হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4501)


4501 - عن عائشة، قالت: إن كان ليكون عليَّ الصِّيامُ من رمضان، فما أستطيع أصومُه حتّى يأتي شعبان.

متفق عليه: رواه مالك في الصيام (54) عن يحيى بن سعيد (الأنصاري)، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، أنَّه سمع عائشة زوج النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم تقول (فذكرته).

ورواه البخاريّ في الصوم (1950)، ومسلم في الصيام (1146) كلاهما من طريق أحمد بن عبد الله بن يونس، حَدَّثَنَا زهير (هو ابن معاوية)، حَدَّثَنَا يحيى بن سعيد (الأنصاري)، عن أبي سلمة، قال: سمعت عائشة رضي الله عنها تقول:"كان يكون عليَّ الصوم من رمضان، فما أستطيع أن أقضيه إِلَّا في شعبان". قال يحيى: الشغل من النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، وبالنبيّ صلى الله عليه وسلم.
ولفظهما سواء إِلَّا أن مسلما لم يميّز قول يحيى وإنما أدرجه في آخر الحديث.

ووقع في رواية عنده مميَّزًا بلفظ:"فظننتُ أنَّ ذلك لمكانها من النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم. يحيى يقول ذلك".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার উপর রমযান মাসের (ছেড়ে যাওয়া) রোযা বাকি থাকত, কিন্তু আমি শাবান মাস আসা পর্যন্ত তা কাজা করতে পারতাম না। (বর্ণনাকারী) ইয়াহইয়া (ইবনে সাঈদ আল-আনসারী) বলেন: (এর কারণ ছিল) নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে এবং নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নিয়ে ব্যস্ততা।









আল-জামি` আল-কামিল (4502)


4502 - عن عائشة، قالت: ما كنتُ أقضي ما يكون عليَّ من رمضان إِلَّا في شعبان. حتّى توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم.

حسن: رواه الترمذيّ (783)، والإمام أحمد (24928)، وابن خزيمة (2050) كلّهم من حديث إسماعيل السدي، عن عبد الله بن البهي، عن عائشة، فذكرته.

قال الترمذي: حسن صحيح.

قلت: فيه إسماعيل السدي وهو ابن عبد الرحمن بن أبي كريمة السُّدي -بضم المهملة وتشديد الدال- مختلف فيه، فوثقه الإمام أحمد والعجلي وابن حبَّان. وقال النسائيّ: صالح.

والخلاصة: أنه حسن الحديث إذا لم تكن مخالفته خلاف المعروف. فزيادته في الحديث:"حتّى توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم" ليس فيها ما يخالف المعروف.

وظاهر الحديث يدل على جواز تراخي قضاء رمضان على أن تنتهي من القضاء قبل مجيء رمضان آخر. كما أن قوله تعالى: {فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَرَ} يدل على أنه لا بأس أن يفرق، وبه قال جمهور أهل العلم.

وأمّا إن دخل عليها رمضان آخر ولم تقضِ، فالواجب عليها أن تصوم رمضان، ثمّ تقضي ما فاتها من رمضان الحاضر، ثمّ تقضي رمضان الماضي.

واختلف أهل العلم هل عليها فدية أم لا؟ فقال ابن عباس، وأبو هريرة، ومالك، والشافعيّ، وأحمد: عليها فدية. مدان عن كل يوم. وعند الشافعي مد. وقال أبو حنيفة، وداود والأخرون: لا فدية عليها، والذي يرجحه الإمام البخاريّ في صحيحه، فقال:"ولم يذكر الله تعالى الإطعام إنّما قال تعالى: {فَعِدَّةٌ مِنْ أَيَّامٍ أُخَرَ}.

قال الحافظ ابن حجر:"لكن إنّما يقوي ما احتجّ به إذا لم يصح في السنة دليل الطعام، إذ لا يلزم من عدم ذكره في الكتاب أن لا يثبت في السنة. ولم يثبت فيه شيء مرفوع، وإنما جاء فيه عن جماعة من الصّحابة، منهم من ذكر، ومنهم عمر عند عبد الرزّاق. ونقل الطحاويّ عن يحيى بن أكثم قال:"وجدته عن ستة من الصحابة لا أعلم لهم فيه مخالفًا" انتهى كلام الطَّحاويّ.

قال الحافظ: وهو قول الجمهور. وخالف في ذلك إبراهيم النخعي وأبو حنيفة وأصحابه. ومال الطحاويّ إلى قول الجمهور.

وممن قال بالإطعام ابن عمر، لكنه بالغ في ذلك، فقال:"يُطعم ولا يصوم".

قلت: مثله قال سعيد بن جبير، وقتادة: يُطعم ولا يقضي.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার ওপর রমযানের যে কাযা (রোযা) বাকি থাকত, তা আমি শাবান মাস ছাড়া অন্য কোনো মাসে কাযা করতে পারতাম না, যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4503)


4503 - عن عائشة، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من مات وعليه صيام، صام عنه وليُّه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1952)، ومسلم في الصيام (1147) من طريق عمرو بن الحارث، عن عبد الله بن أبي جعفر، أنَّ محمد بن جعفر بن الزُّبير حدَّثه، عن عروة، عن عائشة، فذكرته. ومن هذا الطريق رواه أيضًا أبو داود (2400) وقال: هذا في النذر، وهو قول أحمد بن حنبل" اهـ.




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন, "যে ব্যক্তি মারা গেল, অথচ তার উপর রোযা (পালন করা) আবশ্যক ছিল, তার পক্ষ থেকে তার অভিভাবক যেন রোযা পালন করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4504)


4504 - عن وعن ابن عباس، قال: جاء رجلٌ إلى النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، إنَّ أُمِّي ماتتْ وعليها صومُ شهر، أفأقضيه عنها؟ فقال:"لو كان على أمِّك دَيْن أكنتَ قاضيه عنها؟" قال: نعم. قال:"فدَيْن الله أحقُّ أن يُقضي". قال سليمان: فقال الحكم، وسلمة بن كهيل جميعًا -ونحن جلوسٌ حين حدَّث مسلمٌ بهذا الحديث- فقالا: سمعنا مجاهدًا يذكرُ هذا عن ابن عباس.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1953)، ومسلم (1148: 155) كلاهما من طريق زائدة، عن سليمان الأعمش، عن مسلم البطين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره. ولفظهما سواء.

وفي رواية لمسلم:"أنَّ أمرأة أتتْ رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: إنَّ أُمِّي ماتتْ وعليها صوم شهر" الحديث.

وهي معلقة عند البخاريّ بلفظ:"قالت امرأة للنبيّ صلى الله عليه وسلم: إنَّ أمّي ماتت".

وفي رواية معلقة للبخاريّ أيضًا بلفظ:"قالت امرأة للنبيّ صلى الله عليه وسلم إنَّ أُختي ماتتْ".

وفي رواية له معلقة أيضًا:"قالت امرأة للنبيّ صلى الله عليه وسلم: ماتتْ أمّي وعليها صوم خمسة عشر يومًا".

وفي رواية لمسلم:"جاءت امرأة إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله، إنَّ أمي ماتت وعليها صوم نذر" الحديث.

وهي معلقة عند البخاريّ باختصار.

قوله: قال سليمان (هو الأعمش): فقال الحكم (هو ابن عتية).

وقول سليمان الأعمش هذا موصول بالإسناد السابق إليه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, 'হে আল্লাহর রাসূল! আমার মা মারা গেছেন, আর তার উপর এক মাসের সাওম (রোযা) কাযা করা বাকি ছিল। আমি কি তা তার পক্ষ থেকে কাযা করব?' তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, 'যদি তোমার মায়ের উপর কোনো ঋণ থাকত, তবে কি তুমি তা তার পক্ষ থেকে পরিশোধ করতে?' সে বলল, 'হ্যাঁ।' তিনি বললেন, 'সুতরাং আল্লাহর ঋণ পরিশোধের অধিক হকদার।'









আল-জামি` আল-কামিল (4505)


4505 - عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه، قال: بينا أنا جالسٌ عند رسول الله صلى الله عليه وسلم إذ أتته امرأةٌ. فقالت: إني تصدّقت على أمّي بجاريةٍ، وإنَّها ماتتْ. قال: فقال:"وجب أجْرُك. وردَّها عليكِ الميراث". قالت: يا رسول الله، إنه كان عليها صوم شهر. أفأصومُ عنها؟ قال:"صومي عنها". قالت: إنَّها لم تحجَّ قطّ، أفأحجُّ عنها؟ قال:
"حُجِّي عنها".

وفي رواية:"صوم شهرين".

صحيح: رواه مسلم في الصيام (1149) من طريق عبد الله بن عطاء، عن عبد الله بن بريدة، به.

وفي رواية من طريق عبد الله بن عطاء المكيّ، عن سليمان بن بريدة، عن أبيه، مثله. وقال:"صومُ شهر".

قلت: وظاهر الحديث يدل على أنَّ الميت بصوم عنه وليُّه سواء كان الصّوم من رمضان أو من نذر؛ لأنَّ ذمّة الميت مشغولة به، ولأنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قاسه على الدَّيْن، والدَّين يُقضى عن الميت لبراءة ذمّته. وهو قول أهل الحديث كما قال الحافظ ابن حجر في الفتح (4/ 193).

قال الترمذيّ:"اختلف أهل العلم في هذا الباب، فقال بعضهم: يصام عن الميت. وبه قال أحمد وإسحاق قالا: إذا كان على الميت نذر صيام، يصوم عنه. وإذا كان عليه قضاء رمضان أُطعم عنه. وقال مالك، وسفيان، والشافعي: لا يصومُ أحدٌ عن أحد". انتهى.

قلت: وأمّا الشافعي فعلَّق الحكم في القديم على صحة الحديث كما نقله البيهقيّ في"المعرفة" (6/ 309)، وقال في"الخلافيات":"هذه المسألة ثابتة، لا أعلم خلافًا بين أهل الحديث في صحتها. فوجب العمل به. ونقل عن الشافعي أنه قال: كل ما قلتُ، وصحَّ عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم خلافه، فخذوا بالحديث ولا تقلِّدوني".

وذهب أبو حنيفة ومالك إلى أنه لا يصام عن الميت قياسا على الصّلاة.

والمختار فيه ما قاله أحمد: يصام نذر صيام لأنه ليس له بديل بخلاف صيام رمضان فإن له بديلًا وهو الإطعام وهو قول ابن عباس كما ذكره أبو داود (2401)، وإنْ صام الأوّلياء عن الميت فلا حرج عليهم لعموم الحديث، ولهم أن يصوموا كيف شاؤوا مجتمعين أو متفرقين بأن يصوم ثلاثون رجلًا يومًا واحدًا، أو يصوم واحدٌ ثلاثين يومان وكذا أن يُقسِّمَ ثلاثة نفر كل واحد منهم عشرة أيام، فكلها صحيحة.

وأمّا ما رُوي عن ابن عمر، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من مات وعليه صوم شهر فليطعم عنه مكان كلّ يوم مسكينًا" فهو ضعيف.

رواه الترمذيّ (718)، وابن ماجه (1757)، وابن خزيمة (2056) كلّهم من طريق أشعث، عن محمد بن أبي ليلى، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

ومحمد في هذا الإسناد جاء من ثلاثة أوجه، جاء غير منسوب عند الترمذيّ، فقال: هو عندي ابن عبد الرحمن بن أبي ليلى. وجاء عند ابن ماجة منسوبًا إلى ابن سيرين. وقد نبَّه على ذلك المزّي وغيره.

وجاء منسوبًا إلى عبد الرحمن بن أبي ليلى عند ابن خزيمة وهو صحيح.

وإسناده ضعيف من أجل محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى فإنه سيء الحفظ.
وفيه أيضًا الراوي عنه وهو أشعث بن سوار، وهو ضعيف أيضًا.

وقال ابن خزيمة: فإنَّ في القلب من أشعث بن سوار رحمه الله لسوء حفظه".

وقال الترمذيّ:"حديث ابن عمر لا نعرفه مرفوعًا إِلَّا من هذا الوجه، والصحيح عن ابن عمر موقوف قوله".




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের কাছে বসে ছিলাম, তখন তাঁর কাছে এক মহিলা আগমন করলেন। তিনি বললেন: আমি আমার মায়ের ওপর একটি দাসী সদকা করেছিলাম, কিন্তু তিনি (আমার মা) মারা গেছেন।

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমার সওয়াব নিশ্চিত হয়ে গেছে। আর মীরাসের মাধ্যমে দাসীটি তোমার কাছে ফিরে এসেছে।

তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার মায়ের এক মাসের রোযা বাকি ছিল। আমি কি তাঁর পক্ষ থেকে রোযা রাখব?

তিনি বললেন: তুমি তাঁর পক্ষ থেকে রোযা রাখো।

তিনি বললেন: তিনি কখনও হজ্জ করেননি। আমি কি তাঁর পক্ষ থেকে হজ্জ করব?

তিনি বললেন: তাঁর পক্ষ থেকে হজ্জ করো।

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: "দুই মাসের রোযা"।









আল-জামি` আল-কামিল (4506)


4506 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قال الله: كلُّ عمل ابن آدم له إِلَّا الصّيام، فإنّه لي وأنا أجزي به، والصيام جُنَّة، وإذا كان يوم صوم أحدكم فلا يرفث ولا يصْخب، فإن سابَّه أحدٌ أو قاتله فليقلْ: إنِّي امرؤ صائم. والذي نفسُ محمد بيده! لَخُلُوف فم الصّائم أطيب عند الله من ريح المسك. للصّائم فرحتان يفْرَحُهُما: إذا أفطر فرح، وإذا لقي ربَّه فرح بصومه".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1904)، ومسلم في الصيام (1151: 163) كلاهما من طريق ابن جريج، أخبرني عطاء (هو ابن أبي رباح)، عن أبي صالح الزّيات، أنه سمع أبا هريرة رضي الله عنه يقول (فذكره)، واللّفظ للبخاريّ، ، لفظ مسلم قريب منه.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা বলেছেন: আদম সন্তানের প্রতিটি কাজ তার নিজের জন্য, তবে সিয়াম (রোযা) ব্যতীত। কেননা, সিয়াম আমার জন্য এবং আমি নিজেই এর প্রতিদান দেবো। আর সিয়াম হলো ঢালস্বরূপ। যখন তোমাদের কারো সিয়ামের দিন আসে, তখন সে যেন অশ্লীল কথা না বলে এবং হৈ-হুল্লোড় না করে। যদি কেউ তাকে গালি দেয় বা তার সাথে ঝগড়া করে, তবে সে যেন বলে, 'আমি একজন সিয়াম পালনকারী।' যার হাতে মুহাম্মাদের জীবন, তাঁর শপথ! সিয়াম পালনকারীর মুখের গন্ধ আল্লাহর কাছে মিশকের সুগন্ধির চেয়েও অধিক প্রিয়। সিয়াম পালনকারীর জন্য দুটি আনন্দ রয়েছে, যা দ্বারা সে আনন্দিত হয়: যখন সে ইফতার করে, তখন সে আনন্দিত হয়; আর যখন সে তার রবের সাথে সাক্ষাৎ করবে, তখন তার সিয়ামের কারণে সে আনন্দিত হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4507)


4507 - عن وعن أبي هريرة، أنَّ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الصيام جُنّة، فإذا كان أحدكم صائمًا فلا يرفث ولا يجهل. فإن امرؤ قاتله أو شاتمه فليقل: إنِّي صائم، إنِّي صائم".

متفق عليه: رواه مالك في الصيام (59) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاريّ في الصوم (1891) من طريق مالك، ومسلم (1151) من وجه آخر عن سفيان ابن عيينة، عن أبي الزّناد، به، مثله.

وقوله:"فليقل إني صائم" أي نطقا وجهرًا ولا يخوض معه حتّى لا يحبط أجر صومه، ولا يحتاج إلى التأويل الذي ذكره الخطّابي وغيره - أن يقول ذلك في نفسه- أي ليعلم أنه صائم.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "রোযা হলো ঢাল স্বরূপ। যখন তোমাদের কেউ রোযা রাখে, সে যেন অশ্লীল কথা না বলে এবং মূর্খের মতো কাজ না করে। যদি কোনো ব্যক্তি তার সাথে লড়াই করতে আসে বা গালমন্দ করে, তবে সে যেন বলে: 'আমি রোযাদার, আমি রোযাদার'।"









আল-জামি` আল-কামিল (4508)


4508 - عن أبي هريرة، عن النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا تسابَّ وأنتَ صائمٌ، وإن سابَّك أحدٌ فقُلْ: إنِّي صائمٌ، وإنْ كنتَ قائمًا فاجلسْ".

حسن: رواه ابن خزيمة (1994) وعنه ابن حبَّان (3483) عن محمد بن بشار، ثنا عثمان بن عمر، أخبرنا ابن أبي ذئب، عن عجلان مولي المشْمَعِل، عن أبي هريرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عجلان مولى المشمعل فإنه حسن الحديث.

ورواه الإمام أحمد (9532) عن يحيى بن سعيد، عن ابن أبي ذئب، بإسناده ولم يذكر فيه:"وإن كنت قائمًا فاجلس".
وهي زيادة صحيحة، فقد تابع عثمان بن عمر أبو داود الطيالسي (3259)، والنسائي في"الكبرى" (3259) من طريق ابن المبارك.

ويزيد هو ابن هارون، وأبو عامر وهو عبد الملك بن عمرو العقدي شيخا أحمد (10564) كلّهم عن ابن أبي ذئب، فلعل يحيى بن سعيد اختصره. وهي سنة عزيزة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "রোযা অবস্থায় তুমি কাউকে গালিগালাজ করো না। যদি কেউ তোমাকে গালি দেয়, তবে তুমি বলো: আমি রোযাদার। আর যদি তুমি দাঁড়ানো অবস্থায় থাকো, তাহলে বসে পড়ো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4509)


4509 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من لم يدع قول الزّور والعملَ به، فليس الله حاجة في أن يدع طعامه وشرابه".

وزاد في رواية:"والجهل".

صحيح: رواه البخاريّ في الصوم (1903) عن آدم بن أبي إياس، حَدَّثَنَا ابن أبي ذئب، حَدَّثَنَا سعيد المقبريّ، عن أبيه، عن أبي هريرة.

والرّواية الأخرى في الأدب (6057) عن أحمد بن يونس، حَدَّثَنَا ابن أبي ذئب، به.

قوله:"قول الزُّور" أي الكذب.

"والجهل" أي السَّفه.

"والعمل به" أي بمقتضاه.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি মিথ্যা কথা এবং সে অনুযায়ী কাজ পরিত্যাগ করে না, তার পানাহার বর্জনে আল্লাহর কোনো প্রয়োজন নেই।" (অন্য এক বর্ণনায় 'এবং মূর্খতার কাজ' অতিরিক্ত উল্লেখ করা হয়েছে।)









আল-জামি` আল-কামিল (4510)


4510 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ربّ صائم ليس له من صيامه إِلَّا الجوع، وربّ قائم ليس له من قيامه إِلَّا السَّهر".

حسن: رواه ابن ماجه (1690) عن عمرو بن رافع، قال: حَدَّثَنَا عبد الله بن المبارك، عن أسامة ابن زيد، عن سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، قال (فذكره).

وإسناده حسن من أجل الكلام في أسامة بن زيد وهو الليثيّ، فإنه مختلف فيه وكان يخطئ كثيرًا غير أنه حسن الحديث.

ومن طريقه رواه الإمام أحمد (9685)، وقد تابعه عمرو بن أبي عمرو، عن سعيد المقبريّ.

رواه ابن حبَّان (3481)، والبيهقي (4/ 270) من طريقه.

ورواه أبو يعلى (6551)، وابن خزيمة (1997)، والحاكم (1/ 431) فقالوا: عمرو بن أبي عمرو، عن أبي سعيد المقبريّ.

وعمرو بن أبي عمرو - واسمه ميسرة مولى المطلب بن عبد الله بن حنطب، وثَّقه ابن معين وأحمد، وقال أبو حاتم: صدوق.

فهو متابع قوي لأسامة بن زيد، وهو يرُوي عن سعيد، وأبيه أبي سعيد واسمه كيسان.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “অনেক রোযাদার এমন আছে, যার রোযা থেকে ক্ষুধা ছাড়া আর কিছুই লাভ হয় না। আর অনেক রাত জাগরণকারী (ইবাদতকারী) এমন আছে, যার রাত জাগরণ থেকে বিনিদ্রা (জেগে থাকা) ছাড়া আর কিছুই লাভ হয় না।”









আল-জামি` আল-কামিল (4511)


4511 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس الصيام من الأكل والشرب، إنّما الصيام من اللغو والرفث. فإن سابّك أحدٌ أو جهل عليك، فلتقلْ: إنِي صائم،
إني صائم".

حسن: رواه ابن خزيمة (1996)، وابن حبَّان (3479)، والحاكم (1/ 430 - 431)، والبيهقي (4/ 270) كلّهم من حديث الحارث بن عبد الرحمن، عن عمّه، عن أبي هريرة، فذكره.

قال الحاكم: صحيح على شرط مسلم.

وعمّ الحارث هو عبد الله بن المغيرة بن أبي ذباب كما قال ابن حبَّان. وذكره في"ثقاته" (5/ 304) إِلَّا أن مسلمًا لم يخرج له كما قال الحاكم.

وقيل: عمّه اسمه الحارث أيضًا. وقيل: اسمه عياض كما سمّاه ابن منده. وذكره في الصّحابة.

انظر: تهذيب التهذيب (1/ 148).

وفي الباب عن عبيد مولى رسول الله صلى الله عليه وسلم: أنَّ امرأتين صامتا وإنَّ رجلًا قال: يا رسول الله، إنَّ هاهنا امرأتين قد صامتا، وإنهما قد كادتا أن تموتا من العطش! فأعرض عنه أو سكت، ثمّ عاد - وأُراه قال: بالهاجرة- قال: يا نبي الله، إنَّهما والله! قد ماتا أو كادتا أن تموتا! قال:"ادْعُهما". قال: فجاءنا، قال: فجيء بقدح أو عُسٍّ. فقال لإحداهما:"قيتي". فقاءت قيحًا ودمًا وصديدًا ولحمًا، حتّى قاءت نصف القَدَح. ثمّ قال للأخرى:"قيئي" فقاءت من قيح ودم وصديد ولحم عبيط وغيره حتّى ملأت القَدَح. ثمّ قال:"إنَّ هاتين صامتا عمَّا أحلَّ الله لهما، وأفطرنا على ما حرَّم الله عليهما، جلستْ إحداهما إلى الأخرى، فجعلتها تأكلان لحومَ النَّاس".

رواه الإمام أحمد (23653) عن يزيد، أخبرنا سليمان وابن عديّ، عن سليمان -المعنى-، عن رجل حدّثهم في مجلس أبي عثمان النهديّ.

قال ابن عدي: عن شيخ في مجلس أبي عثمان، عن عبيد، فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل رجل لم يُسم.

وأمّا ما رواه أبو يعلى (1576) من طريق حمّاد بن سلمة، عن سليمان -هو ابن طرخان التيمي-، عن عبيد. فسقط منه الرّجل، وظاهره يوهم الاتصال.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عمر مرفوعًا:"ربَّ صائم حظّه من صيامه الجوع والعطش، ورب قائم حظّه من قيامه السّهر".

رواه الطبرانيّ في"الكبير" (13/ 382) من حديث موسي بن أيوب النصيبيّ، ثنا بقية بن الوليد، عن معاوية بن يحيى، عن موسى بن عقبة، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وفيه بقية بن الوليد مدلِّس تدليس التسوية.



رواه أبو داود (2356)، والترمذي (725)، والإمام أحمد (15678)، والبيهقي (4/ 272) كلّهم من حديث عاصم بن عبيد الله، عن عبد الله بن عامر بن ربيعة، عن أبيه، فذكره.

وعلقه البخاريّ بصيغة التمريض. قال الترمذي:"حسن".

قلت: ليس بحسن؛ فإنّ عاصم بن عبيد الله بن عاصم بن عمر بن الخطاب العدوي المدني ضعيف باتفاق أهل العلم.

ورواه ابن خزيمة (2007) من حديث سفيان، عن عاصم بن عبيد الله، به. مثله، ثم قال:"وأنا بريء من عهدة عاصم، سمعت محمد بن يحيى يقول: عاصم بن عبيد الله ليس عليه قياس". ثم قال ابن خزيمة:"سمعت مسلم بن الحجاج يقول: سألنا يحيى بن معين، فقلنا: عبد الله بن محمد بن عقيل أحبّ إليك أم عاصم بن عبيد الله؟ قال: لستُ أحبُّ واحدًا منهما".

ثم قال ابن خزيمة:"كنتُ لا أخرج حديث عاصم بن عبيد الله في هذا الكتاب، ثم نظرتُ فإذا شعبة والثوري قد رويا عنه، ويحيى بن سعيد وعبد الرحمن بن مهدي وهما إماما أهل زمانهما قد رويا عن الثوري عنه. وقد روي عنه مالك خبرًا في غير الموطأ" انتهى.

قلت: رواية هؤلاء الأئمة عن شخص لا يعني في جميع أحواله توثيقًا له، فإنهم قد رووا عنه للاعتبار أو للبيان؛ ولذا قال شعبة -وقد روي عن عاصم بن عبيد الله-: كان عاصم لو قيل له: من بني مسجد البصرة؟ لقال: عن فلان، عن فلان، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه بناه". وفيه إشارة إلى أنه كان يتعمّد.

وقال أحمد: كان ابن عيينة يقول: كان الأشياخ يتقون حديث عاصم. وقال علي بن المديني: سمعت عبد الرحمن بن مهدي ينكر حديثه أشد الإنكار، وتكلم فيه الإمام أحمد والنسائي والدارقطني والجوزجاني وابن حبان وغيرهم. وقال البيهقي عقب الحديث:"عاصم بن عبيد الله ليس بالقوي". واضطرب الحافظ في الحكم على حديث عامر بن ربيعة في التلخيص فقال مرة (1/ 62): إسناده حسن.

وقال في موضع آخر (ص 68):"فيه عاصم بن عبد الله، وهو ضعيف".

لكن عموم أدلة استحباب السواك عند كلّ صلاة شامل للمفطر والصائم؛ لقول النبيّ صلى الله عليه وسلم:"لولا أن أشقّ على أمّتي لأمرتهم بالسواك عند كلّ صلاة".

قال ابن خزيمة (3/ 247):"لم يستثن مفطرًا دون صائم، ففيها دلالة على أنّ السواك للصائم عند كلّ صلاة فضيلة فهو كالمفطر".

قال الترمذي عقب تخريج الحديث والحكم عليه بالحسن:"والعمل على هذا عند أهل العلم، لا يرون بالسواك للصائم بأسًا آخر النهار، ولم ير الشافعي بالسواك بأسًا أول النهار ولا آخره. وكره أحمد وإسحاق السواك آخر النهار".

ونقل ابن حجر في"التلخيص" مثل قول الشافعي: لا بأس بالسواك للصائم أول النهار
وآخره. فقال:"وهذا اختيار أبي شامة، وابن عبد السلام، والنووي. وقال: إنه قول أكثر العلماء، ومنهم المزني".

قلت: وهو اختيارات شيخ الإسلام ابن تيمية كما نقل عنه البعلي الدمشقي في"الاختيارات الفقهية" (ص 20)، فقال:"وهو في جميع الأوقات مستحب، والأصح ولو للصائم بعد الزوال، وهو رواية عن أحمد، وقاله مالك وغيره".

وفي الباب أحاديث أخرى ذكرها ابن الملقن في"البدر المنير" ولم يصح منها شيء.




আবূ হুরায়রাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "রোজা শুধু পানাহার থেকে বিরত থাকার নাম নয়, বরং রোজা হলো অনর্থক কথা ও অশ্লীলতা থেকে বিরত থাকা। যদি কেউ তোমাকে গালি দেয় বা তোমার সাথে মূর্খের মতো আচরণ করে, তবে তুমি বলো: 'আমি রোজা রেখেছি, আমি রোজা রেখেছি'।"









আল-জামি` আল-কামিল (4512)


4512 - عن أبي بكر بن عبد الرحمن بن الحارث بن هشام، عن بعض أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر الناس في سفره عام الفتح بالفطر. وقال:"تقوّوا لعدوّكم" وصام رسول الله صلى الله عليه وسلم.

قال أبو بكر: قال الذي حدّثني: لقد رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم بالعَرْج يصُبُّ الماء على رأسه من العطش أو من الحرّ. ثم قيل لرسول الله صلى الله عليه وسلم: يا رسول الله، إنّ طائفةً من الناس قد صاموا حين صُمتَ. قال: فلما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم بالكَديد دعا بقَدَح فشرب، فأفطر النّاسُ.

صحيح: رواه مالك في الصيام (22) عن سُميٍّ مولى أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أبي بكر بن عبد الرحمن، عن بعض أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم.

ورواه أبو داود (2365)، والنسائي في الكبرى (3017)، وأحمد (15903)، والحاكم (1/ 432) كلّهم من حديث مالك، به، مثله إلا أنّ النسائي. رواه مختصرًا.

ورواه الحاكم من وجهين: عبد الصمد بن الفضل وإسحاق بن الهياج كلاهما عن محمد بن نعيم السعدي، ثنا مالك بن أنس، عن سمي، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، قال:"رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم بالعرج يصبّ على رأسه الماء من الحرّ وهو صائم".

قال الحاكم:"هذا حديث له أصل في الموطأ، فإن كان محمد بن نُعيم حفظه هكذا، فإنه صحيح على شرط الشيخين".

قال الحافظ في"اللسان" في ترجمة إسحاق بن الهياج البلخي، عن محمد بن نعيم السعديّ البصريّ … قال الدارقطني: وهم فيه في موضعين. وهو في"الموطأ" عن مالك، عن سمي، عن أبي بكر، عن بعض الصحابة غير مسمى".

وقال الحافظ ابن عبد البر في"التمهيد" (22/ 47):"هذا حديث مسند صحيح، ولا فرق بين أن يسمي التابعُ الصاحبَ الذي حدّثه أو لا يسميه في وجوب العمل بحديثه؛ لأنّ الصحابة كلّهم
عدول مرضيون، ثقات أثبات. وهذا أمر مجتمع عليه عند أهل العلم بالحديث".




আবূ বাকর ইবনু আব্দুর রহমান থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কোনো কোনো সাহাবী থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কা বিজয়ের বছর সফরের সময় লোকদেরকে রোজা ভেঙে ফেলতে নির্দেশ দেন। তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের শত্রুদের মুকাবিলার জন্য শক্তি সঞ্চয় করো।" আর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রোজা রেখেছিলেন। আবূ বাকর বললেন: যিনি আমাকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন: আমি দেখেছি যে, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম 'আল-আরজ' নামক স্থানে তৃষ্ণা অথবা গরমের কারণে তাঁর মাথার ওপর পানি ঢালছিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে বলা হলো: হে আল্লাহর রাসূল! আপনি রোজা রাখায় কিছু লোক রোজা রেখেছে। তিনি বললেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যখন 'আল-কাদীদ' নামক স্থানে পৌঁছলেন, তখন এক পেয়ালা চাইলেন এবং তা পান করলেন। ফলে লোকেরাও রোজা ভেঙে ফেলল।









আল-জামি` আল-কামিল (4513)


4513 - عن لقيط بن صبرة، قال: قلت: يا رسول الله، أخبرني عن الوضوء؟ قال:"أسبغ الوضوء وخلِّل بين الأصابع، وبالغ في الاستنشاق إلا أن تكون صائمًا".

صحيح: رواه أبو داود (2366)، والترمذي (788)، والنسائي (87)، وابن ماجه (407) كلّهم من حديث يحيى بن سُليم، قال: حدثني إسماعيل بن كثير، قال: سمعت عاصم بن لقيط بن صبرة، عن أبيه، فذكره مطوّلًا، ومختصرًا.

قال الترمذي:"حسن صحيح".

وصحّحه ابن خزيمة (150)، وابن حبان (1054)، والنووي في"المجموع" وغيرهم. وسبق تخريجه في كتاب الوضوء.




লুকাইত ইবনে সাবরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমাকে ওযু সম্পর্কে বলুন। তিনি বললেন: "পূর্ণাঙ্গরূপে ওযু করো এবং আঙ্গুলসমূহের ফাঁকা স্থান খেলাল করো, আর নাকে পানি দেওয়ার ক্ষেত্রে ভালোভাবে গভীর পর্যন্ত পৌঁছাও (কুল্লি করো), তবে যদি তুমি রোযাদার হও (তাহলে বেশি করো না)।"









আল-জামি` আল-কামিল (4514)


4514 - عن * *




৪৫১৪ - ...থেকে বর্ণিত।









আল-জামি` আল-কামিল (4515)


4515 - عن أبي هريرة، قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من قام رمضان إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدّم من ذنبه".

متفق عليه: رواه البخاريُّ في الإيمان (37)، ومسلم في صلاة المسافرين (759) كلاهما من حديث مالك، عن ابن شهاب، عن حميد بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكره.

وحديث مالك عن ابن شهاب، عن حميد بن عبد الرحمن ليس في رواية يحيى الليثي. وقد أكّد ذلك ابن عبد البر في التمهيد (7/ 97).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন, “যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সওয়াবের আশায় রমযানের রাতে দাঁড়িয়ে ইবাদত করে, তার পূর্বের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হয়।”









আল-জামি` আল-কামিল (4516)


4516 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من صام رمضان إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدم من ذنبه، ومن قام ليلة القدر إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدم من ذنبه".

متفق عليه: رواه البخاري في الصوم (1901)، ومسلم في صلاة المسافرين (760) كلاهما من حديث هشام، حدثنا يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكره. بزيادة ليلة القدر.

وكذلك رواه يحيى بن سعيد، ومحمد بن عمرو:"من صام رمضان …" أخرج حديثهما ابن عبد البر في التمهيد (7/ 103 - 104).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সওয়াবের আশায় রমজানের রোযা পালন করবে, তার পূর্বের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে। আর যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সওয়াবের আশায় কদরের রাতে (ইবাদতে) দাঁড়াবে, তারও পূর্বের সকল গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4517)


4517 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يرغّبُ في قيام رمضان من غير أن يأمر بعزيمة، فيقول:"من قام رمضان إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدّم من ذنبه".

قال ابن شهاب: فتوفي رسول الله صلى الله عليه وسلم، والأمر على ذلك ثم كان الأمر على ذلك في خلافة أبي بكر، وصدرًا من خلافة عمر.

صحيح: رواه مالك في كتاب الصلاة في رمضان (2) عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه مسلم في صلاة المسافرين (759: 174) من حديث عبد الرزاق -وهو في مصنفه (7719) وعنه أحمد (7787) وأصحاب السنن -غير ابن ماجه- قال: حدثنا معمر، عن الزهري،
عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.

قوله:"فتوفي رسول الله صلى الله عليه وسلم والأمر على ذلك" هو من قول الزهري كما في الموطأ. وكذلك قال البخاري في صلاة التراويح (2009) ولم يفصله مسلم، بل وقع عنده في نفس الخبر.

والصواب أنه مفصول من الحديث. ومعناه ترك الجماعة في صلاة التراويح.

قال ابن عبد البر:"وفي هذا الحديث من الفقه: فضل قيام رمضان، وظاهره يبيح فيه الجماعة والانفراد؛ لأنّ ذلك كله فعل خير".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসের রাত্রি জাগরণ (নামায) পালনে উৎসাহিত করতেন, তবে তা কঠোরভাবে আদেশ করতেন না। তিনি বলতেন: "যে ব্যক্তি ঈমান ও সওয়াবের আশায় রমযানের রাত্রি জাগরণ (নামায) করবে, তার পূর্বের সমস্ত গুনাহ ক্ষমা করে দেওয়া হবে।"

ইবনু শিহাব (যুহরী) বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন, আর বিষয়টি এভাবেই রইল (ঐচ্ছিক)। এরপর আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতকালে এবং উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের প্রথম দিকেও বিষয়টি এভাবেই ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (4518)


4518 - عن عائشة، قالت: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يرغّب الناس في قيام رمضان من غير أن يأمرهم بعزيمة أمر فيه، فيقول:"من قام رمضان إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدّم من ذنبه".

وفي رواية: خرج في جوف الليل يصلي في المسجد، وصلى بالناس" وساق الحديث. وجاء فيه:"وكان يرغبهم في قيام رمضان من غير أن يأمرهم بعزيمة ويقول:"من قام ليلة القدر إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدم من ذنبه". قال: فتوفي رسول الله صلى الله عليه وسلم والأمر على ذلك.

صحيح: رواه النسائي (2192، 2193، 2195)، وصحّحه ابن خزيمة (2207)، وابن حبان (2543) من أوجه عن الزهري، أخبرني عروة بن الزبير، أنّ عائشة أخبرته، فذكرت الحديث.

وممن رواه عن الزهري أيضًا إبراهيم بن إسماعيل بن مجمع، ومالك كلاهما عن الزهري بهذا الإسناد، ذكره الدارقطني في العلل (3805) إلا أنه قال:"والمحفوظ عن الزهري، عن أبي سلمة وحميد عن أبي هريرة".

قلت: هذا هو الظاهر لاعتماد الشيخين له، ولكن لا يمنع أن يكون للزهري أوجه منها: عن عروة بن الزبير، عن عائشة.

وأما ما رُوي عن عبد الرحمن بن عوف، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ الله تبارك وتعالى فرض صيام رمضان عليكم، وسننتُ لكم قيامه، فمن صامه وقامه إيمانًا واحتسابًا خرج من ذنوبه كيوم ولدته أمُّه" فهو ضعيف.

رواه النسائي (2210)، وابن ماجه (1328) من طريق النضر بن شيبان، قال: قلت لأبي سلمة ابن عبد الرحمن: حدِّثني بشيء سمعته من أبيك، سمعه أبوك من رسول الله صلى الله عليه وسلم، ليس بين أبيك وبين رسول الله صلى الله عليه وسلم أحدٌ في شهر رمضان. قال: نعم. حدثني أبي قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم (فذكره) واللفظ للنسائي.

ورواه الإمام أحمد (1660) من طريق النضر بن شيبان، نحوه.

ورواه النسائي أيضًا (2208) بالإسناد نفسه، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم أنه ذكر شهر رمضان ففضّله على الشهور، وقال:"من قام رمضان إيمانًا واحتسابًا خرج من ذنوبه كيوم ولدته أمُّه".
قال النسائي:"هذا خطأ، والصواب: أبو سلمة عن أبي هريرة".

قلت: يعني حديث الشيخين المتقدم قريبًا.

وكذلك قال البخاري:"لم يصح، وحديث الزهري وغيره عن أبي سلمة عن أبي هريرة أصح".

والحديث مداره على النضر بن شيبان، قال فيه ابن معين:"ليس حديثه بشيء".

وذكره ابن حبان في"الثقات" وقال:"كان ممن يخطئ".

فتعقبه ابن حجر في"التهذيب" (10/ 438) بقوله:"فإذا كان أخطأ في حديثه وليس له غيره، فلا معنى لذكره في الثقات، إلا أن يقال هو في نفسه صادق وإنما غلط في اسم الصحابي فيتجه؛ لكن يردُ على هذا أن في بعض طرقه عنه:"لقيت أبا سلمة، فقلت له: حدثني بحديث سمعته من أبيك، وسمعه أبوك من النبيّ صلى الله عليه وسلم. فقال أبو سلمة: حدثني أبي، فذكره. وقد جزم جماعة من الأئمة بأنّ أبا سلمة لم يصح سماعه من أبيه، فتضعيف النضر على هذا متعيّن.

وقد قال ابن خراش: إنه لا يعرف بغير هذا الحديث. وأعلّه الدارقطني أيضًا بحديث أبي سلمة، عن أبي هريرة" اهـ كلام الحافظ.

قلت: وممن جزم بعدم سماعه من أبيه: علي بن المديني، وأحمد، وابن معين، والبخاري، وأبو حاتم، ويعقوب بن شيبة، وأبو داود. وقال أحمد: مات وهو صغير.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম লোকদেরকে রমযান মাসের কিয়ামের (রাতের নামাযের) প্রতি উৎসাহিত করতেন, তবে তিনি কঠোরভাবে আবশ্যিক নির্দেশ দিতেন না। তিনি বলতেন: "যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সওয়াবের প্রত্যাশায় রমযান মাসে কিয়াম করবে, তার পূর্বের সকল গুনাহ মাফ করে দেওয়া হবে।"

অন্য এক বর্ণনায় এসেছে: তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাতের মধ্যভাগে বের হয়ে মসজিদে সালাত আদায় করেন এবং লোকেদের সাথে সালাত আদায় করেন। ... তাতে আরও এসেছে: তিনি তাদেরকে রমযান মাসের কিয়ামের প্রতি উৎসাহিত করতেন, তবে কঠোরভাবে আবশ্যিক নির্দেশ দিতেন না। তিনি বলতেন: "যে ব্যক্তি ঈমানের সাথে ও সওয়াবের আশায় কদরের রাতে কিয়াম (নামাজ) করবে, তার পূর্বের সকল গুনাহ মাফ করে দেওয়া হবে।" রাবী বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ইন্তেকাল করলেন এবং এই (ঐচ্ছিক উৎসাহ প্রদানের) বিষয়টি তেমনই বহাল রইল।









আল-জামি` আল-কামিল (4519)


4519 - عن عائشة أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلَّى في المسجد ذات ليلة، فصلَّي بصلاته ناسٌ، ثم صلَّى الليلة القابلة فكثُر النّاس، ثم اجتمعوا من الليلة الثالثة أو الرابعة، فلم يخرج إليهم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فلما أصبح قال:"قد رأيتُ الذي صنعتُم، ولم يمنعني من الخروج إليكم إلَّا أني خشيتُ أن تُفرض عليكم" وذلك في رمضان.

متفق عليه: رواه مالك في الصلاة في رمضان (1) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته.

ورواه مسلم في صلاة المسافرين (761: 177) من طريق مالك، به، مثله.

ورواه البخاري في صلاة التراويح (2012) من طريق عقيل، ومسلم في صلاة المسافرين (761: 178) من طريق يونس بن عبيد، كلاهما عن الزهري، به، بسياق أطول.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক রাতে মসজিদে সালাত আদায় করলেন। তাঁর সালাতের সাথে অনেক লোকও সালাত আদায় করল। এরপর তিনি পরের রাতে সালাত আদায় করলেন, তাতে লোকের সংখ্যা আরও বেড়ে গেল। অতঃপর তারা তৃতীয় বা চতুর্থ রাতে একত্রিত হলো, কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের কাছে বের হয়ে আসলেন না। যখন সকাল হলো, তখন তিনি বললেন: “তোমরা যা করেছ, তা আমি দেখেছি। তোমাদের কাছে বেরিয়ে আসতে আমাকে শুধু এই জিনিসটিই বাধা দিয়েছে যে, আমি ভয় পেয়েছিলাম—এটা তোমাদের উপর ফরয হয়ে যাবে।” আর এটা ছিল রমাযান মাসে।









আল-জামি` আল-কামিল (4520)


4520 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم قالت: كان الناس يصلون في مسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضان باللّيل أوزاعًا يكون مع الرّجل شيء من القرآن فيكون معه النفر الخمسة أو الستة أو أقل من ذلك أو أكثر فيصلون بصلاته. قالت: فأمرني رسول الله صلى الله عليه وسلم -
ليلة من ذلك أن أنصب له حصيرا على باب حجرتي ففعلت فخرج إليه رسول الله صلى الله عليه وسلم بعد أن صلى العشاء الآخرة. قالت: فاجتمع إليه من في المسجد فصلي بهم رسول الله صلى الله عليه وسلم ليلا طويلًا، ثم انصرف رسول الله صلى الله عليه وسلم فدخل وترك الحصير على حاله، فلما أصبح الناس تحدّثوا بصلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم بمن كان معه في المسجد تلك الليلة. قالت: وأمسى المسجد راجّا بالناس، فصلّى بهم رسول الله صلى الله عليه وسلم العشاء الآخرة، ثم دخل بيته وثبت الناس. قالت: فقال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما شأن الناس يا عائشة؟". قالت: فقلت له: يا رسول الله، سمع الناس بصلاتك البارحة بمن كان في المسجد فحشدوا لذلك لتصلى بهم. قالت: فقال:"أطوِ عنا حصيرك يا عائشة". قالت: ففعلت وبات رسول الله صلى الله عليه وسلم غير غافل، وثبت الناس مكانهم حتى خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى الصبح. فقالت: فقال:"أيها الناس! أما والله! ما بِتُ -والحمد لله- ليلتي هذه غافلًا وما خفي عليَّ مكانكم ولكني تخوفت أن يفترض عليكم فاكلفوا من الأعمال ما تطيقون فإن الله لا يمل حتى تملوا".

قال: وكانت عائشة تقول: إنَّ أحبَّ الأعمال إلى الله أدومُها وإن قلَّ.

حسن: رواه الإمام أحمد (26307)، والطبراني في الأوسط (5277) كلاهما من حديث محمد بن إسحاق، قال: حدثني محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، عن عائشة، فذكرته.

قال الطبراني: لم يرو هذا الحديث عن محمد بن إبراهيم التيمي إلا محمد بن إسحاق، تفرَّد به محمد بن سلمة الحراني.

قلت: ليس كما قال، فقد تابع محمد بن إسحاق محمد بن عمرو وهو الليثيّ في أصل القصة.

ومن طريقه رواه أبو داود (1374) مختصرًا.

وليس فيه أنه صلى ليلة واحدة، بل أحال أبو داود إلى أصل القصة التي يرويها ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، وفيها أنه صلى الله عليه وسلم لم يخرج من الليلة الثالثة.

فالظاهر أن ابن إسحاق وَهِم في جعله صلاة النبيّ صلى الله عليه وسلم ليلة واحدة، فإنه لم يتابع على ذلك، ولكن يعكّر عليه ما ذكره أحمد (26038) عن محمد بن عمرو. وفيه:"فلما كانت الليلة الثانية كثروا، فأطلع عليهم، فقال:"اكلفوا من الأعمال ما تطيقون. فإنّ الله لا يملّ حتى تملُّوا". فالله أعلم هل تعددت القصة أو هو آخر من وَهِم.

وأما قول الطبراني:"تفرد به محمد بن سلمة الحراني" فليس كما قال، بل تابعه أبو يعقوب وهو إبراهيم بن سعد بن إبراهيم الزهري.
ومن طريقه رواه الإمام أحمد في الرواية المشار إليها أعلاه.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: রমযান মাসের রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মসজিদে লোকেরা বিচ্ছিন্নভাবে (দলবদ্ধ হয়ে) সালাত আদায় করতেন। কোনো কোনো ব্যক্তির সাথে কুরআনের কিছু অংশ মুখস্থ থাকতো। তখন পাঁচ বা ছয়জন অথবা এর থেকে কম বা বেশি লোক তার সাথে যোগ দিতো এবং তারা তার ইকতিদায় সালাত আদায় করতো।

তিনি (আয়িশা) বলেন: একদিন রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে আদেশ করলেন যেন আমি তাঁর জন্য আমার কক্ষের দরজায় একটি চাটাই পেতে রাখি। আমি তাই করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এশার শেষ সালাত আদায়ের পর সেদিকে বের হলেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: এরপর মসজিদে যারা উপস্থিত ছিলেন, তারা তাঁর কাছে সমবেত হলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদেরকে নিয়ে দীর্ঘ সময় ধরে রাতের সালাত আদায় করলেন। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফিরে গেলেন এবং (তাঁর ঘরে) প্রবেশ করলেন। চাটাইটি সেভাবেই পড়ে রইল।

যখন সকাল হলো, লোকেরা সে রাতে মসজিদে উপস্থিতদের নিয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত আদায়ের বিষয়টি আলোচনা করতে লাগলো। তিনি বলেন: পরের সন্ধ্যাবেলায় মসজিদে লোকে লোকারণ্য হয়ে গেল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের নিয়ে এশার শেষ সালাত আদায় করলেন, এরপর তিনি নিজ গৃহে প্রবেশ করলেন, কিন্তু লোকেরা সেখানেই স্থির হয়ে রইল। তিনি বলেন: তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "আয়িশা! লোকেদের কী হয়েছে?"

তিনি বললেন: আমি তাঁকে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! গতকাল রাতে যারা মসজিদে ছিল, তাদের সাথে আপনার সালাত আদায়ের কথা লোকেরা শুনেছে। তাই তারা আপনার সাথে সালাত আদায়ের জন্য ভিড় করেছে। তিনি বলেন: তখন তিনি বললেন: "আয়িশা! আমাদের দিক থেকে চাটাইটি গুটিয়ে রাখো।"

তিনি বলেন: আমি তাই করলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রাত অতিবাহিত করলেন (কিন্তু ঘর থেকে বের হলেন না), যদিও তিনি গাফেল ছিলেন না। লোকেরা তাদের স্থানেই স্থির হয়ে রইল, যতক্ষণ না রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফজরের সালাতের জন্য বের হলেন। তিনি বলেন: তখন তিনি বললেন: "হে লোক সকল! আল্লাহর শপথ! আলহামদুলিল্লাহ, আমি আমার এ রাতটি গাফেল হয়ে অতিবাহিত করিনি এবং তোমাদের অবস্থান আমার কাছে গোপন ছিল না। কিন্তু আমি আশঙ্কা করছিলাম যে, এই সালাতটি তোমাদের উপর ফরয হয়ে যাবে। সুতরাং তোমরা কেবল সেই আমলই করবে যা তোমাদের সামর্থ্যের মধ্যে থাকে। কেননা আল্লাহ তাআলা (সওয়াব দিতে) বিরক্ত হন না, যতক্ষণ না তোমরা (আমল করতে) বিরক্ত হয়ে যাও।"

আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: আল্লাহর নিকট সবচেয়ে প্রিয় আমল হলো সেটি, যা পরিমাণে অল্প হলেও নিয়মিতভাবে করা হয়।