আল-জামি` আল-কামিল
4521 - عن أبي ذرّ، قال: صُمنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم رمضان، فلم يقُمْ بنا شيئًا من الشَّهر، حتى بقي سبعٌ، فقام بنا حتى ذهب ثلث الليل، فلما كانت السادسة لم يقم بنا، فلما كانت الخامسةُ قام بنا حتى ذهب شطر الليل. فقلت: يا رسول الله، لو نفّلتنا قيام هذه الليلة؟ قال: فقال:"إنّ الرجل إذا صلّى مع الإمام حتى ينصرف حُسب له قيام ليلة".
قال: فلما كانت الرابعة لم يقم، فلما كانت الثالثة جمع أهله ونساءه والناس، فقام بنا حتى خشينا أن يفوتنا الفلاح. قال: قلت: وما الفلاح؟ قال: السَّحور، ثم لم يقُمْ بنا بقية الشّهر.
صحيح: رواه أبو داود (1375)، والترمذي (806)، والنسائي (1364)، (1605)، وابن ماجه (1327) كلّهم من طريق داود بن أبي هند، عن الوليد بن عبد الرحمن الجرشي، عن جبير بن نفير الحضرمي، عن أبي ذر، قال (فذكره).
وإسناده صحيح، ورواه الإمام أحمد (21447)، وصححه ابن خزيمة (2206)، وابن حبان (2547) من طريق داود بن أبي هند، به.
وقال الترمذي:"حسن صحيح".
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে রমযানের রোযা রেখেছিলাম। কিন্তু মাসের কোনো অংশে তিনি আমাদের নিয়ে (তারাবীহর জন্য) কিয়াম করেননি, যখন সাত রাত অবশিষ্ট ছিল। তখন তিনি আমাদের নিয়ে কিয়াম করলেন (সালাত আদায় করলেন) যতক্ষণ না রাতের এক-তৃতীয়াংশ অতিবাহিত হলো। এরপর যখন ষষ্ঠ রাত এলো, তিনি আমাদের নিয়ে কিয়াম করলেন না। যখন পঞ্চম রাত এলো, তখন তিনি আমাদের নিয়ে কিয়াম করলেন যতক্ষণ না রাতের অর্ধেক অতিবাহিত হলো। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আপনি যদি এই রাতের বাকি অংশও আমাদের নফল হিসেবে (সালাতে) অতিবাহিত করতে দিতেন? তিনি বললেন: “নিশ্চয়ই কোনো লোক যদি ইমামের সাথে সালাত আদায় করে যতক্ষণ না তিনি (ইমাম) ফিরে যান (সালাত শেষ করেন), তবে তার জন্য এক রাত (পূর্ণ) কিয়ামের সওয়াব লেখা হয়।” আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এরপর যখন চতুর্থ রাত এলো, তিনি কিয়াম করলেন না। এরপর যখন তৃতীয় রাত এলো, তিনি তার পরিবার, মহিলা এবং লোকদের একত্রিত করলেন এবং আমাদের নিয়ে কিয়াম করলেন যতক্ষণ না আমরা ভয় পেলাম যে আমাদের ফালাহ্ (কল্যাণ) হাতছাড়া হয়ে যাবে। তিনি (বর্ণনাকারী) বললেন: আমি জিজ্ঞাসা করলাম, ফালাহ্ কী? তিনি বললেন: সাহুরী (সাহরি)। এরপর মাসের বাকি অংশে তিনি আর আমাদের নিয়ে কিয়াম করেননি।
4522 - عن نعيم بن زياد، قال: سمعتُ النّعمان بن بشير على منبر حمص يقول: قمنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في شهر رمضان ليلة ثلاث وعشرين إلى ثُلث الليل الأوّل، ثم قُمنا معه ليلة خمس وعشرين إلى نصف الليل، ثم قمنا معه ليلة سبع وعشرين حتى ظنّنا أن لا ندرك الفلاح وكانوا يسمُّونه السُّحور.
حسن: رواه النسائي (1606)، وأحمد (18402) وصحّحه ابن خزيمة (2204)، والحاكم (1/ 440) كلهم من حديث معاوية بن صالح، قال: حدثني نعيم بن زياد أبو طلحة، فذكره.
وزاد أحمد في آخره: فأما نحن فنقول: ليلة السابعة، ليلة سبع وعشرين، وأنتم تقولون: ليلة ثلاث وعشرين السابعة، فمن أصوب نحن أو أنتم؟ .
وإسناده حسن من أجل معاوية بن صالح الحمصي فإنه حسن الحديث.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط البخاريّ".
فتعقبه الذهبي بقوله:"معاوية إنما احتجّ به مسلم وليس الحديث على شرط واحد منهما، بل هو حسن".
আন-নু'মান ইবনু বাশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি হিমসের (হোমসের) মিম্বরে দাঁড়িয়ে বলছিলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে রমযান মাসে তেইশ তারিখের রাতে রাতের প্রথম তৃতীয়াংশ পর্যন্ত কিয়াম (নামাজ) করেছিলাম। এরপর পঁচিশ তারিখের রাতে আমরা তাঁর সাথে রাতের অর্ধেক পর্যন্ত কিয়াম করেছিলাম। এরপর সাতাশ তারিখের রাতে আমরা তাঁর সাথে এত দীর্ঘ সময় কিয়াম করেছিলাম যে, আমরা মনে করেছিলাম যে আমরা হয়তো 'ফালাহ' (সাহরী) পেতে পারব না। আর তারা সেটিকে সাহরী বলত।
(বর্ণনাকারী আন-নু'মান ইবনু বাশীর আরও বলেন): আর আমরা (সাহাবীগণ) বলি, সেটি সপ্তম রাত, অর্থাৎ সাতাশ তারিখের রাত। আর আপনারা (পরবর্তী প্রজন্ম) বলেন, তেইশ তারিখের রাত হলো সপ্তম রাত। তাহলে আমাদের মধ্যে কে অধিক সঠিক—আমরা নাকি আপনারা?
4523 - عن أنس بن مالك، أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان يصلي بالليل في رمضان، فجاء قومٌ فقاموا خلفه، فصلّي فكان يخفِّف، ثم يدخل بيته فيصلي، ثم يخرُج ويخفِّف. فلما أصبح، قالوا: يا رسول الله، قمنا خلفك الليلة، فكنتّ تدخلُ بيتك ثم تخرج؟ فقال:"إنّما فعلتُ ذلك من أجلكم".
صحيح: رواه الطبراني في الأوسط (8204) عن موسى بن هارون، قال: حدثنا إسحاق بن راهويه، قال: أخبرنا النضر بن شميل، قال: حدّثنا حماد بن سلمة، قال: أخبرنا ثمامة، عن أنس، فذكره.
وإسناده صحيح، وثمامة هو ابن عبد الله بن أنس بن مالك ثقة من رجال الصحيح، قال ابن عدي: له أحاديث عن أنس. وأرجو أنه لا بأس به، وأحاديثه قريبة من غيره. وهو صالح فيما يرويه عن أنس عندي".
وعزاه الهيثمي في"المجمع" (3/ 173) إلى الأوسط، وقال:"رجاله رجال الصحيح".
وفي الباب عن أبي هريرة، قال: خرج رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فإذا أناسٌ في رمضان يصلون في ناحية المسجد، فقال:"ما هؤلاء؟". فقيل: هؤلاء ناس ليس معهم قرآن، وأبي بن كعب يصلي وهم يصلون بصلاته. فقال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"أصابوا ونِعْم ما صنعوا".
رواه أبو داود (1377) عن أحمد بن سعيد الهمداني، حدّثنا عبد الله بن وهب، أخبرني مسلم بن خالد، عن العلاء بن عبد الرحمن، عن أبيه، عن أبي هريرة. فذكره.
وفي إسناده مسلم بن خالد المعروف بالزنجيّ، قال الذهبي في"الكاشف":"وثق، وضعفه أبو داود لكثرة غلطه"، وقال الحافظ في"التقريب":"فقيه صدوق كثير الأوهام".
ولذلك قال أبو داود عقب الحديث:"ليس هذا الحديث بالقوي؛ مسلم بن خالد ضعيف". وقال فيه ابن المديني: ليس بشيء. وقال البخاري: منكر الحديث، يكتب حديثه ولا يحتج به، يعرف وينكر، وذكره ابن حبان في"الثقات" وقال:"يخطئ أحيانًا". وقال عثمان الدارمي عن ابن معين:"ثقة".
والحديث رواه أيضًا ابن خزيمة (2208) وعنه ابن حبان (2541) من طريق ابن وهب، به.
ورُوي مرسلًا من طريق ثعلبة بن أبي مالك القرظيّ.
رواه البيهقيّ (2/ 495) من طريق بحر بن نصر، قال: قرئ على عبد الله بن وهب، أخبرك عبد الرحمن بن سلمان وبكر بن مضر، عن ابن الهاد، أنّ ثعلبة بن أبي مالك القرظي حدثه، قال:"خرج رسول الله صلى الله عليه وسلم ذات ليلة في رمضان …" الحديث.
قال البيهقيّ:"هذا مرسل حسن. قال: وقد رُوي بإسناد موصول إلا أنه ضعيف". ثم روي حديث خالد الزنجي السابق من طريق أبي داود.
ورواه في المعرفة (4/ 39 - 40) (5401) من طريق الربيع، قال: حدثنا ابن وهب، به، فذكره.
قال البيهقي عقبه:"وهذا خاص فيمن لا يكون حافظًا للقرآن، وثعلبة بن أبي مالك قد رأي النبي صلى الله عليه وسلم فيما زعم أهل العلم بالتواريخ".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমজান মাসে রাতে সালাত আদায় করতেন। তখন কিছু লোক এসে তাঁর পেছনে দাঁড়াল এবং তিনি সালাত আদায় করলেন। তিনি (সালাত) সংক্ষিপ্ত করতেন। এরপর তিনি নিজ ঘরে প্রবেশ করে (নফল) সালাত আদায় করতেন। অতঃপর তিনি (পুনরায়) বের হয়ে এসে (সালাতে) সংক্ষিপ্ত করতেন। যখন সকাল হলো, তারা বললো: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা গত রাতে আপনার পেছনে দাঁড়িয়েছিলাম। আপনি ঘরে প্রবেশ করছিলেন আবার বের হচ্ছিলেন? তখন তিনি বললেন: "আমি তো কেবল তোমাদের জন্যই এমনটি করেছিলাম।"
4524 - عن عبد الرحمن بن عبدِ القاري أنه قال: خرجتُ مع عمر بن الخطاب في رمضان إلى المسجد، فإذا الناسُ أوزاعٌ متفرِّقون، يصلّي الرجلُ لنفسه، ويصلي الرجل فيصلّي بصلاته الرَّهْط.
فقال عمر: والله! إنّي لأراني لو جمعتُ هؤلاء على قارئ واحد لكان أمثل، فجمعهم على أبيّ بن كعب. قال: ثم خرجتُ معه ليلة أخرى والنّاسُ يصلُّون بصلاة قارئهم. فقال عمر: نعمتِ البدعةُ هذه! والتي تنامون عنها أفضل من التي تقومون يعني آخر الليل، وكان الناسُ يقومون أوله".
صحيح: رواه مالك في الصلاة في رمضان (3) عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عبد الرحمن بن عبد القاري، فذكره.
ورواه البخاري في صلاة التراويح (2010) من طريق مالك، به، مثله.
وقول عمر رضي الله عنه:"نعمت البدعة هذه" البدعة هنا بمعناها اللغويّ.
وأمّا في الشّرع فهي بمقابل السنة، وإنّما مدحها عمر رضي الله عنه لأنّها ليست ببدعة شرعًا، بل هي سنّة لإقرار النبيّ صلى الله عليه وسلم من صلّى معه في بعض ليالي رمضان، وإن كان كره ذلك لهم خشية أن تفترض عليهم، فلما مات النبيّ صلى الله عليه وسلم حصل الأمن من ذلك.
ولذلك قال ابن بطال: قيام رمضان سنة؛ لأنّ عمر إنما أخذه من فعل النبيّ صلى الله عليه وسلم، وإنّما تركهـ النبيّ صلى الله عليه وسلم خشية الافتراض. انظر: فتح الباري (4/ 252).
وقد ذهب أكثر الصحابة إلى فعل عمر بن الخطاب من جمعه الناس على قارئ واحد.
وكذلك رُوي عن علي بن أبي طالب:"أنه كان يأمر الناس بالقيام في رمضان، فيجعل للرجال إمامًا، وللنساء إمامًا. قال عرفجة: فأمرني فأممتُ النساء" إلا أنه ضعيف.
رواه عبد الرزاق (5125، 7722) عن محمد بن عمارة، عن عمر الثقفي، عن عرفجة، أنّ عليًا كان يأمر الناس، فذكره. وفي الموضع الثاني، قال: أبو أمية الثقفي، عن عرفجة.
ورواه البيهقي في فضائل الأوقات (125) من وجه آخر عن أبي عبد الله الثقفي، حدثنا عرفجة.
وعمر هو ابن عبد الله بن يعلى بن مرة الثقفي، ضعيف.
وقال الدارقطني:"متروك". وهو من رجال"التهذيب" إلا أنه لم يُذكر فيه كنيته أبو أمية ولا أبو
عبد الله. فتنبّه.
আব্দুর রহমান ইবনে আব্দিল কারী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রমজান মাসে উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে মসজিদে গিয়েছিলাম। তখন দেখি যে লোকেরা বিচ্ছিন্ন দলে দলে বিভক্ত হয়ে সালাত আদায় করছে। কেউ নিজে একাকী সালাত আদায় করছে, আবার কেউ সালাত আদায় করছে এবং তার সালাতের সাথে একদল লোকও সালাত আদায় করছে।
তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর কসম! আমার মনে হচ্ছে, যদি আমি এই লোকগুলোকে একজন মাত্র ক্বারীর (ইমামের) পিছনে একত্রিত করে দিই, তবে সেটাই উত্তম হবে। এরপর তিনি তাদেরকে উবাই ইবনে কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পিছনে একত্রিত করে দিলেন।
(আব্দুর রহমান ইবনে আব্দিল কারী) বলেন: অতঃপর আমি তার (উমর রাঃ)-এর সাথে অন্য এক রাতে বের হলাম, তখন লোকেরা তাদের ক্বারীর (ইমামের) সালাতের সাথে সালাত আদায় করছে। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন বললেন: এটা কতই না উত্তম বিদআত! আর তোমরা যে সময়ে ঘুমিয়ে থাকো তা এই সময় সালাত আদায় করার চেয়ে উত্তম—অর্থাৎ রাতের শেষাংশ। (তখন) লোকেরা অবশ্য রাতের প্রথমাংশেই সালাত আদায় করত।
4525 - عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، أنه سأل عائشة، زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم: كيف كانتْ صلاةُ رسول الله صلى الله عليه وسلم في رمضان؟ فقالت: ما كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يزيدُ في رمضان ولا في غيره على إحدى عشرة ركعة. يصلي أربعًا، فلا تسأل عن حُسنهنّ وطولهنَّ. ثم يصلي أرْبعًا فلا تسألْ عن حسنهنَّ وطولهنَّ. ثم يصلي ثلاثًا. فقالت عائشة: فقلتُ: يا رسول الله، أتنامُ قبل أن توتِر؟ فقال:"يا عائشة، إنَّ عيْنيَّ تنامان، ولا ينام قلبي".
متفق عليه: رواه مالك في صلاة الليل (9) عن سعيد بن أبي سعيد المقبري، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن بن عوف، به.
ورواه البخاري في صلاة التراويح (2013)، ومسلم في صلاة المسافرين (738: 125) كلاهما من طريق مالك، به.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূ সালামাহ ইবনু আবদুর রহমান ইবনু আওফ তাঁকে জিজ্ঞেস করেছিলেন: রমযান মাসে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাত কেমন ছিল? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসে এবং রমযান ছাড়া অন্য মাসেও এগারো রাকাতের বেশি পড়তেন না। তিনি প্রথমে চার রাকাত পড়তেন। তুমি সেগুলোর সৌন্দর্য ও দীর্ঘতা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করো না (অর্থাৎ তা ছিল অসাধারণ)। অতঃপর তিনি আরও চার রাকাত পড়তেন। তুমি সেগুলোর সৌন্দর্য ও দীর্ঘতা সম্পর্কেও জিজ্ঞেস করো না। অতঃপর তিনি তিন রাকাত (বিতর) পড়তেন। আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ! আপনি কি বিতর পড়ার আগে ঘুমিয়ে যান? তিনি বললেন: "হে আয়িশা! আমার চোখ দুটি ঘুমায়, কিন্তু আমার অন্তর ঘুমায় না।"
4526 - عن أبي سلمة، قال: أتيتُ عائشة، فقلتُ: أيْ أمه أخبرني عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم. فقالت: كانت صلاته في شهر رمضان وغيره ثلاث عشرة ركعة بالليل، منها ركعتا الفجر.
متفق عليه: رواه مسلم في صلاة المسافرين (738: 127) عن عمرو الناقد، حدثنا سفيان بن عيينة، عن عبد الله بن أبي لبيد، سمع أبا سلمة، قال (فذكره).
ورواه البخاريّ (1140) من وجه آخر نحوه غير أنه لم يذكر فيه شهر رمضان.
وفي الباب عن جابر بن عبد الله، قال: صلَّى بنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في شهر رمضان ثمان ركعات وأوتر، فلما كانت القابلةُ اجتمعنا في المسجد ورجوْنا أن يخرج إلينا، فلم نزل فيه حتى أصبحنا ثم دخلنا فقلنا: يا رسول الله، اجتمعنا في المسجد ورجوْنا أن تصلي بنا. فقال:"إنّي خشيتُ -أو كرهتُ- أن تكتب عليكم".
رواه أبو يعلى (1802)، والطبراني في الصغير (525) كلاهما من طريق يعقوب بن عبد الله القُمِّي، أخبرنا عيسي بن جارية، عن جابر، قال (فذكره).
قال الطبراني عقبه: لا يروى عن جابر بن عبد الله إلا بهذا الإسناد، تفرد به يعقوب وهو ثقة.
وصحّحه ابن خزيمة (1070)، وابن حبان (2409) من طريق يعقوب القميّ، به.
وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 173):"فيه عيسي بن جارية وثقه ابن حبان، وضعفه ابن معين".
قلت: وهو مختلف فيه؛ قال ابن معين: ليس حديثه بذاك، لا أعلم أحدًا روى عنه غير يعقوب القميّ. وقال في رواية أخرى عنه: عنده مناكير، حدّث عنه يعقوب القمي، وعنبسة قاضي الرّي.
وقال أبو عبيد الآجري عن أبي داود: منكر الحديث. وقال في موضع آخر: ما أعرفه، روي مناكير. وذكره النسائي في"الضعفاء" وقال: منكر. وذكره العقيلي، وابن عدي في جملة الضعفاء. وقال ابن عدي: أحاديثه غير محفوظة. وذكر حديثه هذا في جملة مناكيره. (الكامل 5/ 1889).
ولكن قال أبو زرعة:"لا بأس به". وصحّح حديثه ابن خزيمة، وابن حبان، وقال الذهبي في"الميزان":"إسناده وسط"، وقال في"الكاشف":"صدوق". وسكت عنه الحافظ في"الفتح" (3/ 12) وقد نصَّ في المقدمة أن ما سكتَ عنه فهو حسن.
ولذا قلتُ في"المنة الكبرى" (3/ 389):"ويبدو من هذا أنّ الحديث لا يقلّ عن درجة الحسن لغيره لموافقته لما روته عائشة من فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم بأنه لا يزيد في رمضان ولا في غيره عن ثمان ركعات …".
فالذي يغلب على الظن أنه صلي في هذه الليالي الثلاث بالجماعة إحدى عشرة ركعة كما كان يصلي في بيته منفردًا.
وأمّا ما رُوي عن ابن عباس أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان يصلي في رمضان عشرين ركعة والوتر. فهو ضعيف جدًّا.
رواه ابن أبي شيبة (2/ 164)، والطبراني في الكبير (11/ 393) وعنه البيهقي (2/ 496)، وعبد ابن حميد (653) من طريق أبي شيبة إبراهيم بن عثمان، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، فذكره. وعلّته أبو شيبة هذا فهو متروك، كما في"التقريب".
وقد رواه الذهبي في"الميزان" وقال:"إنه من مناكير أبي شيبة".
وبه أعلّه الهيثمي في"المجمع" (3/ 172) وعزاه للأوسط أيضًا.
وقال الحافظ الزيلعي في نصب الراية (2/ 153):"هو معلول بأبي شيبة إبراهيم بن عثمان جدّ الإمام أبي بكر بن أبي شيبة، وهو متفق على ضعفه، وليّنه ابن عدي في"الكامل". ثم إنه مخالف للحديث الصحيح عن أبي سلمة بن عبد الرحمن أنه سأل عائشة" اهـ فذكر حديثها.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবু সালামা আমাকে বললেন: হে আম্মাজান! আমাকে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সালাত সম্পর্কে বলুন। তিনি বললেন: রমযান মাসে এবং রমযান ছাড়া অন্য মাসেও রাতের বেলা তাঁর সালাত তেরো রাকাত ছিল, যার মধ্যে ফজরের (সুন্নত) দুই রাকাতও অন্তর্ভুক্ত।
মুত্তাফাকুন আলাইহি। এটি মুসলিম (৭৩৮: ১২৭)-এ সলাতুল মুসাফিরীন অধ্যায়ে আমর আন-নাকিদ হতে, তিনি সুফিয়ান ইবনু উয়াইনা হতে, তিনি আবদুল্লাহ ইবনু আবী লাবীদ হতে, তিনি আবু সালামা হতে বর্ণনা করেছেন।
আর এটি আল-বুখারীও (১১৪০) অন্য সূত্রে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন, তবে তিনি এতে রমযান মাসের উল্লেখ করেননি।
আর এই বিষয়ে জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতেও বর্ণিত আছে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রমযান মাসে আমাদের নিয়ে আট রাকাত সালাত এবং বিতর পড়লেন। যখন পরের রাত এলো, আমরা মসজিদে সমবেত হলাম এবং আশা করছিলাম যে তিনি আমাদের কাছে বেরিয়ে আসবেন। আমরা ভোর হওয়া পর্যন্ত সেখানেই থাকলাম। এরপর আমরা তাঁর কাছে প্রবেশ করে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমরা মসজিদে একত্রিত হয়েছিলাম এবং আশা করেছিলাম যে আপনি আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করবেন। তিনি বললেন: “আমি ভয় করেছিলাম—বা অপছন্দ করেছিলাম—যে এটি তোমাদের উপর ফরয হয়ে যায়।”
এটি আবূ ইয়া’লা (১৮০২) এবং ত্বাবারানী ফিস সাগীর (৫২৫) বর্ণনা করেছেন। উভয়ই ইয়াকূব ইবনু আবদুল্লাহ আল-ক্বুম্মী এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, যিনি ঈসা ইবনু জারিয়াহ হতে, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণনা করেছেন।
ত্বাবারানী এর পর মন্তব্য করেছেন: এই সনদ ছাড়া জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে আর কেউ এটি বর্ণনা করেনি। এতে ইয়াকূব একক, আর তিনি নির্ভরযোগ্য।
আর ইবনু খুযাইমাহ (১০৭০) ও ইবনু হিব্বান (২৪০৯) ইয়াকূব আল-ক্বুম্মীর সূত্রে এটিকে সহীহ বলেছেন।
হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৩/১৭৩)-তে বলেছেন: “এতে ঈসা ইবনু জারিয়াহ আছেন, যাঁকে ইবনু হিব্বান নির্ভরযোগ্য বললেও ইবনু মাঈন দুর্বল বলেছেন।”
আমি (গ্রন্থকার) বলছি: তিনি (ঈসা ইবনু জারিয়াহ) সম্পর্কে মতপার্থক্য রয়েছে। ইবনু মাঈন বলেছেন: তার হাদীস তেমন শক্তিশালী নয়। আমি ইয়াকূব আল-ক্বুম্মী ছাড়া আর কাউকে তার থেকে বর্ণনা করতে শুনিনি। অন্য বর্ণনায় তিনি (ইবনু মাঈন) তার সম্পর্কে বলেছেন: তার কাছে মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীস আছে। তার থেকে ইয়াকূব আল-ক্বুম্মী এবং রাইয়ের কাযী 'আনবাসা বর্ণনা করেছেন।
আবু উবায়দ আল-আজুরী আবূ দাঊদ থেকে বর্ণনা করেছেন: তিনি মুনকারুল হাদীস (অস্বীকৃত হাদীসের বর্ণনাকারী)। অন্য এক স্থানে বলেছেন: আমি তাকে চিনি না, তিনি মুনকার হাদীস বর্ণনা করেছেন। নাসাঈ তাকে ‘আয-যু’আফা’ গ্রন্থে উল্লেখ করে বলেছেন: মুনকার। উকাইলী এবং ইবনু আদী তাকে দুর্বল বর্ণনাকারীদের তালিকায় উল্লেখ করেছেন। ইবনু আদী বলেছেন: তার হাদীস সংরক্ষিত নয়। আর তার এই হাদীসটিকে তিনি তার মুনকার হাদীসসমূহের মধ্যে উল্লেখ করেছেন (আল-কামিল ৫/১৮৮৯)।
তবে আবূ যুর'আ বলেছেন: “তার মধ্যে কোনো সমস্যা নেই।” আর ইবনু খুযাইমাহ ও ইবনু হিব্বান তার হাদীসকে সহীহ বলেছেন। ইমাম যাহাবী ‘আল-মীযান’-এ বলেছেন: “এর সনদ মধ্যম মানের।” আর ‘আল-কাশেফ’-এ বলেছেন: “তিনি সত্যবাদী (সাদুক)।” হাফিয ইবনু হাজার ‘আল-ফাতহ’ (৩/১২)-এ এ বিষয়ে নীরবতা অবলম্বন করেছেন। তিনি ভূমিকায় স্পষ্ট করেছেন যে যে হাদীস সম্পর্কে তিনি নীরব থাকেন, তা হাসান (উত্তম) মানের।
এ কারণেই আমি ‘আল-মিন্না আল-কুবরা’ (৩/৩৮৯)-তে বলেছি: “এ থেকে প্রতীয়মান হয় যে এই হাদীসটি হাসান লি-গাইরিহি (অন্য কারণে হাসান)-এর স্তর থেকে নিম্ন নয়, কারণ এটি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বর্ণিত রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর আমলের সঙ্গে মিলে যায় যে তিনি রমযানে বা অন্য সময়ে আট রাকাতের বেশি সালাত আদায় করতেন না...”
সুতরাং, যা প্রবলভাবে মনে হয় তা হলো, তিনি এই তিন রাতে জামাআতের সাথে এগারো রাকাত সালাত আদায় করেছিলেন, যেমনটি তিনি তাঁর ঘরে একাকী সালাত আদায় করতেন।
আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রমযানে বিশ রাকাত এবং বিতর পড়তেন, তা অত্যন্ত দুর্বল (যঈফ জিদ্দান)।
এটি ইবনু আবী শাইবাহ (২/১৬৪), ত্বাবারানী ফীল কাবীর (১১/৩৯৩) এবং তার সূত্রে বায়হাক্বী (২/৪৯৬), এবং আবদ ইবনু হুমাইদ (৬৫৩) বর্ণনা করেছেন আবূ শাইবাহ ইবরাহীম ইবনু উসমান-এর সূত্রে, তিনি হাকাম হতে, তিনি মিকসাম হতে, তিনি ইবনু আব্বাস হতে বর্ণনা করেছেন। আর এর দুর্বলতার কারণ হলেন এই আবূ শাইবাহ, যিনি ‘আত-তাকরীব’-এ বর্ণিত আছে যে পরিত্যক্ত (মাতরুক) রাবী।
আর যাহাবী এটি ‘আল-মীযান’-এ বর্ণনা করে বলেছেন: “এটি আবূ শাইবাহ-এর মুনকার (অস্বীকৃত) হাদীসসমূহের অন্তর্ভুক্ত।”
আর হাইসামী ‘আল-মাজমা’ (৩/১৭২)-এও এই রাবীর দুর্বলতার কারণে এটিকে ত্রুটিযুক্ত বলেছেন এবং এটিকে ‘আল-আওসাত’ গ্রন্থের দিকেও সম্বন্ধ করেছেন।
হাফিয যাইলায়ী ‘নাসবুর রায়াহ’ (২/১৫৩)-এ বলেছেন: “এটি আবূ শাইবাহ ইবরাহীম ইবনু উসমান, ইমাম আবূ বকর ইবনু আবী শাইবাহ-এর দাদা, এর কারণে ত্রুটিপূর্ণ। তার দুর্বলতার ব্যাপারে সবাই একমত, যদিও ইবনু আদী ‘আল-কামিল’-এ তাকে কিছুটা নরম প্রকৃতির বলেছেন। উপরন্তু, এটি আবূ সালামা ইবনু আব্দুর রহমান কর্তৃক আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে প্রশ্ন করার সহীহ হাদীসের বিরোধী।” (তিনি এরপর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি উল্লেখ করেছেন)।
4527 - عن السّائب بن يزيد أنه قال: أمر عمر بن الخطاب أبيَّ بنَ كعب وتميمًا الدّاريَّ أن يقوما للناس بإحدى عشرة ركعة. قال: وقد كان القارئُ يقرأُ بالمئين، حتى كنّا نعتمدُ على العصيِّ من طول القيام، وما كنّا ننصرف إلّا في فروع الفجر.
صحيح: رواه مالك في الصلاة في رمضان (4) عن محمد بن يوسف، عن السائب بن يزيد، فذكره.
وإسناده صحيح، السائب بن يزيد صحابي صغير، ومحمد بن يوسف الأعرج من ثقات التابعين، وهو ابن أخت السائب بن يزيد كما صرّحت الرواية بذلك في السنن الكبرى للبيهقي (2/ 496) من طريق مالك، وقد احتج به الشّيخان.
ورواه سعيد بن منصور في سننه من وجه آخر عن عبد العزيز بن محمد، عن محمد بن يوسف بإسناده، مثله. انظر شرح الموطأ للزرقاني (1/ 354).
وكذلك رواه يحيى بن سعيد عند أبي بكر بن أبي شيبة (2/ 391)، وإسماعيل بن جعفر في حديث علي بن حجر (440)، ومحمد بن إسحاق كما عند محمد بن نصر في قيام الليل (ص 42) كلّ هؤلاء عن محمد بن يوسف، به، مثله. إلّا أن ابن إسحاق فإنه قال:"ثلاث عشرة ركعة".
وهذه المتابعات تدل على أنّ مالكًا لم يخطئْ في قوله:"إحدى عشرة ركعة" ولم ينفرد بها كما قال الحافظ ابن عبد البر.
قال البيهقيّ في"فضائل الأوقات" (ص 275) بعد أن أخرج الحديث من طريق مالك: هكذا في هذه الرواية، وهي موافقة لرواية عائشة عن النبيّ صلى الله عليه وسلم في عدد ركعات قيامه في شهر رمضان وغيره. وكان عمر بن الخطاب أمر بهذا العدد زمانًا ثم أمر بما …" أي الآثار التي سوف تأتي عنه.
وأمّا ما رواه عبد الرزاق (7730) عن داود بن قيس وغيره، عن محمد بن يوسف، عن السائب ابن يزيد، أنّ عمر جمع الناس في رمضان على أبي بن كعب، وعلى تميم الداري على إحدى وعشرين ركعة، يقرؤون بالمئين، وينصرفون عند بزوغ الشمس".
هكذا قال في هذه الرواية"إحدى وعشرين" فيبدو أنه خطأ من عبد الرزاق، وهو وإن كان ثقة حافظًا فإنه قد عمي في آخر عمره فتغيّر، كما صرَّح به الحافظ في"التقريب".
فالصّحيح عن عمر بن الخطاب رضي الله عنه، أنه أمر أبي بن كعب وتميمًا الداري أن يقوما بإحدى عشرة ركعة تأسيًا بفعل رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولكن لما رأى طول القيام، وشعر بمشقة الناس، وفيهم الكبير والضعيف، أمر بتخفيف القراءة وإكثار الركوع والسجود؛ لأنّ صلاة التراويح من الصلوات النافلة يجوز فيها الزيادة والنقصان، وعليه تدل الآثار الآتية:
منها ما رواه السائب بن يزيد نفسه، قال:"كانوا يقومون على عهد عمر في شهر رمضان بعشرين ركعة، وإن كانوا ليقرأون بالمئين من القرآن".
رواه أبو القاسم البغويّ في حديث"علي بن الجعد" المعروف بالجعديات (3387) ومن طريقه البيهقي (2/ 496) عن ابن أبي ذئب، عن يزيد بن خصيفة، عن السائب بن يزيد، فذكره.
ورواه الفريابي في كتاب الصيام (158) من طريق يزيد بن هارون، عن ابن أبي ذئب، به، مثله. وزاد:"حتى كانوا يتوكأون على عصيهم من شدة القيام".
ورواه البيهقي في"المعرفة" (5409) من طريق محمد بن جعفر، قال: حدثني يزيد بن
خصيفة، عن السائب بن يزيد، قال:"كنا نقوم في زمان عمر بن الخطاب بعشرين ركعة والوتر".
ويزيد بن خصيفة ينسب إلى جدّه وهو يزيد بن عبد الله بن خصيفة ثقة، وثّقه الأئمة إلا أن أحمد قال فيه:"منكر الحديث" مع توثيقه له في رواية الأثرم عنه.
قال الحافظ ابن حجر في"هدي الساري" (ص 453):"هذه اللفظة يطلقها أحمد على من يُغرب على أقرانه بالحديث، عرف ذلك بالاستقراء من حاله، وقد احتج بابن خصيفة مالك والأئمة كلّهم" انتهى.
وهذا الأثر صحّحه ابن الملقن في"البدر المنير" (4/ 350) بعد أن عزاه للبيهقي، والنووي في"الخلاصة" كما في نصب الراية (2/ 154).
وأظنه كذلك، فإمّا أن تكون هي الرّواية الثانية عن السائب بن يزيد، بأن عمر بن الخطاب لما رأى طول القيام فيه مشقة خفّف عنهم القراءة وجعلها عشرين ركعة، أو أن يزيد بن خصيفة انفرد برواية هذا الأثر، وهو مخالف لما رواه غيره، وثبت عن عائشة أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم ما كان يزيد في رمضان أو في غير رمضان على إحدى عشرة ركعة، فحكم عليه الشذوذ؛ لأنّ يزيد بن خصيفة ومحمد بن يوسف كلاهما ثقتان يرويان عن السائب بن يزيد، والأول يقول في روايته:"إحدى وعشرين" والثاني يقول:"إحدى عشرة" فيرجح القول الثاني لأنه أوثق من صاحبه؛ ولذا اقتصر الحافظ في وصف يزيد بن خصيفة بأنه"ثقة" وقال في وصف محمد بن يوسف"ثقة ثبت".
ومنها ما رواه مالك في"الموطأ" في الصلاة في رمضان (5) عن يزيد بن رومان أنه قال:"كان الناسُ يقومون في زمان عمر بن الخطاب بثلاث وعشرين ركعة" ولكن فيه انقطاع.
لأن يزيد بن رومان من أقران ابن شهاب الزهريّ -كما في تهذيب الكمال- توفي سنة (130 هـ) ولم يدرك زمن عمر رضي الله عنه، بل قال المزي: عن أبي هريرة مرسل.
ونصَّ الزيلعي في"نصب الراية" (2/ 154) بأنه لم يدرك عمر بن الخطاب، وقال العيني في"عمدة القاري" (11/ 126):"سنده منقطع".
وقال البيهقي في"فضائل الأوقات" (ص 277):"مرسل".
ومنها ما رواه ابن أبي شيبة (2/ 393) عن وكيع، عن مالك بن أنس، عن يحيى بن سعيد:"أنّ عمر بن الخطاب أمر رجلًا يصلي بهم عشرين ركعة".
وفيه انقطاع أيضًا. لأنّ يحيى بن سعيد وهو الأنصاري لم يدرك عمر بن الخطاب.
قال علي بن المديني:"لا أعلمه سمع من صحابي غير أنس" كما في"التهذيب" (11/ 223).
وكذلك منها ما رواه ابن أبي شيبة، عن حميد بن عبد الرحمن، عن حسن (كذا ولعله: الحسن البصري، عن) عبد العزيز بن رفيع، قال:"كان أُبي بن كعب يصلي بالناس في رمضان بالمدينة عشرين ركعة ويوتر بثلاث".
وعبد العزيز بن رُفيع لم يدرك أبي بن كعب فإنه مات سنة ثلاثين ومائة أو بعدها، وقد أتى عليه نيّف وتسعون سنة، كما في تهذيب الكمال.
وعليه فتكون ولادته بعد الثلاثين، وأما أُبي بن كعب رضي الله عنه فإنه توفي سنة (19 هـ) أو (32 هـ).
وأيضًا فإنّ ابن رُفيع إنما يروي عن صغار الصحابة وكبار التابعين.
وروى الضياء المقدسي في المختارة (1161) من طريق أحمد بن منيع، أنا الحسن بن موسي، نا أبو جعفر الرازي، عن الربيع بن أنس، عن أبي العالية، عن أبي بن كعب، أنّ عمر أمر أبيَّا أن يُصلي بالناس في رمضان، فقال: إنّ الناس يصومون النّهار ولا يحسنون أن يقرأوا فلو قرأتَ عليهم بالليل. فقال: يا أمير المؤمنين، هذا شيء لم يكن؟ فقال: قد علمتُ، ولكنه أحسن، فصلّى بهم عشرين ركعة. وفيه أبو العالية وهو رفيع ثقة ولكنه كان يرسل كثيرا، وفيه ربيع بن أنس البكري، صدوق له أوهام وخاصة فيما رواه عنه أبو جعفر الرازي، قال ابن حبان:"الناس يتقون من حديثه ما كان من رواية أبي جعفر عنه لأن في أحاديثه عنه اضطرابا كثيرا".
ومنها ما رواه عبد الرزاق (7733) عن الأسلميّ، عن الحارث بن عبد الرحمن بن أبي ذُباب، عن السائب بن يزيد، قال:"كنا نتصرف من القيام على عهد عمر وقد دنا فروع الفجر، وكان القيام على عهد عمر ثلاثة وعشرين ركعة".
وإسناده واهٍ جدًّا، من أجل الأسلميّ، وهو إبراهيم بن محمد بن أبي يحيى، قال الحافظ:"متروك".
وأمّا الحارث بن عبد الرحمن بن عبد الله بن سعد بن أبي ذباب، فمختلف فيه، فقال أبو حاتم:"يروي عنه الدراوردي أحاديث منكرة، ليس بالقوي". وقال أبو زرعة:"ليس به بأس".
ويظهر من هذه الآثار مع رواية يزيد بن خصيفة أن عمر بن الخطاب رضي الله عنه أمر أولًا بإحدى عشرة ركعة، ثم أمر بعد ذلك بإحدى وعشرين ركعة.
قال ابن عبد البر:"يحتمل أن يكون القيام في أول ما عمل به عمر بإحدى عشر ركعة، ثم خفّف عليهم طول القيام، ونقلهم إلى إحدى وعشرين ركعة، يخفّفون فيها القراءة، ويزيدون في الركوع والسجود". الاستذكار (5/ 154).
وإلى نحو هذا الجمع جنح البيهقي فقال في"السنن" (2/ 496):
"ويمكن الجمع بين الروايتين، فإنهم كانوا يقومون بإحدى عشرة، ثم كانوا يقومون بعشرين ويوترون بثلاث" اهـ.
وقال عبد الحق الإشبيلي في كتابه"الصلاة والتهجد" (ص 287):"ويروى أنّ الناس اشتدّ عليهم طول القيام فشكوا ذلك إلى عمر بن الخطاب، فأمر القارئين أن يخفِّفا من طول القيام ويزيدا في عدد الركوع، فكانا يقومان بثلاث وعشرين ركعة، ثم شكوا فنقصوا من طول القيام زيدوا في
الركوع حتى أتمّوا ستًا وثلاثين، والوتر بثلاث، فاستقرّ الأمر على هذا" اهـ.
ولذا ذهب بعض أهل العلم إلى الزيادة على ثلاثين وعشرين، فروى ابن القاسم في"المدونة" عن الإمام مالك أنها تسع وثلاثون، وهو الأمر القديم الذي أدرك عليه أهل المدينة.
وقال صالح مولى التوأمة: أدركت الناس يقومون بإحدى وأربعين ركعة، يوترون منها بخمس، ذكره صاحب المغني (2/ 604).
وكان الأسود بن يزيد يصلي أربعين ركعة ويوتر بسبع إلى غير ذلك من الأقوال المذكورة في كتب السنة والفقه. (انظر: مختصر كتاب قيام رمضان ص 41 - 45).
وكأنّهم رأوا أنّ الأمر فيه سعة؛ لأنه داخل في مطلق النوافل، وليس من السنن الرواتب.
قال الشافعي:"وليس في شيء من هذا ضيق، ولا حدّ ينتهي إليه، لأنه نافلة فإنْ أطالوا القيام وأقلُّوا السجود فحسن -وهو أحبُّ إليَّ-، وإن أكثروا الركوع والسجود فحسن". المعرفة للبيهقي (4/ 42).
وقال إسحاق بن منصور: قلت لأحمد بن حنبل: كم من ركعة يصلَّي في قيام شهر رمضان؟ فقال: قد قيل فيه ألوان نحوًا من أربعين إنّما هو تطوّع. مختصر كتاب قيام رمضان (ص 45) إلا أن المختار عند الإمام أحمد عشرون ركعة، كما في المغني (2/ 604).
قلت: وقد يختلف باختلاف المصلين.
كما قال شيخ الإسلام ابن تيمية في"المجموع" (22/ 272):"إن نفس قيام رمضان لم يوقت النبيّ صلى الله عليه وسلم فيه عددًا معينًا، بل كان هو صلى الله عليه وسلم لا يزيد في رمضان ولا غيره على ثلاث عشرة ركعة، لكن كان يطيل الركعات، فلما جمعهم عمر على أبي بن كعب كان يصلي بهم عشرين ركعة، ثم يوتر بثلاث، وكان يخفف القراءة بقدر ما زاد من الركعات، لأنّ ذلك أخف على المأمومين من تطويل الركعة الواحدة، ثم كان طائفة من السلف يقومون بأربعين ركعة ويوترون بثلاث، وآخرون قاموا بست وثلاثين، وأوتروا بثلاث. وهذا كلّه سائغ، فكيفما قام في رمضان من هذه الوجوه، فقد أحسن.
والأفضل يختلف باختلاف أحوال المصلين، فإن كان فيهم احتمال لطول القيام، فالقيام بعشر ركعات وثلاث بعدها، كما كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يصلي لنفسه في رمضان وغيره هو الأفضل، وإن كانوا لا يحتملونه فالقيام بعشرين هو الأفضل" انتهى.
সা'ইব ইবনু ইয়াযীদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উবাই ইবনু কা'ব এবং তামীম আদ-দারীকে লোকদের নিয়ে এগারো রাকাত সালাত আদায় করার নির্দেশ দেন। তিনি (সা'ইব ইবনু ইয়াযীদ) বলেন: আর ক্বারী (ইমাম) শত শত আয়াত তিলাওয়াত করতেন। এমনকি দীর্ঘ কিয়াম করার কারণে আমরা লাঠির উপর ভর দিয়ে দাঁড়াতাম। আর আমরা কেবল ফজরের কাছাকাছি সময়েই (সালাত থেকে) ফিরতাম।
4528 - عن أبي ذرّ، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الرجل إذا صلى مع الإمام حتى ينصرف حُسِبَ له قيام ليلة".
صحيح: رواه أبو داود (1375)، والترمذي (806)، والنسائي (1364)، وابن ماجه (1327)
كلّهم من طريق داود بن أبي هند، عن الوليد بن عبد الرحمن الجرشيّ، عن جبير بن نفير الحضرميّ، عن أبي ذر، في حديث طويل. وإسناده صحيح، وقد سبق تخريجه.
وفي الباب ما روي عن أنس، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"من صلَّى المغرب والعشاء في جماعة حتى ينقضي شهر رمضان، فقد أصاب ليلة القدر بحظٍّ وافر".
رواه البيهقي في"فضائل الأوقات" (116) من حديث يحيى بن عقبة، عن محمد بن جحادة، عن أنس، فذكره.
ويحيى بن عقبة هو ابن أبي العيزار ضعيف جدًّا. قال ابن حبان في"المجروحين" (1203):"وكان ممن يروي الموضوعات عن أقوام أثبات، ويلزق المتون الموضوعة بالأسانيد الصحيحة، لا يجوز الاحتجاج به بحال من الأحوال". وضعّفه أيضًا ابن معين وأبو حاتم والنسائي.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أبي هريرة، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"من صلَّى العشاء الآخرة في جماعة في رمضان، فقد أدرك ليلة القدر".
رواه ابن خزيمة (2195)، والبيهقي في"فضائل الأوقات" (117) كلاهما من حديث عقبة بن أبي الحسنة، عن أبي هريرة، فذكره.
وعقبة بن أبي الحسنة مجهول، كما قال ابن المديني وأبو حاتم والذهبي وغيرهم.
ولكن ذكره ابن حبان في"الثقات" تبعًا لقاعدته، وعلى قاعدة شيخه ابن خزيمة.
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় কোনো ব্যক্তি যখন ইমামের সাথে সালাত আদায় করে যতক্ষণ না তিনি (ইমাম) ফিরে যান, তখন তার জন্য এক রাতের কিয়াম (নামাযে দাঁড়ানো) হিসেবে গণ্য করা হয়।"
4529 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من صام رمضان إيمانًا واحتسابًا غُفر له ما تقدّم من ذنبه، ومن قام ليلة القدر إيمانًا واحتسابًا غفر له ما تقدّم من ذنبه".
متفق عليه: رواه البخاري في فضل ليلة القدر (2014)، ومسلم في صلاة المسافرين (760) كلاهما من طريق أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ঈমান ও সাওয়াবের আশায় রমযানের রোযা রাখে, তার পূর্ববর্তী গুনাহসমূহ মাফ করে দেওয়া হয়। আর যে ব্যক্তি ঈমান ও সাওয়াবের আশায় কদরের রাতে (ইবাদতের জন্য) দাঁড়ায়, তারও পূর্ববর্তী গুনাহসমূহ মাফ করে দেওয়া হয়।"
4530 - عن عائشة، قالت: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم إذا دخل العشرُ أحيا اللّيل وأيقظ أهله وجدَّ وشدّ المئزر.
متفق عليه: رواه البخاري في فضل ليلة القدر (2024)، ومسلم في الاعتكاف (1174) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن أبي يعفور، عن أبي الضّحي مسلم بن صُبيح، عن مسروق، عن عائشة، قالت"فذكرته". واللفظ لمسلم.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন (রমযানের) শেষ দশ দিনে প্রবেশ করতেন, তখন তিনি রাত জাগরণ করতেন, তাঁর পরিবারকে জাগিয়ে দিতেন, কঠোর চেষ্টা করতেন এবং (ইবাদতের জন্য) লুঙ্গি শক্ত করে বাঁধতেন।
4531 - عن عائشة، قالت: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يجتهد في العشر الأواخر ما لا يجتهد في غيره.
صحيح: رواه مسلم في الاعتكاف (1175) من طريق عبد الواحد بن زياد، عن الحسن بن
عبيد الله، قال: سمعت إبراهيم يقول: سمعت الأسود بن يزيد يقول: قالت عائشة (فذكرته).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শেষ দশকে (ইবাদতে) এমন কঠোর সাধনা করতেন, যা তিনি অন্য সময়ে করতেন না।
4532 - عن على، قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم إذا كان العشر الأواخر من رمضان شمّر المئزر، واعتزل النساء.
حسن: رواه البيهقي في"الكبرى" (4/ 314)، وفي"فضائل الأوقات" (75) عن علي بن محمد ابن بشران ببغداد، حدثنا إسماعيل بن محمد الصفّار، حدثنا عبد الكريم بن الهيثم، حدثنا محمد بن الصباح، حدثنا هشيم، حدثنا شعبة، عن أبي إسحاق، عن عاصم بن ضمرة، عن علي، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عاصم بن ضمرة فإنه حسن الحديث.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রমাদানের শেষ দশ দিন আসত, তখন তিনি (ইবাদতের জন্য) কোমর শক্ত করে বেঁধে নিতেন এবং নারীদের (স্ত্রীদের) থেকে দূরে থাকতেন।
4533 - عن علي بن أبي طالب، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يوقظ أهله في العشر الأواخر من رمضان.
حسن: رواه الترمذي (795) عن محمود بن غيلان، حدثنا وكيع، حدثنا سفيان، عن أبي إسحاق، عن هبيرة بن بَريم، عن علي، فذكره.
قال الترمذي:"حسن صحيح".
قلت: يحتمل تحسينه فإنّ هبيرة بن يُريم -على وزن عظيم- مختلف فيه، فقال الإمام أحمد: لا بأس بحديثه. وذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 511)، وقال ابن سعد: كان معروفًا وليس بذاك. وضعّفه النسائي وجهّله ابن معين وأبو حاتم. فمثله لا بأس بحديثه كما قال أحمد، وخاصة إذا كان له شواهد.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমজানের শেষ দশকে তাঁর পরিবারবর্গকে (ইবাদতের জন্য) জাগিয়ে তুলতেন।
4534 - عن زرّ بن حبيش يقول: سألت أُبَيَّ بن كعب رضي الله عنه، فقلت: إنّ أخاك ابن مسعود يقول: مَنْ يَقُم الحوْلَ يُصِبْ ليلةَ القَدْر؟ فقال: رحمه الله أراد أن لا يتّكل الناس، أَمَا إنه قد علم أنها في رمضان، وأنّها في العشر الأواخر، وأنّها ليلة سبع وعشرين -ثم حلف لا يستثني- أنّها ليلة سبع وعشرين. فقلت: بأيِّ شيء تقول ذلك يا أبا المنذر؟ قال: بالعلامة أو بالآية التي أخبرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أنّها تطلُعُ يومئذ لا شعاع لها".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (762: 220) من طريق سفيان بن عيينة، عن عبدة وعاصم بن أبي النجود، سمعا زرّ بن حبيش يقول (فذكره). وعبدة هو ابن أبي لبابة.
وفي سنن أبي داود (1378) وغيره:"تصبح الشمس صبيحة تلك الليلة مثل الطّست ليس لها شعاع حتى ترتفع".
والطّست أي مظلمة لا ضوء لها.
যির্র ইবনু হুবাইশ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম। আমি বললাম: "আপনার ভাই ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যে ব্যক্তি সারা বছর রাত জেগে ইবাদত করবে, সে লাইলাতুল কদর পাবে?"
তিনি (উবাই) বললেন: "আল্লাহ তাকে রহমত করুন। তিনি চেয়েছিলেন যেন লোকেরা (একটি নির্দিষ্ট রাতে) ভরসা করে বসে না থাকে। জেনে রাখো, তিনি অবশ্যই জানেন যে, তা (লাইলাতুল কদর) রমজানে, আর তা হলো শেষ দশকে, আর তা হলো সাতাশতম রাত।" এরপর তিনি শপথ করে বললেন—কোনোরূপ ব্যতিক্রম না করেই—যে, তা সাতাশতম রাত।
আমি বললাম: "হে আবুল মুনযির! কীসের ভিত্তিতে আপনি এ কথা বলছেন?"
তিনি বললেন: "সেই নিদর্শন বা আলামতের ভিত্তিতে যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে জানিয়েছেন: 'ঐদিন সূর্য উদিত হবে, কিন্তু তার কোনো কিরণ থাকবে না'।"
4535 - عن ابن عباس، قال: أتيت وأنا نائم في رمضان، فقيل لي: إنّ الليلة ليلة القدر، فقمتُ وأنا ناعس، فتعلّقتُ ببعض أطناب فسطاط رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يصلي. فنظرتُ في الليلة فإذا هي ليلة ثلاث وعشرين.
قال ابن عباس: إنّ الشيطان يطلع مع الشمس كلّ يوم إلا ليلة القدر، وذلك أنها تطلع يومئذ ولا شعاع لها.
حسن: رواه البيهقيّ في"فضائل الأوقات" (104) من طريق مسدد، حدثنا أبو الأحوص، عن سماك، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (2302) عن عفان، حدثنا أبو الأحوص بإسناده إلا أنه لم يذكر علامة ليلة القدر. ورواه أبو داود الطيالسي (2790) عن سلام، عن سماك إلا أنه جعله ليلة أربع وعشرين. وسماك في عكرمة متكلّم فيه.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রমযান মাসে ঘুমন্ত অবস্থায় ছিলাম, তখন আমাকে বলা হলো: আজকের রাতটি লাইলাতুল কদর। আমি ঘুমন্ত অবস্থায়ই উঠে দাঁড়ালাম এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর তাঁবুর কিছু রশি ধরে ঝুলে রইলাম। অতঃপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট আসলাম যখন তিনি সালাত আদায় করছিলেন। আমি রাতটির দিকে লক্ষ্য করলাম, তখন তা ছিল তেইশতম রাত (২৩ তারিখের রাত)।
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বলেন: শয়তান প্রতিদিন সূর্যোদয়ের সময় সূর্যের সাথে ওঠে, লাইলাতুল কদর ব্যতীত। এর কারণ হলো, সেদিন সূর্য উদিত হয় কিন্তু তার কোনো তীব্র দীপ্তি (রশ্মি) থাকে না।
4536 - عن جابر بن عبد الله، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إني كنتُ أُريتُ ليلة القدر، ثم نسيتُها، وهي في العشر الأواخر من ليلتها، وهي ليلة طلقة بلجة، لا حارة ولا باردة".
وزاد الزيادي:"كأنّ فيها قمرًا يفضح كواكبها. وقالا: لا يخرج شيطانُها حتى يضيء فجرها".
حسن: رواه ابن خزيمة (2190) وعنه ابن حبان (3688) عن محمد بن زياد بن عبيد الله الزيادي، ومحمد بن موسى الحرشي، قالا: حدّثنا الفضيل بن سليمان، حدّثنا عبد الله بن عثمان بن خثيم، عن أبي الزبير، عن جابر بن عبد الله، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الفضيل بن سليمان وهو النميري فقد تكلم فيه أكثر أهل العلم إلا أنه يكتب حديثه كما قال أبو حاتم. يعني للاعتبار في الشواهد، وهذا منه، وقد انتقى البخاري رحمه الله من حديثه مما توبع عليه.
وفي الباب ما رُوي عن عبادة بن الصامت أنه سأل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ليلة القدر، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"في رمضان، فالتمسوها في العشر الأواخر، فإنها في وتر: في إحدى وعشرين، أو ثلاث وعشرين، أو خمس وعشرين، أو سبع وعشرين، أو في آخر الليلة. فمن قامها ابتغاءها إيمانا واحتسابًا، ثم وقّفتْ له، غفر له ما تقدّم من ذنبه وما تأخّر" إلا أنه ضعيف.
رواه الإمام أحمد (22713) عن أبي سعيد مولى بني هاشم، قال: حدّثنا سعيد بن سلمة -يعني ابن أبي الحسام-، حدّثنا عبد الله بن محمد بن عقيل، عن عمر بن عبد الرحمن، عن عبادة بن الصامت، فذكره.
وعمر بن عبد الرحمن، ذكره ابن حبان في"الثقات" ولم يوثقه غيره وله ترجمة في"التاريخ
الكبير"، و"الجرح والتعديل". ولكن لم يذكر فيه البخاري ولا ابن أبي حاتم شيئًا لا جرحًا ولا
تعديلًا فهو في عداد المجهولين. ولم يرو عنه غير عبد الله بن محمد بن عقيل.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (22765) عن حيوة بن شريح، حدّثنا بقية، حدثني بحير بن سعد،
عن خالد بن معدان، عن عبادة بن الصامت، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ليلة القدر في العشر البواقي،
من قامهن ابتغاء حسبتهن فإن الله يغفر له ما تقدّم من ذنبه وما تأخر، وهي ليلة وتر: تسع، أو سبع،
أو خامسة، أو ثالثة، أو آخر ليلة".
وقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ أمارة ليلة القدر أنها صافية بَلْجة، كأنّ فيها قمرًا ساطعًا ساكنة
ساجية، لا برد فيها ولا حرَّ، ولا يحل لكوكب أن يُرمي به فيها حتى يصبح، وإنّ أمارتها أن
الشمس صبيحتها تخرج مستوية، ليس لها شعاع مثل القمر ليلة البدر، لا يحل للشيطان أن يخرج
معها يومئذ".
وبقية هو ابن الوليد، وقد صرَّح بالتحديث في أول الإسناد وهو يكفي على رأي الجمهور. وفيه
خالد بن معدان لم يسمع من عبادة بن الصامت، قال أبو حاتم كما في المراسيل (183) وقال أبو
نعيم: لم يلق عبادة بن الصّامت. كما في"تهذيب الكمال".
وله إسناد آخر وهو ما رواه يعقوب بن سفيان (1/ 386)، والبيهقي في"الشعب" (3420) من
طريق إسحاق بن سليمان الرازي، قال: سمعت معاوية بن يحيى، عن الزهريّ، عن محمد بن
عبادة، عن عبادة بن الصامت به.
قال البيهقي:"في هذا الإسناد ضعف".
قلت: لعله يقصد به معاوية بن يحيى وهو الصدفي أبو روح الدمشقي. فإنه ضعيف جدًّا. قال
يحيى: هالك ليس بشيء. وقال الجوزجاني: ذاهب الحديث. وقال أبو زرعة: ليس بقوي،
أحاديثه كلها منكرة ما حدّث بالرّيِّ، والذي حدّث بالشام أحسن حالًا. وضعّفه أيضًا عدد من أهل
العلم.
وفي الباب أيضًا عن ابن عباس. رواه ابن خزيمة (2192) بلفظ:"ليلة طلقة لا حارة ولا
باردة، تُصبح الشمس يومها حمراء ضعيفة".
رواه من طريق زمعة، عن سلمة -وهو ابن وهرام-، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
ومن طريقه رواه أيضًا البزار -كشف الأستار (1034) - إلا أنه لم يذكر فيه:"تصبح الشمس
يومها …".
قال البزار: سلمة بن وهرام لا نعلم حدث عنه غير ابنه عبيد الله وزمعة، وهو من أهل اليمن لا
بأس به، وأحاديثه عن ابن عباس غرائب. ولا نعلم هذا بهذا اللفظ إلّا من حديثه.
قلت: وزمعة هو ابن صالح الجنديّ -بفتح الجيم والنون- ضعيف عند جمهور أهل العلم،
وحديثه عند مسلم مقرون.
وشيخه سلمة بن وهرام مختلف فيه فوثقه أبو زرعة، وضعّفه أبو داود، وهو حسن الحديث إذا لم يأت في حديثه ما ينكر عليه.
জাবির ইবন আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমাকে লাইলাতুল ক্বদর দেখানো হয়েছিল, অতঃপর আমি তা ভুলে গেছি। এটি (রমজানের) শেষ দশকে (শেষ দশকের রাতের মধ্যে) রয়েছে। এটি একটি নির্মল, ঝলমলে রাত, যা উষ্ণও নয় এবং শীতলও নয়।" আর আল-যিয়াদি অতিরিক্ত বলেছেন: "যেন তাতে এমন চাঁদ থাকে যা তার নক্ষত্রগুলোকে ম্লান করে দেয়। এবং তারা দুজন (বর্ণনাকারী) বলেছেন: এর শয়তান এর ভোর আলোকিত না হওয়া পর্যন্ত বের হয় না।"
4537 - عن عائشة، قالت: قلتُ: يا رسول الله، أرأيتَ إن علمتُ ليلة القدر ما أقول فيها؟ قال:"قولي: اللهمّ! إنّك عفوٌّ تحبُّ العفوَ فاعفُ عنّي".
صحيح: رواه الترمذي (3513)، وابن ماجه (3850) كلاهما من حديث كهمس بن الحسن، عن عبد الله بن بريدة، عن عائشة، فذكرته.
ورواه الإمام أحمد (25384)، والنسائي في عمل اليوم والليلة (872) (873) (874)، والحاكم (1/ 530)، والبيهقي في"فضائل الأوقات" (113) كلّهم من هذا الطريق.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
وقال الترمذي:"حسن صحيح" وصحّحه النووي في"الأذكار". ولكن قال النسائي:"مرسل".
ونقل الدارقطني في"السنن" (3557) في كتاب النكاح عن عبد الله بن بريدة، عن عائشة، قالت: جاءت امرأة تريد رسول الله صلى الله عليه وسلم فلم تلقه، فجلستْ تنتظره حتى جاء …".
وقال:"هذه كلّها مراسيل، ابن بريدة لم يسمع من عائشة".
هكذا نقله عنه أيضًا ابن حجر في"تهذيب التهذيب"، وفي"إتحاف المهرة" وجاء في المطبوعة في آخره:"شيئًا".
وذكر الدارقطنيّ في"العلل" (3860) حديث الباب وذكر الخلاف الذي وقع في إسناده، ولم يحكم عليه بالإرسال أو الانقطاع. وإنما قال فقط:"الصحيح عن ابن بريدة، عن عائشة".
ثم رواه أيضًا سليمان بن بريدة عن عائشة، فذكرت مثله.
رواه النسائي في عمل اليوم والليلة (877) من وجه آخر عن سفيان الثوري، عن علقمة بن مرثد، عنه، وقد رُوي أيضًا عنها موقوفًا من وجه آخر بإسناد صحيح.
وبمجموع هذه الأسانيد يحسّن هذا الحديث، وقد سبق أن صحّحه الترمذي، وبناء عليه ردّ الحافظ ابن حجر دعوى عدم سماع عبد الله بن بريدة من عائشة. والله تعالى أعلم
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ! যদি আমি জানতে পারি যে কোনটি লাইলাতুল কদর (কদরের রাত), তাহলে আমি তাতে কী বলব? তিনি বললেন: তুমি বলো: "আল্লাহুম্মা ইন্নাকা 'আফুওউন তুহিব্বুল 'আফওয়া ফা'ফু 'আন্নী" (অর্থাৎ: হে আল্লাহ! আপনি ক্ষমাশীল, আপনি ক্ষমা করতে ভালোবাসেন, সুতরাং আমাকে ক্ষমা করে দিন)।
4538 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أُريتُ ليلة القدر، ثم أيقظني بعضُ أهلي، فنُسِّيتُها، فالتمسوها في العشْر الغوابر".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1166) من طريق ابن وهب، أخبرني يونس، عن ابن شهاب، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي هريرة، فذكره.
قوله:"الغوابر" يعني البواقي، وهي الأواخر.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে লাইলাতুল কদর দেখানো হয়েছিল, অতঃপর আমার পরিবারের কেউ আমাকে জাগিয়ে তুলল, ফলে আমি তা ভুলিয়ে গেলাম। সুতরাং তোমরা তা অবশিষ্ট দশকে তালাশ করো।"
4539 - عن ابن عمر، قال: وكان الناس لا يزالون يقصون على النبيّ صلى الله عليه وسلم الرؤيا: أنّها في الليلة السابعة من العشر الأواخر، فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"أرى رؤياكم قد تواطت في العشر الأواخر، فمن كان متحريها فليتحرّها من العشر الأواخر".
متفق عليه: رواه البخاري في التهجد (1158)، ومسلم في فضائل الصحابة (2478) كلاهما من حديث حماد بن زيد، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
واللفظ للبخاريّ، فإنه ذكر تحت هذا الإسناد ثلاثة أحاديث، وهذا منها. ولم يذكر مسلمٌ تحت هذا الإسناد إلا حديثًا واحدًا غير هذا، وستأتي في فضائل ابن عمر.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, লোকেরা সর্বদা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে স্বপ্ন বর্ণনা করত যে, (শবে কদর) শেষ দশ দিনের সপ্তম রাতে। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "আমি দেখছি তোমাদের স্বপ্ন শেষ দশকে ঐক্যবদ্ধ (বা অভিন্ন ইঙ্গিতবাহী)। তাই যে ব্যক্তি এর সন্ধান করতে চায়, সে যেন শেষ দশকেই এর সন্ধান করে।"
4540 - عن ابن عمر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"من كان منكم مُلتمسها، فليلتمسها في العشر الأواخر".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1165: 210) عن محمد بن المثني، حدثنا محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن جبلة، قال: سمعت ابن عمر يقول (فذكر الحديث).
ইবনু উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি এর (কদরের রাতের) সন্ধান করতে চায়, সে যেন তা শেষ দশকে তালাশ করে।"