আল-জামি` আল-কামিল
5201 - عن جابر بن عبد الله، قال: ثم انصرف إلى المنحر، فنحر ثلاثًا وستين بيده، ثم أعطى عليًا فنحر ما غبر، وأشركه في هديه.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد بن علي بن حسين بن علي بن أبي طالب، عن أبيه، عن جابر، فذكره في حجة النبي صلى الله عليه وسلم.
وقد رُوي عن علي أنه قال: لما نحر رسول الله صلى الله عليه وسلم بُدنه، فنحر ثلاثين بيده، وأمرني فنحرت سائرها.
رواه أبو داود (1764) عن هارون بن عبد الله، حدّثنا محمد ويعلى ابنا عبيد، قالا: حدّثنا محمد ابن إسحاق، عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن علي، فذكره.
ومحمد بن إسحاق مدلّس وقد عنعن، ولم يذكر ابن هشام في سيرته هذا الجزء من حديث ابن إسحاق في خروج النبيّ صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع، كما أنّ فيه مخالفة لحديث جابر في الصّحيح أنه صلى الله عليه وسلم -
نحر ثلاثًا وستين بيده، ثم أعطى عليًا فنحر ما غبر كما مضى.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানী করার স্থানে গেলেন, অতঃপর নিজ হাতে তেষট্টিটি উট কুরবানী করলেন, এরপর তিনি আলীকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বাকিগুলো কুরবানী করার জন্য দিলেন এবং তাঁকে (হাদী বা কুরবানীর পশুর সওয়াবে) শরীক করলেন।
5202 - عن ابن عباس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أهدى عام الحديبية في هدايا رسول الله صلى الله عليه وسلم جملًا كان لأبي جهل في رأسه برة فضّة.
حسن: رواه أبو داود (1749) عن النّفيلي، حَدّثنَا محمد بن سلمة، حدثنا محمد بن إسحاق.
ح وحدّثنا محمد بن المنهال، حدّثنا يزيد بن زريع، عن محمد بن إسحاق -المعنى-، قال: قال عبد الله -يعني ابن أبي نجيح-، حدّثني مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.
قال ابن منهال: برّة من ذهب. زاد النفيلي: يغيظ بذلك المشركين.
ومحمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن، ولكن صرّح بالتحديث فيما رواه الإمام أحمد (2362) عن يعقوب، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي نجيح، عن مجاهد بن جبر، عن ابن عباس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قد كان أهدي جمل أبي جهل الذي كان استلب يوم بدر، في رأسه برة فضة، عام الحديبية في هديه.
وقال في موضع آخر:"ليغيظ بذلك المشركين".
ورواه ابن خزيمة (2897، 2898) مع التصريح في الرواية الثانية. وكذلك الحاكم (1/ 467) وقال:"صحيح على شرط مسلم".
علاوة على ذلك فإن له طرقًا أخرى غير ابن إسحاق منها ما رواه الإمام أحمد (2466) عن حسين، حدّثنا جرير بن حازم، عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عباس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أهدي في بُدنه بعيرًا كان لأبي جهل، في أنفه برة من فضة.
ومن هذا الوجه رواه البيهقيّ (5/ 230) وقال:"هذا إسناد صحيح". إلا أنهم يرون أنّ جرير بن حازم أخذه من محمد بن إسحاق، ثم دلّسه، فإن بيَّن فيه سماع جرير من ابن أبي نجيح صار الحديث صحيحًا" انتهى.
قلت: جرير بن حازم ثقة ثبت، ولم يُرم بالتدليس فلا يضرّ عنعنته وله أحاديث معنعنة في الصحيحين، فلا حاجة إلى هذا التعليق الذي ذكره البيهقي رحمه الله تعالى. فإذا صحّ الحديث فلا يعلّ بما لم يصح.
مثل رواية سفيان، عن ابن أبي ليلى، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس.
رواه ابن ماجه (3100) من أوجه عن وكيع، قال: حدّثنا سفيان.
وابن أبي ليلي سيء الحفظ، والحكم لم يسمع من المقسم.
ومثل رواية مالك في الموطأ (1/ 377) عن نافع، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أهدي جملًا، كان لأبي جهل بن هشام في حجّ أو عمرة، وهذا مرسل.
هكذا رواه يحيى في الموطأ وفيه خطأ بين، فكل من رواه عن مالك لم يذكر فيه نافعًا، كما قال
ابن عبد البر في التمهيد (17/ 413):"وهذا من الغلط البين، ولا أدري ما وجهه، ولم يختلف الرواة للموطأ عن مالك -فيما علمت قديمًا وحديثًا- أنّ هذا الحديث في الموطأ لمالك، عن عبد الله بن أبي بكر، وليس لنافع فيه ذكر، ولا وجه لذكر نافع فيه. ولم يرو نافع عن عبد الله بن أبي بكر قط شيئًا، بل عبد الله بن أبي بكر ممن يصلح أن يروي عن نافع، وقد روي عن نافع من هو أجلّ منه. وهذا الحديث في الموطأ عند جماعة رواته لمالك عن عبد الله بن أبي بكر".
وكذلك لا يصح ما رواه الخطيب في تاريخه (4/ 82 - 83) في ترجمة أبي عبد الله أحمد بن الحسن بن عبد الجبار الصوفي، أخبرنا سويد بن سعيد، حدثنا مالك، عن الزهري، عن أنس، عن أبي بكر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أهدي جملًا لأبي جهل.
وقد سئل الدارقطني عن هذا الحديث فقال: أبو عبد الله الصوفي وهم فيه وهمًا قبيحًا، والصواب عن مالك، عن عبد الله بن أبي بكر مرسلًا عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، والوهم فيه من الصوفي. انتهى.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুদায়বিয়ার বছরে তাঁর হাদী (কুরবানীর) উটগুলোর মধ্যে আবূ জাহেলের একটি উটকে হাদিয়া হিসেবে পেশ করেছিলেন, যার নাকে রুপার একটি আংটি ছিল।
5203 - عن جابر، قال: نحر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن نسائه بقرة في حجّته.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1319: 357) عن محمد بن حاتم، حدّثنا محمد بن بكر. ح وحدثني سعيد بن يحيى الأمويّ، حدثني أبي - كلاهما، عن ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول (فذكره).
وقوله:"عن نسائه" يعني بعض نسائه؛ لأن البقرة تجزئ عن سبعة فقط، كما في حديث جابر الآتي، وقد جاء تفسيره في حديث أبي هريرة الآتي بقوله:"عمن اعتمر من نسائه". وعائشة لم تعتمر، فخرجت من التسعة، ولذا ذبح عنها بقرة بحجِّها.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হজ্জের সময় তাঁর স্ত্রীদের পক্ষ থেকে একটি গরু কুরবানী করেছিলেন।
5204 - عن جابر بن عبد الله قال: ذبح رسول الله صلى الله عليه وسلم عن عائشة بقرة يوم النحر.
صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1319) عن عثمان بن أبي شيبة، حدّثنا يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.
وتخصيص عائشة بالذكر من باب ذكر بعض أفراد العموم للأهمية.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানীর দিন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে একটি গরু যবেহ করলেন।
5205 - عن عائشة، قالت: خرجنا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم، ولا نرى إلا الحجّ حتى إذا كنا بسرف أو قريبًا منها، حضتُ. فدخل عليَّ النبيُّ صلى الله عليه وسلم وأنا أبكي. فقال:"أنفستِ؟" (يعني الحيضة) قالت: قلتُ: نعم. قال:"إنّ هذا شيء كتبه الله على بنات آدم، فاقضي ما يقضي الحاج، غير أن لا تطوفي بالبيت حتى تغتسلي".
قالت: وضحّى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن نسائه بالبقر.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحيض (294)، ومسلم في الحج (1211: 119) كلاهما من
طريق سفيان بن عيينة، قال: سمعت عبد الرحمن بن القاسم، قال: سمعت القاسم يقول: سمعت عائشة تقول (فذكرته).
ورواه مسلم أيضًا (130) من طريق عبد العزيز بن أبي سلمة الماجشون، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، بسياق أطول. وفيه:"فلما كان يوم النحر طهرتُ، فأمرني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فأفضتُ. قالت: فأُتينا بلحم بقر. فقلت: ما هذا؟ فقالوا: أهدي رسول الله صلى الله عليه وسلم عن نسائه البقر …" الحديث.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হলাম এবং আমরা হজ্জ ছাড়া অন্য কোনো উদ্দেশ্য দেখছিলাম না। অবশেষে যখন আমরা সার্ফ নামক স্থানে বা তার কাছাকাছি পৌঁছলাম, তখন আমি ঋতুমতী হলাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে প্রবেশ করলেন, আর আমি কাঁদছিলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি 'নাফাস' (ঋতুস্রাব) হয়েছো?" (অর্থাৎ মাসিক)। তিনি (আয়িশা) বললেন, আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "নিশ্চয় এটি এমন একটি বিষয় যা আল্লাহ তাআলা আদম-কন্যাদের জন্য নির্ধারণ করে দিয়েছেন। অতএব, হাজিগণ যা যা করে থাকে, তুমিও তা তা করো। তবে তুমি পবিত্র না হওয়া পর্যন্ত কাবাঘরের তাওয়াফ করবে না।" তিনি (আয়িশা) বললেন: আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের পক্ষ থেকে গরু দ্বারা কুরবানি করলেন।
5206 - عن عائشة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نحر عن آل محمد في حجّة الوداع بقرة واحدة.
صحيح: رواه أبو داود (1750)، وابن ماجه (3135) كلاهما عن أحمد بن عمرو بن السرح المصريّ أبو طاهر، قال: أنبأنا ابن وهب، قال: أنبأنا يونس، عن ابن شهاب، عن عمرة، عن عائشة، فذكرته. وإسناده صحيح.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জের সময় মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের পক্ষ থেকে একটি মাত্র গরু কুরবানী করেছিলেন।
5207 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ذبح عمن اعتمر من نسائه بقرة بينهن.
صحيح: رواه أبو داود (1751)، وابن ماجه (3133) كلاهما من حديث الوليد بن مسلم، قال: حدثنا الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره. وإسناده صحيح.
والوليد بن مسلم مدلس إلا أنه صرّح بالتحديث في رواية ابن ماجه.
وصحّحه ابن خزيمة (2903)، والحاكم (1/ 467) كما في تلخيص الذهبي له، كلاهما من حديث الوليد بن مسلم.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".
تنبيه: وقع في المستدرك المطبوع خطأ في الإسناد، فرواه من طريق النسائي هكذا: حدّثنا أبو على الحسين بن علي الحافظ، أنبأنا أبو عبد الرحمن أحمد بن شعيب الفقيه بمصر، ثنا محمد بن أبي كثير، عن سلمة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث، بمثله.
والحديث في سنن النسائيّ الكبرى (4128) عن عمرو بن عثمان، عن الوليد، عن الأوزاعيّ، عن يحيى، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، مثله. وزاد:"في حجّة الوداع".
وهذا مما يؤكّد وقوع الخطأ في سند الحاكم المطبوع.
وأمّا الحافظ ابن حجر فلم يعزه إليه أصلًا، وإنما اكتفى بعزوه إلى ابن خزيمة وحده. انظر: إتحاف المهرة (16/ 124).
والوليد مدلس إلا أنه صرّح كما مضى، وقد تابعه إسماعيل بن سماعة، عن الأوزاعي، بإسناده مثله. رواه ابن حبان (4008) من طريق هشام بن عمار، قال: حدثنا إسماعيل بن سماعة، فذكره.
وهشام بن عمار حسن الحديث، ومتابعة إسماعيل بن سماعة للوليد يؤكّد بأن الوليد لم يسقط أحدًا بين الأوزاعي وبين يحيى بن أبي كثير، فإنه يفعل هذا أحيانًا مع الضعفاء بحجة أن الأوزاعي أنبل من أن يروي عن الضّعفاء.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে যারা উমরাহ পালন করেছিলেন, তাদের পক্ষ থেকে তাদের মাঝে একটি গরু যবেহ করেছিলেন।
5208 - عن جابر بن عبد الله، قال: نحرنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم عام الحديبية البدنة عن سبعة، والبقرة عن سبعة.
صحيح: رواه مالك في الضحايا (9) عن أبي الزبير المكيّ، عن جابر بن عبد الله، به. ورواه مسلم في الحج (1318: 350) من طريق مالك، به، مثله.
জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: হুদায়বিয়ার বছর আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে সাতজনের পক্ষ থেকে একটি উট এবং সাতজনের পক্ষ থেকে একটি গরু কুরবানী করেছিলাম।
5209 - عن جابر بن عبد الله، قال: خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم مهلّين بالحجّ، فأمرنا رسول الله صلى الله عليه وسلم أن نشترك في الإبل والبقر كلّ سبعة منا في بدنة.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1318: 351) من طرق، عن زهير أبي خيثمة، حدّثنا أبو الزبير، عن جابر، فذكره.
وفي رواية: اشتركنا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم في الحج والعمرة كل سبعة في بدنة. فقال رجل لجابر: أيشترك في البدنة ما يشترك في الجزور؟ قال: ما هي إلا من البدن.
وفي رواية: كنا نتمتع مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بالعمرة، فنذبح البقرة عن سبعة نشترك فيها.
قال الترمذيّ (904) بعد أن روى هذا الحديث:"والعمل على هذا عند أهل العلم من أصحاب النبي صلى الله عليه وسلم وغيرهم، يرون الجزور عن سبعة، والبقرة عن سبعة. وهو قول سفيان الثوري، والشافعي، وأحمد. وروي عن ابن عباس، عن النبي صلى الله عليه وسلم: أن البقرة عن سبعة، والجزور عن عشرة. وهو قول إسحاق. واحتج بهذا الحديث. وحديث ابن عباس إنما نعرفه من وجه واحد".
قلت: حديث ابن عباس هو الآتي بعد حديث.
জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে হজ্জের ইহরাম বেঁধে বের হলাম। তখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের উট ও গরুতে অংশীদার হতে নির্দেশ দিলেন যে, আমাদের মধ্যে সাতজন মিলে একটি উট বা গরুতে অংশ নেবে।
সহীহ: মুসলিম এটিকে হজ্জ অধ্যায়ে (১৩১৮: ৩৫১) যুহাইর আবূ খাইছামা সূত্রে আবূ যুবায়র থেকে, তিনি জাবির থেকে, বিভিন্ন সনদে বর্ণনা করেছেন।
অন্য এক বর্ণনায় আছে: আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে হজ্জ ও উমরার জন্য প্রত্যেক সাতজন মিলে একটি উট বা গরুতে অংশ নিয়েছিলাম। এক ব্যক্তি জাবিরকে জিজ্ঞেস করল: একটি উটে যতজন অংশ নেয়, একটি গরুতেও কি ততজন অংশ নিতে পারে? তিনি বললেন: গরুও তো উটের সমগোত্রীয়ই (অর্থাৎ, উভয়ের অংশ সমান)।
অন্য বর্ণনায় আছে: আমরা রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে উমরার মাধ্যমে তামাত্তু (উপভোগ) করতাম এবং আমরা সাতজন মিলে অংশ নিয়ে গরু কুরবানী করতাম।
তিরমিযী (৯০৪) এই হাদীসটি বর্ণনা করার পর বলেন: "নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাহাবীগণ এবং অন্যান্য আলিমদের নিকট এই হাদীসের ওপর আমল প্রচলিত। তারা মনে করেন, একটি উট সাতজনের পক্ষ থেকে এবং একটি গরুও সাতজনের পক্ষ থেকে কুরবানী করা যায়। এটা হলো সুফিয়ান সাওরী, শাফেঈ ও আহমাদের অভিমত। ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সূত্রে বর্ণিত আছে যে, একটি গরু সাতজনের পক্ষ থেকে এবং একটি উট দশজনের পক্ষ থেকে (কুরবানী করা যায়)। এটি ইসহাকের অভিমত। তিনি এই (জাবিরের) হাদীসটি দ্বারাও প্রমাণ পেশ করেন। আর ইবনে আব্বাসের হাদীসটি আমরা কেবল একটি সূত্রেই জানি।"
আমি বলি: ইবনে আব্বাসের হাদীসটি এর পরের হাদীসে আসছে।
5210 - عن حذيفة بن اليمان، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أشرك بين المسلمين البقرة عن سبعة.
حسن: رواه الإمام أحمد عن أسود بن عامر (23446)، وعن يحيى بن آدم (23453) كلاهما عن إسرائيل، عن الحكم بن عتيبة، قال: حدثني المغيرة بن حَذَف، عن حذيفة، فذكره.
وفي لفظ يحيى بن آدم:"شرَّك رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجّته بين المسلمين".
وإسناده حسن من أجل المغيرة بن حذف العبسيّ وهو من رجال التعجيل" قال ابن معين:"مشهور". قال الحافظ: وذكره ابن خلفون في الثقات. قلت: ولم يذكره ابن حبان في"ثقاته" وهو من شرطه.
وأما ما روي عن ابن عباس، قال: كنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في سفر، فحضر الأضحى، فاشتركنا
في الجزور عن عشرة، والبقرة عن سبعة. فهو شاذ.
رواه الترمذي (905)، والنسائي (4392)، وابن ماجه (3131)، وصحّحه ابن خزيمة (2908)، وابن حبان (4007)، والحاكم (4/ 230)، والبيهقيّ (5/ 235 - 236) كلهم من حديث الحسين بن واقد، عن علباء بن أحمر، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
قال الترمذيّ: حديث حسن غريب، وهو حديث حسين بن واقد.
وقال الحاكم:"صحيح على شرط البخاريّ".
قلت: الحسين بن واقد ليس على شرط البخاري، ولكن على شرط مسلم، وهو المروزي أبو عبد الله القاضي، حسن الحديث إذا لم يخالف وقد خالف هنا في المتن.
ولذا رجّح البيهقي رواية جابر، فقال:"حديث أبي الزبير عن جابر أصح من ذلك، وقد شهد الحديبية وشهد الحج والعمرة، وأخبرنا بأن النبي صلى الله عليه وسلم أمرهم باشتراك سبعة في بدنة، فهو أولى بالقبول".
وفي الباب عن ابن مسعود، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"الجزور عن سبعة، والبقرة عن سبعة في الأضاحي".
رواه الطبراني في الأوسط (6124) عن محمد بن موسى الأُبليّ، قال: حدثنا عمر بن يحيى الأبلي، قال: حدثنا حفص بن جميع، عن مغيرة، عن إبراهيم، عن علقمة، عن ابن مسعود، فذكره.
قال الطبراني:"لم يرو هذا الحديث عن مغيرة إلا حفص بن جميع، تفرّد به عمر بن يحيى".
قلت: عمر بن يحيى الأبليّ وشيخه حفص بن جميع ضعيفان، وقد أعلّه الهيثمي في"المجمع" (3/ 226) بحفص بن جميع.
وفي الباب أيضًا عن أنس بن مالك، قال: رأيت رسول الله صلى الله عليه وسلم عام الحديبية شرّك ين سبعة من أصحابه في البدنة. رواه الطبرانيّ في الأوسط. وفيه معاوية بن يحيى الصدفي ضعيف، كما قال الهيثميّ في"المجمع".
হুযাইফাহ ইবনুল ইয়ামান (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মুসলমানদের মধ্যে সাতজনের পক্ষ থেকে একটি গরুতে (কুরবানীর জন্য) শরীক করে দিলেন।
5211 - عن حفصة أمّ المؤمنين أنها قالت لرسول الله صلى الله عليه وسلم: ما شأن الناس حلّوا ولم تحلل أنت من عمرتك؟ فقال:"إنّي لبّدتُ رأسي، وقلَّدتُ هديي فلا أحلّ حتى أنحر".
متفق عليه: رواه مالك في الحج (180) عن نافع، عن عبد الله بن عمر، به، فذكره. ورواه البخاريّ في الحج (1566)، ومسلم في الحج (1229: 176) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
হাফসা উম্মুল মু’মিনীন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বললেন: মানুষের কী হলো যে তারা ইহরাম খুলে ফেলেছে, কিন্তু আপনি আপনার উমরাহর ইহরাম খোলেননি? তখন তিনি বললেন: "নিশ্চয় আমি আমার মাথা আঠালো করেছি (জট পাকিয়েছি) এবং আমার কুরবানীর পশুকে মালা পরিয়ে চিহ্নিত করেছি। সুতরাং আমি কুরবানী না করা পর্যন্ত ইহরাম খুলব না।"
5212 - عن المسور بن مخرمة، ومروان بن الحكم، قالا: خرج النبيّ صلى الله عليه وسلم من المدينة في بضع عشرة مئة من أصحابه، حتى إذا كانوا بذي الحليفة قلَّد النبيّ صلى الله عليه وسلم الهدي وأشعر، وأحرم بالعمرة.
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1694، 1695) من طريق معمر، عن الزّهريّ، عن عروة بن
الزبير، عن المسور بن مخرمة ومروان، قالا (فذكره).
মিসওয়ার ইবনে মাখরামা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও মারওয়ান ইবনুল হাকাম থেকে বর্ণিত, তাঁরা উভয়ে বললেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর এক হাজারের কিছু বেশি সংখ্যক সাহাবীকে সাথে নিয়ে মদীনা থেকে বের হলেন। এমনকি যখন তাঁরা যুল-হুলাইফায় পৌঁছালেন, তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানীর পশুর গলায় মালা পরালেন ও চিহ্নিত করলেন এবং উমরার ইহরাম বাঁধলেন।
5213 - عن عبد الله بن عباس، قال: صلَّى رسول الله صلى الله عليه وسلم الظّهر بذي الحليفة، ثم دعا بناقته فأشعرها في صفحة سنامها الأيمن، وسلت الدّم، وقلَّدها نعلين، ثم ركب راحلته، فلما اسْتوت به على البيداء أهلَّ بالحجّ.
صحيح: رواه مسلم في الحج (1243) من طريق قتادة، عن أبي حسّان (الأعرج واسمه مسلم ابن عبد الله البصريّ)، عن ابن عباس، فذكره.
قال الترمذيّ عقب حديث ابن عباس (906):"وسمعت أبا السائب يقول: كنا عند وكيع، فقال لرجل عنده ممن ينظر في الرّأي: أشعر رسول الله صلى الله عليه وسلم. ويقول أبو حنيفة: هو مُثْلةٌ! فإنه قد رُوي عن إبراهيم النخعيّ أنه قال: الإشعار مثلة. قال: فرأيت وكيعًا غضب غضبًا شديدًا، وقال: أقول لك قال رسول الله صلى الله عليه وسلم وتقول: قال: إبراهيم! ما أحقك بأن تحبس ثم لا تخرج حتى تنزع عن قولك هذا".
قوله:"وأشعرها" الإشعار هو أن يجرحها في صفحة سنامها اليمنى بحرية أو سكين ونحوه، ثم يسلت الدم عنها. وأصل الإشعار والشعور الإعلام والعلامة، وإشعار الهدي لكونه علامة له، ليعلم أنه هدي، فإن ضلّ ردّه واجدُه، ولا يختلط بغيره.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম যুল-হুলাইফায় যুহরের সালাত আদায় করলেন, অতঃপর তিনি তাঁর উটনীকে ডাকলেন (আনালেন) এবং সেটির ডান দিকের কুঁজের পাশে ইশ'আর করলেন (সামান্য আঘাত করে চিহ্নিত করলেন), আর রক্ত মুছে ফেললেন। এরপর সেটিকে দুটি জুতা দিয়ে কিলাদা (মালা) পরিয়ে দিলেন, অতঃপর তিনি তাঁর সওয়ারীতে আরোহণ করলেন। যখন তা তাঁকে নিয়ে বাইদা নামক স্থানে সোজা হয়ে দাঁড়াল, তখন তিনি হজের ইহরাম বাঁধলেন।
5214 - عن عائشة، قالت: أهدى النبيُّ صلى الله عليه وسلم مرة غنمًا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1701)، ومسلم في الحج (1321: 367) كلاهما من طريق الأعمش، عن إبراهيم النخعي، عن الأسود، عن عائشة، فذكرته. واللفظ للبخاريّ.
وأمّا ما رُوي عن جابر: أهدي رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى البيت غنمًا. فهو غير محفوظ. رواه الإمام أحمد (14891)، والبزار -كشف الأستار 1106 - كلاهما من حديث أبي زُبيد عشر بن القاسم، عن الأعمش، عن أبي سفيان، عن جابر، فذكره. وزاد البزار:"مقلّدة" وقال:"لا نعلمه عن جابر إلّا من هذا الوجه، إنما يرويه أصحاب الأعمش عنه، عن إبراهيم، عن أسود، عن عائشة. ولم يتابع عبثر على قوله: عن جابر". انتهى.
وبمثل ذلك أعلّه الدارقطنيّ"العلل" (15/ 71).
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, একবার নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম কিছু বকরী হাদিয়া হিসেবে পাঠিয়েছিলেন।
5215 - عن عبد الله بن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قسم غنمًا يوم النّحر في أصحابه وقال:"اذبحوها لعمرتكم، فإنها تجزئ عنكم". فأصاب سعد بن أبي وقاص تيسٌ.
صحيح: رواه أحمد (2802) عن حجّاج بن محمد، عن ابن جريج، أخبرني عكرمة مولي ابن عباس، زعم أن ابن عباس أخبره.
وإسناده صحيح.
ورواه الطبرانيّ في الكبير (11/ 223) من وجه آخر.
عن داود بن الحصين، عن عكرمة، عن ابن عباس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم بعث بغنم إلى سعد بن أبي وقاص يقسمها بين أصحابه، وكانوا يتمتعون، فبقي تيس فضحي به سعد بن أبي وقاص في تمتعه.
قال الهيثميّ في"المجمع" (3/ 226): رواه أحمد ورجاله رجال الصحيح. وفاته العزو إلى الطبراني.
ثم رأيته ذكره في الأضاحي (4/ 19) وقال:"رواه الطبراني في الكبير ورجاله رجال الصحيح".
وليس كما قال؛ فإن فيه إبراهيم بن إسماعيل بن أبي حبيبة ليس من رجال الصحيح، وهو ضعيف كما في التقريب.
وثمة فيه علة أخرى وهي أن داود بن الحصين يضعف في عكرمة.
أفضل، لأن هذه النجيبة كانت نفيسة، ولهذا بذل فيها ثمن كثير، فكان إهداؤها إلى الله أفضل من أن يهدي بثمنها عدد دونها، وهذا الذي رجَّحه شيخ الإسلام ابن تيمية في مجموع الفتاوي.
আব্দুল্লাহ ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানির দিনে (ইয়াওমুন নাহার) তাঁর সাহাবীদের মাঝে কিছু বকরি বণ্টন করলেন এবং বললেন: "তোমরা এগুলো তোমাদের উমরার জন্য যবাই করো, কারণ তা তোমাদের জন্য যথেষ্ট হবে।" এতে সা’দ ইবনে আবি ওয়াক্কাসের অংশে একটি পাঁঠা পড়ল।
5216 - عن نافع، قال: أراد ابن عمر رضي الله عنهما الحجَّ، عام حجّة الحرورية في عهد ابن الزبير رضي الله عنهما، فقيل له: إنّ الناس كائن بينهم قتال ونخاف أن يصدُّوك، فقال: {لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ} [سورة الأحزاب: 21] إذًا أصنع كما صنع، أشهدكم أني أوجبتُ عمرة، حتى إذا كان بظاهر البيداء قال: ما شأن الحجّ والعمرة إلا واحد، أُشْهدُكم أني جمعتُ حجّة مع عمرة. وأهدى هديًا مقلَّدًا اشتراه، حتى قدم فطاف بالبيت وبالصّفا، ولم يزد على ذلك ولم يَحْلِل من شيء حرُم منه حتى يوم النحر، فحلق ونحر، ورأى أنْ قد قضى طوافه للحجّ والعمرة بطوافه الأول، ثم قال: كذلك صنع النبيّ صلى الله عليه وسلم.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1708) من طريق موسى بن عقبة، عن نافع، به، فذكره.
ورواه مسلم في الحج (1230) من طرق عن نافع، به، نحوه، مختصرًا ومطوَّلًا، وليس عنده ذكر التقليد.
وأما ما رُوي عن ابن عمر:"أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم اشتري هديه من قُديد" فهو ضعيف.
رواه الترمذي (907)، وابن ماجه (3102) كلاهما من حديث بحيي بن اليمان، عن سفيان، عن عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر، فذكره.
قال الترمذيّ:"هذا حديث غريب لا نعرفه من حديث الثوري إلا من حديث يحيى بن اليمان. وروي عن نافع، أن ابن عمر اشتري من قُديد، وهذا أصح" انتهى.
قلت: وهو كما قال، فإنّ يحيى بن اليمان قال فيه النسائي: ليس بالقوي، وقال ابن عدي: عامة ما يرويه غير محفوظ.
فإنه أخطأ فيه فجعل الحديث مرفوعًا من فعل النبيّ صلى الله عليه وسلم بينما الصواب أنه من فعل ابن عمر، كما في الصحيحين، ولذا قال فيه أبو داود:"يخطئ في الأحاديث ويقلبها".
ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নাফি’ (রাহিমাহুল্লাহ) বলেন: তিনি হারূরিয়্যাহদের ফিতনার বছর, ইবনু যুবাইর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর শাসনামলে হজ্জ করার ইচ্ছা করলেন। তখন তাঁকে বলা হলো: মানুষের মধ্যে যুদ্ধ চলছে এবং আমরা আশঙ্কা করি যে আপনাকে (হজ্জ থেকে) বাধা দেওয়া হতে পারে। তিনি বললেন: "নিশ্চয়ই তোমাদের জন্য আল্লাহর রাসূলের (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) মধ্যে রয়েছে উত্তম আদর্শ।" (সূরা আল-আহযাব: ২১)। সুতরাং আমি তাই করব যা তিনি করেছিলেন। আমি তোমাদেরকে সাক্ষী রাখছি যে আমি উমরার ইহরাম বাঁধলাম। যখন তিনি বাইদা নামক স্থানের বাইরে গেলেন, তখন তিনি বললেন: হজ্জ ও উমরার বিষয়টি একই। আমি তোমাদেরকে সাক্ষী রাখছি যে আমি উমরার সাথে হজ্জের ইহরামও যুক্ত করলাম। এবং তিনি তার কেনা চিহ্নায়িত (মালা পরানো) কুরবানীর পশু (হাদী) সাথে নিলেন। অবশেষে তিনি যখন (মক্কায়) পৌঁছলেন, তখন বাইতুল্লাহ ও সাফা-মারওয়ায় তাওয়াফ করলেন। তিনি এর অতিরিক্ত আর কিছু করেননি এবং (ইহরামের কারণে) যা কিছু তার জন্য নিষিদ্ধ ছিল, কুরবানীর দিন পর্যন্ত তা থেকে হালাল হননি। অতঃপর তিনি মাথা মুণ্ডন করলেন ও কুরবানী করলেন। তিনি মনে করলেন যে তাঁর প্রথম তাওয়াফের দ্বারাই তাঁর হজ্জ ও উমরার তাওয়াফ সম্পন্ন হয়েছে। এরপর তিনি বললেন: নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)ও ঠিক এভাবেই করেছিলেন।
5217 - عن عمرة بنت عبد الرحمن، أنّ زياد بن أبي سفيان كتب إلى عائشة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أن عبد الله بن عباس، قال: من أهدى هديًا حَرُم عليه ما يحرم على الحاج حتى ينحر الهدى، وقد بعثت بهديي فاكتبي إليَّ بأمركِ، أو مُري صاحب الهدي. قالت
عمرة: قالت عائشة: ليس كما قال ابن عباس! أنا فتلتُ قلائد هدي رسول الله صلى الله عليه وسلم بيديّ، ثم قلَّدها رسول الله صلى الله عليه وسلم بيده، ثم بعث بها رسول الله صلى الله عليه وسلم مع أبي، فلم يحرُم على رسول الله صلى الله عليه وسلم شيء أحلَّه الله له حتى نُحر الهدي.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (51) عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد، عن عمرة بنت عبد الرحمن، أنها أخبرته، أنّ زياد بن أبي سفيان، (فذكرته).
ورواه البخاري في الحج (1700)، ومسلم في الحج (1321: 369) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
وروياه من حديث الليث، عن ابن شهاب، عن عروة وعمرة بنت عبد الرحمن، أن عائشة، قالت:"كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يُهدي من المدينة، فأفتل قلائد هديه، ثم لا يجتنب شيئًا مما يجتنبه المحرم". البخاريّ (1698)، ومسلم (1321: 359).
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যিয়াদ ইবনু আবি সুফিয়ান নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কাছে লিখেছিলেন যে, আবদুল্লাহ ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন: যে ব্যক্তি কোরবানির পশু (হাদী) পাঠায়, যবেহ না করা পর্যন্ত তার উপর সে সব জিনিস হারাম হয়ে যায় যা হাজীর উপর হারাম হয়। আর আমি আমার কোরবানির পশু পাঠিয়ে দিয়েছি। আপনি আমাকে আপনার নির্দেশ লিখে জানান, অথবা কোরবানির পশুর তত্ত্বাবধায়ককে নির্দেশ দিন। 'আমরা (রাহঃ) বললেন: আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) যা বলেছেন তা সঠিক নয়! আমি নিজ হাতে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর হাদীর (কোরবানির পশুর) মালা তৈরি করেছি, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে সেটি পরিয়ে দিয়েছেন, এরপর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার বাবার সাথে সেটি পাঠিয়েছেন। কিন্তু আল্লাহ যা তাঁর জন্য হালাল করেছেন, হাদীর পশু যবেহ না করা পর্যন্ত রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য তা কিছুই হারাম হয়নি।
5218 - عن عائشة، قالت: أنا فتلت تلك القلائد من عِهْن كان عندنا، فأصبح فينا رسول الله صلى الله عليه وسلم حلالًا، يأتي ما يأتي الحلال من أهله أو يأتي ما يأتي الرجل من أهله.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1705)، ومسلم في الحج (1321: 364) كلاهما من طريق ابن عون، عن القاسم، عن عائشة. واللفظ لمسلم، ولفظ البخاري مختصر.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমাদের নিকট থাকা ভেড়ার পশম দিয়ে আমি সেই (কুরবানীর পশুর জন্য) মালাগুলো পাকিয়েছিলাম। এরপরও রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের মাঝে হালাল অবস্থাতেই ছিলেন। তিনি তাঁর পরিবারের সাথে সেই আচরণই করতেন যা কোনো হালাল ব্যক্তি তার পরিবারের সাথে করে থাকে, অথবা তিনি তাঁর পরিবারের সাথে সেই আচরণই করতেন যা কোনো পুরুষ তার স্ত্রীর সাথে করে থাকে।
5219 - عن عائشة، قالت: لقد رأيتني أفتل القلائد لهدي رسول الله صلى الله عليه وسلم من الغنم، فيبعث به، ثم يقيم فينا حلالًا.
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1703)، ومسلم في الحج (1321: 365) كلاهما من حديث إبراهيم، عن الأسود، عن عائشة، فذكرته.
وأما ما رُوي عن جابر، قال: بينا النبيّ صلى الله عليه وسلم جالس مع أصحابه، شق قميصه حتى خرج منه، فقيل له! فقال:"واعْدتُهم يقلِّدون هَدْيي اليوم فنسيت" فهو ضعيف.
رواه الإمام أحمد (14129) عن عبد الرزاق، حدّثنا داود بن قيس، عن عبد الرحمن بن عطاء، أنه سمع ابني جابر يحدثان، عن أبيهما، قال: فذكره.
وعبد الرحمن بن عطاء هو القرشي، يقال له: ابن أبي لبيبة الذّارع المدني صاحب الشارعة، مختلف فيه. فوثقه النسائيّ، وقال أبو حاتم: شيخ مجهول. وضعّفه الأزديّ، وأبو أحمد الحاكم، وابن عبد البر، وقال: ترك مالك الرواية عنه وهو جاره. ثم هو تلوّن في رواية هذا الحديث فمرة قال: إنه سمع ابني جابر كما هنا، وأخرى كما في المسند (23613) عن نفر من بني سلمة، قالوا: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم جالسًا فشق ثوبه فقال:"إني واعدت هديًا يشعر اليوم".
وأخرى كما في المسند أيضًا (15298) عن عبد الملك بن جابر بن عتيك، عن جابر بن
عبد الله، قال: كنت عند رسول الله صلى الله عليه وسلم جالسًا فقدَّ قميصه من جيبه حتى أخرجه من رجله، فنظر القوم إلى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"إني أمرت ببُدْني التي بعثت بها أن تُقلَّد اليوم، وتُشعر اليوم على ماء كذا وكذا فلبستُ قميصًا ونسيتُ، فلم أكن أُخرج قميصي من رأسي".
وكان قد بعث ببدنه من المدينة وأقام بالمدينة.
ومع اختلافه في الإسناد ففيه نكارة لأنه مخالف للحديث الصحيح الذي مضى بأن النبيّ صلى الله عليه وسلم إذا بعث هديًا يقيم حلالًا، ولا يحرم عليه شيء أحله الله له.
فلا تغترن بقول الهيثميّ في"المجمع" (3/ 227): رواه أحمد ورجاله ثقات.
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কুরবানীর জন্য পাঠানো বকরীর মালা তৈরি করছিলাম। অতঃপর তিনি তা (কুরবানীর স্থানে) পাঠিয়ে দিতেন এবং আমাদের মাঝে হালাল অবস্থায় অবস্থান করতেন।
5220 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم رأى رجلًا يسوق بدنة، فقال:"ارْكبها" فقال: يا رسول الله، إنّها بدنة. فقال:"اركبها ويلك" في الثانية أو الثالثة.
متفق عليه: رواه مالك في الحج (139) عن أبي الزّناد، عن الأعرج، عن أبي هريرة، فذكره. ورواه البخاريّ في الحج (1689)، ومسلم في الحج (1322: 371) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এক ব্যক্তিকে একটি কুরবানীর উট হাঁকিয়ে নিয়ে যেতে দেখলেন। তিনি বললেন, "এটির উপর আরোহণ করো।" লোকটি বলল, ইয়া রাসূলুল্লাহ! এটি তো কুরবানীর উট। তখন তিনি বললেন, "তোমার জন্য আফসোস! এটির উপর আরোহণ করো।" (এই কথা তিনি) দ্বিতীয়বার অথবা তৃতীয়বার বললেন।