হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4828)


4828 - عن سالم بن عبد الله أنّه سمع رجلًا من أهل الشّام، وهو يسأل عبد الله بن عمر عن التمتع بالعمرة إلى الحج؟ فقال عبد الله بن عمر: هي حلال. فقال الشّاميّ: إنّ
أباك قد نهى عنه؟ فقال عبد الله بن عمر: أرأيتَ إنْ كان أبي نهى عنها، وصنعها رسول الله صلى الله عليه وسلم أأمرَ أبي نتبع أمْ أمرَ رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال الرّجل: بل أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم. فقال: لقد صنعها رسول الله صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه الترمذيّ (824) عن عبد بن حميد، أخبرني يعقوب بن إبراهيم بن سعد، حدّثنا أبيّ، عن صالح بن كيسان، عن ابن شهاب، أنّ سالم بن عبد الله حدّثه، فذكره. وإسناده صحيح التمتع هنا بمعنى القران أي أنه صلى الله عليه وسلم أتي بعمل العمرة غير الحلق والتقصير، ثمّ حجّ وهو القران، ثم صار التمتع في الاصطلاح من أتي بسكين في سفر واحد مستقلين.

قال الترمذيّ:"وأهل الحديث يختارون التمتع بالعمرة في الحجّ، وهو قول الشافعي وأحمد وإسحاق".

وفي الباب ما روي عن سعد بن أبي وقاص، والضحاك بن قيس وهما يذكران التمتع بالعمرة إلى الحجّ، فقال الضّحاك بن قيس:"لا يصنع ذلك إلا من جهل أمر الله". فقال سعد:"بئس ما قلت يا ابن أخي!" فقال الضحاك بن قيس:"إن عمر بن الخطاب قد نهى عن ذلك؟" فقال سعد:"قد صنعها رسول الله صلى الله عليه وسلم وصنعناها معه".

رواه مالك في الحج (63) عن ابن شهاب، عن محمد بن عبد الله بن الحارث بن نوفل بن عبد المطلب، أنه حدثه، أنه سمع سعد بن أبي وقاص، والضحاك بن قيس عام حجّ معاوية بن أبي سفيان وهما يذكران التمتع بالعمرة، فذكره.

ومن طريقه رواه الترمذي (823)، والنسائي (2736) وقال الترمذي:"حديث صحيح".

قلت: ولكن فيه محمّد بن عبد الله بن الحارث بن نوفل لم يوثقه غير ابن حبان، ولذا قال فيه الحافظ:"مقبول" أي إذا توبع، ولم أجد له متابعًا.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, (তাঁর পুত্র) সালেম ইবনে আবদুল্লাহ (রাহিমাহুল্লাহ) শামের জনৈক ব্যক্তিকে তাঁকে (ইবনে উমরকে) উমরার পর হজ্জের জন্য তামাত্তু (করা) সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করতে শুনেছিলেন। আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: এটি হালাল। শামের লোকটি বলল: আপনার পিতা তো তা নিষেধ করেছিলেন? আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: যদি আমার পিতা তা নিষেধ করে থাকেন, আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তা করে থাকেন, তাহলে আমরা কি আমার পিতার আদেশ অনুসরণ করব, নাকি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আদেশ? লোকটি বলল: বরং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর আদেশ। তখন তিনি (ইবনে উমর) বললেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অবশ্যই তা করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4829)


4829 - عن عائشة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أنها قالت: خَرَجْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَامَ حَجَّةِ الْوَدَاعِ، فَمِنَّا مَنْ أَهَلَّ بِعُمْرَةٍ، وَمِنَّا مَنْ أَهَلَّ بِحَجَّةٍ وَعُمْرَةٍ، وَمِنَّا مَنْ أَهَلَّ بِالْحَجِّ، وَأَهَلَّ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم بِالْحَجِّ؛ فَأَمَّا مَنْ أَهَلَّ بِعُمْرَةٍ فَحَلَّ، وَأَمَّا مَنْ أَهَلَّ بِحَجٍّ أَوْ جَمَعَ الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ فَلَمْ يُحِلُّوا حَتَّى كَانَ يَوْمُ النَّحْرِ.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (36) عن أبي الأسود محمد بن عبد الرحمن، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته.

ورواه البخاريّ في الحج (1562)، ومسلم في الحج (1211: 118) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
ورواه مسلم أيضًا من طريق القاسم بن محمد، عن عائشة مختصرًا بلفظ:"منّا من أهلَّ بالحجّ مُفردًا، ومنّا مَنْ قرن، ومنّا من تمتَّع".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিদায় হজের বছর বের হলাম। আমাদের মধ্যে কেউ কেউ উমরার ইহরাম বাঁধল, কেউ কেউ হজ ও উমরা উভয়ের ইহরাম বাঁধল এবং কেউ কেউ শুধু হজের ইহরাম বাঁধল। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজের ইহরাম বাঁধলেন। যারা উমরার ইহরাম বেঁধেছিল, তারা (উমরা শেষে) হালাল হয়ে গেল। আর যারা হজের ইহরাম বেঁধেছিল অথবা হজ ও উমরা একত্রে করেছিল, তারা কুরবানীর দিন আসা পর্যন্ত হালাল হয়নি।









আল-জামি` আল-কামিল (4830)


4830 - عن بكر (هو ابن عبد الله المزني) أنه ذكر لابن عمر: أَنَّ أَنَسًا حَدَّثَهُمْ أَنَّ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم أَهَلَّ بِعُمْرَةٍ وَحَجَّةٍ. فَقَالَ أَهَلَّ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بِالْحَجِّ وَأَهْلَلْنَا بِهِ مَعَهُ فَلَمَّا قَدِمْنَا مَكَّةَ قَالَ:"مَنْ لَمْ يَكُنْ مَعَهُ هَدْيٌ فَلْيَجْعَلْهَا عُمْرَةً". وَكَانَ مَعَ النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم هَدْيٌ، فَقَدِمَ عَلَيْنَا عَلِيُّ بْنُ أَبِي طَالِبٍ مِنَ الْيَمَنِ حَاجًّا فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"بِمَ أَهْلَلْتَ فَإِنَّ مَعَنَا أَهْلَكَ؟". قَالَ: أَهْلَلْتُ بِمَا أَهَلَّ بِهِ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم. قَالَ:"فَأَمْسِكْ فَإِنَّ مَعَنَا هَدْيًا".

متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازي (4353، 4354) عن مسدّد، حدّثنا بشر بن المفضّل، عن حميد الطويل، حدّثنا بكر، فذكره.

وأخرجه مسلم في الحج (1232) من وجه آخر عن حميد الطويل باختلاف في بعض ألفاظه، وفيه تأكيد من أنس بأن النبي صلى الله عليه وسلم لبي بالحج والعمرة جميعا.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত:

বকর ইবনু আবদুল্লাহ আল-মুযানী তাঁকে জানালেন যে, আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাদের কাছে বর্ণনা করেছেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উমরাহ ও হাজ্জ উভয়ের জন্যই তালবিয়াহ পাঠ করেছিলেন। তখন তিনি (ইবনু উমর) বললেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হাজ্জের জন্যই তালবিয়াহ পাঠ করেছিলেন এবং আমরাও তাঁর সঙ্গে হাজ্জের জন্য তালবিয়াহ পাঠ করেছিলাম। যখন আমরা মক্কায় পৌঁছলাম, তখন তিনি বললেন: “যার সাথে কুরবানীর পশু (হাদি) নেই, সে যেন এটাকে উমরায় পরিণত করে নেয়।” আর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে কুরবানীর পশু ছিল। তখন আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাজ্জ আদায়কারী হিসেবে ইয়ামান থেকে আমাদের কাছে এলেন। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম জিজ্ঞেস করলেন: “তুমি কিসের (কিসের নিয়তে) তালবিয়াহ পাঠ করেছ? কেননা তোমার পরিবার তো আমাদের সঙ্গেই আছে।” তিনি (আলী) বললেন: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যা দ্বারা তালবিয়াহ পাঠ করেছেন, আমিও তা দ্বারা তালবিয়াহ পাঠ করেছি। তিনি বললেন: “তবে তুমি (ইহরামের অবস্থায়) থাকো, কারণ আমাদের সাথে কুরবানীর পশু আছে।”









আল-জামি` আল-কামিল (4831)


4831 - عن عبد الله بن عمر، قال:"أهلْلنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بالحجّ مفردًا".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1231) عن يحيى بن أيوب، وعبد الله بن عون الهلالي، قالا: حدثنَا عبّاد بن عبّاد المهلّبي، حدثنا عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن بن عمر، به. واللفظ برواية يحيى بن أيوب.

قال مسلم: وفي رواية ابن عون:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أهلَّ بالحجِّ مفرَدًا".

وفي الباب ما روي عن ابن عباس، قال: أهلّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بالحج (أي مفردًا) فلما قدم طاف بالبيت وبين الصفا والمروة -وقال ابن شوكر: ولم يقصر- ثم اتفقا: ولم يحل من أجل الهدي، وأمر من لم يكن ساق الهدي أن يطوف ويسعى ويقصر ثم يحل.

زاد ابن منيع في حديثه:"أو يحلق ثم يحل".

رواه أبو داود (1792) عن الحسن بن شوكر وأحمد بن منيع، قالا: حدّثنا هشيم، عن يزيد بن أبي زياد -المعنى-، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده ضعيف من أجل يزيد بن أبي زياد وهو الهاشميّ مولاهم الكوفي ضعيف باتفاق أهل العلم.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (2152) وبه أعلّه المنذريّ في"مختصره"، ولكن

الحديث صحيح عن ابن عباس بأن النبيّ صلى الله عليه وسلم كما سبق في فسخ الحج إلى العمرة.

ويجمع بين قولي أنس وعائشة كما قاله الخطابي في"معالم السنن"، قال:"وقد يحتمل ذلك وجهًا آخر، وهو أن يكون بعضهم سمعه يقول:"لبيك بحج" فحكى أنه أفردها وخفي عليه قوله:"وعمرة"، فلم يحك إلا ما سمع، وهو: عائشة، ووعي غيره الزيادة فرواها وهو أنس حين قال:
"سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"لبيك بحج وعمرة" ولا تنكر الزيادات في الأخبار كما لا تنكر في الشهادات، وإنما كان يختلف ويتناقض لو كان الزائد نافيًا لقول صاحبه، فأما إذا كان مثبتًا له وزائدًا عليه فليس فيه تناقض ولا تدافع.

وقد يحتمل أيضًا: أن يكون الراوي سمع ذلك يقوله على سبيل التعليم لغيره فيقول له: لبيك بحجة وعمرة يلقنه ذلك، وأما من روى أنه تمتع بالعمرة إلى الحج فإنه قد أثبت ما حكته عائشة من إحرامه بالحج، وأثبت ما رواه أنس من العمرة والحج إلا أنه أفاد الزيادة في البيان والتمييز بين الفعلين بإيقاعهما في زمانين وهو ما روته حفصة، روى عنها عبد الله بن عمر أنها قالت: يا رسول الله، ما شأن الناس حلوا ولم تحل أنت من عمرتك؟ فقال: إني لبّدت رأسي وقلّدت هديي فلا أحل حتى أنحر. فثبت أنه كان هناك عمرة إلا أنه أدخل عليها الحج قبل أن يقضي شيئًا من عمل العمرة فصار في حكم القارن.

وهذه الروايات على اختلافها في الظاهر ليس فيها تكاذب ولا تهاتر، والتوفيق بينهما ممكن وهو سهل الخروج غير متعذّر، والحمد لله.

ووجه آخر للجمع بين قول من قال: أفرد بالحج وبين من قول من قال: أهل بالحج والعمرة أي أنه لم يُهل بالعمرة استقلالًا من أجل أنه ساق الهدي، بخلاف من لم يسق الهدي فقدم عمرة استقلالًا، ثم أهلّ بالحجّ، فجمع بين الحج والعمرة.

أو يقال: إنه صلى الله عليه وسلم أولا كان مفردًا ثم صار قارنًا، ومن قال: إنه كان متمتعًا فقصد به أنه طاف وسعي كما يفعله المعتمر غير أن لم يحل، بل بقي محرمًا حتى نحر الهدي فشبه النبي صلى الله عليه وسلم بالتمتع من بعض الوجوه لا من كل الوجوه.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে কেবল হজ্জের (ইফরাদ হজ্জের) জন্য ইহরাম বেঁধেছিলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (4832)


4832 - عن الصُّبَيِّ بْنُ مَعْبَدٍ قال: كُنْتُ رَجُلا أَعْرَابِيًّا نَصْرَانِيًّا فَأَسْلَمْتُ، فَأَتَيْتُ رَجُلا مِنْ عَشِيرَتِي يُقَالُ لَهُ هُذَيْمُ بْنُ ثُرْمُلَةَ فَقُلْتُ لَهُ: يَا هَنَاهْ! إِنِّي حَرِيصٌ عَلَى الْجِهَادِ وَإِنِّي وَجَدْتُ الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ مَكْتُوبَيْنِ عَلَيَّ فَكَيْفَ لِي بِأَنْ أَجْمَعَهُمَا؟ قَالَ: اجْمَعْهُمَا وَاذْبَحْ مَا اسْتَيْسَرَ مِنَ الْهَدْيِ فَأَهْلَلْتُ بِهِمَا مَعًا، فَلَمَّا أَتَيْتُ الْعُذَيْبَ لَقِيَنِي سَلْمَانُ بْنُ رَبِيعَةَ وَزَيْدُ بْنُ صُوحَانَ -وَأَنَا أُهِلُّ بِهِمَا جَمِيعًا- فَقَالَ أَحَدُهُمَا لِلآخَرِ: مَا هَذَا بِأَفْقَهَ مِنْ بَعِيرِهِ، قَالَ: فَكَأَنَّمَا أُلْقِيَ عَلَيَّ جَبَلٌ حَتَّى أَتَيْتُ عُمَرَ بْنَ الْخَطَّابِ فَقُلْتُ لَهُ: يَا أَمِيرَ الْمُؤْمِنِينَ! إِنِّي كُنْتُ رَجُلًا أَعْرَابِيًّا نَصْرَانِيًّا، وَإِنِّي أَسْلَمْتُ وَأَنَا حَرِيصٌ عَلَى الْجِهَادِ، وَإِنِّي وَجَدْتُ الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ مَكْتُوبَيْنِ عَلَيَّ، فَأَتَيْتُ رَجُلا مِنْ قَوْمِي، فَقَالَ لِي: اجْمَعْهُمَا وَاذْبَحْ مَا اسْتَيْسَرَ مِنَ الْهَدْيِ، وَإِنِّي أَهْلَلْتَ بِهِمَا مَعًا، فَقَالَ لِي عُمَرُ رَضِيَ
اللَّهُ عَنْهُ: هُدِيتَ لِسُنَّةِ نَبِيِّكَ صلى الله عليه وسلم.

صحيح: رواه أبو داود (1799) -واللّفظ له-، والنسائيّ (2719)، وابن حبان (2970) كلّهم من طرق عن أبي وائل شفيق بن سلمة، قال: قال الصُّبي بن معبد، فذكره.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (83، 169، 227، 254، 256، 379)، وصحّحه ابن خزيمة (3069)، وابن حبان (3910، 3911) وإسناده صحيح.

وقال شقيق بن سلمة: كثيرًا ما كنت آتي الصبي بن معبد أنا ومسروق نسأله عن هذا الحديث.

قال ابن خزيمة:"وفي تركه الإنكار عليه دلالة بينة بأن القران عنده (أي عند عمر بن الخطاب) جائز من غير سوق بدنة ولا بقرة من الميقات التي يحرم منه بالحج والعمرة".

وقال أيضًا:"وفيه دلالة على أن ما استيسر من الهدي جائز عن القارن كهو عن المتمتع لا كما قال بعض العلماء: أنّ القارن لا يكون إلّا بسوق بدنة أو بقرة يسوقه من حيث يحرم".




সুবাই ইবনু মা'বাদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি একজন বেদুঈন খ্রিস্টান ব্যক্তি ছিলাম। অতঃপর আমি ইসলাম গ্রহণ করলাম। আমি আমার গোত্রের হুযাইম ইবনু সুরমুলাহ নামক এক ব্যক্তির কাছে গেলাম এবং তাকে বললাম, "হে অমুক! আমি জিহাদের প্রতি অত্যন্ত আগ্রহী, আর আমি দেখতে পেলাম যে আমার উপর হজ ও উমরা উভয়ই ফরয করা হয়েছে। আমি কীভাবে এই দুটিকে একত্রে আদায় করতে পারি?" সে বলল: "তুমি এই দুটোকে একত্রিত করে নাও এবং তোমার জন্য সহজলভ্য কুরবানির পশু যবেহ করো।" সুতরাং আমি এই দুটি ইবাদতের জন্য একত্রে ইহরাম বাঁধলাম।

যখন আমি 'আল-উযাইব' নামক স্থানে পৌঁছালাম, তখন আমার সাথে সালমান ইবনু রাবি'আহ এবং যায়িদ ইবনু সুওহান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দেখা হলো—আর আমি তখন দুটো (হজ ও উমরা)-এর জন্য একত্রে তালবিয়া পড়ছিলাম। তখন তাদের একজন অন্যজনকে বলল: "এই লোকটি তার উটের চেয়েও কম ফকীহ (দ্বীনের জ্ঞান রাখে)!" তিনি (সুবাই) বললেন: আমার উপর যেন একটি পাহাড় নিক্ষেপ করা হলো (আমি ভীষণ মনঃকষ্ট পেলাম)। এরপর আমি উমার ইবনু খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে গেলাম এবং তাকে বললাম: "হে আমীরুল মু'মিনীন! আমি একজন বেদুঈন খ্রিস্টান ব্যক্তি ছিলাম। আমি ইসলাম গ্রহণ করেছি এবং আমি জিহাদের প্রতি অত্যন্ত আগ্রহী। আমি দেখতে পেলাম যে আমার উপর হজ ও উমরা উভয়ই ফরয করা হয়েছে। অতঃপর আমি আমার গোত্রের এক ব্যক্তির কাছে গেলাম। সে আমাকে বলল, 'তুমি এই দুটোকে একত্রিত করে নাও এবং তোমার জন্য সহজলভ্য কুরবানির পশু যবেহ করো।' আর আমি এই দুটো ইবাদতের জন্য একত্রে ইহরাম বেঁধেছি।" তখন উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বললেন: "তুমি তোমার নবীর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সুন্নাতের দিকে হেদায়াতপ্রাপ্ত হয়েছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (4833)


4833 - عن عبد الله بن عمر، أنه قال حين خرج إلى مكة معتمرًا في الفتنة: إِنْ صُدِدْتُ عَنِ الْبَيْتِ صَنَعْنَا كَمَا صَنَعْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَأَهَلَّ بِعُمْرَةٍ مِنْ أَجْلِ أَنَّ رَسُولَ اللهِ صلى الله عليه وسلم أَهَلَّ بِعُمْرَةٍ عَامَ الْحُدَيْبِيَةِ، ثُمَّ إِنَّ عبْد نَظَرَ فِي أَمْرِهِ، فَقَالَ: مَا أَمْرُهُمَا إِلا وَاحِدٌ، ثُمَّ الْتَفَتَ إِلَى أَصْحَابِهِ فَقَالَ مَا أَمْرُهُمَا إِلا وَاحِدٌ أُشْهِدُكُمْ أَنِّي قَدْ أَوْجَبْتُ الْحَجَّ مَعَ الْعُمْرَةِ ثُمَّ نَفَذ حَتَّى الْبَيْتِ فَطَافَ طَوَافًا وَاحِدًا وَرَأَى ذَلِكَ مُجْزِيًا عَنْهُ وَأَهْدَى.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (99) عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

ورواه البخاريّ في المحصر (1813)، ومسلم في الحج (1230) كلاهما من طريق مالك، به، مثله. إلّا أن مسلمًا قال:"فخرج حتى إذا جاء البيت طاف به سبعًا وبين الصّفا والمروة سبعًا لم يزد عليه …".

ورواه البخاريّ في الحج (1693)، ومسلم في الحج (1230: 183) كلاهما من طريق أيوب، عن نافع، به، نحوه، وفيه عند البخاري:"ثم اشترى الهدي من قديد، ثم قدم فطاف لهما طوافًا واحدًا …".




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ফিতনার (বিদ্রোহের) সময় উমরাহ করার উদ্দেশ্যে মক্কার দিকে রওয়ানা হওয়ার সময় বললেন: যদি আমাকে কাবা ঘর থেকে বাধা দেওয়া হয়, তবে আমরা তাই করব যা আমরা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে করেছিলাম। এরপর তিনি উমরার ইহরাম বাঁধলেন, কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুদায়বিয়ার বছরে উমরার ইহরাম বেঁধেছিলেন। অতঃপর তিনি নিজের বিষয়টি চিন্তা করলেন এবং বললেন: এই দুটির (হজ্জ ও উমরাহ) আদেশ একই। এরপর তিনি তাঁর সঙ্গীদের দিকে ফিরে বললেন: এই দুটির আদেশ একই। আমি তোমাদের সাক্ষী রাখছি যে আমি উমরার সাথে হজ্জকেও ওয়াজিব করে নিয়েছি। এরপর তিনি বাইতুল্লাহ পর্যন্ত গেলেন এবং একটি মাত্র তাওয়াফ করলেন। তিনি মনে করলেন এটাই তার জন্য যথেষ্ট এবং তিনি কুরবানী করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4834)


4834 - عن عائشة، قالت: خَرَجْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم عَامَ حَجَّةِ الْوَدَاعِ فَأَهْلَلْنَا بِعُمْرَةٍ ثُمَّ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم:"مَنْ كَانَ مَعَهُ هَدْيٌ فَلْيُهْلِلْ بِالْحَجِّ مَعَ الْعُمْرَةِ، ثُمَّ لا يَحِلُّ حَتَّى يَحِلَّ مِنْهُمَا جَمِيعًا"، قَالَتْ: فَقَدِمْتُ مَكَّةَ وَأَنَا حَائِضٌ فَلَمْ أَطُفْ بِالْبَيْتِ وَلا بَيْنَ
الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ فَشَكَوْتُ ذَلِكَ إِلَى رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم، فَقَالَ:"انْقُضِي رَأْسَكِ وَامْتَشِطِي وَأَهِلِّي بِالْحَجِّ وَدَعِي الْعُمْرَةَ". قَالَتْ: فَفَعَلْتُ فَلَمَّا قَضَيْنَا الْحَجَّ أَرْسَلَنِي رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم مَعَ عبد الرحمن بْنِ أَبِي بَكْرٍ الصِّدِّيقِ إِلَى التَّنْعِيم فَاعْتَمَرْتُ فَقَالَ:"هَذَا مَكَانُ عُمْرَتِكِ". فَطَافَ الَّذِينَ أَهَلُّوا بِالْعُمْرَةِ بِالْبَيْتِ وَبَيْنَ الصَّفَا وَالْمَرْوَةِ، ثُمَّ حَلُّوا مِنْهَا، ثُمَّ طَافُوا طَوَافًا آخَرَ بَعْدَ أَنْ رَجَعُوا مِنْ مِنًى لِحَجِّهِمْ. وَأَمَّا الَّذِينَ كَانُوا أَهَلُّوا بِالْحَجِّ أَوْ جَمَعُوا الْحَجَّ وَالْعُمْرَةَ، فَإِنَّمَا طَافُوا طَوَافًا وَاحِدًا.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (223) عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته. ثم رواه عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، ثم قال:"بمثل ذلك" ولم يسق لفظه.

ورواه البخاريّ في الحجّ (1556) عن عبد الله بن مسلمة القعنبيّ، ومسلم في الحج (1211: 111) عن يحيى بن يحيى التميمي، كلاهما عن مالك، عن عروة، عن عائشة، به، مثله.

إلّا أنه وقع عندهما:"وأمّا الذين كانوا جمعوا الحجّ والعمرة".

وليس عندهما:"أهلّوا بالحجّ" أي وحده.



وقد عرفت أنه لم يتابع كما نصّ عليه الترمذي.

وأما قول أبي حاتم: لم يرو عنه غير يحيى بن أبي كثير، فتُعقِّب بأنه روى عنه أيضًا أبو قزعة سعيد بن حجير كما مضى.

وكذلك لا يصح ما روي عن حذيفة بن أسيد، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان إذا نظر إلى البيت قال:"اللَّهُم! زد بيتك تشريفًا وتعظيمًا وتكريمًا وبرًا ومهابة".

رواه الطبراني في"الكبير" (3053) وفيه عاصم بن سليمان الكوزي وهو متروك كما قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 238).

ومن العلماء من كذبه ورماه بالوضع كالدارقطني وابن حبان وغيره.

وكذلك لا يصح ما روي عن ابن عباس، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"تُرفع الأيدي في سبعة مواطن: افتتاح الصّلاة، واستقبال البيت، وعلى الصّفا والمروة، والْمَوْقِفَيْن، والجمرتين".

رواه الشافعي في الأم (2/ 169) عن سعيد بن سالم، عن ابن جريج، قال: حُدّثت عن مقسم مولي عبد الله بن الحارث، عن ابن عباس، فذكر نحوه. وفيه انقطاع.

وله شاهد مرسل عن سفيان الثوريّ، عن أبي سعيد الشامي، عن مكحول قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم إذا دخل مكة فرأي البيت رفع يديه وكبّر وقال:"اللهم! أنت السلام، ومنك السلام، فحيّنا ربَّنا بالسّلام. اللَّهمّ! زدْ هذا البيت تشريفًا وتعظيمًا، ومهابة، وزدْ من حجَّه أو اعتمره تكريمًا وتشريفًا وتعظيمًا وبرًّا".

رواه البيهقيّ (5/ 73)، وأبو سعيد الشامي مجهول.

وروي مثل هذا عن عمر بن الخطاب رضي الله عنه.

رواه البيهقيّ من طريق يحيى بن معين، ثنا سفيان بن عيينة، عن إبراهيم بن طريف، عن حُميد ابن يعقوب، سمع سعيد بن المسيب يقول: سمعت من عمر رضي الله عنه كلمة ما بقي أحدٌ من الناس سمعها غيري، سمعته يقول إذا رأى البيت:"اللَّهمّ! أنت السّلام، ومنك السّلام فحيّنا ربَّنا بالسّلام". وهذا إسناد جيّد.

وممن كان يرفع يديه عند رؤية البيت: ابن عمر، وابن عباس، ومن الأئمة: سفيان الثوري، وابن المبارك، وأحمد بن حنبل، وإسحاق بن راهويه وغيرهم. انظر"شرح السنة" للبغويّ (7/ 99 - 100).




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিদায় হজ্জের বছর (মক্কা অভিমুখে) বের হলাম। আমরা উমরার ইহরাম বাঁধলাম। এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যার সাথে কোরবানীর পশু (হাদী) আছে, সে যেন উমরার সাথে হজ্জেরও ইহরাম বাঁধে। এরপর সে ততক্ষণ পর্যন্ত হালাল হবে না, যতক্ষণ না সে উভয়টি থেকে হালাল হয়।" তিনি (আয়িশা) বলেন: আমি যখন মক্কায় পৌঁছলাম, তখন আমি ছিলাম ঋতুমতী। ফলে আমি কাবা শরীফ তাওয়াফ করতে পারিনি এবং সাফা ও মারওয়ার মাঝেও সায়ী করতে পারিনি। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে এ বিষয়ে অভিযোগ করলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তোমার মাথার চুল খুলে নাও, চিরুনি করো এবং হজ্জের ইহরাম বাঁধো, আর উমরা ছেড়ে দাও।" তিনি বলেন: আমি তাই করলাম। যখন আমরা হজ্জ সম্পন্ন করলাম, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে আবদুর রহমান ইবনু আবী বকর আস-সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে তান'ঈমের দিকে পাঠালেন। অতঃপর আমি উমরাহ করলাম। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটি তোমার উমরার স্থান।" যারা শুধু উমরার ইহরাম বেঁধেছিল, তারা বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করল এবং সাফা-মারওয়ার মধ্যে সায়ী করল, এরপর হালাল হয়ে গেল। অতঃপর মিনাহ থেকে ফিরে এসে তারা তাদের হজ্জের জন্য আরেকটি তাওয়াফ করল। আর যারা কেবল হজ্জের ইহরাম বেঁধেছিল অথবা হজ্জ ও উমরাহ একত্রে করেছিল, তারা কেবল একটি তাওয়াফই করল।

(মুত্তাফাকুন আলাইহি: মালিক, বুখারী ও মুসলিম)









আল-জামি` আল-কামিল (4835)


4835 - عن أبي هريرة، قال: بَعَثَنِي أَبُو بَكْرٍ الصِّدِّيقُ فِي الْحَجَّةِ الَّتِي أَمَّرَهُ عَلَيْهَا رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم قَبْلَ حَجَّةِ الْوَدَاعِ فِي رَهْطٍ يُؤَذِّنُونَ فِي النَّاسِ يَوْمَ النَّحْرِ:"لا يَحُجُّ بَعْدَ الْعَامِ مُشْرِكٌ وَلا يَطُوفُ بِالْبَيْتِ عُرْيَانٌ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1622) من طريق يونس (هو ابن يزيد الأيلي)، ومسلم في الحج (1347) من طريق يونس، وعمرو (وهو ابن الحارث) كلاهما عن ابن شهاب الزهريّ، حدثني حميد بن عبد الرحمن بن عوف، عن أبي هريرة، فذكره، واللفظ لمسلم وزاد.

قال ابن شهاب: فكان حميد بن عبد الرحمن يقول:"يوم النحر الحج الأكبر" من أجل حديث أبي هريرة.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আবূ বকর সিদ্দীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে বিদায় হজ্জের পূর্বে সেই হজ্জে একদল লোকের সঙ্গে প্রেরণ করেছিলেন, যে হজ্জে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে (আবূ বকরকে) আমীর নিযুক্ত করেছিলেন। তারা কুরবানীর দিনে লোকেদের মাঝে এই ঘোষণা দিচ্ছিল: "এই বছরের পর আর কোনো মুশরিক যেন হজ্জ করতে না আসে এবং কোনো উলঙ্গ ব্যক্তি যেন বাইতুল্লাহর তাওয়াফ না করে।"

ইবনু শিহাব (যুহরি) বলেন, হুমায়েদ ইবনু আবদুর রহমান বলতেন: আবূ হুরায়রার এই হাদীসের কারণে (কুরবানীর) দিনটি হচ্ছে 'হজ্জে আকবার' (সর্বশ্রেষ্ঠ হজ্জ)।









আল-জামি` আল-কামিল (4836)


4836 - عن أبي هريرة، قال: بَعَثَنِي أَبُو بَكْرٍ فِي تِلْكَ الْحَجَّةِ فِي مُؤَذِّنِينَ بَعَثَهُمْ يَوْمَ النَّحْرِ يُؤَذِّنُونَ بِمِنًى:"أَنْ لَا يَحُجُّ بَعْدَ الْعَامِ مُشْرِكٌ وَلَا يَطُوفُ بِالْبَيْتِ عُرْيَانٌ".

قَالَ حُمَيْدُ بْنُ عبد الرحمن: ثُمَّ أَرْدَفَ رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم بِعَلِيِّ بْنِ أَبِي طَالِبٍ وَأَمَرَهُ أَنْ يُؤَذِّنَ بِبَرَاءَةَ.

قَالَ أَبُو هُرَيْرَةَ: فَأَذَّنَ مَعَنَا عَلِيٌّ يَوْمَ النَّحْرِ فِي أَهْلِ مِنًى بِبَرَاءَة وَأَنْ لا يَحُجَّ بَعْدَ الْعَامِ مُشْرِكٌ وَلا يَطُوفَ بِالْبَيْتِ عُرْيَانٌ.

صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4655) عن سعيد بن عفير، حدثني الليث، حدثني عقيل، عن ابن شهاب، وأخبرني حميد بن عبد الرحمن، أن أبا هريرة، قال (فذكره).

وقوله:"وأخبرني" قال الكرماني: بواو العطف إشعارًا بأنه أخبره أيضًا بغير ذلك، قيل: فهو عطف على مقدّر.

ودلّ الحديث على أن أبا بكر كان هو الأمير على الناس في تلك الحجّة، وكان عليٌّ هو المأمور بالتأذين بذلك، وكأنّ عليًّا لم يطق التأذين وحده واحتاج إلى من يعينه على ذلك فأرسل معه أبو بكر أبا هريرة وغيره يساعدونه على ذلك كما جاء في حديث رواه الإمام أحمد (7977) من طريق محرز بن أبي هريرة، عن أبيه أبي هريرة، قال: كنت مع علي بن أبي طالب حيث بعثه رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى أهل مكة ببراءة.

هكذا جمع الطحاويّ في"مشكله" وسيأتي مزيد من التحقيق في موضعه في قضية العهد الذي ضربه رسول الله صلى الله عليه وسلم للمشركين.

لأنه وقع في رواية أحمد المشار إليها:"ومن كان بينه وبين رسول الله صلى الله عليه وسلم عهد فإنّ أجله أو أمده إلى أربعة أشهر".

والصّحيح أنّ أجله إلى مدته لقوله تعالى: {إِلَّا الَّذِينَ عَاهَدْتُمْ مِنَ الْمُشْرِكِينَ ثُمَّ لَمْ يَنْقُصُوكُمْ شَيْئًا وَلَمْ يُظَاهِرُوا عَلَيْكُمْ أَحَدًا فَأَتِمُّوا إِلَيْهِمْ عَهْدَهُمْ إِلَى مُدَّتِهِمْ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُتَّقِينَ (4)} [سورة التوبة: 4].

وهو الذي يدل عليه ما جاء في"جامع الترمذي" عن علي:"وكان بينه وبين النبيّ صلى الله عليه وسلم عهد فعهده إلى مدّته، ومن لا مدّة له فأربعة أشهر".
وسيأتي كلّ هذه الأمور بالتفصيل في موضعه.

وأمّا ما روي عن أبي بكر أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بعثه ببراءة لأهل مكة:"لا يحجّ بعد العام مشرك، ولا يطوف بالبيت عريان، ولا يدخل الجنة إلا نفس مسلمة، من كان بينه وبين رسول الله صلى الله عليه وسلم مدة فأجله إلى مدته، والله بريء من المشركين ورسولُه".

قال: فسار بها ثلاثًا، ثم قال لعلي رضي الله عنه:"الحقه فرد عليَّ أبا بكر وبلِّغها أنت".

قال: ففعل. قال: فلما قدم على النبيّ صلى الله عليه وسلم أبو بكر بكي. قال: يا رسول الله! حدث فيَّ شيءٌ؟ قال:"ما حدث إلّا خير، لكن أُمرت أن لا يبلغه إلّا أنا أو رجل مني" ففيه نكارة.

رواه الإمام أحمد (4)، وأبو يعلى (104) من حديث وكيع، حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن زيد بن يُثيع، عن أبي بكر، فذكره.

وزيد بن يثيع تفرّد بالرواية عنه أبو إسحاق، ولم يوثقه غير ابن حبان والعجلي، وقال ابن سعد: كان قليل الحديث، فمثله لا يكون"ثقة" كما قال الحافظ في"التقريب"، ثم روى في خبره ما ينكر عليه، وهو قوله:"ولكن أمرت أن لا يبلغه إلا أنا أو رجل مني".

وأخرجه الجوزجانيّ في"الأباطيل" (1/ 128 - 131) وقال:"هذا حديث منكر". ثم رواه من حديث الإمام أحمد وغيره أيضًا وقال:"فهذه الروايات كلّها مضطربة مختلقة منكرة".

وقال الخطابيّ في كتاب"شعار الدين": وقوله:"لا يؤدي عني إلا رجل من أهل بيتي" هو شيء جاء به أهل الكوفة عن زيد بن يثيع، وهو متهم في الرواية، منسوب إلى الرّفض. وعامّة من بلّغ عنه غير أهل بيته، فقد بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم أسعد بن زرارة إلى المدينة يدعو الناس إلى الإسلام ويعلم الأنصار القرآن، وبعث معاذًا وأبا موسى إلى اليمن، وبعث عتاب بن أسيد إلى مكة، فأين قول من زعم: أنه لا يبلغ عنه إلا رجل من أهل بيته؟ !". راجع"منهاج السنة" (5/ 63).

قلت: ثم هو قد اضطرب في رواية هذا الحديث، فمرة قال: عن أبي بكر، فجعله من مسنده. وأخرى قال: سألت عليًا بأيّ شيء بُعثت؟ قال:"بأربع: لا يدخل الجنة إلا نفس مسلمة، ولا يطوف بالبيت عريان، ولا يجتمع المسلمون والمشركون بعد عامهم هذا، ومن كان بينه وبين النبي صلى الله عليه وسلم عهد فعهده إلى مدّته، ومن لا مدّة له فأربعة أشهر".

رواه الترمذيّ (871) عن علي بن خشرم، أخبرنا سفيان بن عيينة، عن أبي إسحاق، عن زيد بن يثيع، قال (فذكره).

قال الترمذي:"حديث حسن".

ورواه الإمام أحمد (594) وصحّحه الحاكم (4/ 178) كلاهما من حديث سفيان بإسناد، مثله. وقال:"هذا حديث صحيح الإسناد".

وله أسانيد أخرى ذكرها الدّارقطني في"العلل" (3/ 163) وقال:"ما رواه ابن عيينة عن أبي
إسحاق، عن زيد بن يثيع، عن علي هو المحفوظ".

ولم يذكر في هذه الروايات الجملة المنكرة وهي:"أمرت أن لا يبلغه إلا أنا أو رجل مني".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবূ বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই হজ্জের সময় আমাকে মুয়াযযিনদের মধ্যে পাঠিয়েছিলেন, যাদেরকে তিনি কুরবানীর দিন মীনায় ঘোষণা দেওয়ার জন্য পাঠিয়েছিলেন: "এই বছরের পর কোনো মুশরিক যেন হজ্জ না করে এবং কোনো উলঙ্গ ব্যক্তি যেন বাইতুল্লাহর তাওয়াফ না করে।" হুমাইদ ইবনু আবদুর রহমান বলেছেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে তাঁর পিছনে পাঠালেন এবং তাঁকে 'বারাআত'-এর (ঘোষণা) প্রচারের নির্দেশ দিলেন। আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, অতঃপর কুরবানীর দিন মীনাবাসীর মাঝে আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাদের সাথে বারাআত এবং এই ঘোষণা প্রচার করলেন যে, এই বছরের পর আর কোনো মুশরিক হজ্জ করবে না এবং কোনো উলঙ্গ ব্যক্তি বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করবে না।









আল-জামি` আল-কামিল (4837)


4837 - عن ابن عباس، قال: كَانَت الْمَرْأَةُ تَطُوفُ بِالْبَيْتِ وَهِيَ عُرْيَانَةٌ فَتَقُول: مَنْ يُعِيرُنِي تِطْوَافًا، تَجْعَلُهُ عَلَى فَرْجِهَا، وَتَقُولُ:

الْيَوْمَ يَبْدُو بَعْضُهُ أَوْ كُلُّهُ … فَمَا بَدَا مِنْهُ فَلا أُحِلُّهُ

نَزَلَتْ هَذِهِ الآيَةُ: {خُذُوا زِينَتَكُمْ عِنْدَ كُلِّ مَسْجِدٍ} [سورة الأعراف: 31].

صحيح: رواه مسلم في التفسير (3028) من طرق عن شعبة، عن سلمة بن كهيل، عن مسلم البطين، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره.

وقوله:"تِطواف" هو ثوب تلبسه المرأة تطوف به، وكان أهل الجاهلية يطوفون عراة ويرمون ثيابهم ويتركونها ملقاة على الأرض ولا يأخذونها أبدًا، ويتركونها تداس بالأرجل حتى تبلى ويسمى اللقاء.

وقوله: تقول … إلخ" أي تطوف عريانة وتنشد هذا الشعر، وحاصله اليوم -أي يوم الطواف-. إما أن ينكشف كل الفرج أو بعضه، وعلى التقديرين فلا أحل لأحد أن ينظر إليه قصدًا، تريد أنها كشفت الفرج لضرورة الطواف لا لإباحة النظر إليه والاستمتاع به. فليس لأحد أن يفعل ذلك. قاله السيوطي في شرح النسائي.

فجاء الإسلام وأمر الله بستر العورة، فقال تعالي: {يَابَنِي آدَمَ خُذُوا زِينَتَكُمْ عِنْدَ كُلِّ مَسْجِد}، وقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"لا يطوف بالبيت عريان".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: (জাহিলিয়াতের যুগে) মহিলারা উলঙ্গ অবস্থায় বাইতুল্লাহ তাওয়াফ করত। তারা বলত, ‘কে আমাকে তিত্বাফ (তাওয়াফের জন্য ব্যবহৃত কাপড়) ধার দেবে?’ তারা সেটা নিজেদের লজ্জাস্থানের উপর রাখত। আর তারা বলত:

"আজকে তার কিছু অংশ বা পুরোটাই প্রকাশিত হবে,
তার মধ্যে যা কিছু প্রকাশ পাবে, আমি তা হালাল মনে করি না।"

তখন এই আয়াতটি নাযিল হয়: "তোমরা প্রত্যেক সালাতের সময় তোমাদের পোশাক পরিধান করো।" [সূরা আল-আ'রাফ: ৩১]। এবং নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "উলঙ্গ অবস্থায় কেউ যেন বাইতুল্লাহ তাওয়াফ না করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4838)


4838 - عن أبي هريرة، قال: أَقْبَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَدَخَلَ مَكَّةَ فَأَقْبَلَ رَسُولُ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم إِلَى الْحَجَرِ فَاسْتَلَمَهُ، ثُمَّ طَافَ بِالْبَيْتِ ثُمَّ أَتَى الصَّفَا فَعَلاهُ حَيْثُ يَنْظُرُ إِلَى الْبَيْتِ فَرَفَعَ يَدَيْهِ فَجَعَلَ يَذْكُرُ اللَّهَ مَا شَاءَ أَنْ يَذْكُرَهُ وَيَدْعُوهُ. قَالَ: وَالأَنْصَارُ تَحْتَهُ. قَالَ هَاشِمٌ: فَدَعَا وَحَمِدَ اللَّهَ وَدَعَا بِمَا شَاءَ أَنْ يَدْعُو.

صحيح: رواه أبو داود (1872) عن أحمد بن حنبل، حدّثنا بهز بن أسد وهاشم -يعني ابن القاسم- قالا: حدّثنا سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن عبد الله بن رباح، عن أبي هريرة، فذكره.

والحديث في مسند الإمام أحمد (10948) من هذا الوجه مطوّلًا.

وكذلك رواه مسلم في"فتح مكة" (1780) عن شيبان بن فرّوخ، حدثنا سليمان بن المغيرة، بإسناده مطوَّلًا مثل الإمام أحمد.
ورواه أبو داود (1871) أيضًا عن مسلم بن إبراهيم، حدّثنا سلام بن مسكين، حدّثنا ثابت البنانيّ، بإسناده وزاد فيه:"وصلى ركعتين خلف المقام" بعد قوله:"لما دخل مكة طاف بالبيت".




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মক্কার দিকে) আগমন করলেন এবং মক্কায় প্রবেশ করলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হাজারে আসওয়াদ-এর দিকে গেলেন এবং তা স্পর্শ করলেন। এরপর তিনি বায়তুল্লাহ্ তাওয়াফ করলেন। এরপর তিনি সাফার নিকট এলেন এবং তাতে আরোহণ করলেন এমনভাবে যেন তিনি বায়তুল্লাহ্ দেখতে পান। তিনি তাঁর দু'হাত উপরে তুললেন এবং যতক্ষণ আল্লাহর যিকির করা ও তাঁর কাছে দু'আ করার ইচ্ছা করলেন, ততক্ষণ তা করতে থাকলেন। তিনি (আবূ হুরায়রা) বলেন, তখন আনসারগণ তাঁর নিচে অবস্থান করছিল। হাশিম বলেন, তিনি দু'আ করলেন, আল্লাহর প্রশংসা করলেন এবং যা দু'আ করার ইচ্ছা করলেন, তা দু'আ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4839)


4839 - عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"نزل الحجر الأسود من الجنة، وهو أشدّ بياضًا من اللّبن فسوّدته خطايا بني آدم".

صحيح: رواه الترمذيّ (877) عن قتيبة، حدّثنا جرير، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، فذكره. قال الترمذي:"حسن صحيح".

وصحّحه ابن خزيمة (2733) ورواه من طريق جرير وزياد بن عبد الله - كلاهما عن عطاء بن السائب.

قلت: وفيه عطاء بن السائب ممن اختلط، وجرير ممن رواه عنه بعد الاختلاط، ولكن رواه النسائيّ (2935)، والإمام أحمد (2795) كلاهما من حديث حماد، عن عطاء بن السائب، بإسناده، مثله.

إلا أنّ النسائي ذكره مختصرًا، وحماد هو ابن سلمة وهو ممن سمع من عطاء قبل اختلاطه؛ وبهذا يكون الإسناد صحيحا فإن عطاء بن السائب ثقة، وثَّقه الأئمة.

وروي بإسناد فيه محمد بن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن عطاء بن أبي رباح، عنه، بلفظ:"الحجر الأسود من حجارة الجنة، وما في الأرض من الجنة غيره، وكان أبيض كالمها، ولولا ما مسّه من رجس الجاهلية، ما مسّه ذو عاهة إلّا برأ".

رواه الطبراني في"الكبير" (11/ 146) قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 242):"وفيه محمد ابن أبي ليلى وفيه كلام".

وهو كما قال؛ فإنّ محمد بن أبي ليلى وصف بسوء الحفظ، وفي"التقريب":"صدوق سيء الحفظ جدًا".

ومع ذلك قال المنذريّ في"الترغيب" (1797):"رواه الطبراني في"الأوسط" و"الكبير" بإسناد حسن".

قوله:"كالمها" بالفتح أي في الصفا مثل البلورة.

وما ما رُوي عن أنس مرفوعًا:"الركن والمقام ياقوتتان من يواقيت الجنة". ففيه داود بن الزّبرقان، قال الذهبي:"متروك". ومن طريقه رواه الحاكم (1/ 456).

ورُوي عنه أيضًا موقوفًا:"الحجر الأسود من الجنة".

رواه الإمام أحمد (13944) عن يحيى بن سعيد، عن شعبة، حدّثنا قتادة، عن أنس، فذكره. وإسناده صحيح، وروي مرفوعًا ولا يصح.
رواه البيهقي (5/ 75) وفيه عمر بن إبراهيم العبدي، عن قتادة، عن أنس، وفي حديثه عن قتادة مناكير كما قال الإمام أحمد، وفي غيره ثقة.

وفي الباب أحاديث أخرى كما ذكرها الهيثميّ في"المجمع" (3/ 242) إلّا أنها كلها ضعيفة.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "হাজরে আসওয়াদ জান্নাত থেকে অবতীর্ণ হয়েছে। এটি দুধের চেয়েও অধিক সাদা ছিল, কিন্তু বনী আদমের গুনাহসমূহ এটিকে কালো করে দিয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4840)


4840 - عن عبد الله بن عمرو قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الركن والمقام ياقوتتان من ياقوت الجنة، طمس الله نورهما، ولولا ذلك لأضاءتا ما بين المشرق والمغرب".

حسن: رواه ابن خزيمة (2731)، والحاكم (1/ 456)، والبيهقي (5/ 75) كلّهم من حديث أيوب بن سويد، عن يونس، عن الزهريّ، عن مسافع بن شيبة الحجبي، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.

قال الحاكم:"هذا حديث تفرّد أيوب بن سويد عن يونس، وأيوب ممن لم يحتجا به إلا أنه من أجلّة مشايخ الشّام".

وقال ابن خزيمة:"هذا الخبر لم يسنده أحدٌ أعلمه من حديث الزهريّ غير أيوب بن سويد إن كان حفظ عنه".

قلت: ليس كما قال، بل أسنده ايضًا أحمد بن شبيب، عن أبيه، عن يونس، عن الزهري، وزاد فيه:"وما مسهما من ذي عاهة ولا سقيم إلا شفي". رواه البيهقيّ.

ووالد أحمد هو شبيب بن سعيد وهو لا بأس بحديثه من رواية ابنه أحمد عنه.

وهذا متابع قوي لأيوب بن سويد الذي غالب أهل العلم على تضعيفه إلّا قوله:"وما مسهما من ذي عاهة ولا سقيم إلا شفي" فإنّها زيادة منكرة، لم يتابع عليها.

وروي هذا الحديث من غير طريق الزهري من وجهين آخرين:

فرواه الترمذي (878) عن قتيبة بن سعيد، حدثنا يزيد بن زريع.

والإمام أحمد (700) عن عفّان كلاهما -أعني يزيد وعفّان- عن رجاء أبي يحيى، عن مسافع ابن شيبة، قال: سمعت عبد الله بن عمرو يقول: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول (فذكر الحديث).

وفي مسند الإمام أحمد: أنشد بالله ثلاثًا، ووضع إصبعه في أذنيه: لسمعتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو يقول (فذكره).

وهذا شاهد لحديث الزهري كما قال الحاكم أي متابعًا له.

وصحّحه النووي في"المجموع" (8/ 36) وقال:"رواه البيهقيّ بإسناد صحيح على شرط مسلم".

قال الترمذيّ:"وقد رُوي عن عبد الله بن عمرو موقوفًا".

قلت: كذا قال أيضًا أبو حاتم في"العلل" (899)، ولكن من رواية الزهري وشعبة كلاهما عن مسافع بن شيبة. وقال:"وهو أشبه، ورجاء شيخ ليس بقوي".

قلت: وأخرجه أيضًا ابن خزيمة (2732) من طريق أبي يحيى، وقال:"لست أعرف أبا رجاء
هذا بعدالة ولا جرح، ولست أحتجّ بخبر مثله".

فلعلّه لم يقف على كلام أبي حاتم، وكلام ابن معين الذي قال فيه:"ضعيف".

وأما قول أبي حاتم:"رواه الزهريّ وشعبة كلاهما عن مسافع بن شيبة، عن عبد الله بن عمرو موقوف وهو أشبه".

فلعلّه يقصد ما رواه عبد الرزاق (8921) عن ابن جريج، عن ابن شهاب، قال: أخبرني مسافع الحجبي أنه سمع رجلًا يحدث عن عبد الله بن عمرو أنه قال (فذكر الحديث). وابن جريج مدلس وقد عنعن.

ورواه أيضًا عبد الرزاق (8915) عن ابن جريج قال: حدثني عطاء، عن عبد الله بن عمرو وكعب الأحبار أنهما قالا:"لولا ما يمسح به ذو الأنجاس من الجاهلية، ما مسّه ذو عاهة إلّا شفي، وما في الجنة شيء في الأرض إلا هو". وهذا إسناد صحيح؛ لأنّ ابن جريج صرّح به.

وقد جاء مرفوعًا عند البيهقي (5/ 75) من طريق مسدد، ثنا حماد بن زيد، عن ابن جريج، عن عطاء، عن عبد الله بن عمرو يرفعه مختصرًا، والله تعالى أعلم بالصّواب.




আব্দুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “রুকন (হাজারে আসওয়াদ) এবং মাকাম (মাকামে ইব্রাহিম) হলো জান্নাতের মণিসমূহের মধ্য থেকে দুটি মণিমুক্তা। আল্লাহ তাদের জ্যোতি বিলীন করে দিয়েছেন। যদি তা না হতো, তবে তারা পূর্ব ও পশ্চিমের মধ্যবর্তী সকল স্থান আলোকিত করে দিত।”









আল-জামি` আল-কামিল (4841)


4841 - عن ابن عمر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"مسح الحجر والركن اليماني يحطُّ الخطايا حطًّا".

صحيح: رواه الإمام أحمد (5621)، وابن حبان (3698) كلاهما من حديث عبد الرزاق -وهو في مصنفه (8877) -، عن سفيان الثوريّ، عن عطاء بن السائب، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن أبيه، عن ابن عمر، فذكره.

وإسناده صحيح، وعطاء بن السائب ثقة، وثَّقه الأئمة لكنه اختلط ولكن روي عنه سفيان الثوريّ قبل الاختلاط. وصحّحه ابن خزيمة (2729) من طريق هشيم، عن عطاء، فذكر مثله.

ورواه الترمذيّ (959) من طريق جرير، عن عطاء بن السائب بإسناده وزاد فيه:"من طاف بهذا البيت أسبوعًا فأحصاه كان كعتق رقبة" وسيأتي ذكر هذا الحديث؛ لأن فيه جريرًا وهو ابن عبد الحميد سمع من عطاء بعد الاختلاط وهو سيأتي.




ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "হাজরে আসওয়াদ এবং রুকনে ইয়ামানি স্পর্শ করা সম্পূর্ণরূপে পাপসমূহ মোচন করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4842)


4842 - عن المنكدر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من طاف حول البيت أسبوعًا لا يلغو
فيه كان كعدل رقبة يعتقها".

حسن: رواه الطبرانيّ في"الكبير" (20/ 360) وعنه أبو نعيم في"معرفة الصحابة" (5/ 2601) في ترجمة المنكدر بن عبد الله بن الهدير القرشيّ التيميّ.

وأخرجه أيضًا الحاكم (3/ 457) كلّهم من طريق علي بن عبد العزيز، ثنا أبو نعيم، ثنا حريث بن السائب، ثنا محمد بن المنكدر، عن أبيه، فذكره.

قال أبو نعيم:"ورواه شعبة عن محمد بن المنكدر نحوه".

ثمّ رواه من طريق وهب بن جرير، عن شعبة، عن محمد بن المنكدر، عن أبيه بلفظ:"من طاف بالبيت كان كعتق رقبة".

وذكره المنذريّ في"الترغيب والترهيب" (1784) وعزاه إلى الطبراني وقال:"رواته ثقات" وكذلك قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 245) وكذلك قال الحافظ في"مختصر الترغيب والترهيب" (99 - 109). وأبو نعيم هو الفضل بن دكين من كبار شيوخ البخاريّ.

وإسناده حسن من أجل حريث بن السائب فإنه حسن الحديث وقد توبع.




মুনকাদার থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি বাইতুল্লাহর চারপাশে সাতবার তাওয়াফ করে এবং তাতে কোনো অনর্থক কথা বলে না, সে একটি দাস মুক্ত করার সমান সওয়াব লাভ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4843)


4843 - عن عبد الله بن عبيد بن عمير، أَنَّ رَجُلا قَالَ: يَا أَبَا عبد الرحمن مَا أَرَاكَ تَسْتَلِمُ إِلا هَذَيْنِ الرُّكْنَيْنِ؟ قَالَ: إِنِّي سَمِعْتُ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم يَقُولُ:"إِنَّ مَسْحَهُمَا يَحُطَّانِ الْخَطِيئَةَ". وَسَمِعْتُهُ يَقُولُ:"مَنْ طَافَ سَبْعًا فَهُوَ كَعِدْلِ رَقَبَةٍ".

صحيح: رواه النسائيّ (2919) عن قتيبة، قال: حدّثنا حماد، عن عطاء، عن عبد الله بن عبيد ابن عمير، فذكره.

والرجل المبهم هو ابن عمير أبوه كما جاء مصرَّحًا به في الروايات الأخرى. وعطاء هو ابن السائب اختلط في آخره. وإسناده صحيح؛ فإن حمادا هو ابن زيد ممن سمع من عطاء قبل اختلاطه. وأبو عبد الرحمن هو عبد الله بن عمر.




আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একজন ব্যক্তি তাঁকে বললেন, "হে আবূ আব্দুর রহমান! আমি আপনাকে এই দুটি রুকন (কোণ) ছাড়া অন্য কিছুকে স্পর্শ (ইস্তিলাম) করতে দেখি না কেন?" তিনি বললেন, "আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: 'নিশ্চয়ই সে দুটি স্পর্শ করলে পাপসমূহ ঝরে যায়।' এবং আমি তাঁকে [নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে] আরো বলতে শুনেছি: 'যে ব্যক্তি সাতবার তাওয়াফ করবে, সে একটি গোলাম আযাদ করার সমতুল্য।'"









আল-জামি` আল-কামিল (4844)


4844 - عن ابن عمر، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"مَنْ طَافَ بِهَذَا الْبَيْتِ أُسْبُوعًا فَأَحْصَاهُ كَانَ كَعِتْقِ رَقَبَةٍ".

وَسَمِعْتُهُ يَقُول:"لا يَضَعُ قَدَمًا وَلا يَرْفَعُ أُخْرَى إِلا حَطَّ اللهُ عَنْهُ خَطِيئَةً وَكَتَبَ لَهُ بِهَا حَسَنَةً".

صحيح: رواه الترمذيّ (959)، والحاكم (1/ 489)، وابن حبان (3697) كلّهم من حديث جرير بن عبد الحميد.

ورواه ابن أبي شيبة (4/ 192 - تحقيق اللحام) من طريق محمد بن فضيل. كلاهما عن عطاء بن السائب، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، عن أبيه، عن ابن عمر، فذكر الحديث.

قال الحاكم:"حديث صحيح على ما بينته من حال عطاء بن السّائب، ولم يخرجاه".
وفي كلام الحاكم إشارة إلى ما قيل في عطاء بن السّائب أي أنه مختلط، وجرير بن عبد الحميد ممن سمع منه بعد الاختلاط.

قال ابن معين:"ما سمع منه جرير ليس من صحيح حديثه"، وقال العقيلي:"من سمع منه من الكبار صحيح مثل سفيان وشعبة، وأما جرير وأشباهه فلا".

قلت: وهو كما قالوا، ولكن روي سفيان عنه جزءًا من الحديث وهو حطّ الخطايا، وحماد بن زيد ذكر مع الجزء الأول الجزء الثاني من الحديث وهو فضل الطواف، وجمع جرير بن عبد الحميد ومحمد بن فضيل الجزئين من الحديث في حديث واحد.

فالظاهر أن عطاء بن السائب لم يختلط في رواية هذا الحديث بجزئيه لوجود متابعين لكل جزء منهما من الراويين اللذين سمعا منه قبل الاختلاط. وبهذا صحَّ إسناد الحديث فإن عطاء بن السائب ثقة، وثَّقه الأئمة.

وتابعهما هشيم في جمع أجزاء هذا الحديث في حديث واحد، رواه الإمام أحمد (4462) عنه، عن عطاء بن السائب، عن عبد الله بن عبيد بن عمير، أنه سمع أباه يقول لابن عمر: ما لي لا أراك تستلم إلّا هذين الركنين: الحجر الأسود، والركن اليماني؟ فقال ابن عمر: إن أفعل فقد سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إن استلامهما يحطّ الخطايا".

وسمعته يقول:"من طاف أسبوعًا يحصيه، وصلى ركعتين كان له كعدل رقبة". وسمعته يقول:"ما رفع رجلٌ قدمًا ولا وضعها إلا كتبتْ له عشر حسنات، وحُطّ عنه عشر سيئات، ورفع له عشر درجات".

وهشيم بن بشير هو أيضًا ممن سمع من عطاء بن السائب بعد الاختلاط.

وأخرجه البغوي في"شرح السنة" (1916) من طريق هشيم وقال:"حديث حسن" وهو كما قال لوجود متابعات لهشيم في أجزاء هذا الحديث.

وأمّا ما رواه ابن ماجه (2956) عن علي بن محمد، حدثنا محمد بن الفضيل، عن العلاء بن المسيب، عن عطاء، عن عبد الله بن عمر، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من طاف بالبيت وصلّي ركعتين كان كعتق رقبة".

ففيه انقطاع فإنّ عطاء وهو ابن أبي رباح لم يسمع من ابن عمر.

قال الإمام أحمد:"قد رأى ابن عمر ولم يسمع منه"، وقال ابن معين:"لم يسمع من ابن عمر شيئًا، ولكنه قد رآه ولا يصح له سماع".

قلت: وقد رُوي موقوفًا، رواه ابن جريج، عن عطاء، عنه. رواه ابن أبي شيبة (4/ 192).

ورجاله ثقات، وابن جريج مدلس وقد عنعن.

وفي الباب ما رُوي أيضًا عن ابن عباس مرفوعًا:"من طاف بالبيت خمسين مرة، خرج من ذنوبه كيوم ولدته أمُّه".
رواه الترمذيّ (866) عن سفيان بن وكيع، حدّثنا يحيى بن يمان، عن شريك، عن أبي إسحاق، عن عبد الله بن سعيد بن جبير، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره.

قال الترمذي:"حديث غريب، سألت محمدًا عن هذا الحديث فقال: إنما يروى هذا عن ابن عباس قوله".

وهو كما قال، فقد رواه ابن أبي شيبة (4/ 192 - تحقيق اللحام) من طريق مطرف، عن أبي إسحاق، بإسناده إلا أنه وقع فيه عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، ولم يذكر فيه عبد الله بن سعيد فهل وقع فيه تحريف أو هو هكذا؟ . كما أنّ شريكًا رواه أيضًا موقوفًا.

رواه عبد الرزاق (9809) عن ابن المبارك، عن شريك، بإسناده موقوفًا.

وشريك هو ابن عبد الله النخعي الكوفي سيء الحفظ، وأبو إسحاق هو السبيعي مدلّس وقد عنعن، كما أنه اختلط في آخره.

ورواه أحمد بن محمد بن عمر بن يونس اليماميّ عن عبد الرزاق بإسناده مرفوعًا ولفظه:"من طاف بهذا البيت خمسين أسبوعًا غفر له". رواه ابن شاهين في"الترغيب في فضائل الأعمال" (333) عن محمد بن يعقوب الخضيب، ثنا أحمد بن محمد بن عمر اليماميّ، فذكره.

واليمامي هذا ضعيف جدًّا، حدّث بنسخ عن الثقات بعجائب. قال ابن عدي:"تكثر عجائب اليمامي هذا، وهو مقارب الحديث وهو إلى الضعف أقرب منه إلى الصدق".

وفي الباب أيضًا عن عبد الله بن عمرو، عن النبي صلى الله عليه وسلم:"من طاف سبعًا وصلّى خلف المقام ركعتين فهو عدل محرر".

رواه ابن شاهين في"الترغيب في فضائل الأعمال" (331) عن عبد الله بن محمد، ثنا هدبة بن خالد، ثنا حماد بن الجعد، ثنا قتادة، ثنا عطاء بن أبي رباح، أنّ مولى لعبد الله بن عمرو حدّثه عن عبد الله بن عمرو، فذكره.

وفيه حماد بن الجعد هو الهذلي البصريّ ضعفه ابن معين والنسائي وأبو داود وليّنه أبو زرعة، وفيه جهالة مولي عبد الله بن عمرو بن العاص.

وقد رُوي موقوفًا على عبد الله بن عمرو، رواه عبد الرزاق (8825) عن معمر، عن حوشب، عن عطاء بن أبي رباح، يحدث عن عبد الله بن عمرو قال:"من طاف باليت، وصلى ركعتين لا يقول إلّا خيرًا كان كعدل رقبة".

وفي الباب ما رُوي عن عائشة أيضًا مرفوعًا:"إنّ الله يباهي بالطّائفين".

رواه أبو يعلى (4609)، والخطيب في"تاريخ بغداد" (916) في ترجمة محمد بن صبيح، وابن السماك، وابن عدي في"الكامل" (5/ 1992) في ترجمة عائذ بن نسير لبيان مناكيره، كلّهم من طريق عائذ بن نسير، عن عطاء، عن عائشة، فذكرته.
وعائذ بن نُسير منكر الحديث. قال يحيى:"ليس به بأس، ولكن روى حديث مناكير"، وفي رواية عثمان بن سعيد، قال: قلت ليحيى بن سعيد: عائذ بن نسير كيف حديثه؟ قال:"ضعيف".

وأورد الذهبي هذا الحديث في"الميزان" في ترجمة عائذ بن نسير لبيان مناكيره.

وقال ابن عدي: وكلّ هذه الأحاديث غير محفوظة.

تنبيه: تحرّف في بعض المصادر"ابن نسير" إلى"ابن بشير".

وفي الباب ما رُوي عن داود بن عجلان، قال:"طُفْنَا مَعَ أَبِي عِقَالٍ فِي مَطَرٍ فَلَمَّا قَضَيْنَا طَوَافَنَا أَتَيْنَا خَلْفَ الْمَقَامِ فَقَالَ: طُفْتُ مَعَ أَنَسِ بْنِ مَالِكٍ فِي مَطَرٍ، فَلَمَّا قَضَيْنَا الطَّوَافَ أَتَيْنَا الْمَقَامَ فَصَلَّيْنَا رَكْعَتَيْنِ، فَقَال لَنَا أَنَسٌ:"ائْتَنِفُوا الْعَمَلَ فَقَدْ غُفِرَ لَكُمْ" هَكَذَا قَالَ لَنَا رَسُولُ اللهِ صلى الله عليه وسلم وَطُفْنَا مَعَهُ فِي مَطَرٍ".

رواه ابن ماجه (3118) عن محمد بن أبي عمر العدنيّ، حدّثنا داود بن عجلان، فذكره.

وداود بن عجلان هو البلخيّ نزل مكة، قال ابن حبان:"يروي عن أبي عقال عن أنس المناكير الكثيرة والأشياء الموضوعة" ثم ذكر هذا الحديث.

وضعّفه أيضًا ابن معين، وأبو داود، والبيهقي، والحاكم وغيرهم.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "যে ব্যক্তি এই ঘরের (কা'বার) সাতবার তাওয়াফ করবে এবং তা যথাযথভাবে সম্পন্ন করবে, তা একটি গোলাম আযাদ করার সমতুল্য হবে।"

তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরও বলেন, আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: "সে যখন কোনো কদম ফেলে বা অন্য কদম তোলে, আল্লাহ এর বিনিময়ে তার থেকে একটি গুনাহ দূর করে দেন এবং তার জন্য একটি নেকী লেখেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (4845)


4845 - عن عمر أَنَّهُ جَاءَ إِلَى الْحَجَرِ الأَسْوَدِ فَقَبَّلَهُ فَقَال: إِنِّي أَعْلَمُ أَنَّكَ حَجَرٌ لا تَضُرُّ وَلا تَنْفَعُ وَلَوْلا أَنِّي رَأَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم يُقَبِّلُكَ مَا قَبَّلْتُكَ.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1597)، ومسلم في الحج (1270: 251) كلاهما من طريق الأعمش، عن إبراهيم، عن عابس بن ربيعة، عن عمر، فذكره.

وأما ما رواه الحاكم (1/ 457) من حديث أبي سعيد الخدري، عن عمر في هذا الحديث مطوّلًا وفيه قصة لعلي إلا أنه ليس على شرط الشيخين كما قال الحاكم فإنهما لم يخرّجا لأبي هارون عمارة بن جوين العبدي. قال فيه الذهبي:"ساقط". وقال الحافظ في"التلخيص" (2/ 246):"هو ضعيف جدًا".




উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে তিনি হাজারে আসওয়াদের (কালো পাথর) কাছে এসে তাতে চুম্বন করলেন এবং বললেন: ‘আমি অবশ্যই জানি যে তুমি এমন একটি পাথর যা কোনো ক্ষতিও করতে পারে না এবং কোনো উপকারও করতে পারে না। আর আমি যদি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তোমাকে চুম্বন করতে না দেখতাম, তবে আমি তোমাকে চুম্বন করতাম না।’









আল-জামি` আল-কামিল (4846)


4846 - عن عمر بن الخطاب، قال لِلرُّكْنِ: أَمَا وَاللهِ! إِنِّي لأَعْلَمُ أَنَّكَ حَجَرٌ لا تَضُرُّ وَلا تَنْفَعُ وَلَولا أَنِّي رَأَيْتُ النَّبِيَّ صلى الله عليه وسلم اسْتَلَمَكَ مَا اسْتَلَمْتُكَ، فَاسْتَلَمَه. ثُمَّ قَال: فَمَا لَنَا وَلِلرَّمَلِ إِنَّمَا كُنَّا رَاءَيْنَا بِهِ الْمُشْرِكِينَ وَقَدْ أَهْلَكَهُم اللهُ. ثُمَّ قَال: شَيْءٌ صَنَعَهُ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم فَلا نُحِبُّ أَنْ نَتْرُكَهُ.

صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1605) عن سعيد بن أبي مريم، أخبرنا محمد بن جعفر، أخبرني زيد بن أسلم، عن أبيه، أن عمر بن الخطاب قال فذكره.




উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (হাজারে আসওয়াদ) রুকন-কে লক্ষ্য করে বললেন: আল্লাহর কসম! আমি নিশ্চিত জানি যে তুমি একটি পাথর, যার ক্ষতি বা উপকার করার কোনো ক্ষমতা নেই। যদি আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তোমাকে চুম্বন/স্পর্শ করতে না দেখতাম, তবে আমি তোমাকে চুম্বন/স্পর্শ করতাম না। এরপর তিনি সেটিকে চুম্বন/স্পর্শ করলেন। এরপর তিনি বললেন: রমল (তাওয়াফে দ্রুত পায়ে চলা) করার আমাদের কী প্রয়োজন? আমরা তো এর দ্বারা মুশরিকদেরকে দেখাতাম, আর আল্লাহ তো তাদের ধ্বংস করে দিয়েছেন। এরপর তিনি বললেন: এটি এমন একটি কাজ যা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) করেছেন, তাই আমরা তা পরিহার করতে পছন্দ করি না।









আল-জামি` আল-কামিল (4847)


4847 - عن سويد بن غفلة، قال: رأيتُ عمر قبَّل الحجَرَ والتزمَهُ، وقال: رأيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بك حفِيًّا.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1271) من طريق وكيع، عن سفيان (هو الثوري)، عن إبراهيم ابن عبد الأعلى، عن سويد بن غفلة، به، فذكره.

قال مسلم: وحدثنيه محمد بن المثنى، حدّثنا عبد الرحمن (هو ابن مهدي)، عن سفيان بهذا الإسناد، قال:"ولكني رأيت أبا القاسم بك حفيًّا" ولم يقل:"والتزمه".




সুয়াইদ ইবনু গাফালাহ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেখলাম, তিনি হাজারে আসওয়াদে চুম্বন করলেন এবং তা জড়িয়ে ধরলেন। আর তিনি বললেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি, তিনি তোমার প্রতি যত্নবান ছিলেন।