হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5228)


5228 - عن أنس، قال: صلى رسول الله صلى الله عليه وسلم ونحن معه بالمدينة الظهر أربعًا، والعصر بذي الحليفة ركعتين، ثم بات بها حتى أصبح، ثم ركب حتى استوت به على البيداء … الحديث.

وفيه: ونحر النبيّ صلى الله عليه وسلم بدنات بيده قيامًا.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1551) عن موسى بن إسماعيل، حدّثنا وُهيب، حدّثنا أيوب، عن أبي قلابة، عن أنس، فذكره.

وأخرجه مسلم (690) من وجه آخر عن أيوب بإسناده مختصرًا ولم يذكر فيه نحر النبيّ صلى الله عليه وسلم.

وأخرجه البيهقيّ (5/ 237) من طريق محمد بن الحسين بن أبي الحنين صاحب المسند، عن شيخ البخاريّ موسى بن إسماعيل بإسناده، وزاد فيه:"سبع بدنات".

وقوله:"سبع بدنات" لا يوجد في رواية موسى بن إسماعيل التي أشار إليها البيهقيّ. ولكن رواه البخاريّ (1714) عن سهل بن بكار، حدّثنا وهيب بإسناده، وذكر فيه أن النبي صلى الله عليه وسلم نحر بيده سبع بُدن قيامًا، فكان من الأولى أن يشير البيهقي إلى رواية سهل بن بكار.

هذا مما شاهده أنس، وإلّا فإنه صلى الله عليه وسلم نحر ثلاثًا وستين كما أخبر به جابر.




আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের সাথে মদীনায় যুহরের সালাত চার রাকআত আদায় করলেন এবং যুল-হুলাইফায় আসরের সালাত দুই রাকআত আদায় করলেন। অতঃপর তিনি সেখানে সকাল হওয়া পর্যন্ত রাত্রি যাপন করলেন, তারপর আরোহণ করলেন এবং বাইদা (নামক স্থান) পর্যন্ত চললেন...। আর এর মধ্যে আছে: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) নিজ হাতে দাঁড়িয়ে থাকা অবস্থায় উট (বাদানাত) নহর করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5229)


5229 - عن جابر، أنّ النّبيّ صلى الله عليه وسلم وأصحابه كانوا ينحرون البدن معقولة اليسرى، قائمة على ما بقي من قوائمها.

حسن: رواه أبو داود (1767) عن عثمان بن أبي شيبة، حدّثنا أبو خالد الأحمر، عن ابن جريج، عن أبي الزبير، عن جابر.
وقال (أي ابن جريج): وأخبرني عبد الرحمن بن سابط، فذكره.

وقول ابن جريج:"وأخبرني عبد الرحمن بن سابط" مرسل صحيح لأن ابن سابط من ثقات التابعين، وهو يقوي المسند.

قال البيهقيّ (5/ 237 - 238) بعد أن أخرج الطريقين من أبي داود:"حديث ابن جريج عن أبي الزبير، عن جابر، موصول، وعن عبد الرحمن بن سابط مرسل".




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয়ই নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) এবং তাঁর সাহাবীগণ উট নহর করতেন, যখন সেটির বাম পা বাঁধা থাকত এবং এটি অবশিষ্ট পায়ের উপর দাঁড়িয়ে থাকত।









আল-জামি` আল-কামিল (5230)


5230 - عن عبد الله بن قرط، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"إنّ أعظم الأيام عند الله تبارك وتعالى يوم النّحر، ثم يوم القرّ". وهو اليوم الثاني.

قال: وقرّب لرسول الله صلى الله عليه وسلم بدنات خمس أو ست، فطفقن يزدلفن إليه بأيّتهنّ يبدأ، فلما وجبتْ جنوبُها قال: فتكلّم بكلمة خفية لم أفهمها. فقلت: ما قال؟ قال:"من شاء اقتطع".

صحيح: رواه أبو داود (1765) عن إبراهيم بن موسي الرازيّ، أخبرنا عيسي. ح وحدّثنا مسدد، أخبرنا عيسي -وهذا لفظ إبراهيم-، عن ثور، عن راشد بن سعد، عن عبد الله بن عامر بن لُحي، عن عبد الله بن قُرط، فذكره.

وإسناده صحيح، وثور هو ابن يزيد أبو خالد الحمصيّ، ثقة من رجال البخاريّ.

ومن هذا الوجه رواه الإمام أحمد (19075)، وصححه ابن خزيمة (2866، 2917) مطوّلًا ومختصرًا والحاكم (4/ 221) وقال:"صحيح الإسناد ولم يخرجاه".

وقوله:"يزدلفن" أي يقتربن.

وقوله:"من شاء اقتطع" فيه جواز هبة المشاع، وليس هو من النهب المنهي عنه.

وفي الباب عن غرفة بن الحارث الكنديّ، قال: شهدت رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع، وأتي بالبدن فقال:"ادعو لي أبا حسن" فدُعي له علي، فقال له:"خذ بأسفل الحربة" وأخذ رسول الله صلى الله عليه وسلم بأعلاها، ثم طعنا بها في البدن، فلما فرغ ركب بغلته وأردف عليًّا رضي الله عنه.

رواه أبو داود (1766) عن محمد بن حاتم، حدّثنا عبد الرحمن بن مهدي، حدّثنا عبد الله بن المبارك، عن حرملة بن عمران، عن عبد الله بن الحارث الأزديّ، قال: سمعت غرفة بن الحارث الكنديّ، فذكره.

وفيه عبد الله بن الحارث الأزديّ لم يوثقه غير ابن حبان، وجهّله ابن القطّان.




আব্দুল্লাহ ইবনু কুর্ত (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "নিশ্চয় আল্লাহ তাবারাকা ওয়া তাআলার নিকট দিবসগুলোর মধ্যে সবচেয়ে মহান হলো ইয়াওমুন নাহর (কুরবানির দিন), এরপর ইয়াওমুল ক্বার (স্থির হওয়ার দিন)।" আর এটি হলো দ্বিতীয় দিন। রাবী বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর জন্য পাঁচ বা ছয়টি উটনী পেশ করা হলো। সেগুলোর কোনটি দিয়ে তিনি শুরু করবেন, এই আগ্রহে উটনীগুলো তাঁর দিকে এগিয়ে যেতে লাগল। যখন সেগুলোর পার্শ্বদেশ (জমিনের উপর) লুটিয়ে পড়ল, তিনি বললেন: এরপর তিনি এমন একটি গোপন কথা বললেন যা আমি বুঝতে পারিনি। আমি জিজ্ঞেস করলাম, তিনি কী বললেন? তিনি বললেন: "যে চায়, সে কেটে (মাংস) নিয়ে নিক।"









আল-জামি` আল-কামিল (5231)


5231 - عن جابر بن عبد الله، قال: كنا نتزود لحوم الأضاحي على عهد النبي صلى الله عليه وسلم إلى المدينة.

متفق عليه: رواه البخاري في الجهاد والسير (2980)، ومسلم في الأضاحي (1972/ 32)
كلاهما من طريق سفيان بن عيينة، عن عمرو (هو: ابن دينار) أخبرني عطاء (هو: ابن أبي رباح) سمع جابر بن عبد الله فذكره.

ورواه البخاريّ في الحجّ (1719)، ومسلم في الأضاحي (1972/ 30) كلاهما من طريق ابن جريج، حدّثنا عطاء، قال: سمعت جابر بن عبد الله، يقول:"كنّا لا نأكل من لحوم بُدننا فوق ثلاث منى، فرخّص لنا النبيُّ صلى الله عليه وسلم، فقال:"كلوا وتزوّدوا".

قلت لعطاء: قال جابر: حتى جئنا المدينة؟ قال: نعم، واللفظ لمسلم وفي لفظ البخاري قال: لا.

والمثبت مقدم على النافي، ويؤيده رواية عمرو بن دينار عن عطاء وكذا رواية أبي الزبير عن جابر فيما رواه الإمام أحمد (14509)، وصححه ابن حبان (5930) من طريق الحسين بن واقد، عن أبي الزبير، عن جابر قال:"أكلنا القديد مع نبي الله صلى الله عليه وسلم إلى المدينة".

وإسناده حسن من أجل الحسين بن واقد فهو حسن الحديث.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের যুগে কোরবানির গোশত মদীনা পর্যন্ত সাথে নিয়ে যেতাম।

তিনি অন্য এক বর্ণনায় বলেন: আমরা মিনাতে আমাদের কোরবানির পশুর গোশত তিন দিনের বেশি খেতাম না। এরপর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম আমাদের জন্য অনুমতি দিলেন এবং বললেন: "তোমরা খাও এবং সাথে নিয়ে যাও।"

জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে অন্য একটি বর্ণনায় এসেছে: আমরা আল্লাহর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামের সাথে শুকনা গোশত (ক্বাদিদ) মদীনা পর্যন্ত খেয়েছি।









আল-জামি` আল-কামিল (5232)


5232 - عن جابر بن عبد الله، قال: ثم أمر (يعني النبيّ صلى الله عليه وسلم" من كلِّ بدنة ببَضْعَة، فجُعلتْ في قدر، فطُبختْ فأكلا من لحمها، وشربا من مرقها.

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218) من طريق حاتم بن إسماعيل المدنيّ، عن جعفر بن محمد بن علي بن الحسين بن أبي طالب، عن أبيه، عن جابر، فذكره في الحديث الطويل في صفة حجّة النبيّ صلى الله عليه وسلم.

وأمّا ما رُوي عن ابن عباس، قال: أهدي رسول الله صلى الله عليه وسلم في حجّة الوداع مائة بدنة، نحر منها ثلاثين بدنة بيده، ثم أمر عليًا فنحر ما بقي منها وقال:"اقسم لحومها وجلالها وجلودها بين الناس، ولا تعطينَّ جزّارا منها شيئًا، وخذ لنا من كلّ بعير حُذْيَةٌ من لحم، ثم اجعلها في قدر واحدة حتى نأكل من لحمها ونحو من مرقها" ففعل. ففيه رجل لم يسم.

رواه أحمد (2359) عن يعقوب، حدّثنا أبي، عن إسحاق، قال: حدثني رجل، عن عبد الله بن أبي نجيح، عن مجاهد بن جبر، عن ابن عباس، فذكره.

ولم يسم فيه شيخ محمد بن إسحاق كما أنّ في متنه نكارة، فقد جاء في الصحيح من حديث جابر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم نحر من هديه ثلاثًا وستين بدنة، ثم أعطى عليًا فنحر ما غبر.

وكذلك لا يصح ما رواه أبو داود (1764) من وجه آخر عن محمد بن إسحاق، عن ابن أبي نجيح، عن مجاهد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن علي بن أبي طالب، قال:"لما نحر رسول الله صلى الله عليه وسلم بدنه فنحر ثلاثين بيده، وأمرني فنحرتُ سائرها". ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (1374) وزاد فيه:"اقسم لحومها بين الناس، وجلودها وجلالها، ولا تعطين جازرًا منها شيئًا".

فاختلف محمد بن إسحاق، فقال في الحديث: حدثني رجل عن عبد الله بن أبي نجيح. وجعل
في هذا الحديث عبد الله بن أبي نجيح شيخًا له، وهو اضطراب مع نكارة في متنه.




জাবির ইবনে আবদুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, অতঃপর তিনি (অর্থাৎ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) প্রত্যেক কুরবানীর উট থেকে এক টুকরা মাংসের নির্দেশ দিলেন। সেটিকে একটি হাঁড়িতে রাখা হলো এবং রান্না করা হলো। তারপর তাঁরা সেই মাংস খেলেন এবং এর ঝোল পান করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5233)


5233 - عن علي قال: أهدى النبي صلى الله عليه وسلم مائة بدنة، فأمرني بلحومها فقسمتها، ثم أمرني بجلالها فقسمتها، ثم بجلودها فقسمتها.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1718)، ومسلم في الحج (1317: 349) كلاهما من طريق مجاهد، حدثني ابن أبي ليلى، أنّ عليًّا رضي الله عنه حدّثه، فذكره. واللفظ للبخاريّ.

ولفظ مسلم نحوه، وزاد في رواية:"في المساكين، ولا يُعطي في جزارتها منها شيئًا".

قوله:"بجلالها" الجلال -بكسر الجيم وتخفيف اللام- جمع جُل بضم الجيم: وهو ما يطرح على ظهر البعير من كساء ونحوه. الفتح (3/ 549).




আলী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) একশত উট (কুরবানির জন্য) হাদিয়া দিলেন। অতঃপর তিনি আমাকে সেগুলোর গোশত বণ্টন করতে নির্দেশ দিলেন, তখন আমি তা বণ্টন করলাম। এরপর তিনি আমাকে সেগুলোর আচ্ছাদন (জিলāl) বণ্টন করতে নির্দেশ দিলেন, তখন আমি তা বণ্টন করলাম। এরপর তিনি আমাকে সেগুলোর চামড়াগুলো বণ্টন করতে নির্দেশ দিলেন, তখন আমি তা বণ্টন করলাম।









আল-জামি` আল-কামিল (5234)


5234 - عن جابر بن عبد الله، قال: كنّا لا نأكل من لحوم بُدننا فوق ثلاث منى، فرخّص لنا النبيُّ صلى الله عليه وسلم، فقال:"كلوا وتزوّدوا" فأكلنا وتزوّدنا. قلت لعطاء: أقال: حتى جئنا المدينة؟ قال: لا.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحجّ (1719)، ومسلم في الأضاحي (1972) كلاهما من طريق ابن جريج، حدّثنا عطاء (هو ابن أبي رباح)، قال: سمعت جابر بن عبد الله، فذكره. واللفظ للبخاريّ.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমরা মিনার কুরবানীর পশুর (বদনা) মাংস তিন দিনের বেশি খেতাম না। অতঃপর নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাদের জন্য অনুমতি দিলেন এবং বললেন, "তোমরা খাও এবং সাথে সংরক্ষণ করো (পাথেয় হিসেবে রাখো)।" সুতরাং আমরা খেলাম এবং সংরক্ষণ করলাম। (বর্ণনাকারী বলেন:) আমি আতা (ইবনে আবি রাবাহ)-কে জিজ্ঞেস করলাম: তিনি কি বলেছিলেন: 'যতক্ষণ না আমরা মদীনায় পৌঁছলাম'? তিনি (আতা) বললেন: 'না।'









আল-জামি` আল-কামিল (5235)


5235 - عن علي بن أبي طالب، قال: أمرني رسول الله صلى الله عليه وسلم أن أقوم على بُدنة، وأن أتصدّق بلحمها وجلودها وأجلَّتها، وأن لا أُعطي الجزّار منها. قال: نحن نعطيه من عندنا.

متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1716)، ومسلم في الحج (1317: 348) كلاهما من طريق عبد الكريم الجزريّ، عن مجاهد، عن عبد الرحمن بن أبي ليلى، عن علي، فذكره. واللفظ لمسلم.

ولفظ البخاري نحوه، وليس عنده"نحن نعطيه من عندنا".




আলী ইবনু আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আমাকে একটি কুরবানীর উটের (বদনা) তত্ত্বাবধান করতে নির্দেশ দিলেন, এবং যেন আমি এর গোশত, চামড়া ও গদি সদকা করে দেই, আর কসাইকে যেন এর কোনো অংশ পারিশ্রমিক হিসেবে না দেই। তিনি বললেন: আমরা তাকে আমাদের নিজস্ব সম্পদ থেকে পারিশ্রমিক দেব।









আল-জামি` আল-কামিল (5236)


5236 - عن نافع، أن ابن عمر رضي الله عنهما كان يبعث بهديه من جَمْع من آخر الليل، حتّى يُدْخَل به منحر النبيّ صلى الله عليه وسلم مع حجّاج فيهم الحر والمملوك.
صحيح: رواه البخاريّ في الحج (1711) عن إبراهيم بن المنذر، حدثنا أنس بن عياض، حدثنا موسى بن عقبة، عن نافع، به، فذكره.




আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি (হজ্বের) হাদী (কুরবানীর পশু) রাতের শেষ ভাগে জাম’ (মুযদালিফা) থেকে পাঠিয়ে দিতেন, যাতে তা নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কুরবানী করার স্থানে প্রবেশ করানো হয়। (তিনি এমন) হাজীদের সাথে (পাঠাতেন) যাদের মধ্যে স্বাধীন ও ক্রীতদাস উভয়ই থাকত।









আল-জামি` আল-কামিল (5237)


5237 - عن جابر بن عبد الله، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"نحرتُ ههنا، ومني كلّها منحر، فانحروا في رحالكم".

صحيح: رواه مسلم في الحج (1218: 149) عن عمر بن حفص بن غياث، حدثنا أبي، عن جعفر (هو ابن محمد بن علي بن الحسين بن علي بن أبي طالب)، حدثني أبي، عن جابر، به. في حديث الطويل في حجة النبي صلى الله عليه وسلم.




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "আমি এখানেই কুরবানি করেছি, আর মিনা পুরোটাই কুরবানির স্থান, সুতরাং তোমরা তোমাদের নিজ নিজ অবস্থানে/জায়গায় কুরবানি করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (5238)


5238 - عن علي بن أبي طالب، قال: ثم أتي (يعني النبيّ صلى الله عليه وسلم" المنحرَ، فقال:"هذا المنحر ومِني كلّها منحر". الحديث.

حسن: رواه الترمذيّ (885)، وأبو داود (1922، 1935)، وابن ماجه (3010) كلّهم من حديث سفيان، عن عبد الرحمن بن الحارث بن عياش بن أبي ربيعة، عن زيد بن علي، عن أبيه، عن عبيد الله بن أبي رافع، عن علي بن أبي طالب، فذكره، وهو جزء من حديث طويل في لفظ الترمذيّ.

قال الترمذي:"حديث علي حديث حسن صحيح، لا نعرفه من حديث علي إلا من هذا الوجه".




আলী ইবন আবী তালিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, অতঃপর তিনি (অর্থাৎ নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)) কুরবানীর স্থানে (মানহার) এলেন এবং বললেন: "এটি হলো কুরবানীর স্থান, আর মিনা পুরোটাই কুরবানীর স্থান।"









আল-জামি` আল-কামিল (5239)


5239 - عن جابر بن عبد الله، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كلّ عرفة موقف، وكلّ مني منحر، وكلّ المزدلفة موقف، وكلّ فجاج مكة طريق ومنحر".

حسن: رواه أبو داود (1937)، وابن ماجه (3048) كلاهما من حديث أسامة بن زيد، عن عطاء، عن جابر، فذكره. وصحّحه ابن خزيمة (2787).

وفيه أسامة بن زيد مختلف غير أنه حسن الحديث، وقد حسّن إسناده الحافظ ابن عبد الهادي في تنقيح التحقيق (3/ 556).

وأمّا كون جابر لم يذكر هذا الجزء في حديث صفة حجّة النبيّ صلى الله عليه وسلم الطويل الذي أخرجه مسلم وغيره فلا يجعله شاذًا؛ لأنه من الممكن أنه حدّث به جابر في أوقات مختلفة بأجزاء مختلفة، فيزيد بعض الرواة عنه عن بعض، كما هو واقع في الصحاح وغيرها.

وفي الباب ما روي عن أبي هريرة، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"منى كلَّها منحر، وللحاجّ مكة كلها منحر". رواه عبد الرزاق، قال: أخبرنا معمر، عن محمد بن المنكدر، عن أبي هريرة، فذكره.

ذكره ابن عبد البر في"الاستذكار" (13/ 10) ولم أجده في"مصنف عبد الرزاق" فانظر فيه. وإسناده منقطع فإن محمد بن المنكدر لم يسمع من أبي هريرة كما قال ابن معين وأبو زرعة.

ورواه البيهقي (5/ 115) من حديث عبد الوهاب بن عطاء، قال ابن جريج: وأخبرني محمد بن
المنكدر أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال (فذكره)، وهو مرسل.

وفي الباب ما روي أيضًا عن جبير بن مطعم، عن النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"كلّ فجاج مني منحر، وكلّ أيام التشريق ذبح".

رواه الإمام أحمد (16751)، والبيهقي (5/ 239) كلاهما من حديث أبي المغيرة، قال: حدّثنا سعيد بن عبد العزيز، قال: حدثني سليمان بن موسى، عن جبير بن مطعم، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فذكره.

وسليمان بن موسى هو الأشدق لم يدرك جبير بن مطعم.

وروى البيهقي بسند صحيح عن ابن عباس أنه كان ينحر بمكة.

هذا وقد اتفق أهل العلم على أنّ المنحر في الحج مني كما اتفقوا على أنّ المنحر للمعتمر الذي ساق الهدي مكة.

واختلفوا فيما سوى ذلك، فذهب الجمهور إلى جواز النحر في الحجّ في جميع الحرم. وقال مالك: لا ينحر الحاج إلا بمنى، والمعتمر إلّا بمكة.

وأما قوله:"كلّ أيام التشريق ذبح" فمختلف فيه بين أهل العلم، فذهب الشافعي إلى حديث جبير بن مطعم، وذهب مالك وأبو حنيفة وأحمد إلى أن ذلك يختص بيوم النحر ويومين بعده، وهو قول الجمهور من الصحابة والتابعين.

روي مالك في موطئه عن ابن عمر قال: الأضحى يومان بعد يوم الأضحى. قال مالك: إنه بلغه عن علي بن أبي طالب مثل ذلك.

وحكى النووي أنه روي هذا أيضًا عن عمر بن الخطاب.

قلت: أدلتهم مبسوطة في كتب الفقه.

وأما الحديث فلا يثبت، وقد روي أيضا عن أبي هريرة مرفوعا:"أيام التشريق كلها ذبح" رواه البيهقي (9/ 295) وقال: فيه معاوية بن يحيى الصدفي ضعيف لا يحتج به.

ثم قال البيهقي في المعرفة (14/ 64): فإذا لم يثبت فالقياس ما قاله الشافعي. انظر للمزيد"المنة الكبرى" (4/ 500 - 501).




জাবির ইবনে আব্দুল্লাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: ‘পুরো আরাফা ময়দানই অবস্থানস্থল (মাওকিফ)। পুরো মিনাই কুরবানীর স্থান (মানহার)। পুরো মুযদালিফাই অবস্থানস্থল (মাওকিফ)। আর মক্কার প্রতিটি রাস্তা বা গিরিপথই পথ ও কুরবানীর স্থান (মানহার)।’









আল-জামি` আল-কামিল (5240)


5240 - عن عبد الله بن عمر، أنه قال: -حِينَ خَرَجَ إِلَى مَكَّةَ مُعْتَمِرًا فِي الْفِتْنَةِ: إِنْ صُدِدْتُ عَنِ الْبَيْتِ صَنَعْنَا كَمَا صَنَعْنَا مَعَ رَسُولِ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم فَأَهَلَّ بِعُمْرَةٍ مِنْ أَجْلِ أَنَّ رَسُولَ اللَّهِ صلى الله عليه وسلم أَهَلَّ بِعُمْرَةٍ عَامَ الْحُدَيْبِيَةِ، ثُمَّ إِنَّ عبد اللَّهِ نَظَرَ فِي أَمْرِهِ فَقَالَ: مَا أَمْرُهُمَا إِلا وَاحِدٌ. ثُمَّ الْتَفَتَ إِلَى أَصْحَابِهِ فَقَالَ: مَا أَمْرُهُمَا إلا وَاحِدٌ أُشْهِدُكُمْ أَنِّي قَدْ أَوْجَبْتُ الْحَجَّ مَعَ الْعُمْرَةِ، ثُمَّ نَفَذَ حَتَّى جَاءَ الْبَيْتَ فَطَافَ طَوَافًا وَاحِدًا وَرَأَى ذَلِكَ مُجْزِيًا عَنْهُ وَأَهْدَى.

متفق عليه: رواه مالك في الموطأ (99) عن نافع، عن عبد الله بن عمر. ورواه البخاري في المحصر (1806)، ومسلم في الحج (1230) كلاهما من طريق مالك، به، نحوه.




আবদুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি ফিতনার (বিদ্রোহের) সময়ে যখন উমরাহকারী হিসেবে মক্কার উদ্দেশ্যে বের হলেন, তখন বললেন: যদি আমাকে বায়তুল্লাহ (কা'বা) থেকে বাধা দেওয়া হয়, তবে আমরা সেটাই করব যা আমরা রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে করেছিলাম। এরপর তিনি উমরাহর ইহরাম বাঁধলেন। কারণ রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হুদায়বিয়ার বছর উমরাহর ইহরাম বেঁধেছিলেন। অতঃপর আবদুল্লাহ (ইবনে উমর) তাঁর বিষয়টি নিয়ে চিন্তা করলেন এবং বললেন: এই দুটির (হজ ও উমরার) বিধান একই। এরপর তিনি তাঁর সাথীদের দিকে ফিরে বললেন: এই দুটির বিধান একই। আমি তোমাদের সাক্ষী রাখছি যে, আমি উমরাহর সাথে হজ্জকেও ওয়াজিব (আবশ্যক) করে নিয়েছি। অতঃপর তিনি (কোন বাধা ছাড়াই) এগিয়ে গেলেন, এমনকি বায়তুল্লাহর কাছে পৌঁছালেন এবং এক (একক) তাওয়াফ করলেন। তিনি মনে করলেন এটাই তার জন্য যথেষ্ট এবং তিনি কুরবানী করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5241)


5241 - عن أبي رزين -رجل من بني عامر- أنه قال: يا رسول الله، إنّ أبي شيخ كبير لا يستطيع الحجّ ولا العمرة ولا الظعن، قال:"احجج عن أبيك واعتمر".

صحيح: رواه أبو داود (1810)، والترمذيّ (930)، والنسائيّ (2621)، وابن ماجه (2906) كلّهم من شعبة، عن النّعمان بن سالم، عن عمرو بن أوس، عن أبي رزين، فذكره.

ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (16184)، وابن خزيمة (3040)، وابن حبان (3991)، والحاكم (1/ 481)، والبيهقي (4/ 350) وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.

قال الإمام أحمد: لا أعلم في إيجاب العمرة حديثًا أصح من هذا.




আবু রাযিন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! নিশ্চয় আমার পিতা খুবই বৃদ্ধ। তিনি হজ্ব, ওমরাহ অথবা সফর (যাত্রা) করতে সক্ষম নন।" তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি তোমার পিতার পক্ষ থেকে হজ্ব ও ওমরাহ করো।"









আল-জামি` আল-কামিল (5242)


5242 - عن عائشة رضي الله عنها، قالت: يا رسول الله هل على النساء جهاد؟ قال:"نعم عليهنّ جهاد لا قتال فيه: الحجّ والعمرة".

صحيح: رواه ابن ماجه (2901)، وابن خزيمة (3074) كلاهما من حديث محمد بن فضيل، ثنا حبيب بن أبي عمرة، عن عائشة بنت طلحة، عن عائشة أمّ المؤمنين، قالت (فذكرته).
وإسناده صحيح. قال ابن خزيمة:"في قوله صلى الله عليه وسلم:"عليهن جهاد لا قتال فيه" وإعلامه أن الجهاد الذي عليهن الحج والعمرة بيان أن العمرة واجبة كالحجّ".

وأصل الحديث في الصحيح من طريق غير محمد بن فضيل كما مضى، وليس فيه ذكر للعمرة. ومحمد بن فضيل من رجال الشيخين إلا أنه دون جرير وعبد الواحد وغيرهما في الحفظ والإتقان، ولذا قال فيه الحافظ:"صدوق". وهؤلاء لم يذكروا في حديثهم العمرة.

وفي الباب ما رُوي عن جابر أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم سئل عن العمرة أواجبة هي؟ قال:"لا، وأن تعتمروا هو أفضل".

رواه الترمذيّ (931) عن محمد بن عبد الأعلى، حدّثنا عمرو بن علي، عن الحجاج، عن محمد بن المنكدر، عن جابر، فذكره.

قال الترمذي: حسن صحيح.

قلت: بل ضعيف من أجل الحجاج وهو ابن أرطاة، وهو ضعيف، وقد خالف. ومن طريقه رواه أيضًا الإمام أحمد (14397)، وابن خزيمة (3068)، والبيهقي (4/ 349).

قال البيهقي: كذا رواه الحجاج بن أرطاة مرفوعًا.

ثم رواه من طريق ابن جريج والحجاج بن أرطاة، عن محمد بن المنكدر، عن جابر، أنه سئل عن العمرة: أواجبة كفريضة الحج؟ قال: لا وأن تعتمر خير لك. قال: هذا هو المحفوظ عن جابر موقوف غير مرفوع، ورُوي عن جابر مرفوعًا بخلاف ذلك، وكلاهما ضعيف" انتهي.

وهو يشير بذلك إلى ما رواه هو (4/ 350 - 351) من طريق ابن لهيعة، عن عطاء، عن جابر، مرفوعًا:"الحج والعمرة فريضتان واجبتان".

وقال:"ابن لهيعة غير محتج به".

وقد سبقه ابن عدي فقال:"غير محفوظ". الكامل (4/ 1468).

وتعقب النووي أيضًا على كلام الترمذي في قوله: حديث حسن صحيح. فقال: هذا كلام غير مقبول، ولا تغتر بكلام الترمذي … وأطال في ردّ الحديث.

وأما ما رُوي عن طلحة بن عبيد الله أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"الحجّ جهاد والعمرة تطوّع" فهو ضعيف جدًّا.

رواه ابن ماجه (2989) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا الحسن بن يحيى الخشني، قال: حدثنا عمر بن قيس، قال: أخبرني طلحة بن يحيى، عن عمّه إسحاق بن طلحة، عن طلحة بن عبيد الله، فذكره.

وعمر بن قيس هو المكيّ المعروف بسندل، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، بل قال الإمام أحمد: متروك.
وممن ذهب إلى وجوب العمرة: عمر وابنه عبد الله وابن عباس وعطاء وطاوس ومجاهد وقتادة والحسن وابن سيرين، وبه قال الثوريّ والشافعي وأحمد وإسحاق.

وممن ذهب إلى أنها سنة مالك، وأصحاب الرأي. انظر: شرح السنة للبغوي (7/ 15).

وقال الترمذي (3/ 262):"قال الشافعي: العمرة سنة، لا نعلم أحدًا رخّص في تركها، وليس فيها شيء ثابت بأنها تطوّع. وقد روي عن النبيّ صلى الله عليه وسلم بإسناد وهو ضعيف، لا تقوم بمثلها حجة. وقد بلغنا عن ابن عباس أنه كان يوجبها" قال الترمذي: كله كلام الشّافعيّ.

وقد رجّح النووي في"المجموع" (7/ 7) بأن العمرة فرض باتفاق الأصحاب، وهو المنصوص في الجديد والقديم".




আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! মহিলাদের উপর কি জিহাদ আছে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: হ্যাঁ, তাদের উপর জিহাদ আছে, যাতে কোনো যুদ্ধ নেই: তা হলো হাজ্জ (হজ) ও উমরাহ।









আল-জামি` আল-কামিল (5243)


5243 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"العمرة إلى العمرة كفّارة لما بينهما، والحجّ المبرور ليس له جزاء إلا الجنّة".

متفق عليه: رواه مالك في الحج (65) عن سُمي مولى أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أبي صالح السمان، عن أبي هريرة، فذكره.

ورواه البخاري في العمرة (1773)، ومسلم في الحج (1349) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.




আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক উমরাহ থেকে পরবর্তী উমরাহ, এতদুভয়ের মধ্যবর্তী সময়ের গুনাহসমূহের কাফফারা (প্রায়শ্চিত্ত)। আর মাবরূর (পূণ্যময়) হজ্জের প্রতিদান জান্নাত ছাড়া আর কিছুই নয়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5244)


5244 - عن ابن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال لامرأة من الأنصار يقال لها: أمّ سنان:"ما منعك أن تكوني حججتِ معنا؟" قالت: ناضحان كانا لأبي فلان (زوجها) حجّ هو وابنه على أحدهما، وكان الآخر يسقي غلامنا. قال:"فعمرة في رمضان تقضي حجّة أو حجّة معي".

متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1863)، ومسلم في الحج (1256: 222) كلاهما من طريق يزيد بن زريع، حدّثنا حبيب المعلِّم، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره. واللفظ لمسلم.

ولفظ البخاري قريب منه إلا أنه قال:"حجّة معي" ولم يشك.

ورواه البخاريّ أيضًا في العمرة (1782)، ومسلم في الحج (1256: 221) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد (هو القطّان)، عن ابن جريج، قال: أخبرني عطاء، قال: سمعت ابن عباس يحدّثنا. قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لامرأة من الأنصار -سمّها ابن عباس فنسيتُ اسمها-:"ما منعك أن تحجِّي معنا؟". قالت: لم يكن لنا إلّا ناضحان، فحجَّ أبو ولدها وابنها على ناضح وترك لنا ناضحًا ننضح عليه. قال:"فإذا جاء رمضان فاعتمريّ، فإنّ عمرةً فيه تعدل حجّة".




ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসার গোত্রের এক মহিলাকে, যার নাম ছিল উম্মে সিনান, জিজ্ঞেস করলেন: "তোমাকে কিসে আমার সাথে হজ করতে বাধা দিয়েছে?" তিনি বললেন: আমাদের (অর্থাৎ আমার স্বামীর) দুটি পানি বহনকারী উট ছিল। তিনি (স্বামী) ও তার পুত্র তাদের একটিতে চড়ে হজ করেছেন। আর অপরটি আমাদের গোলামকে পানি সেচের কাজে লাগাচ্ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "অতএব, রমজানে একটি উমরাহ একটি হজের সমতুল্য, অথবা আমার সাথে একটি হজের সমতুল্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (5245)


5245 - عن ابن عباس، قال: أراد رسول الله صلى الله عليه وسلم الحجّ، فقالت امرأة لزوجها: أحجني مع رسول الله صلى الله عليه وسلم على جملك. فقال: ما عندي ما أُحجُّك عليه. قالت: أحجَّني على جملك فلان. قال: ذاك حبيس في سبيل الله عز وجل. فأتى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: إنّ امرأتي تقرأ عليك السلام ورحمة الله، وإنها سألتني الحجّ معك، قالت: أحجَّني مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت: ما عندي ما أحجك عليه، فقالت: أحجّني على جملك فلان، فقلت: ذاك حبيس في سبيل الله، فقال:"أما إنّك لو أحججتها عليه كان ذلك في سبيل الله" قال: وإنّها أمرتني أن أسألك ما يعدل حجّة معك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اقرأها السلام ورحمة الله وبركاته، وأخبرها أنها تعدل حجّة معي" يعني عمرة في رمضان.

حسن: رواه أبو داود (1990) عن مسدد وعبد الوارث، عن عامر الأحول، عن بكر بن عبد الله، عن ابن عباس، قال (فذكره).

وصحّحه ابن خزيمة (3077)، ورواه من طريق عبد الوارث بإسناده مثله. وبكر بن عبد الله هو المزني أبو عبد الله البصريّ.

وإسناده حسن من أجل عامر الأحول وهو ابن عبد الواحد مختلف فيه، فضعّفه الإمام أحمد والنسائي ووثّقه أبو حاتم، ومشّاه ابن عدي غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف لأنه رمي بسوء الحفظ.

وقصة هذه المرأة تشبه قصة المرأة التي في الصّحيحين.




ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজ্জ করার ইচ্ছা করলেন। তখন এক মহিলা তার স্বামীকে বলল: আপনার উটের পিঠে চড়িয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমাকে হজ্জ করান। স্বামী বলল: তোমাকে হজ্জ করানোর মতো কিছু আমার কাছে নেই। সে (মহিলা) বলল: আপনার অমুক উটের পিঠে চড়িয়ে আমাকে হজ্জ করান। স্বামী বলল: ওটা তো আল্লাহর রাস্তায় ওয়াকফ্ করা হয়েছে। অতঃপর লোকটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমার স্ত্রী আপনার প্রতি সালাম ও আল্লাহর রহমত জ্ঞাপন করেছে। সে আপনার সাথে হজ্জ করার জন্য আমাকে অনুরোধ করেছে। সে বলেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমাকে হজ্জ করান। আমি বলেছি: তোমাকে হজ্জ করানোর মতো কিছু আমার কাছে নেই। তখন সে বলল: আপনার অমুক উটের পিঠে চড়িয়ে আমাকে হজ্জ করান। আমি বললাম: ওটা আল্লাহর রাস্তায় ওয়াকফ্ করা হয়েছে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সাবধান! যদি তুমি তাকে তার (ঐ উটের) উপর চড়িয়ে হজ্জ করাতে, তবে তা আল্লাহর রাস্তাতেই গণ্য হতো।" লোকটি বলল: আর সে আমাকে আদেশ করেছে যেন আমি আপনাকে জিজ্ঞাসা করি, আপনার সাথে হজ্জ করার সমতুল্য কী রয়েছে? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাকে আমার পক্ষ থেকে সালাম ও আল্লাহর রহমত ও বরকত জানাবে এবং তাকে খবর দেবে যে, রমযান মাসে উমরাহ্ করা আমার সাথে হজ্জ করার সমতুল্য।" (অর্থাৎ রমযান মাসে উমরাহ্ করা।)









আল-জামি` আল-কামিল (5246)


5246 - عن أمّ معقل الأسدية أنها قالت: يا رسول الله، إنّي أريد الحج، وجملي أعجف، فما تأمرني؟ قال:"اعتمري في رمضان، فإنّ عمرة في رمضان تعدل حجّة".

صحيح: رواه الإمام أحمد (27285) عن روح ومحمد بن مصعب، قالا: حدثنا الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أم معقل الأسدية، قالت: (فذكرته). وهذا إسناد صحيح.

قلت: هذا الجزء من الحديث صحيح.

رواه أبو داود (1988)، والترمذي (939)، وابن ماجه (2993)، والإمام أحمد (27106) وفي مواضع أخرى، وابن خزيمة (3075)، والبيهقي (4/ 346) وغيرهم من طرق مختلفة مع قصة لأم معقل إلا أن الرواة لم يضبطوا القصّة كما أنهم لم يضبطوا متن الحديث وإسناده فاستحقوا مجانبة الذكر في الصحيح إلا أني لما رأيت أن أكثر الرواة متفقون على الجزء المرفوع من الحديث وهو قول النبيّ صلى الله عليه وسلم:"العمرة في رمضان تعدل حجة" وله شواهد صحيحة، أوردته في كتابي هذا بأصح الأسانيد.
ورواه البزّار -كشف الأستار (1151) - من وجه آخر عن المختار بن فلفل، عن طلق بن حبيب، عن أبي طليق، قال: طلبتْ مني أُمُّ طليق جملًا تحجّ عليه، فقلت: قد جعلته في سبيل الله. فسألت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"صدقتْ لو أعطيتها كان في سبيل الله. وإن عمرة في رمضان تعدل حجّة".

قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 280) بعد أن روي بأطول من هذا عن الطبراني في"الكبير":"ورواه البزار باختصار عنه ورجال البزار رجال الصّحيح".

وهذا بعينه أن الطبراني لم يرو من هذا الوجه.

وقد حاول الحافظ في الإصابة في ترجمة"أبي معقل" (4/ 181) جمع هذه الأسانيد وتوفيقها، ولكنه لم يوفق في ذلك، وكذلك كل من حاول بعده.

وقصة هذه المرأة تشبه قصة المرأة التي ذكرها ابن عباس، فهل هي قصة واحدة أو تعددت؟ والأشبه أنها تعددت، والله أعلم.

وقد جاء هذا الحديث أيضًا عن يوسف بن عبد الله بن سلام يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لرجل من الأنصار وامرأته:"اعتمرا في رمضان، فإن عمرة في رمضان لكما كحجة" رواه الإمام أحمد (16406)، والطبراني في الكبير (4324) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، قال: حدثنا ابن المنكدر، قال: سمعت يوسف بن عبد الله بن سلام، فذكره.

ويوسف بن عبد الله بن سلام صحابي صغير، وقال العجلي: تابعي ثقة، والصواب أن له صحبة كما قال البخاري، فقد روى الإمام أحمد (16404) وإسناده صحيح عن يحيى بن أبي الهيثم العطار، قال: سمعت يوسف بن عبد الله بن سلام يقول:"سماني رسول الله صلى الله عليه وسلم يوسف، ومسح على رأسي". إلا أنه لم يرو عن النبي صلى الله عليه وسلم؛ ولذا أخرجه أبو داود (1189)، وابن خزيمة (2376).

حديث الباب من وجه آخر عن يوسف بن عبد الله بن سلام، عن جدّته أم معقل، قالت: لما حجّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حجّة الوداع، وكان لنا جمل، فجعله أبو معقل في سبيل الله، وأصابنا مرض، وهلك أبو معقل، وخرج النبي صلى الله عليه وسلم، فلما فرغ من حجه جئته، فقال:"يا أمّ معقل، ما منعك أن تخرجي معنا؟" قالت: لقد تهيأنا فهلك أبو معقل، وكان لنا جمل هو الذي نحجّ عليه، فأوصى به أبو معقل في سبيل الله، قال:"فهلّا خرجت عليه، فإنّ الحجّ في سبيل الله، فأما إذا فاتتك هذه الحجة معنا، فاعتمري في رمضان فإنها كحجة" فكانت تقول:"الحج حجة، والعمرة عمرة، وقد قال هذا لي رسول الله صلى الله عليه وسلم ما أدري ألي خاصة". واللفظ لأبي داود.

وفي الإسناد محمد بن إسحاق مدلس، ولم يصرّح.

وفي روايات أخرى حضرت أم معقل مع زوجها النبي صلى الله عليه وسلم.

وفي رواية أخرى: أبو معقل ممن حجّ مع النبيّ صلى الله عليه وسلم.
وفي روايات أخرى اختلافات أخرى غير ما ذكرت تجعل هذه القصة أنها وقع فيها اضطراب شديد، وبالله التوفيق.

وقال الحافظ ابن حجر في"الفتح" (3/ 604):"ووقعت لأم طليق قصة مثل هذه أخرجها أبو علي بن السكن، وابن منده في الصحابة، والدولابي في الكني من طريق طلق بن حبيب: أنّ أبا طليق حدّثه أن امرأته قالت له -وله جمل وناقة- أعطني جملك أحج عليه، قال: جملي حبيس في سبيل الله. قالت: إنه في سبيل الله أن أحج عليه، فذكر الحديث، وفيه: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صدقت أم طليق"، وفيه: ما يعدل الحج؟ قال:"عمرة في رمضان".

وزعم ابن عبد البر أن أمّ معقل هي أم طليق لها كنيتان، وفيه نظر؛ لأنّ أبا معقل مات في عهد النبي صلى الله عليه وسلم وأبا طليق عاش حتى سمع منه طلق بن حبيب وهو من صغار التابعين، فدل على تغاير المرأتين، ويدل عليه تغاير السياقين أيضًا، ولا معدل عن تفسير المبهمة في حديث ابن عباس بأنها أم سنان أو أم سليم لما في القصة التي في حديث ابن عباس من التغاير للقصة التي في حديث غيره، ولقوله في حديث ابن عباس:"إنها أنصارية"، وأما أم معقل فإنها أسدية، ووقعت لأم الهيثم أيضًا، والله أعلم. انتهى.




উম্মু মা'কিল আল-আসাদিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি হজ করতে চাই, কিন্তু আমার উট দুর্বল। আপনি আমাকে কী আদেশ করেন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি রমজানে উমরাহ করো, কেননা রমজানের উমরাহ একটি হজের সমতুল্য।"









আল-জামি` আল-কামিল (5247)


5247 - عن جابر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"عمرة في رمضان تعدل حجة".

صحيح: رواه ابن ماجه (2995) عن أبي بكر بن أبي شية، قال: حدثنا أحمد بن عبد الملك بن واقد، قال: حدثنا عبيد الله بن عمرو، عن عبد الكريم، عن عطاء، عن جابر، فذكره. وإسناده صحيح.

وعبد الكريم هو ابن مالك الجزريّ، ومن طريقه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (14795، 14882).




জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "রমজান মাসে ওমরাহ্ পালন করা একটি হজ্জের সমতুল্য।"