আল-জামি` আল-কামিল
4481 - عن ابن عباس، قال: خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم من المدينة إلى مكة، فصام حتّى بلغ عُسْفان، ثمّ دعا بماء، فرفعه إلى يديه يُريه الناس، فأفطر حتّى قدم مكة. وذلك في رمضان.
فكان ابن عباس يقول: قد صام رسول الله صلى الله عليه وسلم وأفطر، فمن شاء صام، ومن شاء أفطر.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1948)، ومسلم في الصوم (1113) كلاهما من حديث جرير، عن منصور، عن مجاهد، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনা থেকে মক্কার উদ্দেশ্যে বের হলেন। তিনি সাওম পালন করছিলেন, অবশেষে যখন তিনি উসফান নামক স্থানে পৌঁছালেন, তখন তিনি পানি চাইলেন। অতঃপর তিনি মানুষের সামনে দেখানোর জন্য পানীয়টি নিজ হাতে উপরে তুলে ধরলেন এবং ইফতার করলেন (রোযা ভেঙে ফেললেন)। মক্কায় পৌঁছা পর্যন্ত তিনি আর রোযা রাখেননি। এই ঘটনা ঘটেছিল রমযান মাসে।
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সাওম পালনও করেছেন এবং ইফতারও করেছেন। সুতরাং যে ইচ্ছা করে, সে সাওম পালন করুক এবং যে ইচ্ছা করে, সে ইফতার করুক।
4482 - عن جابر بن عبد الله، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج عام الفتح إلى مكة في رمضان، فصام حتّى بلغ كراع الغميم، فصام الناس، ثمّ دعا بقدح من ماء، فرفعه، حتّى نظر الناسُ إليه، ثمّ شرب، فقيل له بعد ذلك: إنّ بعض الناس قد صام؟ فقال:"أولئك العُصاة، أولئك العصاة".
وزاد في رواية:"إنَّ الناس قد شقَّ عليهم الصيام، وإنَّما ينظرون فيما فعلت، فدعا بقدح من ماء بعد العصر".
صحيح: رواه مسلم (1114) من طريق جعفر، عن أبيه، عن جابر، فذكره.
وجعفر هو ابن محمد بن عليّ بن الحسين بن عليّ بن أبي طالب.
وقوله:"أولئك العصاة، أولئك العصاة" قال ابن حبَّان في"صحيحه" (8/ 318):"إنَّما
أطلق عليهم هذه اللفظة بتركهم الأمر الذي أمرهم به، وهو الإفطار، لا أنّهم صاروا عصاة بصومهم في السَّفر".
وقال الشافعي: معنى قوله:"أولئك العصاة" هذا إذا لم يحتمل قلبُه قبول رخصة الله، فأما من رأي الفطر مباحًا وصام وقوي على ذلك، فهو أعجب إليَّ". ذكره الترمذيّ (710).
জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মক্কা বিজয়ের বছর রমযান মাসে মক্কার উদ্দেশ্যে বের হলেন। তিনি সিয়াম পালন করলেন, এমনকি যখন তিনি কুরাউল গামীম নামক স্থানে পৌঁছলেন, তখন লোকেরাও সিয়াম পালন করছিল। এরপর তিনি এক পাত্র পানি আনতে বললেন এবং তা উঁচু করলেন, যাতে লোকেরা তা দেখতে পায়। এরপর তিনি তা পান করলেন। এরপর তাঁকে বলা হলো: কিছু লোক তো (এখনও) সিয়াম পালন করছে? তিনি বললেন: "ওরা অবাধ্য, ওরা অবাধ্য।"
অপর বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: "নিশ্চয়ই মানুষের জন্য সিয়াম পালন কষ্টকর হয়ে পড়েছে এবং তারা কেবল দেখছে যে আমি কী করছি।" এরপর তিনি আসরের পরে এক পাত্র পানি আনতে বললেন (এবং পান করলেন)।
4483 - عن قزعة، قال: أتيت أبا سعيد الخدريّ رضي الله عنه وهو مكثُور عليه، فلمّا تفرَّق النَّاسُ عنه، قلتُ: إنِّي لا أسألك عمّا يسألك هؤلاء عنه. سألته عن الصّوم في السفر؟ فقال: سافرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى مكّة ونحن صيام. قال: فنزلنا منزلًا، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّكم قد دنوتم من عدوِّكم والفطرُ أقوى لكم". فكانت رخصة فمنّا من صام، ومنّا من أفطر. ثمّ نزلنا منزلا آخر، فقال:"إنَّكم مُصْبِّحُوا عدُوّكم، والفطرُ أقوى لكم، فأفطروا". وكانت عَزْمةً، فأفطرنا. ثمّ قال: رأيتنا نصوم مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد ذلك في السَّفر.
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1120) عن محمد بن حاتم، حَدَّثَنَا عبد الرحمن بن مهديّ، عن معاوية بن صالح، عن ربيعة (هو أبن يزيد الدّمشقيّ)، قال: حَدَّثَنِي قزعة، به، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (11307) عن عبد الرحمن بن مهديّ، بإسناده مطوَّلًا.
قوله:"مكثور عليه" أي عنده كثيرون من الناس.
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, কাযাআহ বলেন: আমি আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এলাম। তখন তাঁর কাছে বহু লোক ভিড় করে ছিল। যখন লোকেরা চলে গেল, আমি বললাম: "আমি আপনাকে এমন কিছু জিজ্ঞেস করব না যা এই লোকেরা জিজ্ঞেস করেছে। আমি তাঁকে সফরকালে রোযা রাখা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম।" তিনি বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সঙ্গে মক্কার উদ্দেশ্যে সফরে বের হলাম, তখন আমরা রোযা ছিলাম। তিনি (আবু সাঈদ) বলেন: অতঃপর আমরা এক স্থানে অবতরণ করলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "তোমরা তোমাদের শত্রুর নিকটবর্তী হয়ে গেছ, আর ইফতার (রোযা ভঙ্গ করা) তোমাদের জন্য অধিক শক্তিশালী করবে।" এটি ছিল একটি রুখসত (শিথিলতা/অনুমতি)। তাই আমাদের মধ্যে কেউ রোযা রাখল, আবার কেউ রোযা ভেঙ্গে ফেলল। অতঃপর আমরা অন্য এক স্থানে অবতরণ করলাম। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তোমরা ভোরে তোমাদের শত্রুর মুখোমুখি হবে, আর ইফতার তোমাদের জন্য অধিক শক্তিশালী করবে। সুতরাং তোমরা ইফতার করো।" এটি ছিল বাধ্যতামূলক নির্দেশ (আযমাহ), তাই আমরা ইফতার করলাম। এরপর তিনি বললেন: আমি দেখেছি, এরপরও আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে সফরে রোযা রেখেছি।
4484 - عن عمر بن الخطّاب، قال: غزونا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضان غزوتين: يوم بدر والفتح، فأفطرنا فيهما.
حسن: رواه الترمذيّ (714) عن قُتَيبة، حَدَّثَنَا ابن لهيعة، عن يزيد بن أبي حبيب، عن معمر بن أبي حُييّة، عن ابن المسيب، أنه سأله عن الصوم في السفر؟ فحدّث أن عمر بن الخطّاب، قال: فذكره. وفيه ابن لهيعة إِلَّا أن رواية قُتَيبة عنه كانت قبل اختلاطه.
ورواه الإمام أحمد (142) عن حسن بن موسى، عن ابن لهيعة، بإسناده، مثله.
ورواه أيضًا (140) عن أبي سعيد -وهو عمرو بن محمد العنقري-، عن ابن لهيعة، حَدَّثَنَا بكير، عن سعيد بن المسيب، عن عمر، فذكره نحوه. وفيه متابعة ليزيد بن أبي حبيب.
وأمّا سماع سعيد بن المسيب عن عمر بن الخطّاب فمختلف فيه، والراجح ما قاله الإمام أحمد:"أنه رآه وسمع منه. إذا لم يقبل سعيد عن عمر فمن يقبل؟ !". انظر: الجرح والتعديل (4/ 6
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে রমযান মাসে দু'টি যুদ্ধে (গাযওয়ায়) অংশগ্রহণ করেছিলাম—বদরের যুদ্ধ এবং (মক্কা) বিজয়ের (ফাতহ) দিন—তখন আমরা উভয়টিতেই রোযা ভঙ্গ করেছিলাম।
4485 - عن أبي هريرة، قال: أُتي النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بطعام بمر الظهران، فقال لأبي بكر وعمر:
"أدنيا فكلا". فقالا: إنا صائمان. فقال:"ارحلوا لصاحبيكم، واعملوا لصاحبيكم".
صحيح: رواه النسائيّ (2264)، والإمام أحمد (8436)، وصحّحه ابن خزيمة (2031)، وابن حبَّان (3557)، والحاكم (1/ 433) كلّهم من طرق عن أبي داود وهو الجفريّ، قال: حَدَّثَنَا سفيان الثوريّ، عن الأوزاعيّ، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين".
قلت: بل هو على شرط مسلم وحده؛ فإنَّ أبا داود الجفري اسمه عمر بن سعد بن عبيد، لم يخرج له البخاريّ. وإسناده صحيح، ولا يُعله من أرسله عن أبي سلمة.
وقوله:"ارحلوا" أي سدُّوا الرحل لهما على البعير.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মাররুজ-জাহরান নামক স্থানে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট খাবার আনা হলো। তিনি আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: "তোমরা দু'জন কাছে এসো এবং খাও।" তাঁরা দু'জন বললেন: "আমরা অবশ্যই সাওম পালনকারী।" তখন তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের এই দুই বন্ধুর জন্য সফরসামগ্রী তৈরি করো এবং তাদের জন্য কাজ করো।"
4486 - عن أنس بن مالك، قال: كنّا مع النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم في السَّفر، فمنَّا الصَّائم ومنا المفطر، قال: فنزلنا منزلًا في يوم حارٍ، أكثرنا ظلًا صاحب الكساء، ومِنّا من يتّقي الشّمس بيده.
قال: فسقط الصّوام، وقام المفطرون، فضربوا الأبنية وسقوا الركاب، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ذهب المفطرون اليوم بالأجر".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجهاد والسير (2890)، ومسلم في الصيام (1119) كلاهما من طريق عاصم الأحول، عن مورِّق العجليّ، عن أنس، فذكره. واللّفظ لمسلم. ولفظ البخاريّ مختصر.
وفي رواية عند مسلم:"فتحزّم المفطرون وعملوا". أي شدّوا أوساطهم وعملوا للصائمين.
আনাস বিন মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা এক সফরে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলাম। আমাদের মধ্যে কিছু লোক ছিল সিয়াম পালনকারী এবং কিছু লোক ছিল সিয়াম পালনমুক্ত। তিনি বলেন, আমরা এক তীব্র গরমের দিনে এক স্থানে যাত্রা বিরতি করলাম। আমাদের মধ্যে যার কাছে চাদর ছিল, সে অধিক ছায়া পাচ্ছিল। আর কিছু লোক নিজেদেরকে হাত দিয়ে সূর্যতাপ থেকে রক্ষা করছিল।
তিনি বলেন, তখন সিয়াম পালনকারীরা দুর্বল হয়ে পড়ল (বা বসে পড়ল)। আর যারা সিয়াম পালন করেনি, তারা দাঁড়িয়ে তাঁবু স্থাপন করল এবং আরোহণের পশুদের পানি পান করাল।
তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আজ সিয়াম পালনমুক্তরাই (যারা সিয়াম পালন করেনি) পূর্ণ সাওয়াব নিয়ে গেল।"
4487 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: كنا نغزو مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضان، فمنا الصّائم، ومنا المفطر. فلا يجد الصائم على المفطر، ولا المفطر على الصائم. يرون أنَّ من وجد قُوة فصام، فإنَّ ذلك حسن، ويرون أن من وجد ضعفًا فأفطر فإنَّ ذلك حسن.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1116: 96) عن عمرو الناقد، حَدَّثَنَا إسماعيل بن إبراهيم، عن الجريريّ، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره.
وقد زعم ابن خزيمة في"صحيحه" (3/ 260): وفي حديث ابن عليّة: كنا نغدو (كذا! وأظنّ الصواب: نغزو) مع رسول الله صلى الله عليه وسلم. ولم يقل: في رمضان".
وهو ليس كما زعم، بل في رواية مسلم صريح أنه في رمضان، وإسماعيل بن إبراهيم هو ابن علية. وكذلك قال يزيد بن زريع، عن الجريريّ. ومن طريقه رواه ابن حبَّان (3558).
আবু সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে রমযান মাসে যুদ্ধে যেতাম। তখন আমাদের মধ্যে কেউ রোযাদার থাকত, আবার কেউ রোযা ভঙ্গকারী থাকত। এতে রোযাদার ব্যক্তি রোযা ভঙ্গকারীর উপর কোনো দোষারোপ করত না এবং রোযা ভঙ্গকারীও রোযাদারের উপর কোনো দোষারোপ করত না। তারা মনে করত যে, যে ব্যক্তি শক্তি লাভ করে রোযা রাখে, তবে তা উত্তম; আর তারা মনে করত যে, যে ব্যক্তি দুর্বলতা বোধ করে রোযা ভঙ্গ করে, তবে তা-ও উত্তম।
4488 - عن جابر بن عبد الله، قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في سفر، فرأى زحامًا ورجلًا قد ظُلِّل عليه، فقال:"ما هذا؟". فقالوا: صائم. فقال:"ليس من البرِّ الصومُ في السّفر".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1946)، ومسلم في الصيام (1115) كلاهما من طريق شعبة، حَدَّثَنَا محمد بن عبد الرحمن الأنصاريّ، قال: سمعت محمد بن عمرو بن الحسن بن عليّ، عن جابر بن عبد الله، فذكره.
وزاد مسلم في رواية: قال شعبة: وكان يبلغني عن يحيى بن أبي كثير أنه كان يزيد في هذا الحديث، وفي هذا الإسناد أنه قال:"عليكم برخصة الله الذي رخَّص لكم". قال: فلمّا سألته، لم يحفظه.
وقوله: فلمّا سألته -أي سألت محمد بن عبد الرحمن الأنصاري. وهو شيخ شعبة- فلم يحفظه، ولكن حفظه غيره.
وتفصيل ذلك كما قال ابن القطَّان: إنَّ هذا الحديث يرويه عن جابر رجلان كل منهما اسمه محمد بن عبد الرحمن (وهو ابن زرارة الأنصاريّ، ومحمد بن عبد الرحمن بن ثوبان) ورواه عن كلّ منهما يحيى بن أبي كثير. أحدهما: ابن ثوبان، والآخر ابن سعد بن زرارة.
فابن ثوبان سمعه من جابر، وابن سعد بن زرارة رواه بواسطة محمد بن عمرو بن حسن، وهي رواية الصحيحين. كذا في التلخيص (2/ 205).
والأمر ليس كما قال، فإن ابن زرارة الأنصاري يرويه بالواسطة كما هو واضح من كلامه، وهي التي يرويها الشيخان.
والأنصاري لم يحفظ هذه الزيادة، ولكن حفظها ابن ثوبان، فقد روى النسائيّ (2258) عن شعيب بن شعيب، والطحاوي (3135) من طريق الوليد بن مسلم - كلاهما عن الأوزاعيّ، قال: حَدَّثَنِي يحيى بن أبي كثير، قال: أخبرني محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، قال: أخبرني جابر بن عبد الله، فذكر الحديث. وزاد فيه:"فعليكم برخصة الله التي رخّص لكم فاقبلوها".
والوليد بن مسلم مدلِّس ولكنه توبع، ويحيى بن أبي كثير ثقة رمي بالتدليس إِلَّا أنه صرَّح بالتحديث، فانتفت عنه تهمة التدليس.
وخالفه الفريابيّ، فرواه عن الأوزاعي قال: حَدَّثَنَا يحيى، قال: أخبرني محمد بن عبد الرحمن، قال: حَدَّثَنِي من سمع جابرًا، نحوه.
فأدخل بين محمد بن عبد الرحمن (وهو الأنصاري) وبين جابرٍ رجلًا وهو محمد بن عمرو بن الحسن.
وقوله:"نحوه" يشير إلى نحو حديث يحيى بن أبي كثير، ولكن كل من رواه عنه، عن الأنصاريّ بالواسطة لم يذكر هذه الزيادة.
فقد رواه النسائيّ من طريق عليّ بن المبارك، واختلف عليه:
فروي عثمان بن عمر، عن عليّ بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن، عن رجل، عن جابر، فلم يذكر هذه الزيادة.
ورواه وكيع، عن عليّ بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير، عن محمد بن عبد الرحمن بن ثوبان، عن جابر، فذكر الزيادة. وهذه الروايات كلها في النسائيّ.
فالذي يظهر أن يحيى كان بروي مرة بالزيادة، وأخرى بدونها، وزيادته مقولة لثقة رواته عنه، وقد صحح هذه الزيادة ابن القطّان وغيره.
إِلَّا أن هذه الزيادة لا يقال: أخرجها مسلم، لأنه أوردها معلّقة بدون إسناد متصل، فهي ليست على شرطه.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার সফরে ছিলেন। তিনি ভিড় দেখলেন এবং একজন লোককে দেখলেন, যার উপর ছায়া দেওয়া হয়েছে। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন, "এটা কী?" তারা বলল, "তিনি রোযাদার।" তখন তিনি বললেন, "সফরে রোযা রাখা পুণ্যের কাজ নয়।"
(মুত্তাফাকুন আলাইহি। এটি বুখারী ও মুসলিম বর্ণনা করেছেন।)
4489 - عن جابر بن عبد الله، أن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم سافر في رمضان، فاشتدّ الصوم على رجل من أصحابه، فجعلت ناقتُه تهيم به تحت ظلال الشجر. فأُخبر النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم فأمره فأفطر، ثمّ دعا رسول الله صلى الله عليه وسلم بإناء فيه ماء فوضعه على يده، فلمّا رآه الناس شرب شربوا.
حسن: رواه أبو يعلى (1780) وعنه ابن حبَّان (3565) عن عبد الأعلى بن حمّاد، حَدَّثَنَا حمّاد ابن سلمة، عن أبي الزُّبير، عن جابر، فذكره.
ورواه الحاكم (1/ 433) من وجه آخر عن حمّاد بن سلمة، وقال:"صحيح على شرط مسلم".
وإسناده حسن من أجل أبي الزُّبير.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসে সফর করছিলেন। তখন তাঁর একজন সাহাবীর জন্য রোযা রাখা খুব কঠিন হয়ে পড়ায়, তার উটটি গাছের ছায়ার নিচে তাকে নিয়ে ইতস্তত ঘোরাফেরা করতে শুরু করল। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এ ব্যাপারে জানানো হলে তিনি তাকে রোযা ভাঙতে নির্দেশ দিলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পানিভর্তি একটি পাত্র চাইলেন এবং তা নিজের হাতের উপর রাখলেন। যখন লোকেরা তাঁকে পান করতে দেখল, তখন তারাও পান করল।
4490 - عن كعب بن عاصم الأشعري المخزوميّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس من البرّ الصِّيام في السّفر".
صحيح: رواه النسائيّ (2255)، وابن ماجه (1664)، والإمام أحمد (23679، 23680، 23681)، وابن خزيمة (2016)، والحاكم (1/ 433)، وعبد الرزّاق (4467)، والطحاوي (3137) كلّهم من حديث الزّهريّ، عن صفوان بن عبد الله، عن أمّ الدّرداء، عن كعب بن عاصم، فذكره.
وفي بعض المصادر:"ليس من ام بر ام صيام في سفر".
قال الحافظ ابن حجر في"التلخيص" (2/ 205):"هذه لغة لبعض أهل اليمن يجعلون لام التعريف ميمًا، ويحتمل أن يكون النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خاطب بها هذا الأشعريّ كذلك؛ لأنها لغته، ويحتمل أن يكون الأشعري هذا نطق بها على ما ألف من لغته، فحملها عنه الراوي وأدّاها باللفظ الذي سمعها منه، وهذا الثاني أوجه عندي".
قال الحاكم:"صحيح الإسناد ولم يخرجاه".
কা'ব ইবনু আসিম আল-আশ'আরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সফরে রোযা রাখা কোনো পুণ্য (বা নেক কাজ) নয়।"
4491 - عن عبد الله بن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس من البرّ الصيام في السفر".
صحيح: رواه ابن ماجه (1665)، وصحّحه ابن حبَّان (3548)، والطحاوي (3136) كلّهم من حديث محمد بن المصفّى الحمصيّ، قال: حَدَّثَنَا محمد بن حرب، عن عبد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وإسناده صحيح. وقد صحَّحه أيضًا البوصيريّ في"الزوائد".
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সফরের অবস্থায় রোযা রাখা পুণ্যের কাজ নয়।"
4492 - عن عبد الله بن عمرو، قال: سار رسول الله صلى الله عليه وسلم فنزل بأصحابه، وإذا ناس قد جعلوا عريشًا على صاحبهم، وهو صائم، فمرَّ به رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: ما شأن صاحبكم؟ أوجع؟". قالوا: لا يا رسول الله، ولكنه صائم. وذلك في يوم حرور. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا برَّ أن يُصام في سفر".
حسن: رواه الطبرانيّ في"الكبير" (جزء 13/ 14) (109) من طريق حييّ، عن أبي عبد الرحمن، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.
وإسناده حسن من أجل حبي وهو ابن عبد الله بن شريح المعافريّ المصريّ، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف؛ لأنَّ الإمام أحمد قال:"في أحاديثه مناكير".
ولذا لم أدخل في هذا"الجامع" من أحاديثه ما انفرد به أو خالف فيه الثّقات.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 161):"رجاله رجال الصَّحيح".
قلت: حيي بن عبد الله ليس من رجال الصَّحيح، وإنما أخرج له أصحاب السنن.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একবার সফর করছিলেন এবং তাঁর সাহাবীদের সাথে বিশ্রামের জন্য অবতরণ করলেন। তখন তিনি দেখতে পেলেন যে কিছু লোক তাদের এক সাথীর উপর একটি ছাউনি (বা শামিয়ানা/পর্দা) তৈরি করে দিয়েছে, অথচ সে ছিল রোযাদার। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার পাশ দিয়ে অতিক্রম করার সময় বললেন: "তোমাদের সাথীর কী হয়েছে? সে কি অসুস্থ?" তারা বলল: "না, হে আল্লাহর রাসূল, বরং সে রোযাদার।" আর এটি ছিল প্রচণ্ড গরমের দিন। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সফরের অবস্থায় রোযা রাখা পুণ্যের কাজ নয়।"
4493 - عن عبد الله بن عباس، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ليس من البر الصيام في السفر".
صحيح: رواه البزّار -كشف الأستار (985) -، والطَّبرانيّ في الكبير (11/ 187) كلاهما من حديث ابن جريج، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.
وقال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 161):"رجال البزّار رجال الصَّحيح".
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "সফরের অবস্থায় রোযা রাখা পুণ্যের কাজ নয়।"
4494 - عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الله يحبُّ أن تُؤتي رُخصه كما يحبُّ أن تُؤتي عزائمُه".
حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (11/ 323)، والبزّار - كشف الأستار (990)، وأبو نعيم في"الحلية" (8/ 276)، وصحّحه ابن حبَّان (354) كلّهم من حديث الحسين بن محمد بن الزارع، قال: حَدَّثَنَا أبو محصن حصين بن نمُير، قال: حَدَّثَنَا هشام بن حسان، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الحسين بن محمد الزارع فإنه صدوق كما قال أبو حاتم.
وذكره الهيثميّ في"المجمع" (3/ 162) وقال:"رجال البزّار ثقات".
وكان ابن عباس يقول:"الإفطار في السَّفر عزيمة". رواه البزّار -كشف الأستار (986) -.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ ভালোবাসেন যে তাঁর প্রদত্ত ছাড়গুলো গ্রহণ করা হোক, যেমন তিনি ভালোবাসেন যে তাঁর বাধ্যতামূলক বিধানগুলো পালন করা হোক।"
4495 - عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنَّ الله يحبُّ أن تؤتي رخصه كما يكره أن تُؤتى معصيتُه".
حسن: رواه الإمام أحمد (5873)، والبزّار - كشف الأستار (988). وصحّحه ابن خزيمة (950)، وابن حبَّان (2742) كلّهم من حديث عمارة بن غزيّة، عن حرب بن قيس، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل حرب بن قيس فإنه حسن الحديث.
وقد سقط في بعض المصادر الحديثية، والصّواب ذكره.
وفي الباب عن عمَّار بن ياسر، قال: أقبلنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم من غزوة، فسرنا في يوم شديد الحرّ، فنزلنا في بعض الطريق، فانطلق رجلٌ منا، فدخل تحت شجرة، فإذا أصحابه يلوذون به، وهو مضطجع كهيئة الوجع، فلمّا رآهم رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما بال صاحبكم؟".
قالوا: صائم. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس من البر أن تصوموا في السفر عليكم بالرخصة التي رخَّص الله فاقبلوها".
رواه الطبرانيّ من حديث ابن لهيعة، حَدَّثَنِي قرة وعقيل، عن ابن شهاب، عن سعيد، عن عمار، فذكره.
هكذا ذكره ابن كثير في جامع المسانيد (6869)، ولم يطبع مسند عمار، ولذا لم أقف على اسم الراوي عن ابن لهيعة، وذكره المنذريّ في"الترغيب والترهيب" (1624) وقال:"إسناده حسن". وتبعه الهيثميّ في المجمع (3/ 161) فقال: رواه الطبرانيّ في الكبير: وإسناده حسن".
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أبي برزة مرفوعًا:"ليس من البر الصيام في السفر". رواه البزّار - كشف الأستار (987) - عن محمد بن معمر، ثنا محمد بن خالد بن عثمة، ثنا إبراهيم بن سعد، ثنا عبد الله بن عامر، عن محمد، عن رجل من آل أبي برزة، عن أبي برزة، فذكره.
وفيه رجل لم يسم، وإليه أشار أيضًا الهيثميّ في"المجمع" (3/ 161)، وعزاه أيضًا لأحمد والطَّبرانيّ في"الكبير". فأما مسند الإمام أحمد فلم أجده فيه.
وأمّا الطبرانيّ فرواه في الأوسط (5593) عن محمد بن عبد الله الحضرميّ، قال: حَدَّثَنَا معمر ابن بكار السُّعْديّ، قال: حَدَّثَنَا إبراهيم بن سعد، عن عبد الله بن عامر الأسلميّ، عن خاله عبد الرحمن بن حرملة، عن محمد بن المنكدر، عن أبي برزة، فذكره.
قال الطبرانيّ: لم يرو هذا الحديث عن عبد الرحمن بن حرملة إِلَّا عبد الله بن عامر، ولا عن عبد الله ابن عامر إِلَّا إبراهيم بن سعد، تفرّد به معمر بن بكار، ولا يرُوي عن أبي برزة إِلَّا بهذا الإسناد.
قلت: معمر بن بكار السُّعدي مختلف فيه، فذكره ابن حبَّان في"الثّقات"، وقال الذّهبيّ في"الميزان" (4/ 153):"صويلح"، ولكن قال العقيلي في"الضعفاء" (1792):"في حديثه وهم،
ولا يتابع على أكثره". ولعلَّ هذا منه، فإنه وقع في الإسناد اضطراب كما ترى.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “নিশ্চয় আল্লাহ্ পছন্দ করেন যে, তাঁর দেওয়া সহজ বিধানগুলো (রুখসা) পালন করা হোক, যেমন তিনি অপছন্দ করেন যে তাঁর অবাধ্যতা করা হোক।”
4496 - عن أنس بن مالك القشيري الكعبيّ، أنه أتى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم بالمدينة وهو يتغدّي، فقال له النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم:"هلمَّ إلى الغداء". فقال: إنِّي صائم. فقال له النَّبِيّ:"إنَّ الله عز وجل وضع للمسافر الصوم وشطر الصّلاة، وعن الحبلى والمرضع".
حسن: رواه النسائيّ (2315)، والبيهقي (4/ 231) كلاهما من حديث وهيب، عن عبد الله بن سوادة القشيري، عن أبيه، عن أنس بن مالك رجل منهم (وهو غير خادم النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فذكر الحديث.
وإسناده حسن، وهيب هو ابن خالد بن عجلان من رجال الشّيخين.
وسوادة والد عبد الله هو ابن الحنظلة القشيري من رجال مسلم. قال عنه أبو حاتم: شيخ.
وخالفه أبو هلال الراسبي، فرواه عن عبد الله بن سوادة، عن أنس بن مالك الكعبي القشيريّ، ولم يذكر فيه"عن أبيه".
ومن هذا الوجه أخرجه أبو داود (2408)، والتِّرمذيّ (715)، وابن ماجة (1667)، وأحمد (19047)، وابن خزيمة (2044)، والبيهقي.
ولفظه: أغارت علينا خيل رسول الله صلى الله عليه وسلم فانتهيت. أو فانطلقت إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يأكل، فقال:"ادن فكل". قلت: إني صائم. قال:"اجلس أحدثك عن الصوم أو الصائم" فذكر الحديث.
قال: والله! لقد قالهما رسول الله صلى الله عليه وسلم كلاهما أو أحدهما، فيا لهف نفسيّ، هلّا كنتُ طعمتُ من طعام رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وإسناده حسن فإنَّ أبا هلال هو: محمد بن سليم مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وعبد الله ابن سوادة روى عن أنس، كما رُوي عن أبيه، عن أنس، وكلاهما محفوظ.
وللحديث طرق أخرى غير أن ما ذكرته هو أصحها.
وقد رُوي عن أبي أمية، كما قال الترمذيّ إِلَّا أنه لا يصح عنه، وحكم عليه الفسوي في"التاريخ" (2/ 468) بالاضطراب.
ورجَّح أبو حاتم بأنه عن أبي قلابة، عن أنس بن مالك الكعبي. انظر"العلل" (1/ 158).
ويقول في موضع آخر: والصحيح ما يقوله أيوب السختيانيّ، عن أبي قلابة، عن أنس بن مالك القشيري"العلل" (1/ 266).
قال الترمذيّ:"حديث أنس بن مالك الكعبي حديث حسن، ولا نعرف لأنس بن مالك هذا عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم غير هذا الحديث الواحد، والعمل على هذا عند أهل العلم.
وقال بعض أهل العلم: الحامل والمرضع تُفطران وتقضيان. وبه يقول سفيان، ومالك،
والشافعي، وأحمد.
وقال بعضهم: تُفطران وتطعمان ولا قضاء عليهما، وإن شاء تا قضتا ولا إطعام عليهما. وبه يقول إسحاق" انتهى.
وفي المسألة قول آخر وهو: أن عليهما القضاء دون الإطعام، وبه أفتت اللجنة الدائمة للبحوث العلمية والإفتاء (12/ 205). وقد سبق الكلام على هذه المسألة في أول كتاب الصيام.
আনাস ইবনু মালিক আল-কুশাইরী আল-কা'বী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মদীনায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন যখন তিনি দুপুরের খাবার খাচ্ছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "আসো, দুপুরে খাবার খাও।" তিনি বললেন: "আমি তো রোযাদার।" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তা'আলা মুসাফিরের জন্য সওম (রোযা) ও অর্ধেক সালাত (নামায), এবং গর্ভবতী ও দুগ্ধদানকারিনী মহিলার উপর থেকে সওম (এর বাধ্যবাধকতা) তুলে নিয়েছেন।"
অন্য একটি বর্ণনায় এর শব্দগুলো হলো: আমাদের উপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর অশ্বারোহী বাহিনী আক্রমণ করলো। আমি ছুটে গেলাম বা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম যখন তিনি খাচ্ছিলেন। তিনি বললেন: "কাছে আসো এবং খাও।" আমি বললাম: "আমি রোযাদার।" তিনি বললেন: "বসো, আমি তোমাকে সওম বা রোযাদার সম্পর্কে বলি।" অতঃপর তিনি হাদীসটি বর্ণনা করলেন।
তিনি বললেন: আল্লাহর কসম! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উভয়টি বা উভয়ের মধ্যে একটি কথা অবশ্যই বলেছেন। আমার জন্য আফসোস! আমি কেন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর খাবার থেকে খেলাম না!
4497 - عن أسماء بنت أبي بكر، قالت: أفطرنا على عهد النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يوم غيم، ثمّ طلعت الشّمس.
قيل لهشام: فأُمروا بالقضاء؟ قال: بدٌّ من قضاء.
وقال معمر: سمعت هشامًا يقول: لا أدري أقضوا أم لا.
صحيح: رواه البخاريّ في الصوم (1959) عن عبد الله بن أبي شيبة، حَدَّثَنَا أبو أسامة، عن هشام بن عروة، عن فاطمة (هي ابنة المنذر)، عن أسماء بنت أبي بكر، فذكرته.
قول هشام:"بدٌّ من قضاء" هذا اجتهاد منه، بدليل قوله:"لا أدري أقضوا أم لا؟".
ولذا اختلف أهل العلم في وجوب القضاء وعدمه.
وفي أصح الروايتين عن عمر بن الخطّاب أنه قال في مثل ذلك:"من كان أفطر فليصم يومًا مكانه".
لقد أورد الحافظ البيهقيّ في"سننه" (4/ 217) عدة روايات عن عمر تدلّ على وجوب القضاء.
وأمّا ما رُوي عن زيد بن وهب، قال: بينما نحن جلوس في مسجد المدينة في رمضان، والسماء متغيّمة فرأينا أنَّ الشّمس قد غابت، وإنا قد أمسينا، فأخرجت لنا عِساس من لبن من بيت حفصة. فشرب عمر وشربنا. فلم تلبث أن ذهب السحاب، وبدت الشّمس فجعل بعضنا يقول البعض: تقضي يومنا هذا. فسمع ذلك عمر، فقال: والله لا نقضيه وما تجانفنا لإثم.
فهي مخالفة لروايات الثّقات. والعِساس مفرده عسّ، وهو القدح الكبير.
قال البيهقيّ: وكان يعقوب بن سفيان الفارسي يحمل على زيد بن وهب هذه الرواية المخالفة للروايات المتقدمة، وبعدها مما خولف فيه، وزيد ثقة إِلَّا أنَّ الخطأ غير مأمون.
قال الخطّابي في"معالمه": قال أكثر أهل العلم: القضاء واجب عليه. وقال إسحاق بن راهويه وأهل الظاهر: لا قضاء عليه، ويمسك بقية النهار عن الأكل والشرب حتّى تغرب الشّمس.
وقال الحافظ في"الفتح": وجاء ترك القضاء عن مجاهد والحسن، وبه قان إسحاق وأحمد في رواية، واختاره ابن خزيمة".
قلت: وهو الذي رجَّحه أيضًا شيخ الإسلام ابن تيمية وتلميذه الحافظ ابن القيم في"تهذيب السنن" (3/
আসমা বিনত আবী বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর যুগে মেঘাচ্ছন্ন দিনে ইফতার করেছিলাম, তারপর সূর্য প্রকাশিত হলো।
হিশামকে জিজ্ঞাসা করা হলো: তাদেরকে কি কাযা করার নির্দেশ দেওয়া হয়েছিল? তিনি বললেন: কাযা করা অপরিহার্য।
মা'মার বলেন: আমি হিশামকে বলতে শুনেছি: তারা কাযা করেছিলেন কিনা—তা আমি জানি না।
সহীহ: এটি বুখারী (আস-সাওম, ১৯৫৯) আব্দুল্লাহ ইবনু আবী শাইবাহ হতে, তিনি আবূ উসামাহ হতে, তিনি হিশাম ইবনু উরওয়াহ হতে, তিনি ফাত্বিমাহ (তিনি ইবনু মুনযির-এর কন্যা) হতে, তিনি আসমা বিনত আবী বকর হতে বর্ণনা করেছেন। অতঃপর তিনি হাদীসটি উল্লেখ করেছেন।
হিশামের উক্তি: "কাযা করা অপরিহার্য" – এটি তার ব্যক্তিগত ইজতিহাদ, কেননা তিনি বলেছেন: "তারা কাযা করেছিলেন কিনা—তা আমি জানি না?"—এটিই তার প্রমাণ।
এ কারণেই আলেমগণ কাযা ওয়াজিব হওয়া বা না হওয়া নিয়ে মতভেদ করেছেন।
উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে দুটি বিশুদ্ধতম রিওয়ায়াতে এসেছে যে, তিনি এরূপ ক্ষেত্রে বলেছেন: "যে ইফতার করেছে, সে যেন তার বদলে একদিন রোযা রাখে।"
হাফিয বায়হাকী তাঁর 'সুনানে' (৪/২১৭) উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে কাযা ওয়াজিব হওয়ার প্রমাণস্বরূপ একাধিক রিওয়ায়াত উদ্ধৃত করেছেন।
আর যাইদ ইবনু ওয়াহাব হতে যা বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: আমরা যখন রমযান মাসে মদীনার মসজিদে বসেছিলাম এবং আকাশ মেঘাচ্ছন্ন ছিল, তখন আমরা দেখলাম যে সূর্য ডুবে গেছে এবং আমরা সন্ধ্যা পার করেছি। তখন হাফসাহর ঘর হতে দুধ ভর্তি 'ইসাস' (বড় পানপাত্র) বের করে আনা হলো। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পান করলেন এবং আমরাও পান করলাম। অল্পক্ষণের মধ্যেই মেঘ সরে গেল এবং সূর্য দেখা গেল। তখন আমাদের মধ্যে কেউ কেউ বলতে শুরু করল: আমরা কি আজকের দিনের কাযা করব? উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তা শুনে বললেন: আল্লাহর কসম, আমরা এর কাযা করব না। কারণ, আমরা কোনো পাপের দিকে ঝুঁকে পড়িনি।
তবে এই রিওয়ায়াতটি বিশ্বস্ত বর্ণনাকারীদের রিওয়ায়াতের বিপরীত। আর 'ইসাস' এর একবচন হলো 'আস', যার অর্থ বড় পানপাত্র।
বায়হাকী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: ইয়া'কুব ইবনু সুফইয়ান আল-ফারিসী যাইদ ইবনু ওয়াহাবের এই রিওয়ায়াতটির জন্য তাকে সমালোচনা করতেন, যা পূর্ববর্তী ও পরবর্তী রিওয়ায়াতগুলোর বিরোধী। যাইদ যদিও বিশ্বস্ত রাবী, তবে তার ভুল হওয়া অস্বাভাবিক নয়।
খাত্তাবী তাঁর 'মা'আলিমুস সুনান'-এ বলেন: অধিকাংশ আলেম বলেছেন: তার উপর কাযা ওয়াজিব। আর ইসহাক ইবনু রাহওয়াইহ এবং আহলুয যাহির (জাহিরী মতাবলম্বীরা) বলেন: তার উপর কোনো কাযা নেই। তবে সে দিনের বাকি অংশ পানাহার থেকে বিরত থাকবে, যতক্ষণ না সূর্য ডুবে যায়।
হাফিয (ইবনু হাজার) 'আল-ফাতহ'-এ বলেন: কাযা না করার মতটি মুজাহিদ ও হাসান (বসরী) থেকেও বর্ণিত আছে। ইসহাক ও আহমাদও (একটি রিওয়ায়াতে) এই মত দিয়েছেন। আর ইবনু খুযাইমাহও এটিই গ্রহণ করেছেন।
আমি (গ্রন্থকার) বলি: শাইখুল ইসলাম ইবনু তাইমিয়্যাহ এবং তাঁর ছাত্র হাফিয ইবনুল কায়্যিমও 'তাহযীবুস সুনান'-এ (৩/...) এই মতটিকেই প্রাধান্য দিয়েছেন।
4498 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: قال النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"أليس إذا حاضتْ لم تَصلِّ ولم تصمْ؟ فذلك نقصان دينها".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1951)، ومسلم في الإيمان (80) من وجوه عن سعيد ابن أبي مريم، حَدَّثَنَا محمد بن جعفر، حَدَّثَنِي زيد (هو ابن أسلم)، عن عياض (هو ابن عبد الله)، عن أبي سعيد الخدريّ، به. واللّفظ للبخاريّ. ومضى مطوَّلًا في كتاب الإيمان.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন সে ঋতুমতী হয়, তখন কি সে সালাত আদায় করে না এবং সাওম পালনও করে না? আর এটাই হলো তার দ্বীনের ঘাটতি।"
4499 - عن ابن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه قال:"تمكث الليالي ما تُصلي، وتفطر في رمضان، فهذا نقصان الدين".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (79) عن محمد بن رمح، أخبرنا اللّيث، عن ابن الهاد، عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر، فذكره مطوَّلًا.
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা এমন রাত যাপন করো যখন তোমরা সালাত আদায় করো না এবং রমজানে রোযা ছেড়ে দাও। আর এটাই হলো দ্বীনের ঘাটতি।"
4500 - عن معاذة، قالت: سألت عائشة، فقلت: ما بالُ الحائض تقضي الصومَ ولا تقضي الصّلاة؟ فقالت: أحرورية أنتِ؟ قلت: لستُ بحرورية، ولكني أسأل، قالت: يصيبنا ذلك فنؤمر بقضاء الصوم، ولا نؤمر بقضاء الصّلاة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحيض (321)، ومسلم في الحيض (335) من وجوه عن معاذة، قالت (فذكرته) واللّفظ لمسلم.
মু'আযাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম, কেন হায়েযগ্রস্ত নারী রোযার কাযা আদায় করে কিন্তু সালাতের কাযা আদায় করে না? তিনি (আয়েশা) বললেন: তুমি কি হারুরিয়াহ (খারেজী) সম্প্রদায়ের লোক? আমি বললাম: আমি হারুরিয়াহ নই, তবে আমি শুধু জিজ্ঞেস করছি। তিনি বললেন: আমাদের এই অবস্থা (হায়েয) হতো, তখন আমাদের রোযার কাযা আদায়ের নির্দেশ দেওয়া হতো, কিন্তু সালাতের কাযা আদায়ের নির্দেশ দেওয়া হতো না।