হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (4961)


4961 - عن أبي جحيفة، قال: صليتُ مع النبيّ صلى الله عليه وسلم بمنى الظّهر ركعتين، ثم لم نزل نصلي ركعتين حتى رجع إلى المدينة.
صحيح: رواه أبو بكر بن أبي شيبة (2/ 448)، والطبرانيّ في الكبير (22/ 102) كلاهما من حديث وكيع، ثنا سفيان، وابن أبي ليلى، عن عون بن أبي جحيفة، عن أبيه، فذكره. وإسناده صحيح.




আবু জুহাইফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মিনায় যুহরের সালাত দুই রাকাত আদায় করলাম। এরপর তিনি মদীনায় ফিরে আসা পর্যন্ত আমরা সর্বদা দুই রাকাতই সালাত আদায় করে গেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (4962)


4962 - عن عمران بن حصين عن صلاة المسافر فقال: حججت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلّى ركعتين، وحججت مع أبي بكر فصلّى ركعتين، ومع عمر فصلى ركعتين، ومع عثمان ست سنين من خلافته أو ثماني سنين فصلى ركعتين - ثم إنّ عثمان صلّى بعد ذلك أربعًا.

حسن: رواه الترمذيّ (545) -واللفظ له-، وأبو داود (1229) مختصرًا، والإمام أحمد (19865)، وأبو بكر بن أبي شيبة (2/ 450) في سياق أطول من هذا - كلّهم من طريق علي بن جدعان، عن أبي نضرة، أنّ فتي سأل عمران بن حصين، عن صلاة رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال (فذكره).

وزاد الإمام أحمد:"ثم إن عثمان صلّى بعد ذلك أربعًا".

وعلي بن جدعان هو: علي بن زيد بن عبد الله بن زهير بن عبد الله بن جدعان التيميّ البصريّ ضعيف إلّا ما رُوي عن الترمذي فإنه قال:"صدوق"، ولذا حسّن هذا الحديث.

قلت: وهو كذلك في هذا الحديث لوجود شواهده بأن عثمان كان يُتمّ في منى بعد ذلك.

وفي الباب ما رُوي عن أبي ذر، رواه القاسم بن عوف الشيباني عن رجل، قال:"كنا قد حملنا لأبي ذر شيئًا نريد أن نعطيه إياه، فأتينا الرَّبذة فسألنا عنه فلم نجده، قيل استأذن في الحجّ فأذن له فأتيناه بالبلدة وهي مني، فبينا نحن عنده إذ قيل له: إن عثمان صلّي أربعًا فاشتدّ ذلك على أبي ذر وقال قولا شديدًا، وقال:"صليت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلى ركعتين، وصليت مع أبي بكر وعمر" ثم قام أبو ذر فصلّي أربعًا فقيل له: عبْتَ على أمير المؤمنين شيئًا ثم صنعت! قال: الخلافُ أشدّ، إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم خطبنا فقال:"إنّه كائن بعدي سلطان فلا تُذلوه، فمنْ أراد أن يذلَّه فقد خلع رِبْقَةَ الإسلام من عنقه، وليس بِمقبولٍ منه توبةٌ حتى يسُدَّ ثلمته التي ثَلَم وليس بفاعل، ثم يعود فيكون فيمن يُعزّه"."أمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن لا يغلبونا على ثلاثٍ: أنْ نأمر بالمعروف، ونهى عن المنكر، ونعلم الناس السنن".

رواه الإمام أحمد (21460) عن يزيد ومحمد بن يزيد قالا: حدّثنا العوّام. قال محمد: عن القاسم، وقال يزيد في حديثه: حدثني القاسم بن عوف الشيباني، عن رجل، قال: فذكره. وفيه رجل مبهم لا يُعرف.




ইমরান ইবনে হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মুসাফিরের সালাত (নামাজ) সম্পর্কে বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হজ করেছি, তখন তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন। আমি আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে হজ করেছি, তখন তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন। উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও হজ করেছি, তখন তিনিও দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন। উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর খিলাফতের ছয় বছর বা আট বছর পর্যন্ত আমি তাঁর সাথেও হজ করেছি, তখন তিনিও দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন। এরপর উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চার রাকাত সালাত আদায় করেন।

এই বিষয়ে আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও একটি বর্ণনা রয়েছে (যাতে বলা হয়েছে): আমরা আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে দেওয়ার জন্য কিছু জিনিসপত্র বহন করেছিলাম। আমরা রাবাযায় গেলাম এবং তাঁর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলাম, কিন্তু তাঁকে পেলাম না। বলা হলো, তিনি হজের অনুমতি চেয়েছেন এবং তাঁকে অনুমতি দেওয়া হয়েছে। আমরা তাঁকে মিনায় পেলাম। আমরা যখন তাঁর কাছে ছিলাম, তখন তাঁকে জানানো হলো: উসমান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) চার রাকাত সালাত আদায় করেছেন। এতে আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) অত্যন্ত মর্মাহত হলেন এবং কঠোর ভাষায় কিছু বললেন। তিনি বললেন: "আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করেছি, তখন তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করেছেন। আমি আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথেও সালাত আদায় করেছি (তখনও দুই রাকাত ছিল)।"

এরপর আবু যার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) উঠে দাঁড়ালেন এবং চার রাকাত সালাত আদায় করলেন। তখন তাঁকে বলা হলো: আপনি আমীরুল মুমিনীন-এর কৃতকর্মের সমালোচনা করলেন, অথচ আপনি নিজেই তাই করলেন! তিনি বললেন: মতবিরোধ তার চেয়েও কঠিন। নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিয়েছিলেন এবং বলেছিলেন: "আমার পরে নেতৃত্ব আসবে, তোমরা তাদেরকে অপমানিত করো না। যে ব্যক্তি তাদেরকে অপমানিত করতে চাইবে, সে তার গলা থেকে ইসলামের রশি খুলে ফেলল। এবং তার তওবা ততক্ষণ পর্যন্ত কবুল হবে না যতক্ষণ না সে তার সৃষ্ট ফাটল মেরামত করে, আর সে তা করবেও না। তারপর সে ফিরে আসবে এবং সে তাদের অন্তর্ভুক্ত হবে যারা সেই শাসককে সম্মান করে।" রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদেরকে তিনটি বিষয়ে পরাজিত না হওয়ার নির্দেশ দিয়েছেন: আমরা যেন সৎকাজের আদেশ দেই, মন্দ কাজ থেকে নিষেধ করি এবং মানুষকে সুন্নাত শিক্ষা দেই।









আল-জামি` আল-কামিল (4963)


4963 - عن جابر بن عبد الله قال: فلما كان يوم التروية توجهوا إلى منى فأهلوا بالحج وركب رسول الله صلى الله عليه وسلم فصلّي به الظّهر والعصر والمغرب والعشاء والفجر، ثم مكث
قليلا حتى طلعت الشمس وأمر بقبة من شعر تضرب له بنمرة، فسار رسول الله صلى الله عليه وسلم ولا تشكّ قريش إلا أنه واقف عند المشعر الحرام -كما كانت قريش تصنع في الجاهليّة-، فأجاز رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى أتي عرفة فوجد القبّة قد ضُربت له بنمرة فنزل بها.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر بطوله في حجّة النبيّ صلى الله عليه وسلم.

قوله:"نمرة" هي موضع بجنب عرفات وليس من عرفات.

أما قوله:"حتى أتى عرفة، فوجد القبة قد ضربت له بنمرة" ففيه تجوّز، والمراد قارب عرفات. انظر شرح مسلم للنوويّ (8/ 180).




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তারবিয়াহর দিন (৮ যুলহিজ্জা) এলো, তারা মিনার দিকে রওনা হলেন এবং হজের ইহরাম বাঁধলেন। আর আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হলেন এবং সেখানে (মিনায়) তিনি যোহর, আসর, মাগরিব, ইশা ও ফজর সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি সূর্যোদয় হওয়া পর্যন্ত সেখানে কিছুক্ষণ অবস্থান করলেন। এবং তিনি নামিরাহতে তাঁর জন্য পশমের একটি তাঁবু স্থাপনের নির্দেশ দিলেন। অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চলতে শুরু করলেন। কুরাইশরা সন্দেহ করছিল না যে, তিনি অবশ্যই মাশ‘আরুল হারামের কাছে অবস্থান করবেন—যেমন জাহেলিয়াতের যুগে কুরাইশরা করতো—কিন্তু রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মাশ‘আরুল হারাম) পার হয়ে চলে গেলেন, অবশেষে তিনি আরাফাতে পৌঁছলেন এবং দেখতে পেলেন তাঁর জন্য নামিরাহতে তাঁবু স্থাপন করা হয়েছে। অতঃপর তিনি সেখানে অবতরণ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4964)


4964 - عن ابن عمر، قال: غدا رسول الله صلى الله عليه وسلم من مني حين صلي الصبح صبيحة يوم عرفة حتى أتي عرفة، فنزل بنمرة وهي منزل الإمام الذي ينزل فيه بعرفة، حتى إذا كان عند صلاة الظهر راح رسول الله صلى الله عليه وسلم مهجِّرًا، فجمع بين الظهر والعصر ثم خطب الناس ثم راح فوقف على الموقف من عرفة.

حسن: رواه أبو داود (1913) عن أحمد وهو في مسنده (6130) عن يعقوب بن إبراهيم، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق وهو حسن الحديث إذا صرَّح بالتحديث كما في هذا الحديث.




ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফার দিনের সকালে ফজরের সালাত আদায় করার পর মিনা থেকে রওনা হলেন, যতক্ষণ না তিনি আরাফায় পৌঁছলেন। অতঃপর তিনি নামিরাহ-তে অবতরণ করলেন। এটি হলো সেই স্থান যেখানে আরাফায় ইমাম অবস্থান করেন। যখন যোহরের সালাতের সময় হলো, তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুপুর বেলায় (তাজির করে) যাত্রা শুরু করলেন, এবং যোহর ও আসরের সালাত একত্রে আদায় করলেন। এরপর তিনি লোকদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দিলেন। অতঃপর তিনি যাত্রা করে আরাফার (নির্ধারিত) স্থানে গিয়ে অবস্থান নিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4965)


4965 - عن محمد بن أبي بكر الثقفيّ: أنه سأل أنس بن مالك -وهما غاديان من مني إلى عرفة-: كيف كنتم تصنعون في هذا اليوم مع رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: كان يهلُّ المهلُّ منا فلا يُنكر عليه، ويُكبِّر المكبِّرُ فلا يُنكر عليه.

متفق عليه: رواه مالك في الحج (43) عن محمد بن أبي بكر الثقفيّ، بالإسناد.

ورواه البخاريّ في الحج (1659)، ومسلم في الحج (1285) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.

ورواه مسلم من طريق موسى بن عقبة، حدّثني محمد بن أبي بكر قال: قلت لأنس بن مالك غداة عرفة: ما تقول في التلبية هذا اليوم؟ قال (فذكره بنحوه).




আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মদ ইবনে আবি বকর আস-সাকাফী তাঁকে জিজ্ঞেস করেছিলেন—যখন তারা মিনা থেকে আরাফার দিকে যাচ্ছিলেন—: "এই দিনে আপনারা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে কেমন করতেন?" তিনি বললেন: "আমাদের মধ্যে যে ব্যক্তি তালবিয়া পাঠ করত, তার প্রতি আপত্তি করা হতো না; এবং যে ব্যক্তি তাকবীর পাঠ করত, তার প্রতিও আপত্তি করা হতো না।"









আল-জামি` আল-কামিল (4966)


4966 - عن عبد الله بن عمر، قال: غدونا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم من مِني إلى عرفات، مِنَّا الملبِّي، ومِنَّا المكبِّر.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1284) من طريق يحيي بن سعيد (هر الأنصاريّ)، عن عبد الله ابن أبي سلمة (هو الماجشون)، عن عبد الله بن عبد الله بن عمر، عن أبيه، به.

ورواه مسلم أيضًا من طريق عمر بن حسين، عن عبد الله بن أبي سلمة، عن عبد الله بن عبد الله بن عمر، عن أبيه، قال:"كنّا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في غداة عرفة، فمنّا المكبِّر، ومنّا المهلّل، فأمّا نحن فنكبِّر". قال: قلت: واللهِ! لعجبًا منكم! ، كيف لم تقولوا له: ماذا رأيتَ رسول الله يصنع؟ ! .




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে মিনা থেকে আরাফাতের দিকে রওনা হলাম। আমাদের মধ্যে কেউ তালবিয়াহ পাঠ করছিল, আর কেউ তাকবীর বলছিল।

(অন্য এক বর্ণনায় আছে) তিনি বলেন: আমরা আরাফার সকালে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর সাথে ছিলাম। আমাদের মধ্যে কেউ তাকবীর বলছিল, আর কেউ তাহলীল (লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ) বলছিল। কিন্তু আমরা তখন তাকবীর বলছিলাম। [রাবী] বলেন: আমি বললাম: আল্লাহর কসম! আমি তোমাদের দেখে অবাক হচ্ছি! তোমরা কেন তাকে জিজ্ঞেস করলে না যে তোমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে কী করতে দেখেছো?!









আল-জামি` আল-কামিল (4967)


4967 - عن سالم بن عبد الله أنه قال: كتب عبد الملك بن مروان إلى الحجاج بن يوسف: أنْ لا تخالف عبد الله بن عمر في شيء من أمر الحجِّ. قال: فلمّا كان يوم عرفة، جاءه عبد الله بن عمر حين زالت الشّمس وأنا معه، فصاح به عند سُرادقِه: أيْنَ هذا؟ فخرج عليه الحجّاج وعليه مِلْحفةٌ مُعَصْفرة، فقال: ما لك يا أبا عبد الرحمن؟ فقال: الرَّواح إنْ كنتَ تُريد السُّنة. فقال: أهذه السّاعة؟ قال: نعم. قال: فأنظرني حتّى أفيض عليَّ ماءً، ثم أخْرُجَ، فنزل عبد الله، حتى خرج الحجّاج فسار بيني وبين أبي، فقلت له: إن كنتَ تريدُ أن تُصيب السُّنة اليوم فاقْصُر الخطبة وعجِّلْ الصَّلاةَ. قال: فجعل ينظر إلى عبد الله بن عمر كيما يسمع ذلك منه، فلمّا رأى ذلك عبد الله قال: صدق سالم.

صحيح: رواه مالك في الحج (194) عن ابن شهاب، عن سالم، به.

ورواه البخاريّ في الحجّ (1660) من طريق مالك، به، مثله.

ورواه أيضًا (1662) معلقًا عن الليث، حدّثني عقيل، عن ابن شهاب، قال: أخبرني سالمٌ:"أنّ الحجّاج بن يوسف -عام نزل بابن الزبير رضي الله عنهما سأل عبد الله رضي الله عنه: كيف تصنعُ في الموقف يوم عرفة؟ فقال سالم: إن كنتَ تريد السّنة فهجِّر بالصّلاة يوم عرفة. فقال عبد الله بن عمر: صدق إنّهم كانوا يجمعون بين الظهر والعصر في السُّنة. فقلت لسالم: أفعل ذلك رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال: وهل يتبعون بذلك إلّا سنته؟ !". قال الحافظ في الفتح (3/ 514):"وصله الإسماعيليّ من طريق يحيى بن بكير وأبي صالح جميعًا عن الليث".

وأمّا ما رواه سعيد بن حسان، عن ابن عمر، قال: لما قتل الحجاجّ ابنَ الزّبير أرسل إلى ابن عمر:"أية ساعة كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يروح في هذا اليوم؟ قال: إذا كان ذلك رُحنا، فلما أراد ابن عمر أن يروح قالوا: لم تزغ. قال: أزاغت الشمس؟ قالوا: لم تزغ الشمس. قال: فلما قالوا: زاغت الشمس ارتحل" ففيه سعيد بن حسان لم يوثقه أحد، وذكره ابن حبان في الثقات، ولم يرو عنه إلا اثنان، فهو"مقبول" عند الحافظ ابن حجر.
ومن طريقه رواه أبو داود (1914) عن الإمام أحمد -وهو في مسنده (4782) -، ورواه أيضا ابن ماجه (3009) عن وكيع، حدّثنا نافع بن عمر الجمحيّ، عن سعيد بن حسان، فذكره.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পুত্র সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ (রহ.) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আব্দুল মালিক ইবনু মারওয়ান হাজ্জাজ ইবনু ইউসুফের কাছে লিখলেন যে, হজ্জের কোনো বিষয়েই যেন সে আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর বিরোধিতা না করে।

তিনি (সালিম) বলেন: এরপর যখন আরাফার দিন এলো, সূর্য ঢলে যাওয়ার পর আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর (হাজ্জাজের) কাছে এলেন, আর আমিও তাঁর সাথে ছিলাম। তিনি হাজ্জাজের তাঁবুর কাছে গিয়ে চিৎকার করে ডাকলেন: "কোথায় সে?" হাজ্জাজ একটি জাফরান রঙ করা চাদর পরিহিত অবস্থায় তার সামনে বের হয়ে আসলো এবং বললো: হে আবূ আব্দুর রহমান! আপনার কী চাই? তিনি (ইবনু উমর) বললেন: আপনি যদি সুন্নাহর অনুসরণ করতে চান, তবে (আরাফার দিকে) রওনা হোন। হাজ্জাজ বললো: এখনই? তিনি বললেন: হ্যাঁ। হাজ্জাজ বললো: আমাকে একটু অবকাশ দিন, আমি শরীরে কিছু পানি ঢেলে তারপর বের হচ্ছি। তখন আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) (সওয়ারী থেকে) অবতরণ করলেন, যতক্ষণ না হাজ্জাজ বেরিয়ে এলো এবং আমার ও আমার বাবার মাঝখান দিয়ে হাঁটতে শুরু করলো। আমি (সালিম) তাকে (হাজ্জাজকে) বললাম: আপনি যদি আজ সুন্নাহর উপর আমল করতে চান, তবে খুৎবা সংক্ষিপ্ত করুন এবং সালাত তাড়াতাড়ি আদায় করুন। তিনি (হাজ্জাজ) তখন আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দিকে এমনভাবে তাকাতে লাগলেন যেন তিনি তাঁর মুখ থেকে ঐ কথাটি শোনেন। যখন আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এ দৃশ্য দেখলেন, তিনি বললেন: সালিম সত্য বলেছে।









আল-জামি` আল-কামিল (4968)


4968 - عن جابر قال: فخطب الناس وقال (فذكر خطبته صلى الله عليه وسلم" … ثم أذّن، ثم أقام فصلّى الظهر، ثم أقام فصلّى العصر، ولم يصلِّ بينهما شيئًا … الحديث.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر الحديث بطوله في حجة النبي صلى الله عليه وسلم.

ورواه أبو داود (1905) من هذا الوجه مسندًا، كما رواه أيضًا (1906) من وجه آخر عن عبد الله بن مسلمة، حدّثنا سليمان - يعني ابن بلال ح. وعن أحمد بن حنبل، حدّثنا عبد الوهاب الثقفيّ -المعنى واحد-، عن جعفر بن محمد، عن أبيه:"أن النبيّ صلى الله عليه وسلم صلّى الظهر والعصر بأذان واحد بعرفة، ولم يسبِّح بينهما وإقامتين، وصلى المغرب والعشاء بجمع بأذان واحد وإقامتين ولم يسبّح بينهما" مرسلًا؛ فإنّ والد جعفر هو محمد بن علي بن حسين بن علي بن أبي طالب أبو جعفر الباقر لم يدرك النبيّ صلى الله عليه وسلم إلّا أن هذا المرسل لا يُعلُّ الموصولَ، وفي كلام أبي داود إشارة إلى ذلك فإنه قال عقب حديث محمد بن علي بن حسين:"هذا الحديث أسنده حاتم بن إسماعيل في الحديث الطويل (وهو حديث جابر في صفة حجة النبي صلى الله عليه وسلم"، ووافق حاتم بنَ إسماعيل على إسناده (أي الموصول) محمد بنُ علي الجعفيّ، عن جعفر (أي ابن محمد)، عن أبيه، عن جابر إلّا أنه قال:"فصلي المغرب والعتمة بأذان وإقامة".

فرجَّح رواية حاتم بن إسماعيل بمتابعة محمد بن علي الجعفيّ كلاهما عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر على رواية سليمان بن بلال، وعبد الوهاب الثقفيّ، كلاهما عن جعفر بن محمد، عن أبيه محمد المرسلة. وهو الحقّ إلّا أن في رواية محمد بن علي الجعفيّ بأذان وإقامة.

ومحمد بن علي الجعفيّ ترجمه البخاري في التاريخ الكبير (1/ 184)، وابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (8/ 27) ولم يقولا فيه شيئًا، فهو من عداد المجهولين.

وقوله:"بأذان وإقامة" شاذّ؛ لأنّ المحفوظ:"بأذان وإقامتين" كما في رواية حاتم بن إسماعيل الموصولة، وفي رواية محمد بن علي بن حسين الباقر المرسلة.

ثم وجدت أن سليمان بن بلال روي عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر أيضًا مسندًا.

رواه الإمام أحمد (15243) عن موسى بن داود عنه، فذكر جزءًا من الحديث. وأمّا جمع الصّلاتين في المزدلفة فسيأتي بعد عدّة أبواب.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মানুষের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন... অতঃপর আযান দেওয়া হলো, তারপর ইকামত দেওয়া হলো এবং তিনি যুহরের সালাত আদায় করলেন। এরপর আবার ইকামত দেওয়া হলো এবং তিনি আসরের সালাত আদায় করলেন। এ দুই সালাতের মাঝে তিনি আর কিছুই আদায় করেননি... (সম্পূর্ণ হাদীসটি)।









আল-জামি` আল-কামিল (4969)


4969 - عن عائشة، قالت: كانت قريش ومن دان دينها يقفون بالمزدلفة وكانوا يسمّون الْحُمْس، وكان سائر العرب يقفون بعرفات فلمّا جاء الإسلام أمر الله نبيه صلى الله عليه وسلم أن يأتي عرفات ثم يقف بها، ثم يفيض منها فذلك قوله تعالي: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ} [البقرة: 199].

متفق عليه: رواه البخاريّ في التفسير (4520)، ومسلم في الحج (1219) كلاهما من طريق أبي معاوية محمد بن خازم، حدثنا هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.

وفي رواية ابن ماجه (3018):"نحن قواطن البيت، لا نجاوز الحرم. فأنزل الله عز وجل". وفي لفظ الترمذي:"نحن قطين الله".

قال الترمذيّ: ومعنى هذا الحديث أنّ أهل مكة كانوا لا يخرجون من الحرم، وعرفة خارج من الحرم. وأهل مكة كانوا يقفون بالمزدلفة ويقولون: نحن قطين الله، يعني سكان الله، ومَنْ سوي أهل مكة كانوا يقفون بعرفات، فأنزل الله تعالى: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ}".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরাইশ এবং যারা তাদের ধর্ম অনুসরণ করত, তারা মুযদালিফায় অবস্থান করত এবং তাদেরকে ‘আল-হুমস’ বলা হতো। আর আরবের অন্যান্যরা আরাফাতে অবস্থান করত। এরপর যখন ইসলাম আসলো, আল্লাহ তাঁর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে নির্দেশ দিলেন যে, তিনি যেন আরাফাতে যান, সেখানে অবস্থান করেন, এরপর সেখান থেকে প্রত্যাবর্তন করেন (ইফা'দা করেন)। আর এটাই হলো মহান আল্লাহর বাণী: "অতঃপর তোমরাও প্রত্যাবর্তন করো, যেখান থেকে লোকেরা প্রত্যাবর্তন করে।" (সূরা আল-বাকারা: ১৯৯)।

ইবনু মাজাহর এক বর্ণনায় (৩০১৮) আছে, (কুরাইশরা বলত): "আমরা কা’বার স্থায়ী বাসিন্দা, আমরা হারাম এলাকার সীমা অতিক্রম করি না।" অতঃপর আল্লাহ আযযা ওয়া জাল (এ আয়াত) নাযিল করলেন। তিরমিযীর এক শব্দে আছে: "(তারা বলত) আমরা আল্লাহর প্রতিবেশী/আশ্রিত।"

ইমাম তিরমিযী বলেন: এই হাদীসের মর্মার্থ হলো, মক্কার লোকেরা হারাম এলাকার বাইরে যেত না, অথচ আরাফাত হারাম এলাকার বাইরে অবস্থিত। মক্কাবাসীরা মুযদালিফায় অবস্থান করত এবং বলত: আমরা আল্লাহর প্রতিবেশী—অর্থাৎ আল্লাহর বাসিন্দা। আর মক্কাবাসী ব্যতীত অন্য যারা ছিল, তারা আরাফাতে অবস্থান করত। তখন আল্লাহ তা‘আলা নাযিল করেন: "অতঃপর তোমরাও প্রত্যাবর্তন করো, যেখান থেকে লোকেরা প্রত্যাবর্তন করে।" (আল-বাকারা: ১৯৯)।









আল-জামি` আল-কামিল (4970)


4970 - عن عروة قال: كانت العرب تطوف بالبيت عراةً إلّا الْحُمْس -والحمس: قريش وما ولدت- كانوا يطوفون عراة إلا أن تعطيهم الحمس ثيابا فيعطي الرجالُ الرّجالَ والنّساءُ النساءَ، وكانت الحمس لا يخرجون من المزدلفة وكان الناس كلهم يبلغون عرفات.

قال هشام: فحدثني أبي عن عائشة رضي الله عنها قالت: الحمس هم الذين أنزل الله عز وجل فيهم: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ}. قالت: كان الناس يفيضون من عرفات وكان الحمس يفيضون من المزدلفة يقولون لا نفيض إلا من الحرم فلما نزلتْ: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ} رجعوا إلى عرفات.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1665) من حديث علي بن مسهر، ومسلم في الحج (1219: 152) من حديث أسامة - كلاهما عن هشام، عن أبيه، فذكره، واللفظ لمسلم.

ولفظ البخاري قريب منه، وفيه:"فدفعوا إلى عرفات". أي أُمروا أن يتوجّهوا إلى عرفات ليقفوا بها ثم يفيضوا منها. وسوف يأتي تفسير الآية.

والْحُمْس: بضم المهملة، وسكون الميم بعدها مهملة.

وتفسيره كما روى إبراهيم الحربيّ في"غريب الحديث" من طريق ابن جريج، عن مجاهد،
قال:"الحمس قريش ومن كان يأخذ قريش مأخذها من القبائل كالأوس والخزرج وخزاعة وثقيف وغزوان وبني عامر وبني صعصعة وبني كنانة إلا بني بكر، والأحمس في كلام العرب: الشديد، سموا بذلك لما شدّدوا على أنفسهم، وكانوا إذا أهلوا بحج أو عمرة لا يأكلون لحمًا ولا يضربون وبرًا، ولا شعرًا. وإذا قدموا مكة وضعوا ثيابهم التي كانت عليهم".

وروى إبراهيم أيضًا من طريق عبد العزيز بن عمران المدني قال:"سموا حُمْسًا بالكعبة؛ لأنها حمساء حجرها أبيض يضرب إلى السواد، وقال أبو عبيدة معمر بن المثنى: تحمّس تشدّد، ومنه حمس الوغى إذا اشتدّ".




উরওয়াহ (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আরবরা খালি গায়ে বায়তুল্লাহ তাওয়াফ করত, শুধু 'আল-হুমস' ছাড়া। আর আল-হুমস হলো কুরাইশ এবং তাদের বংশধররা। তারা (অন্য আরবরা) খালি গায়ে তাওয়াফ করত, তবে যদি আল-হুমস তাদেরকে কাপড় দিত। তখন পুরুষরা পুরুষদেরকে দিত এবং নারীরা নারীদেরকে দিত। আর আল-হুমস মুযদালিফা থেকে বের হতো না (সেখান থেকেই প্রত্যাবর্তন করত), অথচ অন্য সব মানুষ আরাফাত পর্যন্ত যেত।

হিশাম বলেন, আমার পিতা আমাকে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেছেন: 'আল-হুমস' হলো তারা, যাদের সম্পর্কে আল্লাহ আযযা ওয়া জাল্ল এই আয়াত নাযিল করেছেন: {অতঃপর যে স্থান থেকে অন্য লোকেরা প্রত্যাবর্তন করে, তোমরাও সে স্থান থেকে প্রত্যাবর্তন কর।} তিনি (আয়েশা) বলেন: লোকেরা আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তন করত, কিন্তু আল-হুমস মুযদালিফা থেকে প্রত্যাবর্তন করত। তারা বলত: আমরা হারাম (হারাম শরীফ) এলাকা ছাড়া অন্য কোথাও থেকে প্রত্যাবর্তন করব না। অতঃপর যখন এই আয়াতটি নাযিল হলো: {অতঃপর যে স্থান থেকে অন্য লোকেরা প্রত্যাবর্তন করে, তোমরাও সে স্থান থেকে প্রত্যাবর্তন কর।} তখন তারা (আল-হুমস) আরাফাতের দিকে ফিরে গেল (এবং অন্যদের সাথে আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তন করা শুরু করল)।









আল-জামি` আল-কামিল (4971)


4971 - عن جبير بن مطعم، قال: أضللتُ بعيرًا لي، فذهبتُ أطلبه يوم عرفة، فرأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم واقفًا مع الناس بعرفة. فقلتُ: واللهِ، إنّ هذا لمن الحمس، فما شأنه ههنا؟ وكانتْ قريش تُعدُّ من الحمس.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1664)، ومسلم في الحج (1220) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، حدثنا عمرو (هو ابن دينار)، حدثنا محمد بن جبير بن مطعم، عن أبيه، فذكره.

والتحقيق في هذا أن قصة جبير بن مطعم مع رسول الله صلى الله عليه وسلم وقعت في الجاهلية. وأسلم جبير بن مطعم يوم الفتح وكان ذهابه إلى عرفة ليطلب بعيره الشارد لا ليقف بها.

ويؤكّد هذا ما رواه ابن خزيمة في صحيحه كما في الحديث الآتي.




জুবাইর ইবনে মুত'ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আমার একটি উট হারিয়ে ফেলেছিলাম, তাই আমি আরাফার দিনে সেটিকে খুঁজতে গেলাম। তখন আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে দেখলাম যে তিনি জনগণের সাথে আরাফাতে দাঁড়িয়ে আছেন। তখন আমি (নিজে নিজে) বললাম: আল্লাহর কসম, ইনি তো 'আল-হুমস'-এর অন্তর্ভুক্ত, এখানে তাঁর কী কাজ? (কারণ) কুরাইশদের 'আল-হুমস'-এর অন্তর্ভুক্ত গণ্য করা হতো।









আল-জামি` আল-কামিল (4972)


4972 - عن جبير بن مطعم قال: كانت قريش إنما تدفع من المزدلفة ويقولون: نحن الحمس فلا نخرج من الحرم، وقد تركوا الموقف على عرفة. قال: فرأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم في الجاهلية يقف مع الناس بعرفة على جمل له ثم يصبح مع قومه بالمزدلفة فيقف معهم يدفع إذا دفعوا.

حسن: رواه ابن خزيمة (2823) عن نصر بن علي، أخبرنا وهب بن جرير، ثنا أبي، عن محمد ابن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي بكر، عن عثمان بن أبي سليمان، عن عمه نافع بن جبير، عن أبيه جبير بن مطعم، فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه يُحسّن حديثه إذا صرّح.

ورواه أيضًا (3057) من وجه آخر عن محمد بن إسحاق، عن عبد الله بن أبي بكر بإسناده وقال فيه:"لقد رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل أن ينزل عليه، وإنه لواقف على بعير له بعرفات مع الناس يدفع معهم منها، ما ذاك إلا توفيقًا من الله".

وهذا إسناد حسن أيضًا، كما جاء التصريح بالتحديث عن ابن إسحاق في الرّواية السّابقة.

فقوله:"قبل أن ينزل عليه" أي قوله تعالى: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ} فالنبيّ صلى الله عليه وسلم -
كان يقف بعرفات قبل نزول الآية.

وفيه دليل لقوله:"ما ذاك إلا توفيقًا من الله" أي تقريرًا من الله سبحانه وتعالى لفعل النبي صلى الله عليه وسلم.

قال جبير بن مطعم:"فلما أسلمت علمتُ أن الله وفّقه لذلك".

هكذا رواه إسحاق بن راهويه عن الفضل بن موسى، عن عثمان بن الأسود، عن عطاء، أن جبير بن مطعم قال:"أضللت حمارًا لي في الجاهلية فوجدته بعرفة، فرأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم واقفًا بعرفات مع الناس، فلما أسلمتُ علمت أن الله وفقه لذلك". انظر الفتح (3/ 516).




জুবাইর ইবনু মুত‘ইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: কুরাইশরা কেবল মুযদালিফা থেকেই প্রত্যাবর্তন করত। আর তারা বলত: আমরা হলাম ‘আল-হুমস’ (ধর্মে দৃঢ়), তাই আমরা হারামের এলাকা থেকে বের হব না। অথচ তারা আরাফাতে অবস্থান করা ছেড়ে দিয়েছিল। তিনি বলেন: অতঃপর আমি জাহেলিয়াতের যুগে দেখেছি যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর উটের উপর আরোহণ করে লোকদের সাথে আরাফাতে অবস্থান করছিলেন। এরপর তিনি মুযদালিফায় তাঁর গোত্রের সাথে সকাল যাপন করতেন এবং তাদের সাথে অবস্থান করতেন, যখন তারা (মুযদালিফা থেকে) প্রত্যাবর্তন করত, তিনিও প্রত্যাবর্তন করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4973)


4973 - عن ابن عباس قال: يطوفُ الرّجلُ بالبيت ما كان حلالًا حتى يهلّ بالحجّ، فإذا ركب إلى عرفةَ فمن تيسر له هَديَّةٌ من الإبل أو البقر أو الغنم، ما تيسر له من ذلك، أيَّ ذلك شاء، غير أنه إن لم يتيسر له فعليه ثلاثةُ أيّام في الحجّ، وذلك قبل يوم عرفة، فإن كان آخر يوم من الأيام الثلاثة يومَ عرفة فلا جناح عليه، ثم لِينطلقْ حتى يقف بعرفات من صلاة العصر إلى أن يكون الظلام، ثم لِيدفعوا من عرفات إذا أفاضوا منها حتى يبلغوا جَمْعًا الذي يبيتون به، ثم ليذكرِوا الله كثيرًا، وأَكْثِرُوا التكبير والتهليل قبل أن تُصبحوا، ثم أفيضوا فإن الناس كانوا يُفيضون، وقال الله تعالى: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ وَاسْتَغْفِرُوا اللَّهَ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَحِيمٌ} [البقرة: 199] حتى تَرْمُوا الجمرة.

صحيح: رواه البخاريّ في التفسير (4521) عن محمد بن أبي بكر، حدّثنا فضيل بن سليمان، حدثنا موسى بن عقبة، أخبرني كريب، عن ابن عباس، فذكره.

وأما قوله تعالى: {ثُمَّ أَفِيضُوا مِنْ حَيْثُ أَفَاضَ النَّاسُ} [سورة البقرة: 199] فظاهر سياق الآية أنها الإفاضة من المزدلفة؛ لأنّها ذكرت بلفظ"ثم" بعد ذكر الأمر بالذكر عند المشعر الحرام، فأجاب بعضُ المفسّرين بأنّ الأمر بالذّكر عند المشعر الحرام بعد الإفاضة من عرفات التي سيقت بلفظ الخبر لما ورد منه على المكان الذي تشرع الإفاضة منه، فالتقدير: فإذا أفضتم اذكروا ثم لتكن إفاضتكم من حيث أفاض الناس لا من حيث كان الحمس يفيضون. أو التقدير: فإذا أفضتم من عرفات إلى المشعر الحرام فاذكروا الله عنده، ولتكن إفاضتكم من المكان الذي يفيض فيه الناس غير الحمس.

واختار الطّحاويّ أن"ثم" بمعنى الواو، وليس للترتيب، فيكون معناه لقصد التأكيد لا لمحض الترتيب. والمعنى: فإذا أفضتم من عرفات فاذكروا الله عند المشعر الحرام، ثم اجعلوا الإفاضة التي تفيضون منها من حيث أفاض الناس يعني من عرفات لا من حيث كنتم تفيضون في الجاهلية من المزدلفة، وقيل غير ذلك. انظر"الفتح".
وأما الإفاضة من عرفات وكون الحجّ لا يتم إلّا بالإفاضة منها فتكفي الآية السابقة وهي قوله تعالي: {فَإِذَا أَفَضْتُمْ مِنْ عَرَفَاتٍ فَاذْكُرُوا اللَّهَ عِنْدَ الْمَشْعَرِ الْحَرَامِ} [سورة البقرة: 198].

إلّا أن حمل الآية على ظاهرها لا يتمشى مع الأحاديث الصحيحة الواردة في الباب، والله تعالى أعلم.

ومن المفسرين مَنْ قالوا بظاهر الآية بأنّ الأمر بالإفاضة في قوله تعالى بأنّ الإفاضة هنا من المزدلفة حيث أفاض الناس - أي جنس سواء كان كانوا في الجاهليّة منذ إبراهيم عليه السلام أو في الإسلام بعد مشروعية الحجّ.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মানুষ ততক্ষণ পর্যন্ত বাইতুল্লাহর তাওয়াফ করবে যতক্ষণ না সে হজের ইহরাম বাঁধে। অতঃপর যখন সে আরাফার দিকে যাত্রা করবে, তখন যে ব্যক্তি উট, গরু বা ছাগল থেকে কুরবানি (হাদি) দিতে সক্ষম হয়, সে তার যেকোনো একটি পছন্দমতো দিতে পারে। তবে যদি সে কুরবানি দিতে না পারে, তবে তার উপর হজের সময় তিন দিন রোজা রাখা আবশ্যক। আর তা আরাফার দিনের পূর্বে। যদি তিন দিনের শেষ দিনটি আরাফার দিন হয়, তবে তাতে কোনো সমস্যা নেই। অতঃপর সে যেন চলতে শুরু করে, যাতে সে আসরের সালাতের সময় থেকে সন্ধ্যা হওয়া পর্যন্ত আরাফাতে অবস্থান করে। এরপর যখন তারা আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তন করবে, তখন যেন তারা জম' (মুযদালিফা) পর্যন্ত যায়, যেখানে তারা রাত যাপন করে। এরপর তারা যেন বেশি বেশি আল্লাহর যিকির করে, এবং সকাল হওয়ার পূর্বে তাকবীর ও তাহলীল বেশি করে পড়ে। অতঃপর তোমরা প্রত্যাবর্তন করো, কারণ লোকেরা এভাবে প্রত্যাবর্তন করত। আল্লাহ তাআলা বলেছেন: "অতঃপর তোমরা প্রত্যাবর্তন করো যেখান থেকে লোকেরা প্রত্যাবর্তন করে এবং আল্লাহর নিকট ক্ষমা চাও। নিশ্চয় আল্লাহ ক্ষমাশীল, পরম দয়ালু।" [সূরা বাকারা: ১৯৯]—যতক্ষণ না তোমরা জামরায় কঙ্কর নিক্ষেপ করো।









আল-জামি` আল-কামিল (4974)


4974 - عن عبد الرحمن بن يعمر الدّيليّ، قال: أتيت النبي صلى الله عليه وسلم وهو بعرفة فجاء ناسٌ أو نفر من أهل نجد فأمروا رجلًا فنادي رسول الله صلى الله عليه وسلم كيف الحج؟ فأمر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم رجلًا، فنادى:"الحجّ يوم عرفة من جاء قبل صلاة الصّبح من ليلة جمع فتمَّ حجُّه أيام منى ثلاثة: {فَمَنْ تَعَجَّلَ فِي يَوْمَيْنِ فَلَا إِثْمَ عَلَيْهِ}. قال: ثم أردف رجلا خلفه فجعل ينادي بذلك.

صحيح: رواه أبو داود (1949)، والترمذي (889)، والنسائي (210) (3047)، وابن ماجه (3015) كلّهم من حديث سفيان الثوريّ، عن بكير بن عطاء، عن عبد الرحمن بن يعمر الدّيليّ، فذكره واللفظ لأبي داود.

رواه الإمام أحمد (18774)، وصحّحه ابن خزيمة (2822)، وابن حبان (3892)، والحاكم (1/ 464) كلّهم من هذا الطّريق.

قال الترمذيّ:"هذا أجود حديث رواه سفيان الثوريّ".

وقال أيضًا:"وقد روي شعبة عن بكير بن عطاء نحو حديث الثوريّ. قال: وسمعت الجارود يقول: سمعت وكيعًا أنه ذكر هذا الحديث فقال: هذا الحديث أمُّ المناسك".

وصحّحه الحاكم على شرط الشيخين.




আবদুর রহমান ইবনু ইয়া'মুর আদ-দাইলি (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট আসলাম যখন তিনি আরাফাতে ছিলেন। তখন নজদবাসী কিছু লোক বা একটি দল এলো। তারা একজনকে দায়িত্ব দিল, ফলে লোকটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে ডেকে জিজ্ঞেস করল: হজ্জ কেমন হবে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একজনকে নির্দেশ দিলেন, ফলে তিনি ডেকে বললেন: "হজ্জ হলো আরাফার দিন। যে ব্যক্তি মুযদালিফার রাতের ফজরের সালাতের পূর্বে এসে পৌঁছাল, তার হজ্জ পূর্ণ হলো। মিনায় অবস্থান তিন দিন। {আর যে তাড়াহুড়ো করে দু'দিনে চলে যাবে, তার কোনো পাপ নেই।} [সূরা বাকারা: ২০৩]" তিনি (আবদুর রহমান) বলেন, এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পেছনে একজনকে আরোহণ করালেন এবং তিনি তা (উপরে বর্ণিত ঘোষণা) ডেকে বলতে লাগলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (4975)


4975 - عن عروة بن مضرس الطائي قال: أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم بالموقف -يعني بجمع- قلت: جئت يا رسول الله من جبل طي أكلَلْت مطيتي وأتعبتُ نفسي، والله! ما تركت من حبل إلا وقفتُ عليه! فهل لي من حجّ؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أدرك معنا هذه الصّلاة، وأتي عرفات قبل ذلك ليلًا أو نهارًا فقد تم حجُّه وقضى تفثه".

صحيح: رواه أبو داود (1950)، والترمذيّ (891)، والنسائيّ (3039)، وابن ماجه (3016) كلّهم من طريق إسماعيل بن أبي خالد، حدّثنا عامر الشعبيّ، عن عروة بن مضرس، فذكر الحديث.

ومنهم من قرن مع إسماعيل بن أبي خالد زكريا -وهو ابن أبي زائدة-، ومنهم من قرن معهما
داود بن أبي هند، هؤلاء الثلاثة عن عامر الشعبي بإسناده.

قال الترمذي: حسن صحيح.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (18300) وصحّحه ابن خزيمة (2820)، وابن حبان (3850)، والحاكم (1/ 463) وقال:"هذا حديث صحيح على شرط كافة أئمة الحديث، وهي قاعدة من قواعد الإسلام. وقد أمسك عن إخراجه الشّيخان محمد بن إسماعيل، ومسلم بن الحجّاج على أصلهما أنّ عروة بن مضرس لم يحدّث عنه غير عامر الشعبيّ، وقد وجدنا عروة بن الزبير بن العوّام حدّث عنه".

وقال المروزيّ في اختلاف العلماء (ص 90):"روى عنه أيضًا إبراهيم والحسن".

على هذا فلا أرى أن عدم إخراج الشيخين كان بسبب تفرّد الشعبيّ عن عروة بن مضرس، إذ ليس من شرط الشيخين أن يروي الحديث اثنان فما فوقهما.

وخالفهم جميعًا مطرف بن طريف، عن الشعبيّ بإسناده فقال:"من أدرك جمعًا والإمام واقف، فوقف مع الإمام، ثم أفاض مع الناس فقد أدرك الحجّ، ومن لم يدرك فلا حجّ له".

رواه النسائيّ (3040)، والطحاويّ في"مشكله" (4688) كلاهما من وجهين، عن مطرف بن طريف - واللفظ للطّحاويّ، ولفظ النّسائيّ نحوه.

قال الطّحاويّ:"فتأملنا هذا المعنى الذي زاده مطرِّف عن الشعبي على أصحاب الشعبي في هذا الحديث بعد وقوفنا على أن فقهاء الأمصار الذين تدور الفتيا عليهم بالحرمين، وبسائر الأمصار سواهما لا يختلفون أنّ من فاته الوقوف بجمع، وقد كان وقف بعرفة قبل ذلك، أنه ليس في حكم من فاته الحج، وأنه قد أدرك الحجَّ، وقد فاته منه ما يكفيه عنه الدّم، غير طائفة منهم قليلة العدد، فإنّها زعمتْ أنّ من فاته الوقوف بجمع في حجّه بعدما يطلعُ الفجر، فقد فاته الحجُّ، وجعلوا فوتَ الوقوف بجمع قبل طلوع الفجر، كفوت الوقوف بعرفة في الحج حتى يطلع الفجر، ولا نعلم أحدًا ممن تقدَّمهم رُوي عنه هذا القول غير علقمة بن قيس" انتهي.

وذكر ابن عبد البر في"التمهيد" (9/ 272) أنّ القائلين بهذا القول مع علقمة: عامر الشعبيّ، وإبراهيم النخعيّ، والحسن البصريّ، قالوا: من لم ينزل بالمزدلفة وفاته الوقوف بها فقد فاته الحج، ويجعلها عمرة. وهو قول عبد الله بن الزبير، وبه قال الأوزاعي أنّ الوقوف بالمزدلفة فرض واجب يفوت الحج بفواته، وقد رُوي عن الثوري مثل ذلك ولا يصح عنه. والأصح عنه إن شاء الله ما قدمنا ذكره.

وروي عن حماد بن أبي سليمان أنه قال: من فاتته الإفاضة من جمع فقد فاته الحجّ فلحل بعمرة ثم يحجّ قابلًا" انتهى.




উরওয়াহ ইবনু মুদাররিস আত-ত্বাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট মাওক্বিফে (অর্থাৎ, মুযদালিফায়) এসে বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! আমি ত্বাই পাহাড় থেকে এসেছি। আমি আমার বাহনকে ক্লান্ত করেছি এবং নিজেকে পরিশ্রান্ত করেছি। আল্লাহর কসম! আমি এমন কোনো পর্বতমালা বা উঁচু স্থান বাকি রাখিনি যেখানে আমি অবস্থান করিনি! আমার কি তাহলে হজ্জ হয়েছে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি আমাদের সাথে এই সালাতে (মুযদালিফায় ফজর) শামিল হয়েছে এবং এর পূর্বে দিন কিংবা রাতে আরাফাতে এসেছে (অবস্থান করেছে), তার হজ্জ পূর্ণ হয়েছে এবং সে তার আবশ্যকীয় কাজ সম্পন্ন করেছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (4976)


4976 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أدرك عرفات فوقف بها والمزدلفة
فقد تم حجّه، ومن فاته عرفات فقد فاته الحج فليحل بعمرة وعليه الحج من قابل".

حسن: رواه الدارقطنيّ (2519) من طريق ابن أبي ليلى، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.

وابن أبي ليلي سيء الحفظ إلّا أنه لم يتفرّد به، فقد رواه البيهقي (5/ 174) من طريق عبد الله بن حبيب بن أبي ثابت، عن عطاء به، مثله، إلا أنه لم يذكر المزدلفة.

ولا يلتفت إلى متابعة عمر بن قيس عن عطاء فإنه متروك، ومن طريقه رواه الطبرانيّ في"الكبير" (11/ 202).




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি আরাফাত পেল এবং সেখানে অবস্থান করল (এবং মুযদালিফায়ও), তার হজ্ব পূর্ণ হলো। আর যার আরাফাত ছুটে গেল, তার হজ্ব ছুটে গেল। সুতরাং সে যেন উমরার মাধ্যমে ইহরাম মুক্ত হয় এবং পরবর্তী বছর তার উপর হজ্ব করা আবশ্যক।"









আল-জামি` আল-কামিল (4977)


4977 - عن جابر أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"نحرتُ ههنا ومنى كلُّها مَنْحر، فانْحَروا في رحالكم، ووقفتُ ههنا وعرفة كلُّها موقف، ووقفت ههنا وجَمْعٌ كّلها موقف".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218: 149) عن عمر بن حفص بن غياث، حدّثنا أبي، عن جعفر (وهو ابن محمد بن علي بن الحسين بن علي بن أبي طالب)، حدّثني أبي، عن جابر، به.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি এখানেই নহর করেছি, আর মিনা পুরোটাই নহরের স্থান। অতএব, তোমরা তোমাদের নিজ নিজ অবস্থানস্থলেই নহর করো। আমি এখানে অবস্থান করেছি, আর আরাফাহ পুরোটাই অবস্থানের স্থান। আর আমি এখানে অবস্থান করেছি, আর জাম' (মুযদালিফা) পুরোটাই অবস্থানের স্থান।"









আল-জামি` আল-কামিল (4978)


4978 - عن علي بن أبي طالب، قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم بعرفة فقال:"هذه عرفة وهذا هو الموقف وعرفة كلّها موقف. ثم أفاض حين غربت الشمس وأردف أسامة ابن زيد، وجعل يشير بيده على هينته والناس يضربون يمينا وشمالا يلتفت إليهم ويقول:"أيها الناس! عليكم السّكينة ثم أتي جمعا فصلّى بهم الصلاتين جميعا فلما أصبح أتي قزح فوقف عليه، وقال:"هذا قزح وهو الموقف وجمع كلّها موقف". ثم أفاض حتى انتهى إلى وادي محسر فقرع ناقته فخبَّتْ حتى جاوزَ الوادي فوقف وأردف الفضل، ثم أتي الجمرة فرماها، ثم أتي المنحرَ، فقال:"هذا المنحر ومِنى كلّها منحر".

واستفتته جارية شابة من خثعم فقالت: إن أبي شيخ كبير قد أدركته فريضة الله في الحج أفيجزئ أن أحج عنه؟ قال:"حُجِّي عن أبيك". قال: ولوي عنقَ الفضل، فقال العباس: يا رسول الله، لم لويت عنقَ ابن عمِّك؟ . قال:"رأيت شابًا وشابّة فلم آمن الشّيطان عليهما". ثم أتاه رجل فقال: يا رسول الله، إنّي أَفضْتُ قبل أن أحلق، قال:"احْلقْ أو قصِّر ولا حرج".

قال: وجاء آخر فقال: يا رسول الله، إنّي ذبحتُ قبل أن أرمي، قال:"ارْمِ ولا حرج". قال: ثم أتي البيت فطاف به ثم أتي زمزم فقال:"يا بني عبد المطلب، لولا أن يغلبكم الناس عنه لنزعتُ".
حسن: رواه الترمذيّ (885)، وأبو داود (1922، 1935)، وابن ماجه (3010) كلّهم من حديث سفيان، عن عبد الرحمن بن الحارث بن عياش بن أبي ربيعة، عن زيد بن علي، عن أبيه، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي بن أبي طالب، فذكره واللفظ للترمذي وغيره رووه مختصرًا.

قال الترمذي:"حديث علي حديث حسن صحيح، لا نعرفه من حديث علي إلّا من هذا الوجه من حديث عبد الرحمن بن الحارث بن عياش. وقد رواه غير واحد عن الثوريّ مثل هذا. والعمل على هذا عند أهل العلم، رأوا أن يجمع بين الظهر والعصر بعرفة في وقت الظهر، وقال بعض أهل العلم: إذا صلى الرجل في رحله ولم يشهد الصلاة مع الإمام إن شاء جمع هو بين الصلاتين مثل ما صنع الإمام.

وقال: وزيد بن علي هو ابن حسين بن علي بن أبي طالب" انتهي.

قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله بن عياش المخزوميّ غير أنه حسن الحديث.

وزيد بن علي هو عمّ جعفر بن محمد الصادق ذكره ابن حبان في"الثقات" (4/ 249)، وقال الحافظ في"التهذيب":"وأعاد ابن حبان ذكره في طبقة أتباع التابعين وقال: روى عن أبيه" انظر:"الثقات" (6/ 313).

وفي الباب ما روي عن ابن عباس مرفوعًا:"عرفة كلّها موقف، ومني كلّها موقف". رواه البزّار - كشف الأستار (1127) عن حوثرة بن محمد المنقريّ من كتابه، ثنا سفيان بن عينة، عن عمرو بن دينار، عن طاوس، عن ابن عباس، فذكره.

وقال: وحدّثناه أحمد بن عبدة، أنبأ سفيان بن عيينة، فذكره عن طاوس مرسلًا.

قال البزّار:"لا نعلم أحدًا قال:"عن ابن عباس" إلا حرثرة ولم يتابع" انتهى.

قلت: وهو كما قال؛ فإن حوثرة بن محمد المنقري أبو الأزهر البصريّ الورّاق، روى عنه عدد منهم ابن خزيمة، ولم يوثقه غير ابن حبان، فهو"مقبول" على اصطلاح ابن حجر أي إذا توبع، ولم يتابع كما قال البزّار، فهو لين الحديث.




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরাফায় অবস্থান করলেন এবং বললেন: “এটা আরাফা এবং এটাই অবস্থানের স্থান। আর আরাফার সবটাই অবস্থানের স্থান।”

এরপর যখন সূর্য ডুবে গেল, তিনি সেখান থেকে যাত্রা করলেন। তিনি উসামা ইবনু যায়িদকে (তাঁর বাহনে) আরোহী করলেন এবং শান্তভাবে হাত দিয়ে ইশারা করতে লাগলেন। লোকেরা ডানে-বামে তাড়াহুড়ো করে ছুটছিল। তিনি তাদের দিকে ফিরে বললেন: “হে লোক সকল! তোমাদের উপর আবশ্যক হলো প্রশান্তি বজায় রাখা।”

এরপর তিনি জুমআ’ (অর্থাৎ মুযদালিফাহ) এলেন এবং সেখানে তাদের নিয়ে দুই সালাত (মাগরিব ও ইশা) একত্র করে আদায় করলেন। এরপর যখন সকাল হলো, তিনি কুযাহ পাহাড়ের কাছে এলেন এবং তার উপর দাঁড়ালেন এবং বললেন: “এটা কুযাহ এবং এটা অবস্থানের স্থান, আর জুমআ’ (মুযদালিফাহ)-এর সবটাই অবস্থানের স্থান।”

এরপর তিনি যাত্রা করলেন যতক্ষণ না ওয়াদি মুহাসসির-এ পৌঁছলেন। সেখানে তিনি তার উটকে আঘাত করলেন, ফলে সেটি দ্রুত চলতে শুরু করল যতক্ষণ না উপত্যকা পার হলো। এরপর তিনি থামলেন এবং ফাদ্বলকে (তাঁর বাহনে) আরোহী করলেন। এরপর তিনি জামরাতুল আকাবার কাছে এলেন এবং তাতে কংকর নিক্ষেপ করলেন। এরপর তিনি কুরবানীর স্থানে এলেন এবং বললেন: “এটা কুরবানীর স্থান, আর মিনার সবটাই কুরবানীর স্থান।”

এরপর খাসআম গোত্রের এক যুবতী মহিলা তাঁর নিকট ফাতওয়া চাইলেন এবং বললেন: “আমার পিতা খুবই বৃদ্ধ, এমতাবস্থায় তাঁর উপর আল্লাহর ফরযকৃত হাজ্জ (হজ্জ) করার সময় হয়েছে। আমি কি তার পক্ষ থেকে হাজ্জ আদায় করলে যথেষ্ট হবে?” তিনি বললেন: “তোমার পিতার পক্ষ থেকে তুমি হাজ্জ করো।”

বর্ণনাকারী বলেন: তিনি ফাদ্বল-এর ঘাড় ঘুরিয়ে দিলেন। তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: “হে আল্লাহর রাসূল! আপনি আপনার চাচাতো ভাইয়ের ঘাড় ঘুরিয়ে দিলেন কেন?” তিনি বললেন: “আমি একজন যুবক ও একজন যুবতীকে দেখলাম। তাই তাদের উভয়ের উপর শয়তানের প্রভাব নিয়ে আমি নিরাপদ বোধ করিনি।”

এরপর তাঁর কাছে এক লোক এসে বললেন: “হে আল্লাহর রাসূল! আমি হালাল (তাকসীর বা চুল কাটার আগে) হওয়ার পূর্বেই তাওয়াফে ইফাদাহ করেছি।” তিনি বললেন: “চুল কাটো বা ছোট করো, এতে কোনো সমস্যা নেই (হারাজ নেই)।” বর্ণনাকারী বলেন: এরপর আরেকজন এসে বললেন: “হে আল্লাহর রাসূল! আমি কংকর নিক্ষেপের আগে কুরবানী করেছি।” তিনি বললেন: “কংকর নিক্ষেপ করো, এতে কোনো সমস্যা নেই।”

বর্ণনাকারী বলেন: এরপর তিনি বায়তুল্লাহর কাছে এলেন এবং তাওয়াফ করলেন। এরপর তিনি যমযমের কাছে এলেন এবং বললেন: “হে আবদুল মুত্তালিবের বংশধরেরা! যদি মানুষের ভিড়ে তোমাদের উপর (পানি তোলার) কর্তৃত্ব হারানোর ভয় না থাকত, তবে আমি নিজেই (বালতি দিয়ে পানি) উঠাতাম।”









আল-জামি` আল-কামিল (4979)


4979 - عن يزيد بن شيبان، قال: كنّا وقوفًا بعرفة مكانًا بعيدًا من الموقف، فأتانا ابنُ مِرْبع الأنصاريّ، فقال: إنّي رسولُ رسولِ الله صلى الله عليه وسلم إليكم يقول:"كونوا على مشاعركم، فإنّكم على إرْثٍ من إرْثِ أبيكم إبراهيم عليه السلام".

صحيح: رواه أبو داود (1919)، والترمذي (883)، والنسائي (3014)، وابن ماجه (3011) كلّهم من حديث سفيان بن عيينة، عن عمرو بن دينار، عن عمرو بن عبد الله بن صفوان، عن يزيد بن
شيبان، فذكره ولفظهم متقارب.

قال الترمذي:"حديث ابن مِرْبع الأنصاريّ حديث حسن صحيح، لا نعرفه إلا من حديث ابن عيينة، عن عمرو بن دينار. وابن مِرْبع اسمه يزيد بن مربع الأنصاريّ، وإنما يعرف له هذا الحديث الواحد".

ورواه الإمام أحمد (17233)، وصحّحه ابن خزيمة (2818، 2819)، والحاكم (1/ 462) وقال:"صحيح الإسناد".




ইবনু মিরবা' আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ইয়াযীদ ইবনু শাইবান বলেন: আমরা আরাফাতে অবস্থানের স্থান থেকে দূরে এক জায়গায় দাঁড়িয়েছিলাম। তখন ইবনু মিরবা' আল-আনসারী আমাদের নিকট আসলেন এবং বললেন: আমি তোমাদের নিকট রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর পক্ষ থেকে প্রেরিত দূত। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলছেন: "তোমরা তোমাদের মাশা‘ইরে (নির্ধারিত স্থানে) অবস্থান করো। কেননা তোমরা তোমাদের পিতা ইব্রাহীম (আলাইহিস সালাম)-এর উত্তরাধিকারের অংশের উপরই রয়েছ।"









আল-জামি` আল-কামিল (4980)


4980 - عن ابن عباس قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ارفعوا عن بطن عرنة، ارفعوا عن بطن محسّر".

حسن: رواه ابن خزيمة (2816)، والحاكم (1/ 462) وعنه البيهقيّ (5/ 115) كلّهم من حديث محمد بن كثير، ثنا سفيان بن عيينة، عن زياد بن سعد، عن أبي الزبير، عن أبي معبد، عن ابن عباس، فذكره.

ورواه هولاء أيضا عن يحيى بن سعيد، عن ابن جريج قال: أخبرني عطاء، عن ابن عباس قال: فذكره موقوفا، والحكم لمن رفع.

قال الحاكم:"هذا حديث صحيح على شرط مسلم قال: وله شاهد على شرط الشيخين إلا أنّ فيه تقصيرًا في سنده.

أما قوله:"العرنات" فالوقوف بعرنة أي لا تقفوا بعرنة.

وأما قوله:"عن محسر" فالنزول بجمع أن لا تنزلوا محسرًا" انتهى.

قلت: هذا إسناد حسن من أجل الكلام في محمد بن كثير الصنعانيّ إلا أنه حسن الحديث، وليس هو العبديّ كما في ابن خزيمة، ولعلّ الحاكم قال:"على شرط مسلم ظنًا منه أنه العبديّ" هكذا قال ابن خزيمة.

ولم يصبْ النّووي في تضعيف الحديث من أجله بقوله:"ضعّفه جمهور الأئمّة ولم يرو له مسلم""المجموع" (8/ 122).

قلت: محمد بن كثير هو الصنعاني ليس ممن اتفق على تضعيفه جمهور الأئمة بل قال فيه ابن معين: كان صدوقًا، وقال ابن سعد: كان ثقة، وقال أبو حاتم: كان رجلًا صالحًا، وذكره ابن حبان في"الثقات" فمثله يُحَسن حديثه في المتابعات وقد وجدنا له متابعًا، رواه الطحاويّ في"مشكله" (1194) من طريق أبي الأشعث أحمد بن المقدام العجليّ، قال: حدثنا ابن عيينة، بإسناده فذكره.

وفي الباب ما روي عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عرفة كلّها موقف، وارتفعوا عن بطن عرنة. ومزدلفة كلّها موقف وارتفعوا عن بطن محسر، ومني كلّها منحر، وفجاج مكة كلها منحر".

رواه عبد الرزاق عن معمر، عن محمد بن المنكدر، عن أبي هريرة، فذكره.
ذكره ابن عبد البر في"الاستذكار" (13/ 10) ولم أجده في"مصنف عبد الرزاق" فيُنظر فيه.

وإسناده منقطع فإن محمد بن المنكدر لم يسمع من أبي هريرة كما قال ابن معين وأبو زرعة.

ورواه البيهقي (5/ 115) من حديث عبد الوهاب بن عطاء، قال ابن جريج: وأخبرني محمد بن المنكدر أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال (فذكره)، وهو مرسل.

وفي الباب ما روي أيضًا عن جبير بن مطعم، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"كلّ عرفات موقف، وارفعوا عن بطن عرنة، وكلّ مزدلفة موقف وارفعوا عن محسر، وكلّ فجاج مني منحر، وكلّ أيام التشريق ذبح".

رواه الإمام أحمد (16571)، والبيهقي (5/ 239) كلاهما من حديث أبي المغيرة، قال: حدّثنا سعيد بن عبد العزيز، قال: حدّثني سليمان بن موسى، عن جبير بن مطعم، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، فذكره.

وسليمان بن موسى هو الأشدق لم يدرك جبير بن مطعم.

ورواه أيضًا الدارقطني (4/ 284)، والبيهقيّ (5/ 239)، والطبراني (2/ 138) كلّهم من حديث سويد بن عبد العزيز، عن سعيد بن عبد العزيز التّنوخيّ، عن سليمان بن موسى، عن نافع بن جبير ابن مطعم، عن أبيه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"أيام التشريق كلّها ذبح".

قال البيهقيّ:"الأوّل مرسل، وهذا غير قوي لأنّ راويه سويد".

ورواه البزار من هذا الوجه وقال: تفرّد به سويد، ولا يحتج بما تفرد به. كذا في"كشف الأستار" (1/ 27)، ولكن يبدو أن الإسناد سقط من"كشف الأستار" أو لم يذكره الهيثميّ في"الكشف"، وإلّا فقد نقل عنه الزّيلعيّ أيضًا في"نصب الراية" (3/ 61) وهذا لفظه:"قال البزار: ورواه سويد بن عبد العزيز فقال فيه: عن نافع بن جبير، عن أبيه، وهو رجل ليس بالحافظ، ولا يحتج به إذا انفرد بحديث. وحديث ابن أبي حسين هو الصواب مع أنّ ابن أبي حسين لم يلقَ جبير ابن مطعم، وإنما ذكرنا هذا الحديث لأنا لا نحفظ عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في كلّ أيام التشريق ذبح، إلّا في هذا الحديث، فكذلك ذكرناه، وبينا العلّة فيه" انتهى.

وحديث عبد الرحمن بن أبي حسين الذي أشار إليه البزّار هو ما رواه كما في كشف الأستار (1126)، وابن حبان في صحيحه (3854)، والبيهقيّ (9/ 295 - 296) كلّهم من حديث سعيد بن عبد العزيز، عن سليمان بن موسى، عن عبد الرحمن بن أبي حسين، عن جبير بن مطعم، فذكر مثله. فأدخلوا بين سليمان بن موسى وبين جبير بن مطعم"عبد الرحمن بن أبي حسين".

وعبد الرحمن بن أبي حسين أيضًا لم يلقَ جبير بن مطعم كما أنه لم يوثقه غير ابن حبان، فهو"مقبول" على اصطلاح الحافظ، ويحتاج إلى متابعة فالصّحيح أنه مرسل كما قال البيهقيّ.

وسليمان بن موسى هو الأمويّ الأشدق فقيه أهل الشام في زمانه، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث. وللحديث أسانيد أخرى لا يصح منها شيء.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن جابر مرفوعًا:"كلّ عرفة موقف وارتفعوا عن بطن عرنة، وكلّ
المزدلفة موقف وارتفعوا عن بطن محسَّر، وكلّ مني مَنْحر إلّا ما وراء العقبة".

رواه ابن ماجه (3012) عن هشام بن عمار، قال: حدّثنا القاسم بن عبد الله العمري، قال: حدثنا محمد بن المنكدر، عن جابر بن عبد الله، قال (فذكره).

وإسناده ضعيف جدًا من أجل القاسم بن عبد الله العمري فإنه واه. قال أحمد: كان يكذب ويضع الحديث، ترك الناسُ حديثه.

وفي الباب أيضًا عن حبيب بن خماشة الخطميّ، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول بعرفة:"عرفة كلّها موقف إلّا بطن عرنة، والمزدلفة كلّها موقف إلّا بطن محسر".

رواه الحارث في"مسنده" البغية (384) عن محمد بن عمر، حدثنا صالح بن خوات، عن يزيد ابن رومان، عن حبيب بن عمير، عن حبيب بن خماشة الخَطْميّ، فذكره.

ومحمد بن عمر هو الواقديّ متهم، وبه أعلّه الحافظ في"الإصابة" في ترجمة حبيب بن عمير ابن خماشة.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن عمرو بن معدي كرب الزّبيديّ قال:"ولقد رأيتُنا وقوفًا ببطن محسر، نخاف أن يتخطّفنا الجنّ، فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"ارتفعوا عن بطن عرنة، فإنّهم إخوانكم إذا أسلموا".

رواه الطبراني في الكبير (17/ 46 - 47)، والأوسط (2303)، والصغير (157)، والبزار (1093)، والطحاوي في"مشكله" (1200) كلهم من طريق محمد بن زياد بن زبّار الكلبيّ، قال: حدّثنا شرقي بن قطامي، عن أبي طلق العائذيّ، عن شراحيل بن القعقاع، قال: سمعت عمرو بن معدي يقول (فذكره) في حديث طويل كما تقدم في صيغة التلبية، وفيه سلسلة من الضعفاء.

وفي الباب ما رواه مالك بلاغًا في الحج (116) أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"عرفة كلّها موقف، وارتفعوا عن بطن عرنة، والمزدلفة كلها موقف وارتفعوا عن بطن محسر".

قال ابن عبد البر في"التمهيد" (24/ 417):"هذا الحديث يتصل من حديث جابر بن عبد الله، ومن حديث ابن عباس، ومن حديث علي بن أبي طالب".

وقال في الاستذكار (13/ 9 - 10):"هذا الحديث يتصل من حديث جابر وابن عباس، وعلي ابن أبي طالب، وقد ذكرنا طرقه في"التمهيد"، وأكثرها ليس فيها ذكر بطن عرنة، وإسناده صحيح عند الفقهاء، وهو محفوظ من حديث أبي هريرة" انتهى.

قال ابن عبد البر:"واختلف العلماء فيمن وقف من عرفة بعرنة:

فقال مالك فيما ذكر ابن المنذر عنه: يهريق دمًا وحجّه تام. قال أبو عمر: روى هذه الرواية عن مالك خالد بن نزار.

قال أبو مصعب: إنه كمن لم يقف، وحجّه فائت، وعليه الحج من قابل إذا وقف ببطن عرفة.

ورُوي عن ابن عباس قال:"من أفاض من عرنة فلا حجّ له".
وقال القاسم وسالم:"من وقف بعرنة حتى دفع فلا حج له".

وذكر ابن المنذر هذا القول عن الشّافعي، قال: وبه أقول لأنه لا يجزئه أن يقف مكانا أمر رسول الله صلى الله عليه وسلم أن لا يقف به" انتهى. (13/ 13).

وقال النووي في"المجموع" (8/ 120):"لو وقف ببطن عرنة لم يصح وقوفه عندنا، وبه قال جماهير العلماء. وحكى ابنُ المنذر وأصحابُنا عن مالك أنه يصح ويلزمه دم. وقال العبدريّ: هذا الذي حكاه أصحابنا عن مالك لم أرَه له، بل مذهبه في هذه المسألة كمذهب الفقهاء أنه لا يجزئه. قال: وقد نصَّ أصحابه أنه لا يجوز أن يقف بعرنة".

ثم قال النوويّ -بعد أن سرد أحاديث الباب-:"فتحصل الدّلالة على مالك بثلاثة أشياء: أحدها: الرّواية المرسلة فإنّ المرسل عنده حجّة. والثاني: الموقوف على ابن عباس وهو حجّة عنده. والثّالث: أن الذي قلنا به من تحديد عرفات مجمع عليه والذي يدعيه من دخول عرنة في الحدّ لا يقبل إلا بدليل وليس لهم دليل صحيح ولا ضعيف في ذلك، والله أعلم".




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা আরনাহ উপত্যকা থেকে উঠে যাও, তোমরা মুহাস্‌সির উপত্যকা থেকেও উঠে যাও।"