আল-জামি` আল-কামিল
4981 - عن عائشة إن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما من يومٍ أكثر من أَنْ يُعْتق اللهُ فيه عبدًا من النّار من يوم عرفة، وإنّه ليدنو ثم يباهي بهم الملائكة فيقول ما أراد هؤلاء؟".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1348) من طريق ابن وهب، أخبرني مخرمة بن بكير، عن أبيه، قال: سمعت يونس بن يوسف يقول عن ابن المسيب، قال: قالت عائشة (فذكرته).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: আরাফার দিনের চেয়ে এমন কোনো দিন নেই, যেদিন আল্লাহ এত অধিক সংখ্যক বান্দাকে জাহান্নামের আগুন থেকে মুক্তি দেন। আর নিশ্চয়ই তিনি (আল্লাহ) নিকটবর্তী হন। অতঃপর তিনি তাদের (হাজীদের) নিয়ে ফেরেশতাদের কাছে গর্ব (বা প্রশংসা) করেন এবং বলেন, এরা কী চেয়েছে?
4982 - عن طارق بن شهاب: أنّ أُناسًا من اليهود قالوا: لو نزلت هذه الآية فينا لاتخذنا ذلك اليوم عيدًا! فقال عمر أيَّةُ آيةٍ؟ فقالوا: {الْيَوْمَ أَكْمَلْتُ لَكُمْ دِينَكُمْ وَأَتْمَمْتُ عَلَيْكُمْ نِعْمَتِي وَرَضِيتُ لَكُمُ الْإِسْلَامَ دِينًا} [المائدة: 3]. فقال عمر: إنّي لأعلمُ أيّ مكان أُنزلتْ؛ أُنزلتْ ورسولُ الله صلى الله عليه وسلم واقف بعرفة".
متفق عليه: رواه البخاريّ في المغازيّ (4407)، ومسلم في التفسير (3017) كلاهما من طريق سفيان الثوريّ، عن قيس بن مسلم، عن طارق بن شهاب، فذكره. واللفظ للبخاريّ.
ولفظ مسلم نحوه، وزاد:"قال سفيان: أشكّ كان يوم جمعة أم لا؟".
ثم رواه مسلم من طريق إدريس (هو ابن يزيد الأوديّ)، وأبي عُميس (هو عتبة بن عبد الله المسعوديّ) -فرّقهما- كلاهما عن قيس بن مسلم، به، نحوه. وفيه أنّها نزلتْ في يوم الجمعة، ولم يشكّا.
তারিক ইবনে শিহাব থেকে বর্ণিত, কিছু ইহুদি লোক বলল: যদি এই আয়াতটি আমাদের মাঝে অবতীর্ণ হতো, তাহলে আমরা সেই দিনটিকে উৎসবের দিন হিসেবে গ্রহণ করতাম। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, 'কোন আয়াত?' তারা বলল: "{আজ তোমাদের জন্য তোমাদের দীনকে পূর্ণাঙ্গ করে দিলাম এবং তোমাদের উপর আমার নিয়ামত সম্পূর্ণ করলাম, আর ইসলামকে তোমাদের জন্য দীন হিসেবে মনোনীত করলাম।}" [সূরা আল-মায়েদা: ৩]। উমার (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আমি নিশ্চিতভাবে জানি তা কখন এবং কোথায় অবতীর্ণ হয়েছিল; তা অবতীর্ণ হয়েছিল যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফায় দাঁড়িয়ে ছিলেন।
4983 - عن جابر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ما من أيام أفضل عند الله من أيام عشر من ذي الحجة". قال: فقال رجل: يا رسول الله، هنّ أفضل أمْ عدّتهنّ جهادًا في سبيل الله؟ قال:"هنّ أفضل من عدّتهن جهادا في سبيل الله. وما من يوم أفضل
عند الله من يوم عرفة؛ ينزل الله إلى السّماء الدّنيا فيباهي بأهل الأرض أهل السّماء فيقول: انظروا إلى عبادي شُعْثًا غُبْرًا ضاحين جاؤوا من كلِّ فجٍّ عميق يرجون رحمتي ولم يروا عذابي، فلمْ يُرَ يومٌ أكثرُ عتقًا من النّار من يوم عرفة".
حسن: رواه ابن حبان (3853) من طريق محمد بن مروان العقيليّ، حدّثنا هشام -هو الدّستوائيّ-، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.
ورواه أبو يعلى (2090)، والبزّار - كشف الأستار (1128) - كلاهما من هذا الوجه.
وإسناده حسن من أجل أبي الزبير -وهو المكي- هو لا بأس في تصريحه للتحديث، وإخراج ابن حبان له في صحيحه دليل على أنه صرّح به في إسناد آخر، كما نصّ على ذلك في المقدمة (1/ 162) قائلًا:"فإن صحَّ عندي خبر من رواية مدلّس أنه بيّن السّماع فيه، لا أبالي أن أذكره من غير بيان السماع في خبره بعد صحته عندي من طريق آخر".
وذكره ابن خزيمة في صحيحه (2840) من وجه آخر عن مرزوق -وهو أبو بكر-، عن أبي الزبير، عن جابر، مختصرًا. وقال: أنا أبرأ من عهدة مرزوق.
قلت: مرزوق أبو بكر هو الباهليّ البصريّ مولي طلحة بن عبد الرحمن هو ليس ممن يتبرّأ منه، فقد وثّقه أبو زرعة، وروى عنه جماعة من أئمة الحديث ثم هو لم ينفرد بهذا الحديث فقد تابعه هشام الدستوائيّ كما مضى في الإسناد الأول، ثم إذا كان ابن خزيمة يتبرأ من عهدته فهل لم يقف على الإسناد الأول فيخرجه في صحيحه؟ .
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহর কাছে যিলহজ্জ মাসের দশ দিনের চেয়ে উত্তম কোনো দিন নেই।" বর্ণনাকারী বলেন: তখন এক ব্যক্তি বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! এই দিনগুলো কি আল্লাহর পথে জিহাদের সমতুল্য দিনগুলোর চেয়েও উত্তম? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এই দিনগুলো আল্লাহর পথে এর (দিনগুলোর) সমতুল্য সংখ্যক দিনের জিহাদের চেয়েও উত্তম। আর আরাফার দিনের চেয়ে আল্লাহর কাছে উত্তম আর কোনো দিন নেই। আল্লাহ তাআলা দুনিয়ার আসমানে অবতরণ করেন এবং পৃথিবীবাসীকে নিয়ে আসমানবাসীদের সাথে গর্ব করেন। তিনি বলেন: 'আমার বান্দাদের দিকে দেখ, তারা উস্কোখুস্কো চুল নিয়ে, ধুলোমলিন অবস্থায়, রোদে পুড়ে দূর-দূরান্তের গভীর পথ অতিক্রম করে এসেছে। তারা আমার রহমতের আশা করে, যদিও তারা আমার শাস্তি দেখেনি।' আরাফার দিনের চেয়ে অধিক পরিমাণে জাহান্নাম থেকে মুক্তি দেওয়ার দিন আর দেখা যায় না।"
4984 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ الله عز وجل يباهي الملائكة بأهل عرفات، يقول: انظُروا إلى عبادي شُعْثًا غُبْرًا".
حسن: رواه الإمام أحمد (8047) عن أبي قَطن وإسماعيل بن عمر، قالا: حدّثنا يونس، عن مجاهد أبي الحجّاج، عن أبي هريرة، فذكر الحديث.
وإسناده حسن لأجل يونس، وهو: ابن أبي إسحاق فإنّه حسن الحديث.
وأبو قَطن هو: عمرو بن الهيثم بن قَطن -بفتح القاف- ثقة من رجال مسلم.
وصحّحه ابن خزيمة (2839)، وابن حبان (3852)، والحاكم (1/ 465) كلّهم من طريق يونس ابن أبي إسحاق.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشّيخين".
والصّواب أن يونس بن أبي إسحاق من رجال مسلم وحده.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "নিশ্চয়ই আল্লাহ তা‘আলা আরাফাতের ময়দানে অবস্থানকারীদের নিয়ে ফেরেশতাদের সামনে গর্ব করেন। তিনি বলেন: ‘তোমরা আমার বান্দাদের দিকে তাকাও, তারা এলোমেলো চুল ও ধূলিধূসরিত অবস্থায় এসেছে।"
4985 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يقول:"إنّ الله عز وجل يباهي ملائكته عشية عرفة بأهل عرفة، فيقول: انظروا إلى عبادي أتوني شُعْثًا غُبْرًا".
حسن: رواه أحمد (7089) عن أزهر بن القاسم، حدثنا المثني -يعني ابن سعيد-، عن قتادة، عن عبد الله بن باباه، عن عبد الله بن عمرو، فذكره.
ورواه أيضًا الطبرانيّ في"الصّغير" (575) من هذا الطّريق.
وإسناده حسن لأجل أزهر بن القاسم، فإنه صدوق.
قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 250): رواه أحمد والطبراني في"الكبير"، و"الصغير" ورجال أحمد موثقون. وبمعناه أحاديث أخرى ولكن كلها ضعيفة. انظر: كتاب الإيمان - جموع أبواب الإيمان بالملائكة.
আব্দুল্লাহ ইবনু আমর ইবনুল আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: “নিশ্চয় আল্লাহ তা‘আলা আরাফার দিনের সন্ধ্যায় আরাফার অধিবাসীদের নিয়ে তাঁর ফেরেশতাদের কাছে গর্ব করেন। অতঃপর তিনি বলেন: ‘তোমরা আমার বান্দাদের দিকে তাকাও, তারা এলোমেলো চুল ও ধূলিধূসরিত অবস্থায় আমার কাছে এসেছে।”
4986 - عن ابن عمر، قال: ثم أقبل رسول الله صلى الله عليه وسلم على الأنصاري فقال:"إنْ شئتَ أخبرتُكَ عمَّا جئْتَ تسألُ، وإنْ شئْتَ سألْتَني فأخْبرُكَ". فقال: لا يا نبي الله أخبرني عمّا جئتُ أسألُكَ. قال:"جئتَ تَسْألُني عن الحاجّ ما له حين يخرجُ من بيته؟ وما له حين يقوم بعرفات؟ وما له حين يرمي الجمار؟ وما له حين يحلق رأسه؟ وما له حين يقضي آخر طواف بالبيت". فقال: يا نبي الله! والذي بعثك بالحقّ! ما أخطأتَ مما كان في نفسي شيئًا! قال:"فإنّ له حين يخرج من بيته أن راحلته لا تخطو خطوة إلا كتب له بها حسنة أو حطّت عنه بها خطيئة، فإذا وَقفَ بعرفة فإنّ الله عز وجل ينزل إلى السّماء الدّنيا فيقول: انظُرُوا إلى عبادي شُعْثًا غُبْرًا اشهدوا أنّي قد غفرتُ لهم ذنوبهم وإن كان عدد قطر السّماء ورمل عالج. وإذا رمي الجمار لا يدري أحدٌ ما له حتى يوفاه يوم القيامة. وإذا حلق رأسه فله بكل شعرة سقطت من رأسه نور يوم القيامة. وإذا قضى آخر طوافه بالبيت خرج من ذنوبه كيوم ولدتْه أمُّه".
حسن: رواه ابن حبان (1887)، والبيهقيّ في دلائل النبوة (6/ 294)، والبزار -كشف الأستار- (1082) كلّهم من حديث يحيي بن عبد الرحمن الأرحبي، حدثني عبيدة بن الأسود، عن القاسم ابن الوليد، عن سنان بن الحارث بن مصرف، عن طلحة بن مصرف، عن مجاهد، عن ابن عمر، فذكر حديثًا طويلًا، وهذا جزء منه.
وإسناده حسن من أجل يحيى بن عبد الرحمن الأرحبي فإنه مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وسنان بن الحارث بن مصرف ذكره ابن حبان في الثقات (6/ 424، 8/ 299) وذكر من الرواة عنه القاسم بن الوليد، ومحمد بن طلحة، وترجمه ابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (4/ 254)، وزاد من الرواة عنه صالح بن حيي والد حسن بن صالح.
وقال البيهقي:"إسناده حسن".
وقال الهيثمي:"رجال البزار موثقون".
وقال البزار:"وقد رُوي هذا الحديث من وجوه، ولا نعلم له أحسن من هذا الطريق".
قلت: وهو كما قال، فقد رواه عبد الرزاق (8830) وعنه الطبرانيّ (3566) عن ابن مجاهد، عن أبيه، عن ابن عمر، قال: فذكر الحديث بطوله، ولم يسم عبد الرزاق بن مجاهد من هو؟ فإن كان هو عبد الوهاب فقال وكيع: كانوا يقولون: إن عبد الوهاب بن مجاهد لم يسمع من أبيه. أي فيه انقطاع. ثم هو ضعيف جدًا، كذبه سفيان، وقال ابن معين: ضعيف. وقال أبو حاتم: ضعيف الحديث. وأما قول ابن عدي: عامة ما يرويه لا يتابع عليه، فهو ليس على إطلاقه فإنه قد توبع في الإسناد السابق إلا أنه لا يعتبر به من أجل ضعفه الشديد.
فالخلاصة كما سبق قول البزار، وقال أيضًا وقد رُوي عن إسماعيل بن رافع، عن أنس نحو حديث ابن عمر.
قلت: رواه البزار -كشف الأستار (1083) - بإسناده عن إسماعيل بن رافع، عن أنس بن مالك، نحو حديث ابن عمر. وإسماعيل بن رافع ضعيف.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن ابن عباس قال:"كان فلان رديف رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم عرفة، قال: فجعل الفتي يلاحظ النساء وينظر إليهن. قال: وجعل رسول الله صلى الله عليه وسلم يصرف وجهه بيده من خلفه مرارًا. قال: وجعل الفتي يلاحظ إليهن. قال: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم: ابنَ أخي، إنّ هذا يوم مَنْ ملك فيه سمعَه وبصرَه ولسانَه غُفر له".
رواه الإمام أحمد (3041، 3350)، وأبو يعلى (2441)، والطبراني (12974)، وابن خزيمة في صحيحه (2834، 2833) كلهم من طريق سُكين بن عبد العزيز، قال: حدثني أبي، قال: سمعت ابن عباس قال (فذكره).
وفي بعض الروايات أن الفتى هو الفضل بن عباس.
وسكين بن عبد العزيز بن قيس العبدي البصريّ مختلف فيه، فقال ابن معين: ثقة. وقال أبو حاتم: لا بأس به، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وقال العجلي: ثقة، وقال ابن عدي: أرجو أنه لا بأس به. ولكن قال النسائي: ليس بالقوي.
والخلاصة: أنه حسن الحديث؛ ولذا قال فيه الحافظ:"صدوق يروي عن الضّعفاء" فضعفه ليس منه. ولكن أبوه عبد العزيز بن قيس، قال فيه أبو حاتم:"مجهول" ومع هذا ذكره ابن حبان في"الثقات".
وقد تبرّأ منه ومن ولده ابنُ خزيمة، فقال:"أنا برئ من عهدة سُكين بن عبد العزيز وعهدة أبيه، ثم روي بإسناده من وجهين - عن سكين بن عبد العزيز، عن أبيه، بإسناده، مثله.
وذلك بعد أن ذكر قصة الفضل وأنه كان رديف رسول الله صلى الله عليه وسلم، وجعل ينظر إلى امرأة حسنة، والنبيّ صلى الله عليه وسلم يصرف وجهه عنها بدون ذكر الزيادات التي في حديث سكين بن عبد العزيز.
قلت: وهي قصة صحيحة مخرّجة في الصّحيح.
ومن هنا يعرف تساهل المنذريّ في قوله بعد أن أخرج حديث ابن عباس من مسند الإمام أحمد:"بإسناد صحيح".
وفي الباب ما رُوي عن طلحة بن عبد الله بن كريز، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما رؤي الشيطانُ يومًا هو فيه أصغر ولا أدحر ولا أحقر ولا أغيظ منه في يوم عرفة، وما ذاك إلا لما رأى من تنزيل الرّحمة، وتجاوز الله عن الذّنوب العظام إلّا ما أُرى يوم بدر". قيل: وما رأي يوم بدر يا رسول الله؟ قال:"أما إنّه قد رأى جبريل يزع الملائكة".
رواه مالك في الحجّ (245) وعنه عبد الرزاق (8832) عن إبراهيم بن أبي عبلة، عن طلحة بن عبيد الله، فذكره. وهو مرسل.
وقوله:"أدحر" بالدال والحاء المهملة - أي أبعد وأذلّ. قال الله تعالى: {فَتُلْقَى فِي جَهَنَّمَ مَلُومًا مَدْحُورًا (39)} [سورة الإسراء: 39] أي مبعدًا من رحمة الله.
وفي الباب عن عباس بن مرداس السلميّ قال: إنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم دعا لأمّته عشية عرفة بالمغفرة فأجيب:"إنّي قد غفرت لهم ما خلا الظالم، فإني آخذ للمظلوم منه". قال:"أي ربِّ إنْ شئتَ أعطيتَ المظلوم من الجنة. وغفرت للظالم". فلم يجب عشيته، فلمّا أصبح بالمزدلفة أعاد الدّعاء. فأُجيب إلى ما سأل. قال: فضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم -أو قال: تبسّم-. فقال له أبو بكر وعمر: بأبي أنت وأمي إنّ هذه لساعة ما كنت تضحك فيها! . فما الذي أضحكك؟ أضحك الله سنَّك. قال:"إنّ عدو الله إبليس لما علم أن الله عز وجل قد استجاب دعائي وغفر لأمتي أخذ التراب فجعل يحثوه على رأسه ويدعو بالويل والثبور. فأضحكني ما رأيت من جزعه".
رواه ابن ماجه (3013) عن أيوب بن محمد الهاشميّ، قال: حدّثنا عبد القاهر بن السريّ السّلميّ، قال: حدّثنا عبد الله بن كنانة بن عباس بن مرداس السلميّ، أنّ أباه أخبره، عن أبيه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم دعا، فذكره.
ورواه أبو داود (5234) واقتصر على قوله:"ضحك رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال له أبو بكر أو عمر:"أضحك الله سنك" وساق الحديث. هكذا قال أبو داود.
فقوله:"ساق الحديث" إشارة إلى ذكر الحديث كاملًا.
ورواه الإمام أحمد (16207)، والبيهقي في شعب الإيمان (346) بكامله كلّهم من طريق عبد القاهر بن السري بإسناده، مثله. إلا أنهم قالوا: عن ابن كنانة بن العباس.
وابن كنانة هو عبد الله كما جاء مصرحًا به عند ابن ماجه.
وأخرجه البخاريّ في تاريخه (7/ 2 - 3) وقال: لم يصح حديثه.
قلت: وهو كما قال، فإنّ فيه عبد الله بن كنانة بن العباس، لم يرو عنه غير عبد القاهر، ولذا قال فيه الحافظ:"مجهول".
وأيضًا فيه أبوه كنانة بن العباس بن مرداس، لم يرو عنه سوى ابنه عبد الله، ولذا قال فيه أيضًا الحافظ:"مجهول".
وقال ابن حبان في ترجمة كنانة بن العباس بن مرداس السلمي في المجروحين (2/ 234):"يروي عن أبيه، روى عنه ابنه، منكر الحديث جدًا. فلا أدري التخليط في حديثه منه أو من ابنه، ومن أيهما كان فهو ساقط الاحتجاج بما روى، لعظم ما أتي من المناكير عن المشاهير".
ثم أعاد ذكره في"الثقات" (/ 339) من التابعين فتناقض.
وقال البيهقيّ:"هذا الحديث له شواهد كثيرة، وقد ذكرناها في كتاب"البعث" فإن صحّ بشواهده فقيه الحجة، وإن لم يصح فقد قال الله عز وجل: {إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ} [سورة النساء: 48]، وظلم بعضهم بعضًا دون الشرك" انتهى.
وفيه إشارة إلى ضعف الحديث حتى بشواهده.
وبالغ ابن الجوزيّ فأدخل هذا الحديث في كتابه"الموضوعات" (2/ 214) بناء على كلام ابن حبان في كنانة بن العباس، ولعله لم يقف على كلام ابن حبان في"الثقات".
والخلاصة أنه ضعيف لا موضوع؛ ولذا تعقبه الحافظ ابن حجر في"القول المسدّد" (الحديث السابع)، وذكر له شواهد، ولكن كلها ضعيفة لا يسلم منها شيء، ثم إن هذا الحديث مع ضعفه يدل على عموم غفران الذنوب لمن شهد الموقف منها حقوق العباد.
وقد جاء في الصحيح في قوله تعالى: {وَنَزَعْنَا مَا فِي صُدُورِهِمْ مِنْ غِلٍّ إِخْوَانًا عَلَى سُرُرٍ مُتَقَابِلِينَ} [سورة الحجر: 47] قال:"يخلص المؤمنون من النار، فيحبسون على قنطرة بين الجنة والنار، فيقتص بعضهم من بعض مظالم كانت بينهم في الدّنيا، حتى إذا هُذِّبوا ونقوا أذن لهم في دخول الجنة، فوالذي نفس محمد بيده لأحدهم أهدي بمنزله في الجنة منه بمنزله كان في الدنيا".
رواه البخاريّ في الرقاق (6535) عن الصلت بن محمد، حدثنا يزيد بن زريع، فقرأ الآية الكريمة، قال: حدثنا سعيد، عن قتادة، عن أبي المتوكل الناجي، أن أبا سعيد الخدريّ قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم (فذكر الحديث).
وقد روي بخلاف حديث العباس بن مرداس:
عن أنس بن مالك قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم بعرفة يوم عرفة، وكادت الشّمس أن تغرب فقال:"يا بلال، أنصت لي الناس". فقام بلال: فقال: يا معشر الناس أنصتوا. فقال:"أتاني جبريل عليه السلام آنفًا، فأقرأني من ربّي السلام، وقال: إنّ الله قد غفر لأهل عرفات ما خلا التّبعات. أفيضوا باسم الله".
رواه العقيليّ في ترجمة (شبويّه المروزيّ) عن ابن المبارك وقال:"حديثه منكر غير محفوظ".
وقال: وقد روي في هذا المعنى بخلاف هذا اللفظ حديث العباس بن مرداس، وحديث ابن عمر وغيره. وأسانيدها لينة، وفيه عن عائشة وجابر بإسنادين صالحين" انتهى. انظر:"الضعفاء" (2/ 196 - 197).
وقال الذهبي في"الميزان" (2/ 262):"شبّويه عن ابن المبارك" فذكر حديثًا منكرًا، ذكره العقيليّ.
إذا عرفنا لفظ هذا الحديث بأنه يخالف ما رواه العباس بن مرداس عرفنا وهم المنذريّ في"الترغيب والترهيب" (1821) فجعل حديث ابن المبارك موافقًا لحديث العباس بن مرداس ولفظه:"إنّ الله عز وجل غفر لأهل عرفات وأهل المشعر، وضمن عنهم التبعات".
وزاد:"فقام عمر بن الخطاب فقال: يا رسول الله، هذا لنا خاصة؟ قال:"هذا لكم، ولمن أتي من بعدكم إلى يوم القيامة" فقال عمر: كثر خير الله وطاب" انتهي.
فلعلّه وهم في سوق اللفظ لأنه كان يملي من حفظه كما يظهر من مقدمته.
وفي الباب ما رُوي أيضًا عن أنس قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"إنّ الله تطوَّل على أهل عرفات يباهي بهم الملائكة يقول: يا ملائكتي انظروا إلى عبادي شُعْثًا غُبْرًا، أقبلُوا يضربونَ إليَّ من كلِّ فجٍّ عميق، فأشهدكم أني قد أجبت دعاءهم، وشفعت رغبتهم، ووهبت مسيئهم لمحسنهم، وأعطيت محسنيهم جميع ما سألوني غير التبعات التي بينهم، فإذا أفاض القوم إلى جمع ووقفوا وعادوا في الرغبة والطلب إلى الله يقول: يا ملائكتي عبادي وقفوا، فعادوا في الرغبة والطّلب، فأشهدكم أني قد أجبت دعاءهم، وشفعت رغبتهم، ووهبت مسيئهم لمحسنهم، وأُعطيت محسنيهم ما سألني، وكفلت عنهم التّبعات التي بينهم".
رواه أبو يعلي (1351) عن إبراهيم بن الحجاج النيليّ، حدثنا صالح المريّ، عن يزيد الرّقاشي، عن أنس، فذكره.
ذكره الهيثميّ في"المجمع" (3/ 257) وضعّفه من أجل صالح المريّ.
قلت: صالح المريّ هو: ابن بشير بن وادع المري -بضم الميم وتشديد الراء- ضعّفه ابن معين، وقال البخاريّ: منكر الحديث. وفي التقريب:"ضعيف".
وأما ابن حبان فذكره في الثقات (4/ 374) فالظّاهر أنه لم يقف على كلام الأئمة فيه. وفات الهيثميّ يزيد الرقاشيّ وهو ابن يزيد بن أبان فلم يضعفه وهو ممن ضُعِّف.
وأمّا ما رُوي"أفضلُ الأيام يوم عرفة وافق يوم الجمعة، وهو أفضل من سبعين حجّة في غير يوم الجمعة" فهو لا أصل له، أورده ابن الأثير في"جامع الأصول" (6867) -تحقيق: أيمن صالح- وعزاه إلى رزين.
ورَزين هو ابن معاوية بن عمار الأندلسيّ السرقسطيّ المتوفي سنة خمس وثلاثين وخمسمائة بمكة، وصفه الذهبي في"سير أعلام النبلاء" (20/ 204) بأنه الإمام المحدّث الشهير صاحب كتاب"تجريد الصحاح"، وكان إمام المالكيين بالحرم.
وقال ابن الأثير في مقدمة"جامع الأصول" (1/ 48 - 50):"جمع بين كتب البخاريّ،
ومسلم، والموطأ لمالك، وجامع الترمذي، وسنن أبي داود، وسنن أبي عبد الرحمن النسائي رحمة الله عليهم".
وهو الذي بني عليه الحافظ ابن الأثير كتابه"جامع الأصول"، ولكن كما يقول الحافظ الذهبي:"أدخل في كتابه زيادات واهية، لو تنزّه عنها لأجاد".
قلت: وهذا الحديث من هذا القبيل.
وقد حاول أئمّة الحديث الوقوف على إسناد هذا الحديث فلم يقفوا عليه، قال الحافظ ابن القيم في"زاده" (1/ 65) بعد أن بيّن مزية وقفة الجمعة من عشرة وجوه بقوله:"وأما ما استفاض على ألسنة العوام بأنها تعدل ثنتين وسبعين حجة فباطل لا أصل له عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، ولا عن أحد من الصحابة والتابعين".
وقال الحافظ في"الفتح" (8/ 271) بعد أن عزاه لرزين في"جامعه":"لا أعرف حاله؛ لأنه لم يذكر صحابيه ولا من أخرجه".
وقال الحافظ ابن ناصر الدين الدمشقي في جزء"فضل عشر ذي الحجة ويوم عرفة" (ص 46):"حديث وقفة الجمعة يوم عرفة أنها تعدل اثنتين وسبعين حجة حديث باطل لا يصح، وكذلك لا يثبت ما رُوي عن زرّ بن حبيش أنه أفضل من سبعين حجة في غير يوم جمعة".
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসারী লোকটির দিকে মুখ ফিরিয়ে বললেন: "তুমি চাইলে, তুমি যে বিষয়ে প্রশ্ন করতে এসেছ, আমি সে বিষয়ে তোমাকে বলে দেব। আর যদি চাও, তুমি আমাকে প্রশ্ন করবে এবং আমি তোমাকে উত্তর দেব।" লোকটি বলল: "না, হে আল্লাহর নবী! আপনিই বলুন, আমি আপনাকে কী প্রশ্ন করতে এসেছি।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি আমাকে প্রশ্ন করতে এসেছ যে, হাজি যখন তার বাড়ি থেকে বের হয়, তখন সে কী লাভ করে? আর যখন সে আরাফাতের ময়দানে অবস্থান করে, তখন সে কী লাভ করে? আর যখন সে জামারাহসমূহে পাথর নিক্ষেপ করে, তখন সে কী লাভ করে? আর যখন সে মাথা মুণ্ডন করে, তখন সে কী লাভ করে? আর যখন সে বাইতুল্লাহর শেষ তাওয়াফ সম্পন্ন করে, তখন সে কী লাভ করে?" লোকটি বলল: "হে আল্লাহর নবী! সেই সত্তার কসম, যিনি আপনাকে সত্যসহকারে প্রেরণ করেছেন! আপনি আমার মনে যা ছিল, তার কিছুই ভুল করেননি (অর্থাৎ হুবহু সব বলে দিয়েছেন)।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে যখন তার বাড়ি থেকে বের হয়, তখন তার উট বা বাহন যতবার পা ফেলে, ততবার তার জন্য একটি করে নেকি লেখা হয় অথবা তার একটি করে গুনাহ মোচন করা হয়। আর যখন সে আরাফাতে অবস্থান করে, তখন আল্লাহ তাআলা দুনিয়ার নিকটবর্তী আকাশে অবতরণ করেন এবং বলেন: ‘আমার বান্দাদের দিকে তাকাও—তারা আলুথালু ও ধুলায় আবৃত অবস্থায় এসেছে। তোমরা সাক্ষী থাকো যে, আমি তাদের গুনাহ ক্ষমা করে দিয়েছি, যদিও তা আকাশের ফোঁটা এবং বালুকাময় মরুভূমির বালুকণার সমসংখ্যক হয়। আর যখন সে জামারাহসমূহে পাথর নিক্ষেপ করে, তখন সে কী লাভ করে, তা ক্বিয়ামতের দিন তার প্রতিফল না পাওয়া পর্যন্ত কেউ জানে না। আর যখন সে তার মাথা মুণ্ডন করে, তখন তার মাথা থেকে ঝরে পড়া প্রতিটি চুলের বিনিময়ে ক্বিয়ামতের দিন তার জন্য একটি করে আলো (নূর) থাকবে। আর যখন সে বাইতুল্লাহর শেষ তাওয়াফ সম্পন্ন করে, তখন সে তার গুনাহ থেকে এমনভাবে বেরিয়ে আসে, যেমন তার মা তাকে জন্ম দিয়েছিল।"
4987 - عن أبي أيوب، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من قال: لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كلّ شيء قدير، عشر مرات كان كمن أعتق أربعة أنفس من ولد إسماعيل".
متفق عليه: رواه البخاريّ (6404)، ومسلم (2693) كلاهما من حديث عمر بن أبي زائدة، عن أبي إسحاق، عن عمرو بن ميمون، قال:"من قال: لا إله إلا الله … إلخ".
قال عمر (ابن أبي زائدة) حدّثنا عبد الله بن أبي السفر، عن الشعبي، عن ربيع بن خثيم، بمثل ذلك. فقلت للربيع: ممن سمعتَه؟ قال: من عمرو بن ميمون. قال: فأتيت عمرو بن ميمون، فقلت: ممن سمعته؟ قال: من ابن أبي ليلى. قال: فأتيت ابن أبي ليلى، فقلت: ممن سمعته؟ قال: من أبي أيوب الأنصاري يحدثه عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.
আবূ আইয়ুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু লা শারীকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু ওয়া হুয়া আলা কুল্লি শাইয়িন ক্বাদীর’ (আল্লাহ ছাড়া কোনো ইলাহ নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই। রাজত্ব তাঁরই এবং প্রশংসা তাঁরই। তিনি সর্ববিষয়ে ক্ষমতাবান।) এই বাক্যটি দশবার বলবে, সে এমন ব্যক্তির মতো হবে যে ইসমাঈলের (আঃ) বংশধর থেকে চারজন দাস মুক্ত করল।”
এ বিষয়ে ঐকমত্য রয়েছে। ইমাম বুখারী (৬৪০৪) ও মুসলিম (২৬৯৩) উভয়েই উমর ইবনু আবী যায়েদাহ্ থেকে, তিনি আবূ ইসহাক থেকে, তিনি আমর ইবনু মাইমূন থেকে এটি বর্ণনা করেছেন। আমর ইবনু মাইমূন বলেন: "যে ব্যক্তি বলবে: লা ইলাহা ইল্লাল্লাহ... ইত্যাদি।"
উমর (ইবনু আবী যায়েদাহ্) বলেন: আব্দুল্লাহ ইবনু আবী সাফারের মাধ্যমে আমাদের কাছে বর্ণনা করা হয়েছে, তিনি শা'বী থেকে, তিনি রবী ইবনু খুসাইম থেকে অনুরূপ বর্ণনা করেছেন। আমি রবী-কে জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কার কাছে শুনেছেন? তিনি বললেন: আমর ইবনু মাইমূনের কাছে। তিনি বলেন: অতঃপর আমি আমর ইবনু মাইমূনের কাছে গেলাম এবং জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কার কাছে শুনেছেন? তিনি বললেন: ইবনু আবী লায়লার কাছে। তিনি বলেন: অতঃপর আমি ইবনু আবী লায়লার কাছে গেলাম এবং জিজ্ঞেস করলাম: আপনি কার কাছে শুনেছেন? তিনি বললেন: আবূ আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে, যিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে এটি বর্ণনা করেছেন।
4988 - عن علي بن أبي طالب قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أفضل ما قلتُ أنا والنّبيون قبلي عشية عرفة: لا إله إلّا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كلّ شيء قدير".
حسن: رواه الطبراني في الدعاء (874) من طريق قيس بن الربيع، عن الأغر بن الصباح، عن
خليفة بن حصين، عن علي رضي الله عنه، فذكره.
وفي الإسناد قيس بن الربيع الأسدي أبو محمد الكوفيّ، مختلف فيه. فقال عفّان بن مسلم: كان قيس ثقة يوثقه الثوري وشعبة. وقال أبو داود الطّيالسيّ: قال لنا شعبة: أدركوا قيسًا قبل أن يموت.
وعن الوليد الطيالسيّ قال: كان قيس بن الربيع ثقة، حسن الحديث، حدّث عنه معاذ بن معاذ، ولكن ليّنه الإمام أحمد وضعّفه ابن معين، وكان عبد الرحمن بن مهدي يحدث عنه ثم تركهـ.
والسبب في ذلك كما قال جعفر بن أبان: سألت ابن نمير عن قيس بن الربيع؟ فقال: كان له ابن هو آفته، نظر أصحاب الحديث في كتبه، فأنكروا حديثه وظنوا أن ابنه قد غيّرها.
وكذلك قال أبو داود: إنما أتي قيس بن الربيع من قبل ابنه، كان ابنه يأخذ حديث الناس فيدخلها في فرج كتاب قيس، ولا يعرف الشيخ ذلك.
والخلاصة فيه ما قاله ابن عدي:"وعامة رواياته مستقيمة، والقول فيه ما قال شعبة، وإنه لا بأس به".
فإذا تبين أنه لم يتعمّد ولم يُتّهم فقد وجدنا لحديثه شاهدًا مرسلًا قويًّا، وهو ما رواه مالك (1/ 422) عن زياد بن أبي زياد مولي عبد الله بن عياش بن أبي ربيعة، عن طلحة بن عبيد الله بن كريز، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أفضل الدّعاء دعاء يوم عرفة، وأفضل ما قلت أنا والنّبيون من قبلي: لا إله إلّا الله وحده لا شريك له".
وطلحة بن عبيد الله بن كَرِيزْ -بفتح الكاف وإسكان الزاي- تابعيّ خزاعيّ، قال عبد الله بن أحمد: سألت أبي عنه، فقال: ثقة. وعمل السّلف يقويه أيضًا.
عن أبي شعبة أنه قال: رمقت ابن عمر وهو بعرفة لأسمع ما يدعو، قال: فما زاد على أن قال:"لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير".
أورده البيهقي (5/ 117) هكذا معلقا.
ورواه الطبراني في"الدعاء" (878) بإسناده عن عبد الله بن الحارث، أن ابن عمر كان عشية عرفة يرفع صوته، فذكره وزاد بعده:"اللَّهم اهدنا بالهدى، وزينا بالتقوى، واغفر لنا في الآخرة والأولى" ثم يخفض صوته، ثم يقول:"اللَّهم إني أسألك من فضلك وعطائك رزقًا طيبًا مباركًا، اللَّهم إنك أمرت بالدّعاء، وقضيت على نفسك بالاستجابة، وأنت لا تخلف وعدك، ولا تكذب وعدك، اللَّهم ما أحببت من خير فحبّبه إلينا، ويسره لنا، وما كرهت من شيء فكرهه إلينا، وجنبنا ولا تنزع عنا الإسلام بعد إذ أعطيتنا" انتهى ورجاله ثقات.
وفي معناه ما رُوي أيضا عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه أن النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال:"خير الدّعاء دعاء يوم عرفة، وخير ما قلت أنا والنبيون من قبلي: لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كل شيء قدير".
رواه الترمذي (3585) عن أبي عمرو مسلم بن عمرو، حدثني عبد الله بن نافع، عن حماد بن أبي حميد، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده، فذكره.
قال الترمذي:"هذا حديث غريب من هذا الوجه، وحماد بن أبي حُميد هو محمد بن أبي حميد، وهو أبو إبراهيم الأنصاري المدني، ليس بالقوي عند أهل الحديث".
وقال الحافظ في"التقريب":"هو الأنصاريّ الزرقي، لقبه حماد، ضعيف".
ومن طريقه رواه الإمام أحمد (6961).
وأمّا قول الهيثميّ في"المجمع" (3/ 252):"رجاله موثقون" فهو ليس كما قال؛ فإنّ حماد بن أبي حميد ضعيف باتفاق أهل العلم، ولم يذكره ابن حبان في الثّقات.
وحديث عبد الله بن عمرو هذا مع ضعف فيه إذا ضمّ إلى مرسل طلحة بن عبيد الله قوي؛ لأنّ ابن عدي قال في حماد بن أبي حميد:"وهو مع ضعفه يكتب حديثه".
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن علي رضي الله عنه قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"أكثر دعائي ودعاء الأنبياء قبلي بعرفة: لا إله إلا الله وحده لا شريك له، له الملك وله الحمد وهو على كلّ شيء قدير، اللَّهم! اجعل في قلبي نورًا، وفي سمعي نورًا، وفي بصري نورًا، اللهم! اشرح لي صدري ويسِّر لي أمري، أعوذ بك من وسواس الصدر، وفتنة القبر، وشتات الأمر، وأعوذ بك من شر ما يأتي في الليل والنهار، وما تهبُّ به الرياح".
رواه ابن عبد البر في"التمهيد" (6/ 39)، والبيهقي (5/ 117) كلاهما من طريق موسي بن عبيدة، عن أخيه عبد الله بن عبيدة، عن علي رضي الله عنه.
قال البيهقي: تفرد به موسي بن عبيدة وهو ضعيف، ولم يدرك أخوه عليًّا رضي الله عنه.
قلت: وهو كما قال، موسي بن عبيدة هذا هو الربذي، أهل العلم مطبقون على تضعيفه.
وفي الباب أحاديث أخرى عن عمر، وابن عباس، وابن مسعود وغيرهم. ولا يسلم منها شيء من ضعيف أو مجهول أو من لا يحتج به. والصحيح في هذا الباب هو ما ذكرته.
আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “আরাফার সন্ধ্যায় (বিকেলে) আমি এবং আমার পূর্ববর্তী নবীগণ যা বলেছি তার মধ্যে সর্বোত্তম হলো: ‘লা ইলাহা ইল্লাল্লাহু ওয়াহদাহু লা শারীকা লাহু, লাহুল মুলকু ওয়া লাহুল হামদু ওয়া হুয়া আলা কুল্লি শাই’ইন ক্বাদীর’।” (অর্থাৎ, আল্লাহ্ ছাড়া কোনো ইলাহ্ নেই, তিনি একক, তাঁর কোনো শরীক নেই। রাজত্ব তাঁরই এবং সমস্ত প্রশংসা তাঁরই। আর তিনি সবকিছুর উপর ক্ষমতাবান।)
4989 - عن أم الفضل بنت الحارث: أنّ ناسًا تماروا عندها يوم عرفة في صيام رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال بعضُهم: هو صائم. وقال بعضهم: ليس بصائم، فأرسلتُ إليه بقَدَحِ لبنٍ -وهو واقف على بعيره- فشرب.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (132) عن أبي النّضر مولى عمر بن عبيد الله، عن عُمير مولي عبد الله بن عباس، عن أم الفضل، فذكرته.
ورواه البخاري في الحج (1661)، ومسلم في الصيام (1132: 110) كلاهما من طريق
مالك، به، مثله.
وأمّ الفضل اسمها لبابة بنت الحارث الهلالية أخت ميمونة زوج النبي صلى الله عليه وسلم، وزوج العباس، قديمة الإسلام.
উম্মুল ফাদ্বল বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, একদিন আরাফার দিনে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের রোযা রাখা নিয়ে কিছু লোক তাঁর কাছে বিতর্ক করছিল। তাদের কেউ বলছিল: তিনি রোযাদার। আবার কেউ বলছিল: তিনি রোযাদার নন। (বিতর্ক শুনে) আমি তখন তাঁর কাছে এক পেয়ালা দুধ পাঠালাম—এ সময় তিনি তাঁর উটের উপর দাঁড়ানো ছিলেন—অতঃপর তিনি তা পান করলেন।
4990 - عن ميمونة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أنها قالت: إنّ الناس شكُّوا في صيام رسول الله صلى الله عليه وسلم يوم عرفة، فأرسلتُ إليه بحلاب وهو واقف في الموقف، فشرب منه والناس ينظرون.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصوم (1989)، ومسلم في الصيام (1124) كلاهما من طريق ابن وهب، أخبرني عمرو (هو ابن الحارث)، عن بكير (هو ابن عبد الله بن الأشج)، عن كريب مولي ابن عباس، عن ميمونة، فذكرته.
মায়মূনাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: লোকেরা আরাফার দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর রোযা রাখা নিয়ে সন্দেহ করছিল, তাই আমি তাঁর কাছে একটি দুধের পাত্র (বা পেয়ালা) পাঠালাম, যখন তিনি (আরাফাতের) মাঠে (মওকিফে) দাঁড়িয়েছিলেন, তখন তিনি তা থেকে পান করলেন এবং লোকেরা তা দেখছিল।
4991 - عن جابر بن عبد الله قال: ثم ركب رسول الله صلى الله عليه وسلم حتى أتى الموقف، فجعل بطن ناقته القصواء إلى الصّخرات، وجعل حَبْل المشاة بين يديه، واستقبل القبلة … الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره بطوله في حجة النبي صلى الله عليه وسلم.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সওয়ারীতে আরোহণ করলেন এবং মাওকিফ (দাঁড়ানোর স্থান)-এ আসলেন। তিনি তাঁর উটনী কাসওয়ার পেট পাথরের দিকে রাখলেন, পথচারীদের চলার পথকে তাঁর সামনে রাখলেন এবং কিবলামুখী হলেন... (বাকি হাদিসটুকু)।
4992 - عن أسامة بن زيد قال: كنتُ رديف النبيّ صلى الله عليه وسلم بعرفات، فرفع يديه يدعو، فمالت به ناقته فسقط خطامُها، فتناول الخطام بإحدى يديه، وهو رافع يده الأخرى.
حسن: رواه النسائيّ (3011) عن يعقوب بن إبراهيم، عن هُشيم، قال: حدثنا عبد الملك، عن عطاء، قال: قال أسامة، فذكره.
ورواه أحمد (21821) وصحّحه ابن خزيمة (2824) كلاهما من حديث هشيم، به، مثله. وعطاء هو ابن أبي رباح اختلف في سماعه من أسامة بن زيد، فنفاه أبو حاتم كما في"تحفة التحصيل" (ص 229)، وأثبته ابن خزيمة كما في"صحيحه" (3006) قال فيه: حدّثني أسامة بن زيد.
والأصل في هذا الحديث أنه عن عطاء، عن ابن عباس، عن أسامة بن زيد إلا أنّ عبد الملك ابن أبي سليمان أخطأ فحذف الواسطة لأنه وصف بأنّ له أوهامًا، فروى عددًا من الأحاديث عن عطاء، عن أسامة بن زيد.
انظر مسند أحمد (21822، 21823). ولذا أخرج أصحاب الصحاح هذا الحديث وغيره من هذا الطريق، منهم: ضياء الدين المقدسيّ في"المختارة" (1335) من طريق هُشيم.
উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি আরাফাতের ময়দানে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে (একই বাহনে) আরোহণ করে ছিলাম। তিনি দু'হাত তুলে দু'আ করছিলেন। তখন তাঁর উটনিটি একদিকে ঝুঁকে গেল এবং তার লাগাম (নাকের দড়ি) নিচে পড়ে গেল। তিনি তাঁর এক হাত দ্বারা লাগামটি তুলে নিলেন, অথচ তাঁর অপর হাতটি তখনও (দু’আর জন্য) উত্তোলিত ছিল।
4993 - عن أم الفضل بنت الحارث: أنّ ناسًا تماروا عندها يوم عرفة في صيام رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال بعضُهم: هو صائم. وقال بعضهم: ليس بصائم، فأرسلتُ إليه بقَدَحِ لبنٍ -وهو واقف على بعيره- فشرب.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (132) عن أبي النّضر مولي عمر بن عبيد الله، عن عُمير مولي عبد الله بن عباس، عن أم الفضل، فذكرته.
ورواه البخاري في الحج (1661)، ومسلم في الصيام (1123: 110) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
উম্মুল ফাদল বিনতে হারিস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই কিছু লোক তাঁর (উম্মুল ফাদলের) কাছে আরাফার দিন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর রোজা রাখা নিয়ে বিতর্ক করছিল। তাদের কেউ কেউ বলছিল: তিনি রোযা রেখেছেন। আর কেউ কেউ বলছিল: তিনি রোযা রাখেননি। অতঃপর তিনি (উম্মুল ফাদল) তাঁর কাছে এক পাত্র দুধ পাঠালেন—যখন তিনি তাঁর উটের ওপর দাঁড়িয়ে ছিলেন—তখন তিনি তা পান করলেন।
4994 - عن جابر بن عبد الله قال: فلم يزل (يعني النبيَّ صلى الله عليه وسلم" واقفًا حتّى غربت الشّمس، وذهبت الصُّفرة قليلا حتى غاب القرْص … الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره بطوله في حجة النبيّ صلى الله عليه وسلم.
الوقوف المجزئ أن يكون بعد الزوال إلى الغروب كما ثبت ذلك من فعل النبيّ صلى الله عليه وسلم.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, তিনি (অর্থাৎ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দাঁড়িয়ে থাকলেন, যতক্ষণ না সূর্য অস্তমিত হলো এবং (আলোর) হলদে ভাব কিছুটা দূর হলো, যতক্ষণ না সূর্যের চাকতি (সম্পূর্ণরূপে) অদৃশ্য হয়ে গেল।
4995 - عن علي بن أبي طالب قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم بعرفة ثم أفاض حين غابت الشمس، وأردف أسامة بن زيد.
حسن: رواه أبو داود (1922، 1935)، والترمذي (885)، وابن ماجه (3010)، وصححه ابن خزيمة (2837) -واللّفظ له- كلّهم من حديث سفيان، عن عبد الرحمن بن الحارث بن عياش، عن زيد بن علي، عن أبيه، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي، فذكره في حديث طويل كما ذكره الترمذيّ -ومضى قريبًا- وغيره رواه مختصرًا، واللفظ هنا لابن خزيمة الذي اختصره في هذا الجزء الخاص بالإفاضة من عرفة.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد الرحمن بن الحارث بن عياش غير أنه حسن الحديث.
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরাফাতে অবস্থান করলেন। অতঃপর যখন সূর্য ডুবে গেল, তিনি (সেখান থেকে) রওয়ানা হলেন এবং উসামাহ ইবনু যায়িদকে তাঁর পিছনে সওয়ারী করে নিলেন।
4996 - عن أسامة، قال: كنتُ رِدْف النبيّ صلى الله عليه وسلم فلما وقعت الشمس دفع رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه أبو داود (1924) عن أحمد بن حنبل، حدثنا يعقوب، حدثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني إبراهيم بن عقبة، عن كريب مولي عبد الله بن عباس، عن أسامة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق، وقد صرّح بالتحديث.
উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের পিছনে সওয়ার ছিলাম। অতঃপর যখন সূর্য অস্তমিত হলো, তখন আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যাত্রা শুরু করলেন।
4997 - عن عروة بن مضرس الطائي قال: أتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم بالموقف -يعني بجمع
- قلت: جئت يا رسول الله من جبل طي أكلَلْتُ مطيتي وأتعبت نفسي، والله ما تركت من حبل إلا وقفتُ عليه! فهل لي من حج؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أدرك معنا هذه الصّلاة، وأتي عرفات قبل ذلك ليلًا أو نهارًا فقد تم حجُّه وقضي تفثه".
صحيح: رواه أبو داود (1950)، والترمذي (891)، والنسائي (3039)، وابن ماجه (3016) كلّهم من طريق إسماعيل بن أبي خالد، حدّثنا عامر الشعبيّ، عن عروة بن مضرّس، فذكر الحديث.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح". والحديث تقدم في باب وجوب الوقوف بعرفة.
وقد استدل الإمامُ أحمد وغيره بحديث عروة بن مضرس على أن وقت الوقوف من حين طلوع الفجر من يوم عرفة إلى طلوع الفجر من ليلة النحر، وسوّي بين أجزاء النهار وأجزاء الليل.
وقد نقل شيخ الإسلام ابن تيمية عن أكثر الحنابلة مثل أبي بكر، وابن أبي موسى، وابن حامد، والقاضي وأصحابه قالوا: لو وقف بعرفة يوم عرفة قبل الزوال ونفر منها قبل الزوال أساء وحجّه تام، وعليه الدّم.
وأما قول مالك:"أن من دفع قبل الغروب فلا حج له".
فقد قال ابن عبد البر في"التمهيد" (10/ 21):"ولا نعلم أحدًا من فقهاء الأمصار قال بقول مالك، وهو قد وقف بعد الزوال وبعد الصلاة، ولا روينا عن أحد من السلف؛ فإنّ سائر العلماء قالوا: كلّ من وقف بعرفة بعد الزوال أو في ليلة النحر فقد أدرك الحج، فإن دفع قبل غروب الشمس من عرفة فعليه دم عندهم، وحجّه تام".
উরওয়াহ ইবনু মুদাররিস আত-ত্বাঈ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি অবস্থানস্থলে—অর্থাৎ মুযদালিফায়—রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বললাম: হে আল্লাহর রাসূল! আমি ত্বাই পাহাড় থেকে এসেছি। আমার উটকে আমি ক্লান্ত করে ফেলেছি এবং নিজেকে পরিশ্রান্ত করেছি। আল্লাহর কসম! আমি এমন কোনো পর্বতমালা/পাহাড়ের পথ বাকি রাখিনি যেখানে আমি দাঁড়াইনি! আমার কি তবে হজ্জ হবে? তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "যে ব্যক্তি আমাদের সাথে এই সালাত (ফজরের সালাত) আদায় করল, আর এর পূর্বে দিনে বা রাতে আরাফাতে উপস্থিত হলো, তার হজ্জ পূর্ণ হয়ে গেল এবং সে তার অপরিহার্য কাজ (ইহরামের কারণে সৃষ্ট ময়লা দূরীকরণ) শেষ করল।"
4998 - عن عروة بن الزبير، أنه قال: سُئل أسامة بن زيد وأنا جالسٌ معه: كيف كان يسير رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع حين دفع؟ قال: كان يسير العَنَق، فإذا وجد فجوةً نصَّ.
قال مالك: قال هشام: والنَّصُّ فوق العَنَق.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (176) عن هشام بن عروة، عن أبيه، فذكره. ورواه البخاريّ في الحج (1666) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك، به، مثله.
ورواه مسلم في الحجّ (1286: 283، 284) من طرق، عن هشام بن عروة، به، بلفظ:"كيف كان يسير رسول الله صلى الله عليه وسلم حين أفاض من عرفة؟" فذكره.
قوله:"العنَق" بفتح المهملة والنون هو السير الذي بين الإبطاء والإسراع.
وقوله:"نصَّ" أي أسرع، وأصل النّص غاية المشي، ومنه نصصت الشيء رفعته، ثم استعمل في ضرب سريع من السير. انظر الفتح (3/ 518).
উরওয়াহ ইবনুয যুবাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি উসামা ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে বসা ছিলাম। তখন তাঁকে জিজ্ঞেস করা হলো: বিদায় হজ্জের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন রওয়ানা হচ্ছিলেন, তখন তিনি কীভাবে চলছিলেন? তিনি বললেন: তিনি আল-আনাক (স্বচ্ছন্দ, অর্থাৎ ধীর ও দ্রুতের মাঝামাঝি) গতিতে চলতেন। অতঃপর যখন তিনি খালি জায়গা পেতেন, তখন দ্রুতবেগে চলতেন (নাস্ করতেন)।
4999 - عن ابن عباس، أنه دفع مع النبيّ صلى الله عليه وسلم يوم عرفة فسمع النبيُّ صلى الله عليه وسلم وراءه زَجْرًا شديدًا، وضرْبًا وصوْتًا للإبل، فأشار بسوطه إليهم وقال:"أيُّها الناسُ، عليكم بالسّكينة، فإنّ البرَّ ليس بالإيضاع".
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1671) عن سعيد بن أبي مريم، حدّثنا إبراهيم بن سويد، حدثني عمرو بن أبي عمرو مولى المطّلب، أخبرني سعيد بن جبير مولى والبة الكوفي، حدثني ابن عباس، فذكره.
قوله:"فإنّ البرّ ليس بالإيضاع" أي ليس بالسّير السريع، فبيّن صلى الله عليه وسلم أن تكلّف الإسراع في السير ليس من البر أي مما يتقرّب به. انظر: الفتح (3/ 522).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি আরাফার দিনে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে (আরাফাত থেকে) অগ্রসর হচ্ছিলেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পিছনে কঠোর ধমক, প্রহার এবং উটগুলোর উচ্চ শব্দ শুনতে পেলেন। তিনি চাবুক দিয়ে তাদের দিকে ইশারা করলেন এবং বললেন, "হে লোক সকল! তোমরা ধীর-স্থিরতা অবলম্বন করো, কেননা দ্রুত গতিতে চলার মধ্যে কোনো পুণ্য নেই।"
5000 - عن جابر بن عبد الله قال: ودفع رسول الله صلى الله عليه وسلم وقد شنق للقصواء الزّمام، حتى إنَّ رأسَها ليصيبُ موركَ رحله ويقول بيده اليمني:"أيها الناس، السّكينةَ السّكينة" الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدنيّ، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر بطوله في صفة حجة النبي صلى الله عليه وسلم.
জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রওনা হলেন, এমতাবস্থায় তিনি তাঁর (উটনী) কাসওয়া'র লাগাম শক্তভাবে ধরে রেখেছিলেন, এমনকি তার মাথা তাঁর হাওদার পশ্চাদ্ভাগের সাথে আঘাত করছিল। আর তিনি তাঁর ডান হাত দিয়ে বলছিলেন: "হে লোকসকল, শান্তভাবে, শান্তভাবে (চলো)।" (এ হলো দীর্ঘ হাদীসের অংশ)।