আল-জামি` আল-কামিল
4288 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الصيام جُنّة".
متفق عليه: رواه مسلم في الصيام (1151: 162) من طرق عن المغيرة (وهو الحزاميّ)، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه الشيخان -البخاريّ (1904)، ومسلم (1151: 163) كلاهما من طريق ابن جريج، أخبرني عطاء، عن أبي صالح الزيات أنه سمع أبا هريرة، فذكره في حديث طويل.
والجنة -بضم الجيم- السيرة والوقاية من الآثام في الدنيا، ومن النار في الآخرة.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সিয়াম হলো ঢাল।"
4289 - عن عثمان بن أبي العاص الثقفيّ، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"الصِّيام جنّة من النّار، كجنة أحدكم من القتال".
صحيح: رواه النسائي (2230)، وابن ماجه (1639)، وأحمد (16278، 17902)، وصحّحه ابن خزيمة (2125)، وابن حبان (3649) كلهم من حديث الليث بن سعد، عن يزيد بن أبي حبيب، عن سعيد بن أبي هند، أن مطرقًا من بني عامر بن صعصعة حدَّثه أنّ عثمان بن أبي العاص الثقفيّ دعا له بلبن ليسقيه فقال مطرف: إني صائم. فقال عثمان (فذكر الحديث).
واختصره النسائي. وزاد بعضهم:"وصيام حسن ثلاثة أيام من الشهر".
وإسناده صحيح، ومطرف هو ابن عبد الله بن الشّخير.
وللحديث إسناد آخر وهو ما رواه النسائيّ (2231)، وأحمد (16273)، وابن خزيمة (1891) كلّهم من حديث محمد بن إسحاق، عن سعيد بن أبي هند، عن مطرف، قال: دخلتُ على عثمان ابن أبي العاص فقال سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث).
وزاد فيه أحمد: وكان آخر ما عهد إليّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حين بعثني إلى الطّائف قال:"يا عثمان تجوّز في الصّلاة، فإنّ في القوم الكبير وذا الحاجة". ولم يذكره النسائي. وأما ابن خزيمة فذكر فيه الزيادة السابقة.
وابن إسحاق مدلس وقد صرَّح بالتحديث عند ابن خزيمة، كما أنه توبع في الإسناد السابق.
উসমান ইবন আবুল আস আস-সাকাফী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “রোযা হচ্ছে আগুন (জাহান্নাম) থেকে ঢালস্বরূপ, যেমন তোমাদের কারো ঢাল যুদ্ধ থেকে (রক্ষা করে)।”
সহীহ: এটি নাসাঈ (২২৩০), ইবনু মাজাহ (১৬৩৯), আহমাদ (১৬২৭৮, ১৭৯০২), ইবনু খুযাইমাহ (২১২৫) এবং ইবনু হিব্বান (৩৬৪৯) বর্ণনা করেছেন। সকলেই লাইস ইবনু সা'দ থেকে, তিনি ইয়াযীদ ইবনু আবী হাবীব থেকে, তিনি সা'ঈদ ইবনু আবী হিন্দ থেকে বর্ণনা করেছেন যে, বানু আমির ইবনু সা'সা'আর মুতাররিফ তাকে জানিয়েছেন যে, উসমান ইবন আবুল আস আস-সাকাফী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে পান করার জন্য দুধের দাওয়াত দিলেন। তখন মুতাররিফ বললেন: আমি রোযাদার। তখন উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (সম্পূর্ণ হাদীসটি) বর্ণনা করলেন।
নাসাঈ হাদীসটিকে সংক্ষিপ্ত করেছেন। কেউ কেউ অতিরিক্ত বর্ণনা করেছেন: "এবং প্রতি মাসে তিন দিন রোযা রাখা উত্তম।" এর সনদ সহীহ। আর মুতাররিফ হলেন ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনুশ শিখখীর।
হাদীসের আরেকটি সনদ রয়েছে, যা নাসাঈ (২২৩১), আহমাদ (১৬২৭৩) ও ইবনু খুযাইমাহ (১৮৯১) বর্ণনা করেছেন। সকলেই মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক থেকে, তিনি সা'ঈদ ইবনু আবী হিন্দ থেকে, তিনি মুতাররিফ থেকে বর্ণনা করেছেন। মুতাররিফ বলেন: আমি উসমান ইবন আবুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। তখন তিনি বললেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি (এরপর সম্পূর্ণ হাদীসটি উল্লেখ করেন)।
আহমাদ তাতে আরও যোগ করেছেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন আমাকে তায়েফে প্রেরণ করেছিলেন, তখন শেষ যে উপদেশটি আমাকে দিয়েছিলেন, তা হলো: "হে উসমান! তুমি সালাতে সংক্ষেপ করবে, কারণ জামা'আতের মধ্যে বয়স্ক ব্যক্তি এবং প্রয়োজন সম্পন্ন ব্যক্তিরা থাকে।" নাসাঈ এটি উল্লেখ করেননি। আর ইবনু খুযাইমাহ তাতে পূর্বের অতিরিক্ত অংশটি উল্লেখ করেছেন।
আর ইবনু ইসহাক মুদাল্লিস, কিন্তু তিনি ইবনু খুযাইমাহর নিকট তা (হাদীসটি) বর্ণনা করার বিষয়টি স্পষ্টভাবে উল্লেখ করেছেন। পূর্বের সনদেও তার অনুসরণ করা হয়েছে।
4290 - عن جابر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: قال ربُّنا عز وجل:"الصّيام جنّة يستجنّ بها العبد من النّار، وهو لي وأنا أجزي به".
حسن: رواه الإمام أحمد عن حسن (14669)، وعن عتاب بن زياد، عن عبد الله (وهو ابن المبارك (15264) كلاهما عن ابن لهيعة، قال: حدثني أبو الزبير، عن جابر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في ابن لهيعة، ولكن في إحدى طريقيه روى عنه عبد الله بن المبارك وهو ممن سمع منه قبل اختلاطه فروايته أعدل من غيره. وقد حسَّنه المنذريّ في"الترغيب والترهيب" (1472).
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ তা‘আলা বলেন: "রোযা ঢালস্বরূপ, এর দ্বারা বান্দা জাহান্নামের আগুন থেকে রক্ষা পায়। আর তা আমার জন্য, আর আমিই এর প্রতিদান দেব।"
4291 - عن جابر، أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال لكعب بن عُجرة:"يا كعب بن عجرة! الصوم جنّة، والصدقة تطفئُ الخطيئة، والصّلاة قربان - أو قال: برهان".
حسن: رواه الإمام أحمد (14441)، وأبو يعلى (1999)، والبزار -كشف الأستار (1609) -، وصحّحه ابن حبان (4514)، والحاكم (3/ 479 - 480) كلّهم من حديث ابن خُثيم، عن عبد الرحمن ابن سابط، عن جابر، فذكره في حديث طويل.
وإسناده حسن من أجل ابن خُثيم وهو عبد الله بن عثمان فإنه حسن الحديث.
জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কা’ব ইবনু উজরাকে বললেন: “হে কা’ব ইবনু উজরা! রোযা হলো ঢাল, আর সাদাকাহ গুনাহকে নিভিয়ে দেয়, এবং সালাত হলো নৈকট্য লাভের মাধ্যম (কুরবান) - অথবা তিনি (নবী) বললেন: প্রমাণ (বুরহান)।”
4292 - عن عائشة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الصيام جُنّة من النّار، فمن أصبح صائمًا فلا يجهل يومئذ، وإن امرؤ جهل عليه فلا يشتمه ولا يسبُّه، وليقل: إنّي صائم. والذي نفس محمد بيده لخلوف فم الصائم أطيب عند الله من ريح المسك".
حسن: رواه النسائيّ (2234) عن محمد بن يزيد الآدمي، قال: حدّثنا معن، عن خارجة بن سليمان، عن يزيد بن رومان، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
وإسناده حسن من أجل خارجة وهو ابن عبد الله بن سليمان فإنه حسن الحديث. ومن هو ابن عيسي بن يحيى الأشجعيّ مولاهم من رجال الجماعة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: রোযা জাহান্নামের আগুন থেকে ঢালস্বরূপ। সুতরাং যে ব্যক্তি রোযা রেখে সকালে উপনীত হয়, সে যেন সেদিন মূর্খের মতো কাজ না করে। আর যদি কোনো ব্যক্তি তার সাথে মূর্খের মতো আচরণ করে, তবে সে যেন তাকে গালি না দেয় এবং তিরস্কার না করে, বরং সে যেন বলে, 'আমি রোযাদার।' যাঁর হাতে মুহাম্মাদের প্রাণ, তাঁর শপথ! রোযাদারের মুখের গন্ধ আল্লাহর কাছে মিশকের সুগন্ধির চেয়েও অধিক প্রিয়।
4293 - عن معاذ بن جبل عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الصوم جنة".
حسن: رواه الترمذيّ (2616)، وابن ماجه (3973)، وأحمد (22016) كلّهم من حديث
معمر، عن عاصم بن أبي النجود، عن أبي وائل، عن معاذ بن جبل، فذكره في حديث طويل.
قال الترمذي: حسن صحيح.
قلت: فيه أبو وائل وهو شقيق بن سلمة لم يسمع من معاذ.
ورواه أحمد (22133) من طريق حماد بن سلمة، عن عاصم، عن شهر بن حوشب، عن معاذ، فذكره.
وشهر بن حوشب فيه كلام معروف، وإنه لم يسمع من معاذ أيضًا.
وقد رواه النسائي (2225، 2226) وأحمد (22032، 22051، 22047) كلاهما من طرق أخرى عن معاذ بن جبل، فذكره في حديث طويل ومختصر.
وبمجموع هذه الطرق وما قبله من أصول ثابتة يحسّن هذا الحديث.
وفي الباب عن أبي عبيدة مرفوعًا:"الصّوم جُنّة ما لم يخرقها".
رواه النّسائيّ (2233)، والدّارميّ (1773)، والبخاريّ في التاريخ الكبير (7/ 21)، وأحمد (1690)، وأبو يعلى (878)، وابن خزيمة (1892) كلّهم من حديث واصل مولى أبي عيينة، عن بشار بن أبي سيف الجرميّ، عن الوليد بن عبد الرحمن الجرشيّ، عن عياض بن غطيف، عن أبي عبيدة بن الجراح، فذكره في حديث طويل، واختصره البعض.
وبشار بن أبي سيف لم يوثقه غير ابن حبان ولذا قال ابن حجر:"مقبول" أي عند المتابعة.
قلت: وقد تابعه مسعر عن الوليد، إلّا أن الوليد قال: حدّثنا أصحابنا عن أبي عبيدة قال:"الصّيام جنّة ما لم يخرقها".
رواه النسائي (2235) وفيه أنّ الوليد لم يسم أصحابه، وأنّ أبا عبيدة لم يرفعه إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم.
وقوله:"ما لم يخرقها" قال الدّارمي: يعني بالغيبة.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أنس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الحسد يأكل الحسنات كما تأكل النار الحطب، والصّدقة تطفئُ الخطيئة كما يطفئ الماء النّار، والصّلاة نور المؤمن، والصيام جنّة من النار".
رواه ابن ماجه (4210) عن هارون بن عبد الله الحمال، وأحمد بن الأزهر قالا: حدّثنا ابن أبي فديك، عن عيسى بن أبي عيسى الحناط، عن أبي الزناد، عن أنس، فذكره. ورواه أبو يعلى (3656) عن هارون بن عبد الله وحده.
وإسناده ضعيف جدًّا؛ فإن عيسى الحناط وهو ابن أبي عيسي ميسرة الغفاري المدني ضعيف باتفاق أهل العلم حتى قال أبو داود والدارقطني وغيرهما:"متروك الحديث".
মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "রোজা ঢালস্বরূপ।"
4294 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال:"الطاعم الشاكر بمنزلة الصائم الصّابر". حسن: روي هذا الحديث عن أبي هريرة من وجوه:
منها ما رواه عبد الرزاق (19573) عن معمر، عن رجل من غفار، أنه سمع سعيدًا المقبري، يحدث عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
ومن هذا الطريق رواه أحمد (7806)، والبيهقي (4/ 306).
وكذلك رواه مسدد في"مسنده" عن معتمر بن سليمان، عن معمر، بإسناده كما قال الحافظ في"الفتح" (9/ 582).
وأما ما رواه ابن حبان (315) من وجه آخر عن نصر بن علي، حدّثنا معتمر بن سليمان، عن معمر، عن سعيد المقبري. فالظاهر أنه وهم، خفي ذلك على ابن حبان فظن أنه متصل ولذا أخرجه في"صحيحه".
والرّجل المبهم فيه هو معن بن محمد بن معن بن نضلة الغفاري كما في الروايات الآتية.
ومنها ما رواه الترمذي (2486) عن إسحاق بن موسى الأنصاريّ، حدثنا محمد بن معن المدني الغفاريّ، حدثني أبي، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
ومحمد بن معن بن محمد بن معن الغفاري أبو يونس، ثقة من رجال البخاري.
وأبوه معن بن محمد بن معن بن نضلة الغفاري، روى له البخاريّ.
ومنها ما رواه ابن خزيمة (1898) عن بشر بن هلال، ثنا عمر بن علي المقدمي، قال: سمعت معن بن محمد، يحدث عن سعيد المقبري، قال: كنت أنا وحنظلة بن علي بالبقيع مع أبي هريرة، فحدّثنا أبو هريرة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث.
ومنها ما رواه أيضا ابن خزيمة (1899) عن إسماعيل بن بشر بن منصور السالمي، ثنا عمر بن علي، عن معن بن محمد، قال: سمعت حنظلة بن علي قال: سمعت أبا هريرة بهذا البقيع يقول (فذكر الحديث).
ورواه ابن ماجه (1764) من وجهين عن معن بن محمد، عن حنظلة بن علي، فذكره.
ورواه الحاكم (1/ 422)، والبيهقي (4/ 306) كلاهما من طريق عمر بن علي المقدمي، بإسناده.
قال البيهقي: وقد قيل: عن عمر بن علي، عن معن، عن المقبري وحنظلة، عن أبي هريرة.
قال أبو بكر بن خزيمة: الإسنادان صحيحان عن سعيد المقبري، وعن حنظلة بن علي جميعًا عن أبي هريرة. ألا تسمع المقبري يقول:"كنت أنا وحنظلة بن علي بالبقيع مع أبي هريرة".
والخلاصة فيه أنّ جميع هذه الأسانيد تدور على معن بن محمد بن معن بن نضلة الغفاري أبو محمد حجازي، روى عن حنظلة بن علي الأسلمي وسعيد المقبري، وعنه ابنه محمد وابن جريج وعبد الله بن عبد الله الأشعري، وعمر بن علي المقدمي. ذكره ابن حبان في"الثقات"، وروى له البخاريّ.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
والصّواب على شرط البخاري وحده.
واستدركه الذهبي فقال:"هو في الصحيحين، فلا وجه لاستدراكه".
قلت: كلام الذهبي يشعر بأنّ الحديث في الصحيحين مسندًا، والصحيح أنّ البخاريّ ذكره في الباب في كتاب الأطعمة: باب الطاعم الشاكر مثل الصائم الصابر. عن أبي هريرة معلقًا. وأما مسلم فلم يخرجه أصلًا.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কৃতজ্ঞতার সাথে আহারকারী ধৈর্যশীল রোজাদারের সমতুল্য।"
4295 - عن سنان بن سنّة الأسلميّ صاحب النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الطاعم الشاكر له مثل أجر الصّائم الصّابر".
حسن: رواه ابن ماجه (1765)، وأحمد وابنه (19014)، والدّارميّ (2067) كلّهم من حديث عبد العزيز بن محمد، قال: أخبرني محمد بن عبد الله بن أبي حرة، عن عمّه حكيم بن أبي حرة، عن سنان بن سنّة، فذكره.
إلّا أنّ الدارمي زاد بعد سنان بن سنة"عن أبيه" وقد نبّه عليه أهل العلم، إلّا أن محقق الدارمي ومحقق إتحاف المهرة (6/ 64) حذفا قوله:"عن أبيه" وهي ثابتة في أكثر النسخ. يقال: إنّ شيخ الدارمي وهو نعيم بن حماد قد أخطأ في هذا فتنبّه.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد العزيز بن محمد وهو الدراوردي فإنه مختلف فيه إلا أنه حسن الحديث.
وقد اختلف على محمد بن عبد الله بن أبي حرة، فرواه الدراوردي هكذا.
ورواه سليمان بن بلال، حدثني محمد بن عبد الله بن أبي حرة، عن عمّه حكيم بن حرة، عن سلمان الأغر، عن أبي هريرة قال: لا أعلمه إلا عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث.
ومن هذا الطريق رواه الإمام أحمد (7889)، والحاكم (4/ 136)، والبيهقي (4/ 306).
ونقل ابن أبي حاتم في"العلل" (2/ 13 - 14) عن أبي زرعة قوله حين سُئل: أيّهما أصح؟ قال:"حديث الدّراورديّ أشبه".
সিনান ইবনে সুন্নাহ আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কৃতজ্ঞতা প্রকাশকারী ভোজনকারীর জন্য ধৈর্যশীল রোযাদারের অনুরূপ সাওয়াব রয়েছে।
4296 - عن عائشة أمّ المؤمنين، قالت: قال لي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم ذات يوم:"يا عائشة، هل عندكم شيءٌ؟". قالت: فقلت: يا رسول الله، ما عندنا شيء. قال:"فإني صائم".
قالت: فخرج رسول الله صلى الله عليه وسلم فأُهديت لنا هدية -أو جاءنا زَوْرٌ-. قالت: فلما رجع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم. قلتُ: يا رسول الله، أُهديت لنا هدية -أو جاءنا زَوْر- وقد خبّأتُ لك شيئًا. قال:"ما هو؟". قلت: حَيْس. قال:"هاتيه" فجئتُ به فأكل. ثم قال:"قد كنتُ أصبحتُ صائمًا".
قال طلحة: فحدثت مجاهدا بهذا الحديث. فقال: ذاك بمنزلة الرجل يُخرجُ الصّدقة من ماله.
فإن شاء أمضاها وإن شاء أمسكها.
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1154) من طريق طلحة بن يحيى بن عبيدالله، حدثتني عائشة بنت طلحة (عمّته)، عن عائشة أمّ المؤمنين قالت (فذكرته).
আয়িশা উম্মুল মু'মিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাকে বললেন: "হে আয়িশা, তোমাদের কাছে কি কিছু আছে?" তিনি বলেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমাদের কাছে কিছু নেই। তিনি বললেন: "তাহলে আমি রোযা রাখলাম।"
তিনি বলেন, এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বেরিয়ে গেলেন। তখন আমাদের জন্য একটি হাদিয়া (উপহার) এলো—অথবা তিনি বললেন, আমাদের কাছে মেহমান এলো। তিনি বলেন, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফিরে এলেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ, আমাদের জন্য একটি হাদিয়া এসেছে—অথবা তিনি বললেন, আমাদের কাছে মেহমান এসেছে—আর আমি আপনার জন্য কিছু জিনিস লুকিয়ে রেখেছি। তিনি বললেন: "সেটা কী?" আমি বললাম: 'হাইস' (খেজুর, পনীর ও ঘি দিয়ে তৈরি এক প্রকার খাবার)। তিনি বললেন: "ওটা নিয়ে এসো।" আমি তা নিয়ে এলাম এবং তিনি তা খেলেন। এরপর তিনি বললেন: "আমি তো সকালে রোযা রাখার নিয়ত করেছিলাম।"
তালহা বলেন, আমি এই হাদীসটি মুজাহিদের কাছে বর্ণনা করলাম। তখন তিনি বললেন: এটা সেই ব্যক্তির মতো, যে তার সম্পদ থেকে সাদাকাহ (দান) বের করে, অতঃপর ইচ্ছা করলে তা জারি রাখে (দান করে দেয়) অথবা ইচ্ছা করলে তা রেখে দেয়।
4297 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا دُعي أحدكم إلى طعام وهو صائم، فليقُلْ: إنّي صائم".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1150) من طريق سفيان بن عيينة، عن أبي الزناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
قال النووي في"شرح مسلم" (9/ 235):"الصائم لا خلاف أنه لا يجب عليه الأكل، لكن إن كان صومُه فرضًا لم يجُزْ له الأكل؛ لأنّ الفرْضَ لا يجوز الخروج منه، وإن كان نفلًا جاز الفطر وتركهـ، فإن كان يشق على صاحب الطعام صومُه، فالأفضل الفطر، وإلا فإتمام الصوم. والله أعلم".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কাউকে খাবারের জন্য দাওয়াত দেওয়া হয় এবং সে রোযা অবস্থায় থাকে, তখন সে যেন বলে: 'আমি রোযাদার'।"
4298 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا دُعي أحدُكم فليُجب فإن كان صائمًا فليصلِّ، وإن كان مُفطرًا فليطْعَم".
صحيح: رواه مسلم في النكاح (1431) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا حفص بن غياث، عن هشام (هو ابن حسان القردوسيّ)، عن ابن سيرين، عن أبي هريرة، فذكره.
قوله:"فليُصل" أي فليدعُ لأهل الطّعام بالمغفرة والبركة ونحو ذلك، وأصل الصلاة في اللغة: الدعاء، ومنه قوله تعالى: {وَصَلِّ عَلَيْهِمْ} [التوبة: 103].
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কাউকে দাওয়াত দেওয়া হয়, তখন সে যেন তা কবুল করে। যদি সে রোযাদার হয়, তবে সে যেন [তাদের জন্য] দু'আ করে, আর যদি সে রোযাদার না হয়, তবে যেন সে খায়।"
4299 - عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من دُعي إلى طعام وهو صائم فلْيُجبْ، فإن شاء أطعم، وإن شاء ترك".
صحيح: رواه ابن ماجه (1751) عن أحمد بن يوسف السلمي، قال: حدثنا أبو عاصم، قال: أنبأنا ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره. وإسناده صحيح.
ورواه مسلم في النكاح (1430) من وجه آخر عن أبي عاصم، بإسناده، ومن وجهين آخرين عن
سفيان، عن أبي الزبير ولم يذكر فيه:"الصوم".
ورواه أيضًا أبو داود (3740)، والنسائي في الكبرى (6610)، وابن حبان (5303)، والبيهقي (7/ 264) كلّهم من طرق، عن أبي الزبير، ولم يذكروا فيه:"الصوم".
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তিকে খাবারের জন্য দাওয়াত দেওয়া হয়, অথচ সে রোযা রেখেছে, সে যেন সেই দাওয়াত কবুল করে। অতঃপর সে চাইলে খেতে পারে, আর চাইলে বিরত থাকতে পারে।"
4300 - عن أنس بن مالك قال: دخل النبيُّ صلى الله عليه وسلم على أمِّ سُليم، فأتتْه بتمر وسمن. قال: أعيدوا سمنكم في سقائه وتمركم في وعائه، إني صائم، ثم قام إلى ناحية من البيت فصلَّي غير المكتوبة، فدعا لأمّ سُليم وأهل بيتها. فقالت أمُّ سليم: يا رسول الله، إنّ لي خُويصة، قال: ما هي؟ قالت: خادمُك أنس. فما ترك خير آخرةٍ ولا دنيا إلّا دعا به:"اللهمّ ارزقه مالًا وولدًا، وباركْ له".
فإني لمن أكثر الأنصار مالًا. وحدثتني ابتي أمينةُ أنه دُفن لصلبي مقدم الحجاج البصرة بضعٌ وعشرون ومائة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1982) من طريق حميد، عن أنس بن مالك قال (فذكره).
ورواه البخاري في الدعوات (6334) عن قيس بن الربيع، ومسلم في فضائل الصحابة (2480) من طريق أبي داود (هو الطيالسي) كلاهما عن شعبة، عن قتادة، قال: سمعت أنسًا قال: قالت أمُّ سُليم للنبيّ:"أنسٌ خادمُك" الحديث مقتصرًا على شطره الأخير.
ورواه البخاريّ في الدعوات (6378، 6379)، ومسلم في فضائل الصحابة (2480) من طريق محمد بن جعفر غُنْدَر، حدثنا شعبة، قال: سمعت قتادة، عن أنس، عن أمّ سليم أنها قالت:"يا رسول الله، أنس خادمك" الحديث، فجعله من مسند أمِّ سُليم.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উম্মে সুলাইমের কাছে গেলেন। তিনি (উম্মে সুলাইম) তাঁর জন্য খেজুর ও ঘি নিয়ে আসলেন। তিনি (নবী) বললেন, তোমরা তোমাদের ঘি তার মশক/পাত্রে এবং খেজুর তার পাত্রে ফিরিয়ে রাখো। আমি রোজা রেখেছি। অতঃপর তিনি ঘরের এক কোণে দাঁড়ালেন এবং নফল সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি উম্মে সুলাইম ও তার পরিবারের জন্য দু'আ করলেন। তখন উম্মে সুলাইম বললেন, হে আল্লাহর রাসূল! আমার একটি বিশেষ প্রার্থনা আছে। তিনি বললেন, তা কী? তিনি বললেন, আপনার খাদেম আনাস। এরপর তিনি আনাসের জন্য পরকাল বা দুনিয়ার এমন কোনো কল্যাণ ছিল না, যার জন্য দু'আ করলেন না। (তিনি বললেন): "হে আল্লাহ! তাকে সম্পদ ও সন্তান দান করো, আর তাতে বরকত দাও।"
(আনাস বলেন,) আমি হলাম আনসারদের মধ্যে সবচেয়ে বেশি সম্পদের অধিকারী। আর আমার মেয়ে আমিনা আমাকে বলেছে যে, হাজ্জাজ বসরায় আসার আগে আমার ঔরসের একশত সাতাশ জন সন্তানকে দাফন করা হয়েছে।
4301 - عن عون بن أبي جحيفة، عن أبيه، قال: آخي النبيُّ صلى الله عليه وسلم بين سلمان وأبي الدرداء، فزار سلمانُ أبا الدّرداء، فرأى أمَّ الدرداء متبذِّلة، فقال لها: ما شأنُك؟ قالت: أخوك أبو الدّرداء ليس له حاجة في الدّنيا. فجاء أبو الدرداء فصنع له طعامًا، فقال له: كلْ. قال: فإني صائم. قال: ما أنا بآكل حتى تأكل. قال: فأكل. فلما كان الليل ذهب أبو الدّرداء يقوم، قال: نم، فنام. ثم ذهب يقوم: فقال: نم. فلما كان من آخر الليل قال سلمان: قم الآن، فصلَّيا. فقال له سلمان: إنَّ لربِّك عليك حقًّا، ولنفسك عليك حقًّا، ولأهلك عليك حقًّا، فأعط كلَّ ذي حق حقّه. فأتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فذكر ذلك له، فقال له النبيّ صلى الله عليه وسلم:"صدق سلمان".
صحيح: رواه البخاريّ في الصوم (1968) عن محمد بن بشار، حدثنا جعفر بن عون، حدثنا أبو العُميس، عن عون بن أبي جحيفة، عن أبيه، فذكره.
أبو العُميس هو عتبة بن عبد الله المسعوديّ. وأبو جحيفة واسمه: وهب بن عبد الله السُّوائيّ.
وفي الباب ما رُوي عن أمّ هانئ، قالت: لما كان يوم الفتح -فتح مكة- جاءت فاطمة، فجلست على يسار رسول الله صلى الله عليه وسلم، وأمّ هانئ عن يمينه، قالت: فجاءت الوليدة بإناء فيه شراب. فناولتْه فشرب منه، ثم ناول أمَّ هانئ فشربتْ منه، فقالت: يا رسول الله، لقد أفطرتُ وكنت صائمة؟ فقال لها:"أكنت تقضين شيئًا؟". قالت: لا. قال:"فلا يضرْك إن كان تطوّعًا".
رواه أبو داود (2456) عن عثمان بن أبي شيبة، ثنا جرير بن عبد الحميد، عن يزيد بن أبي زياد، عن عبد الله بن الحارث، عن أمّ هانئ، فذكرته. ويزيد بن أبي زياد هو الهاشمي مولاهم ضعيف باتفاق أهل العلم.
وله إسناد آخر رواه الترمذي (731) عن قتيبة، حدثنا أبو الأحوص، عن سماك بن حرب، عن ابن أم هانئ، عن أمّ هانئ، فذكرت نحوه. قال الترمذي:"في إسناده مقال".
قلت: لعله يشير إلى الخلاف الواقع على سماك بن حرب، فقيل هكذا، وقيل: عن سماك، عن رجل، عن أم هانئ.
رواه الإمام أحمد (26897) من طريق إسرائيل بن يونس، عن سماك.
وقيل: عن سماك، عن رجل من آل جعدة، عن أمّ هانئ.
وقيل: عن سماك عن جعدة رجل من قريش وهو ابن أم هانيء.
وقيل: عن سماك، عن يحيى بن جعدة، عن أم هانئ.
وقيل: عن سماك، عن هارون بن أم هانئ -كما عند أبي داود الطيالسي (1721) - أو ابن ابن أم هانئ، عن أمّ هانئ، وقيل: غير ذلك.
ولذا قال ابن التركماني كما في"الجوهر النقي" (4/ 278):"هذا الحديث اضطرب متنًا وسندًا. أما اضطراب متنه فظاهر. وقد ذكر فيه أنه كان يوم الفتح، وهي أسلمت عام الفتح، وكان الفتح في رمضان، فكيف يلزمها قضاؤه. وأما اضطراب سنده فاختلف على سماك" فذكره ونقل عن النسائي في الكبرى (3309) أنه قال:"اختلف على سماك فيه، وسماك ليس ممن يعتمد عليه إذا انفرد بالحديث؛ لأنه كان يقبل التلقين".
وكذلك قال الحافظ في"التلخيص" (2/ 211):"ومما يدل على غلط سماك فيه أنه قال في بعض الروايات عنه: إنّ ذلك كان يوم الفتح، ويوم الفتح كان في رمضان، فكيف بتصور قضاء رمضان في رمضان".
ولكن للحديث إسناد آخر وهو ما رواه الترمذي (732) عن أبي داود الطيالسي وهو في
"مسنده" (1723) قال: حدثنا شعبة، قال: كنت أسمع سماك بن حرب يقول: حدثني أحد ابني أمّ هاني، فلقيت أفضلهم وكان اسمه جعدة، وكانت أم هانئ جدته، فحدثني عن جدته أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم دخل عليها، فدُعي بشراب فشرب، ثم ناولها فشربتْ. فقالت: يا رسول الله، أما إني كنتُ صائمة! فقال رسول الله:"الصائم المتطوع أمين نفسه، إن شاء صام، وإن شاء أفطر".
قال شعبة: فقلت له: أأنت سمعتَ هذا من أمّ هانيء؟ قال: لا أخبرني أبو صالح وأهلنا عن أمّ هانيء.
قال الترمذي: ورواية شعبة أحسن، هكذا حدثنا محمود بن غيلان، عن أبي داود، فقال:"أمين نفسه".
حدثنا غير محمود عن أبي داود، فقال:"أمير نفسه أو أمين نفسه" على الشّك. وهكذا رُوي من غير وجه عن شعبة"أمين" أو"أمير نفسه" على الشّك. انتهى.
وجعدة هو ابن هبيرة، وهو من زوجها هبيرة الذي هرب من مكة يوم الفتح، قال البخاري في التاريخ الكبير (2/ 239):"لا يعرف إلا بحديث فيه نظر". ونقل عنه ابن عدي في الكامل (2/ 601) وأقره. وقال الذهبي في الميزان:"لا يدري من هو؟".
وأبو صالح اسمه باذام، ويقال: باذان ضعيف مدلّس.
وقد تزيد هذه الطريق اضطرابًا في الإسناد، إذْ بين سماك بن حرب وبين أمّ هانئ رجلان: أحدهما ضعيف، والثاني مجهول.
والخلاصة أن هذا الحديث لا يصح من وجه من الوجوه، بل باجتماع هذه الوجوه تزيده اضطرابًا. فلا تغترن بقول الحاكم (1/ 439):"صحيح الإسناد"، وفيه أبو صالح مولى أم هاني ضعيف مدلس.
وفي الحديث -وإن كان فيه مقال- دليل على جواز الإفطار من صوم النفل من غير عذر بدون قضاء. وعليه تدل الأحاديث الأخرى بخلاف من استمسك بعموم قوله تعالى: {وَلَا تُبْطِلُوا أَعْمَالَكُمْ} [محمد: 33].
وأما إن كان الصوم واجبًا كقضاء رمضان أو نذر فلا يجوز الإفطار بغير عذر، وإن أفطر فعليه القضاء.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أبي سعيد أنه قال: صنع رجلٌ طعامًا، ودعا رسولَ الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه، فقال رجل: إني صائم. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أخوك صنع طعامًا ودعاك، أفطرْ واقْضِ يومًا مكانه".
رواه أبو داود الطيالسي في"مسنده" (2317) قال: حدثنا محمد بن أبي حميد، عن إبراهيم بن عبيد بن رفاعة الزرقي، عن أبي سعيد، فذكره.
ومحمد بن أبي حميد وأهل المدينة يقولون: حماد بن أبي حميد. قال البخاري: منكر الحديث. وضعّفه أحمد وابن معين وغيرهما.
ورواه الدارقطني من حديث محمد بن أبي حميد، عن إبراهيم بن عبيد بن رفاعة، قال:"صنع أبو سعيد طعامًا فدعا النبيّ صلى الله عليه وسلم وأصحابه" فذكر الحديث.
قال الحافظ في"التلخيص" (3/ 198):"وهو مرسل؛ لأنّ إبراهيم تابعي. ومع إرساله فهو ضعيف لأنّ محمد بن أبي حميد متروك".
وله طريق آخر وهو ما رواه ابن عدي، والبيهقي (4/ 279) من طريق إسماعيل بن أبي أويس، عن أبيه، عن ابن المنكدر، عن أبي سعيد.
قال الحافظ:"وفيه لين، وابن المنكدر لا يعرف له سماع من أبي سعيد".
وأبو أويس ضعيف أيضًا، وولده إسماعيل أشدّ منه ضعفًا، فقد كذّبه ابن معين.
وأما كونه من رجال البخاريّ فالظاهر من صنيع البخاريّ أنه انتقي من حديثه بالقرائن المختلفة، وهذا لا يمنع من تضعيف حديثه ما لم يخرجه البخاريّ.
وأما قول الحافظ في"الفتح" (4/ 210) بعد أن عزاه للبيهقي:"إسناده حسن" فليس بحسن لما عرفت.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن عائشة قالت: أُهدي لي ولحفصة طعام وكنا صائمتين، فأفطرنا، ثم دخل رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلنا له: يا رسول الله، إنا أُهديت لنا هدية، فاشتهيناها فأفطرنا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا عليكما، صوما مكانه يومًا آخر".
رواه أبو داود (2457)، والنسائي في الكبرى (3277) -ط. مؤسسة الرسالة-، والبيهقي (4/ 281) كلهم من طريق اين الهاد، عن زميل مولي عروة، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته.
ذكر البيهقي عن ابن عدي أنه ذكر عن البخاري:"لا يُعرف لزُميل سماع من عروة، ولا لابن الهاد من زُميل ولا تقوم به الحجة".
وقال الخطابي في"معالمه":"إسناده ضعيف، وزميل مجهول، ولو ثبت الحديث أشبه أن يكون إنما أمرهما بذلك استحبابًا".
ورواه الترمذي (735)، والإمام أحمد (26168)، والبيهقي (4/ 280) كلّهم من حديث كثير ابن هشام، حدثنا جعفر بن برقان، عن الزهري، عن عروة، عن عائشة، فذكرت نحوه.
قال الترمذي: وروى صالح بن أبي الأخضر، ومحمد بن أبي حفصة هذا الحديث عن الزهري، عن عروة، عن عائشة، مثل هذا.
ورواه مالك بن أنس، ومعمر، وعبيدالله بن عمر، وزياد بن سعد، وغير واحد من الحفاظ، عن الزهري، عن عائشة، مرسلًا. ولم يذكروا فيه:"عن عروة" وهذا أصح.
وقال:"لأنه روي عن ابن جريج قال: سألت الزهري. قلت له: أحدثك عروة عن عائشة؟ قال: لم أسمع من عروة في هذا شيئًا، ولكني سمعت في خلافة سليمان بن عبد الملك من ناس، عن بعض من سأل عائشة عن هذا الحديث.
حدثنا بذلك علي بن عيسى بن يزيد البغدادي، حدثنا رَوْح بن عبادة، عن ابن جريج، فذكر الحديث".
قلت: وكذلك رواه عبد الرزاق (7791) عن ابن جريج، قال: قلت لابن شهاب، فذكره.
ورواية مالك في الموطأ في الصوم (50) عن ابن شهاب الزهري:"أنّ عائشة، وحفصة أصبحتا صائمتين" فذكر الحديث مثله.
قال ابن عبد البر: لا يصح عن مالك إلا مرسلًا.
ورواية معمر رواه عبد الرزاق (7790) عنه، عن الزهري، قال:"أصبحت عائشة وحفصة ....".
وللحديث إسناد آخر، رواه النسائي في الكبري (3287) عن علي بن عثمان، قال: حدثنا المعافي ابن سليمان، قال: حدثنا خطّاب بن القاسم، عن خُصيف، عن عكرمة، عن ابن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم دخل على حفصة وعائشة وهما صائمتان، ثم خرج فرجع وهما تأكلان. فقال:"ألم تكونا صائمتين؟" قالتا: بلى، ولكن أُهدي لنا هذا الطعام فأعجبنا، فأكلنا منه. قال:"صوما يومًا مكانه".
قال النسائي:"هذا حديث منكر، وخُصيف ضعيف في الحديث وخطّاب لا علم لي به. والصواب حديث معمر ومالك وعبيدالله".
وللحديث إسناد آخر وهو ما رواه النسائي (3282)، وابن حبان (3517) كلاهما من حديث ابن وهب، عن جرير بن حازم، عن يحيى بن سعيد، عن عمرة، عن عائشة، فذكرت الحديث.
ظاهرة الصحة، ولكن قال النسائي:"هذا خطأ". يعني الصواب أنه مرسل.
وقال البيهقي:"ورُوي من أوجه أخر عن عائشة لا يصح شيء من ذلك، قد بينت ضعفها في الخلافيات".
قلت: ومن هذه الوجوه ما رواه البيهقيّ أيضًا في"السنن الكبرى" عن عبيدالله بن عمر، ومالك ابن أنس، ويونس بن يزيد عن ابن شهاب قال: بلغني"أنّ عائشة وحفصة أصبحتا صائمتين منطوعتين، فأُهدي لهما طعام، فأفطرنا عليه، فدخل عليهما النبيّ صلى الله عليه وسلم" فذكر الحديث وقال:"هذا الحديث رواه ثقات الحفاظ من أصحاب الزهري عنه منقطعًا: مالك بن أنس، ويونس بن يزيد، ومعمر بن راشد، وابن جريج، ويحيى بن سعيد، وعبيدالله بن عمر، وسفيان بن عيينة، ومحمد بن الوليد الزبيدي، وبكر بن وائل وغيرهم".
وأورد النووي في"شرح المهذب" (6/ 396 - 398) نصوصًا طويلة عن البيهقي وأقرّه.
وفي الباب ما رُوي أيضًا عن عائشة قالت: دخل علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلنا: إنّ عندنا حيسًا قد خبّأناه لك قال:"قرِّبوه" فأكل وقال:"إني قد كنتُ أردت الصوم، ولكن أصوم يومًا مكانه".
رواه النسائي في"الكبري" (3286) عن محمد بن منصور، حدثنا سفيان، عن طلحة بن
يحيى، عن عمته عائشة بنت طلحة، عن عائشة فذكرته.
قال النسائي: هذا اللفظ خطأ، قد روي هذا الحديث جماعة عن طلحة فلم يذكر أحد منهم"ولكن أصوم يومًا مكانه".
وأحاديث الباب تفيد أنّ الصائم المتطوع إذا أفطر لعذر أو لغير عذر فليس عليه القضاء وبه قال جمهور أهل العلم كما قال النووي في"شرح المهذب":"ولم يثبت في القضاء شيء، وإن ثبت فهو محمول على الاستحباب كما قال الخطابي".
وقال أبو حنيفة ومالك: يجب عليه القضاء.
وذكر مالك في"الموطأ" أن الرجل إذا دخل في شيء من الأعمال الصالحة فعليه أن يتمها ولا يقطعها.
আবূ জুহাইফাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মধ্যে ভ্রাতৃত্ব স্থাপন করে দেন। একবার সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখতে গেলেন। তিনি আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর স্ত্রী উম্মুদ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জীর্ণশীর্ণ অবস্থায় দেখতে পেলেন। তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন, “তোমার এমন অবস্থা কেন?” তিনি বললেন, “তোমার ভাই আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দুনিয়ার কোনো কিছুর প্রতি আগ্রহ নেই।” এরপর আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে সালমানের জন্য খাবার তৈরি করলেন এবং বললেন, “খান।” সালমান বললেন, “আমি রোযা রেখেছি।” আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, “তুমি না খেলে আমি খাব না।” সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন খেলেন। যখন রাত হলো, আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাহাজ্জুদের জন্য দাঁড়াতে চাইলেন। সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, “ঘুমাও।” ফলে তিনি ঘুমালেন। এরপর যখন তিনি আবার দাঁড়াতে চাইলেন, তখনো সালমান বললেন, “ঘুমাও।” যখন রাতের শেষ অংশ হলো, তখন সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, “এবার উঠুন।” অতঃপর তাঁরা উভয়ে সালাত আদায় করলেন। এরপর সালমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন, “নিশ্চয়ই আপনার প্রতি আপনার রবের হক আছে, আপনার নিজেরও আপনার প্রতি হক আছে, আর আপনার পরিবারেরও আপনার প্রতি হক আছে। সুতরাং প্রত্যেক হকদারকে তার প্রাপ্য হক দিন।” এরপর আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বিষয়টি উল্লেখ করলেন। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন, "সালমান সত্য বলেছে।"
4302 - عن أنس بن مالك، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُفطر من الشّهر حتى نظن أن لا يصوم منه، ويصوم حتى نظن أن لا يفطر منه شيئًا، وكان لا تشاء تراه من اللّيل مصليًا إلّا رأيته، ولا نائمًا إلّا رأيته.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1972) من طريق حُميد أنه سمع أنسًا، فذكره.
ورواه مسلم في الصيام (1158) من طريق ثابت، عن أنس:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يصوم حتى يقال: قد صام، قد صام. ويفطر حتى يقال: قد أفطر، قد أفطر".
আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (নফল) কোনো কোনো মাসে এমনভাবে রোযা না রেখে কাটাতেন যে আমরা মনে করতাম তিনি আর তাতে রোযা রাখবেন না, আবার এমনভাবে রোযা রাখতেন যে আমরা মনে করতাম তিনি আর তা থেকে কোনো কিছু বাদ দেবেন না। আর তুমি তাঁকে রাতে যখনই দেখতে চাইতে, হয় তাঁকে সালাত আদায়রত দেখতে পেতে, না হয় তাঁকে নিদ্রিত দেখতে পেতে।
4303 - عن ابن عباس، قال: ما صام النبيُّ صلى الله عليه وسلم شهرًا كاملًا قطّ غير رمضان، ويصومُ حتى يقول القائلُ: لا والله! لا يُفطر، ويُفطر حتى يقول القائل: لا والله! لا يصوم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1971)، ومسلم في الصيام (1157) كلاهما من طريق أبي عوانة، عن أبي بشر، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره. ومن هذا الطريق رواه أيضًا أحمد (2947).
ورواه أبو داود (2430) من طريق عثمان بن حكيم قال: سألت سعيد بن جبير عن صيام رجب؟ فقال: أخبرني ابن عباس، فذكره.
وإسناده صحيح أيضًا، غير أنّ أبا بشر وهو جعفر بن إياس من أثبت الناس في سعيد بن جبير، وليس في حديثه السؤال عن صوم رجب.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাস ছাড়া অন্য কোনো মাস সম্পূর্ণভাবে রোযা রাখেননি। তিনি (নফল) রোযা রাখতেন, এমনকি কোনো কোনো সময় এমনও হতো যে লোকে বলতো, আল্লাহর কসম! তিনি আর রোযা ছাড়া থাকবেন না। আবার তিনি রোযা থেকে বিরতও থাকতেন, এমনকি কোনো কোনো সময় এমনও হতো যে লোকে বলতো, আল্লাহর কসম! তিনি আর রোযা রাখবেন না।
4304 - عن عائشة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أنها قالت: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يصومُ حتى نقول: لا
يُفطر، ويُفطر حتى نقول: لا يصوم.
وما رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم استكمل صيامَ شهر قط إلّا رمضان. وما رأيته في شهر أكثر صيامًا منه في شعبان.
متفق عليه: رواه مالك في الصيام (56) عن أبي النّضر مولي عمر بن عبيدالله، عن أبي سلمة ابن عبد الرحمن، عن عائشة، فذكرته.
ورواه البخاريّ في الصوم (1969)، ومسلم في الصيام (1156: 175) كلاهما من طريق مالك، به.
وفي رواية عند البخاريّ:"فإنه كان يصوم شعبان كلّه".
وعند مسلم:"كان يصوم شعبان كلّه، كان يصوم شعبان إلّا قليلًا".
ورُوي مثل هذا أيضًا عن أبي هريرة.
رواه أبو داود (2435) عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا حماد، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم بمعناه أي معني حديث عائشة وهو قولها:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصوم حتى نقول: لا يُفطر …" وزاد:"كان يصومه إلّا قليلًا، بل كان يصومه كلّه".
وحماد هو ابن سلمة تغيّر حفظه بآخره، فوهم فيه فجعله من مسند أبي هريرة.
والصواب أنه من مسند عائشة أو أمّ سلمة، كما ذكره النسائي (4/ 150 - 151).
ورواه أحمد (25101) عن يزيد بن هارون، قال: حدّثنا محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، قال: سألت عائشة: كيف كان يصوم النبيّ صلى الله عليه وسلم فذكرت مثله.
ورواه أيضًا الترمذيّ (737) من حديث عبدة عن محمد بن عمرو بإسناده مختصرًا.
فاتفاق يزيد بن هارون وعبدة -وهو ابن سليمان الكلابي ثقة ثبت من رجال الجماعة- يجعل الخطأ من حماد بن سلمة.
ومعنى قوله:"كان يصومه إلّا قليلا، بل كان يصومه كلّه" أي أكمله مرة، ومرة لم يكمله، فقيل: يصومه كلّه، أي يصوم في أوله ووسطه وآخره، لا يخصّ شيئًا منه ولا يعمه بصيامه.
وقيل: ليس على ظاهره، وإنما المراد: أكثره لا جميعه، وعبّر بالكلّ عن الغالب والأكثر. قاله المنذري.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনভাবে সাওম পালন করতেন যে, আমরা বলতাম: তিনি আর কখনো সাওম ভঙ্গ করবেন না। আবার এমনভাবে সাওম ছেড়ে দিতেন যে, আমরা বলতাম: তিনি আর সাওম পালন করবেন না। আমি রমযান ব্যতীত অন্য কোনো মাসের সাওম রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সম্পূর্ণভাবে পালন করতে দেখিনি। আর শাবান মাসের চেয়ে অন্য কোনো মাসে তাঁকে এত বেশি সাওম পালন করতে দেখিনি।
4305 - عن عائشة، قالت: لا أعلم رسول الله صلى الله عليه وسلم قرأ القرآن كلّه في ليلة واحدة، ولا قام ليلة حتى الصباح، ولا صام شهرًا كاملًا قطّ غير رمضان.
صحيح: رواه النسائي (2182) عن هارون بن إسحاق، عن عبدة، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن زرارة بن أوفي، عن سعد بن هشام، عن عائشة، فذكرته.
ورواه مسلم في الصلاة (746)، وأحمد (24269) من أوجه أخرى عن سعيد بن أبي عروبة في قصة طويلة لسعد بن هشام. ومضى بعضها في كتاب الصلاة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি জানি না যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোনো এক রাতে সম্পূর্ণ কুরআন তিলাওয়াত করেছেন, অথবা কোনো এক রাতে সকাল পর্যন্ত সালাতে দাঁড়িয়ে ছিলেন, অথবা রমযান মাস ছাড়া অন্য কোনো মাস সম্পূর্ণ রোযা রেখেছেন।
4306 - عن عائشة، قالت: كان أحبّ الشّهور إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يصومه: شعبان، ثم يصله برمضان.
صحيح: رواه أبو داود (2431) عن الإمام أحمد وهو في مسنده (25548) عن عبد الرحمن بن مهدي، عن معاوية بن صالح، عن عبد الله بن أبي قيس، سمع عائشة تقول (فذكرته).
ورواه أيضًا النسائي (2350) وصحّحه ابن خزيمة (2077)، والحاكم (1/ 434) كلّهم من طريق معاوية بن صالح به. وإسناده صحيح.
وأما قول الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين". ففيه وهمٌ؛ فإن معاوية بن صالح لم يخرج له البخاري كما قال الذهبي في"الميزان".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে রোযা রাখার জন্য সবচেয়ে প্রিয় মাস ছিল শা'বান, এরপর তিনি তা রমযানের সাথে যুক্ত করতেন।
4307 - عن أمّ سلمة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه لم يكن يصوم من السنة شهرًا تامًا إلّا شعبان يصله برمضان.
صحيح: رواه أبو داود (2336) عن الإمام أحمد -وهو في مسنده (26653) - عن محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، عن توبة العنبري، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، عن أمّ سلمة، فذكرته.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا البيهقي (4/ 210) وإسناده صحيح.
ورواه الترمذي (736)، والنسائي (2175)، والإمام أحمد (26562) كلّهم من طريق عبد الرحمن بن مهدي، عن سفيان، عن منصور، عن سالم بن أبي الجعد، عن أبي سلمة، عن أمّ سلمة، قالت:"ما رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم صام شهرين متتابعين إلا أنه كان يصل شعبان برمضان".
وإسناده صحيح أيضًا إلا أنّ الترمذي قصّر في الحكم عليه، فقال: حديث أمّ سلمة حديث حسن.
وقد رواه أيضًا في الشمائل (295) بهذا الإسناد. وقال:"هذا إسناد صحيح".
وهذا الحكم يكون أصح من الحكم الأول إلا أن تكون النُّسخ قد اختلفت.
ورواه ابن ماجه (1648) من وجه آخر عن شعبة، عن منصور بإسناده مختصرًا.
وقد أشار الترمذيّ أنّ هذا الحديث قد رُوي أيضًا عن أبي سلمة، عن عائشة أنها قالت:"ما رأيتُ النبيّ صلى الله عليه وسلم في شهر أكثر صيامًا منه في شعبان، كان يصومه إلّا قليلًا، بل كان يصومه كلّه".
ثم رواه عن هناد، حدّثنا عبدة، عن محمد بن عمرو، حدّثنا أبو سلمة، عن عائشة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم بذلك.
وقال: وقد روي سالم أبو النضر وغير واحد عن أبي سلمة، عن عائشة نحو رواية محمد بن
عمرو. انتهى.
قلت: وقد تقدم رواية أبي النّضر، عن أبي سلمة، عن عائشة.
উম্মে সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাদান মাস ছাড়া বছরের অন্য কোনো মাস সম্পূর্ণ রোযা রাখতেন না, তবে শা'বান মাসকে তিনি রমাদানের সাথে যুক্ত করতেন।
