আল-জামি` আল-কামিল
5061 - عن أنس بن مالك، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رمي جمرة العقبة، ثم انصرف إلى البُدن فنحرها، والحجّام جالس وقال بيده عن رأسه، فحلق شقَّه الأيمن فقسمه فيمن يليه،
ثم قال:"احْلق الشِّق الآخر" فقال: أين أبو طلحة؟ فأعطاه إيّاه.
متفق عليه: رواه مسلم في الحج (1305) من طرق عن هشام (هو الدّستوائيّ) عن محمد بن سيرين، عن أنس بن مالك، فذكره.
ورواه البخاريّ في الوضوء (171) من طريق ابن عون، عن ابن سيرين، به، مختصرًا بلفظ:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لما حلق رأسه كان أبو طلحة أوّل من أخذ من شعره".
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জামরাতুল আকাবায় (পাথর) নিক্ষেপ করলেন, এরপর কুরবানীর উটগুলোর দিকে মনোনিবেশ করে সেগুলোকে নহর (যবেহ) করলেন। নাপিত বসে ছিল। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তার হাত দ্বারা মাথার দিকে ইঙ্গিত করলেন, অতঃপর তার মাথার ডান দিক মুণ্ডন করা হলো এবং তিনি সেটি তার পার্শ্ববর্তী লোকদের মাঝে বণ্টন করলেন। এরপর তিনি বললেন: "অন্য পাশটিও মুণ্ডন করো।" অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: আবু তালহা কোথায়? অতঃপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে (বাম পাশের চুলগুলো) দিয়ে দিলেন।
5062 - عن معمر بن عبد الله قال: كنت أرحل لرسول الله صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع قال فقال لي ليلة من الليالي:"يا معمر لقد وجدت الليلة في أنْسَاعِي اضطرابًا". قال: فقلت: أما والذي بعثك بالحقّ لقد شددتها كما كنت أشدُّها، ولكنه أرخاها مَنْ قد كان نَفِسَ عليَّ مكاني منك، لتستبدل بي غيري، قال: فقال:"أما إنّي غيرُ فاعلٍ". قال: فلما نحر رسول الله صلى الله عليه وسلم هديه بمنى أمرني أن أحلقه، قال: فأخذتُ الموسي فقمت على رأسه. قال: فنظر رسول الله صلى الله عليه وسلم في وجهي وقال لي:"يا معمرُ، أمكنكَ رسول الله صلى الله عليه وسلم من شحمة أذنه وفي يدك الموسي؟ !". قال: فقلت: أما والله يا رسول الله إنّ ذلك لمن نعمة الله عليَّ ومَنِّه. قال: فقال:"أجلْ إذًا أقِرّ لك". قال: ثم حلقت رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه الإمام أحمد (27249)، والطبرانيّ في الكبير (20/ 447 - 448) كلاهما من حديث ابن إسحاق، قال: حدثني يزيد بن أبي حبيب المصريّ، عن عبد الرحمن بن عقبة مولي معمر بن عبد الله بن نافع بن نضلة العدويّ، عن معمر بن عبد الله، فذكره. ولفظهما سواء إلا في أحرف.
إسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق؛ لأنه مدلس ولكنه صّرح. ومن أجل عبد الرحمن بن عقبة فإنه من رجال"التعجيل" قال الحسيني:"مجهول" فتعقبه الحافظ ابن حجر فقال:"وَهِل، بل هو معروف، ذكره ابن يونس، ونسبه غفاريًا، وذكر في الرواة عنه موسي بن أيوب (علاوة عن يزيد بن أبي حبيب)، وأن عبد الرحمن المذكور قتل بإفرلقيا، ولم يذكر ابن أبي حاتم تبعًا للبخاريّ فيه جرحًا".
قلت: فمثله يحسّن حديثه، وخاصة وقد سبق في حديث ابن خزيمة ما يشهد له.
وجزم أهل العلم أنّ الذي حلق شعر رأس النبيّ صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع هو معمر بن عبد الله بن نضلة القرشيّ، منهم: الحافظ في الفتح (1/ 309).
وقوله:"أنساعي" جمع نِسعة -بكسر النون، وسكون السين- وهي التي تُنسج عريضة ليربط على صدر البعير.
وقوله:"نِفس" بكسر الفاء -كعلِم- من نَفِسْت عليه بالشيء إذا تراه له أهلًا. أفاده السنديّ.
মা‘মার ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। তিনি বলেন, আমি বিদায় হজ্জের সময় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর উটের সওয়ারি সরঞ্জাম প্রস্তুত করতাম। তিনি বলেন, এরপর এক রাতে তিনি আমাকে বললেন: “হে মা‘মার! আমি আজ রাতে আমার উটের (সাওয়ারির) রজ্জুগুলোতে অস্থিরতা (শিথিলতা) অনুভব করছি।” আমি বললাম: তবে শপথ সেই সত্তার, যিনি আপনাকে সত্যসহকারে প্রেরণ করেছেন, আমি সেগুলোকে তেমনই শক্ত করে বেঁধেছি যেমন আমি সাধারণত বাঁধি। কিন্তু আপনার কাছে আমার এই অবস্থান নিয়ে যে ব্যক্তি ঈর্ষা করত, সে-ই সেগুলো শিথিল করে দিয়েছে—যাতে আপনি আমার বদলে অন্য কাউকে নিয়োগ দেন। তিনি বললেন: “নিশ্চয়ই আমি তা করব না।” তিনি বলেন, এরপর যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিনাতে তাঁর কুরবানীর পশু যবেহ করলেন, তখন তিনি আমাকে আদেশ করলেন যেন আমি তাঁর চুল কামিয়ে দেই। তিনি বলেন, আমি ক্ষুর নিলাম এবং তাঁর মাথার কাছে দাঁড়ালাম। তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার চেহারার দিকে তাকালেন এবং আমাকে বললেন: “হে মা‘মার! রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর কানের নরম অংশ তোমার আয়ত্তে দিয়েছেন, আর তোমার হাতে রয়েছে ক্ষুর?!” আমি বললাম: আল্লাহর কসম, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! নিঃসন্দেহে এটা আমার প্রতি আল্লাহর নি‘আমত ও অনুগ্রহ। তিনি বললেন: “হ্যাঁ, তাহলে আমি তোমার জন্য তা স্বীকার করলাম (অর্থাৎ এটি তোমার জন্য আল্লাহর পক্ষ থেকে একটি অনুগ্রহ)।” তিনি বলেন, এরপর আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মাথা মুণ্ডন করে দিলাম।
5063 - عن أنس بن مالك، قال: لما أراد رسول الله صلى الله عليه وسلم أن يحلق الحجام رأسه،
أخذ أبو طلحة بشعر أحد شقي رأسه بيده، فأخذ شعره، فجاء به إلى أمّ سليم، قال: فكانت أمُّ سليم تدوفه في طيبها.
صحيح: رواه الإمام أحمد (12483) عن حسن (هو ابن موسي)، حدّثنا حماد بن سلمة، عن ثابت البنانيّ، عن أنس، فذكره.
وقوله:"تدوفه في طيبها" أي تخلطه فيه، يقال: دافه بماء يدوفه ويديفه إذا بلّه به وخلطه.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নাপিতকে দিয়ে তাঁর মাথা মুণ্ডন করাতে চাইলেন, তখন আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর মাথার এক পাশের চুল নিজ হাতে নিলেন, অতঃপর তিনি সেই চুল নিয়ে উম্মু সুলাইমের কাছে আসলেন। তিনি বলেন, তখন উম্মু সুলাইম সেই চুল তাঁর সুগন্ধির সাথে মিশিয়ে রাখতেন।
5064 - عن أنس قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم والحلّاق يحلقه، وقد أطاف به أصحابُه، ما يريدون أن تقع شعرة إلّا في يد رجل.
صحيح: رواه الإمام أحمد (12363) عن سليمان بن حرب، حدّثنا سليمان بن المغيرة، عن ثابت، عن أنس، فذكره. وإسناده صحيح.
আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখেছি যখন নাপিত তাঁর মাথা মুণ্ডন করছিল, আর তাঁর সাহাবীগণ তাঁকে ঘিরে রেখেছিলেন। তাঁরা চাইছিলেন না যে একটি চুলও যেন কোনো লোকের হাতের বাইরে পড়ে যায়।
5065 - عن محمد بن عبد الله بن زيد، أنّ أباه حدّثه: أنّه شهد النبيَّ صلى الله عليه وسلم عند المنْحر، ورجلًا من قريش، وهو يُقسم أضاحي، فلم يصبه منها شيءٌ ولا صاحبَه، فحلق رسولُ الله صلى الله عليه وسلم رأسه في ثوبه، فأعطاه فقسم منه على رجال، وقلّم أظفاره فأعطاه صاحبه قال: فإنه لعندنا مخضوب بالحنّاء والكتم - يعني شعره.
صحيح: رواه أحمد (16474، 16475)، وابن خزيمة (2931)، والحاكم (1/ 475) كلّهم من حديث أبان العطّار، قال: حدثني يحيي -يعني ابن أبي كثير-، عن أبي سلمة، عن محمد بن عبد الله بن زيد، أنّ أباه حدّثه، فذكره. وأبو محمد هو عبد الله بن زيد بن عبد ربه صاحب الأذان.
وإسناده صحيح. وصحّحه الحاكم وقال:"على شرط الشيخين".
وهذا وهم منه فإنّ محمد بن عبد الله بن زيد من رجال مسلم وحده.
আবদুল্লাহ ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, তিনি কুরবানীর স্থানে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট উপস্থিত ছিলেন। তাঁর সাথে কুরাইশের একজন লোকও ছিল। তিনি কুরবানীর গোশত ভাগ করছিলেন। কিন্তু তিনি বা তাঁর সঙ্গী কেউ এর থেকে কিছুই পাননি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর পোশাকের মধ্যে মাথা মুণ্ডন করলেন। অতঃপর (মুণ্ডানো চুল) তাঁকে দিলেন। তিনি সেটি লোকেদের মাঝে ভাগ করে দিলেন। আর তিনি তাঁর নখ কাটলেন এবং সেটি তাঁর সঙ্গীকে দিলেন। (বর্ণনাকারী) বলেন, নিশ্চয়ই সেই চুল হেনা ও কাতাম (এক ধরনের রং) দিয়ে রাঙানো অবস্থায় এখনো আমাদের কাছে বিদ্যমান রয়েছে।
5066 - عن عبد الله بن عمر، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"اللهمّ! ارْحم المحلِّقين". قالوا: والمقصِّرين يا رسول الله؟ قال:"اللهمّ! ارْحم المحلِّقين". قالوا: والمقصِّرين يا رسول الله؟ قال:"والمقصِّرين".
متفق عليه: رواه مالك في الحجّ (184) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، فذكره. ورواه البخاريّ في الحج (1727)، ومسلم في الحج (1301: 317) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
ورواه مسلم من طريق عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، به، بلفظ:"رحم الله المحلّقين" قالوا: والمقصِّرين يا رسول الله؟ قال:"رحم الله المحلّقين" قالوا: والمقصِّرين يا
رسول الله؟ قال:"رحم الله المحلّقين" قالوا: والمقصِّرين يا رسول الله؟ قال:"والمقصِّرين".
وعلقه البخاريّ -عقب رواية مالك-، عن عبيد الله بن عمر، به، مختصرًا.
قال الخطّابي وغيره: إنّ من عادة العرب كانت تحبُّ توفير الشّعر والتزين به، وكان الحلق فيهم قليلًا، وربما كانوا يرونه من الشّهرة، وذي الأعاجم، ولذلك كرهوا الحلق، واقتصروا على التقصير".
وروى مالك في الحجّ (200) بإسناد صحيح عن نافع، عن ابن عمر كان إذا حلق رأسه في حجّ أو عمرة، أخذ من لحيته وشاربه.
وكان عمر بن الخطاب رضي الله عنه يقول:"من غقص رأسه أو ضفر أو لبَّد، فقد وجب عليه الحِلاقُ".
رواه مالك في الحج (205) عن يحيى بن سعيد، عن سعيد بن المسيب، أنّ عمر بن الخطاب كان يقول (فذكره).
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "হে আল্লাহ! যারা মাথা মুণ্ডন করেছে, তাদের প্রতি রহম করুন।" সাহাবীগণ বললেন, "আর যারা চুল ছোট করে কেটেছে, হে আল্লাহর রাসূল?" তিনি বললেন, "হে আল্লাহ! যারা মাথা মুণ্ডন করেছে, তাদের প্রতি রহম করুন।" সাহাবীগণ বললেন, "আর যারা চুল ছোট করে কেটেছে, হে আল্লাহর রাসূল?" তিনি বললেন, "আর যারা ছোট করে কেটেছে (তাদের প্রতিও রহম করুন)।"
5067 - عن عبد الله بن عمر، قال: حلق النبيُّ صلى الله عليه وسلم وطائفةٌ من أصحابه، وقصّر بعضهم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1729) من طريق جويرية بن أسماء، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ورواه مسلم في الحجّ (1301) من حديث اللّيث، عن نافع، به، مثله. وزاد: قال عبد الله (ابن عمر): إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"رحم الله المحلقين" مرة أو مرتين، ثم قال:"والمقصّرين".
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীগণের একটি দল মাথা মুণ্ডন করলেন, আর তাদের মধ্যে কেউ কেউ চুল ছোট করলেন। আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আল্লাহ্ মাথা মুণ্ডনকারীদের উপর রহমত বর্ষণ করুন।"—একবার অথবা দু'বার বললেন, অতঃপর বললেন: "এবং চুল ছোটকারীদের (তাকসীরকারীদের) উপরও।"
5068 - عن ابن عمر، أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم قال يوم الحديبيّة:"اللهمّ! اغفر للمحلّقين" فقال رجلٌ: والمقصّرين؟ فقال:"اللهمّ! اغفر للمحلّقين". فقال: والمقصِّرين؟ . قال: حتى قالها ثلاثًا، أو أربعًا، ثم قال:"وللمقصِّرين".
صحيح: رواه الإمام أحمد (4897، 6384) عن عبد الرزاق، أخبرنا معمر، عن أيوب، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
ورواه ابن أبي شيبة (14/ 452) من وجه آخر عن ابن عمر ضمن قصة الحديبية، وفيه تصريح بأنه صلى الله عليه وسلم قال ذلك يوم الحديبية. كما قال ذلك أيضًا في حجّة الوداع.
ولا منافاة بينهما؛ ولذا لا يحتاج إلى الإنكار في إثبات كونه قال ذلك أيضًا يوم الحديبية؛ لأنّ من أنكر ذلك أسند إلى عدم علمه به، وعدم العلم ليس بعلم كما يقال، فإنّ الصحيح الثابت الذي عليه المحقّقون أنه صلى الله عليه وسلم قال ذلك أولًا في الحديبية، ثم أعاده في حجّة الوداع كما جاء مصرّحًا أيضًا في حديث أمّ الحصين الأسلميّة الآتي.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম হুদায়বিয়ার দিনে বললেন: "হে আল্লাহ! যারা (মাথা) মুণ্ডন করেছে, তাদেরকে ক্ষমা করে দিন।" তখন এক ব্যক্তি বলল: আর যারা চুল ছোট করেছে? তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! যারা (মাথা) মুণ্ডন করেছে, তাদেরকে ক্ষমা করে দিন।" লোকটি আবার বলল: আর যারা চুল ছোট করেছে? বর্ণনাকারী বলেন, এভাবে তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিনবার অথবা চারবার বলার পর বললেন: "আর যারা চুল ছোট করেছে, তাদেরকেও (ক্ষমা করে দিন)।"
5069 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللهمّ! اغفر للمحلقين". قالوا: يا رسول الله، وللمقصِّرين؟ قال:"اللهمّ! اغفر للمحلقين". قالوا: يا رسول الله،
وللمقصِّرين؟ قال:"اللهمّ! اغفر للمحلقين". قالوا: يا رسول الله، وللمقصِّرين؟ قال:"وللمقصِّرين".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1728)، ومسلم في الحجّ (1302) كلاهما من طريق محمد ابن فضيل، حدّثنا عُمارة بن القعقاع، عن أبي زرعة، عن أبي هريرة، فذكره. واللّفظ لمسلم.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "হে আল্লাহ! যারা মাথা মুণ্ডন করে, তাদের ক্ষমা করে দিন।" তারা বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আর যারা চুল ছোট করে (কাটে/ছাঁটে), তাদের?" তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! যারা মাথা মুণ্ডন করে, তাদের ক্ষমা করে দিন।" তারা বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আর যারা চুল ছোট করে, তাদের?" তিনি বললেন: "হে আল্লাহ! যারা মাথা মুণ্ডন করে, তাদের ক্ষমা করে দিন।" তারা বললেন: "হে আল্লাহর রাসূল! আর যারা চুল ছোট করে, তাদের?" তিনি বললেন: "আর যারা চুল ছোট করে (কাটে/ছাঁটে, তাদেরও)।"
5070 - عن أمّ الحصين الأسلميّة، أنّها سمعت النّبيّ صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع دعا للمحلّقين ثلاثًا، وللمقصّرين مرّة.
صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1303) من طريق شعبة، عن يحيى بن الحصين، عن جدّته، أنّها سمعت النبيَّ صلى الله عليه وسلم (فذكرته).
উম্মুল হুসাইন আল-আসলামিয়্যাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, তিনি বিদায় হজ্জের সময় নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মুণ্ডনকারীদের জন্য তিনবার এবং চুল ছোটকারীদের জন্য একবার দু‘আ করতে শুনেছেন।
5071 - عن عبد الله بن عباس قال: حلق رجال يوم الحديبية وقصر آخرون فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يرحم الله المحلِّقين" قالوا: يا رسول الله! والمقصرين؟ قال:"يرحم الله المحلّقين" قالوا: يا رسول الله! والمقصرين؟ قال:"يرحم الله المحلِّقين" قالوا: يا رسول الله والمقصِّرين؟ قال:"والمقصِّرين". قالوا: فما بال المحلِّقين يا رسول الله ظاهرتَ لهم الرّحمة؟ قال:"لم يشكُّوا". قال: فانصرف رسول الله صلى الله عليه وسلم.
حسن: رواه الإمام أحمد (3311)، واللّفظ له، والطّحاويّ في شرح معانيه (4057)، وابن ماجه (3045) مختصرًا، كلّهم من حديث محمد بن إسحاق، حدّثني عبد الله بن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه مدلس حسن الحديث إذا صرّح.
وقوله:"ظاهرت لهم الرحمة" أي جمعت وكررتَ لهم الرّحمة.
وقوله:"لم يشكوا" أي لم يعاملوا معاملة من يشك في جواز الّتحلّل، أي من قصّر فكأنّه شكّ في جواز التّحلل حتى اقتصر في التّحلّل على بعضه، ومن حلق فلا شكّ منه أي لم يعاملوا معاملة من يشك في أنّ الاتباع أحسن، وأمّا من قصر فقد عامله معاملة الشاك في ذلك، حيث ترك فعله صلى الله عليه وسلم. قاله السنديّ في حاشية المسند.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হুদায়বিয়ার দিনে কিছু লোক মাথা মুণ্ডন করেছিল এবং অন্যরা চুল ছোট করেছিল। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "যারা মাথা মুণ্ডন করেছে, আল্লাহ তাদের প্রতি দয়া করুন।" তারা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আর যারা চুল ছোট করেছে? তিনি বললেন: "যারা মাথা মুণ্ডন করেছে, আল্লাহ তাদের প্রতি দয়া করুন।" তারা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আর যারা চুল ছোট করেছে? তিনি বললেন: "যারা মাথা মুণ্ডন করেছে, আল্লাহ তাদের প্রতি দয়া করুন।" তারা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আর যারা চুল ছোট করেছে? তিনি বললেন: "আর যারা চুল ছোট করেছে (তাদের প্রতিও)।" তারা বলল: ইয়া রাসূলাল্লাহ! যারা মাথা মুণ্ডন করেছে, আপনি তাদের জন্য এত বেশি রহমতের কথা বারবার কেন বললেন? তিনি বললেন: "তারা সন্দেহ করেনি।" বর্ণনাকারী বলেন: অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম চলে গেলেন।
5072 - عن مالك بن ربيعة، أنّه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"اللهم! اغفر للمحلقين". قال: يقول رجل من القوم: والمقصرين؟ فقال: يا رسول الله! في الثالثة أو في الرابعة:"والمقصرين". ثم قال: وأنا يومئذ محلوق الرّأس، فما يسرني بحلق رأسي حمر النّعم أو فِطْرًا عظيمًا.
حسن: رواه الإمام أحمد (17598) من حديث أوس بن عبيد الله أبي مقاتل السّلوليّ، قال:
حدّثني بريد بن أبي مريم، عن أبيه مالك بن ربيعة، فذكره.
وفيه أوس بن عبيد الله السّلوليّ من أهل البصرة، ذكره ابن حبان في الثقات (6/ 73) وهو من رجال"التّعجيل" وقد روى عنه جماعة، كما ذكره ابن أبي حاتم في الجرح والتّعديل.
فهو مقبول، وهو كذلك لأنه تابعه حبان بن يسار الكلابيّ، عن يزيد بن أبي مريم، أنه سمع أباه أبا مريم بذكر عن النبيّ صلى الله عليه وسلم أنه في خطبة له (فذكر الحديث).
ومن طريقه رواه الطبرانيّ في"الكبير" (9/ 275)، والأوسط كما في مجمع البحرين (1777). وحسّنه أيضًا الهيثميّ في"المجمع" (3/ 262) وعزاه إلى الأوسط وأحمد ولم يعزُ إلى"الكبير".
وحبان بن يسار الكلابي من رجال"التقريب"، قال فيه الحافظ:"صدوق اختلط".
وأبو مريم كنية مالك بن ربيعة، وله صحبة كما قال ابن معين وغيره، وقد جاء إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم فدعا له النبيّ صلى الله عليه وسلم أن يبارك له في ولده، فولد له ثمانون ذكرًا كما في الإصابة (3/ 344).
وفي الباب ما روي عن أبي سعيد الخدريّ:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أحرم وأصحابه عام الحديبية غير عثمان وأبي قتادة، فاستغفر للمحلِّقين ثلاثًا وللمقصِّرين مرة".
رواه الإمام أحمد (11149)، وأبو يعلى (1263)، والبيهقيّ في الدلائل (4/ 51)، والطّيالسيّ (2224) كلّهم من حديث هشام، عن يحيى (وهو ابن أبي كثير)، عن أبي إبراهيم الأنصاريّ، قال: ثنا أبو سعيد الخدريّ، فذكره.
وأبو إبراهيم هو الأشهليّ المدنيّ، قال فيه أبو حاتم:"لا يدري من هو". الجرح والتعديل (9/ 332)، وبه أعله الهيثميّ في"المجمع" (3/ 262).
ولا يروى عنه غير يحيى بن أبي كثير، ولم يذكره ابن حبان في"الثقات"، ولا في"المجروحين" فهو"مجهول"، ولكن قال فيه الحافظ:"مقبول".
ورواه الطّحاويّ في شرح مشكله (1386) من طريق هارون بن إسماعيل الخزاز، عن علي بن المبارك، قال: حدّثنا يحيى بن أبي كثير، أنّ أبا إبراهيم حدّثه عن أبي سعيد الخدريّ:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم عام الحديبية حلق، وحلق أصحابه رؤوسهم غير رجلين: رجل من الأنصار، ورجل من قريش".
قال الطّحاويّ:"ولم نجد هذا التبيان في حديث أحد ممن روى هذا الحديث عن يحيى بن أبي كثير غير علي بن المبارك، وأمّا الأوزاعيّ فلم يذكر ذلك في حديثه هذا عن يحيي". ثم قال:"وليس علي بن المبارك بدون الأوزاعيّ" انتهى.
وعلي بن المبارك هو الهنائيّ، ثقة، وثقه أبو داود وغيره من رجال الجماعة، ولكن قوله:"ليس بدون الأوزاعيّ" ففيه نظر؛ لأنّ الأوزاعي إمام جليل وفقيه كبير، ثم كان لعلي بن المبارك، عن يحيى بن أبي كثير كتابان: أحدهما سماع، والآخر إرسال. فحديث الكوفيين عنه فيه شيء، والرّاوي عنه هارون بن إسماعيل الخزاز من البصرة.
فقول علي بن المبارك:"غير رجلين: رجل من الأنصار، ورجل من قريش" لم يأت في خبر آخر صحيح.
وأمّا ما ذكر في مسند الإمام أحمد: عثمان وأبو قتادة فهما غير محرمين أصلا، ليسا ممن شكّ فقصر فتنبّه.
وفي الباب أيضًا ما رُوي عن جابر بن عبد الله يقول: حلق رسول الله يوم الحديبية، وحلق ناس كثير من أصحابه حين رأوه حلق، وأمسك آخرون. فقالوا: والله! ما طفنا بالبيت فقصروا: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"يرحم الله المحلِّقين". فقال رجل: والمقصّرين يا رسول الله؟ قال:"رحم الله المحلقين". فقال رجل: والمقصرين يا رسول الله؟"يرحم الله المحلِّقين". فقال رجل: والمقصّرين يا رسول الله؟ قال:"والمقصرين".
رواه الطّحاويّ في"شرح مشكله" (1367) من طريق زمعة بن صالح، عن زياد بن سعد، عن أبي الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول (فذكره).
وزمعة بن صالح الجنديّ اليماني أبو وهب ضعيف عند جماهير أهل العلم. قال ابن حبان:"كان رجلًا صالحًا يهم ولا يعلم، ويخطئ ولا يفهم حتى غلب في حديثه المناكير التي يرويها عن المشاهير""المجروحين".
وفيه بيان لمعنى الشّك.
وفي الباب ما روي أيضًا عن حُبشي بن جنادة -وكان ممن شهد حجّة الوداع- قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اللهم! اغفر للمحلّقين" قالوا: يا رسول الله، والمقصرين؟ قال: اللهم! اغفر للمحلّقين" قالوا: يا رسول الله، والمقصرين؟ قال:"اللهم! اغفر للمحلّقين" قالوا: يا رسول الله: والمقصِّرين؟ قال -في الثالثة-:"والمقصِّرين".
رواه الإمام أحمد (17507)، والطبراني في الكبير (4/ 18) كلاهما من حديث إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن حبشي بن جنادة، قال (فذكره).
وأبو إسحاق مدلس ومختلط، ويقال: إنه لم يسمع من حبشي بن جنادة، ففيه انقطاع.
وفي الباب ما رُوي عن قارب قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"اللهم! اغفر للمحلقين" قال رجل: والمقصرين. قال في الرابعة:"والمقصرين".
رواه الإمام أحمد (27202) عن سفيان، عن إبراهيم بن ميسرة، عن ابن قارب، عن أبيه، قال: فذكره.
ويُقَلِّلُه سفيان بيده قال سفيان: وقال في تيك كأنه يوسع يده.
وابن قارب هو عبد الله وقد حج مع أبيه، وله ولأبيه صحبة ولكن فيه انقطاع، فإن إبراهيم بن ميسرة لم يسمع منه، وإنما سمعه من ولده وهب كما في الرواية الآتية.
ففي مسند البزار - كشف الأستار (1135)، والآحاد والمثاني لابن أبي عاصم (3/ 233) ومن طريقه ابن قانع في المعجم (2/ 85) عن سفيان، عن إبراهيم بن ميسرة، عن وهب بن عبد الله بن قارب، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم فذكره.
ووهب بن عبد الله بن قارب اختلف في صحبته، والصحيح أنه تابعي، ذكره البخاري في التاريخ الكبير (8/ 165)، وابن أبي حاتم في الجرح والتعديل (9/ 22) وقد تفرد بالرواية عنه إبراهيم بن ميسرة، ولم يوثقه غير ابن حبان (3/ 427) فهو في عداد المجهولين. وله أسانيد أخرى كلها تدور عليه، وفي بعضها إرسال. وبالله التوفيق.
মালিক ইবনে রাবী'আহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছেন: "হে আল্লাহ! যারা মাথা মুণ্ডন করে (মুহাল্লিক্বীন), আপনি তাদের ক্ষমা করুন।" বর্ণনাকারী বলেন, তখন উপস্থিত লোকজনের মধ্য থেকে একজন বলল: এবং যারা চুল ছোট করে (মুকাসসিরীন)? (রাসূলুল্লাহ্ উত্তর না দেওয়ায়) সে তৃতীয় বা চতুর্থবার বলল, ইয়া রাসূলাল্লাহ! (তখন তিনি বললেন:) "(তাদেরকেও ক্ষমা করুন, অর্থাৎ) যারা চুল ছোট করে।" অতঃপর তিনি (মালিক ইবনে রাবী'আহ) বললেন: সেদিন আমি ছিলাম মুণ্ডনকারী, তাই আমার এই মাথা মুণ্ডনের বিনিময়ে লাল উট অথবা বিরাট কোনো সম্পদ পেলেও আমি খুশি হতাম না।
5073 - عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ليس على النساء حلق، إنما على النساء التقصير".
صحيح: رواه أبو داود من وجهين: أحدهما (1985) عن أبي يعقوب البغداديّ -ثقة-، حدّثنا هشام بن يوسف، عن ابن جريج، عن عبد الحميد بن جبير بن شيبة، عن صفية بنت شيبة، قالت: أخبرتني أمُّ عثمان بنت أبي سفيان، أنّ ابن عباس، قال (فذكره).
ورواه الدارقطني (2666)، والبيهقيّ (5/ 104) كلاهما من وجهين، عن هشام بن يوسف، عن ابن جريج، قال: أخبرني عبد الحميد بن جبير، بإسناده، مثله.
وإسناده صحيح، ورجاله ثقات، وهشام بن يوسف هو الصنعانيّ أبو عبد الرحمن القاضي ثقة من رجال الصحيح.
وأمّ عثمان بنت سفيان أو أبي سفيان لها صحبة، وكانت من المبايعات كما قال ابن عبد البر.
قال الحافظ في"التقريب":"هي أمّ ولد شيبة بن عثمان لها صحبة وحديث".
وقال في التلخيص (2/ 261): إسناده حسن، وقوّاه أبو حاتم في"العلل" (834)، والبخاريّ في"التاريخ" (6/ 46) وأعلّه ابن القطّان، وردّ عليه ابن المواق فأصاب" انتهى.
أي أعلّه بأمّ عثمان بنت سفيان، فقال:"لا يعرف حالها".
وكذا حسّنه الحافظ ولم يصححه، ولا أعرف له سببًا في ذلك ورجاله كلهم ثقات.
وأما الإسناد الثاني عند أبي داود فهو ما رواه من طريق ابن جريج، قال:"بلغني عن صفية بنت شيبة بن عثمان، قالت (فذكر الإسناد).
وفيه انقطاع بين ابن جريج وبين صفية بنت شيبة.
وأوهم البيهقيّ في إيراد هذا الإسناد في الكبرى بأنّ أبا داود لا يروي إلّا بهذا.
وفي معناه ما رُوي عن علي قال: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تحلق المرأة رأسها.
رواه الترمذيّ (914) عن محمد بن موسى الجرشيّ البصريّ، حدّثنا أبو داود الطّيالسيّ، حدّثنا همام، عن قتادة، عن خِلاص بن عمرو، عن علي، فذكره.
وقال: وحدّثنا محمد بن بشار، حدّثنا أبو داود، عن همام، عن خلاص، نحوه. ولم يذكر فيه"عن علي".
قال الترمذي:"حديث علي فيه اضطراب، ورُوي هذا الحديث عن حماد بن سلمة، عن قتادة، عن عائشة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم نهى أن تحلق المرأة رأسها، والعمل على هذا عند أهل العلم لا يرون على المرأة حلقًا، ويرون أنّ عليها التقصير" انتهى.
قلت: أمّا حديث عائشة، فرواه البزار -كشف الأستار (1137) - وفيه معلي بن عبد الرحمن الواسطيّ، قال البزّار:"لا يتابع على حديثه".
وذكره الهيثميّ في"المجمع" (3/ 263) قال بعد أن عزاه إلى البزار: وفيه معلي بن عبد الرحمن، وقد اعترف بالوضع.
وقال ابن عدي: أرجو أنه لا بأس به.
وفي معناه أيضًا ما رُوي عن عثمان يقول: نهى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن تحلق المرأة رأسها.
رواه البزار -كشف الأستار (1136) - من طريق روح بن عطاء بن أبي ميمونة، حدثني أبي، عن وهب بن عمير، قال: سمعت عثمان يقول (فذكره).
قال البزار:"لا نعلم رُوي وهبٌ إلا هذا، ولا حدّث عنه إلّا عطاء، وروح ليس بالقوي".
وأورده الهيثميّ في"مجمع الزوائد" (3/ 263) بعد أن عزاه للبزار:"فيه روح بن عطاء ضعيف".
وقال ابن المنذر:"أجمعوا أن لا حلق على النساء، إنّما عليهنّ التقصير. وقالوا: ويكره لهن الحلق؛ لأنّه بدعة في حقهن وفيه مثلة" إلّا أنّها لو حلفت أجزأ عنها، وتكون مسيئة، والنهي يحمل على التنزيه.
تقول عائشة رضي الله عنها:"كنا نحجّ ونعتمر، فما نزيد على أن نطرف قدر أصبع".
وعن ابن عمر قال في المحرمة:"تأخذ من شعرها مثل السبابة".
وعن عطاء قال:"تأخذ من عفر رأسها".
هذه الآثار ذكرها البيهقيّ في"الكبري".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নারীদের জন্য মাথা মুণ্ডানো নেই, বরং নারীদের জন্য হলো চুল ছোট করা (তাকসীর)।"
5074 - عن أنس بن مالك: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أتي مني، فأتى الجمرة فرماها، ثم أتي منزله بمنى، ونحر، ثم قال للحلّاق:"خذ" وأشار إلى جانبه الأيمن، ثم الأيسر،
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ثم جعل يعطيه النّاس.
وفي رواية: وأشار بيده إلى الجانب الأيمن هكذا، فقسم شعره بين من يليه. قال: ثم أشار إلى الحلّاق إلى الجانب الأيسر، فحلقه، فأعطاه أمَّ سُليم.
وفي رواية: فبدأ بالشّق الأيمن، فوزّعه الشعرة والشعرتين بين النّاس. ثم قال بالأيسر فصنع به مثل ذلك، ثم قال:"ههنا أبو طلحة؟" فدفعه إلى أبي طلحة.
وفي رواية: وقال بيده عن رأسه، فحلق شقه الأيمن فقسمه فيمن يليه، ثم قال:"احلق الشّق الآخر" فقال:"أين أبو طلحة؟"، فأعطاه إياه.
وفي رواية: ناول الحالق شقّه الأيمن فحلقه، ثم دعا أبا طلحة الأنصاريّ فأعطاه إياه. ثم ناول الشّق الأيسر فقال:"احلق" فحلقه. فأعطاه أبا طلحة فقال:"أقسمه بين النّاس".
متفق عليه: رواه مسلم في الحج (1305: 323، 324، 325، 326) من طرق، عن هشام بن حسان، عن محمد بن سيرين، عن أنس فذكره.
ورواه البخاريّ في الوضوء (171) من حديث ابن عون، عن ابن سيرين، عن أنس بن مالك:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لما حلق رأسه، كان أبو طلحة أوّل من أخذ من شعره".
عرف من رواية ابن عون، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم أعطى أبا طلحة من شعر شقّه الأيمن، وعرف من روايات مسلم أنه أعطاه من شعر شقه الأيمن، ومن شعر شقه الأيسر. كما عرف أيضًا من روايات مسلم أنه أعطى الناس شعر شقّه الأيمن والأيسر. كما عرف أنه أعطى أمّ سليم شعر شقه الأيسر.
فظاهرها التّضارب، ولكن يمكن الجمع بأنه صلى الله عليه وسلم لما حلق شقه الأيمن أعطى أبا طلحة، ولما حلق شقه الأيسر أعطى جزءًا منه لأمّ سُليم، والباقي لأبي طلحة ليقسمه بين الناس.
فقوله في الرّواية الأولى:"ثم جعل يعطيه الناس" أي تولى ذلك أبو طلحة إذ أخذ شعر شقه الأيمن، وشعر شقه الأيسر وقام بتقسيمه على النّاس بأمر النبيّ صلى الله عليه وسلم كما في الرواية الآخرة عند مسلم، وبالله التوفيق.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিনায় আগমন করলেন। অতঃপর তিনি জামারায় এসে কঙ্কর নিক্ষেপ করলেন। এরপর তিনি মিনায় তাঁর আবাসস্থলে এলেন এবং কুরবানি করলেন। এরপর তিনি নাপিতকে বললেন: "ধরো।" এবং তিনি তাঁর ডান দিকে ইঙ্গিত করলেন, এরপর বাম দিকে। তারপর তিনি তা লোকদেরকে দিতে লাগলেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: তিনি তাঁর হাত দিয়ে ডান দিকে এভাবে ইঙ্গিত করলেন, অতঃপর তাঁর চুলগুলো তাঁর নিকটবর্তী লোকদের মধ্যে ভাগ করে দিলেন। বর্ণনাকারী বলেন: এরপর তিনি নাপিতকে বাম দিকে ইঙ্গিত করলেন, ফলে সে তা কেটে দিল। অতঃপর তিনি তা উম্মে সুলাইমকে দিলেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: তিনি ডান পাশ থেকে শুরু করলেন এবং এক বা দুটি চুল করে লোকদের মধ্যে তা বণ্টন করে দিলেন। এরপর তিনি বাম পাশের চুল কাটলেন এবং একই রকম করলেন। এরপর তিনি বললেন: "আবু তালহা কি এখানে আছে?" অতঃপর তিনি তা আবু তালহার হাতে তুলে দিলেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: তিনি তাঁর হাত দিয়ে তাঁর মাথার দিকে ইঙ্গিত করলেন। অতঃপর তিনি তাঁর মাথার ডান অংশ কামালেন এবং তা তাঁর নিকটবর্তী লোকদের মধ্যে বণ্টন করলেন। এরপর বললেন: "অন্য অংশটিও কামাও।" অতঃপর বললেন: "আবু তালহা কোথায়?" এরপর তিনি তা তাকে দিয়ে দিলেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: তিনি নাপিতকে তাঁর ডান পাশ ধরিয়ে দিলেন, আর সে তা কামাল। এরপর তিনি আবু তালহা আনসারী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে ডাকলেন এবং তা তাকে দিলেন। এরপর তিনি বাম পাশ ধরিয়ে দিলেন এবং বললেন: "কেটে ফেলো।" সে তা কেটে দিল। অতঃপর তিনি তা আবু তালহাকে দিলেন এবং বললেন: "এটা লোকদের মধ্যে ভাগ করে দাও।"
5075 - عن عبد الله بن عمرو بن العاص، أنه قال: وقف رسول الله صلى الله عليه وسلم للنّاس بمنى والنّاس يسألونه فجاءه رجلٌ فقال له: يا رسول الله، لم أشعرْ فحلقت قبل أن أنحر؟ فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"انحر ولا حرج". ثم جاءه آخر فقال: يا رسول الله، لم أشعر فنحرت قبل أنْ أرمي؟ قال:"ارْم ولا حرج". قال: فما سُئل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن شيء قُدِّم ولا أُخِّر إلا قال:"افعل ولا حرج".
متفق عليه: رواه مالك في الحجّ (242) عن ابن شهاب الزّهريّ، عن عيسى بن طلحة، عن
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عبد الله بن عمرو بن العاص، فذكره.
ورواه البخاريّ في الحجّ (1736)، ومسلم في الحج (1306: 327) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
وعندهما البخاري (1737) ومسلم من حديث ابن جريج قال: سمعت الزهري بإسناده عن عبد الله بن عمرو حدثه أنه شهد النبي صلى الله عليه وسلم يخطب يوم النحر، فقام إليه رجل فقال: كنت أحسب أن كذا قبل كذا، ثم قام آخر فقال: كنت أحسب أن كذا قبل كذا، حلقت قبل أن أنحر، نحرت قبل أن أرمي، وأشباه ذلك، فقال النبي صلى الله عليه وسلم:"افعل ولا حرج" لهن كلهن، فما سئل يومئذ عن شيء إلا قال:"افعل ولا حرج" واللفظ للبخاري.
وأما مسلم فأبهم لفظ السؤال فقال: لهؤلاء الثلاث، وهؤلاء الثلاث لم يذكرها مسلم قبله، وإنما ذكر الثلاث بعده في حديث محمد بن أبي حفصة، عن الزهري، وجاء فيه: إني حلقت قبل أن أرمي، فقال:"ارم ولا حرج"، وأتاه آخر فقال: إني ذبحت قبل أن أرمي، فقال:"ارم ولا حرج" وأتاه آخر فقال: إني أفضت إلى البيت قبل أن أرمي، فقال:"ارم ولا حرج".
আবদুল্লাহ ইবনে আমর ইবনে আল-আস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মিনার ময়দানে লোকদের জন্য দাঁড়ালেন এবং লোকেরা তাঁকে প্রশ্ন করছিল। তখন তাঁর কাছে এক ব্যক্তি এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি খেয়াল করিনি, তাই কুরবানি করার আগেই মাথা মুণ্ডন করে ফেলেছি? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "কুরবানি করো, এতে কোনো সমস্যা নেই।" অতঃপর অন্য এক ব্যক্তি এসে বলল: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি খেয়াল করিনি, তাই পাথর নিক্ষেপ করার আগেই কুরবানি করে ফেলেছি? তিনি বললেন: "পাথর নিক্ষেপ করো, এতে কোনো সমস্যা নেই।" বর্ণনাকারী বলেন: সেদিন (হজ্জের আমলের) আগে-পিছে করা সম্পর্কিত যা কিছুই রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে জিজ্ঞাসা করা হয়েছে, তিনি কেবল বলেছেন: "করে নাও, এতে কোনো সমস্যা নেই।"
5076 - عن جابر بن عبد الله: أنّ رجلًا قال: يا رسول الله، ذبحتُ قبل أن أرمي قال:"ارْمِ ولا حرج". قال رجلٌ: يا رسول الله، حلقتُ قبل أن أذبح؟ قال:"اذبح ولا حرج".
صحيح: رواه الإمام أحمد (15133)، وابن حبان (3878)، والبيهقيّ (1435) كلّهم من طرق عن حماد بن سلمة، عن قيس بن سعد، عن عطاء بن أبي رباح، عن جابر بن عبد الله، فذكره.
وعلقه البخاريّ عقب حديث ابن عباس (1722) عن حماد، عن قيس بن سعد، وعباد بن منصور، عن عطاء، عن جابر، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، ولم يذكر لفظه. وإسناده صحيح.
ورواه ابن ماجه (3052)، والإمام أحمد (14498)، كلاهما من وجه آخر عن أسامة بن زيد، قال: حدثني عطاء بن أبي رباح، به، ولفظه: قعد رسول الله صلى الله عليه وسلم بمنى يوم النّحر للنّاس، فجاءه رجل فقال: يا رسول الله، إنّي حلقتُ قبل أن أذبح، قال:"لا حرج". ثم جاءه آخر فقال: يا رسول الله، إنّي نحرت قبل أن أرمي، قال:"لا حرج". فما سئل يومئذ عن شيء قُدِّم قبل شيء إلّا قال:"لا حرج". لفظ ابن ماجه.
وزاد أحمد:"عرفة كلّها موقف، والمزدلفة كلّها موقف ....".
وأسامة بن زيد هو اللّيثيّ مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وقد توبع في الإسناد الأوّل.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এক ব্যক্তি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম), আমি (জামারায়) কংকর নিক্ষেপের (রামি) আগেই কুরবানি করে ফেলেছি। তিনি বললেন, "এখন কংকর নিক্ষেপ করো, এতে কোনো সমস্যা নেই।" আরেক ব্যক্তি বললেন, হে আল্লাহর রাসূল, আমি কুরবানি করার আগেই মাথা মুণ্ডন (হাল্ক) করে ফেলেছি? তিনি বললেন, "এখন কুরবানি করো, এতে কোনো সমস্যা নেই।"
5077 - عن أسامة بن شريك، قال: خرجتُ مع النبيّ صلى الله عليه وسلم حاجًّا، فكان النّاسُ يأتونه، فمن قال: يا رسول الله، سعيتُ قبل أن أطوف، أو قدّمت شيئًا أو أخّرت شيئًا،
فكان يقول:"لا حرج، لا حرج إلّا على رجل اقترض عرض رجل مسلم وهو ظالم. فذلك الذي حرج وهلك".
صحيح: رواه أبو داود (2015) ومن طريقه البيهقيّ (5/ 146) وصححه ابن خزيمة (2774 (كلّهم من حديث جرير، عن أبي إسحاق (وهو الشيباني)، عن زياد بن علاقة، عن أسامة بن شريك، فذكره.
قال البيهقيّ:"هذا اللفظ:"سعيت قبل أن أطوف غريب! تفرّد به جرير عن الشيباني، فإن كان محفوظًا فكأنّه سأله عن رجل سعي عقيب طواف القدوم قبل طواف الإفاضة، فقال: لا حرج".
وتعقبه ابن التركمانيّ فقال:"هذه الصورة مشهورة، وهي التي فعلها النبيّ صلى الله عليه وسلم فالظاهر أنه لا يسأل عنها، وإنما سأل عن تقديم السعي على طواف الإفاضة، وعموم قول الصحابي:"فما سئل عن شيء قدِّم ولا أخر إلا قال: افعل ولا حرج" يدل على جواز ذلك، وهو مذهب عطاء والأوزاعي واختاره ابن جرير الطبري في تهذيب الآثار، وظهر بهذا أن الشافعي وأكثر العلماء تركوا العمل بعموم الحديث كما تقدم".
قلت: وما قاله ابن التركماني هو المتجه، وهو الذي فهمه أيضًا ابن خزيمة فبوّب بقوله:"إسقاط الحرج عن السّاعي بين الصّفا والمروة قبل الطّواف بالبيت جهلًا، بأن الطّواف بالبيت قبل السّعي" ثم ذكر الحديث. وبه قال أحمد في رواية إنْ كان ناسيًا.
قلت: إنّ الله قد علمَ بأن الحج سيكون فيه مشقة فوضع الحرج والضيق عن عباده، كما جاء في حديث أبي سعيد الخدريّ.
ولأسامة بن شريك حديث طويل بإسناد صحيح. رواه الإمام أحمد (18454) وغيره، وسيأتي في موضعه، وفيه: وسألوه عن أشياء هل علينا حرج في كذا وكذا؟ فقال:"عباد الله، وضع الله الحرج إلا امرأ اقترض امرأ مسلمًا ظلما، فذلك حرْج وهُلْك".
فكان أسامة بن شريك يحدث أحيانًا بجزء من الحديث كما سبق، وكما رواه الطحاويّ في شرحه (2/ 236) من وجه آخر عن أسباط بن محمد، قال: ثنا أبو إسحاق الشّيبانيّ، بإسناده، وفيه: سئل عمن حلق قبل أن يذبح أو ذبح قبل أن يحلق؟ فقال:"لا حرج" فلما أكثروا عليه قال:"يا أيّها النّاس، قد رفع الحرج إلا من اقترض من أخيه شيئًا ظلمًا فذلك الحرج".
فكلُّ شيء من تقديم وتأخير جاء في حديث أسامة بن شريك منصوصًا يحمل على الحقيقة بدون تأويل كذا وكذا.
উসামা ইবনু শারীক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে হজ্জের উদ্দেশে বের হলাম। তখন লোকেরা তাঁর (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আসত। কেউ জিজ্ঞেস করত, ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি তাওয়াফ করার আগেই সা’ঈ করে ফেলেছি, অথবা কোনো কিছু আগে করে ফেলেছি কিংবা কোনো কিছু পরে করে ফেলেছি (এতে কি কোনো সমস্যা হবে?)। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলতেন: "কোনো সমস্যা নেই, কোনো সমস্যা নেই। তবে সেই ব্যক্তি ছাড়া, যে অন্যায়ভাবে কোনো মুসলিমের মান-সম্মান ছিনিয়ে নিয়েছে। সেই ব্যক্তিই সংকটে পড়েছে এবং ধ্বংস হয়েছে।"
5078 - عن ابن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قيل له: في الذّبح، والحلق، والرّمي، والتّقديم والتّأخير، فقال:"لا حرج".
وفي رواية: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يُسأل يوم النّحر بمنى فيقول:"لا حرج". فسأله رجلٌ، فقال: حلقتُ
قبل أن أذبح، قال:"اذبحُ ولا حرج". وقال: رميتُ بعد ما أمسيت، فقال:"لا حرج".
وفي رواية: قال رجل للنبيّ صلى الله عليه وسلم: زُرْت قبل أن أرمي، قال:"لا حرج". قال:"حلقتُ قبل أن أذبح؟". قال:"لا حرج". قال: ذبحتُ قبل أن أرمي، قال:"لا حرج".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1734)، ومسلم في الحج (1307) كلاهما من طريق وهيب، حدثنا عبد الله بن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس، به، ولفظهما سواء.
والرواية الثانية عند البخاريّ في الحج (1735) من طريق خالد بن مهران الحذّاء، عن عكرمة، عن ابن عباس.
والرواية الثالثة عند البخاري أيضًا في الحج (1722) من طريق عطاء بن أبي رباح، عن ابن عباس.
قوله:"زُرت" أي طواف الزيارة، وهو طواف الإفاضة.
ورواه البيهقيّ (5/ 142 - 143) من حديث إبراهيم بن طهمان، عن خالد الحذّاء، عن عكرمة، عن ابن عباس، أنه قال (فذكر الحديث).
وزاد فيه:"فما علمته سئل عن شيء يومئذ إلا قال:"لا حرج" ولم يأمر بشيء من الكفارة" قال: هذا إسناد صحيح" انتهي.
قلت: هذا الحديث أخرجه أيضًا البخاريّ (1723)، وأبو داود (1983)، والإمام أحمد (1858) كلّهم من أوجه أخر، عن خالد الحذاء، ولم يذكروا فيه:"ولم يأمر بشيء من الكفارة".
ولذا قال ابن التركمانيّ:"هذه الزيادة غريبة جدًا! لم أجدها في شيء من الكتب المتداولة بين أهل العلم، وشيخ البيهقيّ وشيخ شيخه لم أعرف حالهما بعد الكشف والتتبع، وأيضًا إبراهيم بن طهمان وإن خُرِّج له في الصحيح فقد تكلّموا فيه" وأطال الكلام فيه.
قلت: هذه الزيادة من حيث الفقه صحيحة، ولكن كثيرًا ما يتصرّف البيهقي رحمه الله في الصناعة الحديثية التي هي موضع النقد من أهل العلم، كما في هذه المسألة فقد قال جماعة من أهل العلم: إنّ التمسّك بظاهر هذه الأحاديث مخالف لقوله تعالى: {وَلَا تَحْلِقُوا رُءُوسَكُمْ حَتَّى يَبْلُغَ الْهَدْيُ مَحِلَّهُ} [البقرة: 196].
ولذا قال ابن التركمانيّ:"وقد ترك أكثر الفقهاء العمل بعموم هذه الأحاديث، ونقل عن مالك أن من حلق قبل أن يرمي فعليه دم". وأطال الكلام فيه.
وقد توسّعت في بيان مذاهب العلماء في"المنة الكبرى" (4/ 267 - 275)، وخلاصته أن من قدَّم نُسكًا على نسك سواء في ذلك كان ناسيًا، أو جاهلًا، أو عامدًا فلا شيء عليه؛ لأنّ وجوب الفدية يحتاج إلى دليل ولو كانت واجبة لبيّنها رسول الله صلى الله عليه وسلم لأنّ تأخير البيان عن وقت الحاجة لا يجوز كما قرّره الأصوليّون.
هذا رأي جمهور أهل العلم منهم: الشافعي، وأحمد، وإسحاق، وداود الظاهريّ، وفقهاء أهل
الحديث في الشّرق والغرب.
قال ابن حزم في"المحلي" (7/ 264 - 265) بعد ذكر أقوال الفقهاء في إيجاب الدّم على من قدَّم شيئًا أو أخّر شيئًا:"كلّ هذه الأقوال في غاية الفساد؛ لأنّها كلّها دعاوية بلا دليل، لا من قرآن، ولا من سنة، ولا من قياس، ولا من رأي سديد".
وأمّا ما روي عن ابن عباس: من قدّم شيئًا من حجّه أو أخره فليهرق بذلك دمًا". فهو ضعيف كما قال ابن حزم في"المحلي" وابن عبد البر في التمهيد (7/ 277)، وابن حجر في الفتح (3/ 573). انظر للمزيد:"المنة الكبرى" ففيه كثير من التفاصيل.
وفي الباب عن أبي سعيد قال: سئل رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو بين الجمرتين عن رجل حلق قبل أن يرمي، فقال:"لا حرج". وعن رجل ذبح قبل أن يرمي، قال:"لا حرج". ثم قال:"عباد الله، وضع الله عز وجل الحرج والضيق، وتعلموا مناسككم فإنّها من دينكم".
رواه الطحاوي في شرح المعاني (2/ 237) من طريق الحجاج، عن عبادة بن نسي، قال: حدثني أبو زبيد، قال: سمعت أبا سعيد الخدري، قال (فذكره). لم أستطع تعيين الحجّاج من هو؟
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে কুরবানী, মাথা মুণ্ডন, কংকর নিক্ষেপ (রমী), এবং আগে-পিছে করা (অগ্রাধিকার বা বিলম্বন) সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বললেন: "এতে কোনো দোষ নেই (বা অসুবিধা নেই)।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে মিনাতে নহরের দিন (কুরবানীর দিন) জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বলতেন: "কোনো দোষ নেই।" অতঃপর একজন লোক তাঁকে জিজ্ঞেস করে বলল: আমি কুরবানী করার আগেই মাথা মুণ্ডন করে ফেলেছি। তিনি বললেন: "এখন কুরবানী কর, আর কোনো দোষ নেই।" আরেকজন বলল: আমি সন্ধ্যা হওয়ার পর কংকর নিক্ষেপ করেছি। তিনি বললেন: "কোনো দোষ নেই।"
অন্য এক বর্ণনায় আছে: একজন লোক নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলল: আমি কংকর নিক্ষেপের আগে (তাওয়াফে) যিয়ারত করেছি। তিনি বললেন: "কোনো দোষ নেই।" সে বলল: "আমি কুরবানী করার আগে মাথা মুণ্ডন করেছি?" তিনি বললেন: "কোনো দোষ নেই।" সে বলল: আমি কংকর নিক্ষেপের আগে কুরবানী করেছি। তিনি বললেন: "কোনো দোষ নেই।"
5079 - عن حفصة أمّ المؤمنين، أنّها قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: ما شأن النّاس حلُّوا، ولم تحللْ أنت من عمرتك؟ فقال:"إنّي لبدتُ رأسي، وقلّدتُ هدي، فلا أحلّ حتى أنحر".
متفق عليه: رواه مالك في الحج (180) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، عن حفصة، فذكرته.
ورواه البخاريّ في الحج (1566)، ومسلم في الحج (1229: 176) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
وهذا خاص للقارن الذي ساق الهدي بخلاف المتمتع والمفرد إن أراد الذبح أو القارن الذي لم يسق الهدي فهم مخيرون في التقديم والتأخير كما جاء في الأحاديث الصحيحة:"افعل ولا حرج".
وقيل: إنّ قوله صلى الله عليه وسلم:"افعل ولا حرج" يشمل جميع الحالات تيسيرًا من الله وتخفيفًا منه.
হাফসা উম্মুল মুমিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: লোকেদের কী হলো যে তারা ইহরাম খুলে ফেলেছে, অথচ আপনি আপনার উমরাহ থেকে ইহরাম খুলেননি? তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আমি আমার চুল জট পাকিয়েছি এবং আমার কুরবানীর পশুকে চিহ্নিত করেছি (মালা পরিয়েছি), সুতরাং আমি কুরবানী না করা পর্যন্ত ইহরাম খুলব না।"
5080 - عن نافع أنّ ابن عمر أراد الحج عام نزل الحجاج بابن الزبير فقيل له: إنّ النّاس كائن بينهم قتالٌ، وإنّا نخافُ أن يصدُّوكَ؟ فقال: {لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ} أصنع كما صنع رسول الله صلى الله عليه وسلم إني أشهدكم أني قد أوجبت عمرة ثم خرج حتى إذا كان بظاهر البيداء قال: ما شأن الحج والعمرة إلا واحد، اشهدوا (قال ابن رمح أشهدكم) أني قد أوجبت حجًّا مع عمرتي. وأهدى هديا اشتراه بقُدَيْد، ثم انطلق يُهلُّ بهما جميعًا، حتى قدم مكّة فطاف بالبيت وبالصّفا والمروة.
ولم يزدْ على ذلك، ولم ينحرْ، ولم يحلق ولم يُقصِّرْ، ولم يحِللْ من شيء حرُم منه. حتى كان يوم النَّحر، فنحر وحلقَ، ورأى أن قد قضى طوافَ الحجِّ والعمرة بطوافه الأوّل.
وقال ابن عمر: كذلك فعل رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1640)، ومسلم في الحج (1230: 182) كلاهما عن قتيبة، حدثنا الليث، عن نافع، به. واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ قريب منه.
আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাফি' বর্ণনা করেন যে, ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই বছর হজ্জের ইচ্ছা করলেন যখন হাজ্জাজ (ইবনে ইউসুফ) ইবনে যুবাইর-এর সাথে (যুদ্ধ করার জন্য) অবতীর্ণ হয়েছিল। তখন তাঁকে বলা হলো: "মানুষের মধ্যে যুদ্ধ শুরু হবে, আর আমরা ভয় পাচ্ছি যে তারা হয়তো আপনাকে (মক্কায় প্রবেশ করতে) বাধা দেবে?" তিনি বললেন: "তোমাদের জন্য আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর মধ্যে রয়েছে উত্তম আদর্শ।" আমি তাই করব যা আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) করেছিলেন। (তিনি আরও বললেন:) আমি তোমাদের সাক্ষী রাখছি যে আমি উমরার ইহরাম বেঁধেছি। এরপর তিনি বের হলেন। যখন তিনি বাইদা নামক স্থানের উপরিভাগে পৌঁছলেন, তখন বললেন: "হজ্জ ও উমরার বিষয় একই (সংযুক্ত)। তোমরা সাক্ষী থাকো যে, আমি আমার উমরার সাথে হজ্জেরও ইহরাম বাঁধলাম।" তিনি কুদাইদ নামক স্থান থেকে ক্রয় করা একটি কুরবানীর পশু (হাদি) সঙ্গে নিলেন, অতঃপর সে দুটো (হজ্জ ও উমরা) এর তালবিয়া পাঠ করতে করতে চললেন, অবশেষে মক্কায় পৌঁছলেন। এরপর তিনি বাইতুল্লাহ এবং সাফা-মারওয়ার সাঈ করলেন। এর চেয়ে বেশি কিছু তিনি করলেন না। তিনি কুরবানী করলেন না, মাথা মুণ্ডন বা চুল ছোটও করলেন না, এবং ইহরামের কারণে যা কিছু নিষিদ্ধ ছিল, তা থেকে হালাল হলেন না। অবশেষে যখন ইয়াওমুন নাহর (কুরবানীর দিন) আসল, তখন তিনি কুরবানী করলেন এবং মাথা মুণ্ডন করলেন। তিনি মনে করলেন যে প্রথম তাওয়াফের মাধ্যমেই তাঁর হজ্জ ও উমরার তাওয়াফ সম্পন্ন হয়ে গেছে। ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-ও অনুরূপ করেছিলেন।
(হাদীসটি মুত্তাফাকুন আলাইহি। বুখারী ১৬৪০, মুসলিম ১২৩০)