আল-জামি` আল-কামিল
5021 - عن الفضل بن عباس -وكان رديف رسول الله صلى الله عليه وسلم- أنه قال في عشيّة عرفة وغداة جَمْعٍ للناس حين دفعوا:"عليكم بالسّكينة" وهو كافٌّ ناقته.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1282) من طريق أبي الزبير، عن أبي معبد مولي ابن عباس، عن ابن عباس، عن الفضل بن عباس، به.
ফাদল ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পেছনে সওয়ারী ছিলেন, যে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরাফাতের সন্ধ্যায় এবং জাম্' (মুযদালিফা)-এর সকালে, যখন লোকেরা রওয়ানা হচ্ছিল, তখন বললেন: "তোমরা ধীরস্থিরতা বজায় রাখো।" এ সময় তিনি তাঁর উটনীকে টেনে ধরে রাখছিলেন।
5022 - عن ابن عباس، قال: إنما كان بدء الإيضاع من قبل أهل البادية، كانوا يقفون حافتي الناس حتى يعلقوا العِصيَّ والجِعَابَ والقِعَابَ، فإذا نفروا، تقعقعت تلك،
فنفروا بالناس، وقال: ولقد رئي رسول الله صلى الله عليه وسلم وإن ذِفْرَى ناقته ليمس حاركها، وهو يقول بيده:"يا أيها الناس، عليكم بالسّكينة، يا أيها الناس، عليكم بالسّكينة".
حسن: رواه أحمد (2193) وابن خزيمة (2863) والحاكم (1/ 465) وعنه البيقهي (5/ 126) كلهم من حديث حماد بن زيد، عن كثير بن شنظير، عن عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس، فذكره. واللفظ لأحمد.
قال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري".
قلت: إسناده حسن من أجل كثير بن شنظير المازني أبو قرة البصري، مختلف فيه، فضعَّفه ابن معين وأبو زرعة والنسائي وأبو أحمد الحاكم.
وابن شنظير من رجال الشيخين، وقال ابن عدي:"أرجو أن تكون أحاديثه مستقيمة"، ويكون هذا منها إن شاء الله تعالي.
وقوله:"الإيضاع": هو حمل البعير ونحوه على الإسراع.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, দ্রুত গমনের (ইওদা‘-র) সূচনা হয়েছিল মরুচারী বেদুঈনদের পক্ষ থেকে। তারা রাস্তার দুই পাশে দাঁড়িয়ে যেত এবং লাঠি, তীর রাখার থলে ও পানীয় পাত্র ঝুলিয়ে রাখত। অতঃপর যখন তারা চলতে শুরু করত, তখন সেগুলোর শব্দ হতো, আর তারা লোকেদেরকেও দ্রুত চলার জন্য তাড়া দিত। তিনি আরও বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এমন অবস্থায় দেখা গেছে যে, তাঁর উটনীর ঘাড়ের গোড়ার অংশ তার কাঁধের সামনের অংশকে স্পর্শ করছিল (অর্থাৎ তিনি অত্যন্ত দ্রুত চলছিলেন), আর তিনি তাঁর হাত দ্বারা ইশারা করে বলছিলেন: "হে মানবমণ্ডলী, তোমরা শান্ত ও ধীরস্থিরতা অবলম্বন করো। হে মানবমণ্ডলী, তোমরা শান্ত ও ধীরস্থিরতা অবলম্বন করো।"
5023 - عن جابر بن عبد الله، قال: حتى أتى بطن محسِّر، فحرَّك قليلًا، ثم سلك الطريق الوسطى.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، فذكر بطوله في صفة حجة النبيّ صلى الله عليه وسلم.
قوله:"بطن مُحَسِّر" بضم الميم وفتح الحاء وكسر السين المشددة المهملتين، سُمي بذلك لأن فيل أصحاب الفيل حسر فيه أي أعيا وكلَّ. شرح النووي (8/ 189) ومنه قوله تعالى: {ثُمَّ ارْجِعِ الْبَصَرَ كَرَّتَيْنِ يَنْقَلِبْ إِلَيْكَ الْبَصَرُ خَاسِئًا وَهُوَ حَسِيرٌ} [الملك: 4].
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: অবশেষে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বাতনে মুহাসসির-এ পৌঁছলেন, তখন কিছুটা দ্রুত চললেন, এরপর মধ্যবর্তী রাস্তা ধরলেন।
5024 - عن علي بن أبي طالب، قال: لما أفاض النبيّ صلى الله عليه وسلم من جمْعٍ، وانتهى إلى وادي محسِّر قرع ناقته، فخبَّتْ حتى جاوز الوادي.
حسن: رواه الترمذي (885) في حديث طويل من حديث سفيان، عن عبد الرحمن بن الحارث ابن عياش بن أبي ربيعة، عن زيد بن علي، عن أبيه، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي بن أبي طالب، فذكره.
قال الترمذي:"حديث علي حديث حسن صحيح، لا نعرفه من حديث علي إلّا من هذا الوجه من حديث عبد الرحمن بن الحارث بن عياش. وقد رواه غير واحد عن الثوريّ مثل هذا".
قلت: إسناده حسن من أجل الكلام في عبد الرحمن بن الحارث بن عبد الله بن عياش المخزوميّ غير أنه حسن الحديث.
আলী ইবনে আবি তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জাম‘ (মুযদালিফা) থেকে রওয়ানা হলেন এবং ওয়াদী মুহাসসিরে পৌঁছলেন, তখন তিনি তাঁর উটনীকে আঘাত করলেন। ফলে সেটি দ্রুত চলতে শুরু করল যতক্ষণ না সে উপত্যকাটি অতিক্রম করে গেল।
5025 - عن أسامة بن زيد رضي الله عنهما أنه قال: رَدِفْتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم من عرفات، فلما بلغ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الشِّعْبَ الأيسر الذي دون المزدلفة أناخ فبال ثم جاء فصببت عليه الوضوء فتوضأ وضوءًا خفيفًا، فقلت: الصّلاة يا رسول الله؟ قال:"الصّلاة أمامك". فركب رسول الله صلى الله عليه وسلم حتّى أتى المزدلفة فصلى، ثم ردف الفضلُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم غَداةَ جَمْعٍ.
قال كريب: فأخبرني عبد الله بن عباس رضي الله عنهما، عن الفضل: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يزل يلبي حتى بلغ الجمرة.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1669)، ومسلم في الحج (1280) كلاهما من طريق إسماعيل بن جعفر، عن محمد بن أبي حرملة، عن كريب مولى ابن عباس، عن أسامة بن زيد، فذكره. ولفظهما متقارب.
ورواه البخاريّ أيضًا في الحج (1685)، ومسلم أيضًا في الحج (1281: 267) -واللفظ له- كلاهما من طريق ابن جريج، أخبرني عطاء، أخبرني ابن عباس: أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أردف الفضل من جمع. قال: فأخبرني ابنُ عباس أنّ الفضل أخبره، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يزل يلبي حتى رمي جمرة العقبة.
ورواه البخاريّ في الحج (1686) من طريق الزهريّ، عن عبيد الله بن عبد الله (هو ابن عتبة بن مسعود)، عن ابن عباس رضي الله عنهما، أنّ أسامة بن زيد رضي الله عنهما كان رِدّف النبيّ صلى الله عليه وسلم من عرفة إلى المزدلفة، ثم أردف الفضل من المزدلفة إلى منى، قال: فكلاهما قالا:"لم يزل النبيّ صلى الله عليه وسلم يلبي حتى رمي جمرة العقبة".
উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আরাফাত থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে আরোহণ করেছিলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন মুযদালিফার সামান্য আগে বাম দিকের উপত্যকায় পৌঁছলেন, তখন তিনি তাঁর বাহন বসালেন এবং পেশাব করলেন। এরপর তিনি ফিরে আসলেন। আমি তাঁর উপর ওযূর পানি ঢেলে দিলাম। তিনি হালকাভাবে ওযু করলেন। আমি বললাম, 'ইয়া রাসূলাল্লাহ! সালাত?' তিনি বললেন: "সালাত তোমার সামনে (মুযদালিফায়) হবে।" এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরোহণ করলেন এবং মুযদালিফায় পৌঁছে সালাত আদায় করলেন। এরপর (পরের দিন) মুযদালিফার সকালে ফযল (ইবনে আব্বাস) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে আরোহণ করলেন।
কুরাইব বলেন, এরপর আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ফযল (ইবনে আব্বাস) থেকে আমাকে অবহিত করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জামরায় (কংকর নিক্ষেপের স্থানে) পৌঁছানো পর্যন্ত তালবিয়া পাঠ করতে থাকেন।
অন্য এক বর্ণনায় (যা ফযল ইবনে আব্বাসকে জানিয়েছেন) এসেছে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জামরাতুল আকাবায় কংকর নিক্ষেপ না করা পর্যন্ত তালবিয়া পাঠ করা থেকে বিরত হননি।
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সূত্রে বর্ণিত, উসামা ইবনে যায়েদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরাফাহ থেকে মুযদালিফা পর্যন্ত নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পিছনে আরোহণ করেছিলেন, এরপর মুযদালিফা থেকে মিনা পর্যন্ত ফযল (ইবনে আব্বাস) আরোহণ করেন। তাঁরা উভয়ই বলেছেন: "নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জামরাতুল আকাবায় কংকর নিক্ষেপ না করা পর্যন্ত তালবিয়া পাঠ করা থেকে বিরত হননি।"
5026 - عن عبد الرحمن بن يزيد، أنّ عبد الله لبَّي حين أفاض من جَمْعٍ، فقيل: أعرابيٌّ هذا؟ فقال عبد الله: أنسي النّاسُ أمْ ضلُّوا؟ سمعتُ الذي أُنزلتْ عليه سورة البقرة يقول في هذا المكان:"لبيك اللَّهمّ لبيك".
صحيح: رواه مسلم في الحج (1283) من طرق، عن حصين، عن كثير بن مدرك الأشجعيّ، عن عبد الرحمن بن يزيد، به.
আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যখন তিনি জুমু' (মুযদালিফা) থেকে প্রত্যাবর্তনের সময় তালবিয়া পাঠ করলেন, তখন জিজ্ঞেস করা হলো: ইনি কি কোনো মরুবাসী (আ'রাবী)? আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: লোকেরা কি ভুলে গেছে, নাকি তারা পথভ্রষ্ট হয়েছে? আমি তার কাছে শুনেছি যার উপর সূরাতুল বাকারা অবতীর্ণ হয়েছে, তিনি এই স্থানে বলেছেন: "লাব্বাইকা আল্লাহুম্মা লাব্বাইক।"
5027 - عن عبد الرحمن بن معاذ التيمي قال: خطبنا رسول الله صلى الله عليه وسلم ونحن بمنى ففُتحتْ أسماعُنا حتّى كنّا نسمع ما يقول ونحن في منازلنا فطفق يعلمهم مناسكهم حتّى بلغ الجمار فوضع أصبعيه السبابتين ثم قال:"بحصى الخذف". ثم أمر المهاجرين فنزلوا
في مقدم المسجد، وأمر الأنصار فنزلوا من وراء المسجد، ثم نزل الناس بعد ذلك.
صحيح: رواه أبو داود (1957)، والنسائي (2996)، والإمام أحمد (16589)، والبيهقي (5/ 127) كلّهم من حديث محمد بن إبراهيم التيميّ، عن عبد الرحمن بن معاذ التيميّ، قال (فذكر الحديث).
انظر تخريجه كاملًا في باب خطب النبيّ صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع.
আব্দুর রহমান ইবনে মু'আয আত-তাইমী থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা মিনায় থাকা অবস্থায় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের উদ্দেশ্যে খুতবা দিলেন। ফলে আমাদের কানগুলো এমনভাবে খুলে গেল যে, আমরা আমাদের বাসস্থানে থেকেও তিনি যা বলছিলেন তা শুনতে পাচ্ছিলাম। অতঃপর তিনি তাদের হজ্জের নিয়ম-কানুন শিক্ষা দিতে শুরু করলেন, এমনকি তিনি জামারাতে (পাথর নিক্ষেপের স্থানে) পৌঁছলেন। তখন তিনি তাঁর উভয় শাহাদাত আঙ্গুল রাখলেন (ইঙ্গিত করলেন) এবং বললেন: "ক্ষিপ্ত পাথরের (আকারের নুড়ি) দ্বারা।" এরপর তিনি মুহাজিরগণকে নির্দেশ দিলেন, ফলে তারা মসজিদের সম্মুখভাগে অবস্থান নিলেন, আর আনসারগণকে নির্দেশ দিলেন, ফলে তারা মসজিদের পেছনে অবস্থান নিলেন। এরপর অন্যান্য লোকেরা অবস্থান গ্রহণ করল।
5028 - عن عائشة أنها قالت: استأذنتْ سودةُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم ليلة المزدلفة تدفع قبله وقبل حَطْمَة النّاسِ -وكانت امرأةً ثَبِطةً (يقول القاسم: والثَّبطةُ الثَّقيلة) قال: فأذن لها فخرجت قبل دفعه، وحَبَسَنا حتى أصبحنا فدفعنا بدفعه.
ولأَنْ أكُونَ استأذنتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم كما استأذَنْتُهُ سودةُ فأكونَ أدفعُ بإذنه أحبُّ إليَّ من مَفْرُوحٍ به.
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1681)، ومسلم في الحج (1290: 293) كلاهما من طريق أفلح بن حميد، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، فذكرته. واللفظ لمسلم.
قوله:"قبل حطمة الناس" أي قبل أن يزدحموا ويحطم بعضهم بعضًا.
قوله:"ثبطة" بفتح المثلثة وكسر الموحدة بعدها مهملة خفيفة - أي بطيئة الحركة.
قوله:"مفروح به" أي ما يفرح به من كلِّ شيء.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুযদালিফার রাতে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম-এর নিকট অনুমতি চাইলেন, যাতে তিনি (ফজরের) আগে এবং মানুষের ভিড়ের পূর্বে (মিনা অভিমুখে) রওনা হতে পারেন। তিনি ছিলেন একজন স্থূলাঙ্গী (বা ধীরগতিসম্পন্ন) নারী। (আল-কাসিম বলেন: থাবিতা মানে ভারী মহিলা)। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে অনুমতি দিলেন। অতঃপর তিনি (সাওদা) তাঁর রওনা হওয়ার আগেই বের হয়ে গেলেন। আর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের ধরে রাখলেন (বা অপেক্ষা করালেন) যতক্ষণ না আমরা সকালে পৌঁছালাম। অতঃপর আমরা তাঁর রওনা হওয়ার সাথে সাথে রওনা হলাম।
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আরো বলেন: সাওদা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যেভাবে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট অনুমতি চেয়েছিলেন, আমিও যদি তাঁর নিকট সেভাবে অনুমতি চাইতাম এবং তাঁর অনুমতিতে (আগে) রওনা হতাম, তবে তা আমার নিকট এমন কিছু পাওয়ার চেয়েও অধিক প্রিয় হতো, যা আনন্দের কারণ হয়।
5029 - عن ابن عباس، قال: أنا ممن قدَّم النبيُّ صلى الله عليه وسلم ليلة المزدلفة في ضعفة أهله.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1678)، ومسلم في الحج (1293) كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، حدّثنا عبد الله بن أبي يزيد، أنه سمع ابن عباس يقول (فذكره). واللفظ للبخاري، ولفظ مسلم قريب منه.
ورواه البخاريّ أيضًا في جزاء الصيد (1856)، ومسلم (الموضع نفسه) كلاهما من طريق حماد ابن زيد، عن عبيد الله بن أبي يزيد، به، نحوه.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি তাদের অন্তর্ভুক্ত ছিলাম যাদেরকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুযদালিফার রাতে তাঁর পরিবারের দুর্বল লোকদের সাথে (মিনা অভিমুখে) আগে পাঠিয়ে দিয়েছিলেন।
5030 - عن عطاء، عن ابن عباس، قال: بعث بي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم بسحر من جمع في ثَقَل نبيِّ الله صلى الله عليه وسلم.
قلت: أبلغك أن ابن عباس قال: بعث بي بليل طويل؟ قال: لا. إلّا كذلك، بسحر. قلت له: فقال ابن عباس: رمينا الجمرة قبل الفجر؟ وأين صلَّى الفجر؟ قال: لا، إلّا كذلك.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1294) عن عبد بن حميد، أخبرنا محمد بن بكر، أخبرنا ابن جريج، أخبرني عطاء (هو ابن أبي رباح)، أنّ ابن عباس قال (فذكره).
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে মুযদালিফা থেকে সাহারীর সময় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের ভারবহনকারী কাফেলার সাথে পাঠিয়েছিলেন।
(বর্ণনাকারী আতা’কে) আমি জিজ্ঞাসা করলাম: আপনার কাছে কি এই মর্মে বর্ণনা পৌঁছেছে যে ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: আমাকে দীর্ঘ রাতের বেলায় পাঠিয়েছিলেন? তিনি বললেন: না, কেবল এমনই, সাহারীর সময়। আমি তাঁকে জিজ্ঞাসা করলাম: ইবনে আব্বাস কি বলেছিলেন, আমরা ফজরের আগে জামারায় কংকর নিক্ষেপ করেছিলাম? আর তিনি (নবী) ফজর কোথায় আদায় করেছিলেন? তিনি বললেন: না, শুধু এইটুকুই।
5031 - عن سالم بن شوَّال -مولى أمِّ حبيبة- أنه دخل على أمِّ حبيبة فأخبرتْه، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بعث بها من جمع بليل.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1292) من طريق ابن جريج، أخبرني عطاء، أنّ ابن شوّال أخبره، فذكره.
ثم رواه من طريق عمرو بن دينار، عن سالم بن شوال، عن أم حبيبة قالت:"كنا نفعله على عهد النبيّ صلى الله عليه وسلم نغلّس من جمع إلى مني".
وفي رواية عنده:"نغلّس من مزدلفة".
উম্মু হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তাঁর আযাদকৃত গোলাম সালিম ইবনে শাওয়াল তাঁর নিকট প্রবেশ করলে তিনি তাকে জানান যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে রাতের বেলা ‘জাম’ (মুযদালিফা) থেকে পাঠিয়ে দিয়েছিলেন।
অন্য এক বর্ণনায় উম্মু হাবীবা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর যুগে এমনটিই করতাম— আমরা ‘জাম’ (মুযদালিফা) থেকে মিনায় ভোরের অন্ধকারে রওনা হতাম। (তাঁরই নিকট অন্য এক বর্ণনায় ‘মুযদালিফা’ শব্দটি এসেছে)।
5032 - عن الفضل: أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أمر ضعفة بني هاشم أن ينفروا من جمع بليل.
حسن: رواه النسائيّ (3037) عن أبي داود قال: حدثنا أبو عاصم وعفان وسليمان، عن شعبة، عن مشاش، عن عطاء، عن ابن عباس، عن الفضل، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (1811)، وأبو يعلى (6734) كلاهما من طريق عفان، عن شعبة، بهذا الإسناد، مثله.
وإسناده حسن من أجل مُشاش وهو أبو ساسان أو أبو الأزهر السلميّ، وثّقه ابن معين. وقال أبو حاتم: صالح الحديث، وقال أبو زرعة: ليس به بأس. فمثله يحسّن حديثه.
إلّا أن الترمذيّ (893) علّله بأنّ شعبة روى هذا الحديث عن مشاش، عن عطاء، عن ابن عباس. وهذا خطأ؛ أخطأ فيه مُشَّاش وزاد فيه:"عن الفضل بن عباس". وروى ابن جريج وغيره هذا الحديث عن عطاء، عن ابن عباس، ولم يذكروا فيه (عن الفضل بن عباس). ومشاش بصريّ وروي عنه شعبة" انتهى.
قلت: لا يبعد عن أن يروي عطاء هذا الحديث عن وجهين، وشعبة إمام في الحديث وأعرف الناس بمشاش، وروايته عنه تقوي هذا الجانب، فلا يحتاج إلى تخطئة مشاش.
আল-ফাদল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বনু হাশিমের দুর্বল লোকদেরকে নির্দেশ দিয়েছিলেন যে, তারা যেন রাত থাকতেই জাম' (মুযদালিফা) থেকে প্রস্থান করে।
5033 - عن عبد الله بن عمر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أذن لضعفة الناس من المزدلفة بليل.
صحيح: رواه أحمد (4892) والنسائي في الكبرى (4037) كلاهما من حديث عبد الرزاق، قال: أخبرنا معمر، عن الزهري، عن سالم، عن ابن عمر، فذكره. وإسناده صحيح.
আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুর্বল প্রকৃতির লোকদেরকে রাতের বেলায় মুযদালিফা থেকে (মিনা অভিমুখে) চলে যাওয়ার অনুমতি দিয়েছিলেন।
5034 - عن جابر، قال: رمي رسولُ الله صلى الله عليه وسلم الجمرة يوم النّحر ضُحًى، وأمّا بعد فإذا زالت الشمس.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1299: 314) من طريق ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول (فذكره).
জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোরবানীর দিন (ঈদের দিন) পূর্বাহ্ণে (চাশতের সময়) জামারায় কঙ্কর নিক্ষেপ করেছিলেন, কিন্তু এরপর (আইয়ামে তাশরীকের দিনগুলোতে), সূর্য ঢলে যাওয়ার পর (যাওয়ালের পর) করতেন।
5035 - عن أمّ الحصين، قالت: حججتُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم حجّة الوداع، فرأيتُ أسامة وبلالًا، وأحدهما آخذٌ بخطام ناقة النبيّ صلى الله عليه وسلم، والآخر رافع ثوبه يستره من الحرِّ حتى رمي جمرة العقبة.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1298: 312) من طريق زيد بن أبي أنيسة، عن يحيى بن الحصين، عن أمّ الحصين جدّته، قالت (فذكره).
উম্মুল হুসাইন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বিদায় হজ্জ আদায় করেছিলাম। তখন আমি উসামা ও বিলালকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) দেখলাম, তাদের একজন ছিলেন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উটের লাগাম ধরে, আর অন্যজন গরম থেকে তাঁকে রক্ষা করার জন্য তাঁর কাপড় উঁচু করে ধরে রেখেছিলেন, যতক্ষণ না তিনি জামরাতুল আকাবায় কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন।
5036 - عن عبد الله مولي أسماء، قال: قالت لي أسماء -وهي عند دار المزدلفة-: هل غاب القمر؟ قلت: لا، فصلّت ساعة، ثم قالت: يا بُنيَّ! هل غاب القمرُ؟ قلت: نعم. قالت: ارْحل بي. فارْتحلنا حتى رمت الجمرةَ، ثم صلَّتْ في منزلها. فقلتُ لها: أيْ هَنَتاهُ، لقد غلّسنا! قالت: كلا أيْ بُنيّ إنَّ النَّبي صلى الله عليه وسلم أذِن للظُعُن.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1679)، ومسلم في الحج (1291) كلاهما من طريق يحبي القطان، عن ابن جريج، قال: حدّثني عبد الله مولى أسماء. واللفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه.
আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাঁর আযাদকৃত গোলাম আব্দুল্লাহ বলেন, আসমা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) মুযদালিফার ঘরের কাছে থাকাবস্থায় আমাকে বললেন: চাঁদ কি ডুবে গেছে? আমি বললাম: না। অতঃপর তিনি কিছুক্ষণ সালাত আদায় করলেন। এরপর বললেন: হে আমার বৎস! চাঁদ কি ডুবে গেছে? আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: আমাকে নিয়ে যাত্রা শুরু করো। অতঃপর আমরা যাত্রা করলাম, যতক্ষণ না তিনি জামারায় কংকর নিক্ষেপ করলেন। এরপর তিনি তার ঘরে (তাঁবুতে) সালাত আদায় করলেন। তখন আমি তাকে বললাম: হে শ্রদ্ধেয় নারী, আমরা তো খুব ভোরে (অন্ধকার থাকতেই) রওনা হয়ে গেলাম! তিনি বললেন: না, হে আমার বৎস! নিশ্চয়ই নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দুর্বলদের (বা নারীদের) জন্য এর অনুমতি দিয়েছেন।
5037 - عن ابن شهاب، أنّ سالم بن عبد الله أخبره: أنّ عبد الله بن عمر كان يقدِّمُ ضَعَفَةَ أهله، فيقفون عند المشعر الحرام بالمزدلفة بالليل فيذكرون الله ما بدا لهم، ثم يدفعون قبل أن يقف الإمام، وقبل أن يدفعَ. فمنهم مَنْ يقدَمُ مِنًى لصلاة الفجر، ومنهم مَنْ يَقْدَمُ بعد ذلك، فإذا قَدِمُوا رَمَوا الجمْرةَ.
وكان ابنُ عمر يقول: أرخصَ في أولئك رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1676)، ومسلم في الحج (1295) كلاهما من طريق يونس (هو ابن يزيد الأيلي)، عن ابن شهاب الزهريّ، به. واللفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ نحوه.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি তাঁর পরিবারের দুর্বল লোকদেরকে আগে পাঠিয়ে দিতেন। তারা রাতের বেলায় মুযদালিফায় মাশ‘আরুল হারামের কাছে অবস্থান করত এবং যতক্ষণ ইচ্ছা আল্লাহ্র যিকির করত। অতঃপর ইমাম (রাষ্ট্রপ্রধান বা দলনেতা) সেখানে অবস্থান করার পূর্বেই এবং তিনি (ইমাম) সেখান থেকে রওনা হওয়ার পূর্বেই তারা রওনা হয়ে যেত। তাদের মধ্যে কেউ কেউ ফজরের সালাতের জন্য মিনায় পৌঁছত, আবার কেউ কেউ এর পরে পৌঁছত। যখনই তারা পৌঁছত, তখনই তারা জামরায় (পাথর) নিক্ষেপ করত। ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলতেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের জন্য এই ছাড় দিয়েছেন।
5038 - عن ابن عباس، قال: أرسلني رسول الله صلى الله عليه وسلم في ضعفة أهله، فصلينا الصّبح بمني ورمينا الجمرة.
صحيح: رواه النسائيّ (3048) عن محمد بن عبد الله بن عبد الحكم، عن أشهب، أنّ داود بن عبد الرحمن حدّثهم، أنّ عمرو بن دينار حدّثه، أنّ عطاء بن أبي رباح حدّثهم أنّه سمع ابن عباس يقول (فذكره).
وإسناده صحيح. وأشهب هو ابن عبد العزيز بن داود القيسيّ"ثقة فقيه".
ورواه أحمد (2460) عن حسين، عن داود - يعني العطار بإسناده، مثله.
وفي معناه ما رُويَ عن عائشة أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أمر إحدى نسائه أن تنفر من جمع ليلة جمع، فتأتي جمرة العقبة فترميها، وتُصبح في منزلها.
رواه النسائيّ (3066) من حديث عبد الله بن عبد الرحمن الطائفيّ، عن عطاء بن أبي رباح، قال: حدّثتني عائشة بنت طلحة، عن خالتها عائشة أمّ المؤمنين، فذكرته، وكان عطاء يفعله حتى مات.
ومن هذا الطريق رواه أيضًا البخاريّ في التاريخ الصغير (1/ 296) وقال:"والمرأة هي سودة أم المؤمنين".
وفيه عبد الله بن عبد الرحمن الطائفيّ الثقفيّ. قال أبو حاتم: ليس بقوي، لين الحديث. وقال النسائيّ: ليس بذاك.
وأما ما رُوي عن عائشة أيضًا أنها قالت:"أرسل رسول الله صلى الله عليه وسلم بأمّ سلمة ليلة النّحر فرمت الجمرة قبل الفجر، ثم مضتْ فأفاضتْ. وكان ذلك اليوم الذي يكون رسول الله صلى الله عليه وسلم عندها" فظاهره السّلامة! ولكن فيه علّة خفية وهي النكارة.
رواه أبو داود (1942) عن هارون بن عبد الله، حدّثنا ابن أبي فديك، عن الضحاك -يعني ابن عثمان-، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته. وصحّحه الحاكم (1/ 469) على شرطهما.
ورواه البيهقيّ (5/ 133) من وجه آخر عن ابن أبي فديك، بإسناده وقال:"رواه أبو داود عن هارون بن عبد الله".
وقال في المعرفة (4/ 127):"هذا إسناد صحيح لا غبار عليه".
قلت: إسناده حسن من أجل ابن أبي فديك وهو محمد بن إسماعيل بن مسلم بن أبي فديك، وهو"صدوق".
رواه أبو داود هكذا مختصرًا، وقد عُلم من الروايات الأخرى أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم أمرها أن توافي صلاة الصبح يوم النّحر بمكة.
رواه البيهقي (5/ 133) من طريق أبي معاوية الضرير، عن هشام، عن عروة، عن أبيه، عن زينب بنت أبي سلمة، عن أم سلمة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أمرها، فذكرته.
قال البيهقيّ بعد أن روى عن الشّافعيّ روايتين فيهما، قال الشّافعيّ: أخبرني من أثق به:"كأن الشّافعيّ رحمه الله أخذه من أبي معاوية الضّرير، وقد رواه أبو معاوية موصولًا".
قلت: وهذا يخالف الواقع، فإن النبيّ صلى الله عليه وسلم يوم النحر في صلاة الصبح كان بالمزدلفة، ولم يكن بمكة حتى توافيه أمُّ سلمة؛ ولهذا أنكره الإمام أحمد وضعّفه، كما نقله الحافظ ابن القيم في تهذيب السنن عن ابن عبد البر فإنه لا يمكن أن توافي معه صلاة الصبح بمكة.
وبهذه الأحاديث رأى البخاريّ أنّ ما رواه الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"لا ترموا الجمرة حتى تطلع الشمس". أنه مضطرب لما وصفنا، ولا ندري الحكم سمع هذا من مقسم أم لا؟ . ذكره في التاريخ الصغير (1/ 295).
وإلى هذه الأحاديث ذهب الشافعيّ والإمام أحمد في رواية إلى جواز الرّمي قبل طلوع الشمس لمن ارتحل من الضعفة والنساء من المزدلفة بعد نصف الليل.
وأما حديث ابن عباس الذي حكم عليه البخاريّ بالاضطراب فله طرق كثيرة يعضد بعضها بعضًا كما هو الآتي.
আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম আমাকে তাঁর পরিবারের দুর্বলদের সাথে (আগে) পাঠিয়েছিলেন। তাই আমরা মিনায় ফজরের সালাত আদায় করলাম এবং জামরায় কংকর নিক্ষেপ করলাম।
সহীহ: এটি নাসাঈ (৩০৪৮) মুহাম্মাদ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুল হাকাম সূত্রে, তিনি আশহাব সূত্রে, তিনি দাঊদ ইবনু আবদির রাহমান সূত্রে, তিনি আমর ইবনু দীনার সূত্রে, তিনি আতা ইবনু আবী রাবাহ সূত্রে বর্ণনা করেছেন যে, তিনি ইবনু আব্বাসকে বলতে শুনেছেন (তিনি এটি বর্ণনা করেছেন)। এর সনদ সহীহ। আর আশহাব হলেন ইবনু আব্দুল আযীয ইবনু দাঊদ আল-ক্বায়সী, যিনি ‘ছিকাহ ফক্বীহ’ (নির্ভরযোগ্য ফক্বীহ)। এটি আহমাদও (২৪৬০) হুসাইন সূত্রে, দাঊদ —অর্থাৎ আল-আত্তার— থেকে একইরূপ বর্ণনা করেছেন।
এর সমর্থনে আরও বর্ণিত হয়েছে আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে, যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর স্ত্রীদের একজনকে আদেশ করলেন যে তিনি যেন জাম‘ (মুযদালিফা) থেকে জাম‘আর রাতে (অর্থাৎ ঈদুল আযহার রাতে) প্রস্থান করেন, জামরাতুল আকাবায় এসে কংকর নিক্ষেপ করেন এবং সকালে তাঁর নিজ আবাসে ফিরে যান।
এটি নাসাঈ (৩০৬৬) আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুর রহমান আত-তায়েফী সূত্রে, আতা ইবনু আবী রাবাহ থেকে বর্ণনা করেছেন। আতা (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: 'আয়েশা বিনত তালহা আমার কাছে তাঁর খালা উম্মুল মু'মিনীন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন,' অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন। আতা (রাহিমাহুল্লাহ) মৃত্যু পর্যন্ত এটি করতেন। এই সূত্র ধরে বুখারীও তাঁর ‘আত-তারীখ আস-সগীর’ (১/২৯৬)-এ বর্ণনা করেছেন এবং তিনি বলেছেন: "আর সেই স্ত্রী হলেন উম্মুল মু'মিনীন সাওদাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)।"
এতে আব্দুল্লাহ ইবনু আব্দুর রহমান আত-তায়েফী আস-সাকাফী রয়েছেন। আবু হাতিম বলেছেন: সে ততটা শক্তিশালী নয়, তার হাদীসে দুর্বলতা আছে। নাসাঈ বলেছেন: সে তেমন উল্লেখযোগ্য নয়।
আর যা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকেও বর্ণিত হয়েছে, তিনি বলেন: "রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কুরবানীর রাতে উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে (আগে) পাঠিয়েছিলেন। তিনি ফজরের পূর্বে জামরায় কংকর নিক্ষেপ করলেন, অতঃপর চলে গেলেন এবং তাওয়াফে ইফাদা করলেন। সেদিনটি এমন ছিল যেদিন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁর কাছে অবস্থান করতেন।" এটির বাহ্যিক দৃষ্টিতে কোনো সমস্যা নেই! কিন্তু এর মধ্যে একটি গোপন ত্রুটি রয়েছে, আর তা হলো এটি মুনকার (অস্বীকৃত)।
এটি আবূ দাউদ (১৯৪২) হারুন ইবনু আব্দুল্লাহ সূত্রে বর্ণনা করেছেন। হাকেমও (১/৪৬৯) তাঁদের (শাইখাইন) শর্তানুসারে এটিকে সহীহ বলেছেন। বাইহাকীও (৫/১৩৩) ইবনু আবী ফুদাইক থেকে অন্য সূত্রে এটি বর্ণনা করেছেন এবং বলেছেন: "আবূ দাউদ এটিকে হারুন ইবনু আব্দুল্লাহ সূত্রে বর্ণনা করেছেন।" এবং 'আল-মা'রিফা' (৪/১২৭)-এ বলেছেন: "এর সনদ সহীহ, এতে কোনো দোষ নেই।" আমি (আলবানী) বলি: ইবনু আবী ফুদাইকের কারণে এর সনদ হাসান। তিনি মুহাম্মদ ইবনু ইসমাঈল ইবনু মুসলিম ইবনু আবী ফুদাইক, আর তিনি 'সাদুক' (সত্যবাদী)।
আবূ দাউদ এভাবে সংক্ষেপে বর্ণনা করেছেন। অন্যান্য রিওয়ায়াত দ্বারা জানা যায় যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে (উম্মু সালামাহকে) কুরবানীর দিন মক্কায় ফজরের সালাতের জন্য উপস্থিত থাকতে নির্দেশ দিয়েছিলেন। বাইহাকী (৫/১৩৩) আবূ মু'আবিয়াহ আদ্-দ্বা'রীর সূত্রে উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন যে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম তাঁকে নির্দেশ দিলেন, অতঃপর তিনি তা উল্লেখ করেন। বাইহাকী শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ)-এর থেকে দুটি রিওয়ায়াত বর্ণনা করার পর বলেন: শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: যার প্রতি আমি আস্থা রাখি, তিনি আমাকে জানিয়েছেন: "মনে হয় শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) আবূ মু'আবিয়াহ আদ্-দ্বা'রীর থেকে এটি গ্রহণ করেছেন, আর আবূ মু'আবিয়াহ এটি মুয়াস্সাল (সংযুক্ত সনদসহ) হিসেবে বর্ণনা করেছেন।" আমি (আলবানী) বলি: এটি বাস্তবতার পরিপন্থী। কেননা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কুরবানীর দিন ফজরের সালাতের সময় মুযদালিফায় ছিলেন, মক্কায় ছিলেন না যে উম্মু সালামাহ তাঁর সাথে সেখানে উপস্থিত হবেন। একারণেই ইমাম আহমাদ এই হাদীসটিকে মুনকার (অস্বীকৃত) বলেছেন ও দুর্বল ঘোষণা করেছেন, যেমনটি হাফিয ইবনু আল-কাইয়্যিম তাঁর 'তাহযীবুস-সুনান'-এ ইবনু আব্দুল বার্র থেকে উদ্ধৃত করেছেন। কারণ মক্কায় তাঁর সাথে ফজরের সালাতে উপস্থিত হওয়া সম্ভব নয়।
এই হাদীসগুলোর কারণে বুখারী (রাহিমাহুল্লাহ) মনে করেন যে, হাকাম মিকসাম থেকে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সূত্রে যা বর্ণনা করেছেন যে, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "সূর্য উদিত না হওয়া পর্যন্ত তোমরা জামরায় কংকর নিক্ষেপ করো না," সেটি (উপরোক্ত বর্ণনাগুলোর কারণে) মুযতারাব (অস্থির/দুর্বল)। আর আমরা জানি না হাকাম মিকসামের থেকে সরাসরি শুনেছেন কি না। তিনি এটি 'আত-তারীখ আস-সগীর' (১/২৯৫)-এ উল্লেখ করেছেন।
এই হাদীসগুলোর ভিত্তিতেই শাফিঈ (রাহিমাহুল্লাহ) এবং ইমাম আহমাদ (রাহিমাহুল্লাহ) একটি বর্ণনা অনুসারে দুর্বল ও মহিলাদের জন্য অর্ধরাতের পরে মুযদালিফা থেকে চলে গিয়ে সূর্যোদয়ের পূর্বে কংকর নিক্ষেপ করা জায়েয মনে করতেন।
আর ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর যে হাদীসটিকে বুখারী মুযতারাব হিসেবে রায় দিয়েছেন, তার অনেকগুলো সূত্র রয়েছে যা একে অপরের পরিপূরক, যা পরবর্তীতে আসবে।
5039 - عن ابن عباس، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم قدم ضعفة أهله قال:"لا ترموا الجمرة حتى تطلع الشمس".
حسن: رواه الترمذيّ (893) من حديث وكيع، عن المسعوديّ، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، فذكره.
قال الترمذيّ:"حسن صحيح".
قلت: فيه المسعوديّ هو عبد الرحمن بن عبد الله بن عتبة مختلط، وإنّ سماع وكيع منه كان بالكوفة قديم كما قال الإمام أحمد، وقال:"إنه كان قد اختلط بغداد، وإن سماع من سمع هناك ليس بشيء. قال: ومن سمع منه بالكوفة فسماعه جيد".
وتابعه الأعمش، عن الحكم بإسناده.
ومن طريقه الإمام أحمد (2507) مطولًا، و (3513) مختصرًا.
ولكن نقل الترمذي (880) عن شعبة قال: لم يسمع الحكم من مقسم إلا خمسة أحاديث" وهذا الحديث ليس منها؛ لأنّ يحيي القطّان عدّها. انظر: تحفة التحصيل: (80 - 81).
قلت: ولكن له طرق أخرى.
منها: ما رواه أبو داود (1941)، والنسائيّ (3065) كلاهما من حديث حبيب، عن عطاء، عن ابن عباس، قال:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يقدّم ضعفاء أهله، ويأمرهم - يعني لا يرمون الجمرة حتى تطلع الشمس".
وحبيب هو ابن أبي ثابت مدلّس وقد عنعن، وفي حديثه عن عطاء وهم.
نقل العقيلي عن القطان قال: في حديثه عن عطاء ليس بمحفوظ.
ومنها: ما رواه فضيل بن سليمان، عن موسى بن عقبة، قال: أخبرني كريب، عن ابن عباس:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يأمر نساءه وثَقله من صبيحة جمع أن يفيضوا مع أوّل الفجر بسواد، وأن لا يرموا
الجمرة إلّا مصبحين".
رواه البيهقيّ (5/ 132) عن محمد بن أبي بكر عنه.
وفيه: فُضيل بن سليمان وهو النميري، مختلف فيه، ولكن الغالب على حديثه الضعف، وخاصة في روايته عن موسى بن عقبة الإمام في المغازي.
قال صالح بن محمد جزرة: منكر الحديث، روى عن موسى بن عقبة مناكير.
وقال ابن معين:"ليس بثقة"، وقال:"ليس هو بشيء، ولا يكتب حديثه".
ومنها: ما رواه أبو داود (1940)، والنسائي (3064)، وابن ماجه (3025)، والإمام أحمد (2082) كلهم من حديث سفيان، عن سلمة بن كهيل، عن الحسن العرني، عن ابن عباس.
وصحّحه ابن حبان (3869)، فرواه من هذا الوجه.
وفيه انقطاع فإنّ العرني لم يسمع من ابن عباس، بل لم يدركه وهو يرسل عنه كما قال الإمام أحمد وابن معين وأبو حاتم وغيرهم.
ومنها: ما رواه الإمام أحمد (2459) من طريق شريك، عن ليث، عن طاوس، عن ابن عباس، قال:"عجلنا النبيّ صلى الله عليه وسلم أو عجّل أمّ سلمة، وأنا معهم من المزدلفة إلى جمرة العقبة، فأمرنا أن لا نرميها حتى تطلع الشمس".
وفيه شريك وليث، وفيهما كلام معروف. وله طرق أخرى يقوي بعضها بعضًا، كما قال الحافظ ابن حجر في"الفتح" (3/ 617).
إلا أن ابن خزيمة في صحيحه (4/ 280) أبدى الشك في صحة أخبار ابن عباس، فقال:"ولست أحفظ في تلك الأخبار إسنادًا ثابتًا من جهة النّقل، فإن ثبت إسناد واحد منها فمعناه أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم زجر المذكور ممن قدمهم تلك الليلة عن رمي الجمار قبل طلوع الشمس، لا السّامع المذكور؛ لأنّ خبر ابن عمر -الآتي- يدل على أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قد أذن لضعفة النساء في رمي الجمار قبل طلوع الشمس، فلا يكون خبر ابن عمر خلاف خبر ابن عباس إن ثبت خبر ابن عباس من جهة النقل، على أنّ رمي الجمار لضعفة النساء بالليل قبل طلوع الفجر أيضًا عندي جائز للخبر الذي أذكره" انتهى.
وبهذا قال مالك وأبو حنيفة بأنه لا يجوز الرمي قبل طلوع الشمس ولو ارتحل بعد نصف الليل، ولكن هذا يخالف الغاية التي من أجلها أذن النبيّ صلى الله عليه وسلم للضعفة من الارتحال من المزدلفة إلى منى، فيحمل هذا الحديث إن صحَّ على كراهية الرّمي قبل طلوع الشمس، فإن الوقت المختار الذي لا خلاف فيه هو وقت الضّحي.
وأمّا ما روي عن شعبة مولي ابن عباس، عن ابن عباس، قال:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بعث به مع أهله إلى منى يوم النحر فرموا الجمرة مع الفجر" ففيه ضعف. رواه الإمام أحمد من وجهين (2935،
2936) عن ابن أبي ذئب، عن شعبة، عن ابن عباس.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا أبو داود الطيالسيّ في مسنده (2852).
وإسناده ضعيف من أجل شعبة مولي ابن عباس، وهو ابن دينار الهاشميّ، قال فيه النسائي:"ليس بالقوي" كما في"الميزان".
ولكن قال ابن معين:"ليس به بأس". وفي التقريب:"صدوق سيء الحفظ". فمثله لا يقبل إذا خالف الثقات، كما في الرّوايات السّابقة.
فقوله:"رموا مع الفجر" فيه نكارة.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পরিবারের দুর্বলদের (আগে) পাঠিয়েছিলেন। তিনি বললেন: "সূর্য ওঠা পর্যন্ত জামরায় কংকর নিক্ষেপ করো না।"
5040 - عن ابن عباس، قال: سئل النبيّ صلى الله عليه وسلم فقال: رميتُ بعد ما أمسيتُ؟ فقال:"لا حرج".
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1723) عن محمد بن المثنى، حدّثنا عبد الأعلى، حدّثنا خالد، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
فيه نقل وقت الرمي المختار إلى وقت الجواز. والظاهر من السؤال أنه كان في يوم النحر؛ لأنّ الوقت المختار هو قبل الزوال، فرفع النبيّ صلى الله عليه وسلم الحرج عمن رماه مساء، ويقاس عليه من رماه ليلًا لاشتراك جزء من المساء في الليل.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞেস করা হলো, (একজন জিজ্ঞেস করল,) আমি সন্ধ্যা হয়ে যাওয়ার পর (কঙ্কর) নিক্ষেপ করেছি? তিনি বললেন, "কোনো অসুবিধা নেই।"