আল-জামি` আল-কামিল
4468 - عن حمزة بن عمرو الأسلميّ، قال: يا رسول الله! أجد بي قوة على الصيام
في السفر، فهل عليَّ جناح؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"هي رخصة من الله، فمن أخذ بها فحسن، ومن أحبَّ أن يصوم فلا جناح عليه".
صحيح: رواه مسلم في الصوم (1121: 107) من طرق عن ابن وهب، أخبرني عمرو بن الحارث، عن أبي الأسود، عن عروة بن الزبير، عن أبي مراوح، عن حمزة بن عمرو، فذكره.
قوله:"فمن أخذ بها فحسن" فيه إشارة إلى تفضيل الفطر في السفر على الصيام.
ولحمزة بن عمرو طرق أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.
منها ما رواه ابن خزيمة (2153) عن محمد بن العلاء بن كريب الهمداني، حدّثنا عبدة، عن محمد بن إسحاق، عن عمران بن أبي أنس، عن سليمان بن يسار، عن حمزة بن عمرو الأسلميّ قال: كنت أسردُ الصوم على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم فقلت: يا رسول الله، إني أصوم ولا أفطر، أفأصوم في السفر؟ قال:"إن شئت فصم، وإن شئت فأفطر".
قال النسائي في"الكبري" (2604):"هذا مرسل". أي فيه انقطاع بين سليمان بن يسار وبين حمزة بن عمرو؛ لأنه رواه في"المجتبي" (2302) فخالف فيه في الموضعين:
أحدهما: أن ابن إسحاق قال: حدثني عمران بن أبي أنس، فصرَّح بالتحديث.
والثاني: أنه أدخل بين سليمان بن يسار وبين حمزة بن عمرة"أبا مراوح".
وصحَّح المزّي هذا الطريق، فقال في ترجمة (أبي مراوح): الصحيح عن عمران بن أبي أنس، عن سليمان بن يسار، عن أبي مرواح، عن حمزة، به.
والخلاصة أن هذا الحديث رواه عروة بن الزبير، وأبو مراوح.
فأما عروة بن الزبير فله شيخان:
أحدهما: عائشة رضي الله عنها، فيكون الحديث من مسندها.
والثاني: حمزة بن عمرو، فيكون الحديث من مسنده.
وأما أبو مراوح فليس له طريق غير حمزة بن عمرو، والكل صحيح.
قال ابن عبد البر:"وفي هذا الحديث التخيير للصائم في رمضان إن شاء أن يصوم في سفره، وإن شاء أن يفطر. وهو أمر مجمع عليه من جماعة فقهاء الأمصار، وهو الصحيح في هذا الباب"."التمهيد" (22/ 147).
হামযাহ ইবনু আমর আল-আসলামী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি সফরকালে সাওম (রোযা) পালনের সামর্থ্য অনুভব করি। এতে কি আমার কোনো পাপ হবে? রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “এটি আল্লাহর পক্ষ থেকে প্রদত্ত একটি ছাড় (সুবিধা)। সুতরাং যে ব্যক্তি তা গ্রহণ করবে, তা উত্তম। আর যে ব্যক্তি সাওম পালন করতে পছন্দ করবে, তার ওপর কোনো পাপ নেই।”
4469 - عن أنس بن مالك، أنه قال: سافرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضان، فلم يَعِب الصَّائمُ على المفطر، ولا المفطر على الصَّائم.
متفق عليه: رواه مالك في الصيام (22) عن حميد الطويل، عن أنس بن مالك، فذكره.
ورواه البخاريّ في الصوم (1947) من طريق مالك، به، مثله.
ورواه مسلم في الصيام (1118) من وجه آخر عن حميد الطويل، قال: خرجتُ فصمتُ، فقالوا لي: أعِدْ. قال: فقلت: إن أنسًا أخبرني أنّ أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم كانوا يسافرون (فذكره).
قال: فلقيت ابنَ أبي مليكة فأخبرني عن عائشة، رضي الله عنها، بمثله.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রমযান মাসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সফর করেছিলাম। তখন রোযাদার ব্যক্তি রোযাহীন ব্যক্তির সমালোচনা করত না এবং রোযাহীন ব্যক্তিও রোযাদার ব্যক্তির সমালোচনা করত না।
4470 - عن ابن عباس قال: لا تعبْ على من صام، ولا على من أفطر، فقد صام رسول الله صلى الله عليه وسلم في السفر وأفطر.
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1112/ 89) عن أبي كريب، حدّثنا وكيع، عن سفيان، عن عبد الكريم، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যে ব্যক্তি রোযা রেখেছে তাকেও তুমি নিন্দা করো না এবং যে রোযা ভঙ্গ করেছে তাকেও তুমি নিন্দা করো না। কেননা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সফরে রোযা রেখেছেন এবং রোযা ভঙ্গও করেছেন।
4471 - عن أبي الدرداء، قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في شهر رمضان في حرٍّ شديد، حتّى إن كان أحدُنا ليضعُ يدَه على رأسه من شدّة الحرِّ وما فينا صائمٌ إلّا رسول الله صلى الله عليه وسلم وعبد الله بن رواحة.
متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1945)، ومسلم في الصيام (1122) من طريق إسماعيل ابن عبيد الله، عن أمّ الدرداء، عن أبي الدرداء، فذكره. واللفظ لمسلم.
ولفظ البخاري: خرجنا مع النبي صلى الله عليه وسلم في بعض أسفاره في يوم حار حتى يضع الرجل يده على رأسه من شدة الحر، وما فينا صائم، إلا ما كان من النبي صلى الله عليه وسلم وابن رواحة.
আবূ দারদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে রমযান মাসে প্রচণ্ড গরমের সময় বের হলাম, এমনকি আমাদের মধ্যে কেউ কেউ তীব্র গরমের কারণে তার হাত মাথার ওপর রাখছিল। আর আমাদের মধ্যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এবং আব্দুল্লাহ ইবনে রাওয়াহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছাড়া কেউ রোযাদার ছিল না।
4472 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال:"غزونا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم لست عشرة مضتْ من رمضان، فمنّا من صام، ومنّا من أفطر، فلم يَعِب الصَّائم على الْمُفطر، ولا المفطر على الصَّائم".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1116) من طرق، عن قتادة، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدري، فذكره.
وأبو نضرة اسمه المنذر بن مالك بن قُطعة العبديّ.
ووقع في رواية له:"لثمانَ عشرة خلتْ".
وفي رواية:"في ثِنْتَي عشْرة".
وفي رواية:"لسبعَ عشرة أو تسع عشرة".
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে রমযানের ষোল দিন অতিবাহিত হওয়ার পর যুদ্ধে (গাজওয়া) অংশগ্রহণ করলাম। আমাদের মধ্যে কেউ সিয়াম পালনকারী ছিল এবং কেউ ছিল সিয়াম ভঙ্গকারী। কিন্তু সিয়াম পালনকারী সিয়াম ভঙ্গকারীর উপর দোষারোপ করত না, আর সিয়াম ভঙ্গকারীও সিয়াম পালনকারীর উপর দোষারোপ করত না।
4473 - عن أبي سعيد الخدريّ، وجابر بن عبد الله، قالا:"سافرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فيصوم الصَّائمُ ويفطرُ المفطر، فلا يعيبُ بعضُهم على بعض".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1117) من وجوه عن مروان بن معاوية (هو الفزاريّ)، عن عاصم (هو ابن سليمان الأحول)، قال: سمعت أبا نضرة، يحدِّث عن أبي سعيد الخدري، وجابر ابن عبد الله، قالا (فذكراه).
আবূ সাঈদ আল-খুদরী ও জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁরা বলেন, “আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সফরে ছিলাম। তখন রোযাদার রোযা রাখত এবং যারা রোযা ছাড়ত তারা রোযা ছাড়ত, আর তাদের কেউ কারো উপর দোষারোপ করত না।”
4474 - عن عمران بن حصين، قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يمشي حافيًا وناعلًا، ويشرب قائمًا وقاعدًا، وينفتل عن يمينه وعن يساره، ويصوم في السفر ويفطر.
حسن: رواه البزار -كشف الأستار (993) -، عن الحسين بن يحيى الأرزيّ، ثنا موسى بن إسماعيل، ثنا هارون بن موسى، عن حسين المعلم، عن عبد الله بن بريدة، عن عمران بن حصين، فذكره.
قال البزار:"وهذا رواه حسين، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده. ورواه هارون، عن حسين، عن ابن بريدة، عن عمران.
وهارون ليس به بأس، وزاد:"ويصوم في السفر ويُفطر"، ولا نحفظ هذا عن عمرو بن شعيب.
ولو حفظناه كان هذا الإسناد أحسن من ذلك، وإن كان ذلك هو المعروف" انتهى.
قلت: بل فيه كما الآتي:
ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কখনও খালি পায়ে হাঁটতেন আবার কখনও জুতা পরিহিত অবস্থায় হাঁটতেন, তিনি দাঁড়িয়ে ও বসে উভয় অবস্থাতেই পান করতেন, তিনি (সালাতের পর) ডান দিকে ও বাম দিকে উভয় দিকেই ফিরতেন (ঘুরে বসতেন), এবং তিনি সফরে সিয়াম পালনও করতেন এবং ভঙ্গও করতেন (ইফতারও করতেন)।
4475 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم يصلي حافيا وناعلا، ويصوم في السفر ويُفطر، ويشرب قائما وقاعدا، وينصرف عن يمينه وعن شماله.
حسن: رواه أحمد (6679، 6928، 7012) من طرق، عن حسين المعلم، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكره. وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যে, তিনি খালি পায়ে এবং জুতা পরিহিত অবস্থায় সালাত আদায় করতেন, তিনি সফরে সাওম (রোযা) রাখতেন ও সাওম ভেঙেও ফেলতেন (ইফতার করতেন), তিনি দাঁড়িয়ে ও বসে পান করতেন, এবং তিনি (সালাত শেষে) ডান দিকে ও বাম দিকে ফিরতেন।
4476 - عن أنس، قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان في سفر ومعه أصحابه، فشقَّ عليهم الصوم، فدعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بإناء فيه ماء فشرب -وهو على راحلته-، والناس ينظرون إليه.
حسن: رواه ابن خزيمة (2039)، والطحاوي (3156) كلاهما من حديث ابن أبي مريم، قال: أنا يحيى بن أيوب، قال: حدثني حميد، أن بكر بن عبد الله المزني، حدثه قال: سمعت أنس بن مالك يقول (فذكر الحديث).
وإسناده حسن من أجل الكلام في يحيى بن أيوب الغافقي إلا أنه حسن الحديث. كما انه توبع في الأسانيد الآتية.
رواه الإمام أحمد (12269) عن روح بن عبادة، حدّثنا هشام بن حسان، عن حميد الطويل، عن انس بن مالك، فذكره مختصرًا.
ورواه الإمام أحمد أيضًا (13429، 13619)، وأبو يعلى (3806) من أوجه أخرى عن حميد، عن أنس بن مالك.
وحميد هو ابن أبي حميد الطويل رمي بالتدليس، ويقال: إنه لم يسمع من أنس إلا أربعة وعشرين حديثًا، والباقي سمعها من ثابت البناني عنه، وثابت البناني ثقة، ولذا تحمّل الأثقة عنعته، وهنا يحيى بن أيوب الغافقي أقام الإسناد بذكر الواسطة بينهما إن كان حفظه لأنه كان يخطئ.
وفي الباب ما رُوي عن ابن مسعود:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يصوم في السفر ويفطر، ويصلي ركعتين لا يدعهما يقول: لا يزيد عليهما يعني الفريضة".
رواه الإمام أحمد (3813)، وأبو يعلى (5309)، والبزار - كشف الأستار (992) والطحاوي في شرحه (1/ 333) كلهم من حديث روح بن عبادة، حدّثنا سعيد بن أبي عروبة، عن عبد السلام، عن حماد، عن إبراهيم، عن علقمة، عن ابن مسعود، فذكره.
قال البزار: لا نعلمه عن عبد الله (ابن مسعود) إلا بهذا الإسناد، ولا رواه عن عبد السلام إلا ابن أبي عروبة.
وفيه عبد السلام هو ابن أبي الجنوب ضعيف جدًّا من رجال ابن ماجه. ووهم الحافظ الهيثمي في"المجمع" (3/ 158) فقال:"رجال أحمد رجال الصحيح"، ظنا منه أنه عبد السلام بن حرب الملائي من رجال الشيخين كما وهم غيره.
وكان الحافظ ممن ظنَّ أولًا أنه ابن حرب، ثم ظهر له أنه ابن أبي الجنوب كما ذكره في"التعجيل" (657) مستدلًا برواية ابن عدي في"الكامل" في ترجمة عبد السلام بن أبي الجنوب من طريق روح بن عبادة بهذا الإسناد.
وقال بعد تخريجه (أي ابن عدي):"عبد السلام المذكور في هذا الإسناد يقال: هو ابن أبي الجنوب، حدَّث عنه سعيد بن أبي عروبة بهذا الإسناد" انتهى كلام ابن عدي.
ثم قال الحافظ -متعقبًا على الحسيني في قوله:"عبد السلام، عن حماد بن أبي سليمان مجهول"-:"وظهر أنه معروف، ورواية ابن أبي عروبة عنه رواية الأقران، وابن أبي الجنوب ضعيف عندهم. ولم أر له رواية عن حماد بن أبي سليمان" انتهي.
وفي الباب أيضًا ما روي عن سنان بن المحبق الهذلي، عن أبيه، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من كانت له حمولة تأوي إلى شبع فليصم رمضان حيث أدركهـ".
رواه أبو داود (2410) عن حامد بن يحيى، ثنا هشام بن القاسم، ح.
وثنا عقبة بن مُكْرم، ثنا أبو قتيبة -المعنى-، قالا: ثنا عبد الصمد بن حبيب بن عبد الله الأزدي، حدثني حبيب بن عبد الله، قال: سمعت سنان بن سلمة بن المحبق الهذلي يحدث، فذكره.
وقال أبو داود (2411): وحدّثنا نصر بن المهاجر، حدّثنا عبد الصمد. يعني ابن عبد الوارث - حدّثنا عبد الصمد بن حبيب، قال: حدثني أبي، عن سنان بن سلمة، عن سلمة بن المحبق، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أدركه رمضان في السفر" فذكر معناه.
أعلّه المنذري بعبد الصمد بن حيب الأزدي العَدْوي البصريّ، ونقل عن البخاري أنه قال:"لين الحديث". وقال أيضًا: منكر الحديث، ذاهب الحديث، ولم يعدَّه هذا الحديث شيئًا". وضعّفه أيضًا أحمد". وذكر له أبو جعفر العقيلي هذا الحديث: وقال: لا يتابع عليه، ولا يعرف إلا
به" انتهى.
وقوله:"الحمولة" بفتح الحاء -كلّ ما يركب عليه من إبل أو حمار وغيرهما. وفي القرآن: {وَمِنَ الْأَنْعَامِ حَمُولَةً وَفَرْشًا} [سورة الأنعام: 142].
ومعنى قوله:"تأوي إلى شبع" أي يأوي صاحبها إلى مكان يشبع فيه بأن يكون معه زاد فعليه أن يصوم سواء كان السفر طويلًا أو قصيرًا؛ لأنه لا مشقة ولا عناء فيه.
وفيه إيجاب الصوم على المسافر الذي لا يجد مشقة.
وفيه نكارة وشذوذ لما صحَّ في"الصَّحيح" أنَّ المسافر مخيّر بين الإفطار والصوم، ولعلّ البخاريّ حكم على عبد الصمد بن حبيب بأنه منكر الحديث من اجل روايته هذا الحديث الذي لا يتابع عليه.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সাহাবীগণের সাথে এক সফরে ছিলেন। তখন তাদের জন্য সাওম (রোজা) রাখা কষ্টকর হয়ে উঠলো। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি পাত্রে পানি আনতে বললেন এবং পান করলেন— তখন তিনি তাঁর সওয়ারীর উপর ছিলেন এবং লোকজন তাঁর দিকে তাকিয়ে ছিল।
4477 - عن وعن عبد الله بن عباس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج إلى مكة عام الفتح في رمضان، فصام حتّى بلغ الكديد، ثمّ أفطر فأفطر الناسُ، وكانوا يأخذون بالأحدث فالأحدث من أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه مالك في الصيام (21) عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عتبة بن مسعود، عن عبد الله بن عباس، فذكره.
ورواه البخاريّ في الصوم (1944) من طريق مالك، به، مثله.
ولم يذكر قوله:"وكانوا يأخذون بالأحدث … إلخ".
ورواه مسلم (1113) من أوجه أخرى عن ابن شهاب، به، نحوه. وفيه:"وكان صحابةُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يتبعون الأحدث فالأحدث من أمره".
وفي رواية قال سفيان (هو ابن عيينة): لا أدري مِنْ قَوْلِ من هو؟ يعني: وكان يؤخذ بالآخر من قول رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وفي رواية قال الزهريّ: وكان الفطر آخر الأمرين، وإنما يؤخذ من أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم بالآخر فالآخر.
فعُلم بهذه الروايات أنَّ الذين كانوا يأخذون بالأحدث فالأحدث هم الصّحابة. وأنَّ الذي قاله هو الزّهريّ، وعُلم أن قوله:"وكانوا يأخذون …" مدرج في رواية الموطأ؛ ولذلك لم يخرجه البخاريّ في"صحيحه".
ذهب بعض أهل الظاهر إلى أنَّ الصّوم في السّفر منسوخ؛ لأنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أفطر، وكان ذلك آخر الأمرين، وكان الصّحابة يأخذون بالآخر فالآخر من فعله صلى الله عليه وسلم.
واحتجوا أيضًا بقوله تعالي: {فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَرَ} أي إن صامه لم يجزئه، بل عليه قضاؤه إذا رجع إلى أهله.
ونقل الحافظ في"الفتح" (4/ 696): وحكي ذلك أيضًا عن عمر، وابن عمر، وأبي هريرة، والزهريّ، وإبراهيم النخعي وغيرهم.
ورد الجمهور على قولهم هذا بأنَّ المريض لو صام أجزأ صومه بالاتفاق، ومعنى الآية: {فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَرَ} أي إن أفطر.
وقالوا: قول الراوي:"وكانوا يأخذون بالأحدث فالأحدث" لا يدل على النسخ إذ ليس فيه إنَّ الفطر في السفر ناسخ لإباحة الصوم في السفر بحجّة أن ابن عباس نفسه كان يقول:"فمن شاء صام، ومن شاء أفطر" وهو حديث صحيح كما سيأتي. فلم يجعل ابن عباس إفطار النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في السفر بعد صيامه فيه ناسخًا للصوم في السفر، بل جعله على جهة اليسر لمن يشق عليه الصوم في السفر.
وفي حديث أبي سعيد الخدريّ دلالة واضحة في عدم النسخ في قوله:"لقد رأيتنا نصوم بعد ذلك مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في السفر". وذلك بعد أن أفطروا في فتح مكة، وهو الآتي في الباب الذي يليه.
وأمّا ما رُوي عن عبد الرحمن بن عوف مرفوعًا:"صائم رمضان في السفر كالمفطر في الحضر" فهو ضعيف.
رواه ابن ماجه (1666) من حديث أسامة بن زيد، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبيه عبد الرحمن بن عوف، فذكره.
قال البوصيري:"هذا إسناد ضعيف منقطع، أسامة بن زيد هو ابن أسلم ضعيف، وأبو سلمة بن عبد الرحمن لم يسمع من أبيه شيئًا. قاله ابن معين والبخاري".
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের বছর রমজান মাসে মক্কার উদ্দেশ্যে বের হন। তিনি রোযা রাখলেন, এমনকি যখন আল-কাদীদ (নামক স্থানে) পৌঁছলেন, তখন তিনি রোযা ভেঙে দিলেন। ফলে লোকেরাও রোযা ভেঙে দিল। আর তারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নির্দেশসমূহের মধ্যে সবচেয়ে নতুনটিকে গ্রহণ করতেন (যা সর্বশেষ ছিল, সেই অনুযায়ী আমল করতেন)।
4478 - عن محمد بن كعب أنه قال: أتيت أنس بن مالك في رمضان وهو يريد سفرًا، وقد رُحلتْ له راحلته، ولبس ثياب السّفر، فدعا بطعام فأكل. فقلت له: سنّة؟ قال: سنّة، ثمّ ركب.
حسن: رواه الترمذيّ (799) عن قُتَيبة، حَدَّثَنَا عبد الله بن جعفر، عن زيد بن أسلم، عن محمد ابن المنكدر، عن محمد بن كعب، قال (فذكره).
ورواه الترمذيّ أيضًا عن محمد بن إسماعيل، حَدَّثَنَا سعيد بن أبي مريم، حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، قال: حَدَّثَنِي زيد بن أسلم، قال: حَدَّثَنِي محمد بن المنكدر، عن محمد بن كعب، فذكر نحوه.
ورواه البيهقيّ (4/ 247) من طريق عثمان بن سعيد الدارميّ، ثنا ابن أبي مريم، بإسناده، وفيه:"تقارب غروب الشّمس، فدعا بطعام، فأكل منه".
قال الترمذيّ: هذا حديث حسن. ومحمد بن جعفر هو ابن أبي كثير، مديني ثقة. وهو أخو إسماعيل بن جعفر، وعبد الله بن جعفر هو ابن نجيح والد عليّ بن عبد الله المدينيّ، وكان يحيى بن معين يضعفه".
وفي الباب عن عبيد بن جبر، قال: كنت مع أبي بصرة الغفاري - صاحب النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في سفينة من الفسطاط في رمضان، فرفع، ثمّ قرّب غداءه.
قال جعفر في حديثه: فلم يجاوز البيوت، حتّى دعا بالسفرة. قال: اقترب. قلت: ألستَ تري البيوت؟ ! قال أبو بصرة: أترغب عن سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ . قال جعفر في حديثه: فأكل.
رواه أبو داود (2412) عن عبد الله بن عمر، حَدَّثَنِي عبد الله بن زيد.
ح وثنا جعفر بن مسافر، ثنا عبد الله بن يحيى المعنى. قالا: حَدَّثَنِي سعيد بن أبي أيوب. زاد جعفر: والليث. قال: حَدَّثَنِي يزيد بن أبي حبيبه: أن كليب بن ذُهل الحضرميّ أخبره، عن عبيد -قال: جعفر: ابن جبر- قال: كنت مع أبي بصرة الغفاري (فذكر الحديث).
ومن طريق أبي داود أخرجه البيهقيّ (4/ 246).
ورواه الدَّارميّ (1754)، والإمام أحمد (27231)، وابن خزيمة (2040) كلّهم من طريق سعيد بن أبي أيوب، حَدَّثَنِي يزيد بن أبي حبيب، بإسناده، نحوه.
قال ابن خزيمة:"لست أعرف كليب بن ذُهل، ولا عبيد بن جبر، ولا أقبل دين من لا أعرفه بعدالة".
وما قاله ابن خزيمة كلام متجه على أسس علمية سليمة ولكن لم يطبّق ما قاله هو ولا تلميذه ابن حبَّان في كثير من الرواة الذين لم يعرف عنهم شيءٌ. وأخرجا حديثهم في"صحيحيهما". وقد تم التنبيه عليه في مواضع كثيرة.
وأمّا كليب بن ذُهل فهو مصريّ ذكره ابن حبَّان في"الثّقات" (7/ 356) وترجم له البخاريّ في"التاريخ الكبير" (7/ 230)، وابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (7/ 167) ولم يقولا فيه شيئًا. وقال فيه الحافظ:"مقبول" أي إذا توبع، فإذا لم يتابع فهو لين الحديث.
وأمّا عبيد بن جبر فهو الغفاري أبو جعفر المصري مولى أبي بصرة، روى عن مولاه في الفطر في السفر، وهو يرى البيوت. ذكره الفسويّ في"المعرفة والتاريخ" (2/ 492) في ثقات التابعين، ووثَّقه العجلي وابن حبَّان.
وفي الباب أيضًا عن دحية بن خليفة، أنه خرج من قرية من دمشق مرة إلى قدر قرية عقبة من الفسطاط، وذلك ثلاثة أميال في رمضان، ثمّ إنه أفطر، وأفطر معه ناسٌ، وكره آخرون أن يُفطروا،
فلمّا رجع إلى قريته قال: والله! لقد رأيتُ اليوم أمرًا ما كنتُ أظنّ أني أراه. إنَّ قومًا رغبوا عن هدي رسول الله صلى الله عليه وسلم وأصحابه". يقول ذلك للذين صاموا، ثمّ قال عند ذلك:"اللَّهُمَّ! اقبضني إليك".
رواه أبو داود (2143)، والإمام أحمد (27231)، وابن خزيمة (2041)، والبيهقي (4/ 241) كلّهم من طريق اللّيث، قال: حَدَّثَنِي يزيد بن أبي حيب، عن أبي الخير، عن منصور الكلبيّ، عن دحية بن خليفة، فذكره.
قال ابن خزيمة: إني لا أعرف منصور بن زيد الكلبي هذا بعدالة ولا جرح".
قلت: وهو كما قال، وقد سبقه ابن المديني فقال:"مجهول".
وقال الذّهبيّ:"ما روى عنه سوى مرثد اليزني (يعني أبا الخير) حديثه أفطر المسافر على ثلاثة أميال".
وقال الحافظ في"التقريب":"مستور". ولكن يشهد بعضه لبعض ويقويه عمل السلف.
قال أنس بن مالك: قال لي أبو موسى: ألم أنبأ أو ألم أخبر أنك تخرج صائمًا، وتدخل صائمًا؟ قال: قلت: بلى. قال: فإذا خرجت فاخرج مفطرًا، وإذا دخلت فادخل مفطرًا.
وعن عمرو بن شرحبيل أنه كان يسافر وهو صائم فيفطر من يومه. رواهما البيهقيّ (4/ 247).
استمسك بهذه الآثار الإمام أحمد وإسحاق وداود والمزني من الشافعية، فقالوا: إنه إذا نوى الصوم، ثمّ سافر أبيح له أن يفطر. لكن يقال: إنَّ المزنيّ، قد رجع عن قوله.
وقال مالك وأبو حنيفة والشافعي: من لا يفارق العمران إِلَّا بعد الفجر فليس له الفطر في ذلك اليوم؛ لأنه ممن شهد الشهر وهو مقيم فيجب عليه أن يصوم؛ لأنّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم لم يخرج من المدينة في شهر رمضان مفطرًا، وإنما أفطر في الطريق.
وأمّا إن سافر المقيم بالليل، وفارق عمران البلد قبل الفجر فله أن يفطر بلا خلاف.
والتمسّك بالآثار أولى من القياس.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মদ ইবনে কা'ব (রহ.) বলেন: আমি রমযান মাসে আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট আসলাম। তখন তিনি সফরের প্রস্তুতি নিচ্ছিলেন। তাঁর সওয়ারির পিঠে জিন বাঁধা হয়েছে এবং তিনি সফরের পোশাক পরিধান করেছেন। তখন তিনি খাবার আনতে বললেন এবং খেলেন। আমি তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম: (এটা কি) সুন্নাত? তিনি বললেন: সুন্নাত। অতঃপর তিনি সওয়ার হলেন।
এই বিষয়ে উবাইদ ইবনে জাবর থেকেও বর্ণিত আছে যে, তিনি বলেন: আমি রমযান মাসে ফুসতাত (মিশর)-এর একটি নৌকাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবী আবূ বাসরাহ আল-গিফারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম। নৌকা চলতে শুরু করার পর তিনি তাঁর সকালের খাবার এগিয়ে আনতে বললেন। (বর্ণনাকারী) জা'ফার তার হাদীসে বলেন: যখন নৌকা বসতবাড়িগুলো অতিক্রম করেনি, তখন তিনি দস্তরখানা চাইলেন এবং বললেন, 'কাছে এসো।' আমি বললাম: আপনি কি বাড়িগুলো দেখছেন না?! আবূ বাসরাহ বললেন: তুমি কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত থেকে বিমুখ হতে চাও? জা'ফার তার হাদীসে বলেন: অতঃপর তিনি খেলেন।
এই বিষয়ে দিহয়া ইবনে খলীফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত আছে যে, তিনি রমযান মাসে দামেস্কের একটি গ্রাম থেকে ফুসতাতের উকবাহ গ্রামের সমপরিমাণ দূরত্বে (যা প্রায় তিন মাইল) একবার বের হলেন। অতঃপর তিনি ইফতার করলেন। তাঁর সাথে থাকা লোকেরাও ইফতার করল, কিন্তু অন্য কিছু লোক ইফতার করা অপছন্দ করল। তিনি যখন তাঁর গ্রামে ফিরে আসলেন, তখন বললেন: আল্লাহর কসম! আমি আজ এমন একটি বিষয় দেখলাম যা আমি দেখতে চাইনি। কিছু লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীদের পথ (সুন্নাত) থেকে মুখ ফিরিয়ে নিয়েছে। — যারা রোযা রেখেছিল তাদের উদ্দেশ্যে তিনি এই কথা বললেন। অতঃপর তিনি বললেন: 'হে আল্লাহ! আমাকে আপনার কাছে তুলে নিন (মৃত্যু দিন)।'
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আবূ মূসা (আশআরী) (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন: আমি কি জানতে পারিনি বা আমাকে কি জানানো হয়নি যে, তুমি রোযা রেখে বের হও এবং রোযা রেখেই প্রবেশ করো? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: যখন তুমি বের হবে, তখন ইফতারকারী হিসেবে বের হও, আর যখন প্রবেশ করবে, তখন ইফতারকারী হিসেবে প্রবেশ করো।
আমর ইবনে শুরাহবীল (রহ.) থেকেও বর্ণিত যে, তিনি রোযা অবস্থায় সফরে যেতেন এবং দিনের বেলায় ইফতার করে ফেলতেন।
(ফিকাহবিদগণের মতে, এই সকল সাহাবীর আমল প্রমাণ করে যে সফর শুরু করার পর রোযা ভঙ্গ করা জায়েয, যদিও সেদিনের সিয়াম শুরু করা হয়ে থাকে।)
4479 - عن أبي سعيد، قال: أتى رسول الله صلى الله عليه وسلم على نهر من السماء، والناس صيام في يوم صائف مشاة، ونبي الله على بغلة له، فقال:"اشربوا أيّها الناس". قال: فأبوا. قال:"إنَّي لست مثلكم إني أيسركم، إني راكب" فأبوا. فثني رسول الله صلى الله عليه وسلم فخذه فنزل فشرب، وشرب الناس، وما كان يريد أن يشرب.
صحيح: رواه الإمام أحمد (11423)، وأبو يعلى (1214) كلاهما من حديث عبد الصمد بن عبد الوارث، حَدَّثَنِي أبيّ، حَدَّثَنَا الجريريّ، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد، فذكره.
والجريري هو سعيد بن أبي إياس اختلط بآخره. وعبد الوارث والد عبد الصمد ممن روى عنه قبل الاختلاط.
وصحّحه ابن خزيمة (1966)، وابن حبَّان (3550، 3556) من أوجه أخرى عن الجريري.
منهم ابن المبارك وهو ممن سمع أيضًا من الجريري قبل الاختلاط.
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম একটি গ্রীষ্মকালীন দিনে এক আসমানি নহরের কাছে এলেন, যখন লোকেরা হেঁটে যাচ্ছিল এবং তারা রোযা অবস্থায় ছিল। আর আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি খচ্চরের উপর সওয়ার ছিলেন। তিনি বললেন, "হে লোকসকল! পান করো।" রাবী বলেন, কিন্তু তারা অস্বীকার করল (পান করতে চাইল না)। তিনি বললেন, "আমি তোমাদের মতো নই। আমি তোমাদের মধ্যে সবচেয়ে আরামদায়ক অবস্থায় আছি, আমি সওয়ারির উপর আছি।" কিন্তু তারা আবারো অস্বীকার করল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর উরু ভাঁজ করে নিচে নেমে আসলেন এবং পান করলেন। তখন লোকেরাও পান করল। অথচ তিনি পান করতে চাননি।
4480 - عن أنس بن مالك، قال: كنّا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في السَّفر، فمنَّا الصَّائم ومنا المفطر، قال: فنزلنا منزلًا في يوم حارٍ، أكثرنا ظلًا صاحب الكساء، ومِنّا من يتّقي الشّمس بيده.
قال: فسقط الصّوام، وقام المفطرون، فضربوا الأبنية وسقوا الرُّكاب، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ذهب المفطرون اليوم بالأجر".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2890)، ومسلم في الصيام (1119) من طريق عاصم الأحول، عن مورِّق العجليّ، عن أنس، فذكره. واللّفظ لمسلم.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা এক সফরে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। আমাদের মধ্যে কেউ ছিল রোযাদার এবং কেউ ছিল রোযা ভঙ্গকারী। বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর আমরা এক গরমের দিনে এক স্থানে অবতরণ করলাম। আমাদের মধ্যে যার চাদর বা কাপড়ের ছায়া সবচেয়ে বেশি ছিল, সে তা ব্যবহার করল, আর আমাদের মধ্যে কেউ কেউ হাত দিয়ে সূর্যকে ঠেকানোর চেষ্টা করছিল। বর্ণনাকারী বলেন: রোযাদাররা দুর্বল হয়ে পড়ল, আর যারা রোযা ভঙ্গকারী ছিল তারা তাঁবু স্থাপন করল এবং আরোহণের পশুদের পানি পান করাল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আজ রোযা ভঙ্গকারীগণই সমস্ত প্রতিদান লাভ করল।"
4481 - عن ابن عباس، قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم من المدينة إلى مكة، فصام حتّى بلغ عُسْفان، ثمّ دعا بماء، فرفعه إلى يديه يُريه الناس، فأفطر حتّى قدم مكة. وذلك في رمضان.
فكان ابن عباس يقول: قد صام رسول الله صلى الله عليه وسلم وأفطر، فمن شاء صام، ومن شاء أفطر.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1948)، ومسلم في الصوم (1113) كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن مجاهد، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনা থেকে মক্কার উদ্দেশ্যে বের হলেন। তিনি সাওম পালন করছিলেন, অবশেষে যখন তিনি উসফান নামক স্থানে পৌঁছালেন, তখন তিনি পানি চাইলেন। অতঃপর তিনি মানুষের সামনে দেখানোর জন্য পানীয়টি নিজ হাতে উপরে তুলে ধরলেন এবং ইফতার করলেন (রোযা ভেঙে ফেললেন)। মক্কায় পৌঁছা পর্যন্ত তিনি আর রোযা রাখেননি। এই ঘটনা ঘটেছিল রমযান মাসে।
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাওম পালনও করেছেন এবং ইফতারও করেছেন। সুতরাং যে ইচ্ছা করে, সে সাওম পালন করুক এবং যে ইচ্ছা করে, সে ইফতার করুক।
4482 - عن جابر بن عبد الله، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج عام الفتح إلى مكة في رمضان، فصام حتّى بلغ كراع الغميم، فصام الناس، ثمّ دعا بقدح من ماء، فرفعه، حتّى نظر الناسُ إليه، ثمّ شرب، فقيل له بعد ذلك: إنّ بعض الناس قد صام؟ فقال:"أولئك العُصاة، أولئك العصاة".
وزاد في رواية:"إنَّ الناس قد شقَّ عليهم الصيام، وإنَّما ينظرون فيما فعلت، فدعا بقدح من ماء بعد العصر".
صحيح: رواه مسلم (1114) من طريق جعفر، عن أبيه، عن جابر، فذكره.
وجعفر هو ابن محمد بن عليّ بن الحسين بن عليّ بن أبي طالب.
وقوله:"أولئك العصاة، أولئك العصاة" قال ابن حبَّان في"صحيحه" (8/ 318):"إنَّما
أطلق عليهم هذه اللفظة بتركهم الأمر الذي أمرهم به، وهو الإفطار، لا أنّهم صاروا عصاة بصومهم في السَّفر".
وقال الشافعي: معنى قوله:"أولئك العصاة" هذا إذا لم يحتمل قلبُه قبول رخصة الله، فأما من رأي الفطر مباحًا وصام وقوي على ذلك، فهو أعجب إليَّ". ذكره الترمذيّ (710).
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের বছর রমযান মাসে মক্কার উদ্দেশ্যে বের হলেন। তিনি সিয়াম পালন করলেন, এমনকি যখন তিনি কুরাউল গামীম নামক স্থানে পৌঁছলেন, তখন লোকেরাও সিয়াম পালন করছিল। এরপর তিনি এক পাত্র পানি আনতে বললেন এবং তা উঁচু করলেন, যাতে লোকেরা তা দেখতে পায়। এরপর তিনি তা পান করলেন। এরপর তাঁকে বলা হলো: কিছু লোক তো (এখনও) সিয়াম পালন করছে? তিনি বললেন: "ওরা অবাধ্য, ওরা অবাধ্য।"
অপর বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: "নিশ্চয়ই মানুষের জন্য সিয়াম পালন কষ্টকর হয়ে পড়েছে এবং তারা কেবল দেখছে যে আমি কী করছি।" এরপর তিনি আসরের পরে এক পাত্র পানি আনতে বললেন (এবং পান করলেন)।
4483 - عن قزعة، قال: أتيت أبا سعيد الخدريّ رضي الله عنه وهو مكثُور عليه، فلمّا تفرَّق النَّاسُ عنه، قلتُ: إنِّي لا أسألك عمّا يسألك هؤلاء عنه. سألته عن الصّوم في السفر؟ فقال: سافرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى مكّة ونحن صيام. قال: فنزلنا منزلًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّكم قد دنوتم من عدوِّكم والفطرُ أقوى لكم". فكانت رخصة فمنّا من صام، ومنّا من أفطر. ثمّ نزلنا منزلا آخر، فقال:"إنَّكم مُصْبِّحُوا عدُوّكم، والفطرُ أقوى لكم، فأفطروا". وكانت عَزْمةً، فأفطرنا. ثمّ قال: رأيتنا نصوم مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ذلك في السَّفر.
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1120) عن محمد بن حاتم، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن مهديّ، عن معاوية بن صالح، عن ربيعة (هو أبن يزيد الدّمشقيّ)، قال: حَدَّثَنِي قزعة، به، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (11307) عن عبد الرحمن بن مهديّ، بإسناده مطوَّلًا.
قوله:"مكثور عليه" أي عنده كثيرون من الناس.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কাযাআহ বলেন: আমি আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলাম। তখন তাঁর কাছে বহু লোক ভিড় করে ছিল। যখন লোকেরা চলে গেল, আমি বললাম: "আমি আপনাকে এমন কিছু জিজ্ঞেস করব না যা এই লোকেরা জিজ্ঞেস করেছে। আমি তাঁকে সফরকালে রোযা রাখা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম।" তিনি বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সঙ্গে মক্কার উদ্দেশ্যে সফরে বের হলাম, তখন আমরা রোযা ছিলাম। তিনি (আবু সাঈদ) বলেন: অতঃপর আমরা এক স্থানে অবতরণ করলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তোমরা তোমাদের শত্রুর নিকটবর্তী হয়ে গেছ, আর ইফতার (রোযা ভঙ্গ করা) তোমাদের জন্য অধিক শক্তিশালী করবে।" এটি ছিল একটি রুখসত (শিথিলতা/অনুমতি)। তাই আমাদের মধ্যে কেউ রোযা রাখল, আবার কেউ রোযা ভেঙ্গে ফেলল। অতঃপর আমরা অন্য এক স্থানে অবতরণ করলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা ভোরে তোমাদের শত্রুর মুখোমুখি হবে, আর ইফতার তোমাদের জন্য অধিক শক্তিশালী করবে। সুতরাং তোমরা ইফতার করো।" এটি ছিল বাধ্যতামূলক নির্দেশ (আযমাহ), তাই আমরা ইফতার করলাম। এরপর তিনি বললেন: আমি দেখেছি, এরপরও আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে সফরে রোযা রেখেছি।
4484 - عن عمر بن الخطّاب، قال: غزونا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضان غزوتين: يوم بدر والفتح، فأفطرنا فيهما.
حسن: رواه الترمذيّ (714) عن قُتَيبة، حَدَّثَنَا ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن معمر بن أبي حُييّة، عن ابن المسيب، أنه سأله عن الصوم في السفر؟ فحدّث أن عمر بن الخطّاب، قال: فذكره. وفيه ابن لهيعة إِلَّا أن رواية قُتَيبة عنه كانت قبل اختلاطه.
ورواه الإمام أحمد (142) عن حسن بن موسى، عن ابن لهيعة، بإسناده، مثله.
ورواه أيضًا (140) عن أبي سعيد -وهو عمرو بن محمد العنقري-، عن ابن لهيعة، حَدَّثَنَا بكير، عن سعيد بن المسيب، عن عمر، فذكره نحوه. وفيه متابعة ليزيد بن أبي حبيب.
وأمّا سماع سعيد بن المسيب عن عمر بن الخطّاب فمختلف فيه، والراجح ما قاله الإمام أحمد:"أنه رآه وسمع منه. إذا لم يقبل سعيد عن عمر فمن يقبل؟ !". انظر: الجرح والتعديل (4/ 6
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে রমযান মাসে দু'টি যুদ্ধে (গাযওয়ায়) অংশগ্রহণ করেছিলাম—বদরের যুদ্ধ এবং (মক্কা) বিজয়ের (ফাতহ) দিন—তখন আমরা উভয়টিতেই রোযা ভঙ্গ করেছিলাম।
4485 - عن أبي هريرة، قال: أُتي النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بطعام بمر الظهران، فقال لأبي بكر وعمر:
"أدنيا فكلا". فقالا: إنا صائمان. فقال:"ارحلوا لصاحبيكم، واعملوا لصاحبيكم".
صحيح: رواه النسائيّ (2264)، والإمام أحمد (8436)، وصحّحه ابن خزيمة (2031)، وابن حبَّان (3557)، والحاكم (1/ 433) كلّهم من طرق عن أبي داود وهو الجفريّ، قال: حَدَّثَنَا سفيان الثوريّ، عن الأوزاعيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين".
قلت: بل هو على شرط مسلم وحده؛ فإنَّ أبا داود الجفري اسمه عمر بن سعد بن عبيد، لم يخرج له البخاريّ. وإسناده صحيح، ولا يُعله من أرسله عن أبي سلمة.
وقوله:"ارحلوا" أي سدُّوا الرحل لهما على البعير.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মাররুজ-জাহরান নামক স্থানে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট খাবার আনা হলো। তিনি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তোমরা দু'জন কাছে এসো এবং খাও।" তাঁরা দু'জন বললেন: "আমরা অবশ্যই সাওম পালনকারী।" তখন তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের এই দুই বন্ধুর জন্য সফরসামগ্রী তৈরি করো এবং তাদের জন্য কাজ করো।"
4486 - عن أنس بن مالك، قال: كنّا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في السَّفر، فمنَّا الصَّائم ومنا المفطر، قال: فنزلنا منزلًا في يوم حارٍ، أكثرنا ظلًا صاحب الكساء، ومِنّا من يتّقي الشّمس بيده.
قال: فسقط الصّوام، وقام المفطرون، فضربوا الأبنية وسقوا الركاب، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ذهب المفطرون اليوم بالأجر".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2890)، ومسلم في الصيام (1119) كلاهما من طريق عاصم الأحول، عن مورِّق العجليّ، عن أنس، فذكره. واللّفظ لمسلم. ولفظ البخاريّ مختصر.
وفي رواية عند مسلم:"فتحزّم المفطرون وعملوا". أي شدّوا أوساطهم وعملوا للصائمين.
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা এক সফরে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। আমাদের মধ্যে কিছু লোক ছিল সিয়াম পালনকারী এবং কিছু লোক ছিল সিয়াম পালনমুক্ত। তিনি বলেন, আমরা এক তীব্র গরমের দিনে এক স্থানে যাত্রা বিরতি করলাম। আমাদের মধ্যে যার কাছে চাদর ছিল, সে অধিক ছায়া পাচ্ছিল। আর কিছু লোক নিজেদেরকে হাত দিয়ে সূর্যতাপ থেকে রক্ষা করছিল।
তিনি বলেন, তখন সিয়াম পালনকারীরা দুর্বল হয়ে পড়ল (বা বসে পড়ল)। আর যারা সিয়াম পালন করেনি, তারা দাঁড়িয়ে তাঁবু স্থাপন করল এবং আরোহণের পশুদের পানি পান করাল।
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আজ সিয়াম পালনমুক্তরাই (যারা সিয়াম পালন করেনি) পূর্ণ সাওয়াব নিয়ে গেল।"
4487 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: كنا نغزو مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضان، فمنا الصّائم، ومنا المفطر. فلا يجد الصائم على المفطر، ولا المفطر على الصائم. يرون أنَّ من وجد قُوة فصام، فإنَّ ذلك حسن، ويرون أن من وجد ضعفًا فأفطر فإنَّ ذلك حسن.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1116: 96) عن عمرو الناقد، حَدَّثَنَا إسماعيل بن إبراهيم، عن الجريريّ، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره.
وقد زعم ابن خزيمة في"صحيحه" (3/ 260): وفي حديث ابن عليّة: كنا نغدو (كذا! وأظنّ الصواب: نغزو) مع رسول الله صلى الله عليه وسلم. ولم يقل: في رمضان".
وهو ليس كما زعم، بل في رواية مسلم صريح أنه في رمضان، وإسماعيل بن إبراهيم هو ابن علية. وكذلك قال يزيد بن زريع، عن الجريريّ. ومن طريقه رواه ابن حبَّان (3558).
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে রমযান মাসে যুদ্ধে যেতাম। তখন আমাদের মধ্যে কেউ রোযাদার থাকত, আবার কেউ রোযা ভঙ্গকারী থাকত। এতে রোযাদার ব্যক্তি রোযা ভঙ্গকারীর উপর কোনো দোষারোপ করত না এবং রোযা ভঙ্গকারীও রোযাদারের উপর কোনো দোষারোপ করত না। তারা মনে করত যে, যে ব্যক্তি শক্তি লাভ করে রোযা রাখে, তবে তা উত্তম; আর তারা মনে করত যে, যে ব্যক্তি দুর্বলতা বোধ করে রোযা ভঙ্গ করে, তবে তা-ও উত্তম।
