আল-জামি` আল-কামিল
5101 - عن وعن ابن عباس: أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم شرب ماءٌ في الطّواف.
حسن: رواه ابن خزيمة (2750)، وابن حبان (3837)، والحاكم (1/ 460)، والبيهقي (5/ 86) كلّهم من طريق العباس بن محمد الدّوري، ثنا أبو غسّان مالك بن إسماعيل بن درهم، أخبرنا عبد السلام بن حرب، عن شعبة، عن عاصم، عن الشعبي، عن ابن عباس، فذكره.
قال الحاكم:"هذا حديث غريب صحيح، ولم يخرجاه بهذا اللّفظ".
وقال ابن خزيمة: الرّخصة في الشرب في الطواف إن ثبت الخبر، فإن في القلب من هذا الإسناد، وأنا خائف أن يكون عبد السلام أو من دونه وهم في هذه اللّفظة أعني في قوله:"في الطّواف".
قلت: عبد السلام بن حرب هو الملائيّ من رجال الجماعة مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إذا لم يكن في حديثه ما ينكر عليه وقد وجدنا لحديثه ما يشهد له.
ولذا تعقّب بنُ التّركمانيّ قول البيهقيّ تبعًا لشيخه الحاكم:"هذا غريب بهذا اللّفظ".
فقال ابن التركماني:"إسناده جيد، وشيخ البيهقيّ فيه هو الحاكم، قد أخرجه في مستدركهـ، وصحّحه، وأخرجه ابن حبان أيضًا في صحيحه عن هارون بن عيسى، عن ابن عباس بسنده. ولا يلزم من قول البيهقيّ:"غريب" عدم ثبوته، وقد شهد له ما أخرجه ابن أبي شيبة في مصنفه (4/
412)، فقال: حدّثني يحيى بن يمان، عن سفيان، عن منصور، عن خالد بن سعد، عن أبي مسعود أنه عليه السلام استسقي وهو يطوف بالبيت، فأتى بذنوب نبيذ السقاية فشربه". انتهي.
قلت: فيه خالد بن سعد هو الكوفيّ مولى أبي مسعود الأنصاريّ مختلف فيه، وذكر هذا الحديث البخاريّ في"التاريخ الأوسط" بهذا الإسناد وقال:"لا يصح". وذكره ابن عدي في"الكامل" (3/ 900) من جملة منكراته.
وقال الحافظ ابن حجر في"تهذيب التهذيب" (3/ 94):"ورواه يحيي بن سعيد، عن سفيان موقوفًا. وهو الصّحيح".
وروى عبد الرزاق (9796)، وابن أبي شيبة من طريق ابن أبي ليلى، عن عكرمة بن خالد، قال: أخبرني شيخ من آل وداعة:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم شرب وهو يطوف بالبيت".
وفيه علّتان: الأولى: ابن أبي ليلي سيء الحفظ.
والثانية: شيخ من آل وداعة مجهول، ولم يصرح بالسماع من النبيّ صلى الله عليه وسلم. نقل البيهقيّ عن الشّافعيّ أنه قال:"وروي من وجه لا يثبت أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم شرب وهو يطوف".
قال ابن التركماني:"لعلّ هذا الحديث (أي حديث شيخ من آل وداعة) هو الذي أراده الشافعيّ فإنّ فيه علتين". فذكرهما ونفى أن يكون الشافعي أراد به حديث ابن عباس الذي صدرنا به الباب.
وكان ابن عباس، وعطاء، وطاوس، ومجاهد، والثوري لا يرون بأسًا أن يشرب الرجل وهو يطوف بالبيت، كما ذكر ذلك عنهم ابن أبي شيبة، وعبد الرزاق في مصنفهما.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাওয়াফের সময় পানি পান করেছিলেন।
5102 - عن بكر بن عبد الله المزني قال: كنت جالسا مع ابن عباس عند الكعبة، فأتاه أعرابيٌّ، فقال: ما لي أرى بني عمِّكم يسقون العسل واللَّبن، وأنتم تسقون النّبيذ؟ أمن حاجة بكم أم من بخل؟ فقال ابن عباس: الحمد لله ما بنا من حاجة ولا بخل، قدم النبي صلى الله عليه وسلم على راحلته وخلفه أسامة فاستقى، فأتيناه بإناء من نبيذ، فشرب وسقى فضله أسامة، وقال:"أحستم وأجملتم، كذا فاصنعوا". فلا نريد تغيير ما أمر به رسول الله صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1316) عن محمد بن المنهال الضّرير، حدّثنا يزيد بن زريع، حدثنا حميد الطّويل، عن بكر بن عبد الله المزنيّ، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (3528) من وجه آخر عن حماد، عن حميد، وفيه:"ما شأن آل معاوية يسقون الماء والعسل، وآل فلان يسقون اللّبن".
বকর ইবনু আব্দুল্লাহ আল-মুযানী (রাহিমাহুল্লাহ) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সঙ্গে কা'বার পাশে বসা ছিলাম, তখন তাঁর কাছে একজন বেদুঈন আসলো। সে বলল: কী ব্যাপার! আমি দেখছি যে আপনাদের চাচাতো ভাইয়েরা মধু ও দুধ পান করাচ্ছে, আর আপনারা পান করাচ্ছেন নাবীয? এটা কি আপনাদের অভাবের কারণে, নাকি কৃপণতার কারণে? ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহর প্রশংসা, আমাদের অভাবও নেই, আর কৃপণতাও নেই। (ঘটনা হলো এই যে) নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সওয়ারীর উপর আরোহন করে এলেন, আর তাঁর পিছনে ছিলেন উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। তিনি পানীয় চাইলেন। তখন আমরা তাঁকে নাবীয ভর্তি একটি পাত্র এনে দিলাম। তিনি তা পান করলেন এবং অবশিষ্টটুকু উসামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে পান করালেন। আর তিনি বললেন: “তোমরা উত্তম কাজ করেছ এবং সুন্দর কাজ করেছ। তোমরা এভাবেই করো।” সুতরাং রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যা আদেশ করেছেন, আমরা তা পরিবর্তন করতে চাই না।
5103 - عن عائشة، قالت: فطاف الذين أهلُّوا بالعمرة بالبيت، وبالصّفا والمروة، ثم حلُّوا، ثم طافوا طوافًا آخر بعد أن رجعوا من منًى لحجِّهم. وأمّا الذين كانوا جمعوا الحجَّ والعمرة، فإنّما طافوا طوافًا واحدًا … الحديث.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1556)، ومسلم في الحج (1211: 111) كلاهما من طريق مالك، عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، عن عائشة، فذكرته. وهو جزء من حديث سبق ذكره بتمامه.
وبهذا قال جمهور أهل العلم، وفي رواية عند أحمد: المتمتع يكفيه السعي الأول، واستحب السعي مرة ثانية.
قولها:"فإنما طافوا طوافًا واحدًا" أي سعيًا واحدًا، والطواف هنا المقصود منه السعي.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: যারা উমরার ইহরাম বেঁধেছিল, তারা বায়তুল্লাহর তাওয়াফ এবং সাফা-মারওয়ার সাঈ করল, এরপর হালাল হয়ে গেল। অতঃপর তারা মিনাহ্ থেকে ফিরে এসে তাদের হজ্জের জন্য পুনরায় আরেকটি তাওয়াফ করল। আর যারা হজ্জ ও উমরাহ একত্রে করেছিল, তারা কেবল একটি তাওয়াফ করেছিল।
5104 - عن ابن عمر أنه كان يرمي الجمرة الدنيا بسبع حصيات، يكبر على إثر كل حصاة، ثم يتقدم حتى يسهل، فيقوم مستقبل القبلة، فيقوم طويلا، ويدعو ويرفع يديه، ثم يرمي الوسطى ثم يأخذ ذات الشمال فيستهل، ويقوم مستقبل القبلة، فيقوم طويلا، ويدعو ويرفع يديه، يقوم طويلا، ثم يرمي جمرة ذات العقبة من بطن الوادي، ولا يقف عندها، ثم ينصرف، فيقول: هكذا رأيت النبي صلى الله عليه وسلم يفعله.
صحيح: رواه البخاري في الحج (1751) عن عثمان بن أبي شيبة، حدثنا طلحة بن يحيي، حدثنا يونس، عن الزهري، عن سالم، عن ابن عمر، فذكره.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ছোট জামরায় সাতটি কংকর নিক্ষেপ করতেন। প্রতিটি কংকর নিক্ষেপের পর তিনি তাকবীর (আল্লাহু আকবার) বলতেন। অতঃপর তিনি সম্মুখে এগিয়ে যেতেন, যেখানে ভূমি সমতল হত। সেখানে তিনি কিবলামুখী হয়ে দীর্ঘক্ষণ দাঁড়িয়ে থাকতেন, দু‘আ করতেন এবং হাত তুলে প্রার্থনা করতেন। এরপর তিনি মধ্যম জামরায় কংকর নিক্ষেপ করতেন। এরপর তিনি বাম দিকে যেতেন এবং সেখানে সমতল ভূমিতে কিবলামুখী হয়ে দীর্ঘক্ষণ দাঁড়িয়ে থাকতেন, দু‘আ করতেন এবং দু’হাত তুলে প্রার্থনা করতেন। এরপর তিনি উপত্যকার নিচ থেকে জামরাত আল-আক্বাবায় (বড় জামরা) কংকর নিক্ষেপ করতেন, কিন্তু এর কাছে তিনি থামতেন না। অতঃপর তিনি ফিরে আসতেন এবং বলতেন: আমি নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে এভাবেই করতে দেখেছি।
5105 - عن وَبَرة، قال: سألتُ ابن عمر رضي الله عنهما: متى أرمي الجمار؟ قال: إذا رمي إمامُك فارْمِه، فأعدتُ عليه المسألة، قال: كنّا نتحيَّنُ، فإذا زالت الشّمس رمينا.
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1746) عن أبي نعيم (هو الفضل بن دكين)، حدّثنا مسعر (هو ابن كدام)، عن وَيرة (هو ابن عبد الرحمن المسلي)، به، فذكره.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। ওয়াবারা বলেন, আমি ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: আমি কখন জামারায় (শয়তানের স্তম্ভে) পাথর নিক্ষেপ করব? তিনি বললেন: যখন তোমার ইমাম (নেতা) পাথর নিক্ষেপ করবে, তুমিও নিক্ষেপ করবে। আমি তাঁর কাছে প্রশ্নটি আবার করলাম। তিনি বললেন: আমরা (সঠিক) সময় অনুসন্ধান করতাম, আর যখন সূর্য ঢলে যেত, আমরা পাথর নিক্ষেপ করতাম।
5106 - عن جابر، قال: رمي رسول الله الجمرة يوم النّحر ضُحي، وأما بعد فإذا زالت الشمس.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1299: 314) من طريقين عن ابن جريج، قال في أحدهما: أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله، فذكره.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানীর দিন (নাহরের দিন) জামরায় (পাথর) নিক্ষেপ করেছিলেন পূর্বাহ্ণে (সূর্য উপরে উঠার পর)। কিন্তু এরপর (অর্থাৎ তাশরীকের দিনগুলোতে) তিনি তা করতেন সূর্য ঢলে যাওয়ার পর।
5107 - عن عائشة، قالت: أفاض رسول الله صلى الله عليه وسلم من آخر يومه حين صلّى الظهر، ثم رجع إلى مني فمكث بها ليالي أيام التشريق، يرمي الجمرة إذا زالت الشمس كلّ جمرة بسبع حصيات يكبِّر مع كلّ حصاة، ويقف عند الأولى والثانية فيطيل القيام، ويتضرّع، ويرمي الثالثة، ولا يقف عندها.
حسن: رواه أبو داود (1973) من طرق عن أبي خالد الأحمر، عن محمد بن إسحاق، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته.
ورواه الإمام أحمد (24592)، وصحّحه ابن خزيمة (2956)، وابن حبان (3868)، والحاكم (1/ 477 - 478) كلّهم من طريق محمد بن إسحاق، بإسناده، مثله.
قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".
قلت: وذلك على مذهبه، وإلا فمحمد بن إسحاق ليس على شرط مسلم، وإنما رواه عنه مقرونًا، ثم هو مدلس ولكنه صرّح في رواية ابن حبان.
وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس، قال:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يرمي الجمار إذا زالت الشمس".
رواه الترمذيّ (898) عن أحمد بن عبدة الضّبيّ البصريّ، حدّثنا زياد بن عبد الله، عن الحجاج، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس، فذكره.
قال الترمذيّ:"حسن".
قلت: فيه الحجاج وهو ابن أرطاة ضعيف مدلس ضعّفه النسائي وغيره.
ومن طريقه رواه أيضًا الإمام أحمد (2231)، ورواه ابن ماجه (3054) من وجه آخر عن الحكم، ولكن فيه شيخه جبارة بن المغلس ضعيف، وشيخه إبراهيم بن عثمان بن أبي شيبة متروك.
وفي أحاديث الباب دليل على أنّ السنة أن يرمي الجمار في غير يوم النحر بعد الزوال. وبه قال جمهور أهل العلم من الأئمة الأربعة وغيرهم.
وقال عطاء وطاوس: يجوز قبل الزوال.
ورخّص الحنفية الرّمي في يوم النّفر قبل الزوال، وبه قال أيضًا إسحاق. انظر: الفتح (3/ 580).
وروي ذلك عن ابن عباس أيضًا: قال: إذا انتفخ النّهار من يوم النّفر الآخر فقد حلّ الرّمي والصّدر. رواه البيهقيّ (5/ 152).
وقال:"وفيه طلحة بن عمرو المكي ضعيف".
وفي رواية عند الحنفية جواز الرمي في أيام التشريق كلها قبل الزوال قياسًا على رمي يوم النحر.
انظر: البدائع (2/ 137 - 138)، والمجموع للنووي (8/ 282).
وانظر للمزيد:"المنة الكبرى" (4/ 325 - 326).
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর দিনের শেষ দিকে যখন যোহরের সালাত আদায় করলেন, তখন (মক্কা থেকে ফিরা শুরু করলেন)। অতঃপর তিনি মিনায় ফিরে এসে আইয়ামে তাশরীক্বের রাতগুলোতে সেখানে অবস্থান করলেন। তিনি সূর্য ঢলে যাওয়ার পর জামারাহতে পাথর নিক্ষেপ করতেন। প্রতিটি জামারাহতে সাতটি করে কঙ্কর মারতেন এবং প্রতিটি কঙ্কর নিক্ষেপের সময় তাকবীর বলতেন। তিনি প্রথম ও দ্বিতীয় (জামারাহর) কাছে দাঁড়িয়ে দীর্ঘ সময় অবস্থান করতেন এবং বিনয় ও কাকুতি মিনতি করতেন (দোয়া করতেন)। আর তৃতীয়টিতে (জামারাতুল আকাবা) পাথর নিক্ষেপ করতেন, কিন্তু এর কাছে দাঁড়াতেন না।
5108 - عن عبد الله بن عمر: أنّ العبّاس رضي الله عنه استأذن النبيَّ صلى الله عليه وسلم ليبيت بمكة ليالي منى، من أجل سقايته فأذن له.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1745)، ومسلم في الحج (1315) كلاهما من طريق عبد الله بن نمير، حدّثنا عبيد الله (هو ابن عمر العمريّ)، حدثني نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وفي الباب ما رُوي عن ابن عباس، قال:"لم يرخِّص النّبيُّ صلى الله عليه وسلم لأحد يبيت بمكة إلاّ للعباس من أجل السّقاية".
رواه ابن ماجه (3066) عن علي بن محمد، وهناد بن السّريّ، قالا: حدّثنا أبو معاوية، عن إسماعيل بن مسلم، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.
وفيه إسماعيل بن مسلم المكي أبو إسحاق ضعّفه ابن معين، وأبو زرعة، وأبو حاتم، والنسائي وغيرهم.
وفي الباب ما رُوي أيضًا عن عبد الرحمن بن فروخ يسأل ابن عمر، قال:"إنّا نتبايع بأموال النّاس فيأتي أحدنا مكة فيبيت على المال. فقال: أما رسول الله صلى الله عليه وسلم فبات بمنى وظلّ".
رواه أبو داود (1958) عن أبي بكر محمد بن خلاد الباهلي، حدّثنا يحيى، عن ابن جريج، حدثني حريز -أو أبو حريز (الشك من يحيي) - أنه سمع عبد الرحمن بن فروخ، فذكره.
وحريز -أو أبو حريز-"مجهول" كما في"التقريب".
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে মিনার রাতগুলোতে মক্কায় অবস্থান করার জন্য অনুমতি চাইলেন, তাঁর হাজীদের পানি পান করানোর (সাকায়া) কাজের কারণে। তখন তিনি তাকে অনুমতি দিলেন।
5109 - عن عاصم بن عديّ: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أرخص لرِعاء الإبل في البيتوتة خارجين عن مني، يرمون يوم النّحر، ثم يرمون الغد، ومن بعد الغد ليومين، ثم يرمون يوم النّفر.
صحيح: رواه مالك في الحج (218) عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم، عن أبيه، أنّ أبا البدّاح ابن عاصم بن عدي، أخبره عن أبيه، فذكره.
وإسناده صحيح، وأبو البدّاح يقال: كنيته أبو عمرو، وأبو البدّاح لقب. ويقال: اسمه: عدي، البلويّ حليف الأنصار، وهو ثقة كما في التقريب.
وهو مشهور من التابعين كما قال الحاكم، والذهبي، ووهم من ذكره في الصحابة كما قال
ابن حجر.
ورواه أبو داود (1975)، والترمذي (955)، والنسائي (3069)، وابن ماجه (3037)، وصحّحه ابن خزيمة (2975)، وابن حبان (3888)، والحاكم (1/ 478) كلّهم من طريق مالك، به، نحوه. إلّا ابن حبان فإنه رواه من حديث سفيان بن عيينة، عن عبد الله بن أبي بكر، بإسناده، مثله.
ولفظ أبي داود مثله، ولفظ النسائي نحوه، ولفظ الترمذي وابن ماجه:" … أن يرموا يوم النّحر، ثم يجمعوا رمي يومين بعد النّحر، فيرمونه في أحدهما -قال مالك: ظننتُ أنه قال: في الأول منهما-، ثم يرمون يوم النّفر".
وقال الترمذي:"حديث حسن صحيح، وهو أصح من حديث ابن عيينة، عن عبد الله بن أبي بكر".
قلت: حديث ابن عيينة. رواه الترمذيّ نفسه (954)، وأبو داود (1976)، والنسائي (3068)، وابن ماجه (3036)، وصححه ابن خزيمة (2977)، وابن حبان (3888)، والحاكم (1/ 478) كلّهم عنه، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم - وزاد أبو داود: وعن محمد ابني أبي بكر، عن أبيهما، عن أبي البدَّاح بن عدي، عن أبيه: أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أرخص للرعاة أن يرموا يومًا ويدعوا يومًا.
وإسناده صحيح، وأبو البداح بن عدي هو ابن عاصم بن عدي نسب في هذه الرواية إلى جده، وأبوه عاصم بن عدي كما قال البيهقيّ (5/ 151) عقب رواية الحديث من طريق أبي داود. قال:"هكذا رواه سفيان بن عيينة. وكذلك قال روح بن القاسم عن عبد الله بن أبي بكر. وكأنهما نسبا أبا البداح إلى جدّه، وأبوه عاصم بن عدي".
وعاصم بن عدي هو صاحب اللّعان الصحابي المشهور.
ونظرًا لكون حديث ابن عيينة اختصارًا مخلًا للمعني رجّح الترمذيّ رواية مالك، وقد سبقه يحيي بن معين، فقد رواه عن سفيان بن عيينة، ثم قال:"وكلام سفيان هذا خطأ إنما هو كما قال مالك بن أنس قال يحيي: فكان سفيان لا يضبطه كان إذا حدث به يقول: ذهب عليَّ من هذا الحديث شيءٌ" انظر تاريخ ابن معين برواية الدّوريّ (646).
ولكن من أهل العلم من جمعوا بين رواية ابن عيينة ورواية مالك، فقالوا: إنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم رخّص للرعاء في ترك رمي الجمار يومًا ويرموا يومًا (أي ليومين من أيام التّشريق)، ثم يوم النّفر. انظر كلام ابن خزيمة (4/ 320).
قال مالك عقب الحديث في"الموطأ":"تفسير الحديث الذي أرخص رسولُ الله صلى الله عليه وسلم لرعاء الإبل في تأخير رمي الجمار، فيما نُري -والله أعلم- أنّهم يرمون يوم النّحر، فإذا مضى اليوم الذي يلي يوم النّحر رموا من الغد، وذلك يوم النّفر الأوّل، فيرمون لليوم الذي مضى، ثم يرمون ليومهم ذلك؛ لأنّهم لا يقضي أحدٌ شيئًا حتى يجب عليه، فإذا وجب عليه ومضى كان القضاءُ بعد ذلك،
فإنْ بدا لهم النَّفر فقد فرغوا، وإن أقاموا إلى الغد رموا مع الناس يوم النّفر الآخر ونفروا".
قال الخطّابي في"معالمه": وقال الشافعي نحوّا من قول مالك. وقال بعضهم:"هم بالخيار إن شاؤا قدموا وإن شاؤا أخّروا".
আসিম ইবনে আদী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উটের রাখালদের জন্য মিনার বাইরে রাত্রি যাপনের অনুমতি প্রদান করেন। তারা কুরবানির দিন (১০ যিলহজ) কঙ্কর নিক্ষেপ করবে, এরপর তারা পরের দিন (১১ যিলহজ) এবং তার পরের দিন (১২ যিলহজ)-এর দুই দিনের (কঙ্কর) একসাথে নিক্ষেপ করবে, অতঃপর তারা নাফরের দিন (১৩ যিলহজ) নিক্ষেপ করবে।
5110 - عن عبد الله بن عمر: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رخص لرِعاء الإبل أن يرموا بالليل.
حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1139) - والبيهقي (5/ 151) كلاهما من حديث عبد الأعلى ابن حماد، ثنا مسلم بن خالد، ثنا عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في مسلم بن خالد، وهو الزنجي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث، وقد حسَّنَه أيضا الحافظ في التلخيص (2/ 263).
وبمعناه روي أيضا عن ابن عباس. رواه البيهقي من طريق عطاء بن أبي رباح عنه، وفيه عمر بن قيس وهو المكي، المعروف بـ (سندل) ضعيف جدا، والصحيح فيه أنه من مرسل عطاء بن أبي رباح، كما رواه البيهقي بإسناد صحيح عنه.
وفي معناه رُوي أيضا عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رخّص للرّعاة أنّ يرموا باللّيل، وأيّ ساعة من النّهار شاؤوا". إلا أنه ضعيف أيضا.
رواه الدارقطني (2685) من طريق بكر بن بكار، حدّثنا إبراهيم بن يزيد، حدّثنا سليمان الأحول، عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جدّه.
وبكر بن بكار وشيخه إبراهيم بن يزيد وهو الخوزي ضعيفان، وإن كان شيخه أسوأ حالًا منه.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম উটের রাখালদেরকে রাতে কংকর নিক্ষেপ করার অনুমতি দিয়েছিলেন।
5111 - عن عبد الله بن عباس، قال: أُمر النّاس أن يكون آخر عهدهم بالبيت، إلّا أنه خُفِّف عن الحائض.
متفق عليه: رواه البخاري في الحج (1755)، ومسلم في الحج (1328: 380) كلاهما من طريق سفيان (هو ابن عيينة)، عن ابن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, মানুষকে নির্দেশ দেওয়া হয়েছে যে তাদের শেষ কাজটি যেন বায়তুল্লাহর সাথে হয় (অর্থাৎ বিদায়ী তাওয়াফ করা)। কিন্তু ঋতুমতী নারীর ক্ষেত্রে তা শিথিল করা হয়েছে।
5112 - عن عبد الله بن عباس قال: كان الناس ينصرفون في كلِّ وجه، فقال رسولُ الله صلى الله عليه وسلم:"لا ينفرنَّ أحدٌ حتّى يكون آخرُ عهده بالبيت".
صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1327) من طريق سفيان (هو ابن عيينة)، عن سليمان الأحول، عن طاوس، عن ابن عباس، قال (فذكره).
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, লোকেরা (হজ সমাপনের পর) বিভিন্ন দিকে (যার যার গন্তব্যের উদ্দেশ্যে) ফিরে যাচ্ছিল। অতঃপর রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "কেউ যেন (মক্কা থেকে) প্রস্থান না করে, যতক্ষণ না বায়তুল্লাহর সাথে তার শেষ সাক্ষাৎ হয়।"
5113 - عن عائشة، أنّها قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: يا رسول الله، إنّ صفيّة بنت حُييّ قد حاضت؟ قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لعلّها تحبسُنا، ألم تكن طافتْ معكنَّ؟" فقالوا:
بلي، قال:"فاخرجي".
متفق عليه: رواه مالك في الحج (226) عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم، عن أبيه، عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة، به، فذكرته.
ورواه البخاريّ في الحيض (328) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك، به، مثله. ورواه مالك أيضًا في الحجّ (225) ومن طريقه البخاريّ في الحجّ (1757) عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، نحوه.
ورواه البخاريّ في الحجّ أيضًا (1561)، ومسلم في الحج (1211: 128) من طريق جرير، عن منصور، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، به، مطوّلًا. وفي آخره: قالت صفية:"ما أُراني إلّا حابستكم؟ قال:"عقرى حلقي، أو ما كنت طفتِ يوم النّحر؟" قالت: بلى. قال:"لا بأس، انفري". واللفظ لمسلم.
قوله:"عقْري حلْقي". قيل: يعني عقر الله جسدها وأصابها بوجع في حلقها.
وقيل: معناه تعقر قومها وتحلقهم بشؤمها، وقيل: العقرى الحائض. وقيل: معناه جعلها الله عاقرًا لا تلد، وحلقي مشؤومة على أهلها.
نقل هذه الأقوال النووي في شرحه على مسلم (8/ 153) ثم قال:"وعلى كل قول فهي كلمة كان أصلها ما ذكرناه، ثم اتّسعت العرب فيها فصارت تطلقها ولا تريد حقيقة ما وضعت له أولا، ونظيره: تربت يداه، وقاتله الله ما أشجعه".
وقوله صلى الله عليه وسلم:"لعلّها تحبسنا" يعني أنّها إذا ما طافتْ طواف الإفاضة فهي تحبسنا أي ننتظر حتى تطهر وتغتسل وتطوف ثم نرحل.
هذا هو الأصل في هذه المسألة بأنّ المرأة إذا حاضت قبل أن تطوف طواف الإفاضة فهي تبقى في مكة حتى تطهر وتطوف.
وأما إذا تعذّر المقام عليها بمكة فهي لا تخلو من حالين:
إما أن تكون قريبة من مكة حيث يتيسّر لها الرجوع إلى مكة بعد الطهارة، فترجع إلى بلدها وهي محرمة، ولا يحل وطؤها حتى تطهر فتعود إلى مكة للطواف.
وإما أن تكون بعيدة عن مكة يتعذّر عليها الرجوع إلى مكة مرة أخرى، فتطوف على حالها، وترجع إلى بلدها. وهذه خلاصة ما ذهب إليه شيخ الإسلام ابن تيمية في فتاواه (26/ 185) وما بعدها.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: “ইয়া রাসূলাল্লাহ! সাফিয়্যা বিনতে হুয়াই (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ঋতুবতী হয়ে গেছেন?” রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: “সম্ভবত সে আমাদের আটকে দেবে। সে কি তোমাদের সাথে (তাওয়াফে ইফাদা) সম্পন্ন করেনি?” তারা বললেন: “হ্যাঁ।” তিনি বললেন: “তাহলে তোমরা (মক্কা থেকে) বেরিয়ে পড়ো।”
5114 - عن عائشة، قالت: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في ليالي الحج وذكرت الحديث، قالت: حتى تفرنا من مني، فنزلنا المحصّب، فدعا عبد الرحمن، فقال:"اخرج بأختك الحرم، فلتُهل بعمرة، ثم افرغا من طوافكما، أنتظركما ها هنا". فأتينا في
جوف الليل، فقال:"فرغتما؟". قلت: نعم، فنادى بالرّحيل في أصحابه، فخرج فمرَّ بالبيت، فطاف به قبل صلاة الصّبح، ثم خرج إلى المدينة.
متفق عليه: رواه البخاري في الحجّ (1788)، ومسلم في الحجّ (1211: 123) كلاهما من حديث أفلح بن حميد، عن القاسم بن محمد، عن عائشة، فذكرته. واللّفظ لمسلم، ولفظ البخاريّ:"فارتحل النّاس ومن طاف بالبيت". حاول الحافظ الإجابة عن هذه العبارة، ثم رأى أنه وقع فيها تحريف، وقال:"والصواب: فارتحل الناس، ثم طاف بالبيت" كما وقع عند أبي داود (2005)، ومسلم" انتهى.
وفي صحيح ابن خزيمة (2998) من طريق أفلح بن حميد: فارتحل الناسُ، فمرَّ بالبيت قبل صلاة الصّبح، فطاف به، ثم خرج فركب، ثم انصرف متوجهًا إلى المدينة.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লামের সাথে হজ্জের রাতে বের হলাম... তিনি (পুরো ঘটনাটি) বর্ণনা করলেন। তিনি বলেন: অবশেষে আমরা মিনা থেকে ফিরে এলাম এবং আল-মুহাস্সাব নামক স্থানে অবতরণ করলাম। তখন তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবদুর রহমানকে ডাকলেন এবং বললেন: "তোমার বোনকে সাথে নিয়ে হারাম (মক্কার হারামের সীমানা) থেকে বের হও। সে যেন উমরার ইহরাম বাঁধে। অতঃপর তোমরা দু'জন তোমাদের তাওয়াফ শেষ করো। আমি তোমাদের জন্য এখানে অপেক্ষা করব।" আমরা রাতের মাঝামাঝি সময়ে ফিরে এলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তোমরা কি অবসর হয়েছ?" আমি বললাম: "হ্যাঁ।" অতঃপর তিনি তাঁর সাহাবীদের মাঝে সফরের (যাত্রা শুরুর) ঘোষণা দিলেন। তিনি বের হলেন এবং বায়তুল্লাহর পাশ দিয়ে গেলেন। ফজরের সালাতের পূর্বে তিনি তা তাওয়াফ করলেন। এরপর তিনি মদীনার উদ্দেশে রওনা হলেন।
5115 - عن عائشة، أنّها قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: يا رسول الله، إنّ صفيّة بنت حُييّ قد حاضت، قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لعلّها تحبسُنا، ألم تكن طافتْ معكنَّ؟" فقالوا: بلي، قال:"فاخرجي".
متفق عليه: رواه مالك في الحج (226) عن عبد الله بن أبي بكر بن حزم، عن أبيه، عن عمرة بنت عبد الرحمن، عن عائشة، به، فذكرته. ورواه البخاريّ في الحيض (328) عن عبد الله بن يوسف، أخبرنا مالك، به، مثله.
ورواه البخاريّ في الحجّ أيضًا (1561)، ومسلم في الحج (1211: 128) من طريق جرير، عن منصور، عن إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، به، مطوّلًا. وقد مضى قريبًا.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে, তিনি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ, সাফিয়্যাহ বিনতে হুয়াইয়্য (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এর মাসিক শুরু হয়ে গিয়েছে। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেন: "সম্ভবত সে আমাদের আটকে দেবে। সে কি তোমাদের সাথে (বিদায়ী) তাওয়াফ করেনি?" তারা বলল: হ্যাঁ, করেছে। তিনি বললেন: "তাহলে তোমরা রওনা হও।"
5116 - عن عكرمة: أنّ أهل المدينة سألوا ابن عباس رضي الله عنهما، عن امرأة طافت، ثم حاضتْ؟ قال لهم: تنفرُ. قالوا: لا نأخذُ بقولك وندع قول زيد. قال: إذا قدمتم المدينة فسلُوا، فقدموا المدينة فسألوا، فكان فيمن سألوا أمَّ سُليم (فذكرتْ حديث صفيّة).
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1758: 1759) من طريق أيوب، عن عكرمة، به، فذكره.
ورواه مسلم في الحجّ (1328: 381) من طريق الحسن بن مسلم، عن طاوس، قال:"كنتُ مع ابن عباس، إذ قال زيد بن ثابت: تُفتي أنّ تصدُر الحائض قبل أن يكون آخر عهدها بالبيت؟ فقال له ابن عباس: إمّا لا! فسلْ فلانة الأنصاريّة، هل أمرها بذلك رسولُ الله صلى الله عليه وسلم؟ قال: فرجع زيد ابن ثابت إلى ابن عباس يضحك، وهو يقول: ما أراك إلّا قد صدقت".
والأنصاريّة الظاهر أنّها أمُّ سُليم المذكورة في رواية عكرمة عند البخاريّ. بل وجزم الحافظ في
الفتح (3/ 588) بذلك.
وأمُّ سليم هي ابنة ملحان، وهي أمُّ أنس بن مالك رضي الله عنهما.
وقول ابن عباس:"إمّا لا" قال ابن الأثير:"أصل هذه الكلمة"إنْ" و"ما" فأُدغمت النون في الميم، وما زائدة في اللفظ لا حكم لها، وقد أمالت العرب"لا" إمالة خفيفة، ومعناه: إن لم تفعل هذا، فليكن هذا".
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইকরিমা বলেছেন: মদীনার লোকেরা তাঁকে সেই মহিলা সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করল, যে তাওয়াফ করার পর ঋতুমতী হয়েছে। তিনি তাদের বললেন: সে চলে যাবে (বিদায়ী তাওয়াফ না করেই)। তারা বলল: আমরা আপনার কথা গ্রহণ করব না এবং যায়িদের কথা ছেড়ে দেব? (অর্থাৎ যায়িদ ইবনু সাবেত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর ফতোয়া ছেড়ে দেব?) তিনি বললেন: যখন তোমরা মদীনায় ফিরে যাবে, তখন জিজ্ঞাসা করো। তারা মদীনায় ফিরে গেল এবং জিজ্ঞাসা করল। যাদের তারা জিজ্ঞাসা করেছিল, তাদের মধ্যে ছিলেন উম্মে সুলাইম (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)। (তিনি তখন সাফিয়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর হাদীসটি উল্লেখ করেন)।
মুত্তাফাকুন আলাইহি: এটি বুখারী (হাজ্জ, ১৭৫৮ ও ১৭৫৯) আইয়ুবের সূত্রে ইকরিমা থেকে বর্ণনা করেছেন এবং তিনি এটি উল্লেখ করেছেন।
আর এটি মুসলিম (হাজ্জ, ১৩২৮/৩৮১) আল-হাসান ইবনু মুসলিমের সূত্রে তাঊস থেকে বর্ণনা করেছেন। তাঊস বলেন: আমি ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর সাথে ছিলাম, তখন যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আপনি কি এই ফাতওয়া দিচ্ছেন যে, ঋতুমতী মহিলা বাইতুল্লাহর সাথে শেষ সাক্ষাৎ না করেই চলে যাবে? ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে বললেন: যদি (আপনার কাছে ভিন্ন প্রমাণ) না থাকে, তবে অমুক আনসারী মহিলাকে জিজ্ঞাসা করুন, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কি তাকে এরূপ করার নির্দেশ দিয়েছিলেন? তাঊস বলেন: তখন যায়িদ ইবনু সাবিত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) হাসতে হাসতে ইবনু আব্বাসের কাছে ফিরে এলেন এবং বললেন: আমি তো দেখছি আপনিই সত্য বলেছেন।
আর সেই আনসারী মহিলা স্পষ্টতই উম্মে সুলাইম, যিনি বুখারীর বর্ণনায় ইকরিমা কর্তৃক উল্লিখিত হয়েছেন। বরং হাফিয ইবনু হাজার (রাহিমাহুল্লাহ) আল-ফাতহ গ্রন্থে (৩/৫৮৮) এটি নিশ্চিত করেছেন।
উম্মে সুলাইম হলেন বিনতে মিলহান এবং তিনি আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর মাতা।
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর উক্তি: "ইম্মা লা" সম্পর্কে ইবনুুল আসীর বলেছেন: এই শব্দটির মূল হলো "ইন" (যদি) এবং "মা" (না), অতঃপর নূনকে মিমের মধ্যে বিলীন করা হয়েছে। আর "মা" হলো শব্দে অতিরিক্ত, এর কোনো (ব্যাকরণগত) হুকুম নেই। আর আরবরা "লা" শব্দটিতে সামান্য ইমালাহ (শব্দের ঝোঁক পরিবর্তন) করত। এর অর্থ হলো: যদি তুমি এটা না করো, তবে এটা হোক।
5117 - عن طاوس بن كيسان، قال: سمعتُ ابن عمر يقول: إنّها لا تنفر. ثم سمعته يقول بعدُ: إنّ النبيَّ صلى الله عليه وسلم رخَّص لهنَّ.
صحيح: رواه البخاريّ في الحجّ (1760، 1761) عن مسلم (هو ابن إبراهيم الفراهيديّ)، حدّثنا وُهيب (هو ابن خالد)، حدّثنا ابن طاوس (هو عبد الله)، عن أبيه، عن ابن عباس رضي الله عنهما: قال: رُخَّص للحائض أن تنفر إذا أفاضتْ. قال: وسمعتُ ابن عمر يقول (فذكره).
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তাউস ইবনু কাইসান বলেন, আমি তাঁকে (ইবনু উমরকে) বলতে শুনেছি: (হায়েযগ্রস্ত মহিলা) মক্কা থেকে বিদায় নিতে পারবে না। অতঃপর পরবর্তীতে আমি তাঁকে বলতে শুনেছি: নিশ্চয়ই নাবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাদের জন্য (বিদায় নেওয়ার) অনুমতি দিয়েছেন।
5118 - عن ابن عمر، قال: من حجّ البيت فليكن آخر عهده بالبيت إلّا الحيَض، ورخَّص لهنّ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم.
صحيح: رواه الترمذيّ (944)، وصحّحه ابن خزيمة (3000)، وابن حبان (3899)، والحاكم (1/ 467 - 468) كلّهم من حديث عيسى بن يونس، عن عبيد الله بن عمر، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
قال الترمذي:"حسن صحيح، والعمل على هذا عند أهل العلم".
وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين". وقال الذهبي:"خرَّجا أصله" وهو كما قال، وقد سبق.
هذا قول عامة فقهاء الأمصار بأنه لا وداع على حائض، ولا أعرف له مخالفًا إلّا ما روي عن عمر وابنه عبد الله، وزيد بن ثابت إلا أن الأخيرين قد رجعا لما بلغتهما السنة.
وأمّا ما رُوي عن الحارث بن عبد الله بن أوس، قال:"أتيتُ عمر بن الخطّاب فسألته عن المرأة تطوف بالبيت يوم النّحر، ثم تحيض. قال: ليكن آخر عهدها بالبيت. قال الحارث: كذلك أفناني رسول الله صلى الله عليه وسلم. قال: فقال عمر: أربت عن يديك سألتني عن شيء سألت عنه رسول الله صلى الله عليه وسلم لكيما أخالف؟ !". فهو غلط.
رواه أبو داود (2004) عن عمرو بن عون، أخبرنا أبو عوانة، عن يعلى بن عطاء، عن الوليد بن عبد الرحمن، عن الحارث بن عبد الله بن أوس، وقد حسّنه المنذريّ في مختصره.
قلت: وهو كما قال، فإنّ إسناده في ظاهره السّلامة، ولكن غلط فيه الحارث بن عبد الله بن أوس لما عزا فتواه إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم، فإنه صلى الله عليه وسلم قال: وعمل بخلافه، ولكن فهم الحارث بن عبد الله أنّ قوله صلى الله عليه وسلم:"ليكن آخر عهدها بالبيت" وهو عام.
لأنه رواه الترمذيّ (946) من وجه آخر عنه، قال: سمعت النبيّ صلى الله عليه وسلم يقول:"من حجّ هذا البيت او اعتمر فليكن آخر عهده بالبيت". وليس فيه ذكر للحيض. إلّا أنه ضعيف فيه الحجاج بن أرطأة ضعيف.
قال الترمذيّ:"حديث الحارث بن عبد الله بن أوس، حديث غريب. وهكذا روى غير واحد عن الحجاج بن أرطاة مثل هذا، وقد خولف الحجاج في بعض هذا الإسناد" انتهى.
وفيه أيضًا عبد الرحمن بن البيلمانيّ مولى عمر ضعيف.
وهذا العام مخصّص بحديث عائشة وابن عباس وغيرهما.
وأمّا عمر بن الخطاب فلعلّه لم تبلغه هذه السنة كما لم تبلغ ابنه عبد الله أيضًا، ثم بلغته فرجع عنها ورخّص للحيّض إذا طفن الإفاضة أن ينفرن.
وأمّا دعوى الطّحاويّ وغيره النّسخ فهو بعيد؛ لأنّ النّسخ لا يثبت إلا بثبوت المنسوخ، ولم يثبت أبدًا أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أمر الحيّض بطواف الوداع، فبطل قوله بالنّسخ.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: যে ব্যক্তি বাইতুল্লাহর হজ্জ করবে, তার শেষ কাজটি যেন বাইতুল্লাহর সাথে হয়, তবে ঋতুবতী মহিলারা ছাড়া। আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাদের জন্য ছাড় দিয়েছেন।
5119 - عن أبي هريرة، قال: بعثني أبو بكر رضي الله عنه فيمن يؤذّن يوم النّحر بمنى:"لا يحجّ العام مشرك، ولا يطوف بالبيت عريان". ويوم الحجّ الأكبر يوم النّحر، وإنما قيل الأكبر من أجل قول الناس: الحج الأصغر، فنبذ أبو بكر إلى النّاس في ذلك العام، فلم يحجّ عام حجّة الوداع الذي حجّ فيه النبيّ صلى الله عليه وسلم مشرك.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الجزية (3177) عن أبي اليمان، أخبرنا شعيب، عن الزهريّ، أخبرنا حُميد بن عبد الرحمن، أنّ أبا هريرة قال (فذكره).
ورواه الشيخان -البخاري في التفسير (4657)، ومسلم في الحج (1347) - من وجهين آخرين عن ابن شهاب الزهري. وفيه التصريح من حُميد بن عبد الرحمن: يوم النحر يوم الحج الأكبر من أجل حديث أبي هريرة.
وهذا يشعر بأنّ قوله:"يوم النّحر يوم الحجّ الأكبر" مدرج من قول حُميد بن عبد الرحمن. ولكن رواه أبو داود (1946) من طريق شعيب بإسناده، فزاد في آخره: ويوم الحجّ الأكبر يوم النّحر، والأكبر الحج" مشعر بأنه مرفوع.
والصّحيح أنه مدرج كما في الصحيحين من التصريح من حميد بن عبد الرحمن، وهو الذي رجّحه أيضًا الحافظ ابن حجر في"فتحه" (8/ 321) فقال:"وقوله:"ويوم الحج الأكبر يوم النّحر" هو قول حميد بن عبد الرحمن استنبطه من قوله تعالى: {وَأَذَانٌ مِنَ اللَّهِ وَرَسُولِهِ إِلَى النَّاسِ يَوْمَ
الْحَجِّ الْأَكْبَرِ}. ومن مناداة أبي هريرة بذلك بأمر أبي بكر يوم النّحر، فدلّ على أنّ المراد بيوم الحجّ الأكبر يوم النّحر" انتهى.
هذا الحديث مما ذكره الطّحاويّ في مشكل الآثار كما قال الحافظ في الفتح (8/ 318) وقال: قال الطّحاويّ:"هذا مشكل؛ لأنّ الأخبار في هذه القصّة تدلّ على أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم بعث أبا بكر بذلك، ثم أتبعه عليًّا فأمره أن يؤذّن، فكيف يبعث أبو بكر أبا هريرة ومن معه بالتأذين مع صرف الأمر عنه في ذلك إلى علي؟" ثم أجاب بما حاصله: إنّ أبا بكر كان الأمير على الناس في تلك الحجّة بلا خلاف، وكان علي هو المأمور بالتّأذين بذلك. وكأنّ عليًّا لم يطق التّأذين بذلك وحده، واحتاج إلى من يعينه على ذلك، فأرسل معه أبو بكر أبا هريرة وغيره ليساعدوه على ذلك.
ثم ساق من طريق المحرز بن أبي هريرة، عن أبيه، قال:"كنت مع علي حين بعثه النبيّ صلى الله عليه وسلم ببراءة إلى أهل مكة. فكنتُ أنادي معه بذلك حتى يصحل صوتي، وكان ينادي قبلي حتى يعيى" أخرجه أحمد (2/ 299)، وابن حبان (3820)، وغيرهما. انظر: شرح مشكل الآثار (9/ 225 - 227).
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আমাকে তাদের মধ্যে পাঠিয়েছিলেন যারা কুরবানীর দিন মিনায় এই ঘোষণা দিবে: "এই বছর কোনো মুশরিক যেন হজ্জ না করে এবং কোনো উলঙ্গ ব্যক্তি যেন কা'বার তাওয়াফ না করে।" আর কুরবানীর দিন হলো হাজ্জে আকবর (বৃহত্তম হজ্জ)। আর একে আকবর (বৃহত্তম) বলার কারণ হলো লোকে এটিকে হাজ্জে আসগর (ক্ষুদ্র হজ্জ) বলে থাকে। আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) সেই বছর লোকদের কাছে এই ঘোষণা পৌঁছে দিলেন। ফলে, বিদায় হজ্জের বছর—যে বছর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজ্জ করেছিলেন—কোনো মুশরিক হজ্জ করেনি।
5120 - عن ابن عمر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم وقف يوم النّحر بين الجمرات في الحجّة التي حجّ، فقال:"أيّ يوم هذا؟". قالوا: يوم النّحر. قال:"هذا يوم الحجّ الأكبر".
صحيح: رواه أبو داود (1945)، وابن ماجه (3058)، وصححّه الحاكم (2/ 331)، والبيهقيّ (5/ 139) من حديث هشام بن الغاز، قال: سمعت نافعًا يحدّث عن ابن عمر، فذكره. واللّفظ لأبي داود.
ولفظ ابن ماجه والحاكم أطول منه، فإنهما ذكرا خطبة النبيّ صلى الله عليه وسلم كاملة. وعلّقه البخاريّ (1742) عن هشام بن الغاز.
قال الحاكم:"هذا حديث صحيح الإسناد، ولم يخرجاه بهذه السّياقة، وأكثر هذا المتن مخرّج في الصحيحين إلا قوله:"إنّ يوم الحجّ الأكبر يوم النّحر". فإنّ الأقاويل فيه عن الصّحابة والتابعين رضي الله عنهم على خلاف بينهم فيه. فمنهم من قال: يوم عرفة، ومنهم من قال: يوم النحر".
وهشام بن الغاز هو الجرشي الشامي وهو ثقة، وثقه ابن معين، وقال أحمد: صالح الحديث.
ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁর সেই হজ্জে (যেটি তিনি করেছিলেন) কুরবানীর দিন জামরাসমূহের মাঝখানে দাঁড়িয়েছিলেন। অতঃপর তিনি বললেন: "আজ কোন দিন?" তারা বলল: "কুরবানীর দিন।" তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "এটা হলো হজ্জে আকবরের (মহত্তম হজ্জের) দিন।"