আল-জামি` আল-কামিল
5181 - عن بلال: أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم صلَّى في جوف الكعبة.
صحيح: رواه الترمذيّ (874) وصحّحه ابن خزيمة (3008) كلاهما من حديث حماد بن زيد، عن عمرو بن دينار، عن ابن عمر، عن بلال، فذكره. وإسناده صحيح.
قال الترمذي:"حديث بلال حديث حسن صحيح، والعمل عليه عند أكثر أهل العلم، لا يرون بالصّلاة في الكعبة بأسًا. وقال مالك: لا بأس بالصلاة النافلة في الكعبة. وكره أن تصلي المكتوبة في الكعبة. وقال الشافعي: لا بأس أن تصلي المكتوبة والتطوع في الكعبة. لأن حكم النافلة والمكتوبة في الطّهارة والقبلة سواء".
قلت: لم ينقل عن أحد من الصّحابة أنهم صلوا المكتوبة في جوف الكعبة، وقد روي عن ابن عمر أنه كان يصلي فيه ركعتي الطواف، ودخل محمد بن الحنفية الكعبة فصلّى في كلّ زاوية ركعتين. وكان الحسين بن علي يدخل الكعبة ويصلي ركعتين.
هذه الآثار أخرجها عبد الرزاق في مصنفه (5/ 82).
وفي الباب ما رُوي عن عبد الرحمن بن صفوان قال:"قلت لعمر بن الخطاب: كيف صنع رسول الله صلى الله عليه وسلم حين دخل الكعبة؟ قال: صلى ركعتين".
رواه أبو داود (2026) عن زهير بن حرب، حدّثنا جرير، عن يزيد بن أبي زياد، عن مجاهد، عن عبد الرحمن بن صفوان، قال (فذكره).
وفيه يزيد بن أبي زياد وهو الهاشميّ مولاهم، جمهور أهل العلم مطبقون على تضعيفه. ومن طريقه رواه الإمام أحمد (15552) بأطول منه كما مضى في الوقوف عند الملتزم.
ورواه ابن خزيمة في صحيحه (3017) مع قوله:"إن كان يزيد بن أبي زياد من الشّرط الذي اشترطنا في أول الكتاب".
قلت: وهو كما في أوّل الكتاب:"بنقل العدل عن العدل موصولًا إليه صلى الله عليه وسلم من غير قطع في أثناء الإسناد، ولا جرح في ناقلي الأخبار".
وهذا الحديث ليس على شرطه لوجود جرح من الأئمة المتقدمين في يزيد بن أبي زياد.
وفي الباب ما رُوي عن عثمان بن طلحة:"أنَّ النبيّ صلى الله عليه وسلم دخل البيت فصلّى ركعتين وِجاهك، حين تدخل بين السّاريتين".
رواه الإمام أحمد (15387)، والطبرانيّ في الكبير (9/ 55)، والبيهقيّ (2/ 328 - 329) كلّهم من طرق، عن حماد بن سلمة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عثمان بن طلحة، فذكره.
وفيه انقطاع فإن عروة بن الزبير لم يسمع من عثمان بن طلحة.
قال البيهقي: تفرّد به حماد بن سلمة، وفيه إرسال بين عروة وعثمان.
وفي الباب أيضًا ما روي عن أبي هريرة، قال:"لما كان يوم الفتح، بعث رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى أمّ عثمان بن طلحة:"أن ابعثي إليَّ بمفتاح الكعبة". فقالت: لا، واللات والعُزّى لا أبعث به إليك، فقال قائل: ابعث إليها قسرًا، فقال ابنها عثمان: يا رسول الله، إنّها حديثة عهد بكفر، فابعثني إليها حتى آتيك به، قال: فذهب إليها، فقال: يا أمّتاه، إنه قد جاء أمرٌ غير الذي كان، وإنه إن لم تعطني المفتاح قُتلت، قال: فأخرجته فدفعته إليه، فجاء به يسعى، فلما دنا من رسول الله صلى الله عليه وسلم عثر، فابتدر المفتاح من يده، فقام النبيّ صلى الله عليه وسلم[عثر] فجثا عليه بثوبه، فأخذه ثم جاء إلى الباب أحسبه قال: ففتحه، ثم قام عند أركان البيت وأرجائه يدعو، ثم صلّى ركعتين بين الأسطوانتين.
رواه البزار -كشف الأستار (1162) - عن إبراهيم بن راشد، ثنا زيد بن عوف، ثنا حماد بن سلمة، عن محمد بن عمرو، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره.
وفيه زيد بن عوف أبو ربيعة، بصريّ، ويقال: فهد بن عوف -وفهد لقب- مختلف فيه، فقال الفلّاس: متروك الحديث.
وقال البخاري: تركه عليّ وغيره، وبه أعلّه الهيثميّ في"المجمع" (3/ 294) فقال: هو ضعيف.
قوله:"فابتدره" كذا في الكشف، وفي مجمع الزوائد (3/ 294): فانتشر المفتاح.
وقوله:"عثر فجثى". لم يذكر في"المجمع"":"عثر".
وأمّا ما رُوي عن عائشة، قالت: إنّ النبيّ خرج من عندها وهو مسرور، ثم رجع إليها وهو كئيب، فقال:"إني دخلت الكعبة، لو استقبلت من أمري ما استدبرت ما دخلتها، إني أخاف أن أكون قد شققتُ على أمّتي" فهو ضعيف.
رواه أبو داود (2029)، والترمذي (873)، وابن ماجه (3064)، وصحّحه ابن خزيمة (3014) كلّهم من طرق، عن إسماعيل بن عبد الملك، عن عبد الله بن أبي مليكة، عن عائشة، فذكرته. قال الترمذي: حسن صحيح.
قلت: بل هو ضعيف فإن فيه إسماعيل بن عبد الملك وهو ابن أبي الصّفير -مصغرًا- مختلف فيه فضعّفه النسائيّ وأبو حاتم وأبو داود، وقال ابن حبان: كان يقلب ما يروي، فمثله إذا تفرّد لا
يقبل، ولذا قال فيه ابن عدي: وهو ممن يكتب حديثه، وساق له الذّهبيّ في"الميزان" هذا الحديث مشعرًا بأنه من مناكيره.
وكذلك لا يصح ما رُوي عن ابن عباس، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من دخل البيت دخل في حسنة، وخرج من سيئة مغفورًا له". فإنه ضعيف.
رواه الطبرانيّ في الكبير (11/ 177، 200 - 201)، والبزار -كشف الأستار (1161) -، وابن خزيمة (3013) كلّهم من حديث سعيد بن سليمان، ثنا عبد الله بن المؤمل، ثنا عمر بن عبد الرحمن ابن محيص، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره.
قال البزار:"لا نعلمه عن ابن عباس إلا من هذا الوجه".
قلت: وفيه عبد الله بن المؤمل وهو ابن هبة المخزوميّ المكيّ ضعّفه جمهور أهل العلم. قال عبد الله بن أحمد عن أبيه:"أحاديث عبد الله بن المؤمل مناكير". وترجمه ابن عدي في"الكامل" (4/ 1454) وذكر من أحاديثه ما لا يتابع عليه منها الحديث المذكور، وقال: وهذا ما أمليتُ من أحاديث ابن المؤمل كلها غير محفوظة".
وبه أعلّه أيضًا الهيثميّ في"المجمع" (3/ 293) وقال:"وفيه عبد الله بن المؤمل وثّقه ابن سعد وغيره وفيه ضعف".
বিলাল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কা'বার ভেতরে সালাত আদায় করেছেন।
ইমাম তিরমিযী (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: বিলালের হাদীসটি ‘হাসান সহীহ’। অধিকাংশ আলিমের নিকট এর ওপরই আমল করা হয়। তাঁরা কা'বার ভেতরে সালাত আদায় করাকে দোষের মনে করেন না। ইমাম মালিক (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: কা'বার ভেতরে নফল সালাত আদায় করা দোষের নয়। তবে তিনি কা'বার ভেতরে ফরয সালাত আদায় করা মাকরূহ মনে করতেন। ইমাম শাফেঈ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেছেন: কা'বার ভেতরে ফরয ও নফল উভয় সালাতই আদায় করা দোষের নয়। কারণ পবিত্রতা ও ক্বিবলার ক্ষেত্রে নফল ও ফরযের হুকুম একই।
এই বিষয়ে আব্দুর রহমান ইবনু সাফওয়ান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত আছে, তিনি বলেছেন: আমি উমার ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যখন কা'বায় প্রবেশ করেছিলেন, তখন তিনি কী করেছিলেন? তিনি বললেন: তিনি দুই রাকাত সালাত আদায় করেছিলেন।
উসমান ইবনু তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বাইতুল্লাহতে প্রবেশ করে তোমার দিক মুখ করে দুই থামের মাঝখানে দুই রাকাত সালাত আদায় করেছিলেন।
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত দীর্ঘ হাদীসের শেষে আছে: ...এরপর তিনি দুই থামের মাঝখানে দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন।
আর যা আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত হয়েছে যে, তিনি (নবী) তাঁর কাছ থেকে হাসিমুখে বের হলেন, তারপর বিষণ্ণ হয়ে ফিরে এলেন এবং বললেন: "আমি কা'বায় প্রবেশ করেছি। যদি আমার কাজের শুরুটা শেষ দিয়ে শুরু করতাম, তবে আমি সেখানে প্রবেশ করতাম না। আমি ভয় পাচ্ছি যে, আমি আমার উম্মতের ওপর (এতে) কষ্ট আরোপ করে দিয়েছি।" – এই হাদীসটি দুর্বল।
অনুরূপভাবে ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: "যে বাইতুল্লাহতে প্রবেশ করে, সে নেকি নিয়ে প্রবেশ করে এবং ক্ষমা প্রাপ্ত হয়ে গুনাহ থেকে মুক্ত হয়ে বের হয়।" – এটিও দুর্বল।
5182 - عن عطاء، قال: سمعت ابن عباس يقول: إنما أمرتم بالطّواف، ولم تؤمروا بدخوله. قال: لم يكن ينهى عن دخوله، ولكني سمعته يقول: أخبرني أسامة بن زيد أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لما دخل البيت دعا في نواحيه كلّها، ولم يصل فيه حتى خرج، فلما خرج ركع في قُبل البيت ركعتين، وقال: هذه القبلة. قلت له: ما نواحيها؟ أو في زواياها؟ قال: بل في كل قبلة من البيت.
متفق عليه: رواه مسلم في الحجّ (1330) من طرق، عن محمد بن بكر، أخبرنا ابن جريج، قال: قلت لعطاء: أسمعت ابن عباس يقول (فذكره).
ورواه البخاريّ في الصلاة (398) من وجه آخر عن ابن جريج مختصرًا.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত। (আতা বলেন) আমি তাঁকে বলতে শুনেছি, তোমাদেরকে কেবল তাওয়াফ করার নির্দেশ দেওয়া হয়েছে, এর (কা'বার) ভেতরে প্রবেশ করার নির্দেশ দেওয়া হয়নি। তিনি (ইবনু আব্বাস) বললেন, এর ভেতরে প্রবেশ করতে নিষেধ করা হয়নি, কিন্তু আমি তাঁকে বলতে শুনেছি যে, উসামা ইবনু যায়িদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁকে খবর দিয়েছেন, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন বাইতুল্লাহর ভেতরে প্রবেশ করলেন, তখন তিনি এর সকল পার্শ্বে দু'আ করলেন এবং বের না হওয়া পর্যন্ত সেখানে সালাত আদায় করেননি। অতঃপর যখন তিনি বের হলেন, তখন কা'বার সম্মুখে দু'রাকাআত সালাত আদায় করলেন এবং বললেন: 'এটাই কিবলা'। আমি (আতা) তাঁকে জিজ্ঞেস করলাম: এর পার্শ্বগুলো বলতে কী বোঝানো হয়েছে? অথবা এর কোণগুলো? তিনি বললেন: বরং বাইতুল্লাহর প্রত্যেক কিবলার দিকে (দু'আ করেছিলেন)।
5183 - عن ابن عباس، قال: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لما قدم، أبي أن يدخل البيت، وفيه الآلهة، فأمر بها فأُخرجت، فأخرجوا صورة إبراهيم وإسماعيل في أيديهما الأزلام. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"قاتلهم الله! أما والله! قد علموا أنّهما لم يستقسما بها قطّ". فدخل البيت، فكبّر في نواحيه، ولم يصل فيه.
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1601) عن أبي معمر، حدّثنا عبد الوارث، حدّثنا أيوب،
حدّثنا عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় যখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) (মক্কায়) আগমন করলেন, তখন তিনি বাইতুল্লাহতে প্রবেশ করতে অস্বীকার করলেন, যখন তাতে দেব-দেবী ছিল। অতঃপর তিনি সেগুলোকে বের করে দেওয়ার নির্দেশ দিলেন, ফলে সেগুলোকে বের করা হলো। (বের করার সময়) তারা ইবরাহীম ও ইসমাঈল ('আলাইহিমাস সালাম)-এর ছবি বের করল, যাদের হাতে ছিল ভাগ্য নির্ণয়ের শর (আযলাম)। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "আল্লাহ তাদের ধ্বংস করুন! আল্লাহর কসম! তারা অবশ্যই জানে যে, তারা ('আলাইহিমাস সালাম) কখনোই এর দ্বারা ভাগ্য নির্ণয় করেননি।" এরপর তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ঘরে (কাবা শরীফের ভেতরে) প্রবেশ করলেন এবং এর বিভিন্ন কোণে তাকবীর দিলেন, কিন্তু তাতে সালাত আদায় করলেন না।
5184 - عن ابن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم دخل الكعبة وفيها ست سواري، فقام عند سارية، فدعا ولم يصل.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1331) عن شيبان بن فروخ، حدّثنا همام، حدثنا عطاء، عن ابن عباس، فذكره.
ورواه ابن حبان في صحيحه (3207) عن الحسن بن سفيان، قال: حدثنا شيبان بن فروخ، بإسناده، وفيه:"فقام عند كلّ سارية ودعا ولم يصل".
همام هو ابن يحيى العَوْذيّ - بفتح العين وسكون الواو.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কা'বা ঘরে প্রবেশ করলেন। তাতে ছয়টি খুঁটি ছিল। অতঃপর তিনি একটি খুঁটির কাছে দাঁড়ালেন, দু'আ করলেন, কিন্তু সালাত আদায় করলেন না।
5185 - عن ابن عباس، قال: إنّ الفضل بن عباس أخبره أنه دخل مع النبيّ صلى الله عليه وسلم البيت، وأنَّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يصل في البيت حين دخله، ولكنه لما خرج فتزل، ركع ركعتين عند باب الكعبة.
صحيح: رواه الإمام أحمد (1819) عن عبد الرزاق -وهو في مصنفه (9057) - قال: حدّثنا ابن جريج، أخبرني عمرو بن دينار، أنّ ابن عباس، كان يخبر أنّ الفضل بن عباس أخبره، فذكره.
ورواه أيضًا الإمام أحمد (1795، 1830)، وأبو يعلى (6733)، والطبراني في الكبير (18/ 290) كلّهم من حديث حماد بن سلمة، عن عمرو بن دينار، عن ابن عباس، عن الفضل بن عباس: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قام في الكعبة فسبَّح وكبَّر، ودعا الله عز وجل واستغفر، ولم يركع ولم يسجد.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, নিশ্চয়ই ফাদল ইবনে আব্বাস তাকে জানিয়েছেন যে, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে (কা'বা) ঘরে প্রবেশ করেছিলেন। আর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যখন কা'বার ভেতরে প্রবেশ করেন, তখন তিনি সেখানে সালাত আদায় করেননি। কিন্তু যখন তিনি বের হলেন এবং নেমে আসলেন, তখন কা'বার দরজার পাশে দুই রাকাত সালাত আদায় করলেন।
5186 - عن ابن عباس، قال: حدثني أخي الفضل بن عباس وكان معه حين دخل البيت: أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم لم يُصل في الكعبة، ولكنه لما دخلها وقع ساجدًا بين العمودين، ثم جلس يدعو.
حسن: رواه أحمد (1801)، والطّبراني (18/ 270)، وصحّحه ابن خزيمة (3007) كلّهم من حديث محمد بن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي نجيح، عن عطاء بن أبي رباح، وعن مجاهد بن جبر، عن عبد الله بن عباس، فذكره.
وإسناده حسن من أجل محمد بن إسحاق فإنه مدلس إلّا أنه صرَّح.
ويجمع بين حديث بلال وبين حديث أسامة بن زيد، والفضل بن عباس بأن الزّيادة مقبولة، كما قال البخاري في كتاب الزكاة بعد إخراج حديث ابن عمر (1483):"فيما سقت السماء …".
وقال:"والمفسّر يقضي على المبهم إذا رواه أهل الثبت، كما روى الفضل بن عباس: أنّ النبي صلى الله عليه وسلم لم يصل في الكعبة. وقال بلال: قد صلَّى. فأخذ بقول بلال، وترك قول الفضل" انتهى قول البخاري.
وقيل: لعلّ أسامة بن زيد انشغل بالدّعاء، ولم ير النبيّ صلى الله عليه وسلم.
وقيل: لعله خرج لحاجة ثم رجع، وقد صلى النبي صلى الله عليه وسلم فلم يره.
وقيل: إنّه بعد إغلاق البيت تكون فيه الظلمة فلم يره أسامة، ورآه بلال لقربه. ذكر بعض هذه الوجوه الحافظ في الفتح (3/ 468).
وأما من جعل أداء الصلاة في الكعبة يوم الفتح، والنفي عنها يوم حجّة الوداع كما قال ابن حبان (7/ 483) ففيه نظر؛ لما روى الأزرقي في أخبار مكة (1/ 273) عن جدّه قال: سمعت سفيان يقول: سمعت غير واحد من أهل العلم يذكرون:"أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم إنما دخل الكعبة مرة واحدة عام الفتح، ثم حجّ فلم يدخلها".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমার ভাই ফাদল ইবনে আব্বাস আমাকে জানিয়েছেন—আর তিনি (ফাদল) রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে ছিলেন যখন তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কা'বায় প্রবেশ করেন—যে রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কা'বার ভেতরে সালাত আদায় করেননি, বরং যখন তিনি এতে প্রবেশ করলেন, তখন তিনি দুটি স্তম্ভের মাঝখানে সিজদায় লুটিয়ে পড়লেন, এরপর তিনি বসে দু'আ করলেন।
5187 - عن إسماعيل بن أبي خالد، قال: قلت لعبد الله بن أبي أوفي صاحب رسول الله صلى الله عليه وسلم: أدخل النبيّ صلى الله عليه وسلم في عمرته؟ قال: لا.
متفق عليه: رواه مسلم في الحج (1332) عن سريج بن يونس، حدّثني هشيم، أخبرنا إسماعيل ابن أبي خالد، فذكره.
ورواه البخاريّ في الحجّ (1600) من وجه آخر عن إسماعيل بن خالد. ولم يذكر فيه"العمرة".
وذلك في عمرة القضاء كما تدل عليه رواية البخاريّ (4188) بقوله:"فكنا نستره من أهل مكة لا يصيبه أحد بشيء".
وفي رواية عنده (4255):"لما اعتمر رسول الله صلى الله عليه وسلم سترناه من غلمان المشركين ومنهم، أن يؤذوا رسول الله صلى الله عليه وسلم".
আব্দুল্লাহ ইবনে আবি আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইসমাঈল ইবনে আবি খালিদ বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবী আব্দুল্লাহ ইবনে আবি আওফা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে জিজ্ঞেস করলাম: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কি তাঁর উমরাহর (ইহরামের) অবস্থায় (মক্কায়) প্রবেশ করেছিলেন? তিনি বললেন: না।
5188 - عن عائشة، أنّها قالت: كنت أحبُّ أن أدخل البيت فأصلي فيه، فأخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم بيدي فأدخلني في الحجر وقال لي:"صلِّي في الحجر إذا أردتِ دخول البيت، فإنّما هو قطعة من البيت ولكن قومك استقصروا حين بنوا الكعبة، فأخرجوه من البيت".
حسن: رواه أبو داود (2028)، والنسائي (2912)، والترمذي (876) كلّهم من حديث عبد العزيز بن محمد، عن علقمة بن أبي علقمة، عن أمه، عن عائشة، فذكرته.
ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (24616).
قال الترمذي:"حسن صحيح". وفيه أمّ علقمة واسمها مرجانة ذكرها ابن حبان في"الثقات" ولم يوثقها غيره، ولذا قال الحافظ:"مقبولة" أي إذا توبعت.
قلت: وقد توبعت في إسناد آخر وإن كان فيه انقطاع وهو ما رواه الإمام أحمد (24384) عن حسن، حدّثنا حماد بن سلمة، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جبير، عن عائشة، أنها قالت: يا رسول الله، كلّ أهلك قد دخل البيت غيري؟ . فقال:"أرسلي إلى شيبة فيفتح لكِ الباب" فأرسلتْ إليه. فقال شيبة: ما استطعنا فتحه في جاهلية ولا إسلام بليل. فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"صلّي في الحجر، فإنّ قومك استقصروا عن بناء البيت حين بنوه".
وفيه عطاء بن السائب مختلط، ولكن روى عنه حماد بن سلمة قبل الاختلاط، وسعيد بن جبير لم يسمع من عائشة.
ولكن رواه الطبراني في المعجم الأوسط (7094) عن محمد بن عبد الله بن بكر السراج، قال: حدثنا إسماعيل بن إبراهيم الترجماني، قال: حدثنا شعيب بن صفوان، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، عن عائشة، قالت: قلت: يا رسول الله! كلّ نسائك قد دخل البيت غيري؟ ! قال:"فاذهبي إلى ذي قرابتك إلى شيبة، فليفتح لك الباب فادخليه". فأرسلت إليه: أنّ نبي الله قد أذن لي أن يُفتح لي الباب فأدخله. قال: نبي الله أمرك بذاك؟ قلت: نعم. فأخذ المفاتيح، فأتى النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، أمرت عائشة أن يُفتح لها الباب؟ قال:"نعم". قال: لا والله ما فتحتُه في جاهلية ولا إسلام بليل قطّ. قال:"فانظر ما كنتَ تصنع فافعله، ولا أفعله (كذا في الأصل، ويبدو أن قوله:"ولا أفعله" خطأ من سبق القلم) قال:"واذهبي أنت يا عائشة فصلي ركعتين في الحجر، فإن طائفةٌ منه من البيت، وإنّ قومك قصرت بهم النفقة فتركوا طائفة من البيت".
فأدخل فيه شعيب بن صفوان"ابن عباس" بين سعيد بن جبير، وبين عائشة.
وشعيب بن صفوان هو الثقفيّ أبو يحيى الكاتب من رجال مسلم إلّا أنه مختلف فيه، فقال الإمام أحمد: لا بأس به، وهو صحيح الحديث، وتكلم فيه ابن معين، وقال ابن عدي: عامة ما يرويه لا يتابعه عليه أحد، ثم لم يعلم هل روى عن عطاء بن السائب قبل اختلاطه أو بعده إلا أنها متابعة قوية لحديث مرجانة.
والحجر: هو الحائط المستدير إلى جانب الكعبة الغربي، واختلف هل الحجر كله من البيت؟ فالراجح أن بعضه من البيت ومقداره ستة أذرع أو سبعة، وما زاد على ذلك فليس من البيت. انظر: الفتح (3/ 443).
ثم عمل عائشة بعده يقويه أيضًا ففي مصنف عبد الرزاق (9155) عن معمر، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، قالت:"ما أبالي أفي الحجر صليت، أم في جوف البيت". وإسناده صحيح.
ورواه أيضًا عبد الرزاق (9154) عن ابن جريج، قال: حدثني كثير بن أبي كثير، عن أمّ كلثوم بنت عمرو بن أبي عقرب، عن عائشة، أنّها سألته أن يفتح لها الكعبة ليلًا، فأبى عليها -زعموا شيبة
ابن عثمان - فقالت عائشة لأمّ كلثوم:"انطلقي ندخل الكعبة، فدخلت الحجر".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আমি চাইতাম যেন আমি (কা'বা) ঘরের ভেতরে প্রবেশ করে সালাত আদায় করতে পারি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার হাত ধরলেন এবং আমাকে হিজরে (হাতীমে) প্রবেশ করালেন এবং আমাকে বললেন: "যদি তুমি ঘরে প্রবেশ করতে চাও, তবে তুমি হিজরে সালাত আদায় করো, কারণ নিশ্চয়ই এটি (হিজর) কা'বা ঘরেরই একটি অংশ। কিন্তু তোমার গোত্রের লোকেরা যখন কা'বা নির্মাণ করেছিল, তখন তারা অর্থ সংকটে পড়েছিল, ফলে তারা এটিকে ঘরের বাইরে রেখে দিয়েছিল।"
5189 - عن عائشة، قالت: قلت: يا رسول الله، ألا أدخل البيت؟ قال:"ادخلي الحجر فإنّه من البيت".
صحيح: رواه النسائيّ (2911) عن أحمد بن سعيد الرباطيّ، قال: حدّثنا وهب بن جرير، قال: حدّثنا قرّة بن خالد، عن عبد الحميد بن جبير، عن عمّته صفيّة بنت شية، قالت: حدّثتنا عائشة، فذكرته. وهذا إسناد صحيح.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি কি ঘরে (কাবা ঘরে) প্রবেশ করব না? তিনি বললেন: "তুমি 'হিযর'-এ প্রবেশ করো। কেননা তা ঘরের (কাবা ঘরের) অংশ।"
5190 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُشدّ الرّحال إلّا إلى ثلاثة مساجد: المسجد الحرام، ومسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم، ومسجد الأقصى".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصلاة (1189)، ومسلم في الحج (1397) كلاهما من حديث سفيان، عن الزهري، عن سعيد، عن أبي هريرة، فذكره.
وقد سبق ذكره في كتاب الصلاة مع بقية الأحاديث.
وأمّا ما رُوي:"إنّ من صلّى في مسجدي أربعين صلاة كتب له براءة من النار، وبراءة من العذاب، وأنه بريء من النفاق" وبألفاظ أخرى فكلّها ضعيفة، ولكن يشهد بعضه لبعض، ويندرج تحت أصل وهو أداء الصلاة جماعة، فلا بأس أن يواظب المسلم على أداء الصلاة في المسجد النبوي بدون هذا القيد كما قلت في"المنة الكبرى" (4/ 417 - 420) وفيه فوائد أخرى فراجعها.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিনটি মসজিদ ছাড়া (পুণ্য অর্জনের উদ্দেশ্যে) সফর করা যাবে না: মাসজিদুল হারাম, আল্লাহর রাসূলের মসজিদ (মাসজিদে নববী) এবং মাসজিদুল আক্বসা।"
5191 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما من أحد يسلِّمُ عليَّ إلا ردَّ الله عليَّ روحي حتّى أرُدَّ عليه السلام".
حسن: رواه أبو داود (2041) عن محمد بن عوف، حدّثنا المقرئ، حدّثنا حيوة، عن أبي صخر حُميد بن زياد، عن يزيد بن عبد الله بن قُسيط، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه الإمام أحمد (10815)، والبيهقي في الكبرى (5/ 245) كلاهما من طريق المقرئ (وهو عبد الله بن يزيد) بإسناده، مثله.
وإسناده حسن من أجل الخلاف في أبي صخر غير أنه حسن الحديث، وهو من رجال مسلم، وقد قال فيه الحافظ:"صدوق يهم".
ويزيد بن عبد الله بن قُسيط اختلف في سماعه من أبي هريرة، ولكن لم أجد حجّة قاطعة على عدم سماعه منه، وقد أمكنه ذلك، فإنه ولد سنة (32 هـ)، ومات أبو هريرة سنة (59 هـ).
في حين رواه الطبراني في الأوسط من طريقين: الأول مثل هذا (9325)، والثانية بزيادة"أبي
صالح" بين يزيد بن عبد الله بن قسيط، وبين أبي هريرة (3116). وقال:"لم يرو هذا الحديث عن يزيد إلا أبو صخر، ولا عن أبي صخر إلا حيدة، تفرّد به عبد الله بن يزيد".
ولا يضرّ تفرّد هؤلاء فهم كلهم ثقات، وهذا الطريق يقوي ما قبله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: কোনো ব্যক্তি যখনই আমার ওপর সালাম পেশ করে, তখনই আল্লাহ আমার রূহ (আত্মা) আমার কাছে ফিরিয়ে দেন, যাতে আমি তাকে সালামের উত্তর দিতে পারি।
5192 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تجعلوا بيوتكم قبورًا، ولا تجعلوا قبري عيدًا، وصلّوا عليّ فإنّ صلاتكم تبلغني حيث كنتم".
حسن: رواه أبو داود (2042) عن أحمد بن صالح، قال: قرأت على عبد الله بن نافع، أخبرني ابن أبي ذئب، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة، فذكره.
وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد الله بن نافع وهو الصائغ المخزوميّ مولاهم فإنه إذا حدّث من حفظه أخطأ، وإذا حدّث من الكتاب يصيب، وإنه هنا حدّث من الكتاب.
ومن طريقه رواه الإمام أحمد (8804).
وقوله:"عيدا" أي لا تجعلوه مجمعًا كالأعياد التي يقصد الناس الاجتماع إليها للصّلاة، بل يزار قبره صلوات الله وسلامه عليه كما كان يزوره الصحابة رضوان الله عليهم على الوجه الذي يرضاه ويحبه صلوات الله وسلامه عليه" قاله ابن القيم في"تهذيب السنن" (2/ 447).
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের ঘরকে কবরে (সমাধিতে) পরিণত করো না, আর আমার কবরকে উৎসবের স্থানে পরিণত করো না। বরং তোমরা আমার প্রতি সালাত (দরুদ) পাঠাও, কেননা তোমরা যেখানেই থাকো না কেন, তোমাদের সালাত (দরুদ) আমার কাছে পৌঁছে যায়।"
5193 - عن عبد الله بن مسعود، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ لله ملائكة سياحين في الأرض يبلّغون من أمّتي السّلام".
صحيح: رواه النسائيّ في المجتبي (1282)، وفي اليوم والليلة (66)، والإمام أحمد (3666)، وصحّحه ابن حبان (914)، والحاكم (2/ 421) كلّهم من طرق عن سفيان، عن عبد الله ابن السائب، عن زاذان، عن عبد الله فذكره.
وإسناده صحيح. انظر للمزيد: جموع أبواب الإيمان بالملائكة.
وكان ابن عمر إذا قدم من السفر أتي القبر، فقال:"السلام عليك يا رسول الله، السلام عليك يا أبا بكر، السلام عليك يا أبتاه".
وفي رواية: بدأ بقبر رسول الله صلى الله عليه وسلم، فصلى عليه وسلّم، ودعا له، ولا يمسّ القبر.
رواه البيهقيّ في الكبرى (5/ 245)، وفي الصغري (1749 - بترقيمي).
قال الإمام مالك، وأحمد، والشافعي: يقول ذلك مستقبل الحجرة.
ولا يقف عند القبر للدعاء لنفسه؛ لأنّ أحدًا من الصحابة لم يكن يفعله، ولكن كانوا يستقبلون القبلة.
وفي الباب عن علي بن حسين، عن أبيه، عن جدّه، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال:"لا تتخذوا قبري عيدًا، ولا بيوتكم قبورًا، فإنّ تسليمكم يبلغني أينما كنتم".
رواه أبو يعلى (469) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا زيد بن الحباب، حدّثنا جعفر بن إبراهيم
من ولد ذي الجناحين، قال: حدّثنا علي بن عمر، عن أبيه، عن علي بن حسين، فذكره.
وفيه علي بن عمر وهو ابن الحسين بن علي بن أبي طالب الهاشمي لم يوثقه إلا ابن حبان، وفي التقريب:"مستور".
وفي الباب أيضًا عن الحسن بن علي بن أبي طالب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلُّوا في بيوتكم، لا تتخذوها قبورًا، ولا تتخذوا بيتي عيدًا، صلُّوا عليَّ وسلِّموا، فإنّ صلاتكم وسلامكم يبلغني أينما كنتم".
رواه أبو يعلى (6761) عن موسي بن محمد بن حيان، حدّثنا أبو بكر الحنفي، حدثنا عبد الله بن نافع، أخبرني العلاء بن عبد الرحمن، قال: سمعت الحسن بن علي بن أبي طالب، فذكره.
وفيه عبد الله بن نافع وهو الصائغ إذا حدّث من حفظه أخطأ، وإذا حدّث من الكتاب يصيب، وهنا لم يرو من الكتاب فلعله أخطأ، فإنّ الحديث معروف لأبي هريرة كما سبق، وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (2/ 247).
وأمّا الأحاديث التي رويت في زيارة قبر النبيّ صلى الله عليه وسلم، مثل قوله:"من حجّ فزار قبري بعد مماتي فكأنّما زارني في حياتي".
ومثل:"من حجّ البيت ولم يزرني فقد جفاني".
ومثل:"من حجّ حجّة الإسلام، وزار قبري، وغزا غزوة، وصلى عليَّ في بيت المقدس لم يسأله الله عز وجل فيما افترض عليه".
ومثل:"من زار قبري وجبت له شفاعتي".
ومثل:"من زارني بعد موتي فكأنما زارني وأنا حي".
فهذه الأحاديث وغيرها لا يصح منها شيء. انظر تخريجها بالتفصيل في"المنة الكبرى" (4/ 401 - 407).
আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহর এমন পরিভ্রমণকারী ফেরেশতাগণ রয়েছেন, যারা যমীনে ঘুরে বেড়ান এবং আমার উম্মতের পক্ষ থেকে আমার নিকট সালাম পৌঁছিয়ে থাকেন।"
5194 - عن ربيعة بن الهدير، قال: ما سمعت طلحة بن عبيد الله يحدِّث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم حديثًا قطّ غير حديث واحد، قال:"خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يريد قبور الشّهداء، حتى إذا أشرفنا على حرّة واقم، فلمّا تدلينا منها وإذا قبور بمحنيّةٍ. قال: قلنا: يا رسول الله، أقبور إخواننا هذه؟ قال:"قبور أصحابنا" فلما جئنا قبور الشهداء، قال:"هذه قبور إخواننا".
حسن: رواه أبو داود (2043) عن حامد بن يحيي، حدّثنا محمد بن معن المدني، أخبرني داود ابن خالد، عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن ربيعة بن الهدير، قال (فذكره).
وإسناده حسن من أجل داود بن خالد وهو ابن دينار المدنيّ، وهو صدوق كما في"التقريب"،
ومن طريقة رواه أيضًا الإمام أحمد (1387)، والبزار - كشف الأستار (955).
وقوله:"حرة واقم" هي الحرة التي كانت بها الوقيعة التي أوقعها بهم مسلم بن عقبة أيام يزيد ابن معاوية، وهي إحدى حرتي المدينة، وهي الشرقية. والحرة الغربية يقال لها:"وبرة".
والحديث يدل على زيارة قبور الشهداء بأحد، وقد ثبت عن عقبة بن عامر كما مضى أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم خرج في آخر حياته، فصلى على أهل أحد صلاته على الميت.
وفي رواية:"صلى عليهم بعد ثمان سنوات كالمودع للأحياء".
রবীআহ ইবনুল হুদাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি তালহা ইবনু উবাইদিল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে মাত্র একটি হাদীস ছাড়া আর কখনও কোনো হাদীস বর্ণনা করতে শুনিনি। তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে শহীদদের কবর যিয়ারতের উদ্দেশ্যে বের হলাম। যখন আমরা 'হাররাত ওয়াকেম'-এর সন্নিকটে পৌঁছলাম এবং সেখান থেকে নিচে নামলাম, তখন একটি উপত্যকায় কিছু কবর দেখতে পেলাম। তিনি (তালহা) বলেন: আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! এগুলো কি আমাদের ভাইদের কবর? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, 'এগুলো আমাদের সাথীদের কবর।' এরপর যখন আমরা (উহুদের) শহীদদের কবরের কাছে আসলাম, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, 'এগুলো আমাদের ভাইদের কবর।'
5195 - عن عبد الله بن عمر، قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يأتي قباء راكبًا وماشيًا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (1194)، ومسلم في الحج (1399) كلاهما من حديث نافع، عن ابن عمر، فذكره.
وعندهما عن ابن نمير، عن عبيد الله، عن نافع:"فيصلي فيه ركعتين".
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হয়ে (আরোহী অবস্থায়) এবং হেঁটে কুবাতে আসতেন। আর তিনি সেখানে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন।
5196 - عن سهل بن حنيف: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ومن تطهر في بيته، ثم أتي مسجد قباء، فصلى فيه صلاة، كان له كأجر عمرة".
حسن: رواه النسائيّ (2/ 37)، وابن ماجه (1412)، وصحّحه الحاكم (3/ 12) كلّهم من حديث محمد بن سليمان الكرماني، قال: سمعت أبا أمامة بن سهل بن حنيف، يقول: قال: سهل ابن حنيف، فذكره. قال الحاكم: صحيح الإسناد.
قلت: وفيه محمد بن سليمان المدني القبائي، روى عنه جماعة ووثّقه ابن حبان، وهو حسن الحديث؛ لأنّه توبع كما رواه البخاريّ في"تاريخه" (8/ 379) وله ما يشهد له. انظر: كتاب الصلاة.
সহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি নিজ ঘরে পবিত্রতা অর্জন করল, অতঃপর ক্বুবা মসজিদে এসে সেখানে সালাত আদায় করল, তার জন্য একটি উমরার (হজের) সওয়াবের মতো সওয়াব হবে।"
5197 - عن عائشة، قالت: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال:"إذا قضى أحدكم حجّه فليُعجل الرّحلة إلى أهله، فإنّه أعظم لأجره".
حسن: رواه الدارقطنيّ (2790)، والحاكم (1/ 477) وعنه البيهقيّ (5/ 259) كلّهم من حديث أبي مروان محمد بن عثمان العثماني، ثنا أبو ضمرة الليثيّ، عن هشام بن عروة، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.
قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
وهذا وهم منه فإن أبا مروان محمد بن عثمان ليس من رجال الشيخين، وإنما روي له ابن ماجه والنسائي في"الخصائص" غير أنه مختلف فيه، فوثقه أبو حاتم، وصالح جزرة، والذّهبي، إلا أنه
يروي عن أبيه المناكير. وهذا ليس منها فهو حسن الحديث.
وأبو ضمرة الليثي هو أنس بن عياض الليثي، ثقة من رجال الجماعة.
الحج، مثل الخروج من عرفة قبل الغروب، وترك المبيت بمزدلفة، وترك رمي الجمار جملة وغيرها. وآثارهم مخرجة في مصنف ابن أبي شيبة، ومصنف عبد الرزاق، وسنن سعيد بن منصور وغيرها إلى أن جاء دور فقهاء الإسلام أبي حنيفة ومالك والشافعي وأحمد رحمهم الله تعالى، فهم على مذهب سلفهم.
وإنما وقع الخلاف فيما بينهم في تحديد الواجبات، فمن قال بوجوبه ألزمَ الدمَ بتركه، ومن لم يقل بوجوبه لم يُلْزِم الدمَ بتركهـ.
ولمزيد من الإيضاح والتفصيل انظر:"المنة الكبري".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার হজ্ব সম্পন্ন করে, তখন সে যেন তার পরিবারের কাছে ফিরে যাওয়ার জন্য তাড়াতাড়ি করে। কারণ তা তার প্রতিদানের জন্য অধিক মহৎ।"
5198 - عن * *
৫১৯৮ - ... থেকে বর্ণিত ...
5199 - عن عبد الله بن عمر، قال: تمتّع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع بالعمرة إلى الحجّ، وأهدي، فساق معه الهدي من ذي الحليفة، وبدأ رسول الله صلى الله عليه وسلم فأهلَّ بالعمرة، ثم أهلَّ بالحجّ. وتمتّع النّاسُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بالعمرة إلى الحجّ، فكان من الناس من أهدى فساق الهدي، ومنهم من لم يُهْدِ. فلمّا قدم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مكة. قال للناس:"من كان منكم أهدى، فإنه لا يحلُّ من شيء حرُم منه حتّى يقضي حجَّه. ومن لم يكن منكم أهدى فليطف بالبيت وبالصّفا والمروة، وليقصِّر وليَحْلل، ثم ليُهلّ بالحجِّ ولْيُهد. فمن لم يجد هديًا، فليصُم ثلاثة أيام في الحجّ وسبعة إذا رجع إلى أهله".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1691)، ومسلم في الحج (1237) من طريق الليث بن سعد، حدثني عقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن سالم بن عبد الله، أنّ عبد الله بن عمر قال (فذكره).
وقوله تعالى: {ثَلَاثَةِ أَيَّامٍ فِي الْحَجِّ} جمهور المفسرين أنه يصومها قبل التروية، ويوم التروية وآخرها يوم عرفة، وإذا فاته صيامها صامها أيام التشريق اليوم الحادي عشر، والثاني عشر، والثالث عشر.
وذهب ابن جرير إلى أن له أن يصومها من أول إحرامه بالحج بعد قضاء عمرته إلى انقضاء أيام التشريق سوى يوم النحر فإنه غير جائز له صومه.
وقوله تعالى: هم أهل الحرم، ومن بينه وبين مكة دون مسافة القصر. نصَّ عليه الإمام أحمد.
وقال مالك: هم أهل مكة.
فليس على المكي دمُ تمتع وإنْ كان تمتع بالعمرة إلى الحج فإن تمتعه صحيح إلا ليس عليه دم
متعة لأن المتعة له لا عليه.
আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিদায় হজ্জে উমরার সাথে হজ্জের তামাত্তু’ (সুবিধা) গ্রহণ করেন এবং তিনি কুরবানীর পশু সঙ্গে নিয়েছিলেন। তিনি যুল-হুলাইফা হতে তাঁর সাথে কুরবানীর পশু নিয়ে যান। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রথমে উমরার জন্য ইহরাম বাঁধেন, অতঃপর হজ্জের জন্য ইহরাম বাঁধেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে লোকেরাও উমরার সাথে হজ্জের তামাত্তু’ (সুবিধা) গ্রহণ করেন। লোকদের মধ্যে কেউ কেউ কুরবানীর পশু সাথে নিয়েছিল এবং কেউ কেউ কুরবানীর পশু সাথে নেয়নি। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কায় আসলেন, তখন তিনি লোকদেরকে বললেন: "তোমাদের মধ্যে যারা কুরবানীর পশু সাথে এনেছ, তারা হজ্জ সমাপ্ত না করা পর্যন্ত কোনো হালাল বস্তুও ব্যবহার করতে পারবে না যা তার জন্য (ইহরামের কারণে) হারাম হয়েছে। আর তোমাদের মধ্যে যারা কুরবানীর পশু সাথে আননি, তারা যেন বাইতুল্লাহর ত্বওয়াফ করে এবং সাফা-মারওয়ার সা‘ঈ সম্পন্ন করে, চুল ছোট করে (তাকসীর) হালাল হয়ে যায়। অতঃপর তারা হজ্জের ইহরাম বাঁধবে এবং কুরবানী করবে। কিন্তু যে ব্যক্তি কুরবানীর পশু পাবে না, সে যেন হজ্জের সময় তিন দিন এবং পরিবারের কাছে ফিরে গেলে সাত দিন সিয়াম (রোজা) পালন করে।"
(উদ্ধৃতি সূত্র:) মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী (হজ্জ, ১৬৯১) এবং মুসলিম (হজ্জ, ১২৩৭) এটি লায়স ইবনু সা'দ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, (তিনি বলেন,) আমাকে উকায়ল ইবনু খালিদ হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি ইবনু শিহাব থেকে, তিনি সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ থেকে যে, আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন (অতঃপর তিনি এটি উল্লেখ করেন)।
আল্লাহ তা‘আলার বাণী: "হজ্জের সময় তিন দিন" (সূরা বাক্বারাহ ২:১৯৬) - বেশিরভাগ মুফাসসিরদের মতে, সে (তামাত্তুকারী) সিয়ামগুলো তারবিয়াহ (আটই যিলহজ্জ)-এর পূর্বে, তারবিয়াহর দিন এবং শেষ দিন আরাফার দিন পর্যন্ত পালন করবে। যদি তার সিয়ামগুলো ছুটে যায়, তাহলে সে তা আইয়ামে তাশরীক (১১, ১২ ও ১৩ই যিলহজ্জ) পালন করবে।
ইবনু জারীর-এর মত হলো: সে তার উমরা সম্পন্ন করার পর হজ্জের ইহরাম বাঁধার প্রথম দিন থেকে শুরু করে আইয়ামে তাশরীক শেষ হওয়া পর্যন্ত যেকোনো সময় রোজা রাখতে পারে, কেবল ইয়াওমুন নাহার (কুরবানীর দিন) ব্যতীত; কারণ সেই দিন তার জন্য রোজা রাখা জায়িয নয়।
এবং আল্লাহ তা‘আলার বাণী (সূরা বাকারাহ ২:১৯৬) দ্বারা উদ্দেশ্য যারা মক্কার অধিবাসী নয়— তারা হলো হারাম শরীফের অধিবাসী এবং যারা মক্কা ও তার মাঝামাঝি দূরত্বের কসরের দূরত্বের চেয়ে কম দূরত্বে অবস্থান করে। ইমাম আহমাদ এই বিষয়ে সুস্পষ্ট বক্তব্য দিয়েছেন।
আর ইমাম মালিক বলেন: তারা হলো মক্কার অধিবাসী।
সুতরাং মক্কাবাসীর উপর তামাত্তু’র কুরবানী (দম) ওয়াজিব নয়, যদিও তারা উমরার সাথে হজ্জের তামাত্তু’ করে। তাদের তামাত্তু’ সহীহ, তবে তাদের উপর তামাত্তু’র ‘দম’ নেই। কারণ তামাত্তু’ (সুবিধা) তাদের জন্য প্রযোজ্য, তাদের বিরুদ্ধে নয়।
5200 - عن عروة بن الزبير، أنّ عائشة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أخبرته عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في تمتّعه بالعمرة إلى الحجّ، فتمتّع النّاسُ معه.
بمثل الذي أخبرني سالم، عن ابن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1692)، ومسلم في الحج (1228) كلاهما من طريق الليث بن سعد، حدثني عُقيل (هو ابن خالد)، عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، به.
وقوله:"بمثل الذي أخبرني … إلخ" القائل ذلك هو ابن شهاب الزهري يحيل فيه على حديثه السابق.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী। তিনি উরওয়া ইবনুয যুবাইরকে অবহিত করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমরাহসহ হজ্জের তামাত্তু (সুবিধা) গ্রহণ করেছিলেন, ফলে লোকেরাও তাঁর সাথে তামাত্তু করেছিল। এটি সেইরকম, যা আমাকে সালিম ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রে অবহিত করেছেন।