আল-জামি` আল-কামিল
4248 - عن سمرة بن جندب، قال: سمعت النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"لا يغرنّ أحدَكم نداءُ بلال من السحور، ولا هذا البياض حتى يستطير".
وفي رواية:"لا يغرنّ من سحوركم أذان بلال، ولا بياض الأفق المستطيل هكذا حتى يستطير هكذا" حكاه حماد بيديه. قال: يعني معترضًا.
وفي رواية:"لا يغرنّكم نداءُ بلال، ولا هذا البياض حتى يبدو الفجر" أو قال:"حتى ينفجر الفجر". صحيح: رواه مسلم في الصيام (1094) من طرق، عن سوادة بن حنظلة القشيريّ، قال: سمعت سمرة بن جندب يقول (فذكر الحديث بكلّ هذه الألفاظ).
সামুরা ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "সাহ্রীর জন্য তোমাদের কাউকে যেন বিলালের আযান ধোঁকা না দেয়, আর না এই শুভ্রতা (মিথ্যা ফজর) যতক্ষণ না তা ছড়িয়ে পড়ে (অর্থাৎ সত্য ফজর উদিত হয়)।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "সাহ্রীর জন্য তোমাদেরকে বিলালের আযান যেন ধোঁকা না দেয়, আর না দিগন্তের সেই লম্বা শুভ্রতা (মিথ্যা ফজর), যতক্ষণ না তা এভাবে আড়াআড়িভাবে ছড়িয়ে পড়ে।" (হাম্মাদ তাঁর দুই হাত দিয়ে ইশারা করে বর্ণনা করেন। তিনি বলেন: অর্থাৎ আড়াআড়িভাবে)।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তোমাদেরকে বিলালের আযান যেন ধোঁকা না দেয়, আর না এই শুভ্রতা যতক্ষণ না ফজর প্রকাশিত হয়," অথবা তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "যতক্ষণ না ফজর বিদীর্ণ হয়।"
4249 - عن أنس بن مالك قال: إن نبي الله صلى الله عليه وسلم وزيد بن ثابت تسحرا، فلما فرغا من سحورهما قام نبي الله صلى الله عليه وسلم إلى الصلاة فصلي. قلنا لأنس: كم كان بين فراغهما من سحورهما ودخولهما في الصلاة؟ قال: كقدر ما يقرأ الرجل خمسين آية.
متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1134) عن يعقوب بن إبراهيم، قال: حدثنا روح، قال: حدثنا سعيد، عن قتادة، عن أنس بن مالك، فذكره. ورواه مسلم في الصوم (1097) من وجه آخر عن وكيع، عن هشام، عن قتادة به، واللفظ للبخاري.
قوله:"إلى الصلاة فصلي": صلاة الفجر.
وقوله:"دخولهما في الصلاة": أي صلاة الصبح.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং যায়েদ ইবনে সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেহরি খেয়েছিলেন। যখন তাঁরা সেহরি থেকে ফারিগ হলেন, তখন আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাতের জন্য দাঁড়ালেন এবং সালাত আদায় করলেন। আমরা আনাসকে জিজ্ঞাসা করলাম: তাঁদের সেহরি থেকে ফারিগ হওয়া এবং সালাতে প্রবেশ করার মধ্যে সময়ের ব্যবধান কতটুকু ছিল? তিনি বললেন: একজন ব্যক্তি পঞ্চাশটি আয়াত পাঠ করতে যে পরিমাণ সময় লাগে ততটুকু।
4250 - عن أنس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا يمنعنكم أذان بلال من السحور، فإن في بصره شيئًا".
صحيح: رواه الإمام أحمد (12428)، وأبو يعلى (2967)، والبزار -كشف الاستار (982) - كلّهم من طريق محمد بن بِشْر، حدّثنا سعيد، عن قتادة، عن أنس، فذكره. وإسناده صحيح.
وسعيد هو ابن أبي عروبة ثقة حافظ، وكان من أثبت الناس في قتادة إلا أنه مختلط، وقد سمع منه محمد بن بشر قبل الاختلاط.
ولا يعارض هذا قوله صلى الله عليه وسلم:"إذا أذّن ابن أمّ مكتوم فكلوا واشربوا، وإذا أذن بلال فلا تأكلوا ولا تشربوا" وذلك على العموم، وأحيانًا كان بلال يخطئ فيؤذن قبل الفجر لسوء في عينه كما جاء في حديث شيبان أنه غدا إلى المسجد فجلس إلى بعض حجر النبيّ صلى الله عليه وسلم، فسمع صوته، فقال:"أبا يحيى" قال: نعم. قال:"ادخل" فدخل فإذا النبيّ صلى الله عليه وسلم يتغدي. فقال:"هلّم إلى الغداء" فقال: يا رسول الله، إني أريد الصيام. قال:"وأنا أريد الصيام، إن مؤذننا في بصره سوء أذّن قبل الفجر". رواه الطبرانيّ في"المعجم الكبير" (7/ 373).
قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 153):"فيه قيس بن الربيع، وثقه شعبة والثوري وفيه كلام".
قلت: وفيه شيخه أشعث بن سوار الكندي أضعف منه.
وذكر ابنُ خزيمة (1/ 211) تأويلًا آخر فقال:"يجوز أن يكون بين ابن أمّ مكتوم وبن بلال نوب، فكان بلال إذا كانت نوبته أذن بليل، وكان ابن أم مكتوم إذا كانت نوبته أذن بليل".
ولعلّ حديث أنيسة بنت حبيب يدل عليه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদেরকে যেন বেলাল-এর আযান সাহ্রী খাওয়া থেকে বিরত না রাখে। কেননা, তার দৃষ্টিতে দুর্বলতা রয়েছে (বা তার চোখে সমস্যা আছে)।"
সহীহ: এটি ইমাম আহমাদ (১২২৮), আবু ইয়ালা (২৯৬৭) এবং বায্যার—কাশফুল আসতার (৯৮২)-এ বর্ণনা করেছেন। তারা সকলেই মুহাম্মাদ ইবনু বিশ্র-এর সূত্রে, তিনি সাঈদ থেকে, তিনি কাতাদাহ থেকে, তিনি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। আর এর সনদ সহীহ।
সাঈদ হলেন ইবনু আবী আরুবা, তিনি নির্ভরযোগ্য হাফিয ছিলেন। কাতাদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণনার ক্ষেত্রে তিনি সবচেয়ে নির্ভরযোগ্য রাবীদের মধ্যে অন্যতম ছিলেন, তবে তিনি ইখতিলাতগ্রস্ত (স্মৃতিভ্রষ্ট) হয়ে গিয়েছিলেন। মুহাম্মাদ ইবনু বিশ্র তার স্মৃতিভ্রষ্ট হওয়ার আগেই তার থেকে শ্রবণ করেছিলেন।
এই হাদীসটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই উক্তির সাথে সাংঘর্ষিক নয়: "যখন ইবনু উম্মে মাকতুম আযান দেন, তখন তোমরা পানাহার করো, আর যখন বেলাল আযান দেন, তখন তোমরা পানাহার করো না।" এটি সাধারণ নীতির ক্ষেত্রে প্রযোজ্য। কিন্তু কখনও কখনও বেলাল তার চোখের সমস্যার কারণে ভুল করতেন এবং ফজর হওয়ার আগেই আযান দিয়ে দিতেন। যেমন শাইবান-এর হাদীসে এসেছে যে, তিনি (শাইবান) একবার মসজিদে গেলেন এবং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কিছু কক্ষের পাশে বসলেন। তিনি তাঁর (নবীর) কণ্ঠস্বর শুনতে পেলেন। তিনি বললেন: "আবা ইয়াহইয়া!" সে বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "ভিতরে এসো।" সে প্রবেশ করে দেখল যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহ্রী খাচ্ছেন। তিনি বললেন: "এসো, সাহ্রী খাও।" সে বলল: হে আল্লাহর রাসূল, আমি সিয়াম পালনের ইচ্ছা করেছি। তিনি বললেন: "আমিও সিয়াম পালনের ইচ্ছা করেছি। আমাদের মুয়াজ্জিন তার দৃষ্টির সমস্যার কারণে ফজরের আগেই আযান দিয়ে দিয়েছে।" এটি তাবারানী ‘আল-মু'জাম আল-কাবীর’ (৭/৩৭৩)-এ বর্ণনা করেছেন।
হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৩/১৫৩)-তে বলেছেন: "এতে কায়েস ইবনুর রাবী’ রয়েছেন। শু’বা ও সাওরী তাকে নির্ভরযোগ্য বললেও তার ব্যাপারে সমালোচনা রয়েছে।"
আমি (ভাষ্যকার) বলি: এতে তার শায়খ আশ'আস ইবনু সুওয়ার আল-কিন্দীও রয়েছেন, যিনি তার চেয়ে দুর্বল।
ইবনু খুযাইমাহ (১/২১১) অন্য একটি ব্যাখ্যা উল্লেখ করেছেন। তিনি বলেছেন: "ইবনু উম্মে মাকতুম এবং বেলালের মধ্যে দায়িত্ব ভাগ করা থাকত। যখন বেলালের পালা আসত, তখন তিনি রাতে আযান দিতেন। আর যখন ইবনু উম্মে মাকতুমের পালা আসত, তিনিও রাতে আযান দিতেন।"
আর সম্ভবত উনাইসা বিনতে হাবীব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস এই দিকেই ইঙ্গিত করে।
4251 - عن أُنيسة بنت حبيب قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا أذّن ابن أمّ مكتوم فكلوا واشربوا. وإذا أذّن بلال فلا تأكلوا ولا تشربوا" فإن كانت الواحدة منا ليبقى عليها الشيء من سحورها فتقول لبلال: أمهل حتى أفرغ من سحوري.
صحيح: رواه النسائي (640)، وابن خزيمة (404)، وابن حبان (3474)، وأحمد (27440) كلّهم من طريق هشيم، قال: حدّثنا منصور بن زاذان، عن خبيب بن عبد الرحمن، عن عمّته أنيسة بنت حبيب، فذكرته. وإسناده صحيح. انظر كتاب الأذان.
وأما ما رُوي عن زيد بن ثابت أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ ابن أم مكتوم يؤذّن بليل فكلوا واشربوا حتى يؤذّن بلال" فهو ضعيف. فيه محمد بن عمر الواقديّ ضعيف جدًّا. ومن طريقه رواه البيهقي (1/ 382).
উনাইসাহ বিনতে হাবীব থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন ইবনু উম্মে মাকতূম আযান দেন, তখন তোমরা খাও ও পান করো। আর যখন বিলাল আযান দেন, তখন তোমরা পানাহার করো না।" আমাদের মধ্যে কোনো নারীর যদি সাহরীর কিছু অংশ বাকি থাকত, তবে তিনি বিলালের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উদ্দেশে বলতেন: "অপেক্ষা করুন, যেন আমি আমার সাহরী শেষ করে নিতে পারি।"
4252 - عن سهل بن سعد، قال: كنتُ أتسحّرُ في أهلي، ثم تكون سُرعتي أن أُدركَ السّجود مع رسول الله صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه البخاريّ في الصوم (1920) عن محمد بن عبيدالله، حدّثنا عبد العزيز بن أبي حازم، عن أبيه، عن حازم، عن سهل بن سعد، فذكره.
সাহল ইবনু সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার পরিবারের সাথে সাহরি সম্পন্ন করতাম। এরপর আমার দ্রুততা এমন হতো যে, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে (ফজরের) সালাতের সিজদা পেতাম।
4253 - عن زيد بن ثابت قال: تسحرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم ثم قمنا إلى الصّلاة قلت: كم كان قدرُ ما بينهما؟ قال: خمسين آية.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1921)، ومسلم في الصيام (1097) كلاهما من طريق هشام (هو الدستوائي)، حدّثنا قتادة، عن أنس، عن زيد بن ثابت، فذكره. واللفظ لمسلم.
ولفظ البخاري:"قال: كم كان بين الأذان والسَّحور؟ قال: قدرُ خمسين آية".
যায়দ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাহরী খেলাম। এরপর আমরা সালাতের জন্য দাঁড়ালাম। (বর্ণনাকারী জিজ্ঞাসা করলেন:) এই দুটির মধ্যে সময়ের ব্যবধান কতটুকু ছিল? তিনি বললেন: পঞ্চাশ আয়াত (তিলাওয়াতের) পরিমাণ।
4254 - عن عدي بن حاتم، قال: لما نزلت: {حَتَّى يَتَبَيَّنَ لَكُمُ الْخَيْطُ الْأَبْيَضُ مِنَ الْخَيْطِ الْأَسْوَدِ مِنَ الْفَجْرِ} [سورة البقرة: 187] عمدتُ إلى عقال أسود وإلى عقال أبيض، فجعلتها تحت وسادتي، فجعلتُ أنظرُ في الليل فلا يستبين لي، فغدوت على رسول الله صلى الله عليه وسلم فذكرت له ذلك فقال:"إنّما ذلك سواد الليل وبياض النهار".
وفي رواية:"إني أجعل تحت وسادتي عقالين، عقالًا أبيض وعقالًا أسود أعرف الليل من النهار. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ وسادتك لعريض! إنّما هو سواد الليل وبياض النهار".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1916)، ومسلم في الصيام (1090) كلاهما من حديث
حصين بن عبد الرحمن، عن الشعبي، عن عدي بن حاتم، فذكره. والرواية الثانية عند مسلم
وفي رواية لأبي داود (2349):"فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال:"إنّ وسادتك ....".
আদী ইবনু হাতিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: "তোমাদের জন্য ভোরের সাদা রেখা থেকে কালো রেখা স্পষ্ট না হওয়া পর্যন্ত" [সূরা আল-বাকারা: ১৮৭], তখন আমি একটি কালো রশি এবং একটি সাদা রশি নিলাম। আমি সেগুলোকে আমার বালিশের নিচে রেখে দিলাম। রাতে আমি সেগুলোর দিকে তাকাতে লাগলাম, কিন্তু আমার কাছে (তা পরিষ্কার) স্পষ্ট হচ্ছিল না। পরদিন সকালে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম এবং বিষয়টি তাঁকে বললাম। তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তা হলো রাতের অন্ধকার এবং দিনের আলো।"
অপর এক বর্ণনায় আছে: "আমি রাতের বেলা বালিশের নিচে দুটি রশি রাখি—একটি সাদা রশি ও একটি কালো রশি, যাতে আমি রাতের থেকে দিনকে চিনতে পারি।" তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমার বালিশ তো দেখছি বেশ চওড়া! নিশ্চয়ই তা হলো রাতের অন্ধকার এবং দিনের আলো।"
4255 - عن جابر بن عبد الله، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الفجر فجران، فأمّا الفجر الذي يكون كذنب السرحان فلا تحل الصلاة فيه، ولا يحرّم الطّعام. وأمّا الذي يذهب مستطيلًا في الأفق فإنه يحل ويحرّم الطّعام".
صحيح: رواه الحاكم (1/ 191) عن أبي بكر محمد بن أحمد بن حاتم الداربردي بمرو، ثنا عبد الله بن روح المدائني، ثنا يزيد بن هارون، أنبأنا ابن أبي ذئب، عن الحارث بن عبد الرحمن، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن جابر، فذكره.
قال الحاكم:"إسناده صحيح" وهو شاهد لحديث ابن عباس.
وروي عن ابن عباس قال: إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الفجر فجران، فجر يحرم فيه الطّعام، ويحل فيه الصلاة. وفجر يحرم فيه الصلاة ويحل فيه الطعام".
رواه الدارقطني (2185)، وابن خزيمة (356، 1927) وعنه الحاكم (1/ 191) عن محمد بن علي بن محرز -أصله بغدادي انتقل إلى فسطاط- نا أبو أحمد الزبيري، عن سفيان، عن ابن جريج، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.
قال ابن خزيمة: هذا لم يروه أحد عن أبي أحمد إلا ابن محرز هذا.
وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين في عدالة الرواة ولم يخرجاه. وأظن أني قد رأيته من حديث عبد الله بن الوليد، عن الثوري موقوفًا".
ورواه أيضًا في كتاب الصوم (1/ 425) وقال:"هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه. وقال: شاهده حديث سمرة مرفوعًا" فذكره.
وقال الدارقطني:"لم يرفعه غير أبي أحمد الزبيريّ عن الثوري، ووقفه الفريابي وغيره عن الثوري، ووقفه أصحاب ابن جريج عنه أيضًا" انتهى.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: ফজরের সূচনা দুই প্রকার। যে ফজরটি নেকড়ের লেজের মতো (লম্বাটেভাবে উঠে দ্রুত বিলীন হয়ে যায়), তাতে সালাত হালাল (ফরয হয় না) এবং খাবার হারাম (রোজা শুরু) হয় না। আর যে ফজর দিগন্তে আড়াআড়িভাবে ছড়িয়ে পড়ে, তাতে সালাত হালাল (ফরয হয়) এবং খাবার হারাম (রোজা শুরু) হয়।
4256 - عن قيس بن طلق، عن أبيه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كلوا واشربوا، ولا يُهِيدَنَّكم الساطع المصْعِد، فكلوا واشربوا حتى يعترض لكم الأحمر".
حسن: رواه أبو داود (2348)، والترمذي (705) وصحّحه ابن خزيمة (1930) كلهم من طريق ملازم بن عمرو، عن عبد الله بن النعمان، حدّثني قيس بن طلق، عن أبيه، فذكره.
قال الترمذي: حديث حسن غريب من هذا الوجه.
وقال ابن خزيمة:"الدليل على أنّ الفجر الثاني الذي ذكرناه هو البياض المعترض الذي لونه الحمرة إن صحّ الخبر، فإني لا أعرف عبد الله بن النعمان هذا بعدالة ولا جرح، ولا أعرف له عنه راويًا غير ملازم بن عمرو".
قلت: أما العلة الأولى وهي قوله: لا أعرف عبد الله بن النعمان بعدالة ولا جرح، فقد سبق توثيق ابن معين له، كما وثقه أيضًا العجلي وابن حبان. وفيه ردٌ أيضًا على الحافظ في قوله في"التقريب":"مقبول" فإنه في أقل أحواله"صدوق".
والعلة الثانية: وهو قوله:"لا أعرف له راويًا غير ملازم بن عمرو".
فقد روى عنه أيضًا عمر بن يونس كما ذكره ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل"، والحافظ في"تهذيب التهذيب".
وكذلك روى عنه أيضًا محمد بن جابر. رواه الإمام أحمد (16291) عن موسى، عنه، عن عبد الله بن النعمان، عن قيس بن طلق، عن أبيه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ليس الفجر المستطيل في الأفق، ولكنه المعترض الأحمر".
إلّا أن محمد بن جابر وهو ابن سيار بن طارق الحنفي اليمامي ضعيف، ولكن قال الحافظ:"صدوق". وقال:"ورجّحه أبو حاتم على ابن لهيعة". وقد توبع كما في الأسانيد السابقة.
وللحديث طريق آخر عن ملازم بن عمرو، قال: ثنا عبد الله بن بدر السحيميّ، قال: حدثني جدّي قيس بن طلق، قال: حدثني أبي أنّ نبي الله صلى الله عليه وسلم قال: (فذكر الحديث نحو حديث أبي داود).
رواه الطحاوي في"شرحه" (2/ 107) عن أبي أمية، قال: حدثنا أبو نعيم، والخضر بن محمد ابن شجاع كلاهما عن ملازم بن عمرو، بإسناده.
وعبد الله بن بدر السحيمي الحنفي"ثقة" من رجال السنن.
وبمجموع هذه الأسانيد يصح هذا الحديث أو يحسن.
قال الترمذي:"والعمل على هذا عند أهل العلم أنه لا يحرم على الصائم الأكل والشرب حتى يكون الفجر الأحمر المعترض. وبه يقول عامة أهل العلم".
তালক্ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “তোমরা খাও এবং পান করো। ঊর্ধ্বমুখী লম্বা সাদা আলো যেন তোমাদেরকে বিরত না করে। তোমরা ততক্ষণ পর্যন্ত পানাহার করতে থাকো যতক্ষণ না তোমাদের জন্য দিগন্তে লালচে আভা আড়াআড়িভাবে প্রকাশিত হয়।”
4257 - عن زرّ بن حُبيش، قال: تسحَّرتُ ثم انطلقتُ إلى المسجد، فمررتُ بمنزل حُذيفة بن اليمان فدخلتُ عليه، فأمر بِلقْحَةٍ فحُلبتْ، وبقِدْر فسُخِّنَتْ، ثم قال: ادنُ فكُلْ. فقلتُ: إنّي أريدُ الصَّومَ. فقال: وأنا أريدُ الصّومَ، فأكلنا وشربنا، ثم أتينا المسجد، فأقيمت الصّلاة، ثم قال حذيفة: هكذا فعل بي رسول الله صلى الله عليه وسلم. قلت: أبعدَ الصُّبح؟ قال: نعم، هو الصُّبح غير أن تطلع الشَّمس. قال: وبين بيت حذيفة وبين المسجد كما بين مسجد ثابت وبستان حَوْط. وقد قال حمّاد أيضًا: وقال حذيفة: هكذا صنعت مع النبيّ صلى الله عليه وسلم، وصنع بي النبيُّ صلى الله عليه وسلم.
حسن: ولكنه مختلف في رفعه ووقفه.
رواه الإمام أحمد (23361) من طريق حماد بن سلمة -واللفظ له-، والنسائي (2152) من طريق سفيان، وابن ماجه (1695) من طريق أبي بكر بن عياش، كلّهم عن عاصم بن بهدلة، عن زرّ ابن حبيش، فذكره مختصرًا.
ورواه شعبة، عن عدي بن ثابت، قال: سمعت زر بن حبيش عنه موقوفًا.
قال النسائي -كما في تحفة الأشراف (3/ 32) -:"لا نعلم أحدًا رفعه غير عاصم، فإن كان رفعه صحيحًا فمعناه: أنه قرب النهار، كقوله تعالى {وَإِذَا طَلَّقْتُمُ النِّسَاءَ فَبَلَغْنَ أَجَلَهُنَّ} [سورة البقرة: 231] معناه: إذا قاربن البلوغ، وكقول القائل: بلغنا المنزل، إذا قاربه" انتهى.
قلت: وهو كما قال، ولكن حكمه الرفع، فإنه ليس للصحابي أن يعين وقت دخول السحور وخروجه، لا سيما وقد جاء مرفوعًا من طريق عاصم بن بهدلة وهو وإن كان دون عدي بن ثابت ولكن لا يمنع من قبول زيادته لما عرف من المحدثين من رفع الحديث في وقت، ووقفه في وقت آخر.
ومن هذه الموقوفات ما رواه أيضا النسائي (2154) عن عمرو بن علي، قال: حدّثنا محمد بن فضيل، قال: حدثنا أبو يعفور، قال: حدّثنا إبراهيم، عن صلة بن زفر، قال: تسحّرتُ مع حذيفة،
ثم خرجنا إلى المسجد، فصلينا ركعتي الفجر، ثم أقيمت الصلاة فصلينا".
ومنها ما رواه أيضًا عبد الرزاق (7606) عن إسرائيل، عن عامر بن شقيق، عن شقيق بن سلمة، قال: انطلقت أنا وزر بن حبيش إلى حذيفة وهو في دار الحارث بن أبي ربيعة، فاستأذنّا عليه، فخرج إلينا، فأتي بلبن فقال: اشربا. فقلنا: إنا نريد الصيام، قال: وأنا أريد الصيام.
فشرب، ثم ناول زرًا فشرب، ثم ناولني فشربتُ، والمؤذّن يؤذّن في المسجد. قال: فلما دخلنا المسجد أقيمت الصلاة وهم يغلّسون".
وقد فهم من هذه الأحاديث بعض أهل العلم أنه تسحّر بعد طلوع الفجر، وهو غير واضح من كلام حذيفة، ولكن بناء على فهمه هذا قالوا: هذا منسوخ لحديث بلال أنه ينادي بليل، وابن أم مكتوم بنادي إذا طلع الفجر.
فإن الطحاوي روى حديث حذيفة في"شرحه" (2/ 106) من طريق حماد بن سلمة، عن عاصم، مختصرًا.
وقال: يحتمل أن يكون حديث جذيفة قبل نزول قوله تعالى: {وَكُلُوا وَاشْرَبُوا حَتَّى يَتَبَيَّنَ لَكُمُ الْخَيْطُ الْأَبْيَضُ مِنَ الْخَيْطِ الْأَسْوَدِ مِنَ الْفَجْرِ ثُمَّ أَتِمُّوا الصِّيَامَ إِلَى اللَّيْلِ} [سورة البقرة: 187]".
قلت: ليس من الظاهر أن حذيفة تسحّر بعد طلوع الفجر، حتى نحتاج إلى النسخ؛ لأنه كل ما في الأمر أنه تسحّر ثم غدا إلى المسجد، وصلى ركعتين، ثم أقيمت الصّلاة فصلّى الصبح.
فقد يكون حذيفة بالغ في تأخير السحور حتى أخذ المؤذن يؤذن لصلاة الفجر.
وفي الباب أحاديث أخرى سبق تخريجها في كتاب الأذان.
হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। যির ইবনু হুবাইশ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি সাহরি খেয়ে মসজিদের দিকে যাচ্ছিলাম। পথে আমি হুযাইফা ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাড়ির পাশ দিয়ে যাচ্ছিলাম, তাই তাঁর কাছে প্রবেশ করলাম। তিনি তখন একটি দুগ্ধবতী পশু থেকে দুধ দোহন করতে এবং একটি পাত্র গরম করতে আদেশ দিলেন। এরপর বললেন: কাছে এসো এবং খাও। আমি বললাম: আমি রোযা রাখার নিয়ত করেছি। তিনি বললেন: আমিও তো রোযা রাখতে চাই। অতঃপর আমরা খেলাম ও পান করলাম। এরপর আমরা মসজিদে গেলাম। সেখানে নামাযের ইকামাত দেওয়া হলো। তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার সাথেও এমনটি করেছিলেন। আমি (যির) জিজ্ঞেস করলাম: এটি কি সুবহে সাদিকের পরে? তিনি বললেন: হ্যাঁ, এটা তো সুবহে সাদিক (ভোর), তবে এখনো সূর্য উদিত হয়নি।
4258 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا سمع أحدكم النداء، والإناء في يده فلا بضعه حتى يقضي حاجته منه".
حسن: رواه أبو داود (2350) وعنه الدارقطني (2182)، والحاكم (1/ 426) كلهم عن عبد الأعلى بن حماد، ثنا حماد، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
وصحّحه الحاكم على شرط مسلم.
وقال الدارقطني: قال أبو داود: أسنده روح بن عبادة كما قال عبد الأعلى.
قلت: لا يوجد قول أبي داود في نسختنا المطبوعة على رواية اللؤلؤي، وكذلك لم يذكر ابن حجر قول الدارقطني هذا في"إتحاف المهرة" (16/ 120) وإنما نقل عنه قوله:"كلهم ثقات". وهو أيضًا غير موجود في نسختنا المطبوعة للدارقطني.
ونقل ابن القطّان في الوهم والإيهام (2/ 282) عن أبي داود قال: حدّثنا عبد الأعلى بن حماد،
أظنه عن حماد، بإسناده.
قال ابن القطان: هكذا في رواية ابن الأعرابي عن أبي داود:"أظنه" انتهى.
ولا يوجد هذا القول في نسختنا المطبوعة على رواية اللؤلؤي.
كما أن الدارقطني الذي روى عن محمد بن يحيى بن مرداس، عن أبي داود، عن عبد الأعلى بن حماد، بإسناده لم يذكر فيه قوله:"أظنه".
وكذلك لم يذكره روح بن عبادة، عن حماد بن سلمة، عن عمار بن أبي عمار، عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم مثله، وزاد فيه:"وكان المؤذن يؤذن إذا بزغ الفجر". رواه عنه الإمام أحمد (1030). وهذا إسناد جيد.
وكذلك رواه الثقات الآخرون عن حماد بن سلمة، منهم: غسان بن الربيع أبو محمد الأزدي، روى عنه الإمام أحمد (9474)، والحاكم (1/ 203) وغسان بن الربيع من ثقات شيوخ أحمد.
ومنهم عبد الواحد بن غياث ومن طريقه رواه أيضًا الحاكم.
كلّ هؤلاء أعني عبد الأعلى بن حماد، وروح بن عبادة، وغسان بن الربيع، وعبد الواحد بن غياث لم يقل أحدٌ منهم:"أظنه" هكذا بالشك إلا عبد الأعلى في رواية ابن الأعرابي.
واليقين يقضي على الشك كما يقال، فهذه الأسانيد كلّها متصلة صحيحة.
ولكن سأل ابن أبي حاتم أباه كما في"العلل" (1/ 123 - 124) عن حديث روح بن عبادة، عن حماد، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث.
وقال: وروي روح أيضًا عن حماد، عن عمار بن أبي عمار، عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وزاد فيه:"كان المؤذن يؤذن إذا بزغ الفجر".
فقال أبو حاتم:"هذان الحديثان ليسا بصحيحين. أما حديث عمار فعن أبي هريرة موقوف، وعمار ثقة. والحديث الآخر ليس بصحيح" انتهي.
كذا قال أبو حاتم وهو إمام في الجرح والتعديل، ولكنه لم يبين سبب عدم صحة حديث أبي هريرة، ولا سبب وقفه.
وحماد بن سلمة بن دينار البصري أحد الأئمة الثقات إلا أنه لما كبر ساء حفظه، ولذا تركهـ البخاري، وأما مسلم فاجتهد وأخرج من حديثه عن ثابت ما سمع منه قبل تغيره.
فلعلّ أبا حاتم لم يعتمد على رواية حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو فضعّفه.
وحماد بن سلمة، عن عمار بن أبي عمار، عن أبي هريرة فوقفه.
ولم أجد من سبقه فضعف حماد بن سلمة في محمد بن عمرو، وإنما تكلّم الناس في حماد بن سلمة عن قيس بن سعد لأنه ضاع كتاب حماد بن سلمة عنه فكان يحدث من حفظه ويخطئ.
وأورد ابن عدي في الكامل (2/ 670 - 671) عدة أحاديث مما ينفرد به حماد متنًا أو إسنادًا،
وليس منها الحديث المذكور.
وقال:"وله أحاديث كثيرة، وأصناف كثيرة، ومشايخ كثيرة، وهو من أئمة المسلمين كما قال علي بن المديني".
وعمار بن أبي عمار متابع قوي لمحمد بن عمرو.
ولحماد شيخ آخر وهو يونس، عن الحسن، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فذكر مثله.
رواه الإمام أحمد (9474) مع رواية شيخه غسان كما سبق.
وهذا مرسل قوي يقوي الموصول.
والخلاصة أن الحديث صحيح أو حسن في أقل تقدير لكثرة طرقه واختلاف مخارجه، فلا وجه لتضعيفه، وبالله التوفيق.
وفي الحديث دليل على أن من سمع الأذان والإناء في يده فلا يضعه حتى يقضي منه حاجته، وفيه رد على من زعم أن هذا الأذان المقصود منه أذان بلال الأول الذي كان يؤذن قبل طلوع الفجر.
قال الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن" (3/ 233):"وقد اختلف في هذه المسألة، فروي إسحاق بن راهويه، عن وكيع أنه سمع الأعمش يقول: لولا الشهرة لصليت الغداة ثم تسحرت. ثم ذكر إسحاق عن أبي بكر وعلي وحذيفة نحو هذا. ثم قال: وهؤلاء لم يروا فرقًا بين الأكل وبين الصلاة المكتوبة. هذا آخر كلام إسحاق" انتهى.
قلت: والجمهور على أن طلوع الفجر يحرم الطعام والشراب؛ لقوله تعالى: {وَكُلُوا وَاشْرَبُوا حَتَّى يَتَبَيَّنَ لَكُمُ الْخَيْطُ الْأَبْيَضُ مِنَ الْخَيْطِ الْأَسْوَدِ مِنَ الْفَجْرِ} [سورة البقرة: 187]، ولكن يستثني منه هذا الجزء من الأكل والشرب الذي جاء في حديث الباب حتى لا يتضارب الكتاب والسنة.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ আযান শুনতে পায়, আর তার হাতে পানপাত্র থাকে, তবে সে যেন তা রেখে না দেয়, যতক্ষণ না সে তার প্রয়োজন শেষ করে।"
4259 - عن سهل بن سعد الساعديّ، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يزال الناسُ بخير ما عجَّلوا الفطر".
متفق عليه: رواه مالك في الصيام (6) عن أبي حازم بن دينار، عن سهل بن سعد، فذكره.
ورواه البخاري في الصوم (1957) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك، به، مثله. ورواه مسلم (1098) من حديث يعقوب وسفيان كلاهما عن أبي حازم به، مثله.
সাহল ইবনু সা'দ আস-সা'য়িদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মানুষ ততক্ষণ পর্যন্ত কল্যাণের উপর থাকবে, যতক্ষণ তারা ইফতার দ্রুত করে।"
4260 - عن سهل بن سعد، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تزال أمتي على سنتي ما لم تنتظر بفطرها النجوم".
قال: وكان النبيّ صلى الله عليه وسلم إذا كان صائمًا أمر رجلًا، فأوفي على شيء، فإذا قال: غابت الشمس أفطر.
صحيح: رواه ابن خزيمة (2061) وعنه ابن حبان (3510)، والحاكم (1/ 434) كلّهم من حديث محمد بن أبي صفوان الثقفي، حدّثنا عبد الرحمن بن مهدي، حدّثنا سفيان، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد، فذكره.
قال ابن خزيمة: هكذا حدثنا به ابن أبي صفوان، وأهاب أن يكون الكلام الأخير عن غير سهل ابن سعد، لعله من كلام الثوري أو من قول أبي حازم، فأدرج في الحديث.
وأخطا الهيثميّ في"الموارد" (891) فحذف هذا الكلام، وهو ثابت في صحيح ابن حبان إلا أن ابن حبان لم يقل من ابن خزيمة هذا التعليق، كما أنّ الحاكم لم يبد مثل هذا الشك.
والأصل أنه جزء من الحديث قاله سهل بن سعد.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه بهذه السياقة، إنما أخرجا بهذا الإسناد للثوري:"لا يزال الناس بخير ما عجلوا الفطر" فقط.
قلت: محمد بن أبي صفوان وهو محمد بن عثمان بن أبي صفوان ليس من رجال أحدهما، وإنما أخرج له أصحاب السنن وهو ثقة.
وحديث الثوري في صحيح مسلم كما سبق بدون هذه الزيادة.
সাহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমার উম্মত ততদিন পর্যন্ত আমার সুন্নাহর উপর থাকবে, যতদিন তারা ইফতার করার জন্য তারকারাজির (প্রকাশের) অপেক্ষা না করবে।" তিনি আরো বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন সাওম পালন করতেন, তখন তিনি একজন লোককে নির্দেশ দিতেন যেন সে কোনো উঁচু স্থানে আরোহণ করে। যখন সে বলত, 'সূর্য ডুবে গেছে', তখনই তিনি ইফতার করতেন।
4261 - عن أبي عطية، قال: دخلت أنا ومسروق على عائشة رضي الله عنها. فقال لها مسروق: رجلان من أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم كلاهما لا يألو عن الخير. أحدهما يعجِّل المغرب والإفطار، والآخر يؤخِّر المغرب والإفطار. فقالت: مَنْ يعجِّل المغرب والإفطار؟ قال: عبد الله، فقالت: هكذا كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يصنع.
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1099) من طريق عُمارة بن عُمير، عن أبي عطية (هو الوادعي مختلف في اسمه)، به، فذكره.
وعبد الله هو ابن مسعود كما جاء التصريح به في رواية الترمذي (702).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (আবু আতিয়্যাহ বলেন:) আমি ও মাসরূক তাঁর নিকট প্রবেশ করলাম। অতঃপর মাসরূক তাঁকে বললেন: মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবীগণের মধ্যে দুজন ব্যক্তি রয়েছেন, তারা উভয়েই কল্যাণকর কাজ করতে কোনো ত্রুটি করেন না। তাদের একজন মাগরিবের সালাত ও ইফতার তাড়াতাড়ি করেন এবং অন্যজন মাগরিবের সালাত ও ইফতার বিলম্ব করেন। তিনি (আয়িশা) বললেন: কে মাগরিব ও ইফতার তাড়াতাড়ি করেন? তিনি (মাসরূক) বললেন: আবদুল্লাহ। তিনি (আয়িশা) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এভাবেই করতেন।
4262 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا يزال الدين ظاهرًا ما عجّل الناسُ الفطر؛ لأنّ اليهود والنصارى يؤخّرون".
حسن: رواه أبو داود (2353)، وابن ماجه (1698) كلاهما من حديث محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره. وإسناده حسن من أجل محمد بن عمرو وهو حسن الحديث.
ومن طريقه رواه الإمام أحمد (9810) وصحّحه ابن خزيمة (2060)، وابن حبان (3503)، والحاكم (1/ 431). وقال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
وأما ما رُوي عن أبي ذر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال لبلال:"أنت يا بلال تؤذن إذا كان الصبح ساطعًا في السماء، فليس ذلك بالصبح، إنما الصبح هكذا معترضًا". ثم دعا بسحوره فتسحّر وكان يقول:"ولا تزال أمّتي بخير ما أخّروا السّحور وعجّلوا الفطر" فهو ضعيف.
رواه الإمام أحمد (21507) مطولًا ومختصرًا (21312) وفي الموضعين عن موسى بن داود، حدّثنا ابن لهيعة، عن سالم بن غيلان، عن سليمان بن أبي عثمان، عن عدي بن حاتم الحمصي، عن أبي ذر، فذكره. وابن لهيعة فيه كلام معروف أنه سيء الحفظ.
ورواه أيضا أحمد (21503) من وجه آخر عن رشدين بن سعد، عن سالم بن غيلان به نحوه. ورشيد بن سعد ضعيف باتفاق أهل العلم.
وسليمان بن أبي عثمان وهو التجيبي، وشيخه عدي بن حاتم الحمصي مجهولان.
قال الحسيني كما في"التعجيل" (734):"عدي بن حاتم أو حاتم بن عدي هكذا وقع بالشك حمصي مجهول، حدّث عن أبي ذر وعنه سليمان بن أبي عثمان".
وفي الباب ما رُوي أيضًا عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قال الله تعالى: أحبُّ عبادي إليَّ أعجلُهم فطرًا".
رواه الترمذي (700)، والإمام أحمد (8360) وصحّحه ابن خزيمة (2062)، وابن حبان (3507) كلّهم من حديث الأوزاعي، حدّثنا قرة بن عبد الرحمن، عن الزهري، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره. قال الترمذي:"حسن غريب".
قلت: هو غريب فقط دون الحسن؛ فإنّ قرّة بن عبد الرحمن وإن كان من رجال مسلم فإنه ضعيف باتفاق أهل العلم ولم أجد له من تابعه، وأما مسلمٌ فرواه مقرونًا بغيره.
وفي بعض طرق الحديث الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي وهو مدلس وقد عنعن إلا أنه توبع؛ ولذا قال الترمذي عقب تخريج الحديث من طريقه: حدثنا عبد الله بن عبد الرحمن، أخبرنا أبو عاصم وأبو المغيرة، عن الأوزاعي بهذا الإسناد بنحوه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "দ্বীন (ইসলাম) সুপ্রতিষ্ঠিত থাকবে, যতক্ষণ পর্যন্ত লোকেরা দ্রুত ইফতার করবে; কারণ ইয়াহূদী ও খ্রিষ্টানরা (ইফতার) বিলম্ব করে।"
4263 - عن عبد الله بن أبي أوفي، قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر وهو صائم، فلما غابت الشّمس قال لبعض القوم: يا فلان، قمْ فاجدح لنا، فقال: يا رسول الله! لو أمسيتَ. قال: انزل فاجدَح لنا. قال: يا رسول الله! فلو أمسيتَ. قال: انزل فاجدَح لنا. قال: إنّ عليك نهارًا، قال: انزل فاجدح لنا. فنزل فجدحَ لهم فشرب النبيُّ صلى الله عليه وسلم ثم قال: إذا رأيتم الليل قد أقبل من هاهنا فقد أفطر الصّائم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1955)، ومسلم في الصيام (1101) كلاهما من طريق أبي إسحاق سليمان الشيبانيّ، عن عبد الله بن أبي أوفي، به. واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه.
قوله:"فاجدح لنا" الجَدْح: أن يُحَرّك السَّويقُ بالماء ويُخَوّض حتى يسْتَوي. وكذلك اللَّبَن ونَحْوه والمِجْدَح: عُود مُجَنَّح الرأس تُساط به الأشْرِبة وربَّما يكون له ثلاث شُعَب. النهاية (1/ 700).
واسم الصحابي المبهم هو بلال كما جاء في بعض الروايات.
আবদুল্লাহ ইবনু আবী আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা সফরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সঙ্গে ছিলাম এবং তিনি সওম পালনকারী ছিলেন। যখন সূর্য ডুবে গেল, তিনি দলের একজনকে বললেন: "হে অমুক! ওঠো এবং আমাদের জন্য (সাতু/সাভীক) গুলে দাও।" সে বললো: "হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যদি আরেকটু দেরি করতেন (সন্ধ্যা হওয়া পর্যন্ত অপেক্ষা করতেন)।" তিনি বললেন: "নেমে যাও এবং আমাদের জন্য গুলে দাও।" সে আবার বললো: "হে আল্লাহর রাসূল! যদি আপনি আরেকটু অপেক্ষা করতেন।" তিনি বললেন: "নেমে যাও এবং আমাদের জন্য গুলে দাও।" সে বললো: "দিনের কিছুটা আলো এখনও তো বাকি আছে।" তিনি বললেন: "নেমে যাও এবং আমাদের জন্য গুলে দাও।" অতঃপর সে নেমে গিয়ে তাদের জন্য সাভীক প্রস্তুত করলো, আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা পান করলেন। এরপর তিনি বললেন: "যখন তোমরা দেখবে যে রাত্রি এই দিক থেকে আগমন করেছে, তখন সওম পালনকারী ইফতার করবে।"
4264 - عن عمر بن الخطاب، قال: قال رسول الله:"إذا أقبل الليل من هاهنا، وأدبر النهار من هاهنا، وغربت الشمس فقد أفطر الصائم".
متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1954)، ومسلم في الصيام (1100) كلاهما من طريق هشام بن عروة، قال: سمعت أبي يقول: سمعت عاصم بن عمر بن الخطاب، عن أبيه رضي الله عنه، فذكره. واللفظ للبخاري.
وقوله:"فقد أفطر الصائم" معناه: أنه قد صار في حكم المفطر وإن لم يأكل. وقيل: معناه أنه قد دخل في وقت الفطر، وحان له أن يُفطر.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন রাত এই দিক থেকে আগমন করে, আর দিন ঐ দিক থেকে চলে যায়, এবং সূর্য ডুবে যায়, তখন রোযাদার ইফতার করে ফেলেছে।"
4265 - عن سلمان بن عامر الضّبيّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا كان أحدكم صائمًا فليفطر على التّمر، فإن لم يجد التّمر فعلى الماء، فإنّ الماء طهور".
حسن: رواه أبو داود (2355)، والترمذي (695)، وابن ماجه (1699)، وأحمد (16228)، وصحّحه ابن خزيمة (2067)، والحاكم (1/ 431 - 432) كلّهم من طرق، عن عاصم الأحول، عن حفصة بنت سيرين، عن الرباب، عن عمّها سلمان بن عامر، فذكره.
قال الترمذي:"حسن" وفي نسخة"حسن صحيح". وقال: زاد ابن عيينة (يعني عن عاصم):"فإنه بركة" بعد قوله:"فليفطر على التمر".
قال النسائي في"الكبرى" (3306):"هذا الحرف"بركة" لا نعلم أن أحدًا ذكره غير ابن عيينة، ولا أحسبه محفوظًا".
كذا قال! وقد زاده أيضًا محمد بن فضيل، عن عاصم عند ابن خزيمة.
ولم يذكرها ابن ماجه فإنه رواه أيضًا من طريق محمد بن فضيل.
وإسناده حسن من أجل الرَّباب -بفتح أولها- بنت صُليع الضّبيّة البصريّة. وقد صحّح حديثها أبو حاتم فيما نقل عنه ابنه عبد الرحمن في"العلل" (1/ 237) قال: سألت أبي عن حديث رواه حماد بن سلمة، عن عاصم، عن حفصة بنت سيرين: أنّ الرباب. فذكرت حديث سلمان أنّ النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا صام أحدكم فليفطر على التمر، فإن لم يجد فليفطر على الماء فإنه طهور". قال أبي: وروى هذا الحديث هشام بن حسان وغير واحد عن حفصة، عن الرباب، عن سلمان، عن النبي صلى الله عليه وسلم. قلت لأبي: أيّهما أصح؟ قال: جميعًا صحيحين، فقصر به حماد، وقد روي عن عاصم أيضًا نحوه" انتهى.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط البخاريّ".
والحديث أُعلّ بالوقف ولكن الصواب أنه موصول كما أُعلّ بالاضطراب الوقوع خطأ في الإسناد، ولكن الصواب أنه لا اضطراب فيه، فإنّ من رواه من وجه صحيح لا يضرّ من رواه بوجه ضعيف مضطرب كما قال البيهقي (4/ 239) بعد أن رواه من طريق يونس بن حبيب، عن أبي داود الطيالسيّ وهو في"مسنده" (1278) عن شعبة، عن عاصم، قال: سمعت حفصة بنت سيرين، تحدّث عن الرباب، عن سلمان بن عامر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال فذكره.
قال البيهقي:"هكذا وجدته في"المسند" قد أقام إسناده أبو داود. وقد رواه محمود بن غيلان، عن أبي داود دون ذكر الرباب. ورُوي عن روح بن عبادة عن شعبة موصولًا. ورواه سعد ابن عامر عن شعبة فغلط في إسناده". ثم ساقه من طريقه عن شعبة، عن عبد العزيز بن صُهيب، عن أنس بن مالك، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من وجد تمرًا فليفطر عليه، ومن لا فليفطر على الماء فإنه طهور".
قال البخاري فيما روى عنه أبو عيسى: حديث سعيد بن عامر وهم، يهم سعيد، والصحيح حديث عاصم عن حفصة بنت سيرين. انتهى.
قلت: حديث سعيد بن عامر، عن شعبة. رواه الترمذي (6904)، وابن خزيمة (2066)، والنسائي في الكبرى (3317).
قال الترمذي: حديث أنس لا نعلم أحدًا رواه عن شعبة، مثل هذا غير سعيد بن عامر، وهو حديث غير محفوظ، ولا نعلم له أصلًا من حديث عبد العزيز بن صهيب، عن أنس. ثم ذكر ما هو الصحيح من حديث شعبة.
وقال ابن خزيمة: هذا لم يروه عن سعيد بن عامر عن شعبة إلا هذا.
قلت: إذا لا يصلح أن يكون حديث أنس هذا شاهدًا لحديث سلمان الضبيّ؛ لأنّ الشاهد هو المشهود نفسه وإنما وقع فيه خطأ من سعيد بن عامر كما قال البخاريّ وغيره.
وقال الحاكم: وله شاهد صحيح على شرط مسلم فذكر حديث أنس بن مالك الآتي.
ولا يُعلُّ بأنّ هذا أمر، والذي يأتي بعده فعل؛ لاختلاف المخرجين، بل إنّ الأمر يؤكّد الفعل.
والرّباب بنت صليع الضبية هذه اكتسبت الثقة بكلام الأئمة في هذا الحديث ولعلّ ذلك لوجود شواهد وإلّا فهي مستورة كما قال ابن الملقن في"البدر المنير" (5/ 697) مع تصحيح حديثها؛ لأنّه لم يرو عنها إلا حفصة بنت سيرين، ولم يوثقها إلا ابن حبان؛ ولذا قال فيها الحافظ:"مقبولة" أي إذا توبعت، ولم أجد لها متابعًا.
সালমান ইবন আমির আদ-দাব্বি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের কেউ যখন রোজা রাখে, তখন সে যেন খেজুর দিয়ে ইফতার করে। যদি সে খেজুর না পায়, তবে পানি দিয়ে ইফতার করবে। কারণ পানি পবিত্রকারী।"
4266 - عن أنس بن مالك، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يفطر على رطبات قبل أن يُصلي، فإن لم تكن رطبات فعلي تمرات، فإن لم تكن حسا حسوات من ماء.
صحيح: رواه أبو داود (2356) وعنه الدارقطني (2278) عن الإمام أحمد وهو في مسنده (12676)،
والترمذي (696) والدارقطني (2277)، والبيهقي (4/ 239) من أوجه آخر أيضًا - كلّهم من حديث عبد الرزاق، حدثنا جعفر بن سليمان، حدثنا ثابت البناني، أنه سمع أنس بن مالك، فذكره.
قال الترمذي:"حسن غريب".
وقال الدارقطني: هذا إسناد صحيح.
وقال الحاكم (1/ 432):"صحيح على شرط مسلم، وقد سبقت الإشارة إليه بأنه شاهد صحيح لحديث سلمان بن عامر".
وقد روي أيضا عن أنس أن النبي صلى الله عليه وسلم كان يبدأ إذا أفطر بالتمر، إلا أنه مرسل. رواه النسائي في الكبرى (3304) عن موسى بن حزام الترمذي، قال: أخبرنا يحبي -وهو ابن آدم-، قال: حدثنا يزيد بن عبد العزيز، عن رقبة، عن بريد بن أبي مريم، عن أنس، فذكره.
قال النسائي:"هذا الحديث رواه شعبة، عن بريد، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرسلا، وشعبة أحفظ ممن روى هذا الحديث".
قلت: هذا المرسل يقوي ما سبق، وقد خالف الدارقطني فقال:"يشبه أن يكون رقبة حفظه". العلل (12/ 19).
আনাস ইবনে মালেক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালাত আদায়ের পূর্বে কয়েকটি তাজা খেজুর (রুতাব) দ্বারা ইফতার করতেন। যদি তাজা খেজুর না থাকত, তাহলে তিনি কয়েকটি শুকনো খেজুর (তামারাত) দ্বারা ইফতার করতেন। আর যদি শুকনো খেজুরও না থাকত, তাহলে তিনি কয়েক ঢোক পানি পান করে নিতেন।
4267 - عن أنس، قال: ما رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم قط صلى صلاة المغرب حتى يُفطر، ولو على شَرْبة من ماء.
صحيح: رواه أبو يعلى (3792) وعنه ابن حبان (3504) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا حسين بن علي الجعفي، عن زائدة، عن حُميد، عن أنس، فذكره.
وإسناده صحيح. وحسين بن علي هو ابن الوليد الجعفي الكوفي ثقة من رجال الصحيح.
ورواه ابن خزيمة (2065) من وجهين عن محمد بن محرز، عن حسين بن علي بإسناده، وعن زكريا بن يحيى بن أبان، حدّثنا مسكين بن عبد الرحمن التميمي، حدثني يحيى بن أيوب، عن حميد الطويل، عن أنس، ولكن بلفظ:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا كان صائمًا لم يصل حتى نأتيه برطب وماء، فيأكل ويشرب إذا كان الرطب، وأمّا في الشتاء لم يصل حتى تأتيه بتمر وماء".
ومن الطريق الثاني رواه أيضًا الطبراني في"الأوسط".
وقال: لم يروه عن حميد إلّا يحيي، ولا عنه إلا مسكين، تفرّد به زكريا".
وقال الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (3/ 156):"رواه الطبراني في الأوسط. وفيه من لم أعرفه".
ثم رواه ابن خزيمة (2063) من طريقين آخرين: شعيب بن إسحاق والقاسم بن غصن - كلاهما عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن أنس، فذكره مثل اللفظ الأول.
والقاسم بن غصن ضعيف باتفاق أهل العلم.
قال ابن حبان في"المجروحين" (875):"كان ممن يروي المناكير عن المشاهير، ويقلب الأسانيد حتى يرفع المراسيل، ويسند الموقوف، لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد، فأما فيما وافق الثقات فإن اعتبر معتبر لم أر بذلك بأسًا".
قلت: وقد وافقه شعيب بن إسحاق وهو ابن عبد الرحمن الأموي الدمشقي وهو ثقة من رجال الصحيح.
ورواه الحاكم (1/ 431) عن ابن خزيمة من طريق شعيب بن إسحاق بإسناده مثله.
ورواه البزار - كشف الأستار (984) من وجه آخر عن القاسم بن غصن بإسناده مثله، وقال:"لا نعلمه بهذا اللفظ إلّا بهذا الإسناد، القاسم لين الحديث، وإنما نكتب من حديثه ما لا نحفظه من غيره" انتهى.
فالظاهر من كلامه أنه لم يقف على رواية شعيب بن إسحاق، وإلا لما كتب من حديث القاسم ابن غصن.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কখনও মাগরিবের সালাত আদায় করতে দেখিনি, যতক্ষণ না তিনি ইফতার করতেন, যদিও তা এক ঢোক পানি দিয়ে হয়।
