আল-জামি` আল-কামিল
5241 - عن أبي رزين -رجل من بني عامر- أنه قال: يا رسول الله، إنّ أبي شيخ كبير لا يستطيع الحجّ ولا العمرة ولا الظعن، قال:"احجج عن أبيك واعتمر".
صحيح: رواه أبو داود (1810)، والترمذيّ (930)، والنسائيّ (2621)، وابن ماجه (2906) كلّهم من شعبة، عن النّعمان بن سالم، عن عمرو بن أوس، عن أبي رزين، فذكره.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (16184)، وابن خزيمة (3040)، وابن حبان (3991)، والحاكم (1/ 481)، والبيهقي (4/ 350) وقال الحاكم: صحيح على شرط الشيخين.
قال الإمام أحمد: لا أعلم في إيجاب العمرة حديثًا أصح من هذا.
আবু রাযিন (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বললেন, "ইয়া রাসূলাল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! নিশ্চয় আমার পিতা খুবই বৃদ্ধ। তিনি হজ্ব, ওমরাহ অথবা সফর (যাত্রা) করতে সক্ষম নন।" তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তুমি তোমার পিতার পক্ষ থেকে হজ্ব ও ওমরাহ করো।"
5242 - عن عائشة رضي الله عنها، قالت: يا رسول الله هل على النساء جهاد؟ قال:"نعم عليهنّ جهاد لا قتال فيه: الحجّ والعمرة".
صحيح: رواه ابن ماجه (2901)، وابن خزيمة (3074) كلاهما من حديث محمد بن فضيل، ثنا حبيب بن أبي عمرة، عن عائشة بنت طلحة، عن عائشة أمّ المؤمنين، قالت (فذكرته).
وإسناده صحيح. قال ابن خزيمة:"في قوله صلى الله عليه وسلم:"عليهن جهاد لا قتال فيه" وإعلامه أن الجهاد الذي عليهن الحج والعمرة بيان أن العمرة واجبة كالحجّ".
وأصل الحديث في الصحيح من طريق غير محمد بن فضيل كما مضى، وليس فيه ذكر للعمرة. ومحمد بن فضيل من رجال الشيخين إلا أنه دون جرير وعبد الواحد وغيرهما في الحفظ والإتقان، ولذا قال فيه الحافظ:"صدوق". وهؤلاء لم يذكروا في حديثهم العمرة.
وفي الباب ما رُوي عن جابر أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم سئل عن العمرة أواجبة هي؟ قال:"لا، وأن تعتمروا هو أفضل".
رواه الترمذيّ (931) عن محمد بن عبد الأعلى، حدّثنا عمرو بن علي، عن الحجاج، عن محمد بن المنكدر، عن جابر، فذكره.
قال الترمذي: حسن صحيح.
قلت: بل ضعيف من أجل الحجاج وهو ابن أرطاة، وهو ضعيف، وقد خالف. ومن طريقه رواه أيضًا الإمام أحمد (14397)، وابن خزيمة (3068)، والبيهقي (4/ 349).
قال البيهقي: كذا رواه الحجاج بن أرطاة مرفوعًا.
ثم رواه من طريق ابن جريج والحجاج بن أرطاة، عن محمد بن المنكدر، عن جابر، أنه سئل عن العمرة: أواجبة كفريضة الحج؟ قال: لا وأن تعتمر خير لك. قال: هذا هو المحفوظ عن جابر موقوف غير مرفوع، ورُوي عن جابر مرفوعًا بخلاف ذلك، وكلاهما ضعيف" انتهي.
وهو يشير بذلك إلى ما رواه هو (4/ 350 - 351) من طريق ابن لهيعة، عن عطاء، عن جابر، مرفوعًا:"الحج والعمرة فريضتان واجبتان".
وقال:"ابن لهيعة غير محتج به".
وقد سبقه ابن عدي فقال:"غير محفوظ". الكامل (4/ 1468).
وتعقب النووي أيضًا على كلام الترمذي في قوله: حديث حسن صحيح. فقال: هذا كلام غير مقبول، ولا تغتر بكلام الترمذي … وأطال في ردّ الحديث.
وأما ما رُوي عن طلحة بن عبيد الله أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"الحجّ جهاد والعمرة تطوّع" فهو ضعيف جدًّا.
رواه ابن ماجه (2989) عن هشام بن عمار، قال: حدثنا الحسن بن يحيى الخشني، قال: حدثنا عمر بن قيس، قال: أخبرني طلحة بن يحيى، عن عمّه إسحاق بن طلحة، عن طلحة بن عبيد الله، فذكره.
وعمر بن قيس هو المكيّ المعروف بسندل، أهل العلم مطبقون على تضعيفه، بل قال الإمام أحمد: متروك.
وممن ذهب إلى وجوب العمرة: عمر وابنه عبد الله وابن عباس وعطاء وطاوس ومجاهد وقتادة والحسن وابن سيرين، وبه قال الثوريّ والشافعي وأحمد وإسحاق.
وممن ذهب إلى أنها سنة مالك، وأصحاب الرأي. انظر: شرح السنة للبغوي (7/ 15).
وقال الترمذي (3/ 262):"قال الشافعي: العمرة سنة، لا نعلم أحدًا رخّص في تركها، وليس فيها شيء ثابت بأنها تطوّع. وقد روي عن النبيّ صلى الله عليه وسلم بإسناد وهو ضعيف، لا تقوم بمثلها حجة. وقد بلغنا عن ابن عباس أنه كان يوجبها" قال الترمذي: كله كلام الشّافعيّ.
وقد رجّح النووي في"المجموع" (7/ 7) بأن العمرة فرض باتفاق الأصحاب، وهو المنصوص في الجديد والقديم".
আয়িশাহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! মহিলাদের উপর কি জিহাদ আছে? তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: হ্যাঁ, তাদের উপর জিহাদ আছে, যাতে কোনো যুদ্ধ নেই: তা হলো হাজ্জ (হজ) ও উমরাহ।
5243 - عن أبي هريرة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"العمرة إلى العمرة كفّارة لما بينهما، والحجّ المبرور ليس له جزاء إلا الجنّة".
متفق عليه: رواه مالك في الحج (65) عن سُمي مولى أبي بكر بن عبد الرحمن، عن أبي صالح السمان، عن أبي هريرة، فذكره.
ورواه البخاري في العمرة (1773)، ومسلم في الحج (1349) كلاهما من طريق مالك، به، مثله.
আবু হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "এক উমরাহ থেকে পরবর্তী উমরাহ, এতদুভয়ের মধ্যবর্তী সময়ের গুনাহসমূহের কাফফারা (প্রায়শ্চিত্ত)। আর মাবরূর (পূণ্যময়) হজ্জের প্রতিদান জান্নাত ছাড়া আর কিছুই নয়।"
5244 - عن ابن عباس، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال لامرأة من الأنصار يقال لها: أمّ سنان:"ما منعك أن تكوني حججتِ معنا؟" قالت: ناضحان كانا لأبي فلان (زوجها) حجّ هو وابنه على أحدهما، وكان الآخر يسقي غلامنا. قال:"فعمرة في رمضان تقضي حجّة أو حجّة معي".
متفق عليه: رواه البخاريّ في جزاء الصيد (1863)، ومسلم في الحج (1256: 222) كلاهما من طريق يزيد بن زريع، حدّثنا حبيب المعلِّم، عن عطاء، عن ابن عباس، فذكره. واللفظ لمسلم.
ولفظ البخاري قريب منه إلا أنه قال:"حجّة معي" ولم يشك.
ورواه البخاريّ أيضًا في العمرة (1782)، ومسلم في الحج (1256: 221) كلاهما من طريق يحيى بن سعيد (هو القطّان)، عن ابن جريج، قال: أخبرني عطاء، قال: سمعت ابن عباس يحدّثنا. قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لامرأة من الأنصار -سمّها ابن عباس فنسيتُ اسمها-:"ما منعك أن تحجِّي معنا؟". قالت: لم يكن لنا إلّا ناضحان، فحجَّ أبو ولدها وابنها على ناضح وترك لنا ناضحًا ننضح عليه. قال:"فإذا جاء رمضان فاعتمريّ، فإنّ عمرةً فيه تعدل حجّة".
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী কারীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আনসার গোত্রের এক মহিলাকে, যার নাম ছিল উম্মে সিনান, জিজ্ঞেস করলেন: "তোমাকে কিসে আমার সাথে হজ করতে বাধা দিয়েছে?" তিনি বললেন: আমাদের (অর্থাৎ আমার স্বামীর) দুটি পানি বহনকারী উট ছিল। তিনি (স্বামী) ও তার পুত্র তাদের একটিতে চড়ে হজ করেছেন। আর অপরটি আমাদের গোলামকে পানি সেচের কাজে লাগাচ্ছিল। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "অতএব, রমজানে একটি উমরাহ একটি হজের সমতুল্য, অথবা আমার সাথে একটি হজের সমতুল্য।"
5245 - عن ابن عباس، قال: أراد رسول الله صلى الله عليه وسلم الحجّ، فقالت امرأة لزوجها: أحجني مع رسول الله صلى الله عليه وسلم على جملك. فقال: ما عندي ما أُحجُّك عليه. قالت: أحجَّني على جملك فلان. قال: ذاك حبيس في سبيل الله عز وجل. فأتى رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال: إنّ امرأتي تقرأ عليك السلام ورحمة الله، وإنها سألتني الحجّ معك، قالت: أحجَّني مع رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقلت: ما عندي ما أحجك عليه، فقالت: أحجّني على جملك فلان، فقلت: ذاك حبيس في سبيل الله، فقال:"أما إنّك لو أحججتها عليه كان ذلك في سبيل الله" قال: وإنّها أمرتني أن أسألك ما يعدل حجّة معك، فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"اقرأها السلام ورحمة الله وبركاته، وأخبرها أنها تعدل حجّة معي" يعني عمرة في رمضان.
حسن: رواه أبو داود (1990) عن مسدد وعبد الوارث، عن عامر الأحول، عن بكر بن عبد الله، عن ابن عباس، قال (فذكره).
وصحّحه ابن خزيمة (3077)، ورواه من طريق عبد الوارث بإسناده مثله. وبكر بن عبد الله هو المزني أبو عبد الله البصريّ.
وإسناده حسن من أجل عامر الأحول وهو ابن عبد الواحد مختلف فيه، فضعّفه الإمام أحمد والنسائي ووثّقه أبو حاتم، ومشّاه ابن عدي غير أنه حسن الحديث إذا لم يخالف لأنه رمي بسوء الحفظ.
وقصة هذه المرأة تشبه قصة المرأة التي في الصّحيحين.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজ্জ করার ইচ্ছা করলেন। তখন এক মহিলা তার স্বামীকে বলল: আপনার উটের পিঠে চড়িয়ে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমাকে হজ্জ করান। স্বামী বলল: তোমাকে হজ্জ করানোর মতো কিছু আমার কাছে নেই। সে (মহিলা) বলল: আপনার অমুক উটের পিঠে চড়িয়ে আমাকে হজ্জ করান। স্বামী বলল: ওটা তো আল্লাহর রাস্তায় ওয়াকফ্ করা হয়েছে। অতঃপর লোকটি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট এসে বলল: আমার স্ত্রী আপনার প্রতি সালাম ও আল্লাহর রহমত জ্ঞাপন করেছে। সে আপনার সাথে হজ্জ করার জন্য আমাকে অনুরোধ করেছে। সে বলেছে: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে আমাকে হজ্জ করান। আমি বলেছি: তোমাকে হজ্জ করানোর মতো কিছু আমার কাছে নেই। তখন সে বলল: আপনার অমুক উটের পিঠে চড়িয়ে আমাকে হজ্জ করান। আমি বললাম: ওটা আল্লাহর রাস্তায় ওয়াকফ্ করা হয়েছে। তিনি (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সাবধান! যদি তুমি তাকে তার (ঐ উটের) উপর চড়িয়ে হজ্জ করাতে, তবে তা আল্লাহর রাস্তাতেই গণ্য হতো।" লোকটি বলল: আর সে আমাকে আদেশ করেছে যেন আমি আপনাকে জিজ্ঞাসা করি, আপনার সাথে হজ্জ করার সমতুল্য কী রয়েছে? রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি তাকে আমার পক্ষ থেকে সালাম ও আল্লাহর রহমত ও বরকত জানাবে এবং তাকে খবর দেবে যে, রমযান মাসে উমরাহ্ করা আমার সাথে হজ্জ করার সমতুল্য।" (অর্থাৎ রমযান মাসে উমরাহ্ করা।)
5246 - عن أمّ معقل الأسدية أنها قالت: يا رسول الله، إنّي أريد الحج، وجملي أعجف، فما تأمرني؟ قال:"اعتمري في رمضان، فإنّ عمرة في رمضان تعدل حجّة".
صحيح: رواه الإمام أحمد (27285) عن روح ومحمد بن مصعب، قالا: حدثنا الأوزاعي، عن يحيى بن أبي كثير، عن أبي سلمة بن عبد الرحمن، عن أم معقل الأسدية، قالت: (فذكرته). وهذا إسناد صحيح.
قلت: هذا الجزء من الحديث صحيح.
رواه أبو داود (1988)، والترمذي (939)، وابن ماجه (2993)، والإمام أحمد (27106) وفي مواضع أخرى، وابن خزيمة (3075)، والبيهقي (4/ 346) وغيرهم من طرق مختلفة مع قصة لأم معقل إلا أن الرواة لم يضبطوا القصّة كما أنهم لم يضبطوا متن الحديث وإسناده فاستحقوا مجانبة الذكر في الصحيح إلا أني لما رأيت أن أكثر الرواة متفقون على الجزء المرفوع من الحديث وهو قول النبيّ صلى الله عليه وسلم:"العمرة في رمضان تعدل حجة" وله شواهد صحيحة، أوردته في كتابي هذا بأصح الأسانيد.
ورواه البزّار -كشف الأستار (1151) - من وجه آخر عن المختار بن فلفل، عن طلق بن حبيب، عن أبي طليق، قال: طلبتْ مني أُمُّ طليق جملًا تحجّ عليه، فقلت: قد جعلته في سبيل الله. فسألت رسول الله صلى الله عليه وسلم فقال:"صدقتْ لو أعطيتها كان في سبيل الله. وإن عمرة في رمضان تعدل حجّة".
قال الهيثمي في"المجمع" (3/ 280) بعد أن روي بأطول من هذا عن الطبراني في"الكبير":"ورواه البزار باختصار عنه ورجال البزار رجال الصّحيح".
وهذا بعينه أن الطبراني لم يرو من هذا الوجه.
وقد حاول الحافظ في الإصابة في ترجمة"أبي معقل" (4/ 181) جمع هذه الأسانيد وتوفيقها، ولكنه لم يوفق في ذلك، وكذلك كل من حاول بعده.
وقصة هذه المرأة تشبه قصة المرأة التي ذكرها ابن عباس، فهل هي قصة واحدة أو تعددت؟ والأشبه أنها تعددت، والله أعلم.
وقد جاء هذا الحديث أيضًا عن يوسف بن عبد الله بن سلام يقول: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم لرجل من الأنصار وامرأته:"اعتمرا في رمضان، فإن عمرة في رمضان لكما كحجة" رواه الإمام أحمد (16406)، والطبراني في الكبير (4324) كلاهما من حديث سفيان بن عيينة، قال: حدثنا ابن المنكدر، قال: سمعت يوسف بن عبد الله بن سلام، فذكره.
ويوسف بن عبد الله بن سلام صحابي صغير، وقال العجلي: تابعي ثقة، والصواب أن له صحبة كما قال البخاري، فقد روى الإمام أحمد (16404) وإسناده صحيح عن يحيى بن أبي الهيثم العطار، قال: سمعت يوسف بن عبد الله بن سلام يقول:"سماني رسول الله صلى الله عليه وسلم يوسف، ومسح على رأسي". إلا أنه لم يرو عن النبي صلى الله عليه وسلم؛ ولذا أخرجه أبو داود (1189)، وابن خزيمة (2376).
حديث الباب من وجه آخر عن يوسف بن عبد الله بن سلام، عن جدّته أم معقل، قالت: لما حجّ رسول الله صلى الله عليه وسلم حجّة الوداع، وكان لنا جمل، فجعله أبو معقل في سبيل الله، وأصابنا مرض، وهلك أبو معقل، وخرج النبي صلى الله عليه وسلم، فلما فرغ من حجه جئته، فقال:"يا أمّ معقل، ما منعك أن تخرجي معنا؟" قالت: لقد تهيأنا فهلك أبو معقل، وكان لنا جمل هو الذي نحجّ عليه، فأوصى به أبو معقل في سبيل الله، قال:"فهلّا خرجت عليه، فإنّ الحجّ في سبيل الله، فأما إذا فاتتك هذه الحجة معنا، فاعتمري في رمضان فإنها كحجة" فكانت تقول:"الحج حجة، والعمرة عمرة، وقد قال هذا لي رسول الله صلى الله عليه وسلم ما أدري ألي خاصة". واللفظ لأبي داود.
وفي الإسناد محمد بن إسحاق مدلس، ولم يصرّح.
وفي روايات أخرى حضرت أم معقل مع زوجها النبي صلى الله عليه وسلم.
وفي رواية أخرى: أبو معقل ممن حجّ مع النبيّ صلى الله عليه وسلم.
وفي روايات أخرى اختلافات أخرى غير ما ذكرت تجعل هذه القصة أنها وقع فيها اضطراب شديد، وبالله التوفيق.
وقال الحافظ ابن حجر في"الفتح" (3/ 604):"ووقعت لأم طليق قصة مثل هذه أخرجها أبو علي بن السكن، وابن منده في الصحابة، والدولابي في الكني من طريق طلق بن حبيب: أنّ أبا طليق حدّثه أن امرأته قالت له -وله جمل وناقة- أعطني جملك أحج عليه، قال: جملي حبيس في سبيل الله. قالت: إنه في سبيل الله أن أحج عليه، فذكر الحديث، وفيه: فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"صدقت أم طليق"، وفيه: ما يعدل الحج؟ قال:"عمرة في رمضان".
وزعم ابن عبد البر أن أمّ معقل هي أم طليق لها كنيتان، وفيه نظر؛ لأنّ أبا معقل مات في عهد النبي صلى الله عليه وسلم وأبا طليق عاش حتى سمع منه طلق بن حبيب وهو من صغار التابعين، فدل على تغاير المرأتين، ويدل عليه تغاير السياقين أيضًا، ولا معدل عن تفسير المبهمة في حديث ابن عباس بأنها أم سنان أو أم سليم لما في القصة التي في حديث ابن عباس من التغاير للقصة التي في حديث غيره، ولقوله في حديث ابن عباس:"إنها أنصارية"، وأما أم معقل فإنها أسدية، ووقعت لأم الهيثم أيضًا، والله أعلم. انتهى.
উম্মু মা'কিল আল-আসাদিয়াহ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত যে, তিনি বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! আমি হজ করতে চাই, কিন্তু আমার উট দুর্বল। আপনি আমাকে কী আদেশ করেন? তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "তুমি রমজানে উমরাহ করো, কেননা রমজানের উমরাহ একটি হজের সমতুল্য।"
5247 - عن جابر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم قال:"عمرة في رمضان تعدل حجة".
صحيح: رواه ابن ماجه (2995) عن أبي بكر بن أبي شية، قال: حدثنا أحمد بن عبد الملك بن واقد، قال: حدثنا عبيد الله بن عمرو، عن عبد الكريم، عن عطاء، عن جابر، فذكره. وإسناده صحيح.
وعبد الكريم هو ابن مالك الجزريّ، ومن طريقه أخرجه أيضًا الإمام أحمد (14795، 14882).
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "রমজান মাসে ওমরাহ্ পালন করা একটি হজ্জের সমতুল্য।"
5248 - عن وهب بن خنبش، قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"عمرة في رمضان تعدل حجة".
صحيح: رواه ابن ماجه (2991) عن طرق، عن وكيع، قال: حدثنا سفيان، عن بيان وجابر، عن الشعبي، عن وهب بن خنبش، فذكره.
ومن هذا الوجه رواه أيضًا الإمام أحمد (17661)، وابنه عبد الله في زياداته على المسند (17601) عن أبيه ويحيى بن معين، قالا: حدثنا وكيع، فذكره.
وإسناده صحيح لا من طريق جابر وهو ابن يزيد الجعفيّ، ولكن من طريق بيان وهو ابن بشر الأحمسيّ من رجال الجماعة.
وقد روي أيضا عن هرم بن خنبش مثله، رواه ابن ماجه (2992) وفيه داود بن يزيد الزعافري وهو ضعيف باتفاق أهل العلم.
ওয়াহব ইবনু খানবাশ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “রমজান মাসে উমরাহ্ করা একটি হজ্জের সমতুল্য।”
5249 - عن عكرمة بن خالد، أنه سأل ابن عمر رضي الله عنهما عن العمرة قبل الحجّ،
فقال: لا بأس. قال عكرمة: قال ابن عمر: اعتمر النبيّ صلى الله عليه وسلم قبل أن يحجّ.
صحيح: رواه البخاريّ في العمرة (1774) عن أحمد بن محمد (هو المروزيّ)، أخبرنا عبد الله (هو ابن المبارك)، أخبرنا ابن جريج، أن عكرمة بن خالد، سأل ابن عمر، فذكره.
وأما ما رُوي عن سعيد بن المسيب، أنّ رجلًا من أصحاب النبيّ صلى الله عليه وسلم أتي عمر بن الخطّاب فشهد عنده أنه سمع رسول الله صلى الله عليه وسلم في مرضه الذي قبض فيه ينهى عن العمرة قبل الحجّ. ففيه انقطاع وجهالة.
رواه أبو داود (1793) عن أحمد بن صالح، حدثنا عبد الله بن وهب، أخبرني حيوة، أخبرني أبو عيسى الخراساني، عن عبد الله بن القاسم، عن سعيد بن المسيب، فذكره.
وفيه ثلاث علل:
الأولى: الاختلاف في سماع سعيد بن المسيب من عمر بن الخطاب، فأثبته الإمام أحمد وأنكره ابن معين.
والثانية: عبد الله بن القاسم التيمي البصريّ، روى عنه عدد من الرواة إلا أنه لم يوثقه أحد، وإنما ذكره ابن حبان في"الثقات"؛ ولذا قال فيه ابن حجر:"مقبول" أي إذا توبع، ولكنه لم يتابع فهو لين الحديث.
والثالثة: أبو عيسى الخراسانيّ هو الآخر من روى عنه عدد كثير من الرواة. ولم يوثقه غير ابن حبَّان، ولذا قال فيه الحافظ ابن حجر:"مقبول" أي إذا توبع، وإذا لم يتابع فهو لين الحديث.
ولهذه الأسباب المجتمعة أو لغيرها قال الخطابي في"معالمه":"في إسناد هذا الحديث مقال، وقال: وقد اعتمر رسول الله صلى الله عليه وسلم عمرتين قبل حجّه، والأمر الثابت المعلوم لا يترك بالأمر المظنون، وجواز ذلك إجماع من أهل العلم لم يذكر فيه خلاف".
وتبعه البغويّ في شرح السنة (7/ 10) فقال:"في إسناده مقال".
ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, ইকরিমাহ ইবন খালিদ (রাহিমাহুল্লাহ) তাঁকে হজ্জের পূর্বে উমরাহ করা সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলে তিনি (ইবন উমর) বললেন: এতে কোনো অসুবিধা নেই। ইকরিমাহ বলেন: ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বলেছেন, নবী করীম সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হজ্জ করার পূর্বেই উমরাহ সম্পন্ন করেছিলেন।
5250 - عن ابن عباس، قال: كَانُوا يَرَوْنَ أَنَّ الْعُمْرَةَ فِي أَشْهُرِ الْحَجِّ مِنْ أَفْجَرِ الْفُجُورِ فِي الأَرْضِ، وَيَجْعَلُونَ الْمُحَرَّمَ صَفَرًا، وَيَقُولُونَ: إِذَا بَرَا الدَّبَرْ وَعَفَا الأَثَرْ وَانْسَلَخَ صَفَرْ حَلَّتِ الْعُمْرَةُ لِمَنِ اعْتَمَرْ.
قَدِمَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم وَأَصْحَابُهُ صَبِيحَةَ رَابِعَةٍ مُهِلِّينَ بِالْحَجِّ فَأَمَرَهُمْ أَنْ يَجْعَلُوهَا عُمْرَةً فَتَعَاظَمَ ذَلِكَ عِنْدَهُمْ فَقَالُوا: يَا رَسُولَ اللَّهِ! أَيُّ الْحِلِّ؟ قَالَ:"حِلٌّ كُلُّه".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1564)، ومسلم في الحج (1240: 198) كلاهما من طريق وهيب، حدّثنا عبد الله بن طاوس، عن أبيه، عن ابن عباس، فذكره، ولفظهما سواء.
وفي رواية عند مسلم (199) من طريق أبي العالية البراء، عن ابن عباس، به، وفيه:"فقدم لأربع مَضَيْن من ذي الحجة".
قوله:"برأ الدَّبَر" أي ما كان يحصل بظهور الإبل من الحمل عليها، ومشقّة السّفر، فإنه كان يبرأ بعد انصرافهم من الحجّ.
وقوله:"عفا الأثر" أي درس. والمراد: أثر الإبل وغيرها في سيرها، وعفا أثرها لطول مرور الأيام.
ইবনু আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: তারা (জাহিলিয়াতের যুগে) মনে করত যে, হজের মাসসমূহে উমরাহ করা পৃথিবীতে সবচেয়ে বড় পাপের মধ্যে গণ্য। তারা মুহাররম মাসকে সফর মাস বানিয়ে দিত এবং বলত: যখন (পশুর) পিঠের ক্ষত শুকিয়ে যাবে, আর (সফরের) চিহ্ন মুছে যাবে, এবং সফর মাস অতিবাহিত হয়ে যাবে, তখন উমরাহকারীর জন্য উমরাহ হালাল হবে।
নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) ও তাঁর সাহাবীগণ (যিলহজ মাসের) চার তারিখ সকালে হাজির হলেন, তাঁরা হজের ইহরাম বেঁধেছিলেন। তখন তিনি তাদেরকে নির্দেশ দিলেন যেন তারা সেটিকে উমরায় পরিণত করে নেন। এই বিষয়টি তাদের নিকট বিরাট (কষ্টকর) মনে হলো। তারা জিজ্ঞেস করল: হে আল্লাহর রাসূল! (ইহরাম খোলার পর) কোন জিনিস হালাল হবে? তিনি বললেন: "সব কিছুই হালাল।"
5251 - عن أنس بن مالك، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم اعتمر أربع عمر، كلَّهنّ في ذي القعدة إلا التي مع حجّته: عمرة من الحديبية -أو زمن الحديبية- في ذي القعدة، وعمرة من العام المقبل في ذي القعدة، وعمرة من جعرانة حيث قسم غنائم حنين في ذي القعدة، وعمرة مع حجته.
متفق عليه: رواه البخاريّ في العمرة (1778)، ومسلم (1253) كلاهما من طريق همّام، حدثنا قتادة، أن أنسًا، أخبره، فذكره. واللفظ لمسلم.
আনাস ইবনে মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চারটি উমরাহ (ওমরাহ) করেছেন। তার হজ্জের সাথে করা উমরাহটি ছাড়া বাকি সবগুলোই যুল-কা‘দাহ (ذي القعدة) মাসে ছিল। (তা হলো:) যুল-কা‘দাহ মাসে হুদায়বিয়াহ থেকে (বা হুদায়বিয়াহ-এর সময়কালীন) একটি উমরাহ, পরের বছর যুল-কা‘দাহ মাসে একটি উমরাহ, জি‘ইর্রানাহ থেকে যখন তিনি হুনায়নের গণিমত বণ্টন করেছিলেন— সেটিও যুল-কা‘দাহ মাসে একটি উমরাহ, এবং হজ্জের সাথে করা একটি উমরাহ।
5252 - عن مجاهد، قال: دخلتُ أنا وعروة بن الزبير المسجد، فإذا عبد الله بن عمر جالس إلى حجرة عائشة. والناس يصلّون الضُّحى في المسجد. فسألناه عن صلاتهم، فقال: بدعة. فقال له عروة: يا أبا عبد الرحمن، كم اعتمر رسول الله صلى الله عليه وسلم؟ فقال: أربع عمر. إحداهنّ في رجب. فكرهنا أن نكذّبه ونردّ عليه، وسمعنا استنان عائشةَ في الحجرة. فقال عروة: ألا تسمعين، يا أمَّ المؤمنين إلى ما يقول أبو عبد الرحمن؟ فقالت: وما يقول؟ قال يقول: اعتمر النبيّ صلى الله عليه وسلم أربع عمر إحداهنّ في رجب. فقالت: يرحم الله أبا عبد الرحمن. ما اعتمر رسولُ الله صلى الله عليه وسلم إلّا وهو معه. وما اعتمر في رجب قطّ.
متفق عليه: رواه البخاريّ في العمرة (1775 - 1776)، ومسلم في الحجّ (1255: 22) كلاهما من طريق جرير، عن منصور، عن مجاهد، به، فذكره.
وأما قول ابن عمر:"إحداهنّ في رجب" فهو وهم منه رضي الله عنه، ولذا لما اعترضته عائشة سكت. زاد مسلم:"وابن عمر يسمع، فما قال: لا، ولا نعم. وسكت".
মুজাহিদ থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি এবং উরওয়াহ ইবনু যুবাইর মসজিদে প্রবেশ করলাম। আমরা দেখলাম যে, আবদুল্লাহ ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কক্ষের পাশে বসে আছেন। আর লোকেরা তখন মসজিদে চাশতের (দুহা) সালাত আদায় করছিল। তখন আমরা তাঁকে তাদের (দুহা) সালাত সম্পর্কে জিজ্ঞেস করলাম। তিনি বললেন: এটা বিদ‘আত।
এরপর উরওয়াহ তাঁকে বললেন: হে আবূ আবদুর রহমান! রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম কতটি উমরাহ করেছেন?
তিনি বললেন: চারটি উমরাহ, যার মধ্যে একটি ছিল রজব মাসে।
আমরা তাঁকে মিথ্যাবাদী সাব্যস্ত করা বা তাঁর কথা প্রত্যাখ্যান করা অপছন্দ করলাম, আর আমরা আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর কক্ষের ভেতর থেকে মেসওয়াক করার শব্দ শুনতে পেলাম। তখন উরওয়াহ বললেন: হে উম্মুল মু’মিনীন! আবূ আবদুর রহমান যা বলছেন, তা কি আপনি শুনছেন না?
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) জিজ্ঞেস করলেন: তিনি কী বলছেন?
তিনি (উরওয়াহ) বললেন: তিনি বলছেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম চারটি উমরাহ করেছেন, যার মধ্যে একটি ছিল রজব মাসে।
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন: আল্লাহ আবূ আবদুর রহমানকে ক্ষমা করুন। রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম উমরাহ করেছেন, আর তিনি (ইবনু উমর) তাঁর সাথেই ছিলেন। কিন্তু তিনি কক্ষনো রজব মাসে উমরাহ করেননি।
5253 - عن البراء بن عازب، قال: اعتمر رسول الله صلى الله عليه وسلم في ذي القعدة قبل أن يحجّ مرتين.
صحيح: رواه البخاريّ في العمرة (1781) من طريق إبراهيم بن يوسف، عن أبيه (هو يوسف بن
إسحاق بن أبي إسحاق السبيعيّ)، عن أبي إسحاق، قال: سألتُ مسروقًا وعطاء ومجاهدًا، فقالوا: اعتمر رسول الله صلى الله عليه وسلم في ذي القعدة قبل أن يحجّ. وقال سمعت البراء بن عازب يقول (فذكره).
وقوله:"مرتين" أراد بهما العمرة المفردة المستقلة وهما اثنتان حقًّا: عمرة القضاء، وعمرته من جعرانة.
বারা' ইবন 'আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজ্জ করার পূর্বে যুল-ক্বাদাহ মাসে দু’বার উমরাহ করেছেন।
5254 - عن البراء بن عازب، قال: اعتمر رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل أن يحجّ، واعتمر قبل أن يحج، واعتمر قبل أن يحج. فقالت عائشة: لقد علم أنه اعتمر أربع عمر بعمرته التي حجّ فيها.
صحيح: رواه الإمام أحمد (18629) عن يزيد بن هارون، أخبرنا زكريا بن أبي زائدة، عن أبي إسحاق، عن البراء بن عازب، فذكره.
ورواه البيهقي (5/ 11) من هذا الطريق وقال: ثلاث عمر كلهن في ذي القعدة". ثم ذكر استدراك عائشة.
واختصره أبو يعلي (1660) بلفظ:"اعتمر رسول الله صلى الله عليه وسلم قبل الحج" ولم يكرره ثلاثًا.
ثم ذكر استدراك عائشة ولا منافاة بين قول البراء وبين قول عائشة؛ فإن البراء لم يدخل عمرة النبيّ صلى الله عليه وسلم في حجته من جملة العمر، وأدخلته عائشة فاختلف العدد - وكلاهما صواب.
বারা ইবনু আযিব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) হজ্জ করার পূর্বে উমরাহ করেছেন, হজ্জ করার পূর্বে উমরাহ করেছেন, এবং হজ্জ করার পূর্বে উমরাহ করেছেন। অতঃপর আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) বললেন, তিনি (বারা) নিশ্চয়ই অবগত আছেন যে, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁর সেই উমরাহটি সহ মোট চারটি উমরাহ করেছেন, যা তিনি হজ্জের সাথে করেছিলেন।
5255 - عن ابن عباس، قال: اعتمر رسول الله صلى الله عليه وسلم أربع عمر: عمرة الحديبية، والثانية حين تواطؤوا على عمرة من قابل، والثالثة من جعرانة، والرابعة التي قرن مع حجّته.
صحيح: رواه أبو داود (1993)، والترمذيّ (816)، وابن ماجه (3003)، وأحمد (2211)، وصحّحه ابن حبان (3946)، والحاكم (3/ 50) كلّهم من طريق داود بن عبد الرحمن العطار، عن عمرو بن دينار، عن عكرمة، عن ابن عباس، فذكره.
قال الترمذي:"حديث ابن عباس حديث حسن غريب، وروى ابن عيينة هذا الحديث عن عمرو ابن دينار، عن عكرمة، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم اعتمر أربع عمر، ولم يذكر فيه عن ابن عباس".
ثم أسنده عن سعيد بن عبد الرحمن المخزوميّ، عن سفيان بن عيينة، بإسناده.
قلت: داود بن عبد الرحمن العطار، وثّقه أبو داود وغيره وهو من رجال الجماعة، فزيادته مقبولة.
ইবনে আব্বাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) চারটি উমরাহ্ (ওমরাহ) করেছেন: হুদায়বিয়ার উমরাহ্, দ্বিতীয়টি হলো যখন তারা পরবর্তী বছর উমরাহ্ করার জন্য সমঝোতা করেছিল, আর তৃতীয়টি হলো জি‘ইর্রানাহ থেকে, এবং চতুর্থটি হলো যা তিনি তাঁর হজ্জের সাথে মিলিয়ে করেছিলেন।
5256 - عن جابر، أنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم اعتمر ثلاث عمر كلّها في ذي القعدة: إحداهنّ زمن الحديبية، والأخرى في صلح قريش، والأخرى مرجعه من الطائف من الجعرانة.
حسن: رواه البزار -كشف الأستار (1149) -، والطبراني في الأوسط -مجمع البحرين (1790) - كلاهما من حديث سهل بن بكار، ثنا وهيب، عن ابن خثيم (وهو عبد الله بن عثمان بن خثيم)، عن سعيد بن جبير، وطلق بن حبيب، وأبي الزبير - كلّهم عن جابر، فذكره.
قال الهيثمي:"رجاله رجال الصحيح""المجمع" (3/ 279).
قلت: وهو كذلك وعبد الله بن عثمان بن خثيم"صدوق" من رجال مسلم.
জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিনটি উমরাহ করেছেন, যার সব কটিই ছিল যিলকদ মাসে। সেগুলোর একটি হলো হুদায়বিয়ার সময়, অন্যটি হলো কুরাইশের সাথে সন্ধির সময় এবং অপরটি হলো তায়েফ থেকে ফেরার পথে জি’ররানা (নামক স্থান) থেকে।
5257 - عن عائشة زوج النبي صلى الله عليه وسلم، قالت: لم يعتمر رسول الله صلى الله عليه وسلم عمرة إلّا في ذي القعدة.
صحيح: رواه ابن ماجه (2997) عن أبي بكر بن أبي شيبة، حدّثنا عبد الله بن نمير، عن الأعمش، عن مجاهد، عن عائشة، فذكرته.
وإسناده صحيح. وفي سماع مجاهد من عائشة خلاف، والصحيح أنه ثابت.
আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যুল-ক্বা'দাহ মাস ছাড়া অন্য কোনো মাসে উমরাহ পালন করেননি।
5258 - عن عائشة، أنّ رسول الله صلى الله عليه وسلم اعتمر عمرتين: عمرة في ذي القعدة، وعمرة في شوال.
صحيح: رواه أبو داود (1991) عن عبد الأعلى بن حماد، حدّثنا داود بن عبد الرحمن، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، فذكرته إلا أن قولها:"شوال" لا بد من تأويله -أي في آخر شوال وأوائل ذي القعدة كأنها تقصد أنه صلى الله عليه وسلم أحرم في آخر شوال، وكانت عمرته في ذي القعدة كما قال أنس وغيره. لأنّ الثابت في الأحاديث الصحيحة أن النبيّ صلى الله عليه وسلم اعتمر في ذي القعدة.
وقولها:"عمرتين" تعني مستقلتين.
ورواه البيهقيّ (4/ 346) من حديث عبد الله بن محمد بن إسحاق الفاكهي بمكة، ثنا أبو يحيى ابن أبي ميسرة، ثنا سعيد بن منصور، ثنا عبد العزيز بن محمد، أبنا هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، قالت:"اعتمر رسول الله صلى الله عليه وسلم ثلاث عمر: عمرة في شوال، وعمرتين في ذي القعدة".
تقصد غير عمرته التي كانت في الحجّ.
وأمّا ما رواه الدارقطنيّ (2293) من طريق العلاء بن زهير، عن عبد الرحمن بن الأسود، عن أبيه، عن عائشة، قالت: خرجت مع رسول الله صلى الله عليه وسلم في عُمرة في رمضان فأفطرَ رسولُ الله صلى الله عليه وسلم وصمتُ، وقَصَر وأتممتُ، فقلت: يا رسول الله، بأبي وأمي أفطرتَ وصمتُ، وقصرتَ وأتممتُ؟ فقال:"أحسنتِ يا عائشة".
فهو حديث غلط، بل ادّعى البعض أنه مكذوب؛ لأنّ النبيّ صلى الله عليه وسلم لم يعتمر في رمضان قط، ولأنّ عائشة ما كانتْ تخالف رسول الله صلى الله عليه وسلم وخاصة في العبادات التي هي توقيفية.
وذكر ابن القيم في"الزاد" أنّ الحديث لا يصح، ونقل عن شيخ الإسلام ابن تيمية قوله:"هو كذب على رسول الله صلى الله عليه وسلم".
واختلف حكم الدّارقطني عليه، فقال في"السنن":"إسناده حسن". وقال في"العلل" (14/ 258) بعد أن أشار إلى الاختلاف فيه على العلاء بن زهير وصلًا وإرسالًا، قال:"والمرسل أشبه بالصّواب".
ولكن حاول الحافظ في"الفتح" (3/ 603) تأويله بأن قولها:"في رمضان" متعلق بقولها:"خرجت" ويكون المراد سفر فتح مكة. فإنه كان في رمضان، واعتمر النبيّ صلى الله عليه وسلم تلك السنة من
الجعرانة، ولكن في ذي القعدة.
ورواه الدارقطنيّ (2294) بإسناد آخر إلى العلاء بن زهير فلم يقل في الإسناد"عن أبيه" ولا قال فيه:"رمضان".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নিশ্চয় রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) দু'টি উমরাহ আদায় করেছেন: একটি যিলকদ মাসে এবং একটি শাওয়াল মাসে।
[সহীহ: এটি আবূ দাঊদ (১৯৯১) আব্দুল আ'লা ইবন হাম্মাদ-এর সূত্রে, তিনি দাঊদ ইবন আব্দুর রহমান থেকে, তিনি হিশাম ইবন উরওয়া থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে এটি বর্ণনা করেছেন। তবে তাঁর এই উক্তি 'শাওয়াল' এর ব্যাখ্যা করা প্রয়োজন—অর্থাৎ শাওয়ালের শেষ এবং যিলকদ মাসের প্রথম দিকে। সম্ভবত তিনি উদ্দেশ্য করেছেন যে রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) শাওয়ালের শেষ দিকে ইহরাম বেঁধেছিলেন এবং তাঁর উমরাহ যিলকদ মাসে সম্পন্ন হয়েছিল, যেমনটি আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এবং অন্যান্যরা বলেছেন। কারণ সহীহ হাদীসসমূহ দ্বারা প্রমাণিত যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) যিলকদ মাসেই উমরাহ করেছেন।
আর তাঁর 'দু'টি উমরাহ' উক্তিটির অর্থ হল স্বতন্ত্র দু'টি উমরাহ।]
বায়হাকীও এটি বর্ণনা করেছেন (৪/৩৪৬) আব্দুল্লাহ ইবন মুহাম্মাদ ইবন ইসহাক আল-ফাকেহীর সূত্রে, তিনি আবূ ইয়াহইয়া ইবন আবী মাইসারা থেকে, তিনি সাঈদ ইবন মানসূর থেকে, তিনি আব্দুল আযীয ইবন মুহাম্মাদ থেকে, তিনি হিশাম ইবন উরওয়া থেকে, তিনি তাঁর পিতা থেকে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেন যে, তিনি বলেন: রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তিনটি উমরাহ আদায় করেছেন: একটি শাওয়াল মাসে এবং দুটি যিলকদ মাসে। (তিনি সেই উমরাহটি ছাড়া অন্যান্য উমরার কথা বুঝিয়েছেন যা হজ্জের সময় হয়েছিল।)
আর যা দারাকুতনী বর্ণনা করেছেন (২২৯৩) আলা' ইবন যুহাইর-এর সূত্রে, তিনি আব্দুর রহমান ইবন আল-আসওয়াদ থেকে, তিনি তার পিতা থেকে, তিনি আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণনা করেছেন, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর সাথে রমযান মাসের উমরায় বের হলাম। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) রোযা ভাঙলেন কিন্তু আমি রোযা রাখলাম। তিনি কসর করলেন আর আমি পূর্ণ করলাম। আমি বললাম: ইয়া রাসূলুল্লাহ, আমার পিতা-মাতা আপনার উপর কুরবান হোক, আপনি রোযা ভাঙলেন আর আমি রাখলাম, আপনি কসর করলেন আর আমি পূর্ণ করলাম? তিনি বললেন: "হে আয়িশা, তুমি ভালো করেছ।" (তবে এটি একটি ভুল হাদীস, বরং কেউ কেউ দাবি করেছেন যে এটি বানোয়াট...)
5259 - عن يعلى بن أمية أنه كَانَ يَقُولُ لِعُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ رضي الله عنه لَيْتَنِي أَرَي نَبِيَّ اللهِ صلى الله عليه وسلم حِينَ يُنْزَلُ عَلَيْهِ، فَلَمَّا كَانَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم بِالْجِعْرَانَةِ وَعَلَى النَّبِيِّ صلى الله عليه وسلم ثَوْبٌ قَدْ أُظِلَّ بِهِ عَلَيْهِ مَعَهُ نَاسٌ مِنْ أَصْحَابِهِ، فِيهِمْ عُمَرُ، إِذْ جَاءَهُ رَجُلٌ عَلَيْهِ جُبَّةُ صُوفٍ مُتَضَمِّخٌ بِطِيبٍ فَقَالَ: يَا رَسُولَ اللهِ، كَيْفَ تَرَى فِي رَجُلٍ أَحْرَمَ بِعُمْرَةٍ فِي جُبَّةٍ بَعْدَ مَا تَضَمَّخَ بِطِيبٍ؟ فَنَظَرَ إِلَيْهِ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم سَاعَةً ثُمَّ سَكَتَ، فَجَاءَهُ الْوَحْيُ، فَأَشَارَ عُمَرُ بِيَدِهِ إِلَى يَعْلَى ابْنِ أُمَيَّةَ: تَعَالَ، فَجَاءَ يَعْلَى فَأَدْخَلَ رَأْسَهُ، فَإِذَا النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم مُحْمَرُّ الْوَجْهِ يَغِطُّ سَاعَةً ثُمَّ سُرِّيَ عَنْهُ فَقَالَ:"أَيْنَ الَّذِي سَأَلَنِي عَنِ الْعُمْرَةِ آنِفًا؟". فَالْتُمِسَ الرَّجُلُ فَجِيءَ بِهِ فَقَالَ النَّبِيُّ صلى الله عليه وسلم:"أَمَّا الطِّيبُ الَّذِي بِكَ فَاغْسِلْهُ ثَلَاثَ مَرَّاتٍ، وَأَمَّا الْجُبَّةُ فَانْزِعْهَا ثُمَّ اصْنَعْ فِي عُمْرَتِكَ مَا تَصْنَعُ فِي حَجِّكَ".
متفق عليه: رواه البخاريّ في الحج (1536)، ومسلم في الحج (1180: 8) كلاهما من طريق ابن جريج، أخبرني عطاء، أن صفوان بن يعلى بن أمية أخبره، أن يعلى كان يقول لعمر بن الخطاب، فذكره.
ইয়ালা ইবনে উমায়্যা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি উমর ইবনুল খাত্তাব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-কে বলতেন, "হায়! আমি যদি আল্লাহর নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে দেখতে পেতাম যখন তাঁর ওপর ওয়াহী নাযিল হতো।" যখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) জি’ইর্রানায় অবস্থান করছিলেন এবং তাঁর উপর কাপড় দিয়ে ছায়া করা ছিল, তখন তাঁর সাথে তাঁর সাহাবীগণের একটি দল ছিল, তাদের মধ্যে উমরও (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ছিলেন। এমন সময় তাঁর কাছে একজন লোক এলো, যার পরনে ছিল উলের জুব্বা (পোশাক), আর সে সুগন্ধি মেখেছিল। সে বললো: হে আল্লাহর রাসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)! আপনি এমন ব্যক্তি সম্পর্কে কী বলেন, যে সুগন্ধি ব্যবহারের পর জুব্বা পরিহিত অবস্থায় উমরার ইহরাম বেঁধেছে? নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) কিছুক্ষণ তার দিকে তাকালেন, তারপর চুপ রইলেন। এরপর তাঁর ওপর ওয়াহী এলো। তখন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাঁর হাত দিয়ে ইয়ালা ইবনে উমায়্যার দিকে ইশারা করে বললেন, "এসো।" ইয়ালা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) এসে তাঁর মাথা প্রবেশ করালেন। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর চেহারা মুবারক লাল হয়ে গিয়েছিল এবং কিছুক্ষণ তিনি নাক ডাকছিলেন। এরপর তাঁর থেকে (কষ্ট) দূর হলো। তিনি বললেন, "কোথায় সে ব্যক্তি, যে এইমাত্র আমাকে উমরাহ সম্পর্কে জিজ্ঞেস করেছিল?" লোকটি খোঁজ করা হলো এবং তাকে নিয়ে আসা হলো। তখন নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন, "তোমার শরীরে যে সুগন্ধি আছে, তা তিনবার ধুয়ে ফেলো। আর জুব্বাটি খুলে ফেলো। এরপর তোমার উমরার ক্ষেত্রে তাই করো যা তুমি তোমার হাজ্জের ক্ষেত্রে করো।"
5260 - عن عائشة، أنّها قالت: يا رسول الله، يصدرُ النَّاسُ بنسكين، وأصدرُ بنُسك؟ فقال لها:"انتظري، فإذا طَهُرْتِ فاخرجي إلى التّنعيم فأهلي، ثمّ ائتينا بمكان كذا، ولكنّها على قدر نفقتك أو نصْبِك".
متفق عليه: رواه البخاريّ في العمرة (1787)، ومسلم في الحج (1211: 126) كلاهما من طريق ابن عون، عن القاسم بن محمد، وعن ابن عون، عن إبراهيم (هو النّخعيّ)، عن الأسود، قالا: قالت عائشة (فذكرته).
قوله:"على قدر نفقتك أو نصبك" قال النوويّ:"هذا ظاهر في أنّ الثواب والفضل في العبادة يكثر بكثرة النّصب والنفقة، والمراد النّصب الذي لا يذمّه الشّرع وكذا النّفقة".
আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: “হে আল্লাহর রাসূল! লোকজন দুটি ইবাদত (হাজ্জ ও উমরাহ) সম্পন্ন করে ফিরছে, আর আমি কি একটি মাত্র ইবাদত সম্পন্ন করে ফিরব?” অতঃপর তিনি (রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাঁকে বললেন: “অপেক্ষা করো। যখন তুমি পবিত্র হবে, তখন তানঈমের দিকে বের হয়ে যাও এবং (উমরার) ইহরাম বাঁধো। এরপর অমুক স্থানে আমাদের কাছে ফিরে এসো। তবে এর (অর্থাৎ উমরার) সাওয়াব তোমার খরচ বা তোমার কষ্টের পরিমাণ অনুযায়ী হবে।”