আল-জামি` আল-কামিল
481 - عن أبي اليسر قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"مَن أنظر معسرًا، أو وضع له، أظله اللَّه في ظل عرشه".
صحيح: رواه أبو بكر بن أبي شيبة (7/ 552) عن حسين بن علي، عن زائدة، عن عبد الملك بن عمير، عن ربعي، قال: حدثني أبو اليسر، فذكر الحديث.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا أحمد (15521) وإسناده صحيح، وأبو اليسر هو: كعب بن عمرو ابن عباد السَّلمي -بالفتح- الأنصاري صحابي بدوي جليل.
وأصل هذا الحديث في صحيح مسلم (3006) ضمن حديث طويل فانظره.
আবু ইয়াসির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো অভাবগ্রস্তকে অবকাশ দেয় (ঋণ পরিশোধের সময় বাড়িয়ে দেয়), অথবা তার জন্য (ঋণের বোঝা) হালকা করে দেয় (মাফ করে দেয়), আল্লাহ তাকে তাঁর আরশের ছায়ায় স্থান দেবেন।"
482 - عن محمد بن كعب القرظيّ، أنّ أبا قتادة كان له على رجل دين، وكان يأتيه يتقاضاه، فيختبئُ منه، فجاء ذات يوم فخرج صبيٌّ، فسأله عنه فقال: نعم هو في
البيت يأكلُ خزيرةً، فناداه: يا فلان، اخرُج، فقد أُخبرتُ أنّك هاهنا. فخرج إليه، فقال: ما يُغيِّيُك عني؟ قال: إنّي معسرٌ وليس عندي. قال: اللَّه إنّك معسرٌ؟ قال: نعم. فبكى أبو قتادة ثم قال: سمعتُ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"من نفّس عن غريمه أو محا عنه، كان في ظلّ العرش يوم القيامة".
حسن: رواه الإمام أحمد (22623) عن عفّان، حدّثنا حماد -يعني ابن سلمة- أخبرنا أبو جعفر الخطميّ، عن محمد بن كعب القرظيّ، فذكره.
وإسناده حسن، لأجل أبي جعفر الخطميّ وهو: عمير بن يزيد بن عمير الأنصاريّ أبو جعفر الخطميّ، فإنه"صدوق" كما في التقريب، وبقية رجاله ثقات.
وسيأتي في كتاب البيوع حديث أبي قتادة الذي في صحيح مسلم (1563) وليس فيه ذكرٌ للعرش.
وأمّا ما رُوي عن عبد الرحمن بن عوف مرفوعًا:"ثلاثة في ظل العرش: القرآن يحاج العباد، والرحم ينادي صلْ من وصلني واقطع من قطعني، والأمانة" فهو لا يصح.
رواه العقيليّ في الضعفاء (4/ 5)، والبغويّ في شرحه (3433) كلاهما من طريق مسلم بن إبراهيم، حدثنا كثير بن عبد اللَّه اليشكريّ، حدثني الحسن بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبيه، فذكر مثله.
قال العقيلي:"لا يصح إسناده".
وقال أيضًا:"والرواية في الرحم والأمانة من غير هذا الوجه بأسانيد جياد، بألفاظ مختلفة، وأما القرآن فليس بمحفوظ". انتهى.
ونقل الذهبي في الميزان (3/ 209) تضعيفه من العقيليّ.
وكذلك ما رُوي عن سلمان الفارسيّ أنه قال: سبعة يظلّهم اللَّه في ظلّ عرشه يوم لا ظلّ إلا ظلُّه: الإمام العادل، ورجل لقي رجلًا فقال: واللَّه إنّي لأحبُّك في اللَّه وقال الآخر: مثل ذلك، ورجل كان قلبه معلقًا بالمساجد من حبّها، ورجل جعل شبابه ونشاطه فيما يحبُّ اللَّه ويرضاه، ورجل دعته امرأة ذات جمال إلى نفسها فتركها من خشية اللَّه، ورجل أعطى صدقته بيمينه كاد أن يخفيها من شماله، ورجل إذا ذكر اللَّه فاضت عيناه من خشية اللَّه تعالى. فهو موقوف وضعيف.
رواه أبو جعفر ابن أبي شيبة في كتاب العرش (56) عن محمد بن عبيد المحاربيّ، حدّثنا إسماعيل بن إبراهيم التيمي، عن إبراهيم، عن الوليد بن عتبة، عن سلمان من قوله.
وإسماعيل بن إبراهيم التيميّ هو الأحول أبو يحيى التيمي الجمهور على تضعيفه غير ابن معين قال فيه: يكتب حديثه، وضعّفه الحافظ في التقريب.
وشيخه إبراهيم هو ابن مسلم العبديّ الهجريّ، ومن طريقه رواه سعيد بن منصور في سننه قال: حدثنا أبو معاوية، عنه، عن الوليد بن عتبة، عن سلمان.
ذكره السيوطي في"تمهيد الفرش في الخصال الموجبة لظل العرش" (ص 35).
فإذا كان في طريق سعيد بن منصور إبراهيم الهجري ففي قول الحافظ في"الفتح" (2/ 144):"رواه سعيد بن منصور بإسناد حسن". فيه نظر؛ لأنّ إبراهيم الهجريّ، الجمهور مجمعون على تضعيفه وقال هو في التقريب:"لين الحديث، رفع الموقوفات".
قلت: بعض هذه الأحاديث فيها مقال كما رأيتَ، إلا أنّها تقوّى بشواهدها الصّحيحة؛ ولذا ادّعى الذهبي في كتابه"العرش" بقوله:"وقد ورد في ظلّ العرش أحاديث تبلغ التواتر".
وقد جمع الحافظ ابن حجر الأحاديث الموجبة لظل العرش في كتابه"معرفة الخصال الموصلة إلى الظلال" ولخّصه وأضاف عليه السيوطيّ في كتاب سمّاه:"تمهيد الفرش في الخصال الموجبة الظل العرش" طبع بتحقيق الأستاذ مشهور سلمان، طبع بمكتبة المنار عام 1407 هـ.
আবু কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় তাঁর এক ব্যক্তির কাছে পাওনা ছিল। তিনি তার কাছে তাগাদা দিতে আসতেন। লোকটি তাঁর কাছ থেকে লুকিয়ে থাকত। একদিন তিনি (আবু কাতাদা) এলেন। তখন একটি শিশু বেরিয়ে এলো। তিনি তাকে লোকটির ব্যাপারে জিজ্ঞাসা করলে শিশুটি বলল: হ্যাঁ, সে ঘরের ভেতরে 'খাজীরা' (এক প্রকার খাবার) খাচ্ছে। তখন তিনি তাকে ডেকে বললেন: ওহে অমুক, বেরিয়ে এসো! আমাকে জানানো হয়েছে যে তুমি এখানে আছো। তখন সে বেরিয়ে এলো। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: তুমি আমার কাছ থেকে কেন লুকিয়েছিলে? সে বলল: আমি অসচ্ছল এবং আমার কাছে (দেওয়ার মতো) কিছুই নেই। তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! তুমি কি সত্যিই অসচ্ছল? সে বলল: হ্যাঁ। তখন আবু কাতাদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কেঁদে ফেললেন এবং বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি তার ঋণগ্রস্তের উপর থেকে (চাপ) হালকা করে দেয় অথবা ঋণ মাফ করে দেয়, কিয়ামতের দিন সে আরশের ছায়ার নিচে থাকবে।”
483 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"لما قضى اللَّه الخلق كتب في كتابه فهو عنده فوق العرش: إنّ رحمتي غلبتْ غضبي".
متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3194)، ومسلم في كتاب التوبة (2751) كلاهما عن قتية بن سعيد، حدثنا المغيرة بن عبد الرحمن القرشي، عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره.
واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم نحوه، ثم رواه مسلم من حديث سفيان بن عيينة، عن أبي الزّناد ولفظه:"سبقتْ رحمتي غضبي".
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আল্লাহ্ সৃষ্টি সম্পন্ন করলেন, তখন তিনি তাঁর কিতাবে লিপিবদ্ধ করলেন, যা তাঁর নিকট আরশের উপর বিদ্যমান: নিশ্চয়ই আমার রহমত আমার ক্রোধের উপর প্রবল হয়েছে।"
484 - عن أبي هريرة، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ اللَّه حين خلق الخلق كتب بيده على نفسه: إنّ رحمتي تغلب غضبي".
حسن: رواه الترمذيّ (3543)، وابن ماجه (189، 4295) كلاهما من طريق ابن عجلان (وهو يحيى)، عن أبيه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا أحمد (9597)، وابن خزيمة في كتاب التوحيد (8، 79)، وابن حبان في صحيحه (6145)، قال الترمذيّ:"حسن صحيح".
قلت: هو حسن فقط من أجل الكلام في ابن عجلان عن أبي هريرة إلا أنه لم ينفرد به، فقد تابعه اثنان.
أحدهما: أبو رافع كما في السنة (608) لابن أبي عاصم، ولفظه:"لما قضى اللَّه الخلق كتب في كتاب عنده: غلبت -أو قال: سبقت- رحمتي غضبي، فهو عنده فوق العرش". أو كما قال.
وأبو رافع هو نفيع الصّائغ ثقة ثبت.
والثاني: أبو صالح، عن أبي هريرة، ولفظه:
"إنّ اللَّه عز وجل كتب كتابًا بيده لنفسه قبل أن يخلق السماوات والأرض، فوضعه تحت عرشه فيه: رحمتي سبقتْ غضبي".
رواه الإمام أحمد (9159) عن محمد بن سابق، حدثنا شريك، عن الأعمش، عن أبي صالح، به. وشريك هو ابن عبد اللَّه القاضي النخعيّ تُكلِّم فيه من ناحية حفظه، ولكنه توبع فتبين منه أنه لم يخلط فيه، وبهذه المتابعات ثبت قوله:"بيده". وإن كان الحديث في الصحيحين بدونه كما في باب: إنّ اللَّه كتب في كتابه:"إنّ رحمتي غلبت غضبي". وفيه أنه وضعه فوق عرشه.
قال اللغويون:"فوق" من ألفاظ الأضداد التي تستعمل في لغة العرب ويراد بها"تحت" كقوله تعالى: {إِنَّ اللَّهَ لَا يَسْتَحْيِي أَنْ يَضْرِبَ مَثَلًا مَا بَعُوضَةً فَمَا فَوْقَهَا} [سورة البقرة: 26] أي فيما دونها.
وقوله:"على نفسه".
قال ابن خزيمة:"فاللَّه جلّ وعلا أثبت في أي من كتابه أنّ له نفسًا، وكذلك بيّن على لسان نبيّه أن له نفسًا، كما أثبت النفس في كتابه وكفرت الجهمية بهذه الآي وهذه السنن، وزعم بعض جهلتهم أن اللَّه تعالى إنما أضاف النفس إليه على معنى إضافة الخلق إليه، وزعم أن نفسه غير كما خلق غيره. وهذا لا يتوهمه ذو لبٍّ وعلم فضلا عن أن يتكلّم به. قد أعلم اللَّه في محكم تنزيله أنه {كَتَبَ عَلَى نَفْسِهِ الرَّحْمَةَ} [الأنعام: 12] أفيتوهّم مسلمٌ أن اللَّه تعالى كتب على غيره الرحمة؟ وحذّر العباد نفسه أفيحل لمسلم أن يقول: إن اللَّه حذّر العباد غيره أو يتأول قوله لكليمه موسى: {وَاصْطَنَعْتُكَ لِنَفْسِي} [سورة طه: 41] فيقول: معناه واصطفيتك لغيري من المخلوق، أو يقول: أراد روح اللَّه بقوله: {وَلَا أَعْلَمُ مَا فِي نَفْسِكَ} [سورة المائدة: 116] أراد ولا أعلم ما في غيرك؟ هذا ما لا يتوهمه مسلم ولا يقوله إلا معطّل كافر". انتهى.
قال الشيخ خليل هرّاس معلقًّا على كلام ابن خزيمة:"فالنّفس ثابتهٌ للَّه عز وجل بالآيات والأحاديث المتفق عليها، فأهل الحقّ يثبتون ذلك ويمسكون عما وراءه من الخوض في حقيقتها أو كيفيتها، وينزّهون اللَّه عن مشابهة نفسه لأنفس المخلوقين، كما لا يقتضي إثباته عندهم أن يكون مركبًا من نفس وبدن، تعالى اللَّه عن ذلك". انتهى.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ যখন সৃষ্টিসমূহ সৃষ্টি করলেন, তিনি নিজ হাতে নিজের ওপর লিখে রাখলেন: 'নিশ্চয় আমার রহমত আমার ক্রোধের ওপর জয়ী হবে।'"
485 - عن حذيفة قال:"فُضِّلتْ هذه الأمّة على سائر الأمم بثلاث: جعلتْ لها الأرضُ طهورًا ومسجدًا، وجُعلت صفوفها على صفوف الملائكة". قال: كان النبيُّ صلى الله عليه وسلم يقول ذا -"وأعطيتُ هذه الآيات من آخر البقرة من كنز تحت العرش، لم
يُعطَها نبيٌّ قبلي".
قال أبو معاوية: كلّه عن النبيّ صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه الإمام أحمد (23251)، وأبو داود الطيالسيّ (418)، وابن خزيمة (264)، وعنه ابن حبان (6400)، والبزّار في البحر الزّخّار (2836، 2845)، والفريابي في فضائل القرآن (55) كلّهم من طريق أبي مالك الأشجعيّ، عن ربعي بن حراش، عن حذيفة، فذكره.
وأبو مالك اسمه سعيد بن طارق بن أشيم الأشجعيّ.
وفي رواية:"فهنّ في كنز من بيت من تحت العرش".
ومن هذا الوجه رواه أيضًا مسلمٌ في"صحيحه" (522) إلّا أنه ذكر الخصلتين الأوليين، ثم قال:"وذكر خصلة أخرى".
هكذا أبهمها ولم يُفصح عنها.
وأمّا قول الحاكم (1/ 563):"رواه مسلم من حديث أبي مالك الأشجعيّ، عن ربعي بن حراش، عن حذيفة، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"أعطيتُ خواتيم سورة البقرة من كنز تحت العرش". فوهمٌ منه؛ لأنّ مسلمًا لم يصرِّح به كما ذكرته.
হুযাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এই উম্মতকে অন্যান্য উম্মতের উপর তিনটি বিষয় দ্বারা শ্রেষ্ঠত্ব দেওয়া হয়েছে: তাদের জন্য যমিনকে পবিত্রতা অর্জনের মাধ্যম (পবিত্রকারী) ও মসজিদ বানানো হয়েছে এবং তাদের কাতারসমূহকে ফিরিশতাদের কাতারসমূহের মতো করা হয়েছে। (তিনি [হুযাইফা] বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম এইগুলো বলতেন) - "আর আমাকে সূরা আল-বাকারার শেষাংশের এই আয়াতগুলো আরশের নিচের ভাণ্ডার থেকে দেওয়া হয়েছে, যা আমার পূর্বে কোনো নবীকে দেওয়া হয়নি।" আবু মুআবিয়া বলেন, এই সমস্ত কথাই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে বর্ণিত।
486 - عن عقبة بن عامر الجهنيّ قال: قال لي رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"اقرإِ الآيتين من آخر سورة البقرة، فإنّي أُعطيتُهما من تحت العرش".
حسن: رواه الإمام أحمد (17324) عن إسحاق بن إبراهيم الرّازيّ، حدّثنا سلمة بن الفضل، قال: حدّثني محمد بن إسحاق، عن يزيد بن أبي حبيب، عن مرثد بن عبد اللَّه، عن عقبة بن عامر، فذكره.
ومحمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن، ومن هذا الطّريق رواه أبو يعلى (1735)، والطبراني في"الكبير" (17/ رقم 780).
ومحمد بن إسحاق توبع في رواية، رواها الإمام أحمد (17445) عن يحيى بن إسحاق، عن ابن لهيعة، عن يزيد، عن أبي الخير، عن عقبة بن عامر، فذكر الحديث مثله.
وأبو الخير هو مرثد بن عبد اللَّه، وابن لهيعة فيه كلام معروف، ولكن روى عنه قتيبة بن سعيد، وروايته عنه صالحة.
ومن طريقه رواه الفريابي في فضائل القرآن (51).
উকবাহ ইবন আমির আল-জুহানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "সূরা বাকারার শেষের দুটি আয়াত পাঠ করো। কেননা আমাকে সেগুলো আরশের নিচ থেকে দেওয়া হয়েছে।"
487 - عن أبي ذرّ قال: قال رسولُ اللَّه صلى الله عليه وسلم:"أُعطيتُ خواتيم سورة البقرة من بيت كنز من تحت العرش، لم يعطهنَّ نبيٌّ قبلي".
حسن: رواه ابن مردويه من طريق سفيان الثوريّ، عن منصور، عن ربعي بن حراش، عن زيد ابن ظبيان، عن أبي ذرّ، فذكره.
أورده ابنُ كثير في تفسيره (1/ 506).
وزيد بن ظبيان"مقبول" كما في التقريب، وهو كذلك لأنه توبع.
لأنه رواه الإمام أحمد أيضًا (21345) من طريق شيبان، عن منصور، عن ربعي، عن خرشة بن الحرّ -أو المعرور بن سويد- عن أبي ذرّ، فذكره.
وخرشة بن الحرّ، والمعرور بن سويد ثقتان، وفي بعض الروايات"و" بدل"أو" وفي أخرى:"عن خرشة بن الحر، عن المعرور بن سويد". وهذا تصحيف.
ولا يضر ما رواه جرير، عن منصور بإسناده عمّن حدثه عن أبي ذر - وعنه رواه الإمام أحمد (21343) فمن صرّح حجّة على من لم يصرِّح.
ورواه الحاكم (1/ 562) من وجه آخر عن عبد اللَّه بن صالح المصريّ، قال: أخبرني معاوية بن صالح، عن أبي الزّاهرية، عن جبير بن نفير، عن أبي ذرّ، أنّ رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ اللَّه ختم سورة البقرة بآيتين أعطانيهما من كنزه الذي تحت العرش، فتعلموهنّ وعلّموهنّ نساءكم وأبناءكم فإنّها صلاة وقرآن ودعاء".
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط البخاريّ".
وتعقبه الذهبي فقال:"معاوية لم يحتج به البخاريّ".
وفيه عبد اللَّه بن صالح المصريّ كاتب الليث مختلف فيه غير أنه حسن الحديث في المتابعات والشواهد كما هنا.
ورُوي عن ابن مسعود موقوفًا عليه.
والجماعة على أن من المخلوقات ما لا يعدم ولا يفنى بالكلية، كالجنة والنار، والعرش وغير ذلك. ولم يقل بفناء جميع المخلوقات إلا طائفة من أهل الكلام المبتدعين، كالجهم بن صفوان ومن وافقه من المعتزلة ونحوهم، وهذا قول باطل يخالف كتاب اللَّه، وسنة رسوله، وإجماع سلف الأمة وأئمتها، كما في ذلك من الدلالة على بقاء الجنة وأهلها، وبقاء غير ذلك مما لا تتسع هذه الورقة لذكره. وقد استدل طوائف من أهل الكلام والمتفلسفة على امتناع فناء جميع المخلوقات بأدلة عقلية. واللَّه أعلم". الفتاوى
আবূ যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমাকে সূরা বাকারার শেষ আয়াতগুলো আরশের নিচে অবস্থিত একটি গুপ্ত ভান্ডার থেকে প্রদান করা হয়েছে। আমার পূর্বে কোনো নবীকে তা দেওয়া হয়নি।"
488 - عن النعمان بن بشير قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"إنّ مما تذكرون من جَلال اللَّه: التسبيح، والتهليل، والتحميد ينعطفن حول العرش، لهنّ دويٌّ كدويّ النّحل، تُذكِّر صاحبها. أما يحبُّ أحدكم أن يكون له، أو لا يزال له من يُذَكِّرُ به".
صحيح: رواه ابن ماجه (3809) عن أبي بشر بكر بن خلف، قال: حدثني يحيى بن سعيد، عن موسى بن أبي عيسى الطّحان، عن عون بن عبد اللَّه، عن أبيه، أو أخيه، عن النعمان بن بشير، فذكره.
وإسناده صحيح، وقد اختلف في تعيين موسى بن أبي عيسى الطّحان من هو؟ :
فقيل: هو موسى بن مسلم أبو عيسى الطّحان الكوفيّ، كما في رواية ابن ماجه وفي إحدى طريقي الطبراني في الدّعاء (1693) والإمام أحمد (18363) روى عنه يحيى بن سعيد، وكذلك روى عنه عبد اللَّه بن نمير، وعنه رواه ابن أبي شيبة (10/ 298).
وهو الطّريق الثالث عند الطبرانيّ في كتاب الدعاء (1693) إلا أنه قال:"عن موسى الجهني".
وموسى بن مسلم أبو عيسى ثقة، وثقه ابن معين، وقال أحمد: لا بأس به، وذكره ابن حبان في"الثقات" (7/ 455).
وأما قول الطبرانيّ: موسى الجهنيّ، فلم أقف على من قال ذلك وإنما قالوا: موسى بن مسلم الحزاميّ، ويقال: الشّيبانيّ أبو عيسى الكوفيّ الطّحان المعروف بموسى الصّغير.
ورواه الحاكم (1/ 500) من طريق عبد اللَّه بن نمير فقال:"عن موسى بن سالم، عن عون بن عبد اللَّه بن عتبة، عن أبيه، عن النعمان". وقال:"صحيح الإسناد". وتعقبه الذهبي فقال:"موسى ابن سالم قال فيه أبو حاتم: منكر الحديث".
قلت: خالف الحاكمُ جميع الرّواة فقال: موسى بن سالم فإن كان هو أبو جهضم مولى آل العباس بن عبد المطلب فإنه لم يذكر من رواته عبد اللَّه بن نمير كما لم يذكر من شيوخه عون بن عبد اللَّه بن عتبة إلا أنه ثقة أيضًا، وثقه أبو زرعة، وقال أبو حاتم: صالح الحديث صدوق. الجرح والتعديل (8/ 143).
وأما قول الذهبي: موسى بن سالم قال فيه أبو حاتم:"منكر الحديث". الميزان (4/ 205). فهو وهم منه مع أنه نقل كلام أبي حاتم في موسى بن سالم أبو جهضم العباس مولاهم بأنه"صدوق" وقال في نسخة من كتابه"الميزان":"وليس في كتاب أبي حاتم موسى بن سالم سوى واحد، وهو أبو جهضم مولى آل العباس، وقد وثقه أحمد وأبو زرعة، وقال أبو حاتم: صالح الحديث". انتهى.
وقوله:"ينعطفن"، وفي رواية الإمام أحمد:"يتعاطفن" أي يتعاطف تسبيحهم وتحميدهم، فهذا الضمير يقوم مقام العائد إلى الموصول الذي هو المبتدأ، ومثله قوله تعالى: {وَالَّذِينَ يُتَوَفَّوْنَ مِنْكُمْ وَيَذَرُونَ أَزْوَاجًا يَتَرَبَّصْنَ} [سورة البقرة: 234] أي أزواجهم، والمراد: تمثيل هذه الكلمات التي هي التسبيح وغيره، وهذا مبني على تشكل الأعمال والمعاني بأشكال، وهذا مما يدل عليه أحاديث كثيرة. قاله السنديّ.
والخلاصة أن الذي يظهر أن الصّحيح في إسناد هذا الحديث هو موسى بن مسلم أبو عيسى الطحان، ومن قال: موسى بن سالم أو موسى بن عبد اللَّه فقد وهم، واللَّه تعالى أعلم.
رواه البزّار - كشف الأستار (39) عن الفضل بن سهل، ثنا يحيى بن أبي بُكير، ثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن عبد اللَّه بن خليفة، عن عمر، فذكره.
ورواه ابنُ أبي عاصم في السنة (574)، والضياء المقدسيّ في المختارة (151)، وأبو يعلى الموصليّ في مسنده كما قال ابن كثير في"تفسيره" كلّهم من طريق يحيى بن أبي بكير، بإسناده، مثله.
قال البزّار: هذا لا نعلم أحدًا رواه من الصحابة رفعه إلا عمر، وقفه الثوريّ على عمر، وعبد اللَّه بن خليفة لم يرو عنه إلا أبو إسحاق، وقد رُوي عن جبير بن مطعم بغير لفظه". انتهى.
وقال الحافظ ابن كثير:"وعبد اللَّه بن خليفة، وليس بذاك المشهور، وفي سماعه من عمر نظر، ثم منهم من يرويه عنه، عن عمر موقوفًا، ومنهم من يرويه عنه مرسلًا، ومنهم من يزيد في متنه زيادة غريبة، ومنهم من يحذفها". انتهى.
قلت: وهو كما قال؛ فقد رواه ابن جرير في تفسيره عن عبد اللَّه بن أبي زياد القطوانيّ، قال: حدثنا عبد اللَّه بن موسى، قال: أخبرنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن عبد اللَّه بن خليفة، قال: أتت امرأة النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقالت: ادعُ اللَّه أن يدخلني الجنّة. فعظّم الرّبُّ عز وجل ثم قال:"إنّ كرسيَّه وسع السماوات والأرض وإنّه لينتقد عليه، فما يفضل منه مقدار أربع أصابع". ثم قال بأصابعه فجمعها:"وإن له أطيطًا كأطيط الرّحل الجديد إذا رُكب من ثقله".
فهذا مرسل، وفي متنه زيادة غريبة كما قال ابن كثير: وهي منكرة.
وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع" (1/ 83 - 84):"رواه البزّار ورجاله رجال الصّحيح". فهو ليس كما قال؛ فإنّ عبد اللَّه بن خليفة هو الهمدانيّ ليس من رجال الصحيح، وإنّما روي له ابن ماجه في تفسيره كما رمز له الحافظ في التقريب، ثم هو لم يوثقه أحدٌ، وإنما ذكره ابن حبان في"الثقات" (5/ 28) ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول". أي إذا توبع، ولم أجد له متابعًا فهو ليّن الحديث.
وكذلك لا يصح أيضًا ما روي عن أبي ذرّ، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"يا أبا ذر ما السّماوات عند الكرسيّ إلّا كحلقة ملقاة بأرض فلاة، وفضل العرش على الكرسي كفضل الفلاة على الحلقة".
رواه ابن حبان (361)، وأبو الشيخ في العظمة (259)، والبيهقي في الأسماء والصفات (862)، وأبو نعيم في الحلية (1/ 166 - 167) كلّهم من طريق إبراهيم بن هشام بن يحيى بن يحيى الغسّانيّ، حدثني أبي، عن جدي، عن أبي إدريس الخولانيّ، عن أبي ذر، فذكر الحديث مختصرًا ومطوّلًا.
وقد تمّ تخريجه مطوّلًا في جموع الإيمان بالأنبياء والرسل - باب ما جاء في عدد الأنبياء.
وهذا إسناد ضعيف جدًّا؛ فإن إبراهيم بن هشام الغسّانيّ متروك، كذّبه أبو حاتم وأبو زرعة كما نقل عنهما الذهبي في"الميزان".
وله إسناد آخر رواه محمد بن عثمان بن أبي شيبة في كتاب"العرش" (58) من طريق المختار
ابن غسان العبدي، عن إسماعيل بن مسلم، عن أبي إدريس الخولانيّ، عن أبي ذرّ، فذكره.
وإسماعيل بن مسلم هو المكي، ضعيف عند جمهور أهل العلم.
والمختار بن غسان العبدي من رجال ابن ماجه، وهو على شرط ابن حبان، ولكنه لم يذكره في الثقات. وقد روى عنه عدد، ولم يؤثر فيه توثيق أحد، قال فيه الحافظ في"التقريب":"مقبول". أي إذا توبع وإلا فليّن الحديث.
وله إسناد آخر رواه البيهقيّ في الأسماء والصفات (861) من طريق الحسن بن عرفة العبديّ: ثنا يحيى بن سعيد السعدي البصريّ: ثنا عبد الملك بن جريج، عن عطاء، عن عبيد بن عمير اللّيثيّ، عن أبي ذرّ، فذكر الحديث نحوه.
قال البيهقيّ: تفرّد به يحيى بن سعيد السعديّ، وله شاهد بإسناد أصحّ".
وهو يقصد به إسناد إبراهيم بن هشام بن يحيى بن يحيى الغساني كما سبق، وأنه ليس بأصح من إسناد يحيى بن سعيد السعديّ.
ويحيى بن سعيد السعديّ هذا ذكره العقيليّ في كتابه"الضعفاء" (4/ 403) وقال:"عن ابن جريج، لا يتابع على حديثه، وليس بمشهور بالنقل". ولعله يقصد هذا الحديث.
وقال ابن حبان في المجروحين (3/ 129):"يروي المقلوبات والملزقات، لا يجوز الاحتجاج به إذا انفرد".
وترجم له ابنُ عدي في"الكامل" (7/ 2699) وذكر طرفًا من هذا الحديث وقال:"وهذا حديث منكر من هذا الطريق عن ابن جريج، عن عطاء. . .".
وقال أبو نعيم: تفرّد به عن ابن جريج يحيى بن سعيد العبشميّ.
وللحديث طرق أخرى لا يسلم منها من مقال.
والخلاصة: أنه لم يثبتْ شيءٌ مرفوعٌ عن النبيِّ صلى الله عليه وسلم في صفة الكرسي، وما جاء عن بعض السّلف أنّه العلم أو هو العرش نفسه فلا دليل عليه، والصّحيح أنه موضع القدمين وهو الثابت عن حبر هذه الأمة عبد اللَّه بن عباس رضي الله عنهما ولا نعلم له مخالفًا من الصّحابة، وقد تلقّاه جمهور أهل العلم من السلف والخلف بالقبول والتسليم، واللَّه تعالى أعلم.
انظر للمزيد: فتاوي شيخ الإسلام ابن تيمية (5/ 75)، وشرح العقيدة الطّحاوية (ص 277).
নোমান ইবনে বশীর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ্র মহিমা ও শ্রেষ্ঠত্বের যে সমস্ত যিকির তোমরা করে থাকো—যেমন: তাসবীহ (সুবহানাল্লাহ), তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ) ও তাহমীদ (আলহামদুলিল্লাহ)—এগুলো আরশের চারদিকে আবর্তন করে। এগুলোর আওয়াজ মৌমাছির গুঞ্জনের মতো, যা এর পাঠকারীকে (আল্লাহ্র কাছে) স্মরণ করিয়ে দেয়। তোমাদের কেউ কি পছন্দ করে না যে, তার জন্য এমন কেউ থাকুক, অথবা সর্বদা এমন কেউ থাকুক, যে তাকে (আল্লাহ্র কাছে) স্মরণ করিয়ে দেবে?"
489 - عن عائشة، قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"خُلقتِ الملائكة من نور، وخلق الجان من مارج من نار، وخلق آدم مما وُصف لكم".
صحيح: رواه مسلم في الزّهد (2996) من طرق عن عبد الرّزاق وهو في مصنفه (20904) عن معمر، عن الزّهريّ، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
وما رواه أبو الشيخ في العظمة (315) عن عبد اللَّه بن عمرو، وزاد فيه:"من نور الصّدر والذّراعين". فهو ضعيف، أو منقطع أو موقوف، وإن صحّ عن عبد اللَّه بن عمرو فيحمل على أنه وجد هكذا في كتب الأوائل؛ لأنّه كان ينظر فيها، لأنّ الصّحيح الثابت عن عروة، عن عائشة هو ما ذكرته.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "ফেরেশতাদের সৃষ্টি করা হয়েছে নূর (আলো) থেকে, জিনদের সৃষ্টি করা হয়েছে আগুনের শিখা থেকে এবং আদমকে সৃষ্টি করা হয়েছে সেই জিনিস থেকে যা তোমাদের কাছে বর্ণনা করা হয়েছে।"
490 - عن مالك بن صعصعة قال (فذكر حديث الإسراء والمعراج) وجاء فيه:"فأتينا السماء السّابعة فأتيتُ على إبراهيم، فسلّمتُ عليه فقال: مرحبًا بك من ابنٍ ونبيٍّ، فرُفع لي البيت المعمور، فسألت جبريل، فقال: هذا البيتُ المعمور يصلي فيه كلّ يوم سبعون ألف ملك، إذا خرجوا لم يعودوا إليه آخر ما عليهم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3207)، ومسلم في الإيمان (164) كلاهما من طريق سعيد، حدثنا قتادة، حدثنا أنس بن مالك، عن مالك بن صعصعة، فذكر الحديث بطوله، وهو سيأتي في موضعه كاملًا.
মালিক ইবনু সা‘সা‘আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ইসরা ও মি‘রাজের হাদিস বর্ণনা করলেন। তাতে এসেছে: "অতঃপর আমরা সপ্তম আকাশে পৌঁছলাম। আমি ইব্রাহীম (আলাইহিস সালাম)-এর কাছে আসলাম এবং তাঁকে সালাম দিলাম। তিনি বললেন: সুস্বাগতম হে পুত্র এবং নবী! এরপর আমার জন্য 'আল-বাইতুল মা‘মুর' উঠিয়ে ধরা হলো। আমি জিবরীলকে (আলাইহিস সালাম) জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: এটি হলো আল-বাইতুল মা‘মুর। এখানে প্রতিদিন সত্তর হাজার ফিরিশতা সালাত আদায় করেন। একবার তারা এখান থেকে বের হলে তাদের সর্বশেষ পালা হিসেবে আর ফিরে আসেন না।"
491 - عن عبد اللَّه بن مسعود قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يُؤتي بجهنّم يومئذ لها سبعون ألف زمام، مع كلِّ زمام سبعون ألف ملك يجرونها".
صحيح: رواه مسلم في كتاب الجنة (2842) عن عمر بن حفص بن غياث: حدثنا أبي، عن العلاء بن خالد الكاهليّ، عن شقيق، عن عبد اللَّه، فذكره.
ورواه الترمذيّ (2573) عن شيخه عبد اللَّه بن عبد الرحمن، عن عمر بن حفص بن غياث، به، مثله.
وقال: قال عبد اللَّه (أي شيخه): والثوريّ لا يرفعه.
قلت: وهذا الحديث مما استدركه أيضًا الدّارقطنيّ على مسلم وقال: رفعه وهم، رواه الثوريّ ومروان وغيرهما عن العلاء بن خالد موقوفًا.
قال النّوويّ:"حفص ثقة حافظ إمام، فزيادته مقبولة كما سبق نقله عن الأكثرين والمحقّقين".
আবদুল্লাহ ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কেয়ামতের দিন জাহান্নামকে এমন অবস্থায় আনা হবে যে, তার সত্তর হাজার লাগাম থাকবে। প্রতিটি লাগামের সাথে সত্তর হাজার ফেরেশতা থাকবে, যারা সেগুলোকে টেনে আনবে।
492 - عن مالك بن صعصعة قال (فذكر حديث الإسراء والمعراج) وجاء فيه:"فأتينا السّماء السّابعة. . . فأتيتُ إبراهيم، فسلّمتُ عليه فقال: مرحبًا بك من ابنٍ ونبيٍّ، فرُفع لي البيت المعمور، فسألت جبريل، فقال: هذا البيتُ المعمور يصلي فيه كلّ يوم سبعون ألف ملك، إذا خرجوا لم يعودوا إليه آخر ما عليهم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3207)، ومسلم في الإيمان (164) كلاهما من طريق سعيد، حدثنا قتادة، حدثنا أنس بن مالك، عن مالك بن صعصعة، فذكر الحديث بطوله.
মালিক বিন সা'সা'আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তিনি ইসরা ও মি’রাজের হাদিস বর্ণনা করলেন, তাতে এসেছে): আমরা সপ্তম আকাশে পৌঁছলাম... আমি ইবরাহীম (আঃ)-এর কাছে গেলাম এবং তাঁকে সালাম দিলাম। তিনি বললেন: পুত্র এবং নবী হিসাবে তোমাকে স্বাগতম। এরপর আমার জন্য বাইতুল মা‘মুর উন্মোচিত হলো। আমি জিবরীলকে এ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম। তিনি বললেন: এটি হলো বাইতুল মা‘মুর। এখানে প্রতিদিন সত্তর হাজার ফেরেশতা সালাত আদায় করেন। একবার যারা বের হয়ে যায়, তাদের জন্য আর কখনও সেখানে ফিরে আসার সুযোগ থাকে না।
493 - عن حكيم بن حزام، قال: بينما رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم في أصحابه إذ قال لهم:"تسمعون ما أسمع؟". قالوا: ما نسمع من شيء! قال:"إنّي لأسمعُ أطيطَ السّماء وما تُلامُ أن تثطّ، وما فيها موضع شبر إلّا وعليه ملك ساجد أو قائم".
حسن: رواه الطبرانيّ في"الكبير" (3/ 224 - 225) من طريق عبد الوهاب بن عطاء، ثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن صفوان بن محرز، عن حكيم بن حزام، فذكر الحديث.
ومن هذا الطّريق رواه ابن نصر المروزيّ في"تعظيم قدر الصّلاة" (1/ 258)، وأبو الشيخ في"العظمة" (3/ 986).
وإسناده حسن لأجل عبد الوهاب بن عطاء -وهو الخفاف أبو نصر وهو وإن كان من رجال
مسلم فقد تكلّم فيه بعض النّقاد.
فقال البخاريّ ليس بالقوي عندهم، وقال النسائي: ليس بالقوي، ومشاه الآخرون فقال ابن معين: لا بأس به، وقال أبو حاتم: يكتب حديثه محله الصّدق، وقال ابن سعد: كان صدوقًا. ومثله يحسّن حديثه.
وسعيد بن أبي عروبة قد اختلط بآخره إلا أن عبد الوهّاب بن عطاء سمع منه قبل اختلاطه.
أما ما رُوي عن أبي ذرّ، عن رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم: أنه قال:"إني أرى ما لا ترون، وأسمع ما لا تسمعون، إنّ السماء أطَّتْ وحّق لها أن تئِطَّ، ما فيها موضع أربع أصابع إلّا وملك واضع جبهته ساجدًا للَّه، واللَّه لو تعلمون ما أعلم لضحكتم قليلًا، ولبكيتم كثيرًا، وما تلذذتم بالنساء على الفرشان، ولخرجتم إلى الصُّعدات تجأرون إلى اللَّه". واللَّه لوددتُ أني كنتُ شجرة تعضد فهو منقطع.
رواه الترمذيّ (2312)، وابن ماجه (4190) كلاهما من طريق إسرائيل، عن إبراهيم بن مهاجر، عن مجاهد، عن مورّق العجليّ، عن أبي ذرّ، فذكره.
ورواه الحاكم (4/ 579) وصحّحه على شرط الشيخين وأقرّه الذّهبي.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (21516) من هذا الوجه وقال في آخر الحديث: قال أبو ذرّ:"واللَّه لوددتُ أني شجرة تُعضد". فظهر من صنيعه أن هذا الخبر من الحديث مدرج من قول أبي ذر.
وإسناده ضعيف؛ لأجل الانقطاع بين مورّق العجلي وأبي ذرّ.
قال أبو زرعة: مورّق العجلي لم يسمع من أبي ذرّ. انظر: المراسيل لابن أبي حاتم (216)، وجامع التحصيل (288) وكذلك قال الدّارقطني وغيره.
وأما إبراهيم بن مهاجر فهو صدوق في حديثه لين.
أخرجه مسلم في المتابعات.
وكذلك ما روى محمد بن نصر المروزيّ في"تعظيم قدر الصّلاة" (1/ 260)، وأبو الشيخ في"العظمة" (3/ 984) من طريق أبي معاذ الفضل بن خالد النّحويّ، قال: حدّثنا عبيد بن سليمان الباهليّ، قال: سمعتُ الضّحاك بن مزاحم يحدّث عن مسروق بن الأجدع، عن عائشة أنّها قالت: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ما في السّماء الدّنيا موضع قدم إلّا عليه ملك ساجد، أو قائم، وذلك قول الملائكة: {وَمَا مِنَّا إِلَّا لَهُ مَقَامٌ مَعْلُومٌ (164) وَإِنَّا لَنَحْنُ الصَّافُّونَ (165) وَإِنَّا لَنَحْنُ الْمُسَبِّحُونَ} [سورة الصّافات: 164 - 166]".
وفي الإسناد الفضل بن خالد أبو معاذ النّحويّ ذكره ابنُ أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (7/ 61) وقال: روى عنه محمد بن علي بن الحسن بن شقيق، وعبد العزيز بن منيب أبو الدّرداء قال: سمعت أبي يقول ذلك".
ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا فهو في عداد المجهولين وهو على شرط ابن حبان ومع ذلك لم
يذكره في الثّقات.
وقد رُوي عن ابن مسعود موقوفًا من وجه ضعيف. انظر:"مجمع الزوائد" (7/ 98)، ومن وجه صحيح. انظر:"تعظيم قدر الصّلاة" (1/ 260)، وقال ابن كثير في تفسيره (7/ 38)، وكذا قال سعيد بن جبير.
قلت: أثر سعيد بن جبير رواه أبو الشيخ في"العظمة" (3/ 982) من وجه ضعيف مع الانقطاع.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن جابر بن عبد اللَّه مرفوعًا:"ما في السّماوات السّبع موضع قدم، ولا شبر ولا كف إلّا وفيه ملك قائم، أو ملك راكع، أو ملك ساجد، فإذا كان يوم القيامة قالوا جميعًا: سبحانك ما عبدناك حقّ عبادتك إلا أنّا لم نشرك بك شيئًا".
رواه الطّبرانيّ في الكبير (2/ 200) عن خير بن عرفة، ثنا عروة، ثنا عبيد اللَّه بن عمرو، عن عبد الكريم بن مالك، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر بن عبد اللَّه، فذكر الحديث.
قال الهيثميّ في"المجمع" (1/ 52):"وفيه عروة بن مروان" هكذا قال، وسكت عن الكلام فيه.
وعروة بن مروان هذا وهو: العرقي -ترجمه الحافظ في اللّسان- وقال:
"وعرقة قرية من عمل طرابلس الشّام، أبو عبد اللَّه حدّث بمصر عن جماعة سمّاها ومنهم: عبيد اللَّه بن عمرو، روى عنه جماعة (سماها منهم) خبر بن عرقة، كان الدارقطني يقول: كان أميًّا ليس بالقوي في الحديث. وقال ابن يونس: حدّثني أبي عن أبيه، قال: ما رأيت أشدّ تقشّفًا من عروة العرقيّ، وكان محققا شديد الحمل على نفسه ضيق الكم، ما يقدر أن يخرج يده منه إلّا بعد جهد. كان يجمع النبات ويبيعه ويتقوّت به". انتهى ملخصًا.
وكذلك ما رُوي عن العلاء بن سعد -وقد شهد الفتح وما بعدها-، أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال يومًا لجلسائه:"هل تسمعون ما أسمع؟" قالوا: وما تسمع يا رسول اللَّه؟ قال:"أطّت السّماء، وحقّ لها أن تئطّ، إنّه ليس فيها موضع قدم إلا وعليه ملك قائم، أو راكع، أو ساجد. وقالت الملائكة: {وَإِنَّا لَنَحْنُ الصَّافُّونَ (165) وَإِنَّا لَنَحْنُ الْمُسَبِّحُونَ} [سورة الصافات: 165 - 166]".
رواه محمد بن نصر المروزيّ (1/ 261) عن أحمد بن سيار، قال: حدثنا أبو جعفر محمد بن خالد الدّمشقيّ المعروف بابن أمه، قال: حدّثني المغيرة بن عثمان بن عطية -من بني عمرو بن عوف- قال: حدثني سليمان بن أيوب -من بني سالم بن عوف-، قال: حدثني عطاء بن يزيد بن مسعود -من بني الحبلي- قال: حدثني سليمان بن عمرو بن الرّبيع -من بني سالم- قال: حدثني عبد الرحمن بن العلاء -من بني ساعدة- عن ايه العلاء بن سعد، فذكره.
وفيه رجال لم أقف على تراجمهم.
হাকীম ইবনু হিযাম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একবার রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সাহাবীদের মাঝে ছিলেন। তিনি তাঁদেরকে জিজ্ঞেস করলেন, "তোমরা কি শুনতে পাচ্ছো যা আমি শুনতে পাচ্ছি?" তাঁরা বললেন, আমরা কিছুই শুনতে পাচ্ছি না! তিনি বললেন, "আমি আসমানের বিকট আওয়াজ শুনতে পাচ্ছি (বোঝা যাচ্ছে আসমান যেন ভারে নুয়ে পড়ছে)। বিকট শব্দ করা তার জন্য অস্বাভাবিক নয়, তাতে এক বিঘত পরিমাণ জায়গাও খালি নেই, যেখানে কোনো ফেরেশতা সিজদা করা অবস্থায় অথবা দাঁড়িয়ে নেই।"
494 - عن وعن أبي هريرة قال: قال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"يتعاقبون فيكم ملائكةٌ باللّيل،
وملائكةٌ بالنّهار، ويجتمعون في صلاة العصر، وصلاة الفجر. ثم يُعرج الذين باتوا فيكم، فيسألهم -وهو أعلم بهم-: كيف تركتم عبادي؟ فيقولون: تركناهم وهم يصلّون، وأتيناهم وهم يُصلّون".
متفق عليه: رواه مالك في قصر الصّلاة (82) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
ورواه البخاريّ في المواقيت (555) عن عبد اللَّه بن يوسف، ومسلم في المساجد (632) عن يحيى بن يحيى - كلاهما عن مالك، به، مثله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমাদের মধ্যে পালাক্রমে রাতের ফিরিশতা এবং দিনের ফিরিশতাগণ আগমন করে। তাঁরা আসরের সালাত এবং ফজরের সালাতের সময় একত্রিত হন। অতঃপর তোমাদের মাঝে যাঁরা রাত্রি যাপন করেন তাঁরা উপরে উঠে যান। তখন আল্লাহ্ তা‘আলা তাঁদেরকে জিজ্ঞেস করেন—যদিও তিনি তাঁদের সম্পর্কে সর্বাধিক অবগত—'তোমরা আমার বান্দাদেরকে কোন অবস্থায় ছেড়ে এসেছ?' তখন তাঁরা বলেন, 'আমরা তাঁদেরকে সালাতরত অবস্থায় ছেড়ে এসেছি এবং আমরা তাঁদের কাছে যখন গিয়েছিলাম তখনও তাঁরা সালাতরত ছিলেন'।"
495 - عن عائشة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أنّها سمعتْ رسولَ اللَّه صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ الملائكةَ تنزلُ في العنان -وهو السّحاب- فتذكر الأمرَ قُضي في السّماء، فتسترق الشّياطينُ السّمعَ، فتسمعه فتوحيه إلى الكُهّان فيكذبون منها مائة كذبة من عند أنفسهم".
صحيح: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3210) حدّثنا محمد، حدّثنا ابن أبي مريم: أخبرنا اللّيث: حدّثنا ابن أبي جعفر، عن محمد بن عبد الرحمن، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته.
قوله:"حدّثنا محمد" رجّح الحافظ ابن حجر أن يكون محمد هو البخاريّ نفسه.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছেন: "নিশ্চয়ই ফেরেশতারা 'আনান'-এ (যা মেঘ) নেমে আসেন। অতঃপর তারা আসমানে যা ফয়সালা করা হয়েছে তা আলোচনা করেন। তখন শয়তানরা লুকিয়ে তা শুনতে চেষ্টা করে (কান পাতে), অতঃপর তারা তা শুনতে পায় এবং গণকদের কাছে তা ওহী (বা বার্তা) আকারে পৌঁছে দেয়। তখন তারা (গণকরা) এর সাথে নিজেদের পক্ষ থেকে একশোটি মিথ্যা যোগ করে।"
496 - عن أبي هريرة، عن النّبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إذا قضى اللَّه الأمر في السّماء ضربت الملائكةُ بأجنحتها خُضعانًا لقوله كالسِّلسلةِ على صفوان -قال عليٌّ: وقال غيره: صفوان ينفذهم ذلك- فإذا فُزِّعَ عن قلوبهم، قالوا: ماذا قال ربُّكم؟ قالوا: للذي قال الحقّ وهو العليُّ الكبيرُ، فيسمعُها مسترقُو السَّمع ومسترقو السّمع هكذا واحدٌ فوق آخر -ووصف سفيانُ بيده وفرَّج بين أصابع يده اليمنى نصبها بعضها فوق بعض- فربّما أدرك الشِّهابُ المستمع قبل أن يرمي بها إلى صاحبه فيُحرقَه، وربّما لم يدركه حتى يرمي بها إلى الذي يليه إلى الذي هو أسفل منه، حتّى يلقوها إلى الأرض -وربّما قال سفيان: حتى تنتهي إلى الأرض- فتُلقى على فَم السّاحر فيكذبُ معها مائةَ كَذْبةٍ فيصدُقُ فيقولون: ألَمْ يُخْبرْنا يوم كذا وكذا، يكون كذا وكذا فوجدناه حقًّا للكلمة التي سُمعت من السّماء".
حدّثنا علي بن عبد اللَّه: حدّثنا سفيان: حدّثنا عمرو عن عكرمة، عن أبي هريرة:"إذا قضى اللَّه الأمر". وزاد:"والكاهن".
وحدّثنا سفيان فقال: قال عمرو: سمعت عكرمة: حدّثنا أبو هريرة قال:"إذا
قضى اللَّه الأمر". وقال:"على فم السّاحر".
قلت لسفيان: أأنت سمعت عمرًا، قال: سمعت عكرمة قال: سمعت أبا هريرة؟ قال: نعم. قلت لسفيان: إن إنسانا روى عنك، عن عمرو عن عكرمة، عن أبي هريرة ويرفعه أنه قرأ: (فُرِّغ)؟ ! قال سفيان: هكذا قرأ عمرو فلا أدري سمعه هكذا أم لا؟ قال سفيان: وهي قراءَتُنا.
صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4701) عن علي بن عبد اللَّه، حدّثنا سفيان، عن عمرو، عن عكرمة، عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন আল্লাহ্ আসমানে কোনো কাজের ফায়সালা করেন, তখন মালাকগণ তাঁর কথার প্রতি বশ্যতা প্রকাশ করতে গিয়ে তাদের ডানা দিয়ে আঘাত করতে থাকেন। এই শব্দ মসৃণ পাথরের উপর শিকলের (টানার) শব্দের মতো শোনা যায়। [আলী (ইবনু আব্দুল্লাহ) বলেন, এবং অন্যেরা বলেছেন: সাফওয়ান (মসৃণ পাথর) এমন যে, সেই আওয়াজ তাদের ভেতর দিয়ে প্রবেশ করে।] যখন তাদের অন্তর থেকে ভয় দূর হয়ে যায়, তখন তারা (মালাকগণ) বলে: 'তোমাদের প্রতিপালক কী বললেন?' তারা (অন্য মালাকগণ) বলে: 'তিনি সত্য কথাই বলেছেন, আর তিনি হলেন সুউচ্চ, মহামহিম (আল-‘আলিয়্যুল কাবীর)।' তখন সেই কথা চুরি করে শুনতে থাকে কিছু শ্রবণকারী (জ্বিন)। আর এই শ্রবণকারীরা একজন আরেকজনের উপর এভাবে থাকে – (রাবী) সুফিয়ান তাঁর ডান হাতের আঙুলগুলো ফাঁকা করে একের ওপর আরেকটা খাড়া করে এভাবে বর্ণনা করলেন। অনেক সময় তাদের দিকে নিক্ষিপ্ত অগ্নিশিখা (উল্কাপিন্ড) সেই শ্রবণকারীকে তার সাথীর কাছে কথা পৌঁছানোর আগেই ধরে ফেলে এবং তাকে জ্বালিয়ে দেয়। আবার কখনো তাকে ধরতে পারে না, ফলে সে তার নিচের জনকে কথাটি পৌঁছে দেয়, এরপর তার নিচের জনকে, এভাবে তারা কথাটি পৃথিবীতে নিক্ষেপ করে। – (সুফিয়ান কখনো কখনো বলেছেন: যতক্ষণ না তা পৃথিবীতে পৌঁছে যায়)। এরপর তা কোনো যাদুকরের মুখে পতিত হয়। সে সেই কথার সাথে একশত মিথ্যা যোগ করে। (কিন্তু যেহেতু মূল শব্দটি সত্য) তাই সে কখনো সত্য প্রমাণিত হয়। ফলে লোকেরা বলে: 'অমুক অমুক দিনে কি সে আমাদেরকে অমুক অমুক কথা বলেনি? আমরা তো তাকে সত্যই পেয়েছি, যা আসমান থেকে শোনা একটি কথার কারণে হয়েছিল।"
497 - عن ابن عباس، قال: أخبرني رجلٌ من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم من الأنصار، أنّهم بينما هم جلوس ليلةً مع رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم رُمي بنجمٍ فاستنار، فقال لهم رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"ماذا كنتم تقولون في الجاهليّة إذا رُمي بمثل هذا؟". قالوا: اللَّه ورسوله أعلم، كنّا نقول: وُلد اللّيلة رجل عظيم، ومات رجلٌ عظيم. فقال رسول اللَّه صلى الله عليه وسلم:"فإنها لا يُرمي بها لموت أحد ولا لحياته، ولكنْ ربُّنا تبارك وتعالى اسْمُه إذا قضى أمرًا سبَّح حملةُ العرش، ثم سَبَّح أهلُ السّماء الذين يَلُونَهم، حتّى يبلُغَ التَّسْبيحُ أهلَ هذه السّماء الدُّنيا. ثم قال الذين يلون حملة العرش لحملة العرش: ماذا قال ربّكم فيخبرونهم ماذا قال. قال: فيستخبر بعض أهل السّماوات بعضًا، حتى يبلغ الخبرُ هذه السّماء الدّنيا فتخطف الجنُّ السّمع فيقذفون إلى أوليائهم. ويُرْمَوْن به. فما جاؤوا به على وجهه فهو حقٌّ، ولكنَّهم يَقْرِفون فيه ويزيدون".
صحيح: رواه مسلم في السلام (2229) من طرق عن يعقوب بن إبراهيم بن سعد، قال: حدّثنا أبي، عن صالح، عن ابن شهاب، حدثني علي بن حسين، أن عبد اللَّه بن عباس قال (فذكره).
وقوله:"يقرفون": معناه يخلطون فيه الكذب، وهو بمعنى يقذفون.
ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আনসার সাহাবীগণের মধ্য থেকে একজন লোক আমাকে জানালেন যে, তারা এক রাতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সঙ্গে বসে ছিলেন। এমন সময় একটি তারকা নিক্ষিপ্ত হলো এবং উজ্জ্বলভাবে জ্বলে উঠলো। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাদের জিজ্ঞেস করলেন: "যখন এমন কিছু নিক্ষিপ্ত হতো, তখন জাহিলিয়াতের যুগে তোমরা কী বলতে?"
তারা বললেন: আল্লাহ এবং তাঁর রাসূলই ভালো জানেন। আমরা বলতাম: আজ রাতে কোনো মহান ব্যক্তির জন্ম হয়েছে অথবা কোনো মহান ব্যক্তির মৃত্যু হয়েছে।
তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বললেন: "নিশ্চয়ই এগুলো কারো মৃত্যু বা কারো জীবনের জন্য নিক্ষিপ্ত হয় না। বরং আমাদের প্রতিপালক (তাঁর নাম বরকতময় ও সুমহান) যখন কোনো বিষয়ে সিদ্ধান্ত গ্রহণ করেন, তখন আরশ বহনকারীরা (ফেরেশতারা) তাসবীহ পাঠ করেন। এরপর তাঁদের নিকটবর্তী আসমানের অধিবাসীরা তাসবীহ পাঠ করেন। এভাবে তাসবীহ পাঠ এই নিম্নতম আসমানের অধিবাসীদের কাছে পৌঁছে যায়।
এরপর আরশ বহনকারীদের নিকটবর্তী আসমানের ফেরেশতারা আরশ বহনকারীদের জিজ্ঞেস করেন: তোমাদের প্রতিপালক কী বলেছেন? তখন তাঁরা (আরশ বহনকারীরা) তাঁদেরকে জানিয়ে দেন, তিনি কী বলেছেন।
(নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেন,) তখন এক আসমানের অধিবাসীরা আরেক আসমানের অধিবাসীদের জিজ্ঞেস করতে থাকেন, এভাবে খবরটি এই নিম্নতম আসমানে এসে পৌঁছে। এরপর জিনেরা দ্রুত (তা শোনার জন্য) কান পেতে দেয় এবং তা তাদের বন্ধুদের কাছে (গণকদের কাছে) নিক্ষেপ করে। আর এই নক্ষত্র দিয়েই তাদের প্রতি আঘাত হানা হয়। সুতরাং তারা (জিনেরা বা গণকেরা) যে কথাটি সঠিক রূপে নিয়ে আসে, তা সত্য। তবে তারা এর মধ্যে মিথ্যা মিশিয়ে দেয় এবং (মিথ্যা) বাড়িয়ে দেয়।"
498 - عن أبي هريرة، قال: قال النبيُّ صلى الله عليه وسلم:"إذا كان يومُ الجمعة كان على كلّ باب من أبواب المسجد الملائكة يكتبون الأوّل فالأوّل، فإذا جلس الإمامُ طووا الصُّحفَ، وجاءوا يستمعون الذّكر".
متفق عليه: رواه البخاريّ في بدء الخلق (3211)، ومسلم في الجمعة (850: 24) كلاهما من طريق ابن شهاب، عن أبي سلمة والأغرّ، عن أبي هريرة، فذكره.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: যখন জুমু‘আর দিন আসে, মসজিদের প্রত্যেক দরজায় ফেরেশতারা অবস্থান করেন। তাঁরা প্রথমে আগমনকারীদের নাম একের পর এক লিখতে থাকেন। অতঃপর যখন ইমাম (খুতবার জন্য) বসে যান, তখন তাঁরা তাঁদের দপ্তরসমূহ গুটিয়ে ফেলেন এবং তাঁরা (খুতবা) শোনার জন্য চলে আসেন।
499 - عن أبي هريرة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"خلق اللَّه آدم على صورته، طوله ستون ذراعًا. فلما خلقه قال: اذهب فسلِّم على أولئك النّفر من الملائكة جلوس، فاستمع ما يحيّونك فإنّها تحيّة ذريّتك. فقال: السلام عليكم. فقالوا: السلام عليك ورحمة اللَّه، فزادوا: ورحمة اللَّه. فكلّ من يدخل الجنة على صورة آدم، فلم يزل الخلق ينقص بعدُ حتى الآن".
متفق عليه: رواه البخاريّ في كتاب الاستئذان (6227)، ومسلم في كتاب الجنة وصفة نعيمها وأهلها (2841) كلاهما من حديث عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن همام بن منبه، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ তাআলা আদমকে তাঁর (আল্লাহর) আকৃতিতে সৃষ্টি করেছেন। তাঁর উচ্চতা ছিল ষাট হাত। যখন তিনি তাঁকে সৃষ্টি করলেন, তখন বললেন: যাও, উপবিষ্ট সেই ফেরেশতাদের দলটিকে সালাম দাও এবং তারা তোমাকে যে অভিবাদন জানায়, তা মনোযোগ দিয়ে শোনো। কারণ এটাই হবে তোমার এবং তোমার বংশধরদের অভিবাদন। তখন তিনি বললেন: আসসালামু আলাইকুম। তারা (ফেরেশতারা) বললেন: আসসালামু আলাইকা ওয়া রহমাতুল্লাহ। তারা (ফেরেশতারা) ‘ওয়া রহমাতুল্লাহ’ শব্দটি বৃদ্ধি করলেন। যে ব্যক্তি জান্নাতে প্রবেশ করবে, সে আদমের আকৃতিতেই প্রবেশ করবে। এর পরে সৃষ্টি (মানুষের উচ্চতা) ক্রমশ কমতে শুরু করেছে এবং তা এখনও পর্যন্ত চলছে।"
500 - عن أسيد بن حُضير قال: بينما هو يقرأ من الليل سورة البقرة وفرسه مربوط عنده، إذ جالتِ الفرسُ، فسكتَ فسكتتْ، فقرأ فجالتِ الفرسُ، فسكت فسكتتْ الفرسُ، ثم قرأ فجالتِ الفرسُ فانصرف، وكان ابنه يحيى قريبًا منها فأشفق أن تُصيبَه فلمّا اجترَّه، رفع رأسه إلى السّماء حتى ما يراها. فلما أصبح حدّث النبيَّ صلى الله عليه وسلم فقال:"اقرأُ يا ابنَ حُضير، اقرأ يا ابْنَ حُضير". قال: فأشفقتُ يا رسول اللَّه أن تطأ يحيى -وكان منها قريبًا-، فرفعتُ رأسي فانصرفت إليه، فرفعت رأسي إلى السّماء فإذا مثل الظُّلة فيها أمثال المصايح فخرجتْ حتى لا أراها! قال:"وتدري ما ذاك؟". قال: لا. قال:"تلك الملائكةُ دَنتْ لصوتِك، ولو قرأتَ لأصبحتْ ينظرُ النّاسُ إليها، لا تتوارى منهم".
متفق عليه: رواه البخاريّ في فضائل القرآن (5018)، ومسلم في صلاة المسافرين (796) كلاهما من حديث يزيد بن الهاد، أنّ عبد اللَّه بن خباب حدّثه، أنّ أبا سعيد الخدريّ حدّثه، عن أسيد ابن حضير، أنه قال (فذكر الحديث).
উসাইদ ইবন হুযাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: একবার তিনি রাতে সূরা আল-বাকারা পাঠ করছিলেন এবং তাঁর ঘোড়াটি তাঁর পাশে বাঁধা ছিল। হঠাৎ ঘোড়াটি লাফালাফি করতে শুরু করল। তিনি নীরব হলে ঘোড়াটিও শান্ত হলো। তিনি আবার পাঠ শুরু করলেন, ঘোড়াটি আবার লাফালাফি শুরু করল। তিনি চুপ করলেন, ঘোড়াটিও চুপ করল। এরপর তিনি আবারও পাঠ শুরু করলে ঘোড়াটি পুনরায় লাফালাফি শুরু করল। তখন তিনি থেমে গেলেন। তাঁর পুত্র ইয়াহইয়া তার কাছাকাছি ছিল, তাই তিনি ভয় পেলেন যে ঘোড়াটি তাকে আঘাত করতে পারে। যখন তিনি ইয়াহইয়াকে সরিয়ে নিলেন, তখন তিনি আকাশের দিকে মাথা তুললেন এবং কিছুই দেখতে পেলেন না।
যখন সকাল হলো, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ঘটনাটি জানালেন। তিনি (নবী) বললেন: "পাঠ করো হে ইবন হুযাইর, তুমি পাঠ করো হে ইবন হুযাইর।" তিনি বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আমি ভয় পেয়েছিলাম যে ঘোড়াটি ইয়াহইয়াকে মাড়িয়ে দেবে—সে এটির কাছাকাছি ছিল। তাই আমি আমার মাথা তুললাম এবং তার দিকে ফিরলাম। এরপর আমি আকাশের দিকে মাথা তুলতেই দেখলাম মেঘের মতো একখণ্ড বস্তু, যার মধ্যে প্রদীপের মতো জিনিস ছিল। এরপর তা চলে গেল, এমনকি আমি আর দেখতে পেলাম না!" তিনি (নবী) জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি জানো ওটা কী ছিল?" তিনি বললেন: "না।" তিনি (নবী) বললেন: "ওরা ছিল ফেরেশতা। তারা তোমার তেলাওয়াতের আওয়াজ শুনে কাছে এসেছিল। তুমি যদি পাঠ চালিয়ে যেতে, তবে সকাল হওয়ার সঙ্গে সঙ্গে মানুষ তাদের দেখতে পেত, তারা তাদের কাছ থেকে লুকিয়ে থাকত না।"