হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5188)


5188 - عن عائشة، أنّها قالت: كنت أحبُّ أن أدخل البيت فأصلي فيه، فأخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم بيدي فأدخلني في الحجر وقال لي:"صلِّي في الحجر إذا أردتِ دخول البيت، فإنّما هو قطعة من البيت ولكن قومك استقصروا حين بنوا الكعبة، فأخرجوه من البيت".

حسن: رواه أبو داود (2028)، والنسائي (2912)، والترمذي (876) كلّهم من حديث عبد العزيز بن محمد، عن علقمة بن أبي علقمة، عن أمه، عن عائشة، فذكرته.

ومن هذا الوجه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (24616).

قال الترمذي:"حسن صحيح". وفيه أمّ علقمة واسمها مرجانة ذكرها ابن حبان في"الثقات" ولم يوثقها غيره، ولذا قال الحافظ:"مقبولة" أي إذا توبعت.
قلت: وقد توبعت في إسناد آخر وإن كان فيه انقطاع وهو ما رواه الإمام أحمد (24384) عن حسن، حدّثنا حماد بن سلمة، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جبير، عن عائشة، أنها قالت: يا رسول الله، كلّ أهلك قد دخل البيت غيري؟ . فقال:"أرسلي إلى شيبة فيفتح لكِ الباب" فأرسلتْ إليه. فقال شيبة: ما استطعنا فتحه في جاهلية ولا إسلام بليل. فقال النبيّ صلى الله عليه وسلم:"صلّي في الحجر، فإنّ قومك استقصروا عن بناء البيت حين بنوه".

وفيه عطاء بن السائب مختلط، ولكن روى عنه حماد بن سلمة قبل الاختلاط، وسعيد بن جبير لم يسمع من عائشة.

ولكن رواه الطبراني في المعجم الأوسط (7094) عن محمد بن عبد الله بن بكر السراج، قال: حدثنا إسماعيل بن إبراهيم الترجماني، قال: حدثنا شعيب بن صفوان، عن عطاء بن السائب، عن سعيد بن جبير، عن ابن عباس، عن عائشة، قالت: قلت: يا رسول الله! كلّ نسائك قد دخل البيت غيري؟ ! قال:"فاذهبي إلى ذي قرابتك إلى شيبة، فليفتح لك الباب فادخليه". فأرسلت إليه: أنّ نبي الله قد أذن لي أن يُفتح لي الباب فأدخله. قال: نبي الله أمرك بذاك؟ قلت: نعم. فأخذ المفاتيح، فأتى النبيّ صلى الله عليه وسلم، فقال: يا رسول الله، أمرت عائشة أن يُفتح لها الباب؟ قال:"نعم". قال: لا والله ما فتحتُه في جاهلية ولا إسلام بليل قطّ. قال:"فانظر ما كنتَ تصنع فافعله، ولا أفعله (كذا في الأصل، ويبدو أن قوله:"ولا أفعله" خطأ من سبق القلم) قال:"واذهبي أنت يا عائشة فصلي ركعتين في الحجر، فإن طائفةٌ منه من البيت، وإنّ قومك قصرت بهم النفقة فتركوا طائفة من البيت".

فأدخل فيه شعيب بن صفوان"ابن عباس" بين سعيد بن جبير، وبين عائشة.

وشعيب بن صفوان هو الثقفيّ أبو يحيى الكاتب من رجال مسلم إلّا أنه مختلف فيه، فقال الإمام أحمد: لا بأس به، وهو صحيح الحديث، وتكلم فيه ابن معين، وقال ابن عدي: عامة ما يرويه لا يتابعه عليه أحد، ثم لم يعلم هل روى عن عطاء بن السائب قبل اختلاطه أو بعده إلا أنها متابعة قوية لحديث مرجانة.

والحجر: هو الحائط المستدير إلى جانب الكعبة الغربي، واختلف هل الحجر كله من البيت؟ فالراجح أن بعضه من البيت ومقداره ستة أذرع أو سبعة، وما زاد على ذلك فليس من البيت. انظر: الفتح (3/ 443).

ثم عمل عائشة بعده يقويه أيضًا ففي مصنف عبد الرزاق (9155) عن معمر، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، قالت:"ما أبالي أفي الحجر صليت، أم في جوف البيت". وإسناده صحيح.

ورواه أيضًا عبد الرزاق (9154) عن ابن جريج، قال: حدثني كثير بن أبي كثير، عن أمّ كلثوم بنت عمرو بن أبي عقرب، عن عائشة، أنّها سألته أن يفتح لها الكعبة ليلًا، فأبى عليها -زعموا شيبة
ابن عثمان - فقالت عائشة لأمّ كلثوم:"انطلقي ندخل الكعبة، فدخلت الحجر".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেছেন: আমি চাইতাম যেন আমি (কা'বা) ঘরের ভেতরে প্রবেশ করে সালাত আদায় করতে পারি। তখন রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার হাত ধরলেন এবং আমাকে হিজরে (হাতীমে) প্রবেশ করালেন এবং আমাকে বললেন: "যদি তুমি ঘরে প্রবেশ করতে চাও, তবে তুমি হিজরে সালাত আদায় করো, কারণ নিশ্চয়ই এটি (হিজর) কা'বা ঘরেরই একটি অংশ। কিন্তু তোমার গোত্রের লোকেরা যখন কা'বা নির্মাণ করেছিল, তখন তারা অর্থ সংকটে পড়েছিল, ফলে তারা এটিকে ঘরের বাইরে রেখে দিয়েছিল।"









আল-জামি` আল-কামিল (5189)


5189 - عن عائشة، قالت: قلت: يا رسول الله، ألا أدخل البيت؟ قال:"ادخلي الحجر فإنّه من البيت".

صحيح: رواه النسائيّ (2911) عن أحمد بن سعيد الرباطيّ، قال: حدّثنا وهب بن جرير، قال: حدّثنا قرّة بن خالد، عن عبد الحميد بن جبير، عن عمّته صفيّة بنت شية، قالت: حدّثتنا عائشة، فذكرته. وهذا إسناد صحيح.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি বললাম, ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আমি কি ঘরে (কাবা ঘরে) প্রবেশ করব না? তিনি বললেন: "তুমি 'হিযর'-এ প্রবেশ করো। কেননা তা ঘরের (কাবা ঘরের) অংশ।"









আল-জামি` আল-কামিল (5190)


5190 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تُشدّ الرّحال إلّا إلى ثلاثة مساجد: المسجد الحرام، ومسجد رسول الله صلى الله عليه وسلم، ومسجد الأقصى".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصلاة (1189)، ومسلم في الحج (1397) كلاهما من حديث سفيان، عن الزهري، عن سعيد، عن أبي هريرة، فذكره.

وقد سبق ذكره في كتاب الصلاة مع بقية الأحاديث.

وأمّا ما رُوي:"إنّ من صلّى في مسجدي أربعين صلاة كتب له براءة من النار، وبراءة من العذاب، وأنه بريء من النفاق" وبألفاظ أخرى فكلّها ضعيفة، ولكن يشهد بعضه لبعض، ويندرج تحت أصل وهو أداء الصلاة جماعة، فلا بأس أن يواظب المسلم على أداء الصلاة في المسجد النبوي بدون هذا القيد كما قلت في"المنة الكبرى" (4/ 417 - 420) وفيه فوائد أخرى فراجعها.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তিনটি মসজিদ ছাড়া (পুণ্য অর্জনের উদ্দেশ্যে) সফর করা যাবে না: মাসজিদুল হারাম, আল্লাহর রাসূলের মসজিদ (মাসজিদে নববী) এবং মাসজিদুল আক্বসা।"









আল-জামি` আল-কামিল (5191)


5191 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"ما من أحد يسلِّمُ عليَّ إلا ردَّ الله عليَّ روحي حتّى أرُدَّ عليه السلام".

حسن: رواه أبو داود (2041) عن محمد بن عوف، حدّثنا المقرئ، حدّثنا حيوة، عن أبي صخر حُميد بن زياد، عن يزيد بن عبد الله بن قُسيط، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه الإمام أحمد (10815)، والبيهقي في الكبرى (5/ 245) كلاهما من طريق المقرئ (وهو عبد الله بن يزيد) بإسناده، مثله.

وإسناده حسن من أجل الخلاف في أبي صخر غير أنه حسن الحديث، وهو من رجال مسلم، وقد قال فيه الحافظ:"صدوق يهم".

ويزيد بن عبد الله بن قُسيط اختلف في سماعه من أبي هريرة، ولكن لم أجد حجّة قاطعة على عدم سماعه منه، وقد أمكنه ذلك، فإنه ولد سنة (32 هـ)، ومات أبو هريرة سنة (59 هـ).

في حين رواه الطبراني في الأوسط من طريقين: الأول مثل هذا (9325)، والثانية بزيادة"أبي
صالح" بين يزيد بن عبد الله بن قسيط، وبين أبي هريرة (3116). وقال:"لم يرو هذا الحديث عن يزيد إلا أبو صخر، ولا عن أبي صخر إلا حيدة، تفرّد به عبد الله بن يزيد".

ولا يضرّ تفرّد هؤلاء فهم كلهم ثقات، وهذا الطريق يقوي ما قبله.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: কোনো ব্যক্তি যখনই আমার ওপর সালাম পেশ করে, তখনই আল্লাহ আমার রূহ (আত্মা) আমার কাছে ফিরিয়ে দেন, যাতে আমি তাকে সালামের উত্তর দিতে পারি।









আল-জামি` আল-কামিল (5192)


5192 - عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"لا تجعلوا بيوتكم قبورًا، ولا تجعلوا قبري عيدًا، وصلّوا عليّ فإنّ صلاتكم تبلغني حيث كنتم".

حسن: رواه أبو داود (2042) عن أحمد بن صالح، قال: قرأت على عبد الله بن نافع، أخبرني ابن أبي ذئب، عن سعيد المقبري، عن أبي هريرة، فذكره.

وإسناده حسن من أجل الكلام في عبد الله بن نافع وهو الصائغ المخزوميّ مولاهم فإنه إذا حدّث من حفظه أخطأ، وإذا حدّث من الكتاب يصيب، وإنه هنا حدّث من الكتاب.

ومن طريقه رواه الإمام أحمد (8804).

وقوله:"عيدا" أي لا تجعلوه مجمعًا كالأعياد التي يقصد الناس الاجتماع إليها للصّلاة، بل يزار قبره صلوات الله وسلامه عليه كما كان يزوره الصحابة رضوان الله عليهم على الوجه الذي يرضاه ويحبه صلوات الله وسلامه عليه" قاله ابن القيم في"تهذيب السنن" (2/ 447).




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ্ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "তোমরা তোমাদের ঘরকে কবরে (সমাধিতে) পরিণত করো না, আর আমার কবরকে উৎসবের স্থানে পরিণত করো না। বরং তোমরা আমার প্রতি সালাত (দরুদ) পাঠাও, কেননা তোমরা যেখানেই থাকো না কেন, তোমাদের সালাত (দরুদ) আমার কাছে পৌঁছে যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5193)


5193 - عن عبد الله بن مسعود، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إنّ لله ملائكة سياحين في الأرض يبلّغون من أمّتي السّلام".

صحيح: رواه النسائيّ في المجتبي (1282)، وفي اليوم والليلة (66)، والإمام أحمد (3666)، وصحّحه ابن حبان (914)، والحاكم (2/ 421) كلّهم من طرق عن سفيان، عن عبد الله ابن السائب، عن زاذان، عن عبد الله فذكره.

وإسناده صحيح. انظر للمزيد: جموع أبواب الإيمان بالملائكة.

وكان ابن عمر إذا قدم من السفر أتي القبر، فقال:"السلام عليك يا رسول الله، السلام عليك يا أبا بكر، السلام عليك يا أبتاه".

وفي رواية: بدأ بقبر رسول الله صلى الله عليه وسلم، فصلى عليه وسلّم، ودعا له، ولا يمسّ القبر.

رواه البيهقيّ في الكبرى (5/ 245)، وفي الصغري (1749 - بترقيمي).

قال الإمام مالك، وأحمد، والشافعي: يقول ذلك مستقبل الحجرة.

ولا يقف عند القبر للدعاء لنفسه؛ لأنّ أحدًا من الصحابة لم يكن يفعله، ولكن كانوا يستقبلون القبلة.

وفي الباب عن علي بن حسين، عن أبيه، عن جدّه، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال:"لا تتخذوا قبري عيدًا، ولا بيوتكم قبورًا، فإنّ تسليمكم يبلغني أينما كنتم".

رواه أبو يعلى (469) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا زيد بن الحباب، حدّثنا جعفر بن إبراهيم
من ولد ذي الجناحين، قال: حدّثنا علي بن عمر، عن أبيه، عن علي بن حسين، فذكره.

وفيه علي بن عمر وهو ابن الحسين بن علي بن أبي طالب الهاشمي لم يوثقه إلا ابن حبان، وفي التقريب:"مستور".

وفي الباب أيضًا عن الحسن بن علي بن أبي طالب، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صلُّوا في بيوتكم، لا تتخذوها قبورًا، ولا تتخذوا بيتي عيدًا، صلُّوا عليَّ وسلِّموا، فإنّ صلاتكم وسلامكم يبلغني أينما كنتم".

رواه أبو يعلى (6761) عن موسي بن محمد بن حيان، حدّثنا أبو بكر الحنفي، حدثنا عبد الله بن نافع، أخبرني العلاء بن عبد الرحمن، قال: سمعت الحسن بن علي بن أبي طالب، فذكره.

وفيه عبد الله بن نافع وهو الصائغ إذا حدّث من حفظه أخطأ، وإذا حدّث من الكتاب يصيب، وهنا لم يرو من الكتاب فلعله أخطأ، فإنّ الحديث معروف لأبي هريرة كما سبق، وبه أعله الهيثمي في"المجمع" (2/ 247).

وأمّا الأحاديث التي رويت في زيارة قبر النبيّ صلى الله عليه وسلم، مثل قوله:"من حجّ فزار قبري بعد مماتي فكأنّما زارني في حياتي".

ومثل:"من حجّ البيت ولم يزرني فقد جفاني".

ومثل:"من حجّ حجّة الإسلام، وزار قبري، وغزا غزوة، وصلى عليَّ في بيت المقدس لم يسأله الله عز وجل فيما افترض عليه".

ومثل:"من زار قبري وجبت له شفاعتي".

ومثل:"من زارني بعد موتي فكأنما زارني وأنا حي".

فهذه الأحاديث وغيرها لا يصح منها شيء. انظر تخريجها بالتفصيل في"المنة الكبرى" (4/ 401 - 407).




আব্দুল্লাহ ইবনে মাসউদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহর এমন পরিভ্রমণকারী ফেরেশতাগণ রয়েছেন, যারা যমীনে ঘুরে বেড়ান এবং আমার উম্মতের পক্ষ থেকে আমার নিকট সালাম পৌঁছিয়ে থাকেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (5194)


5194 - عن ربيعة بن الهدير، قال: ما سمعت طلحة بن عبيد الله يحدِّث عن رسول الله صلى الله عليه وسلم حديثًا قطّ غير حديث واحد، قال:"خرجنا مع رسول الله صلى الله عليه وسلم يريد قبور الشّهداء، حتى إذا أشرفنا على حرّة واقم، فلمّا تدلينا منها وإذا قبور بمحنيّةٍ. قال: قلنا: يا رسول الله، أقبور إخواننا هذه؟ قال:"قبور أصحابنا" فلما جئنا قبور الشهداء، قال:"هذه قبور إخواننا".

حسن: رواه أبو داود (2043) عن حامد بن يحيي، حدّثنا محمد بن معن المدني، أخبرني داود ابن خالد، عن ربيعة بن أبي عبد الرحمن، عن ربيعة بن الهدير، قال (فذكره).

وإسناده حسن من أجل داود بن خالد وهو ابن دينار المدنيّ، وهو صدوق كما في"التقريب"،
ومن طريقة رواه أيضًا الإمام أحمد (1387)، والبزار - كشف الأستار (955).

وقوله:"حرة واقم" هي الحرة التي كانت بها الوقيعة التي أوقعها بهم مسلم بن عقبة أيام يزيد ابن معاوية، وهي إحدى حرتي المدينة، وهي الشرقية. والحرة الغربية يقال لها:"وبرة".

والحديث يدل على زيارة قبور الشهداء بأحد، وقد ثبت عن عقبة بن عامر كما مضى أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم خرج في آخر حياته، فصلى على أهل أحد صلاته على الميت.

وفي رواية:"صلى عليهم بعد ثمان سنوات كالمودع للأحياء".




রবীআহ ইবনুল হুদাইর থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমি তালহা ইবনু উবাইদিল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পক্ষ থেকে মাত্র একটি হাদীস ছাড়া আর কখনও কোনো হাদীস বর্ণনা করতে শুনিনি। তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন: আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে শহীদদের কবর যিয়ারতের উদ্দেশ্যে বের হলাম। যখন আমরা 'হাররাত ওয়াকেম'-এর সন্নিকটে পৌঁছলাম এবং সেখান থেকে নিচে নামলাম, তখন একটি উপত্যকায় কিছু কবর দেখতে পেলাম। তিনি (তালহা) বলেন: আমরা বললাম, হে আল্লাহর রাসূল! এগুলো কি আমাদের ভাইদের কবর? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, 'এগুলো আমাদের সাথীদের কবর।' এরপর যখন আমরা (উহুদের) শহীদদের কবরের কাছে আসলাম, তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, 'এগুলো আমাদের ভাইদের কবর।'









আল-জামি` আল-কামিল (5195)


5195 - عن عبد الله بن عمر، قال: كان النبيّ صلى الله عليه وسلم يأتي قباء راكبًا وماشيًا.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الصّلاة (1194)، ومسلم في الحج (1399) كلاهما من حديث نافع، عن ابن عمر، فذكره.

وعندهما عن ابن نمير، عن عبيد الله، عن نافع:"فيصلي فيه ركعتين".




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) সওয়ার হয়ে (আরোহী অবস্থায়) এবং হেঁটে কুবাতে আসতেন। আর তিনি সেখানে দুই রাকাত সালাত আদায় করতেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5196)


5196 - عن سهل بن حنيف: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"ومن تطهر في بيته، ثم أتي مسجد قباء، فصلى فيه صلاة، كان له كأجر عمرة".

حسن: رواه النسائيّ (2/ 37)، وابن ماجه (1412)، وصحّحه الحاكم (3/ 12) كلّهم من حديث محمد بن سليمان الكرماني، قال: سمعت أبا أمامة بن سهل بن حنيف، يقول: قال: سهل ابن حنيف، فذكره. قال الحاكم: صحيح الإسناد.

قلت: وفيه محمد بن سليمان المدني القبائي، روى عنه جماعة ووثّقه ابن حبان، وهو حسن الحديث؛ لأنّه توبع كما رواه البخاريّ في"تاريخه" (8/ 379) وله ما يشهد له. انظر: كتاب الصلاة.




সহল ইবনে হুনাইফ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি নিজ ঘরে পবিত্রতা অর্জন করল, অতঃপর ক্বুবা মসজিদে এসে সেখানে সালাত আদায় করল, তার জন্য একটি উমরার (হজের) সওয়াবের মতো সওয়াব হবে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5197)


5197 - عن عائشة، قالت: إنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم، قال:"إذا قضى أحدكم حجّه فليُعجل الرّحلة إلى أهله، فإنّه أعظم لأجره".

حسن: رواه الدارقطنيّ (2790)، والحاكم (1/ 477) وعنه البيهقيّ (5/ 259) كلّهم من حديث أبي مروان محمد بن عثمان العثماني، ثنا أبو ضمرة الليثيّ، عن هشام بن عروة، عن عروة، عن عائشة، فذكرته.

قال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

وهذا وهم منه فإن أبا مروان محمد بن عثمان ليس من رجال الشيخين، وإنما روي له ابن ماجه والنسائي في"الخصائص" غير أنه مختلف فيه، فوثقه أبو حاتم، وصالح جزرة، والذّهبي، إلا أنه
يروي عن أبيه المناكير. وهذا ليس منها فهو حسن الحديث.

وأبو ضمرة الليثي هو أنس بن عياض الليثي، ثقة من رجال الجماعة.



الحج، مثل الخروج من عرفة قبل الغروب، وترك المبيت بمزدلفة، وترك رمي الجمار جملة وغيرها. وآثارهم مخرجة في مصنف ابن أبي شيبة، ومصنف عبد الرزاق، وسنن سعيد بن منصور وغيرها إلى أن جاء دور فقهاء الإسلام أبي حنيفة ومالك والشافعي وأحمد رحمهم الله تعالى، فهم على مذهب سلفهم.

وإنما وقع الخلاف فيما بينهم في تحديد الواجبات، فمن قال بوجوبه ألزمَ الدمَ بتركه، ومن لم يقل بوجوبه لم يُلْزِم الدمَ بتركهـ.

ولمزيد من الإيضاح والتفصيل انظر:"المنة الكبري".




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ তার হজ্ব সম্পন্ন করে, তখন সে যেন তার পরিবারের কাছে ফিরে যাওয়ার জন্য তাড়াতাড়ি করে। কারণ তা তার প্রতিদানের জন্য অধিক মহৎ।"









আল-জামি` আল-কামিল (5198)


5198 - عن * *




৫১৯৮ - ... থেকে বর্ণিত ...









আল-জামি` আল-কামিল (5199)


5199 - عن عبد الله بن عمر، قال: تمتّع رسولُ الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع بالعمرة إلى الحجّ، وأهدي، فساق معه الهدي من ذي الحليفة، وبدأ رسول الله صلى الله عليه وسلم فأهلَّ بالعمرة، ثم أهلَّ بالحجّ. وتمتّع النّاسُ مع رسول الله صلى الله عليه وسلم بالعمرة إلى الحجّ، فكان من الناس من أهدى فساق الهدي، ومنهم من لم يُهْدِ. فلمّا قدم رسولُ الله صلى الله عليه وسلم مكة. قال للناس:"من كان منكم أهدى، فإنه لا يحلُّ من شيء حرُم منه حتّى يقضي حجَّه. ومن لم يكن منكم أهدى فليطف بالبيت وبالصّفا والمروة، وليقصِّر وليَحْلل، ثم ليُهلّ بالحجِّ ولْيُهد. فمن لم يجد هديًا، فليصُم ثلاثة أيام في الحجّ وسبعة إذا رجع إلى أهله".

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1691)، ومسلم في الحج (1237) من طريق الليث بن سعد، حدثني عقيل بن خالد، عن ابن شهاب، عن سالم بن عبد الله، أنّ عبد الله بن عمر قال (فذكره).

وقوله تعالى: {ثَلَاثَةِ أَيَّامٍ فِي الْحَجِّ} جمهور المفسرين أنه يصومها قبل التروية، ويوم التروية وآخرها يوم عرفة، وإذا فاته صيامها صامها أيام التشريق اليوم الحادي عشر، والثاني عشر، والثالث عشر.

وذهب ابن جرير إلى أن له أن يصومها من أول إحرامه بالحج بعد قضاء عمرته إلى انقضاء أيام التشريق سوى يوم النحر فإنه غير جائز له صومه.

وقوله تعالى: هم أهل الحرم، ومن بينه وبين مكة دون مسافة القصر. نصَّ عليه الإمام أحمد.

وقال مالك: هم أهل مكة.

فليس على المكي دمُ تمتع وإنْ كان تمتع بالعمرة إلى الحج فإن تمتعه صحيح إلا ليس عليه دم
متعة لأن المتعة له لا عليه.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বিদায় হজ্জে উমরার সাথে হজ্জের তামাত্তু’ (সুবিধা) গ্রহণ করেন এবং তিনি কুরবানীর পশু সঙ্গে নিয়েছিলেন। তিনি যুল-হুলাইফা হতে তাঁর সাথে কুরবানীর পশু নিয়ে যান। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম প্রথমে উমরার জন্য ইহরাম বাঁধেন, অতঃপর হজ্জের জন্য ইহরাম বাঁধেন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর সাথে লোকেরাও উমরার সাথে হজ্জের তামাত্তু’ (সুবিধা) গ্রহণ করেন। লোকদের মধ্যে কেউ কেউ কুরবানীর পশু সাথে নিয়েছিল এবং কেউ কেউ কুরবানীর পশু সাথে নেয়নি। যখন রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মক্কায় আসলেন, তখন তিনি লোকদেরকে বললেন: "তোমাদের মধ্যে যারা কুরবানীর পশু সাথে এনেছ, তারা হজ্জ সমাপ্ত না করা পর্যন্ত কোনো হালাল বস্তুও ব্যবহার করতে পারবে না যা তার জন্য (ইহরামের কারণে) হারাম হয়েছে। আর তোমাদের মধ্যে যারা কুরবানীর পশু সাথে আননি, তারা যেন বাইতুল্লাহর ত্বওয়াফ করে এবং সাফা-মারওয়ার সা‘ঈ সম্পন্ন করে, চুল ছোট করে (তাকসীর) হালাল হয়ে যায়। অতঃপর তারা হজ্জের ইহরাম বাঁধবে এবং কুরবানী করবে। কিন্তু যে ব্যক্তি কুরবানীর পশু পাবে না, সে যেন হজ্জের সময় তিন দিন এবং পরিবারের কাছে ফিরে গেলে সাত দিন সিয়াম (রোজা) পালন করে।"

(উদ্ধৃতি সূত্র:) মুত্তাফাকুন আলাইহি। ইমাম বুখারী (হজ্জ, ১৬৯১) এবং মুসলিম (হজ্জ, ১২৩৭) এটি লায়স ইবনু সা'দ-এর সূত্রে বর্ণনা করেছেন, (তিনি বলেন,) আমাকে উকায়ল ইবনু খালিদ হাদীস বর্ণনা করেছেন, তিনি ইবনু শিহাব থেকে, তিনি সালিম ইবনু আব্দুল্লাহ থেকে যে, আব্দুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেন (অতঃপর তিনি এটি উল্লেখ করেন)।

আল্লাহ তা‘আলার বাণী: "হজ্জের সময় তিন দিন" (সূরা বাক্বারাহ ২:১৯৬) - বেশিরভাগ মুফাসসিরদের মতে, সে (তামাত্তুকারী) সিয়ামগুলো তারবিয়াহ (আটই যিলহজ্জ)-এর পূর্বে, তারবিয়াহর দিন এবং শেষ দিন আরাফার দিন পর্যন্ত পালন করবে। যদি তার সিয়ামগুলো ছুটে যায়, তাহলে সে তা আইয়ামে তাশরীক (১১, ১২ ও ১৩ই যিলহজ্জ) পালন করবে।

ইবনু জারীর-এর মত হলো: সে তার উমরা সম্পন্ন করার পর হজ্জের ইহরাম বাঁধার প্রথম দিন থেকে শুরু করে আইয়ামে তাশরীক শেষ হওয়া পর্যন্ত যেকোনো সময় রোজা রাখতে পারে, কেবল ইয়াওমুন নাহার (কুরবানীর দিন) ব্যতীত; কারণ সেই দিন তার জন্য রোজা রাখা জায়িয নয়।

এবং আল্লাহ তা‘আলার বাণী (সূরা বাকারাহ ২:১৯৬) দ্বারা উদ্দেশ্য যারা মক্কার অধিবাসী নয়— তারা হলো হারাম শরীফের অধিবাসী এবং যারা মক্কা ও তার মাঝামাঝি দূরত্বের কসরের দূরত্বের চেয়ে কম দূরত্বে অবস্থান করে। ইমাম আহমাদ এই বিষয়ে সুস্পষ্ট বক্তব্য দিয়েছেন।

আর ইমাম মালিক বলেন: তারা হলো মক্কার অধিবাসী।

সুতরাং মক্কাবাসীর উপর তামাত্তু’র কুরবানী (দম) ওয়াজিব নয়, যদিও তারা উমরার সাথে হজ্জের তামাত্তু’ করে। তাদের তামাত্তু’ সহীহ, তবে তাদের উপর তামাত্তু’র ‘দম’ নেই। কারণ তামাত্তু’ (সুবিধা) তাদের জন্য প্রযোজ্য, তাদের বিরুদ্ধে নয়।









আল-জামি` আল-কামিল (5200)


5200 - عن عروة بن الزبير، أنّ عائشة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أخبرته عن رسول الله صلى الله عليه وسلم في تمتّعه بالعمرة إلى الحجّ، فتمتّع النّاسُ معه.

بمثل الذي أخبرني سالم، عن ابن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1692)، ومسلم في الحج (1228) كلاهما من طريق الليث بن سعد، حدثني عُقيل (هو ابن خالد)، عن ابن شهاب، عن عروة بن الزبير، به.

وقوله:"بمثل الذي أخبرني … إلخ" القائل ذلك هو ابن شهاب الزهري يحيل فيه على حديثه السابق.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী। তিনি উরওয়া ইবনুয যুবাইরকে অবহিত করেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) উমরাহসহ হজ্জের তামাত্তু (সুবিধা) গ্রহণ করেছিলেন, ফলে লোকেরাও তাঁর সাথে তামাত্তু করেছিল। এটি সেইরকম, যা আমাকে সালিম ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সূত্রে অবহিত করেছেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5201)


5201 - عن جابر بن عبد الله، قال: ثم انصرف إلى المنحر، فنحر ثلاثًا وستين بيده، ثم أعطى عليًا فنحر ما غبر، وأشركه في هديه.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدني، عن جعفر بن محمد بن علي بن حسين بن علي بن أبي طالب، عن أبيه، عن جابر، فذكره في حجة النبي صلى الله عليه وسلم.

وقد رُوي عن علي أنه قال: لما نحر رسول الله صلى الله عليه وسلم بُدنه، فنحر ثلاثين بيده، وأمرني فنحرت سائرها.

رواه أبو داود (1764) عن هارون بن عبد الله، حدّثنا محمد ويعلى ابنا عبيد، قالا: حدّثنا محمد ابن إسحاق، عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن علي، فذكره.

ومحمد بن إسحاق مدلّس وقد عنعن، ولم يذكر ابن هشام في سيرته هذا الجزء من حديث ابن إسحاق في خروج النبيّ صلى الله عليه وسلم في حجة الوداع، كما أنّ فيه مخالفة لحديث جابر في الصّحيح أنه صلى الله عليه وسلم -
نحر ثلاثًا وستين بيده، ثم أعطى عليًا فنحر ما غبر كما مضى.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানী করার স্থানে গেলেন, অতঃপর নিজ হাতে তেষট্টিটি উট কুরবানী করলেন, এরপর তিনি আলীকে (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বাকিগুলো কুরবানী করার জন্য দিলেন এবং তাঁকে (হাদী বা কুরবানীর পশুর সওয়াবে) শরীক করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5202)


5202 - عن ابن عباس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أهدى عام الحديبية في هدايا رسول الله صلى الله عليه وسلم جملًا كان لأبي جهل في رأسه برة فضّة.

حسن: رواه أبو داود (1749) عن النّفيلي، حَدّثنَا محمد بن سلمة، حدثنا محمد بن إسحاق.

ح وحدّثنا محمد بن المنهال، حدّثنا يزيد بن زريع، عن محمد بن إسحاق -المعنى-، قال: قال عبد الله -يعني ابن أبي نجيح-، حدّثني مجاهد، عن ابن عباس، فذكره.

قال ابن منهال: برّة من ذهب. زاد النفيلي: يغيظ بذلك المشركين.

ومحمد بن إسحاق مدلس وقد عنعن، ولكن صرّح بالتحديث فيما رواه الإمام أحمد (2362) عن يعقوب، حدّثنا أبي، عن ابن إسحاق، حدثني عبد الله بن أبي نجيح، عن مجاهد بن جبر، عن ابن عباس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قد كان أهدي جمل أبي جهل الذي كان استلب يوم بدر، في رأسه برة فضة، عام الحديبية في هديه.

وقال في موضع آخر:"ليغيظ بذلك المشركين".

ورواه ابن خزيمة (2897، 2898) مع التصريح في الرواية الثانية. وكذلك الحاكم (1/ 467) وقال:"صحيح على شرط مسلم".

علاوة على ذلك فإن له طرقًا أخرى غير ابن إسحاق منها ما رواه الإمام أحمد (2466) عن حسين، حدّثنا جرير بن حازم، عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن ابن عباس، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أهدي في بُدنه بعيرًا كان لأبي جهل، في أنفه برة من فضة.

ومن هذا الوجه رواه البيهقيّ (5/ 230) وقال:"هذا إسناد صحيح". إلا أنهم يرون أنّ جرير بن حازم أخذه من محمد بن إسحاق، ثم دلّسه، فإن بيَّن فيه سماع جرير من ابن أبي نجيح صار الحديث صحيحًا" انتهى.

قلت: جرير بن حازم ثقة ثبت، ولم يُرم بالتدليس فلا يضرّ عنعنته وله أحاديث معنعنة في الصحيحين، فلا حاجة إلى هذا التعليق الذي ذكره البيهقي رحمه الله تعالى. فإذا صحّ الحديث فلا يعلّ بما لم يصح.

مثل رواية سفيان، عن ابن أبي ليلى، عن الحكم، عن مقسم، عن ابن عباس.

رواه ابن ماجه (3100) من أوجه عن وكيع، قال: حدّثنا سفيان.

وابن أبي ليلي سيء الحفظ، والحكم لم يسمع من المقسم.

ومثل رواية مالك في الموطأ (1/ 377) عن نافع، عن عبد الله بن أبي بكر بن محمد بن عمرو بن حزم، أنَّ رسول الله صلى الله عليه وسلم أهدي جملًا، كان لأبي جهل بن هشام في حجّ أو عمرة، وهذا مرسل.

هكذا رواه يحيى في الموطأ وفيه خطأ بين، فكل من رواه عن مالك لم يذكر فيه نافعًا، كما قال
ابن عبد البر في التمهيد (17/ 413):"وهذا من الغلط البين، ولا أدري ما وجهه، ولم يختلف الرواة للموطأ عن مالك -فيما علمت قديمًا وحديثًا- أنّ هذا الحديث في الموطأ لمالك، عن عبد الله بن أبي بكر، وليس لنافع فيه ذكر، ولا وجه لذكر نافع فيه. ولم يرو نافع عن عبد الله بن أبي بكر قط شيئًا، بل عبد الله بن أبي بكر ممن يصلح أن يروي عن نافع، وقد روي عن نافع من هو أجلّ منه. وهذا الحديث في الموطأ عند جماعة رواته لمالك عن عبد الله بن أبي بكر".

وكذلك لا يصح ما رواه الخطيب في تاريخه (4/ 82 - 83) في ترجمة أبي عبد الله أحمد بن الحسن بن عبد الجبار الصوفي، أخبرنا سويد بن سعيد، حدثنا مالك، عن الزهري، عن أنس، عن أبي بكر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم أهدي جملًا لأبي جهل.

وقد سئل الدارقطني عن هذا الحديث فقال: أبو عبد الله الصوفي وهم فيه وهمًا قبيحًا، والصواب عن مالك، عن عبد الله بن أبي بكر مرسلًا عن النبيّ صلى الله عليه وسلم، والوهم فيه من الصوفي. انتهى.




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, আল্লাহ্‌র রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুদায়বিয়ার বছরে তাঁর হাদী (কুরবানীর) উটগুলোর মধ্যে আবূ জাহেলের একটি উটকে হাদিয়া হিসেবে পেশ করেছিলেন, যার নাকে রুপার একটি আংটি ছিল।









আল-জামি` আল-কামিল (5203)


5203 - عن جابر، قال: نحر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم عن نسائه بقرة في حجّته.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1319: 357) عن محمد بن حاتم، حدّثنا محمد بن بكر. ح وحدثني سعيد بن يحيى الأمويّ، حدثني أبي - كلاهما، عن ابن جريج، أخبرني أبو الزبير، أنه سمع جابر بن عبد الله يقول (فذكره).

وقوله:"عن نسائه" يعني بعض نسائه؛ لأن البقرة تجزئ عن سبعة فقط، كما في حديث جابر الآتي، وقد جاء تفسيره في حديث أبي هريرة الآتي بقوله:"عمن اعتمر من نسائه". وعائشة لم تعتمر، فخرجت من التسعة، ولذا ذبح عنها بقرة بحجِّها.




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর হজ্জের সময় তাঁর স্ত্রীদের পক্ষ থেকে একটি গরু কুরবানী করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5204)


5204 - عن جابر بن عبد الله قال: ذبح رسول الله صلى الله عليه وسلم عن عائشة بقرة يوم النحر.

صحيح: رواه مسلم في الحجّ (1319) عن عثمان بن أبي شيبة، حدّثنا يحيى بن زكريا بن أبي زائدة، عن ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر، فذكره.

وتخصيص عائشة بالذكر من باب ذكر بعض أفراد العموم للأهمية.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কুরবানীর দিন আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর পক্ষ থেকে একটি গরু যবেহ করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5205)


5205 - عن عائشة، قالت: خرجنا مع النبيّ صلى الله عليه وسلم، ولا نرى إلا الحجّ حتى إذا كنا بسرف أو قريبًا منها، حضتُ. فدخل عليَّ النبيُّ صلى الله عليه وسلم وأنا أبكي. فقال:"أنفستِ؟" (يعني الحيضة) قالت: قلتُ: نعم. قال:"إنّ هذا شيء كتبه الله على بنات آدم، فاقضي ما يقضي الحاج، غير أن لا تطوفي بالبيت حتى تغتسلي".

قالت: وضحّى رسول الله صلى الله عليه وسلم عن نسائه بالبقر.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحيض (294)، ومسلم في الحج (1211: 119) كلاهما من
طريق سفيان بن عيينة، قال: سمعت عبد الرحمن بن القاسم، قال: سمعت القاسم يقول: سمعت عائشة تقول (فذكرته).

ورواه مسلم أيضًا (130) من طريق عبد العزيز بن أبي سلمة الماجشون، عن عبد الرحمن بن القاسم، عن أبيه، عن عائشة، بسياق أطول. وفيه:"فلما كان يوم النحر طهرتُ، فأمرني رسولُ الله صلى الله عليه وسلم فأفضتُ. قالت: فأُتينا بلحم بقر. فقلت: ما هذا؟ فقالوا: أهدي رسول الله صلى الله عليه وسلم عن نسائه البقر …" الحديث.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আমরা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে বের হলাম এবং আমরা হজ্জ ছাড়া অন্য কোনো উদ্দেশ্য দেখছিলাম না। অবশেষে যখন আমরা সার্ফ নামক স্থানে বা তার কাছাকাছি পৌঁছলাম, তখন আমি ঋতুমতী হলাম। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমার কাছে প্রবেশ করলেন, আর আমি কাঁদছিলাম। তিনি জিজ্ঞেস করলেন: "তুমি কি 'নাফাস' (ঋতুস্রাব) হয়েছো?" (অর্থাৎ মাসিক)। তিনি (আয়িশা) বললেন, আমি বললাম: হ্যাঁ। তিনি বললেন: "নিশ্চয় এটি এমন একটি বিষয় যা আল্লাহ তাআলা আদম-কন্যাদের জন্য নির্ধারণ করে দিয়েছেন। অতএব, হাজিগণ যা যা করে থাকে, তুমিও তা তা করো। তবে তুমি পবিত্র না হওয়া পর্যন্ত কাবাঘরের তাওয়াফ করবে না।" তিনি (আয়িশা) বললেন: আর রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের পক্ষ থেকে গরু দ্বারা কুরবানি করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5206)


5206 - عن عائشة زوج النبيّ صلى الله عليه وسلم أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم نحر عن آل محمد في حجّة الوداع بقرة واحدة.

صحيح: رواه أبو داود (1750)، وابن ماجه (3135) كلاهما عن أحمد بن عمرو بن السرح المصريّ أبو طاهر، قال: أنبأنا ابن وهب، قال: أنبأنا يونس، عن ابن شهاب، عن عمرة، عن عائشة، فذكرته. وإسناده صحيح.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা), যিনি নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর স্ত্রী, থেকে বর্ণিত যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বিদায় হজ্জের সময় মুহাম্মাদ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিবারের পক্ষ থেকে একটি মাত্র গরু কুরবানী করেছিলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5207)


5207 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم ذبح عمن اعتمر من نسائه بقرة بينهن.

صحيح: رواه أبو داود (1751)، وابن ماجه (3133) كلاهما من حديث الوليد بن مسلم، قال: حدثنا الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، فذكره. وإسناده صحيح.

والوليد بن مسلم مدلس إلا أنه صرّح بالتحديث في رواية ابن ماجه.

وصحّحه ابن خزيمة (2903)، والحاكم (1/ 467) كما في تلخيص الذهبي له، كلاهما من حديث الوليد بن مسلم.

وقال الحاكم:"صحيح على شرط الشيخين".

تنبيه: وقع في المستدرك المطبوع خطأ في الإسناد، فرواه من طريق النسائي هكذا: حدّثنا أبو على الحسين بن علي الحافظ، أنبأنا أبو عبد الرحمن أحمد بن شعيب الفقيه بمصر، ثنا محمد بن أبي كثير، عن سلمة، عن أبي هريرة، فذكر الحديث، بمثله.

والحديث في سنن النسائيّ الكبرى (4128) عن عمرو بن عثمان، عن الوليد، عن الأوزاعيّ، عن يحيى، عن أبي سلمة، عن أبي هريرة، مثله. وزاد:"في حجّة الوداع".

وهذا مما يؤكّد وقوع الخطأ في سند الحاكم المطبوع.

وأمّا الحافظ ابن حجر فلم يعزه إليه أصلًا، وإنما اكتفى بعزوه إلى ابن خزيمة وحده. انظر: إتحاف المهرة (16/ 124).

والوليد مدلس إلا أنه صرّح كما مضى، وقد تابعه إسماعيل بن سماعة، عن الأوزاعي، بإسناده مثله. رواه ابن حبان (4008) من طريق هشام بن عمار، قال: حدثنا إسماعيل بن سماعة، فذكره.
وهشام بن عمار حسن الحديث، ومتابعة إسماعيل بن سماعة للوليد يؤكّد بأن الوليد لم يسقط أحدًا بين الأوزاعي وبين يحيى بن أبي كثير، فإنه يفعل هذا أحيانًا مع الضعفاء بحجة أن الأوزاعي أنبل من أن يروي عن الضّعفاء.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর স্ত্রীদের মধ্যে যারা উমরাহ পালন করেছিলেন, তাদের পক্ষ থেকে তাদের মাঝে একটি গরু যবেহ করেছিলেন।