হাদীস বিএন


আল-জামি` আল-কামিল





আল-জামি` আল-কামিল (5341)


5341 - عن عائشة، وأنس أن النبي صلى الله عليه وسلم مر بقوم يلقحون، فقال:"لو لم يفعلوا لصلح" قال: فخرج شيصا، فمر بهم، فقال:"ما لنخلكم؟" قالوا: قلت كذا وكذا. قال:"أنتم أعلم بأمر دنياكم".

صحيح: رواه مسلم في الفضائل (2363) من طرق عن أسود بن عامر، حدثنا حماد بن سلمة، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة، وعن ثابت، عن أنس. فذكره.

قوله:"شيصا" هو البسر الرديء الذي إذا يبس صار حشفا.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) ও আনাস (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম এমন কিছু লোকের কাছ দিয়ে যাচ্ছিলেন যারা খেজুর গাছের পরাগায়ন (pollination) করাচ্ছিল। তখন তিনি বললেন: "যদি তারা এই কাজ না করত, তবে (ফলন) ভালো হতো।" (বর্ণনাকারী) বলেন: (এর ফলস্বরূপ) নিম্নমানের ফল ('শিয়স') বের হলো। অতঃপর তিনি তাদের পাশ দিয়ে যাওয়ার সময় বললেন: "তোমাদের খেজুর গাছের কী হলো?" তারা বলল: আপনি এমন এমন (কথা) বলেছিলেন। তিনি বললেন: "তোমরা তোমাদের দুনিয়াবি ব্যাপারগুলো সম্পর্কে বেশি অবগত।"









আল-জামি` আল-কামিল (5342)


5342 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من باع نخلا قد أبرت، فثمرها للبائع إلا أن يشترط المبتاع".

متفق عليه: رواه مالك في البيوع (9) عن نافع، عن ابن عمر.

ورواه البخاري في البيوع (2204)، ومسلم في البيوع (1543: 77) كلاهما من طريق مالك به.

روي هذا الحديث عن نافع، عن ابن عمر من طرق، منها هذا.

ومنها ما رواه عبيد الله، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعا بلفظ:"أيما نخل اشتري أصولها، وقد أبرت، فإن ثمرها للذي أبرها إلا أن يشترط الذي اشتراها".

رواه مسلم (78) من طرق عن عبيد الله به.

ومنها ما رواه الليث عن نافع، عن ابن عمر مرفوعا بلفظ:"أيما امرئ أبر نخلا، ثم باع أصلها، فللذي أبر ثمر النخل إلا أن يشترط المبتاع".

رواه مسلم (87) من طرق عن الليث به.

ومنها ما رواه أيوب، عن نافع، عن ابن عمر مرفوعا بلفظ:"من باع نخلا قد أبرت فثمرتها للبائع إلا أن يشترط المبتاع".

رواه أحمد (4502) عن إسماعيل، عن أيوب به.
ومن طريق إسماعيل وغيره رواه أيضا مسلم إلا أنه لم يذكر لفظ الحديث، وإنما أحال على لفظ حديث الليث.

ومنها ما رواه ابن أبي مليكة عن نافع مولى ابن عمر"أن أيما نخل بيعت قد أبرت لم يذكر الثمر، فالثمر للذي أبرها، وكذلك العبد والحرث". سمي له نافع هؤلاء الثلاثة.

رواه البخاري في البيوع (2203) قال: وقال لي إبراهيم، أخبرنا هشام، أخبرنا ابن جريج قال: سمعت ابن أبي مليكة، فذكر موقوفا على نافع.

ومنها ما روي شعبة قال: سمعت عبد ربه بن سعيد يحدث عن نافع، عن ابن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أيما رجل باع نخلا قد أبرت فثمرتها للأول، وأيما رجل باع مملوكا وله مال فماله لربه الأول إلا أن يشترط المبتاع".

رواه أحمد (5491)، وابن ماجه (2212)، والنسائي في"الكبرى" (4982) كلهم من حديث محمد بن جعفر، حدثنا شعبة فذكره.

قال شعبة: فحدثته بحديث أيوب، عن نافع أنه حدث بالنخل عن النبي صلى الله عليه وسلم، والمملوك عن عمر.

قال عبد ربه: لا أعلمهما جميعا إلا عن النبي صلى الله عليه وسلم، ثم قال مرة أخرى: فحدث عن النبي صلى الله عليه وسلم، ولم يشك.

ولعل الوهم فيه من عبد ربه بن سعيد الأنصاري في رفع القصتين عن نافع. والمحفوظ أن رافعا رفع قصة النخل، ووقف قصة العبد، كما ذكره البخاري.

ومنها ما رواه مالك في البيوع (2) عن نافع، عن ابن عمر، عن عمر قال:"من باع عبدا وله مال، فماله للبائع إلا أن يشترط المبتاع".

ومن طريقه رواه البيهقي (5/ 324) هكذا موقوفا على عمر بن الخطاب. ولكن رواه أبو داود (3434) عن القعنبي، عن مالك بإسناده عن عمر، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم بقصة العبد، فجعله مرفوعا.

وقال أبو داود:"واختلف الزهري، ونافع في أربعة أحاديث، هذا أحدها".

والصحيح أنه موقوف على عمر بن الخطاب، كذلك قال أيضا المنذري، وعزاه إلى النسائي في"الكبرى" (4986)، وعلقه البخاري.

وتفرد محمد بن إسحاق فروى عن نافع، عن ابن عمر، عن عمر مرفوعا بلفظ"من ابتاع نخلا مؤبرا فثمرته للبائع الأول إلا أن يشترط المبتاع، ومن باع عبدا وله مال فماله للبائع إلا أن يشترط المبتاع". رواه النسائي في"الكبرى" (4989).

وكذلك روي عن الزهري، عن سالم، عن أبيه، عن عمر. رواه النسائي في"الكبرى" أيضا من طريق سفيان بن حسين، عن الزهري. وأصحاب الزهري يروونه عن ابن عمر.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: “যে ব্যক্তি পরাগায়িত খেজুর গাছ বিক্রি করে, তবে তার ফল বিক্রেতারই থাকবে, যদি না ক্রেতা শর্তারোপ করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (5343)


5343 - عن عبد الله بن عمر قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول:"من ابتاع نخلا بعد
أن تؤبر فثمرتها للذي باعها إلا أن يشترط المبتاع، ومن ابتاع عبدا فماله للذي باعه إلا أن يشترط المبتاع".

متفق عليه: رواه البخاري في الاستقراض (2379)، ومسلم في البيوع (1543: 80) كلاهما من طريق الليث، عن ابن شهاب الزهري، عن سالم، عن أبيه عبد الله فذكره.

ورواه أحمد (4552)، وأبو داود (3433)، والنسائي (4636)، وابن ماجه (2211)، وصحّحه ابن حبان (4923) كلهم من حديث سفيان، عن ابن شهاب به مثله.

وقد أشار مسلم إلى رواية سفيان، وأحال على رواية الليث، وقال: بمثله.

وكذلك رواه يونس عن ابن شهاب، حدثني سالم بن عبد الله بن عمر أن أباه قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول بمثله.

رواه مسلم عن حرملة بن يحيى، أخبرنا ابن وهب، أخبرني يونس، فذكره، وأحال على لفظ حديث الليث.

فهؤلاء الثلاثة رووا عن ابن شهاب، عن سالم، عن أبيه، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فجمع في القصة على النخل والعبد.

ورواه الشافعي في الأم (2/ 40) عن سفيان، عن الزهري. ولم يذكر فيه إلا النخل.

وله طريق آخر عن ابن عمر أن رجلا اشتري نخلا قد أبرها صاحبها، فخاصمه إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقضى رسول الله صلى الله عليه وسلم أن الثمرة لصاحبها الذي أبرها إلا أن يشترط المشتري.

رواه أحمد (4852) عن يزيد، أخبرنا حماد بن سلمة، عن عكرمة بن خالد المخزومي، عن ابن عمر. فذكره.

ورواه البيهقي (5/ 325) من وجه آخر عن قتادة، عن عكرمة بن خالد، وقال: وهذا منقطع، وقد روي عن هشام الدستوائي، عن قتادة، عن عكرمة بن خالد، عن الزهري، عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم، وقال: كأنه أراد حديث الزهري، عن سالم، عن أبيه.

قلت: من طريق هشام الدستوائي رواه النسائي في"الكبرى" (4994)، وقال: مثل حديث ابن عيينة، عن الزهري. (عن سالم، عن ابن عمر، كما في الصحيحين).




আব্দুল্লাহ ইবন উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-কে বলতে শুনেছি: “যে ব্যক্তি কোনো খেজুর গাছ ক্রয় করে যখন তাতে পরাগায়ন (أبر) করা হয়েছে, তবে সেই গাছের ফল বিক্রেতারই থাকবে, যদি না ক্রেতা শর্তারোপ করে। আর যে ব্যক্তি কোনো দাস ক্রয় করে, তবে তার (দাসের) সম্পদ বিক্রেতারই থাকবে, যদি না ক্রেতা শর্তারোপ করে।”









আল-জামি` আল-কামিল (5344)


5344 - عن ابن عمر، وجابر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"من ابتاع عبدا وله مال فله ماله، وعليه دينه إلا أن يشترط المبتاع، ومن أبَّر نخلا فباعه بعد تأبيره فله ثمره إلا أن يشترط المبتاع".

حسن: رواه ابن حبان (9424)، والبيهقي (5/ 325 - 326) كلاهما من حديث سليمان بن موسى، عن نافع، عن ابن عمر، وعطاء، عن جابر. فذكره.
وإسناده حسن من أجل سليمان بن موسى، وهو الدمشقي الأشدق؛ فإنه حسن الحديث.

ورواه أبو داود (3435)، والبيهقي بإسنادين عمن سمع جابرا، عن جابر فذكره. وفيه رجل لم يسم، وهو قد يكون عطاء، وقد يكون أبا الزبير، كما في رواية ابن أبي شيبة (7/ 113).




ইবনু উমর ও জাবির (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: "যে ব্যক্তি এমন গোলাম ক্রয় করে যার অর্থ-সম্পদ আছে, তবে তার অর্থ-সম্পদ বিক্রেতার এবং তার ঋণও বিক্রেতার, যদি না ক্রেতা ভিন্ন কোনো শর্ত আরোপ করে। আর যে ব্যক্তি কোনো খেজুর গাছ পরাগায়নের পর বিক্রয় করে, তবে তার ফল বিক্রেতার হবে, যদি না ক্রেতা ভিন্ন কোনো শর্ত আরোপ করে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5345)


5345 - عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من اشتري نخلا بعد ما أبرت، ولم يشترط ثمرها فلا شيء له، ومن اشتري عبدا، ولم يشترط ماله فلا شيء له".

صحيح: رواه علي بن الجعد (2875)، ومن طريقه ابن حبان (4921) عن أبي يعلى، عنه، عن ابن أبي ذئب، عن ابن شهاب، عن سالم بن عبد الله، عن ابن عمر. فذكره. وإسناده صحيح.

خلاصة ما توصلنا إليه من تخريج هذا الحديث إن سالما ونافعا اختلفا على ابن عمر:

فرواه سالم، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم في القصتين -العبد، والنخل- جميعا. وروى أحيانا قصة النخل وحده.

ورواه نافع، عن ابن عمر، ففرق بين النخل والعبد، فجعل قصة النخل عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم مرفوعا، وقصة العبد عن ابن عمر، عن عمر بن الخطاب موقوفا.

فاختلف أهل العلم في ترجيح أحدهما على الآخر.

فرجح مسلم قول نافع -وإن كان سالم أحفظ منه-، كما أخرجه البيهقي عن شيخه أبي عبد الله الحافظ قال: سمعت أبا علي الحسين بن علي الحافظ يقول: سمعت أبا حامد أحمد بن محمد بن الحسن يقول: سألت مسلم بن الحجاج رحمه الله عن اختلاف سالم ونافع في قصة العبد. قال: القول ما قال نافع، وإن كان سالم أحفظ منه.

وكذلك قال أيضا النسائي.

وجعل البخاري كلا الحديثين صحيحين، ولم يرجح أحدهما على الآخر.

قال الترمذي في كتاب العلل (1/ 499):"سألت محمدا عن هذا الحديث، وقلت له: حديث الزهري، عن سالم، عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم"من باع عبدا …". وقال نافع: عن ابن عمر، عن عمر. أيهما أصح؟

قال: إن نافعا يخالف سالما في أحاديث، وهذا من تلك الأحاديث، روي سالم عن أبيه، عن النبي صلى الله عليه وسلم. قال نافع: عن ابن عمر، عن عمر. كأنه رأى الحديثين صحيحين أنه يحتمل عنهما جميعا".

وهذا هو الصحيح؛ فإن كلا منهما رويا عن ابن عمر ما سمع منه؛ فإنه نفسه روي مرة، فجمع بين القصتين، وأخرى فرق بينهما، فلا ترجيح لأحدهما على الآخر، بل كلاهما صحيح؛ لأننا وجدنا أن سالما اختصر أحيانا أيضا على قصة النخل دون العبد، وكله صحيح.

وظاهر أحاديث هذا الباب يفيد بأن التأبير هو حد في كون الثمرة تبعا لأصل، فإذا أبرت تفرد حكمها.

فذهب جمهور أهل العلم -منهم مالك، والشافعي، وأحمد- إلى ظاهر هذا الحديث.
وذهب أصحاب الرأي إلى أن الثمر للبائع أبِّر، أو لم يؤبر، إلا أن يشترط المبتاع كالزرع.

وكذلك ظاهر الحديث يفيد بأن مال العبد للبائع إلا أن يشترط المبتاع، وبه قال مالك، والشافعي، وأحمد.

وهذا مبني على اختلاف أهل العلم: هل العبد يملك أو لا؟

فذهب جمهور أهل العلم إلى أن العبد لا يملك إلا ما يملكه سيده، فإذا بيع العبد فيعود ماله إلى سيده، كما يدل عليه الحديث إلا أن يشترط المبتاع. وبالله التوفيق.




ইবনু উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, আল্লাহর রসূল (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি ফল ধারণের (পরাগায়নের) পরে কোনো খেজুর গাছ ক্রয় করে, কিন্তু তার ফলকে (ক্রয়ের শর্ত হিসেবে) শর্তারোপ করেনি, তবে সেই ফলে তার কোনো অধিকার নেই। আর যে ব্যক্তি কোনো গোলাম ক্রয় করে, কিন্তু তার সম্পদকে (ক্রয়ের শর্ত হিসেবে) শর্তারোপ করেনি, তবে সেই সম্পদে তার কোনো অধিকার নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (5346)


5346 - عن أبي هريرة قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أقال مسلما أقاله الله عثرته". وفي رواية:"يوم القيامة".

صحيح: رواه أبو داود (3460)، وابن ماجه (2199)، وعبد الله بن أحمد (7431)، وصحّحه ابن حبان (5030)، والحاكم (2/ 45) كلهم من طريق الأعمش، عن أبي صالح، عن أبي هريرة. فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه ابن حبان (5029)، والقضاعي في مسند الشهاب (453 - 454)، والبيهقي (6/ 27) كلهم من طريق إسحاق بن محمد الفروي، عن مالك بن أنس، عن سُمي، عن أبي صالح بلفظ:"من أقال نادما بيعته …". فزاد فيه لفظ"نادما".

وإسحاق بن محمد الفروي -وإن كان من رجال البخاري- فقد ضعفه غير واحد من أئمة الحديث، فقال النسائي: متروك. وقال الدارقطني: ضعيف. وسببه أنه كف بصره، فساء حفظه، كما قال أبو حاتم: كان صدوقا، ولكن ذهب بصره، فربما لقن، وكتبه صحيحة. وقال مرة: مضطرب الحديث.

فزيادته شاذة؛ لأنه لم يتابعه أحد على هذه الزيادة عن مالك. وقد أشار إليه ابن حبان بقوله: ما روي عن مالك إلا إسحاق الفروي.

وفي معناه ما روي عن أبي شريح قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"من أقال أخاه بيعا أقال الله عثرته يوم القيامة".

رواه الطبراني في"الأوسط" (893) عن أحمد بن يحيى الحلواني، ثنا سعيد بن سليمان، عن شريك، عن عبد الملك بن أبي بشير، عن أبي شريح، فذكره.

وشريك هو ابن عبد الله القاضي سيء الحفظ، يحتاج إلى متابع، ولم أجده، وقد أكد الطبراني أنه لم يرو هذا الحديث عن عبد الملك إلا شريك، وعبد الملك بن أبي بشير لم يرو عن أحد من الصحابة، ففيه انقطاع أيضا، وقول الهيثمي في"المجمع" (4/ 110):"رجاله
ثقات" لا يلزم صحة الإسناد.




আবূ হুরায়রা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে ব্যক্তি কোনো মুসলিমের সাথে কৃত বেচা-কেনা বাতিল (রহিত) করে দেয়, আল্লাহ কিয়ামতের দিন তার ভুলত্রুটি ক্ষমা করে দেন।"









আল-জামি` আল-কামিল (5347)


5347 - عن عائشة قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الخراج بالضمان".

حسن: رواه الشافعي في مسنده (1203) قال: أخبرني من لا أتهم عن ابن أبي ذئب، عن مخلد بن خفاف قال: ابتعت غلاما، فاستغللته، ثم ظهرت منه على عيب، فخاصمت فيه إلى عمر ابن عبد العزيز، فقضى لي برده، وقضى علي برد غلته، فأتيت عروة، فأخبرته، فقال: أروح إليه العشية، فأخبره أن عائشة أخبرتني أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قضى في مثل هذا"أن الخراج بالضمان". فعجلت إلى عمر، فأخبرته ما أخبرني عروة، عن عائشة، عن النبي صلى الله عليه وسلم، فقال عمر بن عبد العزيز:"فما أيسر علي من قضاء قضيته، والله يعلم أني لم أرد فيه إلا الحق، فبلغتني فيه سنة عن رسول الله صلى الله عليه وسلم، فأرد قضاء عمر، وأنفذ سنة رسول الله صلى الله عليه وسلم". فراح إليه عروة، فقضى لي أن آخذ الخراج من الذي قضى به علي له.

ورواه أبو داود (3508)، والنسائي (4502)، والترمذي (1285)، وابن ماجه (2442)، وصحّحه ابن حبان (4928)، والحاكم (2/ 15) كلهم من حديث ابن أبي ذئب بإسناده إلا أنهم لم يذكروا القصة.

قال الترمذي: حسن صحيح. وقد روي هذا الحديث من غير هذا الوجه.

كذا قال في السنن. وقال في"العلل الكبير" (1/ 513):"سألت البخاري عن هذا الحديث، فقال: مخلد بن خطاف لا أعرف له غير هذا الحديث. وهذا حديث منكر". اهـ. إلا أن الترمذي لم يأخذ بقول البخاري.

وللحديث طريق آخر، كما أشار إليه الترمذي، وهو ما رواه هو (1286)، والبيهقي (5/ 322) من طريق عمر بن علي المقدمي، عن هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. فذكرته مثله.

قال الترمذي:"هذا حديث حسن صحيح غريب من حديث هشام بن عروة، وقال: وقد رواه مسلم بن خالد الزنجي هذا الحديث عن هشام بن عروة. ورواه جرير عن هشام أيضًا. وحديث جرير يقال: تدليس، دلس فيه جرير، لم يسمعه من هشام بن عروة". انتهى.

قلت: حديث مسلم بن خالد الزنجي أخرجه أبو داود (3510)، وابن ماجه (2243)، والحاكم (2/ 15)، والبغوي (8/ 162)، وابن الجارود (626) إلا أن أبا داود قال:"هذا إسناد ليس بذاك".

وقال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وسأل الترمذي البخاري عن هذا الإسناد، فقال: إنما رواه مسلم بن خالد الزنجي، ومسلم ذاهب الحديث. فقلت له: قد رواه عمر بن علي، عن هشام بن عروة، فلم يعرفه من حديث عمر ابن علي. قال: قلت له: ترى أن عمر بن علي دلس فيه؟ فقال محمد: لا أعرف أن عمر بن علي
يدلس؟ قلت له: رواه جرير، عن هشام بن عروة؟ فقال: قال محمد بن حميد: إن جريرا روي هذا الحديث في المناظرة، ولا يدرون له فيه سماعا. وقال: وضعف محمد حديث هشام بن عروة. انتهى

إلا أن الترمذي لم يقتنع بكلام البخاري، فحسنه. وكذلك حسنه أيضا البغوي، وصحّحه الشافعي، وابن حبان، والحاكم، والذهبي.

وقال المنذري:"إسناده جيد".

والخلاصة أن هذا الحديث حسن بمجموع أسانيده؛ فإن هذا هو سبيل الحديث الحسن. وفي"التلخيص الحبير" (3/ 22): صحّحه ابن القطان.

ومعنى الحديث: أن المبيع إذا كان مما له دخل وغلة، فإن مالك الرقبة -الذي هو ضامن الأصل- يملك الخراج بضمان الأصل. فإذا ابتاع الرجل أرضا فأشغلها، أو ماشية فنتجها، أو دابة فركبها، أو عبدا فاستخدمه، ثم وجد به عيبا فله أن يرد الرقبة، ولا شيء عليه فيما انتفع به؛ لأنها لو تلفت ما بين مدة العقد والفسخ لكانت من ضمان المشتري، فوجب أن يكون الخراج من حقه. أفاده الخطابي.

إن هذا الحديث كان متداولا بين الفقهاء، فقال بظاهره جمهور أهل العلم إلا أنهم اختلفوا في تفاصيله، كما اختلفوا في نوع المبيع الذي يرد بالعيب، والذي لا يرد به. انظر ما ذكره الخطابي، والبغوي.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: “লাভ হলো জামানতের (দায়িত্বের) বিনিময়ে।”









আল-জামি` আল-কামিল (5348)


5348 - عن عبد الله بن مسعود، عن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"إذا اختلف البيعان، وليس بينهما بينة فهو ما يقول رب السلعة، أو يتتاركان".

حسن: رواه أبو داود (3511)، والنسائي (4652)، والحاكم (2/ 45)، والبيهقي (5/ 332) كلهم من طريق أبي عميس، عن عبد الرحمن بن قيس بن محمد بن الأشعث، عن أبيه، عن جده أن عبد الله بن مسعود باع للأشعث بن قيس رقيقا من رقيق الخمس بعشرين ألف درهم، فأرسل عبد الله في ثمنهم، فقال: إنما أخذتهم بعشرة آلاف، فقال عبد الله: إن شئت حدثتك بحديث سمعته من رسول الله صلى الله عليه وسلم، سمعته يقول. فذكر الحديث.

قال الحاكم:"صحيح الإسناد".

وقال البيهقي:"هذا إسناد حسن موصول، وقد روي من أوجه بأسانيد مراسيل، إذا جمع بينها صار الحديث بذلك قويا". ثم ذكر هذه المراسيل.

قال في"المعرفة" (8/ 140):"وأصح إسناد روي في هذا الباب رواية أبي العميس عن عبد الرحمن بن قيس بن محمد بن الأشعث، عن أبيه، عن جده". ثم ذكر بقية الإسناد.
قلت: ولكن فيه عبد الرحمن بن قيس لم يرو عنه إلا أبو عميس، ولذا قيل فيه إنه"مجهول". وقال ابن حجر في التقريب:"مقبول" أي عند المتابعة.

وقد توبع متابعة قاصرة، رواه الترمذي (1270) عن قتيبة، حدثنا سفيان، عن ابن عجلان، عن عون بن عبد الله، عن ابن مسعود قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"إذا اختلف البيعان فالقول فول البائع، والمبتاع بالخيار".

قال الترمذي:"هذا حديث مرسل، عون بن عبد الله لم يدرك ابن مسعود".

قلت: وللحديث أسانيد أخرى ذكرتها في"المنة الكبرى" (5/ 150).

والخلاصة فيه أن حديث ابن مسعود لا يثبت بوجه من الوجوه، ولكن ضعفه ليس بشديد، فإن بعض طرقه يقوي البعض، ولذا يصح الاستدلال به؛ لأنه أولى من أقوال الرجال.

قال الخطابي في معالمه:"هذا الحديث قد اصطلح عليه الفقهاء على قبوله، وذلك يدل على أن له أصلا، وإن كان في إسناده مقالا، كما اصطلحوا على قبول:"لا وصية لوارث". وإسناده فيه ما فيه".

وقال ابن عبد الهادي في"التنقيح" (4/ 75) بعد أن أخرجه من وجوه كثيرة هو وابن الجوزي:

"والذي يظهر أن حديث ابن مسعود في هذا الباب بمجموع طرقه له أصل، بل هو حديث حسن يحتج به، لكن في لفظه اختلاف، كما ترى".

وظاهر الحديث يدل على أن البائع والمشتري إذا اختلفا في أمر من الأمور المتعلقة بالعقد، فالقول قول البائع، أو يخير المشتري بين أخذ السلعة بالثمن الذي يقوله البائع وبين تركهـ. وأما الفقهاء فاختلفوا فيه اختلافا كثيرا، ذكرت ذلك بالتفصيل في"المنة الكبرى"، فراجعه.



رواه أبو داود (1641) -واللفظ له-، والترمذي (1218)، والنسائي (1412)، وابن ماجه (2198) كلهم من طريق الأخضر بن عجلان، عن أبي بكر الحنفي، عن أنس بن مالك فذكره، واختصره النسائي، ورواه الإمام أحمد (11968)، (12134) مختصرا ومطولا من هذا الوجه، وحسنه الترمذي.

وإسناده ضعيف؛ فيه أبو بكر وهو عبد الله الحنفي، نقل الحافظ ابن حجر في تهذيبه عن البخاري أنه قال:"لا يصح حديثه". وقال ابن القطان الفاسي في"الوهم والإيهام" (5/ 57): إن عبد الله الحنفي لا أعرف أحدا نقل عدالته فهي لم تثبت. وأما تحسين الترمذي له فباعتبار اختلافهم في قبول رواية المساتير، والحنفي المذكور منهم، وقد روت عنه جماعة ليسوا من مشاهير أهل العلم. انتهى مختصرا.

وأما بيع المزايدة فقال الترمذي:"العمل على هذا عند بعض أهل العلم لم يروا بأسا ببيع من يزيد في الغنائم والمواريث". وسيأتي ذكر بعض الأحاديث في"الميراث".



ذهبوا إلى أنه منقطع.

وفي الحديث علة أخرى، وهي أن عبيد الله بن حميد مجهول. سئل عنه ابن معين، فقال:"لا أعرفه". ذكره ابن أبي حاتم في"الجرح والتعديل" (5/ 311). وأما ابن حبان فذكره في الثقات (7/ 144) على قاعدته في توثيق المجاهيل.

وقال بظاهر الحديث أحمد بن حنبل، وإسحاق. وأما أكثر الفقهاء فقالوا: إن ملكها لم يزل عن صاحبها بالعجز عنها، وسبيلها سبيل اللقطة، فإذا جاء ربها وجب على واجدها رد ذلك عليه. أفاده الخطابي.

وقوله:"حسيرا" هو الدابة العاجزة عن المشي.




আবদুল্লাহ ইবনে মাসঊদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম বলেছেন: যখন বিক্রেতা ও ক্রেতা (মূল্য নির্ধারণে) মতবিরোধ করে এবং তাদের কারো কাছেই কোনো সুস্পষ্ট প্রমাণ (দলিল) না থাকে, তখন পণ্যের মালিক (বিক্রেতা) যা বলে তাই গণ্য হবে, অথবা তারা উভয়ে (ক্রয়-বিক্রয়) বাতিল করে দেবে।









আল-জামি` আল-কামিল (5349)


5349 - عن عائشة أن هند بنت عتبة قالت: يا رسول الله، إن أبا سفيان رجل شحيح، وليس يعطيني ما يكفيني وولدي إلا ما أخذت منه، وهو لا يعلم. فقال:"خذي ما يكفيك وولدك بالمعروف".

متفق عليه: رواه البخاري في النفقات (5364)، ومسلم في الأقضية (1714) كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن أبيه، عن عائشة. فذكرته.




আয়িশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, হিন্দ বিনত উতবা বললেন: ইয়া রাসূলাল্লাহ! নিশ্চয় আবু সুফিয়ান একজন কৃপণ লোক, তিনি আমাকে ও আমার সন্তানকে যথেষ্ট হয় এমন পরিমাণ (খরচ) দেন না, তবে যা আমি তার অগোচরে তার থেকে নিয়ে থাকি। তিনি (রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: তুমি তোমার ও তোমার সন্তানের জন্য যথেষ্ট পরিমাণ সঙ্গতভাবে (প্রচলিত প্রথা অনুযায়ী) নাও।









আল-জামি` আল-কামিল (5350)


5350 - عن سمرة بن جندب أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"أيما امرأة زوجها وليان فهي للأول منهما. ومن باع بيعا من رجلين فهو للأول منهما".

صحيح: رواه الترمذي (1110) عن قتيبة، حدثنا غندر، حدثنا سعيد بن أبي عروبة، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب. فذكره.

قال الترمذي:"حديث حسن".

قلت: وهو كما قال؛ فإن فيه سعيد بن أبي عروبة مختلط، ولم يظهر لي متي روي عنه محمد بن جعفر، وهو المعروف بغندر، لكنه توبع.

ومن هذا الوجه رواه أيضا أحمد (20085) إلا أن قال فيه: عن عقبة أو سمرة. الشك من سعيد بن أبي عروبة، فلعله رواه في حالة اختلاطه.

وكذلك رواه ابن ماجه (2190) من حديث خالد بن الحارث عن سعيد بالشك.

والصحيح أنه من حديث سمرة بن جندب، فقد رواه جماعة عن سعيد بن أبي عروبة بدون شك، منهم عبد الوهاب بن عطاء، ومن طريقه رواه الحاكم (2/ 175)، وعنه البيهقي (7/ 140)،
وقد اختلف عليه أيضا، فرواه يحيى بن أبي طالب هكذا بدون شك. ورواه محمد بن إسحاق، حدثنا عبد الوهاب بن عطاء عنه بالشك، ومن هذا الوجه رواه البيهقي.

وممن رواه أيضا بالشك أبو عاصم، عن سعيد بن أبي عروبة عند البيهقي.

وقال:"هذا الاختلاف وقع من ابن أبي عروبة في إسناد هذا الحديث، وقد تابعه أبان العطار عن قتادة في قوله: عن عقبة بن عامر. والصحيح رواية من رواه عن سمرة بن جندب". انتهى.

قلت: هكذا جاء الحديث من غير سعيد بن أبي عروبة، منهم هشام، وهمام، وحماد كلهم عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب، وهؤلاء روايتهم عند أبي داود.

وكذلك رواه ابن ماجه (2191) من حديث وكيع، عن سعيد بن بشر، عن قتادة. وإسناده صحيح، وقد صحّحه أبو زرعة، وأبو حاتم.

قال الحافظ في التلخيص:"وصحته متوقفة على ثبوت سماع الحسن من سمرة؛ فإن رجاله ثقات".

قلت: هؤلاء وغيرهم أثبتوا سماع الحسن من سمرة مطلقا. وهو الذي أقول به، كما ذكرته مرارا.




সمرة ইবনে জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যে কোনো নারীকে যদি দুই অভিভাবক বিবাহ পড়িয়ে দেয়, তবে সে তাদের মধ্যে প্রথমজনের জন্য (বিবাহিতা হবে)। আর যে ব্যক্তি দুই ব্যক্তির কাছে কোনো জিনিস বিক্রি করে, তবে সে তাদের মধ্যে প্রথমজনের জন্য (বিক্রি সম্পন্ন হবে)।"









আল-জামি` আল-কামিল (5351)


5351 - عن أبي بكر -في قصة الهجرة- أنه رضي الله عنه مرَّ على راعي غنم يسوق غنمه إلى الصخرة، فسأله: لمن أنت يا غلام؟ قال: لرجل من قريش سماه، فعرفه، فقال: هل في غنمك لبن؟ قال: نعم. فقال: هل أنت حالب لنا؟ قال: نعم. فحلب له، فأتي به رسول الله صلى الله عليه وسلم، فشرب منه.

صحيح: رواه البخاري في الفضائل (3652) عن عبد الله بن رجاء، حدثنا إسرائيل، عن أبي إسحاق، عن البراء، عن أبي بكر في أثناء قصة الهجرة.




আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত—হিজরতের ঘটনার সময় তিনি এক মেষপালকের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন, যে তার মেষগুলো একটি পাথরের দিকে হাঁকিয়ে নিয়ে যাচ্ছিল। তিনি তাকে জিজ্ঞেস করলেন, "হে বালক, তুমি কার লোক?" সে বলল, কুরাইশের এক ব্যক্তির, যার নাম সে উল্লেখ করল। আবু বকর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) তাকে চিনতে পারলেন। এরপর তিনি জিজ্ঞেস করলেন, "তোমার মেষগুলোর মধ্যে কি দুধ আছে?" সে বলল, "হ্যাঁ।" তিনি বললেন, "তুমি কি আমাদের জন্য দুধ দোহন করে দেবে?" সে বলল, "হ্যাঁ।" অতঃপর সে তার জন্য দুধ দোহন করল। সেই দুধ রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর কাছে আনা হলো, আর তিনি তা পান করলেন।









আল-জামি` আল-কামিল (5352)


5352 - عن سمرة بن جندب أن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أتي أحدكم على ماشية، فإن كان فيها صاحبها فليستأذنه، فإن أذن له فليحتلب وليشرب. وإن لم يكن فيها أحد فليصوت ثلاثا فإن أجابه أحد فليستأذنه، فإن لم يجبه أحد فليحتلب وليشرب، ولا يحمل".

صحيح: رواه أبو داود (2619)، والترمذي (1296) كلاهما من حديث عبد الأعلى، عن سعيد، عن قتادة، عن الحسن، عن سمرة بن جندب. فذكره.

قال الترمذي:"حديث سمرة حديث حسن غريب. والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، وبه يقول أحمد، وإسحاق". وفي بعض النسخ: حسن صحيح غريب.

قلت: وسماع الحسن من سمرة صحيح، كما قال علي بن المديني، وغيره.




সামুরা ইবনু জুনদুব (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, যে নবী (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: "যখন তোমাদের কেউ কোনো পশুর পালের পাশ দিয়ে যায়, যদি সেখানে তার মালিক উপস্থিত থাকে, তবে সে যেন তার কাছে অনুমতি চায়। যদি সে তাকে অনুমতি দেয়, তবে সে যেন দুধ দোহন করে এবং পান করে। আর যদি সেখানে কেউ না থাকে, তবে সে যেন তিনবার উচ্চস্বরে ডাকে। যদি কেউ তার ডাকে সাড়া দেয়, তবে সে যেন তার কাছে অনুমতি চায়। আর যদি কেউ সাড়া না দেয়, তবে সে যেন দুধ দোহন করে এবং পান করে, কিন্তু সে যেন (সাথে) নিয়ে না যায়।"









আল-জামি` আল-কামিল (5353)


5353 - عن عباد بن شرحبيل قال: أصابني سنة، فدخلت حائطا من حيطان المدينة،
ففركت سنبلا، فأكلت، وحملت في ثوبي، فجاء صاحبه، فضربني، وأخذ ثوبي، فأتيت رسول الله صلى الله عليه وسلم، فقال له:"ما علمت إذ كان جاهلا، ولا أطعمت إذ كان جائعا أو قال: ساغبا". وأمره فرد على ثوبي، وأعطاني وسقا، أو نصف وسق من طعام.

صحيح: رواه أبو داود (2630)، والنسائي (5409)، وابن ماجه (2298)، وأحمد (17521)، وصحّحه الحاكم (4/ 133) كلهم من طريق أبي بشر جعفر بن إياس أبي وحشية قال: سمعت عباد بن شرحبيل. فذكره. وإسناده صحيح.

وقوله:"ساغبا" أي جائعا.




আব্বাদ ইবনে শুরাহবীল (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: আমার উপর একবার দুর্ভিক্ষ আপতিত হলো। তখন আমি মদীনার একটি বাগানে প্রবেশ করলাম। আমি কয়েকটি শীষ ডলে (দানা বের করে) খেলাম এবং কিছু আমার কাপড়ে ভরে নিলাম। এরপর তার মালিক এসে আমাকে মারলো এবং আমার কাপড়টি কেড়ে নিল। আমি রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর নিকট গেলাম। তিনি (মালিককে) বললেন: "তুমি তো তাকে শিক্ষা দাওনি যখন সে অজ্ঞ ছিল, আর না তাকে খাইয়েছো যখন সে ক্ষুধার্ত ছিল, কিংবা (রাবী বললেন:) যখন সে সাগিব (ক্ষুধার্ত) ছিল।" এরপর তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) তাকে নির্দেশ দিলেন, ফলে সে আমার কাপড়টি ফিরিয়ে দিল এবং আমাকে এক ওয়াসাক কিংবা অর্ধ ওয়াসাক খাবার দিল।









আল-জামি` আল-কামিল (5354)


5354 - عن أبي سعيد، عن النبي صلى الله عليه وسلم قال:"إذا أتيت على راع فناد ثلاث مرات، فإن أجابك وإلا فاشرب في غير أن تفسد، وإذا أتيت على حائط بستان فناد صاحب البستان ثلاث مرات، فإن أجابك وإلا فكل في أن لا تفسد".

صحيح: رواه ابن ماجه (2300) -واللفظ له-، وأحمد (11159)، وصحّحه ابن حبان (5281)، والحاكم (4/ 132) كلهم من طريق يزيد بن هارون قال: أنبأنا الجريري، عن أبي نضرة، عن أبي سعيد فذكره. وزادوا:"الضيافة ثلاثة أيام، فما زاد فهو صدقة".

قال الحاكم:"صحيح على شرط مسلم".

قلت: وهو كما قال إلا أن الجريري وهو سعيد بن إياس اختلط في أخرة. ويزيد بن هارون روى عنه في حالة اختلاطه، وتابعه حماد بن سلمة، وهو روى عنه قبل اختلاطه، ومن طريقه رواه أحمد (11045) عن مؤمل بن إسماعيل، عنه، عن الجريري بإسناده نحوه.




আবূ সাঈদ (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেন: যখন তুমি কোনো রাখালের কাছে যাও, তখন তাকে তিনবার ডাকো। যদি সে জবাব দেয় (তবে ভালো), অন্যথায় তুমি পান করো, তবে কোনো ক্ষতি না করে। আর যখন তুমি কোনো বাগান বা ফলবাগানের দেওয়ালের কাছে যাও, তখন বাগানের মালিককে তিনবার ডাকো। যদি সে জবাব দেয়, অন্যথায় তুমি খাও, তবে কোনো ক্ষতি না করে।









আল-জামি` আল-কামিল (5355)


5355 - عن عمرو بن شعيب، عن أبيه، عن جده أن رسول الله صلى الله عليه وسلم سئل عن التمر المعلق، فقال:"من أصاب منه من ذي حاجة غير متخذ خبنة فلا شيء عليه".

حسن: رواه أبو داود (1710)، والنسائي (4958)، والترمذي (1289) كلهم عن قتيبة، حدثنا الليث، عن ابن عجلان، عن عمرو بن شعيب بإسناده. واللفظ للترمذي.

قال الترمذي:"حديث حسن".

قلت: وهو كما قال؛ فإن عمرو بن شعيب حسن الحديث.

قال الترمذي عقب حديث سمرة بن جندب:"والعمل على هذا عند بعض أهل العلم، وبه يقول أحمد، وإسحاق".

وذلك لغير المضطر. وأما المضطر فلا خلاف بين أهل العلم أنه يجوز له أن يحلب بغير إذن صاحبه. واختلفوا هل عليه ضمان، أم لا؟ .

وفي الباب ما روي عن ابن عمر، عن النبي صلى الله عليه وسلم أنه قال:"من دخل حائطا فليأكل، ولا يتخذ خبنة".
رواه الترمذي (1278)، وابن ماجه (2301) كلاهما عن يحيى بن سُليم الطائفي، عن عبيد الله ابن عمر، عن نافع، عن ابن عمر فذكره.

ويحيى بن سليم الطائفي مختلف فيه غير أنه حسن الحديث إلا في روايته عن عبيد الله بن عمر، فإنه أخطأ فيه، كما قال الساجي، وقال النسائي: هو منكر الحديث عن عبيد الله بن عمر. ولذا غرَّبه الترمذي، وقال: لا نعرفه من هذا الوجه إلا من حديث يحيي بن سليم.

وقال في"العلل الكبير" (1/ 516):"سألت محمدا عن هذا الحديث، فقال: يحيى بن سليم يروي أحاديث عن عبيد الله بهم فيها. كأنه لم يعرف هذا الحديث إلا من حديث يحيي بن سليم".

وقوله:"خبنة" أي لا يجعل شيئا في ثوبه.

وفي الباب روي أيضا عن رافع بن عمرو قال: كنت أرمي نخل الأنصار، فأخذوني، فذهبوا بي إلى النبي صلى الله عليه وسلم، فقال:"يا رافع، لم ترمي نخلهم؟". قال: قلت: يا رسول الله، الجوع. قال:"لا ترم، وكل ما وقع، أشبعك الله وأرواك".

رواه الترمذي (1288)، والحاكم (3/ 444) كلاهما من حديث الفضل بن موسى، عن صالح ابن أبي جبير، عن أبيه، عن رافع بن عمرو فذكره.

قال الترمذي:"حسن غريب".

وصالح بن أبي جبير وأبوه لم يوثّقهما غير ابن حبان، وجهلهما الآخرون.

قال الترمذي:"سألت محمدا عن هذا الحديث، فقال: لا أعرف هذا إلا من حديث الفضل ابن موسي. وصالح بن أبي جبير لا أعرف اسم أبيه". (العلل 1/ 517).

قلت: وله إسناد آخر، وهو ما رواه أبو داود (2622)، وابن ماجه (2299)، وأحمد (20343)، والحاكم كلهم من حديث معتمر بن سليمان قال: سمعت ابن أبي الحكم الغفاري قال: حدثتني جدتي، عن عم أبيها رافع بن عمرو فذكر نحوه. وزادوا: ومسح رأسي، وقال:"اللَّهم اشبع بطنه". وفيه ابن أبي الحكم وجدته لا يعرفان.




আবদুল্লাহ ইবনু আমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লামকে গাছে ঝুলে থাকা খেজুর সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করা হলো। তিনি বললেন: "যে অভাবগ্রস্ত ব্যক্তি নিজের প্রয়োজনমতো এর থেকে গ্রহণ করে এবং (কাপড়ের) আঁচলে লুকিয়ে বা থলে বানিয়ে নিয়ে যায় না, তার উপর কোনো পাপ নেই।"









আল-জামি` আল-কামিল (5356)


5356 - عن عبد الله بن عمر أن رسول الله صلى الله عليه وسلم قال:"لا يحتلبن أحد ماشية أحد بغير إذنه، أيحب أحدكم أن تؤتي مشربته فتكسر خزانته، فينتقل طعامه، وإنما تخزن لهم ضروع مواشيهم أطعمتهم، فلا يحتلبن أحد ماشية أحد إلا بإذنه".

متفق عليه: رواه مالك في الاستئذان (17) عن نافع، عن عبد الله بن عمر قال: فذكره.

ورواه البخاري في اللقطة (2435)، ومسلم في اللقطة (1726) كلاهما من حديث مالك به مثله.




আব্দুল্লাহ ইবনে উমর (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বলেছেন: কেউ যেন কারো অনুমতি ছাড়া অন্যের গৃহপালিত পশুর দুধ দোহন না করে। তোমাদের কেউ কি এটা পছন্দ করে যে, তার ভাণ্ডার কক্ষে প্রবেশ করে তার সিন্দুক ভেঙে দেওয়া হবে এবং তার খাদ্যসামগ্রী নিয়ে যাওয়া হবে? নিশ্চয় তাদের গৃহপালিত পশুর স্তনগুলো তাদের জন্য খাদ্য সঞ্চয় করে রাখে। অতএব, কেউ যেন কারো গৃহপালিত পশুর দুধ তার অনুমতি ছাড়া দোহন না করে।









আল-জামি` আল-কামিল (5357)


5357 - عن أم هانئ، أن النبي صلى الله عليه وسلم قال لها:"اتخذي غنما؛ فإن فيها بركة".

صحيح: رواه ابن ماجه (2304)، وأحمد (23781) كلاهما من حديث هشام بن عروة، عن أبيه عروة بن الزبير، عن أم هانئ فذكرته، وإسناده صحيح.

قال الدارقطني في"العلل" (15/ 368):"والصحيح قول من قال: عن هشام، عن أبيه، عن أم هانئ".

وهو يشير إلى رواية من رواه عن هشام، عن أبيه، عن عائشة. وكذا من رواه عن هشام، عن أبيه أن رسول الله صلى الله عليه وسلم جاء إلى أم هانئ، فقال لها ذلك. فيكون مرسلا؛ لأن عروة لم يحضر القصة.

وللحديث إسناد آخر: رواه الإمام أحمد (26902) عن إبراهيم بن خالد قال: حدثني رباح، عن معمر، عن أبي عثمان الجحشي، عن موسى -أو فلان- بن عبد الرحمن بن أبي ربيعة، عن أم هانئ قال لها النبي صلى الله عليه وسلم:"اتخذي غنما يا أم هانئ؛ فإنها تروح بخير، وتغدو بخير".

إلا أن فيه مجاهيل، وكذا أعله أيضا الهيثمي في"المجمع" (4/ 66).




উম্মে হানী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম তাঁকে বললেন: "তোমরা ভেড়া/ছাগল পালন করো; কেননা এর মধ্যে বরকত রয়েছে।"









আল-জামি` আল-কামিল (5358)


5358 - عن عروة البارقي يرفعه قال:"الإبل عز لأهلها، والغنم بركة، والخير معقود في نواصي الخيل إلى يوم القيامة".

صحيح: رواه ابن ماجه (2305) عن محمد بن عبد الله بن نمير قال: حدثنا عبد الله بن إدريس، عن حصين، عن عامر، عن عروة البارقي فذكره. وإسناده صحيح.

ورواه أيضا ابن أبي عاصم في"الآحاد والمثاني" (4/ 362)، والطبراني في"الكبير" (17/ 156) كلاهما من وجه آخر، عن عبد الله بن إدريس به مثله.

وعبد الله بن إدريس هو الأودي أبو محمد الكوفي ثقة ضابط.

ولكن رواه مسلم (1872: 99) عنه بدون زيادة الإبل والغنم، فلعله كان يحدث مرة بحديث الفرس وحده، وأخرى بزيادة الإبل والغنم، وكلاهما صحيح.

قال ابن مفلح في"الآداب الشرعية" (2/ 417): ولابن ماجه بإسناد جيد من حديث عروة البارقي"الإبل عز لأهلها، والغنم بركة، والخير معقود في نواصي الخيل إلى يوم القيامة". أخرجه بتمامه ابن ماجه، وأبو يعلى، وإسناده صحيح، ورواه البرقاني على شرط الصحيحين. اهـ.

وأما ما روي عن ابن عمر قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"الشاة من دواب الجنة" فهو ضعيف.

رواه ابن ماجه (2306) عن عصمة بن الفضل النيسابوري ومحمد بن فراس أبي هريرة الصيرفي قالا: حدثنا حرمي بن عمارة قال: حدثنا زربي إمام مسجد هشام بن حسان قال: حدثنا محمد بن سيرين، عن ابن عمر فذكره.
وزربي -بفتح الزاي، وسكون الراء- هو ابن عبد الله الأزدي مولاهم أبو يحيي البصري ضعيف. قال البخاري:"فيه نظر". وقال الترمذي:"له أحاديث مناكير".

قلت: وهذا منها؛ فإنه لم يعرف هذا الحديث عن محمد بن سيرين إلا من طريقه.




উরওয়াহ আল-বারিকী (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: উট তার মালিকের জন্য ইজ্জত, আর ছাগল হলো বরকত; এবং কিয়ামত পর্যন্ত ঘোড়ার কপালে কল্যাণ (মঙ্গল) বাঁধা রয়েছে।









আল-জামি` আল-কামিল (5359)


5359 - عن عائشة قالت: كان على رسول الله صلى الله عليه وسلم ثوبان قطريان غليظان، فكان إذا قعد فعرق ثقلا عليه، فقدم بَزٌّ من الشام لفلان اليهودي، فقلت: لو بعثت إليه، فاشتريت منه ثوبين إلى الميسرة، فأرسل إليه، فقال: قد علمت ما يريد، إنما يريد أن يذهب بمالي أو بدراهمي. فقال رسول الله صلى الله عليه وسلم:"كذب، قد علم أني من أتقاهم الله وآداهم للأمانة".

صحيح: رواه الترمذي (1213)، والنسائي (4628)، وصحّحه الحاكم (2/ 23 - 24)، كلهم من حديث يزيد بن زريع، عن عمارة بن أبي حفصة، عن عكرمة، عن عائشة فذكرته.

قال الترمذي:"حسن غريب صحيح".

وقال الحاكم:"صحيح على شرط البخاري".

قال الترمذي، والحاكم:"وقد رواه شعبة أيضا عن عمارة بن أبي حفصة".

قلت: ومن طريق شعبة رواه الإمام أحمد (25141)، والحاكم مثله.

قال الترمذي:"وسمعت محمد بن فراس البصري يقول: سمعت أبا داود يقول: سئل شعبة يوما عن هذا الحديث، فقال: لست أحدثكم حتى تقوموا إلى حرمي بن عمارة بن أبي حفصة، فتقبلوا رأسه. قال: وحرمي في القوم".

قال الترمذي:"أي إعجابا بهذا الحديث".

وقوله:"إلى الميسرة" أي أجل معلوم، يكون فيه يسر، وإلا فجهالة الأجل مفسدة للبيع.

وفي معناه ما روي عن أنس بن مالك قال: بعثني رسول الله صلى الله عليه وسلم إلى حليق النصراني ليبعث إليه بأثواب إلى الميسرة، فأتيته، فقلت: بعثني إليك رسول الله صلى الله عليه وسلم لتبعث إليه بأثواب إلى الميسرة، فقال: وما الميسرة؟ ومتى الميسرة؟ والله ما لمحمد تاغية، ولا راغية، فرجعت، فأتيت النبي صلى الله عليه وسلم، فلما رآني قال:"كذب عدو الله، أنا خير من بايع، لأن يلبس أحدكم ثوبا من رقاع شتي خير له من أن يأخذ بأمانته -أو في أمانته- ما ليس عنده".

رواه أحمد (13559) عن محمد بن يزيد، حدثنا أبو سلمة صاحب الطعام قال: أخبرني جابر ابن يزيد -وليس بجابر الجعفي- عن الربيع بن أنس، عن أنس فذكره. وأبو سلمة، وجابر بن يزيد مجهولان.
وقال الهيثمي في"المجمع" (4/ 125):"جابر بن يزيد لم أجد من ترجمه".

ورواه البزار -كشف الأستار (1305) - من وجه آخر، وفيه أسيد بن زيد ضعيف.




আয়েশা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন, রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম)-এর পরিধানে দুটি মোটা কাতরি (ইয়েমেনের এক প্রকার কাপড়) চাদর ছিল। তিনি বসলে এবং ঘামলে চাদর দুটি তাঁর উপর ভারী লাগত। অতঃপর জনৈক ইহুদীর জন্য সিরিয়া থেকে কিছু কাপড় (বা পণ্যদ্রব্য) আগমন করল। আমি বললাম, যদি আপনি তার কাছে লোক পাঠান এবং সহজলভ্য হওয়া পর্যন্ত (বা নির্দিষ্ট সময় পর্যন্ত) তার কাছ থেকে দুটি কাপড় কিনে নেন। অতঃপর তিনি তার কাছে লোক পাঠালেন। সে (ইহুদীর লোক) বলল: আমি জানি, তিনি কী চান। তিনি কেবল আমার সম্পদ বা আমার দিরহামগুলো নিয়ে যেতে চান। রাসূলুল্লাহ (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) বললেন: "সে মিথ্যা বলেছে। সে অবশ্যই জানে যে আমি আল্লাহকে তাদের মধ্যে সবচেয়ে বেশি ভয় করি এবং আমানত রক্ষায় তাদের মধ্যে সবচেয়ে বেশি বিশ্বস্ত।"









আল-জামি` আল-কামিল (5360)


5360 - عن أنس بن مالك قال: كان بالمدينة فزع، فاستعار النبي صلى الله عليه وسلم فرسا من أبي طلحة يقال له: المندوب، فركب، فلما رجع قال:"ما رأينا من شيء، وإن وجدناه لبحرا".

متفق عليه: رواه البخاري في الهبة (2627)، ومسلم في الرؤيا (2307) كلاهما من حديث شعبة، عن قتادة قال: سمعت أنسا يقول فذكره.




আনাস ইবনু মালিক (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা) থেকে বর্ণিত, তিনি বলেন: মদীনায় একবার আতঙ্কের সৃষ্টি হলো। তখন নবী করীম (সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়া সাল্লাম) আবূ তালহা (রাদ্বিয়াল্লাহু আনহুমা)-এর নিকট থেকে 'আল-মানদূব' নামক একটি ঘোড়া ধার নিলেন এবং তাতে আরোহণ করলেন। অতঃপর যখন তিনি ফিরে আসলেন, তখন বললেন: "আমরা (ভয় পাওয়ার মতো) কিছুই দেখিনি, বরং আমরা তো এই ঘোড়াকে সাগরের মতো (দ্রুতগামী) পেয়েছি।"