আল-জামি` আল-কামিল
5001 - عن الفضل بن عباس -وكان رديفَ رسول الله صلى الله عليه وسلم- أنه قال في عشية عرفة وغداة جمع للناس حين دفعوا:"عليكم بالسّكينة" وهو كافٌّ ناقته.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1283) من طريق أبي الزبير عن أبي معبد مولى ابن عباس، عن ابن عباس، عن الفضل بن عباس، به.
ফযল ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত—যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে সওয়ার (আরোহী) ছিলেন—তিনি আরাফার সন্ধ্যায় এবং জামা'র (মুযদালিফার) সকালে, যখন লোকেরা রওয়ানা হচ্ছিল, তাদের উদ্দেশ্যে বললেন: "তোমরা অবশ্যই শান্ত ও ধীরস্থির থাকবে।" এই সময় তিনি তাঁর উটনীকে টেনে ধরে রাখছিলেন।
5002 - عن ابن عباس، أنّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أفاض من عرفة، وأسامة ردفُه. قال أسامة: فما زال يسيرُ على هيئته حتى أتى جمعًا.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1286: 282) من طريق يزيد بن هارون، أخبرنا عبد الملك بن أبي سليمان، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.
قوله:"على هيئته" أي على عادته في السكون والرفق.
وفي هذه الأحاديث بيان لكيفية سيره صلى الله عليه وسلم عند الدّفع من عرفة إلى مزدلفة وأنه في رفق وسكينة لا سيما في حال الزّحام، لكن إذا وجد فرجة واتساعًا في الطريق أسرع.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফাহ থেকে (মুযদালিফার দিকে) যাত্রা শুরু করলেন, আর উসামা তাঁর পিছনে আরোহণকারী ছিলেন। উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: তিনি তাঁর স্বাভাবিক ধীরস্থির গতিতে চলতে থাকলেন, অবশেষে মুযদালিফায় পৌঁছলেন।
5003 - عن أسامة أنّ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم أفاض من عرفة، ورديفه أسامة. فجعل يكبح راحلته حتى إن ذفراها لتكاد أن تمس -وربما قال حماد: أن تصيب- قادمة الرحل. وهو يقول:"يا أيها الناس عليكم بالسكينة والوقار، فإن البر ليس في إيضاع الإبل".
صحيح: رواه النسائي (3018) وأحمد (21756) والبيهقي (5/ 119) كلهم من طرق عن حماد بن
سلمة، عن قيس بن سعد، عن عطاء، عن ابن عباس، عن أسامة بن زيد، قال: فذكره. وإسناده صحيح.
উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফাত থেকে প্রত্যাবর্তন করছিলেন, আর উসামা ছিলেন তাঁর পেছনে আরোহী। অতঃপর তিনি তাঁর বাহনটিকে নিয়ন্ত্রণ করছিলেন এমনভাবে যে, বাহনটির গলা বা ঘাড়ের নরম অংশ সামনের হাওদার কাঠকে প্রায় ছুঁয়ে দিচ্ছিল—আর (বর্ণনাকারী) হাম্মাদ কখনও বলেছেন: প্রায় স্পর্শ করছিল। আর তিনি বলছিলেন: “হে মানবসকল! তোমাদের উচিত শান্ত ও ধীরস্থির থাকা। কারণ, দ্রুত উট চালানোতে কোনো পুণ্য নেই।”
5004 - عن علي بن أبي طالب، قال: ثم أردف أسامة، فجعل يعنق على ناقته، والناس يضربون الإبل يمينًا وشمالًا لا يلتفت إليهم ويقول:"السكينة أيها الناس"، ودفع حين غابت الشمس.
حسن: رواه أبو داود (1922)، والترمذيّ (885) كلاهما من حديث سفيان، عن عبد الرحمن ابن الحارث بن عياش بن أبي ربيعة، عن زيد بن علي، عن أبيه، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي بن أبي طالب، فذكره.
واللفظ لأبي داود. وأما الترمذي فذكره في سياق طويل.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد الرحمن بن الحارث إلا أنه حسن الحديث.
وقوله:"لا يلتفت إليهم" هكذا في سنن أبي داود عن الإمام أحمد وهو في مسنده (1348) عن يحيي بن آدم، حدثنا سفيان بإسناده.
ولكن رواه هو نفسه (562)، والترمذي من حديث أبي أحمد محمد بن عبد الله بن الزبير، عن سفيان، فقال فيه:"يلتفت إليهم ويقول: السّكينة …" وهذا هو الصحيح بدون"لا" النافية؛ لأن المعنى لا يستقيم بإثباتها، فالظاهر أن يحيي بن آدم أخطأ فيه، فذكر فيه"لا يلتفت".
والبيهقيّ (5/ 122) أيضًا ممن وهم في إثبات"لا" النافية في رواية محمد بن عبد الله الزبيري الأسدي، والصواب بدونها.
قال محبّ الدّين الطّبريّ في"القرى" (ص 414) قال بعضهم: رواية من روي"يلتفت إليهم" بإسقاط"لا" أصح، فإنه كان ينظر إليهم، وهم يضربون الإبل، يشير إليهم يمينًا وشمالًا:"السّكينة السّكينة".
আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: অতঃপর (নবী কারীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে সওয়ারীতে নিজের পিছনে বসালেন। তিনি নিজের উটনীর লাগাম ধরে দ্রুত চলছিলেন। লোকেরা ডানে-বামে তাদের উটগুলোকে মারছিল। তিনি তাদের দিকে ফিরে না তাকিয়ে বলছিলেন: "হে লোক সকল! শান্ত হও।" আর তিনি সূর্য ডুবে যাওয়ার পর (আরাফাহ থেকে) প্রস্থান করলেন।
5005 - عن عبد الله بن عمر: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم صلّي المغرب والعشاء بالمزدلفة جميعًا.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (196) عن ابن شهاب، عن سالم بن عبد الله، عن أبيه، فذكره.
ورواه مسلم في الحج (703: 286) من طريقه مالك، ورواه البخاري في الحج (1673) من وجه آخر عن سالم نحوه.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুযদালিফায় মাগরিব ও এশার সালাত একত্রে আদায় করেছিলেন।
5006 - عن أبي أيوب الأنصاريّ، أنّه صلّى مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع المغرب والعشاء بالمزدلفة جميعًا.
متفق عليه: رواه مالك في الحجّ (198) عن يحيى بن سعيد (هو الأنصاري)، عن عدي بن ثابت الأنصاريّ، أنّ عبد الله بن يزيد الخطمي أخبره، أنّ أبا أيوب الأنصاريّ أخبره، فذكره.
ورواه البخاريّ في المغازي (4414) عن القعنبيّ، عن مالك، به، مثله.
ورواه أيضًا في الحج (1674) هو ومسلم في الحجّ (1287) كلاهما من طريق سليمان بن بلال، حدثنا يحيى بن سعيد، به، نحوه.
আবু আইয়ুব আল-আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিদায় হজ্জের সময় মুযদালিফায় মাগরিব ও ইশার সালাত একত্রে আদায় করেছিলেন।
5007 - عن أسامة بن زيد، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لما أفاض من عرفة عدل إلى الشعب، فقضى حاجته. قال أسامة بن زيد: فجعلت أصب عليه ويتوضأ. فقلت: يا رسول الله، أتصلي؟ فقال:"المصلي أمامك".
متفق عليه: رواه البخاري في الوضوء (181) ومسلم في الحج (1280) كلاهما من حديث كريب مولى ابن عباس، عن أسامة بن زيد، فذكره، واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم أطول.
উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আরাফা থেকে (মুযদালিফার দিকে) রওনা হলেন, তখন তিনি একটি গিরিপথের দিকে গেলেন এবং প্রাকৃতিক প্রয়োজন সারলেন। উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমি তাঁর উপর পানি ঢালতে থাকলাম এবং তিনি ওযু করছিলেন। আমি বললাম, হে আল্লাহর রাসূল, আপনি কি সালাত পড়বেন? তিনি বললেন: "সালাতের স্থান তোমার সামনেই।"
5008 - عن جابر بن عبد الله قال: حتى أتى المزدلفة، فصلّى بها المغرب والعشاء بأذان واحد وإقامتين، ولم يسبِّح بينهما شيئًا، ثم اضطجع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم حتى طلع الفجر … الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر حديث حجة النبي صلى الله عليه وسلم بطوله.
وبهذا قال الشافعي في القديم، ورواية عن أحمد وهو اختيار الطحاوي قياسًا على الجمع بين الظهر والعصر بعرفة.
وأما قولُ الشّافعيّ الجديد فهو كما يدل عليه حديث أسامة بن زيد الآتي.
وحديث جابر هذا في صلاة النبيّ صلى الله عليه وسلم في المزدلفة هو العمدة، ومن خالفه فإما أن يكون شاذًا فلا يلتفت إليه، وإما أن يكون صحيحًا فيحتاج إلى تأويل لئلا يتضارب فعل النبيّ صلى الله عليه وسلم في حجّه الذي لم يتكرّر.
وأما ما ذكره الزيلعيّ في نصب الراية (3/ 68) بأنّ ابن أبي شيبة رواه في مصنفه بهذا الإسناد، وجاء فيه:"بأذان وإقامة واحدة"، وقال:"هذا حديث غريب فإنّ الذي في حديث جابر الطويل عند مسلم أنه صلاهما بأذان وإقامتين".
قلت: كذا قال، والذي في طبعتي الحوت (14050) واللّحام (4/ 347):"بأذان واحد وإقامتين" مثل رواية مسلم؛ فلعلّ هذا يعود إلى اختلاف نسخ المصنف، والله تعالى أعلم.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুজদালিফায় পৌঁছলেন। অতঃপর সেখানে তিনি মাগরিব ও ইশার সালাত এক আযান ও দুই ইক্বামতের সাথে আদায় করলেন। আর এর মাঝে তিনি কোনো নফল সালাত/তাসবীহ আদায় করেননি। এরপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ফজর উদিত হওয়া পর্যন্ত শুয়ে থাকলেন... হাদীসটি।
5009 - عن ابن عمر، قال: جمع النبيّ صلى الله عليه وسلم بين المغرب والعشاء بجمع كل واحدة منهما بإقامة، ولم يسبّح بينهما ولا على إثر كلّ واحدة منهما.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1673) من طريق ابن أبي ذئب، عن الزهري، به، نحوه وزاد:"كلُّ واحدة منهما بإقامة، ولم يسبِّح بينهما، ولا على إثر كلّ واحدة منهما".
ورواه مسلم (1288: 287) من طريق يونس، عن ابن شهاب، عن عبيد الله بن عبد الله بن عمر، عن أبيه أنه قال: جمع رسولُ صلى الله عليه وسلم بين المغرب والعشاء بجمع ليس بينهما سجدة، وصلّى المغرب ثلاث ركعات، وصلّى العشاء ركعتين، فكان عبد الله يصلي بجمع كذلك حتى لحق بالله تعالي.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুযদালিফায় (জম‘) মাগরিব ও ইশার সালাত একত্রে আদায় করেন। তিনি এই দু'টির প্রত্যেকটির জন্য আলাদা আলাদা ইকামত দেন এবং উভয়ের মাঝখানে কিংবা প্রত্যেকটির পরেও কোনো সুন্নাত সালাত আদায় করেননি। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মাগরিব তিন রাকাত এবং ইশা দু’রাকাত আদায় করেন। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আল্লাহর সাথে মিলিত হওয়ার আগ পর্যন্ত মুযদালিফায় ঠিক এভাবেই সালাত আদায় করতেন।
5010 - عن سعيد بن جبير، أنه صلّى المغرب بجمع والعشاء بإقامة، ثم حدّث عن ابن عمر أنه صلّى مثل ذلك، وحدّث ابن عمر أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم صنع مثل ذلك.
صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1288: 288) عن محمد بن المثنى، حدثنا عبد الرحمن بن مهدي، حدثنا شعبة، عن الحكم وسلمة بن كهيل، عن سعيد بن جبير، فذكره.
وقال: وحدثنيه زهير بن حرب، حدثنا وكيع، حدثنا شعبة بهذا الإسناد، وقال: صلاهما بإقامة واحدة.
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। সাঈদ ইবনে জুবাইর বর্ণনা করেন যে তিনি মুযদালিফায় (জম‘-এ) মাগরিব ও ইশার সালাত এক ইকামতের সাথে আদায় করলেন। এরপর তিনি ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণনা করলেন যে ইবনে উমরও অনুরূপ সালাত আদায় করেছিলেন। ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরও বর্ণনা করলেন যে নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) অনুরূপ করেছিলেন।
5011 - عن عبد الله بن مالك، أنّ ابن عمر صلّى بجمع، فجمع بين الصلاتين بإقامة. وقال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم فعل مثل هذا في هذا المكان. حسن: رواه الترمذي (887)، وأبو داود (1929) كلاهما من حديث سفيان الثوري، عن أبي إسحاق، عن عبد الله بن مالك، فذكره.
واللّفظ للترمذيّ. وأما أبو داود فلم يذكر قوله:"بإقامة" بل اكتفي فقط بذكر الجمع بين الصلاتين.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".
قلت: هو حسن فقط؛ لأن عبد الله بن مالك وهو الهمداني أو الأسدي الكوفي لم يوثقه غير ابن حبان، وروى عنه اثنان، فهو"مقبول" كما في"التقريب". وهو كذلك لأنه توبع كما سبق.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি মুযদালিফায় (বা জাম‘-এ) সালাত আদায় করলেন এবং এক ইক্বামতের মাধ্যমে দুই সালাতকে একত্রিত (জম‘) করলেন। তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এই স্থানে অনুরূপ করতে দেখেছি।
5012 - عن ابن عمر قال: إنه صلى مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بالمزدلفة المغرب والعشاء بإقامة إقامة جمع بينهما.
صحيح: رواه أبو داود (1927) عن الإمام أحمد -وهو في المسند (6473) - وفيه قال (أي عبد الله بن أحمد): قرأت على أبي: حدثنا حماد بن خالد، عن ابن أبي ذئب، عن الزهري، عن سالم، عن أبيه، فذكره.
وقال أبو داود: قال أحمد: قال وكيع:"صلّي كل صلاة بإقامة". إلا أنّ هذا لم يذكره أحمد.
ولكن رواية وكيع هذه أخرجها مسلم (1288: 288) وقال:"صلاهما بإقامة واحدة".
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে মুযদালিফায় মাগরিব ও এশার সালাত আদায় করেছিলেন। তিনি উভয় সালাতকে একত্রিত করেছিলেন এবং উভয়ের জন্য (আলাদা আলাদা) ইকামত দেওয়া হয়েছিল।
5013 - عن أشعث بن سليم عن أبيه قال: أقبلت مع ابن عمر من عرفات إلى المزدلفة فلم يكن يفتر من التكبير والتهليل حتى أتينا المزدلفة، فأذّن وأقام أو أمر إنسانًا فأذّن
وأقام فصلّى بنا المغرب ثلاث ركعات، ثم التفت إلينا فقال: الصّلاة فصلّي بنا العشاء ركعتين، ثم دعا بعشائه.
صحيح: رواه أبو داود (1933) عن مسدد، حدثنا أبو الأحوص، حدثنا أشعث بن سليم، فذكره.
قال (أي أشعث): وأخبرني علاج بن عمرو بمثل حديث أبي، عن ابن عمر، قال: فقيل لابن عمر في ذلك، فقال: صليت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم.
وإسناده صحيح، ورجاله ثقات غير علاج بن عمرو وهو لا يعرف، وذكره ابن حبان في"الثقات"، وروى عنه اثنان فهو"مقبول" حب اصطلاح ابن حجر، وهو كذلك لأنه توبع.
وهذه الروايات عن ابن عمر كلها صحيحة، فإما أن نؤوِّل، وإما أن نحكم على بعضها بالشّذوذ.
وذهب الحافظ ابن القيم رحمه الله تعالى إلى الحكم بالاضطراب في أحاديث ابن عمر، فقال:"والصحيح في ذلك كله الأخذ بحديث جابر وهو الجمع بينهما بأذان وإقامتين لوجهين اثنين:
أحدهما: أنّ الأحاديث سواه مضطربة مختلفة، فهذا حديث ابن عمر في غاية الاضطراب -كما تقدم-، فروي عن ابن عمر من فعله: الجمع بينهما بلا أذان ولا إقامة، وروي عنه الجمع بينهما بإقامة واحدة، وروي عنه الجمع بينهما بأذان واحد وإقامة واحدة، وروي عنه مسندًا إلى النبي صلى الله عليه وسلم: الجمع بينهما بإقامة واحدة، وروي عنه مرفوعًا الجمع بينهما بإقامتين، وعنه أيضًا مرفوعًا: الجمع بينهما بأذان واحد وإقامة واحدة لهما، وعنه مرفوعًا الجمع بينهما دون ذكر أذان ولا إقامة، وهذه الروايات صحيحة عنه، فيسقط الأخذ بها؛ لاختلافها واضطرابها.
والوجه الثاني: أنه قد صحّ من حديث جابر في جمعه صلى الله عليه وسلم بعرفة، أنه جمع بينهما بأذان وإقامتين، ولم يأت في حديث ثابت قطّ خلافه، والجمع بين الصلاتين بمزدلفة كالجمع بينهما بعرفة، لا يفترقان إلّا في التقديم والتأخير.
وقال: ومذهب أحمد والشافعي في الأصح عنه وأبي ثور، وعبد المالك الماجشون، والطحاوي أنه يصليهما بأذان وإقامتين، وحجتهم حديث جابر الطويل.
وقال: وقال مالك: يصليهما بأذانين وإقامتين، وهو مذهب ابن مسعود. وقال ابن المنذر: وروي هذا عن عمر رضي الله عنه.
قال ابن عبد البر:"ولا أعلم ذلك مرفوعًا إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم بوجه من الوجوه، ولكنه روي عن عمر ابن الخطاب أنه صلاهما بالمزدلفة كذلك" انتهى كلام ابن القيم. وفيه تقديم وتأخير. انظر:"تهذيب السنن" (2/ 400).
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আশ‘আত ইবনু সুলাইম তাঁর পিতা থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেন: আমি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে আরাফাত হতে মুযদালিফার দিকে যাচ্ছিলাম। আমরা মুযদালিফায় পৌঁছা পর্যন্ত তিনি অবিরাম তাকবীর ও তাহলীল পাঠ করছিলেন। এরপর তিনি আযান দিলেন এবং ইকামত দিলেন অথবা অন্য কাউকে আযান ও ইকামত দিতে আদেশ করলেন। অতঃপর তিনি আমাদের নিয়ে মাগরিবের সালাত তিন রাকাআত আদায় করলেন। এরপর তিনি আমাদের দিকে ঘুরে বললেন: (এখন) সালাত। অতঃপর তিনি আমাদের নিয়ে ইশার সালাত দুই রাকাআত আদায় করলেন। এরপর তিনি তার রাতের খাবার চাইলেন।
সহীহ: এটি আবূ দাউদ (১৯৩৩) মুসাদ্দাদ হতে, তিনি আবূল আহওয়াস হতে, তিনি আশ‘আত ইবনু সুলাইম হতে বর্ণনা করেছেন। এরপর তিনি তা উল্লেখ করলেন।
আশ‘আত বলেন: আমাকে ‘ইলাজ ইবনু আমর তাঁর পিতা হতে ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে আমার পিতার অনুরূপ হাদীস বলেছেন। তিনি বলেন: এ ব্যাপারে ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বললেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সালাত আদায় করেছি।
এর সনদ সহীহ। এর বর্ণনাকারীগণ নির্ভরযোগ্য, কেবল ‘ইলাজ ইবনু ‘আমর ছাড়া, যিনি অপরিচিত। ইবনু হিব্বান তাঁকে ‘আস-সিকাত’ গ্রন্থে উল্লেখ করেছেন। তাঁর থেকে দু’জন বর্ণনাকারী বর্ণনা করেছেন। হাফিয ইবনু হাজার (রাহিমাহুল্লাহ)-এর পরিভাষা অনুসারে তিনি “মাকবূল” (গ্রহণযোগ্য)। তিনি তা-ই, কারণ তাঁর পক্ষে সমর্থনকারী বর্ণনা (তাবা‘আ) আছে। ইবনু ‘উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত এই বর্ণনাগুলো সবই সহীহ। কাজেই হয় আমাদের তা ‘তা’বীল’ (ব্যাখ্যা) করতে হবে, নতুবা সেগুলোর কিছু অংশকে ‘শায’ (বিচ্ছিন্ন) হিসাবে আখ্যায়িত করতে হবে।
হাফিয ইবনুল কাইয়্যিম (রাহিমাহুল্লাহ) ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসগুলোকে ‘ইযতিরাব’ (অস্থিরতা/পরস্পর বিরোধী) বলে রায় দিয়েছেন। তিনি বলেন: এই বিষয়ে সবচাইতে সহীহ মত হলো জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস গ্রহণ করা। আর তা হলো দু’টি কারণে এক আযান ও দুই ইকামতের মাধ্যমে সালাতদ্বয় একত্রে আদায় করা:
প্রথমত: জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস ছাড়া অন্যান্য হাদীসগুলো পরস্পর বিরোধী এবং অস্থিরতাপূর্ণ। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর এই হাদীসটি—যেমনটা উল্লেখ করা হয়েছে—অত্যন্ত অস্থিরতাপূর্ণ। তাঁর নিজের আমল (কার্যকলাপ) সূত্রে বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি আযান ও ইকামত ছাড়াই সালাতদ্বয় একত্রে আদায় করেছেন। আবার বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি এক ইকামতের মাধ্যমে তা একত্রে আদায় করেছেন। আবার বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি এক আযান ও এক ইকামতের মাধ্যমে একত্রে আদায় করেছেন। আবার রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত সনদ সহকারে তাঁর থেকে বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি এক ইকামতের মাধ্যমে তা একত্রে আদায় করেছেন। আবার মারফূ’ (রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত উন্নীত) সূত্রে তাঁর থেকে বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি দুই ইকামতের মাধ্যমে তা একত্রে আদায় করেছেন। আবার তাঁর থেকে মারফূ’ সূত্রে বর্ণিত হয়েছে যে, উভয় সালাতের জন্য তিনি এক আযান ও এক ইকামতের মাধ্যমে তা একত্রে আদায় করেছেন। আবার মারফূ’ সূত্রে তাঁর থেকে বর্ণিত হয়েছে যে, আযান বা ইকামতের উল্লেখ ছাড়াই একত্রে আদায় করেছেন। ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হতে বর্ণিত এসব বর্ণনা সহীহ হলেও সেগুলোর ভিন্নতা ও অস্থিরতার কারণে সেগুলোর ওপর আমল রহিত হয়ে যায়।
দ্বিতীয় কারণ: জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস দ্বারা প্রমাণিত যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফায় যখন সালাতদ্বয় একত্রে আদায় করেছিলেন, তখন তিনি এক আযান ও দুই ইকামতের মাধ্যমে তা একত্রে আদায় করেছিলেন। এর বিপরীত কোনো সুদৃঢ় হাদীস কখনোই আসেনি। মুযদালিফায় সালাতদ্বয় একত্রে আদায় করা আরাফায় একত্রে আদায়ের মতোই, শুধু অগ্র-পশ্চাৎ করার ক্ষেত্রেই পার্থক্য রয়েছে।
তিনি (ইবনুল কাইয়্যিম) বলেন: ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) ও ইমাম শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর নিকট অধিক সহীহ মতে এবং আবূ সাওর, আব্দুল মালিক আল-মাজিশূন ও তাহাবী (রাহিমাহুল্লাহ)-এর মতে, তিনি এক আযান ও দুই ইকামতের মাধ্যমে সালাতদ্বয় আদায় করবেন। তাদের প্রমাণ হলো জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর দীর্ঘ হাদীসটি। তিনি আরও বলেন: ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: তিনি দুই আযান ও দুই ইকামতের মাধ্যমে সালাতদ্বয় আদায় করবেন। এটাই ইবনু মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মত। ইবনুল মুনযির (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: এ মতটি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত আছে।
ইবনু আব্দুল বার (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: “আমি কোনোভাবেই এটি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) পর্যন্ত মারফূ’ হিসেবে জানতে পারিনি। তবে উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুযদালিফায় সালাতদ্বয় এভাবেই আদায় করেছেন বলে বর্ণিত আছে।” ইবনুল কাইয়্যিমের কথা এখানেই শেষ হলো। এতে কিছুটা আগে-পিছে করা হয়েছে। দেখুন: ‘তাহযীবুস সুনান’ (২/ ৪০০)।
5014 - عن أسامة بن زيد أنه قال: دفع رسول الله صلى الله عليه وسلم من عرفة حتى إذا كان بالشِّعْب
نزل فبال فتوضأ فلم يسبغ الوضوء، فقلت له: الصّلاةَ يا رسول الله؟ فقال:"الصَّلاةُ أمَامَك". فركب فلما جاء المزدلفة نزل فتوضّأ فأسبغ الوضوء، ثم أقيمت الصّلاة فصلي المغرب، ثم أناخ كلُّ إنسان بعيره في منزله، ثم أقيمت العشاء فصلاها ولم يصل بينهما شيئا.
متفق عليه: رواه مالك في الحجّ (197) عن موسى بن عقبة، عن كريب مولى ابن عباس، عن أسامة بن زيد، به، فذكره.
ورواه البخاريّ في الحج (1672)، ومسلم في الحج (1280: 276) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
ولم يذكر في هذا الحديث الأذان، ولعلّ ذلك يعود إلى العلم العام الذي لا يحتاج إلى البيان، فإنّ الإقامة بسبقها الأذان؛ ولذلك لم يذكره أسامة. وهذا التأويل لا بد منه حتى لا يتعارض فعل النبيّ صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع لأنه لم يتكرر، وحديث جابر صريح بأذان وإقامتين، وهذا هو الصحيح من فعل النبيّ صلى الله عليه وسلم في هذه الليلة المباركة، وما خالفه فهو إما شاذ أو صحيح مؤوّل.
وبهذا قال الشافعيّ في الجديد، ورواية عن الإمام أحمد، وبه قال الثوريّ، والمشهور عن الإمام أحمد: كلّ إنسان يتخيّر ما يراه مناسبًا.
উসামা ইবনে যায়দ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফা থেকে রওনা হলেন। যখন তিনি শিয়াব (উপত্যকা)-এর কাছে পৌঁছলেন, তিনি নামলেন, পেশাব করলেন এবং ওযু করলেন, কিন্তু তিনি পূর্ণাঙ্গভাবে ওযু করলেন না। আমি তাকে বললাম: ইয়া রাসূলাল্লাহ! সালাত (নামায)? তিনি বললেন: "সালাত তোমার সামনে (মুযদালিফায়)।" তিনি সওয়ার হলেন। যখন তিনি মুযদালিফায় আসলেন, তিনি নেমে ওযু করলেন এবং পূর্ণাঙ্গভাবে ওযু করলেন। এরপর সালাতের ইকামত দেওয়া হলো এবং তিনি মাগরিবের সালাত আদায় করলেন। এরপর প্রত্যেক ব্যক্তি তার উটকে তার অবস্থানে বসাল। এরপর ইশার সালাতের ইকামত দেওয়া হলো এবং তিনি সেটি আদায় করলেন। আর তিনি এই দুই সালাতের মাঝে অন্য কিছু (নফল) সালাত আদায় করলেন না।
5015 - عن أبي إسحق قال: سمعت عبد الرحمن بن يزيد يقول: حجّ عبد الله رضي الله عنه، فأتينا المزدلفة حين الأذان بالعتمة أو قريبا من ذلك فأمر رجلا فأذّن وأقام، ثم صلي المغرب وصلّي بعدها ركعتين، ثم دعا بعشائه فتعشى ثم أمر -أُرَي- فأذّن وأقام.
قال عمرو: لا أعلم الشّك إلا من زهير - ثم صلّى العشاء ركعتين فلما طلع الفجر قال: إنّ النبي صلى الله عليه وسلم كان لا يصلي هذه الساعة إلا هذه الصلاة في هذا المكان من هذا اليوم.
قال عبد الله: هما صلاتان تحولان عن وقتها صلاة المغرب بعد ما يأتي الناس المزدلفة، والفجر حين يبزغ الفجر. قال: رأيت النبي صلى الله عليه وسلم يفعله.
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1675) عن عمرو بن خالد، حدثنا زهير، حدثنا أبو إسحاق، قال (فذكره).
هكذا بوّبه أيضًا البخاريّ وكأنّه يرى كلَّ صلاة بأذان وإقامة؛ ولعلّ العلة في ذلك أن ابن مسعود جعل فاصلًا بين الصلاتين، فإنه صلّى المغرب، ثم دعا بعشائه فتعشّى، ومعنى هذا أن أصحابه
تفرقوا للعشاء وقضاء الحاجات وغيرها، ففي هذه الحال لا بد من أذان جديد ليجتمع الناس، ثم يقيم ويصلي.
ففي هذه الصورة أداء الصلاتين بأذانين وإقامتين أولي من أدائهما بأذان وإقامتين.
وروي مثل هذا من فعل عمر بن الخطاب كما أخرجه الطحاوي بإسناد صحيح، وبهذا قال مالك رحمه الله.
وروى ابن عبد البر عن أحمد بن خالد أنه كان يتعجّب من مالك حيث أخذ بحديث ابن مسعود، وهو من رواية الكوفيين مع كونه موقوفًا، ويترك ما روي عن أهل المدينة وهو مرفوع.
قال ابن عبد البر:"وأعجب أنا من الكوفيين حيث أخذوا بما رواه أهل المدينة، وهو أن يجمع بينهما بأذان وإقامة واحدة، وتركوا ما رووا في ذلك عن ابن مسعود مع أنهم لا يعدلون به أحدًا" انظر الفتح (3/ 525).
وأمّا التنقّل بعد المغرب أو بعد العشاء فلم يرد في ذلك شيء مرفوع، بل ثبت في الصّحيح أنه لم يسبِّح بينهما، وإنّما ثبت ذلك من فعل بعض الصّحابة.
وأما صلاة الوتر فلم يرد أيضًا عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه أوتر في هذه الليلة لا في حديث جابر ولا في حديث غيره الذين وصفوا حجة النبي صلى الله عليه وسلم.
ولكن لو صلى أحدٌ الوتر في هذه الليلة على أصل ثابت عن النبي صلى الله عليه وسلم بأنه ما كان يترك الوتر في سفر أو حضر لجاز، وبه يقول سماحة الشيخ ابن باز. راجع فتاويه (17/ 282 - 283).
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবু ইসহাক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: আমি আব্দুর রহমান ইবনে ইয়াযিদকে বলতে শুনেছি: আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হজ্জ করেছিলেন। আমরা যখন মুযদালিফায় পৌঁছলাম, তখন ইশার আযানের সময় বা তার কাছাকাছি সময় ছিল। তিনি (আব্দুল্লাহ) একজন লোককে নির্দেশ দিলেন, ফলে সে আযান দিল ও ইকামত দিল। অতঃপর তিনি মাগরিবের সালাত আদায় করলেন এবং এর পরে দুই রাকাত (সুন্নত) সালাত আদায় করলেন। এরপর তিনি তার রাতের খাবার চাইলেন এবং আহার করলেন। অতঃপর তিনি (আব্দুল্লাহ) (রাবী বলেন: আমার ধারণা হয়) নির্দেশ দিলেন, ফলে সে আযান দিল ও ইকামত দিল।
(আমর বলেন: আমি যুহাইর ব্যতীত অন্য কারো থেকে সন্দেহের কথা জানি না।) তারপর তিনি ইশার সালাত দুই রাকাত আদায় করলেন। যখন ফজর উদিত হলো, তিনি বললেন: এই দিন এই স্থানে এই সময় নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এই সালাত ব্যতীত অন্য কোনো সালাত আদায় করতেন না।
আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: দুটি সালাতকে তাদের সময় থেকে স্থানান্তরিত করা হয়: একটি হলো মাগরিবের সালাত, যা লোকেরা মুযদালিফায় আসার পর (পড়া হয়), এবং অন্যটি হলো ফজরের সালাত, যখন ফজর উদিত হয়। তিনি (আব্দুল্লাহ) বললেন: আমি নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে তা করতে দেখেছি।
সহীহ: এটি বুখারী (১৬৭৫) বর্ণনা করেছেন আমর ইবনে খালিদ সূত্রে, তিনি যুহাইর থেকে, তিনি আবু ইসহাক থেকে বর্ণনা করেছেন।
বুখারীও এভাবে অধ্যায় তৈরি করেছেন এবং সম্ভবত তিনি মনে করেন যে প্রত্যেক সালাতের জন্য আযান ও ইকামত প্রয়োজন। সম্ভবত এর কারণ হলো ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সালাতদ্বয়ের মাঝে বিরতি দিয়েছিলেন। কেননা তিনি মাগরিবের সালাত আদায় করার পর রাতের খাবার চাইলেন এবং খেলেন। এর অর্থ হলো—তার সাথীরা রাতের খাবার এবং অন্যান্য প্রয়োজন সারার জন্য আলাদা হয়েছিলেন। এমতাবস্থায়, মানুষকে একত্রিত করার জন্য অবশ্যই নতুন আযান দিতে হবে, এরপর ইকামত দিয়ে সালাত আদায় করতে হবে। এই পরিস্থিতিতে, এক আযান ও দুই ইকামতের চেয়ে দুই আযান ও দুই ইকামতসহ সালাতদ্বয় আদায় করা উত্তম।
উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর কর্মেও অনুরূপ বর্ণিত আছে, যা ত্বাহাবী সহীহ সানাদ সহকারে বর্ণনা করেছেন। ইমাম মালেক (রাহিমাহুল্লাহ) এই মত পোষণ করতেন। ইবনু আবদুল বার্র আহমদ ইবনু খালিদ থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি মালেকের (রাহিমাহুল্লাহ) উপর বিস্ময় প্রকাশ করতেন যে, তিনি কূফাবাসীর বর্ণনা—যা মাওকূফ (সাহাবীর নিজস্ব উক্তি)—সেটি গ্রহণ করেছেন, অথচ মদীনার অধিবাসীদের থেকে বর্ণিত মারফূ‘ (নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম থেকে সরাসরি) বর্ণনা ত্যাগ করেছেন।
ইবনু আবদুল বার্র বলেন: "আমি কূফাবাসীদের উপর বিস্ময় প্রকাশ করি যে, তারা মদীনার অধিবাসীদের বর্ণিত মত গ্রহণ করেছে যে, এক আযান ও এক ইকামত দ্বারা দুই সালাতকে একত্র করা হয়; অথচ তারা ইবনু মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে তাদের বর্ণিত মত ত্যাগ করেছে, যদিও তারা তাকে কারো সমকক্ষ মনে করে না।" (দ্রষ্টব্য: ফাতহুল বারী ৩/৫২৫)।
মাগরিব বা ইশার পর নফল সালাতের ব্যাপারে সরাসরি মারফূ‘ কিছু বর্ণিত হয়নি। বরং সহীহ হাদীসে প্রমাণিত যে তিনি উভয়ের মাঝে কোনো নফল সালাত আদায় করেননি। অবশ্য কিছু সাহাবী থেকে এটি প্রমাণিত।
বিতর সালাতের ব্যাপারেও নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম থেকে বর্ণিত নয় যে, তিনি এই রাতে বিতর আদায় করেছেন, না জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর হাদীসে, না অন্য কারো হাদীসে, যারা নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের হজ্জের বর্ণনা দিয়েছেন। কিন্তু যদি কেউ এই রাতে বিতর সালাত আদায় করেন নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের এই মূলনীতির ভিত্তিতে যে, তিনি সফর বা আবাস—কোনো অবস্থাতেই বিতর ছাড়তেন না, তবে তা জায়েয হবে। শাইখ ইবনু বায (রাহিমাহুল্লাহ) এই মত দিয়েছেন। (দ্রষ্টব্য: তাঁর ফাতাওয়া ১৭/২৮২-২৮৩)।
5016 - عن ابن مسعود قال: ما رأيتُ النبيَّ صلى الله عليه وسلم صلّى صلاةً بغير ميقاتها إلّا صلاتين: جمع بين المغرب والعشاء، وصلّى الفجر قبل ميقاتها.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1682)، ومسلم في الحج (1289) كلاهما من طريق الأعمش، حدثني عمارة (هو ابن عمير التيميّ)، عن عبد الرحمن بن يزيد (النخعي)، عن عبد الله، فذكره، ولفظهما متقارب.
ورواه البخاريّ أيضًا مطوّلًا (1683) من طريق أبي إسحاق السبيعيّ، عن عبد الرحمن بن يزيد النخعيّ، قال: خرجنا مع عبد الله رضي الله عنه إلى مكة ثم قدمنا جَمْعًا، فصلّي الصّلاتين كلَّ صلاةٍ وحدها بأذان وإقامة، والعشاء بينهما ثم صلّى الفجر حين طلع الفجر. قائل يقول: طلع الفجر، وقائل يقول: لم يطلع الفجر، ثم قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ هاتين الصّلاتين حُوِّلتا عن وقتهما في هذا المكان المغرب والعشاء". فلا يقدم الناس جمعًا حتى يعتموا وصلاة الفجر هذه الساعة".
ثم وقف حتى أسفر ثم قال: لو أن أمير المؤمنين أفاض الآن أصاب السنة. فما أدري أقوله كان
أسرع أم دفع عثمان رضي الله عنه فلم يزل يلبي حتى رمي جمرة العقبة يوم النحر.
قوله في الحديث:"وصلّى الفجر قبل ميقاتها" ليس معناه أنه أوقع الفجر قبل طلوعه، وإنما أراد أنها وقعت قبل الوقت المعتاد فعلها فيه في الحضر. انظر: فتح الباري (3/ 525).
ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর নির্ধারিত সময়ের বাইরে কোনো সালাত আদায় করতে দেখিনি, কেবল দুটি সালাত ব্যতীত: (১) তিনি মাগরিব ও ইশা একসঙ্গে আদায় করেছিলেন, এবং (২) তিনি ফজর সালাত তার (অভ্যাসগত) সময়ের আগে আদায় করেছিলেন।
5017 - عن جابر بن عبد الله قال: ثم ركب (يعني النبيّ صلى الله عليه وسلم" القصواء حتى أتي المشعر الحرام، فاستقبل القبلة، فدعاه وكبّره وهلّله، ووحّده، فلم يزل واقفًا حتى أسفر جدًا … الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكره في الحديث الطويل.
ثم رواه من طريق حفص بن غياث، عن جعفر بن محمد، به، قال في حديثه ذلك، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"نحرتُ ها هنا، ومنى كلُّها منحر فانحروا في رحالكم، ووقفتُ ها هنا وعرفة كلّه موقف، ووقفت ههنا وجمع كلّها موقف".
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, অতঃপর তিনি (অর্থাৎ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কাসওয়া নামক উটের পিঠে আরোহণ করলেন এবং মাস‘আরুল হারামে এলেন। তিনি ক্বিবলামুখী হলেন, সেখানে দু‘আ করলেন, তাকবীর বললেন, তাহলীল করলেন এবং আল্লাহর একত্ব ঘোষণা করলেন। তিনি খুব ফর্সা হওয়া পর্যন্ত সেখানে দাঁড়িয়ে থাকলেন।
এবং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেন: "আমি এখানে কুরবানী করেছি, তবে মিনা-র সমস্ত স্থানই কুরবানীর স্থান, তাই তোমরা তোমাদের অবস্থানস্থলেই কুরবানী করো। আর আমি এখানে অবস্থান করেছি, তবে আরাফার সমস্ত স্থানই অবস্থানের স্থান। আর আমি এখানে অবস্থান করেছি, তবে জাম‘ (মুযদালিফা)-র সমস্ত স্থানই অবস্থানের স্থান।"
5018 - عن عمرو بن ميمون يقول: شهدت عمر رضي الله عنه صلَّى بجمع الصُّبح، ثم وقف فقال: إنّ المشركين كانوا لا يفيضون حتى تطلع الشّمس ويقولون: أَشْرِقْ ثَبِير، وأنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم خالفهم ثم أفاض قبل أن تطلع الشمس.
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1684) عن حجاج بن منهال، حدّثنا شعبة، عن أبي إسحاق، سمعت عمرو بن ميمون يقول (فذكره).
وفي غير الصّحيح بإسناد صحيح:"أشرق ثبير كيما نغير" رواه ابن ماجه (3022) وأحمد وغيرهما.
وقوله:"أشرق ثبير" أي ادخل أيها الجبل في الشروق كما يقال: أجْنب -أي ادخل في الجنوب، وأشمل- أي ادخل في الشمال.
ومنه قوله تعالى: {فَأَتْبَعُوهُمْ مُشْرِقِينَ} [الشعراء: 60] أي لحقوهم في وقت دخولهم في شروق الشمس وهو طلوعها.
و"ثبير" بفتح الثاء وكسر الباء، جبل المزدلفة على يسار الذاهب إلى منى. وقيل: هو أعظم
جبال مكة.
وقوله:"كيما نغير" أي كي نغير، وما زائدة. ونُغير أي ندفع للنحر. انظر"القرى" للطبريّ (ص 427 - 428).
উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আমর ইবনু মায়মূন বলেন: আমি উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে মুযদালিফায় ফজরের সালাত আদায় করতে দেখেছি। এরপর তিনি দাঁড়ালেন এবং বললেন: নিশ্চয়ই মুশরিকরা সূর্য উদিত না হওয়া পর্যন্ত (মুযদালিফা থেকে) রওনা হত না এবং তারা বলত, ‘আশরিক ছাবীর’ (হে ছাবীর, তুমি আলোকিত হও)। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের বিরোধিতা করে সূর্য উদয়ের পূর্বেই রওনা হয়ে গেলেন।
5019 - عن جابر قال: فلم يزلْ (يعني النبيّ صلى الله عليه وسلم" واقفًا حتى أسفر جدًا؛ فدفع قبل أن تطلع الشمس، وأردف الفضل بن عبّاس … الحديث.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر الحديث بطوله.
من السنة أن يدفع الحاج من المزدلفة قبل طلوع الشمس. قال طاوس: كان أهل الجاهلية يدفعون من عرفة قبل أن تغيب الشمس، ومن المزدلفة بعد أن تطلع الشمس، فأخّر الله هذه، وقدّم هذه.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (অর্থাৎ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ততক্ষণ দাঁড়িয়ে থাকলেন যতক্ষণ না খুব আলো ফুটে গেল। অতঃপর সূর্যোদয়ের পূর্বেই তিনি (মুযদালিফা থেকে) রওয়ানা হলেন এবং ফাদল ইবনু আব্বাসকে সওয়ারীর পেছনে বসিয়ে নিলেন...।
5020 - عن ابن عباس، أن رسول الله صلى الله عليه وسلم وقف بجمع، فلما أضاء كل شيء قبل أن تطلع الشمس أفاض.
حسن: رواه أحمد (3020) عن أبي داود، عن زمعة، عن سلمة بن وهرام، عن عكرمة، عن ابن عباس فذكره.
وزمعة هو: ابن صالح الجندي أبو وهب ضعيف.
لكن للحديث طريق آخر يقوْيه وهو ما رواه الترمذي (895) وأحمد (2051) كلاهما من حديث أبي خالد الأحمر، قال: سمعت الأعمش، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس أن النبي صلى الله عليه وسلم أفاض من مزدلفة قبل طلوع الشمس.
والحكم هو: ابن عتيبة لم يسمع عن مقسم إلا خمسة أحاديث، وهذا ليس منها، والباقي من الكتاب.
وبالإسنادين يرتقي الحديث إلى درجة الحسن.
قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুযদালিফায় (জমা-তে) অবস্থান করলেন। অতঃপর যখন সব কিছু আলোকময় হয়ে উঠলো—সূর্যোদয়ের আগেই তিনি সেখান থেকে রওনা করলেন।