আল-জামি` আল-কামিল
4488 - عن جابر بن عبد الله، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في سفر، فرأى زحامًا ورجلًا قد ظُلِّل عليه، فقال:"ما هذا؟". فقالوا: صائم. فقال:"ليس من البرِّ الصومُ في السّفر".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1946)، ومسلم في الصيام (1115) كلاهما من طريق شعبة، حَدَّثَنَا محمد بن عبد الرحمن الأنصاريّ، قال: سمعت محمد بن عمرو بن الحسن بن عليّ، عن جابر بن عبد الله، فذكره.
وزاد مسلم في رواية: قال شعبة: وكان يبلغني عن يحيى بن أبي كثير أنه كان يزيد في هذا الحديث، وفي هذا الإسناد أنه قال:"عليكم برخصة الله الذي رخَّص لكم". قال: فلمّا سألته، لم يحفظه.
وقوله: فلمّا سألته -أي سألت محمد بن عبد الرحمن الأنصاري. وهو شيخ شعبة- فلم يحفظه، ولكن حفظه غيره.
وتفصيل ذلك كما قال ابن القطَّان: إنَّ هذا الحديث يرويه عن جابر رجلان كل منهما اسمه محمد بن عبد الرحمن (وهو ابن زرارة الأنصاريّ، ومحمد بن عبد الرحمن بن ثوبان) ورواه عن كلّ منهما يحيى بن أبي كثير. أحدهما: ابن ثوبان، والآخر ابن سعد بن زرارة.
فابن ثوبان سمعه من جابر، وابن سعد بن زرارة رواه بواسطة محمد بن عمرو بن حسن، وهي رواية الصحيحين. كذا في التلخيص (2/ 205).
والأمر ليس كما قال، فإن ابن زرارة الأنصاري يرويه بالواسطة كما هو واضح من كلامه، وهي التي يرويها الشيخان.
والأنصاري لم يحفظ هذه الزيادة، ولكن حفظها ابن ثوبان، فقد روى النسائيّ (2258) عن شعيب بن شعيب، والطحاوي (3135) من طريق الوليد بن مسلم - كلاهما عن الأوزاعيّ، قال: حَدَّثَنِي يحيى بن أبي كثير، قال: أخبرني محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، قال: أخبرني جابر بن عبد الله، فذكر الحديث. وزاد فيه:"فعليكم برخصة الله التي رخّص لكم فاقبلوها".
والوليد بن مسلم مدلِّس ولكنه توبع، ويحيى بن أبي كثير ثقة رمي بالتدليس إِلَّا أنه صرَّح بالتحديث، فانتفت عنه تهمة التدليس.
وخالفه الفريابيّ، فرواه عن الأوزاعي قال: حَدَّثَنَا يحيى، قال: أخبرني محمد بن عبد الرحمن، قال: حَدَّثَنِي من سمع جابرًا، نحوه.
فأدخل بين محمد بن عبد الرحمن (وهو الأنصاري) وبين جابرٍ رجلًا وهو محمد بن عمرو بن الحسن.
وقوله:"نحوه" يشير إلى نحو حديث يحيى بن أبي كثير، ولكن كل من رواه عنه، عن الأنصاريّ بالواسطة لم يذكر هذه الزيادة.
فقد رواه النسائيّ من طريق عليّ بن المبارك، واختلف عليه:
فروي عثمان بن عمر، عن عليّ بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن، عن رجل، عن جابر، فلم يذكر هذه الزيادة.
ورواه وكيع، عن عليّ بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن جابر، فذكر الزيادة. وهذه الروايات كلها في النسائيّ.
فالذي يظهر أن يحيى كان بروي مرة بالزيادة، وأخرى بدونها، وزيادته مقولة لثقة رواته عنه، وقد صحح هذه الزيادة ابن القطّان وغيره.
إِلَّا أن هذه الزيادة لا يقال: أخرجها مسلم، لأنه أوردها معلّقة بدون إسناد متصل، فهي ليست على شرطه.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার সফরে ছিলেন। তিনি ভিড় দেখলেন এবং একজন লোককে দেখলেন, যার উপর ছায়া দেওয়া হয়েছে। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, "এটা কী?" তারা বলল, "তিনি রোযাদার।" তখন তিনি বললেন, "সফরে রোযা রাখা পুণ্যের কাজ নয়।"
(মুত্তাফাকুন আলাইহি। এটি বুখারী ও মুসলিম বর্ণনা করেছেন।)
4489 - عن جابر بن عبد الله، أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم سافر في رمضان، فاشتدّ الصوم على رجل من أصحابه، فجعلت ناقتُه تهيم به تحت ظلال الشجر. فأُخبر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأمره فأفطر، ثمّ دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بإناء فيه ماء فوضعه على يده، فلمّا رآه الناس شرب شربوا.
حسن: رواه أبو يعلى (1780) وعنه ابن حبَّان (3565) عن عبد الأعلى بن حمّاد، حَدَّثَنَا حمّاد ابن سلمة، عن أبي الزُّبير، عن جابر، فذكره.
ورواه الحاكم (1/ 433) من وجه آخر عن حمّاد بن سلمة، وقال:"صحيح على شرط مسلم".
وإسناده حسن من أجل أبي الزُّبير.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসে সফর করছিলেন। তখন তাঁর একজন সাহাবীর জন্য রোযা রাখা খুব কঠিন হয়ে পড়ায়, তার উটটি গাছের ছায়ার নিচে তাকে নিয়ে ইতস্তত ঘোরাফেরা করতে শুরু করল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ ব্যাপারে জানানো হলে তিনি তাকে রোযা ভাঙতে নির্দেশ দিলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পানিভর্তি একটি পাত্র চাইলেন এবং তা নিজের হাতের উপর রাখলেন। যখন লোকেরা তাঁকে পান করতে দেখল, তখন তারাও পান করল।
4490 - عن كعب بن عاصم الأشعري المخزوميّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس من البرّ الصِّيام في السّفر".
صحيح: رواه النسائيّ (2255)، وابن ماجه (1664)، والإمام أحمد (23679، 23680، 23681)، وابن خزيمة (2016)، والحاكم (1/ 433)، وعبد الرزّاق (4467)، والطحاوي (3137) كلّهم من حديث الزّهريّ، عن صفوان بن عبد الله، عن أمّ الدّرداء، عن كعب بن عاصم، فذكره.
وفي بعض المصادر:"ليس من ام بر ام صيام في سفر".
قال الحافظ ابن حجر في"التلخيص" (2/ 205):"هذه لغة لبعض أهل اليمن يجعلون لام التعريف ميمًا، ويحتمل أن يكون النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خاطب بها هذا الأشعريّ كذلك؛ لأنها لغته، ويحتمل أن يكون الأشعري هذا نطق بها على ما ألف من لغته، فحملها عنه الراوي وأدّاها باللفظ الذي سمعها منه، وهذا الثاني أوجه عندي".
قال الحاكم:"صحيح الإسناد ولم يخرجاه".
কা'ব ইবনু আসিম আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সফরে রোযা রাখা কোনো পুণ্য (বা নেক কাজ) নয়।"
4491 - عن عبد الله بن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس من البرّ الصيام في السفر".
صحيح: رواه ابن ماجه (1665)، وصحّحه ابن حبَّان (3548)، والطحاوي (3136) كلّهم من حديث محمد بن المصفّى الحمصيّ، قال: حَدَّثَنَا محمد بن حرب، عن عبد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وإسناده صحيح. وقد صحَّحه أيضًا البوصيريّ في"الزوائد".
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সফরের অবস্থায় রোযা রাখা পুণ্যের কাজ নয়।"
4492 - عن عبد الله بن عمرو، قال: سار رسول الله صلى الله عليه وسلم فنزل بأصحابه، وإذا ناس قد جعلوا عريشًا على صاحبهم، وهو صائم، فمرَّ به رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: ما شأن صاحبكم؟ أوجع؟". قالوا: لا يا رسول الله، ولكنه صائم. وذلك في يوم حرور. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا برَّ أن يُصام في سفر".
حسن: رواه الطبرانيّ في"الكبير" (جزء 13/ 14) (109) من طريق حييّ، عن أبي عبد الرحمن، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.
وإسناده حسن من أجل حبي وهو ابن عبد الله بن شريح المعافريّ المصريّ، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف؛ لأنَّ الإمام أحمد قال:"في أحاديثه مناكير".
ولذا لم أدخل في هذا"الجامع" من أحاديثه ما انفرد به أو خالف فيه الثّقات.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 161):"رجاله رجال الصَّحيح".
قلت: حيي بن عبد الله ليس من رجال الصَّحيح، وإنما أخرج له أصحاب السنن.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার সফর করছিলেন এবং তাঁর সাহাবীদের সাথে বিশ্রামের জন্য অবতরণ করলেন। তখন তিনি দেখতে পেলেন যে কিছু লোক তাদের এক সাথীর উপর একটি ছাউনি (বা শামিয়ানা/পর্দা) তৈরি করে দিয়েছে, অথচ সে ছিল রোযাদার। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার পাশ দিয়ে অতিক্রম করার সময় বললেন: "তোমাদের সাথীর কী হয়েছে? সে কি অসুস্থ?" তারা বলল: "না, হে আল্লাহর রাসূল, বরং সে রোযাদার।" আর এটি ছিল প্রচণ্ড গরমের দিন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সফরের অবস্থায় রোযা রাখা পুণ্যের কাজ নয়।"
4493 - عن عبد الله بن عباس، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ليس من البر الصيام في السفر".
صحيح: رواه البزّار -كشف الأستار (985) -، والطَّبرانيّ في الكبير (11/ 187) كلاهما من حديث ابن جريج، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 161):"رجال البزّار رجال الصَّحيح".
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সফরের অবস্থায় রোযা রাখা পুণ্যের কাজ নয়।"
4494 - عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الله يحبُّ أن تُؤتي رُخصه كما يحبُّ أن تُؤتي عزائمُه".
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (11/ 323)، والبزّار - كشف الأستار (990)، وأبو نعيم في"الحلية" (8/ 276)، وصحّحه ابن حبَّان (354) كلّهم من حديث الحسين بن محمد بن الزارع، قال: حَدَّثَنَا أبو محصن حصين بن نمُير، قال: حَدَّثَنَا هشام بن حسان، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الحسين بن محمد الزارع فإنه صدوق كما قال أبو حاتم.
وذكره الهيثميّ في"المجمع" (3/ 162) وقال:"رجال البزّار ثقات".
وكان ابن عباس يقول:"الإفطار في السَّفر عزيمة". رواه البزّار -كشف الأستار (986) -.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ ভালোবাসেন যে তাঁর প্রদত্ত ছাড়গুলো গ্রহণ করা হোক, যেমন তিনি ভালোবাসেন যে তাঁর বাধ্যতামূলক বিধানগুলো পালন করা হোক।"
4495 - عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الله يحبُّ أن تؤتي رخصه كما يكره أن تُؤتى معصيتُه".
حسن: رواه الإمام أحمد (5873)، والبزّار - كشف الأستار (988). وصحّحه ابن خزيمة (950)، وابن حبَّان (2742) كلّهم من حديث عمارة بن غزيّة، عن حرب بن قيس، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل حرب بن قيس فإنه حسن الحديث.
وقد سقط في بعض المصادر الحديثية، والصّواب ذكره.
وفي الباب عن عمَّار بن ياسر، قال: أقبلنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم من غزوة، فسرنا في يوم شديد الحرّ، فنزلنا في بعض الطريق، فانطلق رجلٌ منا، فدخل تحت شجرة، فإذا أصحابه يلوذون به، وهو مضطجع كهيئة الوجع، فلمّا رآهم رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما بال صاحبكم؟".
قالوا: صائم. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس من البر أن تصوموا في السفر عليكم بالرخصة التي رخَّص الله فاقبلوها".
رواه الطبرانيّ من حديث ابن لهيعة، حَدَّثَنِي قرة وعقيل، عن ابن شهاب، عن سعيد، عن عمار، فذكره.
هكذا ذكره ابن كثير في جامع المسانيد (6869)، ولم يطبع مسند عمار، ولذا لم أقف على اسم الراوي عن ابن لهيعة، وذكره المنذريّ في"الترغيب والترهيب" (1624) وقال:"إسناده حسن". وتبعه الهيثميّ في المجمع (3/ 161) فقال: رواه الطبرانيّ في الكبير: وإسناده حسن".
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أبي برزة مرفوعًا:"ليس من البر الصيام في السفر". رواه البزّار - كشف الأستار (987) - عن محمد بن معمر، ثنا محمد بن خالد بن عثمة، ثنا إبراهيم بن سعد، ثنا عبد الله بن عامر، عن محمد، عن رجل من آل أبي برزة، عن أبي برزة، فذكره.
وفيه رجل لم يسم، وإليه أشار أيضًا الهيثميّ في"المجمع" (3/ 161)، وعزاه أيضًا لأحمد والطَّبرانيّ في"الكبير". فأما مسند الإمام أحمد فلم أجده فيه.
وأمّا الطبرانيّ فرواه في الأوسط (5593) عن محمد بن عبد الله الحضرميّ، قال: حَدَّثَنَا معمر ابن بكار السُّعْديّ، قال: حَدَّثَنَا إبراهيم بن سعد، عن عبد الله بن عامر الأسلميّ، عن خاله عبد الرحمن بن حرملة، عن محمد بن المنكدر، عن أبي برزة، فذكره.
قال الطبرانيّ: لم يرو هذا الحديث عن عبد الرحمن بن حرملة إِلَّا عبد الله بن عامر، ولا عن عبد الله ابن عامر إِلَّا إبراهيم بن سعد، تفرّد به معمر بن بكار، ولا يرُوي عن أبي برزة إِلَّا بهذا الإسناد.
قلت: معمر بن بكار السُّعدي مختلف فيه، فذكره ابن حبَّان في"الثّقات"، وقال الذّهبيّ في"الميزان" (4/ 153):"صويلح"، ولكن قال العقيلي في"الضعفاء" (1792):"في حديثه وهم،
ولا يتابع على أكثره". ولعلَّ هذا منه، فإنه وقع في الإسناد اضطراب كما ترى.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয় আল্লাহ্ পছন্দ করেন যে, তাঁর দেওয়া সহজ বিধানগুলো (রুখসা) পালন করা হোক, যেমন তিনি অপছন্দ করেন যে তাঁর অবাধ্যতা করা হোক।”
4496 - عن أنس بن مالك القشيري الكعبيّ، أنه أتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالمدينة وهو يتغدّي، فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"هلمَّ إلى الغداء". فقال: إنِّي صائم. فقال له النَّبِيّ:"إنَّ الله عز وجل وضع للمسافر الصوم وشطر الصّلاة، وعن الحبلى والمرضع".
حسن: رواه النسائيّ (2315)، والبيهقي (4/ 231) كلاهما من حديث وهيب، عن عبد الله بن سوادة القشيري، عن أبيه، عن أنس بن مالك رجل منهم (وهو غير خادم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث.
وإسناده حسن، وهيب هو ابن خالد بن عجلان من رجال الشّيخين.
وسوادة والد عبد الله هو ابن الحنظلة القشيري من رجال مسلم. قال عنه أبو حاتم: شيخ.
وخالفه أبو هلال الراسبي، فرواه عن عبد الله بن سوادة، عن أنس بن مالك الكعبي القشيريّ، ولم يذكر فيه"عن أبيه".
ومن هذا الوجه أخرجه أبو داود (2408)، والتِّرمذيّ (715)، وابن ماجة (1667)، وأحمد (19047)، وابن خزيمة (2044)، والبيهقي.
ولفظه: أغارت علينا خيل رسول الله صلى الله عليه وسلم فانتهيت. أو فانطلقت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يأكل، فقال:"ادن فكل". قلت: إني صائم. قال:"اجلس أحدثك عن الصوم أو الصائم" فذكر الحديث.
قال: والله! لقد قالهما رسول الله صلى الله عليه وسلم كلاهما أو أحدهما، فيا لهف نفسيّ، هلّا كنتُ طعمتُ من طعام رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وإسناده حسن فإنَّ أبا هلال هو: محمد بن سليم مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وعبد الله ابن سوادة روى عن أنس، كما رُوي عن أبيه، عن أنس، وكلاهما محفوظ.
وللحديث طرق أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.
وقد رُوي عن أبي أمية، كما قال الترمذيّ إِلَّا أنه لا يصح عنه، وحكم عليه الفسوي في"التاريخ" (2/ 468) بالاضطراب.
ورجَّح أبو حاتم بأنه عن أبي قلابة، عن أنس بن مالك الكعبي. انظر"العلل" (1/ 158).
ويقول في موضع آخر: والصحيح ما يقوله أيوب السختيانيّ، عن أبي قلابة، عن أنس بن مالك القشيري"العلل" (1/ 266).
قال الترمذيّ:"حديث أنس بن مالك الكعبي حديث حسن، ولا نعرف لأنس بن مالك هذا عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم غير هذا الحديث الواحد، والعمل على هذا عند أهل العلم.
وقال بعض أهل العلم: الحامل والمرضع تُفطران وتقضيان. وبه يقول سفيان، ومالك،
والشافعي، وأحمد.
وقال بعضهم: تُفطران وتطعمان ولا قضاء عليهما، وإن شاء تا قضتا ولا إطعام عليهما. وبه يقول إسحاق" انتهى.
وفي المسألة قول آخر وهو: أن عليهما القضاء دون الإطعام، وبه أفتت اللجنة الدائمة للبحوث العلمية والإفتاء (12/ 205). وقد سبق الكلام على هذه المسألة في أول كتاب الصيام.
আনাস ইবনু মালিক আল-কুশাইরী আল-কা'বী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মদীনায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন যখন তিনি দুপুরের খাবার খাচ্ছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "আসো, দুপুরে খাবার খাও।" তিনি বললেন: "আমি তো রোযাদার।" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা'আলা মুসাফিরের জন্য সওম (রোযা) ও অর্ধেক সালাত (নামায), এবং গর্ভবতী ও দুগ্ধদানকারিনী মহিলার উপর থেকে সওম (এর বাধ্যবাধকতা) তুলে নিয়েছেন।"
অন্য একটি বর্ণনায় এর শব্দগুলো হলো: আমাদের উপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অশ্বারোহী বাহিনী আক্রমণ করলো। আমি ছুটে গেলাম বা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম যখন তিনি খাচ্ছিলেন। তিনি বললেন: "কাছে আসো এবং খাও।" আমি বললাম: "আমি রোযাদার।" তিনি বললেন: "বসো, আমি তোমাকে সওম বা রোযাদার সম্পর্কে বলি।" অতঃপর তিনি হাদীসটি বর্ণনা করলেন।
তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উভয়টি বা উভয়ের মধ্যে একটি কথা অবশ্যই বলেছেন। আমার জন্য আফসোস! আমি কেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খাবার থেকে খেলাম না!
4497 - عن أسماء بنت أبي بكر، قالت: أفطرنا على عهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يوم غيم، ثمّ طلعت الشّمس.
قيل لهشام: فأُمروا بالقضاء؟ قال: بدٌّ من قضاء.
وقال معمر: سمعت هشامًا يقول: لا أدري أقضوا أم لا.
صحيح: رواه البخاريّ في الصوم (1959) عن عبد الله بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا أبو أسامة، عن هشام بن عروة، عن فاطمة (هي ابنة المنذر)، عن أسماء بنت أبي بكر، فذكرته.
قول هشام:"بدٌّ من قضاء" هذا اجتهاد منه، بدليل قوله:"لا أدري أقضوا أم لا؟".
ولذا اختلف أهل العلم في وجوب القضاء وعدمه.
وفي أصح الروايتين عن عمر بن الخطّاب أنه قال في مثل ذلك:"من كان أفطر فليصم يومًا مكانه".
لقد أورد الحافظ البيهقيّ في"سننه" (4/ 217) عدة روايات عن عمر تدلّ على وجوب القضاء.
وأمّا ما رُوي عن زيد بن وهب، قال: بينما نحن جلوس في مسجد المدينة في رمضان، والسماء متغيّمة فرأينا أنَّ الشّمس قد غابت، وإنا قد أمسينا، فأخرجت لنا عِساس من لبن من بيت حفصة. فشرب عمر وشربنا. فلم تلبث أن ذهب السحاب، وبدت الشّمس فجعل بعضنا يقول البعض: تقضي يومنا هذا. فسمع ذلك عمر، فقال: والله لا نقضيه وما تجانفنا لإثم.
فهي مخالفة لروايات الثّقات. والعِساس مفرده عسّ، وهو القدح الكبير.
قال البيهقيّ: وكان يعقوب بن سفيان الفارسي يحمل على زيد بن وهب هذه الرواية المخالفة للروايات المتقدمة، وبعدها مما خولف فيه، وزيد ثقة إِلَّا أنَّ الخطأ غير مأمون.
قال الخطّابي في"معالمه": قال أكثر أهل العلم: القضاء واجب عليه. وقال إسحاق بن راهويه وأهل الظاهر: لا قضاء عليه، ويمسك بقية النهار عن الأكل والشرب حتّى تغرب الشّمس.
وقال الحافظ في"الفتح": وجاء ترك القضاء عن مجاهد والحسن، وبه قان إسحاق وأحمد في رواية، واختاره ابن خزيمة".
قلت: وهو الذي رجَّحه أيضًا شيخ الإسلام ابن تيمية وتلميذه الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن" (3/
আসমা বিনত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর যুগে মেঘাচ্ছন্ন দিনে ইফতার করেছিলাম, তারপর সূর্য প্রকাশিত হলো।
হিশামকে জিজ্ঞাসা করা হলো: তাদেরকে কি কাযা করার নির্দেশ দেওয়া হয়েছিল? তিনি বললেন: কাযা করা অপরিহার্য।
মা'মার বলেন: আমি হিশামকে বলতে শুনেছি: তারা কাযা করেছিলেন কিনা—তা আমি জানি না।
সহীহ: এটি বুখারী (আস-সাওম, ১৯৫৯) আব্দুল্লাহ ইবনু আবী শাইবাহ হতে, তিনি আবূ উসামাহ হতে, তিনি হিশাম ইবনু উরওয়াহ হতে, তিনি ফাত্বিমাহ (তিনি ইবনু মুনযির-এর কন্যা) হতে, তিনি আসমা বিনত আবী বকর হতে বর্ণনা করেছেন। অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।
হিশামের উক্তি: "কাযা করা অপরিহার্য" – এটি তার ব্যক্তিগত ইজতিহাদ, কেননা তিনি বলেছেন: "তারা কাযা করেছিলেন কিনা—তা আমি জানি না?"—এটিই তার প্রমাণ।
এ কারণেই আলেমগণ কাযা ওয়াজিব হওয়া বা না হওয়া নিয়ে মতভেদ করেছেন।
উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে দুটি বিশুদ্ধতম রিওয়ায়াতে এসেছে যে, তিনি এরূপ ক্ষেত্রে বলেছেন: "যে ইফতার করেছে, সে যেন তার বদলে একদিন রোযা রাখে।"
হাফিয বায়হাকী তাঁর 'সুনানে' (৪/২১৭) উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে কাযা ওয়াজিব হওয়ার প্রমাণস্বরূপ একাধিক রিওয়ায়াত উদ্ধৃত করেছেন।
আর যাইদ ইবনু ওয়াহাব হতে যা বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: আমরা যখন রমযান মাসে মদীনার মসজিদে বসেছিলাম এবং আকাশ মেঘাচ্ছন্ন ছিল, তখন আমরা দেখলাম যে সূর্য ডুবে গেছে এবং আমরা সন্ধ্যা পার করেছি। তখন হাফসাহর ঘর হতে দুধ ভর্তি 'ইসাস' (বড় পানপাত্র) বের করে আনা হলো। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পান করলেন এবং আমরাও পান করলাম। অল্পক্ষণের মধ্যেই মেঘ সরে গেল এবং সূর্য দেখা গেল। তখন আমাদের মধ্যে কেউ কেউ বলতে শুরু করল: আমরা কি আজকের দিনের কাযা করব? উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা শুনে বললেন: আল্লাহর কসম, আমরা এর কাযা করব না। কারণ, আমরা কোনো পাপের দিকে ঝুঁকে পড়িনি।
তবে এই রিওয়ায়াতটি বিশ্বস্ত বর্ণনাকারীদের রিওয়ায়াতের বিপরীত। আর 'ইসাস' এর একবচন হলো 'আস', যার অর্থ বড় পানপাত্র।
বায়হাকী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ইয়া'কুব ইবনু সুফইয়ান আল-ফারিসী যাইদ ইবনু ওয়াহাবের এই রিওয়ায়াতটির জন্য তাকে সমালোচনা করতেন, যা পূর্ববর্তী ও পরবর্তী রিওয়ায়াতগুলোর বিরোধী। যাইদ যদিও বিশ্বস্ত রাবী, তবে তার ভুল হওয়া অস্বাভাবিক নয়।
খাত্তাবী তাঁর 'মা'আলিমুস সুনান'-এ বলেন: অধিকাংশ আলেম বলেছেন: তার উপর কাযা ওয়াজিব। আর ইসহাক ইবনু রাহওয়াইহ এবং আহলুয যাহির (জাহিরী মতাবলম্বীরা) বলেন: তার উপর কোনো কাযা নেই। তবে সে দিনের বাকি অংশ পানাহার থেকে বিরত থাকবে, যতক্ষণ না সূর্য ডুবে যায়।
হাফিয (ইবনু হাজার) 'আল-ফাতহ'-এ বলেন: কাযা না করার মতটি মুজাহিদ ও হাসান (বসরী) থেকেও বর্ণিত আছে। ইসহাক ও আহমাদও (একটি রিওয়ায়াতে) এই মত দিয়েছেন। আর ইবনু খুযাইমাহও এটিই গ্রহণ করেছেন।
আমি (গ্রন্থকার) বলি: শাইখুল ইসলাম ইবনু তাইমিয়্যাহ এবং তাঁর ছাত্র হাফিয ইবনুল কায়্যিমও 'তাহযীবুস সুনান'-এ (৩/...) এই মতটিকেই প্রাধান্য দিয়েছেন।
4498 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"أليس إذا حاضتْ لم تَصلِّ ولم تصمْ؟ فذلك نقصان دينها".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1951)، ومسلم في الإيمان (80) من وجوه عن سعيد ابن أبي مريم، حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، حَدَّثَنِي زيد (هو ابن أسلم)، عن عياض (هو ابن عبد الله)، عن أبي سعيد الخدريّ، به. واللّفظ للبخاريّ. ومضى مطوَّلًا في كتاب الإيمان.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন সে ঋতুমতী হয়, তখন কি সে সালাত আদায় করে না এবং সাওম পালনও করে না? আর এটাই হলো তার দ্বীনের ঘাটতি।"
4499 - عن ابن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"تمكث الليالي ما تُصلي، وتفطر في رمضان، فهذا نقصان الدين".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (79) عن محمد بن رمح، أخبرنا اللّيث، عن ابن الهاد، عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر، فذكره مطوَّلًا.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা এমন রাত যাপন করো যখন তোমরা সালাত আদায় করো না এবং রমজানে রোযা ছেড়ে দাও। আর এটাই হলো দ্বীনের ঘাটতি।"
4500 - عن معاذة، قالت: سألت عائشة، فقلت: ما بالُ الحائض تقضي الصومَ ولا تقضي الصّلاة؟ فقالت: أحرورية أنتِ؟ قلت: لستُ بحرورية، ولكني أسأل، قالت: يصيبنا ذلك فنؤمر بقضاء الصوم، ولا نؤمر بقضاء الصّلاة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحيض (321)، ومسلم في الحيض (335) من وجوه عن معاذة، قالت (فذكرته) واللّفظ لمسلم.
মু'আযাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, কেন হায়েযগ্রস্ত নারী রোযার কাযা আদায় করে কিন্তু সালাতের কাযা আদায় করে না? তিনি (আয়েশা) বললেন: তুমি কি হারুরিয়াহ (খারেজী) সম্প্রদায়ের লোক? আমি বললাম: আমি হারুরিয়াহ নই, তবে আমি শুধু জিজ্ঞেস করছি। তিনি বললেন: আমাদের এই অবস্থা (হায়েয) হতো, তখন আমাদের রোযার কাযা আদায়ের নির্দেশ দেওয়া হতো, কিন্তু সালাতের কাযা আদায়ের নির্দেশ দেওয়া হতো না।
4501 - عن عائشة، قالت: إن كان ليكون عليَّ الصِّيامُ من رمضان، فما أستطيع أصومُه حتّى يأتي شعبان.
متفق عليه: رواه مالك في الصيام (54) عن يحيى بن سعيد (الأنصاري)، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، أنَّه سمع عائشة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم تقول (فذكرته).
ورواه البخاريّ في الصوم (1950)، ومسلم في الصيام (1146) كلاهما من طريق أحمد بن عبد الله بن يونس، حَدَّثَنَا زهير (هو ابن معاوية)، حَدَّثَنَا يحيى بن سعيد (الأنصاري)، عن أبي سلمة، قال: سمعت عائشة رضي الله عنها تقول:"كان يكون عليَّ الصوم من رمضان، فما أستطيع أن أقضيه إِلَّا في شعبان". قال يحيى: الشغل من النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وبالنبيّ صلى الله عليه وسلم.
ولفظهما سواء إِلَّا أن مسلما لم يميّز قول يحيى وإنما أدرجه في آخر الحديث.
ووقع في رواية عنده مميَّزًا بلفظ:"فظننتُ أنَّ ذلك لمكانها من النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. يحيى يقول ذلك".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার উপর রমযান মাসের (ছেড়ে যাওয়া) রোযা বাকি থাকত, কিন্তু আমি শাবান মাস আসা পর্যন্ত তা কাজা করতে পারতাম না। (বর্ণনাকারী) ইয়াহইয়া (ইবনে সাঈদ আল-আনসারী) বলেন: (এর কারণ ছিল) নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এবং নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নিয়ে ব্যস্ততা।
4502 - عن عائشة، قالت: ما كنتُ أقضي ما يكون عليَّ من رمضان إِلَّا في شعبان. حتّى توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه الترمذيّ (783)، والإمام أحمد (24928)، وابن خزيمة (2050) كلّهم من حديث إسماعيل السدي، عن عبد الله بن البهي، عن عائشة، فذكرته.
قال الترمذي: حسن صحيح.
قلت: فيه إسماعيل السدي وهو ابن عبد الرحمن بن أبي كريمة السُّدي -بضم المهملة وتشديد الدال- مختلف فيه، فوثقه الإمام أحمد والعجلي وابن حبَّان. وقال النسائيّ: صالح.
والخلاصة: أنه حسن الحديث إذا لم تكن مخالفته خلاف المعروف. فزيادته في الحديث:"حتّى توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم" ليس فيها ما يخالف المعروف.
وظاهر الحديث يدل على جواز تراخي قضاء رمضان على أن تنتهي من القضاء قبل مجيء رمضان آخر. كما أن قوله تعالى: {فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَرَ} يدل على أنه لا بأس أن يفرق، وبه قال جمهور أهل العلم.
وأمّا إن دخل عليها رمضان آخر ولم تقضِ، فالواجب عليها أن تصوم رمضان، ثمّ تقضي ما فاتها من رمضان الحاضر، ثمّ تقضي رمضان الماضي.
واختلف أهل العلم هل عليها فدية أم لا؟ فقال ابن عباس، وأبو هريرة، ومالك، والشافعيّ، وأحمد: عليها فدية. مدان عن كل يوم. وعند الشافعي مد. وقال أبو حنيفة، وداود والأخرون: لا فدية عليها، والذي يرجحه الإمام البخاريّ في صحيحه، فقال:"ولم يذكر الله تعالى الإطعام إنّما قال تعالى: {فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَرَ}.
قال الحافظ ابن حجر:"لكن إنّما يقوي ما احتجّ به إذا لم يصح في السنة دليل الطعام، إذ لا يلزم من عدم ذكره في الكتاب أن لا يثبت في السنة. ولم يثبت فيه شيء مرفوع، وإنما جاء فيه عن جماعة من الصّحابة، منهم من ذكر، ومنهم عمر عند عبد الرزّاق. ونقل الطحاويّ عن يحيى بن أكثم قال:"وجدته عن ستة من الصحابة لا أعلم لهم فيه مخالفًا" انتهى كلام الطَّحاويّ.
قال الحافظ: وهو قول الجمهور. وخالف في ذلك إبراهيم النخعي وأبو حنيفة وأصحابه. ومال الطحاويّ إلى قول الجمهور.
وممن قال بالإطعام ابن عمر، لكنه بالغ في ذلك، فقال:"يُطعم ولا يصوم".
قلت: مثله قال سعيد بن جبير، وقتادة: يُطعم ولا يقضي.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার ওপর রমযানের যে কাযা (রোযা) বাকি থাকত, তা আমি শাবান মাস ছাড়া অন্য কোনো মাসে কাযা করতে পারতাম না, যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেন।
4503 - عن عائشة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من مات وعليه صيام، صام عنه وليُّه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1952)، ومسلم في الصيام (1147) من طريق عمرو بن الحارث، عن عبد الله بن أبي جعفر، أنَّ محمد بن جعفر بن الزُّبير حدَّثه، عن عروة، عن عائشة، فذكرته. ومن هذا الطريق رواه أيضًا أبو داود (2400) وقال: هذا في النذر، وهو قول أحمد بن حنبل" اهـ.
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "যে ব্যক্তি মারা গেল, অথচ তার উপর রোযা (পালন করা) আবশ্যক ছিল, তার পক্ষ থেকে তার অভিভাবক যেন রোযা পালন করে।"
4504 - عن وعن ابن عباس، قال: جاء رجلٌ إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، إنَّ أُمِّي ماتتْ وعليها صومُ شهر، أفأقضيه عنها؟ فقال:"لو كان على أمِّك دَيْن أكنتَ قاضيه عنها؟" قال: نعم. قال:"فدَيْن الله أحقُّ أن يُقضي". قال سليمان: فقال الحكم، وسلمة بن كهيل جميعًا -ونحن جلوسٌ حين حدَّث مسلمٌ بهذا الحديث- فقالا: سمعنا مجاهدًا يذكرُ هذا عن ابن عباس.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1953)، ومسلم (1148: 155) كلاهما من طريق زائدة، عن سليمان الأعمش، عن مسلم البطين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره. ولفظهما سواء.
وفي رواية لمسلم:"أنَّ أمرأة أتتْ رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: إنَّ أُمِّي ماتتْ وعليها صوم شهر" الحديث.
وهي معلقة عند البخاريّ بلفظ:"قالت امرأة للنبيّ صلى الله عليه وسلم: إنَّ أمّي ماتت".
وفي رواية معلقة للبخاريّ أيضًا بلفظ:"قالت امرأة للنبيّ صلى الله عليه وسلم إنَّ أُختي ماتتْ".
وفي رواية له معلقة أيضًا:"قالت امرأة للنبيّ صلى الله عليه وسلم: ماتتْ أمّي وعليها صوم خمسة عشر يومًا".
وفي رواية لمسلم:"جاءت امرأة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله، إنَّ أمي ماتت وعليها صوم نذر" الحديث.
وهي معلقة عند البخاريّ باختصار.
قوله: قال سليمان (هو الأعمش): فقال الحكم (هو ابن عتية).
وقول سليمان الأعمش هذا موصول بالإسناد السابق إليه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, 'হে আল্লাহর রাসূল! আমার মা মারা গেছেন, আর তার উপর এক মাসের সাওম (রোযা) কাযা করা বাকি ছিল। আমি কি তা তার পক্ষ থেকে কাযা করব?' তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, 'যদি তোমার মায়ের উপর কোনো ঋণ থাকত, তবে কি তুমি তা তার পক্ষ থেকে পরিশোধ করতে?' সে বলল, 'হ্যাঁ।' তিনি বললেন, 'সুতরাং আল্লাহর ঋণ পরিশোধের অধিক হকদার।'
4505 - عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه، قال: بينا أنا جالسٌ عند رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ أتته امرأةٌ. فقالت: إني تصدّقت على أمّي بجاريةٍ، وإنَّها ماتتْ. قال: فقال:"وجب أجْرُك. وردَّها عليكِ الميراث". قالت: يا رسول الله، إنه كان عليها صوم شهر. أفأصومُ عنها؟ قال:"صومي عنها". قالت: إنَّها لم تحجَّ قطّ، أفأحجُّ عنها؟ قال:
"حُجِّي عنها".
وفي رواية:"صوم شهرين".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1149) من طريق عبد الله بن عطاء، عن عبد الله بن بريدة، به.
وفي رواية من طريق عبد الله بن عطاء المكيّ، عن سليمان بن بريدة، عن أبيه، مثله. وقال:"صومُ شهر".
قلت: وظاهر الحديث يدل على أنَّ الميت بصوم عنه وليُّه سواء كان الصّوم من رمضان أو من نذر؛ لأنَّ ذمّة الميت مشغولة به، ولأنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قاسه على الدَّيْن، والدَّين يُقضى عن الميت لبراءة ذمّته. وهو قول أهل الحديث كما قال الحافظ ابن حجر في الفتح (4/ 193).
قال الترمذيّ:"اختلف أهل العلم في هذا الباب، فقال بعضهم: يصام عن الميت. وبه قال أحمد وإسحاق قالا: إذا كان على الميت نذر صيام، يصوم عنه. وإذا كان عليه قضاء رمضان أُطعم عنه. وقال مالك، وسفيان، والشافعي: لا يصومُ أحدٌ عن أحد". انتهى.
قلت: وأمّا الشافعي فعلَّق الحكم في القديم على صحة الحديث كما نقله البيهقيّ في"المعرفة" (6/ 309)، وقال في"الخلافيات":"هذه المسألة ثابتة، لا أعلم خلافًا بين أهل الحديث في صحتها. فوجب العمل به. ونقل عن الشافعي أنه قال: كل ما قلتُ، وصحَّ عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خلافه، فخذوا بالحديث ولا تقلِّدوني".
وذهب أبو حنيفة ومالك إلى أنه لا يصام عن الميت قياسا على الصّلاة.
والمختار فيه ما قاله أحمد: يصام نذر صيام لأنه ليس له بديل بخلاف صيام رمضان فإن له بديلًا وهو الإطعام وهو قول ابن عباس كما ذكره أبو داود (2401)، وإنْ صام الأوّلياء عن الميت فلا حرج عليهم لعموم الحديث، ولهم أن يصوموا كيف شاؤوا مجتمعين أو متفرقين بأن يصوم ثلاثون رجلًا يومًا واحدًا، أو يصوم واحدٌ ثلاثين يومان وكذا أن يُقسِّمَ ثلاثة نفر كل واحد منهم عشرة أيام، فكلها صحيحة.
وأمّا ما رُوي عن ابن عمر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من مات وعليه صوم شهر فليطعم عنه مكان كلّ يوم مسكينًا" فهو ضعيف.
رواه الترمذيّ (718)، وابن ماجه (1757)، وابن خزيمة (2056) كلّهم من طريق أشعث، عن محمد بن أبي ليلى، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ومحمد في هذا الإسناد جاء من ثلاثة أوجه، جاء غير منسوب عند الترمذيّ، فقال: هو عندي ابن عبد الرحمن بن أبي ليلى. وجاء عند ابن ماجة منسوبًا إلى ابن سيرين. وقد نبَّه على ذلك المزّي وغيره.
وجاء منسوبًا إلى عبد الرحمن بن أبي ليلى عند ابن خزيمة وهو صحيح.
وإسناده ضعيف من أجل محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى فإنه سيء الحفظ.
وفيه أيضًا الراوي عنه وهو أشعث بن سوار، وهو ضعيف أيضًا.
وقال ابن خزيمة: فإنَّ في القلب من أشعث بن سوار رحمه الله لسوء حفظه".
وقال الترمذيّ:"حديث ابن عمر لا نعرفه مرفوعًا إِلَّا من هذا الوجه، والصحيح عن ابن عمر موقوف قوله".
বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে বসে ছিলাম, তখন তাঁর কাছে এক মহিলা আগমন করলেন। তিনি বললেন: আমি আমার মায়ের ওপর একটি দাসী সদকা করেছিলাম, কিন্তু তিনি (আমার মা) মারা গেছেন।
তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমার সওয়াব নিশ্চিত হয়ে গেছে। আর মীরাসের মাধ্যমে দাসীটি তোমার কাছে ফিরে এসেছে।
তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার মায়ের এক মাসের রোযা বাকি ছিল। আমি কি তাঁর পক্ষ থেকে রোযা রাখব?
তিনি বললেন: তুমি তাঁর পক্ষ থেকে রোযা রাখো।
তিনি বললেন: তিনি কখনও হজ্জ করেননি। আমি কি তাঁর পক্ষ থেকে হজ্জ করব?
তিনি বললেন: তাঁর পক্ষ থেকে হজ্জ করো।
অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "দুই মাসের রোযা"।
4506 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قال الله: كلُّ عمل ابن آدم له إِلَّا الصّيام، فإنّه لي وأنا أجزي به، والصيام جُنَّة، وإذا كان يوم صوم أحدكم فلا يرفث ولا يصْخب، فإن سابَّه أحدٌ أو قاتله فليقلْ: إنِّي امرؤ صائم. والذي نفسُ محمد بيده! لَخُلُوف فم الصّائم أطيب عند الله من ريح المسك. للصّائم فرحتان يفْرَحُهُما: إذا أفطر فرح، وإذا لقي ربَّه فرح بصومه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1904)، ومسلم في الصيام (1151: 163) كلاهما من طريق ابن جريج، أخبرني عطاء (هو ابن أبي رباح)، عن أبي صالح الزّيات، أنه سمع أبا هريرة رضي الله عنه يقول (فذكره)، واللّفظ للبخاريّ، ، لفظ مسلم قريب منه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা বলেছেন: আদম সন্তানের প্রতিটি কাজ তার নিজের জন্য, তবে সিয়াম (রোযা) ব্যতীত। কেননা, সিয়াম আমার জন্য এবং আমি নিজেই এর প্রতিদান দেবো। আর সিয়াম হলো ঢালস্বরূপ। যখন তোমাদের কারো সিয়ামের দিন আসে, তখন সে যেন অশ্লীল কথা না বলে এবং হৈ-হুল্লোড় না করে। যদি কেউ তাকে গালি দেয় বা তার সাথে ঝগড়া করে, তবে সে যেন বলে, 'আমি একজন সিয়াম পালনকারী।' যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, তাঁর শপথ! সিয়াম পালনকারীর মুখের গন্ধ আল্লাহর কাছে মিশকের সুগন্ধির চেয়েও অধিক প্রিয়। সিয়াম পালনকারীর জন্য দুটি আনন্দ রয়েছে, যা দ্বারা সে আনন্দিত হয়: যখন সে ইফতার করে, তখন সে আনন্দিত হয়; আর যখন সে তার রবের সাথে সাক্ষাৎ করবে, তখন তার সিয়ামের কারণে সে আনন্দিত হবে।"
4507 - عن وعن أبي هريرة، أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الصيام جُنّة، فإذا كان أحدكم صائمًا فلا يرفث ولا يجهل. فإن امرؤ قاتله أو شاتمه فليقل: إنِّي صائم، إنِّي صائم".
متفق عليه: رواه مالك في الصيام (59) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه البخاريّ في الصوم (1891) من طريق مالك، ومسلم (1151) من وجه آخر عن سفيان ابن عيينة، عن أبي الزّناد، به، مثله.
وقوله:"فليقل إني صائم" أي نطقا وجهرًا ولا يخوض معه حتّى لا يحبط أجر صومه، ولا يحتاج إلى التأويل الذي ذكره الخطّابي وغيره - أن يقول ذلك في نفسه- أي ليعلم أنه صائم.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "রোযা হলো ঢাল স্বরূপ। যখন তোমাদের কেউ রোযা রাখে, সে যেন অশ্লীল কথা না বলে এবং মূর্খের মতো কাজ না করে। যদি কোনো ব্যক্তি তার সাথে লড়াই করতে আসে বা গালমন্দ করে, তবে সে যেন বলে: 'আমি রোযাদার, আমি রোযাদার'।"
