হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4268)


4268 - عن زيد بن خالد الجهنيّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من فطَّر صائمًا كان له مثل أجره، غير أنه لا ينقص من أجر الصائم شيئًا".

صحيح: رواه الترمذي (807)، وابن ماجه (1746) وصححه ابن خزيمة (2064)، وابن حبان (3429) كلّهم من حديث عبد الملك بن أبي سليمان، قال: حدثني عطاء بن أبي رباح، عن زيد بن خالد الجهني، فذكره.

ورواه الإمام أحمد (17033) من هذا الوجه وزاد هو وابن خزيمة:"ومن جهّز غازيًا في سبيل الله، أو خلفه في أهله كتب له مثل أجره إلا أنه لا ينقص من أجر الغازي شيء".

قال الترمذي: حسن صحيح.

وأخرجه أيضًا البغوي في"شرح السنة" (1818) من جهة الترمذي، ونقل حكمه بأنه حسن صحيح.

وذكره المنذري في"الترغيب والترهيب" (1658) مقرًا بتصحيح الترمذي وإخراج ابن خزيمة وابن حبان في"صحيحيهما".

لكن نقل العلائيّ في"جامع التحصيل" (520) قول علي بن المديني بأن عطاء بن أبي رباح لم
يسمع من زيد بن خالد الجهنيّ.

وانفرد علي بن المديني بهذا الحكم، فلعلّ هؤلاء الذين سبق ذكرهم وتخريجهم لهذا الحديث لم يأخذوا بكلام علي بن المديني لشهرة هذا الحديث.

وقد رُوي موقوفًا أيضًا. رواه النسائي في الكبرى (3332) من طريق حسين (هو المعلم) عن عطاء، عن عائشة، قالت:"من فطّر صائمًا كان له مثل أجره من غير أن ينتقص من أجر الصّائم شيئًا".

ورواه عبد الرزاق (7906) عن ابن جريج، عن صالح مولي التوأمة، قال: سمعت أبا هريرة يقول:"من فطّر صائمًا أطعمه وسقاه، كان له مثل أجره". فالظاهر من هذه الآثار أن الحديث له أصل وإلا فإنه لا يقال بالأجر وعدمه من الرأي.

وفي الباب أيضًا ما روي عن سلمان الفارسي في حديث طويل، وجاء فيه:"من فطّر صائمًا كان مغفرة لذنوبه" رواه ابن خزيمة (1887) وفيه علي بن زيد بن جدعان ضعيف.

وبمجموع هذه الأحاديث والآثار لعل هؤلاء الذين سبق ذكرهم صحّحوا حديث زيد بن خالد الجهني. والله تعالى أعلم.




যায়েদ ইবনে খালিদ আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো রোজাদারকে ইফতার করাবে, তার জন্য সেই রোজাদারের অনুরূপ সওয়াব হবে, তবে রোজাদারের সওয়াব থেকে কিছুই কমানো হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4269)


4269 - عن مروان -يعني ابن سالم المقَفَّع- قال: رأيت ابن عمر يقبض على لحيته فيقطع ما زاد على الكف، وقال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أفطر قال:"ذهب الظّمأُ وابتلّت العروقُ، وثبت الأجر إن شاء الله".

حسن: رواه أبو داود (2357)، والنسائي في"الكبري" (3315) كلاهما من حديث علي بن حسن، أخبرنا الحسين بن واقد، أخبرنا مروان المقَفَّع فذكره.

ورواه الدارقطني (2279)، والحاكم (1/ 422)، والبيهقي (4/ 239) كلّهم من هذا الوجه.

وعلي بن حسن هو ابن شفيق أبو عبد الرحمن المروزيّ من رجال الجماعة.

قال الدارقطني: تفرد به الحسين بن واقد، وإسناده حسن.

وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين فقد احتجا بالحسين بن واقد، ومروان بن المقَفَّع".

ولكن قال الذهبي: على شرط البخاريّ واحتج البخاري بمروان وابن المقَفَّع وهو ابن سالم".

وهذا يشعر بأن بعض النساخ أخطأوا في نقل قول الحاكم فإن الصّحيح هو ملخص ما نقله الذهبي ثم إنّ في قول الحاكم والذهبي وهمًا أيضًا؛ فإن مروان بن المقفع لم يخرج له البخاري، وإنما أخرج له أبو داود والنسائي. ووثقه ابن حبان وروى عنه عدد. وسبق قول الدارقطني أنه حسن إسناده فهو لا ينزل عن درجة"صدوق".

والحسين بن واقد هو أبو عبد الله القاضي المروزيّ، وثّقه ابن معين وغيره وهو حسن الحديث
من رجال الصحيح.

وأما ما رُوي عن معاذ بن زهرة أنه بلغه أن النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا أفطر، قال:"اللَّهم! لك صمتُ وعلى رزقك أفطرت" فهو مرسل.

رواه أبو داود (2358) وعنه البيهقي (4/ 239) عن مسدد، حدّثنا هشيم، عن حصين، عن معاذ ابن زهرة، فذكره. وأعله المنذريّ بالإرسال؛ لأنّ معاذ بن زهرة تابعي، ثم لم يرو عنه غير حصين، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي عند المتابعة وإلا فلين الحديث.

ورواه ابن السني (479) من طريق سفيان، عن حصين بن عبد الرحمن، عن رجل، عن معاذ بن زهرة، بلفظ:"الحمد لله الذي أعاننيِ فصمت، ورزقني فأفطرت". فأدخل رجلًا بين حصين ومعاذ وهو لم يسم.

وكذلك لا يصح ما روي عن أنس، أنّ النبي صلى الله عليه وسلم كان إذا أفطر قال:"بسم الله، اللهم! لك صمتُ، وعلى رزقك أفطرت، تقبّل مني إنك أنت السميع العليم".

رواه الطبراني في الصغير والأوسط، وكتاب الدعاء (918)، وأبو نعيم في أخبار أصبهان (2/ 217) من طريق إسماعيل بن عمرو البجليّ، ثنا داود بن الزبرقان، عن شعبة، عن ثابت، عن أنس، فذكره.

وإسناده ضعيف جدًّا؛ فإن داود بن الزبرقان متروك كما قال الحافظ في"التلخيص" (2/ 202).

وأورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 156) وأعلّه بداود بن الزبرقان، فقال:"ضعيف".

قلت: وفيه إسماعيل بن عمرو الراوي عنه. قال الطبراني: تفرّد به إسماعيل بن عمرو البجلي.

وقال العقيلي في"الضعفاء" (99):"في حديثه مناكير، ويُحيل على من لا يحتمل". وضعّفه أبو حاتم والدارقطني وغيرهما وهو من رجال"التهذيب" (1/ 320) وسقطت ترجمته في بعض نسخ"التقريب" فتنبه.

وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عباس قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أفطر يقول:"اللهم! لك صمتُ، وعلى رزقك أفطرت، فتقبّل منا إنّك أنت السميع العليم". رواه الدارقطني (2280).

ورواه الطبراني في"الكبير" (12/ 146)، وابن السني في"عمل اليوم والليلة" (480) كلهم من حديث عبد الملك بن هارون بن عنترة، عن أبيه، عن جده، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده ضعيف جدًّا؛ فإنّ عبد الملك بن هارون قال فيه الذهبي:"تركوه" ونقل عن السعدي أنه دجال.

وهارون بن عنترة ذكره ابن حبان في المجروحين (1161) وقال: وهو الذي يقال له: هارون ابن أبي وكيع. وقال:"منكر الحديث جدًّا، يروي المناكير الكثيرة حتى يسبق إلى قلب المستمع لها أنه المتعمد لذلك من كثرة ما يروي ما لا أصل له، لا يجوز الاحتجاج به بحال" انتهى.

ثم غفل عنه فأورده في"الثقات" (7/ 578) في ترجمة هارون بن أبي وكيع، وقال:"روى عنه
عيسي بن يونس".

وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 156): وفيه عبد الملك بن هارون وهو ضعيف.

وهذا تقصير منه؛ فإن فيه هارون بن عنترة ضعيف جدًّا.

وقد قال فيه الدارقطني كما في"الضعفاء والمتروكين" (362):"متروك".




ইবন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। মারওয়ান ইবনু সালিম আল-মুকাফ্ফা' বলেন: আমি ইবন উমারকে দেখেছি, তিনি তাঁর দাড়ি মুষ্টিবদ্ধ করে ধরতেন এবং মুষ্টির অতিরিক্ত অংশ কেটে ফেলতেন। তিনি (ইবন উমার) আরও বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ইফতার করতেন, তখন বলতেন: "পিপাসা দূর হয়েছে, শিরাগুলো সিক্ত হয়েছে এবং আল্লাহ্‌ চাইলে পুরস্কারও সাব্যস্ত হয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4270)


4270 - عن أنس بن مالك قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا أفطر عند قوم دعا لهم، فقال:"أفطر عندكم الصّائمون، وأكل طعامكم الأبرار، وصلّت عليكم الملائكة".

حسن: رواه ابن السني في عمل اليوم والليلة (482)، والطبراني في الدّعاء (925) كلاهما من حديث عمران القطان، عن قتادة، عن أنس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عمران القطان وهو ابن داور -بالواو- فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

وصححه العراقي في"تخريج الأحياء" (2/ 13). ولحديث أنس طرق أخرى تقويه.

منها: ما رواه الإمام أحمد (12177، 13086)، وأبو يعلى (7/ 291 - 292)، وابن أبي شيبة (3/ 100)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (ص 268)، والطبراني في الدعاء (922)، والبيهقي (4/ 239) كلّهم من طرق عن هشام، عن يحيى بن أبي كثير، عن أنس بن مالك، نحوه.

قال البيهقي:"هذا مرسل، لم يسمعه يحيي عن أنس، إنما سمعه عن رجل من أهل البصرة يقال له عمرو بن زينب، ويقال: ابن زُبَيْب، عن أنس".

وقال ابن حبان:"كان يحيي يدلس، فكل ما روي عن أنس فقد دلّس عنه، ولم يسمع من أنس ولا من صحابي".

ومنها: ما رواه معمر، عن ثابت، عن أنس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم جاء إلى سعد بن عبادة، فجاء بخبز وزيت، فأكل ثم قال النبي صلى الله عليه وسلم:"أفطر عندكم الصائمون وأكل طعامكم الأبرار، وصلت عليكم الملائكة".

رواه أبو داود (3854)، وأحمد (12406)، والبيهقي (4/ 240)، والطبراني في الدعاء (924) كلّهم من طريق عبد الرزاق - وهو في مصنفه (4/ 311). عن معمر، به.

صحّح النووي إسناده في"الأذكار"، وتعقبه ابن حجر بأن معمرًا في روايته عن ثابت مقدوح فيها. وقال:"ولو وصف الشيخ المتن بالصّحة لكان أولى؛ لأن له طرقًا يقوي بعضها بعضًا" الفتوحات الربانية (4/ 434).

وأما ما روي عن عبد الله بن الزبير، قال: أفطر رسول الله صلى الله عليه وسلم عند سعد بن معاذ، فقال:"أفطر
عندكم الصائمون، وأكل طعامكم الأبرار، وصلت عليكم الملائكة" فإسناده ضعيف.

رواه ابن ماجه (1747)، وابن حبان (5296) كلاهما من حديث هشام بن عمار، قال: حدثنا سعيد بن يحيى اللخمي، قال: حدثنا محمد بن عمرو بن علقمة، عن مصعب بن ثابت، عن عبد الله ابن الزبير، فذكره.

ومصعب بن ثابت هو ابن عبد الله بن الزبير ضعيف باتفاق أهل العلم. وذكره ابن حبان في"الثقات" (7/ 478) وقال: قد أدخلته في"الضعفاء" وهو ممن أستخير الله تعالى فيه.

وقال في"المجروحين":"منكر الحديث ممن ينفرد بالمناكير عن المشاهير، فلما كثر ذلك منه استحق مجانبة حديثه".

قلت: وهذا مما وهم فيه مصعب بن ثابت فإنّ المشهور أنه من حديث أنس كما سبق، فجعله من حديث عبد الله بن الزبير.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন কোনো গোত্রের কাছে ইফতার করতেন, তখন তাদের জন্য দু'আ করতেন। তিনি বলতেন: "তোমাদের কাছে যেন রোজাদাররা ইফতার করে, তোমাদের খাদ্য যেন সৎ ব্যক্তিরা গ্রহণ করে, এবং ফেরেশতারা যেন তোমাদের জন্য ক্ষমা প্রার্থনা করে (বা রহমতের দু'আ করে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (4271)


4271 - عن أبي أمامة الباهلي قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"بينا أنا نائم أتاني رجلان، فأخذا بضَبْعي، فأتيا بي جبلًا وَعْرًا، فقالا: اصعد. فقلت: إني لا أطيقه. فقالا: إنا سنسهله لك، فصعدتُ حتى إذا كنتُ في سواء الجبل إذا بأصوات شديدة. قلت: ما هذه الأصوات؟ قالوا: هذا عُواء أهل النار، ثم انطلق بي، فإذا أنا بقوم معلقين بعراقيبهم مشقّقة أشداقهم تسيل أشداقهم دمًا. قال: قلت: من هؤلاء؟ قالا: الذين يفطرون قبل تحلّة صومهم" الحديث.

صحيح: رواه ابن خزيمة (1986) وعنه ابن حبان (7491)، والحاكم (1/ 430)، وعنه البيهقي (4/ 216) كلّهم من حديث بشر بن بكر، حدثني ابن جابر، حدثني سليم بن عامر، حدثني أبو أمامة الباهلي، فذكر الحديث في سياق أطول وهو مذكور في موضعه. قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.

قلت: وهو كما قال، وابن جابر هو عبد الرحمن بن يزيد بن جابر. وله طرق أخرى عن عبد الرحمن بن جابر.




আবূ উমামাহ আল-বাহিলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "একদা আমি ঘুমন্ত ছিলাম, এমন সময় দুজন লোক আমার কাছে এলো। তারা আমার দু’বাহু ধরলো এবং আমাকে একটি কঠিন ও দুর্গম পাহাড়ের কাছে নিয়ে গেল। তারা বললো: উপরে উঠো। আমি বললাম: আমি এর সামর্থ্য রাখি না। তারা বললো: আমরা তোমার জন্য এটিকে সহজ করে দেবো। অতঃপর আমি উপরে উঠলাম, এমনকি যখন পাহাড়ের সমতল ভূমিতে পৌঁছালাম, তখন হঠাৎ বিকট আওয়াজ শুনতে পেলাম। আমি বললাম: এই আওয়াজ কিসের? তারা বললো: এটা জাহান্নামবাসীদের আর্তনাদ (চিৎকার)। এরপর তারা আমাকে নিয়ে চলতে থাকলো, হঠাৎ দেখলাম একদল লোক তাদের গোড়ালি দ্বারা ঝোলানো অবস্থায় রয়েছে, তাদের গাল চেরা, এবং তাদের গাল বেয়ে রক্ত ঝরছে। আমি বললাম: এরা কারা? তারা বললো: এরা হলো সেই সমস্ত লোক যারা রোযা পূর্ণ হওয়ার (ইফতারের) সময়ের পূর্বে ভেঙে ফেলে/ইফতার করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4272)


4272 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ثلاثة لا ترد دعوتهم: الإمام العادل، والصائم حتى يُفطر، ودعوة المظلوم يرفعها الله دون الغمام يوم القيامة، وتُفتح لها أبواب السماء. ويقول: بعزّتي لأنصرنَّك ولو بعد حين".
حسن: رواه ابن ماجه (1752)، والترمذي (3598)، وأحمد (10183). وصحّحه ابن خزيمة (1901)، وابن حبان (3428).

كلّهم من حديث سعدان الجهني، عن سعد أبي مجاهد الطائيّ -وكان ثقة-، عن أبي مدلة - وكان ثقة-، عن أبي هريرة، فذكره. وقوله:"ثقة" من كلام ابن ماجه.

وأبو مدلة ليس له حديث غير هذا. وقال الترمذي:"هذا حديث حسن. وسعدان الجهني: هو سعدان بن بشر، قد روى عنه عيسي بن يونس، وأبو عاصم وغير واحد من كبار أهل الحديث.

وأبو مجاهد هو سعد الطائيّ.

وأبو مدلّة هو مولى أمّ المؤمنين عائشة. وإنما نعرفه بهذا الحديث. ويروى عنه هذا الحديث أطول من هذا" انتهى.

وقد حسّنه أيضًا ابن حجر في"أمالي الأذكار" نقل عنه ابن علّان في"شرح الأذكار" (4/ 338).

وأمّا قول ابن المديني:"أبو مدلّة مولي عائشة لا يعرف اسمه، مجهول". فالرجل اشتهر بكنيته، وعدم العلم باسمه لا يجعله مجهولًا، وقد عرفه ابن ماجه فوثّقه وسماه غيره عبيدالله بن عبد الله.

فمثله إذا روى حديثًا وليس فيه ما ينكر عليه، وله شواهد، فبحسن حديثه. وقد صحّحه ابن خزيمة وابن حبان، وحسّنه الترمذي وابن حجر كما مضى.

وقد جاء الحديث عن أبي هريرة من وجه آخر بإسناد حسن بلفظ:"ثلاث دعوات مستجابة لا شك فيهن: دعوة المظلوم، ودعوة الوالد، ودعوة المسافر".

رواه أبو داود (1536)، والترمذي (1905، 3448)، والطبراني في الدعاء (1314)، وأحمد (7510)، وابن حبان (2699) كلهم من طرق، عن هشام الدستوائي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي جعفر المؤذن، أنه سمع أبا هريرة يقول (فذكر الحديث).

وأبو جعفر المؤذن لم يرو عنه غير يحيى بن أبي كثير، وقد قال الحافظ في" التقريب":"مقبول" أي عند المتابعة، وقد توبع في بعض فقرات الحديث.

وأما ما رواه البزار -كشف الأستار (3139) - من طريق إبراهيم بن خُثيم بن عراك بن مالك، عن أبيه، عن جده، عن أبي هريرة، عن النبيّ:"ثلاث حقٌّ على الله أن لا يردّ لهم دعوة: الصّائم حتى يُفطر، والمظلوم حتى ينتصر، والمسافر حتى يرجع".

فلا تقبل متابعته فإن إبراهيم بن خُثيم بن عراك متروك الحديث.

وسيأتي مزيد من التحقيق في كتاب الدعوات.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিন ব্যক্তির দুআ প্রত্যাখ্যান করা হয় না: ন্যায়পরায়ণ শাসক, রোযাদার ব্যক্তি যতক্ষণ না সে ইফতার করে, এবং মাযলুমের (অত্যাচারিতের) দুআ। আল্লাহ তাআলা কিয়ামতের দিন তা মেঘমালার উপরে উঠিয়ে নেন এবং এর জন্য আসমানের দরজাসমূহ খুলে দেওয়া হয়। আর তিনি বলেন: আমার ইজ্জতের শপথ, আমি অবশ্যই তোমাকে সাহায্য করব, যদিও তা কিছুকাল পরে হয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (4273)


4273 - عن أنس بن مالك، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ثلاث دعوات لا تردّ، دعوة الوالد، ودعوة الصّائم، ودعوة المسافر".

حسن: رواه البيهقي (3/ 345)، والضياء في المختارة (2057) كلاهما من طريق أبي العباس
محمد بن يعقوب، حدّثنا إبراهيم بن بكر المروزي، حدثنا السهمي عبد الله بن بكر، حدثنا حميد الطويل، عن أنس بن مالك، فذكره.

وإسناده حسن من أجل إبراهيم بن بكر المروزي فإنه حسن الحديث.

يقول ابن الجوزيّ:"إبراهيم بن بكر ستة، لا نعلم فيهم ضعيفًا سوى هذا" يعني الشيباني. ذكره الحافظ في"اللسان" في ترجمة إبراهيم بن بكر الشيباني، وذكر منهم إبراهيم بن بكر السهمي يعني أنه ليس من الضعفاء.

وفي الباب ما روي عن عبد الله بن عمرو بن العاص، قال: قال رسول الله:"إنّ للصّائم عند فطره لدعوةٌ ما تُردّ".

رواه ابن ماجه (1753) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا الوليد بن مسلم، قال: حدثنا إسحاق ابن عبد الله المدني، قال: سمعت عبد الله بن أبي مليكة، يقول: سمعت عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكره.

ورواه ابن السني (475)، والحاكم (1/ 422) وعنه البيهقي في فضائل الأوقات (142) كلّهم من طريق الحكم بن موسي، حدّثنا الوليد بن مسلم، بإسناده. وزادوا: وسمعت عبد الله يقول عند فطره:"اللهم! إني أسألك رحمتك التي وسعت كلَّ شيء أن تغفر لي ذنوبي".

وفيه إسحاق بن عبيدالله وهو ابن أبي مليكة القرشيّ التيميّ المدني، ويقال: المكيّ، روى عن أخيه عبد الله بن أبي مليكة. وقد نقل محقق كتاب"تهذيب الكمال" أنه وجد في حواشي النسخ من قول المؤلف:"أظنه أخاه".

قلت: هذا هو الظاهر، ومن قال: إنه إسحاق بن عبيدالله بن أبي المهاجر المخزومي مولاهم أخو إسماعيل بن عبيدالله فقد وهم.

وقد روى عنه جمع ولكن لم يوثقه إلا ابن حبان، فهو في درجة مقبول، ويحتاج إلى المتابعة، وأما البوصيري فصححه.



وليلي مولاة أم عمارة ذكرها ابن حبان في"الثقات" (5/ 346) وأخرج حديثها في"الصحيح". ولم يرو عنها غير حبيب بن زيد، ولم يونقها أحد غير ابن حبان فهي"مجهولة".

وفي التقريب:"مقبولة" أي عند المتابعة.

وأما الترمذي فقال: حسن صحيح. وهو تساهل منه.

وقال: وأم عمارة هي جدة حبيب بن زيد الأنصاريّ.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “তিনটি দু’আ ফিরিয়ে দেওয়া হয় না: পিতা-মাতার দু’আ, রোযাদারের দু’আ এবং মুসাফিরের দু’আ।”









আল-জামি` আল-কামিল (4274)


4274 - عن * *




৪২৭৪ - হতে **









আল-জামি` আল-কামিল (4275)


4275 - عن أبي هريرة، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"قال الله: كلُّ عمل ابن آدم له إلّا الصِّيام فإنّه لي وأنا أجزي به، والصِّيام جُنّة، وإذا كان يوم صوم أحدكم فلا يرفث ولا يصْخب، فإنْ سابَّهُ أحدٌ أو قاتله فليقل: إنّي امْرؤٌ صائم. والذي نفسُ محمّد بيده! لَخُلُوفُ فمِ الصَّائم أطيبُ عند الله من ريح المسك. للصَّائم فرحتان يفرحهُما: إذا أفطرَ فرح، وإذا لقي ربَّهُ فرح بصومه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1904)، ومسلم في الصيام (1151: 163) كلاهما من طريق ابن جريج، أخبرني عطاء (هو ابن أبي رباح)، عن أبي صالح الزّيّات، أنه سمع أبا هريرة رضي الله عنه يقول (فذكره). واللفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه.

قوله:"والصّيام جُنّة" بضم الجيم أي سترة ووقاية من الآثام في الدنيا، ومن النار في الآخرة.

وقوله:"فلا يرفث" بضم الفاء وكسرها، والمراد بالرَّفث الكلام الفاحش، ويطلق على الجماع وعلى مقدماته.

وقوله:"ولا يصخب" وفي لفظ مسلم:"ولا يسخب" بالسين بدل الصاد المهملة وهو بمعناه، والصَّخب: الخصام والصّياح.

وقوله:"لخلوف فم الصائم" الخلوف بضم الخاء المعجمة واللام: المراد به تغيّر رائحة فم الصّائم بسبب الصّيام.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তা‘আলা বলেন: আদম সন্তানের প্রতিটি কাজ তার নিজের জন্য, কিন্তু সিয়াম (রোযা) ছাড়া। কেননা তা একান্তভাবে আমার জন্য, আর আমিই এর প্রতিদান দেব। আর সিয়াম (রোযা) হলো ঢালস্বরূপ। তোমাদের কারো সিয়াম পালনের দিন হলে সে যেন অশ্লীল কথা না বলে এবং শোরগোল না করে। যদি কেউ তাকে গালি দেয় কিংবা তার সঙ্গে ঝগড়া করে, সে যেন বলে: আমি একজন সিয়াম পালনকারী। যাঁর হাতে মুহাম্মাদের প্রাণ, তাঁর শপথ! সিয়াম পালনকারীর মুখের দুর্গন্ধ আল্লাহর কাছে মিসকের সুগন্ধি থেকেও উত্তম। সিয়াম পালনকারীর জন্য দুটি আনন্দ রয়েছে, যা তাকে আনন্দিত করে: যখন সে ইফতার করে তখন সে আনন্দিত হয় এবং যখন সে তার প্রতিপালকের সাথে সাক্ষাৎ করবে, তখন সে তার সিয়ামের কারণে আনন্দিত হবে।









আল-জামি` আল-কামিল (4276)


4276 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"والذي نفسي بيده! لخلوف فم الصّائم أطيب عند الله من ريح المسك، إنّما يذر شهوته وطعامه وشرابه من أجلي، فالصّيام لي وأنا أجزي به. كلّ حسنة بعشر أمثالها إلى سبعمائة ضعف إلّا الصّيام فهو لي وأنا أجزي به".

متفق عليه: رواه مالك في الصيام (58) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاريّ في الصيام (1894) من طريق مالك، ومسلم في الصّيام (1151: 162) من طريق المغيرة الحزاميّ - كلاهما عن أبي الزّناد بإسناده. واللّفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم مختصر جدًّا.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “শপথ সেই সত্তার, যাঁর হাতে আমার প্রাণ! নিশ্চয়ই রোজাদারের মুখের গন্ধ আল্লাহর নিকট কস্তুরীর সুগন্ধির চেয়েও অধিক প্রিয়। সে কেবল আমার জন্যই তার প্রবৃত্তি, খাদ্য ও পানীয় পরিত্যাগ করে। সুতরাং রোযা আমার জন্য, আর আমিই এর প্রতিদান দেব। প্রত্যেক নেক আমলের প্রতিদান দশ গুণ থেকে সাতশ’ গুণ পর্যন্ত (বৃদ্ধি করা হয়), তবে রোযা ছাড়া, কারণ তা আমার জন্য, আর আমিই এর প্রতিদান দেব।”









আল-জামি` আল-কামিল (4277)


4277 - عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم يرويه عن ربكم قال:"لكل عمل كفارة، والصوم لي، وأنا أجزي به، ولخلوف فم الصائم أطيب عند الله من ريح المسك".

صحيح: رواه البخاري في التوحيد (7538) عن آدم، عن شعبة، حدثنا محمد بن زياد، سمعت أبا هريرة يقول: فذكره. ولم يذكر مسلم بهذا السياق.

ورواه أحمد (9888) عن محمد بن جعفر وهو غندر، قال: حدثنا شعبة، وفيه:"كل العمل كفارة، والصوم لي .....".

وقوله:"لكل عمل" -أي من المعاصي-"كفارة" من الطاعات.

وأما معنى حديث غندر: كل عمل من الطاعات كفارة للمعاصي.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর রব থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি (আল্লাহ) বলেন: "প্রত্যেক আমলের কাফফারা (প্রতিদান) রয়েছে, কিন্তু সিয়াম (রোজা) আমার জন্য, আর আমিই এর প্রতিদান দেব। আর সিয়াম পালনকারীর মুখের দুর্গন্ধ আল্লাহর নিকট মিশকের সুগন্ধির চেয়েও অধিক প্রিয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (4278)


4278 - عن أبي هريرة، وأبي سعيد، قالا: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ الله عز وجل يقول: إنّ الصوم لي وأنا أجزي به، إنّ للصائم فرحتين. إذا أفطر فرح، وإذا لقي الله فرح، والذي نفس محمد بيده لخلوف فم الصّائم أطيب عند الله من ريح المسك".

صحيح: رواه مسلم في الصيام (1151: 165) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدثنا محمد بن فضيل، عن أبي ستان، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، وأبي سعيد فذكراه.

ورواه النسائي (2213) عن علي بن حرب، عن محمد بن فضيل بإسناده عن أبي سعيد وحده.

وأما ما روي عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أعطيتْ أمّتي خمسَ خصال في رمضان، لم تُعْطَها أمّة قبلهم: خلوف فم الصّائم أطيب عند الله من ريح المسك، وتستغفر لهم الملائكة حتى يفطروا، ويزيّن الله عز وجل كلَّ يوم جنته، ثم يقول: يوشكُ عبادي الصالحون أن يُلقوا عنهم المؤنة والأذى ويصيروا إليكِ، ويُصفَّد فيه مردةُ الشياطين، فلا يخلُصُوا فيه إلى ما كانوا يخلصون إليه في غيره، ويُغفر لهم في آخر ليلة". قيل: يا رسول الله، أهي ليلة القدر؟ قال:"لا، ولكنّ العامل إنما يُوفّي أجره إذا قضى عمله". فهو ضعيف.

رواه الإمام أحمد (7917)، والبزار -كشف الأستار (963) - كلاهما من حديث يزيد بن هارون، نا هشام بن أبي هشام، عن محمد بن محمد بن الأسود، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.

وهشام بن أبي هشام هو هشام بن زياد بن أبي يزيد أبو المقدام، ويقال له أيضًا: هشام بن أبي الولد المدني، ضعيف باتفاق أهل العلم.

قال النسائي: متروك، وقال ابن حبان: يروي الموضوعات عن الثقات، لا يجوز الاحتجاج به.

ومحمد بن محمد بن الأسود لم يرو عنه سوى هشام بن ابي هشام. قال الحافظ في"التقريب":"مستور".




আবূ হুরাইরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ আযযা ওয়া জাল বলেন: নিশ্চয়ই সাওম (রোযা) আমার জন্য এবং আমিই এর প্রতিদান দেব। সাওম পালনকারীর জন্য দুটি আনন্দ রয়েছে: যখন সে ইফতার করে, তখন সে আনন্দিত হয়, আর যখন সে আল্লাহর সাথে সাক্ষাৎ করবে, তখনও সে আনন্দিত হবে। যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, তাঁর শপথ করে বলছি, নিশ্চয়ই রোযাদারের মুখের গন্ধ আল্লাহর নিকট কস্তুরীর সুগন্ধির চেয়েও অধিক সুগন্ধযুক্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (4279)


4279 - عن الحارث الأشعري حدّثه، أنّ النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الله أمر يحيى بن زكريا بخمس كلماتٍ أن يعمل بها ويأمر بني إسرائيل أن يعملوا بها، وإنه كادَ أن يُبْطيء بها، قال عيسى: إنّ الله أمرك بخمس كلمات لتعمل بها وتأمر بني إسرائيل أن يعملوا بها، فإمّا أن تأمرَهُم وإمّا أنْ آمرَهُم، فقال يحيى: أخشى إن سبقتني بها أن يُخسفَ بي أو أُعذّب، فجمع الناس في بيت المقدس فامتلأ المسجدُ وتَعدَّوا على الشُّرَف، فقال: إنّ الله أمرني بخمس كلمات أن أعمل بهن وآمركم أن تعملوا بهن.

أوَّلُهن: أن تعبدوا الله ولا تشركوا به شيئًا، وإنَّ مَثَلَ مَنْ أشرك بالله كمثل رجل اشتري عبدًا من خالص ماله بذهب أو ورق فقال: هذه داري وهذا عملي، فاعمل وأدِّ إليَّ، فكان يعمل ويؤدي إلى غير سيِّدِه، فأيُّكم يرضى أن يكون عبده كذلك؟ .

وإنّ الله أمركم بالصّلاة فإذا صليتم فلا تلتفتوا، فإنّ الله يَنْصِبُ وجهه لوجه عبده في صلاته ما لم يلتفتْ.

وآمرُكم بالصِّيام، فإنَّ مَثَلَ ذلك كمثل رجل في عصابة معه صُرَّةٌ فيها مِسْك، فكلُّهم يَعْجبُ -أو يُعجِبُه ريحُها- وإنَّ ريح الصائم أطيب عند الله من ريح المسك.

صحيح: رواه الترمذيّ (2863)، والإمام أحمد (17170)، وصحّحه ابن خزيمة (1895)، وابن حبان (6233)، والحاكم (1/ 421) كلّهم من طريق يحيي بن أبي كثير، عن زيد بن سلام، عن جده ممطور، عن الحارث الأسدي، فذكره. وإسناده صحيح.

قال الترمذيّ:"حديث حسن صحيح غريب. قال محمد بن إسماعيل (هو البخاريّ):"الحارث الأشعري له صحبة وله غير هذا الحديث".

وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".




আল-হারিছ আল-আশআরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা ইয়াহইয়া ইবনু যাকারিয়াকে পাঁচটি কথা দ্বারা আদেশ করেছেন, যেন তিনি সে অনুযায়ী আমল করেন এবং বনি ইসরাইলকেও সে অনুযায়ী আমল করার নির্দেশ দেন। কিন্তু তিনি তা প্রচার করতে প্রায় বিলম্ব করছিলেন।" 'ঈসা (আঃ) বললেন: "আল্লাহ তাআলা আপনাকে পাঁচটি কথা দ্বারা আদেশ করেছেন, যেন আপনি সে অনুযায়ী আমল করেন এবং বনি ইসরাইলকেও সে অনুযায়ী আমল করার নির্দেশ দেন। হয় আপনি তাদের আদেশ করুন, না হয় আমি তাদের আদেশ করব।" তখন ইয়াহইয়া (আঃ) বললেন: "আমি আশঙ্কা করছি যে, যদি আপনি আমাকে ছাড়িয়ে গিয়ে তা বলে দেন, তবে আমি মাটির নিচে ধসে যাব অথবা আমাকে আযাব দেওয়া হবে।" অতঃপর তিনি বায়তুল মুকাদ্দাসে লোকদের একত্রিত করলেন। ফলে মসজিদ পরিপূর্ণ হয়ে গেল এবং লোকেরা উঁচু স্থানগুলোতেও (ছাদে বা প্রাচীরে) উঠে গেল। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা আমাকে পাঁচটি কথা দ্বারা আদেশ করেছেন, যেন আমি সে অনুযায়ী আমল করি এবং তোমাদেরকেও সে অনুযায়ী আমল করার নির্দেশ দেই।"

"প্রথমত: তোমরা আল্লাহর ইবাদত করো এবং তাঁর সাথে কাউকে শরীক করো না। যে ব্যক্তি আল্লাহর সাথে শরীক করে, তার উদাহরণ হলো এমন ব্যক্তির মতো, যে নিজ খাঁটি ধন-সম্পদ দ্বারা সোনা বা রূপার বিনিময়ে একজন গোলাম ক্রয় করল এবং তাকে বলল: 'এই আমার ঘর এবং এই আমার কাজ। অতএব তুমি কাজ করো এবং তা আমার কাছে ফিরিয়ে দাও।' কিন্তু সে কাজ করে অন্য মনিবের কাছে ফিরিয়ে দিত। তোমাদের মধ্যে এমন কে আছ, যে তার গোলামের এরূপ হওয়া পছন্দ করবে?"

"আর নিশ্চয়ই আল্লাহ তাআলা তোমাদেরকে সালাতের আদেশ করেছেন। অতএব, যখন তোমরা সালাত আদায় করো, তখন (এদিক-ওদিক) তাকাও না। কেননা আল্লাহ তাঁর বান্দার দিকে তাঁর চেহারা ফিরিয়ে রাখেন (সম্মুখীন থাকেন), যতক্ষণ না সে সালাতে (এদিক-ওদিক) তাকায়।"

"আর আমি তোমাদেরকে সিয়ামের (রোযার) আদেশ করছি। এর উদাহরণ হলো সেই ব্যক্তির মতো, যে এক দলের মধ্যে রয়েছে আর তার কাছে রয়েছে একটি থলে, যাতে আছে মিশক (কস্তুরী)। প্রত্যেকেই তার ঘ্রাণে মুগ্ধ হয় – অথবা (বর্ণনাকারী সন্দেহ করে বলেছেন) – তার ঘ্রাণে মুগ্ধ হয়। আর আল্লাহর কাছে সিয়াম পালনকারীর মুখের গন্ধ মিশকের ঘ্রাণের চেয়েও অধিক উত্তম।"









আল-জামি` আল-কামিল (4280)


4280 - عن أبي أمامة، قال: أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلتُ: مرني بأمر، آخذه عنك. قال:"عليك بالصوم، فإنه لا مثل له".

صحح: رواه النسائي (2220) عن عمرو بن علي، عن عبد الرحمن، قال: حدثنا مهدي بن ميمون، قال: أخبرني محمد بن عبد الله بن أبي يعقوب، قال: أخبرني رجاء بن حيوة، عن أبي أمامة، قال (فذكره).

ورواه الإمام أحمد (22141، 22142، 22195، 22220) وصحّحه ابن حبان (3425) كلاهما من طريق مهدي بن ميمون بأطول منه.

وكذلك رواه الإمام أحمد (22140) من طريق واصل مولى أبي عيينة، عن محمد بن عبد الله بن
أبي يعقوب.

وخالفهما شعبة فرواه عن محمد بن عبد الله بن أبي يعقوب قال: سمعت أبا نصر الهلالي، عن رجاء بن حيوة، عن أبي أمامة، وقال فيه:"عليك بالصوم فإنه لا عدل له".

فزاد أبا نصر الهلالي بين محمد بن أبي يعقوب وبين رجاء بن حيوة.

ورواه ابن خزيمة (1893)، وابن حبان (3426)، والحاكم (1/ 421) كلّهم من حديث عبد الصمد بن عبد الوارث، عن شعبة، به.

قال ابن حبان: أبو نصر هذا هو حميد بن هلال، ولست أنكر أن يكون محمد بن أبي يعقوب سمع هذا الخبر بطوله عن رجاء بن حيوة، وسمع بعضه عن حميد بن هلال. فالطّريقان محفوظان" انتهى.

وقال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه. ومحمد بن أبي يعقوب هذا الذي كان شعبة إذا حدّث عنه يقول: حدثني سيد بني تميم. وأبو نصر الهلالي هو حميد بن هلال العدويّ. ولا أعلم له راويًا عن شعبة غير عبد الصمد. وهو ثقة مأمون".

وقال الذهبي:"صحيح، وأبو نصر حميد بن هلال العدويّ تفرّد به عبد الصمد بن عبد الوارث، عن شعبة".

قلت: وليس الأمر كما قالا، فقد رواه النسائيّ (2222، 2223) من وجهين آخرين: يعقوب الحضرميّ، ويحيى بن أبي كثير كلاهما عن شعبة بهذا الإسناد.

والخلاصة فيه أن الإسناد صحيح، وقد صرَّح محمد بن أبي يعقوب بسماعه من رجاء بن حيوة، كما صرَّح بسماعه من أبي نصر الهلالي، فالطريقان محفوظان كما قال ابن حبان.

وأما ما جاء في مصنف عبد الرزاق (7899) عن هشام بن حسان، عن محمد بن أبي يعقوب، عن أبي أمامة. فالظاهر أنه سقط منه"رجاء بن حيوة" من النّساخ، أو أسقطه أحد الرواة كما قال المحقق.




আবূ উমামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম: আমাকে এমন একটি কাজের নির্দেশ দিন যা আমি আপনার কাছ থেকে গ্রহণ করব। তিনি বললেন: "তুমি সিয়াম (রোযা) পালন করো, কারণ এর মতো (উত্তম আমল) আর কিছুই নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (4281)


4281 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: سمعتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من صام يومًا في سبيل الله باعدَ اللهُ وجهه عن النّار سبعين خريفًا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2840)، ومسلم في الصيام (1153: 168) كلاهما من طريق عبد الرزاق، أخبرنا ابن جريج، أخبرني يحيى بن سعيد، وسهيل بن أبي صالح، أنهما سمع النّعمان بن أبي عيّاش الزُّرقي يحدّث عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره.

ولفظهما سواء، إلا أن البخاري قال:"بعَّد".




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি আল্লাহর রাস্তায় একদিন রোযা রাখে, আল্লাহ তার মুখমণ্ডলকে জাহান্নামের আগুন থেকে সত্তর বছরের দূরত্বে সরিয়ে দেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (4282)


4282 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من صام يومًا في سبيل الله، زحزح
الله وجهه عن النار بذلك سبعين خريفًا".

صحيح: رواه النسائي (2244)، وأحمد (7990) كلاهما من حديث أنس بن عياض، عن سُهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكره. وهذا إسناد صحيح.

وللحديث أسانيد أخرى منها ما رواه ابن ماجه (1718) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا أنس بن عياض، قال: حدثنا عبد الله بن عبد العزيز الليثي، عن المقبري، عن أبي هريرة، فذكر الحديث مثله.

وهشام بن عمار السلمي الدمشقي لعله أخطأ فيه على أنس بن عياض لأنه كبر صار يتلقن.

وعبد الله بن عبد العزيز الليثي، قال فيه ابن حبان:"اختلط بآخره فكان يقلّب الأسانيد".

ومنها ما رواه الترمذيّ (1622) عن قتيبة، حدّثنا ابن لهيعة، عن أبي الأسود، عن عروة وسليمان بن يسار، أنهما حدّثاه عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكر مثله. وقال: أحدهما يقول:"سبعين" والآخر يقول:"أربعين".

قال الترمذي:"هذا حديث غريب من هذا الوجه. وأبو الأسود اسمه محمد بن عبد الرحمن بن نوفل الأسدي المدني" انتهي.

وفي الإسناد ابن لهيعة وفيه كلام معروف، ورأى بعض أهل العلم أن قتيبة بن سعيد ممن سمع منه أيضا قبل الاختلاط.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে (আল্লাহর সন্তুষ্টির জন্য) একদিন সাওম (রোযা) পালন করে, আল্লাহ এর বিনিময়ে তার চেহারাকে সত্তর বছরের দূরত্বে জাহান্নাম থেকে দূরে সরিয়ে দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (4283)


4283 - عن عقبة بن عامر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من صام يومًا في سبيل الله عز وجل باعد الله منه جهنم مسيرة مائة عام".

حسن: رواه النسائي (2254)، وابن أبي عاصم في كتاب الجهاد (169)، والطبراني في الكبير (17/ 335) كلهم من حديث محمد بن شعيب، قال: أخبرني يحيى بن الحارث، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن عقبة بن عامر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل القاسم وهو ابن عبد الرحمن الدمشقي أبو عبد الرحمن تكلّم فيه ابن حبان، ومشّاه الآخرون وهو حسن الحديث.

وفي الباب عن أبي أمامة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من صام يومًا في سبيل الله، جعل الله بينه وبين النار خندقًا كما بين السماء والأرض".

رواه الترمذي (1624) عن زياد بن أيوب، حدّثنا يزيد بن هارون، أخبرنا الوليد بن جميل، عن القاسم أبي عبد الرحمن، عن أبي أمامة، فذكره.

قال الترمذي: هذا حديث غريب من حديث أبي أمامة".

قلت: فيه الوليد بن جميل وهو الفلسطيني لين الحديث.

وقال أبو حاتم: شيخ يروي عن القاسم أحاديث منكرة.
وفي الباب ما روي أيضًا عن أبي الدرداء، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صام يومًا في سبيل الله باعد الله عنه النار مسيرة ألف سنة للراكب المستعجل".

رواه الإمام أحمد (27503) عن أبي سعيد، قال: حدثنا أبو يعقوب -يعني إسحاق بن عثمان الكلابي- قال: سمعت خالد بن دُريك يحدث عن أبي الدرداء، فذكره في حديث طويل.

وخالد بن دريك هو الشامي لم يذكر في ترجمته أنه أدرك أبا الدرداء، وقد روي عن ابن عمر وعائشة ولم يدركهما، وأعلّه الهيثمي في"المجمع" (5/ 285) بالانقطاع أيضًا.

وله أسانيد أخرى منها ما رواه الطبراني في"الأوسط" (3598) من طريق عبد الله بن الوليد العدني، قال: حدثنا سفيان الثوري، عن الأعمش، عن شمر بن عطية، عن شهر بن حوشب، عن أم الدرداء، عن أبي الدرداء، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صام يومًا في سبيل الله، جعل الله بينه وبين النار خندقًا كما بين السماء والأرض".

قال الطبراني:"لم يرو هذا الحديث عن سفيان إلا عبد الله بن الوليد العدني".

قلت: العدني من أصحاب سفيان الثوريّ. قال أحمد: سمع من سفيان، وجعل يُصحِّح سماعه، ولكن لم يكن صاحب حديث، وحديثه حديث صحيح. وكان ربما أخطأ في الإسناد. وقد كتبت عنه أنا كثيرًا". وأما ابن معين فقال: لا أعرفه، لم أكتب عنه شيئًا.

وفي الإسناد شهر بن حوشب وفيه كلام معروف.

ومع هذا كله قال المنذري في"الترغيب والترهيب" (1484) بعد أن عزاه إلى الطبراني في"الأوسط"، و"الصغير":"إسناده حسن".

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عمرو بن عبسة، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من صام يومًا في سبيل الله با عده الله من النار سبعين خريفًا".

رواه ابن أبي عاصم في"الجهاد" (170) عن محمد بن علي، حدثنا عبد الله بن سُليم، عن عبيدالله بن عمرو، عن زيد بن أبي أُنيسة، عن جنادة بن أبي خالد، عن أبي شيبة، عن عمرو بن عبيد، فذكره.

وفيه جنادة بن أبي خالد وهو أبو الخطاب الدمشقي ترجمه البخاري في"التاريخ الكبير"، وابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" وسكتا عنه فهو في عداد المجهولين إلا أن ابن حبان ذكره في"الثقات" (6/ 150) على قاعدته في توثيق من لم يُعرف فيه جرح.

وقال الذهبي في"الميزان":"لا يعرف".

وشيخه أبو شيبة هو المهري، قال الذهبيّ في ترجمة"بلج المهري" (1/ 352): عن أبي شيبة المهري، عن ثوبان قاء فأفطر، لا يُدري من ذا ولا من شيخه. وقال البخاري: إسناده ليس بالمعروف. انتهى.
ورواه الطبراني في"الأوسط" (3273) عن بكر بن سهل، عن يحيى بن حمزة، عن النعمان بن المنذر، عن مكحول، قال: قال عمرو بن عبسة. قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صام يومًا في سبيل الله بعُدتْ منه النار مسيرة مائة عام".

ومكحول لم يسمع من عمرو بن عبسة.

قال أبو حاتم: سألت أبا مسهر هل سمع مكحول من أحد من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم؟ قال: ما صح عندي إلا أنس بن مالك".

واختلف في سماعه من واثلة بن الأسقع فأنكر سماعه منه أبو زرعة.

وأما عمرو بن عبة فلم أجد من نصَّ على أنه سمع منه.

ولم ينتبه المنذريّ إلى هذا فقال في"الترغيب والترهيب" (1458) بعد أن عزاه إلى الطبراني في"الكبير"، و"الأوسط":"إسناده لا بأس به". وكيف لا يكون به بأس وفيه انقطاع.

وفي الباب أيضًا عن عتبة بن عبدٍ السلمي، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صام في سبيل الله يومًا فرضًا باعده الله من جهنم كما بين السموات السبع، وبين الأرضين السبع. ومن صام يومًا تطوعًا باعد الله ما بينه وبين جهنم مسيرة ما بين السماء إلى الأرض".

رواه الطبراني في"الكبير" (17/ 119 - 120) من طريق محمد بن عمر الواقدي، ثنا ثور بن

يزيد، عن شريح بن عبيد، عن عتبة بن عبد السّلمي، قال (فذكره). وفيه محمد بن عمر الواقدي

وهو متروك.

ورواه ابن أبي عاصم في"الجهاد" (172) عن محمد بن يحيى بن عبد الكريم، قال: حدثنا رجل -وقد سماه لي-، قال: حدثنا ثور بن يزيد بإسناده، مثله.

وفيه رجل لم يسم، ولا يبعد أن يكون هو الواقدي نفسه؛ فإن محمد بن يحيى قد سماه، ولكن حذفوه لشدّة ضعفه لإيهامه بأنه غيره.

وفي الباب أيضًا ما روي عن معاذ بن أنس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صام يومًا في سبيل الله متطوعًا في غير رمضان بعُد من النار مائة عام سير المضمَّر المجيد".

رواه أبو يعلى (1486) عن أحمد بن عيسى، حدثنا ابن وهب، أخبرني يحيى بن أيوب، عن زبان بن فائد، عن سهل بن معاذ، عن أبيه، فذكره.

وزبان بن فائد البصريّ أبو جوين ضعيف، ضعّفه أحمد وابن معين وابن حبان وغيرهم.

وبه أعلّه الهيثمي في"المجمع" (3/ 194) مع القول بأنه قد وثق.

وقوله:"وقد وثّق" الظاهر منه إشارة إلى ذكر ابن حبان له في"الثقات"، ولكنه لم يذكره في"الثقات" وإنما ذكره في"المجروحين" (373) وقال:"منكر الحديث جدًّا، يتفرد عن سهل بن معاذ بنسخة كأنها موضوعة، لا يحتج به". ونقل تضعيفه عن ابن معين أيضًا.




উকবাহ ইবন আমির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে ব্যক্তি আল্লাহর সন্তুষ্টির উদ্দেশ্যে একটি দিন সাওম (রোজা) পালন করবে, আল্লাহ্ তা‘আলা তার থেকে জাহান্নামকে একশত বছরের পথের দূরত্বে সরিয়ে দেবেন।”









আল-জামি` আল-কামিল (4284)


4284 - عن عبد الله بن مسعود، قال: كنا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال:"من استطاع الباءة فليتزوّج، فإنّه أغضُّ للبصر، وأَحْصن للفرْج، ومن لم يستطع فعليه بالصّوم فإنّه له وِجاء".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1905)، ومسلم في النكاح (1400) كلاهما من طريق الأعمش، عن إبراهيم، عن علقمة، قال:"بينما أنا أمشي مع عبد الله رضي الله عنه فقال"فذكره". واللفظ للبخاري.

وفي سياق مسلم قصّة ابن مسعود مع عثمان رضي الله عنهما.

قوله:"له وِجاء" بكسر الواو، وهو رضّ الخصيتين، وقيل: رضّ عروقهما، ومن يفعل به ذلك تنقطع شهوته، ومقتضاه أنّ الصّوم قامع لشهوة النكاح. (انظر: الفتح




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। তিনি বললেন: "যে ব্যক্তি বিবাহের সামর্থ্য রাখে, সে যেন বিবাহ করে, কারণ তা দৃষ্টিকে অধিক অবনতকারী এবং লজ্জাস্থানকে অধিক রক্ষাকারী। আর যে ব্যক্তি সামর্থ্য রাখে না, সে যেন রোযা রাখে, কারণ রোযা তার জন্য ঢালস্বরূপ (বা কাম-উত্তেজনা দমনকারী)।"









আল-জামি` আল-কামিল (4285)


4285 - عن حذيفة، قال: قال عمر رضي الله عنه: من يحفظ حديثًا عن النبيّ صلى الله عليه وسلم في الفتنة؟ قال حذيفة: أنا سمعته يقول: فتنة الرجل في أهله وماله وجاره تكفِّرها الصّلاة والصِّيام والصّدقة. قال: ليس أسأل عن ذه، إنما أسألُ عن التي تموجُ كما يموجُ البحر. قال: وإنَّ دون ذلك بابًا مغلقًا. قال: فيفتحُ أو يكسر؟ قال: يكسر. قال: ذاك أجدرُ أن لا يُغلقَ إلى يوم القيامة. فقلنا لمسروق: سَلْه، أكان عمر يعلم مَنِ الباب؟ فسأله، فقال: نعم، كما يعلم أن دون غد الليلة.

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1895) من طريق أبي وائل، ومسلم في الإيمان (236) من طريق رِبْعيّ بن حراش - كلاهما عن حذيفة، قال (فذكره). واللفظ للبخاريّ، وسياق مسلم أطول.




হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কোনো হাদীস ফিতনা (বিপর্যয়) সম্পর্কে কে মুখস্থ রেখেছে? হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি তাঁকে (নবীকে) বলতে শুনেছি: মানুষের ফিতনা তার পরিবার, ধন-সম্পদ ও প্রতিবেশীর মাঝে ঘটে; আর সালাত, সওম ও সাদাকা তা দূরীভূত করে (ক্ষমা করিয়ে দেয়)। তিনি (উমার) বললেন, আমি এটি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করছি না। আমি তো জিজ্ঞাসা করছি সেই ফিতনা সম্পর্কে যা সমুদ্রের ঢেউয়ের মতো উত্তাল হবে। তিনি (হুযাইফা) বললেন, এর (সেই বড় ফিতনার) আগে একটি বন্ধ দরজা রয়েছে। তিনি (উমার) বললেন, সেটি কি খোলা হবে, নাকি ভেঙে দেওয়া হবে? তিনি (হুযাইফা) বললেন, ভেঙে দেওয়া হবে। তিনি (উমার) বললেন, তাহলে কিয়ামত পর্যন্ত সেই দরজা আর বন্ধ হওয়ার সম্ভাবনা থাকবে না। আমরা (উপস্থিত লোকেরা) মাসরূককে বললাম, তাঁকে (হুযাইফাকে) জিজ্ঞেস করুন, উমার কি জানতেন যে এই দরজাটি কে? তিনি (মাসরূক) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন। তিনি (হুযাইফা) বললেন, হ্যাঁ, যেমন তিনি জানেন যে আগামীকালের আগে রাত আসবে।









আল-জামি` আল-কামিল (4286)


4286 - عن سهل بن سعد، قال: قال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ في الجنة بابًا يقال له: الرَّيّان يدخلُ منه الصَّائمون يوم القيامة لا يدخلُ منه أحدٌ غيرُهم، يقال: أين الصَّائمون؟ فيقومون، لا يدخل منه أحدٌ غيرهم، فإذا دخلوا أُغلق، فلم يدخل منه أحدٌ".

وفي رواية:"من دخل فيه شرب، ومن شرب لم يظمأ أبدًا".

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1896)، ومسلم في الصيام (1152) من طريق خالد بن مخلد القَطَوانيّ، حدّثنا سليمان بن بلال، حدّثني أبو حازم (هو سلمة بن دينار)، عن سهل، به، فذكره.

واللفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم قريب منه.

والرواية الثانية: رواها النسائي (2236)، وابن خزيمة (1902) كلاهما من حديث سعيد بن
عبد الرحمن، عن أبي حازم، عن سهل.

ورواه الترمذي (765) من حديث هشام بن سعد، عن أبي حازم، عن سهل بن سعد. وقال:

"حسن صحيح غريب".




সাহল ইবনে সা'দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় জান্নাতে একটি দরজা আছে, যাকে 'রাইয়্যান' বলা হয়। কিয়ামতের দিন সাওম পালনকারীরা (রোযাদারগণ) সেই দরজা দিয়ে প্রবেশ করবে। তারা ব্যতীত অন্য কেউ তা দিয়ে প্রবেশ করবে না। বলা হবে: রোযাদারগণ কোথায়? তখন তারা উঠে দাঁড়াবে। তারা ছাড়া অন্য কেউ এই দরজা দিয়ে প্রবেশ করবে না। যখন তারা প্রবেশ করবে, তখন দরজাটি বন্ধ করে দেওয়া হবে। এরপর আর কেউ তা দিয়ে প্রবেশ করবে না।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "যে তাতে প্রবেশ করবে, সে পান করবে; আর যে পান করবে, সে আর কখনো পিপাসার্ত হবে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4287)


4287 - عن أبي هريرة، قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من أنفق زوجين في سبيل الله، نُودي من أبواب الجنة: يا عبد الله هذا خير، فمن كان من أهل الصلاة دُعي من باب الصلاة، ومن كان من أهل الجهاد دُعي من باب الجهاد، ومن كان من أهل الصيام دُعي من باب الرّيّان، ومن كان من أهل الصدقة دُعي من باب الصدقة".

قال أبو بكر: بأبي أنت وأمّي يا رسول الله، ما على من دُعي من تلك الأبواب من ضرورة، فهل يُدعى أجد من تلك الأبواب كلّها؟ قال:"نعم، وأرجو أن تكون منهم".

متفق عليه: رواه مالك في الجهاد (49) عن ابن شهاب، عن حميد بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاريّ في الصوم (1897) من طريق مالك، ومسلم في الزكاة (1027) من وجه آخر عن ابن شهاب.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আল্লাহর পথে দুটি জিনিস জোড়ায় জোড়ায় খরচ করে, তাকে জান্নাতের দরজাসমূহ থেকে ডাকা হবে: হে আল্লাহর বান্দা, এটি উত্তম! যে ব্যক্তি সালাত (নামায)-এর অনুসারী হবে, তাকে সালাতের দরজা থেকে ডাকা হবে। যে ব্যক্তি জিহাদের অনুসারী হবে, তাকে জিহাদের দরজা থেকে ডাকা হবে। যে ব্যক্তি সিয়াম (রোযা)-এর অনুসারী হবে, তাকে রাইয়্যান নামক দরজা থেকে ডাকা হবে। আর যে ব্যক্তি সাদাকাহ (দান)-এর অনুসারী হবে, তাকে সাদাকার দরজা থেকে ডাকা হবে।"

আবূ বাকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার পিতা-মাতা আপনার জন্য কুরবান হোক! যে ব্যক্তিকে ঐ দরজাসমূহ থেকে ডাকা হবে, তার তো কোনো অভাব বা পেরেশানি থাকবে না। তবে কি এমন কেউ থাকবে, যাকে ঐ সকল দরজা থেকেই ডাকা হবে?

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, এবং আমি আশা করি, তুমি হবে তাদের অন্যতম।"