আল-জামি` আল-কামিল
4601 - عن أبي واقد اللّيثيّ، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول لأزواجه في حجّة الوداع:"هذه، ثم ظهور الْحُصُر".
حسن: رواه أبو داود (1722) عن النُّفيليّ، حدّثنا عبد العزيز بن محمد، عن زيد بن أسلم، عن ابن لأبي واقد اللّيثيّ، عن أبيه، فذكره.
وإسناده حسن من أجل ابن أبي واقد، واسمه واقد كما سمّاه الإمام أحمد (21905) في روايته عن سعيد بن منصور، حدّثنا عبد العزيز بن محمد، عن زيد بن أسلم، عن واقد بن أبي واقد اللّيثيّ، عن أبيه، فذكر مثله.
وواقد هذا مختلف فيه، فرجّح الحافظ ابن حجر أن تكون له صحبة تبعًا لذكر ابن منده له في"الصحابة"، ونقل عن أبي داود أيضًا بأن له صحبة، فلم يصب من قال فيه"مجهول".
আবূ ওয়াকিদ আল-লায়ছী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বিদায় হাজ্জের সময় তাঁর স্ত্রীদেরকে বলতে শুনেছি: "এই হাজ্জ, অতঃপর মাদুরের উপর অবস্থান (অর্থাৎ ঘরেই থাকা)।"
4602 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله لما حجّ بنسائه قال:"إنّما هذه الحجّة، ثم الْزمن ظهور الحصُر".
حسن: رواه أحمد (9765)، وأبو يعلى (7158)، والطيالسي (1752)، والبيهقي (5/ 228) كلّهم من طريق ابن أبي ذئب، عن صالح مولى التوأمة، عن أبي هريرة، فذكره.
وزاد الأخيران:"فكن يحججن إلّا سودة بنت زمعة، وزينب بنت جحش، فإنهما كانتا تقولان: والله لا تحركنا دابة بعد أن سمعنا من رسول الله".
وهذه الزّيادة رواها أيضًا أحمد (26751) من أوجه أخرى عن ابن أبي ذئب، به. ورواه البزار -كشف الأستار (1057) - من طريق سفيان الثوريّ، عن صالح مولى التوأمة، به.
قال البزار:"أحسبه عن سفيان، عن ابن أبي ذئب، عن صالح؛ ولكن هكذا قال قبيصة. ورواه
جماعة عن صالح منهم: ابن أبي ذئب، وصالح بن كيسان".
قلت: إسناده حسن من أجل صالح مولي التوأمة، فإنه صدوق وقد اختلط بآخره، ولكن رواه ابن أبي ذئب قبل اختلاطه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের নিয়ে হজ করলেন, তখন তিনি বললেন: "এই তো হলো হজ (যা তোমরা করলে), এরপর তোমরা চাটাইয়ের উপর স্থির থাকো (ঘরে অবস্থান করো)।"
অতঃপর (তাঁর ওফাতের পর) তাঁরা (অন্যান্য স্ত্রীগণ) হজ করতেন, কিন্তু সাওদা বিনতে যামআ এবং যায়নাব বিনতে জাহাশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হজ করেননি। কারণ তারা দু'জন বলতেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট থেকে শোনার পর আল্লাহ্র কসম, কোনো পশুই আমাদেরকে আর ঘর থেকে সরাবে না।
4603 - عن أمّ سلمة، قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لنا في حجّة الوداع:"إنّما هي هذه الحجّة، ثم الجلوس على ظهور الحصر في البيوت".
حسن: رواه الطبرانيّ في"الكبير" (23/ 313)، وأبو يعلى (6885) كلاهما من عبد الله بن جعفر المخرمي، حدثني عثمان بن عمر الأخنس، عن عبد الرحمن بن سعيد بن يربوع، عن أم سلمة، قالت: فأخبرته.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عثمان بن عمر الأخنس غير أنه حسن الحديث، وذكره المنذريّ في"الترغيب" (1849) وقال:"رجاله ثقات".
ورواه البيهقيّ (3/ 214) عن عاصم بن عمر، عن عبد الله بن دينار، عن ابن عمر، فذكر الحديث.
وعاصم بن عمر هو ابن حفص بن عاصم بن عمر بن الخطاب، ضعيف باتفاق أهل العلم.
وشذّ ابن حبان، فذكره في"الثقات" (5/ 233)، وأخرج حديثه في"الصحيح" (3706).
وأمّا معنى الحديث فكما قال البيهقيّ:"في حجّ عائشة وغيرها من أمهات المؤمنين بعد رسول الله صلى الله عليه وسلم دلالة على أنّ المراد من هذا الخبر وجوب الحجّ عليهن مرّة واحدة كما بيّن وجوبه على الرجال مرة لا المنع من الزيادة عليه".
وقوله:"الحصر" بضمة وسكون الصاد تخفيفًا، جمع حصير يُبسط في البيوت، وفيه إشارة إلى لزوم البيت وترك الحجّ النّفل بعد أن تيسّر لهن الحجّ مع النبيّ صلى الله عليه وسلم، لا النهي عن الحج كليا تطوّعًا بعد أداء الفريضة، وقد صح من فعل أزواج النبيّ صلى الله عليه وسلم أنهن حججن بعده صلى الله عليه وسلم في عهد عمر بن الخطاب كما سيأتي.
উম্মে সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জের সময় আমাদেরকে লক্ষ্য করে বললেন: “এটিই (তোমাদের জন্য) একমাত্র হজ্জ। এরপর নিজ নিজ ঘরে চাটাইয়ের (বা বিছানার) ওপর বসে থাকা।”
4604 - عن عمرو بن العاص، قال: فَلَمَّا جَعَلَ اللهُ الإِسْلامَ فِي قَلْبِي أَتَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقُلْتُ: ابْسُطْ يَمِينَكَ فَلأُبَايِعْكَ، فَبَسَطَ يَمِينَهُ قَالَ: فَقَبَضْتُ يَدِي قَالَ:"مَا لَكَ يَا عَمْرُو؟" قَالَ: قُلْتُ: أَرَدْتُ أَنْ أَشْتَرِطَ. قَالَ:"تَشْتَرِطُ بِمَاذَا؟". قُلْت: أَنْ يُغْفَرَ لِي، قَال:"أَمَا عَلِمْتَ أَنَّ الإِسْلامَ يَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهُ، وَأَنَّ الْهِجْرَةَ تَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهَا، وَأَنَّ الْحَجَّ يَهْدِمُ مَا كَانَ قَبْلَهُ". الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (121) في سياق طويل من طرق عن أبي عاصم الضّحاك، قال: أخبرنا حيوة بن شريح، قال: حدّثني يزيد بن أبي حبيب، عن ابن شماسة المهريّ، قال:
حضرنا عمرو بن العاص - وهو في سياقة الموت … فذكره بتمامه.
التفسير الثاني: أنّ الصّرورة هو الرّجل الذي لم يحجّ، فمعناه على هذا أن سنة الدين أن لا يبقى أحدٌ من الناس يستطيع الحج، فلا يحج حتى لا يكون صرورة في الإسلام.
وقد يستدل به من يزعم أن الصّرورة لا يجوز له أن يحجّ عن غيره، وتقدير الكلام عنده: أن الصّرورة إذا شرع في الحج عن غيره صار الحج عنه، وانقلب عن فرضه ليحصل معنى النفي فلا يكون صرورة.
وهذا مذهب الأوزاعي والشافعي وأحمد وإسحاق.
وقال مالك، والثوري: حجّه على ما نوى، وإليه ذهب أهل الرّأي، وقد روي ذلك عن الحسن البصري، وعطاء، والنخعي" انتهي. قاله الخطابي في"معالم السنن".
وقال سفيان: كان أهل الجاهلية يقولون للرجل إذا لم يحج: هو صرورة، فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"لا صرورة في الإسلام".
رواه الطّحاوي في"مشكله" (1283) بإسناده عن سفيان، عن عمرو بن دينار، عن عكرمة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا صرورة في الإسلام" فذكر سفيان قوله. ورجاله ثقات وهو مرسل.
وذكر الطّحاوي المعاني الأخرى للصرورة فراجعه.
وللحديث شواهد في كتب المعاجم إلّا أنها كلّها ضعيفة.
وأشهرها حديث جبير بن مطعم قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا صرورة في الإسلام" رواه الطبرانيّ في"الكبير" (2/ 137) من طريق منصور، عن كلاب بن علي، عن ابن جبير بن مطعم، عن أبيه مرفوعًا.
وكلاب بن علي العامريّ، حدّث عنه منصور بن المعتمر قال فيه الذهبي:"مجهول" وأظهر البيهقيّ (5/ 165) الاختلاف، فقال: رُوي عن منصور بن أبي سليم تارة عن جبير بن مطعم، وتارة عن ابن جبير عن أبيه، وتارة عن ابن أخي جبير، وتارة عن نافع بن جبير أُراه عن أبيه، فذكر الحديث.
আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন আল্লাহ্ আমার হৃদয়ে ইসলামকে স্থান দিলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসলাম এবং বললাম: আপনার ডান হাত প্রসারিত করুন, আমি আপনার হাতে বাইআত করব। তিনি তাঁর ডান হাত প্রসারিত করলেন। তিনি (আমর) বলেন, তখন আমি আমার হাত গুটিয়ে নিলাম। তিনি (নবী) বললেন: "হে আমর, তোমার কী হলো?" তিনি (আমর) বললেন: আমি চেয়েছিলাম কিছু শর্ত আরোপ করতে। তিনি (নবী) বললেন: "তুমি কী শর্ত আরোপ করতে চাও?" আমি বললাম: যেন আমার (পূর্বের) গুনাহ মাফ করা হয়। তিনি বললেন: "তুমি কি জানো না যে, ইসলাম তার পূর্বের সবকিছুকে (গুনাহকে) মুছে দেয়? আর হিজরত তার পূর্বের সবকিছুকে (গুনাহকে) মুছে দেয়? আর হজ তার পূর্বের সবকিছুকে (গুনাহকে) মুছে দেয়?" (এই পর্যন্ত) হাদিস।
4605 - عن أبي هريرة، قال: سُئِلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم أَيُّ الأَعْمَالِ أَفْضَلُ؟ قَال:"إِيمَانٌ بِاللهِ وَرَسُولِهِ". قِيل: ثُمَّ مَاذَا؟ قَال:"جِهَادٌ فِي سَبِيلِ الله". قِيل: ثُمَّ مَاذَا؟ قَال:"حَجٌّ مَبْرُورٌ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1519)، ومسلم في الإيمان (83) كلاهما من طريق إبراهيم بن سعد، عن الزهريّ، عن سعيد بن المسيب، عن أبي هريرة، فذكره.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল, 'কোন আমলটি সর্বোত্তম?' তিনি বললেন, "আল্লাহ ও তাঁর রাসূলের প্রতি ঈমান।" জিজ্ঞাসা করা হলো, 'তারপর কোনটি?' তিনি বললেন, "আল্লাহর পথে জিহাদ।" জিজ্ঞাসা করা হলো, 'তারপর কোনটি?' তিনি বললেন, "মাবরূর (কবুল) হজ্ব।"
4606 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الْعُمْرَةُ إِلَى الْعُمْرَةِ كَفَّارَةٌ لِمَا بَيْنَهُمَا، وَالْحَجَّ الْمَبْرُورُ لَيْسَ لَهُ جَزَاءٌ إِلَّا الْجَنَّةُ".
متفق عليه: رواه مالك في الحج (65) عن سُمي مولى أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أبي صالح
السّمان، عن أبي هريرة، به.
ورواه البخاريّ في العمرة (1773)، ومسلم في الحج (1349) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক উমরাহ থেকে আরেক উমরাহ—এই দুইয়ের মধ্যবর্তী সময়ের (পাপের) কাফ্ফারা (ক্ষতিপূরণ)। আর 'হাজ্জে মাবরূর' (কবুল হওয়া হজ্জ)-এর প্রতিদান জান্নাত ছাড়া আর কিছুই নয়।"
4607 - عن أبي هريرة قال: سمعت النبي صلى الله عليه وسلم يقول:"من حج لله فلم يرفث، ولم يفسق رجع كيوم ولدته أمه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1521) ومسلم في الحج (1350) كلاهما من حديث سيار أبي الحكم، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره، واللفظ للبخاريّ، ولفظ مسلم نحوه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি আল্লাহর জন্য হজ করল এবং অশ্লীলতা থেকে বিরত থাকল, আর কোনো পাপাচারে লিপ্ত হলো না, সে তার মায়ের গর্ভ থেকে ভূমিষ্ঠ হওয়ার দিনের মতো নিষ্পাপ হয়ে ফিরে এল।"
4608 - عن عائشة أنها قالت: يَا رَسُولَ الله، نَرَى الْجِهَادَ أَفْضَلَ الْعَمَلِ أَفَلا نُجَاهِدُ؟ قَال:"لا لَكِنَّ أَفْضَلَ الْجِهَادِ حَجٌّ مَبْرُورٌ".
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1520) عن عبد الرحمن بن المبارك، حدّثنا خالد -هو ابن عبد الله الواسطيّ-، أخبرنا حبيب بن أبي عمرة، عن عائشة بنت طلحة، عن عائشة، به.
وأما ما رُوي عن عمرو بن عبسة، قال: قَالَ رَجُلٌ يَا رَسُول اللهِ، مَا الإِسْلامُ؟ قَال:"أَنْ يُسْلِمَ قَلْبُكَ لله عز وجل، وَأَنْ يَسْلَمَ الْمُسْلِمُونَ مِنْ لِسَانِكَ وَيَدِكَ". قَال: فَأَيُّ الإِسْلامِ أَفْضَل؟ قَال:"الإِيمَانْ" قَال: وَمَا الإِيمَانُ؟ قَال:"تُؤْمِنُ بِاللهِ، وَمَلائِكَتِهِ، وَكُتُبِهِ، وَرُسُلِهِ، وَالْبَعْثِ بَعْدَ الْمَوْتِ". قَال: فَأَيُّ الإِيمَانِ أَفْضَلُ؟ قَال:"الْهِجْرَةُ". قَال: فَمَا الهِجْرَةُ؟ قَال:"تَهْجُرُ السُّوء". قَال: فَأَيُّ الْهِجْرَةِ أَفْضَلُ؟ قَال:"الجِهَادُ". قَال: وَمَا الْجِهَادُ؟ قَال:"أَنْ تُقَاتِلَ الْكُفَّارَ إِذَا لَقِيتَهُم". قَال: فَأَيُّ الْجِهَادِ أَفْضَلُ؟ قَالَ:"مَنْ عُقِرَ جَوَادُهُ وَأُهْرِيقَ دَمُهُ". قَالَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم:"ثُمَّ عَمَلانِ هُمَا أَفْضَلُ الأَعْمَالِ إِلّا مَنْ عَمِلَ بِمِثْلِهِمَا حَجَّةٌ مَبْرُورَةٌ أَوْ عُمْرَةٌ".
ففيه انقطاع رواه أحمد (17027) عن عبد الرزاق وهو في مصنفه (20107) عن معمر، عن أيوب، عن أبي قلابة، عن عمرو بن عبسة، فذكره. وأبو قلابة لم يدرك عمرو بن عبسة.
ورواه الحارث بن أبي أسامة في مسنده كما في"البغية" (13) وفيه رجل مجهول.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমরা মনে করি জিহাদ সর্বোত্তম আমল, তাহলে কি আমরা জিহাদ করব না?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "না। তবে সর্বোত্তম জিহাদ হলো মাবরুর হজ (কবুল হওয়া হজ)।"
আর যা আমর ইবনে আবাসা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি জিজ্ঞেস করল, "হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), ইসলাম কী?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তা হলো, তোমার অন্তর আল্লাহর জন্য সমর্পণ করা এবং তোমার মুখ ও হাত থেকে মুসলিমদের নিরাপদ থাকা।" লোকটি বলল: "তাহলে ইসলামের মধ্যে সর্বোত্তম কোনটি?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ঈমান।" সে জিজ্ঞেস করল: "ঈমান কী?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি আল্লাহ, তাঁর ফেরেশতাগণ, তাঁর কিতাবসমূহ, তাঁর রাসূলগণ এবং মৃত্যুর পর পুনরুত্থানের প্রতি বিশ্বাস স্থাপন করবে।" সে বলল: "তাহলে ঈমানের মধ্যে সর্বোত্তম কোনটি?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হিজরত (দেশত্যাগ)।" সে বলল: "হিজরত কী?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "মন্দ ও খারাপ বিষয় বর্জন করা।" সে বলল: "তাহলে হিজরতের মধ্যে সর্বোত্তম কোনটি?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "জিহাদ।" সে বলল: "জিহাদ কী?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যখন তুমি কাফিরদের মুখোমুখি হও, তখন তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ করা।" সে বলল: "তাহলে জিহাদের মধ্যে সর্বোত্তম কোনটি?" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "ঐ ব্যক্তি, যার ঘোড়া আঘাতপ্রাপ্ত হয়েছে এবং তার রক্ত ঝরানো হয়েছে।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এরপর দুটি আমল রয়েছে, যা সর্বোত্তম আমল। তবে ওই ব্যক্তি ব্যতীত, যে একই ধরনের আমল করেছে— (তা হলো) মাবরুর হজ অথবা উমরাহ।"
4609 - عن ماعز، عَنِ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أَنَّهُ سُئِلَ أَيُّ الأَعْمَالِ أَفْضَلُ؟ قَال:"إِيمَانٌ بِاللهِ وَحْدَهُ، ثُمَّ الْجِهَادُ، ثُمَّ حَجَّةٌ بَرَّةٌ تَفْضُلُ سَائِرَ الْعَمَلِ كَمَا بَيْنَ مَطْلَعِ الشَّمْسِ إِلَى مَغْرِبِهَا".
صحيح: رواه الإمام أحمد (19010)، وعنه الطبراني في"الكبير" (20/ 244)، عن محمد بن جعفر، حدّثنا شعبة، عن أبي مسعود -يعني الجريريّ-، عن يزيد بن عبد الله بن الشّخّير، عن ماعز، فذكره.
وأبو مسعود الجريريّ هو سعيد بن إياس البصريّ، اختلط قبل موته بثلاث سنين، وهو من رجال الجماعة، وقد روي عنه شعبة كما هنا قبل اختلاطه.
ورواه أيضًا عبد الله بن الإمام أحمد (19011) عن هُدبة بن خالد، حدّثنا وُهيب بن خالد،
قال: الجريريّ، حدّثنا عن حيان بن عمير، حدّثنا ماعز، فذكره بنحوه.
ووهيب بن خالد ممن سمع الجريري قبل الاختلاط، إلّا أن الجريري جعل هنا شيخه حيان بن عمير، فلعله سمع من الشيخين.
وأما ماعز فهو غير منسوب، قال ابن عبد البر كما في"التعجيل":"لم أقف على نسبه".
والحديث أورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 207) وعزاه إلى أحمد والطبرانيّ، وقال:"رجال أحمد رجال الصحيح".
قلت: كذا قال، مع أن الطبرانيّ رواه من طريقي المسند إلا أنه أقحم بين شعبة وأبي مسعود الجريريّ"أبا موسي" وهو خطأ.
ثم رواه من الطريق الثالث من وجه آخر عن هدبة بن خالد بإسناده نحوه، ونسب ماعز إلى بني تميم.
قوله:"حج مبرور" قال النووي:"الأصح الأشهر أنّ المبرور هو الذي لا يخالطه إثم مأخوذ من البر وهو الطاعة، وقيل: هو المقبول، ومن علامة القبول أن يرجع خيرًا مما كان. وقيل: هو الذي لا رياء فيه. وقيل: الذي لا يعقبه معصية، وهما داخلان فيما قبلهما". شرح صحيح مسلم (9/ 118).
وقال أبو العباس القرطبي في"المفهم" (3/ 463) في الأقوال التي ذكرت في تفسير الحج المبرور:"كلّها متقاربة المعنى، وهو أنّ الحجّ الذي وُفّيت أحكامه، ووقع موافقًا لما طُلب من المكلف على الوجه الأكمل" اهـ.
وفي الباب ما رُوي عن الشّفاء بنت عبد الله -وكانت امرأة من المهاجرات- قالت: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن أفضل الأعمال؟ فقال:"إيمان بالله، وجهاد في سبيل الله، وحجّ مبرور".
رواه الإمام أحمد (27094) عن هاشم بن القاسم، حدّثنا المسعودي، عن عبد الملك بن عمير، عن رجل من آل أبي حثمة، عن الشّفاء، فذكرته.
والمسعوديّ مختلط، وروى عنه هاشم بن قاسم بعد الاختلاط.
وكذلك رواه شبابة بن سوار، عن المسعودي، عن عبد الملك بن عمير، عن رجل من آل أبي حثمة.
ثم اختلف على عبد الملك بن عمير، فرواه الطبراني في"الكبير" (24/ 315) من طريق زكريا بن أبي زائدة، عن عبد الملك بن عمير، قال: حدثني فلان القرشي، عن جدته أنها سمعت النبي صلى الله عليه وسلم.
ورواه عبدة بن حميد، عن عبد الملك بن عمير، عن عثمان بن أبي حثمة، عن جدته الشّفاء، قالت (فذكرته).
ورواه الوليد بن أبي ثور، عن عبد الملك بن عمير، عن عثمان بن أبي سليمان، عن جدته أم أبيه، قالت: جاء رجل إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال (فذكرته).
وعبد الملك بن عمير وإن كان من رجال الجماعة فقد وُصف بأنه يخطئ كثيرًا.
قال الإمام أحمد:"إنه مضطرب الحديث جدًّا مع قلّة روايته، ما أري له خمسمائة حديث، وقد غلط في كثير منها".
وقال أيضًا:"إنه ضعيف جدًا"، وعن ابن معين:"إنه مخلّط". وقال أبو حاتم:"عبد الملك بن عمير لم يوصف بالحفظ".
ولذا قال الدارقطني في"العلل" (15/ 310):"ويشبه أن يكون الاضطراب من عبد الملك".
وأمّا ما رُوي عن جابر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الحجُّ المبرور ليس له جزاءٌ إلّا الجنّة" قالوا: يا نبي الله، ما برُّ الحجّ المبرور؟ قال:"إطعام الطّعام، وإفشاء السّلام". فهو ضعيف.
رواه الإمام أحمد (14482) عن عبد الصمد بن عبد الوارث، حدثنا محمد بن ثابت، حدثنا محمد بن المنكدر، عن جابر، به.
ورواه العقيلي في"الضعفاء" (4/ 40) من طريق بكر بن بكار، عن محمد بن ثابت البناني، عن محمد بن المنكدر، به، مختصرًا بلفظ:"حج مبرور ليس له جزاء إلا الجنة".
ومحمد بن ثابت بن أسلم البناني البصري، قال فيه يحيى بن معين:"ليس بشيء"، وقال أبو حاتم:"منكر الحديث، يكتب حديثه ولا يحتج به"، وقال البخاري:"فيه نظر". انظر"تهذيب الكمال" (6/ 255 - 256).
ورواه ابن عدي في"الكامل" (6/ 2146) وقال:"وله غير ما ذكرت وليس بالكثير، وعامة أحاديثه لا يتابع عليه".
ورواه أبو داود الطيالسي في مسنده (1824) عن طلحة بن عمرو، عن محمد بن المنكدر به، بلفظ:"أفضل الأعمال إيمان بالله، وجهاد في سبيل الله" قال: قلنا: ما برُّ الحجّ؟ قال:"إطعام الطعام، وطيب الكلام".
وإسناده ضعيف جدًّا، فيه طلحة بن عمرو الحضرمي المكي وهو متروك.
ورواه الحاكم (1/ 483) من طريق أيوب بن سويد، ثنا الأوزاعي، عن محمد بن المنكدر، عن جابر، قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم: ما برُّ الحجّ؟ قال (فذكره بمثل حديث الطيالسي).
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه، لأنهما لم يحتجا بأيوب بن سويد لكنه حديث له شواهد كثيرة" اهـ.
قلت: بل إسناده ضعيف؛ لأن أيوب بن سويد الرّملي متكلم فيه، قال فيه ابن معين:"ليس بشيء يسرق الحديث"، وقال البخاري:"يتكلمون فيه"، وقال النسائي:"ليس بثقة"، وقال أبو حاتم:"لين الحديث"، وقال ابن عدي:"يقع في حديثه ما يوافقه الثقات، ويقع فيه ما لا يوافقونه عليه، ويكتب حديثه في جملة الضعفاء" انظر"تهذيب الكمال" (1/ 318).
قلت: ومع ضعفه فقد خالف فيه الثقة، فقد رواه البيهقي (5/ 262) من طريق الوليد بن مسلم، عن الأوزاعي، عن ابن المنكدر، مرسلًا.
وبالجملة فليس ما يشهد لتفسير الحج المبرور من الحديث المرفوع؛ ولذلك قال ابن حجر في"الفتح" بعد ما عزا حديث جابر لأحمد والحاكم:"وفي إسناده ضعف، فلو ثبت لكان هو المتعين دون غيره". فتح الباري (3/ 382).
وفي الباب أحاديث إلا أنها لا تصح.
منها ما رُوي عن جابر مرفوعًا:"ما أمعر حاجٌّ قطّ".
قيل لجابر:"ما الإمعار؟ قال: ما افتقر". فهو مما تفرّد به محمد بن أبي حميد. ومن طريقه رواه البزار -كشف الاستار (1080) - عنه، عن محمد بن المنكدر، عن جابر، فذكره.
قال البزار: تفرّد به محمد بن أبي حميد، وعنده أحاديث لا يتابع عليها، ولا أحسب ذلك من تعمّده، ولكن من سوء حفظه، فقد روى عنه أهل العلم.
وأمّا قول الهيثميّ (3/ 208) بعد أن عزاه للطبراني في"الأوسط"، والبزار:"ورجاله رجال الصّحيح" فهو ليس بصحيح؛ فإنّ محمد بن أبي حميد الأنصاريّ الزرقي ليس من رجال الصحيح، بل من رجال الترمذيّ وابن ماجه، ثم هو ضعيف عند جمهور أهل العلم.
ومنها ما رُوي عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أمَّ هذا البيت من الكسب الحرام شخص في غير طاعة الله، فإذا أهلّ ووضع رجله في الغَرْز (أي الركاب) وانبعثت به راحلته وقال: لبيك اللهم لبيك، ناداه مناد من السماء: لا لبيك ولا سعديك كسبك حرام، وزادك حرام، وراحلتك حرام، فارجع مأزورًا غير مأجور، وأبشر بما يسوؤك، وإذا خرج الرجل حاجًا بمال حلال، ووضع رجله في الركاب، وانبعثت به راحلته وقال: لبيك اللهم لبيك، ناداه منادٍ من السماء: لبيك وسعديك قد أجبتك، راحلتك حلال، وثيابك حلال، وزادك حلال، فارجع غير مأزور، وأبشر بما يسرّك".
رواه البزار -كشف الأستار (1079) - عن محمد بن مسكين، ثنا سعيد، عن سليمان بن داود، ثنا يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
قال البزار:"الضّعف بيّن علي أحاديث سليمان، ولا يتابعه عليها أحد، وهو ليس بالقوي".
وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (3/ 209 - 210) فقال:"ضعيف".
وأما ما روي عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"وفدُ الله ثلاثةٌ: الغازي، والحاجُّ، والمعتمر"، فهو موقوف على كعب الأحبار.
رواه النسائي (2625)، وابن خزيمة (2511)، وابن حبان (3692)، والحاكم (1/ 441) كلّهم من حديث مخرمة بن بكير، عن أبيه، قال: سمعت سهيل بن أبي صالح، قال: سمعت أبي يقول:
سمعت أبا هريرة يقول (فذكره).
ومن هذا الوجه رواه أيضًا ابن شاهين في"الترغيب" (321)، والبيهقيّ (5/ 262) وقال:"وكذا رُوي عن موسى بن عقبة، عن سهيل".
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
قلت: مخرمة بن بكير لم يسمع من أبيه، وإنما وجد كتابه فروى عنه، ولم يسمع منه؛ ولذا قال ابن حبان في"الثقات":"يحتج بحديثه من غير روايته عن أبيه؛ لأنه لم يسمع من أبيه".
وهذا تناقض! لأنه أخرج حديثه في صحيحه على القاعدة الأصلية بأن الوجادة من أنواع تحمل الحديث، فلعلّ ذهل عنه لما تكلّم في"الثقات" وهو متقدم في تأليفه على الصّحيح.
لكنه خولف في رفعه إلى أبي هريرة.
وقد أشار إلى هذا الاختلاف أبو حاتم فقال:"ورواه سليمان بن بلال، عن سهيل، عن أبيه، عن مرداس الجندعيّ، عن كعب قوله. وقال: ورواه عاصم عن كعب قوله". العلل (1/ 339 - 340).
وقال الدّارقطني في"العلل" (10/ 125) بعد أن سئل عن حديث أبي صالح، عن أبي هريرة.
قال:"يرويه سهيل بن أبي صالح، واختلف عنه. فرواه بكير بن عبد الله بن الأشجّ، عن سهيل، عن أبيه، عن أبي هريرة. تفرّد به عنه ابنه مخرمة بن بكير. وخالفه روح بن القاسم، وسليمان بن بلال، وعبد العزيز بن المختار، والدراوردي، وابن أبي حازم، ووهيب بن خالد، رووه عن سهيل، عن أبيه، عن مرداس الجندعيّ، عن كعب الأحبار، قوله. وهو الصحيح".
ثم أسند رواية روح بن القاسم، ووهيب بن خالد، وسليمان بن بلال كلّهم عن سهيل بن أبي صالح، عن أبيه، عن مرداس، عن كعب، قال:"وفد الله ثلاثة: الغازي في سبيل الله وافد على الله، والحاج إلى بيت الله وافد على الله، والمعتمر وافد على الله" انتهى.
وأخرجه أيضًا البيهقي في"شعب الإيمان" (3/ 474 - 475) من حديث وهيب بن خالد وقال:"وحديث خالد أصح".
وكذلك أعلّه أبو نعيم في"الحلية" (8/ 328) فقال:"غريب، تفرّد به مخرمة، عن أبيه، عن سهيل".
وللقائل أن يقول: لعلّ سهيلًا روى هذا الحديث من وجهين: مرفوعًا من حديث أبي هريرة، رواه عنه اثنان: بكير بن عبد الله بن الأشجّ وعنه ابنه مخرمة. وموسى بن عقبة عن سهيل، كما قال البيهقي ولم أقف على إسناده.
ورواه روح بن القاسم، وسليمان بن بلال، وعبد العزيز بن المختار وغيرهم -الذين ذكرهم الدارقطني- كلّهم عن سهيل، عن أبيه، عن مرداس، عن كعب من قوله.
فيجاب بأنّ الحكم للأكثر، وكلام أهل العلم يؤيد ذلك.
أو لأنّ مخرمة بن بكير كان يروي عن أبيه وجادة من كتاب ولم يسمع منه، فلعلّه انتقل بصره من هذا المتن إلى إسناد آخر، فحدّث به كذلك.
وأما أصحاب الصِّحاح ابن خزيمة، وابن حبان، والحاكم، فمشوا على الجادة بأن من رفع عنده زيادة علم، ولم ينظروا إلى اختلاف الرواة قلة وكثرة.
وكذلك لا يصح أيضًا ما رواه ابن ماجه (2892) عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الحجاج والعُمار وفد الله، إن دعوه أجابهم، وإن استغفروا غفر لهم".
رواه من طريق صالح بن عبد الله بن صالح مولى بني عامر، حدّثني يعقوب بن يحيى بن عبّاد بن عبد الله بن الزبير، عن أبي صالح السمان، عن أبي هريرة، فذكره.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا البيهقيّ (5/ 262) وقال:"صالح بن عبد الله منكر الحديث".
قلت: وهو كما قال، وقد قال مثله البخاريّ، وابن عدي، وفي التقريب:"مجهول".
ووهم الحافظ المنذريّ فعزاه في"الترغيب والترهيب" (1723) للنسائيّ أيضًا. والصّواب حديث النسائيّ هو كما مضى، وهذا اللفظ تفرّد به ابن ماجه؛ ولذا ذكره البوصيريّ في زوائد ابن ماجه.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عمر مرفوعًا:"الغازي في سبيل الله، والحاج والمعتمر وفد الله، دعاهم فأجابوه، وسألوه فأعطاهم".
رواه ابن ماجه (2893)، وصحّحه ابن حبان (4613) كلاهما من حديث عمران بن عيينة، حدّثنا عطاء بن السّائب، عن مجاهد، عن ابن عمر، فذكره.
وعمران بن عيينة أخو سفيان بن عيينة مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف، ولكن علته شيخه عطاء بن السائب فإنه مختلط، وهو روي عنه بعد الاختلاط، كما أنه خولف فيه.
وأمّا البوصيريّ فحسّن إسناده وقال:"عمران مختلف فيه. وقال: رواه البيهقي من هذا الوجه فوقفه ولم يرفعه".
ولم يشر إلى اختلاط عطاء واضطرابه في الرفع والوقف فتنبّه.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن جابر مرفوعًا:"الحجّاج والعمّار وفد الله، دعاهم فأجابوه، سألوه فأعطاهم".
رواه البزار -كشف الأستار (1153) - عن الوليد بن عمرو، ثنا أبو عاصم، ثنا محمد بن أبي حميد، عن محمد بن المنكدر، عن جابر، فذكره.
قال البزار:"لا نعلمه عن جابر إلا عن ابن المنكدر. ورواه عنه ابن أبي حميد وطلحة بن عمرو".
ومحمد بن أبي حميد هو إبراهيم الأنصاريّ الزرقي اتفق أهل العلم على أنه ضعيف منكر الحديث.
وأما طلحة بن عمرو فهو ابن عثمان الحضرمي المكي أضعف من محمد بن أبي حميد قال فيه الحافظ:"متروك".
فلا تنفع متابعته على أنه رواه عنه البيهقي في"شعب الإيمان" (3/ 476) موقوفًا على جابر وزاد فيه:"والغازي".
ثم رأيت أن محمد بن أبي حميد الأنصاريّ قد اضطرب في هذا الحديث فمرة رواه عن محمد ابن المنكدر، عن جابر كما مضى.
وأخرى عن محمد بن المنكدر، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو مرفوعًا أتم منه، ولفظه:"الحاج والعمار وفد الله، إن سألوا أُعطوا، وإن دعوا أجيبوا، وإن أنفقوا أُخلف عليهم، والذي نفس أبي القاسم بيده، ما أهلّ مهل، ولا كبّر مكبِّر على شرف من الأرض إلا أهلّ ما بين يديه، وكبر بتكبيره حتى ينقطع منه الصوت".
رواه ابن وهب، عن محمد بن أبي حميد.
قال ابن أبي حاتم: سمعت أبي يقول:"هذا حديث منكر""العلل" (1/ 298).
وثالثة: ما رواه بكر بن بكار، عن محمد بن أبي حميد الأنصاريّ، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكره بتمامه.
ومن هذا الوجه أخرجه البيهقي في"شعب الإيمان" (3/ 475) وقال: تابعه يونس بن بكير عن محمد بن أبي حميد في أوّل الخبر".
فلم يذكر فيه"محمد بن المنكدر" بينه وبين عمرو بن شعيب.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن أنس بن مالك مرفوعًا:"الحجاج والعمار وفد الله عز وجل، يعطيهم ما سألوا، ويستجيب لهم ما دعوا، ويخلف عليهم ما أنفقوا الدّرهم ألف ألف".
رواه البيهقيّ في"شعب الإيمان" (3/ 476) من طريق ثمامة البصريّ، نا ثابت البناني، عن أنس بن مالك، فذكره.
قال البيهقي:"ثمامة غير قوي".
قلت: وفي آخر الحديث نكارة. كما أن ثمامة البصريّ هذا لم أستطع تعيين من هو؟ .
মা'ইয থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে জিজ্ঞাসা করা হয়েছিল যে, কোন্ আমলটি সর্বশ্রেষ্ঠ? তিনি বললেন: “একমাত্র আল্লাহর প্রতি ঈমান, অতঃপর জিহাদ, অতঃপর হজ্জে মাবরুর (ত্রুটিমুক্ত বা মকবুল হজ্জ)। এটি (হজ্জ) অন্যান্য সকল আমলের চেয়ে এমনভাবে শ্রেষ্ঠ, যেমন সূর্যোদয় থেকে সূর্যাস্তের মধ্যবর্তী দূরত্ব।”
4610 - عن عائشة، قالت: استأذنت النبيّ صلى الله عليه وسلم في الجهاد فقال:"جهادكنّ الحجّ".
صحيح: رواه البخاريّ في الجهاد (2875) عن محمد بن كثير، أخبرنا سفيان، عن معاوية بن إسحاق، عن عائشة بنت طلحة، عن عائشة أمّ المؤمنين قالت (فذكرته).
وفي رواية:"نعم الجهاد الحجّ". رواه البخاريّ (2876) عن قبيصة عن سفيان، عن معاوية بهذا.
وعن حبيب بن أبي عمرة، عن عائشة بنت طلحة، عن عائشة أمّ المؤمنين، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم سأله نساؤه عن الجهاد، فقال (فذكره).
ورواه ابن خزيمة (3074) من طريق ابن فضيل، ثنا حبيب بن أبي عمرة بإسناده، وفيه: قلت: يا رسول الله، هل على النساء من جهاد؟ قال:"عليهنّ جهادٌ لا قتال فيه: الحجّ والعمرة".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট জিহাদের জন্য অনুমতি চাইলে তিনি বললেন: "তোমাদের জিহাদ হলো হজ।"
অন্য একটি বর্ণনায় আছে: "হজই হলো উত্তম জিহাদ।"
আরেকটি বর্ণনায় এসেছে, আমি (আয়েশা) বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! নারীদের জন্য কি কোনো জিহাদ আছে? তিনি বললেন: "তাদের জন্য এমন জিহাদ রয়েছে যেখানে কোনো যুদ্ধ নেই: তা হলো হজ এবং উমরাহ।"
4611 - عن أبي هريرة، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"جهاد الكبير والصّغير والضّعيف والمرأة الحجّ والعمرة".
صحيح: رواه النسائيّ (2626)، والبيهقيّ (4/ 350) كلاهما من حديث الليث بن سعد، عن خالد بن يزيد، عن سعيد بن أبي هلال، عن يزيد بن عبد الله بن الهاد، عن محمد بن إبراهيم، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره. وإسناده صحيح.
ورواه الإمام أحمد (9459) من وجه آخر عن حيوة، عن ابن الهاد، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث التيمي، عن أبي هريرة، فذكره.
وفيه انقطاع فإنّ محمد بن إبراهيم بن الحارث لم يسمع من أبي هريرة.
وقول الهيثميّ في"المجمع" (3/ 206):"رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح، ولكن فيه انقطاعًا؛ فإنّ محمد بن إبراهيم التيميّ لم يسمع من أبي هريرة؛ لأنه ولد سنة (47 هـ)، وتوفي أبو هريرة عام (58 هـ).
قال أبو حاتم:"لم يسمع من جابر" مع أنه توفي بعد السبعين.
والإسناد متصل من وجه آخر كما تراه.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "বৃদ্ধ, শিশু, দুর্বল এবং মহিলাদের জিহাদ হলো হজ ও উমরাহ।"
4612 - عن الحسين بن علي، قال: جاء رجلٌ إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: إنّي جبان، وإنّي ضعيف، قال:"هلُمَّ إلى جهادٍ لا شوكة فيه الحجّ".
صحيح: رواه عبد الرزاق (8809)، والطبرانيّ في"الكبير" (3/ 147) كلاهما من حديث معاوية بن إسحاق، عن عباية بن رفاعة، عن الحسين بن علي، فذكره. وإسناده صحيح.
قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 206):"رواه الطبراني في الكبير والأوسط، ورجاله ثقات".
قلت: وهو كما قال، إلّا أن عبد الرزاق رواه عن الثوريّ، عن معاوية بن إسحاق، فقال فيه:"علي بن حسين" بدلًا من"الحسين بن علي".
والظّاهر أنه تحريف فإنّ عباية بن رفاعة يروي عن الحسين بن علي.
وقد أكّد الطبراني في"الأوسط" (4287) أنه لا يروى عن الحسين إلّا بهذا الإسناد. وانظر"مجمع البحرين" (1648).
وأما ما رُوي عن أمّ سلمة مرفوعًا:"الحجّ جهادُ كلِّ ضعيف" ففيه انقطاع.
رواه ابن ماجه (2902)، والإمام أحمد (26520) كلاهما من حديث وكيع، عن القاسم بن الفضل، عن أبي جعفر محمد بن علي، عن أمّ سلمة، فذكرته.
وأبو جعفر محمد بن علي -وهو الباقر- لم يسمع من أمّ سلمة.
وفي الباب ما رُوي عن طلحة بن عبيد الله أنه سمع النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"الحجّ جهاد، والعمرة تطوّع" فهو ضعيف جدًّا.
رواه ابن ماجه (2989) وفيه عمر بن قيس المكي المعروف بسندل، متروك.
وفي الباب أيضًا عن عثمان بن سليمان، عن جدّته أمّ أبيه قالت: جاء رجل إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: إنّي أريد الجهاد في سبيل الله. قال:"ألا أدلُّك على جهاد لا شوكة فيه؟". قلت: بلى، قال:"حجّ البيت".
رواه الطبرانيّ في"الكبير" (24/ 314) من طريق الوليد بن أبي ثور، عن عبد الملك بن عمير، عن عثمان بن أبي سليمان، بإسناده، فذكره.
قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 206):"وفيه الوليد بن أبي ثور ضعّفه أبو زرعة وجماعة، وزكّاه شريك".
হুসাইন ইবনে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আগমন করল এবং বলল: আমি তো ভীতু এবং আমি দুর্বল। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এসো এমন জিহাদের দিকে, যাতে কোনো কাঁটা (বিপদ বা কঠোরতা) নেই—তা হলো হজ্ব।"
4613 - عن صفوان بن عبد الله بن صفوان -وكانت تحته ابنة أبي الدرداء- قَال: قَدِمْتُ الشَّامَ فَأَتَيْتُ أَبَا الدَّرْدَاءِ فِي مَنْزِلِهِ فَلَمْ أَجِدْهُ وَوَجَدْتُ أُمَّ الدَّرْدَاءِ، فَقَالَت: أَتُرِيدُ الْحَجَّ الْعَامَ؟ فَقُلْت: نَعَمْ قَالَتْ: فَادْعُ اللهَ لَنَا بِخَيْرٍ فَإِنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم كَانَ يَقُول:"دَعْوَةُ الْمَرْءِ الْمُسْلِم لأَخِيهِ بِظَهْرِ الْغَيْبِ مُسْتَجَابَةٌ، عِنْدَ رَأْسِهِ مَلَكٌ مُوَكَّلٌ كُلَّمَا دَعَا لأَخِيهِ بِخَيْرٍ، قَالَ الْمَلَكُ الْمَوَكَّلٌ بِهِ: آمِينَ، وَلَكَ بِمِثْلٍ".
قَالَ: فَخَرَجْتُ إِلَى السُّوقِ فَلَقِيتُ أَبَا الدَّرْدَاءِ فَقَالَ لِي مِثْلَ ذَلِكَ يَرْوِيهِ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه مسلم في الذكر والدّعاء (2733) عن إسحاق بن إبراهيم، عن عيسى بن يونس، ثنا عبد الملك بن أبي سليمان، عن أبي الزبير، عن صفوان، فذكره.
وأشهر ما روي في هذا الباب عن عمر بن الخطاب قال: استأذنت النبيّ صلى الله عليه وسلم في العمرة، فأذَن لي وقال:"لا تنساني يا أخي من دعائك".
وفي رواية:"أي أُخي، أشركنا في دعائكَ ولا تنسَنا".
رواه أبو داود باللفظ الأوّل (1498)، والترمذي (3562)، وابن ماجه (2894) باللّفظ الثاني، كلّهم من حديث عاصم بن عبيد الله، عن سالم، عن ابن عمر، عن عمر، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (195) من هذا الوجه وقال: وقال بعدُ في المدينة:"يا أخي، أشركنا في دعائك". فقال عمر: ما أحبّ أن لي بها ما طلعتْ عليه الشّمس لقوله:"يا أخي".
وقوله:"وقال بعد في المدينة" هو شعبة كما صرّح به أبو داود.
وإسناده ضعيف من أجل عاصم بن عبيد الله وهو: عاصم بن عبيد الله بن عاصم بن عمر بن الخطاب المدني ضعيف عند جمهور أهل العلم.
ولكنه لم يتفرّد به، فقد رواه الخطيب في"تاريخه" (11/ 396) من وجه آخر عن أسباط بن محمد، عن سفيان الثوريّ، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ولكنه نقل عن البرقاني أنه قال:"هذا لا يتابع عليه أبو عبيد، وإنما الصّحيح ما حدّث به عن الزّعفرانيّ، عن شبابة، عن شعبة، عن عاصم بن عبيد الله، عن سالم، عن ابن عمر، عن عمر".
وتعقّبه الخطيب فقال:"وقد رواه عن الزّعفرانيّ غير أبي عبيد، فوافق أبا عبيد على روايته".
وأطال الكلام فيه، والخلاصة أنّ هذا الحديث غير محفوظ من حديث أسباط بن محمد، عن سفيان الثوري عن عبيد الله، وإنما هو حديث الثوري وغيره عن عاصم بن عبيد الله.
فإنّ أسباط بن محمد وإن كان ثقة، وثَّقه ابن معين وابن سعد وغيرهما إلا أنه ضُعِّف في الثوريّ لكثرة مخالفته أصحابه المشهورين له منهم وكيع، ومؤمل بن إسماعيل، والقاسم الجرمي وغيرهم.
সফওয়ান ইবনে আব্দুল্লাহ ইবনে সফওয়ান—যার বিবাহ হয়েছিল আবূ দারদার কন্যার সাথে—তিনি বলেন: আমি শামে (সিরিয়ায়) আগমন করলাম। এরপর আবূ দারদার বাড়িতে তাঁর সাথে সাক্ষাৎ করতে গেলাম। কিন্তু তাঁকে পেলাম না, বরং উম্মু দারদার সাথে সাক্ষাৎ হলো। তিনি (উম্মু দারদা) বললেন: তুমি কি এ বছর হজ্ব করতে চাও? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তবে তুমি আল্লাহর কাছে আমাদের জন্য কল্যাণের দোয়া করো। কেননা নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলতেন: "কোনো মুসলিম ব্যক্তি তার ভাইয়ের জন্য তার অনুপস্থিতিতে যে দোয়া করে, তা কবুল হয়। তার মাথার কাছে একজন ফেরেশতা নিযুক্ত থাকেন। যখনই সে তার ভাইয়ের জন্য কল্যাণের দোয়া করে, তখন সেই নিযুক্ত ফেরেশতা বলেন: 'আমিন (কবুল করো), আর তোমার জন্যেও অনুরূপ (কল্যাণ) রয়েছে'।"
তিনি (সফওয়ান) বলেন: অতঃপর আমি বাজারের দিকে গেলাম এবং আবূ দারদার সাথে সাক্ষাৎ করলাম। তিনিও আমাকে অনুরূপ কথা বললেন, যা তিনি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণনা করেছেন।
সহীহ (বিশুদ্ধ): এটি মুসলিম সংকলন করেছেন 'আল-যিকর ওয়াদ্-দু'আ' (স্মরণ ও দোয়া) অধ্যায়ে (২৭৩৩), ইসহাক ইবনে ইবরাহীম থেকে, তিনি ঈসা ইবনে ইউনুস থেকে, তিনি আমাদেরকে হাদীস শুনিয়েছেন আব্দুল মালিক ইবনে আবী সুলাইমান থেকে, তিনি আবূ আয-যুবায়ের থেকে, তিনি সফওয়ান থেকে, এরপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।
আর এই অধ্যায়ে যা সবচেয়ে বেশি বিখ্যাতভাবে বর্ণিত হয়েছে তা হলো উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে। তিনি বলেন: আমি নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের কাছে উমরার অনুমতি চাইলাম। তিনি আমাকে অনুমতি দিলেন এবং বললেন: "হে আমার ভাই, তোমার দোয়ায় আমাকে ভুলে যেও না।"
অন্য এক বর্ণনায়: "হে ছোট ভাই, তোমার দোয়ায় আমাদেরকে শরিক করো এবং ভুলে যেও না।"
প্রথম শব্দমালায় এটি আবূ দাঊদ (১৪৯৮), এবং দ্বিতীয় শব্দমালায় তিরমিযী (৩৫৬২) ও ইবনে মাজাহ (২৮৯৪) বর্ণনা করেছেন। তারা সকলেই এই হাদীস বর্ণনা করেছেন আসিম ইবনে উবাইদুল্লাহ থেকে, তিনি সালিম থেকে, তিনি ইবনে উমার থেকে, তিনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, এরপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।
ইমাম আহমাদও (১৯৫) এই সূত্রেই তা বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদীনায় বললেন: "হে আমার ভাই, তোমার দোয়ায় আমাদের শরিক করো।" উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তখন বললেন: "তাঁর (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) 'হে আমার ভাই' বলার কারণে আমার কাছে এমন কিছু থাকা পছন্দ নয় যার উপর সূর্য উদিত হয়।"
আর তাঁর উক্তি "আর এরপর মদীনায় বললেন" এটি শু'বা থেকে বর্ণিত, যেমনটি আবূ দাঊদ স্পষ্টভাবে উল্লেখ করেছেন।
তবে এর সনদ আসিম ইবনে উবাইদুল্লাহর কারণে দুর্বল। তিনি হলেন: আসিম ইবনে উবাইদুল্লাহ ইবনে আসিম ইবনে উমার ইবনুল খাত্তাব আল-মাদানী, যিনি অধিকাংশ জ্ঞানীর নিকট দুর্বল।
কিন্তু তিনি (আসিম) এককভাবে এটি বর্ণনা করেননি। আল-খাতীব তাঁর 'তারীখ' (১১/৩৯৬)-এ অন্য একটি সূত্র ধরে এটি বর্ণনা করেছেন আসবাত ইবনে মুহাম্মাদ থেকে, তিনি সুফিয়ান সাওরী থেকে, তিনি উবাইদুল্লাহ থেকে, তিনি নাফি' থেকে, তিনি ইবনে উমার থেকে, এরপর তিনি তা উল্লেখ করেছেন।
তবে তিনি (আল-খাতীব) আল-বারকানী থেকে উদ্ধৃত করেছেন যে, তিনি বলেছেন: "আবূ উবাইদ এই বর্ণনার ক্ষেত্রে অনুসৃত নন। বরং বিশুদ্ধ হলো যা তিনি আয-যা'ফরানী থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি শাবাবাহ থেকে, তিনি শু'বা থেকে, তিনি আসিম ইবনে উবাইদুল্লাহ থেকে, তিনি সালিম থেকে, তিনি ইবনে উমার থেকে, তিনি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে।"
আর আল-খাতীব এর সমালোচনা করে বলেন: "আয-যা'ফরানী থেকে আবূ উবাইদ ছাড়া অন্যরাও এটি বর্ণনা করেছেন, সুতরাং তারা আবূ উবাইদের বর্ণনার সাথে একমত পোষণ করেছেন।"
তিনি (আল-খাতীব) এ বিষয়ে দীর্ঘ আলোচনা করেছেন। সারসংক্ষেপ হলো: এই হাদীসটি আসবাত ইবনে মুহাম্মাদ থেকে, সুফিয়ান সাওরী থেকে, উবাইদুল্লাহর সূত্রে সংরক্ষিত নয়। বরং এটি সাওরী এবং অন্যান্যদের হাদীস, যা আসিম ইবনে উবাইদুল্লাহর সূত্রে বর্ণিত।
কারণ আসবাত ইবনে মুহাম্মাদ যদিও নির্ভরযোগ্য (সিকাহ) ছিলেন—ইবনে মাঈন, ইবনে সা'দ এবং অন্যান্যরা তাঁকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন—তবুও সুফিয়ান সাওরী থেকে তাঁর বর্ণনার ক্ষেত্রে দুর্বল হিসেবে গণ্য করা হয়েছে, কারণ তিনি তাঁর পরিচিত শিষ্যদের (যেমন ওয়াকী', মু'আম্মাল ইবনে ইসমাঈল এবং আল-কাসিম আল-জারমী) তুলনায় বেশি বিরোধিতা করতেন।
4614 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللَّهم اغفر للحاجّ، ولمن استغفر له الحاج".
حسن: رواه البزار (9726)، وابن خزيمة (2516)، والحاكم (1/ 441)، والبيهقيّ (5/ 261) كلهم من حديث شريك، عن منصور، عن أبي حازم، عن أبي هريرة، فذكره. وقال الحاكم:"صحيح الإسناد على شرط مسلم".
وقال الحافظ ابن حجر في مختصر زوائد البزار (735):"إسناده حسن".
قلت: وهو كما قال؛ فإن فيه شريكا وهو ابن عبد الله النخعيّ القاضي، تغير حفظه منذ ولي القضاء، فلا يقبل منه تفرده في الحلال والحرام، وما كان في غير ذلك فيُنظر فيه، وهذا مما له أصل ثابت في عموم الشريعة.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হে আল্লাহ, হাজীকে ক্ষমা করে দিন, এবং যার জন্য হাজী ক্ষমা প্রার্থনা করে তাকেও।"
4615 - عن عبد الله بن مسعود، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تابعوا بين الحجّ والعمرة، فإنّهما ينفيان الفقر والذنوب كما ينفي الكير خبث الحديد والذّهب والفضة، وليس للحجّة المبرورة ثواب إلّا الجنّة".
حسن: رواه الترمذي (810)، والنسائي (2631) كلاهما من حديث أبي خالد الأحمر، عن عمرو بن قيس، عن عاصم، عن شقيق، عن عبد الله بن مسعود، فذكره.
وإسناده حسن من أجل عاصم وهو ابن أبي النجود فإنه حسن الحديث - ومن طريقه رواه الإمام أحمد (3669)، وابن خزيمة (2512)، وابن حبان (3693).
قال الترمذي:"حسن صحيح غريب من حديث ابن مسعود".
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা হজ্জ ও উমরাহ্ পর্যায়ক্রমে আদায় করো। কারণ, এই দুটি দারিদ্র্য ও গুনাহসমূহকে সেভাবে দূর করে দেয়, যেভাবে হাপর লোহা, সোনা ও রুপার ময়লা (খাদ) দূর করে দেয়। আর মাবরূর (গ্রহণযোগ্য) হজ্জের প্রতিদান জান্নাত ছাড়া আর কিছুই নয়।"
4616 - عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"تَابِعُوا بَيْنَ الْحَجِّ وَالْعُمْرَةِ فَإِنَّهُمَا يَنْفِيَانِ الْفَقْرَ وَالذُّنُوبَ كَمَا يَنْفِي الْكِيرُ خَبَثَ الْحَدِيدِ".
حسن: رواه النسائيّ (2630) عن أبي داود، حدّثنا أبو عتّاب، حدّثنا عزرة بن ثابت، عن عمرو بن دينار، قال: قال ابن عباس (فذكره).
وإسناده حسن من أجل أبي عتّاب واسمه سهل بن حماد فإنه حسن الحديث وهو من رجال مسلم. وللحديث طرق أخرى ضعيفة، والذي ذكرته أجودها وأقواها.
وفي الباب ما روي عن جابر مرفوعًا:"تابعوا بين الحج والعمرة فإنهما ينفيان الفقر والذنوب كما ينفي الكير خبث الحديد".
رواه البزار -كشف الأستار (1147) - عن إبراهيم بن سعيد الجوهريّ، ثنا بشر بن المنذر، ثنا محمد بن مسلم، عن عمرو بن دينار، عن جابر، فذكره. وفيه بشر بن المنذر تُكلّم فيه.
وقال العقيليّ في"الضّعفاء" (173):"في حديثه وهم"، ثم أخرج بهذا الإسناد حديثًا آخر وهو"الحج المبرور ليس له جزاء إلّا الجنة. قالوا: وما بره؟ قال: إطعام الطّعام وطيب الكلام". وقال: ولا يتابع عليه في حديث عمرو بن دينار. وقد روي بشر هذا غير حديث من هذا النحو، وهذا يروى عن جابر من حديث محمد بن المنكدر بإسناد لين، ورواه محمد بن ثابت البناني، وطلحة بن عمرو، عن محمد بن المنكدر عن جابر" انتهى.
وفيه ردّ على البزّار في قوله:"لا نعلمه عن جابر إلا بهذا الإسناد".
فالذي يظهر أن بشر بن المنذر وهم في هذا الحديث فجعل حديث ابن عباس لجابر، وخالف فيه أصحاب عمرو بن دينار.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عمر مرفوعًا:"تابعوا بين الحجّ والعمرة، فإنّهما تمحوان الخطايا كما ينفي الكير خبث الحديد".
رواه الطبرانيّ في"الكبير" (12/ 456) عن عبدان بن أحمد، ثنا محمد بن عبد الله بن عبيد بن عقيل، ثنا حجاج بن نصير، ثنا ورقاء، عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر، فذكره.
وفيه حجاج بن نصير -بضم النون- القيسيّ، ضعَّفه ابن معين والنسائيّ وابن سعد والدارقطنيّ وغيرهم.
وقال أبو داود:"تركوا حديثه". وقال ابن المديني:"ذهب حديثه".
وبه أعله الهيثميّ في"المجمع" (3/ 278).
ومع هذا كله ذكره ابن حبان في"الثقات" (8/ 202) وقال:"يخطئ ويهم" فيا تُرى ألم يقف ابن حبان على كلام المتقدمين الذين يعتمد قولهم في الجرح والتعديل أم أنه سبر حديثه فلم يتبين له
ضعفه، فلين القول فيه بأنه يخطئ ويهم؟ .
فإن كان كما قال ابن حبان فقد وجدتُ له متابعًا، وهو ما رواه الحارث في"مسنده" -بغية الباحث (368) - عن هوذة، ثنا داود بن عبد الرحمن، عن عمرو بن دينار، عن ابن لعبد الله بن عمر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال (فذكر نحوه).
وهوذة هو ابن خليفة الثقفيّ مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وداود بن عبد الرحمن هو العطار ثقة كما في"التقريب".
إلّا أنه مرسل، فإنّ ابن عبد الله بن عمر هو سالم لم يدرك النبيّ صلى الله عليه وسلم، فلم تنفع هذه المتابعة، وله طرق أخرى أضعف من هذا.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عامر بن ربيعة مرفوعًا:"تابعوا بين الحجّ والعمرة، فإنّ متابعة بينهما تنفي الفقر والذنوب كما ينفي الكير خبث الحديد".
رواه الإمام أحمد (15694) عن عبد الرزاق -وهو في مصنفه (8796) -، قال: أخبرنا ابن جريج، قال: عن عاصم بن عبيد الله، عن عبد الله بن عامر بن ربيعة، عن أبيه، فذكره.
وفيه عاصم بن عبيد الله بن عاصم بن عمر بن الخطاب العدويّ المدني ضعيف باتفاق أهل العلم. قال ابن حبان:"كان سيء الحفظ كثير الوهم".
قلت: وهو كما قال فإنه اضطرب في هذا الحديث اضطرابًا شديدًا، فتارة يروي عن عبد الله بن عامر، عن أبيه كما هنا. وتارة يقول: عبد الله بن عامر، عن أبيه، عن عمر. وأخرى عن عبد الله ابن عامر، عن عمر، ذكر ذلك الدارقطني في"العلل" (2/ 127 - 128) وأطال في بيان اضطرابه وقال:"لم يكن بالحافظ".
قلت: أما روايته عن عبد الله بن عامر بن ربيعة، عن عمر، فرواه أحمد (167)، وابن ماجه (2887) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، عن عامر بن عبيد الله، بإسناده، مثله.
وكذلك روايته عن عبد الله بن عامر بن ربيعة، عن أبيه، عن عمر بن الخطاب. فرواه أيضًا ابن ماجه (2887) عن أبي بكر بن أبي شيبة، قال: حدثنا محمد بن بشر، قال: حدثنا عبيد الله بن عمر، عن عاصم بن عبيد الله، فذكره.
قال الدارقطني:"الاضطراب من قبل عاصم بن عبيد الله، لا مِنْ قِبلِ مَنْ رواه عنه".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা হজ ও উমরাহর মাঝে ধারাবাহিকতা রক্ষা করো (বা, পরপর করো)। কারণ এ দুটি দারিদ্র্য ও পাপসমূহ দূর করে দেয়, যেভাবে হাপর লোহার ময়লা বা ভেজাল দূর করে দেয়।"
4617 - عن عبد الله بن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أراد الحجّ فلْيتعجَّل".
وزاد في رواية:"فإنّه قد يمرض المريض، وتضلّ الضّالة، وتعرض الحاجة".
حسن: رواه أبو داود (1732) عن مسدّد، حدّثنا أبو معاوية محمد بن خازم، عن الأعمش،
عن الحسن بن عمرو، عن مهران أبي صفوان، عن ابن عباس، فذكره.
ورواه أحمد (1973)، وصحّحه الحاكم (1/ 448) كلاهما من حديث الحسن بن عمرو الفقيميّ، بإسناده، مثله.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد ولم يخرجاه، وأبو صفوان هذا سماه غيره مهران مولي لقريش، ولا يعرف بالجرح".
وهذا وهم منه رحمه الله؛ فإن مهران أبا صفوان هذا"مجهول"، قال الذهبي في"الميزان":"لا يدري من هو؟". وقال أبو زرعة:"لا أعرفه إلا في هذا الحديث".
وأمّا ابن حبان فذكره في"ثقاته" (5/ 442) على قاعدته في توثيق من لم يعرف فيه الجرح؛ إلّا أنه لم ينفرد به، بل رُوي الحديث من وجه آخر.
رواه ابن ماجه (2883)، والإمام أحمد (1833، 1834)، والبيهقي (4/ 340) كلّهم من حديث إسماعيل أبي إسرائيل، عن فضيل بن عمرو، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، عن الفضل، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أراد الحجّ فليتعجّل، فإنه قد يمرض المريض، وتضلّ الضّالة، وتعرض الحاجة".
هكذا رواه أبو الوليد الطيالسيّ عن أبي إسرائيل الملائي من طريقه رواه البيهقيّ.
ورواه غيره عن أبي إسرائيل فقال: عن ابن عباس أو عن الفضل، أو عن أحدهما عن الآخر.
فإن كان من حديث الفضل فإنّ فيه انقطاعًا؛ فإن سعيد بن جبير لم يدركه، واليقين مقدم على الشّك بأنه من رواية ابن عباس، عن الفضل، أو عن ابن عباس نفسه.
ولكنه فيه إسماعيل وهو ابن خليفة العبسيّ أبو إسرائيل الملائيّ الكوفيّ، مختلف فيه فقال الإمام أحمد:"خالف الناس في أحاديث"، وقال الترمذي:"ليس بالقوي عند أصحاب الحديث"، وقال النسائيّ:"ليس بثقة". وتكلّم فيه الجوزجاني بكلام شديد لغلوه في تشيعه فقال:"مفتر زائغ".
ولكن قال أبو زرعة:"صدوق"، وقال أبو حاتم:"حسن الحديث"، وقال ابن سعد:"يقولون إنه صدوق"، وقال أبو داود:"لم يكن يكذب، ليس حديثه من حديث الشّيعة، وليس فيه نكارة".
فمثله إذا تُوبع يحسّن حديثه؛ ولذا اكتفى الحافظ بقوله:"صدوق سيئ الحفظ، نسب إلى الغلو في التشيع". فإنه إذا توبع ولم يكن ما يرويه يؤيد غلوه في التشيع، فالظاهر أنه لم يخطئ فيه، وله طرق أخرى تقويه. والخلاصة أن الحديث حسن.
ووجوب الحجّ على الفور قال به جمهور الفقهاء مالك وأحمد، وأبو حنيفة رحمهم الله جميعًا. وهو قول للشافعي، والأصح في المذهب التراخي.
انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (3/ 502 - 503).
وفي الباب ما رُوي عن علي، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من ملك زادًا وراحلة تبلّغه إلى بيت
الله ولم يحج، فلا عليه أن يموت يهوديًّا أو نصرانيًّا؛ وذلك أنّ الله يقول في كتابه: {وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا} [سورة آل عمران: 97].
رواه الترمذيّ (812) عن محمد بن يحيى القطعيّ البصريّ، حدّثنا مسلم بن إبراهيم، حدّثنا هلال ابن عبد الله مولى ربيعة بن عمرو بن مسلم الباهلي، حدّثنا أبو إسحاق الهمدانيّ، عن الحارث، عن علي، فذكره.
قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلا من هذا الوجه، وفي إسناده مقال، وهلال بن عبد الله مجهول، والحارث يضعّف في الحديث".
قلت: الحارث هذا كذّبه الشعبيّ وابن المديني.
وهلال، قال فيه البخاريّ:"منكر الحديث"، وقال ابن عدي:"هو معروف بهذا الحديث، وليس الحديث بمحفوظ". ورُوي نحوه عن أبي هريرة.
رواه ابن عدي في"الكامل" (4/ 1620) بإسناده عن عبد الرحمن بن القطامي، عن أبي المهزم، عن أبي هريرة، مرفوعًا:"من مات ولم يحج حجّة الإسلام في غير وجع حابس، أو حجّة ظاهرة، أو سلطان جائر، فليمت أي الميتتين إمّا يهوديًّا أو نصرانيًّا".
ونقل عن عمرو بن علي الفلاس أنه قال:"رجل لقيته أنا ويقال له عبد الرحمن بن القطامي يحدث عن أبي المهزم وكان كذابًا".
وقال الدارقطني:"عبد الرحمن بن القطامي، روي عن أبي المهزم، عن أبي هريرة نسخة موضوعة". ذكره ابن عبد الهادي في"تنقيح التحقيق" (3/ 405).
وفي الباب أحاديث أخرى إلّا أنّها كلّها ضعيفة. انظر:"التلخيص" (2/ 22).
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি হজ্জের ইচ্ছা করে, সে যেন দ্রুত করে।"
অন্য এক বর্ণনায় অতিরিক্ত এসেছে: "কেননা অসুস্থ ব্যক্তি অসুস্থ হয়ে যেতে পারে, বাহন হারিয়ে যেতে পারে, অথবা অন্য কোনো প্রয়োজন দেখা দিতে পারে।"
4618 - عن ابن عباس، قال: سَمِعْتُ النَّبِيّ صلى الله عليه وسلم يَخْطُبُ يَقُول:"لا يَخْلُوَنَّ رَجُلٌ بِامْرَأَةٍ إِلا ومَعَهَا ذُو مَحْرَم، وَلَا تُسَافِرُ الْمَرْأَةُ إِلا مَعَ ذِي مَحْرَمٍ". فَقَامَ رَجُلٌ فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، إِنَّ امْرَأَتِي خَرَجَتْ حَاجَّةً وَإِنِّي اكْتُتِبْتُ فِي غَزْوَةِ كَذَا وَكَذَا؟ قَال:"انْطَلِقْ فَحُجَّ مَعَ أهلك".
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1862)، ومسلم في الحج (1341) كلاهما من طريق عمرو بن دينار، عن أبي معبد مولى ابن عباس، قال: سمعت ابن عباس يقول (فذكره)، واللفظ لمسلم.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে খুতবা দিতে শুনেছি, তিনি বলছিলেন: “কোনো পুরুষ যেন কোনো নারীর সাথে নির্জনে অবস্থান না করে, যদি না তার সাথে তার মাহরাম থাকে। আর কোনো নারী যেন সফর না করে, যদি না তার সাথে মাহরাম থাকে।” তখন একজন লোক দাঁড়িয়ে বলল: “হে আল্লাহর রাসূল! আমার স্ত্রী হজ্জ করার উদ্দেশ্যে বেরিয়ে গেছে, আর আমাকে অমুক অমুক যুদ্ধে (অংশগ্রহণের জন্য) তালিকাভুক্ত করা হয়েছে।” তিনি বললেন: “যাও, তুমি তোমার স্ত্রীর সাথে হজ্জ করো।”
4619 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لَا يَحِلُّ لامْرَأَةٍ تُؤْمِنُ بِاللهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ تُسَافِرُ مَسِيرَةَ يَوْمٍ وَلَيْلَة، إِلا مَعَ ذِي مَحْرَمٍ مِنْهَا".
متفق عليه: رواه مالك في الاستئذان (37) عن سعيد بن أبي سعيد المقبريّ، عن أبي هريرة، به، فذكره. ورواه مسلم في الحج (1339: 421) من طريق مالك، به، مثله.
ورواه البخاريّ في تقصير الصلاة (1088)، ومسلم في الحج أيضًا (1339: 420) كلاهما من طريق ابن أبي ذئب، حدّثنا سعيد المقبريّ، به، نحوه.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আল্লাহ ও শেষ দিনের প্রতি বিশ্বাস রাখে এমন কোনো নারীর জন্য বৈধ নয় যে, সে যেন এক দিন ও এক রাতের দূরত্বের পথ তার মাহরাম আত্মীয় ছাড়া ভ্রমণ করে।
4620 - عن ابن عمر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تسافر المرأة ثلاثًا إلّا ومعها ذو محرم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في تقصير الصّلاة (1087)، ومسلم في الحجّ (1338) كلاهما من طريق يحيى القطان، عن عبيد الله (هو ابن عمر العمري)، أخبرني نافع، عن ابن عمر، به.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কোনো নারী যেন তিন দিন সফর না করে, যদি তার সাথে কোনো মাহরাম পুরুষ না থাকে।