি এমন মাস, যাতে একটি রাত আছে যা হাজার মাসের চেয়ে উত্তম। আল্লাহ এর সওমকে ফরজ করেছেন এবং এর রাতে قيام (ইবাদতে দণ্ডায়মান হওয়া)কে নফল করেছেন। যে ব্যক্তি এতে একটি নফল সৎকাজ দ্বারা আল্লাহর নৈকট্য লাভ করে, সে অন্য মাসে একটি ফরজ আদায় করার সমতুল্য হয়। আর যে ব্যক্তি এতে একটি ফরজ আদায় করে, সে অন্য মাসে সত্তরটি ফরজ আদায় করার সমতুল্য হয়। এটি সবরের মাস, আর সবরের প্রতিদান হলো জান্নাত। এটি সহানুভূতি ও সহমর্মিতার মাস, এবং এটি এমন মাস যাতে মুমিনের রিযিক বৃদ্ধি করা হয়। যে ব্যক্তি এতে কোনো সওম পালনকারীকে ইফতার করাবে, তা তার গুনাহের মাগফিরাত এবং জাহান্নামের আগুন থেকে তার ঘাড়কে মুক্ত করার কারণ হবে। ইফতার করানো ব্যক্তির সওয়াব থেকে বিন্দুমাত্র কমানো ছাড়াই সে সেই সাওম পালনকারীর সমান সওয়াব লাভ করবে।"

সাহাবাগণ বললেন: আমাদের সকলের কাছে তো সাওম পালনকারীকে ইফতার করানোর মতো পর্যাপ্ত জিনিস নেই। তিনি বললেন: "আল্লাহ এই সওয়াব তাকেও দেবেন যে একটি খেজুর বা এক ঢোঁক পানি অথবা সামান্য দুধ দ্বারা কোনো সওম পালনকারীকে ইফতার করাবে। এটি এমন মাস যার প্রথম অংশ রহমত, মধ্যম অংশ মাগফিরাত এবং শেষ অংশ জাহান্নাম থেকে মুক্তি। যে ব্যক্তি তার অধীনস্থদের (মালিকানাধীন দাস/কর্মচারীদের) বোঝা হালকা করবে, আল্লাহ তাকে ক্ষমা করবেন এবং তাকে জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেবেন। তোমরা এই মাসে চারটি কাজ বেশি পরিমাণে করো: দুটি কাজ যা দ্বারা তোমরা তোমাদের প্রতিপালককে সন্তুষ্ট করবে, এবং দুটি কাজ যা ছাড়া তোমাদের কোনো উপায় নেই। যে দুটি কাজ দ্বারা তোমরা তোমাদের প্রতিপালককে সন্তুষ্ট করবে, তা হলো: 'লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ'-এর সাক্ষ্য প্রদান করা এবং তাঁর কাছে ক্ষমা চাওয়া (ইস্তেগফার করা)। আর যে দুটি কাজ ছাড়া তোমাদের কোনো উপায় নেই, তা হলো: তোমরা আল্লাহর কাছে জান্নাত চাইবে এবং জাহান্নাম থেকে তাঁর কাছে আশ্রয় প্রার্থনা করবে। আর যে ব্যক্তি এই মাসে কোনো সওম পালনকারীকে তৃপ্তির সাথে খাবার খাওয়াবে, আল্লাহ তাকে আমার হাউয (হাউযে কাওসার) থেকে এমন পানীয় পান করাবেন যার ফলে জান্নাতে প্রবেশ করা পর্যন্ত সে আর কখনও পিপাসার্ত হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4195)


4195 - عن أبي بكرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا يقولنّ أحدُكم: إنّي صمتُ رمضان كلَّه
وقمته كلَّه" فلا أدري أكره التركية، أو قال: لا بد من نومة أو رقدة.

حسن: رواه أبو داود (2415)، والنسائيّ (2109)، وأحمد (20406)، وصحّحه ابن خزيمة (2075)، وابن حبان (3439) كلّهم من حديث يحيى بن سعيد، قال: حدّثنا المهلّب بن أبي حبيبة، قال: حدّثنا الحسن، عن أبي بكرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل المهلَّب بن أبي حبيبة فإنّه حسن الحديث.

وفيه الحسن وهو ابن أبي الحسن البصريّ، واسم أبيه بسار أحد الأئمة الأعلام إلا أنه كان كثير التدليس والإرسال.

قال الدارقطني: إنّ الحسن لم يسمع من أبي بكرة.

ولكن ذكر العلائي في"جامع التحصيل": وله عنه في صحيح البخاريّ عدّة أحاديث، منها حديث الكسوف، ومنها حديث"زادك الله حرصًا ولا تعد" وإن لم يكن فيها التصريح بالسماع فالبخاري لا يكتفي بمجرد إمكان اللقاء كما تقدم، وغاية ما اعتل به الدارقطني أن الحسن روي أحاديث الأحنف بن قيس، عن أبي بكرة. وذلك لا يمنع من سماعه منه ما أخرجه البخاريّ" انتهى.

وزاد أبو زرعة العراقي في"تحفة التحصيل":"وتقدم قول بهز بن أسد أنه سمع منه. وفي سنن النسائي (2/ 118) أن أبا بكرة حدّثه فذكر ركوعه قبل أن يصل الصّف".

ثم إخراج ابن حبان قرينة لسماع الحسن عن أبي بكرة، كما نبه إلى ذلك في المقدمة في قضية المدلسين الذين يوردهم بالعنعنة.




আবূ বাকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যেন না বলে: ‘আমি পুরো রমযান মাস রোযা রেখেছি এবং পুরো রাত ইবাদাত করেছি।’ আমি জানি না, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি আরাম-বিশ্রাম (সম্পূর্ণ) ত্যাগ করা অপছন্দ করেছেন, নাকি তিনি বলেছেন: 'কিছু ঘুম বা বিশ্রাম অবশ্যই প্রয়োজন।'"









আল-জামি` আল-কামিল (4196)


4196 - عن ابن عباس، قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم أجْود الناسِ بالخير، وكان أجودَ ما يكون في رمضان حين يلقاه جبريل، وكان جبريلُ عليه السلام يلقاه كلَّ ليلة في رمضان حتى ينسلخ، يعرضُ عليه النبيّ صلى الله عليه وسلم القرآن، فإذا لقيه جبريل عليه السلام كان أجودَ بالخير من الرّيح المرسلة.

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1902)، ومسلم في الفضائل (2308) من طريق إبراهيم ابن سعد، أخبرنا ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن ابن عباس، فذكره.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ছিলেন কল্যাণের ক্ষেত্রে (দানের ক্ষেত্রে) মানুষের মধ্যে সবচেয়ে উদার। আর তিনি রমযান মাসে সবচেয়ে বেশি উদার হতেন, যখন জিবরীল (আঃ) তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করতেন। জিবরীল (আঃ) রমযান মাস শেষ না হওয়া পর্যন্ত প্রতি রাতে তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করতেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে কুরআন পড়ে শোনাতেন। যখন জিবরীল (আঃ) তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করতেন, তখন তিনি কল্যাণের ক্ষেত্রে প্রেরিত (দ্রুতগামী) বাতাসের চেয়েও বেশি উদার হয়ে যেতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4197)


4197 - عن عبد الله بن عمر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر رمضان، فقال:"لا تصوموا حتى تروا الهلال، ولا تُفطروا حتى تروه، فإن غمَّ عليكم فاقدروا له".
متفق عليه: رواه مالك في الصيام (1) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره.

ورواه البخاري في الصوم (1906)، ومسلم في الصيام (1080) كلاهما من طريق مالك، به.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসের উল্লেখ করে বললেন: "তোমরা চাঁদ না দেখা পর্যন্ত সওম (রোযা) শুরু করো না এবং চাঁদ না দেখা পর্যন্ত ইফতার (ঈদ) করো না। যদি তোমাদের উপর (আকাশ) মেঘাচ্ছন্ন থাকে, তাহলে এর জন্য অনুমান (গণনা) করে নাও।"









আল-জামি` আল-কামিল (4198)


4198 - عن عبد الله بن عمر، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الشّهر تسعٌ وعشرون، فلا تصوموا حتى تروا الهلال، ولا تُفطروا حتى تروه، فإنْ غُمَّ عليكم فاقدروا له".

متفق عليه: رواه مالك في الصيام (2) عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر، فذكره.

ورواه البخاريّ في الصوم (1970) عن عبد الله بن مسلمة (هو القعنبي)، حدّثنا مالك، به، مثله إلا أنه قال في آخره:"فإن غُمَّ عليكم فأكملوا العِدة ثلاثين".

ورواه مسلمٌ في الصيام (1080: 9) من طريق إسماعيل بن جعفر، عن عبد الله بن دينار، به، بمثل لفظ مالك في الموطأ.

قال ابن حجر في الفتح (4/ 121):"وأما حديث ابن عمر فاتفق الرواة عن مالك، عن نافع، فيه على قوله:"فاقدروا له" … واتفق الرواة عن مالك، عن عبد الله بن دينار أيضًا فيه على قوله:"فاقدروا له" وكذلك رواه الزعفراني وغيره عن الشافعي -يعني عن مالك-.

وكذا رواه إسحاق الحربي وغيره في"الموطأ" عن القعنبي.

وأخرجه الربيع بن سليمان، والمزني عن الشافعي فقال فيه كما قال البخاريّ عن القعنبي:"فإنْ غُمَّ عليكم فأكملوا العدَّة ثلاثين".

وقال البيهقيّ في"المعرفة":"إن كانت رواية الشافعي والقعنبي من هذين الوجهين محفوظة، فيكون مالك قد رواه على الوجهين".

وهذا هو الصحيح لتفسير قوله صلى الله عليه وسلم:"فاقدروا له" بإكمال العِدّة ثلاثين. يقول الخطابي في"معالمه":"وعلى هذا قول عامة أهل العلم، ويؤكّد ذلك نهيه صلى الله عليه وسلم عن صوم يوم الشّك.

وكان أحمد يقول: إذا لم يُر الهلال لتسع وعشرين من شعبان -لعلّة في السماء- صام الناس، وإن كان صحوا لم يصوموا اتباعا لمذهب ابن عمر" انتهى.

وقال ابن عبد الهادي في"التنقيح" (3/ 199):"الذي دلّت عليه الأحاديث في هذه المسألة وهو مقتضى القواعد أنّ أيّ شهر غُمَّ أكمل ثلاثين، سواء في ذلك شهر شعبان، وشهر رمضان وغيرهما، وعلى هذا فقوله:"فإن غُمَّ عليكم فأكملوا العِدّة" يرجع إلى الجملتين -وهما قوله:"صوموا لرؤيته، وأفطروا لرؤيته؛ فإن غُمّ عليكم فأكملوا العدّة" أي غُمّ عليكم في صومكم أو فطركم، وهذا هو الظاهر من اللفظ، وباقي الأحاديث تدل على هذا، كقوله:"فإن غمّ عليكم فاقدروا له". وليس المراد: ضيِّقوا، كما ظنَّه من الأصحاب، بل المعني: احسبوا له قدره، فهو من قدر الشيء -وهو مبلغ كميته- ليس من التضييق في شيء" انتهى.

ولابن عبد الهادي رسالة لطيفة ذكر فيها الروايات عن الإمام أحمد وأثبت أن الصحيح منها أنه
لا يصوم ثلاثين من شعبان، وعليه تدل الأحاديث الواردة في هذا الموضوع، وهذه الرسالة باسم:"إقامة البرهان على عدم وجوب صيام يوم الثلاثين من شعبان".




আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “মাস হয় উনত্রিশ দিনে। সুতরাং তোমরা চাঁদ না দেখা পর্যন্ত রোযা শুরু করো না, আর তা (ঈদের চাঁদ) না দেখা পর্যন্ত রোযা ভঙ্গ করো না (ঈদ করো না)। যদি তা তোমাদের উপর মেঘাচ্ছন্ন থাকে, তাহলে এর জন্য গণনা করে নাও।”









আল-জামি` আল-কামিল (4199)


4199 - عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الشهر تسع وعشرون فلا تصوموا حتى تروه، ولا تفطروا حتى تروه، فإن غم عليكم فاقدروا له ثلاثين".

قال: فكان ابن عمر إذا كان شعبان تسعًا وعشرين نظر له، فإن رؤي فذاك، وإن لم يُر ولم يحل دون نظره سحاب ولا قترة أصبح مفطرًا، فإن حال دون منظره سحاب أو قترة أصبح صائمًا.

قال: فكان ابن عمر يفطر مع الناس، ولا يأخذ بهذا الحساب.

صحيح: رواه أبو داود (2320) عن داود بن سلمان العتكي، حدّثنا حماد، حدّثنا أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وإسناده صحيح. والمرفوع منه مخرج في الصحيحين كما مضى غير أنهما لم يذكرا قصة ابن عمر.

وأخرجه البيهقي (4/ 204) من وجه آخر عن أيوب، وقال: قال ابن عون: ذكرت فعل ابن عمر لمحمد بن سيرين فلم يعجبه.

وقال: أخرجه مسلم (1080: 6) عن زهير بن حرب، عن إسماعيل ابن علية (عن أيوب) دون فعل ابن عمر. انتهى.

وقوله:"وكان ابن عمر يُفطر مع الناس، ولا يأخذ بهذا الحساب". يريد أنه كان يفعل هذا الصنيع في شهر شعبان احتياطًا للصوم، ولا يأخذ بهذا الحساب في شهر رمضان، ولا يفطر إلا مع الناس.

والقترة: الغبرة في الهواء الحائلة بين الأبصار وبين رؤية الهلال. أفاده أبو سليمان الخطابي.

وكتب عمر بن عبد العزيز إلى أهل البصرة:"بلغنا عن رسول الله صلى الله عليه وسلم نحو حديث ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم وزاد:"وإن أحسن ما يقدر له أنا إذا رأينا هلال شعبان لكذا وكذا، فالصوم إن شاء الله لكذا وكذا، إلا أن تروا الهلال قبل ذلك". رواه أبو داود (2321) عن حميد بن مسعدة، حدّثنا عبد الوهاب، حدثني أيوب، قال: كتب عمر بن عبد العزيز، فذكره.

ورجاله ثقات إلى عمر بن عبد العزيز.

قال المنذري في"مختصره":"وهذا الذي قاله عمر بن عبد العزيز قضت به الروايات الثابتة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم".

وقال البيهقي (4/ 205):"والذي يدل على صحة ما ذكره عمر بن عبد العزيز سائر الروايات عن النبيّ في هذا الباب منها حديث ابن عمر".

وهم يقصدون حديث ابن عمر المرفوع، وهو قوله صلى الله عليه وسلم:"الشهر تسع وعشرون فلا تصوموا حتى تروه، ولا تفطروا حتى تروه، فإن غمّ عليكم فاقدروا له ثلاثين".

وهذا الذي قاله عمر بن عبد العزيز هو قول أكثر أهل العلم منهم أبو حنيفة ومالك والشافعي
وأحمد في رواية، وعليه فتوى اللجنة الدّائمة.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “মাস ঊনত্রিশ দিনের হয়। সুতরাং তোমরা চাঁদ না দেখে সিয়াম শুরু করবে না এবং চাঁদ না দেখে ইফতার (ঈদ) করবে না। যদি তোমাদের জন্য মেঘাচ্ছন্ন থাকে, তাহলে তোমরা (মাসকে) ত্রিশ দিন পূর্ণ করো।”

তিনি (ইবনু উমর) বলেন: শা'বানের যখন ঊনত্রিশ দিন পূর্ণ হতো, তখন ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চাঁদের দিকে তাকাতেন। যদি চাঁদ দেখা যেত, তবে তো সেটাই। আর যদি চাঁদ দেখা না যেত এবং চাঁদ দেখা থেকে মেঘ বা ধুলোবালি কোনো কিছু বাধা না দিত, তবে তিনি পরের দিন রোজা না রেখে ইফতার করতেন। কিন্তু যদি চাঁদ দেখা থেকে মেঘ বা ধুলোবালি বাধা দিত, তবে তিনি পরের দিন রোজা রাখতেন।

তিনি বলেন: ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মানুষের সাথে ঈদ করতেন (রোজা ভাঙতেন), আর তিনি এই হিসাব অনুসরণ করতেন না।

আর তাঁর এই কথা যে, “ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মানুষের সাথে ঈদ করতেন, আর তিনি এই হিসাব অনুসরণ করতেন না”— এর দ্বারা উদ্দেশ্য হলো, তিনি সিয়ামের সাবধানতা হিসেবে শা'বান মাসে এই কাজ করতেন, কিন্তু রামাদান মাসে তিনি এই হিসাব অনুসরণ করতেন না, বরং তিনি মানুষের সাথেই ঈদ করতেন।

উমার ইবনু আব্দুল আযীয (রাহিমাহুল্লাহ) বসরাবাসীদের নিকট লিখেছিলেন: "রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে আমাদের কাছে ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কর্তৃক বর্ণিত হাদীসের মতোই খবর পৌঁছেছে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেছেন: 'আর এই (মাস পূর্ণ করার) জন্য সবচেয়ে উত্তম হিসাব হলো, যখন আমরা অমুক দিনে শা'বানের চাঁদ দেখি, তখন ইনশাআল্লাহ অমুক দিন সাওম শুরু হবে—তবে তোমরা এর পূর্বে চাঁদ দেখতে পেলে ভিন্ন কথা।'"









আল-জামি` আল-কামিল (4200)


4200 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صوموا لرؤيته وأفطروا لرؤيته، فإن غُمِّي عليكم الشَّهر فعدُّوا ثلاثين".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1909)، ومسلم في الصيام (1081: 19) كلاهما من طريق شعبة، حدّثنا محمد بن زياد، قال: سمعت أبا هريرة يقول (فذكره) واللفظ لمسلم.

ولفظ البخاريّ:" … فإن غُبي عليكم فأكملوا عدّة شعبان ثلاثين".

كذا في النسخة التي بين أيدينا، وقد أشار الحافظ إلى أنها كذلك في رواية"السرخي" وضبطها بفتح الغين المعجمة وتخفيف الموحدة."غبي" قال:"وأغمي وغُمّ وغمي - بتشديد الميم وتخفيفها - فهو مغموم، الكل بمعنى، وأما غبي فمأخوذ من الغباوة وهو عدم الفطنة، وهي استعارة لخفاء الهلال، ونقل ابن العربي أنه روي"عُمِي" بالعين المهملة. من العمي. قال: وهو بمعناه لأنه ذهاب البصر عن المشاهدات أو ذهاب البصيرة عن المعقولات" انتهى من الفتح (4/ 124).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা চাঁদ দেখে সওম (রোযা) শুরু করো এবং চাঁদ দেখে ইফতার (ঈদ) করো। আর যদি তোমাদের উপর মাসটি মেঘাচ্ছন্ন থাকে, তবে ত্রিশ (দিন) গণনা করো।"