আল-জামি` আল-কামিল
4561 - عن زرّ بن حُبيش قال: سألت أبيَّ بن كعب رضي الله عنه، فقلت: إنَّ أخاك ابن
مسعود يقول: من يَقُم الحوْلَ يُصِبْ ليلة القدر. فقال: رحمه الله، أراد أن لا يتكل الناس. أما إنّه قد علم أنها في رمضان، وأنّها في العشر الأواخر. وأنّها ليلة سبع وعشرين. ثم حلف لا يستثني أنّها ليلةُ سبعٍ وعشرين. فقلتُ: بأيّ شيء تقول ذلك يا أبا المنذر؟ قال: بالعلامة أو بالآية التي أخبرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أنها تطلع يومئذ لا شعاعَ لها.
صحيح: رواه مسلم في الصيام (762: 220) من طريق سفيان بن عيينة، عن عبدة (هو ابن أبي لبابة)، وعاصم بن أبي النجود، سمعا زر بن حبيش يقول (فذكره).
যির ইবনু হুবাইশ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞাসা করলাম এবং বললাম: আপনার ভাই ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, যে ব্যক্তি সারা বছর রাত জেগে ইবাদত করবে, সে লাইলাতুল ক্বদর লাভ করবে। তিনি (উবাই) বললেন: আল্লাহ তাকে রহম করুন। তিনি চেয়েছেন যেন মানুষ (এর ওপর) নির্ভর না করে বসে থাকে। তবে তিনি অবশ্যই জানেন যে, লাইলাতুল ক্বদর রমাদানের মধ্যে, আর তা শেষ দশকে, আর তা হচ্ছে সাতাশ তারিখের রাত। এরপর তিনি কসম করে বললেন, কোনো ব্যতিক্রম না রেখেই যে, তা হলো সাতাশ তারিখের রাত। আমি বললাম: হে আবুল মুনযির! আপনি কীসের ভিত্তিতে এ কথা বলছেন? তিনি বললেন: সেই আলামত বা নিদর্শনের ভিত্তিতে, যা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদেরকে জানিয়েছেন যে, ঐ দিন সকালে সূর্য উদিত হবে, আর তাতে কোনো আলোকচ্ছটা থাকবে না।
4562 - عن أبي هريرة، قال: تذاكرنا ليلة القدر عند رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال:"أيُّكم يذكرُ حين طلع القمرُ، وهو مثلُ شِقِّ جفنة".
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1170) من طريق مروان الفزاريّ، عن يزيد بن كيسان، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره.
وقوله:"شقّ جفنة" الشق: هو النصف، والجفنة: القصعة.
قال القاضي عياض:"فيه إشارة إلى أنها تكون في أواخر الشهر؛ لأنّ القمر لا يكون كذلك عند طلوعه إلا في أواخر الشهر".
وقال أبو الحسن الفارسيّ: وهي ليلة سبع وعشرين، فإنّ القمر فيها بتلك الصفة. ذكره الحافظ في"الفتح" (4/ 264).
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট লাইলাতুল কদর নিয়ে আলোচনা করছিলাম। তখন তিনি বললেন: "তোমাদের মধ্যে কে স্মরণ করতে পারো, যখন চাঁদ উদিত হয় তখন তা একটি পেয়ালার অর্ধেকের মতো দেখায়?"
4563 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال في ليلة القدر:"إنّها ليلة سابعة، أو ليلة تاسعة وعشرين، وإنّ الملائكة تلك الليلة في الأرض أكثر من عدد الحصى".
حسن: رواه أحمد (10734)، وأبو داود الطيالسي (2668)، والبزار -كشف الأستار (1030) -، والطبراني في الأوسط (2522)، وابن خزيمة (2194) كلّهم من طرق، عن عمران بن داور القطان، عن قتادة، عن أبي ميمونة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عمران بن داوَر القطان فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث ما لم يخالف أو يأتي في حديثه ما ينكر عليه.
وحديثه هذا ليس فيه ما ينكر عليه إلّا قوله:"إن الملائكة في تلك الليلة في الأرض أكثر من عدد الحصى" فإنه لم يتابع على هذا.
إلا أنه يشهد له في الجملة قوله تعالى: {تَنَزَّلُ الْمَلَائِكَةُ وَالرُّوحُ فِيهَا بِإِذْنِ رَبِّهِمْ مِنْ كُلِّ أَمْرٍ} [سورة القدر].
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কদরের রাত সম্পর্কে বলেছেন: "নিশ্চয় তা হলো সাতাশতম রাত অথবা ঊনত্রিশতম রাত। আর সেই রাতে পৃথিবীতে ফেরেশতাদের সংখ্যা নুড়িপাথরের সংখ্যার চেয়েও বেশি হয়।"
4564 - عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"نظرتُ إلى القمر صبيحة ليلة القدر، فرأيته كأنه فِلْق جَفْنة".
صحيح: رواه أحمد (23129) عن محمد بن جعفر، حدثنا شعبة، عن أبي إسحاق، أنه سمع
أبا حذيفة يحدّث عن رجل من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.
قال أبو إسحاق: إنما يكون القمر كذلك صبيحة ليلة ثلاث وعشرين.
ورواه أحمد (793)، وأبو يعلى (525) كلاهما من حديث حُديج بن معاوية، عن أبي إسحاق، عن أبي حذيفة، عن علي، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكر مثله. إلا أن أبا يعلي قال فيه:"كأنه شق جفنة".
وهذا إسناد ضعيف من أجل حُديج بن معاوية فإنه سيء الحفظ؛ ولعلّ هذا من وهمه أن يروي عن أبي إسحاق، وجعل الحديث من مسند علي، وقد روي شعبة وغيره عن أبي إسحاق وجعل الصحابي غير مسمى. ورواية شعبة أشبه بالصواب.
وقد يكون الوهم من أبي إسحاق نفسه فإن شعبة روى عنه قبل الاختلاط، ولعل حديج بن معاوية روى عنه بعد الاختلاط. وقد سئل الدارقطني عن حديث شعبة فقال:"هو المحفوظ".
انظر: العلل (5/ 186). وأبو حذيفة اسمه سلمة بن صهيب.
وأما قول أبي إسحاق: إنما يكون القمر كذلك صبيحة ليلة ثلاث وعشرين، فقد سبق القول لأبي الحسن الفارسي بأنها ليلة سبع وعشرين.
রাসূলে আকরাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জনৈক সাহাবী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: "আমি কদরের রাতের সকালে চাঁদকে দেখলাম, অতঃপর দেখলাম যে তা যেন একটি পেয়ালার অর্ধাংশ (আকৃতিতে)।"
4565 - عن معاوية بن أبي سفيان، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم في ليلة القدر، قال:"ليلة القدر، ليلة سبع وعشرين".
صحيح: رواه أبو داود (1386) عن عبيد الله بن معاذ، ثنا أبي، أخبرنا شعبة، عن قتادة، أنه سمع مطرفًا، عن معاوية بن أبي سفيان، فذكره.
ومن طريق أبي داود أخرجه البيهقي (4/ 302)، وصحّحه ابن حبان (3680). وإسناده صحيح.
মুয়াবিয়া ইবনে আবি সুফিয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কদরের রাত সম্পর্কে বলেছেন: "কদরের রাত হলো সাতাশতম রজনী।"
4566 - عن ابن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من كان متحريها، فليتحرها ليلة سبع وعشرين". وقال:"تحروها ليلة سبع وعشرين" يعني ليلة القدر.
صحيح: رواه الإمام أحمد (4808) عن يزيد بن هارون، أخبرنا شعبة، عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر، فذكره. وإسناده صحيح. ورواه أبو داود الطيالسي (2000) عن شعبة نحوه.
ورواه مالك، ومن طريقه مسلم (1165: 206) عن عبد الله بن دينار، ولفظه:"تحروا ليلة القدر في السبع الأواخر" كما سيأتي.
ويبدو هذا هو الصحيح، كما رواه أحمد (6474)، قال عبد الله: قرأت على أبي هذا الحديث، وسمعته سماعًا، قال: حدّثنا الأسود بن عامر، حدثنا شعبة، قال: عبد الله بن دينار، أخبرني قال: سمعت ابن عمر يحدث عن النبيّ صلى الله عليه وسلم في ليلة القدر قال:"من كان متحريها، فليتحرّها في ليلة سبع وعشرين".
قال شعبة: وذكر لي رجل ثقة عن سفيان أنه كان يقول: إنما قال:"من كان متحريها فليتحرها
في السبع البواقي". قال شعبة: فلا أدري ذا أو ذا؟ شعبة شك.
قال عبد الله بن أحمد: قال أبي: الرجل الثقة: يحيى بن سعيد القطان.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি এর অনুসন্ধান করতে চায়, সে যেন তা সাতাশতম রাতে অনুসন্ধান করে।" আর তিনি বললেন: "তোমরা সাতাশতম রাতে এর অনুসন্ধান করো," অর্থাৎ লাইলাতুল কদর।
সহীহ: ইমাম আহমদ (৪৮০৮) হাদীসটি ইয়াযিদ ইবনে হারুন থেকে বর্ণনা করেছেন, তাকে শু'বা খবর দিয়েছেন, তিনি আমর ইবনে দীনার থেকে, তিনি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন। এর সনদ সহীহ। এটি আবু দাঊদ তায়ালিসিও (২০০০) শু'বা থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন।
আর এটি মালিকও বর্ণনা করেছেন, এবং তার মাধ্যমে মুসলিমও (১১৬৫: ২০৬) বর্ণনা করেছেন আব্দুল্লাহ ইবনে দীনার থেকে, এবং তার শব্দগুলো হল: "তোমরা শেষ সাত রাতে কদরের রাত অনুসন্ধান করো," যেমনটি পরে আসবে।
আর এটিই সহীহ বলে মনে হয়, যেমনটি আহমদ (৬৪৭৪) বর্ণনা করেছেন। আব্দুল্লাহ (ইমাম আহমদের পুত্র) বলেন: আমি আমার পিতার কাছে এই হাদীসটি পাঠ করেছি এবং আমি এটি সরাসরি শুনেছি। তিনি (পিতা) বলেন: আমাদের কাছে আসওয়াদ ইবনে আমির বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমাদের কাছে শু'বা বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনে দীনার আমাকে খবর দিয়েছেন, তিনি বলেন: আমি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে লাইলাতুল কদর সম্পর্কে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করতে শুনেছি, তিনি বলেছেন: "যে ব্যক্তি এর অনুসন্ধান করতে চায়, সে যেন তা সাতাশতম রাতে অনুসন্ধান করে।"
শু'বা বলেন: আর একজন বিশ্বস্ত ব্যক্তি আমাকে সুফিয়ান থেকে উল্লেখ করেছেন যে, তিনি বলতেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শুধু এটুকু বলেছেন: "যে ব্যক্তি এর অনুসন্ধান করতে চায়, সে যেন তা শেষ সাত রাতে অনুসন্ধান করে।" শু'বা বলেন: আমি জানি না, এটি না ওইটি? শু'বা সন্দেহ করেছেন।
আব্দুল্লাহ ইবনে আহমদ বলেন: আমার পিতা বলেছেন: বিশ্বস্ত লোকটি হলেন: ইয়াহইয়া ইবনে সাঈদ আল-কাত্তান।
4567 - عن ابن عباس، أنّ رجلًا أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا نبي الله، إنّ أبي شيخ كبير عليل يشقّ عليه القيام، فأْمرني بليلة لعلّ الله يوفقني فيها ليلة القدر. قال:"عليك بالسابعة".
صحيح: رواه أحمد (2149) عن معاذ بن هشام، حدثني أبي، عن قتادة، عن عكرمة، عن عبد الله بن عباس، فذكره.
ومن طريقه رواه الطبراني في الكبير (11/ 311)، والبيهقي (4/ 313). وإسناده صحيح.
قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 176):"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح"، ولم يعزه إلى الطبراني وهو رواه من طريق أحمد.
وقوله:"عليك بالسّابعة". أي بعد مضي سبع بعد العشرين.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: হে আল্লাহর নবী! আমার পিতা খুবই বৃদ্ধ ও অসুস্থ। তাঁর পক্ষে (নামাযের জন্য) দাঁড়ানো কষ্টকর। আপনি আমাকে এমন একটি রাতের (ইবাদতের) আদেশ দিন, যাতে আল্লাহ আমাকে তাতে লাইলাতুল কদর লাভের তাওফীক দেন। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি সাতাশ তারিখের রাতকে গ্রহণ করো।"
4568 - عن عبد الله بن عباس، قال: كان عمر يدعوني مع أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم، فيقول لي: لا تكلم حتى يتكلموا. قال: فدعاهم، فسألهم عن ليلة القدر، فقال: أرأيتم قول رسول الله صلى الله عليه وسلم:"التمسوها في العشر الأواخر". أي ليلة ترونها؟ فقال بعضهم: ليلة إحدى، وقال بعضهم: ليلة ثلاث، وقال آخر: خمس، وأنا ساكت. قال: فقال: ما لك لا تتكلّم؟ قال: قلت: إن أذنت لي يا أمير المؤمنين! تكلّمت؟ قال: فقال: ما أرسلتُ إليك إلا لتتكلّم. قال: فقلت: أحدّثكم برأيي؟ قال: عن ذلك نسألك. قال: فقلت: السبع. رأيتُ الله عز وجل ذكر سبع سماوات، ومن الأرض سبعًا، وخلق الإنسان من سبع، ونبت الأرض سبع. قال: فقال: هذا أخبرتني ما أعلم، أرأيت مالا أعلم ما هو قولك: نبت الأرض من سبع؟ قال: فقلت: إن الله يقول: {ثُمَّ شَقَقْنَا الْأَرْضَ شَقًّا (26) فَأَنْبَتْنَا فِيهَا حَبًّا (27) وَعِنَبًا وَقَضْبًا (28) وَزَيْتُونًا وَنَخْلًا (29) وَحَدَائِقَ غُلْبًا (30) وَفَاكِهَةً وَأَبًّا} [سورة عبس: 26 - 31]. والأب: نبت الأرض مما يأكله الدواب ولا يأكله الناس. قال: فقال عمر: أعجزتم أن تقولوا كما قال هذا الغلام الذي لم تجتمع شؤون رأسه بعد، إني والله! ما أرى القول إلا كما قلت. وقال: قد كنتُ أمرتُك أن لا تكلم حتى يتكلموا، وإني آمرك أن تتكلم معهم.
حسن: رواه الإمام أحمد (85)، والبزار (210)، وأبو يعلى (165)، وصححه ابن خزيمة (2172)، والحاكم (1/ 437 - 438) كلهم من حديث عاصم بن كليب الجرمي، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره. والسياق لابن خزيمة.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
وإسناده حسن من أجل عاصم بن كليب، فإنه حسن الحديث.
وذكره الإمام أحمد مختصرًا عن عاصم بن كليب، قال: أبي فحدثتُ به ابن عباس، قال: وما أعجبك من ذلك؟ كان عمر إذا دعا الأشياخ من أصحاب محمد صلى الله عليه وسلم دعاني معهم، فقال: لا تكلم حتى يتكلموا. قال: فدعانا ذات يوم أو ذات ليلة، فقال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال في ليلة القدر ما قد علمتم:"فالتمسوها في العشر الأواخر وترًا" ففي أي الوتر ترونها؟".
ورواه البيهقي (4/ 313) من طريق عبد الرزاق، أنبأنا معمر، عن قتادة وعاصم أنهما سمعا عكرمة يقول: قال ابن عباس: دعا عمر أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم فسألهم عن ليلة القدر، فأجمعوا أنها في العشر الأواخر. فقلت لعمر: إني لأعلم، وإني لأظن أي ليلة هي؟ قال: وأيّ ليلة هي؟ قلت: سابعة تمضي، أو سابعة تبقى من العشر الأواخر. قال: ومن أين تعلم؟ قلت: خلق الله سبع سماوات، وسبع أرضين، وسبعة أيام، وإنّ الدهر يدور في سبع، وخلق الإنسان فيأكل ويسجد على سبعة أعضاء، والطواف سبع، والجبال سبع. فقال عمر: لقد فطنتَ لأمر ما فطنا له".
قال البيهقي في"فضائل الأوقات" (ص 244) نقلًا عن شيخه الحليمي:"وكلّ هذا استدلال، وليس بيقين، وقد كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعلمها في الابتداء غير أنه لم يكن مأذونا له في الإخبار بها لئلا يتكلوا على علمها فيحيوها دون سائر الليالي …".
وفي الباب عن ابن مسعود، قال: إنّ رجلًا أتى النبيَّ صلى الله عليه وسلم، فقال: متى ليلة القدر؟ قال:"ومن يذكر منكم ليلة الصهباوات؟". قال عبد الله: أنا بأبي أنت وأمي، وإنّ في يدي لتمرات أتسحّر بهن مستترًا بمؤخرة رحْلي من الفجر، وذلك حين طلع الفجر".
رواه الإمام أحمد (3565، 3764)، وأبو يعلي (5393)، والطبراني في الكبير (10/ 152)، والطحاوي في شرحه (4548) كلهم من طريق المسعودي، عن سعيد بن عمرو، عن أبي عبيدة، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.
وفيه انقطاع فإنّ أبا عبيدة وهو ابن عبد الله بن مسعود لم يسمع من أبيه.
والمسعوديّ هو عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة اختلط بآخره إلا أن في بعض طرقه من سمع منه قبل الاختلاط منهم شيخ الإمام أحمد عمرو بن الهيثم أبو قطن، قال: حدثنا المسعودي. فانحصرت العلة في الانقطاع.
وقوله:"ليلة الصهباوات" فسّروها بليلة سبع وعشرين.
رواه أبو داود (1384) عن حكيم بن سيف الرقي، أخبرنا عبيد الله -يعني ابن عمرو-، عن زيد -يعني ابن أبي أنيسة-، عن أبي إسحاق، عن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، عن ابن مسعود، فذكره.
أعلّه المنذريّ بقوله:"في إسناده حكيم بن سيف، وفيه مقال".
قلت: حكيم بن سيف هذا هو ابن حكيم الأسدي مولاهم أبو عمرو الرقي، قال فيه أبو حاتم:"شيخ صدوق لا بأس به، يكتب حديثه، ولا يحتجّ به، ليس بالمتين". وذكره ابن حبان في"الثقات"، وقال ابن عبد البر:"شيخ صدوق لا بأس به عندهم".
فحديثه لا ينزل عن درجة الحسن إذا لم يخالف، ولم يأت في حديثه ما ينكر عليه. وهنا أتي في حديثه ما ينكر عليه وهو قوله:"سبع عشرة".
فإنه يخالف الأحاديث الصحيحة، فإنه لم يأت فيها الأمر بطلب ليلة القدر ليلة سبع عشرة من رمضان.
وقد ثبت عن ابن مسعود نفسه ما يخالف هذا كما سبق، ثم إنّ فيه أيضًا أبا إسحاق وهو عمرو بن عبد الله السبيعي. وهو مدلس ومختلط ولم يظهر لي رواية زيد بن أبي أنيسة أكانت قبل اختلاطه أم بعده؟ .
وروي عن أبي قلابة أنه قال: ليلة القدر تنتقل في العشر الأواخر" انتهى.
وقد تكون فيه من الحكمة الإلهية أنها تختلف من بلد إلى آخر، ومن سنة إلى سنة حتى يجتهد الناس العشر الأواخر كلّها، كما كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يجتهد في العشر الأواخر ما لا يجتهد في غيرها.
وأما ما ذكره الحافظ في"الفتح" (4/ 262) بقوله:"واختلف العلماء في ليلة القدر اختلافًا كثيرًا، وتحصّل لنا من مذاهبهم في ذلك أكثر من أربعين قولًا". ثم ذكر هذه الأقوال، فإن أكثرها أقوال الناس لا تستند إلى حديث صحيح، والذي ذكرته عمدته الأحاديث الصحيحة. وبالله التوفيق.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে মুহাম্মদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাহাবিগণের সাথে ডাকতেন এবং আমাকে বলতেন: তারা কথা না বলা পর্যন্ত তুমি কথা বলবে না। তিনি (ইবনে আব্বাস) বলেন: এরপর তিনি (উমর) তাঁদের ডাকলেন এবং লাইলাতুল কদর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন। তিনি বললেন: তোমরা কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই উক্তিটি দেখনি: "তোমরা একে রমাদানের শেষ দশকে তালাশ করো।" তোমরা এটিকে (কদরের রাতকে) কোন রাতে মনে করো?
কেউ কেউ বললেন: একুশতম রাত, কেউ বললেন: তেইশতম রাত, আর কেউ বললেন: পঁচিশতম রাত। আমি তখন নীরব ছিলাম।
তিনি (উমর) বললেন: তোমার কী হলো, তুমি কথা বলছো না কেন? আমি বললাম: হে আমীরুল মুমিনীন! আপনি অনুমতি দিলে কি আমি কথা বলব? তিনি বললেন: আমি তোমাকে ডেকে পাঠিয়েছিই যেন তুমি কথা বলো।
তিনি বললেন: আমি বললাম: আমি কি আমার অভিমত জানাব? তিনি বললেন: সে সম্পর্কেই তো আমরা তোমাকে জিজ্ঞাসা করছি। তিনি বলেন: আমি বললাম: (সেটি হলো) সাত (সাতাশতম রাত)। আমি দেখেছি যে, আল্লাহ তাআলা সাত আসমানের কথা উল্লেখ করেছেন, যমীনও সাতটি, মানুষকেও সাত (ধরনের উপাদান) থেকে সৃষ্টি করেছেন, এবং যমীন থেকে সাত (ধরনের শস্য) উদগত হয়।
তিনি (উমর) বললেন: তুমি যা বললে, এর মধ্যে আমি যা জানি তা তো বললে। কিন্তু তুমি যা জানো না, অর্থাৎ তোমার এই কথা—'যমীন থেকে সাত (ধরনের শস্য) উদগত হয়'—এর দ্বারা কী বোঝাতে চেয়েছো?
তিনি বলেন: আমি বললাম: আল্লাহ তাআলা বলেন: {অতঃপর আমি ভূমিকে বিদীর্ণ করলাম, তারপর তাতে উৎপন্ন করলাম শস্য, আঙ্গুর, শাক-সবজি, যায়তুন, খেজুর, ঘন উদ্যানসমূহ, ফল ও ঘাস (আব্বা)} [সূরা আবাসা: ২৬-৩১]। ‘আল-আব্বু’ (ঘাস) হলো জমিনের সেই উদ্ভিদ, যা চতুষ্পদ জন্তুরা খায়, কিন্তু মানুষ খায় না।
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: তোমরা কি সেই বালকের মতো বলতে অক্ষম হলে, যার মাথার চুল তখনও ভালোভাবে জমাট বাঁধেনি (অর্থাৎ অল্পবয়স্ক)! আল্লাহর কসম! আমি তোমার মতের বাইরে অন্য কিছু দেখছি না (অর্থাৎ আমি তোমার মতের সাথে একমত)। তিনি (উমর) বললেন: আমি তোমাকে আদেশ করেছিলাম যে, তারা কথা না বলা পর্যন্ত তুমি কথা বলবে না, আর এখন আমি তোমাকে আদেশ করছি যে, তুমি তাদের সাথে কথা বলবে।
4569 - عن * *
في هذه المساجد الثلاثة: مسجد المدينة، ومسجد مكة، ومسجد إيلياء.
وكذلك رواه أيضًا عبد الرزاق (8014) عن الثوري، عن واصل الأحدب، عن إبراهيم، قال: جاء حذيفة إلى عبد الله، فقال: ألا أعجبك من ناس عكوف بين دارك ودار الأشعري؟ قال عبد الله: فلعلهم أصابوا وأخطأت. فقال حذيفة: ما أبالي أفيه أعتكف، أو في بيوتكم هذه؟ إنما الاعتكاف في هذه المساجد الثلاثة، مسجد الحرام، ومسجد المدينة، والمسجد الأقصى. وكان الذين اعتكفوا -فعاب عليهم حذيفة- في مسجد الكوفة الأكبر.
وكذلك رواه أبو عوانة، عن مغيرة، عن إبراهيم، أنّ حذيفة قال لابن مسعود: ألا تعجب من قوم بين دارك ودار أبي موسى يزعمون أنهم معتكفون؟ قال: فلعلّهم أصابوا وأخطأت؟ أو حفظوا ونسيت! . قال: أما أنا فقد علمتُ أنه لا اعتكاف إلا في مسجد جماعة.
رواه الطبراني في الكبير (9/ 301) عن علي بن عبد العزيز البغوي، حدّثنا الحجاج بن منهال، حدثنا أبو عوانة، فذكره.
فهؤلاء الذين رووه موقوفًا على حذيفة أوثق من هشام بن عمار وهو الدمشقي الذي قال فيه ابن حجر في التقريب:"صدوق مقرئ، كبر فصار يتلقن، فحديثه القديم أصح".
وكذلك من محمود بن آدم المروزيّ وهو وإن كان روي عنه جمعٌ منهم البخاري إلا أني لم أقف على من وثّقه غير ابن حبان. فمثله إذا خولف لا يقبل.
ثم وقوع الشك في قوله:"المسجد الحرام" أو"في المساجد الثلاثة" أو"في مسجد الجماعة" فمثله لا يصدر عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فهو من حذيفة أو من دونه. فالظاهر أن الراوي لم يضبط لفظ النبيّ صلى الله عليه وسلم وهذا مما يضُعّف الاحتجاج به، ثم لو كان حذيفة حدّث به عن النبيّ صلى الله عليه وسلم فما كان من عبد الله أن يخالفه.
ثم إنّ ابن مسعود يؤكد أن حذيفة أخطأ في قوله هذا، وأصاب من اعتكف في مسجد الكوفة.
وقد يكون وقع فيه النسخ وهو لا يدري. مال إليه الطحاوي في"مشكله".
وقد يكون من اجتهاده أيضًا مستشهدًا بقول النبيّ صلى الله عليه وسلم:"لا تشدّ الرحال إلّا إلى ثلاثة مساجد". ولكن الرواة أخطأوا فرفعوه.
والخلاصة فيه أن هذا الحديث لا يصح بوجه من الوجوه.
وترك العمل بهذا الحديث من جمهور السلف من الصحابة والتابعين ومن بعدهم في القرون المفضلة، وعدم اشتهاره فيما بينهم دليل على عدم صحته، ولو كان هذا الحديث معروفًا لنقُل في الكتب المعتمدة من السنن والمسانيد المشهورة، وإنّما عُرف في القرون المتأخرة في عصر الطحاوي. وأما ما نُقل في سنن سعيد بن منصور فهو مشكوك في لفظه.
وأما ما جاء في المصنفات مثل ابن أبي شيبة، وعبد الرزاق فهو موقوف على حذيفة، وهو محمول على أنه اجتهاد منه.
وما رُوي عن سعيد بن المسيب:"لا اعتكاف إلا في مسجد نبي" أي مسجد بناه نبيٌ. وقد روي عنه أيضًا بلفظ:"مسجد النبي" يعني مسجد المدينة.
كما رُوي عن عطاء:"لا يجاور إلا في مسجد مكة ومسجد المدينة" ولم ير الاعتكاف في مسجد إيلياء (بيت المقدس) كما رواه عبد الرزاق في"مصنفه" (8020).
وفي هذا وفي الرواية الثانية عن سعيد أنهما لم يعملا بحديث حذيفة، ولعلهما اعتمدا على الحديث المشهور:"لا تشد الرحال إلا إلى المساجد الثلاثة" سدَّا للذريعة لئلا يسافر أحدٌ للاعتكاف في غير المساجد الثلاثة كالمساجد الكبيرة في بعض المدن المشهورة آنذاك.
وأما المساجد التي يجوز فيها الاعتكاف ففي أصح أقوال أهل العلم: المسجد الجامع الذي تقام فيه الجماعة والجمعة حتى لا يحتاج المعتكف إلى تكرار الخروج مرة بعد أخرى إلا لحاجة لا بد منها. والله أعلم بالصواب.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত—
এই তিনটি মসজিদে (ইতিকাফ করা যায়): মাসজিদ আল-মাদীনাহ (মদীনার মসজিদ), মাসজিদ মাক্কাহ (মক্কার মসজিদ) এবং মাসজিদ ঈলিয়া (বাইতুল মুকাদ্দাস)।
অনুরূপভাবে এটি বর্ণনা করেছেন আবদুর রাযযাকও (৮০১৪) সাওরী থেকে, তিনি ওয়াসিল আল-আহদাব থেকে, তিনি ইবরাহীম থেকে। ইবরাহীম বলেছেন: হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আব্দুল্লাহ (ইবনে মাসউদ)-এর কাছে এলেন এবং বললেন: তোমার এবং আশআরীর ঘরের মাঝখানে কিছু লোক ইতিকাফ করছে—তুমি কি তাতে আশ্চর্য হবে না? আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: সম্ভবত তারা সঠিক কাজ করেছে আর আমি ভুল করেছি। তখন হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি এতে (সেই মসজিদে) ইতিকাফ করি বা তোমাদের এই ঘরগুলিতে—তাতে আমার কিছু আসে যায় না। ইতিকাফ কেবল এই তিনটি মসজিদে: মাসজিদ আল-হারাম, মাসজিদ আল-মাদীনাহ এবং মাসজিদ আল-আকসা। (যেখানে হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিন্দা করেছিলেন) তারা কুফার বৃহত্তর মসজিদে ইতিকাফ করেছিল।
অনুরূপভাবে এটি আবূ আওয়ানাহ বর্ণনা করেছেন মুগীরাহ থেকে, তিনি ইবরাহীম থেকে যে, হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বললেন: তোমার ও আবূ মূসার ঘরের মাঝখানে ইতিকাফকারী একদল লোককে দেখে তুমি কি আশ্চর্য হবে না? তিনি বললেন: সম্ভবত তারা সঠিক করেছে আর তুমি ভুল করেছো? অথবা তারা মনে রেখেছে আর তুমি ভুলে গেছো! তিনি বললেন: কিন্তু আমি তো জানি যে, জামাআতের মসজিদ ছাড়া ইতিকাফ নেই।
এটি তাবারানী আল-কাবীরে (৯/৩০১) আলী ইবনে আব্দুল আযীয আল-বাগাওয়ী থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন হাজ্জাজ ইবনে মিনহাল, তিনি বলেন: আমাদের কাছে হাদীস বর্ণনা করেছেন আবূ আওয়ানাহ, এরপর তিনি তা উল্লেখ করেন।
সুতরাং, যারা এই বর্ণনাটি হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব উক্তি হিসেবে ‘মাওকূফ’ রূপে বর্ণনা করেছেন, তারা হিশাম ইবনে আম্মার আদ্-দিমাশকী থেকে অধিক নির্ভরযোগ্য। হিশাম সম্পর্কে ইবনে হাজার ‘আত-তাকরীব’ গ্রন্থে বলেছেন: “তিনি সত্যবাদী ক্বারী ছিলেন, কিন্তু বার্ধক্যে তিনি تلقين (শিখিয়ে দেওয়া কথা গ্রহণ) করতে শুরু করেন, তাই তার পুরানো হাদীসগুলি অধিক বিশুদ্ধ।”
তেমনিভাবে মাহমুদ ইবনে আদম আল-মারওয়াযীও। যদিও বুখারীসহ একদল লোক তার থেকে বর্ণনা করেছেন, তবুও আমি ইবনে হিব্বান ছাড়া অন্য কারো দ্বারা তাকে নির্ভরযোগ্য হিসেবে পাইনি। এমন ব্যক্তি যদি বিরোধিতা করেন, তবে তা গ্রহণযোগ্য নয়।
তাছাড়া বর্ণনায় “আল-মাসজিদ আল-হারাম” নাকি “ফি মাসাজিদিস সালাসা” (এই তিন মসজিদে) নাকি “ফি মাসজিদিল জামাআহ” (জামাআতের মসজিদে)—এই ব্যাপারে সন্দেহ রয়েছে। এই ধরনের সন্দেহ নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে আসতে পারে না। এটি হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বা তার নিচের কোনো রাবী থেকে এসেছে। স্পষ্টত প্রতীয়মান হয় যে, রাবী নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর শব্দ সঠিকভাবে মনে রাখতে পারেননি। আর এটাই এই হাদীস দ্বারা দলীল পেশ করার দুর্বলতা। যদি হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এটি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করতেন, তবে আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তার বিরোধিতা করতেন না।
উপরন্তু, ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নিশ্চিত করেন যে, হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এই কথাটি ভুল করেছেন এবং যারা কুফার মসজিদে ইতিকাফ করেছেন, তারা সঠিক করেছেন।
হতে পারে এর মধ্যে রহিতকরণের (নাসখ) ঘটনা ঘটেছিল, যা তিনি (হুযাইফা) জানতেন না। ত্বহাবী তার ‘মুশকিল’ গ্রন্থে এই মত পোষণ করেছেন।
আবার হতে পারে যে, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর এই উক্তি দ্বারা ইশতিহাদ করে তিনি (হুযাইফা) এমন বলেছেন: “তিনটি মসজিদ ব্যতীত অন্য কোনো স্থানের জন্য (সাওয়াবের উদ্দেশ্যে) সফর করা যাবে না।” কিন্তু রাবীগণ ভুলবশত এটিকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর বাণী হিসেবে ‘মারফূ’ করেছেন।
এর সারসংক্ষেপ হলো: এই হাদীস কোনো দিক দিয়েই বিশুদ্ধ নয়।
সাহাবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও তাবেঈনসহ পরবর্তী উত্তম যুগগুলোর অধিকাংশ পূর্বসূরি বিদ্বানগণ এই হাদীসের উপর আমল পরিত্যাগ করেছেন। তাদের মাঝে এর সুপরিচিত না হওয়াটাই এর অগ্রহণযোগ্যতার প্রমাণ। যদি এই হাদীসটি সুপরিচিত হতো, তবে এটি বিখ্যাত সুনান ও মুসনাদ গ্রন্থগুলোতে বর্ণিত হতো। কিন্তু এটি ত্বহাবীর যুগ তথা পরবর্তী শতকে পরিচিতি লাভ করে। আর সুনান সাঈদ ইবনে মানসূরে যা বর্ণিত হয়েছে, তার শব্দে সন্দেহ রয়েছে।
আর ইবনে আবী শাইবা এবং আবদুর রাযযাকের মতো মুসান্নাফ গ্রন্থগুলোতে যা এসেছে, তা হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিজস্ব উক্তি ‘মাওকূফ’ হিসেবে গণ্য এবং তা তার ইজতিহাদ (গবেষণামূলক মতামত) হিসেবে বিবেচিত।
সাঈদ ইবনুল মুসায়্যিব (রহ.) থেকে বর্ণিত: “নবীর মসজিদ ব্যতীত ইতিকাফ নেই” —অর্থাৎ এমন মসজিদ যা কোনো নবী নির্মাণ করেছেন। আবার তার থেকে অন্য শব্দেও বর্ণিত হয়েছে: “মাসজিদুন নবী” (নবীর মসজিদ)—অর্থাৎ মদীনার মসজিদ।
যেমন আত্বা (রহ.) থেকে বর্ণিত: “ইতিকাফ কেবল মক্কার মসজিদ এবং মদীনার মসজিদে।” তিনি মাসজিদ ঈলিয়ায় (বাইতুল মুকাদ্দাস) ইতিকাফের বৈধতা দেননি, যেমনটি আবদুর রাযযাক তার ‘মুসান্নাফ’ (৮০২০)-এ বর্ণনা করেছেন।
এতে এবং সাঈদের দ্বিতীয় বর্ণনায় প্রতীয়মান হয় যে, তারা হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসের উপর আমল করেননি। সম্ভবত তারা সুপরিচিত হাদীস “তিনটি মসজিদ ছাড়া (সাওয়াবের উদ্দেশ্যে) সফর করা যাবে না” এর উপর নির্ভর করেছেন। যাতে কেউ এই তিনটি মসজিদ ছাড়া অন্য কোনো মসজিদে ইতিকাফের উদ্দেশ্যে সফর না করে, যেমন তৎকালে কিছু বিখ্যাত শহরের বড় মসজিদগুলো ছিল।
আর যে সকল মসজিদে ইতিকাফ করা জায়েজ, সে বিষয়ে বিদ্বানদের বিশুদ্ধতম মত হলো: যে জামে মসজিদে জামাআত ও জুমা উভয়ই অনুষ্ঠিত হয়, যাতে ইতিকাফকারীকে বারবার জরুরি প্রয়োজন ছাড়া বাইরে যেতে না হয়। আর সঠিক জ্ঞান আল্লাহই ভালো জানেন।
4570 - عن ابن عمر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا اعتكف طُرح له فراشُه وسريره إلى أسطوانة التوبة مما يلي القبلة، ثم يستند إليها.
حسن: رواه ابن خزيمة (2236)، والطبراني في"الكبير" (12/ 385)، و"الأوسط" (8071)، والفاكهي في"فوائده" (97) ومن طريقه البيهقي في"السنن الكبرى" (5/ 247) كلّهم من طريق عبد العزيز بن محمد (هو الدراوردي)، عن عيسي بن عمر بن موسى، عن نافع، عن ابن عمر.
وفي إسناده عيسي بن عمر بن موسي بن عبيد الله بن معمر القرشي التيمي حجازي، ذكره ابن حبان في"الثقات" (8/ 489) وقال:"يروي المقاطيع". وقال الدارقطني:"معروف يعتبر به" كما في سؤالات البرقاني (388). وقال الحافظ ابن حجر في"التقريب":" مقبول" يعني حيث يتابع وإلا فلين الحديث، ولكنه لم يتابع عليه، بل تفرّد به.
وأما الدراوردي فلم يتفرّد به، بل تابعه عبد الله بن المبارك.
رواه ابن ماجه (1774) من طريق نعيم بن حماد، حدثنا ابن المبارك، عن عيسي بن عمر بن موسي، به، فذكره، بمثل لفظ ابن خزيمة، وليس عندهما قوله:"مما يلي القبلة، ثم يستند إليها".
وفي إسناده نعيم بن حماد المروزي، صدوق يخطئ كثيرًا، كما في التقريب.
والحاصل أن مداره على عيسى بن عمر، لم يوثقه من يُعتبر بتوثيقه لكنه معروف كما قاله الدارقطني، وقد روى عنه جمعُ من الثقات، فحديثه يحتمل التحسين، والله أعلم.
وأما قول البوصيري في"مصباح الزجاجة" (2/ 43):" هذا إسناد صحيح رجاله موثقون" ففيه تساهل كما لا يخفي.
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وأسطوانة التوبة: هي التي شدّ أبو لبابة بن عبد المنذر عليها، وهي على غير القبلة. كما قاله ابن خزيمة.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন ই'তিকাফ করতেন, তখন তাঁর বিছানা ও খাট 'উসতুওয়ানাতুত-তাওবাহ' (তওবার স্তম্ভ) এর দিকে, যা কিবলার দিকে ঘেঁষে ছিল, পাতা হতো। এরপর তিনি তাতে হেলান দিতেন।
4571 - عن أبي سلمة قال: انطلقتُ إلى أبي سعيد الخدري، فقلت: ألا تخرجُ بنا إلى النّخل نتحدَّث؟ فخرج، فقال: قلتُ حدِّثني ما سمعتَ من النبيِّ صلى الله عليه وسلم في ليلة القدر؟ قال: اعتكف رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عشر الأوّل من رمضان، واعتكفنا معه، فأتاه جبريل، فقال: إنّ الذي تطلبُ أمامَك، فاعتكف العشر الأوسط، فاعتكفنا معه، فأتاه جبريل فقال: إنّ الذي تطلبُ أمامَك. قام النبيُّ صلى الله عليه وسلم خطيبًا صبيحة عشرين من رمضان، فقال:"من اعتكف مع النبيّ صلى الله عليه وسلم فليرْجِع، فإنّي أُريتُ ليلة القدر وإنّي نسيهُا، وإنّها في العشْر الأواخر في وتر، وإني رأيتُ كأنّي أسجُد في طين وماء". وكان سقفُ المسجد جريد النّخل، وما نرى في السماء شيئًا، فجاءت قزعةٌ فأُمطرنا، فصلَّي بنا النبيُّ صلى الله عليه وسلم حتى رأيتُ أثرَ الطِّين والماء على جبهة رسول الله صلى الله عليه وسلم وأَرْنبتِه، تصديقَ رؤياه.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصلاة (813) عن موسى، قال: حدثنا همام، عن يحيى، عن أبي سلمة، قال (فذكره).
ورواه مسلم في الصيام (216: 1167) من وجه آخر عن يحيي، به إلا أنه لم يذكر فيه العشر الأول.
قوله:"أُريتُ ليلة القدر" فيه إشارة إلى الرؤية المنامية.
وقد تحققت الرؤية في تلك السنة في ليلة الإحدي والعشرين كما ذكر أبو سعيد الخدري رضي الله عنه.
আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। আবূ সালামা বলেন: আমি আবূ সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম এবং বললাম, আপনি কি আমাদের সাথে খেজুর বাগানে যাবেন না, যেখানে আমরা কথা বলতে পারি? তখন তিনি বের হলেন। আমি তাঁকে বললাম, আপনি আমাকে লাইলাতুল কদর সম্পর্কে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কাছ থেকে যা শুনেছেন, তা বলুন।
তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রমাদানের প্রথম দশকে ইতিকাফ করলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে ইতিকাফ করলাম। অতঃপর জিবরাঈল (আঃ) তাঁর নিকট এসে বললেন: আপনি যা খুঁজছেন, তা আপনার সামনেই রয়েছে। এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মধ্যবর্তী দশকে ইতিকাফ করলেন এবং আমরাও তাঁর সাথে ইতিকাফ করলাম। অতঃপর জিবরাঈল (আঃ) তাঁর নিকট এসে বললেন: আপনি যা খুঁজছেন, তা আপনার সামনেই রয়েছে।
বিশ তারিখ রমাদানের সকালে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দাঁড়িয়ে খুতবা দিলেন এবং বললেন: "যে ব্যক্তি আমার (নবীর) সাথে ইতিকাফ করেছে, সে যেন (ইতিকাফের স্থানে) ফিরে আসে, কারণ আমাকে লাইলাতুল কদর দেখানো হয়েছিল, তবে আমি তা ভুলে গেছি। এটি শেষ দশকে বেজোড় রাতে হবে। আমি স্বপ্নে দেখেছি যে আমি কাদা ও পানির মধ্যে সিজদা করছি।"
মসজিদের ছাদ ছিল খেজুর পাতার ডাল দিয়ে তৈরি। আমরা আকাশে কিছুই দেখছিলাম না। এরপর এক টুকরা মেঘ এলো এবং আমাদের উপর বৃষ্টি হলো। অতঃপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের নিয়ে সালাত আদায় করলেন, এমনকি আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর কপালে ও নাকের ডগায় কাদা ও পানির চিহ্ন দেখতে পেলাম, যা তাঁর স্বপ্নের সত্যতা প্রমাণ করেছিল।
4572 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم اعتكف العشر الأوّل من رمضان، ثم اعتكف العشر الأوسط في قبّة تُركيّة على سُدَّتها حصير. قال: فأخذ الحصير بيده فنحّاها في ناحية القبّة. ثم أطلع رأسه فكلّم الناس فدنوا منه، فقال:"إنّي أعتكفُ العَشْر الأوّل، ألتمسُ هذه الليلة. ثم اعتكفتُ العشر الأوسط، ثم أُتيتُ فقيل لي: إنّها في العشر الأواخر. فمن أحبَّ منكم أن يعتكف فليعتكف".
فاعتكف الناسُ معه. قال:"وإنّي أُريتُها ليلَة وتر، وأنّي أسجدُ صبيحتَها في طين وماء" فأصبح من ليلة إحدى وعشرين، وقد قام إلى الصُّبح، فمطرت السماء. فوكف المسجد، فأبصرتُ الطّين والماء. فخرج حين فرغ من صلاة الصبح، وجبينه وروثهُ أنفه فيهما الطين والماء. وإذا هي ليلُه إحدى وعشرين من العشر الأواخر.
صحيح: رواه مسلم في الصيام (1167: 215) عن محمد بن عبد الأعلى، حدثنا المعتمر،
حدثنا عُمارة بن غزية الأنصاري، قال: سمعتُ محمد بن إبراهيم يحدّث عن أبي سلمة، عن أبي سعيد الخدريّ، فذكره.
قوله:"في قبة تركية" منسوبة إلى الترك وهم الجيل المعروف، وهي قبّة صغيرة.
وقوله:"على سُدَّتِها" الشدّة قيل: هي ظلة على الباب لتقيه من المطر، وقيل: هي الباب نفسه، وقيل: هي الساحة.
আবূ সাঈদ আল-খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাযানের প্রথম দশদিন ই'তিকাফ করলেন, অতঃপর মাঝের দশদিনও ই'তিকাফ করলেন একটি তুর্কী তাঁবুতে, যার প্রবেশদ্বারে চাটাই পাতা ছিল।
তিনি বললেন: অতঃপর তিনি নিজ হাতে চাটাইটি ধরে তাঁবুর একপাশে সরিয়ে রাখলেন। এরপর তিনি মাথা বের করে মানুষের সাথে কথা বললেন। মানুষ তাঁর নিকটবর্তী হলো। তিনি বললেন: "আমি প্রথম দশকে ই'তিকাফ করছিলাম, এই (মহিমান্বিত) রাতটি অন্বেষণ করার জন্য। অতঃপর আমি মাঝের দশকে ই'তিকাফ করলাম। এরপর আমার নিকট (দূত) আসলেন এবং আমাকে বলা হলো যে, তা (লাইলাতুল ক্বদর) শেষ দশকে রয়েছে। সুতরাং তোমাদের মধ্যে যে ই'তিকাফ করতে পছন্দ করে, সে যেন ই'তিকাফ করে।"
ফলে লোকেরা তাঁর সাথে ই'তিকাফ করলো। তিনি বললেন: "আর আমাকে তা (লাইলাতুল ক্বদর) একটি বেজোড় রাতে দেখানো হয়েছে এবং আমাকে দেখানো হয়েছে যে, আমি এর ফজরে কাদা ও পানির মধ্যে সিজদা করছি।"
একুশতম রাত শেষ হওয়ার পরে (যখন ফজর হলো), তিনি সুবহে সাদিক পর্যন্ত দাঁড়িয়ে রইলেন, তখন আকাশ থেকে বৃষ্টি হলো। ফলে মাসজিদে ছাদ চুইয়ে পানি পড়তে লাগল, তখন আমি কাদা ও পানি দেখতে পেলাম। অতঃপর তিনি যখন ফজরের সালাত শেষ করে বের হলেন, তখন তাঁর কপাল ও নাকের ডগায় কাদা ও পানি লেগে ছিল। আর সেটি ছিল শেষ দশকের একুশতম রাত।
4573 - عن أبي سعيد الخدريّ، أنه قال: كان رسولُ الله صلى الله عليه وسلم يعتكفُ العشرَ الوسطَ من رمضان، فاعتكف عامًا، حتى إذا كان ليلة إحدى وعشرين. وهي الليلة التي يخرج فيها من صبحها من اعتكافه. قال:"من اعتكف معي فليعتكف العشر الأواخر، وقد رأيتُ هذه الليلة ثم أُنسيتُها. وقد رأيتُني أسجُد من صبحها في ماء وطين. فالتمسوها في العشر الأواخر، والتمسوها في كلّ وتر".
قال أبو سعيد: فأُمطرت السماءُ تلك الليلة، وكان المسجدُ على عريش، فوكف المسجدُ.
قال أبو سعيد: فأبصرتْ عينايَ رسول الله صلى الله عليه وسلم انصرف وعلى جبهته وأنفه أثرُ الماء والطين من صُبح ليلة إحدى وعشرين.
متفق عليه: رواه مالك في الاعتكاف (9) عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم ابن الحارث التّيميّ، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي سعيد الخدري، أنه قال (فذكره).
ورواه البخاريّ في الاعتكاف (2027) من طريق مالك.
وروياه -البخاري (813)، ومسلم (1167: 216) - كلاهما من حديث يحيى، عن أبي سلمة، عن أبي سعيد الخدري، فذكر نحوه.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রমযানের মধ্যম দশকে ই'তিকাফ করতেন। একবার তিনি ই'তিকাফ করলেন, এমনকি যখন একুশের রাত এলো—আর এটি সেই রাত, যার সকালে তিনি তাঁর ই'তিকাফ থেকে বের হতেন—তখন তিনি বললেন: "যে আমার সাথে ই'তিকাফ করেছে, সে যেন শেষ দশকেও ই'তিকাফ করে। আমি এই রাতটি দেখেছিলাম, কিন্তু পরে আমাকে তা ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে। আমি স্বপ্নে দেখলাম যে আমি এর সকালে পানি ও কাদার মধ্যে সিজদা করছি। অতএব, তোমরা তা (লাইলাতুল কদর) শেষ দশকে তালাশ করো এবং তোমরা তা প্রত্যেক বেজোড় রাতে তালাশ করো।"
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: সেই রাতে আকাশ থেকে বৃষ্টি বর্ষিত হলো। আর মসজিদ ছিল চাটাইয়ের ছাউনির উপর, ফলে মসজিদের ছাদ থেকে পানি পড়তে লাগলো।
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার দু'চোখ দেখতে পেল যে, একুশের রাতের সকালে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সালাত শেষে) ফিরছেন এবং তাঁর কপাল ও নাকের ওপর পানি ও কাদার চিহ্ন লেগে আছে।
4574 - عن أبي سعيد الخدريّ، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يجاور في رمضان العشر التي في وسط الشهر، فإذا كان حين يمُسي من عشرين ليلة تمضي ويستقبل إحدى وعشرين، رجع إلى مسكنه، ورجع من كان يجاور معه، وأنه أقام في شهر جاور فيه الليلة التي كان يرجع فيها، فخطب الناس، فأمرهم ما شاء الله، ثم قال:"كنتُ أجاور هذه العشر، ثم قد بدا لي أن أجاور هذه العشر الأواخر، فمن كان اعتكف معي فليثْبت في معتكفه، وقد أُريتُ هذه الليلة، ثم أُنسيتها، فابتغوها في كلّ وتر،
وقد رأيْتُني أسجُد في ماء وطين".
فاستهلت السماء في تلك الليلة فأمطرتْ، فوكف المسجدُ في مصلّى النبيّ صلى الله عليه وسلم ليلة إحدى وعشرين. فبصرتْ عيني رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ونظرتُ إليه انصرف من الصبح ووجهه ممتلئ طينًا وماء.
متفق عليه: رواه البخاري في فضل ليلة القدر (2018)، ومسلم في الصيام (1167: 214) كلاهما من حديث عبد العزيز الدراوردي (وقرنه البخاري بابن أبي حازم)، عن يزيد بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أبي سعيد الخدري، فذكره. واللفظ للبخاري.
وأما مسلم فأحال على رواية بكر بن مضر، عن ابن الهاد، به. ولفظه متقارب.
আবু সাঈদ খুদরী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমজান মাসের মধ্যবর্তী দশ দিনে ইতিকাফ করতেন। যখন বিশ রাত চলে যেত এবং একুশতম রাত আসত, তখন তিনি তাঁর বাসস্থানে ফিরে যেতেন। তাঁর সাথে যারা ইতিকাফ করত, তারাও ফিরে যেত। একবার এমন হলো যে, তিনি যে মাসে ইতিকাফ করছিলেন, সেই রাতে তিনি (ফিরে না গিয়ে) অবস্থান করলেন, যে রাতে তিনি সাধারণত ফিরে যেতেন। এরপর তিনি লোকদের মাঝে ভাষণ দিলেন এবং আল্লাহ যা চাইলেন, সে অনুযায়ী তাদের আদেশ দিলেন। অতঃপর বললেন: "আমি এই (মধ্যম) দশকে ইতিকাফ করছিলাম, কিন্তু এখন আমার কাছে প্রকাশ করা হয়েছে যে, আমি যেন শেষ দশকে ইতিকাফ করি। অতএব, যে ব্যক্তি আমার সাথে ইতিকাফ করেছে, সে যেন তার ইতিকাফের স্থানে স্থির থাকে। আমাকে এই রাতটি দেখানো হয়েছিল, কিন্তু পরে তা ভুলিয়ে দেওয়া হয়েছে। সুতরাং তোমরা তা প্রতিটি বেজোড় রাতে তালাশ করো। আমি নিজেকে পানি ও কাদার মধ্যে সিজদা করতে দেখেছি।" সেই রাতে আকাশ ভেঙে বৃষ্টি নামল এবং বৃষ্টিপাত হলো। ফলে একুশতম রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সালাতের স্থানে মসজিদ চুইয়ে পড়ল। আমার চোখ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখল—আমি তাঁর দিকে তাকালাম যখন তিনি ফজরের সালাত থেকে ফিরলেন, তখন তাঁর মুখমণ্ডল কাদা ও পানিতে ভরে ছিল।
4575 - عن عبد الله بن عمر، قال: كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يعتكف العشر الأواخر من رمضان.
قال نافع: وقد أراني عبد الله رضي الله عنه المكان الذي كان يعتكف فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم من المسجد.
متفق عليه: رواه البخاري في الاعتكاف (2025)، ومسلم في الاعتكاف (1171: 2) من طريق يونس بن يزيد الأيلي، أنّ نافعًا حدّثه عن عبد الله بن عمر، فذكره. ولفظهما سواء إّلا قول نافع: وقد أراني … إلخ. زاده مسلم، وكذلك زاده أبو داود (2465)، وابن ماجه (1772).
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রমযানের শেষ দশকে ইতিকাফ করতেন।
নাফি’ বলেন, আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে মসজিদের মধ্যে সেই স্থানটি দেখিয়েছিলেন যেখানে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইতিকাফ করতেন।
4576 - عن عائشة، أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم كان يعتكف العشر الأواخر من رمضان حتى توفّاه الله تعالى، ثم اعتكف أزواجُه من بعده.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الاعتكاف (2026)، ومسلم في الاعتكاف (1172: 5) كلاهما من طريق الليث بن سعد، عن عقيل، عن ابن شهاب الزهري، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته. ولفظهما سواء.
ورواه عبد الرزاق (7682) ومن طريقه الإمام أحمد (7784)، والترمذي (790)، وابن حبان (3665) عن معمر وابن جريج كلاهما سمعا ابن شهاب يحدث عن عروة، عن عائشة. وعن سعيد ابن المسيب، عن أبي هريرة، فذكر الحديث إلا قولها:"ثم اعتكف أزواجه بعده".
وإسناده صحيح. ومنهم من لم يذكر ابن جريج.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমজানের শেষ দশকে ইতিকাফ করতেন, যতক্ষণ না আল্লাহ তাঁকে উঠিয়ে নেন। এরপর তাঁর স্ত্রীগণ তাঁর পরে ইতিকাফ করেছেন।
4577 - عن أبي هريرة، قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يعتكفُ في كلِّ رمضان عشرة أيام، فلما
كان العام الذي قُبض فيه اعتكف عشرين يومًا.
صحيح: رواه البخاريّ في الاعتكاف (2044) عن عبد الله بن أبي شيبة، حدّثنا أبو بكر (هو ابن عياش)، عن أبي حصين (هو عثمان بن عاصم)، عن أبي صالح، عن أبي هريرة، قال (فذكره).
আবূ হুরাইরা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রতি রমযানে দশ দিন ইতিকাফ করতেন। কিন্তু যখন তাঁর ওফাত হয়েছিল, সেই বছর তিনি বিশ দিন ইতিকাফ করেছিলেন।
4578 - عن عائشة: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ذكر أن يعتكف العشر الأواخر من رمضان، فاستأذنته عائشة فأذن لها. وسألتْ حفصةُ عائشةَ أن تستأذن لها، ففعلت. فلما رأت ذلك زينب بنت جحش أمرتْ ببناء فبُني لها قالت: وكان رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا صلّي انصرف إلى بنائه فبصر بالأبنية فقال:"ما هذا؟". قالوا: بناء عائشة وحفصة وزينب. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"آلبر أردن بهذا؟ ما أنا بمعتكف". فرجع فلما أفطر اعتكف عشرا من شوال.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الاعتكاف (2045)، ومسلم في الصيام (1172: 6) كلاهما من طريق الأوزاعي، حدثني يحيى بن سعيد (هو الأنصاري)، حدثتني عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة. واللفظ للبخاري.
وفي رواية لمسلم من طريق أبي معاوية، عن يحيى بن سعيد، به. وفيه:"حتى اعتكف في العشر الأوّل من شوّال".
وأخرجه مالك في الاعتكاف (7) عن ابن شهاب، عن عمرة بنت عبد الرحمن، به، مثله. إلا أنّ يحيى الليثي أخطأ في شيخ مالك، فجعله ابن شهاب. والصحيح أنه يحيى بن سعيد، كما سيأتي.
وليس في الحديث ما يدل على وجوب القضاء على من خرج من الاعتكاف وكان متطوعًا. بخلاف النذر أو شيء أوجبه على نفسه فعليه القضاء.
والنبيّ صلى الله عليه وسلم كان من عادته إذا عمل شيئًا داوم عليه، فلما لم يتمكن من الاعتكاف هذا العام من أجل كثرة أبنية النساء في المسجد اعتكف في شوال.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রমযানের শেষ দশকে ই'তিকাফ করার ইচ্ছা প্রকাশ করলেন। অতঃপর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কাছে অনুমতি চাইলে তিনি তাকে অনুমতি দিলেন। হাফসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তার জন্য অনুমতি চাইতে অনুরোধ করলেন এবং তিনি তা করলেন। যখন যায়নাব বিনতে জাহশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ দৃশ্য দেখলেন, তখন তিনিও একটি তাঁবু তৈরি করার নির্দেশ দিলেন এবং তার জন্য তা নির্মাণ করা হলো। তিনি (আয়িশা) বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সালাত শেষ করতেন, তখন তিনি তাঁর তাঁবুর দিকে যেতেন। এরপর তিনি তাঁবুগুলো দেখতে পেলেন এবং বললেন: “এগুলো কী?” লোকেরা বলল: আয়িশা, হাফসা এবং যায়নাবের তাঁবু। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: “এদের দ্বারা কি তারা সৎকাজ উদ্দেশ্য করেছে? আমি ই'তিকাফ করব না।” অতঃপর তিনি ফিরে গেলেন এবং যখন তিনি ইফতার করলেন, তখন শাওয়ালের দশ দিন ই'তিকাফ করলেন।
4579 - عن أُبي بن كعب، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يعتكف في العشر الأواخر من رمضان، فسافر ولم يعتكف، فلما كان من العام المقبل اعتكف عشرين يومًا.
صحيح: رواه أبو داود (2463)، وابن ماجه (1770)، وأحمد (21277)، وصحّحه ابن خزيمة (2225)، وابن حبان (3663)، والحاكم (1/ 439) كلّهم من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت البناني، عن أبي رافع، وهو نفيع الصائغ، عن أبي بن كعب، فذكره.
উবাই ইবনু কা'ব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাদানের শেষ দশকে ইতিকাফ করতেন, অতঃপর তিনি (একবার) সফরে গেলেন এবং ইতিকাফ করতে পারলেন না, যখন পরবর্তী বছর এলো, তখন তিনি বিশ দিন ইতিকাফ করলেন।
4580 - عن أنس بن مالك، قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يعتكف في العشر الأواخر من رمضان. فلم يعتكف عامًا، فلما كان العام المقبل اعتكف عشرين.
صحيح: رواه الترمذي (803)، وابن خزيمة (2226، 2227)، وابن حبان (3664)، والحاكم (1/ 439) كلّهم من حديث ابن أبي عدي، عن حميد، عن أنس، فذكره. وإسناده صحيح.
قال الترمذي: حسن صحيح غريب.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রমাদানের শেষ দশকে ইতিকাফ করতেন। কিন্তু এক বছর তিনি ইতিকাফ করতে পারেননি, তাই যখন পরবর্তী বছর আসল, তখন তিনি বিশ দিন ইতিকাফ করলেন।