হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4541)


4541 - عن الفلتان بن عاصم، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إني رأيت ليلة القدر، ثم أنسيتها، ورأيتُ مسيح الضّلالة، ورأيت رجلين يتلاحيان، فحجزت بينهما، فأنسيتُهما. فأمّا ليلة القدر فاطلبوها في العشر الأواخر. وأما مسيح الضلالة فرجل أجلى الجبهة، ممسوح العين اليسرى، عريض النحر فيه دفأ كأنه فلان بن عبد العزّى، أو عبد العزّي بن فلان".

حسن: رواه أبو بكر بن أبي شيبة في"مسنده" -المطالب العالية (1115) -، حدثنا عبد الله بن إدريس، عن عاصم بن كليب، عن أبيه، عن خاله الفلتان بن عاصم، فذكره.

ومن طريقه أخرجه الطبراني في"الكبير" (18/ 335).

وإسناده حسن من أجل عاصم وأبيه فهما صدوقان.

والحديث أخرجه أيضًا الطبراني، وأبو القاسم البغوي، وابن السكن، وابن شاهين، وغيرهم من طرق عن عاصم بن كليب، به، نحوه.

ذكره الحافظ في"الإصابة" (3/ 209) في ترجمة (الفلتان بن عاصم).




আল-ফালতান ইবনে আসিম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি কদরের রাত (লাইলাতুল কদর) দেখেছি, এরপর আমাকে তা ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে। আমি ভ্রষ্টতার মসীহকে (মাসিহুদ দালালাহ) দেখেছি এবং দুজন লোককে ঝগড়া করতে দেখেছি। আমি তাদের মাঝে মীমাংসা করে দিয়েছি, ফলে আমাকে তাদের (নাম বা পরিচয়) ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে। সুতরাং, কদরের রাত তোমরা শেষ দশকে অনুসন্ধান করো। আর ভ্রষ্টতার মসীহ হল এমন এক ব্যক্তি, যার কপাল প্রশস্ত, বাম চোখ নিশ্চিহ্ন (বা মোছা), প্রশস্ত বক্ষবিশিষ্ট এবং এতে উষ্ণতা (বা স্থূলতা) রয়েছে। সে যেন অমুক ইবনে আব্দুল উযযা, অথবা আব্দুল উযযা ইবনে অমুক।"









আল-জামি` আল-কামিল (4542)


4542 - عن جابر بن سمرة، أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"التمسوا ليلة القدر في العشر الأواخر".
حسن: رواه الإمام أحمد (20809) عن سليمان بن داود، عن شريك، عن سماك، عن جابر ابن سمرة، فذكره. وشريك هو ابن عبد الله القاضي سيء الحفظ إلا أنه توبع.

رواه ابن أبي شيبة (2/ 513) عن عمرو بن طلحة، عن أسباط بن نصر، عن سماك بن حرب، بإسناده، مثله.

وأسباط بن نصر لا بأس به في المتابعة، وقد قال فيه البخاري:"صدوق".

ورواه عبد الله بن أحمد (20930)، والبزار -كشف الأستار (1031) - كلاهما من طريق عبد الرحمن بن شريك، قال: حدثني أبي، عن سماك، بإسناده، مثله. وزاد:"في وتر، فإني قد رأيتها فنُسيتُها، وهي ليلة مطر وريح" أو قال:"قطر وريح".

وعبد الرحمن بن شريك أسوأ من أبيه، قال فيه أبو حاتم: واهي الحديث. ومع ذلك ذكره ابن حبان في"الثقات" (8/ 375) ولكن قال فيه: ربما أخطأ.

ورواه الطبراني في"المعجم الصغير" (285) من وجه آخر عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: وجدتُ في كتاب أبي بخطّه، حدثنا شعبة، عن سماك بن حرب، بإسناده، بلفظ:"التمسوا ليلة القدر، ليلة سبع وعشرين".

قال الطبراني: لم يروه عن شعبة إلا محمد بن أبي شيبة.

قلت: ووالد أبي بكر بن أبي شيبة هو محمد بن إبراهيم بن عثمان العبسيّ مولاهم الكوفي"ثقة".

فلا يضرّ تفرّده لشهرة هذا الحديث من حديث شعبة كما مضى.




জাবির ইবনু সামুরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা লাইলাতুল কদরকে শেষ দশ রাতের মধ্যে অনুসন্ধান করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4543)


4543 - عن معاذ بن جبل، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن ليلة القدر، فقال:"هي في العشر الأواخر، أو في الخامسة، أو في الثالثة".

حسن: رواه أحمد (22043)، والطبراني في"الكبير" (20/ 92) من حديث بقية بن الوليد، حدثني بَحير بن سعد، عن خالد بن معدان، عن أبي بحرية، عن معاذ بن جبل، فذكره.

وإسناده حسن من أجل بقية بن الوليد فإنه صدوق إذا صرَّح، وإلا فهو كثير التدليس عن الضعفاء.

وقد صرَّح في رواية أحمد، وقد اشترط بعض أهل العلم التصريح في جميع طبقات السند، والجمهور على أنه يقبل إذا صرّح في طبقة شيوخه.

وأبو بحرية اسمه عبد الله بن قيس الكندي الحمصي، ثقة، وهو مشهور بكنيته.

وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أقبل إليهم مسرعًا، قال: حتى أفزعنا من سرعته، فلما انتهى إلينا، قال:"جئتُ مسرعًا أخبركم بليلة القدر فأْنسيتُها بيني وبينكم، ولكن التمسوها في العشر الأواخر من رمضان".

رواه الإمام أحمد (2352)، والطبراني في الكبير (12621) كلاهما من طريق قابوس بن أبي
ظبيان، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره.

وقابوس مختلف فيه، وأكثر أهل العلم على أنه ضعيف، حتى قال ابن حبان:"ينفرد عن أبيه بما لا أصل له".

قلت: ليس كما قال، فإنّ هذا الحديث له شواهد كثيرة كما مضى إلا قوله:"فأنسيتُها بيني وبينكم". وأما أبو ظبيان فهو حصين بن جندب الجنبي الكوفي من رجال الجماعة.




মু'আয ইবনু জাবাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে লাইলাতুল কদর সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হয়েছিল। তখন তিনি বললেন: "তা (রমাদানের) শেষ দশ দিনে, অথবা পাঁচ দিনে, অথবা তিন দিনে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4544)


4544 - عن عائشة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"تحرّوا ليلة القدر في الوِتْر من العشر الأواخر من رمضان".

متفق عليه: رواه البخاري في فضل ليلة القدر (2017) من طريق أبي سُهيل، عن أبيه، عن عائشة. وأبو سهيل هو نافع بن مالك بن أبي عامر الأصبحيّ.

ورواه أيضًا (2020) هو ومسلم في الصيام (1169) كلاهما من طريق هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، قالت: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يجاورُ في العشر الأواخر من رمضان ويقول:"تحرَّوا ليلة القدْر في العشر الأواخر من رمضان" واللفظ للبخاري.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা রমাদানের শেষ দশ দিনের বেজোড় রাতগুলোতে শবে কদর সন্ধান করো।"

তিনি (আয়িশা) আরও বলেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাদানের শেষ দশকে ইতিকাফ করতেন এবং বলতেন: "তোমরা রমাদানের শেষ দশকে শবে কদর সন্ধান করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4545)


4545 - عن أبي سعيد الخدريّ أنه قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يعتكفُ العشْر الوسط من رمضان، فاعتكف عامًا، حتى إذا كان ليلةَ إحدى وعشرين. وهي التي يخرجُ فيها من صُبحها من اعتكافه. قال:"من اعتكف معي فليعتكف العشر الأواخر. وقد رأيت هذه الليلة، ثم أُنْسيتُها. وقد رأيتُني أسجدُ من صبحها في ماء وطين. فالتَمسوها في العشر الأواخر، والتمسوها في كلِّ وِتْر".

قال أبو سعيد: فأُمطرت السماءُ تلك الليلة، وكان المسجدُ على عريشٍ، فوكف المسجدُ. قال أبو سعيد: فأبصرت عينايَ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم انصرف وعلى جبهته وأنفه أثرُ الماء والطين: من صبح ليلة إحدى وعشرين.

متفق عليه: رواه مالك في الاعتكاف (9) عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم ابن الحارث التيمي، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي سعيد، فذكره.

ورواه البخاري في الاعتكاف (2027) عن مالك.

وروياه -البخاري (813)، ومسلم (1167: 216) - كلاهما من حديث يحيى، عن أبي سلمة، عن أبي سعيد، فذكره.




আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাদানের মধ্যবর্তী দশকে ই'তিকাফ করতেন। তিনি একবার ই'তিকাফে বসেন। এরপর যখন একুশতম রাত এলো—যে রাতের পরদিন সকালে তিনি ই'তিকাফ শেষ করে বের হতেন—তিনি বললেন, "যে ব্যক্তি আমার সাথে ই'তিকাফ করেছে, সে যেন শেষ দশকেও ই'তিকাফ করে। আমি এই রাতটি (ক্বদরের রাত) দেখেছিলাম, কিন্তু পরে আমাকে তা ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে। আমি নিজেকে এই রাতের পরদিন সকালে পানি ও কাদার মধ্যে সিজদা করতে দেখেছি। সুতরাং তোমরা শেষ দশকে তা (লাইলাতুল ক্বদর) সন্ধান করো, আর প্রতিটি বিজোড় রাতে তা তালাশ করো।"

আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, সেই রাতে আকাশ থেকে বৃষ্টি বর্ষিত হলো। মসজিদটি ছিল খেজুর ডালের ছাউনিযুক্ত, ফলে মসজিদের ছাদ চুইয়ে পানি পড়ছিল। আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, আমার চোখ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছিল, যখন তিনি (ফজরের সালাত শেষে) ফিরলেন, তখন তাঁর কপাল ও নাকের ওপর পানি ও কাদার চিহ্ন লেগে ছিল। এই ঘটনাটি ছিল একুশতম রাতের সকালের।









আল-জামি` আল-কামিল (4546)


4546 - عن ابن عمر، قال: رأى رجلٌ أنّ ليلة القدر ليلة سبع وعشرين. فقال النبيُّ
- صلى الله عليه وسلم:"أرى رؤياكم في العشر الأواخر، فاطلبوها في الوتر منها".

متفق عليه: رواه مسلم في الصيام (1165: 207) من طرق عن سفيان بن عيينة، عن الزهريّ، عن سالم، عن أبيه، فذكره.

ورواه البخاريّ في التعبير (6991) من طريق عُقيل، عن ابن شهاب، بلفظ: أنّ ناسًا أُروا ليلة القدر في السبع الأواخر، وأنّ أناسًا أُروا أنها في العشر الأواخر، فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"التمسوها في السّبع الأواخر" ولم يذكر فيه"الوتر".




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, এক ব্যক্তি স্বপ্নে দেখল যে, কদরের রাত হলো সাতাশতম রাত। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “আমি তোমাদের স্বপ্নগুলোকে শেষ দশকেই (ঐকমত্যে আসতে) দেখছি। সুতরাং তোমরা সেই দশকের বেজোড় রাতগুলিতে তা তালাশ করো।”









আল-জামি` আল-কামিল (4547)


4547 - عن أبي بكرة، قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"التمسوها في تسع بقين، أو سبع بقين، أو خمس بقين، أو في ثلاث أواخر ليلة".

حسن: رواه الترمذي (794) عن حُميد بن مسعدة، حدثنا يزيد بن زريع، حدثنا عيينة بن عبد الرحمن، قال: حدثني أبي، قال: ذُكرتْ ليلة القدر عند أبي بكرة، قال: ما أنا ملتمسها لشيء سمعتُه من رسول الله صلى الله عليه وسلم إلّا في العشر الأواخر، فإني سمعته يقول (فذكر الحديث).

وإسناده حسن. وقد رواه الإمام أحمد (20376)، وأبو داود الطيالسي (922)، وصحّحه ابن خزيمة (2175)، وعنه ابن حبان (3686)، والحاكم (1/ 438) كلهم من وجه آخر عن عيينة بن عبد الرحمن بإسناده، نحوه. وزاد بعضهم في آخر الحديث:"فكان لا يصلي في العشرين إلا كصلاته في سائر السنة، فإذا دخل العشر اجتهد". قال الترمذي: حسن صحيح.

قلت: فيه عيينة بن عبد الرحمن وهو ابن جوشن الغطفاني"صدوق" كما في"التقريب"، وثقه النسائي، وقال أحمد: ليس به بأس.

وأبوه عبد الرحمن بن جوشن الغطفاني أحسن حالًا منه، وثّقه أبو زرعة وابن سعد والعجلي وابن حبان. وقال أحمد:"ليس بالمشهور".

قلت: لأنه لم يذكر من الرواة عنه غير ابنه عيينة. وله أحاديث كثيرة يرويها عن أبي بكرة وغيره، فسبر أهل العلم هذه الأحاديث فلم يجدوا فيها ما ينكر عليه فوثقوه.




আবু বকরাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "তোমরা তা (লাইলাতুল কদর) তালাশ করো যখন নয় রাত বাকি থাকে, অথবা সাত রাত বাকি থাকে, অথবা পাঁচ রাত বাকি থাকে, অথবা শেষ তিন রাতের মধ্যে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4548)


4548 - عن عبد الله بن مسعود، قال: سئل النبيّ صلى الله عليه وسلم عن ليلة القدر، فقال:"كنتُ أُعلمتُها، ثم انفلتَتْ مني، فاطلبوها في سبع يبقين، أو ثلاث يبقين".

حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1028) - عن يوسف بن موسي، ثنا عبد الله بن الجهم، ثنا عمرو بن أبي قيس، عن الزبير بن عدي، عن أبي وائل، عن عبد الله، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن الجهم الرازي فإنه حسن الحديث. قال أبو زرعة: صدوق، وذكره ابن حبان في"الثقات" إلا أن أبا حاتم لم يكتب عنه، وقد رآه وكان يتشيع. وبقية رجاله ثقات.




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে লাইলাতুল কদর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তখন তিনি বললেন: "আমাকে তা জানানো হয়েছিল, কিন্তু পরে তা আমার কাছ থেকে ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে। সুতরাং তোমরা তা সন্ধান করো যখন (রমযানের) সাতটি রাত অবশিষ্ট থাকে, অথবা যখন তিনটি রাত অবশিষ্ট থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4549)


4549 - عن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"التمسوا ليلة القدر في العشر الأواخر
من رمضان". وزاد البزار:"وترًا".

حسن: رواه أبو يعلي (165)، والبزار -كشف الأستار (1027) - كلاهما من حديث عاصم بن كليب، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عاصم بن كليب فإنه حسن الحديث.

ومن طريقه رواه أيضًا البيهقي (4/ 313).

وفي الباب عن مرثد قال: سألت أبا ذر قلتُ: كنتَ سألتَ رسول الله صلى الله عليه وسلم عن ليلة القدر؟ قال: أنا كنتُ أسأل الناس عنها! قال: قلتُ: يا رسول الله، أخبرني عن ليلة القدر أفي رمضان هي، أو في غيره؟ قال:"بل هي في رمضان". قال: قلت: تكون مع الأنبياء ما كانوا فإذا قبضوا رفعت، أم هي إلى يوم القيامة؟ قال:"بل هي إلى يوم القيامة". قال: قلت: في أيِّ رمضان هي؟ قال:"التمسوها في العشر الأوّل، والعشر الأواخر". ثم حدَّث رسول الله صلى الله عليه وسلم وحدث ثم اهتبلت غفلته، قلتُ: في أيِّ العشرين هي؟ قال:"ابتغوها في العشر الأواخر لا تسألني عن شيء بعدها".

ثم حدّث رسول الله صلى الله عليه وسلم وحدّث، ثم اهتبلْتُ غفلته، فقلتُ: يا رسول الله، أقسمتُ عليك بحقّي عليك لما أخبرتني في أيِّ العشر هي؟ قال: فغضب عليَّ غضبًا لم يغضبْ مثله منذ صحبتُه أو صاحبته (كلمة نحوها) قال:"التمسُوها في السبع الأواخر لا تسألني عن شيء بعدها".

رواه الإمام أحمد (21499)، والبزار في مسنده (4068)، وابن خزيمة (2170)، والحاكم (1/ 437، 2/ 530 - 531)، والبيهقي (4/ 307) كلّهم من طريق عكرمة بن عمار، حدثني أبو زُميل سماك الحنفيّ، حدثني مالك بن مرثد بن عبد الله الزماني، حدثني أبي مرثد، قال (فذكره).

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: مالك بن مرثد وأبوه مرثد ليسا من رجال مسلم، وإنما أخرج لهما البخاري في"الأدب المفرد" إلا أن مالك بن مرثد بن عبد الله ثقة.

وأما أبوه فقال الذهبي في"الميزان" (4/ 87):"فيه جهالة. ذكره العقيلي وقال: لا يتابع على حديثه. هكذا وجدتُ بخطّي، فلا أدري من أين نقلته إلا أنه ليس بمعروف، وقد أفرده شيخنا أبو الحجاج عن مرثد بن عبد الله اليزني، ما روى عنه سوى ولده مالك. فأما اليزني فيكنى أبا الخير من كبار التابعين بمصر".

وأما توثيق العجلي، وابن حبان له، فذلك من تساهلهما المعروف. ولا سيما وأن في متنه بعض النكارة لمخالفته المعروف من هدي النبيّ صلى الله عليه وسلم.

وفيه علة أخرى، وهي الاضطراب في الإسناد، فقد رواه الأوزاعي، عن مالك بن مرثد، عن أبيه. هكذا رواه ابن حبان - كما في"الموارد" (926) عن ابن سلم، حدثنا عبد الرحمن بن إبراهيم، حدثنا الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، بإسناده.
وفي صحيح ابن حبان المطبوع (3683) بنفس هذا الإسناد عن الأوزاعي، قال: حدثني مرثد ابن أبي مرثد، عن أبيه، بدون ذكر"مالك".

ورواه ابن خزيمة (2169) عن محمد بن رافع، حدثنا أبو عاصم، عن الأوزاعي، عن مرثد أو أبي مرثد -شك أبو عاصم-، عن أبيه، قال (فذكر الحديث).

وأبو عاصم هو الضحّاك بن مخلد لم يحفظ اسم الراوي تبعًا لشيخه الأوزاعي فإنه تردّد بين مرثد أو أبي مرثد، والصواب أنه ابن مرثد وهو مالك بن مرثد. فيكون الأوزاعي قد تابع سماكًا الحنفي كلاهما يرويان عن مالك بن مرثد، عن أبيه.




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা রমাদানের শেষ দশকে শবে কদর সন্ধান করো।" বাযযার (Bazzar) এর বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: "বেজোড় রাতে।"

আর এই বিষয়ে মুরছিদ (Marathad) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে শবে কদর সম্পর্কে জিজ্ঞেস করেছিলেন? তিনি বললেন: আমিই তো মানুষদেরকে এ সম্পর্কে জিজ্ঞেস করতাম! তিনি (মুরছিদ) বললেন: আমি বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমাকে শবে কদর সম্পর্কে অবহিত করুন, এটা কি রমাদানে নাকি অন্য কোনো মাসে? তিনি বললেন: "বরং এটা রমাদানে।" তিনি বললেন: আমি বললাম: এটা কি নবীরা যতদিন ছিলেন ততদিনই ছিল, আর যখন তাঁদের ওফাত হলো তখন উঠিয়ে নেওয়া হলো, নাকি এটা কিয়ামত পর্যন্ত থাকবে? তিনি বললেন: "বরং এটা কিয়ামত পর্যন্ত থাকবে।" তিনি বললেন: আমি বললাম: রমাদানের কোন্ অংশে এটি? তিনি বললেন: "তোমরা তা প্রথম দশকে এবং শেষ দশকে সন্ধান করো।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আলোচনা করলেন ও কথা বললেন। এরপর আমি তাঁর অন্যমনস্কতার সুযোগ নিয়ে বললাম: এই দুই দশকের মধ্যে কোন্ দশকে এটি? তিনি বললেন: "তোমরা শেষ দশকে এটিকে অন্বেষণ করো। এরপর এ বিষয়ে আমাকে আর কিছু জিজ্ঞেস করো না।" অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আলোচনা করলেন ও কথা বললেন। এরপর আমি তাঁর অন্যমনস্কতার সুযোগ নিলাম এবং বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আপনার উপর আমার যে হক আছে তার কসম দিয়ে বলছি, আপনি অবশ্যই আমাকে বলে দিন এটি কোন্ দশকে? তিনি আমার প্রতি এমন রাগান্বিত হলেন, আমার সাহচর্য লাভের পর তিনি এমন রাগান্বিত হননি (বা এই ধরনের কোনো শব্দ)। তিনি বললেন: "তোমরা শেষ সাত রাতে এটিকে সন্ধান করো। এরপর এ বিষয়ে আমাকে আর কিছু জিজ্ঞেস করো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4550)


4550 - عن أبي سعيد الخدري قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يجاور في رمضان العشر التي في وسط الشهر فإذا كان حين يمسي من عشرين ليلة تمضي ويستقبل إحدى وعشرين رجع إلى مسكنه ورجع من كان يجاور معه وأنه أقام في شهر جاور فيه الليلة التي كان يرجع فيها فخطب الناس فأمرهم ما شاء الله ثم قال:"كنت أجاور هذه العشر، ثم قد بدا لي أن أجاور هذه العشر الأواخر، فمن كان اعتكف معي فليثبت في معتكفه. وقد أُريت هذه الليلة ثم أُنسيتُها فابتغوها في العشر الأواخر، وابتغوها في كلِّ وتر، وقد رأيتني أسجد في ماء وطين".

فاستهلت السماء في تلك الليلة فأمطرت فوكف المسجد في مصلى النبي صلى الله عليه وسلم ليلة إحدى وعشرين فبصرت عيني رسول الله صلى الله عليه وسلم ونظرت إليه انصرف من الصّبح ووجهه ممتلئٌ طينًا وماء.

متفق عليه: رواه البخاريّ في فضل ليلة القدر (2018)، ومسلم في الصيام (1167: 214) كلاهما من طريق يزيد بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي سعيد الخدري، فذكره. واللفظ للبخاري.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসের মধ্যম দশকে ইতিকাফ করতেন। যখন বিশ রাত চলে যেত এবং একুশতম রাত আসত, তখন তিনি তাঁর বাসস্থানে ফিরে যেতেন এবং যারা তাঁর সাথে ইতিকাফ করত, তারাও ফিরে যেত।

কিন্তু একবার যে মাসে তিনি ইতিকাফ করছিলেন, সেই রাতে তিনি তাঁর ফেরার সময়ও সেখানে থাকার সিদ্ধান্ত নিলেন। অতঃপর তিনি লোকজনকে ভাষণ দিলেন এবং আল্লাহ্ যা ইচ্ছা করলেন, তিনি তাদের সেই আদেশ দিলেন। এরপর তিনি বললেন: "আমি এই (মধ্যম) দশকে ইতিকাফ করছিলাম, এখন আমার কাছে প্রতীয়মান হয়েছে যে আমি এই শেষ দশকে ইতিকাফ করব। তাই যে ব্যক্তি আমার সাথে ইতিকাফ করেছে, সে যেন তার ইতিকাফের জায়গায় স্থির থাকে। আমাকে এই রাতটি (কদরের রাত) দেখানো হয়েছিল, কিন্তু পরে তা ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে। সুতরাং তোমরা এটি শেষ দশকে সন্ধান করো এবং প্রতি বেজোড় রাতে সন্ধান করো। আমি নিজেকে পানি ও কাদার মধ্যে সিজদা করতে দেখেছি।"

অতঃপর সেই রাতে আকাশ মেঘমুক্ত হলো এবং বৃষ্টি নামল। একুশতম রাতে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের স্থানে মসজিদের চালা দিয়ে পানি ঝরতে শুরু করল। আমার চোখ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখল এবং আমি লক্ষ করলাম যে তিনি যখন সকালের সালাত থেকে ফিরছিলেন, তখন তাঁর মুখমণ্ডল কাদা ও পানিতে ভরে ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (4551)


4551 - عن عبد الله بن أُنيس، أنّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم قال:"أُريتُ ليلة القدر ثم أُنسيتُها، وأراني صُبْحَها أسجُدُ في ماء وطين". قال: فمطرنا ليلة ثلاثٍ وعشرين، فصلّي بنا رسولُ الله صلى الله عليه وسلم، فانصرف وإنَّ أثر الماءِ والطِّين على جبهته وأنفه.

قال: وكان عبد الله بن أنيس يقول: ثلاثٍ وعشرين.

صحيح: رواه مسلم في الصيام (1168) من طريق أبي ضمرة، عن أبي النّضر مولي ابن
عبيد الله، عن بُسر بن سعيد، عن عبد الله بن أُنيس، فذكره.

وأبو ضمرة هو أنس بن عياض الليثيّ.




আব্দুল্লাহ ইবনে উনাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে কদরের রাত দেখানো হয়েছিল, এরপর তা ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে। তবে আমাকে (স্বপ্নে) দেখানো হয়েছিল যে, আমি সেই রাতের ভোরে পানি ও কাদার মধ্যে সিজদা করছি।" তিনি (আব্দুল্লাহ ইবনে উনাইস) বলেন: এরপর তেইশতম রাতে আমাদের উপর বৃষ্টি হলো। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন। যখন তিনি (সালাত শেষে) ফিরলেন, তখন তাঁর কপাল ও নাকে পানি ও কাদার চিহ্ন লেগে ছিল।

তিনি (বর্ণনাকারী) বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনে উনাইস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন, (ঐ রাতটি ছিল) তেইশতম রাত।









আল-জামি` আল-কামিল (4552)


4552 - عن ابن عباس، قال: أُتيتُ وأنا نائم في رمضان، فقيل لي: إنّ الليلة ليلة القدر. قال: فقمتُ وأنا ناعس، فتعلقتُ ببعض أطناب فسطاط رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأتيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم فإذا هو يصلي. قال: فنظرتُ في تلك الليلة، فإذا هي ليلة ثلاث وعشرين.

حسن: رواه الإمام أحمد (2302، 2547)، والطبراني في الكبير (11/ 292 - 293) كلاهما من حديث أبي الأحوص، قال: أخبرنا سماك، عن عكرمة، قال: قال ابن عباس (فذكره).

وإسناده حسن من أجل سماك وهو ابن حرب بن أوس الذهلي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث في غير روايته عن عكرمة، فإنه اضطرب فيه.

هذا هو المعتمد في روايته عن عكرمة إلّا إذا وُجد ما يعضّده فيحسّن حديثه.

وقوله: فإذا هي ليلة ثلاث وعشرين" له شاهد صحيح لحديث عبد الله بن أنيس، فيغلب على الظّن أنه لم يضطرب في هذا.

وقد جاء عن ابن عباس أنه كان يوقظ أهله ليلة ثلاث وعشرين.

وابن عباس له أحاديث في ليلة القدر، ولا يعارض بعضه بعضًا؛ فلعله كان يحدّث مرة بهذا، وأخرى بهذا. وذلك كشأن الأحاديث الأخرى في ليلة القدر من الصحابة الآخرين.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রমযান মাসে ঘুমাচ্ছিলাম, এমন সময় আমার কাছে আসা হলো এবং বলা হলো: নিশ্চয়ই আজকের রাতটি হলো কদরের রাত। তিনি বললেন: আমি তখন তন্দ্রাচ্ছন্ন অবস্থায় উঠে দাঁড়ালাম এবং রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের তাঁবুর কিছু রশির সাথে জড়িয়ে গেলাম। এরপর আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে আসলাম, তখন দেখলাম তিনি সালাত আদায় করছেন। তিনি বললেন: এরপর আমি সেই রাতটির দিকে তাকালাম (খেয়াল করলাম), তখন দেখলাম সেটি তেইশতম রাত।









আল-জামি` আল-কামিল (4553)


4553 - عن عبد الله أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"التمسوها في العشر الأواخر من رمضان، ليلة القدر في تاسعة تبقى، في سابعة تبقى، في خامسة تبقى".

وفي رواية:"هي في العشر الأواخر، في تسع يمضين، أو في سبع يَبْقين".

صحيح: رواه البخاريّ في فضل ليلة القدر (2021) عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا وُهيب، حدّثنا أيوب، عن عكرمة، عن ابن عباس.

والرواية الثانية (2022) عن عبد الله بن أبي الأسود، حدّثنا عبد الواحد (هو ابن زياد)، حدّثنا عاصم (هو ابن سليمان الأحول)، عن أبي مِجْلَز وعكرمة، قالا: قال ابن عباس، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা রমযানের শেষ দশকে শবে কদর সন্ধান করো। তা হলো, (রমযানের শেষ দিক থেকে গণনা করলে) যখন নয় রাত বাকি থাকে, বা সাত রাত বাকি থাকে, অথবা পাঁচ রাত বাকি থাকে।"

অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তা হলো শেষ দশকে, যখন নয় রাত পার হয়ে যায়, অথবা সাত রাত বাকি থাকে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4554)


4554 - عن عُبادة بن الصّامت، قال: خرج النبيُّ صلى الله عليه وسلم ليخبرنا بليلة القدر، فتلاحي رجلان من المسلمين، فقال:"إني خرجتُ لأخبركم بليلة القدر، وإنه تلاحى فلان وفلان،
فرفعت، وعسى أن يكون خيرًا لكم، فالتمسوها في السبع والتسع والخمس".

صحيح: رواه البخاري في الإيمان (49)، وفي المواضع الأخرى (2023، 6049) من طرق عن حميد، عن أنس، عن عبادة بن الصامت، فذكره.

ورواه أبو داود الطيالسي (577) عن حماد، عن ثابت وحميد، عن أنس، عن عبادة بن الصامت، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خرج … فقال:"فاختلجت مني فاطلبوها في العشر الأواخر في سابعة تبقى، أو تاسعة تبقى، أو خامسة تبقى".

قوله:"فتلاحى فلان وفلان" من الملاحاة، وهي المشاجرة، ورفع الأصوات والمراجعة بالقول الذي لا يصلح على حال الغضب، وذلك شؤم.




উবাদাহ ইবনুস সামিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের লাইলাতুল কদর সম্পর্কে অবহিত করার জন্য বের হলেন। তখন দুইজন মুসলমানের মাঝে ঝগড়া শুরু হলো। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি তোমাদের লাইলাতুল কদর সম্পর্কে অবহিত করার জন্য বের হয়েছিলাম, কিন্তু অমুক ও অমুকের ঝগড়ার কারণে তা (তার সঠিক জ্ঞান) উঠিয়ে নেওয়া হয়েছে। হয়তো এর মধ্যেও তোমাদের জন্য কল্যাণ নিহিত আছে। সুতরাং তোমরা তা (শেষ দশকের) সাত, নয় ও পাঁচ (অর্থাৎ বিজোড় রাতগুলোতে) তালাশ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4555)


4555 - عن أنس، أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم خرج علينا في رمضان، فقال:"إنّي أُريتُ هذه الليلة في رمضان حتى تلاحي رجلان، فرُفعتْ، فالتمسوها في التاسعة والسابعة والخامسة".

صحيح: رواه مالك في الاعتكاف (13) عن حميد الطويل، عن أنس بن مالك، فذكره.

ولم يخرج البخاري حديث مالك، وإنما أخرجه من طريق أخرى عن حميد، عن أنس، عن عبادة بن الصامت. فجعله من مسند عبادة.

فقول أنس:"خرج علينا في رمضان …" هل كان أنس بن مالك ممن خرج عليه رسول الله صلى الله عليه وسلم وسمع منه الحديث المذكور؟

قال ابن عبد البر:"هكذا روي مالك هذا الحديث لا خلاف عنه في إسناده ومتنه، وفيه عن أنس: خرج علينا رسول الله".

ثم قال:"وإنما الحديث لأنس عن عبادة بن الصامت" فذكره.

فالظاهر من كلامه أنه يجعل الحديث من مسند عبادة بن الصامت.

فلعلّ أنسًا كان يروي هذا الحديث على وجهين، فمرة عن عبادة بن الصامت، وأخرى بدون ذكره.

وهو أمر كان جائزًا عند صغار الصحابة مثل: أنس وابن عباس وغيرهما، وبهذا الجمع لا يلزم تخطئة مالك فإنه رواه كما سمع.

ولذلك كان يروي أحيانًا بدون أن يقول:"خرج علينا رسول الله صلى الله عليه وسلم". رواه الإمام أحمد (13452)، والبزار -كشف الأستار (1029) - كلاهما من حديث عبد الوهاب بن عطاء، ثنا سعيد أنه سئل عن ليلة القدر، فحدّثنا عن قتادة، عن أنس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم:"التمسوها في العشر الأواخر في التاسعة والسابعة والخامسة".

وسعيد هو ابن أبي عروبة كان أثبت الناس في قتادة إلا أنه اختلط، وبقي في اختلاطه خمس

سنوات ولا يحتج إلا بما روى عنه القدماء مثل يزيد بن زريع وابن المبارك، ويعتبر برواية
المتأخرين عنه دون الاحتجاج بها.

وعبد الوهاب بن عطاء المعروف بالخفاف ممن سمع منه قبل الاختلاط، وهو القائل: إنّ سعيدًا خولط سنة (148)، وعاش بعدما خولط تسع سنين.

وعبد الوهاب حسن الحديث.

وقوله:"فرُفعت" أي رفع علم تلك الليلة بعد أن علم النبيّ صلى الله عليه وسلم وأراد أن يخبر بها أصحابه، ولذلك قال:"فالتمسوها في كذا وكذا".

ولا يصح من قال:"رفعت ليلة القدر إلى الأبد ولا تعود".




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমযান মাসে আমাদের নিকট বেরিয়ে এলেন এবং বললেন, "নিশ্চয়ই আমাকে রমযান মাসের এই রাতটি (লাইলাতুল ক্বদর) দেখানো হয়েছিল, কিন্তু দুজন লোক ঝগড়া শুরু করায় তা তুলে নেওয়া হয়েছে। অতএব তোমরা তা নবম, সপ্তম ও পঞ্চম রাতে তালাশ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4556)


4556 - عن أبي سعيد الخدري، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"التمسوها في العشر الأواخر من رمضان، والتمسوها في التاسعة، والسابعة والخامسة"، قال: قلت: يا أبا سعيد، إنّكم أعلم بالعدد منا. قال: أجل، نحن أحقّ بذلك منكم. قال: قلت: ما التاسعة والسابعة والخامسة؟ قال: إذا مضتْ واحدة وعشرون فالتي تليها التاسعة. فإذا مضت ثلاث وعشرون فالتي تليها السابعة، فإذا مضى خمس وعشرون فالتي تليها الخامسة.

صحيح: رواه مسلم (1167: 217) عن محمد بن المثنى، قال: حدثنا عبد الأعلى، حدّثنا سعيد، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد، فذكره.

ومن هذا الوجه أخرجه أبو داود (1383) واللفظ له، وأما لفظ مسلم ففي أوله ذكر الاعتكاف. انظره في موضعه.




আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তা (লাইলাতুল কদর) রমযানের শেষ দশকে তালাশ করো, আর তা তালাশ করো নবম, সপ্তম ও পঞ্চম রাতে।" [বর্ণনাকারী] বলেন, আমি বললাম: হে আবূ সাঈদ, আপনারা আমাদের চেয়ে গণনা সম্পর্কে বেশি জানেন। তিনি বললেন: হ্যাঁ, এ ব্যাপারে আমরা তোমাদের চেয়ে বেশি হকদার। [বর্ণনাকারী] বলেন, আমি বললাম: নবম, সপ্তম ও পঞ্চম রাত বলতে কী বোঝানো হয়েছে? তিনি বললেন: যখন একুশ (রাত) পার হয়ে যায়, তখন তার পরের রাতটি হল নবম রাত। যখন তেইশ (রাত) পার হয়ে যায়, তখন তার পরের রাতটি হল সপ্তম রাত। যখন পঁচিশ (রাত) পার হয়ে যায়, তখন তার পরের রাতটি হল পঞ্চম রাত।









আল-জামি` আল-কামিল (4557)


4557 - عن عبد الله بن مسعود، قال: سئل النّبيّ صلى الله عليه وسلم عن ليلة القدر، فقال:"كنتُ أُعلمتها، ثم انفلتت مني، فاطلبوها في سبع يبقين، أو ثلاث يبقين".

حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1028) - عن عبد الله بن يوسف، ثنا عبد الله بن الجهم، ثنا عمرو بن أبي قيس، عن الزبير بن عدي، عن أبي وائل، عن عبد الله، فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الله بن الجهم، وشيخه عمرو بن أبي قيس، فهما صدوقان.

وذكره الهيثمي في"المجمع" (3/ 176) وقال:"رجاله ثقات".




আব্দুল্লাহ ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে লায়লাতুল কদর (কদরের রাত) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলো। তখন তিনি বললেন: 'আমাকে তা (তারিখ) জানানো হয়েছিল, কিন্তু পরে তা আমার থেকে ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে। সুতরাং তোমরা তা অনুসন্ধান করো যখন (রমজানের) সাত রাত অবশিষ্ট থাকে, অথবা তিন রাত অবশিষ্ট থাকে।'









আল-জামি` আল-কামিল (4558)


4558 - عن ابن عمر، أنّ رجالًا من أصحاب رسول الله صلى الله عليه وسلم أُرُوا ليلة القدر في المنام في السّبع الأواخر. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّي أرى رُؤياكم قد تواطأتْ في السّبع
الأواخر، فمن كان متحرّيها، فليتحرَّها في السّبع الأواخر".

متفق عليه: رواه مالك في الاعتكاف (14) عن نافع، عن ابن عمر.

ورواه البخاري في فضل ليلة القدر (2015)، ومسلم في الصيام (1165: 205) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

ورواه مالك (11) ومن طريقه مسلم (1165: 206) عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر، مختصرًا، بلفظ:"تحرّوا ليلة القدر في السّبع الأواخر".

وقوله:"السبع الأواخر" والظاهر أن المراد به أواخر الشهر.

وقيل: المراد به السبع التي أولها ليلة الثاني والعشرين، وآخرها ليلة الثامن والعشرين. فعلى الأول لا تدخل ليلة إحدى وعشرين ولا ثلاث وعشرين. وعلى الثاني تدخل الثانية فقط، ولا تدخل ليلة التاسع والعشرين.

قاله الحافظ ابن حجر في"الفتح": ثم اعلم أن حديث ابن عمر اختلفت ألفاظه على ألوان: منها:"أرى رؤياكم قد تواطأت في السبع الأواخر، فمن كان متحريها فليتحرها في السبع الأواخر". وهو متفق عليه، وفي مسلم جاء بألفاظ مختلفة.

ومنها:"تحروا ليلة القدر في السبع الأواخر".

رواية عبد الله بن دينار، عن ابن عمر.

ومنها:"أرى رؤياكم في العشر الأواخر، فاطلبوها في الوتر منها". رواية سالم عن أبيه.

ومنها:"أن ناسًا منكم قد أُروا أنها في السبع الأول، وأُري ناس منكم أنها في السبع الغوابر، فالتمسوها في العشر الغوابر". وهي أيضًا رواية سالم عن أبيه.

ومنها:"التمسوها في العشر الأواخر، فإن ضعف أحدكم أو عجز فلا يغلبنّ على السبع البواقي".

وهي رواية عقبة بن حريث، عن ابن عمر.

ومنها:"من كان ملتمسها، فليلتمسها في العشر الأواخر".

وهي رواية جبلة، عن ابن عمر.

ومنها:"تحيّنوا ليلة القدر في العشر الأواخر". أو قال: في"التسع الأواخر". هذه رواية جبلة ومحارب عن ابن عمر.

يقول القرطبي في"المفهم" (3/ 251) بعد أن سرد بعض هذه الروايات:"والحاصل من مجموع الأحاديث، ومما استقرّ عليه أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم في طلبها: أنها في العشر الأواخر من رمضان، وأنها متنقلة، وبهذا يجتمع شتات الأحاديث المختلفة الواردة في تعيينها، وهو قول مالك والشافعي والثوري وأحمد وإسحاق وأبي ثور وغيرهم على ما حكاه أبو الفضل عياض، فاعتمد
عليه وتمسّك به".

قلت: ولكن أكثر الروايات أنها في أوتارها في العشر الأواخر، ثم اختلفت الروايات في تعيين أوتارها كما ترى.

فالحاصل أنها في العشر الأواخر في أوتارها بدون تعيين، فقد يكون حصلت في عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم في ليلة من ليالي الوتر في العشر الأواخر، فلا يلزم منه أن تستمر في هذه الليلة إلى يوم القيامة.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কয়েকজন সাহাবী স্বপ্নে দেখলেন যে শবে কদর (লাইলাতুল কদর) রমাদানের শেষ সাত দিনের মধ্যে। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “আমি দেখছি তোমাদের স্বপ্নগুলো শেষ সাত দিনের মধ্যে একমত হয়েছে। তাই যে ব্যক্তি এর সন্ধান করতে চায়, সে যেন শেষ সাত দিনের মধ্যে তার সন্ধান করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (4559)


4559 - عن بلال مؤذن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه قال:"إنّها في السّبع في العشر الأواخر".

صحيح: رواه البخاريّ في المغازي (4470) عن أصبغ، قال: أخبرني ابن وهب، قال: أخبرني عمرو، عن ابن أبي حبيب، عن أبي الخير، عن الصنابحيّ، أنه قال له: متي هاجرت؟ قال: خرجنا من اليمن مهاجرين، فقدمنا الجحفة، فأقبل راكب، فقلت له: الخبر؟ فقال: دفنا النبيّ صلى الله عليه وسلم منذ خمس. فقلت: هل سمعت في ليلة القدر شيئًا؟ قال: نعم، أخبرني بلال، فذكره.

وقد رُوي عن بلال أنها ليلة أربع وعشرين، وأنها ليلة ثلاث وعشرين، وكلاهما لا يصح. والصّواب عنه أنها ليلة السبع في العشر الأواخر بدون تعيين.




বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "নিশ্চয়ই তা (লাইলাতুল কদর) শেষ দশকের সপ্তম রাতে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4560)


4560 - عن علي بن أبي طالب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اطلبوا ليلة القدر في العشر الأواخر، فإن غلبتم فلا تُغلبوا على السبع البواقي".

حسن: رواه عبد الله بن أحمد (1111)، قال: حدثني سويد بن سعيد، أخبرني عبد الحميد بن الحسن الهلالي، عن أبي إسحاق، عن هبيرة بن يَريم، عن علي فذكره.

وإسناده حسن من أجل عبد الحميد بن الحسن الهلالي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخطئ، وهذا مما لم يخطئ فيه إن شاء الله تعالى من أجل أصول ثابتة، وقد قال أبو حاتم:"شيخ"، ووثّقه ابن معين في رواية.

وفي الباب ما رُوي عن أبي عقْرب، قال: غدوتُ إلى ابن مسعود ذات غداة في رمضان، فوجدته فوق بيته جالسًا، فسمعنا صوته وهو يقول: صدق الله، وبلَّغ رسولُه. فقلنا: سمعناك تقول: صدق الله، وبلَّغ رسوله. فقال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ ليلة القدر في النصف من السبع الأواخر من رمضان، تطلع الشمس غداتئذ صافية، ليس لها شعاع".

فنظرتُ إليها فوجدتُها كما قال رسول الله صلى الله عليه وسلم.

رواه أحمد (3857) عن أبي النضر، حدثنا أبو معاوية -يعني شيبان-، عن أبي اليعفور، عن أبي الصلت، عن أبي عقرب، فذكره. وأبو الصلت وشيخه أبو عقرب مجهولان.




আলী ইবনু আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "তোমরা লাইলাতুল কদরকে রমজানের শেষ দশকে তালাশ করো। যদি তোমরা (ইবাদতে) অক্ষম হয়ে পড়ো, তবে অবশিষ্ট সাত রাতে যেন তোমরা পরাভূত না হও।"

এ সম্পর্কিত আরেকটি বর্ণনা আবু আকরাব থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন: আমি রমজানের এক সকালে ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম। তাঁকে তাঁর ঘরের ছাদে বসিয়া থাকতে পেলাম। আমরা তাঁর কণ্ঠস্বর শুনতে পেলাম, তিনি বলছিলেন: 'আল্লাহ সত্য বলেছেন এবং তাঁর রাসূল পৌঁছিয়ে দিয়েছেন।' আমরা বললাম: আমরা আপনাকে বলতে শুনলাম, 'আল্লাহ সত্য বলেছেন এবং তাঁর রাসূল পৌঁছিয়ে দিয়েছেন।' তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয় লাইলাতুল কদর রমজানের শেষ সাত দিনের মধ্যখানে। ঐ দিনের সকালে সূর্য উদিত হয় নির্মল, তাতে কোনো রশ্মি থাকে না।"

আমি সেদিকে তাকালাম এবং দেখলাম রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যেমন বলেছেন, ঠিক তেমনই।