আল-জামি` আল-কামিল
4621 - عن قزعة مولى زياد، قال: سمعت أبا سعيد -وَقَدْ غَزَا مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم ثِنْتَيْ عَشْرَةَ غَزْوَةً- قَالَ: أَرْبَعٌ سَمِعْتُهُنَّ مِنْ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، أَوْ قَالَ يُحَدِّثُهُنَّ عَنِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم، فَأَعْجَبْنَنِي وَآنَقْنَنِي:"أَنْ لَا تُسَافِرَ امْرَأَةٌ مَسِيرَةَ يَوْمَيْنِ لَيْسَ مَعَهَا زَوْجُهَا، أَوْ ذُو مَحْرَمٍ، وَلا صَوْمَ يَوْمَيْنِ الْفِطْرِ وَالأَضْحَى، وَلَا صَلاةَ بَعْدَ صَلاتَيْنِ بَعْدَ الْعَصْرِ حَتَّى تَغْرُبَ الشَّمْسُ وَبَعْدَ الصُّبْحِ حَتَّى تَطْلُعَ الشَّمْسُ، وَلا تُشَدُّ الرِّحَالُ إِلا إِلَى ثَلَاثَةِ مَسَاجِدَ مَسْجِدِ الْحَرَامِ وَمَسْجِدِي وَمَسْجِدِ الْأَقْصَى".
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1864)، ومسلم في الحج (827: 416) كلاهما من طريق شعبة، عن عبد الملك بن عمير، قال: سمعت قزعة مولي زياد، به، فذكره، واللفظ للبخاريّ. واختصره مسلم مقتصرًا على الحديث الأوّل.
ثم قال:"واقتصّ باقي الحديث" يعني الأحاديث الثلاثة الباقية، كما هي عنده من رواية جرير (هو ابن عبد الحميد الضبي)، عن عبد الملك بن عمير، به.
আবু সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (ক্বায'আ মাওলা যিয়াদকে) বলেন—যিনি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বারোটি যুদ্ধে অংশগ্রহণ করেছিলেন—চারটি বিষয় আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছ থেকে শুনেছি, অথবা তিনি বলেছেন যে তিনি এইগুলো নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) থেকে বর্ণনা করেন, যা আমাকে মুগ্ধ ও আনন্দিত করেছে: (১) কোনো মহিলা যেন দু'দিনের দূরত্বে ভ্রমণ না করে, যদি তার সাথে তার স্বামী অথবা কোনো মাহরাম পুরুষ না থাকে; (২) দুই দিন রোযা রাখা (নিষিদ্ধ): ঈদুল ফিতর ও ঈদুল আযহার দিন; (৩) দুই সালাতের পর কোনো সালাত নেই: আসরের সালাতের পর থেকে সূর্য ডুবা পর্যন্ত এবং ফজরের সালাতের পর থেকে সূর্য ওঠা পর্যন্ত; এবং (৪) (ইবাদতের উদ্দেশ্যে) সফর করা যাবে না শুধুমাত্র তিনটি মাসজিদ ছাড়া: মাসজিদুল হারাম, আমার এই মাসজিদ (মাসজিদে নববী) এবং মাসজিদুল আক্বসা।
4622 - عن أبي سعيد قال: سمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لا تسافر المرأة يومين إلا ومعها زوجها أو ذو محرم".
متفق عليه: رواه البخاري في فضل الصلاة في مسجد مكة والمدينة (1197)، ومسلم في الحج (827: 416) كلاهما من حديث شعبة وغيره، عن عبد الملك بن عمير، عن قزعة، عن أبي سعيد في سياق طويل. انظر: ما جاء في المساجد التي تُشد إليها الرحال.
আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: "কোনো নারী যেন দুই দিনের দূরত্বে সফর না করে, যদি না তার সাথে তার স্বামী অথবা কোনো মাহরাম পুরুষ থাকে।"
4623 - عن ابن عباس قال: جاء رجل إلى المدينة، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"أين نزلت؟" قال: على فلانة. قال:"أغلقت عليك بابها؟ لا تحجن امرأة إلا ومعها ذو محرم".
صحيح: رواه الدارقطني (2/ 222 - 223) وأبو عوانة - كما في الإتحاف (9026) كلاهما من حديث أبي حميد المصيصي، ثنا حجاج، ثنا ابن جريج، عن عمرو بن دينار، عن أبي معبد مولي ابن عباس، عن ابن عباس، فذكره.
وقرنه الدارقطني بعكرمة بالشك فقال:"أبو معبد أو عكرمة" وهو من أبي معبد بدون شك. والحجاج هو ابن محمد المصيصي الأعور مختلط.
ورواه البزار في مسنده: حدثنا عمرو بن علي، ثنا أبو عاصم، عن ابن جريج، أخبرني عمرو ابن دينار، سمع معبدا مولى ابن عباس، يحدث عن ابن عباس، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا تحج امرأة إلا ومعها محرم" فقال رجل: يا نبي الله! إني اكتتبت في غزوة كذا، وامرأتي حاجة. قال:"ارجع فحج معها" ذكره الزيلعي في"نصب الراية" (3/ 10).
وفيه متابعة للحجاج المصيصي الذي اختلط بآخره لما قدم بغداد، تابعه أبو عاصم الضحاك بن مخلد النبيل، وهو ثقة حافظ، وإسناده صحيح، وصحّحه أيضا ابن حجر في"الدراية" (2/ 4).
আবদুল্লাহ ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এক ব্যক্তি মদীনায় আসল। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি কোথায় উঠেছ?" সে বলল, অমুকের কাছে। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি কি তোমার জন্য তার দরজা বন্ধ করেছিলে? কোনো নারী যেন হজ্জ না করে, যতক্ষণ না তার সাথে কোনো মাহরাম থাকে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "কোনো নারী যেন মাহরাম ছাড়া হজ্জ না করে।" তখন এক ব্যক্তি বলল, "হে আল্লাহর নবী! আমি অমুক যুদ্ধে নাম লিখিয়েছি, আর আমার স্ত্রী হজ্জ করতে যাচ্ছে।" তিনি বললেন, "ফিরে যাও এবং তার সাথে হজ্জ করো।"
4624 - عن عبد الله بن عمرو، أن النبي صلى الله عليه وسلم استند إلى الكعبة، فوعظ الناس، وذَكَّرَهم، ثم قال:"لا يصلين أحد بعد العصر حتى الليل، ولا بعد الصبح حتى تطلع الشمس، ولا تسافر امرأة إلا مع ذي محرم ثلاثة أيام".
حسن: رواه عبد الرزاق في"المصنف" (10750) عن ابن جريج، قال: أخبرني عبد الكريم (الجزري)، أن عمرو بن شعيب أخبره، عن أبيه، عن عبد الله بن عمرو، فذكره. ومن هذا الطريق أخرجه أيضا أحمد (6712).
وإسناده حسن من أجل عمرو بن شعيب، فإنه حسن الحديث.
আব্দুল্লাহ ইবনে আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কা'বার দিকে হেলান দিয়েছিলেন। অতঃপর তিনি লোকদের উপদেশ দেন এবং তাদেরকে স্মরণ করিয়ে দেন। এরপর তিনি বললেন: "আসরের পরে রাত না আসা পর্যন্ত কেউ যেন সালাত (নামাজ) আদায় না করে, আর ফজরের পরে সূর্য উদিত না হওয়া পর্যন্ত (সালাত আদায় না করে), এবং কোনো নারী যেন তিন দিনের জন্য মাহরাম ব্যতীত ভ্রমণ না করে।"
4625 - عن عمر بن الخطاب أنه أَذِنَ لأزْوَاجِ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فِي آخِرِ حَجَّةٍ حَجَّهَا، فَبَعَثَ مَعَهُنَّ عُثْمَانَ بْنَ عَفَّانَ وَعَبْدَ الرَّحْمَنِ بْنَ عَوْفٍ.
صحيح: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1860) فقال: قال لي أحمد بن محمد (هو الأزرقي)، حدثنا إبراهيم، عن أبيه، عن جده أذن عمر رضي الله عنه لأزواج النبي فذكر الحديث. وقوله:"قال لي": يُحمل على الاتصال.
تنبيه: فإن قيل إن عثمان وعبد الرحمن رضي الله عنهما ليسا محرمين لأزواج النبي صلى الله عليه وسلم فكيف خرجْن إلى الحجّ معهما؟ .
الجواب: إنّ المؤمنين كلَّهم محارم لهنّ من حيث النكاح؛ لأن الله حرَّم ذلك إلى الأبد بقوله تعالى: {وَلَا أَنْ تَنْكِحُوا أَزْوَاجَهُ مِنْ بَعْدِهِ أَبَدًا} [الأحزاب: 53] ولأنهن أمهات المؤمنين لقوله تعالى: {النَّبِيُّ أَوْلَى بِالْمُؤْمِنِينَ مِنْ أَنْفُسِهِمْ وَأَزْوَاجُهُ أُمَّهَاتُهُمْ} [سورة الأحزاب: 6]، وذلك في تعظيمهن واحترامهن كالأمهات، لا في جواز الخلوة بهن وعدم تزويج بناتهن، فإذا أمن الفتنة، وهيأ لهن خليفة المسلمين أسباب السفر مثل المركب والمأكل والمشرب ورفقة النساء الثقات مع أزواجهن جاز لهن الخروج في سفر الحج، كما حصل لهن في زمن عمر، وكما أنهن استأذن أيضا عثمان في الحج، فقال: أنا أحج بكن، فحج بهن جميعا إلا زينب كانت ماتت، وإلا سودة فإنها لم تخرج من
بيتها بعد النبي صلى الله عليه وسلم.
فقه الحديث:
أحاديث الباب تفيد اشتراط المحرم في الحجّ.
قال أبو داود: قلت لأحمد: امرأة موسرة لم يكن لها محرم، هل يجب عليها الحجّ؟ قال: لا. وقال أيضًا: المحرم من السبيل. وبه قال أيضًا أصحاب الرأي.
وقال الشافعي:"ليس المحرم شرطًا في الحجّ بحال، ولها أن تخرج مع حرّة مسلمة ثقة". وكذلك قال مالك:"تخرج مع جماعة النساء".
وقال الأوزاعي:"تخرج مع قوم عدول".
والأوّل معه الأدلة القاطعة؛ ولذا قال ابن المنذر:"تركوا القول بظاهر الحديث، واشترط كلّ واحد منهم شرطًا لا حجّة معه وعليه".
والمصالح الشرعية تقتضي أيضًا وجود المحرم في الأسفار عمومًا، وفي سفر الحجّ خصوصًا لما تتعرّض له المرأة من المخاطر والمضايقات في الأسفار.
উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর (খিলাফতের) সর্বশেষ হজে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রীদেরকে (হজে যাওয়ার) অনুমতি দিয়েছিলেন, এবং তিনি তাঁদের সাথে উসমান ইবনে আফফান ও আবদুর রহমান ইবনে আউফকে প্রেরণ করেছিলেন।
4626 - عن ابن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في امرأة لها زوجها، ولها مال ولا يأذن زوجها في الحجّ، قال:"ليس لها أن تنطلق إلّا بإذن زوجها".
حسن: رواه الطبراني في"الأوسط" (4259)، و"الصغير" (582) -"مجمع البحرين" (1669) -، والدّارقطني (2441)، والبيهقي في"الكبري" (5/ 223)، وفي"المعرفة" (7/ 501) كلّهم من طريق حسان بن إبراهيم، حدّثنا إبراهيم الصائغ، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
قال الطبراني:"لم يرو عن نافع إلا إبراهيم الصّائغ، ولا عن إبراهيم إلا حسّان بن إبراهيم، تفرّد به محمد بن أبي يعقوب الكرمانيّ".
وقال البيهقي في"المعرفة":"تفرّد به حسان بن إبراهيم".
قلت: حسان بن إبراهيم هو الكرمانيّ أبو هشام العنزيّ من رجال الصحيح، وهو حسن الحديث، فلا يضر تفرده.
وأما مسألة استئذان المرأة زوجها في حجّ الفريضة ففيها تفصيل وهو: أنّ الأصل في الواجبات والفرائض المسارعة إلى أدائها، وليس للزوج حق في منع الزوجة عند وجوبها، بل الواجب عليه أن يتعاون معها في أداء الواجبات كالصّلاة والصوم والحج وغيرها. ولكن قد تقتضي المصلحة تأخير الحج لمدّة معينة لظروف خاصة؛ لأنّ الحجّ ليس كالصّلاة والصّوم لطول مدّته، فيستحب للمرأة أن تستأذن زوجها بخلاف الصّلاة والصوم، فإن منعها فلها أن تطيعه؛ لأنّ مخالفته قد تؤدي إلى النزاع والشقاق، والإسلام يأمر بإصلاح ذات البين.
وأما إن منعها منعًا مطلقًا فهذا لا يطاع؛ لأنه لا طاعة لمخلوق في معصية الخالق، بل لها أن
تطلب منه الطلاق، وهو يخشي بمنعه هذا أن يدخل فيمن يصدّون عن سبيل الله.
وقد ذهب جمهور أهل العلم إلى أن الرجل ليس له حق في منع امرأته من حجّة الإسلام إذا توفّرت فيها شروط الوجوب إلا من قال بجواز التراخي وهم الشافعية، فقالوا: للزّوج حقّ في منع زوجته من الحجّ المفروض والتطوّع؛ لأنّ حقه على زوجته على الفور، والحجّ على التراخي.
هذا إذا لم تُحرم، أما إذا أحرمت فلها حكم آخر وهو مبسوط في كتب الفقه. ومنها قول عطاء:"إنّ المرأة تهل بالحجّ فيمنعها زوجها فهي بمنزلة المحصر".
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সেই মহিলা সম্পর্কে আলোচনা করেছেন, যার স্বামী আছে এবং সম্পদও আছে, কিন্তু স্বামী তাকে হজের অনুমতি দেয় না। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তার জন্য স্বামীর অনুমতি ব্যতীত যাত্রা করা বৈধ নয়।"
4627 - عن ابن عباس، قال: كان أهلُ اليمن يحجّون ولا يتزوّدون، ويقولون: نحن المتوكِّلون، فإذا قدموا مكّة سألوا النّاس، فأنزل الله تعالى: {وَتَزَوَّدُوا فَإِنَّ خَيْرَ الزَّادِ التَّقْوَى}.
صحيح: رواه البخاريّ في الحجّ (1523) عن يحيى بن بشر، حدّثنا شبابة، عن ورْقاء، عن عمرو بن دينار، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
وأمّا ما ورد من تفسير قوله تعالى: {وَلِلَّهِ عَلَى النَّاسِ حِجُّ الْبَيْتِ مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا وَمَنْ كَفَرَ فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنِ الْعَالَمِينَ} [سورة آل عمران: 97] بأنّه الزاد والراحلة من حديث ابن عمر، وعائشة، وأنس وغيرهم فإنها كلها ضعيفة، والصحيح أنه من قول عمر، وابن عباس، ومرسل الحسن البصريّ. انظر"المنة الكبرى" (3/ 469).
قال البيهقيّ في"السنن الكبرى":"ويُروي فيه أحاديث لا يصح شيء منها، وحديث إبراهيم بن يزيد أشهرها، وقد أكّدناه بالذي رواه الحسن البصريّ وإن كان منقطعًا".
وحديث إبراهيم بن يزيد هو ما رواه الترمذي (2998)، وابن ماجه (2896)، والبيهقي (5/ 224 - 225) وغيرهم من طرق عن إبراهيم بن يزيد الخوزيّ، عن محمد بن عباد المخزومي، عن ابن عمر، سمع من النبيّ صلى الله عليه وسلم قال: {مَنِ اسْتَطَاعَ إِلَيْهِ سَبِيلًا} الزاد والراحلة".
قال الترمذيّ:"هذا حديث حسن، وإبراهيم بن يزيد الخوزي تكلم فيه بعض أهل العلم من قبل حفظه".
قلت: بل إسناده ضعيف جدًا؛ فإنّ إبراهيم بن يزيد الخوريّ ضعيف باتفاق أهل العلم، وفي التقريب"متروك الحديث".
وانظر للمزيد"المنة الكبرى" (3/ 468 - 473) فقد خرجت فيه هذه الأحاديث تخريجًا علميًّا بالتفصيل.
وأمّا وجود الزاد والراحلة وضروريات السّفر فهذا لا خلاف بين أهل العلم في إيجاب الحج، فمن لم يجد الزاد والراحلة وضروريات السفر فلا يجب عليه الحج باتفاق.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইয়েমেনের লোকেরা হজ্ব করতো কিন্তু কোনো পাথেয় (রসদ) সাথে নিতো না, আর তারা বলতো: আমরাই আল্লাহর উপর ভরসাকারী। অতঃপর যখন তারা মক্কায় পৌঁছাতো, তখন তারা মানুষের কাছে (সাহায্য) চাইতো। তখন আল্লাহ তাআলা নাযিল করলেন: "তোমরা পাথেয় সংগ্রহ করো; আর নিশ্চয় উত্তম পাথেয় হলো তাকওয়া (আল্লাহভীতি)।"
4628 - عن أبي لاس الخزاعيّ، قال: حَمَلَنَا رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم عَلَى إِبِلٍ مِنْ إِبِلِ الصَّدَقَةِ لِلْحَجِّ، فَقُلْنَا: يَا رَسُولَ اللهِ مَا نَرَى أَنْ تَحْمِلَنَا هَذِهِ؟ قَالَ:"مَا مِنْ بَعِيرٍ لَنَا إِلا فِي ذُرْوَتِهِ شَيْطَانٌ، فَاذْكُرُوا اسْمَ اللهِ عَلَيْهَا إِذَا رَكِبْتُمُوهَا كَمَا أمَرَكُمْ ثُمَّ امْتَهِنُوهَا لأَنْفُسِكُمْ فَإِنَّمَا يَحْمِلُ اللهُ عز وجل".
حسن: رواه الإمام أحمد (17938)، والطّبرانيّ في"الكبير" (23/ (837) كلاهما من حديث محمد بن عبيد، حدّثنا محمد بن إسحاق، عن محمد بن إبراهيم بن الحارث، عن عمر بن الحكم ابن ثوبان، عن أبي لاس الخزاعيّ، فذكره.
وإسناده حسن؛ لأنّ محمد بن إسحاق قد صرّح بالتحديث في الرواية الثانية عند الإمام أحمد (17939).
وصحّحه ابن خزيمة (2377)، والحاكم (1/ 444) وقال:"على شرط مسلم". ووافقه الذّهبي، وزادوا بعد قوله"إبل الصدقة":"ضعاف" للحجّ.
আবু লাস আল-খুযাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে হজ্জের জন্য সাদাকার (যাকাতের) উটের উপর সওয়ার করালেন। আমরা বললাম, ইয়া রাসূলুল্লাহ্! আমাদের মনে হয় না এই উটগুলো আমাদের বহন করতে পারবে? তিনি বললেন, আমাদের এমন কোনো উট নেই যার কুব্জের উপর শয়তান নেই। সুতরাং যখন তোমরা এগুলোর উপর আরোহণ করবে, তখন আল্লাহ্র নাম নাও, যেমন তোমাদের নির্দেশ দেওয়া হয়েছে। এরপর সেগুলোকে তোমাদের প্রয়োজনমতো ব্যবহার করো। কেননা আল্লাহ্ তা‘আলাই (আসলে) বহন করান।
4629 - عن ثُمامة بن عبد الله بن أنس، قال: حجّ أنس على رَحْلٍ ولم يكن شحيحًا، وحدَّث أنَّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم حَجَّ على رَحْلٍ وكانت زاملَتَه.
صحيح: رواه البخاريّ في كتاب الحج (1517) تعليقًا، فقال: قال محمد بن أبي بكر (هو المقدمي)، حدّثنا يزيد بن زريع، حدّثنا عزْرة بن ثابت، عن ثمامة، به، فذكره.
وهذا معلق كما قال المزي في"الأطراف" (1/ 160) ووصله البيهقيّ (4/ 334) من طريق يوسف بن يعقوب القاضي، ثنا محمد بن أبي بكر بإسناده، مثله. وأشار إلى تعليق البخاريّ.
وكذلك وصله ابن حبان (3754) عن الحسن بن سفيان، وأبو يعلى من كتابه، قالا: حدّثنا محمد بن أبي بكر المقدمي، بإسناده، ولكن وقع في رواية أبي ذر موصولًا. وهو الذي اعتمده الحافظ في شرحه، وأشار إلى غيره"وقال محمد بن أبي بكر".
قوله:"وكانت زاملته" أي الراحلة التي ركبها، والزّاملة البعير الذي يحمل عليه الطعام والمتاع
من الزمل وهو الحمل.
والمراد أنه لم تكن معه زاملة تحمل طعامه ومتاعه، بل كان ذلك محمولًا معه على راحلته، وكانت هي الراحلة والزاملة. انظر:"فتح الباري" (3/ 381).
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (আনাস) একটি হাওদার উপর সওয়ার হয়ে হজ্জ পালন করেন, যদিও তিনি (হজ্জের ব্যাপারে) কৃপণ ছিলেন না। আর তিনি বর্ণনা করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি হাওদার উপর সওয়ার হয়ে হজ্জ করেছিলেন এবং সেটিই ছিল তাঁর মালপত্র বহনের বাহন।
4630 - عن أنس بن مالك، قال: حجّ النبيُّ صلى الله عليه وسلم على رَحْل رثٍّ، وقطيفة تساوي أربعة دراهم أو لا تساوي. ثم قال:"اللَّهُمَّ! حجّة لا رياء فيها ولا سُمعة".
حسن: رواه ابن ماجه (2890)، والترمذي في"الشمائل" (334)، وابن أبي شيبة (4/ 106) كلّهم من حديث وكيع، عن الربيع بن صبيح، عن يزيد بن أبان، عن أنس بن مالك، فذكره.
وهذا إسناد ضعيف؛ فيه الربيع بن صبيح، قال فيه الحافظ في"التقريب":"صدوق سيء الحفظ، وكان عابدًا مجاهدًا".
وشيخه يزيد بن أبان الرّقاشيّ مختلف فيه، فضعّفه أكثر أهل العلم، وقال أبو داود:"رجل صالح"، وقال أبو حاتم:"كان واعظًا بكَاءً كثير الرواية". وقال ابن عدي:"له أحاديث صالحة". ولكن رُوي الحديث من وجه آخر.
رواه الأصبهاني في"الترغيب والترهيب" (1056) من طريق حماد بن سلمة، عن ثابت البنانيّ، عن أنس بن مالك، فذكر مثله.
وهذا إسناد قوي، ويقوي الإسناد الأوّل، وبهذين الإسنادين يرتقي الحديث إلى درجة الحسن.
وله شاهد، وهو ما رواه البيهقيّ (4/ 332 - 333) من حديث بشر بن قدامة الضّبابيّ، قال: أبصرتُ عيناي حِبِّي رسول الله صلى الله عليه وسلم واقفًا بعرفات مع الناس على ناقة له حمراء قصواء، تحته قطيفة بولانية وهو يقول:"اللَّهم اجعله حجّة غير رياء ولا هباء ولا سمعة" والناس يقولون: هذا رسول الله صلى الله عليه وسلم.
قال سعيد بن بشير:"فسألت عبد الله بن حكيم، فقلت: يا أبا حكيم! وما القصوى؟ قال: أحسبها المبتترة الأذنين؛ فإنّ النوق تبتر آذانها لتسمع". وفيه رجال مجهولون.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি পুরাতন পালানের উপর এবং এমন এক চাদরের উপর বসে হজ্জ করেছেন যার মূল্য চার দিরহাম অথবা তার সমমূল্যেরও নয়। অতঃপর তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! এমন হজ্জ, যাতে কোনো রিয়া (লোক দেখানো) এবং সুম’আ (খ্যাতি লাভের আকাঙ্ক্ষা) নেই।"
4631 - عن عائشة، أنها قالت: يا رسول الله! اعتمرتُم ولم أعتمر؟ فقال:"يا عبد الرحمن، اذهبْ بأختك فأعمِرْها من التنعيم" فأحقبها على ناقة، فاعتمرتْ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1518)، ومسلم في الحج (1211: 120) كلاهما من طريق القاسم بن محمد، عن عائشة، فذكرته، واللفظ للبخاري.
وحديث مسلم بسياق أطول، وفيه:"فأمر عبد الرحمن بن أبي بكر فأردفني على جمله".
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আপনারা উমরা করলেন, আর আমি উমরা করিনি?" তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "হে আবদুর রহমান, তোমার বোনকে নিয়ে যাও এবং তানঈম থেকে তাকে উমরা করাও।" অতঃপর তিনি (আবদুর রহমান) তাকে একটি উটনীর ওপর বসালেন এবং তিনি উমরা করলেন।
4632 - عن ابن عباس، أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مَرَّ بِوَادِي الأَزْرَقِ، فَقَالَ:"أَيُّ وَادٍ هَذَا؟"، فَقَالُوا: هَذَا وَادِي الأَزْرَقِ، قَالَ:"كَأَنِّي أَنْظُرُ إِلَى مُوسَى عليه السلام هَابِطًا مِن
الثَّنِيَّةِ وَلَهُ جُؤَارٌ إِلَى اللَّهِ بِالتَّلْبِيَةِ"، ثُمَّ أَتَى عَلَى ثَنِيَّةِ هَرْشَى، فَقَالَ:"أَيُّ ثَنِيَّةٍ هَذِهِ؟". قَالُوا: ثَنِيَّةُ هَرْشَى قَالَ:"كَأَنِّي أَنْظُرُ إِلَى يُونُسَ بْنِ مَتَّى عليه السلام عَلَى نَاقَةٍ حَمْرَاءَ جَعْدَةٍ، عَلَيْهِ جُبَّةٌ مِنْ صُوفٍ خِطَامُ نَاقَتِهِ خُلْبَةٌ، وَهُوَ يُلَبِّي".
صحيح: رواه مسلم في الإيمان (166) عن الإمام أحمد بن حنبل (وهو في المسند 1854) عن هُشيم، أخبرنا داود بن أبي هند، عن أبي العالية، عن ابن عباس، فذكره.
ورواه مسلم أيضًا من وجه آخر عن ابن عدي، عن داود وفيه:"كأني أنظر إلى موسى" (فذكر من لونه وشعره شيئًا لم يحفظه داود) وفيه:"واضعًا إصبعه في أذنيه له جؤار إلى الله بالتلبية مارًا بهذا الوادي".
وقوله:"جؤار" من جأر يجْأر جأرًا وجؤارًا: رفع صوته، يقال: جأر إلى الله: تضرَّع واستغاث، وفي كتاب الله: {إِذَا هُمْ يَجْأَرُونَ}.
وقوله:"خُلْبة" الليف كما جاء في"حلية الأولياء" (3/ 96): خطامها من ليف.
وأما ما رُوي عن جماعة من الصحابة، منهم: ابن عباس، وأبو هريرة، وأبو سعيد، وغيرهم من فضيلة الحج ماشيًا فكلَّها ضعيفة.
أما حديث ابن عباس، فرواه الطبراني في"الكبير" (12/ 105)، وفي"الأوسط" -"مجمع البحرين" (1655) -، والحاكم (1/ 460 - 461)، والبزار -"كشف الأستار" (1120) - كلهم من طريق عيسي بن سوادة، ثنا إسماعيل بن أبي خالد، عن زاذان، قال: مرض ابن عباس مرضة ثقل منها، فجمع إليه بنيه وأهله فقال: إني سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من حجّ من مكة ماشيًا حتى يرجع إليها، فله بكلّ خطوة سبعمائة حسنة من حسنات الحرم"، فقال رجل: وما حسنات الحرم يا رسول الله؟ قال:"فإن كلّ حسنة منها مائة ألف حسنة". ولم يذكر البزار القصة.
قال الحاكم:"صحيح الإسناد" ورده الذهبي فقال:"ليس بصحيح أخشى أن يكون كذبًا، وعيسى قال أبو حاتم:"منكر الحديث".
قلت: وعيسى بن سوادة هذا النخعيّ، كذّبه ابن معين.
وأما كلام أبي حاتم، فكما في"الجرح والتعديل" (6/ 277):"ضعيف، رُوي عن إسماعيل بن أبي خالد، عن زاذان، عن ابن عباس، حديثًا منكرًا" كأنه يعني هذا.
ورواه ابن خزيمة (2791) من هذا الوجه وقال:"إن صح الخبر، فإن في القلب من عيسي بن سوادة هذا".
قلت: لم يصح هذا الخبر، لقد سبقه كلام أهل العلم في عيسى بن سوادة هذا أورده المنذري في"الترغيب والترهيب" (1719) ونقل عن البخاري قوله:"هو منكر الحديث"، ومعنى قول البخاري: لا تحل الرواية عنه.
ورواه البزار (1121) من وجه آخر عن يحيى بن سليم، ثنا محمد بن مسلم، عن إسماعيل بن إبراهيم، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكر نحوه.
قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 309):"رواه البزار، والطّبراني في"الأوسط"، و"الكبير"، وله عند البزار إسنادان أحدهما: هذا فيه كذاب (يقصد به الإسناد السابق الذي فيه عيسى بن سوادة)، والآخر فيه إسماعيل بن إبراهيم، عن سعيد بن جبير، ولم أعرفه. وبقية رجاله ثقات".
قلت: وفيه علل أخرى منها: يحيى بن سليم وشيخه محمد بن مسلم ضعّفهما الإمام أحمد وغيره.
ومنها ما قاله ابن أبي حاتم: سألت أبي عن حديث رواه يحيى بن سليم الطائفي، عن محمد بن مسلم الطائفي، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكر الحديث.
قال أبي: محمد بن مسلم، عن سعيد بن جبير، مرسل. وهذا حديث يروي عن ابن سيسن رجل مجهول، وليس هذا حديث صحيح"."العلل" (826).
ومنها ما روي عن ابن عباس أيضًا مرفوعًا:"إنّ آدم عليه السلام أتي البيت ألف آتية لم يركب قطّ فيهن من الهند على رجليه".
ذكره المنذريّ في"الترغيب والترهيب" (1720) وعزاه لابن خزيمة (2792) ونقل عنه أنه قال:"في القلب من القاسم بن عبد الرحمن". قال الحافظ المنذري:"القاسم هذا واهٍ".
ومنها ما رُوي عن أبي هريرة يقول: قدم على النبيّ صلى الله عليه وسلم جماعة من مزينة، وجماعة من هذيل، وجماعة من جهينة فقالوا: يا رسول الله! إنا خرجنا إلى مكة مشاة، وقوم يخرجون ركبانًا. فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"للماشي أجر سبعين حجة، وللراكب أجر ثلاثين حجة".
رواه الطبرانيّ في"الأوسط" (7083 - ط. دار الحرمين) عن محمد بن عبد الله بن بكر، ثنا إسماعيل بن إبراهيم، ثنا محمد بن محصن العكاش، ثنا إبراهيم بن أبي عبلة، عن عبد الواحد بن قيس، قال: سمعت أبا هريرة، فذكره."المجمع البحرين" (1656).
قال الحافظ الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (3/ 209):"فيه محمد بن محصن العكاش وهو متروك".
ومحمد بن محصن هذا هو محمد بن إسحاق بن إبراهيم نسب إلى جده الأعلى العكاش الغنوي ترجمه ابن حبان في"المجروحين" (966) في ترجمة محمد بن محصن الأسديّ وقال:"شيخ يضع الحديث على الثقات لا يحل ذكره في الكتب إلا على سبيل القدح فيه".
ثم ترجم لمحمد بن إسحاق العكاش الغنويّ (977) وقال فيه:"كان ممن يضع الحديث على الثقات، لا يجوز الاحتجاج به، ولا الرواية عنه إلا على جهة التعجب عند أهل الصناعة". فكأنه ظن أنهما اثنان.
وروي عن أبي هريرة أيضًا مرفوعًا:"كأني أنظر إلى موسي بن عمران مُنهبطًا من ثنية هرشي ماشيًا".
رواه ابن حبان في"صحيحه" (3755)، وفيه علي بن زياد اللحجيّ، ذكره في"ثقاته" (8 /
470) ولم أجد من وثّقه غيره فهو"مقبول" إذا توبع.
ومنها ما رُوي عن أبي سعيد قال: حجَّ النبيُّ صلى الله عليه وسلم وأصحابه مشاة من المدينة إلى مكة، وقال:"اربطوا أوساطكم بأُزُركم" ومشي خِلْط الهرولة.
رواه ابن ماجه (3119) عن إسماعيل بن حفص الأُبليّ، قال: يحيى بن يمان، عن حمزة بن حبيب الزّيات، عن حمران بن أعين، عن أبي الطفيل، عن أبي سعيد، فذكره. ومن هذا الطريق رواه أيضًا ابن خزيمة (2535)، والحاكم (1/ 442) وقال:"صحيح".
قلت: فيه يحيى بن يمان العجلي الكوفي، قال فيه ابن المديني:"كان فلج فتغير حفظه"، وقال أبو داود:"يخطئ في الأحاديث ويقلبها". وقال ابن عدي:"عامة ما يرويه غير محفوظ".
ولعلّ هذا مما انقلب عليه؛ لأنّ المعروف أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم وأصحابه خرجوا من المدينة راكبين، وأدوا شعائر الحجّ راكبين.
وفيه أيضًا حمران بن أعين، جمهور أهل العلم على تضعيفه، وقال أبو داود:"كان رافضيًّا" فلا يبعد أن يكون هذا الحديث من وضعه.
وقد قال البيهقيّ (5/ 332):"إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حجَّ راكبًا، والخير في كلّ ما صنع رسول الله صلى الله عليه وسلم".
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ওয়া-দিয়েল আযরাক (আল-আযরাক উপত্যকা) অতিক্রম করছিলেন। তিনি বললেন: “এটা কোন উপত্যকা?” লোকেরা বললো: এটা ওয়া-দিয়েল আযরাক। তিনি বললেন: “আমার মনে হচ্ছে, আমি যেন মূসা (আলাইহিস সালাম)-কে দেখতে পাচ্ছি। তিনি উঁচু জায়গা (গিরিপথ) থেকে অবতরণ করছেন এবং উচ্চস্বরে তালবিয়ার মাধ্যমে আল্লাহর কাছে প্রার্থনা (আহ্বান) করছেন।” অতঃপর তিনি হারশা নামক উঁচু স্থানে (গিরিপথে) এলেন। তিনি বললেন: “এটা কোন উঁচু স্থান?” লোকেরা বললো: এটা হারশার উঁচু স্থান। তিনি বললেন: “আমার মনে হচ্ছে, আমি যেন ইউনূস ইবনু মাত্তা (আলাইহিস সালাম)-কে দেখতে পাচ্ছি। তিনি একটি লাল রঙ্গের, ঘন পশমযুক্ত উষ্ট্রীর উপর আরোহণ করে আছেন, তাঁর পরিধানে আছে পশমের একটি জুব্বা এবং তাঁর উষ্ট্রীর লাগাম খেজুরের ছোবড়ার। তিনি তালবিয়াহ পাঠ করছেন।”
4633 - عن عبد الله بن عباس، أَنَّ رَجُلا كَانَ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَوَقَصَتْهُ نَاقَتُهُ وَهُوَ مُحْرِمٌ فَمَاتَ، فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"اغْسِلُوهُ بِمَاءٍ وَسِدْرٍ وَكَفِّنُوهُ فِي ثَوْبَيْهِ، وَلا تَمَسُّوهُ بِطِيبٍ، وَلا تُخَمِّرُوا رَأْسَهُ فَإِنَّهُ يُبْعَثُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مُلَبِّيًا".
وفي رواية:"ولا تخَمِّروا رأسه ولا وجهه، فإنّه يبعث يوم القيامة ملبيًّا".
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1851)، ومسلم في الحج (1206: 99) كلاهما من طريق هشيم (هو ابن بشير الواسطيّ)، أخبرنا أبو بشر (هو جعفر بن إياس الشكري)، حدّثنا سعيد بن جبير، عن ابن عباس، ولفظهما سواء، غير أنّ مسلمًا قال:"مُلبِّدًا" بدل"مِلبيًّا".
والرّواية الثانية عند مسلم من طريق عمرو بن دينار، عن سعيد بن جبير.
وتابعه على قوله:"ولا وجهه" منصور، عن سعيد، فقال:"ولا تغطوا وجهه"، وكذلك أبو الزبير، عن سعيد فقال:"ولا تغطوا وجهه".
وفيه دليل على أن المحرم لا يغطي وجهه، كما لا يغطي رأسه، وسوف يأتي ذلك بالتفصيل.
وفي الباب عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من خرج حاجًّا فمات كُتب له أجر الحاج إلى يوم القيامة، ومن خرج معتمرًا فمات كُتب له أجر المعتمر إلى يوم القيامة، ومن خرج غازيًّا فمات كتب له أجر الغازي إلى يوم القيامة".
رواه الطبراني في"الأوسط" (5317) عن محمد بن السّري، حدثنا إبراهيم بن زياد سبلان، حدّثنا أبو معاوية، حدّثنا محمد بن إسحاق، عن جميل بن أبي ميمونة، عن عطاء بن زيد الليثيّ، عن أبي هريرة، فذكره.
قال الطبراني:"لم يرو هذا الحديث عن عطاء بن يزيد الليثي إلّا جميل بن أبي ميمونة، ولا عن جميل إلا محمد بن إسحاق، تفرّد به أبو معاوية".
قلت: وفي الإسناد جميل بن أبي ميمونة، ذكره البخاري في"التاريخ الكبير"، وابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل"، ولم يذكرا فيه جرحًا ولا تعديلًا.
وذكره ابن حبان في"الثقات" (6/ 146) وقال:"روى عنه محمد بن إسحاق"، وذكر في التهذيب من الرواة عنه أيضًا الليث بن سعد.
وفيه أيضا عنعنة محمد بن إسحاق وهو مدلس.
وأورده الهيثمي في"المجمع" (3/ 209) وقال:"فيه جميل بن أبي ميمونة، ذكره ابن أبي حاتم ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا، وذكره ابن حبان".
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عائشة مرفوعًا:"من مات في هذا الوجه بحج أو عمرة فمات فيه لم يعرض، ولم يحاسبْ، وقيل: ادخل الجنة".
رواه أبو يعلى (4608) عن الحسن بن حماد، حدّثنا حسين يعني الجعفيّ، عن ابن السماك، عن عائذ، عن عطاء، عن عائشة، فذكرته.
ورواه الدارقطني (2778)، والخطيب في"تاريخ بغداد" (542) من وجه آخر عن محمد بن الحسن الهمدانيّ، حدّثنا عائذ المكتب، بإسناده، مثله.
وعائذ هو ابن نسير قال العقيليّ في"الضعفاء" (1447):"عطاء منكر الحديث" ونقل عن يحيى قوله:"ليس به بأس، ولكن روى الحديث مناكير". وفي رواية عثمان بن سعيد قال: قلت ليحيى بن معين: عائذ بن نسير كيف حديثه؟ قال:"ضعيف".
وذكر هذا الحديث ابن عدي في"الكامل" (5/ 1992) من جملة مناكيره، ومحمد بن الحسن الهمداني أبو الحسن الكوفي ضعيف عند جماهير أهل العلم حتى قال فيه النسائي:"متروك"، وهو من رجال"التهذيب".
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলেন। এমতাবস্থায় তিনি ইহরাম অবস্থায় মারা যান যখন তাঁর উট তাঁকে ধাক্কা দেয়। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাকে কুল (পাতা) ও পানি দ্বারা গোসল দাও এবং তাকে তার (ইহরামের) দুই কাপড়ে কাফন দাও, আর তাকে সুগন্ধি লাগিও না এবং তার মাথা আবৃত করো না। কেননা সে কিয়ামতের দিন তালবিয়া পাঠরত অবস্থায় উত্থিত হবে।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: "তার মাথা বা মুখমণ্ডল আবৃত করো না, কেননা সে কিয়ামতের দিন তালবিয়া পাঠরত অবস্থায় উত্থিত হবে।"
4634 - عن عبد الله بن عمر، أنه قال حِينَ خَرَجَ إِلَى مَكَّةَ مُعْتَمِرًا فِي الْفِتْنَةِ: إِنْ صُدِدْتُ عَنِ الْبَيْتِ صَنَعْنَا كَمَا صَنَعْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَهَلَّ بِعُمْرَةٍ مِنْ أَجْلِ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَهَلَّ بِعُمْرَةٍ عَامَ الْحُدَيْبِيَةِ ثُمَّ، إِنَّ عَبْدَ اللهِ نَظَرَ فِي أَمْرِهِ فَقَالَ: مَا
أَمْرُهُمَا إِلا وَاحِدٌ، ثُمَّ الْتَفَتَ إِلَى أَصْحَابِهِ فَقَالَ: مَا أَمْرُهُمَا إِلا وَاحِدٌ، أُشْهِدُكُمْ أَنِّي قَدْ أَوْجَبْتُ الْحَجَّ مَعَ الْعُمْرَةِ. ثُمَّ نَفَذَ حَتَّى جَاءَ الْبَيْتَ فَطَافَ طَوَافًا وَاحِدًا. وَرَأَى ذَلِكَ مُجْزِيًا عَنْهُ وَأَهْدَى.
متفق عليه: رواه مالك في"الموطأ" (99) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، به.
ورواه البخاريّ في المحصر (1806)، ومسلم في الحج (1230) كلاهما من طريق مالك، به، نحوه.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি ফিতনার সময় উমরাহ করার উদ্দেশ্যে মক্কার দিকে যাচ্ছিলেন, তখন তিনি বললেন: যদি আমাকে বাইতুল্লাহ (কা'বা) থেকে বাধা দেওয়া হয়, তবে আমরা তাই করব যা আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে করেছিলাম। এরপর তিনি উমরার ইহরাম বাঁধলেন, কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুদায়বিয়ার বছরে উমরার ইহরাম বেঁধেছিলেন। অতঃপর আবদুল্লাহ (ইবনে উমর) নিজের বিষয়টি চিন্তা করলেন এবং বললেন: এদের (হজ ও উমরার) বিষয়টি তো একই। এরপর তিনি তাঁর সঙ্গীদের দিকে ফিরে বললেন: এদের (হজ ও উমরাহ)-এর বিষয়টি একই। আমি তোমাদের সাক্ষী রাখছি যে, আমি উমরার সাথে হজও ওয়াজিব করে নিলাম। অতঃপর তিনি (মক্কার দিকে) চলতে থাকলেন যতক্ষণ না বাইতুল্লাহ-এর কাছে পৌঁছলেন এবং একটি মাত্র তাওয়াফ করলেন। তিনি মনে করলেন যে এটিই তার জন্য যথেষ্ট, এবং তিনি কুরবানি করলেন।
4635 - عن نافع، أنّ عبيد الله بن عبد الله، وسالم بن عبد الله أخبراه أَنَّهُمَا كَلَّمَا عَبْدَ اللَّهِ بْنَ عُمَرَ رضي الله عنهما لَيَالِيَ نَزَلَ الْجَيْشُ بِابْنِ الزُّبَيْرِ، فَقَالَا: لَا يَضُرُّكَ أَنْ لا تَحُجَّ الْعَامَ، وَإِنَّا نَخَافُ أَنْ يُحَالَ بَيْنَكَ وَبَيْنَ الْبَيْتِ! فَقَالَ: خَرَجْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَحَالَ كُفَّارُ قُرَيْشٍ دُونَ الْبَيْت، فَنَحَرَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم هَدْيَهُ وَحَلَقَ رَأْسَهُ، وَأُشْهِدُكُمْ أَنِّي قَدْ أَوْجَبْتُ الْعُمْرَةَ إِنْ شَاءَ اللَّهُ أَنْطَلِقُ فَإِنْ خُلِّيَ بَيْنِي وَبَيْنَ الْبَيْتِ طُفْتُ وَإِنْ حِيلَ بَيْنِي وَبَيْنَهُ فَعَلْتُ كَمَا فَعَلَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم وَأَنَا مَعَهُ فَأَهَلَّ بِالْعُمْرَةِ مِنْ ذِي الْحُلَيْفَةِ ثُمَّ سَارَ سَاعَةً ثُمَّ قَالَ: إِنَّمَا شَأْنُهُمَا وَاحِدٌ أُشْهِدُكُمْ أَنِّي قَدْ أَوْجَبْتُ حَجَّةً مَعَ عُمْرَتِي فَلَمْ يَحِلَّ مِنْهُمَا حَتَّى حَلَّ يَوْمَ النَّحْرِ وَأَهْدَى. وَكَانَ يَقُول: لا يَحِلُّ حَتَّى يَطُوفَ طَوَافًا وَاحِدًا يَوْمَ يَدْخُلُ مَكَّةَ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المحصر (1807) من طريق جويرية بن أسماء، عن نافع، به، فذكره.
ورواه مسلم في الحج (1230) من طريق عبيد الله، عن نافع، به، نحوه.
وليس فيه قوله:"فنحر النبيّ صلى الله عليه وسلم هديه وحلق رأسه".
আব্দুল্লাহ ইবনে উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন সৈন্যরা ইব্নুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিরুদ্ধে অবস্থান গ্রহণ করেছিল, তখন উবাইদুল্লাহ ইব্ন আব্দুল্লাহ এবং সালিম ইব্ন আব্দুল্লাহ তাঁকে বলেছিলেন: এই বছর আপনি হজ্জ না করলে আপনার কোনো ক্ষতি হবে না। আর আমরা ভয় পাচ্ছি যে, আপনার ও বাইতুল্লাহর মাঝে বাধা সৃষ্টি করা হবে! তখন তিনি বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হয়েছিলাম, তখন কুরাইশ কাফিররা বাইতুল্লাহর সামনে বাধা সৃষ্টি করেছিল। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কুরবানীর পশু যবেহ করেছিলেন এবং মাথা মুণ্ডন করেছিলেন। আমি তোমাদের সাক্ষী রাখছি যে, আমি উমরার ইহরাম বেঁধেছি (ওয়াজিব করেছি), ইনশা আল্লাহ। আমি চলব, যদি আমার ও বাইতুল্লাহর মাঝে বাধা না থাকে, তবে আমি তাওয়াফ করব, আর যদি আমার ও বাইতুল্লাহর মাঝে বাধা দেওয়া হয়, তাহলে আমি ঠিক সেটাই করব যা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) করেছিলেন যখন আমি তাঁর সাথে ছিলাম। অতঃপর তিনি যুল-হুলাইফা থেকে উমরার জন্য ইহরাম বাঁধলেন। এরপর তিনি কিছু সময় পথ চললেন, তারপর বললেন: এই দু’টির (হজ ও উমরা) বিধান একই। আমি তোমাদের সাক্ষী রাখছি যে, আমি আমার উমরার সাথে হজ্জের ইহরামও বেঁধেছি। এরপর কুরবানীর দিন হালাল না হওয়া পর্যন্ত তিনি এ দু’টি থেকে হালাল হননি এবং কুরবানীও করেছিলেন। আর তিনি বলতেন: মক্কায় প্রবেশের দিন এক তাওয়াফ না করা পর্যন্ত হালাল হওয়া যায় না।
4636 - عن عبد الله بن عمر، قال:"أَلَيْسَ حَسْبُكُمْ سُنَّةَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِنْ حُبِسَ أَحَدُكُمْ عَنِ الْحَجِّ طَافَ بِالْبَيْتِ وَبِالصَّفَا وَالْمَرْوَةِ ثُمَّ حَلَّ مِنْ كُلِّ شَيْءٍ حَتَّى يَحُجَّ عَامًا قَابِلًا، فَيُهْدِي أَوْ يَصُومُ إِنْ لَمْ يَجِدْ هَدْيًا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في المحصر (1810) من طريق الزهريّ، قال: أخبرني سالم، قال: كان ابن عمر رضي الله عنهما يقول (فذكره).
ورواه مسلم في الحج (1230) من وجوه أخرى عن ابن عمر، وليس عنده بهذا اللّفظ.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমাদের জন্য কি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাত যথেষ্ট নয়? তোমাদের কেউ যদি হজ্জ থেকে বাধাগ্রস্ত হয় (বা আটকে যায়), তবে সে যেন বায়তুল্লাহ ও সাফা-মারওয়ায় তাওয়াফ করে। অতঃপর সে সবকিছুর (ইহরামের বাঁধন) থেকে হালাল হয়ে যায়, যতক্ষণ না সে পরবর্তী বছর হজ্জ করে। তখন সে কুরবানি দেবে, অথবা কুরবানি করার সামর্থ্য না থাকলে সাওম পালন করবে।
4637 - عن ميمون بن مهران قال: خرجت معتمرا عام حاصر أهلُ الشام ابنَ الزبير بمكة، وبعث معي رجالٌ من قومي بهدي، فلمّا انتهينا إلى أهل الشام منعونا أن ندخل الحرم، فنحرت الهدي مكاني، ثم أحللت ثم رجعت، فلما كان من العام المقبل خرجت لأقضى عمرتي فأتيت ابن عباس فسألته فقال: أبدل الهدي فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر أصحابه أن يبدلوا الهدي الذي نحروا عام الحديبية في عمرة القضاء.
حسن: رواه أبو داود (1864) عن النفيلي، ثنا محمد بن مسلمة، عن محمد بن إسحاق، عن عمرو بن ميمون قال: سمعت أبا حاضر الحميري، يحدث أبي: ميمون بن مهران، فذكره.
وصحّحه الحاكم (1/ 485 - 486) من هذا الوجه وقال:"وأبو حاضر شيخ من أهل اليمن مقبول صدوق".
قلت: وأبو حاضر اسمه عثمان بن حاضر وثّقه أبو زرعة الرازي، وقال الحافظ في التقريب:"صدوق" فالإسناد حسن من أجل ابن إسحاق وإن كان مدلسا فقد صرح بالتحديث في الرواية الآتية:
فقد رواه البيهقي كما في البداية والنهاية (4/ 230) من طريق يونس بن بكير، عن ابن إسحاق قال: حدثني عمرو بن ميمون قال: كان أبي يسأل كثيرا أَهل كان رسول الله صلى الله عليه وسلم أبدل هديه الذي نحر حين صده المشركون عن البيت؟ ولا يجد في ذلك شيئا، حتى سمعته يسأل أبا حاضر الحميري عن ذلك، فقال له: على الخبير سقطت، حججت عام ابن الزبير في الحصر الأول فأهديت هديا، فحالوا بيننا وبين البيت، فنحرت في الحرم ورجعت إلى اليمن، وقلت: لي برسول الله صلى الله عليه وسلم أسوة، فلما كان العام المقبل حججت فلقيت ابن عباس فسألته عما نحرت علي بدله أم لا؟ قال: نعم فأبدل، فإن رسول الله صلى الله عليه وسلم وآله وأصحابه قد أبدلوا الهدي الذي نحروا عام صدهم المشركون فأبدلوا ذلك في عمرة القضاء، فعزت الإبل عليهم فرخص لهم رسول الله صلى الله عليه وسلم وآله في البقر.
قلت: ولم ينفرد به ابن إسحاق بل توبع عليه:
فرواه الحاكم (1/ 485) من طريق يزيد بن هارون أخبرنا عمرو بن ميمون بن مهران، ثنا أبو حاضر عثمان بن حاضر قال: سمعت ابن عباس رضي الله عنهما يقول: إن أهل الحديبية أمروا بإبدال الهدي في العام الذي دخلوا فيه مكة، فأبدلوا وعزت الإبل فرخص لهم فيمن لا يجد بدنة في اشتراء بقرة.
قال الحاكم عقبه: رواه محمد بن إسحاق بن يسار عن عمرو بن ميمون مفسرا ملخصا.
وتابعه أيضا أبو بكر بن عياش في أصل الحديث فيما رواه ابن ماجه (3134) من طريقه عن عمرو بن ميمون، عن أبي حاضر الأزدي، عن ابن عباس قال: قلّت الإبل على عهد رسول الله صلى الله عليه وسلم -
فأمرهم أن ينحروا البقر.
وقال البوصيري في مصباح الزجاجة (3/ 52):"إسناده صحيح رجاله ثقات".
رُوي أن عمر بن الخطاب أهدي نجيبًا، فأعطى بها ثلاثمائة دينار، فأتى النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: يا رسول الله، إني أهديت نجيبًا، فأُعطيت بها ثلاثمائة دينار، أفأبيعها وأشتري بثمنها بُدنا؟ قال:"لا، انحرها إياها".
رواه أبو داود (1756) وعنه البيهقي (5/ 241 - 242) عن النفيلي، حدّثنا محمد بن سلمة، عن أبي عبد الرحيم، عن جهم بن الجارود، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه، قال: أهدى عمر بن الخطاب، فذكره.
قال أبو داود:"أبو عبد الرحيم خالد بن أبي يزيد خال محمد بن سلمة روى عنه حجاج بن محمد".
ورواه ابن خزيمة في صحيحه (2911) من طريق محمد بن سلمة، بإسناده مثله.
وإسناده ضعيف فإن جهم بن الجارود مجهول كما قال الذهبي في"الميزان"، وقال ابن القطان:"لا يعرف" ولم يرو عنه غير أبي عبد الرحيم.
وفيه علة أخرى وهي أن جهم بن الجارود لا يعرف له سماع من سالم، كما ذكره البخاريّ في"التاريخ الكبير".
قال أبو داود معلقًا على الحديث:"هذا لأنه كان أشعرها".
وأخذ الشافعيّ وبعض الحنفية بظاهر هذا الحديث بأنه لا يجوز إبدال الهدي مطلقًا. وقال غيرهم بجواز الإبدال بما هو أفضل؛ وأمّا منع النبي صلى الله عليه وسلم عمر من إبدال هديه لأنه كان أفضل لأنّ هذه النَّجيبة كانت نفيسة ولهذا بذل فيها ثمنٌ كثيرٌ فكان إهداؤُها إلى الله أفضَل من أن يهدي بثمنها عدد دونها، وهذا الذي رجّحه شيخ الإسلام ابن تيمية في مجموع الفتاوي.
মায়মূন ইবনে মিহরান থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি উমরার উদ্দেশ্যে বের হলাম সেই বছর, যখন শামের লোকেরা মক্কায় ইবনে যুবায়েরকে অবরোধ করেছিল। আমার গোত্রের লোকেরা আমার সাথে কুরবানীর পশু (হাদি) পাঠিয়েছিল। যখন আমরা শামের লোকেদের কাছে পৌঁছলাম, তারা আমাদের হারামে প্রবেশ করতে বাধা দিল। তখন আমি আমার স্থানেই কুরবানীর পশুগুলো যবেহ করলাম, অতঃপর হালাল হলাম এবং ফিরে আসলাম। যখন পরের বছর আসল, আমি আমার কাযা উমরাহ আদায়ের জন্য বের হলাম। অতঃপর আমি ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে এসে তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: কুরবানীর পশুর বদল দাও। কারণ, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদেরকে নির্দেশ দিয়েছিলেন, হুদায়বিয়ার বছরে তাঁরা যে কুরবানীর পশু যবেহ করেছিলেন, কাযা উমরাহর সময় তার বদল দিতে।
4638 - عن عبد الله بن عباس، قال: قَدْ أُحُصِرَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم فَحَلَقَ رَأْسَهُ وَجَامَعَ نِسَاءَهُ وَنَحَرَ هَدْيَهُ حَتَّى اعْتَمَرَ عَامًا قَابِلًا.
صحيح: رواه البخاريّ في المحصر (1809) عن محمد، حدّثنا يحيى بن صالح، حدّثنا معاوية ابن سلّام، حدّثنا يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، قال: قال ابن عباس، فذكره.
واختلف في شيخ البخاريّ، فقيل: هو محمد بن يحيى الذهلي، وقيل: هو محمد بن مسلم بن وارة، وقيل: محمد بن إدريس الرازيّ، ومال إليه الحافظ وقال:"ويحتمل أن يكون هو محمد بن إسحاق الصغانيّ، فقد وجدت الحديث من روايته عن يحيى بن صالح". فتح الباري (4/ 7).
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে (উমরাহ পালনে) বাধা দেওয়া হয়েছিল। অতঃপর তিনি তাঁর মাথা মুণ্ডন করলেন, তাঁর স্ত্রীদের সাথে সহবাস করলেন এবং তাঁর কুরবানির পশু যবেহ করলেন, যতক্ষণ না তিনি পরবর্তী বছর উমরাহ সম্পন্ন করলেন।
4639 - عن الحجاج بن عمرو الأنصاريّ، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"مَنْ كُسِرَ أَوْ
عَرِجَ فَقَدْ حَلَّ وَعَلَيْهِ الْحَجُّ مِنْ قَابِلٍ".
صحيح: رواه أبو داود (1863)، والترمذيّ (940)، والنسائي (2861)، وابن ماجه (3077) كلّهم من طريق يحيى بن سعيد، عن الحجاج الصواف، قال: حدّثنا يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن الحجاج بن عمرو، فذكره.
قال: فحدثتُ به ابن عباس وأبا هريرة فقالا: صدق.
وفي رواية قال عكرمة: سألت ابن عباس، وأبا هريرة؟ قالا: صدق.
وإسناده صحيح.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا أحمد (15731) وصحّحه الحاكم (1/ 470، 482 - 483) إلّا أنه رواه من وجه آخر عن الحجاج الصواف وقال:"صحيح على شرط البخاريّ".
وزاد في الموضع الثاني: وقيل: عن عكرمة، عن عبد الله بن رافع، عن الحجاج بن عمرو.
قلت: وإليه أشار الترمذيّ أيضًا بعد أن قال:"هذا حديث حسن صحيح. هكذا رواه غير واحد عن الحجاج الصواف نحو هذا الحديث. وروي معمر ومعاوية بن سلام هذا الحديث عن يحيى بن أبي كثير، عن عكرمة، عن عبد الله بن رافع، عن الحجاج بن عمرو، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وحجاج الصواف لم يذكر في حديثه عبد الله بن رافع. وحجاج ثقة حافظ عند أهل الحديث.
وسمعت محمدًا يقول: رواية معمر ومعاوية بن سلام أصح".
ثم أخرجه هو وأبو داود وابن ماجه كلهم من طريق عبد الرزاق، عن معمر بإسناده كما قال البخاري وغيره.
إلّا أنّ هذا لا يعل الحديث بالإسناد الأول فإنه متصل أيضًا، لا سيما وقد صرّح بالسماع من الحجاج بن عمرو، وقد نصّ الترمذيّ نفسه على تصحيحه، وصحّحه الحاكم على شرط البخاريّ.
فلعلّ عكرمة سمع هذا الحديث من وجهين، وقد صرّح عند الترمذيّ سماعه من الحجاج بن عمرو الأنصاريّ، وكذلك قال أيضًا البيهقيّ في السنن الكبري (5/ 220) ونقل عن علي بن المديني أنه قال:"الحجاج الصواف عن يحيى بن أبي كثير أثبت".
وفي الحديث دليل على أن المحصر لا يكون من العدو فقط كما قال الشافعي وأهل المدينة، بل يكون أيضًا من المرض وغيره كما قال أبو حنيفة وأهل الكوفة، وهو مذهب ابن مسعود. راجع"المنة الكبرى" (4/ 375 - 376).
وأمّا القضاء فهو تابع للفرض والنفل، فإن كان الحج أو العمرة فرضًا فعليه القضاء، وإن كان نفلًا فلا قضاء عليه. وعليه الجمهور.
وقال أبو حنيفة: عليه القضاء سواء كان فرضًا أو تطوّعًا.
وقد فصلتُ القول في الإحصار وأسبابه وأحكامه وأدلة كل واحد من أهل العلم والراجح في
الموضوع في"المنة الكبرى" فراجعه إن شئت.
হাজ্জাজ ইবনে আমর আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি (ইহরাম অবস্থায়) জখম হয় অথবা পঙ্গু হয়ে যায়, সে হালাল হয়ে গেল (ইহরাম থেকে মুক্ত হলো), তবে তার উপর আগামী বছর হজ্জ করা কর্তব্য।"
4640 - عن ابن عباس، أَنَّ امْرَأَةً مِنْ جُهَيْنَةَ جَاءَتْ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقالَت: إِنَّ أُمِّي نَذَرَتْ أَنْ تَحُجَّ فَلَمْ تَحُجَّ حَتَّى مَاتَتْ أَفَأَحُجُّ عَنْهَا؟ قَال:"نَعَمْ حُجِّي عَنْهَا، أَرَأَيْتِ لَوْ كَانَ عَلَى أُمِّكِ دَيْنٌ أَكُنْتِ قَاضِيته؟ اقْضُوا الله فاللهَ أَحَقُّ بِالْوَفَاءِ".
صحيح: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1852) عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا أبو عوانة (وهو الوضاح اليشكري)، عن أبي بِشْر (هو جعفر بن إياس)، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، به، فذكره.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, জুহায়না গোত্রের এক মহিলা নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এলেন। অতঃপর তিনি বললেন: আমার মা হজ করার মানত করেছিলেন, কিন্তু হজ না করেই মারা গেছেন। আমি কি তাঁর পক্ষ থেকে হজ করব? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: হ্যাঁ, তুমি তাঁর পক্ষ থেকে হজ করো। তোমার কী মনে হয়, তোমার মায়ের ওপর যদি কোনো ঋণ থাকত, তবে কি তুমি তা পরিশোধ করতে না? তোমরা আল্লাহর ঋণ পরিশোধ করো, কারণ আল্লাহই ঋণ পরিশোধের অধিক হকদার।