হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4641)


4641 - عن ابن عباس، قال: أَتَى رَجُلٌ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ لَهُ: إِنَّ أُخْتِي قَدْ نَذَرَتْ أَنْ تَحُجَّ وَإِنَّهَا مَاتَتْ؟ فَقَال النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"لَوْ كَانَ عَلَيْهَا دِيْنٌ أَكُنْتَ قَاضِيَةُ؟". قَالَ: نَعَمْ. قَال:"فَاقْضِ اللهَ فَهُوَ أَحَقُّ بِالْقَضَاءِ".

صحيح: رواه البخاريّ في الأيمان والنذور (6699) عن آدم (هو ابن أبي إياس)، حدثنا شعبة، عن أبي بشر، سمعت سعيد بن جبير، عن ابن عباس، به.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে তাঁকে বলল: আমার বোন হজ্জ করার মানত করেছিল, কিন্তু সে মারা গেছে? তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যদি তার উপর কোনো ঋণ থাকত, তবে কি তুমি তা পরিশোধ করতে?" সে বলল: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "তবে আল্লাহর (মানত) পরিশোধ করে দাও। কারণ তিনিই ঋণ পরিশোধের বেশি হকদার।"









আল-জামি` আল-কামিল (4642)


4642 - عن عبد الله بن عباس قال: أمرتْ امرأةُ سنان بن سلمة الجهنيّ أن يسأل رسول الله صلى الله عليه وسلم أنّ أمَّها ماتتْ ولم تحجّ أفيجزئ عن أمِّها أنْ تحجَّ عنها؟ قال:"نعم لو كان على أمِّها دَيْنٌ فقضته عنها ألم يكن يجزئ عنها؟ ! فلتحج عن أمِّها".

صحيح: رواه النسائيّ (2633) عن عمران بن موسي، حدّثنا عبد الوارث، حدّثنا أبو التياح، قال: حدّثني موسى بن سلمة الهذليّ، أنّ ابن عباس قال (فذكره).

وإسناده صحيح، وأبو التياح هو يزيد بن حميد الضُّبعيّ مشهور بكنيته من رجال الجماعة.

ومن طريقه رواه أحمد (2518) في حديث طويل، وصحّحه ابن خزيمة (3034) من هذا الوجه، وفيه قصّة.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, সিনান ইবনে সালামাহ আল-জুহানির স্ত্রী তাঁকে আদেশ করলেন যেন তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করেন যে, তার মা মারা গেছেন কিন্তু হজ করেননি। তার পক্ষ থেকে তার হজ করা কি যথেষ্ট হবে? তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ। যদি তোমার মায়ের উপর কোনো ঋণ থাকত এবং তুমি তা পরিশোধ করতে, তবে কি তা তার জন্য যথেষ্ট হতো না?! অতএব, তুমি তোমার মায়ের পক্ষ থেকে হজ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4643)


4643 - عن بريدة، قال: بَيْنَا أَنَا جَالِسٌ عِنْدَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم إِذْ أَتَتْهُ امْرَأَةٌ فَقَالَت: إِنَّهَا (تعني أمَّها وقد ماتتْ) لَمْ تَحُجَّ قَطُّ أَفَأَحُجُّ عَنْهَا؟ قَال:"حُجِّي عَنْهَا".

صحيح: رواه مسلم في الصوم (1149) عن علي بن حجر السّعديّ، ثنا علي بن مسهر أبو الحسن، عن عبد الله بن عطاء، عن عبد الله بن بريدة، عن أبيه، فذكره في حديث طويل، ذكر بعضه في الزكاة، وبعضه في الصوم.




বুরাইদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট বসে ছিলাম, এমন সময় তাঁর নিকট একজন মহিলা এসে বললেন: নিশ্চয়ই সে (অর্থাৎ আমার মা, যিনি মারা গেছেন) কখনও হজ করেনি। আমি কি তার পক্ষ থেকে হজ করতে পারি? তিনি বললেন: তুমি তার পক্ষ থেকে হজ করো।









আল-জামি` আল-কামিল (4644)


4644 - عن أنس بن مالك قال: جاء رجلٌ إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: إنّ أبي مات ولم يحجّ حجّة الإسلام؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أرأيت لو كان على أبيكَ دين أكنتَ تقضيه عنه؟" قال: نعم، قال:"فإنّه دين عليه فاقضه".

حسن: رواه البزّار (1145 - كشف الأستار) من طريق صدقة بن موسى. والطَّبراني في الكبير (748)، والأوسط (100) من حديث عباد بن راشد -كلاهما عن ثابت، عن أنس، فذكره- واللفظ للبزار.

ولفظ الطبراني:"حجّ عن أبيك".

وادّعى البزّار بأن صدقة تفرد به عن ثابت، كما ادّعى الطبرانيّ بأن عبّادًا تفرد به عن ثابت، وهو ليس كما ادّعيا، بل تابعه أحدهما الآخر.

وإسناده حسن من أجل صدقة بن موسى، ومتابعة عباد بن راشد له.




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন লোক নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এসে বললো: আমার পিতা ইন্তেকাল করেছেন, কিন্তু তিনি ইসলামের ফরয হজ্জ করেননি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি কি মনে করো, যদি তোমার পিতার উপর কোনো ঋণ থাকতো, তবে কি তুমি তা তাঁর পক্ষ থেকে পরিশোধ করতে? সে বললো: হ্যাঁ। তিনি বললেন: তবে এটিও তাঁর উপর একটি ঋণ। অতএব তুমি তা পরিশোধ করো।









আল-জামি` আল-কামিল (4645)


4645 - عن الفضل بن عباس، أَنَّ امْرَأَةً مِنْ خَثْعَمَ قَالَت: يَا رَسُولَ اللهِ إِنَّ أَبِي شَيْخٌ كَبِيرٌ عَلَيْهِ فَرِيضَةُ اللهِ فِي الْحَجِّ وَهُوَ لا يَسْتَطِيعُ أَنْ يَسْتَوِيَ عَلَى ظَهْرِ بَعِيرِهِ؟ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"فَحُجِّي عَنْهُ".

متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1853)، ومسلم في الحج (1335) كلاهما من طريق ابن جريج، عن ابن شهاب، حدّثنا سليمان بن يسار، عن ابن عباس، عن الفضل، فذكره، واللفظ لمسلم. ولم يسق البخاري لفظه، وإنما أحاله على حديث ابن عباس.

قال الحميديّ:"ومن الرواة من لم يذكر فيه الفضل، جعله من مسند ابن عباس"."الجمع بين الصحيحين" (2781)، وهو الحديث الآتي.

وقوله:"حُجّي عنه" فيه دليل على حجّ المرأة عن الرجل، وبه بوّبه النسائي (2643)، وابن خزيمة (3033)، وذكرا فيه هذا الحديث.




ফযল ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, খাছআম গোত্রের এক মহিলা বললেন: "ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমার পিতা অত্যন্ত বৃদ্ধ, তার উপর আল্লাহর পক্ষ থেকে হজ্জ ফরয হয়েছে, কিন্তু তিনি তার উটের পিঠে স্থির হয়ে বসতে সক্ষম নন?" তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তাহলে তুমি তার পক্ষ থেকে হজ্জ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (4646)


4646 - عن عبد الله بن عباس، قال: كَانَ الْفَضْلُ بْنُ عَبَّاسٍ رَدِيفَ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم، فَجَاءَتْهُ امْرأةٌ مِنْ خَثْعَمَ تَسْتَفْتِيهِ، فَجَعَلَ الْفَضْلُ يَنْظُرُ إِلَيْهَا وَتَنْظرُ إِلَيْهِ، فَجَعَلَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم يَصْرِفُ وَجْهَ الْفَضْلِ إِلَى الشِّقِّ الآخَر، فَقَالتَ: يَا رَسُولَ الله! إِنَّ فَرِيضَةَ اللهِ فِي الْحَجِّ أَدْرَكَت أَبِي شَيْخًا كَبِيرًا لا يَسْتَطِيعَ أَنْ يَثْبُتَ عَلَى الرَّاحِلةِ أَفَأحُجُّ عَنْهُ؟ قَالَ:"نَعَمْ" وَذَلِكَ فِي حَجَّةِ الْوَدَاعِ.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (97) عن ابن شهاب، عن سليمان بن يسار، عن عبد الله بن عباس، فذكره.
ورواه البخاريّ في جزاء الصيد (1855)، ومسلم في الحج (1334) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ফাদল ইবনু আব্বাস রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে সওয়ারীতে আরোহণ করেছিলেন। তখন খাস'আম গোত্রের একজন মহিলা এসে তাঁর কাছে ফতোয়া জিজ্ঞাসা করল। ফাদল তার দিকে তাকাতে লাগলেন এবং সেও ফাদলের দিকে তাকাতে লাগল। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ফাদলের মুখ অন্য দিকে ঘুরিয়ে দিতে লাগলেন। তখন সে বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আল্লাহ্‌র পক্ষ থেকে ফরয করা হজ আমার পিতাকে এমন অবস্থায় পেয়েছে যখন তিনি অতি বৃদ্ধ, সওয়ারীর উপর স্থির থাকতে পারেন না। আমি কি তার পক্ষ থেকে হজ করতে পারি? তিনি বললেন: "হ্যাঁ।" আর এটি ছিল বিদায় হজ্জের সময়।









আল-জামি` আল-কামিল (4647)


4647 - عن ابن عباس، قال: جَاءَ رَجُلٌ إِلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم فَقَال: أَحُجُّ عَنْ أَبِي؟ قَال:"نَعَمْ حُجَّ عَنْ أَبِيكَ فَإِنْ لَمْ تَزِدْهُ خَيْرًا لَمْ تَزِدْهُ شَرًّا".

صحيح: رواه ابن ماجه (2904) عن محمد بن عبد الأعلى الصنعاني، قال: حدّثنا عبد الرزاق، أنبأنا سفيان الثوري، عن سليمان الشيباني، عن يزيد بن الأرقم، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده صحيح كما قال البوصيريّ في"زوائد ابن ماجه"، وسليمان هو ابن فيروز أبو إسحاق.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন লোক নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, ‘আমি কি আমার পিতার পক্ষ থেকে হজ করব?’ তিনি বললেন, ‘হ্যাঁ, তুমি তোমার পিতার পক্ষ থেকে হজ করো। কারণ, যদি তুমি তাঁর জন্য কল্যাণ বৃদ্ধি নাও করো, অন্তত অকল্যাণ বৃদ্ধি করবে না।’









আল-জামি` আল-কামিল (4648)


4648 - عن عبد الله بن عباس: أَنَّ رَجُلا سَأَلَ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أَنَّ أَبِي أَدْرَكَهُ الْحَجُّ، وَهُوَ شَيْخٌ كَبِيرٌ لا يَثْبُتُ عَلَى رَاحِلَتِهِ فَإِنْ شَدَدْتُهُ خَشِيتُ أَنْ يَمُوتَ أَفَأَحُجُّ عَنْهُ؟ قَالَ:"أَرَأَيْتَ لَوْ كَانَ عَلَيْهِ دَيْنٌ فَقَضَيْتَهُ أَكَانَ مُجْزِئًا؟". قَال: نَعَمْ، قَال:"فَحُجَّ عَنْ أَبِيكَ".

صحيح: رواه النسائيّ (2640، 5393) عن مجاهد بن موسى، عن هُشيم، عن يحيى بن أبي إسحاق، عن سليمان بن يسار، عن عبد الله بن عباس، قال: فذكره.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (1812) عن هشيم، بإسناده إلا أنه قال: عن ابن عباس أو الفضل بن عباس، فذكره.

لأنه وقع الخلاف على يحيى بن أبي إسحاق فروى هكذا كما مرّ، ورواه أيضًا عمرو بن دينار، عن أبي الشعثاء، عن ابن عباس هكذا.

ورواه شعبة، عن يحيى بن أبي إسحاق، قال: سمعت سليمان بن يسار، حدّثنا الفضل، قال:"كنت رديف رسول الله صلى الله عليه وسلم فسأله رجل، فقال: إنّ أبي -أو أمي- شيخ كبير، لا يستطيع الحج" فذكر الحج. رواه الإمام أحمد (1813) من طريقه.

ورواه النسائيّ من طريقين: من طريقه (5395)، ومن طريق محمد (هو ابن سيرين) (2643، 5394) كلاهما عن يحيى بن أبي إسحاق.

قال النسائي:"سليمان لم يسمع من الفضل بن العباس".

قلت: وهو كما قال؛ لأنّ الفضل بن العباس توفي سنة (18 هـ) في طاعون عمواس، وسليمان ابن يسار ولد في خلافة عثمان، فالصحيح أن بينهما واسطة، وهو ابن عباس.

فمرة يروي ابن عباس عن الفضل، وأخرى بدونه.

قال الترمذيّ (3/ 259): سألت محمدًا عن هذه الرّوايات فقال:"أصحّ شيء في هذا الباب ما رُوي عن ابن عباس، عن الفضل بن عباس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم. وقال: ويحتمل أن يكون ابن عباس سمعه من الفضل وغيره عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، ثم روى هذا عن النبيّ صلى الله عليه وسلم وأرسله. ولم يذكر الذي سمعه منه".




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, এক ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে জিজ্ঞাসা করল, আমার পিতা হজ্জের সময় পেয়েছেন, অথচ তিনি এমন বৃদ্ধ লোক যে তাঁর উটের পিঠে স্থির থাকতে পারেন না। যদি আমি তাঁকে বেঁধেও রাখি, তবে আমার আশঙ্কা হয় যে তিনি মারা যাবেন। আমি কি তাঁর পক্ষ থেকে হজ্জ করব? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তোমার কী মনে হয়, যদি তার উপর ঋণ থাকত আর তুমি তা পরিশোধ করে দিতে, তবে কি তা যথেষ্ট হতো? লোকটি বলল: হ্যাঁ। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তাহলে তোমার পিতার পক্ষ থেকে হজ্জ করো।









আল-জামি` আল-কামিল (4649)


4649 - عن أبي رزين -رجل من بني عامر- أنه قال: يا رَسُول اللهِ! إِنَّ أَبِي شَيْخٌ كَبِيرٌ لا يَسْتَطِيعُ الْحَجَّ وَلا الْعُمْرَةَ وَلا الظَّعْنَ؟ قَال:"حُجَّ عَنْ أَبِيكَ وَاعْتَمِرْ".

صحيح: رواه أبو داود (1810)، والترمذي (930)، والنسائي (2637)، وابن ماجه (2906) كلّهم من طريق شعبة، عن النعمان بن سالم، عن عمرو بن أوس، عن أبي رزين، فذكره.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا أحمد (16184)، وصحّحه ابن خزيمة (3040)، وابن حبان (3991)، والحاكم (481/ 1) وقال:"صحيح على شرط الشيخين".

ومن هذا الوجه رواه أيضًا البيهقي (4/ 350) وقال: قال الإمام أحمد:"لا أعلم في إيجاب العمرة حديثًا أجود من هذا، ولا أصح منه. ولم يجوده أحد كما جوّده شعبة".

قلت: وأبو رزين هو لقيط العقيليّ.




আবূ রাজীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমার পিতা অনেক বৃদ্ধ, যিনি হজ্ব, উমরাহ এবং সফর (যানবাহনে আরোহণ) করতেও সক্ষম নন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, তুমি তোমার পিতার পক্ষ থেকে হজ্ব ও উমরাহ আদায় করো।









আল-জামি` আল-কামিল (4650)


4650 - عن عبد الله بن الزبير، قال: جَاءَ رَجُلٌ مِنْ خَثْعَمَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَقَالَ: إِنَّ أَبِي شَيْخٌ كَبِيرٌ لا يَسْتَطِيعُ الرُّكُوبَ وَأَدْرَكَتْهُ فَرِيضَةُ اللَّهِ فِي الْحَجِّ فَهَلْ يُجْزِئُ أَنْ أَحُجَّ عَنْهُ؟ قَالَ:"آنْتَ أَكْبَرُ وَلَدِهِ؟". قَالَ: نَعَمْ، قَالَ:"أَرَأَيْتَ لَوْ كَانَ عَلَيْهِ دَيْنٌ أَكُنْتَ تَقْضِيهِ؟" قَالَ: نَعَمْ. قَال:"فَحُجَّ عَنْهُ".

حسن: رواه النسائيّ (2638) عن إسحاق بن إبراهيم، أنبأنا جرير، عن منصور، عن مجاهد، عن يوسف بن الزبير، عن عبد الله بن الزبير فذكره.

وإسناده حسن من أجل يوسف بن الزبير فإنه حسن الحديث، وروى عنه جماعة، وذكره ابن حبان في الثقات.

ورواه أيضًا الإمام أحمد (16102) مختصرًا، وأبو يعلى (6812)، والدارمي (1879)، والبيهقي (4/ 329) كلّهم من طريق منصور بإسناده إلّا أنّ البعض قال: عن ابن الزبير، أنّ سودة بنت زمعة قالت:"جاء رجل" فذكرته. كما في رواية الإمام أحمد (27417)، والطبراني في"الكبير" (24/ 37) وقد صحّح البيهقي حديث مجاهد، عن يوسف بن الزبير، عن ابن الزبير، عن النبي صلى الله عليه وسلم.

كما أنه لا يضر هذا الخلاف لأنه من الممكن أن ابن الزبير سمع الحديث من الوجهين، فلا يلتفت إلى من جعل هذا الخلاف، والخلاف الآخر في شك مجاهد في قوله:"يوسف بن الزبير أو الزبير بن يوسف" أو إرسال من أرسله سببًا للاضطراب.

لأنّ الصّحيح لا يُعلّ بالضّعيف كما هو معلوم لدى طلبة هذا العلم.

وقد صحّح الذّهبي في"الميزان" في ترجمة يوسف بن الزبير حديثًا آخر بهذا الإسناد.

وقال الهيثمي في"المجمع" (3/ 282) بعد أن عزاه إلى أحمد والطبراني:"رجاله ثقات".

وذكره الدّارقطنيّ في"علله" (4032) وقال:"وقول جرير ومن تابعه أشبه بالصواب" أي الذين
رووه بدون شك من مجاهد كما هو عند النسائي وغيره.

وفي الباب ما رُوي عن أبي الغوث بن حصين -رجل من الفرع- أنه استفتى النبيّ صلى الله عليه وسلم عن حجّة كانت على أبيه مات ولم يحج؟ قال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"حج عن أبيك" وقال:"وكذلك الصيام في النّذر يقضي عنه".

رواه ابن ماجه (2905) عن هشام بن عمار، حدّثنا الوليد بن مسلم، حدّثنا عثمان بن عطاء، عن أبيه، عن أبي الغوث بن حصين، فذكره.

قال البوصيريّ في"الزوائد":"ليس لأبي الغوث بن حصين عند ابن ماجه سوى هذا الحديث.

وليس له رواية في شيء من الكتب الخمسة، وإسناد حديثه ضعيف، وعثمان بن عطاء الخراساني، قال فيه ابن معين ومسلم والدارقطني ضعيف الحديث، وقال الفلاس: منكر الحديث، وقال النسائي: ليس بثقة، وقال الحاكم: روي عن أبيه أحاديث موضوعة" انتهى.




আব্দুল্লাহ ইবনে যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: খাস'আম গোত্রের একজন লোক রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল, “আমার পিতা অতিশয় বৃদ্ধ, তিনি বাহনে আরোহণ করতে পারেন না। অথচ আল্লাহর পক্ষ থেকে হজ্জের ফরয তাঁর ওপর এসে পড়েছে। আমি কি তাঁর পক্ষ থেকে হজ্জ আদায় করতে পারি?” তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, “তুমি কি তাঁর সবচেয়ে বড় সন্তান?” লোকটি বলল, “হ্যাঁ।” তিনি বললেন, “তোমার কী মনে হয়, যদি তাঁর ওপর কোনো ঋণ থাকত, তবে কি তুমি তা পরিশোধ করতে?” লোকটি বলল, “হ্যাঁ।” তিনি বললেন, “তাহলে তার পক্ষ থেকে হজ্জ আদায় করো।”









আল-জামি` আল-কামিল (4651)


4651 - عن عبد الله بن عباس، أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم سَمِعَ رَجُلًا يَقُولُ: لَبَّيْكَ عَنْ شُبْرُمَةَ. قَالَ:"مَنْ شُبْرُمَةُ؟". قَالَ: أَخٌ لِي أَوْ قَرِيبٌ لِي. قَالَ:"حَجَجْتَ عَنْ نَفْسِكَ؟". قَالَ: لا. قَال:"حُجَّ عَنْ نَفْسِكَ، ثُمَّ حُجَّ عَنْ شُبْرُمَةَ".

صحيح: رواه أبو داود (1811)، وابن ماجه (2903)، وصحّحه ابن خزيمة (3039)، وابن حبان (3988) كلّهم من طريق عبدة بن سليمان، عن سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن عزْرة، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.

ومن هذا الطريق رواه الدارقطني (2658)، والبيهقي (4/ 336) وقال:"هذا إسناد صحيح، ليس في هذا الباب أصح منه".

وعن أحمد روايتان:

الأولى: ما ذكره الأثرم عن أحمد أن رفعه خطأ. وقال:"رواه عدّة موقوفًا على ابن عباس".

والثانية: ما رواه ابنه صالح عن الإمام أنه حكم بأنه مسند، وأنه من قول رسول الله صلى الله عليه وسلم.

قال شيخ الإسلام ابن تيمية في"شرح العمدة" (1/ 292):"فيكون قد اطلع على ثقة من رفعه، وقرّر رفعه جماعة، على أنه إن كان موقوفًا فليس لابن عباس مخالف" انتهى.

وكذا رجّح رفعه عبد الحق وابن القطّان كما في"بيان الوهم والإيهام" (5/ 451). ورجّح الحافظ ابن حجر رفعه أيضًا بالنظر إلى أن له شاهدًا مرسلًا وهو ما رواه سعيد بن منصور، عن سفيان بن عيينة، عن ابن جريج، عن عطاء، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم.

ولكن خالفه ابن أبي ليلى، فرواه عن عطاء، عن عائشة.
وخالفه الحسن بن ذكوان، فرواه عن عمرو بن دينار، عن عطاء، عن ابن عباس. قال الدّارقطني: إنه أصح.

قال الحافظ: وهو كما قال؛ لكنه يقوي المرفوع لأنه من غير رجاله، وقد رواه الإسماعيلي في"معجمه" من طريق أخرى عن أبي الزبير، عن جابر. وفي إسنادها من يحتاج إلى النظر في حاله. فيجتمع من هذا صحة الحديث"، انتهى. انظر:"التلخيص الحبير" (958).

قلت: رواه الدارقطني من عدة طرق علّل بعضها، وصحّح بعضها.

وقد كثر الكلام حول هذا الحديث، وخلاصته كما قال ابن الملقن في"خلاصة البدر المنير" (1/ 345):"أعلّه الطّحاويّ بالوقف، والدّارقطني بالإرسال، وابن المغلس الظاهريّ بالتدليس، وابن الجوزي بالضّعف، وغيرهم بالاضطراب والانقطاع، وقد زال ذلك كله بما أوضحناه في الأصل". يعني"البدر المنير" (6/ 45 - 51).

قلت: لقد أجبت عن كلّ هذه العلل في"المنة الكبرى" (3/ 480) ولا حاجة إلى إعادته، فراجعه.

وعزرة هو ابن عبد الرحمن الخزاعيّ الكوفي، ثقة من رجال مسلم، ومن قال غيره فقد وهم.

وهذا الخبر المفسّر لا يعارضه حديث المرأة الخثعمية وحديث أبي رزين لأسباب لا يحتاج إلى بيانها، وهو أمر معلوم لدى طلبة هذا العلم.




আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে (হজ্জের তালবিয়াতে) বলতে শুনলেন: "আমি শুর্‌বুমার পক্ষ থেকে হাযির (লাব্বাইক বলছি)।" তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "শুর্‌বুমা কে?" সে বলল: আমার ভাই অথবা আমার কোনো নিকটাত্মীয়। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি নিজের পক্ষ থেকে হজ্জ করেছো?" সে বলল: না। তিনি বললেন: "প্রথমে তোমার নিজের পক্ষ থেকে হজ্জ করো, তারপর শুর্‌বুমার পক্ষ থেকে হজ্জ করবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4652)


4652 - عن ابن عباس، أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم مَرَّ بِامْرَأَةٍ وَهِيَ فِي مِحَفَّتِهَا فَقِيلَ لَهَا: هَذَا رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم، فَأَخَذَتْ بِضَبْعَيْ صَبِيٍّ كَانَ مَعَهَا فَقَالَتْ: أَلِهَذَا حَجٌّ يَا رَسُولَ اللهِ؟ قَال:"نَعَمْ وَلَكِ أَجْرٌ".

صحيح: رواه مالك في الحج (244) عن إبراهيم بن عقبة، عن كريب مولى عبد الله بن عباس، عن ابن عباس، فذكره.

ورواه مسلم في الحج (1336) من طريق سفيان بن عيينة، عن إبراهيم بن عقبة، به، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم لقي ركبًا بالرّوحاء، فقال:"من القوم؟". قالوا: المسلمون، فقالوا: من أنت؟ قال:"رسول الله" فرفعتْ إليه امرأة صبيًّا، فقالت: ألهذا حجّ؟ قال (فذكره).

ورواه مختصرًا من طريق سفيان، عن محمد بن عقبة، عن كريب، به.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একটি মহিলার পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যখন সে তার হাওদার মধ্যে ছিল। তখন তাকে বলা হলো: ইনি আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)। অতঃপর সে তার সাথে থাকা একটি শিশুর বাহু ধরে জিজ্ঞেস করল: হে আল্লাহ্‌র রাসূল! এর কি হজ হবে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হ্যাঁ, আর তোমার জন্য রয়েছে প্রতিদান।"









আল-জামি` আল-কামিল (4653)


4653 - عن الجعيد بن عبد الرحمن، قال: سمعت عمر بن عبد العزيز يقول للسائب ابن يزيد وكان قد حُجَّ به في ثقل النّبيّ صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1859) عن عمرو بن زُرارة، أخبرنا القاسم بن مالك، عن الجعيد بن عبد الرحمن، به، فذكره.
ورواه أيضًا (1858) من طريق محمد بن يوسف (هو الكنديّ)، عن السائب بن يزيد، قال:"حُجّ بي مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وأنا ابن سبع سنين".




সায়িব ইবনে ইয়াযিদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমাকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হজ্জ করানো হয়েছিল, যখন আমার বয়স ছিল সাত বছর।









আল-জামি` আল-কামিল (4654)


4654 - عن جابر بن عبد الله قال: رفعتْ امرأةٌ صبيًّا لها إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقالت: يا رسول الله! ، لهذا حجّ؟ قال:"نعم، ولك أجر".

صحيح: رواه الترمذي (924)، وابن ماجه (2910)، والبيهقي (5/ 156) كلّهم من حديث محمد بن سوقة، عن محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله، فذكره.

وإسناده صحيح، وقول الترمذي:"هذا حديث غريب" لم أعرف وجه الغرابة.

وفي الباب ما رُوي عن جابر، قال: كنا إذا حججنا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم، فكنا نلبّي عن النساء، ونرمي عن الصبيان.

رواه الترمذي (927)، وابن ماجه (3038)، والبيهقي (5/ 156) كلهم من طريق أشعث، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.

قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب لا نعرفه إلّا من هذا الوجه، وقد أجمع أهل العلم على أن المرأة لا يلبي عنها غيرُها، بل هي تلبي عن نفسها، ويكره لها رفع الصوت بالتلبية".

قلت: أشعث هو ابن سوَّار الكنديّ قاضي الأهواز، ضعَّفه جمهور أهل العلم.

ولا تفيد ما رواه البيهقي (5/ 156) من وجه آخر عن أيمن بن نابل، عن أبي الزبير لأنه لم يذكر فيه:"كنا نلبي عن النساء".

وأما ما رُوي عن ابن عباس قال:"أيها الناس! أسمعوني ما تقولون، وافهموا ما أقول لكم، أيما مملوك حجّ به أهله فمات قبل أن يُعتق فقد قضى حجّه، وإن عتق قبل أن يموت فليحجج، وأيّما غلام حجّ به أهله فمات قبل أن يدرك، فقد قضى عنه حجّه وإن بلغ فليحجج" فهو موقوف.

رواه الشافعي في الأمّ (2/ 177) عن سعيد، عن مالك بن مغول، عن أبي السفر، قال: قال ابن عباس (فذكره).

وقد رُوي مرفوعًا: رواه الحاكم (1/ 481)، والبيهقيّ (4/ 325) كلاهما من حديث محمد بن المنهال، ثنا يزيد بن زريع، ثنا شعبة، عن سليمان الأعمش، عن أبي ظبيان، عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أيّما صبي حجّ، ثم بلغ الحدث فعليه أن يحجّ حجّة أخرى، وأيّما أعرابي حجّ ثم هاجر فعليه حجة أخرى، وأيما عبد حجّ ثم أعتق فعليه حجة أخرى".

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

ولكن قال الحافظ في"التلخيص" (2/ 220):"رواه ابن خزيمة (3050)، والإسماعيلي في"مسند الأعمش"، والحاكم، والبيهقي، وابن حزم -وصحّحه-، والخطيب في"التاريخ" من حديث محمد بن المنهال، عن يزيد بن زريع، عن شعبة، عن الأعمش، عن أبي ظبيان، عنه. قال
ابن خزيمة: الصحيح موقوف. وأخرجه كذلك من رواية ابن أبي عدي عن شعبة. وقال البيهقي: تفرّد برفعه محمد بن منهال. ورواه الثوري عن شعبة موقوفًا".

قلت: وقد رفعه أيضًا الحارث بن سريج الخوارقيّ، عن يزيد بن زريع، عن شعبة.

ومن طريقه رواه ابن عدي في"الكامل" (2/ 615) في ترجمة الحارث بن سريج النقال، وقال:"وهذا الحديث معروف بمحمد بن المنهال، عن يزيد بن زريع. وأظن الحارث بن سريج هذا سرقه منه. وهذا الحديث لا أعلم يرويه عن يزيد بن زريع غيرهما. ورواه ابن أبي عدي وجماعة معه عن شعبة موقوف" انتهى.

قلت: الحارث بن سريج هذا مختلف فيه فوثقه ابن معين وابن حبان وغيرهما، وضعّفه ابن معين في رواية، بل كذّبه واتهمه موسي بن هارون الحمال كما ذكره ابن عدي في"الكامل"، فمثله لا تنفع متابعته.

وقال الترمذيّ:"وقد أجمع أهل العلم أنّ الصبيّ إذا حجّ قبل أن يدرك، فعليه الحجّ إذا أدرك لا تجزئ عنه تلك الحجة عن حجة الإسلام. وكذلك المملوك إذا حجّ في رقِّه ثم أُعتق، فعليه الحج إذا وجد إلى ذلك سبيلا. لا يجزئ عنه ما حجّ في حال رقّه، وهو قول سفيان الثوريّ، والشافعيّ، وأحمد، وإسحاق". انتهى.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একজন মহিলা তার একটি শিশুকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উঁচু করে ধরলেন এবং বললেন, ‘ইয়া রাসূলাল্লাহ! এই শিশুর জন্য কি হজ্ব আছে?’ তিনি বললেন, “হ্যাঁ, এবং তোমার জন্য রয়েছে সওয়াব।”

(এই হাদীসটি) সহীহ: এটি ইমাম তিরমিযী (৯২৪), ইবনু মাজাহ (২৯১০), এবং বায়হাকী (৫/১৫৬) বর্ণনা করেছেন। এঁরা সকলেই মুহাম্মাদ ইবনু সুওকাহ, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু মুনকাদির, তিনি জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন। এর সনদ সহীহ। ইমাম তিরমিযীর বক্তব্য, “এই হাদীসটি গরীব (অর্থাৎ, একাকী সূত্রে বর্ণিত)”—এর ‘গরীব’ হওয়ার কারণ আমি জানতে পারিনি।

এই অধ্যায়ে জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে আরেকটি বর্ণনা রয়েছে, তিনি বলেন: আমরা যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হজ্ব করতাম, তখন আমরা মহিলাদের পক্ষ থেকে তালবিয়া পাঠ করতাম এবং শিশুদের পক্ষ থেকে (শয়তানকে) পাথর নিক্ষেপ করতাম।
এটি বর্ণনা করেছেন ইমাম তিরমিযী (৯২৭), ইবনু মাজাহ (৩০৩৮), এবং বায়হাকী (৫/১৫৬)। এঁরা সকলে আশ‘আস, তিনি আবুয যুবাইর, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন।
ইমাম তিরমিযী বলেছেন: “এই হাদীসটি গরীব, আমরা এই সূত্র ছাড়া এটি অন্য কোনো সূত্রে জানি না। কিন্তু আহলে ইলম (মুহাদ্দিস ও ফকীহগণ) ঐকমত্যে পৌঁছেছেন যে, কোনো নারীর পক্ষ থেকে অন্য কেউ তালবিয়া পাঠ করবে না, বরং সে নিজেই তার নিজের জন্য তালবিয়া পাঠ করবে। তবে তার জন্য উচ্চস্বরে তালবিয়া পাঠ করা মাকরূহ।”

আমি (ভাষ্যকার) বলি: আশ‘আস হলেন আশ‘আস ইবনু সাওয়ার আল-কিন্দী, আহওয়ায-এর কাজী। জমহূর আহলে ইলম তাকে দুর্বল বলেছেন।

আয়মান ইবনু নাবিল, তিনি আবুয যুবাইর, তিনি জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বায়হাকীর (৫/১৫৬) অপর বর্ণনাটি থেকে, “আমরা মহিলাদের পক্ষ থেকে তালবিয়া পাঠ করতাম” অংশটি না থাকায় সেটিও কোনো সুবিধা দেয় না।

আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: “হে লোক সকল! আমি কী বলছি তা শোনো এবং তোমরা কী বলছো তা আমাকে শুনতে দাও। কোনো দাসকে যদি তার মালিক হজ্ব করায় এবং সে স্বাধীন হওয়ার আগে মারা যায়, তবে তার হজ্ব আদায় হয়ে গেল। আর যদি সে মারা যাওয়ার আগে স্বাধীন হয়, তবে তাকে অবশ্যই হজ্ব করতে হবে। আর কোনো শিশুকে যদি তার পরিবার হজ্ব করায় এবং সে বালেগ হওয়ার আগে মারা যায়, তবে তার হজ্ব আদায় হয়ে গেল। আর যদি সে বালেগ হয়, তবে তাকে অবশ্যই হজ্ব করতে হবে।” এটি মাওকুফ (সাহাবীর নিজস্ব উক্তি)।

এটি ইমাম শাফেঈ আল-উম্ম গ্রন্থে (২/১৭৭) সাঈদ, তিনি মালিক ইবনু মিগওয়াল, তিনি আবুস সাফার, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন।

আর এটি মারফূ’ (রাসূলের বাণী হিসেবে) হিসেবেও বর্ণিত হয়েছে: এটি হাকিম (১/৪৮১) এবং বায়হাকী (৪/৩২৫) উভয়েই মুহাম্মাদ ইবনু মিনহাল, তিনি ইয়াযীদ ইবনু যুরায়', তিনি শু'বাহ, তিনি সুলাইমান আল-আ’মাশ, তিনি আবু যবইয়ান, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, যে তিনি বলেছেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “যে কোনো শিশু হজ্ব করে, অতঃপর সে বালেগ হয়, তবে তার উপর আরেকটি হজ্ব করা আবশ্যক। আর যে কোনো বেদুইন (আরবী) হজ্ব করে, অতঃপর হিজরত করে, তার উপর আরেকটি হজ্ব আবশ্যক। আর যে কোনো দাস হজ্ব করে, অতঃপর সে আযাদ হয়, তার উপর আরেকটি হজ্ব আবশ্যক।”

ইমাম হাকিম বলেছেন: “এটি শাইখাইন (বুখারী ও মুসলিম)-এর শর্তানুসারে সহীহ।”

কিন্তু হাফেয ইবনু হাজার আত-তালখীস গ্রন্থে (২/২২০) বলেন: “এটি ইবনু খুযায়মা (৩০৫০), ইসমাঈলী তাঁর মুসনাদ আল-আ’মাশ-এ, হাকিম, বায়হাকী, ইবনু হাযম—তিনি এটিকে সহীহ বলেছেন—এবং খতীব আত-তারীখ-এ মুহাম্মাদ ইবনু মিনহাল, তিনি ইয়াযীদ ইবনু যুরায়', তিনি শু'বাহ, তিনি আল-আ’মাশ, তিনি আবু যবইয়ান, তিনি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন। ইবনু খুযায়মা বলেছেন: সহীহ হলো এটি মাওকুফ। তিনি ইবনু আবী আদী-এর সূত্রে শু’বাহ থেকে এটিকে মাওকুফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। বায়হাকী বলেছেন: মুহাম্মাদ ইবনু মিনহাল একাই এটি মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন। আর সাওরী শু’বাহ থেকে এটিকে মাওকুফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।”

আমি (ভাষ্যকার) বলি: হারিস ইবনু সুরাইজ আল-খাওয়ারিকীও এটিকে ইয়াযীদ ইবনু যুরায়', তিনি শু’বাহ-এর সূত্রে মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।

তার সূত্রে ইবনু আদী ‘আল-কামিল’ গ্রন্থে (২/৬১৫) হারিস ইবনু সুরাইজ আন-নাকাল-এর জীবনীতে এটি বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: “এই হাদীসটি মুহাম্মাদ ইবনু মিনহাল, তিনি ইয়াযীদ ইবনু যুরায়'-এর সূত্রে পরিচিত। আমার মনে হয় হারিস ইবনু সুরাইজ এটি তার কাছ থেকে চুরি করেছেন। আমি জানি না যে, ইয়াযীদ ইবনু যুরায়'-এর সূত্রে এঁরা দুজন ছাড়া আর কেউ এটি বর্ণনা করেছেন। ইবনু আবী আদী ও তাঁর সাথীরা শু’বাহ থেকে এটিকে মাওকুফ হিসেবে বর্ণনা করেছেন।”

আমি (ভাষ্যকার) বলি: এই হারিস ইবনু সুরাইজ সম্পর্কে মতভেদ আছে। ইবনু মাঈন ও ইবনু হিব্বান প্রমুখ তাকে নির্ভরযোগ্য বলেছেন। আবার এক বর্ণনায় ইবনু মাঈন তাকে দুর্বল বলেছেন। এমনকি মূসা ইবনু হারূন আল-হাম্মাল তাকে মিথ্যাবাদী বলেছেন এবং তার বিরুদ্ধে অভিযোগ এনেছেন, যেমনটি ইবনু আদী ‘আল-কামিল’-এ উল্লেখ করেছেন। তাই তার অনুসরণ (মুতাবা’আহ) কোনো সুবিধা দেয় না।

ইমাম তিরমিযী বলেছেন: “আহলে ইলম ঐকমত্যে পৌঁছেছেন যে, কোনো শিশু বালেগ হওয়ার আগে হজ্ব করলে, বালেগ হওয়ার পর তার উপর আবার হজ্ব করা আবশ্যক। ইসলামের ফরজ হজ্বের জন্য সেই হজ্ব যথেষ্ট হবে না। একইভাবে কোনো দাস যদি তার দাসত্বকালে হজ্ব করে, অতঃপর সে স্বাধীন হয়, তবে পথ পেলে তার উপরও হজ্ব করা আবশ্যক। তার দাসত্বকালে করা হজ্ব তার জন্য যথেষ্ট হবে না। এটি সুফিয়ান সাওরী, শাফেঈ, আহমাদ এবং ইসহাক (রহ.)-এর বক্তব্য।”









আল-জামি` আল-কামিল (4655)


4655 - عن * *




৪৬৫৫ - থেকে * *









আল-জামি` আল-কামিল (4656)


4656 - عن عائشة، قالت: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم مهلّين بالحجّ في أشهر الحجّ، وفي حُرُم الحجّ، وليالي الحجّ حتى نزلنا بسرف … الحديث.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1560)، ومسلم في الحج (1211: 123) كلاهما من طريق أفلح بن حميد، قال: سمعت القاسم بن محمد، عن عائشة، به، فذكرته بطوله.

قوله:"وحُرُم الحج" بضم الحاء المهملة والرّاء أي أزمنته وأمكنته وحالاته، ورُوي بفتح الراء"حَرَم" جمع حُرْمة أي ممنوعات الحج ومحرماته. انظر: فتح الباري (3/ 4




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হাজ্জের ইহরামের তালবিয়াহ পাঠকারী অবস্থায় বের হলাম, হাজ্জের মাসগুলোতে, হাজ্জের পবিত্র সময় ও সীমাগুলোতে এবং হাজ্জের রাতগুলোতে, যতক্ষণ না আমরা সারাফ নামক স্থানে অবতরণ করলাম। ... হাদীস।









আল-জামি` আল-কামিল (4657)


4657 - عن عبد الله بن عمر؛ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَال:"يُهِلُّ أَهْلُ الْمَدِينَةِ مِنْ ذِي الْحُلَيْفَةِ، وَيُهِلُّ أَهْلُ الشَّامِ مِن الْجُحْفَةِ، وَيُهِلُّ أَهْلُ نَجْدٍ مِنْ قَرْنٍ".

قَالَ عَبْدُ الله بْنُ عُمَرَ: وبَلَغَنِي أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ:"وَيُهِلُّ أَهْلُ الْيَمَنِ مِنْ يَلَمْلَمَ".

متفق عليه: رواه مالك في الحج (22) عن نافع، عن ابن عمر، به.
ورواه البخاريّ في الحجّ (1525)، ومسلم في الحج (1182: 13) من طريق مالك، به، مثله.

ورواه مالك أيضًا (23) عن عبد الله بن دينار، عن عبد الله بن عمر أنه قال:"أَمَرَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَهْلَ الْمَدِينَةِ أَن يُهِلُّوا من ذِي الْحُلَيْفَةِ وَأَهْلَ الشَّامِ من الْجُحْفَةِ وَأَهْلَ نَجْدٍ من قَرْنٍ".

قال عبد الله بن عمر: أَمَّا هَؤُلاءِ الثَّلاثُ فَسَمِعْتُهُنَّ مِنْ رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَأَخْبِرْتُ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَالَ:"وَيُهِلُّ أَهْلُ الْيَمَنِ مِنْ يَلَمْلَمَ".

ورواه البخاريّ أيضًا (1528)، ومسلم (1182: 14) من طريق يونس، عن الزهري، عن سالم بن عبد الله بن عمر، عن أبيه، به، نحوه.




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "মদীনার অধিবাসীরা যুল-হুলাইফা থেকে ইহরাম বাঁধবে, সিরিয়াবাসীরা জুহফা থেকে ইহরাম বাঁধবে, এবং নাজদবাসীরা কার্ন (কার্নুল মানাযিল) থেকে ইহরাম বাঁধবে।"

আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমার নিকট এই সংবাদ পৌঁছেছে যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এবং ইয়ামানবাসীরা ইয়ালামলাম থেকে ইহরাম বাঁধবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4658)


4658 - عن عبد الله بن عمر، أنه قال: بَيْدَاؤُكُمْ هَذِهِ الَّتِي تَكْذِبُون عَلَى رَسُولِ اللهِ صلى الله عليه وسلم فِيهَا! مَا أَهَلَّ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم إِلا مِنْ عِنْدِ الْمَسْجِدِ يَعْنِي مَسْجِدَ ذِي الْحُلَيْفَة.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (30) عن موسى بن عقبة، عن سالم بن عبد الله، أنه سمع أباه يقول (فذكره).

ورواه البخاريّ في الحج (1541)، ومسلم في الحج (1186) كلاهما من طريق مالك، به، ولفظ مسلم مثله. واقتصر البخاريّ على الشّطر الأخير.

قوله:"بيداؤكم" البيداء: أرض واسعة عند نهاية ذي الحليفة في الاتجاه إلى مكة.

قال المطري:"رأيت كثيرًا من الحجّاج يتجاوزون ما حول المسجد -يعني مسجد ذي الحليفة- إلى جهة الغرب ويصعدون إلى البيداء، فيتجاوزون الميقات بيقين …"."معجَم الأمكنة الوارد ذكرها في صحيح البخاري" (ص 97).




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তোমাদের এই বাইদা, যে ব্যাপারে তোমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উপর মিথ্যা আরোপ করো! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মসজিদ সংলগ্ন স্থান ছাড়া (তালবিয়ার মাধ্যমে) ইহরামের ঘোষণা দেননি। অর্থাৎ যুল-হুলায়ফার মসজিদ।









আল-জামি` আল-কামিল (4659)


4659 - عن زيد بن جبير: أنه أتي عبد الله بن عمر في منزله -وله فُسطاط وسُرادق-، فسألته: من أين يجوز أن أعتمر؟ قال: فرضها رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لأهل نجد قرْنًا، ولأهل المدينة ذا الحليفة، ولأهل الشّام الجُحْفة".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1522) عن مالك بن إسماعيل، حدّثنا زهير (هو ابن معاوية)، حدّثني زيد بن جبير، به، فذكره.

ورواه مسلم في الحج (1182) من أوجه أخرى عن ابن عمر -من غير طريق زيد بن جبير-، وليس في ألفاظها ذكر العمرة.

قوله:"وله فسطاط وسرادق" المراد بالفسطاط: الخيمة، وهو أيضًا مما يغطى به صحن الدّار من الشمس وغيرها.

والسّرادق: هو ما أحاط بالشيء، ومنه قوله تعالى: {إِنَّا أَعْتَدْنَا لِلظَّالِمِينَ نَارًا أَحَاطَ بِهِمْ سُرَادِقُهَا} [الكهف: 29].




আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। যায়দ ইবনু জুবায়র বলেন: তিনি আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বাড়িতে এলেন—তখন তাঁর একটি তাবু ও একটি চাঁদোয়া ছিল—আমি তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: কোন্ স্থান থেকে ইহরাম বাঁধলে আমার উমরাহ করা বৈধ হবে? তিনি বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নজদবাসীদের জন্য ‘কর্ন’, মদীনা বাসীদের জন্য ‘যুল-হুলাইফা’ এবং সিরিয়াবাসীদের জন্য ‘জুহফা’ মীকাত হিসেবে নির্ধারণ করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4660)


4660 - عن ابن عبّاس، قال: وَقَّتَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم لأَهْلِ الْمَدِينَةِ ذَا الْحُلَيْفَةِ وَلأَهْلِ الشَّامِ الْجُحْفَةَ، وَلأَهْلِ نَجْدٍ قَرْنَ الْمَنَازِلِ، وَلأَهْلِ الْيَمَنِ يَلَمْلَمَ فَهُنَّ لَهُنَّ وَلِمَنْ أَتَى عَلَيْهِنَّ مِنْ غَيْرِ أَهْلِهِنَّ مِمَنْ أَرادَ الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ فَمَنْ كَانَ دُونَهُنَّ فَمُهَلُّهُ مِنْ أَهْلِهِ وَكَذَاكَ حَتَّى أَهْلُ مَكَّةَ يُهِلُّونَ مِنْهَا.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1526)، ومسلم في الحج (1181: 11) كلاهما من طريق حماد بن زيد، عن عمرو بن دينار، عن طاوس، عن ابن عباس، ولفظهما سواء.

رواه البخاريّ أيضًا (1530)، ومسلم (1181: 12) من طريق وُهيب، عن عبد الله بن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس، به، نحوه.

وقوله:"ممن أراد الحجّ والعمرة" فيه بيان أن الإحرام من هذه المواقيت إنما يجب على من كان مروره بها قاصدًا حجًّا أو عمرة دون من لم يرد شيئًا منهما.

فلو أنّ مدنيًّا مرّ بذي الحليفة وهو لا يريد حجًا ولا عمرة فسار حتى قرب من الحرم، فأراد الحج أو العمرة، فإنه يحرم من حيث حضرته النية ولا يجب عليه دم كما يجب على من خرج من بيته يريد الحجّ أو العمرة فطوى الميقات وأحرم بعد ما جاوزه. أفاده الخطابي.

قوله:"فمن كان دونهن فمهله من أهله" أي ميقاته منزله وبيته ولا يجاوزه من غير إحرام إنْ أراد الحج والعمرة، وأما أهل مكة فإن أرادوا الحج فيهل من بيته، وإن أراد العمرة فيخرج إلى الحل، ويحرم منه.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মদিনাবাসীদের জন্য যুল-হুলাইফা, শামবাসীদের জন্য জুহ্ফা, নজদবাসীদের জন্য কারনুল-মানাঝিল এবং ইয়ামানবাসীদের জন্য ইয়ালামলাম নির্ধারণ করেছেন। এই স্থানগুলো ঐ অঞ্চলের অধিবাসীদের জন্য, এবং যারা হজ্জ অথবা উমরার উদ্দেশ্যে অন্যান্য অঞ্চল থেকে ঐ স্থানগুলোর উপর দিয়ে আসে তাদের জন্যও। আর যারা এই মীকাতগুলোর ভেতরের দিকে (মক্কার নিকটবর্তী) বসবাস করে, তাদের ইহরাম বাঁধার স্থান হলো তাদের নিজেদের বাড়ি থেকে। এমনকি মক্কাবাসীরাও মক্কা থেকে ইহরাম বাঁধবে।