হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4441)


4441 - عن عبد الله بن فَروخ، قال: إنّ امرأة سألتْ أمَّ سلمة، فقالت: إنّ زوجي يقبّلني وهو صائم وأنا صائمة، فما ترين؟ فقالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقبلني وهو صائم وأنا صائمة.

حسن: رواه الإمام أحمد (26500)، والطبراني في الكبير (23/ 295)، والنسائي في"الكبرى" (3074) كلّهم من طرق عن طلحة بن يحيى، قال: حدثني عبد الله بن فروخ، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن فروخ التيمي مولى آل طلحة؛ فإنه حسن الحديث.

وأمّا ما رُوي عن أبي قيس، قال: أرسلني عبد الله بن عمرو إلى أمِّ سلمة أسألها: هل كان
رسول الله صلى الله عليه وسلم يقبّل وهو صائم؟ فإن قالت: لا، فقل لها: إنَّ عائشة تخبر الناس أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يقبّل وهو صائم. قال: فسألها أكان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقبّل وهو صائم؟ قالت: لا. قلت: إنّ عائشة تخبر الناس أنّ رسول الله كان يقبل وهو صائم. قالت: لعلّها إيّاها كان لا يتمالك عنها حبًّا! أمّا إياي فلا. فهو منكر.

رواه أحمد (26533)، والطبراني في الكبير (23/ 340)، والنسائيّ في الكبرى (3072) كلّهم من طريق موسى بن علي، عن أبيه، عن أبي قيس، فذكره. أعله النسائي بمخالفة أبي قيس، ثم ذكر الروايات الصحيحة عن أمّ سلمة بأنّ النبي صلى الله عليه وسلم كان يقبلها وهو صائم، وأنها صائمة.

قلت: وفي الإسناد موسي بن عُليّ -بالتصغير- اللّخميّ أبو عبد الرحمن المصري، كان ثقة؛ وثقه أحمد، وابن معين، والعجلي، والنسائي وغيرهم.

ولكن الثقة أحيانًا يروي بما لا يوافق عليه، بل يخالف ما عليه جمهور أهل العلم وهذا الحديث من هذا القسم فإنه ثبت بالتواتر تقيل النبيّ صلى الله عليه وسلم لها ولعائشة؛ ولذا رد أهل العلم حديثه هذا من أجل تفرّده ومخالفته الثقات، كما قال ابن عبد البر:"ما انفرد به فليس بالقوي". ذكره الحافظ في"التهذيب".

قلت: لا بد من القيد بالمخالفة، وإلا فليس كلّ ثقة إذا تفرّد يكون منكرًا.

وقال في"التمهيد" (5/ 124):"وهذا حديث متصل، ولكنه ليس يجيء إلّا بهذا الإسناد، وليس بالقوي، وهو منكر على أصل ما ذكرنا عن أمّ سلمة".

وقال:"والأحاديث المذكورة عن أبي سلمة معارضة، نه وهي أحسن مجيئًا، وأظهر تواترًا، وأثبت نقلًا منه".

وظهر من كلامه أنه لم يحكم عليه بالنكارة إلا لمخالفته الأحاديث الصحيحة المتواترة.




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক মহিলা তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন: আমার স্বামী রোযা অবস্থায় আমাকে চুম্বন করেন, আর আমিও রোযা অবস্থায় থাকি। আপনি এ ব্যাপারে কী মনে করেন? তিনি (উম্মে সালামাহ) উত্তরে বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম রোযা অবস্থায় আমাকে চুম্বন করতেন, আর আমিও রোযা অবস্থায় থাকতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (4442)


4442 - عن حفصة، قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقبِّل وهو صائم

صحيح: رواه مسلم (1107) من طريق الأعمش، عن مسلم، عن شُتَيْر بن شَكَل، عن حفصة، فذكرته. ومسلم هو ابن صُبيح أبو الضّحي.




হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রোযা অবস্থায় চুম্বন করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4443)


4443 - عن ابن عباس، قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يصيبُ من الرؤوس وهو صائم.

صحيح: رواه أحمد (2241، 3392)، وعبد الرزاق (7407) ومن طريقه البزار - كشف الأستار (1020)، والطحاوي في"شرحه" (3292) كلّهم من حديث أيوب، عن عبد الله بن شفيق، عن ابن عباس، فذكره. وإسناده صحيح.

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 167) بعد أن عزاه لأحمد والبزار والطبراني:"رجال أحمد رجال الصحيح".

قال البزار: ومعني يصيب من الرؤوس، أي يقبّل.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) রোজা অবস্থায় [স্ত্রীগণের] মাথা চুম্বন করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4444)


4444 - عن جابر بن عبد الله، قال: قال عمر بن الخطاب: هششتُ فقبلتُ وأنا صائم. فقلت: يا رسول الله، صنعت اليوم أمرًا عظيمًا! قبلتُ وأنا صائم؟ قال:"أرأيتَ لو مضمضتَ من الماء وأنت صائم؟". قلت: لا بأس. قال:"فَمَهْ؟ !".

صحيح: رواه أبو داود (2385)، وأحمد (138)، والبيهقي (4/ 261)، وصححه ابن خزيمة (1999)، وابن حبان (3044)، والحاكم (1/ 431) كلّهم من حديث الليث بن سعد، عن بُكير بن عبد الله، عن عبد الملك بن سعيد، عن جابر بن عبد الله، فذكره.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

ولكن فيه عبد الملك بن سعيد ليس من رجال البخاري، وإنما أخرج له مسلم.

وإسناده صحيح، وليس فيه علة، ولكن نقل المنذري عن النسائي أنه قال:"هذا حديث منكر".

كذا قال! ولا أعرف سبب النكارة.

ورده الذهبي في"الميزان" (2/ 655) في ترجمة عبد الملك بن سعيد، عن جابر، فذكر الحديث. ثم نقل قول النسائي، وقال:"رواه بكير بن الأشج، وهو مأمون عن عبد الملك، وقد روى عنه غير واحد، فلا أدري ممن هذا؟" انتهى.

وقوله:"هششت" الهشاشة والهشاش: الارتياح والخفة والنّشاط.

وأما ما رُوي عنه بخلاف هذا، وهو أنه رأى النبيَّ صلى الله عليه وسلم في المنام قال: فرأيته لا ينظرني. فقلت: يا رسول الله، ما شأني؟ فالتفت إليَّ فقال:"ألستَ المقبِّلَ، وأنتَ الصَّائم؟". فوالذي نفسي بيده لا أقبل وأنا صائم امرأةً ما بقيتُ.

فهو ضعيف. رواه البزار -كشف الأستار (1018) -، والبيهقي (4/ 232) كلاهما من حديث أبي أسامة، عن عمر بن حمزة، ثنا سالم، عن عبد الله بن عمر، عن عمر بن الخطاب، فذكره.

قال البزار:"لا نعلمه عن عمر إلا من هذا الوجه بهذا اللفظ، وقد رُوي عن عمر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم بخلاف هذا" انتهي.

وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 165): رواه البزار، ورجاله رجال الصحيح.

قلت: وهو كما قال إلا أنّ كلامه يُشعر بصحة الحديث، فإن عمر بن حمزة وهو ابن عبد الله بن عمر بن الخطاب وإن كان من رجال مسلم إلا أنه ضعيف، ضعفه أكثر أهل العلم، وبأنه روي حديثًا مخالفًا لا تقوم به الحجة كما قال الطحاوي (3289) وفي كلامه نكارة.

قال البيهقي: تفرد به عمر بن حمزة، فإن صح فعمر بن الخطاب كان قويًا مما يتوهم تحريك القبلة شهوته، ففيه رد على وجهن كما قال ابن التركماني: أحدهما: إن عمر بن حمزة ضعفه ابن معين.

وقال أبو أحمد والرازي: أحاديثه مناكير.
والثاني: أنّ الشرائع لا تؤخذ من المنامات، ولا سيما وقد أفتى النبيّ صلى الله عليه وسلم عمر في اليقظة بإباحة القبلة …".




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি প্রফুল্ল হয়ে রোযা অবস্থায় চুম্বন করে ফেললাম। অতঃপর আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আজ আমি বিরাট এক কাজ করে ফেলেছি! রোযা অবস্থায় আমি চুম্বন করেছি? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি কি মনে করো, যদি তুমি রোযা অবস্থায় পানি দিয়ে কুলি করো (তাহলে কী হবে)? আমি বললাম: এতে কোনো সমস্যা নেই। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তাহলে (চুম্বন করাতেও) কী হলো?









আল-জামি` আল-কামিল (4445)


4445 - عن عطاء بن يسار، عن رجل من الأنصار، أنّ الأنصاريّ أخبر عطاء أنه قبَّل امرأته على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو صائم، فأمر امرأته فسألت النبيّ صلى الله عليه وسلم عن ذلك، فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"إنّ رسول الله يفعل ذلك". فأخبرته امرأتُه فقال: إنّ النبيَّ يُرخّص له في أشياء، فارجعي إليه، فقولي له: فرجعت إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقالت: قال: إنّ النبي صلى الله عليه وسلم يرخّص له في أشياء؟ فقال:"أنا أتقاكم لله، وأعلمكم بحدود الله".

صحيح: رواه أحمد (23682) عن عبد الرزاق -وهو في مصنفه (7412) - أخبرنا ابن جريج، أخبرني زيد بن أسلم، عن عطاء بن يسار، فذكره.

وإسناده صحيح. ولا يضر جهالة الأنصاري فإنه صحابي، والصحابة كلهم عدول.

ولكن رواه مالك في الصيام (14) عن عطاء بن يسار، مرسلًا.

وفيه أن المرأة دخلت على أم سلمة زوج النبي صلى الله عليه وسلم، فذكرت ذلك لها، فأخبرتها أمُّ سلمة أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقبّل وهو صائم، فرجع فأخبرت زوجها بذلك فزاده ذلك شرًّا.

قال ابن عبد البر:"هذا الحديث مرسل عند جميع رواة الموطأ عن مالك".

قلت: ومن وصله عنده زيادة علم -وهي مقبولة عند المحدثين- ومن طريق عبد الرزاق رواه أيضًا ابن حزم في"المحلي" (6/ 306)، واستدل به في الرد على من ادعى أن القبلة من خصوصيات النبيّ صلى الله عليه وسلم.




জনৈক আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আত্বা ইবনু ইয়াসারকে জানিয়েছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে তিনি রোযা অবস্থায় তাঁর স্ত্রীকে চুম্বন করেছিলেন। অতঃপর তিনি তাঁর স্ত্রীকে নির্দেশ দিলেন, ফলে সে ব্যাপারটি নিয়ে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এমনটি করে থাকেন।" তাঁর স্ত্রী তাঁকে সে কথা জানালেন। লোকটি বলল: "নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে হয়তো কিছু বিষয়ে ছাড় দেওয়া হয়েছে। তুমি তাঁর কাছে ফিরে যাও এবং তাঁকে এই কথা বলো।" সুতরাং সে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে ফিরে গেল এবং বলল: "আমার স্বামী বলেছেন যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কিছু বিষয়ে ছাড় দেওয়া হয়েছে?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাদের মধ্যে আল্লাহকে সবচেয়ে বেশি ভয় করি এবং আমিই তোমাদের মধ্যে আল্লাহর সীমারেখা সম্পর্কে সবচেয়ে বেশি অবগত।"









আল-জামি` আল-কামিল (4446)


4446 - عن عبد الله بن ثعلبة بن صُعَير العُذْريّ -وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم قد مسح على وجهه، وأدرك أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم قال: كانوا ينهوني عن القبلة تخوفًا أن أتقرب لأكثر منها، ثم المسلمون اليوم ينهون عنها. ويقول قائلهم: إنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان له من حفظ الله ما ليس لأحد.

صحيح: رواه الإمام أحمد (23669) عن حجاج (هو المصيصي)، حدّثنا ليث -يعني ابن سعد-، حدّثني عُقيل، عن ابن شهاب، عن عبد الله بن ثعلبة بن صعير، فذكره.

ورواه الطحاوي في شرح المعاني (3325) من وجه آخر عن يحيى بن أيوب، قال: حدثني عقيل، بإسناده مختصرًا. وإسناده صحيح.

قال الطحاوي:"بيَّن في هذا الحديث المعنى الذي من أجله كرهها من كرهها للصائم، وأنه إنما هو خوفهم عليه منها أن يجره إلى ما هو أكبر منها، فذلك دليل على أنه إذا ارتفع ذلك المعنى الذي من أجله منعوه منها أنها له مباحة".
وفي الباب ما رُوي عن أنس، قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم أيقبِّل الصّائم؟ فقال:"وما بأس ريحانة يشمُّها".

رواه الطبراني في"الأوسط" (4449)، وفي"الصغير" (614) عن عبد الله بن موسي بن أبي عثمان الأنماطي، قال: حدّثنا محمد بن عبد الله الأرُزّي، قال: حدّثنا معتمر بن سليمان، عن أبيه، عن أنس، فذكره.

قال في"الأوسط": لم يرو هذا الحديث عن سليمان التيمي إلا معتمر، تفرد به محمد بن عبد الله الأرُزّي.

وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 167) ولم يقل فيه شيئًا خلافًا لعادته في حكمه على الرجال.

قلت: وفيه محمد بن عبد الله الأرُزّي لم أعرف من هو؛ فإنّ المزيّ لم يذكره ممن روى عن معتمر بن سليمان.

وأما ما رُوي عن ميمونة مولاة النبيّ صلى الله عليه وسلم قالت: سئل النبي صلى الله عليه وسلم عن رجل قبَّل امرأته وهما صائمان؟ قال:"قد أفطرا"، فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (1686) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدّثنا الفضل بن دكين، عن إسرائيل، عن زيد بن جبير، عن أبي يزيد الضبي، عن ميمونة، فذكرته.

ورواه الطحاوي في"شرحه" (3281) من وجه آخر عن إسرائيل، به، مثله. وقال:"أبو يزيد الضبي رجل لا يعرف".

وقال البخاريّ: هو رجل مجهول.

وقال الدارقطني: ليس بمعروف.

وقال ابن حزم: هو مجهول.

قلت: وفي متنه نكارة لمخالفة ما رُوي عن إباحة القبلة للصائم.




আব্দুল্লাহ ইবনে সা'লাবা ইবনে সু'আইর আল-'উযরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)—যাঁর মুখমণ্ডল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুছে দিয়েছিলেন এবং যিনি রাসূলুল্লাহর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাহাবিদের সাক্ষাৎ লাভ করেছিলেন—তিনি বলেন: তারা আমাকে চুম্বন করা থেকে নিষেধ করতেন, এই ভয়ে যে আমি যেন এর চেয়ে বেশি কিছুর নিকটবর্তী না হই। এরপর বর্তমান কালের মুসলমানগণও তা থেকে নিষেধ করেন। আর তাদের কেউ কেউ বলেন: নিশ্চয়ই আল্লাহ্‌র পক্ষ থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য যে সুরক্ষা ছিল, তা অন্য কারো জন্য নেই।









আল-জামি` আল-কামিল (4447)


4447 - عن عائشة، أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم رخَّص في القبلة للشيخ وهو صائم، ونهى عنه الشاب، وقال: الشيخ يملك إربه، والشاب يفسد صومه.

حسن: رواه البيهقي (4/ 232) من طريق يحيي بن زكريا بن أبي زائدة، حدثني أبان البجلي، عن أبي بكر بن حفص، عن عائشة، فذكرته.

وإسناده حسن من أجل أبان وهو ابن عبد الله بن أبي حازم بن صخر مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

قال الإمام أحمد: صدوق صالح الحديث.
وقال ابن عدي: أرجو أنه لا بأس به.

ووثقه العجلي. فمثله يحسّن حديثه إذا لم يأت في حديثه ما ينكر عليه، كيف وقد شهد له ما يأتي.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রোজা অবস্থায় বৃদ্ধ ব্যক্তির জন্য (স্ত্রীকে) চুম্বন করার অনুমতি দিয়েছেন এবং যুবককে তা থেকে নিষেধ করেছেন। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: বৃদ্ধ ব্যক্তি তার কামনাকে নিয়ন্ত্রণ করতে পারে, আর যুবক তার রোজা নষ্ট করে ফেলে।









আল-জামি` আল-কামিল (4448)


4448 - عن أبي هريرة، أنّ رجلًا سأل النبيَّ صلى الله عليه وسلم عن المباشرة للصائم؟ فرخّص له، وأتاه آخر فسأله فنهاه، فإذا الذي رخص له شيخ، والذي نهاه شاب.

حسن: رواه أبو داود (2387) عن نصر بن علي، حدّثنا أبو أحمد - يعني الزبيري-، أخبرنا إسرائيل، عن أبي العنب، عن الأغر، عن أبي هريرة، فذكره.

وعنه رواه البيهقي (4/ 231 - 232) وإسناده حسن من أجل أبي العنب العدويّ الكوفيّ، روي عنه جماعة منهم: شعبة، ومسعر، وإسرائيل، وغيرهم. قال عبد الحميد بن صالح البرجمي: سألت يونس بن بكير عن اسم أبي العنبس؟ فقال: هو جدّي لأمّي واسمه الحارث بن عبيد بن كعب من بني عدي. وذكره ابن حبان في"الثقات".

فمثله يحسن حديثه إن كان له أصل.

وفي الباب ما رُوي عن عبد الله بن عمرو بن العاصي، قال: كنا عند النبيّ صلى الله عليه وسلم فجاء شاب، فقال: يا رسول الله، أقبِّلُ وأنا صائم؟ قال:"لا". فجاءه شيخ، فقال: أقبِّلُ وأنا صائم؟ قال:"نعم". قال: فنظر بعضنا إلى بعض! . فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قد علمتُ لِمَ نظر بعضكم إلى بعض، إنّ الشيخ بملك نفسه".

رواه الإمام أحمد (6739) عن موسى بن داود، حدّثنا ابن لهيعة، عن يزيد بن حبيب، عن قيصر التُّجيبي، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.

وفي الإسناد ابن لهيعة وفيه كلام معروف أنه سيء الحفظ، وبه أعلّه الهيثمي في"المجمع" (3/ 166)، ولكنه قال فيه:"عبد الله بن عمر".

وعزاه أيضًا إلى الطبراني. وهو كذلك فإنّ الحديث في قطعة (13 - 14) (137) من هذا الوجه، ومن وجه آخر عن ابن لهيعة، وذلك من مسند عبد الله بن عمرو.

فالظاهر أنه وقع خطأ في"مجمع الزوائد"، وقد رواه الخطيب في"الفقيه والمتفقه" (1181) عن الإمام أحمد وقال فيه: عبد الله بن عمرو.

وقد أفتي بالتفريق بين الشيخ والشاب في الصيام عدد من السلف منهم: أبو هريرة، وابن عباس، وابن عمر. أخرج حديثهم البيهقي في"سننه".

اختلف أهل العلم في جواز القبلة للصائم، فرخّص فيها عمر بن الخطاب، وأبو هريرة، وسعد ابن أبي وقاص، وعائشة، وإليه ذهب عطاء، والشعبي، والحسن.

وقال الشافعي: لا بأس إذا لم تحرك القبلة شهوته. وكذلك قال أحمد وإسحاق.

وقال أبو حنيفة وأصحابه: لا بأس بالقبلة للصائم إذا كان يأمن على نفسه.
وقال الثوري: لا يفطّره والتنزّه أحبّ إليَّ.

وقال ابن عباس: يكره ذلك للشاب، ويرخّص للشيخ.

وكره قوم القبلة للصائم على الإطلاق، ونهي عنها ابن عمر، كما رواه مالك في"الموطأ" أنه كان ينهى عن القبلة والمباشرة للصائم، وإليه ذهب مالك.

ويُروي عن ابن مسعود أنه قال:"من فعل ذلك قضى يومًا مكانه. رواه عبد الرزاق (8426)، والطّحاويّ (3284)، عن الثوريّ، عن منصور، عن هلال بن يساف، عن الهزهاز، عن ابن مسعود، فذكره.

قال سفيان: ولا يؤخذ بهذا.

قلت: وفي الإسناد الهزهاز لا يعرف من هو؟ .

وقد رُوي عن ابن مسعود أيضًا ما يخالف ذلك.

وهو ما رواه عبد الرزاق (8442) عن ابن عيينة، عن زكريا، عن الشعبي، عن عمرو بن شرحبيل، أن ابن مسعود كان يباشر امرأته بنصف النهار وهو صائم.

ورواه أيضًا الطحاوي في"شرحه" (3291) من وجه آخر عنه، مثله.

وقد اتفق الجمهور على أنّ من قبّل وأمني فعليه القضاء، ولا كفارة عليه، خلافًا لمالك فإنه أوجب القضاء والكفارة.

كما اتفقوا على أن من أمذى فليس عليه شيء خلافًا لمالك فإنه أوجب عليه القضاء ولا كفارة عليه وأدلتهم مبسوطة في كتب الفقه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে রোযাদারের জন্য (স্ত্রীর সাথে) আলিঙ্গন বা সরাসরি স্পর্শ করা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করল। তখন তিনি তাকে অনুমতি দিলেন। আর তার কাছে অন্য একজন এসে জিজ্ঞেস করল, তখন তিনি তাকে নিষেধ করলেন। এরপর দেখা গেল, যাকে তিনি অনুমতি দিয়েছিলেন, সে ছিল বৃদ্ধ, আর যাকে তিনি নিষেধ করেছিলেন, সে ছিল যুবক।









আল-জামি` আল-কামিল (4449)


4449 - عن الأسود، قال: انطلقتُ أنا ومسروق إلى عائشة رضي الله عنها، فقلنا لها: أكان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يباشر وهو صائم؟ قالت: نعم، ولكنَّه كان أملككم لإربه -أو من أملككم لإربه-.

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1927)، ومسلم في الصيام (1106: 68) كلاهما من طريق إبراهيم (هو النخعي)، عن الأسود، به. واللفظ لمسلم. والشك من أبي عاصم كما نبَّه عليه مسلم في آخر الحديث.

ولفظ البخاري:"كان النبي صلى الله عليه وسلم يقبِّل ويباشرُ وهو صائم، وكان أملكَكُم لاربه".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আসওয়াদ (রহ.) বলেন, আমি ও মাসরুক (রহ.) একত্রে আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট গেলাম। আমরা তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি রোযা অবস্থায় (স্ত্রীর সাথে) সরাসরি মেলামেশা করতেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, তবে তিনি তোমাদের মধ্যে তাঁর কামনার ওপর সর্বাধিক নিয়ন্ত্রণকারী ছিলেন—অথবা তিনি তাদের মধ্যে ছিলেন, যাঁরা কামনার ওপর নিয়ন্ত্রণকারী ছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4450)


4450 - عن عائشة رضي الله عنها أن رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يباشر وهو صائم، ثم يجعل بينه وبينها ثوبا، يعني: الفرج.

حسن: رواه أحمد (24314) عن ابن نمير، عن طلحة بن يحيى، قال: حدثتني عائشة بنت
طلحة، عن عائشة، فذكرته.

وإسناده حسن من أجل الكلام في طلحة بن يحيى غير أنه حسن الحديث.

قال مسروق: سألت عائشة: ما يحل للرجل من امرأته صائمًا؟ قالت:"كلّ شيء إلّا الجماع".

رواه عبد الرزاق (8439) عن معمر، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن مسروق، قال (فذكره).




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রোযা অবস্থায় (স্ত্রীকে) স্পর্শ ও আলিঙ্গন করতেন, এরপর তিনি তার ও স্ত্রীর মাঝে একটি কাপড় রাখতেন—অর্থাৎ (গুপ্তাঙ্গের ক্ষেত্রে)।

মাসরূক বলেন: আমি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, রোযা অবস্থায় স্বামীর জন্য তার স্ত্রীর কাছ থেকে কী বৈধ? তিনি বললেন: "সবকিছুই বৈধ, তবে সহবাস নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (4451)


4451 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا نُودي بالصّلاة -صلاة الصبح- وأحدكم جنب فلا يصوم يومئذ".

صحيح: رواه الإمام أحمد (8145) عن عبد الرزاق، قال: أخبرنا معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة، فذكره.

ومن هذا الطريق رواه أيضًا ابن حبان (3485) وإسناده صحيح.

ولم أقف على هذا الطريق في"مصنف عبد الرزاق" ولكنه رواه (7399) عن ابن جريج، قال: أخبرني عمرو بن دينار، أن يحيى بن جعدة أخبره، عن عبد الله بن عمرو بن عبد القاري، أنه سمع أبا هريرة يقول:"وربّ هذا البيت، من أدركه الصبح جنبًا فليفطر، ولكن محمدا صلى الله عليه وسلم قال".

ورواه النسائي في"الكبري" (2936)، وابن ماجه (1702) كلاهما من وجه آخر عن سفيان ابن عيينة، عن عمرو بن دينار، بإسناده، ولفظُه: لا ورب الكعبة، ما أنا قلت:"من أصبح جنبًا فليفطر" محمد صلى الله عليه وسلم قاله.

قلت: هذا منسوخ كما قال الخطابي، ولذا رجع أبو هريرة عن حديثه هذا لما أُخبر عن حديث عائشة وأم سلمة، كما سيأتي.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন সালাতের জন্য—ফজরের সালাতের জন্য—আযান দেওয়া হয়, আর তোমাদের কেউ জানাবাত (বড় অপবিত্রতা) অবস্থায় থাকে, সে যেন সেদিন সিয়াম (রোযা) পালন না করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4452)


4452 - عن عائشة، أنّ رجلًا قال لرسول الله صلى الله عليه وسلم، وهو واقف على الباب، وأنا أسمع: يا رسول الله، إنّي أُصْبحُ جُنُبًا وأنا أريد الصّيام. فقال صلى الله عليه وسلم:"وأنا أصبحُ جُنبًا وأنا أريد الصّيامَ، فأغتسلُ وأصومُ". فقال له الرجل: يا رسولَ الله، إنّك لست مثلنا، قد غفر الله لك ما تقدّم من ذنبك وما تأخّر. فغضب رسول الله صلى الله عليه وسلم وقال:"إني لأرجو أن أكونَ أخشاكم لله، وأعلَمَكم بما أتَقي".

صحيح: رواه مالك في الصيام (9) عن عبد الله بن عبد الرحمن بن معمر الأنصاريّ، عن أبي يونس مولي عائشة، عن عائشة، فذكرته.

ورواه مسلم في الصيام (1110) من طريق إسماعيل بن جعفر، أخبرني عبد الله بن عبد الرحمن،
به، نحوه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জনৈক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আরজ করল—যখন তিনি দরজায় দাঁড়িয়ে ছিলেন এবং আমি শুনতে পাচ্ছিলাম—ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি রোজার নিয়ত করার পরও ভোরকালে জুনুব (অপবিত্র) অবস্থায় থাকি। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আর আমিও রোজার নিয়ত করার পরও জুনুব অবস্থায় ভোর করি। অতঃপর আমি গোসল করি এবং রোজা রাখি।” লোকটি তাঁকে বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনি তো আমাদের মতো নন। আল্লাহ আপনার পূর্বাপর সকল গুনাহ ক্ষমা করে দিয়েছেন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাগান্বিত হলেন এবং বললেন: “আমি অবশ্যই আশা করি যে, তোমাদের মধ্যে আমিই আল্লাহকে তোমাদের চেয়ে বেশি ভয় করি এবং তাকওয়ার (আল্লাহভীতির) বিষয় সম্পর্কে তোমাদের চেয়ে বেশি অবগত।”









আল-জামি` আল-কামিল (4453)


4453 - عن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام يقول: كنت أنا وأبي عند مروان بن الحكم. وهو أمير المدينة. فذكر له أن أبا هريرة يقول: من أصبح جنبا أفطر ذلك اليوم. فقال مروان أقسمت عليك يا عبد الرحمن! لتذهبنَّ إلى أمَّيْ المؤمنين عائشةَ وأمِّ سلمة فلتسألنَّهما عن ذلك، فذهب عبد الرحمن وذهبت معه حتى دخلنا على عائشة فسلَّم عليها ثم قال: يا أمَّ المؤمنين! إنا كنا عند مروان بن الحكم فذُكر له أنَّ أبا هريرة يقول: من أصبح جنبًا أفطر ذلك اليوم. قالت عائشة: ليس كما قال أبو هريرة يا عبد الرحمن! أترغبُ عمَّا كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصنع؟ فقال عبد الرحمن: لا والله. قالت عائشة: فأشهد على رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه كان يصبح جنبًا من جماع غير احتلام، ثم يصوم ذلك اليوم.

قال: ثم خرجنا حتى دخلنا على أمِّ سلمة فسألها عن ذلك فقالت مثل ما قالت عائشة.

قال: فخرجنا حتّى جئنا مروان بن الحكم فذكر له عبد الرحمن ما قالتا. فقال مروان: أقسمت عليك يا أبا محمد! لتركبنَّ دابّتي فإنّها بالباب فلتذهبنَّ إلى أبي هريرة فإنه بأرضه بالعقيق فلتخبرنَّه ذلك. فركب عبد الرحمن وركبت معه حتى أتينا أبا هريرة فتحدَّث معه عبد الرحمن ساعة، ثم ذكر له ذلك. فقال له أبو هريرة: لا علم لي بذاك إنما أخبرنيه مخبرٌ.

متفق عليه: رواه مالك في الصيام (11) عن سُمي مولى أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، أنه سمع أبا بكر، به، فذكره.

ورواه البخاري في الصوم (1925، 1926) عن عبد الله بن مسلمة، عن مالك، به.

ومن طريق الزهري قال: أخبرني أبو بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، أن أباه عبد الرحمن أخبر مروان، أن عائشة وأمَّ سلمة أخبرناه أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يدركه الفجر وهو جنب من أهله، ثم يغتسل ويصوم. وقال مروان لعبد الرحمن بن الحارث: أقسمُ بالله للتُقْرِعنَّ بها أبا هريرة …" الحديث بنحوه.

ورواه البخاري أيضًا في موضع آخر منه (1931) عن إسماعيل (هو ابن أبي أويس)، عن مالك به، مختصرًا.

ورواه مالك (10) ومن طريقه مسلم في الصيام (1109: 78) عن عبد ربه بن سعيد، عن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، عن عائشة وأم سلمة، فذكرتا لفظ الحديث المرفوع بدون القصة.
والقصة المذكورة رواها مسلم (1109: 75) من طريق ابن جريج، أخبرني عبد الملك بن أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أبي بكر، قال: سمعت أبا هريرة يقصّ ويقول في قصته:"من أدركه الفجرُ جُنبًا فلا يصُم …" الحديث. وفيه القصة. وجاء في آخره: فقال أبو هريرة: أهما قالتاه لك؟ قال: نعم. قال: هما أعلم. ثم ردَّ أبو هريرة ما يكون يقول في ذلك إلى الفضل بن العباس، فقال أبو هريرة: سمعتُ ذلك من الفضل، ولم أسمعه من النبيّ صلى الله عليه وسلم. قال: فرجع أبو هريرة عمّا كان يقول في ذلك.

قلت لعبد الملك: أقالتا:"في رمضان"؟ قال: كذلك، كان يصبح جنبًا من غير حلم ثم يصوم.




আবূ বকর ইবনু আবদির রহমান ইবনুল হারিস ইবনু হিশাম থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি ও আমার পিতা মারওয়ান ইবনুল হাকামের নিকট ছিলাম। তিনি তখন মদীনার আমীর ছিলেন। তখন তাঁর কাছে উল্লেখ করা হলো যে, আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যে ব্যক্তি জুনুবী (নাপাক) অবস্থায় ভোর করে, সেই দিনের রোযা তার ভাঙা হয়ে যায় (বা রোযা রাখা তার জন্য জায়েয নয়)। মারওয়ান বললেন: হে আবদুর রহমান! আমি তোমাকে কসম দিচ্ছি, তুমি অবশ্যই উম্মাহাতুল মু'মিনীন আয়িশা ও উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে যাবে এবং এ বিষয়ে তাঁদের দু'জনকে জিজ্ঞাসা করবে।

আবদুর রহমান গেলেন এবং আমিও তাঁর সাথে গেলাম। এমনকি আমরা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে প্রবেশ করলাম। তিনি তাঁকে সালাম দিলেন। এরপর বললেন: হে উম্মুল মু'মিনীন! আমরা মারওয়ান ইবনুল হাকামের নিকট ছিলাম। তখন তাঁর নিকট উল্লেখ করা হলো যে, আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যে ব্যক্তি জুনুবী অবস্থায় ভোর করে, সেই দিনের রোযা তার ভাঙা হয়ে যায়। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: হে আবদুর রহমান! আবূ হুরাইরা যা বলেছেন তা সঠিক নয়। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা করতেন, তুমি কি তা থেকে বিমুখ হতে চাও? আবদুর রহমান বললেন: আল্লাহর শপথ, না। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তাহলে আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর ব্যাপারে সাক্ষ্য দিচ্ছি যে, তিনি (স্বপ্নদোষ ব্যতিরেকে) সহবাসের কারণে জুনুবী অবস্থায় ভোর করতেন, এরপর তিনি সেই দিনের রোযা রাখতেন।

তিনি (আবূ বকর) বলেন: এরপর আমরা বের হয়ে উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম এবং তাঁকে এ বিষয়ে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনিও আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর অনুরূপ জবাব দিলেন।

তিনি বলেন: এরপর আমরা বের হয়ে মারওয়ান ইবনুল হাকামের কাছে ফিরে এলাম। আবদুর রহমান তাঁদের দু'জনের বক্তব্য তাঁকে জানালেন। তখন মারওয়ান বললেন: হে আবূ মুহাম্মাদ! আমি তোমাকে কসম দিচ্ছি, তুমি অবশ্যই আমার বাহনে আরোহণ করবে—তা দরজার কাছেই রাখা আছে—এবং আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে যাবে। তিনি এখন তাঁর ভূমি আকীকে আছেন। তুমি তাঁকে এই (ফাতওয়া) জানাবে।

এরপর আবদুর রহমান আরোহণ করলেন এবং আমিও তাঁর সাথে আরোহণ করলাম। আমরা আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে পৌঁছলাম। আবদুর রহমান তাঁর সাথে কিছুক্ষণ কথা বললেন, এরপর তাঁকে বিষয়টি জানালেন। আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে বললেন: এ বিষয়ে আমার নিজস্ব কোনো জ্ঞান নেই। আমাকে কেবল একজন বর্ণনাকারী এই তথ্য জানিয়েছিলেন।

(অন্য একটি সূত্রে) ঘটনার শেষে বলা হয়েছে, আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর যে বক্তব্য ছিল, তার উৎস হিসেবে ফযল ইবনুল আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কথা উল্লেখ করলেন। আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি তা ফযল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে শুনেছিলাম, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে শুনিনি। রাবী বলেন: এরপর আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর পূর্বের বক্তব্য থেকে ফিরে এলেন।

(রাবী বলেন: আমি আব্দুল মালিককে জিজ্ঞেস করলাম: তাঁরা কি 'রমযানে' কথাটি বলেছিলেন? তিনি বললেন: হ্যাঁ, [আয়িশা ও উম্মু সালামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছিলেন] তিনি স্বপ্নদোষ ছাড়া জুনুবী অবস্থায় ভোর করতেন, এরপর তিনি রোযা রাখতেন।)









আল-জামি` আল-কামিল (4454)


4454 - عن عائشة، قالت: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يبيتُ جنبًا، فيأتيه بلال، فيؤذنه بالصّلاة فيقوم فيغتسل فأنظر إلى تحدُّر الماء من رأسه، ثم يخرج، فأسمع صوته في صلاة الفجر.

قال مطرف: فقلت لعامر: أفي رمضان؟ قال: رمضان وغيره سواء.

صحيح: رواه ابن ماجه (1703)، وأحمد (24701)، وابن حبان (3491)، والنسائي في الكبري (2992) كلّهم من حديث مطرف، عن عامر الشعبي، عن مسروق، عن عائشة، فذكرته.

وإسناده صحيح، ولا يضر من أرسله عن الشعبي، عن عائشة.

وقد جاء من وجه آخر عن إسماعيل بن أبي خالد، أخبرنا عن عامر، قال: أخبرني أبو بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام أنه أتي عائشة، فقال: إنّ أبا هريرة يُفتينا أنه من أصبح جُنبًا فلا صيام له، فما تقولين له في ذلك؟ فقالت: لقد كان بلال يأتي رسول الله صلى الله عليه وسلم فيؤذنه للصلاة، وإنه الجنب، فيقوم ويغتسل، وإني لأرى جري الماء بين كتفيه، ثم يظل صائمًا.

رواه أحمد (25675)، وابن حبان (3488) كلاهما من هذا الطريق.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতে জানাবাত অবস্থায় থাকতেন। অতঃপর বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে এসে সালাতের জন্য আযান দিতেন। তখন তিনি দাঁড়িয়ে গোসল করতেন, আর আমি দেখতাম তাঁর মাথা থেকে পানি ঝরছে। এরপর তিনি বের হতেন এবং আমি ফজরের সালাতে তাঁর কণ্ঠস্বর শুনতাম। মুতাররিফ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, আমি আমির (রাহিমাহুল্লাহ)-কে জিজ্ঞেস করলাম: (এটা কি শুধু) রমযানে? তিনি বললেন: রমযান ও অন্য সময় সমান।

(অন্য এক বর্ণনায় এসেছে, আবু বকর ইবনু আবদুর রহমান (রাহিমাহুল্লাহ) যখন ফাতিহা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলেন যে, কেউ যদি জানাবাত অবস্থায় সকালে উপনীত হয়, তাহলে কি সে রোযা রাখবে?) তিনি (আয়িশা) বললেন: বিলাল রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসতেন এবং তাঁকে সালাতের জন্য আযান দিতেন, তখন তিনি জানাবাত অবস্থায়ই থাকতেন, অতঃপর তিনি দাঁড়াতেন ও গোসল করতেন। আর আমি তাঁর দুই কাঁধের মধ্যে দিয়ে পানির ধারা প্রবাহিত হতে দেখতাম, এরপরও তিনি রোযা রাখতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4455)


4455 - عن عائشة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يُصبح جنبًا عن طروقة، ثم يصوم.

صحيح: رواه النسائي في"الكبرى" (3002)، وابن حبان (3434) كلاهما من حديث قتيبة ابن سعد، قال: حدّثنا بكر بن مضر، عن عبد الله بن عبد الرحمن، عن أبي سلمة، عن عائشة، فذكرته. وإسناده صحيح.

وقولها:"عن طروقة" أي عن جماع.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সহবাসের কারণে জুনুব (অপবিত্র) অবস্থায় সকাল করতেন, অতঃপর তিনি রোযা রাখতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4456)


4456 - عن سليمان بن يسار، أنه سأل أمَّ سلمة عن الرجل يصبحُ جنبًا أيصوم؟ قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يصبحُ جُنُبًا من غير احتلام، ثم يصوم.

صحيح: رواه مسلم في الصيام (1109) عن أحمد بن عثمان النوفلي، حدّثنا أبو عاصم، حدّثنا ابن جريج، أخبرني محمد بن يوسف، عن سليمان بن يسار، فذكره.

وفي ابن ماجه (1704) وغيره من وجه آخر عن نافع، أنه سأل أم سلمة، فقالت (مثله).
وقد استشكل الناس قول أبي هريرة بأن من أصبح جنبا فلا صوم له، وكان يرويه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم فلما بلغه حديث عائشة وأمّ سلمة، فقال: هما أعلم بذلك، إنما أخبرنيه الفضل بن العباس - يعني وقع فيه النسخ، فإن حديث الفضل بن العباس كان متقدمًا على حديث عائشة وأم سلمة.

وهو أحسن تأويل كما قال الخطابي، وهذا لفظه:"تكلّم الناسُ في معنى ذلك فأحسن ما سمعتُ في تأويل ما رواه أبو هريرة في هذا أن يكون ذلك محمولًا على النسخ، وذلك أن الجماع كان في أول الإسلام محرمًا على القائم في الليل بعد النوم، كالطعام والشراب، فلما أباح الله الجماع إلى طلوع الفجر، جاز لتجنب إذا أصبح قبل أن يغتسل أن يصوم ذلك اليوم، لارتفاع الحظر المتقدم، فيكون تأويل قوله:"من أصبح جنبًا فلا يصوم" أي من جامع في الصوم بعد النوم فلا يجزئه صوم غده، لأنه لا يصبح جنبًا إلا وله أن يطأ قبل الفجر بطرفة عين، فكان أبو هريرة يفتي بما سمعه من الفضل بن العباس على الأمر الأول، ولم يعلم بالنسخ، فلما سمع خبر عائشة وأم سلمة صار إليه.

وقد رُوي عن ابن المسيب أنه قال:"رجع أبو هريرة عن فتياه فيمن أصبح جنبًا أنه لا صوم له".

قال الخطابي:"وقد يتأول ذلك أيضًا على وجه آخر من حيث لا يقع فيه النسخ، وهو أن يكون معناه: من أصبح مجامعًا فلا صوم له. والشيء قد يسمي باسم غيره، إذا كان ماله في العاقبة إليه" انتهى كلام الخطابي.




উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সুলাইমান ইবনু ইয়াসার তাঁকে সেই ব্যক্তি সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন, যে ব্যক্তি জুনুব (গোসল ফরয) অবস্থায় সকালে ওঠে, সে কি রোযা রাখবে? তিনি (উম্মে সালামাহ) বললেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম স্বপ্নদোষ ছাড়া জুনুব অবস্থায় সকালে উঠতেন, অতঃপর তিনি রোযা রাখতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4457)


4457 - عن رافع بن خديج، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أفطر الحاجم والمحجوم".

حسن: رواه الترمذي (774) عن محمد بن يحيى، ومحمد بن رافع النيسابوري، ومحمود بن غيلان، ويحيى بن موسي، قالوا: حدّثنا عبد الرزاق -وهو في مصنفه (7523) - عن معمر، عن يحيى ابن أبي كثير، عن إبراهيم بن عبد الله بن قارظ، عن السائب بن يزيد، عن رافع بن خديج، فذكره.

قال الترمذي:"حسن صحيح. وذُكر عن أحمد بن حنبل أنه قال: أصح شيء في هذا الباب حديث رافع بن خديج".

ورواه أيضًا الإمام أحمد (15828)، وصححه ابن خزيمة (1964)، وابن حبان (3535)، والحاكم (1/ 428)، والبيهقي (4/ 265) كلّهم من حديث عبد الرزاق، به، مثله.

قال ابن خزيمة: سمعت العباس بن عبد العظيم العنبري يقول: سمعت علي بن عبد الله المديني يقول: لا أعلم في"أفطر الحاجم والمحجوم" حديثًا أصح من ذا.

وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

قلت: إبراهيم بن عبد الله بن قارظ من رجال مسلم وحده.
وقال الحاكم:"فليعلم طالب هذا العلم أن الإسنادين ليحيى بن أبي كثير قد حكم لأحدهما أحمد بن حنبل بالصحة، وحكم علي بن المديني للآخر بالصحة، فلا يعلل أحدهما بالآخر، وقد حكم إسحاق بن إبراهيم الحنظلي تحديث شدّاد بن أوس بالصّحة".




রাফে' ইবনু খাদীজ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে শিঙ্গা লাগায় এবং যাকে শিঙ্গা লাগানো হয়, তাদের উভয়ের রোজা ভেঙে যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (4458)


4458 - عن شدّاد بن أوس، أنّه مرّ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في زمن الفتح على رجل يحتجم بالبقيع لثمان عشر خلث من رمضان، فقال:"أفطر الحاجم والمحجوم".

صحيح: رواه أبو داود (2369)، وابن ماجه (1681)، وصحّحه ابن حبان (3533) كلّهم من طريق أبي قلابة، عن أبي الأشعث، عن شداد بن أوس، فذكره. وإسناده صحيح.

وقد نقل الترمذيّ في"العلل الكبير" (1/ 362 - 364) عن البخاري قال: ليس في الباب أصح من حديث ثوبان وشداد بن أوس.

فذكرت له الاضطراب. فقال: كلاهما عندي صحيح؛ فإنّ أبا قلابة روى الحديثين جميعًا.

رواه عن أبي أسماء، عن ثوبان، ورواه عن أبي الأشعث عن شداد".

قال الترمذي: وكذلك ذكروا عن ابن المديني أنه قال: حديث ثوبان، وحديث شدّاد صحيحان.




শাদ্দাদ ইবনে আওস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মক্কা বিজয়ের সময় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে যাচ্ছিলেন। তখন তিনি বাকী নামক স্থানে এক ব্যক্তির পাশ দিয়ে গেলেন, যে রমজানের আঠারো দিন অতিবাহিত হওয়ার পর শিঙ্গা লাগাচ্ছিল। তখন তিনি বললেন: যে শিঙ্গা লাগায় এবং যাকে শিঙ্গা লাগানো হয়, উভয়ের রোযা ভঙ্গ হয়ে যায়।









আল-জামি` আল-কামিল (4459)


4459 - عن ثوبان، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أفطر الحاجم والمحجوم".

صحيح: رواه أبو داود (2367)، وابن ماجه (1608)، وصحّحه ابن خزيمة (1962، 1963)، وابن حبان (3532)، والحاكم (1/ 427) كلّهم من حديث يحيي بن أبي كثير، عن أبي قلابة، عن أبي أسماء الرحبي، عن ثوبان، فذكره.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين. وقال أحمد: وهو أصح ما رُوي في هذا الباب".

قلت: أبو أسماء اسمه عمرو بن مرثد الدمشقي من رجال مسلم وحده.

وفي الباب ما رُوي عن معقل بن سنان الأشجعي أنه قال: مرَّ علىَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا أحتجم

في ثمان عشرة ليلة خلت من شهر رمضان، فقال:"أفطرَ الحاجمُ والمحجوم".

رواه الإمام أحمد (15901) عن أبي الجواب، حدّثنا عمار بن رزيق، عن عطاء بن السائب، قال: حدّثني نفرٌ من أهل البصرة منهم الحسن، عن معقل بن سنان الأشجعيّ، فذكره.

اختلف في إسناده اختلافًا كثيرًا.

أوله: الاختلاف على عطاء بن السائب، فرواه عمار بن رزيق كما مضى، وكذلك رواه محمد ابن فضيل، عنه.

ومن طريقه رواه الطبراني في"الكبير" (20/ 233).

وبقية الاختلافات ذكرها الدارقطني في"علله" (14/ 52).

والاختلاف الثاني على الحسن وهو الإمام البصريّ المشهور، فمرة رواه عن معقل بن سنان، عن
معقل بن يسار، وثالثة عن أبي هريرة، ورابعة عن أسامة بن زيد، وخامسة عن علي بن أبي طالب، وسادسة عن شداد بن أوس، وسابعة عن ثوبان، وثامنة عن غير واحد من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم.

وفي جميع هذه الأسانيد انقطاع؛ فإنّ الحسن البصريّ لم يسمع من أحد من هؤلاء. انظر تفصيل ذلك في"علل الدارقطني" المشار إليه سابقًا.

وفي الباب عن الصّحابة الآخرين جعلهم ابن منده ثمانية وعشرين من الصحابة كما ذكره ابن الملقن في"البدر المنير" (5/ 671).

وقال ابن الجوزيّ في"التحقيق" (3/ 250): رواه بضعة عشر صحابيًا، وأخذ به علي، وابن عمر، وأبو موسى، وأبو هريرة، وعائشة إلّا أن أكثر الأحاديث ضعاف، فنحن ننتخب منها".

وانتخب من هذه الأحاديث: حديث رافع بن خديج، وحديث شداد بن أوس، وحديث ثوبان، وحديث معقل بن سنان الأشجعي، وحديث أسامة بن زيد، وحديث بلال، وحديث أبي هريرة، وحديث عائشة.

وفنَّد الحافظ ابن عبد الهادي هذه الأحاديث وبيَّن ضعفها وما وقع فيها من اضطراب.

والخلاصة فيه أنّ حديث ثوبان، وشدّاد صحيحان كما سبق من قول البخاريّ، وقال الإمام أحمد: إنّ حديث رافع أصح شيء في هذا الباب.

قال الترمذي بعد أن نقل قول الإمام أحمد:"وقد كره قوم من أهل العلم من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم وغيرهم الحجامة للصائم، حتى بعض أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم احتجم بالليل منهم: أبو موسي الأشعريّ، وابن عمرو، وبه يقول ابن المبارك وأحمد وإسحاق.

وقال عبد الرحمن بن مهدي:"من احتجم وهو صائم فعليه القضاء".

قال شيخ الإسلام ابن تيمية رحمه الله: وقد بيَّنا أنَّ الفطرَ بالحجامةِ على وَفقِ الأصول والقياس وأنه من جنس الفطر بدم الحيض والاستقاءة وبالاستمناء. وإذا كان كذلك فبأيّ وجْهٍ أراد إخراجَ الدَّم أفطر كما أنه بأيّ وجْهٍ أخرج القيء أفطر سواءٌ جذب القيء بادخال يده أو بشمِّ ما يقينه أو وضع يده تحت بطنه واستخرج القيء، فتلك طرق لاخراج القيء وهذه طرق لاخراج الدّم ولهذا كان خروج الدم بهذا، وهذا سواء في باب الطهارة. فتبين بذلك كمالُ الشرع واعتدالُه وتناسبه وأنّ ما ورد من النصوص ومعانيها فإن بعضه يصدّق بعضا، ويوافقه {وَلَوْ كَانَ مِنْ عِنْدِ غَيْرِ اللَّهِ لَوَجَدُوا فِيهِ اخْتِلَافًا كَثِيرًا} [النساء: 82].

وأما الحاجم فإنه يجتذب الهواء الذي في القارورة بامتصاصه، والهواء يجتذب ما فيها من الدم فربما صعد مع الهواء شيءٌ من الدّم ودخل في حلقه وهو لا يشعر، والحكمة إذا كانت خفية أو منتشرة علّق الحكمُ بالمظنة كما أن النائم الذي تخرج منه الرّيح ولا يدري يُؤمر بالوضوء فكذلك الحاجم يدخل شيءٌ من الدم مع ريقه الى بطنه وهو لا يدري.
والدَّمُ من أعظم المفطِّرات فإنه حرام في نفسه لما فيه من طغيان الشهوة والخروج عن العدل، والصائم أمر بحسم مادّته فالدَّمُ يزيد الدَّمَ فهو من جنس المحظور فيفطر الحاجم لهذا، كما ينتقض وضوء النائم وإن لم يستيقن خروج الرّيح منه لأنه يخرج ولا يدري وكذلك الحاجم قد يدخل الدم في حلقه وهو لا يدري.

وأمّا الشارط فليس بحاجم، وهذا المعنى منتفي فلا يفطر الشارط وكذلك لو قدر حاجمٌ لا يمص القارورة بل يمتص غيرها، أو يأخذ الدَّم بطريق أخرى لم يفطر. والنَبيُّ صلى الله عليه وسلم كلامه خرج على الحاجم المعروف المعتاد" انتهى كلامه.




থাওবান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “রক্তমোক্ষণকারী (শিঙ্গা ব্যবহারকারী) ও যার রক্তমোক্ষণ করা হলো, তাদের রোযা ভঙ্গ হয়ে গেল।”









আল-জামি` আল-কামিল (4460)


4460 - عن ابن عباس، قال: احتجم النبيُّ صلى الله عليه وسلم وهو صائم.

صحيح: رواه البخاري في الصوم (1939) عن أبي معمر، حدّثنا عبد الوارث، حدّثنا أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.

وكذلك رواه أيضًا أبو داود (2372)، والترمذي (775) كلاهما من حديث عبد الوارث، عن أيوب، به، مثله.

قال أبو داود:"ورواه وهيب بن خالد، عن أيوب، بإسناده، مثله. وجعفر بن ربيعة وهشام بن حسان، عن عكرمة، عن ابن عباس، مثله".

وحديث وهيب بن خالد هو ما رواه البخاري (1938) عن معلى بن أسد، عنه إلا أنه قال فيه:"احتجم وهو محرم، واحتجم وهو صائم".

وقد قيل:"واحتجم وهو صائم". فيه نكارة، والصحيح:"واحتجم وهو محرم".

والذي يظهر لي أنه فعل ذلك في أوقات مختلفة، فإنه صلى الله عليه وسلم أحتجم وهو محرم مسافر؛ لأنّ المحرم لا يكون في بلده، وأخرى احتجم وهو صائم مقيم في بلده، والدليل على ذلك أن عبد الوارث لم يذكر في حديثه:"احتجم وهو محرم".

وأكد أبو داود أنّ رواية وهيب بن خالد، مثله. ومعنى هذا أنّ وهيبًا يروي الحديث في وقتين مختلفين مرة احتجامه صلى الله عليه وسلم وهو محرم مسافر، وأخرى احتجامه صلى الله عليه وسلم وهو صائم مقيم، فجمع الراوي عنه بين الحديثين في حديث واحد. وكلاهما صحيح، فإني لم أقف على من طعن في رواية عبد الوارث، ووهيب بن خالد كلاهما عن أيوب، وإنما ذكروا طرقًا أخرى وطعنوا فيها، ومن هذه الطرق:

ما رواه محمد بن عبد الله الأنصاريّ، عن حبيب بن الشهيد، عن ميمون بن مهران، عن ابن عباس، قال:"احتجم النبي صلى الله عليه وسلم وهو صائم".
رواه الترمذي (776) عن أبي موسى، عن محمد بن عبد الله الأنصاريّ، وقال:"حسن غريب من هذا الوجه".

ورواه النسائي في"الكبري" (3231) من هذ الوجه، وزاد فيه:"وهو محرم".

وقال: هذا منكر، ولا أعلم أحدًا رواه عن حبيب غير الأنصاريّ، ولعله أراد أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم تزوّج ميمونة.

قال الأثرم: سمعت أبا عبد الله ردّ هذا الحديث وضعفه وقال: كانت كتب الأنصاري ذهبت في أيام المنتصر، فكان بعد يحدِّث من كتب غلامه وكان هذا من تلك.

ومن هذه الطرق ما رواه شعبة، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس:"أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم احتجم بالقاحة وهو صائم".

رواه الإمام أحمد (2186)، والطبراني في الكير (12053)، والنسائي في الكبرى (3224) كلّهم من هذا الوجه.

قال يحيى بن سعيد: قال شعبة: لم يسمع الحكم حديث مقسم في الحجامة للصائم.

ومن هذه الطرق ما رواه يزيد بن أبي زياد، عن مقسم، عن ابن عباس:"أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم احتجم بين مكّة والمدينة وهو صائم".

رواه أبو داود (2373)، والترمذي (777)، وابن ماجه (1682)، وأحمد (1848)، والبيهقي (4/ 263) كلّهم من هذا الوجه، ومنهم من لم يذكر:"وهو محرم صائم".

وفيه متابعة للحكم إلا أنّ يزيد بن أبي زياد وهو الهاشمي ضعيف باتفاق أهل العلم، وبه أعله أيضًا النسائي.

ومن هذه الطرق ما رواه قبيصة، قال: حدّثنا الثوري، عن حماد، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس:"أنَّ النبيّ صلى الله عليه وسلم احتجم وهو صائم".

قال النسائي: هذا خطأ لا نعلم أحدًا رواه عن سفيان غير قبيصة، وقبيصة كثير الخطأ. وقد رواه أبو هاشم عن حماد مرسلًا.

ولحديث ابن عباس أسانيد أخرى فما جاء من وجه صحيح لا يُعلّ بما رُوي من وجه ضعيف.

والبخاري والترمذي وغيرهما ذهبا إلى تصحيح حديث ابن عباس:"احتجم وهو محرم، احتجم وهو صائم" على أنهما حديثان. وذهب الإمام أحمد ويحيى بن سعيد القطان إلى تضعيفه.

ولكن كما قلت: إني لم أقف على تضعيفهم لرواية أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس. وإنّما ضعّفوا هذه الروايات التي ذكرت بعضا منها.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রোযা রাখা অবস্থায় শিঙ্গা লাগিয়েছিলেন (রক্তমোক্ষণ করিয়েছিলেন)।