হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5081)


5081 - عن عائشة قالت: كنتُ أطيِّبُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم لإحرامه قبل أن يحرم، ولحلِّه قبل أن يطوف بالبيت.

متفق عليه: رواه مالك في الحجّ (17) عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.

ورواه البخاريّ في الحج (1539)، ومسلم في الحج (1189: 33) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে তাঁর ইহরামের জন্য সুগন্ধি মাখাতাম, ইহরাম বাঁধার পূর্বে; এবং হালাল হওয়ার জন্য সুগন্ধি মাখাতাম, বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করার পূর্বে।









আল-জামি` আল-কামিল (5082)


5082 - عن عائشة، قالت: طيّبتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم لحُرمِه حين أحرم، ولحلِّه بعدما رمي جمرة العقبة، قبل أن يطوف.

صحيح: رواه النسائيّ (2687) عن سعيد بن عبد الرحمن أبي عبيد الله المخزوميّ، قال: حدّثنا سفيان، عن الزهريّ، عن عروة، عن عائشة، فذكرته. وإسناده صحيح.

ورواه الإمام أحمد (26078) من وجه آخر عن ابن جريج، أخبرني عمر بن عبد الله بن عروة، أنه سمع عروة والقاسم يخبران عن عائشة قالت:"طيبتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم بيدي بذريرة لحجة الوداع للحل والإحرام حين أحرم، وحين رمي جمرة العقبة يوم النّحر قبل أن يطوف بالبيت" وإسناده صحيح. ورواية القاسم في الصّحيحين بدون ذكر رمي جمرة العقبة.

فقول عائشة:"بعد ما رمي جمرة العقبة قبل أن يطوف بالبيت" يحمل على بعد ما رمي وذبح وحلق، واستثنى منه الطواف فقط؛ لأنّ هذا هو الترتيب الذي عمل به النبيّ صلى الله عليه وسلم يوم النحر، وعليه يحمل قولها أيضًا:"لحلّه قبل أن يطوف" أي بعد رميه الجمرة والذبح والحلق، قبل الطواف، كما بيّن ذلك ابن عمر، وكما فسّره بذلك ابن خزيمة كما سيأتي.

وأمّا ما رُوي عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا رمي أحدكم جمرة العقبة فقد حلّ له كلّ شيء إلّا النّساء" فهو ضعيف؛ لأنّ الصّحيح أنه من فعله كما مضى لا من قوله.

رواه أبو داود (1978) عن مسدّد، حدّثنا عبد الواحد بن زياد، حدّثنا الحجاج، عن الزهريّ،
عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة، فذكرته.

قال أبو داود:"هذا حديث ضعيف، الحجاج لم ير الزهري ولم يسمع منه".

قلت: وهو كما قال، فإنّ الحجاج بن أرطاة مدلس كما أنه وُصف بكثرة الخطأ. وهذا من خطئه فقد رواه غيره من فعل النبيّ صلى الله عليه وسلم لا من قوله، وهو المشهور الثابت من طرق، عن عائشة رضي الله عنها.

ومن أخطائه أيضًا ما رواه ابن خزيمة (2937)، والبيهقيّ (5/ 136) من وجه آخر عن الحجاج ابن أرطاة، عن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، عن عمرة، عن عائشة، مرفوعًا:"إذا رميتم وحلفتم فقد حلّ لكم كلّ شيء الطيب والثياب إلّا النساء".

فزاد فيه:"وحلقتم". قال البيهقيّ:"وهذا من تخليطات الحجاج بن أرطاة، وإنما الحديث عن عمرة، عن عائشة، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم كما رواه سائر الناس، عن عائشة".

وهو يقصد به ما رواه سائر الرواة من حديث عائشة أنها كانت تطيب رسول الله صلى الله عليه وسلم لحرمة إذا أحرم، ولحله قبل أن يطوف بالبيت، كما مضى حديث القاسم بن محمد، وكذلك رواه عروة في الصحيحين، وسالم بن عبد الله. رواه البيهقيّ (5/ 135 - 136) وفيه قول سالم: وسنة رسول الله أحقّ أن تتبع. انظر للمزيد:"المنة الكبرى" (4/ 281).




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামকে তাঁর ইহরামের জন্য সুগন্ধি লাগিয়ে দিতাম যখন তিনি ইহরাম বাঁধতেন, এবং তাঁর হালাল হওয়ার (ইহরামমুক্তির) জন্য জামরাতুল আকাবায় কঙ্কর নিক্ষেপের পর, বায়তুল্লাহর তাওয়াফ করার পূর্বে সুগন্ধি লাগিয়ে দিতাম।









আল-জামি` আল-কামিল (5083)


5083 - عن عائشة قالت: كنت أطيب النبيّ صلى الله عليه وسلم بعد ما يرمي الجمرة قبل أن يفيض إلى البيت. قال سالم: فسنة رسول الله صلى الله عليه وسلم أحقّ أن نأخذ بها من قول عمر.

حسن: رواه الإمام أحمد (24750) عن مؤمل، قال: حدثنا سفيان، عن عمرو بن دينار، قال سالم، قالت عائشة، فذكرته.

وإسناده حسن من أجل الكلام في مؤمل وهو ابن إسماعيل وصف بسوء الحفظ، إلا أنه في روايته عن سفيان الثوريّ ثقة كما قال ابن معين.

وقول سالم:"سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم أحقّ أن نأخذ بها من قول عمر". لأنّ عمر بن الخطاب رضي الله عنه كان يقول:"إذا رميتم الجمرة وذبحتم فقد حلّ لكم كلّ شيء حرم عليكم إلّا النساء والطّيب".

رواه عبد الرزاق ومن طريقه ابن خزيمة (2939)، والبيهقي (5/ 135) عن معمر، عن الزهري، عن سالم، عن ابن عمر، عن عمر، كان يقول (فذكره).

قال ابن خزيمة:"وقول عائشة:"طيبت رسول الله صلى الله عليه وسلم لحله قبل أن يطوف بالبيت" دلالة على أنه إذا رمي الجمرة وذبح وحلق كان حلالًا قبل أن يطوف بالبيت، خلا ما زجر عنه من وطئ النساء الذي لم يختلف العلماء فيه أنه ممنوع من وطء النساء حتى يطوف طواف الزيارة".




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে সুগন্ধি মাখিয়ে দিতাম জামরায় কংকর নিক্ষেপ করার পর, তবে বায়তুল্লাহর তাওয়াফের (তাওয়াফে ইফাদার) জন্য যাওয়ার আগে। সালিম (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন, উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তির চেয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সুন্নাহ অনুসরণ করাই আমাদের জন্য অধিক হকদার।









আল-জামি` আল-কামিল (5084)


5084 - عن ابن عمر، قال: ثم لم يحلل من شيء حرم منه حتى فضي حجّه، ونحر هديه يوم النّحر، وطاف بالبيت، ثم حلَّ من كلّ شيء حرم منه: وفعل مثل ما فعل
رسول الله صلى الله عليه وسلم من أهدي وساق الهدي من الناس.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1691)، ومسلم في الحج (1227) كلاهما من حديث الليث، حدثني عقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن سالم، أنّ عبد الله بن عمر قال: فذكره في حديث طويل، ذكر في موضعه.

وقوله:"وطاف بالبيت" يقصد به التحلل الثاني.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এরপর তিনি (ইবনে উমর) তাঁর জন্য যা হারাম ছিল, তা থেকে হালাল হননি, যতক্ষণ না তিনি তাঁর হজ সম্পন্ন করেন। আর কুরবানীর দিন তিনি তাঁর কুরবানী (হাদী) জবাই করেন এবং বায়তুল্লাহ শরীফ তাওয়াফ করেন। এরপর তিনি সেই সমস্ত বস্তু থেকে হালাল হয়ে যান যা তাঁর জন্য হারাম ছিল। এবং যেসব লোক হাদীর পশু নিয়ে এসেছিল, তিনি (ইবনে উমর) রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম যা করেছিলেন, ঠিক তাই করেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5085)


5085 - عن عبد الله بن الزبير قال: من سنَّة الحجِّ أن يصلي الإمام الظّهر والعصر والمغرب والعشاء الآخرة والصبح بمنى، ثم يغدو إلى عرفة فيقيل حيث قضى له حتّى إذا زالت الشّمسُ خطب النّاس، ثم صلّي الظّهر والعصرَ جميعًا، ثم وقف بعرفات حتى تغيب الشّمس، ثم يفيض فيصلي بالمزدلفة أو حيث قضى الله، ثم يقف بجمع حتى إذا أسفر دفع قبل طلوعِ الشّمس، فإذا رمي الجمرة الكبرى حلّ له كلُّ شيء حرم عليه إلا النّساء والطّيب حتى يزور البيت.

صحيح: رواه ابن خزيمة (2800، 2801)، والحاكم (1/ 461)، والبيهقي (5/ 122) كلّهم من حديث يحيي بن سعيد، عن القاسم بن محمد، عن عبد الله بن الزبير، قال (فذكره).

ورواه ابن خزيمة أيضًا (2801) عن محمد بن الوليد، ثنا يزيد -يعني ابن هارون-، أخبرنا يحيي بن سعيد بإسناده وقال: وربما اختلفا في الحرف والشيء. وقال:"حلّ له ما حرم عليه إلّا النّساء حتى يطوف بالبيت".

قال ابن خزيمة:"وهذا هو الصّحيح إذا رمي الجمرة حلّ له كلّ شيء خلا النساء؛ لأنّ عائشة خبرت أنها طيّبت النبيّ صلى الله عليه وسلم قبل نزول البيت".

فالصّواب هو ما ذكره يزيد بن هارون عن يحيى: النساء فقط دون الطّيب.

ولكن يعكر على هذا ما رواه الحاكم (1/ 461) وعنه البيهقي (5/ 122) من طريق إبراهيم بن عبد الله، عن يزيد بن هارون، بإسناده وذكر فيه مع النساء الطيب أيضًا، وقال:"هذا حديث على شرط الشيخين".

وهذا وهم منه؛ فإنّ إبراهيم بن عبد الله -وهو ابن بشار الواسطيّ- ليس من رجال الشيخين، ولا من رجال التهذيب، وإنما ترجمه الخطيب (6/ 120) ولم يذكر فيه جرحًا ولا تعديلًا، فهو في عداد المجهولين.

فلعلّ ذكر الطيب يعود إليه؛ لأنّ محمد بن محمد شيخ ابن خزيمة لم يذكر الطبيب، وهو الذي رجّحه ابن خزيمة كما سبق.

وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس مرفوعًا وموقوفًا، بلفظ:"إذا رميتم الجمرة فقد حلّ لكم كلّ
شيء إلّا النساء. فقال رجل: يا ابن عباس، والطيب؟ فقال: أما أنا فقد رأيتُ رسول الله صلى الله عليه وسلم يُضمّخ رأسه بالمسك، أفطيب ذلك أم لا؟".

رواه النسائيّ (3084)، وابن ماجه (3041)، والإمام أحمد (2090، 3204، 3491)، والبيهقيّ (5/ 204) كلّهم من طرق، عن سلمة بن كهيل، عن الحسن العرني، عن ابن عباس، فذكره.

والحسن العرني لم يسمع من ابن عباس، بل لم يدركهـ كما قال أبو حاتم، كما اختلف في رفعه ووقفه، والصّحيح أنه موقوف مع انقطاع فيه. انظر للمزيد من التخريج في"المنة الكبرى" (4/ 281).



فقه الباب:

يستفاد من أحاديث هذا الباب أنّ التحلل الأول يحصل بمجرد رمي جمرة العقبة، وهي رواية عبد الله، عن أبيه أحمد كما في مسائل الإمام أحمد (ص 241)، وهي رواية ابن منصور عنه أيضًا. وبه قال أيضًا الشافعي في الأم (1/ 221).

والدّليل عليه حديث ابن عباس:"إذا رميتم الجمرة فقد حلّ لكم كلّ شيء". وكذلك في حديث عائشة عند أبي داود، وهو ضعيف كما مضى.

والرواية الثانية عند الإمام أحمد: التحلل الأوّل يحصل بالرّمي والحلق. قال القاضي: وهي أصح الروايتين، ورجّح ابن قدامة الرواية الأولى. انظر:"المغني" (3/ 393).

وعند الشافعية المذهب الذي يفتي به أنّ التحلل يحصل باثنين من الثلاثة، وقيل بالاثنين من الأربعة، وهي: الرمي والحلق والذبح والطواف. قاله النووي في"المجموع" (8/ 231).

وإن قدّم الحاج طواف الإفاضة على الرّمي والحلق أو التقصير فلا تحل له النساء، فإن الطواف وحده لا يكفي، ولا بد من رمي الجمرة يوم العيد والحلق أو التقصير، والسعي إن كان عليه السعي.

فإنه لا بد من اجتماع الثلاثة لحلّ جماع النساء، كذا في فتاوي سماحة الشيخ ابن باز رحمه الله تعالي.

وأما أبو حنيفة فعنده لا يحصل التحلل الأول إلا باجتماع الثلاثة، وهي: الرمي والذبح والحلق أو التقصير، كما قرّره الجصّاص.

وأما مالك فيرى أنّ التحلّل يحصل بمجرد الرّمي إلا أنه يحرم عليه الطبيب والنساء، وقد سبق أن ردّت عائشة على عمر في منع الطيب.

وسبب الخلاف في هذا أن أحاديث هذا الباب متعارضة في ظاهرها، فكلٌّ أخذ بما وصل إليه، وترك ما يخالفه، ومنهم من جمع بينها، فأخذ بمجموعها مثل الإمام أحمد رحمه الله تعالي.

انظر مزيدًا من التفصيل في"المنة الكبرى" (4/ 278 - 279).




আবদুল্লাহ ইবনুয যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হজ্জের সুন্নত হলো এই যে, ইমাম মিনার মধ্যে যোহর, আসর, মাগরিব, ইশা ও ফজর সালাত আদায় করবেন। এরপর তিনি আরাফার উদ্দেশ্যে গমন করবেন এবং তার জন্য যেখানে নির্ধারিত হয়, সেখানে বিশ্রাম নিবেন। অতঃপর যখন সূর্য হেলে যাবে (যাওয়াল হবে), তিনি লোকদের উদ্দেশ্যে ভাষণ দেবেন। এরপর যোহর ও আসর সালাত একত্রে আদায় করবেন। এরপর সূর্য অস্ত যাওয়া পর্যন্ত আরাফাতের ময়দানে অবস্থান করবেন। অতঃপর তিনি (সেখান থেকে) রওয়ানা হবেন এবং মুজদালিফায় অথবা আল্লাহ তার জন্য যা নির্দিষ্ট করেছেন সেখানে সালাত আদায় করবেন। এরপর তিনি (মুজদালিফায় তথা) জাম’এ অবস্থান করবেন। এমনকি যখন ফর্সা হয়ে যাবে (ভোর হবে), তখন সূর্যোদয়ের আগেই সেখান থেকে রওনা হবেন। এরপর যখন তিনি বড় জামরায় (জামরাতুল আকাবায়) পাথর নিক্ষেপ করবেন, তখন বাইতুল্লাহর তাওয়াফ না করা পর্যন্ত স্ত্রী এবং সুগন্ধি ব্যতীত তার জন্য হারাম হওয়া সকল কিছু হালাল হয়ে যাবে।









আল-জামি` আল-কামিল (5086)


5086 - عن عائشة، قالت: حججنا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم فأفضنا يوم النّحر.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1733) من طريق الأعرج (هو عبد الرحمن بن هرمز)، حدثني أبو سلمة بن عبد الرحمن، عن عائشة، فذكرته.

ورواه مسلم في الحج (1211: 120) من طريق عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته بطوله، وفيه قالت:"فلما كان يوم النحر طهرتُ، فأمرني رسول الله صلى الله عليه وسلم فأفضت".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে হজ্জ করেছি এবং কুরবানীর দিন (নাহরের দিন) তাওয়াফে ইফাদাহ সম্পন্ন করেছি।









আল-জামি` আল-কামিল (5087)


5087 - عن عبد الله بن عمر: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أفاض يوم النّحر، ثم رجع فصلّي الظهر بمني.

قال نافع: فكان ابن عمر يُفيض يوم النّحر، ثم يرجع فيصلي الظهر بمنى، ويذكرُ أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم فعله.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1308) عن محمد بن رافع، حدّثنا عبد الرزاق، أخبرنا عبيد الله ابن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.

ورواه البخاريّ في الحج (1732) موقوفًا قائلًا: وقال لنا أبو نعيم (هو الفضل بن دكين) حدّثنا سفيان، عن عبيد الله (هو ابن عمر)، عن نافع، عن ابن عمر، أنه طاف طوافًا واحدًا، ثم يقيل، ثم يأتي مني يعني يوم النّحر.

ثم قال البخاريّ: ورفعه عبد الرزاق، أخبرنا عبيد الله (يعني ابن عمر).

قال الحافظ ابن حجر في الفتح (3/ 568):"وصله ابن خزيمة، والإسماعيلي من طريق عبد الرزاق، بلفظ أبي نعيم وزاد في آخره:"ويذكر (أي ابن عمر) أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم فعله".

قلت: وفاته رحمه الله عزوه إلى مسلم موصولًا كما ترى.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কোরবানীর দিন (নহরের দিন) তাওয়াফে ইফাদার জন্য মক্কায় গিয়েছিলেন, অতঃপর ফিরে এসে মিনায় যোহরের সালাত আদায় করেছিলেন।

নাফে' বলেন, ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) কোরবানীর দিন তাওয়াফে ইফাদা সম্পাদন করতেন, অতঃপর ফিরে এসে মিনায় যোহরের সালাত আদায় করতেন এবং তিনি উল্লেখ করতেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এটি করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5088)


5088 - عن جابر بن عبد الله، قال: . . . . ثم ركب رسول الله صلى الله عليه وسلم فأفاض إلى البيت، فصلَّى بمكة الظّهر. . . . الحديث.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمّد، عن أبيه، عن جابر، فذكره في صفة حجة النبي صلى الله عليه وسلم.




জাবির ইবনু আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, অতঃপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আরোহণ করলেন, এরপর তিনি বায়তুল্লাহর দিকে গেলেন এবং মক্কায় যোহরের সালাত আদায় করলেন। ... (বাকি হাদীস)।









আল-জামি` আল-কামিল (5089)


5089 - عن عائشة، قالت: أفاض رسول الله صلى الله عليه وسلم من آخر يومه حين صلّي الظهر، ثم رجع إلى مني فمكث بها ليالي أيام التشريق … الحديث.

حسن: رواه أبو داود (1973) من طرق، عن أبي خالد الأحمر، عن محمد بن إسحاق، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.

وإسناده حسن، فيه محمد بن إسحاق، وقد صرّح بالتحديث عند ابن حبان (3868)، كما سيأتي تخريجه تامًا بعد أبواب.

قول جابر:"فصلّي بمكة الظّهر" وفي حديث ابن عمر السابق أنه"رجع فصلّي الظّهر بمني".

فذهب بعض أهل العلم إلى ترجيح حديث جابر، ويؤيده حديث عائشة، فيما نقله عنهم الإمام ابن القيم في زاد المعاد (2/ 280 - 283).

ومن أهل العلم من جمع بينهما كالنّووي في شرحه لصحيح مسلم (8/ 192) حيث قال:"ووجه الجمع بينهما أنه صلى الله عليه وسلم طاف للإفاضة قبل الزوال، ثم صلّى الظهر بمكة في أوّل وقتها، ثم رجع إلى منى فصلّي بها الظّهر مرة أخرى بأصحابه حين سألوه ذلك، فيكون متنفلا بالظهر الثانية التي بمني …".

ونقله عنه الشّوكانيّ في"نيل الأوطار" (3/ 427) ثم قال:"وذكر ابن المنذر نحوه، ويمكن الجمع بأن يقال: إنه صلّى بمكة، ثم رجع إلى مني، فوجد أصحابه يصلون الظهر فدخل معهم متنقلًا؛ لأمره صلى الله عليه وسلم بذلك لمن وجد جماعة يصلّون وقد صلّي".

وأمّا ما رُوي عن عائشة، وابن عباس: أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أخّر طواف يوم النّحر إلى اللّيل فهو ضعيف.

رواه أبو داود (2000)، والترمذي (920)، وابن ماجه (3059)، وأحمد (2611، 2612)، والبيهقي (5/ 144) كلّهم من طرق عن سفيان، عن أبي الزبير، عن عائشة، وابن عباس، فذكراه. قال الترمذي: حسن صحيح.

وهو كما قال، وظاهر الإسناد إلى ابن عباس صحيح، وأما إلى عائشة ففيه انقطاع بين أبي الزبير وعائشة، وفي الحديث أيضا علة خفية وهي أنه يخالف الأحاديث الصحيحة الثابتة التي سبق ذكرُها أفاضَ يوم النحر، وصلى الظهر بمنى، فلعل ذلك يعود إلى تدليس أبي الزبير بأنه سمع ذلك عن بعض الضعفاء ودلّسه.

قال الترمذيّ عقب ذكر الحديث:"وقد رخّص بعض أهل العلم في أن يؤخر طواف الزّيارة إلى اللّيل، واستحب بعضهم أن يزور يوم النحر، ووسْع بعضهم أن يؤخر ولو إلى آخر أيام مني" انتهى.

وأمّا من لم يطف يوم النّحر فهل يعود محرمًا؟ فالصحيح أنه لا يعود محرمًا وبه قال جمهور أهل العلم من الصّحابة والتابعين ومن بعدهم.

وأما ما رُوي عن أمّ سلمة رضي الله عنها فهو مخرَّج في المنة الكبرى (4/ 284 - 288)، ولكن أعيده هنا لأهميته مع مزيد من التوضيح والتعليق.
قالت أمّ سلمة رضي الله عنها: كانت ليلتي التي يصير إليَّ فيها رسول الله صلى الله عليه وسلم مساء يوم النّحر، فصار إليَّ ودخل عليَّ وهبُ بن زمعة، ومعه رجل من آل أبي أميّة مُتقمِّصين، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم لوهب:"هل أفضتَ يا عبد الله؟". قال: لا والله يا رسول الله! قال صلى الله عليه وسلم:"انْزعْ عنك القميص". قال: فنزعه من رأسه، ونزع صاحبه قميصه من رأسه، ثم قال: لِمَ يا رسول الله؟ قال:"إنّ هذا يوم رُخَّص لكم إذا رميتم الجمرة أن تحلُّوا -يعني من كلّ ما حرمتم منه إلّا النساء، فإذا أمسيتم قبل أن تطوفوا هذا البيت صرتم حُرُمًا كهيئتكم قبل أن ترموا الجمرة، قبل أن تطوفوا به".

رواه أبو داود (1999) عن الإمام أحمد ويحيى بن معين -المعنى واحد- وهو في مسنده (26530)، وابن خزيمة (2958)، والحاكم (1/ 489)، والبيهقيّ (5/ 137) كلّهم من حديث محمد بن أبي عدي، عن محمد بن إسحاق، قال: حدثني أبو عبيدة بن عبد الله بن زمعة، عن أبيه، وعن أمّه زينب بنت أبي سلمة، بحدّثانه ذلك جميعًا عن أمّ سلمة، قالت (فذكرته).

ومحمد بن إسحاق وإن كان صرَّح فإنه لا يقبل في السنن إذا انفرد كما قال الإمام أحمد.

قال أيوب بن إسحاق بن سامري: سألت أحمد فقلت له: يا أبا عبد الله إذا انفرد ابن إسحاق بحديث تقبل؟ قال: لا والله، إني رأيته يحدث عن جماعة بالحديث الواحد، ولا يفصل كلام ذا من كلام ذا.

وقال أبو داود: سمعت أحمد وذُكر عنده محمد بن إسحاق فقال: كان رجلًا يشتهي الحديث، فيأخذ كتب الناس فيضعها في كتبه.

وقال عبد الله: لم يكن يحتج به أبي في السنن.

وهذا الحديث مما انفرد به ابن إسحاق ولم يُعمل به. قال البيهقيّ:"لا أعلم أحدًا من الفقهاء يقول بذلك".

وأمّا أبو عبيدة بن عبد الله بن زمعة، فقال ابن سعد: كان قليل الحديث. وقال أبو زرعة: لا أعرف أحدًا سمّاه، وكذلك قال أبو حاتم، ولم يذكر المزيّ توثيقه من أحد، بل قال الحافظ في"التقريب":"مقبول". وهو مشعر إلى جهالة حاله وإن كان روي له مسلم كما قال المزي عن عبد الملك بن شعيب بن الليث بن سعد، عن أبيه، عن جده -يعني الليث-، عن عقيل بن خالد، عن ابن شهاب، أنه قال: أخبرني أبو عبيدة بن عبد الله بن زمعة، أنّ أمّه زينب بنت أبي سلمة أخبرته، أنّ أمها أمّ سلمة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم كانت تقول (فذكرت قصة رضاع الكبير).

قلت: أخرجه مسلم متابعًا لحديث حميد بن نافع يقول: سمعت زينب بنت أبي سلمة تقول: سمعت أم سلمة تقول (فذكر قصة سهلة بنت سهيل في إرضاع سالم).

فصحَّ قول الحافظ ابن حجر:"مقبول" أي إذا توبع، وقد توبع.

وأما في الحديث الذي أنا في صدده فمع تفرده وقع في إسناده اضطراب. فقد رواه أيضًا الإمام
أحمد (26531) فقال: قال محمد (يعني ابن أبي عدي)، قال أبو عبيدة: وحدثتني أمّ قيس ابنة مِحصن -وكانت جارة لهم- قالت: خرج من عندي عُكاشة بن محصن في نفر من بني أسد متقمّصين عشيّة يوم النّحر، ثم رجعوا إليَّ عشاء، قمصُهم على أيديهم يحملونها. قالت: فقلت: أي عكاشة، مالكم خرجتم متقمِّصين، ثم رجعتم وقمصكم على أيديكم تحملونها؟ فقال: خيرًا يا أمَّ قيس، كان هذا يومًا قد رُخَّص لنا فيه إذا نحن رمينا الجمرة، حللنا من كل ما حُرمنا منه إلّا ما كان من النساء حتى نطوف بالبيت، فإذا أمسينا ولم نطُف به، صرنا حرمًا كهيئتنا قبل أن نرمي الجمرة، حتى نطوف به، فأمسينا ولم نطف، فجعلنا قُمُصنا كما ترين".

فجعل محمد بن أبي عدي يروي عن أبي عبيدة بدون ذكر محمد بن إسحاق بينه وبين أبي عبيدة، وأبو عبيدة يقول: حدثتني أم قيس ابنة محصن ولم يرفعه إلى النبيّ صلى الله عليه وسلم.

ورواه ابن لهيعة، عن أبي الأسود، عن عروة، عن أمّ قيس بنت محصن، قالت: دخل عليَّ عكاشة بن محصن وآخر في منى مساء يوم الأضحي فنزعا ثيابهما وتركا الطيب، فقلت: ما لكما؟ فقالا: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم. قال لنا:"من لم يُفضْ إلى البيت من عشيته، فليدع الثّياب والطّيب".

رواه الطّحاويّ في شرح المعاني (3942) من طريق عبد الله بن يوسف، عن ابن لهيعة. ورواه أيضًا من طريق ابن أبي مريم، نا عبد الله بن لهيعة، قال: ثنا أبو الأسود، عن عروة، عن جدامة بنت وهب -أخت عكاشة بن وهب-، أنّ عكاشة بن وهب صاحب النبيّ صلى الله عليه وسلم وأخا له آخر جاءها حين غابت الشمس يوم النحر، فألقيا قميصهما فقالت: ما لكما؟ فقالا: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من لم يكن أفاض من هنا فليلق ثيابه". وكانوا تطيّبوا ولبسوا الثياب.

فجعل فيه عكاشة بن وهب، وهذا كلّه من تخليط ابن لهيعة، وفيه كلام معروف. وجدامة بنت وهب، ويقال: جندل، ويقال: جندب الأسدي أخت عكاشة بن محصن لأمه، صحابية لها سابقة وهجرة. قال الدارقطني: من قالها بالذال المعجمة صحَّف.

ثم هل الحديث من مسند جدامة بنت وهب، أم من مسند أم قيس بنت محصن، أم من أمّ سلمة؟ وهل عكاشة هو ابن محصن أم ابن وهب؟ وهذا اضطراب واضح في الإسناد، ووجود ابن لهيعة في الإسناد قرينة قوية لهذا الاضطراب.

ولذا قال الحافظ في الإصابة (2/ 488):"وقد اختلف فيه على ابن لهيعة" ثم أخرج حديث الطحاويّ عن أمّ قيس وقال:"وكأنّ هذا أصح، وقد جاء الحديث من وجه آخر عنها أخرجها الحاكم من طريق ابن إسحاق، حدثني أبو عبيدة بن عبد الله بن زمعة، حدثتني أمُّ قيس بنت محصن" فذكر الحديث مختصرًا.

قلت: فمثل هذا الحديث مع تفرده واضطرابه في إسناده لا يقبل في مثل هذا الحكم الذي نعمّ به البلوى، وقد كان النبيّ صلى الله عليه وسلم قال مخاطبًا أصحابه:"خذوا عني مناسككم"، فلا ينبغي أن يخفى
على جمهور الصّحابة ثم التّابعين ومن بعدهم، فإنّ عمر بن الخطاب لما خطب الناس بعرفات وبين لهم سنن الحج وأحكامه وقال فيه:"إذا حلفتم ورميتم فقد حلّ لكم كلّ شيء إلّا النّساء والطّيب" ردّت عليه عائشة وقالت: كنت أطيب رسول الله صلى الله عليه وسلم إذا رمي جمرة العقبة قبل أن يفيض. فسنة رسول الله صلى الله عليه وسلم أحقّ أن يؤخذ من سنة عمر" فهي ردت عليه بمنع الطّيب فقط، ولم تذكر إذا لم يطف إلى المساء فيعود كما كان. وذلك على جمع من الصّحابة فصار شبه الإجماع؛ ولذا حكم عليه كثير من أهل العلم بالشّذوذ والنكارة.

وقد قال محبّ الطبريّ في"القرى" (ص 472) بعد أن بوّب بهذا الحديث:"وهذا حكم لا أعلم أحدًا قال به" فهو ينقل عن الأمّة الإسلامية إلى عهده بأنّ الحكم لم يعمل به، وبالتالي إن نقل عن أحد أنه قال به، ففي ثبوته عنه نظر.

وعلى فرض صحته يمكن حمله على حالهم التي كانوا عليها كما في رواية الطّحاويّ، وكانوا تطيّبوا ولبسوا الثياب وهو أدعى إلى الجماع، وقد حان الليل، فخاف أن يجني على إحرامه قبل طواف الفريضة، فكان أمره صلى الله عليه وسلم لهم بالعودة إلى الإحرام من باب سدّ الذّرائع، كما ذهب مالك إلى عدم استعمال الطيب قبل الطواف للسبب نفسه، أو يكون ذلك الأمر لمجرد التشديد لهم في تأخير الطواف، فإن هؤلاء لقربهم لرسول الله صلى الله عليه وسلم كان أليق لهم المسارعة إلى أدائه في الوقت المستحب وهو قبل الليل، وعلى هذا فهو خاص لهما دون سائر الناس. وبالله التوفيق.

ومن نسي أن يفيض حتى رجع إلى بلاده فهو حرام حين يذكر حتى يرجع إلى البيت فيطوف به، فإن أصاب النساء أهدي بدنة. قال به الفقهاء الذين ينتهي إلى قولهم من أهل المدينة. أخرجه البيهقيّ (5/ 146) بإسناده عن أبي الزّناد، عن الفقهاء.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) দিনের শেষভাগে যোহরের সালাত আদায় করে [মক্কা অভিমুখে] তাওয়াফে ইফাযাহ সম্পন্ন করেন। এরপর তিনি মিনায় ফিরে আসেন এবং সেখানে আইয়ামে তাশরীকের রাতগুলো অবস্থান করেন... হাদীসটি [সম্পূর্ণ নয়]।

হাসান: এটি আবূ দাউদ (নং ১৯৭৩) একাধিক সূত্রে আবূ খালিদ আল-আহমার, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক, তিনি আব্দুর রহমান ইবনু কাসিম, তিনি তাঁর পিতা, তিনি আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন।

আর তাঁর সনদ হাসান। তাতে মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক রয়েছেন। ইবনু হিব্বান (নং ৩৮৬৮)-এর নিকট তিনি তাহদীসের স্পষ্ট ঘোষণা দিয়েছেন, যা কয়েক অধ্যায় পরে পূর্ণাঙ্গভাবে উল্লেখ করা হবে।

জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি: "তিনি মক্কায় যোহরের সালাত আদায় করলেন।" আর ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পূর্ববর্তী হাদীসে আছে যে, "তিনি ফিরে এসে মিনায় যোহরের সালাত আদায় করলেন।"

কিছু উলামায়ে কেরাম জাবের (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসকে প্রাধান্য দিতে চেয়েছেন এবং আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীস একে সমর্থন করে, ইমাম ইবনু আল-কাইয়্যিম যা তাদের থেকে 'যাদুল মা‘আদ' (২/২৮০-২৮৩)-এ উদ্ধৃত করেছেন।

আবার কিছু উলামায়ে কেরাম উভয় হাদীসের মধ্যে সামঞ্জস্য বিধান করেছেন, যেমন ইমাম নববী তাঁর সহীহ মুসলিমের ব্যাখ্যায় (৮/১৯২) বলেছেন: "উভয়ের মধ্যে সামঞ্জস্য বিধানের পদ্ধতি হলো—নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) সূর্য ঢলে যাওয়ার পূর্বে তাওয়াফে ইফাযাহ সম্পন্ন করেন, অতঃপর মক্কায় ওয়াক্তের শুরুতেই যোহরের সালাত আদায় করেন। এরপর তিনি মিনায় ফিরে এসে সেখানে তাঁর সাহাবীগণের সাথে পুনরায় যোহরের সালাত আদায় করেন, যখন তাঁরা তাঁকে সে বিষয়ে জিজ্ঞাসা করেন। সুতরাং মিনায় আদায় করা দ্বিতীয় যোহরের সালাত তাঁর জন্য নফল হিসেবে গণ্য হবে..."

শাওকানী 'নাইলুল আওতার' (৩/৪২৭)-এ তাঁর থেকে এই মতটি উদ্ধৃত করেছেন এবং বলেছেন: "ইবনুল মুনযির অনুরূপ মত উল্লেখ করেছেন। এছাড়া এভাবেও সামঞ্জস্য বিধান করা যেতে পারে যে, তিনি মক্কায় সালাত আদায় করলেন, অতঃপর মিনায় ফিরে এলেন। সেখানে তিনি তাঁর সাহাবীগণকে যোহরের সালাত আদায় করতে দেখে তাদের সাথে নফল হিসেবে শরীক হয়ে গেলেন; কারণ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) এমন ব্যক্তির জন্য এরূপ করার আদেশ দিয়েছেন, যে সালাত আদায় করার পরেও জামাতকে সালাত আদায় করতে দেখেছে।"

তবে আয়েশা ও ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে কুরবানীর দিনের তাওয়াফ রাত্রী পর্যন্ত বিলম্ব করা সম্পর্কে যা বর্ণিত হয়েছে, তা দুর্বল।

এটি আবূ দাউদ (নং ২০০০), তিরমিযী (নং ৯২০), ইবনু মাজাহ (নং ৩০৫৯) এবং আহমাদ (নং ২৬১১, ২৬১২) ও বায়হাকী (৫/১৪৪) সকলেই সুফইয়ান থেকে, তিনি আবূ আয-যুবাইর থেকে, তিনি আয়েশা ও ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে একাধিক সূত্রে বর্ণনা করেছেন। ইমাম তিরমিযী বলেন: হাদীসটি হাসান সহীহ।

তাঁর কথা সঠিক। ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্যন্ত সনদটি বাহ্যত সহীহ। কিন্তু আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) পর্যন্ত সনদে আবূ আয-যুবাইর ও আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মধ্যে ইনকিতা’ (বিচ্ছিন্নতা) রয়েছে। এই হাদীসে আরেকটি গোপন ত্রুটি রয়েছে, যা হলো—এটি পূর্বোল্লিখিত সহীহ ও সুপ্রতিষ্ঠিত হাদীসগুলোর পরিপন্থী, যাতে বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি কুরবানীর দিনেই তাওয়াফে ইফাযাহ সম্পন্ন করেন এবং মিনায় যোহরের সালাত আদায় করেন। সম্ভবত এর কারণ হলো আবূ আয-যুবাইর কর্তৃক দুর্বল রাবীদের নিকট থেকে শুনে তা দালিসের মাধ্যমে বর্ণনা করা।

ইমাম তিরমিযী হাদীসটি উল্লেখ করার পর বলেছেন: "কিছু আলিম তাওয়াফে যিয়ারত রাতে বিলম্ব করার অনুমতি দিয়েছেন এবং কিছু আলিম কুরবানীর দিন তা আদায় করাকে মুস্তাহাব বলেছেন। আবার কেউ কেউ আইয়ামে মিনার শেষ দিন পর্যন্ত বিলম্ব করারও অবকাশ দিয়েছেন।" সমাপ্ত।

আর যে ব্যক্তি কুরবানীর দিন তাওয়াফ করতে ভুলে যায়, সে কি ইহরাম অবস্থায় ফিরে যাবে? সঠিক মত হলো, সে ইহরাম অবস্থায় ফিরে যাবে না। এই মতটিই সাহাবী, তাবেয়ী এবং তাদের পরবর্তীকালের জমহূর উলামায়ে কেরামের।

তবে উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে যা বর্ণিত হয়েছে, তা 'আল-মিন্না আল-কুবরা' (৪/২৮৪-২৮৮)-এ উল্লেখ করা হয়েছে, কিন্তু এর গুরুত্বের কারণে আমি এটিকে এখানে অধিকতর ব্যাখ্যা ও টিকা-সহ পুনরাবৃত্তি করছি।

উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: যে রাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) আমার নিকট আসতেন, তা ছিল কুরবানীর দিনের সন্ধ্যা। তিনি আমার নিকট আগমন করলেন। তখন ওয়াহব ইবনু যাম‘আহ এবং আবূ উমাইয়্যার পরিবারের এক ব্যক্তি পরিহিত জামা অবস্থায় তাঁর নিকট প্রবেশ করলেন। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) ওয়াহবকে বললেন: "হে আবদুল্লাহ! তুমি কি তাওয়াফে ইফাযাহ সম্পন্ন করেছ?" তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! না, হে আল্লাহর রাসূল! তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বললেন: "তোমার জামা খুলে ফেলো।" বর্ণনাকারী বলেন: তিনি তাঁর মাথা থেকে তা খুলে ফেললেন এবং তাঁর সঙ্গীও মাথা থেকে তাঁর জামা খুলে ফেললেন। এরপর ওয়াহব বললেন: হে আল্লাহর রাসূল! কেন? তিনি বললেন: "তোমাদের জন্য এই দিনটিতে যখন তোমরা জামরায় পাথর নিক্ষেপ করেছ, তখন তোমাদেরকে (নারীর সংসর্গ ছাড়া) যে সমস্ত বস্তুকে নিজেদের জন্য হারাম করেছিলে, তা থেকে হালাল হওয়ার অনুমতি দেওয়া হয়েছে। কিন্তু যখন তোমরা এই ঘরের তাওয়াফ করার আগেই সন্ধ্যা করে ফেলবে, তখন তোমরা আবার ইহরাম অবস্থায় ফিরে যাবে, ঠিক সেই অবস্থায়, তোমরা যেমন জামরায় পাথর নিক্ষেপের আগে ছিলে, এই তাওয়াফ করার আগে ছিলে।"

এটি আবূ দাউদ (নং ১৯৯৯) ইমাম আহমাদ ও ইয়াহইয়া ইবনু মা‘ঈন থেকে—উভয়ের অর্থ এক—বর্ণনা করেছেন। এটি তাঁর (আহমাদ-এর) মুসনাদ (নং ২৬৫৩০), ইবনু খুযাইমাহ (নং ২৯৫৮), হাকেম (১/৪৮৯) এবং বায়হাকী (৫/১৩৭)-তেও রয়েছে। তারা সকলেই মুহাম্মাদ ইবনু আবী ‘আদী থেকে, তিনি মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক থেকে, তিনি বলেন: আবূ উবাইদাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু যাম‘আহ আমাকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন, তিনি তাঁর পিতা ও তাঁর মাতা যায়নাব বিনতু আবী সালামাহ (উভয়) থেকে, তাঁরা সকলেই উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন। (অতঃপর তিনি এটি উল্লেখ করেন)।

মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাক যদিও (তাহদীসের) স্পষ্ট ঘোষণা দিয়েছেন, তবুও ইমাম আহমাদের মতে, তিনি যখন এককভাবে বর্ণনা করেন, তখন তাঁকে সুনান (ফিকহী হুকুম)-এর ক্ষেত্রে গ্রহণ করা হয় না।

আইয়্যুব ইবনু ইসহাক ইবনু সামেরী বলেন: আমি আহমাদকে জিজ্ঞাসা করলাম: হে আবূ আব্দুল্লাহ! যদি ইবনু ইসহাক কোনো হাদীস এককভাবে বর্ণনা করেন, তবে তা কি গ্রহণযোগ্য? তিনি বললেন: আল্লাহর শপথ! না। আমি দেখেছি, তিনি একই হাদীস একদল লোকের নিকট থেকে বর্ণনা করেন এবং এর মধ্যে কার কথা কতটুকু, তা পৃথক করেন না।

আবূ দাউদ বলেন: আমি আহমাদকে ইবনু ইসহাক সম্পর্কে বলতে শুনেছি, তখন তিনি বলেন: সে এমন একজন লোক ছিল যে হাদীস কামনা করত, অতঃপর মানুষের কিতাব নিয়ে এসে নিজের কিতাবে ঢুকিয়ে দিত।

আব্দুল্লাহ বলেন: আমার পিতা তাকে সুনান (ফিকহী হুকুম)-এর ক্ষেত্রে দলীল হিসেবে গ্রহণ করতেন না।

আর এই হাদীসটি এমন একটি হাদীস, যা ইবনু ইসহাক এককভাবে বর্ণনা করেছেন এবং এর ওপর আমল করা হয়নি। ইমাম বায়হাকী বলেন: "আমি কোনো ফকীহকে এ কথা বলতে দেখিনি।"

আর আবূ উবাইদাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু যাম‘আহ সম্পর্কে ইবনু সা‘দ বলেন: সে স্বল্প হাদীস বর্ণনাকারী ছিল। আবূ যুর‘আহ বলেন: আমি এমন কাউকে চিনি না যে তাকে বিশ্বস্ত বলেছে। আবূ হাতেমও অনুরূপ বলেছেন। আল-মিযযী কারো পক্ষ থেকে তার তাওসীক (নির্ভরযোগ্যতার ঘোষণা) উল্লেখ করেননি। বরং হাফিয ইবনু হাজার 'আত-তাকরীব'-এ তাকে 'মাকবূল' (গ্রহণযোগ্য) বলেছেন। এটি তার অবস্থার অজ্ঞতাকেই ইঙ্গিত করে, যদিও মুসলিম (তাঁর থেকে) হাদীস বর্ণনা করেছেন, যেমন আল-মিযযী আব্দুল মালিক ইবনু শু‘আইব ইবনুল লাইস ইবনু সা‘দ থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি তার দাদা থেকে—অর্থাৎ লাইস—তিনি উকাইল ইবনু খালিদ থেকে, তিনি ইবনু শিহাব থেকে বর্ণনা করেছেন যে, তাকে আবূ উবাইদাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু যাম‘আহ সংবাদ দিয়েছেন যে, তার মাতা যায়নাব বিনতু আবী সালামাহ তাকে সংবাদ দিয়েছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর স্ত্রী উম্মু সালামাহ বলতেন (অতঃপর বড়দের দুধ পান করানো সংক্রান্ত ঘটনাটি উল্লেখ করেন)।

আমি (আলবানী) বলি: মুসলিম এই হাদীসটি হুমাইদ ইবনু নাফি‘-এর হাদীসের মুতাবা‘আত (সমর্থনকারী বর্ণনা) হিসেবে সংকলন করেছেন। তিনি বলেন: আমি যায়নাব বিনতু আবী সালামাহকে বলতে শুনেছি, তিনি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে শুনেছেন (অতঃপর তিনি সালেমকে দুধ পান করানোর বিষয়ে সাহলা বিনতু সুহাইল-এর ঘটনাটি উল্লেখ করেন)।

সুতরাং হাফিয ইবনু হাজারের উক্তি—'মাকবূল' (অর্থাৎ যদি তার সমর্থন পাওয়া যায়)—সঠিক। আর এখানে তার সমর্থন পাওয়া গেছে।

তবে যে হাদীসটি আমি আলোচনা করছি, তাতে এককভাবে বর্ণনা করার সাথে সাথে সনদে ইদতিরাব (বিশৃঙ্খলা) ঘটেছে। ইমাম আহমাদ (নং ২৬৫৩১)ও এটি বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: মুহাম্মাদ (অর্থাৎ ইবনু আবী ‘আদী) বলেছেন, আবূ উবাইদাহ বলেছেন: এবং মুহাস্সান-এর কন্যা উম্মু কায়স—যিনি তাদের প্রতিবেশী ছিলেন—আমাকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। তিনি বলেন: কুরবানীর দিন সন্ধ্যায় উক্কাশাহ ইবনু মুহাস্সান বানী আসাদ গোত্রের একদল লোকের সাথে জামা পরিহিত অবস্থায় আমার নিকট থেকে বের হন। এরপর সন্ধ্যায় তারা আমার নিকট ফিরে আসেন, তাদের জামাগুলো হাতে ছিল। তিনি (উম্মু কায়স) বলেন: আমি বললাম: হে উক্কাশাহ! কী ব্যাপার, তোমরা জামা পরিহিত অবস্থায় বের হলে, অতঃপর ফিরে এলে আর তোমাদের জামা হাতে বহন করছ? তিনি বললেন: হে উম্মু কায়স! ভালো খবর। এটি এমন একটি দিন, যাতে আমাদেরকে অনুমতি দেওয়া হয়েছে যে, যখন আমরা জামরায় পাথর নিক্ষেপ করি, তখন নারীদের সংসর্গ ছাড়া আমরা যা কিছু হারাম করেছিলাম, তা থেকে হালাল হয়ে যাই—যতক্ষণ না আমরা কা‘বার তাওয়াফ করি। কিন্তু যখন আমরা তাওয়াফ না করে সন্ধ্যা করে ফেলি, তখন আমরা আবার ইহরামের অবস্থায় ফিরে যাই, যেমনটি জামরায় পাথর নিক্ষেপের আগে ছিলাম, যতক্ষণ না আমরা তাওয়াফ করি। আর আমরা সন্ধ্যা করে ফেললাম, কিন্তু তাওয়াফ করিনি, তাই তোমরা যেমন দেখছ, আমরা আমাদের জামাগুলো রেখে দিয়েছি।

সুতরাং মুহাম্মাদ ইবনু আবী ‘আদী আবূ উবাইদাহ থেকে বর্ণনা করেছেন, যেখানে আবূ উবাইদাহ ও তাঁর মাঝে মুহাম্মাদ ইবনু ইসহাকের উল্লেখ নেই। আর আবূ উবাইদাহ বলেছেন: মুহাস্সান-এর কন্যা উম্মু কায়স আমাকে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন এবং তিনি এটিকে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) পর্যন্ত মারফূ’ হিসেবে বর্ণনা করেননি।

ইবনু লাহী‘আ এটি আবূল আসওয়াদ থেকে, তিনি উরওয়াহ থেকে, তিনি মুহাস্সান-এর কন্যা উম্মু কায়স থেকে বর্ণনা করেছেন। তিনি (উম্মু কায়স) বলেন: কুরবানীর দিনের সন্ধ্যায় উক্কাশাহ ইবনু মুহাস্সান এবং অন্য একজন মিনায় আমার নিকট প্রবেশ করে, অতঃপর তারা তাদের কাপড় খুলে ফেলল এবং সুগন্ধি ব্যবহার করা ছেড়ে দিল। আমি বললাম: তোমাদের কী হয়েছে? তারা বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) আমাদের বলেছেন: "যে ব্যক্তি সন্ধ্যা পর্যন্ত বাইতুল্লাহর তাওয়াফে ইফাযাহ সম্পন্ন করবে না, সে যেন কাপড় ও সুগন্ধি পরিত্যাগ করে।"

আত-ত্বাহাবী তাঁর 'শারহুল মা‘আনী' (নং ৩৯৪২)-এ আব্দুল্লাহ ইবনু ইউসুফ থেকে, তিনি ইবনু লাহী‘আ থেকে এটি বর্ণনা করেছেন। তিনি ইবনু আবী মারইয়াম থেকেও বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: ইবনু লাহী‘আ আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আবূল আসওয়াদ আমাদের নিকট বর্ণনা করেছেন, তিনি উরওয়াহ থেকে, তিনি উক্কাশাহ ইবনু ওয়াহব-এর বোন জুদামাহ বিনতু ওয়াহব থেকে বর্ণনা করেছেন যে, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর সাহাবী উক্কাশাহ ইবনু ওয়াহব এবং তার আরেক ভাই কুরবানীর দিন সূর্য ডোবার সময় তার নিকট আসেন। অতঃপর তারা তাদের জামা খুলে ফেলেন। তিনি বললেন: তোমাদের কী হয়েছে? তারা বলল: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি এ সময়ে তাওয়াফে ইফাযাহ সম্পন্ন করেনি, সে যেন তার কাপড় খুলে ফেলে।" আর তারা সুগন্ধি ব্যবহার করেছিলেন এবং কাপড় পরেছিলেন।

এতে তিনি উক্কাশাহ ইবনু ওয়াহব-এর উল্লেখ করেছেন। এ সবই ইবনু লাহী‘আর এলোমেলো বর্ণনার কারণে হয়েছে, যা সম্পর্কে সুপরিচিত আলোচনা রয়েছে। আর জুদামাহ বিনতু ওয়াহব, কাউকে কাউকে জুন্দাল অথবা জুন্দুব আল-আসাদীও বলেছেন—তিনি উক্কাশাহ ইবনু মুহাস্সান-এর বৈমাত্রেয় বোন, তিনি একজন সাহাবিয়্যাহ, যিনি পূর্বে ইসলাম গ্রহণ করেছেন এবং হিজরত করেছেন। দারাকুতনী বলেন: যে ব্যক্তি এটিকে যাল বর্ণ দিয়ে বলেছে, সে ভুল করেছে।

অতঃপর এই হাদীসটি কি জুদামাহ বিনতু ওয়াহব, নাকি উম্মু কায়স বিনতু মুহাস্সান, নাকি উম্মু সালামাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মুসনাদ থেকে এসেছে? আর উক্কাশাহ কি ইবনু মুহাস্সান নাকি ইবনু ওয়াহব? এটি সনদে এক সুস্পষ্ট বিশৃঙ্খলা, আর সনদে ইবনু লাহী‘আর উপস্থিতি এই বিশৃঙ্খলার একটি শক্তিশালী প্রমাণ।

এজন্য হাফিয ইবনু হাজার 'আল-ইসাবাহ' (২/৪৮৮)-এ বলেছেন: "এ বিষয়ে ইবনু লাহী‘আর ওপর মতভেদ হয়েছে।" এরপর তিনি উম্মু কায়স (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত ত্বাহাবীর হাদীসটি উল্লেখ করে বলেন: "মনে হয় এটিই অধিক সহীহ। তার থেকে অন্য পথেও হাদীসটি এসেছে। হাকেম ইবনু ইসহাক থেকে, তিনি আবূ উবাইদাহ ইবনু আব্দুল্লাহ ইবনু যাম‘আহ থেকে, তিনি উম্মু কায়স বিনতু মুহাস্সান থেকে বর্ণনা করেছেন"—অতঃপর সংক্ষিপ্তাকারে হাদীসটি উল্লেখ করেন।

আমি (আলবানী) বলি: এককভাবে বর্ণিত এবং সনদে বিশৃঙ্খলায় পূর্ণ এই ধরনের হাদীস এমন একটি হুকুমের ক্ষেত্রে গ্রহণযোগ্য হতে পারে না, যার দ্বারা বৃহত্তর সংখ্যক মানুষ আক্রান্ত হয়। নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম) তো তাঁর সাহাবীগণকে লক্ষ্য করে বলেছিলেন: "তোমরা আমার নিকট থেকে তোমাদের হজ্জের নিয়মাবলী শিখে নাও।" সুতরাং এই বিষয়টি জমহূর সাহাবীগণ, অতঃপর তাবেয়ীগণ এবং তাদের পরবর্তীকালের লোকের নিকট গোপন থাকার কথা নয়। কেননা উমর ইবনুল খাত্তাব যখন আরাফাতের ময়দানে লোকদের উদ্দেশ্যে খুৎবা দিলেন এবং তাদের জন্য হজ্জের সুন্নাত ও আহকাম বর্ণনা করলেন, এবং তাতে বললেন: "যখন তোমরা মাথা মুণ্ডন করবে ও পাথর নিক্ষেপ করবে, তখন নারীদের সংসর্গ ও সুগন্ধি ছাড়া সবকিছু তোমাদের জন্য হালাল হয়ে যাবে।" তখন আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর কথার প্রতিবাদ করে বললেন: "আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-কে তাওয়াফে ইফাযাহ সম্পন্ন করার পূর্বে জামরায়ে আকাবায় পাথর নিক্ষেপের পর সুগন্ধি মাখিয়ে দিতাম। সুতরাং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর সুন্নাত উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সুন্নাত থেকে অনুসরণ করার অধিক উপযোগী।" তিনি কেবল সুগন্ধি ব্যবহার না করার বিষয়ে তাঁর প্রতিবাদ করেছিলেন, কিন্তু সন্ধ্যা পর্যন্ত তাওয়াফ না করলে আগের মতো ইহরাম অবস্থায় ফিরে যাওয়ার কথা উল্লেখ করেননি। এটি ছিল একদল সাহাবীর সামনে, ফলে এটি প্রায় ইজমার রূপ নেয়। এই কারণেই বহু সংখ্যক আলিম এই হাদীসকে শা‘য (বিরল) ও মুনকার (অস্বীকৃত) বলে রায় দিয়েছেন।

মুহিব আল-ত্বাবারী 'আল-ক্বিরা' (পৃ. ৪৭২)-তে এই হাদীসের শিরোনাম দেওয়ার পর বলেছেন: "আমি এমন কোনো ব্যক্তিকে জানি না, যে এই হুকুমটি দিয়েছে।" তিনি তাঁর যুগ পর্যন্ত মুসলিম উম্মাহর পক্ষ থেকে এই হুকুমের ওপর আমল না হওয়ার কথা বর্ণনা করছেন। সুতরাং কারো পক্ষ থেকে যদি এটি বলা প্রমাণিত হয়ও, তবে তা প্রমাণের বিষয়ে প্রশ্ন রয়েছে।

আর যদি ধরেও নেওয়া হয় যে, এটি সহীহ, তবে এটিকে তাদের অবস্থার ওপর প্রযোজ্য বলে গণ্য করা যেতে পারে, যেমনটি ত্বাহাবীর বর্ণনায় রয়েছে—তারা সুগন্ধি মেখেছিল এবং কাপড় পরেছিল, যা সহবাসের জন্য অধিকতর প্ররোচনাকারী। আর রাত ঘনিয়ে এসেছিল, তাই তারা ফরয তাওয়াফের পূর্বে ইহরামের ত্রুটি ঘটার ভয় করছিলেন। সুতরাং নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর এই আদেশ ছিল 'সদ্দুয যারাই' (ক্ষতি ও ফেতনার পথ বন্ধ করা)-এর নীতি হিসেবে, যেমনটি মালিক তাওয়াফের পূর্বে সুগন্ধি ব্যবহার না করার দিকে গেছেন একই কারণে। অথবা, তাওয়াফ বিলম্ব করার কারণে এটি কেবল তাদের জন্য কঠোরতা আরোপের জন্য ছিল। কেননা এই লোকেরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম)-এর নিকটবর্তী হওয়ায়, রাতের পূর্বে মুস্তাহাব সময়ে তা আদায়ের জন্য দ্রুততা দেখানোই তাদের জন্য অধিক উপযুক্ত ছিল। এই হিসেবে এটি কেবল তাদের দুজনের জন্য প্রযোজ্য, সাধারণ মানুষের জন্য নয়। আল্লাহ তা‘আলার তাওফীক কামনা করি।

আর যে ব্যক্তি তাওয়াফে ইফাযাহ করতে ভুলে যায় এবং নিজের দেশে ফিরে যায়, তবে যখন সে তা স্মরণ করবে, তখন সে মুহরিম হিসেবে থাকবে যতক্ষণ না বাইতুল্লাহতে ফিরে এসে তাওয়াফ করে। যদি সে এর মধ্যে নারীর সংসর্গ লাভ করে, তবে তাকে একটি উট কুরবানী দিতে হবে। এই মতটিই মদীনার ফকীহগণ দিয়েছেন, যাদের মত গ্রহণযোগ্য হিসেবে গণ্য। বায়হাকী (৫/১৪৬) আবূয যিনাদ থেকে, তিনি ফকীহগণ থেকে এই সনদেই তা বর্ণনা করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5090)


5090 - عن ابن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يرمل في السّبع الذي أفاض فيه.

صحيح: رواه أبو داود (2001)، وابن ماجه (3060)، وابن خزيمة في صحيحه (2943)، والحاكم (1/ 475)، والبيهقيّ (5/ 84) كلّهم من حديث ابن وهب، أخبرني ابن جريج، عن عطاء ابن أبي رباح، عن عباس، فذكره.

وقال عطاء: لا رمل فيه. وإسناده صحيح.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

وقال أبو بكر بن أبي خيثمة، حدّثنا إبراهيم بن عرعرة، عن يحيى بن سعيد، عن ابن جريج، قال:"إذا قالتُ: قال عطاء، فأنا سمعته منه، وإن لم أقل سمعت".

ويفهم من قول ابن عمر كما جاء في الصحيحين: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان إذا طاف بالبيت الطواف الأول خبَّ ثلاثًا ومشى أربعًا، وكان ابن عمر يفعله.
يعني أنه إذا كان في غير طوافه الأول كالزيارة والوداع فلا يرمل فيه.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম সেই সাত চক্রে রমল (দ্রুত পদচারণা) করেননি, যা তিনি (আরাফাত থেকে ফিরে এসে) ইফাদার (ফরয) তাওয়াফ হিসাবে করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5091)


5091 - عن أبي ذرّ، قال: قال لي رسول الله صلى الله عليه وسلم:"متى كنت ههنا؟". قال: قلت: قد كنت ههنا منذ ثلاثين بين ليلة ويوم. قال:"فمن كان يُطعمك؟". قال: قلت ما كان لي طعام إلا ماء زمزم فسمنتُ حتى تكسرت عُكَنُ بطني، وما أجد على كبدي سخفة جوع! قال:"إنّها مباركةٌ، إنّها طعام طُعْم".

صحيح: رواه مسلم في فضائل الصحابة (2473) عن هداب بن خالد الأزديّ، حدّثنا سليمان ابن المغيرة، أخبرنا حميد بن هلال، عن عبد الله بن الصامت، قال: قال أبو ذر (فذكر حديثًا طويلًا في خروجه من قومه إلى مكة).

ورواه أبو داود الطيالسيّ (459) عن سليمان بن المغيرة، وزاد فيه:"وشفاء سُقم". وهي زيادة صحيحة ولم يذكرها مسلم لأنه لم تقع لشيخه هداب بن خالد.

وكذلك رواه ابن حبان (7133) من حديث هداب بن خالد بدون هذه الزّيادة.

ووهمَ البيهقيّ (5/ 147) عندما عزاه لمسلم من حديث هداب بن خالد مع هذه الزيادة.




আবু যর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে বললেন: "তুমি কতদিন যাবত এখানে আছ?" তিনি বললেন, আমি বললাম: "আমি প্রায় ত্রিশ দিন ধরে রাত ও দিন এখানে আছি।" তিনি (নবী) বললেন: "কে তোমাকে খাওয়াত?" তিনি বললেন, আমি বললাম: "আমার জন্য খাদ্য বলতে যমযমের পানি ছাড়া আর কিছুই ছিল না। ফলে আমি এমন মোটা হয়ে গেলাম যে আমার পেটের ভাঁজগুলো ফেটে যেতে লাগল, আর আমার কলিজায় আমি ক্ষুধার কোনো দুর্বলতাও অনুভব করি না!" তিনি বললেন: "নিশ্চয় তা (যমযমের পানি) বরকতময়; নিশ্চয় তা খাদ্যের কাজ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5092)


5092 - عن جابر بن عبد الله، قال: ثم ركب رسول الله صلى الله عليه وسلم فأفاض إلى البيت، فصلّى بمكة الظهر، فأتى بني عبد المطلب يسقون على زمزم، فقال:"انزعوا بني عبد المطلب! فلولا أن يغلبكم الناسُ على سقايتكم لنزعتُ معكم". فناولوه دلوًا فشرب منه.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد، عن أبيه، عن جابر، به. وهو آخر جزء من الحديث الطويل في صفة حجة النبي صلى الله عليه وسلم.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হয়ে বাইতুল্লাহর দিকে গেলেন। তিনি মক্কায় যুহরের সালাত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি বনু আবদুল মুত্তালিবের কাছে আসলেন, যারা যমযমের পানি পান করাচ্ছিল। তিনি বললেন: "হে বনু আবদুল মুত্তালিব! তোমরা (পানি) তোলো। যদি আমার ভয় না হতো যে, মানুষেরা তোমাদের পানি পান করানোর অধিকারের ওপর প্রাধান্য লাভ করবে, তবে আমি অবশ্যই তোমাদের সাথে (বালতি টেনে) পানি তুলতাম।" অতঃপর তারা তাঁকে একটি বালতি দিলেন এবং তিনি তা থেকে পান করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5093)


5093 - عن جابر بن عبد الله: أنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم ذهب إلى زمزم، فشرب منها، وصبَّ على رأسه.

حسن: رواه الإمام أحمد (15243) عن موسى بن داود، حدّثنا سليمان بن بلال، عن جعفر، عن أبيه، عن جابر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل موسي بن داود وهو الضّبيّ من رجال مسلم، مختلف فيه غير أنه حسن الحديث.

قال في التقريب:"صدوق فقيه زاهد له أوهام".

فيا ترى هل قوله:"وصبَّ على رأسه" من أوهامه لانفراده؟ . لأنّ كلَّ من روى صفة حجّة النبيّ صلى الله عليه وسلم من حديث جابر لم يذكر هذه الزّيادة.
فلما نظرنا إلى الأحاديث الأخرى وجدنا أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم حثّ على استعمال ماء زمزم لإبراد الحمّى.




জাবির ইবনু আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যমযমের কাছে গেলেন, অতঃপর তা থেকে পান করলেন এবং তাঁর মাথায়ও ঢেলে দিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5094)


5094 - عن جابر بن عبد الله، قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"ماء زمزم لما شرب له".

حسن: رواه ابن ماجه (3062)، وأحمد (14849)، والبيهقيّ (5/ 148) كلّهم من حديث عبد الله بن المؤمل، أنه سمع أبا الزبير يقول: سمعت جابر بن عبد الله يقول (فذكر الحديث).

قال البيهقيّ:"تفرّد به عبد الله بن المؤمل".

قلت: عبد الله بن المؤمل هو ابن هبة المخزوميّ مختلف فيه، فقال أحمد: أحاديثه مناكير. وقال أبو حاتم: ليس بقوي، ولكن قال ابن معين: صالح الحديث.

ثم هو لم يتفرد به، بل تابعه إبراهيم بن طهمان، قال: ثنا أبو الزبير، قال: كنا عند جابر بن عبد الله فتحدثنا، فحضرت صلاة العصر، فقام فصلى بنا في ثوب واحد قد تلبّب به، ورداؤه موضوع، ثم أُتي بماء من زمزم فشرب. فقالوا: ما هذا؟ قال: هذا ماء زمزم. وقال فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ماء زمزم لما شرب له". قال: ثم أرسل النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو بالمدينة قبل أن تفتح مكة إلى سهيل ابن عمرو:"أن اهدِ لنا من ماء زمزم ولا يترك". قال: فبعث إليه بمزادتين. رواه البيهقيّ (5/ 202).

ونقل ابن الملقن في البدر المنير (6/ 300) عن المنذري أنه قال في كلامه على أحاديث"المهذب":"إنه حديث حسن".

وللحديث إسناد آخر، رواه البيهقيّ في شعب الإيمان (4128) (3/ 481 - 482)، والخطيب في تاريخه (11/ 405) في ترجمة عبد الله بن المبارك، كلاهما من طريق سويد بن سعيد، قال: رأيت ابن المبارك أتي زمزم فملأ إناء، ثم استقبل الكعبة، فقال: اللَّهم إنّ ابن الموال، نا عن ابن المنكدر، عن جابر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"ماء زمزم لما شرب له" وهو ذا أشرب هذا لعطش يوم القيامة، ثم شربه.

قال البيهقيّ:"غريب من حديث ابن أبي الموال، عن ابن المنكدر، تفرّد به سويد عن ابن المبارك من هذا الوجه".

قلت: ابن أبي الموال هو عبد الرحمن بن أبي الموال من رجال البخاريّ، وثقه النسائي، وابن معين، والعجلي، وغيرهم. وقال أبو حاتم: لا بأس به.

وسويد بن سعيد الهروي الأصل، ثم الحدثانيّ مختلف فيه، فضعّفه النسائي، ووثقه العجلي، وأخرج له مسلم.

ولذا قال الشيخ شرف الدين الدمياطيّ:"هذا حديث على رسم الصحيح، فإنّ عبد الرحمن بن أبي الموال انفرد به البخاريّ، وسويد بن سعيد انفرد به مسلم" البدر المنير (6/ 301).

وعزاه المنذريّ في الترغيب والترهيب (1842) إلى أحمد وقال:"بإسناد صحيح. ثم قال: والمرفوع منه رواه عبد الله بن المؤمل أنه سمع أبا الزبير يقول: سمعت جابر بن عبد الله يقول
(فذكره). وهذا إسناد حسن" انتهى.

قلت: عزوه حديث سويد بن سعيد إلى أحمد وهم منه.

كما تعقّب الحافظ في"التلخيص" الدّمياطي فقال: غفل عن أن مسلمًا أخرج لسويد ما توبع عليه، ولا ما انفرد، فضلًا عمّا خولف فيه".

والخلاصة في حديث جابر أنه حسن بمجموع هذه الطرق.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বলতে শুনেছি: "জমজমের পানি যে উদ্দেশ্যে পান করা হয়, তা সেই উদ্দেশ্যেই (উপকারী)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5095)


5095 - عن ابن عباس، قال: سقيتُ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم من زمزم فشرب قائمًا، واستسقى وهو عند البيت.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1637)، ومسلم في الأشربة (2027: 120) كلاهما من طريق عاصم، عن الشعبيّ، عن ابن عباس، فذكره. واللفظ لمسلم.

وعاصم هو الأحول وقال: فحلف عكرمة ما كان يومئذ إلا على بعير. كذا ذكره البخاريّ دون مسلم وعند ابن ماجه (3422):"فذكرت ذلك لعكرمة، فحلف بالله ما فعل".

قلت: إنكار عكرمة هذا عجيب منه؛ لأن ابن عباس يصرّح بأنه سقى النبيّ صلى الله عليه وسلم فشرب قائمًا، فهل يريد أن يكذب ابن عباس! .

مع أنه يمكن الجمع بين قوله:"كان يومئذ على بعير"، وبين قول ابن عباس بأنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بعدما انتهى من الطواف أناخ ناقته فجعل المقام بينه وبين البيت، فصلى ركعتين كما ذكره جابر في صفة حجة النبيّ صلى الله عليه وسلم، وعكرمة نفسه ذكر هذا عن ابن عباس، قال:"إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قدم مكة وهو يشتكي، فطاف على راحلته، كلما أتى الركن استلم الركن بمحجن، فلما فرغ من طوافه أناخ فصلى ركعتين".

رواه أبو داود (1881) من طريق يزيد بن أبي زياد، عن عكرمة.

ويزيد بن أبي زياد هو الهاشميّ مولاهم ضعيف. فلعله شرب زمزم بعد ذلك وهو قائم.

وقد أشار علي بن أبي طالب رضي الله عنه إلى أن النبي صلى الله عليه وسلم شرب قائمًا، وذلك عندما قعد في حوائج الناس في رحبة الكوفة … فشرب وهو قائم، ثم قال: إنّ ناسًا يكرهون الشرب قائمًا، وإنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم صنع مثل ما صنعتُ". رواه البخاريّ في الأشربة (5616).

ولكن هل الشرب قائمًا خاص بماء زمزم؟ فالظّاهر من فعل علي بن أبي طالب أنه ليس خاصًا بماء زمزم، ولم أقف على قول أهل العلم في استحباب شرب ماء زمزم قائمًا.

فماء زمزم وغيره من الماء سواء في شربه قائمًا وقاعدًا.

وأما النهي الوارد عن شرب الماء قائمًا، فهو للتنزيه لا للتحريم، كما سيأتي في موضعه إن شاء الله تعالى.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে যমযমের পানি পান করালাম, তখন তিনি দাঁড়িয়ে পান করলেন এবং বায়তুল্লাহর (কা'বার) নিকটেই পানীয় চাইলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5096)


5096 - عن ابن عباس: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم جاء إلى السِّقاية فاستسقى، فقال العباس: يا فضل! اذهبْ إلى أمَّك فأتِ رسولَ الله صلى الله عليه وسلم بشراب من عندها. فقال:"اسْقِني". قال: يا رسول الله! إنهم يجعلون أيديهم فيه! قال:"اسْقِني". فشرب منه، ثم أتى زمزم وهم يسقون ويعملون فيها، فقال:"اعملُوا فإنّكم على عمل صالح". ثم قال:"لولا أن تُغلبوا لنزلتُ حتّى أضع الحبل على هذه" يعني عاتقه وأشار إلى عاتقه.

صحيح: رواه البخاريّ في الحجّ (1635) عن إسحاق (ابن شاهين)، حدّثنا خالد، عن خالد الحذّاء، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সিকাআতের (পানি পান করানোর স্থান) কাছে এলেন এবং পানি চাইলেন। তখন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, হে ফাযল! তুমি তোমার মায়ের কাছে যাও এবং তার কাছ থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য পানীয় নিয়ে এসো। তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, আমাকে এখান থেকেই পানি দাও। তিনি (আব্বাস) বললেন, ইয়া রাসূলাল্লাহ! লোকেরা এর মধ্যে তাদের হাত ডুবিয়ে দেয় (অর্থাৎ এটা অপরিষ্কার)। তিনি (পুনরায়) বললেন, আমাকে এখান থেকেই পানি দাও। অতঃপর তিনি তা থেকে পান করলেন। এরপর তিনি যমযমের কাছে এলেন, আর তারা (লোকেরা) তখন যমযমের পানি তুলছিল এবং তাতে কাজ করছিল। তখন তিনি বললেন, তোমরা কাজ করতে থাকো, কেননা তোমরা অবশ্যই নেক (সৎ) কাজের ওপর আছ। এরপর তিনি বললেন, যদি তোমাদের দ্বারা পরাজিত হয়ে যাওয়ার ভয় না থাকত, তাহলে আমি নেমে আসতাম এবং এইটির উপর রশি রাখতাম। এই বলে তিনি তাঁর কাঁধের প্রতি ইশারা করলেন (অর্থাৎ তিনি নিজ হাতে পানি তুলতেন)।









আল-জামি` আল-কামিল (5097)


5097 - عن ابن عباس، قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ الحُمّى من فيح جهنّم، فأبردوها بماء زمزم".

صحيح: رواه الإمام أحمد (2649) وصحّحه ابن حبان (6028)، والحاكم (4/ 403) كلّهم من طريق عفان، حدّثنا همام، أخبرنا أبو جمرة، قال: كنتُ أدفع النّاس عن ابن عباس، فاحتبستُ أيامًا، فقال: ما حبسك؟ قلت: الحُمّى. قال: إنّ رسول الله قال (فذكر الحديث).

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، ولم يخرجاه بهذا السّياق".

قلت: وهو كما قال، إلا أنه وهم في استدراكه على البخاريّ؛ لأنّ الحديث رواه البخاريّ (3261) عن عبد الله بن محمد، حدّثنا أبو عامر، حدّثنا همام، بإسناده. وفيه: قال ابن عباس: أبردها عنك بماء زمزم، ثم قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"الحمّى من فيح جهنّم فأبردوها بالماء، أو قال: بماء زمزم" شكّ فيه همام.

فلعلّ الحاكم أخرجه من أجل اليقين بماء زمزم؛ فإنّ البخاريّ لم يخرجه بهذا السّياق -أعني- اليقين.

وعفّان هو ابن مسلم إمام حافظ متقن. قال ابن المديني:"كان إذا شكّ في حرف من الحديث تركهـ". فيقينه مقدّم على من شكّ فيه عن همّام، وهو أبو عامر العقديّ (عبد الملك بن عمرو القيسيّ) الذي روى من طريقه البخاريّ وهو دون عفان بن مسلم في الحفظ والإتقان.

وذكر زمزم في هذا الحديث لا يمنع من إبراد الحمّى بالماء المطلق لمن لا يجد ماء زمزم؛ لأنّ البخاري بعد أن أخرج حديث ابن عباس، وذكر أنه كان بمكة وفيها ماء زمزم، أخرج بعده حديث رافع بن خديج يقول: سمعت النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"الحمّى من فور جهنّم فأبردوها عنكم بالماء".

وكذلك أخرج حديث عائشة وابن عمر إشارة إلى استعمال الماء المطلق لإبراد الحمّى، فمن وجد ماء زمزم يبردها به، ومن لم يجد فيبردها بأيّ ماء وجد.




ইবন আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই জ্বর হলো জাহান্নামের উষ্ণতা, সুতরাং তোমরা তা যমযমের পানি দ্বারা শীতল করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (5098)


5098 - عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"خير ماء على وجه الأرض ماء زمزم، فيه طعام من الطُّعم، وشفاء من السُّقْم. وشرّ ماء على وجه الأرض ماء
بوادي برهوت بحضرموت، عليه كرجل الجراد من الهوام، يصبح يتدفق ويُمسي لا بلال فيه".

حسن: رواه الطبرانيّ في الكبير (11/ 98)، والفاكهي في أخبار مكة (2/ 41)، كلاهما من حديث الحسن بن أحمد بن أبي شعيب الحراني، ثنا مسكين بن بكير، ثنا محمد بن مهاجر، عن إبراهيم بن أبي حرة، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في مسكين بن بكير، وإبراهيم بن أبي حرة غير أنهما حسنا الحديث.

وذكره الهيثميّ في"المجمع" (3/ 286) وقال:"رواه الطبراني في"الكبير" ورجاله ثقات، وصحّحه ابن حبان".

كذا قال:"وصحّحه ابن حبان"! ولم أجد هذا الحديث في"الإحسان في ترتيب صحيح ابن حبان"، ولم يذكره الهيثمي نفسه في"موارد الظمآن"، فيا تُرى هل وهم الهيثميّ في عزوه إلى ابن حبان؟ أو تبع في ذلك المنذري فإنه عزاه أيضًا في"الترغيب والترهيب" (1838) إلى ابن حبان.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "পৃথিবীর উপরিভাগের সমস্ত পানির মধ্যে সর্বোত্তম হলো যমযমের পানি। এটা ক্ষুধার্তের জন্য খাবার এবং রোগীর জন্য আরোগ্য। আর পৃথিবীর উপরিভাগের সমস্ত পানির মধ্যে সবচেয়ে নিকৃষ্ট হলো হাযরামাউতের বারহূত উপত্যকার পানি। এর উপর পঙ্গপালের পায়ের মতো পোকামাকড় থাকে। সকালে তা প্রবাহিত হতে থাকে, কিন্তু সন্ধ্যায় তাতে পান করার মতো কিছুই থাকে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (5099)


5099 - عن محمد بن عبد الرحمن بن أبي بكر، قال: كنت عند ابن عباس جالسًا، فجاءه رجل فقال: من أين جئتَ؟ قال: من زمزم. قال: فشربتَ منها كما ينبغي؟ قال: وكيف؟ قال: إذا شربت منها فاستقبل القبلة، واذكر اسم الله، وتنفّس ثلاثًا، وتضلّع منها. فإذا فرغت فاحمد الله عز وجل، فإنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ آية ما بيننا وبين المنافقين إنهم لا يتضلّعون من زمزم".

حسن: رواه ابن ماجه (3016) عن علي بن محمد، حدثنا عبيد الله بن موسى، عن عثمان بن الأسود، عن محمد بن عبد الرحمن بن أبي بكر، فذكره.

وإسناده حسن من أجل محمد بن عبد الرحمن بن أبي بكر وهو الجمحيّ أبو الثورين، ذكره ابن حبان في الثقات (5/ 375). روى عنه عمرو بن دينار، وعثمان بن الأسود، وكان هذا الرجل معروفًا عند أهل العلم.

قال الدوريّ في تاريخه (421):"سمعت يحيى بن معين يقول: حديث أبي الثورين يحدّث به سفيان بن عيينة يقول: أبو الثورين، ويقول حماد بن سلمة: عن محمد بن عبد الرحمن القرشيّ.

ويقول شعبة: أبو السوار. وكلّهم يحدّث به عن عمرو بن دينار هذا. وأخطأ فيه شعبة إنما هو عمرو ابن دينار عن أبي الثورين وهو محمد بن عبد الرحمن القرشيّ"

قلت: فمثل هذا يحسن حديثه. وقال الحافظ في"التقريب":"مقبول".

قلت: وقد وجدتُ له متابعات ذكرها البيهقي.

منها: ما رواه من طريق عبد الوهاب الثقفي، ثنا عثمان بن الأسود، قال: حدثني جليس لابن
عباس، قال: قال لي ابن عباس: من أين جئتَ؟" فذكر الحديث. أخرجه البيهقي (5/ 147).

فعثمان بن الأسود سمع الحديث من محمد بن عبد الرحمن، كما سمعه أيضًا من الرجل الذي دار الحديث بينه وبين ابن عباس.

ومنها: ما رواه إسماعيل بن زكريا، عن عثمان بن الأسود، عن ابن أبي مليكة، قال:"جاء رجل إلى ابن عباس" فذكر الحديث.

رواه الدارقطني، والبيهقي عن شيخه أبي عبد الله الحاكم وهو في المستدرك (1/ 472). ولكن بدون ذكر ابن أبي مليكة. وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين، إن كان عثمان بن الأسود سمع من ابن عباس". وتعقبه الذهبي فقال:"لا والله! ما لحقه، توفي عام خمسين ومائة، وأكبر مشيخته سعيد بن جبير".

فالظاهر أن هذا سقط القلم من الحكم عند تأليف كتابه، وإلّا فالذي سمع منه البيهقيّ وروى عنه هو بذكر ابن أبي مليكة.

وقد أكّد البيهقيّ أنّ الفضل بن موسى السينانيّ، رواه أيضًا عن عثمان بن الأسود، عن عبد الرحمن بن أبي ملكية:"جاء رجل إلى ابن عباس …" فذكره.

وبهذه المتابعات لا يشك أحدٌ في صحة هذا الحديث، وفي أقل أحواله في تحسينه؛ لأنه ليس فيه منهم.

وقد قال البوصيريّ في زوائد ابن ماجه:"هذا إسناد صحيح، رجاله ثقات، رواه الدارقطني في سننه، والحاكم في المستدرك من طريق عبد الله بن أبي مليكة، عن ابن عباس، ورواه البيهقيّ في سننه الكبرى عن الحاكم".

والتّضلّع: هو الإكثار من الشّرب حتى يتمدّد جنبه وأضلاعه.

وقد رُوي عن ابن عباس مرفوعًا:"ماء زمزم لما شُرب، إن شربتَه تستشفى به شفاك الله، وإن شربتَه لشبعك أشبعك الله، وإن شربته ليقطع ظمأك قطعه الله، وهي هزمة جبريل، وسقيا الله إسماعيل".

رواه الدارقطني (2739) عن عمر بن الحسن بن علي، حدثنا محمد بن هشام بن علي المروزي، حدثنا محمد بن حبيب الجاروديّ، حدثنا سفيان بن عيينة، عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.

وعمر بن الحسن هو الأشناني القاضي ضعّفه الدارقطنيّ في سؤالات الحاكم (252) فقال الذهبي في"الميزان" في ترجمته:"لقد أثم الدارقطني بسكوته عنه، فإنه بهذا الإسناد باطل، ما رواه ابن عيينة قط، بل المعروف من حديث عبد الله بن المؤمل، عن أبي الزبير، عن جابر، مختصرًا".

قلت: ولكن عمر بن الحسن لم ينفرد به، بل رواه الحاكم (1/ 473) عن شيخه علي بن حمشاذ
العدل أبي عبد الله، عن محمد بن هشام، بإسناده نحوه. ولم يذكر:"هزمة جبريل، وسقيا الله إسماعيل".

وزاد فيه:"وكان ابن عباس إذا شرب ماء زمزم قال: اللهم! أسألك علمًا نافعًا، ورزقًا واسعًا، وشفاء من كل داء".

قال الحاكم:"صحيح الإسناد إن سلم من الجاروديّ".

قال المنذري في"الترغيب والترهيب" (1841):"سلم منه فإنه صدوق، قاله الخطيب البغداديّ وغيره، لكن الراوي عنه محمد بن هشام المروزي عنه لا أعرفه. وروى الدارقطني دعاء ابن عباس مفردًا من رواية حفص بن عمر العدني".

وقال ابن القطان في"بيان الوهم والإيهام" (3/ 479):"محمد هذا (يعني الجارودي) قدم بغداد وحدّث بها، كان صدوقًا، لكن الراوي عنه لا يعرف حاله، وهو محمد بن هشام بن علي المروزيّ".

ولكن ظاهر من كلام الحاكم أنه يعرف حاله، إذ لم يتوقف إلا عن الجارودي فقط، قاله ابن الملقن في"البدر المنير" (6/ 302).

وأما قول الذهبي في تأثيم الدارقطني فقال الحافظ في اللسان (4/ 291):"والذي يغلب على الظن أن المؤلف هو الذي أثم بتأثيمه الدارقطني، فإنّ الأشناني لم ينفرد بهذا، تابعه عليه في مستدرك الحاكم، ولقد عجبتُ من قول المؤلف (يعني الذهبي): ما رواه ابن عيينة قطّ مع أنه رواه عنه الحميدي، وابن أبي عمر، وسعيد بن منصور، وغيرهم من حفّاظ أصحابه إلّا أنّهم وقفوه على مجاهد. لم يذكروا ابن عباس فيه، فغايته أن يكون محمد بن حبيب وهم في رفعه". انتهى.

وقلت: وكذلك رواه أيضًا عبد الرزاق في المصنف (9124) عن ابن عيينة بإسناده، موقوفًا عن مجاهد.

وهذا ترجيح من الحافظ ابن حجر على أنه موقوف على مجاهد، وهو أقرب إلى الصّواب، والخلاف قائم بين أهل العلم بأنّ قول التابعي الذي لا مجال للرأي فيه حكمه مرفوع أم لا؟

وقد قيل عن مالك أنه يلحق قول التابعي بقول الصحابي الذي لا مجال للاجتهاد فيه، ولعله من أجل ذلك يكثر من آثار التابعين في كتابه"الموطأ" في مجال الاستدلال بها. وعلى كلّ حال فهو موقوف على مجاهد مع زيادات لم تأت من وجه آخر صحيح.

وفي الباب أيضًا ما رُوي عن معاوية رضي الله عنه موقوفًا.

رواه محمد بن إسحاق الفاكهيّ في أخبار مكة (2/ 37) عن محمد بن إسحاق الصيني (كذا! ولعله: الضّبي)، قال: ثنا يعقوب بن إبراهيم بن سعد، قال: ثنا أبي، عن ابن إسحاق، قال: حدثني يحيى بن عباد بن عبد الله بن الزبير، عن أبيه، قال:"لما حجّ معاوية حججنا معه، فلما طاف بالبيت، وصلى عند المقام ركعتين، ثم مر بزمزم وهو خارج إلى الصفا، فقال: انزع لي منها
دلوًا يا غلام، قال: فنزع له منها دلوًا، فأتي به فشرب منه، وصبّ على وجهه ورأسه ويقول:"زمزم شفاء، هي لما شرب له".

وإسناده حسن، لأن محمد بن إسحاق مدلس وقد صّرح بالتحديث، ومن فوقه ثقات بدون النظر إلى من دونه.

ونقل السخاويّ في المقاصد الحسنة (928) عن شيخه ابن حجر أنه قال:"إنه حسن مع كونه موقوفًا، وأفرد فيه جزءًا".

إلّا أني لم أقف على هذا الجزء، وفي الباب أحاديث أخرى عن حذيفة بن اليمان، وصفية، وغيرهما. وهي كلّها ضعيفة.




আবদুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মুহাম্মাদ ইবনে আবদুর রহমান ইবনে আবী বকর (রহ.) বলেন, আমি তাঁর (ইবনে আব্বাসের) কাছে বসা ছিলাম। তখন এক ব্যক্তি তাঁর কাছে এলো। তিনি জিজ্ঞাসা করলেন: ‘তুমি কোথা থেকে এসেছ?’ লোকটি বলল: ‘যমযম থেকে।’ তিনি (ইবনে আব্বাস) বললেন: ‘তুমি কি তা যথাযথভাবে পান করেছ?’ লোকটি জিজ্ঞাসা করল: ‘কীভাবে?’ তিনি বললেন: ‘তুমি যখন তা পান করবে, তখন কিবলামুখী হবে, আল্লাহর নাম নেবে, তিনবারে শ্বাস নেবে (অর্থাৎ পান করবে) এবং পেট ভরে পান করবে। যখন তুমি পান করা শেষ করবে, তখন পরাক্রমশালী আল্লাহর প্রশংসা করবে। কেননা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয়ই আমাদের (ঈমানদারদের) ও মুনাফিকদের মধ্যে পার্থক্যকারী নিদর্শন হলো—তারা যমযমের পানি পেট ভরে পান করে না।"









আল-জামি` আল-কামিল (5100)


5100 - عن أبي الزبير، قال: كنا عند جابر بن عبد الله فتحدثنا، فحضرت صلاة العصر، فقام فصلى بنا في ثوب واحد قد تلبّب به، ورداؤه موضوع، ثم أُتي بماء من زمزم فشرب. فقالوا: ما هذا؟ قال: هذا ماء زمزم. وقال فيه رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ماء زمزم لما شرب له". قال: ثم أرسل النبيّ صلى الله عليه وسلم وهو بالمدينة قبل أن تفتح مكة إلى سهيل بن عمرو:"أن اهِد لنا من ماء زمزم ولا يترك". قال: فبعث إليه بمزادتين.

حسن: رواه البيهقيّ (5/ 202) من طريقين عن أبي محمد أحمد بن إسحاق بن شيبان البغدادي بهراة، أنا معاذ بن نجدة، ثنا خلاد بن يحيى، ثنا إبراهيم بن طهمان، ثنا أبو الزبير، قال (فذكره).

وإسناده حسن، فإن معاذ بن نجدة وهو الهروي وشيخه خلاد بن يحيى حسنا الحديث، وبقية الرجال الذين فوقهم ثقات، ولا ينظر إلى من بعدهم؛ لأن الحديث قد اشتهر قبلهم، وقد حسّنه المنذريّ كما سبق.

ورواه أيضًا البيهقيّ (5/ 202) من وجه آخر عن هشيم، عن عبد الله بن المؤمل المخزومي، عن ابن محيصن، عن عطاء، عن ابن عباس، قال:"استهدي رسول الله صلى الله عليه وسلم سهيل بن عمرو من ماء زمزم".

وقال: روي ذلك عن عكرمة، عن ابن عباس.

وفيه هشيم وهو ابن بشير الواسطيّ، ثقة ثبت إلّا أنه كان يرسل ويدلّس.

وعبد الله بن المؤمل سبق الكلام عليه، ولكنه لا بأس به في المتابعات والشواهد كما هنا.

وروي عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم أنها كانت تحمل من ماء زمزم، وتخبر أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم كان يحمله.

رواه الترمذيّ (963) عن أبي كريب، حدّثنا خلاد بن يزيد الجعفي، حدثنا زهير بن معاوية، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.

ورواه الحاكم (1/ 485) وعنه البيهقي (5/ 202) من طريق ابن خزيمة، عن محمد بن العلاء بن
كريب، بإسناده، مثله.

قال البيهقيّ: ورواه غيره عن أبي كريب وزاد فيه:"حمله رسول الله صلى الله عليه وسلم في الأداوي والقرب، وكان يصب على المرضى ويسقيهم".

قلت: هكذا رواه البخاري في التاريخ الكبير (3/ 189) في ترجمة خلاد قال: قال أحمد: حدثنا أبو كريب، بإسناده، فذكره. وقال: خلاد لا يتابع عليه.

قلت: خلاد بن يزيد الجعفي لم يوثقه غير ابن حبان، وقال:"ربما أخطأ". وهذا من خطئه فإنه لم يثبت في الأخبار الصحيحة أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم كان يحمل زمزم.

قال الترمذي:"حسن غريب، لا نعرفه إلا من هذا الوجه".

وصحّحه الحاكم وتعقّبه الذهبي فقال: خلاد لا يتابع عليه كما قال البخاريّ.

وقال البيهقي في"شعب الإيمان" (3/ 482):"تفرّد به خلاد بن يزيد الجعفيّ هذا". وضعّفه الحافظ في التلخيص (2/ 287) وذلك لتفرده، وإلّا فهو ليس بضعيف مطلقًا، فلو توبع لقبلت متابعته وأجاد في التقريب عندما قال:"صدوق ربما وهم".

وإنما الذي جاء في الأخبار أنه صلى الله عليه وسلم أهدي له ماء زمزم، وكان السّلف يحملونه.




জাবির ইবন আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আবূয যুবাইর বলেন: আমরা জাবির ইবন আব্দুল্লাহর নিকট ছিলাম এবং আমরা আলাপ-আলোচনা করছিলাম। অতঃপর আসরের সালাতের সময় হলো। তিনি উঠে দাঁড়ালেন এবং আমাদেরকে নিয়ে এক কাপড়ে সালাত আদায় করলেন, যা তিনি (শরীরে) পেঁচিয়ে জড়িয়ে রেখেছিলেন, আর তাঁর চাদরটি রাখা ছিল। এরপর তাঁর নিকট যমযমের পানি আনা হলো এবং তিনি তা পান করলেন। লোকেরা জিজ্ঞেস করল, এটি কী? তিনি বললেন, এটি যমযমের পানি। আর এ সম্পর্কে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যমযমের পানি যে উদ্দেশ্যে পান করা হয়, তা সে উদ্দেশ্যেই ফলদায়ক।" তিনি বলেন: অতঃপর মক্কা বিজয়ের পূর্বে যখন নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মদীনায় ছিলেন, তখন তিনি সুহাইল ইবন আমর-এর কাছে লোক পাঠালেন এই মর্মে যে, "আমাদের জন্য যমযমের পানি পাঠাও এবং তা যেন কম না হয়।" তিনি বলেন, অতঃপর সুহাইল তাঁর (নবীর) নিকট দুই মশক পানি পাঠালেন।